वादों की फाइलें और अतिरिक्त प्रभार का 'खेल', अनियमित कर्मचारियों के जख्मों पर प्रशासनिक नमक!
छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के ढाई साल बाद भी दैनिक वेतन भोगी और अनियमित कर्मचारियों की तकदीर नहीं बदल सकी है। नियमितीकरण का लुभावना वादा कर सत्ता के शिखर तक पहुंचने वाली सरकार अब अपने ही वादों से पैर खींचती नजर आ रही है। आलम यह है कि नियमितीकरण तो दूर, अब कर्मचारियों को दी जाने वाली महज चार हजार रुपये की सम्मान राशि पर भी संशय के बादल मंडराने लगे हैं। इसी बीच सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) द्वारा जारी एक ताजा प्रशासनिक आदेश ने प्रदेश के लाखों कर्मचारियों के आक्रोश की आग में घी डालने का काम किया है। कर्मचारी संगठन इसे सरकार का 'तुगलकी फरमान' और मांगों को ठंडे बस्ते में डालने की सुनियोजित प्रशासनिक चाल बता रहे हैं।
8 जून का वह आदेश, जिसने बढ़ाई बेचैनी
नया रायपुर स्थित मंत्रालय से 8 जून 2026 को अवर सचिव मनराखन बुरारे के हस्ताक्षर से जारी एक आदेश ने नौकरशाही की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस आदेश के तहत दो वरिष्ठ अधिकारियों को महत्वपूर्ण विभागों का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है:
1. हेमंत कुमार पांडे (अवर सचिव): इन्हें सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के साथ-साथ 'जन निवारण विभाग' का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है।
2. विमल कुमार सांडिले (अपर सचिव): इन्हें योजना आर्थिक सांख्यिकी के साथ 'धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग' की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई है।
दिखने में यह एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया लग सकती है, लेकिन इसके पीछे छिपी क्रोनोलॉजी को लेकर कर्मचारियों में भारी नाराजगी है।
अतिरिक्त प्रभार के भरोसे 'जन शिकायत निवारण', कैसे सुधरेगी व्यवस्था?
कर्मचारी संगठनों का सीधा आरोप है कि जब धरातल पर नियमितीकरण, सम्मान निधि और जन शिकायतों को लेकर लाखों कर्मचारी और आम जनता दफ्तरों के चक्कर काट रही है, तब सरकार नीतिगत फैसले लेने के लिए 'फुल-टाइम' (पूर्णकालिक) अफसरों की नियुक्ति क्यों नहीं कर रही?
जिस जन शिकायत निवारण विभाग के पास प्रदेशभर की शिकायतें पहुंचती हैं, उसे ही अतिरिक्त प्रभार के भरोसे छोड़ दिया गया है। जब मूल जिम्मेदारी के साथ अधिकारी अन्य विभागों का बोझ संभालेंगे, तो जनता और कर्मचारियों की फाइलों का निपटारा किस रफ्तार से होगा, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। इसे कर्मचारी 'तारीख पर तारीख' और 'टेबल-टू-टेबल' फाइलें उलझाने की नीति मान रहे हैं।
चार हजार की सम्मान राशि पर भी आनाकानी!
कड़वा सच यह भी है कि आसमान छूती महंगाई के इस दौर में बेहद कम मानदेय पर काम कर रहे अनियमित कर्मचारियों को जो न्यूनतम सम्मान राशि मिलनी चाहिए, उसे लेकर भी प्रशासनिक स्तर पर आनाकानी की खबरें आ रही हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि सरकार इसे सीमित करने या कमेटियों के मकड़जाल में दफन करने की तैयारी में है। प्रशासनिक आदेशों की इस प्रतिलिपि में हर बड़े विभाग का जिक्र है, लेकिन उस आम कर्मचारी की चिंताओं का कोई स्थान नहीं है जो चिलचिलाती धूप में सरकार की योजनाओं को जमीनी स्तर पर लागू करता है।
चुनावी वादे बनाम ढाई साल की जमीनी हकीकत
यह वही छत्तीसगढ़ है जहां चुनाव से ठीक पहले भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष अरुण साव ने खुद कर्मचारी संगठनों के आंदोलन स्थल पर पहुंचकर मंच से वादा किया था कि सरकार बनते ही उन्हें नियमित किया जाएगा। मगर आज ढाई साल बीत जाने के बाद भी सरकार के पास नियमितीकरण का कोई ठोस रोडमैप दिखाई नहीं देता। कमेटियों की रिपोर्ट और प्रशासनिक उलझनों के बीच लाखों दैनिक वेतन भोगी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
कर्मचारियों की दोटूक: 'हक मांग रहे हैं, भीख नहीं'
प्रदेश के अनियमित कर्मचारी संगठनों का कहना है कि वे सरकार से अपना जायज हक मांग रहे हैं, कोई खैरात नहीं। यदि सरकार की यही नीति रही और फाइलों को इसी तरह लटकाया जाता रहा, तो आने वाले समय में इसका बड़ा राजनीतिक खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। प्रशासनिक ढांचा इस वक्त अतिरिक्त प्रभार के सहारे रेंग रहा है, जिससे न केवल शासन की कार्यप्रणाली प्रभावित हो रही है, बल्कि मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री की मंशा पर भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या वाकई सरकार का खजाना खाली है या फिर नियत में खोट है?






