बुधवार, 4 नवंबर 2026

एमओयू का खेल या सियासत का मेल?

 एमओयू का खेल या सियासत का मेल? — छत्तीसगढ़ में विकास के दावों की सच्चाई


"जब भी देश में कोई नई सरकार बनती है, तो सबसे बड़ा शिगूफा किस चीज का छोड़ा जाता है? विकास का, बड़े-बड़े निवेश का, और विदेशी दौरों का!

नेताजी सूट-बूट पहनकर विदेशों में जाते हैं, कैमरा चमकता है, बड़े-बड़े उद्योगपतियों के साथ हाथ मिलाते हुए तस्वीरें छपती हैं, और फिर हवा में तैरते हुए करोड़ों-अरबों के 'एमओयू' (MoU) के आंकड़े देश के सामने परोस दिए जाते हैं।

लेकिन, जरा रुकिए! क्या आपने कभी सोचा है कि इन एमओयू और विदेशी दौरों का ज़मीनी सच क्या होता है? क्या कागजों पर साइन होने वाले ये हसीन वादे जमीन पर उतरते हैं, या फिर यह सिर्फ जनता की आँखों में धूल झोंकने का एक राजनीतिक खेल है?

आज हम बात करेंगे छत्तीसगढ़ की—जहाँ खनिज संपदा कूट-कूट कर भरी है, लेकिन जहाँ की सियासत इन दिनों सिर्फ 'एमओयू-एमओयू' के खेल पर टिकी हुई है। छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार के विदेशी दौरों, राज्यों के चक्करों और उन बड़े-बड़े निवेश दावों की आज हम ऐसी परतें उधेड़ेंगे, जो शायद मुख्यधारा की मीडिया में आपको देखने को न मिलें।

'एमओयू-एमओयू' का यह पुराना खेल क्या है?

"सबसे पहले यह समझते हैं कि यह 'एमओयू' यानी Memorandum of Understanding का खेल काम कैसे करता है।

पार्टी कोई भी हो, सरकार चाहे किसी की भी आए—पार्टियां बदलती हैं, चेहरे बदलते हैं, लेकिन यह खेल कभी नहीं बदलता। पिछले कुछ दशकों में छत्तीसगढ़ में या देश के दूसरे राज्यों में जितने भी एमओयू साइन हुए हैं, अगर उन सबके कागजों को सच मान लिया जाए, तो अब तक आधा देश सिंगापुर और सिलिकॉन वैली बन जाना चाहिए था।

मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री और बड़े-बड़े निगम अध्यक्ष तक सरकारी खर्च पर चार्टर्ड प्लेन या बिजनेस क्लास में बैठकर विदेशों के दौरे करते हैं। सिंगापुर, दुबई, अमेरिका और देश के बड़े महानगरों में इन्वेस्टर समिट के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जाते हैं।

वहाँ जाकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं कि- 'फलाने देश से इतने हजार करोड़ का निवेश आ रहा है, लाखों युवाओं को रोजगार मिलेगा!'

लेकिन असली खेल तब शुरू होता है जब ये नेता वापस अपने राज्य लौटते हैं। जनता ताली बजाती है, मीडिया हेडलाइन छापता है, और कुछ महीनों बाद वो फाइलें सरकारी दफ्तरों की किसी धूल भरी अलमारी में हमेशा के लिए दफन हो जाती हैं। सवाल यह है कि जनता के टैक्स के पैसों पर होने वाले इन दौरों का हिसाब कौन देगा?"

छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार और विदेशी-देशीय दौरे

"अब बात करते हैं मौजूदा छत्तीसगढ़ की—जहाँ विष्णुदेव साय के नेतृत्व में भाजपा की सरकार चल रही है।

हाल ही के दिनों में मुख्यमंत्री और उनका पूरा अमला विदेशी दौरों पर निकला। सिंगापुर जैसे देशों की यात्राएं हुईं, वहाँ इंटरनेशनल मंचों पर छत्तीसगढ़ में निवेश के बड़े-बड़े सपने दिखाए गए। राज्य सरकार ने दवा की कि हजारों-लाखों करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव (Investment Proposals) मिल रहे हैं। कभी सिंगापुर के साथ स्किल डेवलपमेंट और डेटा सेंटर के नाम पर एमओयू होते हैं, तो कभी देश के दूसरे शहरों (जैसे हैदराबाद या दिल्ली) में उद्योगपतियों के साथ बैठकें करके हज़ारों करोड़ के करार किए जाते हैं।

सरकार का यह तर्क होता है कि इससे छत्तीसगढ़ के स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा, खेत और खदान से निकलकर स्थानीय उत्पाद सीधे ग्लोबल मार्केट तक जाएंगे, और राज्य का तेजी से विकास होगा।

लेकिन यहाँ सबसे बड़ा सवाल जो उठ रहा है, वो यह है कि—

  • देश में और छत्तीसगढ़ प्रदेश में आखिर सरकार ने कितने उद्योगपतियों के साथ, किस-किस कार्य के लिए और किन-किन शर्तों पर एमओयू किए?
  • उनमें से कितनी कंपनियों ने जमीन पर असल में काम शुरू किया?
  • कितना वास्तविक निवेश (Actual Investment) जमीन पर उतरा?
  • और सबसे अहम सवाल—कितने स्थानीय युवाओं को वास्तव में पक्का रोजगार मिला?"

जवाबदेही कहाँ है? 'श्वेत पत्र' (White Paper) की मांग क्यों जरूरी है?

"यहीं पर आकर जनता को बेवकूफ बनाने का यह खेल बेनकाब हो जाता है।

छत्तीसगढ़ की जनता आज यह पूछने के लिए मजबूर हो चुकी है कि जब सरकार कंपनियों के साथ एमओयू साइन करती है, तो उसके बाद उन कंपनियों को कितनी ज़मीन रियायती दरों पर मुहैया कराई जाती है? इन्वेस्टर समिट्स और इन विदेशी दौरों के आयोजन पर जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये खर्च कर दिए जाते हैं, लेकिन उसका रिटर्न क्या है? इसका कोई पुख्ता डेटा सरकार सार्वजनिक क्यों नहीं करती?

यही कारण है कि अब यह मांग उठने लगी है कि विष्णुदेव साय सरकार को इस पूरे मामले पर एक 'श्वेत पत्र' (White Paper) जारी करना चाहिए।

श्वेत पत्र का मतलब होता है—एक ऐसा आधिकारिक दस्तावेज जिसमें सरकार पिछले सालों और अपने कार्यकाल के दौरान किए गए सभी एमओयू, उन पर खर्च हुए बजट, विदेशी दौरों के कुल खर्च, और जमीन पर उतरे प्रोजेक्ट्स का कच्चा-चिट्ठा साफ-साफ जनता के सामने रखे।

पार्टियां आती हैं और चली जाती हैं, सरकारें बदलती हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ की भोली-भाली जनता को सिर्फ कागजी विकास के सपने दिखाकर ठगा जाता है। अगर सरकार ने वाकई धरातल पर काम किया है, तो श्वेत पत्र जारी करने से डर क्यों?"

"साथियों, खेल बहुत साफ है। राजनीति में 'इन्वेस्टमेंट' शब्द एक ऐसा ब्रह्मास्त्र बन चुका है, जिसका इस्तेमाल करके जनता का ध्यान असली मुद्दों—जैसे बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा और मूलभूत सुविधाओं—से भटका दिया जाता है।

छत्तीसगढ़ खनिज संपदा से मालामाल राज्य है, यहाँ के संसाधनों पर देश का हक है, लेकिन यहाँ के स्थानीय युवाओं को रोजगार के नाम पर आज भी दर-दर भटकना पड़ता है। विदेशी दौरों की चमक-धमक और एमओयू के इन भारी-भरकम आंकड़ों से छत्तीसगढ़ के गरीब का चूल्हा नहीं जलता।

अब समय आ गया है कि हम और आप सवाल पूछें। सिर्फ तालियां बजाने के बजाय आंकड़ों का हिसाब मांगें।

आपकी इस पूरे मुद्दे पर क्या राय है? क्या छत्तीसगढ़ सरकार को वाकई अपने इन दौरों और एमओयू का पूरा हिसाब जनता को देते हुए श्वेत पत्र जारी करना चाहिए? हमें नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी बेबाक राय जरूर बताएं।

दीवाली पर जहर परोस रही हैं बड़ी कंपनियां! खुली पोल, सरकार की मिलीभगत?

 

  • दीवाली पर जहर परोस रही हैं बड़ी कंपनियां! खुली पोल, सरकार की मिलीभगत?

  • सावधान! नकली खोवा-घी का खेल और सरकार की चुप्पी, किसकी शह पर बिक रहा जहर?

, जरा आंखें खोलिए! त्योहारों का सीजन आते ही हमारे घरों में खुशियों की मिठाइयां आनी शुरू हो जाती हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि आप अपने परिवार को जो खोवा, पनीर और घी खिला रहे हैं, वह किसी मिठाई की दुकान से नहीं, बल्कि सीधे मौत के कारखानों से आ रहा है?

और इस बार का खेल उससे भी बड़ा है! मिलावट का यह काला कारोबार सिर्फ किसी नुक्कड़ के हलवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि इस खेल में बाजार की बड़ी-बड़ी नामी गिरामी कंपनियां भी शामिल हो चुकी हैं। जी हाँ, वही ब्रांड जिन पर आप आंख बंद करके भरोसा करते हैं।

जांच रिपोर्टें इस बात की गवाह हैं कि इनके कई बड़े बैचेस फेल हो चुके हैं। और सबसे डरावनी बात क्या है? इन मिलावटी सामानों में सिर्फ घटिया सामग्री नहीं, बल्कि शीशा (Lead) और ऐसे खतरनाक केमिकल्स मिल रहे हैं जो धीरे-धीरे आपके गुर्दे और लीवर को गला रहे हैं।

बड़ी कंपनियों के खेल और खतरनाक केमिकल्स की पोल 

जरा सोचिए, जब देश के बड़े ब्रांड्स के पैकेटबंद घी और पनीर की जांच होती है, तो उसमें खतरनाक स्तर पर सिंथेटिक फैट, डिटर्जेंट और यूरिया के साथ-साथ सेहत के लिए जानलेवा मेटल्स और केमिकल्स पाए जाते हैं।

  • खोवे का सच: त्योहारों पर मांग इतनी बढ़ जाती है कि फैक्ट्रियों में सिंथेटिक खोवा धड़ल्ले से बनता है। इसमें यूरिया, रिफाइंड ऑयल, और स्टार्च के साथ-साथ ऐसे केमिकल्स होते हैं जो आपकी आंतों को जला कर रख देते हैं।
  • घी और पनीर का जहर: जो पैकेटबंद घी और पनीर आप मलाईदार समझकर खरीदते हैं, लैब टेस्ट में उसके कई सैंपल पूरी तरह फेल हो चुके हैं। कई मामलों में इनमें भारी धातुओं (Heavy Metals) और शीशे की मिलावट की पुष्टि हुई है, जो सीधे तौर पर कैंसर जैसी बीमारियों को न्योता दे रही है।

लेकिन सवाल यह है कि ये कंपनियां इतनी बेखौफ क्यों हैं? इन्हें किसका संरक्षण मिला हुआ है?

खाद्य विभाग की नाकामी और सरकार की मिलीभगत 

यहाँ आकर शासन-प्रशासन और खाद्य सुरक्षा विभाग (Food Safety Department) की भूमिका पर बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा होता है!

हर साल त्योहारी सीजन से पहले बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। विभाग के अधिकारी एसी कमरों से बाहर निकलकर दो-चार दुकानों पर औचक निरीक्षण का नाटक करते हैं। मीडिया के सामने सैंपलिंग की फोटो खिंचवाई जाती है। लेकिन असली खेल इसके बाद शुरू होता है!

  • सैंपलिंग का ढकोसला: जब रिपोर्ट आती है, तो क्या कार्रवाई होती है? कागजों में जुर्माना लगाकर मामला रफा-दफा कर दिया जाता है। क्या किसी बड़े ब्रांड का लाइसेंस रद्द हुआ? क्या किसी बड़े चेहरे पर आपराधिक मुकदमा चला?
  • लापरवाही या मिलीभगत? जब बाजार में खुलेआम जहर बिक रहा है और बड़ी कंपनियों के गोदामों तक विभाग की पहुंच होने के बावजूद मिलावट रुक नहीं रही है, तो इसे महज़ लापरवाही नहीं कहा जा सकता। यह सीधी-सीधी मिलीभगत है! जनता की सेहत दांव पर लगी है, और जिम्मेदार आंखें मूंदकर बैठे हैं।

जब तक प्रशासनिक तंत्र और राजनीतिक संरक्षण के तार इन मिलावटखोरों से जुड़े रहेंगे, तब तक आम जनता के स्वास्थ्य के साथ यूं ही खिलवाड़ होता रहेगा। खाद्य विभाग के अधिकारी सिर्फ त्योहारों पर खानापूर्ति के लिए औपचारिकता निभाते हैं, ताकि जनता को यह लगे कि सरकार काम कर रही है। असलियत यह है कि जनता की जान भगवान भरोसे छोड़ दी गई है।

मंगलवार, 3 नवंबर 2026

आम जनता महंगाई से बेहाल, और विधायकों के लिए राजमहल!"

 आम जनता महंगाई से बेहाल, और विधायकों के लिए राजमहल!"


क्या चल रहा है देश और आपके राज्य में? महंगाई का आलम यह है कि आम आदमी की थाली से दाल-सब्जी गायब होती जा रही है, पेट्रोल-डीजल, गैस सिलेंडर और बच्चों की फीस भरते-भरते आम इंसान की रीढ़ की हड्डी टूट चुकी है। लेकिन... लेकिन जनाब, हमारे नुमाइंदों यानी विधायकों की जिंदगी देखिए! उनके ठाठ-बाठ देखकर तो राजा-महाराजा भी शरमा जाएं।

अभी हाल ही में छत्तीसगढ़ के नवा रायपुर (सेक्टर-25) से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसे पढ़कर और सुनकर हर उस आम नागरिक का खून खौल उठेगा जो टैक्स के एक-एक पाई चुकाता है। खबर क्या है? खबर यह है कि विधायकों के लिए बनने वाले फ्लैट्स का नक्शा बदल दिया गया है! पहले भाईसाहब 3 BHK फ्लैट बनने वाले थे, लेकिन अब उन्हें अपग्रेड करके 4 BHK आलीशान फ्लैट बना दिया गया है! और तो और, लागत कितनी बढ़ गई? सीधे 80 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी!

आज इसी पर करेंगे कड़वी बात, तीखा विश्लेषण। वीडियो को अंत तक देखिएगा, क्योंकि आज सवाल सिर्फ एक सरकार या पार्टी का नहीं, बल्कि हमारी व्यवस्था और प्राथमिकताओं का है।"

खबर का कच्चा-चिट्ठा - क्या है पूरा मामला?

: "चलिए,आपको तारीख और आंकड़ों के साथ पूरी सच्चाई बताता हूँ। हमारे पास जो जानकारी और दस्तावेज (तस्वीर) सामने आए हैं, उसके मुताबिक:

  • नवा रायपुर के सेक्टर-25 में प्रदेश के विधायकों के लिए प्रस्तावित आवासीय परिसर को अब और ज्यादा भव्य बनाया जा रहा है।
  • पहले पूर्व भूपेश बघेल सरकार के कार्यकाल में यह तय हुआ था कि 78 विधायकों के लिए 3 BHK फ्लैट्स बनाए जाएंगे।
  • लेकिन अब प्लान बदल चुका है। अब सभी 90 विधायकों के लिए 4 BHK आलीशान फ्लैट्स का नक्शा तैयार किया गया है।

भाई, सिर्फ कमरों की संख्या ही नहीं बढ़ी, सुविधाएं सुनिए जरा!

  • इसमें स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, कैफेटेरिया, मल्टीपरपज हॉल और सर्वेंट क्वार्टर जैसी हाईटेक और लग्जरी सुविधाएं जोड़ी जा रही हैं।
  • और इन सब 'शाही बदलावों' की वजह से प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत सीधे 80 करोड़ रुपये बढ़ गई है।
  • तर्क यह दिया जा रहा है कि पीडब्ल्यूडी (PWD) ने विधायकों के सुझावों और वर्तमान जरूरतों को ध्यान में रखते हुए यह नया खाका तैयार किया है। वाह! जनता की जरूरत महंगाई के इस दौर में दो वक्त की रोटी जुटाना है, और विधायकों की जरूरत 'सर्वेंट क्वार्टर और स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स' वाली आलीशान कोठियां हैं!"
  • जनता का दर्द बनाम जनप्रतिनिधियों की ऐश 

जरा सोचकर देखिए एक तरफ देश और प्रदेश का आम आदमी महंगाई की चक्की में पिस रहा है। दूध, आटा, चावल, दाल सब पर टैक्स लग रहा है। मिडिल क्लास आदमी बैंक की EMI चुकाते-चुकाते अपनी आधी जवानी गुजार देता है। उसे 2 BHK फ्लैट खरीदने के लिए भी जिंदगीभर की जमापूंजी लगानी पड़ती है या लोन के जाल में फंसना पड़ता है।

लेकिन हमारे माननीय विधायकों को देखिए! जनता के टैक्स के पैसों से उनके आराम का पूरा ख्याल रखा जा रहा है। 3 BHK से सीधा 4 BHK पर छलांग! क्या विधायकों के परिवार इतने बड़े हो गए हैं कि उन्हें 3 कमरे कम पड़ने लगे? या जनता की गाढ़ी कमाई को पानी की तरह बहाना ही इन सबका मुख्य एजेंडा बन गया है?

जब जनता रोजगार मांगती है, तो बजट नहीं होने का रोना रोया जाता है। जब किसानों को उनके फसलों का सही दाम देने की बात आती है, तो खजाने खाली होने का पाठ पढ़ाया जाता है। जब सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की हालत सुधारने की बात होती है, तो कहा जाता है कि 'धन की कमी है'। लेकिन जब बात हमारे साहब लोगों के आलीशान आवास और सुविधाओं की आती है, तो 80 करोड़ रुपये चुटकी बजाते ही बढ़ जाते हैं! ये पैसा किसका है? क्या यह किसी राजनेता के बाप की जागीर है? नहीं! यह आपका और हमारा खून-पसीने की कमाई का टैक्स है।"

सिस्टम पर सवाल और नेताओं की प्राथमिकताएं]

"यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारें चाहे किसी की भी रहें—चाहे पुरानी सरकार हो या वर्तमान सरकार—जनता से जुड़े मुद्दों पर नीतियां बदलती हैं या नहीं बदलतीं, लेकिन नेताओं की सुख-सुविधाओं के मामले में कभी कोई कटौती नहीं होती। सब मिलकर एक ही थाली के चट्टे-बट्टे साबित होते हैं।

विधायकों को वेतन मिलता है, भत्ते मिलते हैं, मुफ्त बिजली-पानी मिलती है, मेडिकल सुविधा मिलती है, पेंशन मिलती है—और उसके बाद भी उनके रहने के लिए राजमहल जैसे फ्लैट्स पर जनता के करोड़ों रुपये फूंक दिए जाते हैं। क्या एक विधायक आम जनता से इतना ऊपर हो गया है कि उसे जनता के दुखों से कोई फर्क ही नहीं पड़ता?

यह सिर्फ एक इमारत या 4 BHK फ्लैट का मामला नहीं है, यह हमारी राजनीतिक संस्कृति की बानो है, जहाँ जनसेवक, 'शासक' बन बैठे हैं।"

वक्त आ गया है कि हम सवाल पूछना सीखें। सोशल मीडिया पर स्टेटस लगाने या रील्स देखने से काम नहीं चलेगा। जब तक हम अपने इन चुने हुए नुमाइंदों से यह नहीं पूछेंगे कि 'भाई, हमारी महंगाई कम करने के लिए क्या योजना है?' और 'हमारे पैसों से राजमहल क्यों बनाए जा रहे हैं?', तब तक ये लोग हमें ऐसे ही हल्के में लेते रहेंगे।

अब आपको तय करना है कि क्या आप ऐसे ही चुपचाप सब देखते रहेंगे या सवाल उठाएंगे। इस वीडियो को देश के हर उस नागरिक तक शेयर कीजिए जो महंगाई से परेशान है और नेताओं की इस अय्याशी से आहत है।

नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखिए कि क्या विधायकों के लिए 80 करोड़ अतिरिक्त खर्च करके 4 BHK फ्लैट बनाना सही है? 

सांसद को 'जो करना है कर लो' कहने वाले IAS अमित कटारिया फिर विवादों में! काला चश्मा से लेकर हाईकोर्ट के चाबुक तक..."

 सांसद को 'जो करना है कर लो' कहने वाले IAS अमित कटारिया फिर विवादों में! काला चश्मा से लेकर हाईकोर्ट के चाबुक तक..."



कहते हैं कि सियासत और ब्यूरोक्रेसी यानी नौकरशाही, ये दोनों जब आपस में टकराती हैं, तो चिंगारी दूर-दूर तक जाती है। लेकिन छत्तीसगढ़ में आजकल जो कुछ चल रहा है, वो सिर्फ चिंगारी नहीं, बल्कि सीधे तौर पर प्रशासनिक अहंकार और लोकतंत्र के बीच एक महासंग्राम बन चुका है।

और इस महासंग्राम के केंद्र में हैं— छत्तीसगढ़ के एक बेहद चर्चित, रईस और दबंग आईएएस अधिकारी, अमित कटारिया!

वही अमित कटारिया, जो कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने काला चश्मा पहनकर खड़े होने की वजह से पूरे देश की सुर्खियों में आ गए थे। जो कागजों पर तो सिर्फ एक रुपया सैलरी लेने वाले फकीर नुमा अफसर दिखते हैं, लेकिन जिनकी असलियत और रुतबे के चर्चे हर तरफ हैं।

लेकिन अब मामला सिर्फ एक-दो पुराने किस्सों तक सीमित नहीं है। ताजा खबर ये है कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अमित कटारिया समेत कई बड़े अधिकारियों को अवमानना (Contempt of Court) का नोटिस थमा दिया है! इतना ही नहीं, कुछ समय पहले रायपुर के वरिष्ठ सांसद और दिग्गज नेता बृजमोहन अग्रवाल के साथ उनकी बदसलूकी का मामला सीधे लोकसभा अध्यक्ष तक पहुंच गया था! और तो और, भाई साहब... इनके नाम पर छत्तीसगढ़ में फर्जी वसूली और धमकियों का बाजार भी गर्म रहा है।

आखिर चल क्या रहा है छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य विभाग में? क्या ब्यूरोक्रेसी इतनी बेलगाम हो चुकी है कि उसे जनता के चुने हुए नुमाइंदों और अदालत के आदेशों की भी परवाह नहीं है? आज की इस वीडियो में हम पर्दाफाश करेंगे अमित कटारिया के पूरे विवादित इतिहास का—बस्तर के 'काला चश्मा' कांड से लेकर, सांसद से पंगा और ताजा कानूनी डंडे तक! एक-एक बात खुलकर सामने आएगी।

ताजा विवाद - छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का डंडा और अवमानना नोटिस 

शुरुआत करते हैं एकदम ताजा और सनसनीखेज अपडेट से। मामला जुड़ा है छत्तीसगढ़ स्टेट फार्मेसी काउंसिल में रजिस्ट्रार की नियुक्ति के विवाद से।

हवा में तीर चलाने के बजाय जरा तथ्यों को समझिए। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 3 मार्च 2026 को साफ-साफ निर्देश दिया था कि तत्कालीन रजिस्ट्रार को हटाया जाए। इसके बाद 15 मई 2026 को पूर्णकालिक रजिस्ट्रार नियुक्त करने का आदेश हुआ और अदालत ने इसके लिए आठ हफ्ते की सख्त समय सीमा तय की थी।

लेकिन हमारी आका-ब्यूरोक्रेसी ने क्या किया? कोर्ट के आदेश को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया! तय समय में जब नियुक्ति नहीं हुई, तो मजबूरन अदालत में अवमानना याचिका (Contempt Petition) दाखिल करनी पड़ी।

और अब परिणाम क्या आया है? छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए स्वास्थ्य विभाग के सचिव IAS अमित कटारिया, स्वास्थ्य संचालक संजीव झा और काउंसिल के अध्यक्ष अरुण मिश्रा को नोटिस जारी कर दिया है! अदालत ने इन तीनों से तीन हफ्ते के भीतर जवाब मांगा है कि आखिर कोर्ट के आदेश की अवहेलना क्यों की गई?

जरा सोचिए! जिस महकमे के मुखिया पर कानून का पालन कराने की जिम्मेदारी हो, अगर वही महकमा हाईकोर्ट के आदेशों की धज्जियां उड़ाएगा, तो आम जनता न्याय के लिए कहां जाएगी? यह सिर्फ एक नोटिस नहीं है, बल्कि सिस्टम के मुंह पर एक करारा तमाचा है।

सांसद बृजमोहन अग्रवाल बनाम IAS अमित कटारिया - "जो करना है कर लो!" 

लेकिन भाई, अमित कटारिया का विवादों से पुराना नाता है। हाईकोर्ट के इस मामले से ठीक कुछ महीने पहले, इसी साल मध्य में रायपुर के सांसद और राज्य के पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के साथ उनका जो टकराव हुआ, उसने तो दिल्ली तक भूचाल ला दिया था!

हुआ यूं कि 20 मई को सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने जनहित से जुड़े कुछ जरूरी मामलों और पत्रों के जवाब को लेकर स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया को फोन किया। सोचिए, राज्य की राजधानी का एक वरिष्ठ सांसद, जो जनता द्वारा चुना गया प्रतिनिधि है, वो जब एक आईएएस अधिकारी को फोन करे, तो उम्मीद क्या होती है? सम्मान की, संवाद की!

लेकिन आरोप है कि अमित कटारिया ने न सिर्फ महीनों तक सांसद के पत्रों के जवाब नहीं दिए, बल्कि फोन पर बेहद रुखे और घमंड भरे लहजे में बात की। सूत्रों और शिकायतों के मुताबिक, बातचीत के दौरान आईएएस अमित कटारिया ने सांसद से यहां तक कह दिया— "जो करना है कर लो!" (Do whatever you want!)

भाई साहब! एक आईएएस अफसर एक निर्वाचित सांसद को खुलेआम ये कह रहा है कि 'जो करना है कर लो'! क्या यह लोकतंत्र का अपमान नहीं है?

मामला इतना बढ़ा कि बृजमोहन अग्रवाल ने इसे सीधे तौर पर अपने विशेषाधिकार का हनन (Breach of Privilege) मानते हुए लोकसभा अध्यक्ष के पास लिखित शिकायत दर्ज करा दी। लोकसभा सचिवालय ने भी इस मामले को गंभीरता से लेते हुए DoPT (कार्मिक मंत्रालय) से तथ्यात्मक रिपोर्ट मांग ली।

इस पूरे मामले पर सियासत भी गरमा गई। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल तक को कूदना पड़ा। उन्होंने साफ कहा कि यह घटना इस बात का सबूत है कि छत्तीसगढ़ के अफसरों को जनता या जनप्रतिनिधियों की कोई परवाह नहीं है, उन्हें सिर्फ अपनी कुर्सी से मतलब है। सोचिए, जनता के वोट से चुने गए नेता की इज्जत एक कुर्सी पर बैठे नौकरशाह के सामने किस तरह तार-तार की जा रही है!

अमित कटारिया के नाम पर फर्जी वसूली और धमकियों का खेल! 


अब आइए इस कहानी के सबसे खतरनाक और काले पहलू पर। जब अफसर का खौफ और दबंगई इस स्तर पर बढ़ जाती है, तो सिस्टम के नीचे पलने वाले दलाल और ठग भी इसका पूरा फायदा उठाने लगते हैं।

कुछ समय पहले छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से एक बहुत बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया था। एक शातिर ठग ने क्या किया? उसने खुद को स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया का बेहद करीबी और खास आदमी बताकर शहर के निजी अस्पतालों (Private Hospitals) को फोन करना शुरू कर दिया!

अस्पतालों को बड़े-बड़े प्रशासनिक एक्शन का डर दिखाया गया, नियमों की आड़ में डराया-धमकाया गया और उनके नाम पर मोटी रकम की अवैध वसूली (Extortion) की गई! सोचकर देखिए, जब किसी अधिकारी की छवि 'दबंग' और 'किसी की न सुनने वाले' अफसर के तौर पर स्थापित हो जाती है, तो अपराधियों को यह यकीन दिलाने में आसानी हो जाती है कि "अरे, ये तो किसी की नहीं सुनते, इनके नाम पर डराओगे तो अस्पताल वाले तुरंत पैसे दे देंगे।"

भले ही पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई की हो, लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर किसी अधिकारी के नाम का ऐसा खौफ या दुरुपयोग मार्केट में क्यों पनपता है? क्यों ठगों को यह भरोसा होता है कि उस बड़े साहब का नाम लेते ही लोग कांप जाएंगे? यह अपने आप में एक बहुत बड़ा गंभीर सवाल है जो प्रशासन की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगाता है।

पुराना इतिहास - वो 'काला चश्मा' और 1 रुपये की सैलरी का ड्रामा 

, अगर आपको लगता है कि अमित कटारिया सिर्फ अब ऐसे तेवर दिखा रहे हैं, तो आपका इतिहास कमजोर है। जनाब का रिकॉर्ड शुरू से ऐसा ही रहा है!

फ्लैशबैक में चलिए—साल 2015, मई का महीना। अमित कटारिया तब बस्तर के कलेक्टर हुआ करते थे। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बस्तर के दौरे पर आए थे। प्रोटोकॉल के मुताबिक देश के प्रधानमंत्री का स्वागत करना था। बाकी सारे अधिकारी कायदे से हाथ जोड़े खड़े थे, लेकिन हमारे अमित कटारिया साहब... उन्होंने प्रधानमंत्री के सामने भी अपनी शान बनाए रखने के लिए चेहरे पर ब्रांडेड काला चश्मा (Sunglasses) चढ़ा रखा था!

तस्वीरें नेशनल मीडिया में वायरल हो गईं। प्रोटोकॉल तोड़ने और वीवीआईपी विजिट में इस तरह की असहज शैली को लेकर भारी बवाल मचा। तत्कालीन रमन सिंह सरकार को मजबूरन नोटिस जारी करना पड़ा था।

इसके अलावा, मीडिया में उनकी एक और यूएसपी खूब गाई जाती है कि भाई, ये तो 'सबसे अमीर आईएएस' हैं—जिनका परिवार रियल एस्टेट के बड़े कारोबार से जुड़ा है, जिनकी पत्नी एक कमर्शियल पायलट हैं, और जो शुरुआती दिनों में अपनी सेवा के नाम पर सिर्फ ₹1 (एक रुपया) सैलरी लेने का दावा करते थे।

लेकिन सवाल यह है कि एक रुपये की सांकेतिक सैलरी लेने का दिखावा करने वाले या करोड़ों की संपत्ति के मालिक होने का गुरूर रखने वाले, क्या जनता के प्रति अपनी जवाबदेही भूल गए हैं? क्या एक करोड़पति या दबंग अफसर होने का मतलब यह है कि आप जनप्रतिनिधियों को अपमानित करेंगे और अदालत के आदेशों को कचरे के डिब्बे में डाल देंगे?

लोकतंत्र में संविधान सबसे ऊपर है। यहाँ न तो कोई नेता सर्वसर्वा है और न ही कोई आईएएस अधिकारी कानून से ऊपर है। जनप्रतिनिधि जनता की आवाज होते हैं और अदालत न्याय का मंदिर। अगर नौकरशाही इसी तरह अहंकार में चूर होकर "जो करना है कर लो" की भाषा बोलने लगेगी, तो आम जनता का इस तंत्र से भरोसा उठ जाएगा।

हाईकोर्ट के इस ताजा नोटिस ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं, चाहे आप कितने भी पावरफुल कुर्सी पर क्यों न बैठे हों।

अब देखना यह होगा कि स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया और बाकी अधिकारी कोर्ट के इस डंडे के आगे क्या जवाब देते हैं, और सरकार इस बेलगाम होती प्रशासनिक संस्कृति पर लगाम लगाती है या नहीं।

आपकी इस पूरे मामले पर क्या राय है? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी बेबाक राय जरूर लिखिए। क्या ऐसे अधिकारियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए या नहीं?


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सीजी में युवा सिर्फ वोट देने की मशीन

 सीजी में युवा सिर्फ वोट देने की मशीन 


क्या इस देश और राज्य में युवा सिर्फ वोट देने के लिए रह गए हैं? क्या नौकरियां अब सिर्फ चुनावी घोषणापत्रों के पन्नों तक सीमित रहेंगी?

आज हम बात कर रहे हैं उन लाखों युवाओं की, जिन्होंने दिन-रात एक करके पढ़ाई की, परीक्षा दी, और अब सिर्फ रिजल्ट, जॉइनिंग और नई भर्तियों के लिए सड़कों पर धक्के खा रहे हैं। कभी कोर्ट का सहारा, कभी रोस्टर में गड़बड़ी, कभी जांच का बहाना और कभी-कभी तो प्रशासनिक ताने-बाने में फाइलों का खो जाना! आखिरकार कब तक युवाओं के भविष्य के साथ यह खिलवाड़ चलता रहेगा?

आज के इस विशेष रिपोर्ट में हम एक-एक करके बात करेंगे:

  1. विश्वविद्यालय भर्तियों में आरक्षण और रोस्टर की गड़बड़ी का जो नया मामला सामने आया है।
  2. डी.एड (D.Ed/D.El.Ed) अभ्यर्थियों का आंदोलन और उनकी मांगें।
  3. ASI भर्ती के 1500 पदों की अटकी हुई सूची।
  4. 57,000 शिक्षक भर्ती की गारंटी और अतिथि शिक्षकों (Guest Teachers) का अनिश्चित भविष्य।

अगर आप भी इनमें से किसी भर्ती का इंतजार कर रहे हैं या युवाओं के इस हक की लड़ाई में साथ हैं, तो इस वीडियो को अंत तक जरूर देखें और शेयर करें।"

विश्वविद्यालयों में भर्ती गड़बड़ी और जांच का पेंच

"सबसे पहले नजर डालते हैं हाल ही में सामने आए विश्वविद्यालय भर्ती विवाद पर। राज्यपाल सचिवालय के आदेशानुसार, विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक पदों की भर्ती से लेकर भवन निर्माण और रखरखाव कार्यों में कथित अनियमितताओं की शिकायतों का संज्ञान लिया गया है। कुलाधिपति ने इसकी जांच और प्रगति का निरीक्षण करने के निर्देश दिए हैं।

लेकिन शिकायतें क्या हैं? जरा गौर से सुनिए:

  • आरक्षण और रोस्टर में गड़बड़ी: पदों के आरक्षण में तय नियमों की अनदेखी की गई।
  • स्वीकृत पदों से ज्यादा का विज्ञापन: जितने पद स्वीकृत नहीं थे, उससे अधिक पर विज्ञापन निकाल दिए गए।
  • रोस्टर में मनमाना बदलाव: प्रक्रिया के बीच में ही तय रोस्टर को बदल दिया गया।
  • कार्य परिषद (Executive Council) की बिना मंजूरी: भर्ती प्रक्रिया को आगे बढ़ा दिया गया।

इसके अलावा बैकलॉग पद, शिक्षकों की पदोन्नति और वेतन संरक्षण जैसे कई मुद्दे इसमें शामिल हैं। अब सवाल यह उठता है कि जब विज्ञापन निकाला जाता है, तब जिम्मेदार अधिकारी इन नियमों को क्यों भूल जाते हैं? क्या यह जानबूझकर किया जाता है ताकि मामला कोर्ट या जांच में अटके और भर्ती लटक जाए?"

 डी.एड (D.Ed) अभ्यर्थी और 57,000 शिक्षकों का वादा

: "अब बात करते हैं शिक्षा विभाग की। चुनावों के समय 57,000 शिक्षकों की भर्ती की गारंटी और वादे बड़े-बड़े मंचों से किए गए थे। लेकिन धरातल पर क्या है?

डी.एड (D.Ed) अभ्यर्थी आज सड़कों पर आंदोलन करने को मजबूर हैं। न्यायालय के फैसलों के बावजूद, प्राथमिक शिक्षक भर्तियों में डी.एड अभ्यर्थियों को उनका हक समय पर नहीं मिल पा रहा है। काउंसिलिंग, दस्तावेज सत्यापन और फिर अंतिम सूची जारी करने में महीनोंलगा दिए जाते हैं।

दूसरी तरफ, जो अतिथि शिक्षक (Guest Teachers) सालों से बेहद कम मानदेय पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं, उनका भविष्य भी अधर में है। न तो नई नियमित भर्तियां पूरी हो पा रही हैं और न ही अतिथि शिक्षकों के समायोजन को लेकर कोई ठोस नीति बन पा रही है। नतीजा यह है कि स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं और योग्य अभ्यर्थी सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं।"

ASI भर्ती के 1500 पद और रुकी हुई अन्य परीक्षाएं

"शिक्षकों के बाद अब आइए पुलिस महकमे और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की ओर। ASI (सहायक उपनिरीक्षक) भर्ती के लगभग 1500 पदों की चयन सूची महीनों से लटकी हुई है। अभ्यर्थियों ने शारीरिक दक्षता (Physical Test), लिखित परीक्षा सब पार कर लिया। लेकिन चयन सूची जारी क्यों नहीं हो रही? इसका कोई ठोस जवाब किसी विभाग के पास नहीं है।

यही हाल कई अन्य व्यावसायिक और लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं का है:

  • किसी परीक्षा का रिजल्ट रोक दिया जाता है।
  • किसी में मॉडल आंसर-की को लेकर विवाद खड़ा हो जाता है।
  • तो किसी भर्ती प्रक्रिया पर कोर्ट का स्टे (Stay) लग जाता है।

युवा सालों-साल अपने घर-परिवार से दूर रहकर, किराए के कमरों में तंगी की जिंदगी जीकर तैयारी करते हैं। लेकिन जब परीक्षा का परिणाम ही सालों तक न आए, तो उनकी मानसिक स्थिति क्या होगी, इसका अंदाजा किसी अधिकारी या राजनेता को शायद नहीं है।"

लेट-लतीफी' का पैटर्न और युवाओं का नुकसान

"दोस्तों, अगर आप ध्यान से देखें तो हर भर्ती में एक जैसा पैटर्न नजर आता है:

  1. पहले बड़ी धूमधाम से भर्ती का विज्ञापन निकाला जाता है।
  2. फॉर्म भरवाकर करोड़ों रुपये की फीस जमा की जाती है।
  3. फिर रोस्टर या आरक्षण में ऐसी खामियां छोड़ दी जाती हैं, जिससे मामला कोर्ट चला जाए।
  4. और फिर मामला जांच, कोर्ट और प्रशासनिक कमेटियों के चक्कर में सालों तक घूमता रहता है।

इस पूरे खेल में नुकसान किसका होता है? नुकसान उस युवा का होता है जिसकी उम्र सीमा (Age Limit) धीरे-धीरे खत्म हो रही है। नुकसान उस गरीब मां-बाप का होता है जो पेट काटकर अपने बच्चे को पढ़ा रहे हैं।"

"सरकार और प्रशासन को यह समझना होगा कि युवा सिर्फ वोट बैंक नहीं हैं। भर्तियों में पारदर्शिता, समयबद्ध चयन प्रक्रिया और रोस्टर का सही पालन प्रशासन की पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए।

  • 1500 ASI पदों की रुकी हुई सूची तुरंत जारी हो!
  • डी.एड अभ्यर्थियों और शिक्षक भर्ती की मांगों का पारदर्शी हल निकले!
  • 57,000 शिक्षक पदों के वादे पर अमल शुरू हो!
  • और विश्वविद्यालयों में जो गड़बड़ियां हुई हैं, उनकी निष्पक्ष जांच करके दोषियों पर कार्रवाई हो और सही अभ्यर्थियों को मौका मिले!

आपकी इस पूरे मुद्दे पर क्या राय है? क्या आप भी इनमें से किसी भर्ती के अटकने से प्रभावित हुए हैं? कमेंट सेक्शन में अपनी बात जरूर रखें।

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