राष्ट्रवाद की नई परिभाषा या विभाजन की पुरानी लकीरें?
इतिहास के पन्नों से वर्तमान की राजनीति तक का एक गहरा और निष्पक्ष विश्लेषण
1. प्रस्तावना: इतिहास की गूंज और वर्तमान का कोलाहल
सन् 1947 का अगस्त महीना सिर्फ एक देश की आजादी का गवाह नहीं था, बल्कि उपमहाद्वीप के सीने पर खिंची उस खूनी लकीर का भी गवाह था जिसने रातों-रात करोड़ों लोगों को अपनी ही जमीन पर पराया बना दिया। आज जब हम इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में खड़े हैं, तब भी नागरिकता, राष्ट्रवाद और पहचान के सवाल थमे नहीं हैं।
अक्सर यह माना जाता है कि इतिहास बीत चुका समय है, लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप के संदर्भ में इतिहास एक जीवंत इकाई है जो हर रोज हमारी सुबह के अखबारों और शाम की टीवी डिबेट्स को तय करती है। आज देश के राजनीतिक गलियारों से लेकर चाय की टपरियों तक जिस 'राष्ट्रवाद' पर सबसे तीखी बहस हो रही है, उसकी जड़ें दरअसल आज की राजनीति में नहीं, बल्कि सन 47 और उसके बाद के दशकों में लिए गए राजनीतिक फैसलों में छिपी हैं। सवाल यह उठता है कि क्या हम आज वाकई राष्ट्र की सुरक्षा और संप्रभुता की नई इबारत लिख रहे हैं, या सिर्फ अतीत के घावों को कुरेदकर वर्तमान की राजनीतिक गोटियां सेट कर रहे हैं?
## 2. नेहरू-लियाकत समझौते से असम अकॉर्ड तक: इतिहास का वो सच जो छिपाया गया
विभाजन के तुरंत बाद सबसे बड़ा संकट शरणार्थियों का था। दोनों ओर से इंसानों का ऐसा रेला चला जिसकी कल्पना इतिहास में कभी नहीं की गई थी। इस मानवीय त्रासदी को संभालने और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए 1950 में 'नेहरू-लियाकत समझौता' (दिल्ली पैक्ट) हुआ। इस समझौते का मूल उद्देश्य यह था कि दोनों देश अपने-अपने यहाँ अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे और जो शरणार्थी वापस जाना चाहते हैं, उन्हें उनकी संपत्ति वापस मिलेगी।
> **इतिहास का अंतर्विरोध:**
> दस्तावेज़ गवाह हैं कि भारत ने इस समझौते की शर्तों का पूरी निष्ठा से पालन किया, लेकिन तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) और पश्चिमी पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों (विशेषकर हिंदुओं, सिखों, बौद्धों) पर अत्याचार का सिलसिला थमा नहीं। नतीजतन, सीमाओं के पार से आबादी का पलायन रुक-रुक कर चलता रहा।
>
इसके बाद दूसरा सबसे बड़ा मोड़ आया सन 1971 में, जब बांग्लादेश का जन्म हुआ। इस दौरान एक बार फिर लाखों की संख्या में शरणार्थी भारत, विशेषकर असम और पश्चिम बंगाल की सीमाओं में दाखिल हुए। असम की जनसांख्यिकी (Demography) में आए इस अचानक बदलाव ने वहां एक बड़े सांस्कृतिक और सामाजिक आंदोलन को जन्म दिया, जिसे हम 'असम आंदोलन' के नाम से जानते हैं। छह साल चले इस खूनी संघर्ष का अंत 1985 के 'असम समझौते' (Assam Accord) से हुआ, जिसने नागरिकता के लिए 25 मार्च 1971 की कट-ऑफ तारीख तय की।
विडंबना देखिए कि जो असम समझौता असम की अस्मिता को बचाने के लिए हुआ था, वही आगे चलकर देश की नागरिकता बहस का सबसे पेचीदा कानूनी दस्तावेज बन गया।
## 3. कानून, नागरिकता और पहचान की कानूनी भूलभुलैया
नागरिकता किसी भी संप्रभु राष्ट्र का सबसे बुनियादी अधिकार होती है। भारत के संविधान के भाग-2 (अनुच्छेद 5 से 11) में नागरिकता के प्रावधान दिए गए हैं। लेकिन समय के साथ इसमें कई बदलाव किए गए। 1955 के मूल नागरिकता कानून में 1986, 1992, 2003, 2005, 2015 और हाल ही में सीएए (CAA) के जरिए संशोधन किए गए।
इन संशोधनों की यात्रा को देखें तो समझ आता है कि भारत की नागरिकता की अवधारणा 'भूमंडलीय अधिकार' (Jus Soli - जन्म के आधार पर) से खिसककर 'रक्त संबंध/धार्मिक प्रताड़ना' (Jus Sanguinis - वंश या पृष्ठभूमि के आधार पर) की तरफ बढ़ी है।
4. राष्ट्रवाद का नया 'कॉर्पोरेट मॉडल': चुनावी ध्रुवीकरण और क्रोनोलॉजी का खेल
आज की सत्ता ने राजनीति को एक ऐसे 'इवेंट मैनेजमेंट' में बदल दिया है, जहाँ देश की सुरक्षा और नागरिकों की पहचान सिर्फ चुनावी विज्ञापनों के टूलकिट बन कर रह गए हैं। जो मुद्दा कभी देश की संप्रभुता से जुड़ा गंभीर विषय हुआ करता था, उसे आज बेहद शातिर तरीके से 'क्रोनोलॉजी' के खेल में बदल दिया गया है। गृह मंत्रालय की फाइलें बाद में हिलती हैं, पहले सत्ताधारी दल के आईटी सेल और गोदी मीडिया के स्टूडियोज में 'देशभक्त बनाम देशद्रोही' की स्क्रिप्ट लिख दी जाती है।
यह आज की सत्ता की सबसे बड़ी 'करतूत' है कि उसने जनता को बुनियादी सवालों से पूरी तरह काट दिया है।
जब युवा बेरोजगारी पर सवाल उठाता है, तो उसे सीमा पार के दुश्मनों का डर दिखाया जाता है।
जब किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) या अपनी बदहाली पर बात करता है, तो विमर्श को अचानक नागरिकता, घुसपैठियों और धर्म के चश्मे पर लाकर खड़ा कर दिया जाता है।
सत्ता का दोहरा चरित्र:
एक तरफ तो कागजों पर 'वसुधैव कुटुंबकम्' का ढोंग रचा जाता है, और दूसरी तरफ घरेलू राजनीति में अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए समाज के एक हिस्से को लगातार 'खलनायक' (Villain) के रूप में पेश किया जाता है। यह राष्ट्रवाद नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद की आड़ में खेली 5. जांच एजेंसियों का तमाशा और संस्थाओं का आत्मसमर्पण
इतिहास गवाह है कि जब-जब सरकारें जन-आकांक्षाओं को पूरा करने में विफल होती हैं, तब-तब वो भय का माहौल बनाती हैं। आज की सत्ता की सबसे बड़ी करतूत यह है कि उसने देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं की रीढ़ को ही तोड़ दिया है। जो चुनाव आयोग, जो अदालतें और जो जांच एजेंसियां किसी भी लोकतंत्र का सुरक्षा कवच होती हैं, उन्हें आज सत्ता के इशारे पर नाचने वाली कठपुतलियों में तब्दील कर दिया गया है।
विपक्ष की आवाज को दबाने के लिए कभी देशद्रोह के मुकदमों का सहारा लिया जाता है, तो कभी केंद्रीय एजेंसियों को पीछे छोड़ दिया जाता है। लेकिन जब बात असल घुसपैठ, सीमाओं पर चीन की दादागिरी या आंतरिक सुरक्षा की आती है, तो सत्ता की 'छप्पन इंच' की छाती अचानक चुप्पी साध लेती है। इतिहास की गलतियों को सुधारने का दावा करने वाले हुक्मरान आज इतिहास के सबसे कमजोर और डरे हुए दौर का निर्माण कर रहे हैं, जहाँ सवाल पूछना ही सबसे बड़ा अपराध बन चुका है।
6. निष्कर्ष: क्या राजा नंगा हो चुका है?
कवि अज्ञेय ने कभी लिखा था कि "सांप, तुम सभ्य तो हुए नहीं..."। आज की सत्ता पर यह बात बिल्कुल सटीक बैठती है। राष्ट्रवाद का जो चोगा इस सरकार ने ओढ़ रखा है, उसकी सिलाई अब उधड़ने लगी है। नागरिकता के नाम पर गरीबों को ट्रिब्यूनल की अंतहीन लाइनों में खड़ा कर देना और खुद बड़े-बड़े मंचों से राष्ट्रभक्ति के सर्टिफिकेट बांटना, अब जनता के सामने बेनकाब हो चुका है।
यह लेख आज के हुक्मरानों को यह याद दिलाने के लिए है कि इतिहास सिर्फ दर्ज नहीं होता, इतिहास हिसाब भी रखता है। जब आने वाली पीढ़ियां इस दौर का मूल्यांकन करेंगी, तो वो इस बात पर थूकेगी कि जब देश को अस्पतालों, स्कूलों और नौकरियों की जरूरत थी, तब देश की सत्ता मजहब की दीवारें और नफरत की नई लकीरें खींचने में मशगूल थी। राजा भले ही खुद को अजेय समझे, लेकिन लोकतंत्र की जनता कभी न कभी यह चिल्लाकर जरूर कहेगी कि—"राजा नंगा है।"
"सच्चा राष्ट्रवाद सीमाओं पर तैनात फौजी के सम्मान और देश के आखिरी गरीब के पेट की भूख से तय होता है, न कि सत्ता की भूख मिटाने के लिए टीवी चैनलों पर परोसी जाने वाली नफरत की खुराक से।"
वीडियो देखें
https://youtu.be/O9wDbpEtyK4?si=qIhxnQSFl-8SwAus







