रविवार, 8 नवंबर 2026

छत्तीसगढ़ी का अपमान और हाईकोर्ट का चाबुक! कब तक सहेगा छत्तीसगढ़िया?

 छत्तीसगढ़ी का अपमान और हाईकोर्ट का चाबुक! कब तक सहेगा छत्तीसगढ़िया?


महतारी का अपमान और न्याय की लड़ाई: छत्तीसगढ़ के वजूद का सवाल!


आज फिर एक बार उन लोगों के कोलाहल को देखकर, छत्तीसगढ़िया समाज की दुर्दशा को देखकर, कसम से कलेजा थर-थर कांप उठता है और भीतर से एक उबाल उठ खड़ा होता है।

जिस माटी में हमने जन्म लिया, जिस छत्तीसगढ़ी बोली में हमने अपनी पहली लोरी सुनी, जिस महतारी के आंचल में हमने खेलना-खाना सीखा... आज उसी महतारी का अपमान, उसी छत्तीसगढ़ी भाषा की उपेक्षा और उसी छत्तीसगढ़िया समाज के हकों पर लगातार डाका डाला जा रहा है।

लेकिन आज बात सिर्फ दुख की नहीं है, आज बात न्याय की है, उम्मीद की है—जिसका एक मजबूत प्रमाण हाल ही में माननीय हाईकोर्ट के आदेश के रूप में हमारे सामने आया है।


छत्तीसगढ़ी भाषा की उपेक्षा - अपनों के बीच परायापन 

सवाल यह उठता है कि जिस छत्तीसगढ़ी भाषा में ढाई-तीन करोड़ लोगों की सांसें बसती हैं, उसे आज कुछ तथाकथित 'सभ्य' लोग हीन भावना से क्यों देखते हैं?

जब कोई छत्तीसगढ़ी में बात करता है, तो उसे गंववार समझ लिया जाता है। दफ्तरों में, स्कूलों में, और बड़े-बड़े तड़क-भड़क वाले मंचों पर छत्तीसगढ़ी बोलने वालों को ऐसे देखा जाता है मानो उन्होंने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो।

अरे, क्या छत्तीसगढ़ी बोलने वाले इंसान नहीं हैं? क्या उनकी मातृभाषा का कोई मोल नहीं है?

आज विडंबना यह है कि हमारे अपने ही घर में, हमारी अपनी माटी में, हमारी भाषा को दोयम दर्जे का बना कर रख दिया गया है। छत्तीसगढ़ के बड़े-बड़े मंचों पर अंग्रेजी और हिंदी की धूम है, पर जिस भाषा से इस माटी की सोंधी खुशबू आती है, उसे बिसारते जा रहे हैं। इसे उपेक्षा नहीं तो और क्या कहेंगे?"

छत्तीसगढ़ महतारी का अपमान 

 इससे भी ज्यादा पीड़ादायक बात यह है— छत्तीसगढ़ महतारी का अपमान!

जिस महतारी के नाम पर हमने छत्तीसगढ़ के गठन के सपने देखे थे, आज उसकी प्रतिष्ठा और उसकी अस्मिता के साथ सरेआम खिलवाड़ हो रहा है।

कभी राजनीतिक मंचों पर छत्तीसगढ़िया संस्कृति की खिल्ली उड़ाई जाती है, तो कभी बाहर से आकर लोग हमारी संस्कृति को नीचा दिखाने का कुत्सित प्रयास करते हैं।

सोचिए ज़रा! जो माटी अपना अन्न-जल देकर हमारा पेट भरती है, जो छत्तीसगढ़ महतारी अपने आंचल में हम सबको सहेज कर रखती है, उसका अपमान क्यों?

आखिर क्यों छत्तीसगढ़िया समाज को हर जगह अपने हक और सम्मान के लिए हाथ जोड़ने पड़ते हैं? क्या इस माटी में जन्म लेना कोई गुनाह है?

नहीं साथियों, यह अपमान सिर्फ छत्तीसगढ़ महतारी का नहीं है, यह हमारे उन पूर्वजों के बलिदान का अपमान है, जिन्होंने लाठी-गोलियां खाकर इस छत्तीसगढ़ का निर्माण किया था।"

छत्तीसगढ़ियों के साथ अन्याय - रोजगार से लेकर हक तक 

"और अब बात करते हैं सबसे बड़े नासूर की— छत्तीसगढ़िया समाज के साथ हो रहा अन्याय!

चाहे रोजगार की बात हो, चाहे माटी के संसाधनों की, चाहे उद्योग-धंधों में स्थानीय लोगों के हक की बात हो—हर जगह छत्तीसगढ़िया जनता के साथ ठगी हो रही है।

बाहर से आकर लोग हमारी नौकरियां खा रहे हैं, हमारी माटी के खनिजों को लूट रहे हैं, और हमारे युवा रोजगार के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।

जब हम अपना हक मांगते हैं, तो हमारी आवाज को दबा दिया जाता है। हमारे सीधे-स्वभाव और भोलेपन को बाहरी लोगों ने हमारी कमजोरी समझ लिया है।

पर वे भूल गए हैं कि छत्तीसगढ़िया जब तक शांत रहता है, तब तक शांत रहता है... लेकिन जब उसके सब्र का बांध टूटता है, तो बड़े-बड़े अहंकार के किले ढह जाते हैं!"

हाईकोर्ट का आदेश 

अंधेरा चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, सूरज की एक किरण उसे चीरकर बाहर आती ही है।

और वही सूरज की किरण न्याय की एक बहुत बड़ी उम्मीद बनकर आई है— माननीय हाईकोर्ट का यह ऐतिहासिक आदेश!

न्यायपालिका ने यह साबित कर दिया है कि कानून की नजर में हर कोई बराबर है और गलत करने वालों को उनकी सजा मिलकर ही रहेगी। हाईकोर्ट का यह आदेश छत्तीसगढ़ी भाषा, संस्कृति और यहां के नागरिकों के अधिकारों के पक्ष में एक मजबूत ढाल बनकर उभरा है।

यह आदेश इस बात की गवाही देता है कि अन्याय का अंधेरा चाहे कितना भी लंबा हो, जीत आखिरकार सत्य और न्याय की ही होती है।

अब हम सभी छत्तीसगढ़िया बंधुओं की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। हमारा समय आ गया है कि हम अपनी भाषा 'छत्तीसगढ़ी' को गर्व के साथ बोलें, अपनी संस्कृति को आगे बढ़ाएं, और छत्तीसगढ़ महतारी के सिर को कभी झुकने न दें।


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शनिवार, 7 नवंबर 2026

छत्तीसगढ़ में पेड़ों पर कुल्हाड़ी और सियासत!

 छत्तीसगढ़ में पेड़ों पर कुल्हाड़ी और सियासत! माना-तूता के जंगल बचाने के लिए आदिवासियों-ग्रामीणों का अनोखा विरोध, सरकार से तीखे सवाल!



आज हम बात करने जा रहे हैं छत्तीसगढ़ की उस धरती की, जिसे कभी हरे-भरे जंगलों और प्राकृतिक खूबसूरती के लिए जाना जाता था। लेकिन आज उसी छत्तीसगढ़ में विकास के नाम पर विनाश का खेल खुलेआम खेला जा रहा है।

सवाल ये है कि क्या 'विकास' का मतलब सिर्फ पेड़ों को काटना और कंपनियों को फायदा पहुँचाना रह गया है? नवा रायपुर के माना-तूता क्षेत्र में प्रस्तावित 'चित्तोत्पल फिल्म सिटी' के नाम पर लगभग 1100 हरे-भरे पेड़ों को काटने का प्रस्ताव है! जरा सोचिए, 1100 पेड़! क्या छत्तीसगढ़ सरकार के पास इस फिल्म सिटी को बनाने के लिए कोई बंजर ज़मीन नहीं थी? क्या सिर्फ इसलिए जंगलों का सफाया किया जा रहा है ताकि कागजी विकास के आंकड़े चमकाए जा सकें? आज इसी पर होगी तीखी चर्चा, 

पूरा मामला क्या है? माना-तूता का सच

"आइए पहले आपको पूरा मामला समझाते हैं कि आखिर चल क्या रहा है।

  • रायपुर के पास नवा रायपुर के माना-तूता क्षेत्र में प्रस्तावित फिल्म सिटी के लिए करीब 1100 पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाने की तैयारी कर ली गई है।
  • जब 27 अक्टूबर को प्रशासन की कटाई वाली मशीनें यानी जेसीबी और कटर लेकर गाड़ियां मौके पर पहुँचीं, तो स्थानीय ग्रामीण और पर्यावरण प्रेमी चुपचाप बैठने वालों में से नहीं थे।
  • उन्होंने पेड़ों से लिपटकर चिपको आंदोलन की तर्ज पर विरोध जताना शुरू कर दिया!
  • हद तो तब हो गई जब अपनी ज़मीन और अपने जंगलों को बचाने की गुहार लगा रहे शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों में से 10 ग्रामीणों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया! हालांकि, भारी विरोध के बाद उन्हें करीब एक घंटे बाद छोड़ दिया गया।

अब सरकार और पर्यटन विभाग का तर्क सुनिए। पर्यटन विभाग का दावा है कि 'अरे, चिंता मत कीजिए, हम इसके बदले 11 हजार नए पौधे लगा देंगे!' अरे भाई, वाह! क्या तर्क है? एक तरफ आप सालों पुराने, फल-फूल रहे, पर्यावरण को आक्सीजन देने वाले 1100 पेड़ काट रहे हैं, और दूसरी तरफ कागजों पर 11 हजार पौधे लगाने का झुनझुना थमा रहे हैं। क्या एक नया पौधा तुरंत जाकर उन 1100 पेड़ों की जगह ले लेगा? क्या उसकी छांव और पर्यावरण संतुलन की भरपाई तुरंत हो जाएगी? ये जनता को बेवकूफ बनाने के अलावा और कुछ नहीं है।"

विरोध का नया और अनोखा तरीका: पेड़ों पर देवी-देवता और छत्तीसगढ़ महतारी

"लेकिन तारीफ करनी होगी हमारे गांवों के लोगों की, आदिवासियों और पर्यावरण प्रेमियों की! जब प्रशासन और पुलिस अपनी ताकत दिखाने पर उतर आए, तो गांव वालों ने विरोध का एक ऐसा नायाब और धार्मिक-सांस्कृतिक तरीका निकाला कि सरकार और प्रशासन के भी होश उड़ गए।

ग्रामीणों ने पेड़ों को बचाने के लिए उन पर देवी-देवताओं की तस्वीरें और हमारी अपनी 'छत्तीसगढ़ महतारी' की तस्वीरें लगा दी हैं! सोचिए, जब कोई बुलडोजर या कटर किसी ऐसे पेड़ के पास जाएगा जिस पर छत्तीसगढ़ महतारी या देवी-देवताओं की तस्वीर टंगी हो, तो कोई कैसे उन पर वार करेगा? यह सिर्फ पेड़ों को बचाने की लड़ाई नहीं है, यह छत्तीसगढ़ की संस्कृति, आस्था और जल-जंगल-जमीन को बचाने की आखिरी जंग बन चुकी है।

ग्रामीण और स्थानीय समितियां साफ कह रही हैं कि भाई, फिल्म सिटी बनानी है तो बनाओ, हमें एेतराज नहीं है, लेकिन इसके लिए दूसरी बंजर या खाली जगह का चयन करो, इन हरे-भरे जंगलों को क्यों उजाड़ रहे हो? लेकिन बहरी हो चुकी व्यवस्था को शायद ये चीखें सुनाई नहीं दे रही हैं।"

सरकार और कंपनियों की मिलीभगत

"अब वक्त आ गया है सरकार से सीधे और तीखे सवाल पूछने का। मैं पूछता हूं छत्तीसगढ़ के हुक्मरानों से:

  1. पहला सवाल: क्या छत्तीसगढ़ की पहचान सिर्फ उद्योगपतियों और कंपनियों को यहां के संसाधन और जंगल सौंपने के लिए रह गई है? जब भी कोई बड़ा प्रोजेक्ट आता है, तो सबसे पहले जंगलों और आदिवासियों की ज़मीन को ही क्यों निशाना बनाया जाता है?
  2. दूसरा सवाल: क्या नवा रायपुर विकास प्राधिकरण या पर्यटन विभाग के पास फिल्म सिटी के लिए कोई अन्य वैकल्पिक ज़मीन उपलब्ध नहीं थी? ज़िद क्यों है कि माना-तूता के जंगल को ही काटना है? कहीं इसके पीछे कोई और बड़ा कमर्शियल खेल तो नहीं है?
  3. तीसरा सवाल: पेड़ों से लिपटकर शांतिपूर्ण विरोध कर रहे ग्रामीणों को पुलिस द्वारा हिरासत में लेना क्या तानाशाही नहीं है? क्या अपनी ज़मीन और पर्यावरण बचाने वाले अब इस राज्य में अपराधी माने जाएंगे?
  4. चौथा सवाल: वो 11 हजार नए पौधे लगाने का दावा कागजों पर कब तक दौड़ता रहेगा? जो पेड़ आज खड़े हैं, जो पर्यावरण को शुद्ध कर रहे हैं, उन्हें काटकर आप कौन सा इको-फ्रेंडली विकास मॉडल पेश करना चाहते हैं?

इन सवालों के जवाब सरकार को जनता को देने होंगे। सिर्फ प्रेस विज्ञप्ति जारी कर देने से या कागजी दावे कर देने से पर्यावरण का नुकसान पूरा नहीं हो जाता।"

, मामला सिर्फ 1100 पेड़ों का नहीं है। मामला इस बात का है कि कल को आपके शहर, आपके गांव के जंगलों पर भी इसी तरह बुलدोज़र चल सकता है। अगर आज हमने माना-तूता के इन ग्रामीणों का साथ नहीं दिया, तो कल पर्यावरण और हमारी संस्कृति का और भी बड़ा सौदा हो जाएगा।

ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों का यह संघर्ष हम सबका संघर्ष है। पेड़ों पर देवी-देवताओं और छत्तीसगढ़ महतारी की तस्वीर लगाकर उन्होंने बता दिया है कि वे अपनी आस्था और पर्यावरण के साथ किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेंगे।

आपकी इस पूरे मामले पर क्या राय है? क्या सरकार को फिल्म सिटी की जगह बदलनी चाहिए? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखिए,


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लालफीताशाही और घूसखोरी का नंगा सच

 लालफीताशाही और घूसखोरी का नंगा सच: एसीबी के आंकड़े खोल रहे हैं सिस्टम की पोल, आखिर कब तक बचेगा भ्रष्टाचारियों का यह गिरोह?


जरा सोचिए... आप अपनी ही जमीन का नामांतरण कराने के लिए सरकारी दफ्तर के चक्कर काटते हैं, अपने ही हक के भुगतान के लिए फाइलें दबाई जाती हैं, और हर टेबल पर बैठे बाबू से लेकर साहब तक की आँखों में लालच का पर्दा पड़ा होता है। छत्तीसगढ़ के सरकारी दफ्तरों का यह कोई नया सच नहीं है, लेकिन इस सच के पीछे जो आंकड़े हैं, वे आपके पैरों तले जमीन खिसका देने के लिए काफी हैं।

आज हम बात करेंगे भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) के उन काले चिट्ठों की, जो यह चीख-चीख कर कह रहे हैं कि जनता की गाढ़ी कमाई को लूटने वाले बेखौफ हैं। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है— क्या सरकार का इकबाल सिर्फ फाइलों तक सिमट कर रह गया है? क्या वजह है कि घूसखोर पकड़े तो जाते हैं, लेकिन फिर वही कागजी पेचीदगियों और अभियोजन स्वीकृति (Prosecution Sanction) के नाम पर फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दी जाती हैं? आइए, एक-एक आंकड़े का कच्चा चिट्ठा खोलते हैं।

लूट की पूरी दास्तान 

जरा इन आंकड़ों पर गौर फरमाइश कीजिए। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2021 से लेकर 28 मई 2026 तक यानी इन चंद सालों के भीतर, छत्तीसगढ़ में रिश्वतखोरी के कुल 154 मामलों में तगड़ी ट्रैप कार्रवाई (Trap Action) की गई।

सुनने में यह आंकड़ा छोटा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे का दर्द देखिए। इन 154 मामलों में कोई आम नागरिक नहीं, बल्कि 193 सरकारी अधिकारी और कर्मचारी रिश्वत लेते हुए सीधे रंगे हाथों दबोचे गए! और भ्रष्टाचार का कुल खेल कितने का था? इन छापों के दौरान कुल 51 लाख 67 हजार 540 रुपये की अवैध रिश्वत की राशि बरामद की गई।

यानी सरकार के नुमाइंदे जनता का खून चूसने में एक सेकंड की भी देर नहीं लगाते। जरा साल-दर-साल के इन आंकड़ों की चाल देखिए, जो सरकार की नाकामी और भ्रष्टाचार के बढ़ते ग्राफ की गवाही दे रहे हैं:

  • वर्ष 2021: रिश्वतखोरी के 13 मामले दर्ज हुए, जिसमें 14 लोकसेवक पकड़े गए।
  • वर्ष 2022: फिर वही 13 मामले सामने आए और 18 अधिकारी-कर्मचारी शिकंजे में आए।
  • वर्ष 2023: चमत्कार देखिए! इस साल दर्ज ट्रैप प्रकरणों की संख्या सीधे शून्य हो गई। एक भी लोकसेवक नहीं पकड़ा गया। क्या इस साल भ्रष्टाचार अचानक गायब हो गया था या फिर एसीबी की आँखें बंद कर दी गई थीं? यह बहुत बड़ा सवाल है।
  • वर्ष 2024: इसके बाद अचानक ग्राफ उछलता है और 44 मामले दर्ज होते हैं, जिसमें 57 अधिकारी-कर्मचारी धरे जाते हैं।
  • वर्ष 2025: यह साल तो मानो भ्रष्टाचार के सारे रिकॉर्ड तोड़ देता है! इस साल सबसे ज्यादा 60 मामलों में ट्रैप लगाया गयाऔर रिकॉर्ड 71 सरकारी अधिकारी और कर्मचारी रंगे हाथों पकड़े गए।
  • वर्ष 2026 (28 मई तक): और इस साल के शुरुआती महीनों में ही यानी 28 मई तक 24 ट्रैप प्रकरण दर्ज हो चुके हैं, जिसमें 33 लोकसेवक पकड़े जा चुके हैं।

मतलब साफ है, साल दर साल घूसखोरी का ग्राफ ऊपर चढ़ता जा रहा है, लेकिन सिस्टम की सुई वहीं की वहीं अटकी हुई है।

कौन से विभाग सबसे आगे? — जनता की लूट के अड्डे 

 अब सवाल यह उठता है कि जनता को सबसे ज्यादा किस विभाग में लूटा जा रहा है? क्या स्वास्थ्य या शिक्षा महकमा सुधरा है? बिल्कुल नहीं! आइए विभागवार सूची देखते हैं:

  1. राजस्व विभाग (Revenue Department): इस सूची में नंबर वन पर है राजस्व विभाग। जमीन की खरीद-बिक्री, नामांतरण, सीमांकन और सबसे शर्मनाक बात तो यह है कि राजस्व रिकॉर्ड में सुधार कराने के नाम पर भी जमकर रिश्वतखोरी चल रही है। आम आदमी अपनी ही जमीन के कागजात के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है।
  2. स्कूल शिक्षा विभाग (School Education Department): जी हाँ, नौनिहालों का भविष्य गढ़ने वाला शिक्षा विभाग इस सूची में दूसरे स्थान पर है। यहाँ 20 मामलों में 25 अधिकारी और कर्मचारी घूस लेते पकड़े गए। शिक्षा के मंदिरों में भी भ्रष्टाचार का दीमक लग चुका है।
  3. पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग: यहाँ 14 मामले दर्ज हुए और 15 कर्मचारी कार्रवाई के दायरे में आए। गांवों के विकास के लिए आने वाला पैसा किसकी जेब में जा रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है।
  4. गृह (पुलिस) विभाग: कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी जिनकी है, उसी पुलिस विभाग में रिश्वतखोरी के 10 मामले सामने आए और 13 अधिकारी-कर्मचारी पकड़े गए।
  5. न्याय प्रशासन एवं विधिक सेवा विभाग: यहाँ तक कि न्याय दिलाने वाले महकमे में भी 7 मामले दर्ज हुए और 10 लोकसेवकों को पकड़ा गया।

अनुमति के नाम पर फाइलें दबाने का खेल 

, असली खेल तो अब शुरू होता है। एसीबी ने ट्रैप कर लिया, घूसखोरों को रंगे हाथ पकड़ भी लिया, पैसे भी बरामद हो गए... तो फिर क्या हुआ? क्या उन भ्रष्ट अधिकारियों को जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया?

यहीं से शुरू होती है सरकार और तंत्र की असली चालबाजी!

न्यायालय में चालान पेश करने और भ्रष्ट अधिकारियों पर मुकदमा चलाने के लिए शासन स्तर से अभियोजन स्वीकृति (Prosecution Sanction) की जरूरत होती है। और यहीं पर आकर सरकार का सारा एंटी-करप्शन का ढोल, खोखला साबित हो जाता है। महीनों, बल्कि सालों तक सक्षम प्राधिकारी और सरकार के नुमाइंदे इन फाइलों को फाइलों के नीचे दबाकर बैठ जाते हैं।

अरे हुक्मरानों, जनता पूछ रही है कि आखिर इन भ्रष्ट अधिकारियों को बचाने के लिए फाइलें क्यों रोकी जाती हैं? क्यों महीनों और सालों तक अभियोजन की अनुमति नहीं दी जाती? क्या सरकार के आशीर्वाद के बिना यह सब संभव है? जब आप ट्रैप के आंकड़े बड़े गर्व से जारी करते हैं, तो फिर उन मामलों को अंजाम तक पहुँचाने में आपकी यह ढीली-ढाली कार्यप्रणाली क्यों सामने आती है?

अदालतों में फाइलें इसलिए लटक जाती हैं क्योंकि सरकार समय पर अनुमति नहीं देती। पुराना रिकॉर्ड उठा कर देख लीजिए, कई मामलों में तो घूसखोर बाबू रिटायर भी हो जाते हैं, मलाई भी काट लेते हैं, और सरकार की मेहरबानी से अदालती प्रक्रिया फाइलों में ही दम तोड़ देती है। यह ढीला-ढाला रवैया नहीं, बल्कि भ्रष्टाचारियों को परोक्ष रूप से दिया जा रहा संरक्षण है!

छत्तीसगढ़ की जनता अब सब देख रही है। एक तरफ गरीब आदमी चपरासी से लेकर बाबू के सामने हाथ जोड़ने को मजबूर है, और दूसरी तरफ एसीबी के जाल में फंसने के बाद भी ये रसूखदार अधिकारी राजनीतिक संरक्षण के सहारे बेखौफ घूम रहे हैं।

यह वक्त सिर्फ आंकड़े गिनाने का नहीं, बल्कि सरकार को कटघरे में खड़ा करने का है। यदि सच में भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति है, तो हर एक ट्रैप केस में तुरंत अभियोजन की अनुमति दी जाए और दोषियों को फास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिए सजा दिलाई जाए।

अगर सरकार ने अपना यह ढीला-ढाला रवैया नहीं बदला, तो जनता का गुस्सा इन फाइलों से बाहर आकर सड़कों पर दिखेगा।

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शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

छत्तीसगढ़ का 'गुजराती' सौदा!

 छत्तीसगढ़ का 'गुजराती' सौदा!


अमित शाह की 'क्रोनोलॉजी', बस्तर का 'विकास मॉडल 2.0' और छत्तीसगढ़ के जल-जंगल-जमीन पर कॉर्पोरेट पहरा

राजनीति और कॉर्पोरेट जगत की जुगलबंदी में कोई भी कदम यूं ही नहीं उठाया जाता; हर बड़े दौरे के पीछे एक सोची-समझी 'क्रोनोलॉजी' होती है और हर क्रोनोलॉजी के पीछे अरबों रुपये की एक बड़ी डील। जब देश के गृह मंत्री अमित शाह बस्तर की धरती पर कदम रखते हैं और दावा करते हैं कि 5 साल में बस्तर के आदिवासियों की आमदनी छह गुना बढ़ जाएगी, तो वह एक सुनहरे भविष्य का सपना बेच रहे होते हैं । लेकिन इसी बीच सत्ता के गलियारों से एक ऐसी सूची (List) लीक होती है, जो गृह मंत्री के दावों की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी है ।

यह कहानी सिर्फ 'नक्सल मुक्त बस्तर' की नहीं है, बल्कि 'संसाधन मुक्त छत्तीसगढ़' की है । एक तरफ बस्तर में सुरक्षा कैंपों को 'वीर शहीद गुंडादूर सेवा डेरा' में तब्दील करने का प्रशासनिक ढोल पीटा जा रहा है, तो दूसरी तरफ परदे के पीछे से अडानी से लेकर टोरेंट तक की गुजराती लॉबी को छत्तीसगढ़ के जल-जंगल और जमीन सौंपने का पूरा खाका तैयार हो चुका है ।

1. शाह का 'बस्तर मॉडल 2.0': सेवा का मुखौटा या जमीन की घेराबंदी?

गृह मंत्री अमित शाह ने बस्तर दौरे में केरल जितने बड़े भूभाग को नक्सलवाद से मुक्त कराने के लिए 200 सुरक्षा कैंपों में से 70 को 'वीर शहीद गुंडादूर सेवा डेरा' बनाने का एलान किया । दावा है कि यहाँ बैंकिंग, आधार कार्ड और 371 सरकारी योजनाएं सीधे आदिवासियों के दरवाजे तक पहुंचेंगी ।

लेकिन स्थानीय जानकारों और राजनीति के इनसाइडर्स का सवाल कुछ और है: क्या ये 'सेवा डेरे' सिर्फ आदिवासियों की भलाई के लिए हैं, या फिर बस्तर के दुर्गम और खनिज-समृद्ध इलाकों में कॉर्पोरेट कंपनियों की सुरक्षित एंट्री के लिए बनाए गए सेफ पैसेज (Safe Passage) हैं?

2. वो 'वायरल लिस्ट': छत्तीसगढ़ की छाती पर 'सूरत और अहमदाबाद' का पहरा

जैसे ही गृह मंत्री का दौरा खत्म होता है, छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक हलकों में एक सूची तैरने लगती है। यह सूची बताती है कि राज्य की विष्णुदेव साय सरकार ने गुजरात की दिग्गज कंपनियों के लिए रेड कारपेट बिछा दिया है :

 अडानी पावर व अडानी एंटरप्राइजेज (अहमदाबाद): ऊर्जा और केमिकल प्रोजेक्ट्स के लिए सरगुजा की हसदेव-समृद्ध वादियों में बड़े पैमाने पर जमीन की तलाश और हरी झंडी ।

 आरसेलर मित्तल निपॉन (सूरत): बस्तर के लौह-अयस्क (Iron Ore) के गढ़ में भारी उद्योग लगाने की तैयारी ।

 टोरेंट फार्मास्यूटिकल्स और लाइस्टियम लाइफ साइंसेज (अहमदाबाद): दवा उद्योग के नाम पर राजधानी रायपुर के आसपास की महंगी जमीनों पर नजर ।

 सफायर सेमीकॉम (अहमदाबाद): इलेक्ट्रॉनिक सेमीकंडक्टर हब के लिए रायपुर में पैठ ।

 अंबुजा सीमेंट: छत्तीसगढ़ के लाइमस्टोन (चूना पत्थर) बेल्ट पर पूरी तरह काबिज होने की कवायद, जिस पर पहले ही अवैध वसूली के संगीन आरोप लग चुके हैं ।

3. मुर्दों के अंगूठे और फर्जी जनसुनवाई का 'सच्चा चिट्ठा'

विकास की इस चमचमाती कहानी का सबसे काला अध्याय है—'जमीन हड़पने का खेल'। मैदानी हकीकत यह है कि इन बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों को स्थापित करने के लिए जनसुनवाइयों का मजाक उड़ाया जा रहा है । कई इलाकों से रिपोर्ट आ रही है कि प्रशासन की मिलीभगत से फर्जी जनसुनवाइयां की गईं और जो ग्रामीण सालों पहले मर चुके हैं, उनके नाम पर अंगूठे लगवाकर उद्योगों के पक्ष में सहमति दिखा दी गई । सरकार पूरी तरह से उद्योगपतियों की गोद में बैठी नजर आ रही है ।

4. छत्तीसगढ़िया युवा: सिर्फ 'चपरासी और गार्ड' बनने की योग्यता?

डबल इंजन सरकार का सबसे बड़ा खोखला दावा है—'स्थानीय युवाओं को रोजगार']। कड़वा सच तो यह है कि स्किल डेवलपमेंट के नाम पर छत्तीसगढ़ के युवाओं को अपने ही जल-जंगल-जमीन पर महज चपरासी या सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी भी नसीब नहीं हो रही है ।

हाल ही में राज्य के उद्योगों में हुई जानलेवा दुर्घटनाओं ने इस सच से पर्दा उठा दिया कि मरने वाले अधिकांश मजदूर बाहरी राज्यों के थे। उद्योगपतियों की क्रूर नीति साफ है—स्थानीय लोगों को नौकरी पर मत रखो, क्योंकि अगर वे हक मांगेंगे तो 'आंदोलन' का खतरा रहेगा। इसलिए मजदूर भी बाहर से मंगाए जा रहे हैं ।

5. 'उलगुलान' की गूंज और सुलगती सियासत

इस गुजराती घुसपैठ के खिलाफ अब बस्तर और सरगुजा ही नहीं, बल्कि छुईखदान समेत छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों में भी 'जल-जंगल-जमीन' की रक्षा के लिए 'उलगुलान' (क्रांति) के नारे गूंजने लगे हैं ।

क्षेत्रीय दलों जैसे छत्तीसगढ़ समाज पार्टी, क्रांति सेना और जय जोहार पार्टी ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है । उनका सीधा आरोप है कि दिल्ली के आकाओं (नरेंद्र मोदी और अमित शाह) के दबाव में विष्णुदेव साय सरकार छत्तीसगढ़ की अस्मिता और संपदा को गुजरात के उद्योगपतियों के हाथों गिरवी रख रही है ।

[OUTRO/CONCLUSION: निष्कर्ष]

क्या छत्तीसगढ़ का नक्शा अब पूरी तरह बदलने वाला है? क्या छत्तीसगढ़िया जनता का सदियों से चला आ रहा शोषण अब कॉर्पोरेट गुलामी के एक नए युग में तब्दील हो जाएगा? 

अमित शाह का बस्तर आना और तत्काल बाद गुजराती कंपनियों को ताबड़तोड़ हरी झंडी मिलना, यह चीख-चीख कर गवाही दे रहा है कि लोकतंत्र की आड़ में कॉर्पोरेट लूट का एक विशाल नेटवर्क काम कर रहा है । पर्यावरण की तबाही और स्थानीय जनता को चपरासी बनाने की कीमत पर खड़ा किया जा रहा यह 'गुजरात मॉडल', छत्तीसगढ़ के सुनहरे भविष्य का निर्माण नहीं, बल्कि उसकी बर्बादी का नया दस्तावेज है।

छत्तीसगढ़ में 'Gen Z' का भविष्य खतरे में, वित्त मंत्री की ढिलाई और सरकार पर सीधा हमला

 छत्तीसगढ़ में 'Gen Z' का भविष्य खतरे में, वित्त मंत्री की ढिलाई और सरकार पर सीधा हमला



आज हम बात करने जा रहे हैं छत्तीसगढ़ के उस कड़वे सच की, जिसे छुपाने के लिए विज्ञापनों और बड़े-बड़े दावों का सहारा लिया जा रहा है।

जरा सोचिए—एक इंसान की संदिग्ध हालत में मौत हो जाती है... अब सवाल ये उठता है कि उसकी मौत कैसे हुई? क्या वो कोई हादसा था? क्या वो हत्या थी? या फिर उसे जहर देकर मार दिया गया? इन सारे रहस्यों से पर्दा उठाने की जिम्मेदारी होती है 'मेडिको लीगल संस्थान' की।

लेकिन ज़रा आँखें खोलकर इस रिपोर्ट को देखिए—छत्तीसगढ़ का इकलौता मेडिको लीगल संस्थान आज खुद वेंटिलेटर पर है! यहाँ विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है। और सबसे शर्मनाक बात ये है कि पिछले 25 साल से इस संस्थान में कोई नियमित भर्ती ही नहीं हुई है! यानी एक चौथाई सदी से भर्ती प्रक्रिया ठप्प है और फाइलें सरकारी दफ्तरों में धूल फांक रही हैं!"

वित्त विभाग और ओपी चौधरी पर तीखा हमला - 

: "अब सवाल उठता है कि आखिर इन फाइलों को रोककर किसने रखा है? किसके इशारे पर छत्तीसगढ़ के युवाओं का हक मारा जा रहा है?

भाइयों और बहनों, इस संस्थान में नियमित भर्तियों के लिए सिर्फ 84 लाख रुपए सालाना के अतिरिक्त खर्च का प्रस्ताव भेजा गया था। सरकारें इवेंट्स पर और वाहवाही लूटने में अरबों रुपए बहा देती हैं, लेकिन जब बात राज्य में न्याय व्यवस्था और युवाओं को रोजगार देने की आती है, तो वित्त विभाग को इस 84 लाख के प्रस्ताव पर 'आपत्ति' नजर आने लगती है!

और इस वित्त विभाग के मुखिया कौन हैं? हमारे वित्त मंत्री श्री ओपी चौधरी जी! वही ओपी चौधरी, जिन्हें केंद्र की मोदी सरकार और खुद प्रधानमंत्री मोदी बड़े गर्व से 'युवा आइकॉन' बनाकर पेश करते हैं। ज़रा विडंबना देखिए! एक तरफ मोदी जी मंचों से युवाओं को प्रेरणा देने की बात करते हैं, और दूसरी तरफ उन्हीं के चहेते 'युवा आइकॉन' मंत्री के विभाग में ही नियुक्तियों पर रोक लगी हुई है। क्या यही है युवाओं का विकास? क्या यही है 'युवा आइकॉन' का असली चेहरा?"

न्याय व्यवस्था से खिलवाड़ 

सोचिए कि इसके परिणाम कितने खतरनाक हैं। अगर राज्य में जाँच करने वाले पर्याप्त विशेषज्ञ ही नहीं होंगे, तो गंभीर मामलों में मौत की असली वजह कभी सामने कैसे आएगी?

इसका मतलब तो यही हुआ कि अपराधियों के हौसले बुलंद रहेंगे, क्योंकि उन्हें पता है कि यहाँ वैज्ञानिक जाँच करने के लिए डॉक्टर ही नहीं हैं। क्या छत्तीसगढ़ की जनता न्याय पाने के लिए भी तरसेगी? एक तरफ सरकार पारदर्शिता के दावे करती है, और दूसरी तरफ बजट की आड़ लेकर जरूरी नियुक्तियों को रोक दिया जाता है।"

Gen Z का आंदोलन और युवाओं का भविष्य 

और अब बात करते हैं उस सबसे अहम मुद्दे की, जिससे सत्ता में बैठे लोगों की नींद उड़ी हुई है—Gen Z (जेन जी)!

आज की नई पीढ़ी, यानी हमारे 'Gen Z' युवा, जो सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक अपने हकों के लिए आवाज़ उठा रहे हैं और एक नया युवा आंदोलन खड़ा कर रहे हैं। ये 'Gen Z' युवा अब सरकार के बहकावे में आने वाले नहीं हैं। ये रील्स बनाने वाले युवा अब सरकार से अपनी डिग्रियों, अपनी मेहनत और अपने भविष्य का हिसाब मांग रहे हैं।

जब 'Gen Z' युवा रात-दिन पढ़ाई करके परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, तो उन्हें क्या मिलता है? रुकी हुई नियुक्तियाँ, अटकी हुई फाइलें और वित्त विभाग की आपत्तियाँ!

मोदी जी जिसे 'युवा आइकॉन' बनाकर प्रमोट कर रहे हैं, वही 'युवा आइकॉन' आज इसी 'Gen Z' के भविष्य पर ताला लगाकर बैठे हैं। लेकिन सरकार एक बात कान खोलकर सुन ले—यह 'Gen Z' का दौर है। अगर आपने युवाओं को रोजगार नहीं दिया और नियुक्तियों पर लगी रोक तुरंत नहीं हटाई, तो यही 'Gen Z' का आंदोलन इस सत्ता की नींव हिलाकर रख देगा।"

अब वक्त आ गया है कि सिर्फ बयानों पर भरोसा न किया जाए, बल्कि सीधे सवाल पूछे जाएं।

अगर वित्त मंत्री ओपी चौधरी जी सच में युवाओं के हमदर्द हैं, तो वे सार्वजनिक रूप से जवाब दें कि 84 लाख के उस छोटे से प्रस्ताव पर रोक क्यों लगाई गई? विभागों में खाली पड़े पदों पर नियमित भर्तियां क्यों नहीं की जा रही हैं?

छत्तीसगढ़ का युवा अब चुप बैठने वाला नहीं है। अगर सरकार ने अपनी रोजगार विरोधी नीतियों को नहीं सुधारा, तो राज्य का हर 'Gen Z' युवा सड़क पर उतरकर अपना हक छीनना जानता है।


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