सोमवार, 14 सितंबर 2026

सत्ता की देहरी पर संघर्ष: 'मोदी की गारंटी' और वादों के चक्रव्यूह में उलझा छत्तीसगढ़

 सत्ता की देहरी पर संघर्ष: 'मोदी की गारंटी' और वादों के चक्रव्यूह में उलझा छत्तीसगढ़


विशेष रिपोर्ट | राजनीतिक एवं प्रशासनिक विश्लेषण

छत्तीसगढ़ की शांत फिज़ाओं में एक बार फिर प्रशासनिक असंतोष की बड़ी सुगबुगाहट तेज हो गई है। एक ओर जहां सरकार 'मोदी की गारंटी' के तहत अपने चुनावी संकल्पों को पूरा करने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर प्रदेश के लाखों अनियमित, संविदा, दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी और पेंशनर्स अब आर-पार के मूड में आ चुके हैं।

इंद्रावती भवन (नया रायपुर) के समक्ष कर्मचारियों द्वारा 11 सितंबर 2026 को भोजन अवकाश के दौरान किया गया सांकेतिक प्रदर्शन [00:49] केवल एक दिन का विरोध नहीं था, बल्कि यह उस आगामी राजनीतिक तूफ़ान का संकेत है, जो आने वाले समय में विष्णुदेव साय सरकार के प्रशासनिक ढांचे और राजनीतिक स्थिरता की परीक्षा ले सकता है।

चुनावी वादे बनाम ज़मीनी हकीकत: गले की फांस बनती 'गारंटी'?

राजनीति की गतिशीलता भी विचित्र होती है। विधानसभा चुनावों के दौरान जब तत्कालीन सरकार के खिलाफ असंतोष पनप रहा था, तब भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेताओं ने कर्मचारियों के पंडालों में जाकर उन्हें भरोसा दिलाया था कि सत्ता में आते ही उनकी समस्याओं का स्थाई समाधान किया जाएगा [02:10]। संकल्प पत्र में शामिल 'मोदी की गारंटी' के तहत अनियमित कर्मचारियों के नियमितीकरण, छंटनी रोकने और आउटसोर्सिंग व्यवस्था पर अंकुश लगाने का वादा किया गया था [05:03]।

लेकिन आज, सरकार के कार्यकाल को ढाई साल बीत जाने के बाद भी, जब नीतियां धरातल पर उतरती नहीं दिख रही हैं, तो यही वादे सरकार के लिए प्रशासनिक और राजनीतिक दबाव का मुख्य कारण बनते जा रहे हैं [06:15]।

कर्मचारियों की मुख्य 5-सूत्रीय मांगें

छत्तीसगढ़ प्रगतिशील अनियमित कर्मचारी फेडरेशन और सहयोगी संगठनों के प्रमुख नेतृत्व (जैसे गोपाल प्रसाद साहू एवं करण सिंह अटेरिया) के आह्वान पर उठाई गई प्रमुख मांगें केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि कर्मचारियों की जीविका से सीधे जुड़ी हैं [05:43]:

1. नियमितीकरण एवं बहाली: संविदा/अनियमित कर्मचारियों का संपूर्ण नियमितीकरण, छंटनी पर तुरंत प्रतिबंध और पूर्व में निकाले गए कर्मचारियों की ससम्मान बहाली [06:33]।

2. आउटसोर्सिंग और ठेका प्रथा पर रोक: विभिन्न सरकारी विभागों, विशेषकर स्वास्थ्य और नगरीय निकायों में जारी आउटसोर्सिंग व ठेका व्यवस्था को समाप्त कर सीधी भर्ती प्रक्रिया को प्राथमिकता [06:52]।

3. लंबित डीए (DA) एरियर्स का भुगतान: केंद्र के समान जनवरी 2026 से लंबित महंगाई भत्ता तथा 86 महीनों के लंबित एरियर्स का तुरंत निपटारा [06:06]।

4. पुरानी पेंशन (OPS) कैशलेस स्वास्थ्य सुविधा: नगरीय निकायों व अन्य विभागों में ओल्ड पेंशन स्कीम लागू करना तथा कर्मचारियों व पेंशनर्स के लिए ₹5 लाख तक की कैशलेस इलाज सुविधा सुनिश्चित करना [07:01]।

5. न्यूनतम वेतन पूर्णकालीन दर्जा: न्यूनतम वेतन पाने वाले एवं अंशकालिक कर्मचारियों को पूर्णकालीन कर्मचारी का दर्जा देना [06:44]।

बहुकोणीय असंतोष: शिक्षा से लेकर कृषि तक फैलाव

यह प्रशासनिक गतिरोध केवल अनियमित कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। राज्य के भीतर सामाजिक और शैक्षणिक असंतोष के कई अन्य मोर्चे भी खुले हुए हैं [08:40]:

 शिक्षा क्षेत्र में तनातनी: बीएड/डीएड अभ्यर्थियों का लंबे समय से चला आ रहा आंदोलन [08:44], नेट-पीएचडी धारकों की भर्ती प्रक्रिया में तेजी लाने की मांग, और अतिथि शिक्षकों व स्कूली बच्चों के प्रदर्शन राज्य के शिक्षा बजट और मानव संसाधन प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

 बजट का गणित: राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा पर खर्च के मामले में छत्तीसगढ़ का 16वें-17वें स्थान पर आना [09:40] यह दर्शाता है कि इंफ्रास्ट्रक्चर और स्थायी भर्तियों के बीच प्राथमिकताओं को संतुलित करने की तत्काल आवश्यकता है।

 प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं पर सवाल:

 धान खरीदी: ₹3100 प्रति क्विंटल धान खरीदी का वादा तो पूरा हुआ, लेकिन रकबा और खसरा गिरदावरी के प्रशासनिक नियमों के कारण वास्तविक किसानों को होने वाली व्यावहारिक जटिलताओं पर चर्चा गरम है [10:31]।

 महतारी वंदन योजना: योजना की शुरुआत के बाद नए विवाहित जोड़ों या पात्र महिलाओं के नाम न जुड़ पाने और पोर्टल के अपडेट न होने से सामाजिक स्तर पर नई मांगें जन्म ले रही हैं [10:40]।

निष्कर्ष: संवाद ही समाधान का रास्ता

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कर्मचारियों और जनता का विश्वास ही शासन की सबसे बड़ी ताकत होती है। महज सांकेतिक हड़ताल को सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन मानकर अनदेखा करना प्रशासनिक दृष्टिकोण से जोखिम भरा हो सकता है।

यदि साय सरकार समय रहते इन कर्मचारी संगठनों और विभिन्न वर्गों के साथ सीधे संवाद की मेज पर बैठकर कोई ठोस नीतिगत रास्ता नहीं निकालती है, तो आने वाले समय में यह असंतोष एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकता है। देखना यह होगा कि सरकार 'मोदी की गारंटी' को प्रशासनिक अमलीजामा पहनाने के लिए क्या कड़े और दूरदर्शी कदम उठाती है

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रविवार, 13 सितंबर 2026

छत्तीसगढ़ में 'पुत्रमोह' की सियासत: क्या बदलेगा दशकों पुराना इतिहास या दोहराई जाएगी कहानी?

 छत्तीसगढ़ में 'पुत्रमोह' की सियासत: क्या बदलेगा दशकों पुराना इतिहास या दोहराई जाएगी कहानी?


विशेष विश्लेषण | राजनीति

छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों एक सवाल फिज़ाओं में तैर रहा है—क्या राज्य को जल्द ही एक और 'सीएम सन' (मुख्यमंत्री का बेटा) बतौर प्रमुख नेता के रूप में स्थापित होता दिखेगा? पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के उनके जन्मदिन के अवसर पर दिए गए एक बयान ने प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है [01:41]। भूपेश बघेल ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पर तंज कसते हुए कहा था कि उनके बेटे चैतन्य बघेल ('बिट्टू') की राजनीति में आने की कोई मंशा नहीं थी, लेकिन जांच एजेंसियों और राजनीतिक घटनाक्रमों ने उन्हें नेता बनने पर मजबूर कर दिया [01:52]।

बघेल का यह बयान महज़ एक राजनीतिक तंज नहीं है, बल्कि इसे छत्तीसगढ़ की राजनीति में 'बिट्टू' की सियासी री-लॉन्चिंग के तौर पर देखा जा रहा है [02:12]। हालांकि, अगर छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास के पन्नों को पलटें, तो मुख्यमंत्रियों के बेटों या परिजनों की राजनीति में एंट्री कोई नई बात नहीं है [02:34]।

इतिहास के पन्ने: सफलता और सीमाओं का लेखा-जोखा

1. पंडित रविशंकर शुक्ल का दौर और श्यामाचरण शुक्ल की सफलता

अविभाजित मध्य प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल के पुत्र श्यामाचरण शुक्ल राजनीति में आए और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे [00:19]। उनके दूसरे पुत्र विद्याचरण शुक्ल ने भी केंद्र की राजनीति में अपनी धाक जमाई [00:32]। हालांकि, श्यामाचरण शुक्ल के पुत्र अमितेश शुक्ल विधायक और मंत्री पद तक तो पहुंचे, लेकिन उससे आगे की राह आसान नहीं रही [03:13]।

2. सारंगढ़ राजपरिवार की अनूठी राजनीतिक विरासत

सारंगढ़ के राजा नरेशचंद्र सिंह के पुत्र संग्राम सिंह चुनावी राजनीति में खास मुकाम नहीं बना पाए [03:25], लेकिन उनकी पत्नी ललिता देवी और तीन पुत्रियों ने इतिहास रचा। ललिता देवी पुसौर सीट से निर्विरोध विधायक चुनी गईं [03:49]। उनकी बेटी कमला देवी विधायक और मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री बनीं, जबकि पुष्पा देवी (रायगढ़) और रजनीगंधा (महासमुंद) ने सांसद का सफर तय किया [04:02]।

3. मोतीलाल वोरा और अजित जोगी का दौर

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे मोतीलाल वोरा के पुत्र अरुण वोरा विधायक तो बने, लेकिन मुख्यमंत्री स्तर की राजनीतिक सफलता उनसे दूर ही रही [04:37]।

छत्तीसगढ़ गठन के बाद प्रथम मुख्यमंत्री अजित जोगी के पुत्र अमित जोगी ने भारी मतों से अपनी पहली विधायकी जीती [05:00], लेकिन बाद के राजनीतिक घटनाक्रमों और उथल-पुथल के चलते उनकी राजनीतिक राह काफी चुनौतीपूर्ण हो गई [05:11]।

4. डॉ. रमन सिंह और अभिषेक सिंह

प्रदेश में 15 वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे डॉ. रमन सिंह ने भी अपने पुत्र अभिषेक सिंह को राजनीति में उतारा [05:32]। अभिषेक सिंह राजनांदगांव से सांसद चुने गए, लेकिन पनामा पेपर्स और विभिन्न विवादों के बाद वे मुख्यधारा की चुनावी राजनीति की रेस में पीछे छूट गए [05:46]।

चैतन्य बघेल 'बिट्टू': लॉन्चिंग और भावी चुनौतियाँ

पाटन से छह बार के विधायक और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पुत्र चैतन्य बघेल की राजनीति में शुरुआत से बहुत सक्रिय रुचि नहीं थी [06:13]। लेकिन ईडी, सीबीआई और अन्य जांच एजेंसियों की कार्रवाई के बीच उनका नाम सुर्खियों में आया [06:40]।

अब सवाल यह उठता है कि क्या भूपेश बघेल अपने बेटे की राजनीतिक ताजपोशी अपने पारंपरिक गढ़ पाटन से कराएंगे, या फिर दुर्ग ज़िले की किसी अन्य सीट या बालोद-गुंडायदेही जैसे सुरक्षित क्षेत्र से उन्हें मैदान में उतारेंगे [07:00]?

आगे की राह कितनी आसान?

 गुटबाज़ी और अंदरूनी समीकरण: कांग्रेस की मौजूदा राजनीति में अंदरूनी खींचतान और नए समीकरण बनते-बिगड़ते दिख रहे हैं [07:22]।

 विरोधी खेमा: भूपेश बघेल की अपनी राजनीतिक शैली के कारण एक तरफ जहाँ उनका मजबूत जनाधार है, वहीं विरोधियों की संख्या भी कम नहीं है [07:41]। ऐसे में 'बिट्टू' के लिए राह केवल टिकट हासिल करने तक सीमित नहीं होगी, बल्कि जीत दर्ज करना भी एक बड़ी परीक्षा होगी [07:50]।

निष्कर्ष: क्या टूटेगा सालों पुराना रिकॉर्ड?

छत्तीसगढ़ की राजनीति का इतिहास गवाह है कि पंडित रविशंकर शुक्ल के बाद कोई भी अन्य मुख्यमंत्री अपने बेटों को सत्ता के शीर्ष शिखर (मुख्यमंत्री पद) तक पहुँचाने में सफल नहीं हो पाया है [00:19]। अधिकांश 'सीएम सन' केवल विधायक या सांसद बनने तक ही सीमित रह गए [00:42]।

ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भूपेश बघेल का यह नया दांव छत्तीसगढ़ की राजनीति में 'पुत्रमोह' और 'विरासत' की पुरानी पटकथा को बदलेगा, या फिर चैतन्य बघेल भी इतिहास के उसी ढर्रे पर आगे बढ़ेंगे

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शनिवार, 12 सितंबर 2026

धुएँ में छत्तीसगढ़, रोशनी में उत्तराखंड: कॉरपोरेट और सियासत के बीच पिसती जल-जंगल-ज़मीन

 धुएँ में छत्तीसगढ़, रोशनी में उत्तराखंड: कॉरपोरेट और सियासत के बीच पिसती जल-जंगल-ज़मीन



 रायगढ़ के गारे पेलमा से लेकर हसदेव तक, छत्तीसगढ़ के संसाधनों पर दूसरे राज्यों और निजी घरानों का कब्ज़ा।

 उत्तराखंड सरकार का अडानी पावर के साथ 25 साल का बिजली समझौता और छत्तीसगढ़ की ज़मीन पर नए पावर प्लांट का संकट [03:06, 04:16]।

 पेसा कानून और फर्जी ग्राम सभाओं के साए में उखड़ते गाँव और भड़कता जन-आक्रोश [05:08, 05:28]।

1. कहानी का प्रवेश: एक राज्य, जो दूसरों का घर रोशन करता है और खुद धुएँ में खो जाता है

राजस्थान पावर, महाराष्ट्र पावर और अब उत्तराखंड पावर [00:12]। नाम अलग-अलग राज्यों के हैं, लेकिन इन सबके पीछे का ताना-बाना एक ही है—छत्तीसगढ़ का समृद्ध कोयला, रायगढ़ और हसदेव के जंगल, और उत्खनन का ठेका निजी कॉरपोरेट घरानों के हाथ में [00:29, 02:50]।

विकास की इस अंधी दौड़ में छत्तीसगढ़ के हिस्से सिर्फ तीन चीज़ें आ रही हैं—प्रदूषण, गंभीर बीमारियां और विस्थापन [00:54, 04:27]। स्थानीय ग्रामीण सड़कों पर हैं, जल-जंगल-ज़मीन बचाने के लिए नारे गूँज रहे हैं, लेकिन शासन-प्रशासन के कान पर जूँ तक नहीं रेंग रही [01:08, 01:18]।

2. पुष्कर सिंह धामी कैबिनेट का निर्णय और छत्तीसगढ़ का संकट

ताज़ा मामला उत्तराखंड सरकार से जुड़ा है [02:15]। उत्तराखंड को रायगढ़ के गारे पेलमा सेक्टर 4/1 का कोल ब्लॉक आवंटित किया गया [02:50, 03:42]। लेकिन असली पेच यहाँ फँसता है—उत्तराखंड के पास न तो कोयला खनन का अनुभव है और न ही वहाँ पावर प्लांट लगाने की भौगोलिक स्थितियाँ [03:56]।

परिणाम स्वरूप, उत्तराखंड सरकार ने अडानी पावर के साथ 1320 मेगावाट बिजली आपूर्ति के लिए 25 साल का लंबा करार करने का प्रस्ताव पास किया है [03:06, 03:42]। यानी ज़मीन छत्तीसगढ़ की, कोयला छत्तीसगढ़ का, राखड़ और धुआँ छत्तीसगढ़ झेलेगा, और मुनाफे का गणित कहीं और लिखा जाएगा [04:16, 04:47, 05:56]।

3. पेसा कानून की धज्जियाँ और फर्जी ग्राम सभाओं का साया

छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में पेसा (PESA) कानून लागू है, जिसके तहत किसी भी परियोजना के लिए ग्राम सभा की वैधानिक सहमति अनिवार्य है [05:08]।

लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि हसदेव से लेकर तमनार और मैदानी क्षेत्रों तक प्रशासनिक दबाव और कथित फर्जी ग्राम सभाओं के ज़रिए सहमतियाँ तैयार कर ली जाती हैं [05:28, 05:46]। ग्रामीणों के प्रतिरोध को पुलिस बल के प्रयोग और गिरफ्तारियों के दम पर दबाने की कोशिश की जाती है, जैसा कि हाल ही में तमनार और अन्य क्षेत्रों में देखा गया है

कब तक शांत रहेगा छत्तीसगढ़?

जब मुनाफे का केंद्र कॉरपोरेट घराने और बाहरी राज्य होंगे और स्थानीय नागरिकों को विस्थापन और प्रदूषण की आग में झोंक दिया जाएगा, तो असंतोष की ज्वाला भड़कना स्वाभाविक है [00:54, 07:08]। शांत छत्तीसगढ़ में जिस तेज़ी से जन-आंदोलन का दायरा बढ़ रहा है, वह केंद्र और राज्य सत्ता दोनों के लिए एक बड़ी चेतावनी है

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शुक्रवार, 11 सितंबर 2026

छत्तीसगढ़ भाजपा की पूरी सरकारकी सर्जरी के अलावा कोई चारा नहीं

 


छत्तीसगढ़ भाजपा की पूरी  सरकार की सर्जरी के अलावा कोई चारा नहीं 

छत्तीसगढ़ में सत्ता की कमान संभाले 'डबल इंजन' सरकार के भीतर इन दिनों जो कुछ चल रहा है, उसे केवल रूटीन संगठनात्मक गतिविधि मान लेना जल्दबाज़ी होगी [00:00]। हाल ही में राजधानी रायपुर में भाजपा के क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जामवाल और प्रदेश संगठन महामंत्री पवन साय की मौजूदगी में दो दिनों तक चला मंथन शिविर अब प्रदेश की राजनीति का सबसे बड़ा चर्चा का विषय बन चुका है [00:09]।

दो दिनों की इस मैराथन बैठक में जिस तरह से संगठन पदाधिकारियों और ज़िला अध्यक्षों ने अपनी ही सरकार के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड सामने रखा, उसने सत्ता के गलियारों में हड़कंप मचा दिया है [00:23]।

बंद कमरों का असंतोष: ज़िला अध्यक्षों का 'रिपोर्ट कार्ड'

बैठक में 36 ज़िलों से आए ज़िला अध्यक्षों ने अपनी व्यथा खुलकर सामने रखी [03:01]। जो बातें छनकर बाहर आईं, वे बताती हैं कि सत्ता और संगठन के बीच की दूरी किस कदर बढ़ चुकी है [01:45]।

1. बिजली बिल और टैक्स का बोझ: ज़िला अध्यक्षों का साफ कहना था कि बिजली बिलों में वृद्धि और स्थानीय निकायों/पंचायतों में नए करों की वसूली के कारण वे जनता के बीच जाने से कतरा रहे हैं [02:04]।

2. प्रशासनिक उपेक्षा: पदाधिकारियों का आरोप है कि मंत्री और उच्च अधिकारी उनकी सुनते तक नहीं हैं [03:32]। कई मंत्रियों पर कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के फोन तक न उठाने के आरोप लगे [03:42]।

3. सड़कों और बुनियादी ढांचों की बदहाली: सरगुजा प्रवास के दौरान खुद संगठन महामंत्री पवन साय की गाड़ी गड्ढों में फंसने की घटना ने ज़मीनी स्थिति की पोल खोल दी, जिसके बाद स्थानीय मंत्रियों को सार्वजनिक रूप से सफाई देनी पड़ी [03:51]।

4. युवा और बेरोज़गारी: बैठक में यह बात भी उठी कि स्कूलों की स्थिति और नौकरियों के अभाव को लेकर स्थानीय स्तर पर तीखा जनाक्रोश है [02:52]।

मंत्रियों की 'क्लास' और गुटबाज़ी पर शिकंजा

बताया जाता है कि बैठक के पहले दिन कई मंत्रियों की अनुपस्थिति पर संगठन ने सख्त रुख अपनाया, जिसके बाद दूसरे दिन मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और वित्त मंत्री ओपी चौधरी की मौजूदगी में मंत्रियों की जमकर 'क्लास' ली गई [01:15], [03:01]।

संगठन के कड़े रुख के बाद अब इस बात के कयास तेज़ी से लगाए जा रहे हैं कि क्या गुजरात मॉडल की तर्ज पर छत्तीसगढ़ में भी मंत्रिमंडल में कोई बड़ा फेरबदल देखने को मिलेगा या पूरी टीम की सर्जरी होगी [05:28]।

विपक्ष के तीखे हमले: 'गड्ढे में सत्ता और संगठन'

सत्ताधारी दल के भीतर छिड़े इस मंथन पर विपक्ष ने भी हमला बोलने में देरी नहीं की। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने तंज कसते हुए कहा कि सत्ता और संगठन में कोई तालमेल नहीं है और सरकार पूरी तरह पटरी से उतर चुकी है [01:45]।

वहीं, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने 2023-24 की पुलिस आरक्षक भर्ती परीक्षा का मुद्दा उठाते हुए आरोप लगाया कि 1600 पदों पर भर्ती रोक दी गई है और कई अभ्यर्थियों का चयन 7-8 ज़िलों में एक साथ होने की गड़बड़ी सामने आई है [07:50], [08:24]। इस मुद्दे को लेकर अभ्यर्थी गृह मंत्री के कवर्धा स्थित कार्यालय के बाहर धरने पर बैठे हैं [09:10]।

आगे की राह: क्या होगा आलाकमान का फैसला?

संगठन के इस दो दिवसीय मंथन की विस्तृत रिपोर्ट अब केंद्रीय नेतृत्व—प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और प्रदेश प्रभारी नितिन नवीन—को सौंपी जानी है [05:09]।

छत्तीसगढ़ में सत्ता-संगठन के बीच तालमेल बिठाने और जन-असंतोष को दूर करने के लिए आलाकमान क्या कदम उठाता है, यह देखने वाली बात होगी [07:22]। क्या यह मंथन केवल एक चेतावनी बनकर रह जाएगा या प्रदेश में बड़े राजनीतिक बदलाव की शुरुआत साबित होगा?

विडियो देखें 

https://youtu.be/qxolf1FkVZU?si=zGkMY3-32b4WEdVO

गुरुवार, 10 सितंबर 2026

जब किताबों की जगह तख्तियाँ उठाने को मजबूर हुई ‘जेन अल्फा’

  जब किताबों की जगह तख्तियाँ उठाने को मजबूर हुई ‘जेन अल्फा’



डिजिटल दौर का नया चेहरा और सड़कों पर उतरता बचपन

जिस ‘जेन-अल्फा’ (Gen Alpha)—अर्थात 2010 के बाद जन्मी उस पीढ़ी—को दुनिया आमतौर पर स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में खोया हुआ मानती है, वही पीढ़ी आज छत्तीसगढ़ के बस्तर से लेकर सरगुजा तक अपने बुनियादी अधिकारों के लिए सड़कों पर संघर्ष कर रही है [00:08]।

तेज धूप हो या मूसलाधार बारिश, कोरबा से कांकेर और मरवाही से सरगुजा तक—सरकारी और एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूलों के हजारों नौनिहाल आज किताबों की जगह हाथों में शिकायत की तख्तियाँ लेकर राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर चक्काजाम करने को विवश हैं [00:31]।

इन बच्चों के सवाल बेहद सादे लेकिन पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने वाले हैं:

 हमें हॉस्टलों में कीड़े लगा और घटिया खाना क्यों दिया जाता है?” [00:57]

 पीने के लिए दूषित पानी क्यों मिलता है?” [01:08]

 आवाज उठाने पर हमारे परिजनों को क्यों धमकाया जाता है?” [01:17]

 सड़कें जर्जर क्यों हैं और घटिया साइकिलों के नाम पर यह कैसा खेल चल रहा है?” [01:30]

इनमें से अधिकांश छात्र आदिवासी, दलित और पिछड़े वर्गों से आते हैं [01:39]। जिस वर्ग के कल्याण और सामाजिक उत्थान के नाम पर राज्य और केंद्र सरकारें हर साल अरबों-खरबों रुपये के बजटीय आवंटन का दावा करती हैं [02:02], उसी वर्ग के बच्चों को न्यूनतम रोटी, कपड़ा और स्वच्छ पानी के लिए अपना भविष्य दांव पर लगाना पड़ रहा है।

आंकड़ों की जुबानी: प्रशासनिक संवेदनहीनता का रिपोर्ट कार्ड

यदि जुलाई में नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत से लेकर अब तक की स्थिति पर नजर डालें, तो राज्य के विभिन्न हिस्सों में स्कूली बच्चे 39 से अधिक बार अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर चुके हैं [02:24]।

उदाहरणात्मक रूप से, कोरबा जिले के छुरी स्थित एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूल के 300 छात्र अगस्त माह के दौरान तीन-तीन बार प्रशासनिक उपेक्षा से तंग आकर सड़कों पर बैठे [02:47]।

जब भी बच्चे चक्काजाम करते हैं, तो अमूमन यह घटनाक्रम देखने को मिलता है:

1. आश्वासन का दोहराव: ट्राइबल वेलफेयर विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, पुलिस बल और स्थानीय प्रशासनिक अमला मौके पर पहुँचता है [03:08]।

2. कागजी दिलासा: बच्चों को जल्द कार्रवाई और सुधार का आश्वासन देकर धरना समाप्त कराया जाता है [03:18]।

3. वही ढाक के तीन पात: हफ्ते-दो हफ्ते बीतने के बाद स्थिति पुनः वैसी ही हो जाती है, और सुधार के नाम पर केवल नोटिसबाजी सिमट कर रह जाती है [03:45]।

प्रशासनिक अधिकारी यह जवाब देने में असमर्थ नजर आते हैं कि यदि यही स्थितियां किसी उच्च प्रशासनिक अधिकारी या जनप्रतिनिधि के बच्चों के हॉस्टल में होतीं, तो क्या सुधार की गति यही रहती? [04:14]

नीतिगत विरोधाभास: बजट का भारी आवंटन, मगर धरातल शून्य

छत्तीसगढ़ का यह समकालीन परिदृश्य राजनीति और सामाजिक न्याय के दावों के बीच एक बड़े विरोधाभास को रेखांकित करता है [04:32]। आदिवासी बहुल राज्य में शीर्ष प्रशासनिक और विभागीय दायित्वों पर इस वर्ग के प्रतिनिधियों की मौजूदगी के बावजूद [04:43], धरातल पर क्रियान्वयन की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है।

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर गड़बड़ी कहाँ है?

 ठेकेदारी सप्लाई तंत्र: क्या हॉस्टलों में घटिया राशन, जर्जर भवन और घटिया गुणवत्ता की सामग्री की आपूर्ति केवल निचले स्तर के ठेकेदारों की मिलीभगत है, या यह तंत्र ऊपर तक फैला हुआ है? [05:16]

 जिला प्रशासन की निगरानी: जिले के प्रशासनिक प्रमुख (कलेक्टर) और विभागीय उप-आयुक्तों की नियमित निरीक्षण प्रणाली कहाँ सुप्त पड़ी है? [05:37]

 संसाधनों का विचलन: शिक्षकों की भारी कमी के बावजूद सैकड़ों शिक्षकों को शैक्षणिक कार्यों के बजाय कलेक्टोरेट और अन्य प्रशासनिक दफ्तरों में संलग्न (अटैच) करके रखा गया है [07:21]।

युक्तीकरण (Rationalization) और व्यवस्था सुधार के नाम पर दर्जनों प्राथमिक व माध्यमिक शालाओं के समायोजन या बंद होने से ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी शिक्षा की पहुँच और कठिन हो गई है [07:46]।

भविष्य की चुनौती: जन-आक्रोश का नया केंद्र

हॉस्टलों और स्कूलों की यह अव्यवस्था केवल कमरों की दीवारों तक सीमित नहीं है। खराब सड़कों के कारण होने वाली दुर्घटनाएं, समय पर गणवेश व पाठ्यपुस्तकों का न मिलना और शिकायत करने पर मिलने वाली धमकियाँ अब इन छात्रों के बीच गहरे असंतोष का रूप ले रही हैं [06:46]।

यह स्थिति केवल प्रशासनिक ढिलाई नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन के प्रति आम जन और नई पीढ़ी के घटते विश्वास का संकेत है [06:00]। यदि समय रहते इन नौनिहालों की बुनियादी आवश्यकताओं, शैक्षणिक माहौल और हॉस्टलों के भोजन-पानी की गुणवत्ता में ठोस व स्थायी सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में यह शांतिपूर्ण विरोध एक व्यापक सामाजिक आंदोलन का रूप ले सकता है [08:03]।

छत्तीसगढ़ के नीति-निर्धारकों के सामने आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है: क्या राज्य का विकास केवल आंकड़ों की बाजीगरी में दिखाई देगा या उन दूरस्थ अंचलों के हॉस्टलों में भी पहुँचेगा जहाँ का बचपन आज सड़क पर न्याय मांग रहा है?

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