गुरुवार, 5 नवंबर 2026

छत्तीसगढ़ के इन इलाकों में सुलग रही है बगावत की आग!

 

  • छत्तीसगढ़ बीजेपी में बड़ा भूचाल! 
  • संगठन में सब कुछ ठीक नहीं? छत्तीसगढ़ के इन इलाकों में सुलग रही है बगावत की आग!


छत्तीसगढ़ की सियासत में इन दिनों कुछ बहुत बड़ा पक रहा है! एक तरफ सरकार अपनी योजनाओं और दावों की पीठ थपथपा रही है, तो दूसरी तरफ सत्ताधारी दल यानी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के अंदर से ही बगावत के सुर अब दबी जुबान में नहीं, बल्कि खुलेआम सड़कों और सोशल मीडिया पर सुनाई देने लगे हैं।

साथियों, सवाल ये उठ रहा है कि क्या छत्तीसगढ़ बीजेपी में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है? क्या जिन कार्यकर्ताओं ने खून-पसीना बहाकर सरकार बनाई थी, आज वही खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं? और सबसे बड़ा सवाल—क्या रवि भगत जैसे युवा और फायरब्रांड नेता का पार्टी से किनारा कर लेना किसी बड़े भूचाल की आहट है?

आज के इस रिपोर्ट में हम चीर-फाड़ करेंगे छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जिलों की जमीनी हकीकत की—चाहे बात डोंगरगढ़ की हो, मोहला-मानपुर की हो, सारंगढ़ की हो या फिर लैलूंगा से लेकर रायपुर तक सुलग रही असंतोष की आग की। वीडियो बहुत दिलचस्प और महत्वपूर्ण होने वाला है, अंत तक बने रहिएगा।"

रवि भगत का इस्तीफा और संगठन की कार्यशैली पर सवाल

"शुरुआत करते हैं छत्तीसगढ़ बीजेपी के उस झटके से, जिसने राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया है। हम बात कर रहे हैं भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और कद्दावर नेता रवि भगत की।

रवि भगत ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपना इस्तीफा मंडल अध्यक्ष को भेजा, जो अब सोशल मीडिया पर आग की तरह वायरल हुआ है। हालांकि इस्तीफे में उन्होंने 'निजी कारणों' का हवाला दिया है, लेकिन राजनीतिक पंडित अच्छी तरह समझते हैं कि इसके पीछे की असल कहानी क्या है।

याद कीजिए, पिछले साल जुलाई 2025 में पार्टी संगठन ने रवि भगत को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। उनकी गलती क्या थी? उनकी गलती ये थी कि उन्होंने अपनी ही सरकार के सामने जनता और गांवों के विकास के लिए 'DMF फंड' (जिला खनिज न्यास) के इस्तेमाल को लेकर खुलकर सवाल खड़े किए थे। उन्होंने कहा था कि गांवों की सड़क और पानी जैसी बुनियादी समस्याओं के लिए इस फंड का सही जगह इस्तेमाल होना चाहिए। लेकिन जनहित की बात उठाने पर एक तेज-तर्रार युवा नेता को अनुशासन का पाठ पढ़ा दिया गया, नोटिस थमा दिया गया।

और नतीजा क्या निकला? आखिरकार एक जमीनी नेता को घुटन महसूस हुई और उसने पार्टी से नाता तोड़ लिया। राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा आम है कि रवि भगत का जाना सिर्फ एक बानगी है, आने वाले दिनों में कई और बड़े और नाराज नेता भी इस फेहरिस्त में शामिल हो सकते हैं।"

सारंगढ़ से लेकर डोंगरगढ़ और मोहला-मानपुर तक सुलगता असंतोष 

, मामला सिर्फ रवि भगत तक सीमित नहीं है। छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से ऐसी तस्वीरें सामने आ रही हैं जो बीजेपी के लिए खतरे की घंटी हैं।

अभी हाल ही में सारंगढ़ जिला भाजपा की बैठक का एक वाकया देखिए। बैठक में कार्यकर्ताओं का गुस्सा इस कदर फूटा कि जिला अध्यक्ष ज्योति पटेल और जिला प्रभारी शंकरलाल अग्रवाल की कार्यशैली पर खुलेआम सवाल खड़े किए गए। हालात तब और बिगड़ गए जब सारंगढ़ नगर मंडल अध्यक्ष जयप्रकाश बानी को पद से हटा दिया गया। इसके बाद कार्यकर्ताओं का सब्र टूट गया, बैठक के बाद जमकर नारेबाजी हुई और मांग उठी कि प्रभारी मंत्री और संगठन के प्रभारियों को तुरंत बदला जाए! सोचिए, एक पार्टी बैठक जहां रणनीति बननी चाहिए थी, वहां विरोध प्रदर्शन और नारेबाजी हो रही है।

यही हाल डोंगरगढ़ क्षेत्र और मोहला-मानपुर क्षेत्र का भी है। इन इलाकों से लगातार खबरें आ रही हैं कि स्थानीय कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के बीच एक भारी दूरी बनती जा रही है। कार्यकर्ताओं का दर्द यह है कि सरकार बनने के बाद उनकी पूछपरख बंद हो गई है। जिन लोगों ने विपक्ष में रहकर लाठियां खाईं, संघर्ष किया, आज सत्ता आने के बाद वे खुद को हाशिए पर पा रहे हैं। संगठन के बड़े फैसले ऊपर से थोपे जा रहे हैं, और जमीनी कार्यकर्ताओं की राय को पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है।"

छत्तीसगढ़ सरकार की नीतियां और नौकरशाही का दखल 

"आखिर इस बगावत की जड़ में क्या है? क्यों छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जिलों में पार्टी के भीतर ही घमासान मचा हुआ है?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इसके पीछे सरकार की कार्यशैली और नौकरशाही (ब्यूरोक्रैसी) का बढ़ता दखल है। कार्यकर्ताओं का सीधा आरोप है कि सरकार चलाने वाले नेता अब आम जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं से कटते जा रहे हैं। फाइलें अफसरों के दफ्तरों में घूमती हैं, और जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों या पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं की सुनवाई नहीं होती।

जब रवि भगत जैसे नेता ने डीएमएफ (DMF) फंड जैसे मुद्दों पर जनता की आवाज उठाई, तो उन्हें दबाने की कोशिश की गई। यह संदेश कार्यकर्ताओं में बहुत गलत गया। कार्यकर्ताओं के मन में यह सवाल उठ रहा है कि अगर पार्टी के भीतर ही सच बोलने पर पाबंदी लग जाएगी, जनता की बुनियादी बात रखने पर नोटिस थमा दिए जाएंगे, तो फिर आम आदमी की सुनवाई कहां होगी?"

लब्बोलुआब यह है कि छत्तीसगढ़ बीजेपी के अंदर सब कुछ अंदरखाने खौल रहा है। सारंगढ़ की खींचतान, डोंगरगढ़ और मोहला-मानपुर का असंतोष, और रवि भगत का पार्टी छोड़ना—ये महज छिटपुट घटनाएं नहीं हैं, बल्कि यह एक गहरी नाराजगी का संकेत हैं। यदि समय रहते शीर्ष नेतृत्व ने इस आंतरिक असंतोष को नहीं संभाला, कार्यकर्ताओं को सम्मान नहीं दिया और तानाशाही रवैये को खत्म नहीं किया, तो आने वाले समय में यह चिंगारी बड़ा रूप ले सकती है। चर्चा यह भी है कि कई अन्य असंतुष्ट नेता भी सही वक्त का इंतजार कर रहे हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल आपसे है—आपको क्या लगता है? क्या छत्तीसगढ़ में बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं की यह नाराज़गी आने वाले दिनों में पार्टी के लिए बहुत भारी पड़ने वाली है? क्या रवि भगत के बाद कुछ और बड़े चेहरे भी पार्टी छोड़ सकते हैं?

नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर बताइएगा।

उद्यानिकी विभाग का यह कच्चा चिट्ठा

 उद्यानिकी विभाग का यह कच्चा चिट्ठा 


छत्तीसगढ़ में किसानों को उन्नत खेती से जोड़ने और उनकी आय बढ़ाने के लिए चलाई जाने वाली योजनाएं अक्सर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं। ताजा मामला उद्यानिकी विभाग से जुड़ा है, जहाँ मसाला विस्तार योजना के तहत हल्दी और अदरक के बीज वितरण में लगभग 10 करोड़ रुपये की भारी-भरकम गड़बड़ी के आरोप सामने आए हैं। इस खुलासे के बाद से ही कृषि और उद्यानिकी महकमे में हड़कंप मच गया है। सवाल यह है कि आखिरकिसानों के नाम पर चल रही इन योजनाओं में मुनाफाखोरी और मनमानी का खेल कैसे चल रहा है? आइए, इस पूरी पड़ताल पर विस्तार से नजर डालते हैं।

25 करोड़ की योजना और 10 करोड़ की कथित गड़बड़ी - 

  • योजना का दायरा: छत्तीसगढ़ में मसाला विस्तार योजना के तहत कुल लगभग 25 करोड़ रुपये की लागत से 2,076 हेक्टेयर क्षेत्र में हल्दी और अदरक की खेती कराने का लक्ष्य रखा गया था।
  • वितरण व्यवस्था: इस योजना के तहत किसानों को बीज उपलब्ध कराने के लिए कुल 10 एजेंसियों को जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
  • अनियमितता के आरोप: सामने आई शिकायतों के मुताबिक, कायदे से अलग-अलग जिलों के लिए अलग एजेंसियां होनी थीं, लेकिन बीरगांव की मात्र एक ही एजेंसी ने रायपुर से लेकर कोंडागांव, बीजापुर और जगदलपुर समेत कई जिलों में बीज की धड़ल्ले से आपूर्ति कर दी। इस एक ही एजेंसी को कई जिलों का ठेका मिलने और सप्लाई करने से बीज की गुणवत्ता, उसकी कीमत और संपूर्ण वितरण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

विभाग की कार्यप्रणाली और सप्लाई को लेकर विवाद 

  • किसानों को लूटने का खेल: उद्यानिकी और कृषि विभाग में इससे पहले भी कई तरह के घपले-घोटाले सामने आते रहे हैं। जानकारों और स्थानीय सूत्रों का कहना है कि किसानों को मिलने वाली सब्सिडी और बीजों के वितरण में हमेशा से बिचौलियों और चुनिंदा ठेकेदारों को फायदा पहुँचाने का खेल चलता रहा है।
  • ठेके में देने के आरोप: विभाग के कामकाज और सप्लाई के मामलों को लेकर लगातार यह विवाद गहराता जा रहा है कि क्या मंत्री स्तर पर पूरे विभाग को चुनिंदा हाथों या ठेके पर दे दिया गया है? यही कारण है कि एक ही एजेंसी को नियमों को ताक पर रखकर इतने बड़े पैमाने पर सप्लाई का जिम्मा मिल गया।

जांच के दायरे और आगे की कार्रवाई 

  • कृषि मंत्री के निर्देश: मामले के तूल पकड़ने और गंभीर शिकायतें सामने आने के बाद कृषि मंत्री रामविचार नेताम के सख्त निर्देशों पर अब इस पूरे मामले की आधिकारिक जांच शुरू कर दी गई है।
  • उद्यानिकी संचालनालय की टीम: इस खुलासे के तुरंत बाद उद्यानिकी संचालनालय ने एक विशेष जांच टीम का गठन किया है।
  • जांच के मुख्य बिंदु:
    • यह पता लगाया जाएगा कि वास्तव में मैदान में किसानों को कितने बीज वितरित किए गए।
    • सप्लाई किए गए बीजों की गुणवत्ता तय मानकों के अनुरूप थी या नहीं।
    • सब्सिडी की वास्तविक राशि किन-किन हितग्राहियों के खातों या तक पहुँची है।
    • इसके लिए जिलों से हितग्राहियों कीवार जानकारी और उससे जुड़े तमाम मूल दस्तावेज तलब किए गए हैं।

साफ है कि मसाला विस्तार योजना के नाम पर हुआ यह खेल सिर्फ एक बानगी है कि कैसे कागजों पर योजनाएं बड़ी दिखती हैं, लेकिन जमीन पर व्यवस्था किस तरह चरमरा जाती है। अब सबकी निगाहें उद्यानिकी संचालनालय की जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं कि क्या इस मामले में संलिप्त बड़े अधिकारियों और एजेंसियों पर कोई ठोस कार्रवाई होती है या यह जांच भी फाइलों में ही दबी रह जाती है।

बुधवार, 4 नवंबर 2026

पेंड्रावन बांध पर क्यों मंडरा रहा है फिर से खतरा?

 पेंड्रावन बांध पर क्यों मंडरा रहा है फिर से खतरा?



रायपुर ज़िले से लगा हुआ ब्रिटिश ज़माने का पेंड्रावन जलाशय कोई आम तालाब नहीं है। यह इलाक़े के 20 से ज़्यादा गांवों के हज़ारों किसानों और ग्रामीणों की 'जीवनदायिनी' है। इसी पानी से खेती होती है, मछली पालन होता है, और पूरे क्षेत्र का भूजल स्तर (Groundwater level) रिचार्ज होता है।

लेकिन इस सरकार की नज़र इस पर क्यों गड़ी हुई है? क्योंकि इस बांध के कैचमेंट एरिया (जलग्रहण क्षेत्र) में कीमती खनिज छिपे हैं!

और सरकार ने क्या किया? हाईकोर्ट के एक पुराने आदेश की आड़ लेकर, जल संसाधन विभाग ने चुपचाप तरीके से खनन कंपनी को वहां सर्वे और एक्सप्लोरेशन (अन्वेषण) की अनुमति दे दी!

(थोड़े तीखे तेवर में) ज़रा याद कीजिए, साल 2017 में भी यही हरकत की गई थी। तब 'नवभारत' अखबार ने इस खुलासे को छापा था, और जनता के भारी विरोध के बाद सरकार को घुटने टेकने पड़े थे। विधानसभा के बजट सत्र में तत्कालीन मंत्री को खुद खड़े होकर वह एनओसी (NOC) रद्द करनी पड़ी थी। आईआईटी रुड़की और डैम सेफ्टी बोर्ड ने साफ कहा था कि अगर यहां माइनिंग हुई, तो पेंड्रावन बांध का अस्तित्व ही नक्शे से मिट जाएगा!

लेकिन जब नीयत में ही खोट हो, तो सरकारें बाज कहां आती हैं? मौका मिलते ही फिर से गुपचुप तरीके से रास्ता निकाल लिया गया। अब वहां के 20 गांवों के किसान फिर से सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं।

नवा रायपुर का सेंध जलाशय — इको-टूरिज्म या पर्यावरण का कत्ल?

अब आते हैं दूसरे मामले पर—नवा रायपुर का सेंध जलाशय!

यहां सरकार का खेल थोड़ा आधुनिक और शातिर है। यहां सीधे खनन नहीं, बल्कि 'सौंदर्यीकरण और पर्यटन' के नाम पर खेल खेला जा रहा है। नवा रायपुर विकास प्राधिकरण (NRDA) ने क्या किया? सेंध और झांझ जलाशयों को 'इको-टूरिज्म' और 'वाटर स्पोर्ट्स' के नाम पर आम जनता से छिन्न-भिन्न कर दिया।

जलाशय के पानी को पाटा गया, उसके प्राकृतिक किनारों को तोड़ा गया और वहां 40 करोड़ रुपये से ज़्यादा के पक्के कंक्रीट पाथवे, रिटेनिंग वॉल और दुकानें खड़ी कर दी गईं! जिस आद्रभूमि (Wetland) को आपको बचाना चाहिए था, वहां कंक्रीट का जंगल बना दिया गया।

छत्तीसगढ़ राज्य वेटलैंड अथॉरिटी ने अपनी जांच रिपोर्ट में साफ कहा कि यह सीधे तौर पर पर्यावरण संरक्षण अधिनियम (Environment Protection Act) का खुला उल्लंघन है! अथॉरिटी ने तो रायपुर कलेक्टर को यह तक निर्देश दिए कि इन नियमों को तोड़ने वालों के खिलाफ कोर्ट में फौजदारी मुकदमा दर्ज कराया जाए, जिसमें 5 साल तक की जेल हो सकती है।

लेकिन मजाल है कि प्रशासन के कान पर जूं रेंगे! नेशनल ग्रीन हरित अधिकरण (NGT) के सख्त निर्देशों को ताक पर रखकर, आज भी वहां पानी के स्रोतों को दरकिनार करके नए-नए टेंडर निकाले जा रहे हैं और व्यावसायिक leases बांटी जा रही हैं।

बीजेपी की नीति — "एक-एक करके बेच दो सब कुछ!"

इन दोनों मामलों को एक साथ जोड़कर देखिए। यह कोई इत्तेफाक नहीं है, यह एक सोची-समझी नीति है!

आज सत्ता में बैठी सरकार की आर्थिक और पर्यावरण नीतियां पूरी तरह से जनता विरोधी हो चुकी हैं। इनका फॉर्मूला बिल्कुल साफ है:

  1. पहले किसी बड़े प्रोजेक्ट, पर्यटन या विकास का मुखौटा सामने लाओ।
  2. उसके बाद प्राकृतिक जल स्रोतों, जंगलों और कैचमेंट एरिया को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाओ।
  3. और अंत में, उस पूरी संपदा को किसी निजी कंपनी या चहेते ठेकेदारों को लीज पर सौंप दो!

चाहे हसदेव के जंगलों को काटना हो, चाहे पेंड्रावन के कैचमेंट में माइनिंग की छूट देनी हो, या फिर सेंध जलाशय को कंक्रीट में बदलकर व्यावसायिक बनाना हो—मकसद सिर्फ एक है: प्रकृति को उजाड़ो, और पूंजीपतियों की तिजोरी भरो!

सरकार 'सबका विकास' का नारा ज़रूर देती है, लेकिन असलियत यह है कि विकास सिर्फ उन मुट्ठीभर कंपनियों का हो रहा है जो आपकी सांसें और पानी तक खरीदने की ताकत रखती हैं।

पेंड्रावन के ग्रामीणों ने 'पेंड्रावन जलाशय बचाओ किसान संघर्ष समिति' के बैनर तले एक बार फिर आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है। पर्यावरणप्रेमी लगातार आवाज़ उठा रहे हैं।

लेकिन सवाल यह है कि आखिर कब तक आम जनता को अपनी ही ज़मीन, अपना ही पानी और अपनी ही आबोहवा बचाने के लिए सड़कों पर संघर्ष करना पड़ेगा? क्या सरकार का एकमात्र काम देश के प्राकृतिक संसाधनों को कंपनियों के हाथों गिरवी रखना रह गया है?

इस पूरे मामले पर आपकी क्या राय है? क्या विकास के नाम पर हमारे तालाबों और बांधों को नष्ट करना सही है? हमें नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय ज़रूर बताएं।


#पेंड्रावन_बांध_बचाओ #SavePendravaanDam #सेंध_जलाशय_बचाओ #SaveSendhReservoir #जल_जंगल_जमीन_बचाओ #Chhattisgarh #EnvironmentProtection #SaveWaterBodies #StopMining #NavaRaipur⁠

एमओयू का खेल या सियासत का मेल?

 एमओयू का खेल या सियासत का मेल? — छत्तीसगढ़ में विकास के दावों की सच्चाई


"जब भी देश में कोई नई सरकार बनती है, तो सबसे बड़ा शिगूफा किस चीज का छोड़ा जाता है? विकास का, बड़े-बड़े निवेश का, और विदेशी दौरों का!

नेताजी सूट-बूट पहनकर विदेशों में जाते हैं, कैमरा चमकता है, बड़े-बड़े उद्योगपतियों के साथ हाथ मिलाते हुए तस्वीरें छपती हैं, और फिर हवा में तैरते हुए करोड़ों-अरबों के 'एमओयू' (MoU) के आंकड़े देश के सामने परोस दिए जाते हैं।

लेकिन, जरा रुकिए! क्या आपने कभी सोचा है कि इन एमओयू और विदेशी दौरों का ज़मीनी सच क्या होता है? क्या कागजों पर साइन होने वाले ये हसीन वादे जमीन पर उतरते हैं, या फिर यह सिर्फ जनता की आँखों में धूल झोंकने का एक राजनीतिक खेल है?

आज हम बात करेंगे छत्तीसगढ़ की—जहाँ खनिज संपदा कूट-कूट कर भरी है, लेकिन जहाँ की सियासत इन दिनों सिर्फ 'एमओयू-एमओयू' के खेल पर टिकी हुई है। छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार के विदेशी दौरों, राज्यों के चक्करों और उन बड़े-बड़े निवेश दावों की आज हम ऐसी परतें उधेड़ेंगे, जो शायद मुख्यधारा की मीडिया में आपको देखने को न मिलें।

'एमओयू-एमओयू' का यह पुराना खेल क्या है?

"सबसे पहले यह समझते हैं कि यह 'एमओयू' यानी Memorandum of Understanding का खेल काम कैसे करता है।

पार्टी कोई भी हो, सरकार चाहे किसी की भी आए—पार्टियां बदलती हैं, चेहरे बदलते हैं, लेकिन यह खेल कभी नहीं बदलता। पिछले कुछ दशकों में छत्तीसगढ़ में या देश के दूसरे राज्यों में जितने भी एमओयू साइन हुए हैं, अगर उन सबके कागजों को सच मान लिया जाए, तो अब तक आधा देश सिंगापुर और सिलिकॉन वैली बन जाना चाहिए था।

मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री और बड़े-बड़े निगम अध्यक्ष तक सरकारी खर्च पर चार्टर्ड प्लेन या बिजनेस क्लास में बैठकर विदेशों के दौरे करते हैं। सिंगापुर, दुबई, अमेरिका और देश के बड़े महानगरों में इन्वेस्टर समिट के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जाते हैं।

वहाँ जाकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं कि- 'फलाने देश से इतने हजार करोड़ का निवेश आ रहा है, लाखों युवाओं को रोजगार मिलेगा!'

लेकिन असली खेल तब शुरू होता है जब ये नेता वापस अपने राज्य लौटते हैं। जनता ताली बजाती है, मीडिया हेडलाइन छापता है, और कुछ महीनों बाद वो फाइलें सरकारी दफ्तरों की किसी धूल भरी अलमारी में हमेशा के लिए दफन हो जाती हैं। सवाल यह है कि जनता के टैक्स के पैसों पर होने वाले इन दौरों का हिसाब कौन देगा?"

छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार और विदेशी-देशीय दौरे

"अब बात करते हैं मौजूदा छत्तीसगढ़ की—जहाँ विष्णुदेव साय के नेतृत्व में भाजपा की सरकार चल रही है।

हाल ही के दिनों में मुख्यमंत्री और उनका पूरा अमला विदेशी दौरों पर निकला। सिंगापुर जैसे देशों की यात्राएं हुईं, वहाँ इंटरनेशनल मंचों पर छत्तीसगढ़ में निवेश के बड़े-बड़े सपने दिखाए गए। राज्य सरकार ने दवा की कि हजारों-लाखों करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव (Investment Proposals) मिल रहे हैं। कभी सिंगापुर के साथ स्किल डेवलपमेंट और डेटा सेंटर के नाम पर एमओयू होते हैं, तो कभी देश के दूसरे शहरों (जैसे हैदराबाद या दिल्ली) में उद्योगपतियों के साथ बैठकें करके हज़ारों करोड़ के करार किए जाते हैं।

सरकार का यह तर्क होता है कि इससे छत्तीसगढ़ के स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा, खेत और खदान से निकलकर स्थानीय उत्पाद सीधे ग्लोबल मार्केट तक जाएंगे, और राज्य का तेजी से विकास होगा।

लेकिन यहाँ सबसे बड़ा सवाल जो उठ रहा है, वो यह है कि—

  • देश में और छत्तीसगढ़ प्रदेश में आखिर सरकार ने कितने उद्योगपतियों के साथ, किस-किस कार्य के लिए और किन-किन शर्तों पर एमओयू किए?
  • उनमें से कितनी कंपनियों ने जमीन पर असल में काम शुरू किया?
  • कितना वास्तविक निवेश (Actual Investment) जमीन पर उतरा?
  • और सबसे अहम सवाल—कितने स्थानीय युवाओं को वास्तव में पक्का रोजगार मिला?"

जवाबदेही कहाँ है? 'श्वेत पत्र' (White Paper) की मांग क्यों जरूरी है?

"यहीं पर आकर जनता को बेवकूफ बनाने का यह खेल बेनकाब हो जाता है।

छत्तीसगढ़ की जनता आज यह पूछने के लिए मजबूर हो चुकी है कि जब सरकार कंपनियों के साथ एमओयू साइन करती है, तो उसके बाद उन कंपनियों को कितनी ज़मीन रियायती दरों पर मुहैया कराई जाती है? इन्वेस्टर समिट्स और इन विदेशी दौरों के आयोजन पर जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये खर्च कर दिए जाते हैं, लेकिन उसका रिटर्न क्या है? इसका कोई पुख्ता डेटा सरकार सार्वजनिक क्यों नहीं करती?

यही कारण है कि अब यह मांग उठने लगी है कि विष्णुदेव साय सरकार को इस पूरे मामले पर एक 'श्वेत पत्र' (White Paper) जारी करना चाहिए।

श्वेत पत्र का मतलब होता है—एक ऐसा आधिकारिक दस्तावेज जिसमें सरकार पिछले सालों और अपने कार्यकाल के दौरान किए गए सभी एमओयू, उन पर खर्च हुए बजट, विदेशी दौरों के कुल खर्च, और जमीन पर उतरे प्रोजेक्ट्स का कच्चा-चिट्ठा साफ-साफ जनता के सामने रखे।

पार्टियां आती हैं और चली जाती हैं, सरकारें बदलती हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ की भोली-भाली जनता को सिर्फ कागजी विकास के सपने दिखाकर ठगा जाता है। अगर सरकार ने वाकई धरातल पर काम किया है, तो श्वेत पत्र जारी करने से डर क्यों?"

"साथियों, खेल बहुत साफ है। राजनीति में 'इन्वेस्टमेंट' शब्द एक ऐसा ब्रह्मास्त्र बन चुका है, जिसका इस्तेमाल करके जनता का ध्यान असली मुद्दों—जैसे बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा और मूलभूत सुविधाओं—से भटका दिया जाता है।

छत्तीसगढ़ खनिज संपदा से मालामाल राज्य है, यहाँ के संसाधनों पर देश का हक है, लेकिन यहाँ के स्थानीय युवाओं को रोजगार के नाम पर आज भी दर-दर भटकना पड़ता है। विदेशी दौरों की चमक-धमक और एमओयू के इन भारी-भरकम आंकड़ों से छत्तीसगढ़ के गरीब का चूल्हा नहीं जलता।

अब समय आ गया है कि हम और आप सवाल पूछें। सिर्फ तालियां बजाने के बजाय आंकड़ों का हिसाब मांगें।

आपकी इस पूरे मुद्दे पर क्या राय है? क्या छत्तीसगढ़ सरकार को वाकई अपने इन दौरों और एमओयू का पूरा हिसाब जनता को देते हुए श्वेत पत्र जारी करना चाहिए? हमें नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी बेबाक राय जरूर बताएं।

दीवाली पर जहर परोस रही हैं बड़ी कंपनियां! खुली पोल, सरकार की मिलीभगत?

 

  • दीवाली पर जहर परोस रही हैं बड़ी कंपनियां! खुली पोल, सरकार की मिलीभगत?

  • सावधान! नकली खोवा-घी का खेल और सरकार की चुप्पी, किसकी शह पर बिक रहा जहर?

, जरा आंखें खोलिए! त्योहारों का सीजन आते ही हमारे घरों में खुशियों की मिठाइयां आनी शुरू हो जाती हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि आप अपने परिवार को जो खोवा, पनीर और घी खिला रहे हैं, वह किसी मिठाई की दुकान से नहीं, बल्कि सीधे मौत के कारखानों से आ रहा है?

और इस बार का खेल उससे भी बड़ा है! मिलावट का यह काला कारोबार सिर्फ किसी नुक्कड़ के हलवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि इस खेल में बाजार की बड़ी-बड़ी नामी गिरामी कंपनियां भी शामिल हो चुकी हैं। जी हाँ, वही ब्रांड जिन पर आप आंख बंद करके भरोसा करते हैं।

जांच रिपोर्टें इस बात की गवाह हैं कि इनके कई बड़े बैचेस फेल हो चुके हैं। और सबसे डरावनी बात क्या है? इन मिलावटी सामानों में सिर्फ घटिया सामग्री नहीं, बल्कि शीशा (Lead) और ऐसे खतरनाक केमिकल्स मिल रहे हैं जो धीरे-धीरे आपके गुर्दे और लीवर को गला रहे हैं।

बड़ी कंपनियों के खेल और खतरनाक केमिकल्स की पोल 

जरा सोचिए, जब देश के बड़े ब्रांड्स के पैकेटबंद घी और पनीर की जांच होती है, तो उसमें खतरनाक स्तर पर सिंथेटिक फैट, डिटर्जेंट और यूरिया के साथ-साथ सेहत के लिए जानलेवा मेटल्स और केमिकल्स पाए जाते हैं।

  • खोवे का सच: त्योहारों पर मांग इतनी बढ़ जाती है कि फैक्ट्रियों में सिंथेटिक खोवा धड़ल्ले से बनता है। इसमें यूरिया, रिफाइंड ऑयल, और स्टार्च के साथ-साथ ऐसे केमिकल्स होते हैं जो आपकी आंतों को जला कर रख देते हैं।
  • घी और पनीर का जहर: जो पैकेटबंद घी और पनीर आप मलाईदार समझकर खरीदते हैं, लैब टेस्ट में उसके कई सैंपल पूरी तरह फेल हो चुके हैं। कई मामलों में इनमें भारी धातुओं (Heavy Metals) और शीशे की मिलावट की पुष्टि हुई है, जो सीधे तौर पर कैंसर जैसी बीमारियों को न्योता दे रही है।

लेकिन सवाल यह है कि ये कंपनियां इतनी बेखौफ क्यों हैं? इन्हें किसका संरक्षण मिला हुआ है?

खाद्य विभाग की नाकामी और सरकार की मिलीभगत 

यहाँ आकर शासन-प्रशासन और खाद्य सुरक्षा विभाग (Food Safety Department) की भूमिका पर बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा होता है!

हर साल त्योहारी सीजन से पहले बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। विभाग के अधिकारी एसी कमरों से बाहर निकलकर दो-चार दुकानों पर औचक निरीक्षण का नाटक करते हैं। मीडिया के सामने सैंपलिंग की फोटो खिंचवाई जाती है। लेकिन असली खेल इसके बाद शुरू होता है!

  • सैंपलिंग का ढकोसला: जब रिपोर्ट आती है, तो क्या कार्रवाई होती है? कागजों में जुर्माना लगाकर मामला रफा-दफा कर दिया जाता है। क्या किसी बड़े ब्रांड का लाइसेंस रद्द हुआ? क्या किसी बड़े चेहरे पर आपराधिक मुकदमा चला?
  • लापरवाही या मिलीभगत? जब बाजार में खुलेआम जहर बिक रहा है और बड़ी कंपनियों के गोदामों तक विभाग की पहुंच होने के बावजूद मिलावट रुक नहीं रही है, तो इसे महज़ लापरवाही नहीं कहा जा सकता। यह सीधी-सीधी मिलीभगत है! जनता की सेहत दांव पर लगी है, और जिम्मेदार आंखें मूंदकर बैठे हैं।

जब तक प्रशासनिक तंत्र और राजनीतिक संरक्षण के तार इन मिलावटखोरों से जुड़े रहेंगे, तब तक आम जनता के स्वास्थ्य के साथ यूं ही खिलवाड़ होता रहेगा। खाद्य विभाग के अधिकारी सिर्फ त्योहारों पर खानापूर्ति के लिए औपचारिकता निभाते हैं, ताकि जनता को यह लगे कि सरकार काम कर रही है। असलियत यह है कि जनता की जान भगवान भरोसे छोड़ दी गई है।

मंगलवार, 3 नवंबर 2026

आम जनता महंगाई से बेहाल, और विधायकों के लिए राजमहल!"

 आम जनता महंगाई से बेहाल, और विधायकों के लिए राजमहल!"


क्या चल रहा है देश और आपके राज्य में? महंगाई का आलम यह है कि आम आदमी की थाली से दाल-सब्जी गायब होती जा रही है, पेट्रोल-डीजल, गैस सिलेंडर और बच्चों की फीस भरते-भरते आम इंसान की रीढ़ की हड्डी टूट चुकी है। लेकिन... लेकिन जनाब, हमारे नुमाइंदों यानी विधायकों की जिंदगी देखिए! उनके ठाठ-बाठ देखकर तो राजा-महाराजा भी शरमा जाएं।

अभी हाल ही में छत्तीसगढ़ के नवा रायपुर (सेक्टर-25) से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसे पढ़कर और सुनकर हर उस आम नागरिक का खून खौल उठेगा जो टैक्स के एक-एक पाई चुकाता है। खबर क्या है? खबर यह है कि विधायकों के लिए बनने वाले फ्लैट्स का नक्शा बदल दिया गया है! पहले भाईसाहब 3 BHK फ्लैट बनने वाले थे, लेकिन अब उन्हें अपग्रेड करके 4 BHK आलीशान फ्लैट बना दिया गया है! और तो और, लागत कितनी बढ़ गई? सीधे 80 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी!

आज इसी पर करेंगे कड़वी बात, तीखा विश्लेषण। वीडियो को अंत तक देखिएगा, क्योंकि आज सवाल सिर्फ एक सरकार या पार्टी का नहीं, बल्कि हमारी व्यवस्था और प्राथमिकताओं का है।"

खबर का कच्चा-चिट्ठा - क्या है पूरा मामला?

: "चलिए,आपको तारीख और आंकड़ों के साथ पूरी सच्चाई बताता हूँ। हमारे पास जो जानकारी और दस्तावेज (तस्वीर) सामने आए हैं, उसके मुताबिक:

  • नवा रायपुर के सेक्टर-25 में प्रदेश के विधायकों के लिए प्रस्तावित आवासीय परिसर को अब और ज्यादा भव्य बनाया जा रहा है।
  • पहले पूर्व भूपेश बघेल सरकार के कार्यकाल में यह तय हुआ था कि 78 विधायकों के लिए 3 BHK फ्लैट्स बनाए जाएंगे।
  • लेकिन अब प्लान बदल चुका है। अब सभी 90 विधायकों के लिए 4 BHK आलीशान फ्लैट्स का नक्शा तैयार किया गया है।

भाई, सिर्फ कमरों की संख्या ही नहीं बढ़ी, सुविधाएं सुनिए जरा!

  • इसमें स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, कैफेटेरिया, मल्टीपरपज हॉल और सर्वेंट क्वार्टर जैसी हाईटेक और लग्जरी सुविधाएं जोड़ी जा रही हैं।
  • और इन सब 'शाही बदलावों' की वजह से प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत सीधे 80 करोड़ रुपये बढ़ गई है।
  • तर्क यह दिया जा रहा है कि पीडब्ल्यूडी (PWD) ने विधायकों के सुझावों और वर्तमान जरूरतों को ध्यान में रखते हुए यह नया खाका तैयार किया है। वाह! जनता की जरूरत महंगाई के इस दौर में दो वक्त की रोटी जुटाना है, और विधायकों की जरूरत 'सर्वेंट क्वार्टर और स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स' वाली आलीशान कोठियां हैं!"
  • जनता का दर्द बनाम जनप्रतिनिधियों की ऐश 

जरा सोचकर देखिए एक तरफ देश और प्रदेश का आम आदमी महंगाई की चक्की में पिस रहा है। दूध, आटा, चावल, दाल सब पर टैक्स लग रहा है। मिडिल क्लास आदमी बैंक की EMI चुकाते-चुकाते अपनी आधी जवानी गुजार देता है। उसे 2 BHK फ्लैट खरीदने के लिए भी जिंदगीभर की जमापूंजी लगानी पड़ती है या लोन के जाल में फंसना पड़ता है।

लेकिन हमारे माननीय विधायकों को देखिए! जनता के टैक्स के पैसों से उनके आराम का पूरा ख्याल रखा जा रहा है। 3 BHK से सीधा 4 BHK पर छलांग! क्या विधायकों के परिवार इतने बड़े हो गए हैं कि उन्हें 3 कमरे कम पड़ने लगे? या जनता की गाढ़ी कमाई को पानी की तरह बहाना ही इन सबका मुख्य एजेंडा बन गया है?

जब जनता रोजगार मांगती है, तो बजट नहीं होने का रोना रोया जाता है। जब किसानों को उनके फसलों का सही दाम देने की बात आती है, तो खजाने खाली होने का पाठ पढ़ाया जाता है। जब सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की हालत सुधारने की बात होती है, तो कहा जाता है कि 'धन की कमी है'। लेकिन जब बात हमारे साहब लोगों के आलीशान आवास और सुविधाओं की आती है, तो 80 करोड़ रुपये चुटकी बजाते ही बढ़ जाते हैं! ये पैसा किसका है? क्या यह किसी राजनेता के बाप की जागीर है? नहीं! यह आपका और हमारा खून-पसीने की कमाई का टैक्स है।"

सिस्टम पर सवाल और नेताओं की प्राथमिकताएं]

"यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारें चाहे किसी की भी रहें—चाहे पुरानी सरकार हो या वर्तमान सरकार—जनता से जुड़े मुद्दों पर नीतियां बदलती हैं या नहीं बदलतीं, लेकिन नेताओं की सुख-सुविधाओं के मामले में कभी कोई कटौती नहीं होती। सब मिलकर एक ही थाली के चट्टे-बट्टे साबित होते हैं।

विधायकों को वेतन मिलता है, भत्ते मिलते हैं, मुफ्त बिजली-पानी मिलती है, मेडिकल सुविधा मिलती है, पेंशन मिलती है—और उसके बाद भी उनके रहने के लिए राजमहल जैसे फ्लैट्स पर जनता के करोड़ों रुपये फूंक दिए जाते हैं। क्या एक विधायक आम जनता से इतना ऊपर हो गया है कि उसे जनता के दुखों से कोई फर्क ही नहीं पड़ता?

यह सिर्फ एक इमारत या 4 BHK फ्लैट का मामला नहीं है, यह हमारी राजनीतिक संस्कृति की बानो है, जहाँ जनसेवक, 'शासक' बन बैठे हैं।"

वक्त आ गया है कि हम सवाल पूछना सीखें। सोशल मीडिया पर स्टेटस लगाने या रील्स देखने से काम नहीं चलेगा। जब तक हम अपने इन चुने हुए नुमाइंदों से यह नहीं पूछेंगे कि 'भाई, हमारी महंगाई कम करने के लिए क्या योजना है?' और 'हमारे पैसों से राजमहल क्यों बनाए जा रहे हैं?', तब तक ये लोग हमें ऐसे ही हल्के में लेते रहेंगे।

अब आपको तय करना है कि क्या आप ऐसे ही चुपचाप सब देखते रहेंगे या सवाल उठाएंगे। इस वीडियो को देश के हर उस नागरिक तक शेयर कीजिए जो महंगाई से परेशान है और नेताओं की इस अय्याशी से आहत है।

नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखिए कि क्या विधायकों के लिए 80 करोड़ अतिरिक्त खर्च करके 4 BHK फ्लैट बनाना सही है?