रविवार, 24 मई 2026

सर्किट हाउस जमींदोज, आरटीआई में जांच रिपोर्ट 'लापता'

 पीडब्ल्यूडी का 'डिमोलिशन खेल': 95 साल पुराना मजबूत सर्किट हाउस जमींदोज, आरटीआई में जांच रिपोर्ट 'लापता'



 हेरिटेज बिल्डिंग गिराने के नाम पर करोड़ों के 'संगठित खेल' की बू; बिना तकनीकी कमेटी और फॉर्म नंबर 136 के ही ढहा दिया ब्रिटिश काल का ऐतिहासिक ढांचा।

 प्रदेश में करीब 50 और सरकारी भवनों के नवनिर्माण की तैयारी, आरटीआई एक्टिविस्ट ने लगाया भ्रष्टाचार का गंभीर आरोप।


छत्तीसगढ़ का लोक निर्माण विभाग (PWD) एक बार फिर बड़े विवादों के घेरे में है। उपमुख्यमंत्री व पीडब्ल्यूडी मंत्री अरुण साव के कार्यकाल के दौरान विभाग पर एक ऐसा गंभीर आरोप लगा है, जिसने विभाग की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला राजधानी रायपुर के 95 साल पुराने ऐतिहासिक सर्किट हाउस (ओल्ड बिल्डिंग) को जमींदोज करने और उससे जुड़ी तकनीकी जानकारियों को आरटीआई (सूचना के अधिकार) के तहत छुपाने का है।

आरोप है कि जिस ब्रिटिश कालीन मजबूत इमारत को 100 साल और सुरक्षित रखा जा सकता था, उसे सिर्फ नए निर्माण और 'कमीशन के खेल' के लिए आनन-फानन में ढहा दिया गया। चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरी कवायद में नियमों को ताक पर रखने की बात सामने आ रही है।

लाखों खर्च कर संवारा, फिर चला दिया बुलडोजर

सूत्रों और आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार, पिछली सरकारों के दौरान ही इस सर्किट हाउस के कई कमरों को चमकाने, नई टाइल्स और दरवाजे लगाने में लाखों-करोड़ों रुपए खर्च किए गए थे। जनता की गाढ़ी कमाई से हुए इस जीर्णोद्धार के कुछ समय बाद ही अचानक इस पूरी बिल्डिंग को 'जर्जर' घोषित कर नेस्तनाबूद कर दिया गया।

आरटीआई में खुलासा: गायब है फॉर्म नंबर 136 और जांच प्रतिवेदन

इस पूरे मामले को लेकर आरटीआई एक्टिविस्ट राकेश चौबे ने विभाग से जब जानकारी मांगी, तो पीडब्ल्यूडी के अफसरों के हाथ-पांव फूल गए। राकेश चौबे के मुताबिक:

1 विभाग ने पहली आरटीआई में सिर्फ इतना जवाब दिया कि "भवन जर्जर हो चुका था, इसलिए इसे तोड़ा गया।"

2 जब दोबारा आरटीआई लगाकर भवन के निरीक्षण की तकनीकी रिपोर्ट मांगी गई, तो विभाग कोई पुख्ता दस्तावेज नहीं दे सका।

3 नियमतः किसी भी सरकारी बिल्डिंग को तोड़ने से पहले तकनीकी विशेषज्ञों और इंजीनियरों की 3 से 5 सदस्यीय कमेटी बनती है। यह कमेटी 'फॉर्म नंबर 136' (निरीक्षण रिपोर्ट) पर हस्ताक्षर करती है। लेकिन इस मामले में न तो कोई आधिकारिक जांच प्रतिवेदन है और न ही फॉर्म नंबर 136।

आरोप लग रहे हैं कि किसी एक चहेते इंजीनियर की कथित मौखिक या फर्जी रिपोर्ट के आधार पर इस ऐतिहासिक हेरिटेज ढांचे को गिरा दिया गया, ताकि नए सिरे से करोड़ों का टेंडर निकाला जा सके।

क्या प्रदेश में सक्रिय है 'संगठित डिमोलिशन गिरोह'?

आरटीआई एक्टिविस्ट राकेश चौबे का कहना है कि यह केवल एक बिल्डिंग का मामला नहीं है। विभाग अब प्रदेश भर में ऐसे लगभग 50 सरकारी प्रोजेक्ट्स और भवनों को फिर से नवनिर्मित (पुनर्वास) करने की तैयारी कर रहा है। आशंका जताई जा रही है कि तोड़ने और दोबारा बनाने के नाम पर विभाग में एक 'संगठित गिरोह' काम कर रहा है, जिसका मुख्य उद्देश्य सरकारी पैसे का बंदरबांट करना है।

हेरिटेज को सहेजने के बजाय मिटा दी पहचान

विशेषज्ञों के अनुसार, ब्रिटिश शासनकाल के दौरान बनी इस इमारत के स्ट्रक्चर में लगे बीम, कॉलम और लोहे इतने मजबूत थे कि यह इमारत अगली एक सदी तक खड़ी रह सकती थी। जहां एक तरफ ऐतिहासिक इमारतों को 'हेरिटेज' घोषित कर सहेजा जाता है, वहीं रायपुर में पीडब्ल्यूडी ने इसे मलबे में तब्दील कर दिया।

मामला जाएगा अपीलीय फोरम और कोर्ट

जानकारी छुपाने और टालमटोल रवैये को लेकर आरटीआई एक्टिविस्ट अब विभाग के प्रथम अपीलीय अधिकारी के पास जा रहे हैं। यदि वहां भी सही जानकारी (निरीक्षण रिपोर्ट और फॉर्म 136) नहीं मिलती है, तो मामले को संबंधित सक्षम फोरम और न्यायालय में ले जाने की तैयारी है, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।

बड़ा सवाल: मुख्यमंत्री के कड़े रुख के बाद भी PWD बेलगाम क्यों?

एक तरफ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय राजस्व जैसे विभागों में सालों से जमे अधिकारियों और पटवारियों को हटाने के कड़े आदेश दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पीडब्ल्यूडी में सालों से एक ही मलाईदार कुर्सी पर जमे अधिकारियों की 'रीति-नीति' पर कोई अंकुश नहीं दिख रहा है। अब देखना यह होगा कि भ्रष्टाचार के इन गंभीर आरोपों पर उपमुख्यमंत्री अरुण साव और मुख्यमंत्री साय क्या संज्ञान लेते हैं।

Vidio देखें 

https://youtu.be/7aEMtv3yqPE?si=f_h2rBwdRnHYnrsw


कहानी: 'चुनावी चाय' और बंधुआ रिमोट

 कहानी: 'चुनावी चाय' और बंधुआ रिमोट


एक बार की बात है, छत्तीसगढ़ के "सियासतपुर" गांव के चौराहे पर मंगलू की चाय दुकान सजी हुई थी। मंगलू की दुकान की खासियत थी कि वहां चाय कम और राजनीति की कड़क चर्चाएं ज्यादा उबलती थीं।

शाम का समय था, और तभी 'वीरू  बाबू' (जो गांव के नए मुखिया बने थे) वहां आकर बैठ गए। वीरू बाबू थोड़े परेशान दिख रहे थे। वह अपनी चाय का घूंट ले ही रहे थे कि तभी वहां से हाथ में झोला टांगे और 125 किलोमीटर की 'पैदल न्याय यात्रा' करके आ रहे ' भोपू भैया' अपनी टोली के साथ गुजरे।

भोपू भैया ने जैसे ही वीरू बाबू को देखा, उन्होंने जोर से ताना मारा, "अरे वीरू  बाबू! अपनी चाय की केतली तो संभाल लो! गांव में बिजली कट रही है, स्कूल के बच्चे परेशान हैं, और आप यहां आराम से चाय पी रहे हो? पहले अपनी केतली की समीक्षा करो!"

विरु  बाबू ने मुस्कुराते हुए कहा, "भैया, सब ठीक चल रहा है। मैं तो बस गांव की कानून-व्यवस्था देख रहा हूं।"

इस पर भोपू भैया हंसते हुए बोले, "अरे क्या देख रहे हो! रिमोट कंट्रोल तो नागपुर वाले भाईसाहब के पास है। तुम तो बस वहां के 'बंधुआ मजदूर' बन गए हो [! बटन वहां दबता है, और चाय तुम्हारी दुकान पर उबलती है!"

"बंधुआ मजदूर" का शब्द सुनते ही पूरी चाय दुकान पर सन्नाटा छा गया!

तभी कोने में बैठे एक बुजुर्ग ने हुक्का गुड़गुड़ाते हुए कहा, "भैया हो! राजनीति भी अजब चीज है। जब भोपू भैया सत्ता में थे, तब विपक्ष उन पर निशाना साधता था, उनके पूरे परिवार के खातों की जांच की बातें होती थीं । अब वीरू बाबू  आए हैं, तो भोपू भैया उन पर 'नागपुर का रिमोट' होने का ठप्पा लगा रहे हैं।"

भोपू भैया ने कड़क चाय का एक कुल्हड़ हाथ में लिया और बोले, "हम डरने वाले नहीं हैं बाबू! चाहे जितने हमले हों, जनता के लिए हमारी न्याय यात्रा चलती रहेगी!"

वीरू  बाबू ने भी मुस्कुराते हुए अपनी चाय खत्म की और कहा, "भैया, रिमोट किसी के हाथ में हो या न हो, पर चाय तो मंगलू के हाथ की ही कड़क रहेगी!"

सीख: राजनीति में चाहे कितने भी "घाट-प्रतिघात"  और तीखे बयान चलें, चाय की दुकान पर बैठने वाली जनता सब समझती है और अंत में मजे लेकर अपनी कड़क चाय का आनंद उठाती है!


Vidio देखें 


https://youtu.be/n7CJrZDoC_c?si=fd2tDg2AEfsOljZW



शनिवार, 23 मई 2026

धर्म के 'सौदागर' और राजनीति का 'झूठा' खेल: पाखंड का पर्दाफाश!

 धर्म के 'सौदागर' और राजनीति का 'झूठा' खेल: पाखंड का पर्दाफाश!



जब बात धर्म की राजनीति करने और दूसरों पर उंगली उठाने की हो, तो कुछ राजनेताओं की जुबान सबसे तेज चलती है। लेकिन जब खुद की ही निष्ठा और पवित्रता कसौटी पर हो, तो ये नेता कैमरे के सामने ऐसे बेनकाब होते हैं कि उनकी बोलती बंद हो जाती है। उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध महाकाल मंदिर से एक ऐसा ही सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने कथित 'धर्म रक्षकों' के दोहरे चरित्र को सरेआम उजागर कर दिया है

महाकाल का प्रसाद और बीजेपी नेता की 'झूठ'

तिरुपति मंदिर के लड्डू विवाद को लेकर देश में मचे शुद्धिकरण और प्रायश्चित के शोर के बीच, अब बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन से एक शर्मनाक वीडियो वायरल हुआ है । यह वीडियो किसी विपक्षी दल के नेता का नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) के महामंत्री संजय अग्रवाल का है ।

दरअसल, महाकाल मंदिर परिसर में एक गेट गिरने से हुए हादसे का निरीक्षण करने बीजेपी के नेता पहुंचे थे। इस दौरान उन्हें वहां प्रसाद (लड्डू-पैकेट के लिए चना) बनने की प्रक्रिया दिखाने ले जाया गया । लेकिन कैमरे में जो कैद हुआ, उसने आस्थावानों के पैरों तले जमीन खिसका दी। बीजेपी नेता संजय अग्रवाल ने प्रसाद के चने की सामग्री में से एक मुट्ठी चना उठाया, उसे चखा (मुंह में डाला) और उसी हाथ में बचे हुए चने को वापस प्रसाद के ढेर में डाल दिया !

करोड़ों भक्तों की आस्था के प्रतीक बाबा महाकाल के महाप्रसाद को इस तरह 'जूठा' करने का वीडियो जैसे ही कांग्रेस ने जारी किया, वैसे ही हड़कंप मच गया ।

चौतरफा घिरे तो मांगी माफी, पर 'हिंदुत्व' के ठेकेदार चुप क्यों?

वीडियो के सोशल मीडिया पर आग की तरह फैलते ही चारों तरफ थू-थू होने लगी। खुद को चौतरफा घिरा देख बीजेपी नेता संजय अग्रवाल ने तुरंत सफाई दी और माफी मांग ली । उन्होंने दलील दी कि मुंह में डालने के बाद हाथ में बची सामग्री झूठी नहीं हुई थी । लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या आस्था के साथ इस तरह का खिलवाड़ माफी योग्य है?

सबसे बड़ा और तीखा सवाल उन तमाम तथाकथित हिंदू संगठनों और कट्टरपंथियों पर उठता है, जो दूसरों की छोटी सी चूक पर भी सड़कों पर उतर आते हैं, 'थूक जिहाद' जैसे नैरेटिव गढ़ने लगते हैं और प्रधानमंत्री तक का खून खौल उठता है । आज वही संगठन इस मामले पर पूरी तरह 'मौन व्रत' धारण किए हुए हैं । आखिर यह चुप्पी क्यों? क्या हिंदुत्व की भावनाएं सिर्फ तभी आहत होती हैं जब आरोपी विपक्ष का हो या किसी दूसरे समुदाय का ?

डबल इंजन की सरकार में 'ढहती' व्यवस्था

यह घटना उस वक्त की है जब महाकाल मंदिर का एक द्वार ढहने से दो मासूमों की जान चली गई और कई लोग घायल हो गए थे । इससे पहले भी उज्जैन में आए आंधी-तूफान में करोड़ों की लागत से बनी मूर्तियां ताश के पत्तों की तरह बिखर गई थीं, जिन्हें जेसीबी से बेहद अमानवीय और मनमाने तरीके से उठाया गया था ।

चाहे अयोध्या के राम मंदिर की छत से पानी टपकने का मामला हो या महाकाल में घोटालों और हादसों की फेहरिस्त—इस डबल इंजन की सरकार में आस्था के केंद्रों का रख-रखाव और नेताओं का आचरण, दोनों ही कटघरे में हैं ।

बड़ा सवाल: आस्था पर विश्वासघात कब तक?

यह वीडियो उन तमाम लोगों की आंखें खोलने के लिए काफी है, जो धर्म की पट्टी बांधकर किसी एक राजनीतिक दल या संगठन पर आंख मूंदकर भरोसा करते हैं । सच तो यह है कि आम जनता की भावनाओं और श्रद्धा के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात वही लोग कर रहे हैं, जो खुद को धर्म का सबसे बड़ा अलमबरदार बताते हैं ।

महाकाल के दरबार में हुआ यह कृत्य महज एक नेता की लापरवाही नहीं, बल्कि सत्ता के अहंकार और धर्म के नाम पर की जाने वाली पाखंडी राजनीति का सरेआम सबूत है।

Vidio देखें 


https://youtu.be/YEPHEl0KUSU?si=LdiZpzoNDkWLk4P8


शुक्रवार, 22 मई 2026

छत्तीसगढ़ के हक पर 'सर्जिकल स्ट्राइक', मुनाफे वाली कंपनी गई

छत्तीसगढ़ के हक पर 'सर्जिकल स्ट्राइक', मुनाफे वाली कंपनी गई 


 छत्तीसगढ़ के संसाधनों और औद्योगिक पहचान पर दिल्ली से एक और बड़ा प्रहार हुआ है। हसदेव के जंगलों में चल रही हलचल के बीच, अब मध्य भारत के स्टील हब 'भिलाई' की धड़कन कहे जाने वाले फेरो स्क्रैप निगम लिमिटेड (FSNL) को केंद्र सरकार ने विदेशी हाथों में सौंप दिया है। लगातार मुनाफे में चल रही और भिलाई स्टील प्लांट (BSP) की रीढ़ मानी जाने वाली इस सरकारी कंपनी को जापान की 'कोनोई ट्रांसपोर्ट कंपनी लिमिटेड' (Konoike Transport Co. Ltd.) ने महज 320 करोड़ रुपये की उच्चतम बोली लगाकर खरीद लिया है।

इस सौदे के सामने आते ही भिलाई सहित पूरे प्रदेश के श्रमिक संगठनों, जागरूक नागरिकों और राजनीतिक गलियारों में आक्रोश का माहौल है। सवाल उठ रहे हैं कि जो कंपनी खुद हर साल सरकार की झोली में करोड़ों का मुनाफा डाल रही थी, उसे बेचने की इतनी जल्दबाजी क्यों थी?

कैसा अर्थशास्त्र: 3 साल के मुनाफे की कीमत पर पूरी कंपनी साफ!

विभागीय सूत्रों और वित्तीय आंकड़ों पर नजर डालें तो FSNL का यह विनिवेश किसी बड़े घोटाले से कम नजर नहीं आता।

 सालाना मुनाफा: FSNL कोई बीमार या घाटे में चल रही इकाई नहीं थी। यह हर साल औसतन 100 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा कमाकर केंद्र सरकार को दे रही थी।

 पेंडिंग ऑर्डर्स: विनिवेश के वक्त भी कंपनी के पास स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAIL) के विभिन्न प्लांटों से जुड़े 1000 करोड़ रुपये से अधिक के ठेके (वर्क ऑर्डर) पेंडिंग थे।

 खुद की संपत्ति: कंपनी के पास 50 करोड़ रुपये से अधिक की तो अपनी अचल संपत्ति और इंफ्रास्ट्रक्चर है। वहीं शेयर बाजार में भी इस कंपनी की साख मजबूत थी और इसके शेयर की कीमत 729 रुपये के स्तर को छू रही थी।

जानकारों का कहना है कि जो कंपनी अगले तीन साल में अपनी बिक्री की पूरी कीमत (320 करोड़) खुद कमाकर सरकारी खजाने को लौटा देती, उसे महज इतनी छोटी रकम में जापान की कंपनी को सौंप देना केंद्र सरकार की नीति और नीयत दोनों पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

तीन केंद्रीय मंत्रियों के हस्ताक्षर, पर छत्तीसगढ़ सरकार मौन

दिल्ली में केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और उद्योग मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी की मौजूदगी में इस सौदे पर अंतिम मुहर लगाई गई। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम पर छत्तीसगढ़ की 'डबल इंजन' सरकार की खामोशी सबसे ज्यादा चौंकाने वाली है।

भिलाई के श्रमिक नेताओं का आरोप है कि राज्य की विष्णुदेव साय सरकार दिल्ली के फैसलों के सामने असहाय नजर आ रही है। स्थानीय रोजगार और राज्य के आर्थिक हितों की रक्षा करने के बजाय सूबे की सरकार ने इस संवेदनशील मुद्दे पर पूरी तरह से मौन साध लिया है। विपक्ष भी इस मुद्दे पर केवल चुनावी और सियासी यात्राओं तक सीमित है, जमीन पर मजदूरों की लड़ाई लड़ने वाला कोई नहीं दिख रहा।

हजारों परिवारों के भविष्य पर छाए संकट के बादल

FSNL में सीधे तौर पर काम करने वाले नियमित कर्मचारियों के अलावा, स्क्रैप प्रोसेसिंग और परिवहन कार्य में हजारों ठेका मजदूर और स्थानीय युवा जुड़े हुए हैं। जापान की निजी कंपनी के हाथ में कमान जाते ही अब यहां 'ठेका पद्धति' और 'छंटनी' का डर हावी हो गया है। स्थानीय लोगों ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा है कि आत्मनिर्भर भारत का नारा देने वाली सरकार स्थानीय युवाओं को विदेशी कॉर्पोरेट का गुलाम बनाने पर तुली है।

अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, भारतीय जनता पार्टी के कुछ स्थानीय नेता भी इस फैसले से असहज हैं और दबी जुबान में इसका विरोध कर रहे हैं, लेकिन आलाकमान के खौफ के कारण कोई भी खुलकर सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।

क्या अब नगरनार की बारी?

FSNL के इस अचानक हुए निजीकरण ने बस्तर के नगरनार स्टील प्लांट (NMDC) को लेकर भी डर बढ़ा दिया है। हालांकि सरकार लगातार नगरनार के निजीकरण का खंडन करती रही है, लेकिन FSNL के हश्र को देखकर भिलाई और बस्तर के उद्योग जगत में यह चर्चा तेज है कि आज FSNL बिका है, कल नगरनार की बारी भी आ सकती है।

Vidio देखें 


https://youtu.be/S3LubnY1E-M?si=BUeOeqAhl5mViTrX


गुरुवार, 21 मई 2026

संघ की क्लास की परतें खुलने लगी

 संघ की क्लास की परतें खुलने लगी

आ गया एक एक सच सामने 


छत्तीसगढ़ की राजनीति में सत्ता और संगठन के बीच चल रही खींचतान ने अब एक बेहद गंभीर और नया मोड़ ले लिया है। रायपुर के रोहिणीपुरम स्थित सरस्वती शिक्षण संस्थान के कार्यालय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और प्रदेश सरकार के 5 दिग्गज मंत्रियों के बीच हुई 'समन्वय बैठक' की परतें अब एक-एक कर खुलने लगी हैं।

सूत्रो के मुताबिक, यह महज कोई औपचारिक समन्वय बैठक नहीं थी, बल्कि मंत्रियों की बाकायदा 'क्लास' ली गई थी। इस क्लास में प्रदेश के पांच ताकतवर मंत्रियों— गृहमंत्री विजय शर्मा, वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी, स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल, वन मंत्री केदार कश्यप और राजस्व मंत्री टंक राम वर्मा को विशेष तौर पर तलब किया गया था ।

CBI के पर कतरने के पीछे क्या नागपुर कनेक्शन?

इस तीखी रिपोर्ट में सबसे बड़ा और गंभीर सवाल गृह मंत्रालय के उस फैसले पर उठाया गया है, जिसके तहत छत्तीसगढ़ में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के अधिकारों को सीमित कर दिया गया है । राजनीतिक गलियारों में यह सवाल बड़ी शिद्दत से गूंज रहा है कि आखिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि मोदी-शाह की दिल्ली वाली महाशक्तिशाली CBI की एंट्री पर छत्तीसगढ़ सरकार को अंकुश लगाने की हिमाकत करनी पड़ी?

दावा किया जा रहा है कि संघ (RSS) से जुड़े कई रसूखदार और बड़े अधिकारियों के नाम CBI की जांच के दायरे में आ चुके हैं । इन अधिकारियों ने अपनी गर्दन फंसती देख संघ के बड़े पदाधिकारियों के सामने गुहार लगाई थी और अपनी व्यथा सुनाई थी। आरोप है कि अपने चहेते और खास नौकरशाहों को CBI की सीधी और ताबड़तोड़ कार्रवाई (पूछताछ और गिरफ्तारी) से बचाने के लिए ही गृह मंत्रालय के जरिए यह पूरी चक्रव्यूह रचना तैयार की गई है ।

जांच की आंच में घिरे बड़े नाम!

वीडियो में वरिष्ठ पत्रकार ने साफ तौर पर इशारा किया है कि पूर्ववर्ती सरकार के दौरान हुए शराब घोटाले, महादेव सट्टा ऐप कांड, कोयला घोटाले और बहुचर्चित PSC घोटाले की जांच में कई IAS और IPS अधिकारियों के नाम लगातार तैर रहे हैं । इसमें जनसंपर्क और परिवहन विभाग संभाल चुके IPS दीपांशु काबरा जैसे चर्चित नामों का भी जिक्र नागपुर कनेक्शन के हवाले से किया गया है । चूंकि PSC घोटाले की जांच अब CBI के हाथों में है, इसलिए जांच का दायरा कहां तक फैलेगा, इसे लेकर सत्ता और संघ के भीतर भारी घबराहट देखी जा रही थी ।

विपक्ष और गलियारों में चर्चा: 'सिर्फ बचाना नहीं, मलाईदार पोस्टिंग भी देनी है'

चर्चाएं सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं हैं। भाजपा खेमे और प्रशासनिक हल्कों में दबी जुबान से यह बात चीख-चीख कर कही जा रही है कि गृहमंत्री विजय शर्मा को सिर्फ CBI पर लगाम लगाने का ही फरमान नहीं मिला है, बल्कि संघ की ओर से बाकायदा उन पसंदीदा अफसरों और कर्मचारियों की एक सीक्रेट लिस्ट सौंपी गई है जिन पर कोई कार्रवाई नहीं की जानी है । इतना ही नहीं, आदेश यह भी है कि इन्हें हटाना तो दूर, बल्कि जल्द से जल्द मलाईदार और अच्छी जगहों पर पोस्टिंग दी जाए ।

तीखा सवाल:

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार स्वतंत्र रूप से फैसले ले रही है, या फिर पर्दे के पीछे से सरकार की कमान और मंत्रियों के विभागों का रिमोट कंट्रोल पूरी तरह से संघ कार्यालय से संचालित हो रहा है?

अभी तो सिर्फ गृह मंत्रालय का पत्ता खुला है, आने वाले दिनों में बाकी के 4 मंत्रियों— ओ.पी. चौधरी, केदार कश्यप, श्याम बिहारी जायसवाल और टंक राम वर्मा के विभागों से संघ के एजेंडे वाले क्या-क्या आदेश निकलते हैं, इस पर पूरी राजनीतिक बिरादरी की नजरें टिकी हुई हैं !

Vidio देखें 


https://youtu.be/kfLU-rsmGpI?si=9P9NGqFiNFic2TzW


कहानी: सिस्टम का सच और रेंजर की बेबसी कवर्धा जिले के डाल मोहा गांव की सीमा पर सूरज डूबने को था, लेकिन नदियों के किनारे ट्रैक्टरों और पोकलेन मशीनों की गड़गड़ाहट शांत नहीं हुई थी। वन विभाग के दो ईमानदार रेंजरों को खबर मिली कि सरकारी आदेशों की धज्जियां उड़ाकर खुलेआम अवैध रेत खनन किया जा रहा है। अपनी ड्यूटी के प्रति वफादार, दोनों रेंजरों ने सोचा कि कानून का डंडा माफियाओं को रोक देगा। वे दल-बल के साथ वहां पहुंचे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि कवर्धा, जो खुद सूबे के गृह मंत्री का गृह जिला है, वहां कानून का नहीं बल्कि रेत माफियाओं का खौफ चलता है। जैसे ही अधिकारियों ने गाड़ियों को रोकने की कोशिश की, माफियाओं की गुंडों की फौज उन पर टूट पड़ी। बड़े अधिकारी किसी तरह जान बचाकर भागे, लेकिन दो रेंजर उनके चंगुल में फंस गए। बीच सड़क पर, सरेआम उन्हें दौड़ा-दौड़ा कर बेरहमी से पीटा गया, जब तक कि वे लहूलुहान नहीं हो गए। यह घटना सिर्फ एक मारपीट नहीं थी, बल्कि सिस्टम के गाल पर एक करारा तमाचा थी। उधर राजधानी रायपुर का हाल भी जुदा नहीं था। एक पुलिस आरक्षक अपने छोटे बच्चे के साथ सड़क से गुजर रहा था। एक मामूली सी टक्कर क्या हुई, बदमाशों ने पुलिस की वर्दी का खौफ भूलकर उस रेंजर की तरह ही उस आरक्षक को भी सड़क पर धुन दिया। आम जनता सोच रही थी—जब रेंजर और पुलिस वाले ही सुरक्षित नहीं हैं, तो हमारी क्या बिसात? इसी दौरान, राजधानी के तूता मैदान में धूप और धूल के बीच बैठे संविदा और नियमितीकरण की मांग करने वाले प्रदेश के सैकड़ों कर्मचारी अपनी 'मोदी की गारंटी' पूरी होने का इंतजार कर रहे थे। सरकार को आए अभी एक साल भी नहीं हुआ था, लेकिन चारों तरफ असंतोष की आग सुलग रही थी। सियासी गलियारों में भी हलचल तेज थी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता टी.एस. सिंहदेव (बाबा) जब लोहारीडीह कांड के सिलसिले में जेल में बंद ग्रामीणों से मिलकर बाहर आए, तो उन्होंने मीडिया के सामने एक और चौंकाने वाला सच रखा। उन्होंने बताया कि पुलिस ने बर्बरता की हदें पार करते हुए उन निर्दोष ग्रामीणों को भी जेल में डाल दिया है जो घटना के वक्त गांव में थे ही नहीं। दूसरी तरफ, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कार्यकाल की उपसचिव सौम्या चौरसिया को कोयला घोटाले में कोर्ट से जमानत तो मिल गई थी, लेकिन अन्य मामलों के चलते उनका जेल से बाहर आना अब भी मुश्किल था। सरकार के भीतर की इस खलबली से खुद भाजपा के कद्दावर नेता भी अछूते नहीं थे। सांसद बृजमोहन अग्रवाल और दुर्ग के सांसद विजय बघेल ने सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। विजय बघेल ने कर्मचारियों के नियमितीकरण के मुद्दे पर सरकार को कड़े तेवर दिखाते हुए चिट्ठी लिख डाली थी। नदियों के किनारे अवैध माइनिंग का खेल बेखौफ जारी था। कांकेर, राजिम, महासमुंद और बलौदाबाजार जैसे जिले माफियाओं के गढ़ बन चुके थे। कलेक्टर फाइलों पर कड़े आदेश तो दस्तखत कर रहे थे, लेकिन जमीन पर अफसर, नेता और माफियाओं का गठजोड़ (नेक्सेस) इतना मजबूत था कि हर आदेश बेअसर साबित हो रहा था। कहानी का अंत एक बड़े सवाल पर आकर रुकता है: जब कड़े तेवर और बड़े-बड़े दावों के बीच ईमानदारी से काम करने वाले अफसरों को लहूलुहान होकर भागना पड़े, तो क्या वाकई सूबे की विष्णुदेव साय सरकार और गृह मंत्री विजय शर्मा कानून व्यवस्था को संभाल पा रहे हैं, या फिर यह व्यवस्था पूरी तरह फेल हो चुकी है?

 कहानी: सिस्टम का सच और वर्दी की बेबसी और बहुत कुछ 


कवर्धा जिले के डाल मोहा गांव की सीमा पर सूरज डूबने को था, लेकिन नदियों के किनारे ट्रैक्टरों और पोकलेन मशीनों की गड़गड़ाहट शांत नहीं हुई थी। वन विभाग के दो ईमानदार रेंजरों को खबर मिली कि सरकारी आदेशों की धज्जियां उड़ाकर खुलेआम अवैध रेत खनन किया जा रहा है। अपनी ड्यूटी के प्रति वफादार, दोनों रेंजरों ने सोचा कि कानून का डंडा माफियाओं को रोक देगा।

वे दल-बल के साथ वहां पहुंचे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि कवर्धा, जो खुद सूबे के गृह मंत्री का गृह जिला है, वहां कानून का नहीं बल्कि रेत माफियाओं का खौफ चलता है। जैसे ही अधिकारियों ने गाड़ियों को रोकने की कोशिश की, माफियाओं की गुंडों की फौज उन पर टूट पड़ी। बड़े अधिकारी किसी तरह जान बचाकर भागे, लेकिन दो रेंजर उनके चंगुल में फंस गए। बीच सड़क पर, सरेआम उन्हें दौड़ा-दौड़ा कर बेरहमी से पीटा गया, जब तक कि वे लहूलुहान नहीं हो गए। यह घटना सिर्फ एक मारपीट नहीं थी, बल्कि सिस्टम के गाल पर एक करारा तमाचा थी।

उधर राजधानी रायपुर का हाल भी जुदा नहीं था। एक पुलिस आरक्षक अपने छोटे बच्चे के साथ सड़क से गुजर रहा था। एक मामूली सी टक्कर क्या हुई, बदमाशों ने पुलिस की वर्दी का खौफ भूलकर उस रेंजर की तरह ही उस आरक्षक को भी सड़क पर धुन दिया। आम जनता सोच रही थी—जब रेंजर और पुलिस वाले ही सुरक्षित नहीं हैं, तो हमारी क्या बिसात?

इसी दौरान, राजधानी के तूता मैदान में धूप और धूल के बीच बैठे संविदा और नियमितीकरण की मांग करने वाले प्रदेश के सैकड़ों कर्मचारी अपनी 'मोदी की गारंटी' पूरी होने का इंतजार कर रहे थे। सरकार को आए अभी एक साल भी नहीं हुआ था, लेकिन चारों तरफ असंतोष की आग सुलग रही थी।

सियासी गलियारों में भी हलचल तेज थी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता टी.एस. सिंहदेव (बाबा) जब लोहारीडीह कांड के सिलसिले में जेल में बंद ग्रामीणों से मिलकर बाहर आए, तो उन्होंने मीडिया के सामने एक और चौंकाने वाला सच रखा। उन्होंने बताया कि पुलिस ने बर्बरता की हदें पार करते हुए उन निर्दोष ग्रामीणों को भी जेल में डाल दिया है जो घटना के वक्त गांव में थे ही नहीं। दूसरी तरफ, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कार्यकाल की उपसचिव सौम्या चौरसिया को कोयला घोटाले में कोर्ट से जमानत तो मिल गई थी, लेकिन अन्य मामलों के चलते उनका जेल से बाहर आना अब भी मुश्किल था।

सरकार के भीतर की इस खलबली से खुद भाजपा के कद्दावर नेता भी अछूते नहीं थे। सांसद बृजमोहन अग्रवाल और दुर्ग के सांसद विजय बघेल ने सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। विजय बघेल ने कर्मचारियों के नियमितीकरण के मुद्दे पर सरकार को कड़े तेवर दिखाते हुए चिट्ठी लिख डाली थी।

नदियों के किनारे अवैध माइनिंग का खेल बेखौफ जारी था। कांकेर, राजिम, महासमुंद और बलौदाबाजार जैसे जिले माफियाओं के गढ़ बन चुके थे। कलेक्टर फाइलों पर कड़े आदेश तो दस्तखत कर रहे थे, लेकिन जमीन पर अफसर, नेता और माफियाओं का गठजोड़ (नेक्सेस) इतना मजबूत था कि हर आदेश बेअसर साबित हो रहा था।

कहानी का अंत एक बड़े सवाल पर आकर रुकता है: जब कड़े तेवर और बड़े-बड़े दावों के बीच ईमानदारी से काम करने वाले अफसरों को लहूलुहान होकर भागना पड़े, तो क्या वाकई सूबे की विष्णुदेव साय सरकार और गृह मंत्री विजय शर्मा कानून व्यवस्था को संभाल पा रहे हैं, या फिर यह व्यवस्था पूरी तरह फेल हो चुकी है?