गुरुवार, 18 जून 2026

छत्तीसगढ़ में 'वर्दी' का दम घोंट रही सियासत? दिल्ली की दौड़ में सूबे के होनहार IPS!


छत्तीसगढ़ में 'वर्दी' का दम घोंट रही सियासत? दिल्ली की दौड़ में सूबे के होनहार IPS!


खास रिपोर्ट: कैडर रिव्यू में लेत-लतीफी, नेताओं की 'दबंगई' और कॉरपोरेट-पॉलिटिकल नेक्सस से व्यथित होकर केंद्रीय प्रतिनियुक्ति की कतार में खड़े हुए छत्तीसगढ़ के कई आला पुलिस अफसर; कानून-व्यवस्था पर उठ रहे गंभीर सवाल।


छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक और पुलिसिया गलियारों में इन दिनों एक बेहद संवेदनशील और चौंकाने वाली चर्चा आम है— *'क्या छत्तीसगढ़ के होनहार और कड़क आईपीएस अधिकारियों का राज्य में दम घुट रहा है?'* यह सवाल इसलिए मौजूं हो गया है क्योंकि राज्य के कई सीनियर और काबिल आईपीएस (IPS) अफसर अचानक छत्तीसगढ़ छोड़कर दिल्ली (केंद्रीय प्रतिनियुक्ति) जाने के लिए बेताब दिखाई दे रहे हैं। प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि जब पुलिसिंग पर सियासत का पहिया जरूरत से ज्यादा भारी होने लगता है, तो वर्दीधारी अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए 'डेपुटेशन' के आवेदन को ही आखिरी हथियार बना लेते हैं।

कहा जा रहा है कि मौजूदा 'डबल इंजन' सरकार के दौर में आईपीएस लॉबी के भीतर असंतोष की एक अंडरकरेंट दौड़ रही है। राज्य के भीतर कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति और हाल ही में असम में छत्तीसगढ़ पुलिस के साथ हुए बेहद शर्मनाक वाकये ने इस आग में घी का काम किया है।

## **फुटबॉल बनी 'खाकी': कैडर रिव्यू में देरी और लूप लाइन का खेल**

जानकारों का मानना है कि छत्तीसगढ़ में आईपीएस अधिकारियों को राजनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर 'फुटबॉल' बनाकर रख दिया गया है। राज्य में लंबे समय से लंबित **कैडर रिव्यू (Cadre Review) में हो रही देरी** और वरिष्ठ पदों की कमी के चलते कई अधिकारियों को अपना भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा है। वरिष्ठता और काबिलियत को नजरअंदाज कर चहेतों को मलाईदार पोस्टिंग देने और फील्ड में बेहतर रिकॉर्ड रखने वाले प्रभावशाली अफसरों को 'लूप लाइन' में धकेलने के खेल ने पुलिस महकमे के भीतर गहरा नैराश्य पैदा किया है।

अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर भेजने का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा है। पूर्व में अमित कुमार, नीतू कमल और दालूरी श्रवण जैसे अधिकारी केंद्र जा चुके हैं, तो वहीं हाल के दिनों में अभिषेक सांडिल, रामगोपाल गर्ग, दीपक झा और जितेंद्र सिंह मीणा जैसे नामी अफसरों ने भी दिल्ली की राह पकड़ ली है। अब कतार में कुछ और बड़े नाम हैं।

> **संतोष सिंह और अमरेश मिश्रा भी कतार में!**

> औद्योगिक बेल्ट रायगढ़, कवर्धा समेत कई जिलों की कमान सफलतापूर्वक संभाल चुके आईपीएस **संतोष सिंह** का स्वयं इच्छा से दिल्ली डेपुटेशन पर जाने की तैयारी करना चौंकाता है। वहीं, राज्य के सबसे पावरफुल और चर्चित चेहरों में से एक— एसीबी (ACB) चीफ **अमरेश मिश्रा** के भी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने की गंभीर चर्चाएं हैं। सवाल उठ रहा है कि यदि इतने रसूखदार और रडार पर रहने वाले अधिकारी राज्य छोड़ना चाहते हैं, तो पर्दे के पीछे की कहानी कितनी पेचीदा होगी?

## **नेताओं की 'चमकाऊ' नीति और कॉरपोरेट की गुलामी का आरोप**

अखबार को मिले इनपुट्स के अनुसार, छत्तीसगढ़ में इन दिनों पुलिसिंग का ढर्रा पूरी तरह बदल चुका है। विपक्ष और अंदरूनी सूत्रों का आरोप है कि पुलिस को अपराधियों को पकड़ने के बजाय **'कॉरपोरेट घरानों की चौकीदारी'** में झोंक दिया गया है। जमीनी स्तर पर अपराध बढ़ रहे हैं, लेकिन पुलिस के आला अफसरों को कथित तौर पर निर्देश हैं कि वे कॉरपोरेट हितों की रक्षा को प्राथमिकता दें।

इसके अलावा, सत्ताधारी दल के स्थानीय नेताओं और रसूखदारों की 'दबंगई' ने पुलिस के इकबाल को भारी चोट पहुंचाई है। सोशल मीडिया पर हाल ही में ऐसे कई वीडियो वायरल हुए हैं जहां कभी कलेक्टर तो कभी एसपी और थानेदारों को सरेआम 'चमकाने' (धमकाने) की कोशिश की गई। जब थाने से लेकर जिला मुख्यालय तक राजनीतिक दबाव इस कदर हावी हो जाए कि जायज कार्रवाई पर भी नेताओं की डांट सुननी पड़े, तो वर्दी का स्वाभिमान डगमगाना लाजमी है।

## **सांसदों की 'गोटी' और वसूली के संगीन आरोप**

इस पूरे खेल का एक और स्याह पहलू भी सामने आ रहा है। गलियारों में सुगबुगाहट है कि छत्तीसगढ़ से दिल्ली भागने की इस होड़ में कुछ अफसर बकायदा दिल्ली में बैठे प्रभावशाली सांसदों के जरिए अपनी 'गोटी' फिट कर रहे हैं। चर्चा तो यहां तक है कि पसंदीदा केंद्रीय विंग (जैसे CBI, IB या NIA) में जगह पाने के लिए बड़े स्तर पर 'लेनदेन' और 'सेटिंग' का खेल चल रहा है।

दूसरी तरफ, राज्य की सबसे बड़ी जांच एजेंसी एसीबी-ईओडब्ल्यू पर भी दाग लगे हैं। हालांकि अमरेश मिश्रा के कमान संभालने के बाद पटवारियों, आरआई और एसडीएम पर ताबड़तोड़ कार्रवाई हुई है; लेकिन राज्य के चर्चित शराब घोटाला, कोयला परिवहन घोटाला, डीएमएफ और पीएससी घोटाले के आरोपियों से **'एजेंसी के ही कुछ अफसरों द्वारा मोटी वसूली'** किए जाने के संगीन आरोप लगे हैं। नव्या मलिक ड्रग्स केस में भी डायरी के कुछ कथित पन्ने सोशल मीडिया पर तैरते रहे, जो खाकी की साख पर बट्टा लगाते हैं।

## **असम कांड: जब अपनों ने ही अपनों की 'भद्र' पीटी!**

इस पूरे प्रशासनिक संकट के बीच, हाल ही में असम के गुवाहाटी में जो हुआ, उसने छत्तीसगढ़ पुलिस के मनोबल को पाताल में धकेल दिया है। डिजिटल अरेस्ट के एक बड़े मामले में अपराधियों को दबोचने गई छत्तीसगढ़ पुलिस की टीम को वहां की स्थानीय जनता के विरोध के बाद **असम पुलिस ने ही हिरासत में ले लिया।**

यह घटना छत्तीसगढ़ सरकार की कूटनीति और पुलिस समन्वय पर बहुत बड़ा तमाचा है।

 1. **पहला सवाल:** क्या छत्तीसगढ़ पुलिस ने असम जाने से पहले कानूनी और वैधानिक प्रक्रियाओं के तहत वहां की पुलिस को सूचना नहीं दी थी?

 2. **दूसरा सवाल:** केंद्र, असम और छत्तीसगढ़— तीनों जगह भारतीय जनता पार्टी (BJP) की 'डबल-ट्रिपल इंजन' सरकार होने के बावजूद राज्यों के बीच इतना खराब कोऑर्डिनेशन क्यों है?

अपराधियों को पकड़ने गई पुलिस जब खुद हवालात की हवा खाने लगे, तो इससे अपराधियों के हौसले बुलंद होना और पुलिस का मनोबल टूटना तय है।

## **दावे बनाम हकीकत: सरकार के 'ऑल इज वेल' पर भारी पड़ते सवाल**

इस पूरे बवाल पर जब मुख्यमंत्री और गृह मंत्री (विजय शर्मा) से बात की जाती है, तो सरकार का आधिकारिक रुख यही होता है कि *"राज्य में कानून व्यवस्था सुदृढ़ है और सब कुछ ठीक चल रहा है।"* तकनीकी रूप से यह भी दलील दी जाती है कि नियमों के मुताबिक हर आईपीएस को केंद्र में 2 साल सेवाएं देनी ही होती हैं।

लेकिन कागजी नियमों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर साफ दिख रहा है। यदि राज्य में काम करने का माहौल इतना ही बेहतरीन है, तो अचानक से होनहार अफसरों की फौज छत्तीसगढ़ को 'बाय-बाय' कहने के लिए इतनी उतावली क्यों है? बहरहाल, देखना दिलचस्प होगा कि गृह मंत्रालय इस प्रशासनिक असंतोष को कैसे थामता है, या फिर आने वाले दिनों में कुछ और बड़े आईपीएस अफसर छत्तीसगढ़ से बोरिया-बिस्तर समेटकर दिल्ली कूच कर जाते हैं।

वीडियो देखें 

https://youtu.be/WCc0filkMAE?si=vAXlfJtZkvnkp7IQ

बुधवार, 17 जून 2026

विकास की फाइलों पर 4 नहीं, अब 7 फीसदी कमीशन की 'अघोषित' जंग!

  'डबल इंजन' में भ्रष्टाचार का हाई-स्पीड गियर? विकास की फाइलों पर 4 नहीं, अब 7 फीसदी कमीशन की 'अघोषित' जंग!


मंत्रालय के गलियारों से ग्राउंड जीरो तक की पड़ताल

पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने कभी देश के सामने एक कड़वी हकीकत बयां की थी कि "केंद्र से चलने वाला ₹1 जनता तक पहुंचते-पहुंचते महज 15 पैसे रह जाता है।" करीब चार दशक बाद आज छत्तीसगढ़ में भी यही सवाल फिर से जोर-शोर से गूंज रहा है। राज्य में भले ही 'डबल इंजन' की सरकार होने और भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े दावों के साथ सत्ता परिवर्तन हुआ हो, लेकिन मंत्रालय के बंद कमरों से छनकर आ रही खबरें चौकाने वाली हैं। प्रशासनिक हलकों और गलियारों में चर्चा आम है कि विकास कार्यों और केंद्रीय ग्रांट की फाइलों को आगे बढ़ाने के लिए 'कमीशन का रेट' 4 फीसदी से बढ़ाकर 7 फीसदी कर दिया गया है। इसी 'अघोषित तकरार' के चलते विकास की अरबों रुपयों की फाइलें मंत्रालय में धूल खा रही हैं।

₹6,700 करोड़ का भारी-भरकम बजट और प्यासी जनता

केंद्रीय वित्त आयोग (Finance Commission) के तहत छत्तीसगढ़ के नगरीय निकायों और पंचायतों को चमकाने, बुनियादी सुविधाएं सुधारने और आपदा प्रबंधन के लिए ₹6,700 करोड़ से अधिक की भारी-भरकम राशि जारी की जाती है। नियमतः इस राशि का आधा हिस्सा शुद्ध पेयजल और स्वच्छता (पानी और सफाई) पर खर्च होना अनिवार्य है।

लेकिन ग्राउंड जीरो की हकीकत भयावह है। एक तरफ जहां शहरों की नालियां बजबजा रही हैं और सफाई व्यवस्था भगवान भरोसे है, वहीं ग्रामीण इलाकों की तस्वीरें कलेजा कपा देने वाली हैं। भीषण गर्मी के इस दौर में जल जीवन मिशन और वित्त आयोग की राशि के बावजूद ग्रामीण बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। कई गांवों में 1,000 से अधिक घरेलू नल सूखे पड़े हैं। ग्रामीणों को सिर पर गुंडी (बर्तन) रखकर दो से तीन किलोमीटर दूर दूसरे गांवों में पानी की तलाश में भटकना पड़ रहा है। 'जल संरक्षण दिवस' जैसी सरकारी औपचारिकताएं तो पूरी हो जाती हैं, लेकिन धरातल पर प्यास का सन्नाटा पसरा हुआ है।

टेंडर की शर्तों का 'मायाजाल' और चहेते ठेकेदारों की मोनोपॉली

इस पूरे खेल की शुरुआत जमीनी स्तर पर नहीं, बल्कि मंत्रालय स्तर से ही शुरू हो जाती है। सूत्रों के मुताबिक, वित्त आयोग की राशि से होने वाले कार्यों के लिए टेंडरों में ऐसी जटिल और चुनिंदा शर्तें (Conditions) जोड़ दी जाती हैं, जिससे आम या स्थानीय ठेकेदार रेस से बाहर हो जाएं। इसके चलते कुछ खास और 'चहेते ठेकेदारों' की मोनोपॉली (एकाधिकार) स्थापित हो चुकी है। स्थानीय स्तर के जनप्रतिनिधि और अधिकारी इस बड़े खेल के आगे मूकदर्शक बने हुए हैं, क्योंकि पूरा ताना-बाना ऊपर से ही तय होकर आता है।

फाइलों पर लगी 'कमीशन' की दीमक; 4% से बढ़कर हुआ 7%?

राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में सबसे बड़ी चर्चा कमीशन की दरें बढ़ने को लेकर है। विभागीय सूत्रों की मानें तो पहले जहां केंद्रीय ग्रांट की फाइलों को हरी झंडी दिखाने के लिए कथित तौर पर 4 फीसदी का लेन-देन चर्चाओं में रहता था, वहीं अब इसे बढ़ाकर 7 फीसदी किए जाने की मांग हो रही है। यही वजह है कि जब तक यह 'डील' फाइनल नहीं होती, तब तक विकास कार्यों की फाइलें वित्त और संबंधित मंत्रालयों के दफ्तरों से आगे नहीं खिसक पा रही हैं।

विपक्ष और कांग्रेस के ग्रामीण अध्यक्षों (जैसे पप्पू बंजारे व अन्य) ने भी सरकार को घेरते हुए आरोप लगाया है कि प्रदेश में विकास कार्य पूरी तरह ठप पड़ गए हैं। विधानसभा के भीतर भी विपक्ष ने पुरजोर तरीके से यह मुद्दा उठाया था कि विकास कार्यों की प्रशासनिक स्वीकृति होने के बावजूद वित्त मंत्रालय फाइलों को दबाकर बैठा हुआ है।

रडार पर भारी-भरकम मंत्रालय: मंत्रियों की खामोशी पर सवाल

इस पूरी व्यवस्था में उन प्रमुख मंत्रालयों पर उंगलियां उठ रही हैं, जिनके पास ग्रामीण और शहरी विकास का सीधा जिम्मा है:

1. पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्रालय (मंत्री: विजय शर्मा): जहां ग्रामीण क्षेत्रों की पेयजल व्यवस्था और पंचायतों के ग्रांट की फाइलें अटकी पड़ी हैं।

2. नगरीय प्रशासन एवं विकास मंत्रालय (उपमुख्यमंत्री मंत्री: अरुण साव): जल जीवन मिशन में हो रही कथित गड़बड़ियों और शहरी निकायों की बदहाली को लेकर विधानसभा से लेकर सड़क तक घिरे हुए हैं।

3. वित्त मंत्रालय (मंत्री: .पी. चौधरी): जिन पर विपक्ष ने सीधे तौर पर 'चेहरा देखकर' फाइलों को मंजूरी देने और जानबूझकर विकास के बजट को रोकने का आरोप लगाया है।

जनता का सवाल: भ्रष्टाचारियों को 'उल्टा लटकाने' के वादे का क्या हुआ?

चुनाव के वक्त मंचों से दहाड़ते हुए बड़े-बड़े नेताओं ने दावा किया था कि भ्रष्टाचारियों को 'उल्टा लटकाकर सीधा' कर दिया जाएगा। लेकिन आज जब केंद्र और राज्य दोनों जगह एक ही दल की सरकार है, तब भी यदि केंद्रीय पैसे का एक बड़ा हिस्सा बीच रास्ते में ही दम तोड़ रहा है, तो आम जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है। देखना होगा कि विकास की इन फाइलों से '7 फीसदी' का यह अघोषित ग्रहण कब हटता है और छत्तीसगढ़ के प्यासे गांवों तक पानी कब पहुंचता है।

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मंगलवार, 16 जून 2026

छत्तीसगढ़ बीजेपी में छिड़ी अंदरूनी महाभारत, 'अनुशासन का बुलडोज़र' हुआ पंचर!

 छत्तीसगढ़ बीजेपी में छिड़ी अंदरूनी महाभारत, 'अनुशासन का बुलडोज़र' हुआ पंचर!


रायपुर: छत्तीसगढ़ की सियासत में इन दिनों पर्दे के पीछे एक ऐसी राजनीतिक पटकथा लिखी जा रही है, जिसने रायपुर से लेकर दिल्ली दरबार तक हलचल मचा दी है। कल तक जो भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) 'ऑल इज वेल' और 'अनुशासन का डंडा' होने का दम भरती थी, आज उसी के भीतर चल रही अंदरूनी कलह और गुटबाजी की खबरें बाहर आने लगी हैं। छत्तीसगढ़ में डबल इंजन की सरकार को बैठे लगभग ढाई साल हो चुके हैं, और इस समय सबसे बड़ा मुद्दा कैबिनेट में फेरबदल और मंत्रियों के परफॉर्मेंस का बना हुआ है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय चाहते हैं कि मंत्रिमंडल में फेरबदल हो ताकि वे अपने चहेते विधायकों को जगह दे सकें और खराब परफॉर्मेंस या संगठन विरोधी सुर अपनाने वाले मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखा सकें, क्योंकि अगले ढाई साल बाद राज्य में चुनाव होने हैं। हालांकि, दिल्ली दरबार से फिलहाल इस फेरबदल को हरी झंडी नहीं मिली है और कहा गया है—"अभी रुको, देखते हैं।" ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या मोदी-शाह का रसूख भी राज्य के दिग्गज नेताओं के आगे बौना साबित हो रहा है?

बंद कमरे की 'इनसाइड स्टोरी': पाँच दिग्गजों ने फंसाया पेंच

राजनीतिक गलियारों और बंद कमरों से आ रही खबरों के मुताबिक, राज्य के आधा दर्जन दिग्गज नेताओं के तेवरों ने इस फेरबदल के पहियों पर ब्रेक लगा दिया है। आइए जानते हैं कि इन दिग्गज नेताओं के रुख ने कैसे इस पूरी कवायद को रोक दिया:

1. रामविचार नेताम और रेणुका सिंह (सरगुजा का आदिवासी असंतोष):

हाल ही में हुई बीजेपी की कोर ग्रुप की बैठक में भारी फेरबदल किया गया, जिससे दिग्गज आदिवासी नेता रामविचार नेताम को कोर ग्रुप से हटा दिया गया। सरगुजा क्षेत्र में आदिवासियों के बीच गहरा प्रभाव रखने वाले नेताम इस फैसले से बेहद खफा हैं और उन्होंने अपनी नाराजगी केंद्रीय नेतृत्व के सामने दर्ज कराई है। दूसरी तरफ, पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ विधायक रेणुका सिंह के तेवर भी तीखे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक कथित ऑडियो (जिसकी पुष्टि आधिकारिक तौर पर नहीं है) को लेकर विपक्ष भी हमलावर है और कांग्रेस का कहना है कि बीजेपी के वरिष्ठ नेता खुद मान रहे हैं कि यह सरकार दिल्ली के रिमोट कंट्रोल से चल रही है।

2. विजय शर्मा (गृह मंत्रालय छोड़ने को तैयार नहीं):

मंत्रिमंडल की संभावित बदलाव सूची में सबसे पहला नाम गृह मंत्री विजय शर्मा का चल रहा था। राज्य, विशेषकर राजधानी रायपुर में लगातार बढ़ती चाकूबाजी, तलवारबाजी, लूट और बमबारी जैसी घटनाओं के कारण कानून-व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। चर्चा थी कि उन्हें मंत्री पद से हटाकर बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में नई जिम्मेदारी देकर दिल्ली शिफ्ट किया जाएगा। लेकिन अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, विजय शर्मा दिल्ली जाने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं और वे न केवल राज्य की राजनीति में बने रहना चाहते हैं, बल्कि गृह मंत्रालय भी छोड़ने को राजी नहीं हैं।

3. ओपी चौधरी और सीएम के बीच अनबन की सुगबुगाहट:

मंत्रिमंडल फेरबदल की इस रेस में ओपी चौधरी काफी सक्रिय नजर आ रहे थे। कहा जा रहा है कि उन्होंने जो फेरबदल की सूची थमाई थी, उसमें कुछ ऐसे नाम शामिल थे जो मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के बेहद करीबी मंत्रियों के थे। इसी बात को लेकर मुख्यमंत्री और चौधरी के बीच अनबन या खींचतान की स्थिति पैदा हुई। बताया जा रहा है कि इस फेरबदल के तरीके से ओपी चौधरी भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं।

4. अरुण साव (साहू समाज और विभागीय खींचतान):

डिप्टी सीएम अरुण साव को लेकर भी कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। लोक निर्माण जैसे अहम विभागों में कथित तौर पर मची 'लूट-खसोट' के कारण उनका विभाग बदलने की चर्चा जोरों पर थी। वहीं, पार्टी के कुछ अन्य नेता और 'सुपर सीएम' कहे जाने वाले चेहरे चाहते हैं कि साव को मंत्रिमंडल से ही बाहर कर दिया जाए, ताकि वे स्वयं राज्य की पिछड़े वर्ग (साहू समाज) की राजनीति का नेतृत्व कर सकें। हालांकि, अरुण साव के प्रभारी नितिन नवीन के साथ अच्छे संबंधों के कारण फिलहाल मामला टल गया है।

दिल्ली में मंत्रियों की 'करतूतों' का पहुंचा पुलिंदा

इस पूरे खेल की शुरुआत बीजेपी की कोर ग्रुप की बैठक से हुई थी। दिल्ली से आए केंद्रीय नेताओं के सामने कई मंत्रियों की कार्यप्रणाली, उनके ओएसडी (OSD) और विशेष सहायकों के भ्रष्टाचार व मनमानी की शिकायतों का पुलिंदा रखा गया। कार्यकर्ताओं का यह गुस्सा देखकर केंद्रीय नेताओं ने आश्वासन दिया था कि, "आपकी शिकायतों को गंभीरता से लिया जाएगा, लेकिन फिलहाल आप व्यक्ति विशेष के बजाय पार्टी के लिए काम करें। अगर सत्ता हाथ से चली गई तो कुछ नहीं बचेगा।"

पार्टी के 'अनुशासन' पर खड़े हुए बड़े सवाल

मंत्रिमंडल के इस फेरबदल के टलने और अंदरूनी कलह के सतह पर आने के बाद अब संगठन की एकजुटता और अनुशासन की पोल खुलती नजर आ रही है। केंद्रीय नेतृत्व और मुख्यमंत्री साय के फैसलों को जिस तरह से सूबे के दिग्गज नेताओं ने चुनौती दी है, उससे आने वाले दिनों में पार्टी के भीतर की रार और बढ़ने की आशंका है।

अब देखना दिलचस्प होगा कि दिल्ली दरबार और मुख्यमंत्री साय मिलकर इस उलझे हुए राजनीतिक पेंच को कैसे सुलझाते हैं और आने वाले दिनों में ऊँट किस करवट बैठता है।

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सोमवार, 15 जून 2026

छत्तीसगढ़ में 'अटैचमेंट-डीअटैचमेंट' का महाखेल: कोर्ट के आदेश और सीएम की दहाड़ भी बेअसर!

 छत्तीसगढ़ में 'अटैचमेंट-डीअटैचमेंट' का महाखेल: कोर्ट के आदेश और सीएम की दहाड़ भी बेअसर!

एजुकेशन  और स्वास्थ्य विभाग में मलाईदार कुर्सियों का अजब जुगाड़; संघ की कथित सिफारिश और करोड़ों के लेन-देन का सनसनीखेज घालमेल



छत्तीसगढ़ में इन दिनों एक ऐसा प्रशासनिक खेल चल रहा है जिसे सुनकर सुशासन के दावों की हवा निकल जाती है। एक तरफ सूबे के मुख्यमंत्री मंच से गरजते हुए भ्रष्टाचार पर 'जीरो टॉलरेंस' और मलाईदार पदों पर सालों से जमे अधिकारियों-कर्मचारियों का अटैचमेंट तत्काल समाप्त करने की मुनादी करते हैं, वहीं दूसरी तरफ राज्य की बेलगाम अफसरशाही और शातिर दिमाग अधिकारी न तो मुख्यमंत्री के आदेशों की परवाह कर रहे हैं और न ही हाईकोर्ट की सख्त फटकार की। ट्रांसफर की आड़ में 'अटैचमेंट' और फिर 'डी-अटैचमेंट' का एक ऐसा समानांतर और गैरकानूनी सिंडिकेट खड़ा हो चुका है, जिसने राज्य की बुनियादी स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था को दीमक की तरह खोखला कर दिया है।

पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को ठेंगा दिखाने वाले इस खेल की परतें जब खुलती हैं, तो यह साफ हो जाता है कि सरकार चाहे जिसकी भी हो, सिस्टम को हांकने वाले चेहरे अपने ऐश-ओ-आराम के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। मुख्यमंत्री कहते हैं कि 'अटैचमेंट बंद करो और मूल विभाग में जाओ', लेकिन शातिर अधिकारियों के पास हर आदेश का कानूनी और गैर-कानूनी तोड़ पहले से तैयार रहता है। करोड़ों रुपये के लेन-देन और कथित तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कुछ रसूखदार चेहरों की सिफारिशों के दम पर चल रहे इस खेल ने पूरी प्रशासनिक साख पर सवालिया निशान लगा दिया है।

### **मंत्रालय (महानदी भवन) का अजूबा खेल: 10-10 साल से जमे हैं 'साहब'**

इस पूरे खेल का सबसे बड़ा अड्डा राज्य का दिल कहे जाने वाला मंत्रालय यानी 'महानदी भवन' बना हुआ है। सूत्रों के मुताबिक, अकेले मंत्रालय में 200 से अधिक कर्मचारी और अधिकारी अटैचमेंट के सहारे कुंडली मारकर बैठे हैं। नियमतः इन्हें फील्ड पर होना चाहिए था, जहां इन्हें धूप, बरसात और ठंड में जनता के बीच काम करना था। लेकिन फील्ड की मुश्किलों से बचने और राजधानी की सुख-सुविधाओं का आनंद लेने के लिए भारी-भरकम लेन-देन और राजनीतिक आकाओं की पैरवी का इस्तेमाल किया जाता है।

चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से कई अधिकारी और कर्मचारी पिछले 10-10 साल से एक ही जगह जमे हुए हैं। मंत्रालय कर्मचारी संघ ने इस विसंगति को लेकर सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) से कई बार लिखित शिकायतें की हैं। हर बार सिर्फ खोखले आश्वासन मिलते हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर फाइलें दबा दी जाती हैं। वजह साफ है—इस सिंडिकेट में ऊपर से लेकर नीचे तक पैसों की मलाई बंटती है और 'भाई साहबों' की सिफारिश के आगे नियम-कायदे घुटने टेक देते हैं।

> ### **केस स्टडी: अंबिकापुर का 'जादुई' डी-अटैचमेंट फॉर्मूला**

> जब विधानसभा में स्वास्थ्य विभाग के अटैचमेंट का मुद्दा गूंजा, तो स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने बड़े तामझाम के साथ घोषणा की कि सभी अटैचमेंट तत्काल प्रभाव से निरस्त किए जा रहे हैं। जिला प्रमुखों को पत्र जारी हुए। अंबिकापुर में चौतरफा दबाव के बाद जिला अधिकारी ने 16 कर्मचारियों का अटैचमेंट समाप्त कर उन्हें मूल स्थापना में भेजने का आदेश निकाला। लेकिन यह सिर्फ आंखों में धूल झोंकने का नाटक था। जैसे ही मामला शांत हुआ, अधिकारियों ने एक नया 'जादुई' आदेश जारी कर दिया। बहाना बनाया गया कि *"कर्मचारियों के जाने से विभाग का काम प्रभावित हो रहा है, अतः इन्हें वापस डी-अटैच (उसी मलाईदार पद पर अटैच) किया जाता है।"* यह फॉर्मूला अब पूरे प्रदेश के विभागों में धड़ल्ले से लागू किया जा रहा है।


### **शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग पर वज्रपात: नौनिहालों का भविष्य अंधकार में**

इस अटैचमेंट और डी-अटैचमेंट के खेल की सबसे भारी कीमत सूबे के गरीब बच्चे और मरीज चुका रहे हैं। शिक्षा विभाग का हाल यह है कि बड़े पैमाने पर प्राचार्य, व्याख्याता और शिक्षक गांवों के स्कूलों को छोड़कर शहरों के दफ्तरों या मलाईदार अटैचमेंट सीटों पर बैठे हैं। नतीजा यह है कि ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में पढ़ाई पूरी तरह ठप है। कहीं पांच क्लास के बच्चों को अकेला एक शिक्षक संभाल रहा है, तो कहीं स्कूलों के कमरों में ताले लटक रहे हैं। सरकार एक तरफ सरकारी स्कूलों में फीस लेने जैसे नए-नए आदेश निकाल रही है, जिससे विपक्ष को यह आरोप लगाने का मौका मिल रहा है कि सरकार सरकारी शिक्षा तंत्र को ही बंद करना चाहती है।

यही भयावह स्थिति स्वास्थ्य विभाग की भी है। ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ अटैचमेंट के जरिए जिला मुख्यालयों या राजधानी के एअर-कंडीशंड कमरों में आराम फरमा रहे हैं। सुदूर अंचलों में गरीब मरीज स्ट्रेचर पर दम तोड़ रहे हैं, प्रसव के लिए महिलाएं तड़प रही हैं, लेकिन उनके हक के डॉक्टर और कर्मचारी प्रशासनिक जादूगरी के दम पर ऊंची कुर्सियों का सुख ले रहे हैं।

| विभाग | कागजी दावा / सीएम का आदेश | ग्राउंड रियलिटी (अटैचमेंट का सच) |

*मंत्रालय (जीएडी)** | सभी कर्मचारी फील्ड पर जाएं, अटैचमेंट पूरी तरह खत्म। | 200 से अधिक रसूखदार कर्मचारी 10 साल से पैरवी के दम पर जमे हैं। |

| **शिक्षा विभाग** | शिक्षकों की कमी दूर होगी, कोई अटैचमेंट नहीं रहेगा। | प्राचार्य और व्याख्याता दफ्तरों में बाबू बने हैं, स्कूलों में ताले लटक रहे हैं। |

| **स्वास्थ्य विभाग** | विधानसभा में घोषणा—सभी स्वास्थ्यकर्मी मूल पोस्टिंग पर भेजे गए। | अंबिकापुर जैसी 'डी-अटैचमेंट' की चालबाजी से सभी वापस एसी कमरों में लौटे। |

### **हाईकोर्ट की फटकार भी बेअसर: क्या यह सीधे तौर पर अवमानना नहीं?**

इस पूरे मामले में सबसे गंभीर पहलू यह है कि बिलासपुर हाईकोर्ट इस अटैचमेंट प्रथा को लेकर बेहद सख्त रुख अपना चुका है। माननीय न्यायालय ने कई मामलों की सुनवाई के दौरान साफ तौर पर कहा है कि ट्रांसफर या पोस्टिंग की आड़ में किसी को मनमर्जी से अटैच करना कानूनी अधिकार नहीं है, यह पूरी तरह गैरकानूनी है। हाईकोर्ट ने अफसरशाही के कई ऐसे मनमाने आदेशों को निरस्त भी किया है। जब-जब कोर्ट का डंडा चलता है, जनता तालियां बजाती है कि अब व्यवस्था सुधरेगी। लेकिन राज्य की बेलगाम हो चुकी अफसरशाही को न तो कोर्ट की अवमानना का डर है और ना ही मुख्यमंत्री के विशेषाधिकार का।

विभागीय सूत्रों के अनुसार, इस खेल के पीछे एक बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा है। तबादला उद्योग पर कागजी रोक लगने के बाद 'अटैचमेंट' को ही कमाई का नया जरिया बना लिया गया है। मनशाई जगह पर टिके रहने के लिए लाखों रुपये का एडवांस और हर महीने का फिक्स कमीशन इस सिंडिकेट के शीर्ष तक पहुंचता है। जब कोई ईमानदार मंत्री या अधिकारी इस पर रोक लगाने की कोशिश करता है, तो संघ (आरएसएस) के बड़े पदाधिकारियों के नाम का इस्तेमाल कर 'ऊपर' से दबाव डलवा दिया जाता है।

> ### **सत्ता के गलियारों से सीधे सवाल...**

>  1. जब मुख्यमंत्री स्वयं मंच से 'जीरो टॉलरेंस' की घोषणा करते हैं, तो उनके मातहत अधिकारी उनके ही आदेशों का मजाक उड़ाने की हिम्मत कैसे कर पाते हैं?

>  2. क्या स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल को यह पता है कि उनके द्वारा विधानसभा में दी गई क्लीन चिट को जमीनी अफसरों ने 'डी-अटैचमेंट' के जरिए रद्दी की टोकरी में डाल दिया है?

>  3. बिलासपुर हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद जो अफसर 'अटैचमेंट' का खेल खेल रहे हैं, उन पर सीधे तौर पर न्यायालय की अवमानना का मुकदमा क्यों नहीं चलना चाहिए?

>  4. क्या 'डबल इंजन' की सरकार में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) जैसी संस्था के रसूख का इस्तेमाल भ्रष्ट और कामचोर कर्मचारियों को संरक्षण देने के लिए किया जा रहा है?

निष्कर्ष: कथनी और करनी के बीच सुलगते सवाल**

छत्तीसगढ़ की जनता ने जिस सुशासन और बदलाव के भरोसे पर नई सरकार को चुना था, उसे ये शातिर अधिकारी अपनी चालाकी से मटियामेट करने में तुले हुए हैं। अगर करोड़ों रुपये के लेन-देन के इस 'अटैचमेंट उद्योग' को तुरंत ध्वस्त नहीं किया गया, तो मुख्यमंत्री के 'जीरो टॉलरेंस' के वादे का हश्र भी पिछली सरकारों जैसा ही होगा। अब गेंद पूरी तरह मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के पाले में है। क्या वे इन बेलगाम अफसरों पर नकेल कसकर अपनी प्रशासनिक धमक दिखाएंगे, या फिर छत्तीसगढ़ की जनता इसी तरह सिस्टम के इस क्रूर तमाशे को देखने के लिए मजबूर रहेगी? जनता जवाब का इंतजार कर रही है।

वीडियो देखें 

https://youtu.be/5as2DabotK4?si=ffaUdOWOzEuC6zWH


रविवार, 14 जून 2026

बस्तर में 'विकास' की नई क्रोनोलॉजी


 बस्तर में 'विकास' की नई क्रोनोलॉजी


जल, जंगल, जमीन पर 'बाहरी' पहरा या छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान से समझौता?


क्या छत्तीसगढ़ के अमूल्य संसाधनों का सौदा हो चुका है? एक तरफ बस्तर को नक्सलवाद से मुक्त कर आदिवासियों तक 'सेवा डेरा' पहुँचाने का सरकारी दावा, तो दूसरी तरफ पर्दे के पीछे से राज्य के खनिज, जमीन और उद्योगों को गुजरात की बड़ी कॉरपोरेट लॉबी के हवाले करने की सुगबुगाहट। क्या यह महज एक संयोग है या एक सोची-समझी क्रोनोलॉजी? पढ़िए, डबल इंजन सरकार के इस नए इंडस्ट्रियल पुश का पूरा कच्चा-चिट्ठा।

### **1. बस्तर का नया चेहरा: सुरक्षा कैंप से 'सेवा डेरा' का सफर**

राजनीति का एक स्थापित नियम है—कोई भी दौरा बेमकसद नहीं होता, हर कदम के पीछे एक बड़ी डील और एक गहरी क्रोनोलॉजी होती है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का हालिया बस्तर दौरा भी इसी का एक बड़ा उदाहरण बनकर उभरा है।

सरकार का दावा है कि बस्तर अब नक्सलवाद के खात्मे की कगार पर है और अगले पांच वर्षों में यहाँ के लोगों की आमदनी छह गुना बढ़ जाएगी। इस दावे को जमीन पर उतारने के लिए **'बस्तर विकास मॉडल 2.0'** के तहत एक महत्वाकांक्षी योजना शुरू की गई है। केरल जितने बड़े भूभाग में फैले बस्तर के सात जिलों को सुरक्षा देने के लिए स्थापित किए गए 200 सुरक्षा कैंपों में से 70 कैंपों को **"वीर शहीद गुंडादूर सेवा डेरा"** में तब्दील किया जा रहा है।

इन सेवा डेरों की संकल्पना यह है कि सरकार खुद आदिवासियों के दरवाजे तक पहुंचेगी। एक ही छत के नीचे बैंकिंग, आधार कार्ड, राशन और डिजिटल सेवाओं समेत केंद्र व राज्य सरकार की 371 योजनाओं का लाभ सीधे स्थानीय जनता को मिलेगा। पहली नजर में यह बस्तर के कायाकल्प की एक बेहद खूबसूरत तस्वीर पेश करता है, लेकिन इस चमकते विकास मॉडल के पीछे एक दूसरी कहानी भी आकार ले रही है।

### **2. वायरल लिस्ट का सच: छत्तीसगढ़ के संसाधनों पर किसका पहरा?**

जैसे ही बस्तर में विकास के कसीदे पढ़े जा रहे थे, ठीक उसी वक्त छत्तीसगढ़ के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में एक सूची (लिस्ट) वायरल हो गई। यह सूची चीख-चीख कर सवाल पूछ रही है कि आखिर छत्तीसगढ़ के सारे बड़े ठेके, जमीनें और उद्योग एक विशेष राज्य की लॉबी की झोली में ही क्यों जा रहे हैं?

रायपुर से लेकर बस्तर तक, और सरगुजा से लेकर रायगढ़-राजनांदगांव तक, कॉरपोरेट दिग्गजों ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए हैं। हालांकि इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं है कि यह सूची गृह मंत्री के दौरे से सीधे जुड़ी है, लेकिन उद्योग जगत में मची यह हलचल इस प्रकार है:

 * **अडानी पावर और अडानी एंटरप्राइजेस (अहमदाबाद):** ऊर्जा और केमिकल क्षेत्र के भारी-भरकम प्रोजेक्ट्स के लिए इन्हें हरी झंडी मिलने की खबरें हैं, और ये सरगुजा संभाग में बड़े पैमाने पर जमीन की तलाश में हैं।

 * **आरसेलर मित्तल निपॉन प्राइवेट लिमिटेड (सूरत):** बस्तर के खनिज-समृद्ध क्षेत्र में विशाल उद्योग स्थापित करने की तैयारी में है।

 * **सफायर सेमीकॉम प्राइवेट लिमिटेड:** अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक सेमीकंडक्टर क्षेत्र की यह कंपनी राजधानी रायपुर के रणनीतिक इलाकों में स्थापित होने जा रही है।

 * **टोरेंट फार्मास्यूटिकल्स और लाइस्टियम लाइफ साइंस (अहमदाबाद):** दवा निर्माण क्षेत्र की इन बड़ी कंपनियों को छत्तीसगढ़ के प्रमुख शहरों से सटी बेशकीमती जमीनें आवंटित की जा रही हैं।

 * **ओक्स श्री इंसाल (राजकोट):** केंद्र सरकार के विजन के अनुरूप ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ की जमीन का उपयोग करने की तैयारी में है।

 * **अंबुजा सीमेंट:** प्रचुर चूना पत्थर (लाइमस्टोन) वाले क्षेत्रों में अपना साम्राज्य बढ़ा रही है, जो पहले ही सीमेंट की कीमतों और कथित अवैध वसूलियों को लेकर विवादों में रही है।

### **3. रोजगार का छलावा: 'लोकल' को चपरासी की नौकरी भी नहीं?**

सरकार इन बड़े उद्योगों के निवेश को 'रोजगार के सुनहरे अवसर' के रूप में पेश कर रही है। लेकिन छत्तीसगढ़ का कड़वा इतिहास कुछ और ही बयां करता है। स्थानीय युवाओं को स्किल डेवलपमेंट के नाम पर अक्सर चपरासी या सुरक्षा गार्ड जैसी बेहद मामूली नौकरियां देकर टरका दिया जाता है, और कभी-कभी तो वह भी नसीब नहीं होती।

हाल के दिनों में प्रदेश में हुई बड़ी औद्योगिक दुर्घटनाओं ने एक भयावह सच को उजागर किया है। हादसों में जान गंवाने वाले मजदूरों की सूची में अधिकांश नाम दूसरे राज्यों के श्रमिकों के थे। उद्योगों के भीतर यह अंदरूनी नीति साफ दिखती है कि स्थानीय युवाओं को काम पर रखने से बचा जाए, क्योंकि स्थानीय लोगों के शामिल होने से भूमि, पर्यावरण और मजदूरी को लेकर आंदोलन का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में सवाल उठता है: **यदि छत्तीसगढ़ के युवाओं को जल, जंगल और जमीन खोने के बाद मजदूर बनने का भी हक नहीं मिलेगा, तो यह विकास किसके लिए है?**

### **4. फर्जी जनसुनवाई और 'उलगुलान' की गूंज**

सत्ता की ताकत के दम पर छत्तीसगढ़ के मैदानी और पहाड़ी इलाकों में उद्योगों को स्थापित करने के लिए 'फर्जी जनसुनवाई' के गंभीर आरोप लग रहे हैं। खबरों के मुताबिक, कई जगहों पर तो मृत व्यक्तियों के अंगूठे के निशान लगाकर कॉरपोरेट घरानों को जमीनें सौंपने का खेल खेला गया है।

इस शोषण और दमन के खिलाफ अब छत्तीसगढ़ का आदिवासी और स्थानीय समाज चुप बैठने को तैयार नहीं है। बस्तर और सरगुजा से लेकर छुईखदान के मैदानी इलाकों तक जल, जंगल और जमीन को बचाने की लड़ाई एक बार फिर तेज हो गई है। जंगलों के भीतर **'उलगुलान'** (क्रांति) के नारे गूंजने लगे हैं।

### **5. सुलगते राजनीतिक सवाल: क्या बदल जाएगा छत्तीसगढ़ का नक्शा?**

इस वायरल सूची और ताबड़तोड़ फैसलों ने छत्तीसगढ़ की राजनीति में भूचाल ला दिया है। क्षेत्रीय राजनीतिक दल और संगठन जैसे **छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना, छत्तीसगढ़ समाज पार्टी और जय जोहार पार्टी** ने सरकार के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया है। उनका सीधा आरोप है कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के केंद्रीय दबाव में आकर छत्तीसगढ़ को गुजरात के उद्योगपतियों के हाथों 'गिरवी' रख रही है।

**निष्कर्ष:

क्या 'डबल इंजन' की यह रफ्तार छत्तीसगढ़िया अस्मिता और पर्यावरण को कुचल कर आगे बढ़ेगी? क्या करोड़ों-अरबों के इस निवेश से स्थानीय युवाओं का भविष्य सचमुच सुधरेगा, या छत्तीसगढ़ की नियति सिर्फ अपने बहुमूल्य संसाधनों को लुटते हुए देखना रह जाएगी? ये वो सवाल हैं जिनका जवाब आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की जनता को खुद तय करना होगा, क्योंकि इस बार लड़ाई सिर्फ रोजगार की नहीं, बल्कि अस्तित्व और पहचान की है।

वीडियो देखें 


https://youtu.be/tKxuX5pVeEs?si=XwNdU1Vy2YXAhOYV



शनिवार, 13 जून 2026

अडानी डिमांड' से साय सरकार के हाथ-पांव फूले!

 अडानी डिमांड' से साय सरकार के हाथ-पांव फूले!


क्या कॉरपोरेट दबाव और जन-आक्रोश के बीच फंस गई है छत्तीसगढ़ की डबल इंजन सरकार? राजस्थान को जरूरत नहीं, फिर भी 'मध्य भारत के फेफड़े' पर क्यों चल रही है कुल्हाड़ी? एकInside रिपोर्ट।



छत्तीसगढ़ में हसदेव अरण्य के जंगलों को बचाने की जंग एक बार फिर बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गई है। एक तरफ जहां हसदेव अरण्य में राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (RRVUNL) के नाम पर संचालित होने वाली तीसरी खदान 'केते एक्सटेंशन' (Kete Extension) को गुपचुप तरीके से मंजूरी मिलने के बाद स्थानीय आदिवासियों और पर्यावरणविदों ने आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है , वहीं दूसरी तरफ कॉरपोरेट दिग्गज अडानी समूह की एक नई और गुप्त फरमाइश ने राज्य की विष्णुदेव साय सरकार की रातों की नींद उड़ा दी है ।

उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार, अडानी पावर लिमिटेड और अडानी एंटरप्राइजेज केमिकल ने छत्तीसगढ़ सरकार को पत्र लिखकर सरगुजा क्षेत्र में भारी-भरकम जमीन और इंफ्रास्ट्रक्चर (बिजली-पानी) की मांग की है । इस मांग ने सरकार के भीतर एक ऐसा राजनीतिक असमंजस पैदा कर दिया है कि मामले को सुलझाने के लिए सीधे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के हस्तक्षेप की जरूरत महसूस की जा रही है ।

पेंच नंबर 1: जब राजस्थान को कोयले की जरूरत ही नहीं, तो हसदेव का विनाश क्यों?

इस पूरी कहानी का सबसे चौंकाने वाला पहलू 'सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी' (CEA) के संशोधित आंकड़े हैं । सरकारी दावों में बार-बार कहा जाता है कि राजस्थान के पावर प्लांटों को चालू रखने के लिए हसदेव का कोयला अनिवार्य है। लेकिन सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है:

1. सरप्लस बिजली का सच: CEA के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, साल 2025-26 से 2035-36 के बीच राजस्थान की बिजली मांग के पुराने अनुमान (20,000 मेगावाट) को घटाकर अब 16,000 मेगावाट कर दिया गया है । इसके साथ ही, राजस्थान के पास वर्तमान में 840 मेगावाट सरप्लस (अतिरिक्त) बिजली मौजूद है ।

2. सौर ऊर्जा की क्रांति: राजस्थान खुद सौर ऊर्जा (Solar Energy) के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो रहा है, जहां अकेले 32,000 मेगावाट की सौर परियोजनाएं कतार में हैं ।

3. सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा: खुद पूर्ववर्ती सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र देकर स्वीकार किया था कि राजस्थान की अगले 20 वर्षों की कोयला जरूरत अकेले 'परसा केते बासेन' (PKB) ब्लॉक से पूरी हो सकती है ।

बड़ा सवाल: जब राजस्थान को अतिरिक्त कोयले की आवश्यकता ही नहीं है, तो हसदेव के पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील (Ecologically Sensitive) क्षेत्र को क्यों उजाड़ा जा रहा है? 

पेंच नंबर 2: 'लेजेंड' के नाम पर खुद के पावर प्लांटों को फायदा पहुंचाने का खेल?

ग्राउंड रिपोर्ट और स्थानीय कार्यकर्ताओं का आरोप है कि हसदेव से निकलने वाले कोयले का इस्तेमाल राजस्थान के लिए कम और अडानी समूह के निजी थर्मल पावर प्लांटों (रायपुर, कोरबा और रायगढ़ स्थित प्लांट) के लिए ज्यादा किया जा रहा है । बिलासपुर-सरगुजा हाईवे पर चौबीसों घंटे बाय-रोड ट्रकों के माध्यम से भारी मात्रा में कोयला निजी प्लांटों की तरफ डंप किया जा रहा है । 'केते एक्सटेंशन' की तीसरी खदान को मिली मंजूरी को इसी बड़ी क्रोनी-कैपिटलिज्म (Crony Capitalism) की साजिश का हिस्सा माना जा रहा है ।

पर्यावरणीय तबाही: 'रेगिस्तान' बनने की कगार पर छत्तीसगढ़

हसदेव का जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि पूरे मध्य भारत का 'फेफड़ा' (Lung of Central India) है । अब तक दो खदानों के चक्कर में 10,000 एकड़ जंगल तबाह हो चुका है और करीब 6 लाख पेड़ काटे जा चुके हैं ।

तीसरी मंजूरी (केते एक्सटेंशन) का सच:

 घना जंगल: इस प्रस्तावित ब्लॉक का 98% इलाका बेहद घना जंगल है ।

 पेड़ों की बलि: स्थानीय संघर्ष समितियों के मुताबिक, इस तीसरे ब्लॉक के खुलने से 5 लाख से अधिक पेड़ और साफ कर दिए जाएंगे ।

 विलुप्ति का खतरा: 'भारतीय वन्यजीव संस्थान' (WII) ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट चेतावनी दी थी कि यहां खनन से मिनीमाता हसदेव बांगो बांध का अस्तित्व खतरे में आ जाएगा , जिससे छत्तीसगढ़ की कृषि व्यवस्था चरमरा जाएगी।

 मानव-हाथी संघर्ष: हाथियों के 2000 वर्ग किमी के प्राकृतिक कॉरिडोर और हाथी रिजर्व के बीच खनन होने से हाथियों का गुस्सा अब सीधे इंसानी बस्तियों पर फूटेगा ।

 आदिवासियों पर चोट: स्थानीय आदिवासियों की 70% आजीविका इसी जंगल पर निर्भर है, जो अब पूरी तरह उजड़ जाएगी ।

पेंच नंबर 3: बस्तर से डरकर सरगुजा में 'जमीन की नई डिमांड'

इस पूरे विवाद के बीच 'इनसाइड स्टोरी' यह है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य में निवेश बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर उद्योगपतियों (जिंदल, मित्तल आदि) को आमंत्रित किया है । अडानी समूह को बस्तर में पहले ही लौह अयस्क (Iron Ore) की एक खदान आवंटित है, लेकिन पिछले 8 महीनों से वहां काम ठप है क्योंकि 150 से अधिक गांवों के आदिवासी इसका उग्र विरोध कर रहे हैं ।

नक्सलवाद और जन-विरोध के डर से अब अडानी समूह ने अपना रुख बदलते हुए सरगुजा क्षेत्र में ऊर्जा केमिकल सेक्टर के लिए नई जमीन मांग ली है।

राजनीतिक गलियारों में हड़कंप: आगे कुआं, पीछे खाई

सूत्रों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ की एक दमदार मंत्री ने इस विषय पर प्रदेश प्रभारी नितिन नवीन से भी चर्चा की है । सरकार के सामने सबसे बड़ी दुविधा यह है:

 अगर अडानी की मांग मानी: तो आदिवासियों का आक्रोश इस कदर भड़केगा कि साय सरकार के लिए अगला विधानसभा चुनाव जीतना नामुमकिन हो जाएगा। छत्तीसगढ़ पहले ही अभूतपूर्व गर्मी (ग्लोबल वार्मिंग) और जल संकट से जूझ रहा है , ऐसे में और जंगल काटना आत्मघाती होगा।

 अगर मांग ठुकराई: तो दिल्ली दरबार (मोदी-शाह) की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है ।

क्लाइमेक्स (आगे क्या?):

आगामी 19-20 तारीख को बस्तर में होने वाली 'मध्य क्षेत्रीय बैठक' में देश के गृह मंत्री अमित शाह शामिल होने आ रहे हैं। माना जा रहा है कि इस बैठक के इतर साय सरकार के शीर्ष नेता इस 'कॉरपोरेट डिमांड' और 'हसदेव विवाद' पर बीच का रास्ता निकालने के लिए अमित शाह के सामने अपनी बात रख सकते हैं ।

क्या छत्तीसगढ़ की डबल इंजन सरकार छत्तीसगढ़ के जल, जंगल और जमीन की रक्षा कर पाएगी या कॉरपोरेट दबाव के आगे नतमस्तक होना पड़ेगा? यह आने वाला वक्त तय करेगा।

सदन के संकल्प का क्या हुआ?

याद रहे कि 26 जुलाई 2022 को छत्तीसगढ़ विधानसभा में सभी 90 विधायकों (भाजपा और कांग्रेस दोनों) ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर हसदेव के सभी कोयला ब्लॉकों को निरस्त करने का संकल्प लिया था । तत्कालीन सरकार ने इसी आधार पर केते एक्सटेंशन की जनसुनवाई और भूमि अधिग्रहण को रोका था । लेकिन सत्ता बदलते ही उसी संकल्प को ठंडे बस्ते में डालकर तीसरी खदान को हरी झंडी दे दी गई । यहाँ तक कि अनुसूचित जनजाति आयोग के कड़े तेवरों और फर्जी जनसुनवाई की शिकायतों को भी दरकिनार कर दिया गया है!

वीडियो देखें 

https://youtu.be/cg5leyPmvr8?si=e3NPyppgBxjmyYSj