शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

BJP-RSS सर्वे और विधायकों पर संकट

 BJP-RSS सर्वे और विधायकों पर संकट


राजनीति में जो बाहर दिखता है, अक्सर पर्दे के पीछे कहानी बिल्कुल अलग होती है। जनता सोचती है कि सरकार आराम से चल रही है, लेकिन अंदर ही अंदर चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है।

आज की यह खबर सत्ता के गलियारों से छनकर बाहर आई है, जिसने कई दिग्गज विधायकों और मंत्रियों की नींद उड़ा दी है। खबर है— भाजपा और संघ यानी RSS के एक बड़े अंदरूनी सर्वे की!

दावा किया जा रहा है कि इस गुप्त सर्वे की रिपोर्ट हाईकमान की टेबल पर पहुँच चुकी है, और रिपोर्ट में कई विधायकों का 'रिपोर्ट कार्ड' पूरी तरह से लाल निशान (Red Zone) में दिख रहा है। यानी आसान शब्दों में कहें तो— कई मौजूदा विधायकों की हालत बेहद खराब है!

आज के इस रिपोर्ट में हम परत-दर-परत समझेंगे कि आखिर इस सर्वे में क्या निकला है? किन वजहों से विधायकों का ग्राउंड रिपोर्ट कार्ड खराब हुआ? और क्या वास्तव में आगामी चुनाव में 30 से 40% विधायकों के टिकट कटने वाले हैं? वीडियो को अंत तक देखिएगा, क्योंकि आंकड़े और विश्लेषण चौंकाने वाले हैं!"

मुख्य मुद्दा: संघ का सर्वे और हाईकमान की सख्ती

"सबसे पहले यह समझते हैं कि RSS और BJP का यह सर्वे काम कैसे करता है। आपको पता होगा कि भारतीय जनता पार्टी किसी भी चुनाव को हल्के में नहीं लेती। चाहे सरकार बने 6 महीने हुए हों या 3 साल, संघ और पार्टी की टीमें लगातार ग्राउंड लेवल पर जनता की नब्ज टटोलती रहती हैं।

इस बार जो अंदरूनी फीडबैक आया है, वह पार्टी के आलाकमान के लिए चिंता का विषय बन गया है। सूत्रों की मानें तो इस सर्वे में तीन मुख्य बिंदुओं पर विधायकों को आंका गया है:

  1. जनता के बीच सक्रियता (Accessibility): चुनाव जीतने के बाद विधायक अपने क्षेत्र की जनता से कितना मिल रहे हैं? क्या उनके फोन उठते हैं या कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर दिया गया है?
  2. प्रशासनिक छवि और एंटी-इन्कंबेंसी (Anti-Incumbency): क्या विधायक पर भ्रष्टाचार, अधिकारियों पर अनावश्यक दबाव बनाने या स्थानीय गुटबाजी बढ़ाने के आरोप लग रहे हैं?
  3. संगठन से तालमेल: विधायक का अपनी ही पार्टी के स्थानीय मंडल और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं के साथ व्यवहार कैसा है?

रिपोर्ट्स बताती हैं कि पहली बार जीतकर आए कई नए विधायकों से लेकर कुछ सीनियर और कद्दावर नेताओं तक की रिपोर्ट बेहद चिंताजनक पाई गई है। कई क्षेत्रों में जनता के बीच यह संदेश जा रहा है कि विधायक बनने के बाद नेता जी सिर्फ ट्रांसफर-पोस्टिंग और सरकारी प्रोजेक्ट्स के लेन-देन में व्यस्त हो गए हैं।"

विधायकों की हालत क्यों खराब हुई?

अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि चुनाव के बाद इतनी जल्दी विधायकों का ग्राफ गिरने लगा? राजनीति के जानकारों के अनुसार इसके 4 बड़े कारण हैं:

पहला कारण— पहली बार के विधायकों का आक्रामक और गैर-जिम्मेदाराना रवैया: कई क्षेत्रों में नए और युवा विधायक बने नेताओं ने आते ही प्रशासनिक अधिकारियों से सीधे टकराव मोल ले लिया या सार्वजनिक मंचों पर विवादित बयानबाजी शुरू कर दी। जनता और पार्टी हाईकमान दोनों को आक्रामक बयानों से ज्यादा 'डिलिवरी और सुशासन' की उम्मीद होती है।

दूसरा कारण— धरातल से दूरी और कार्यकर्ताओं का असंतोष: चुनाव जिताने वाला असली सिपाही 'बूथ कार्यकर्ता' होता है। सर्वे में यह बात निकलकर आई है कि जीतने के बाद कई विधायकों ने उन कार्यकर्ताओं को पूछना बंद कर दिया जिन्होंने दिन-रात एक करके वोट दिलवाए थे। कार्यकर्ताओं का यही असंतोष संघ के फीडबैक में साफ छलका है।

तीसरा कारण— गुटबाजी और स्थानीय भ्रष्टाचार: कई जिलों में स्थानीय संयंत्रों, ठेकेदारी, खदानों और विकास कार्यों में वर्चस्व को लेकर विधायक और उनके करीबियों पर उंगलियां उठ रही हैं।

चौथा कारण— 'मोदी/ब्रांड' के भरोसे रहने की आदत: बहुत से विधायकों को लगता है कि 'हम तो बड़े चेहरे या पार्टी के निशान के नाम पर जीत ही जाएंगे, हमें क्षेत्र में काम करने की क्या जरूरत?' लेकिन संघ का साफ मानना है कि जब तक स्थानीय विधायक की छवि साफ नहीं होगी, तब तक केवल शीर्ष नेतृत्व के भरोसे हर बार चुनाव नहीं जीता जा सकता।"

बड़ा सवाल: क्या वास्तव में कटेंगे 30-40% टिकट?

अब आते हैं सबसे अहम सवाल पर— क्या वास्तव में इन विधायकों के टिकट कटने जा रहे हैं?

अगर हम बीजेपी के पिछले 10 सालों के ट्रैक रिकॉर्ड को देखें—चाहे गुजरात हो, मध्य प्रदेश हो, राजस्थान हो या अन्य राज्य—बीजेपी हाईकमान टिकट काटने में जरा भी संकोच नहीं करता। गुजरात में तो पार्टी ने चुनाव से पहले पूरी की पूरी कैबिनेट और दर्जनों विधायकों के चेहरे बदल दिए थे।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार भी जो सर्वे सामने आया है, वह एक तरीके से विधायकों के लिए 'वेक-अप कॉल' (चेतावनी) है।

  • रेड जोन में मौजूद विधायक: अगर इन्होंने अगले कुछ महीनों में अपनी कार्यशैली नहीं सुधारी, जनता के बीच जाकर माफी या समन्वय नहीं बनाया, तो इनका पत्ता कटना तय माना जा रहा है।
  • वरिष्ठ नेताओं पर असर: जो बुजुर्ग या बहुत लंबे समय से विधायक हैं, उनके क्षेत्र में एंटी-इन्कंबेंसी काटने के लिए पार्टी 'उम्र और नए चेहरों' का फॉर्मूला लागू करके उनका टिकट काट सकती है।
  • नए विधायकों पर नजर: पहली बार के विधायकों को अपनी परफॉर्मेंस सुधारने का एक मौका दिया जाएगा, लेकिन अगर संगठन के खिलाफ शिकायतें जारी रहीं तो हाईकमान दूसरा विकल्प ढूंढने में देरी नहीं करेगा।"

"कुल मिलाकर, भाजपा और संघ के इस अंदरूनी सर्वे ने एक बात साफ कर दी है कि अब सिर्फ चुनाव जीतने से काम नहीं चलेगा, हर दिन जनता की कसौटी पर खरा उतरना पड़ेगा। जो विधायक परफॉर्म करेंगे, वे टिकेंगे; और जिनकी रिपोर्ट खराब है, उनके सिर पर टिकट कटने की तलवार लटकती रहेगी।

अब आप लोग मुझे कमेंट करके बताइए— आपके क्षेत्र के विधायक का काम कैसा है? क्या आपके विधायक जी जनता के बीच रहते हैं या उनकी भी हालत इस सर्वे के मुताबिक खराब चल रही है? अपने विधायक का नाम और अपने जिले का नाम कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।

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शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

बस्तर में अब इस लाल आतंक का कहर

 

बस्तर में अब इस लाल आतंक का कहर 


जब भी हम बस्तर का नाम सुनते हैं, हमारे ज़हन में गोलियों की गूँज, जंगलों की खामोशी और 'लाल आतंक' यानी नक्सलवाद की तस्वीर उभरती है। प्रशासनिक दावों की मानें तो बस्तर अब नक्सलमुक्त होने की राह पर है, बंदूकें शांत हो रही हैं और लाल आतंक का साया छँट रहा है।

लेकिन क्या बस्तर सच में लाल आतंक से मुक्त हो चुका है? कड़वी सच्चाई यह है कि बंदूक का लाल आतंक भले कम हो गया हो, लेकिन पानी का लाल आतंक आज भी बस्तर के फेफड़ों को घोंट रहा है। एक ऐसा लाल आतंक, जिसे किसी हथियार की ज़रूरत नहीं है—यह बहता है नदियों में, घुलता है गाँव वालों के पीने के पानी में, और चुपचाप लील रहा है आने वाली नस्लों को।

आज हम बात कर रहे हैं दंतेवाड़ा की शंखिनी और डंकिनी नदियों की—वे नदियाँ जो कभी बस्तर की जीवनरेखा थीं, लेकिन आज बैलाडीला की खदानों के 'रेड ऑक्साइड' और कचरे की वजह से खूनी लाल हो चुकी हैं।"

50-60 गाँवों की दास्तान

"शंखिनी और डंकिनी के इस विषैले लाल फेर में कोई एक-दो गाँव नहीं, बल्कि 50 से 60 गाँव फँसे हुए हैं। भांसी, गदापाल, गामवाड़े, बचेली, नेरली, मटेन, किरंदुल से लेकर दंतेवाड़ा के निचले मैदानी इलाकों तक फैली पूरी आबादी इस लाल पानी का अभिशाप झेल रही है।

सोचिए, जिस नदी के संगम पर प्रसिद्ध माँ दंतेश्वरी का पावन मंदिर स्थित है, उस नदी का पानी छूने लायक भी नहीं बचा।

  • गाँव की औरतें पीने के पानी के लिए किलोमीटर दूर भटकने को मजबूर हैं।
  • जो इस पानी को पीते हैं, वे पेट के गंभीर रोगों और लिवर की बीमारियों का शिकार हो रहे हैं।
  • पशु-पक्षी यह पानी पीकर मर रहे हैं।
  • और सबसे भयानक—इन नदियों का लाल पानी जब खेतों में घुसता है, तो लहलहाती फसलें सड़ जाती हैं और ज़मीन हमेशा के लिए बंजर हो जाती है।"

विकास की कीमत और रेड ऑक्साइड का ज़हर

आखिर यह नदियाँ इतनी लाल कैसे हुईं? इसकी शुरुआत होती है बैलाडीला की पहाड़ियों से—जहाँ देश का सबसे बेहतरीन लोहा पाया जाता है। एनएमडीसी (NMDC) और खनन गतिविधियों के कारण लोहे का बारीक चूर्ण यानी 'रेड ऑक्साइड' और वाशिंग का कचरा सीधे शंखिनी नदी में बहा दिया जाता है।

शंखिनी आगे जाकर डंकिनी से मिलती है, और दोनों मिलकर इस पूरे अंचल को लाल रंग में रंग देती हैं। कभी शंखिनी का पानी इतना साफ हुआ करता था कि नदी की तली का शंख भी साफ दिखता था—इसीलिए इसका नाम शंखिनी पड़ा। लेकिन आज यह देश की सबसे प्रदूषित नदियों में से एक मानी जाती है।

देश को यहाँ के लोहे से इंफ्रास्ट्रक्चर मिला, तरक्की मिली, अरबों का राजस्व मिला... लेकिन यहाँ के आदिवासियों को क्या मिला? लाल पानी, बीमारियाँ और अपनी ही ज़मीन पर बेबसी।"

बंदूकों से बड़ा संकट - 'धीमा ज़हर'

"लोग कहते हैं कि नक्सलवाद ने बस्तर को पीछे धकेला। यह बात सच है। लेकिन यह 'पानी का लाल आतंक' नक्सलवाद से भी ज्यादा खतरनाक है। नक्सली हमला सामने से होता है, लेकिन प्रदूषित पानी का यह ज़हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा करके पूरे परिवार को खत्म करता है।

  • स्वास्थ्य संकट: त्वचा के रोग, अपंगता, और असमय मौत यहाँ के कई गाँवों में आम बात हो चुकी है।
  • आर्थिक मार: किसान अब खेती नहीं कर पा रहे क्योंकि मिट्टी में लोहे की परत जम चुकी है।
  • प्रशासनिक उपेक्षा: सालों से वाटर फ़िल्टर प्लांट और पाइपलाइन के वादे किए गए, कई योजनाएं बनीं, पर 50 से अधिक गाँवों की ज़मीनी हकीकत आज भी नहीं बदली।"

"अगर बस्तर को सच में 'मुक्त' करना है, तो उसे सिर्फ बंदूकों से नहीं, बल्कि इस लाल पानी के ज़हर से भी आज़ाद कराना होगा। जब तक शंखिनी और डंकिनी फिर से नीली और साफ़ नहीं होतीं, तब तक बस्तर के आदिवासियों के लिए 'लाल आतंक' कभी खत्म नहीं होगा।

क्या विकास की कीमत हमेशा आदिवासियों के जीवन और उनकी नदियों को देकर ही चुकाई जाएगी? यह सवाल हम प्रशासन और सरकार से पूछते हैं।

आपकी इस मुद्दे पर क्या राय है? कमेंट करके ज़रूर बताएं।

क्या गरीब बच्चों को अनपढ़ रखना चाहती है सरकार?

 शिक्षा का सच - क्या गरीब बच्चों को अनपढ़ रखना चाहती है सरकार?


अगर आपके घर में कोई बच्चा है, तो अगले कुछ मिनट अपनी आँखें और कान खोलकर इस खबर को सुनिए और देखिए। क्योंकि जो सच आज मैं आपको बताने जा रहा हूँ, वो यह साबित करने के लिए काफी है कि इस देश में गरीब के बच्चे को पढ़ाना तो दूर, उसे सुरक्षित माहौल में जीने तक का अधिकार नहीं दिया जा रहा है!"

"एक तरफ सरकारी स्कूलों के भवन जर्जर हैं, जंग लगे गेट कभी भी बच्चों के सिर पर गिर सकते हैं, आए दिन हादसे हो रहे हैं, स्कूलों में शिक्षक तक नहीं हैं! और दूसरी तरफ? दूसरी तरफ सरकार का कारनामा देखिए—RTE यानी Right to Education (शिक्षा का अधिकार) के तहत मिलने वाली मुफ़्त सीटों में सीधे-सीधे 59 हजार सीटों की कटौती कर दी गई!

जी हाँ, आपने बिल्कुल सही सुना! जहाँ 85 हजार बच्चों को निजी स्कूलों में मुफ्त शिक्षा मिलनी चाहिए थी, उसे घटाकर सीधे 26 हजार कर दिया गया! आखिर क्यों? क्या सरकार नहीं चाहती कि गरीब का बच्चा पढ़े? क्या शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव जी के पास इस बात का कोई जवाब है? आज हम खोलेंगे इस पूरी व्यवस्था की पोल!"

"चलिए सबसे पहले बात करते हैं सरकारी स्कूलों के ज़मीनी हालात की। दोस्तों, आज देश के तमाम सरकारी स्कूलों का हाल यह है कि भवन जर्जर हो चुके हैं। छतों से प्लास्टर गिरता है, दीवारों में दरारें हैं, और स्कूल के जो मेन गेट हैं, वे जंग खाकर इस कदर सड़ चुके हैं कि वे कभी भी मासूम बच्चों पर गिर सकते हैं। देश के कई राज्यों से लगातार ऐसी खबरें आ रही हैं जहाँ स्कूल का गेट गिरने या छज्जा गिरने से बच्चों की जान पर बन आई है।

सवाल यह है कि जब सरकार के पास बड़े-बड़े विज्ञापनों और नेताओं की गाड़ियों के काफिले के लिए करोड़ों का फंड है, तो इन मासूम बच्चों की सुरक्षा के लिए, बाउंड्रीवाल और गेट की मरम्मत के लिए बजट क्यों नहीं है?

और बात सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर की नहीं है, शिक्षकों की भी भारी कमी है। एक-एक शिक्षक के भरोसे पूरा-पूरा स्कूल चल रहा है। क्या ऐसे पढ़ेगा इंडिया? क्या यही है वो मॉडल जिसकी कसमें खाई जाती हैं?"

"सरकारी स्कूल तो तबाह कर दिए गए, लेकिन जो गरीब परिवार अपने बच्चों को 'राइट टू एजुकेशन' (RTE) के तहत अच्छे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना चाहते थे, उनके सपनों पर भी सरकार ने हथौड़ा चला दिया है।

स्क्रीन पर इस डेटा को ध्यान से देखिए— RTE के तहत जो सीटें पहले 85 हजार हुआ करती थीं, उन्हें इस साल घटाकर सीधे 26 हजार कर दिया गया! यानी लगभग 59 हजार गरीब बच्चे निजी स्कूलों में मुफ़्त पढ़ाई के अवसर से महरूम कर दिए गए!

यह आंकड़ा कोई हवा-हवाई नहीं है। इस फैसले के खिलाफ खुद प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन मैदान में उतर आई है!

प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव गुप्ता ने साफ शब्दों में इस फैसले का विरोध करते हुए कहा है कि 'RTE का मुख्यमकसद गरीब परिवारों के बच्चों को बड़े और गुणवत्तापूर्ण निजी स्कूलों में पढ़ाई का मौका देना है।' जब आप सीटें ही खत्म कर देंगे, तो ये गरीब बच्चे कहाँ जाएँगे?

और सबसे शर्मनाक बात जानते हैं आप क्या है? प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन इस मामले को लेकर हाई कोर्ट पहुँच गई है! जब कोर्ट में शिक्षा विभाग से जवाब माँगा गया, तो सरकार ने क्या दलील दी? सरकार का कहना है कि—'पैसों की कमी है!'"

"पैसों की कमी?! माननीय शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव जी, आपसे पूरा देश और गरीब जनता यह सवाल पूछ रही है— जब नेताओं के भत्तों की बात आती है, जब चुनाव प्रचार के बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाने होते हैं, जब मंत्रियों के बंगलों का नवीनीकरण होता है, तब पैसों की कमी क्यों नहीं होती? लेकिन जब गरीब के बच्चे को मुफ्त और अच्छी शिक्षा देने की बात आती है, तो आपके पास बजट नहीं होता?

गजेंद्र यादव जी, जब आपने शिक्षा मंत्री का पद संभाला था, तब आपने बड़े-बड़े दावे किए थे। लेकिन आज आपके कार्यकाल में—

  1. सरकारी स्कूल हादसों का अखाड़ा बने हुए हैं, गेट टूटने की कगार पर हैं।
  2. स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं।
  3. और RTE के तहत 59,000 गरीब बच्चों की सीटें छीन ली गईं!

क्या आप यह बताना चाहेंगे कि ये 59,000 बच्चे अब कहाँ जाएँगे? क्या सरकार यह मान चुकी है कि गरीब का बच्चा सिर्फ मजदूरी करने के लिए पैदा हुआ है? शिक्षा मंत्री जी, अगर आप गरीब बच्चों को सुरक्षित स्कूल और मुफ़्त शिक्षा नहीं दे सकते, तो इस कुर्सी पर बैठने का आपको क्या नैतिक अधिकार है?"

संविधान हमें समानता और शिक्षा का अधिकार देता है। लेकिन जब सरकारें RTE जैसी योजनाओं का गला घोंटने लगें और सरकारी स्कूलों को खंडहर बनने के लिए छोड़ दें, तो समझ जाइए कि नियत में खोट है।

अगर गरीब का बच्चा पढ़-लिख गया, तो वो अपने अधिकारों के लिए सवाल पूछेगा। और शायद यही वजह है कि सरकारें शिक्षा पर खर्च करने से कतराती हैं।

प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन कोर्ट गई है, लेकिन इस देश की सबसे बड़ी अदालत आप हैं—'जनता की अदालत'। अगर आज हम और आप शांत रहे, तो कल यह 26 हजार सीटें घटकर शून्य हो जाएँगी।

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गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

छत्तीसगढ़ में 'धान' का महाघोटाला!

 छत्तीसगढ़ में 'धान' का महाघोटाला!


 1 लाख मीट्रिक टन धान गायब, अमानक चावल और PMO तक पहुंची फाइल... कहां दबा दी गई जांच?

छत्तीसगढ़ को 'धान का कटोरा' कहा जाता है... लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसी धान के कटोरे में भ्रष्टाचार का ऐसा 'दीमक' लगा है, जो सरकारें बदलने के बावजूद खत्म होने का नाम नहीं ले रहा?

जिस प्रदेश में किसान खून-पसीना बहाकर धान उगाता है, उसी प्रदेश में हवा में 1 लाख मीट्रिक टन धान (यानी 10 लाख क्विंटल धान) गायब हो जाता है! और खेल सिर्फ धान गायब होने का नहीं है दोस्तों... गोदामों में अमानक (खराब) चावल खपाया जा रहा है, करोड़ों के घोटाले के आरोप लग रहे हैं, शिकायतें खाद्य विभाग से लेकर सीधे PMO (प्रधानमंत्री कार्यालय) तक पहुंच रही हैं... लेकिन 5 महीने बीत जाने के बाद भी जांच रिपोर्ट का कोई अता-पता नहीं है!

आज के इस वीडियो में हम छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में चल रहे 'धान और चावल के सबसे बड़े खेल' का कच्चा चिट्ठा खोलने वाले हैं। वीडियो पूरा देखिएगा, क्योंकि जो सच आज आप सुनेंगे, वो आपको सोचने पर मजबूर कर देगा!"

1 लाख मीट्रिक टन धान और हेलेना तिग्गा का मामला

सबसे पहले बात करते हैं हाल ही में सामने आई उस खबर की जिसने प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मचा दिया है।

खबरों के मुताबिक, नागरिक आपूर्ति निगम (नान) रायपुर की प्रभारी हेलेना तिग्गा पर करोड़ों रुपये के घोटाले के गंभीर आरोप लगे हैं। आरोप क्या हैं? आरोप यह है कि गोदामों में अमानक, यानी खराब और घटिया स्तर का चावल जमा कराया गया।

अब जरा सोचिए! जब गरीबों के राशन और धान खरीदी के नाम पर करोड़ों रुपये का बजट बनता है, तो वहां खराब चावल गोदामों में कैसे पहुंच जाता है? इसकी लिखित शिकायत सीधे राज्य के खाद्य विभाग से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) तक भेजी गई! मामला इतना बड़ा था कि अवर सचिव ने पूरे मामले पर 7 दिनों के अंदर जांच रिपोर्ट मांगी थी।

लेकिन 7 दिन छोड़िए दोस्तों... आज 5 महीने बीत चुके हैं! 5 महीने! ना जांच रिपोर्ट का पता है, ना किसी बड़े चेहरे पर कार्रवाई का! सवाल यह है कि 7 दिन की रिपोर्ट 5 महीने तक ठंडे बस्ते में किसकी शह पर दबाकर रखी गई है? क्या प्रशासनिक लीपापोती चल रही है या किसी बड़े आका को बचाने का खेल हो रहा है?"

'हवा में उड़ गया धान!'

"और मामला सिर्फ अमानक चावल तक सीमित रहता तो शायद बात अलग होती... असली धमाका तो तब हुआ जब धान खरीदी के बाद आंकड़े मिलाए गए!

छत्तीसगढ़ के राइस मिलों और सोसायटियों से 1 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा धान गायब पाया गया! 1 लाख मीट्रिक टन... जानते हैं इसका मतलब क्या होता है? सैकड़ों-हजारों ट्रकों में भरकर धान गायब हो गया और किसी को कानों-कान खबर नहीं हुई?

यह 1 लाख मीट्रिक टन धान कहां गया?

  • क्या कागजों में फर्जी खरीदी दिखाई गई थी?
  • क्या राइस मिलरों और बिचौलियों के साथ मिलकर धान का गोलमाल कर दिया गया?
  • या फिर सोसायटियों से धान सीधे काले बाजार में बेच दिया गया?

यह कोई छोटा-मोटा शॉर्टेज नहीं है, यह सीधे-सीधे करोड़ों रुपये की सरकारी संपत्ति पर डकैती है! किसान धूप में सड़कर धान बेचता है, और यहां सिस्टम के अंदर बैठे 'दीमक' कागजों में ही पूरा का पूरा धान डकार जाते हैं!"

चाहे सरकार किसी की हो, 'खेल' वही है!

"अब जरा इसका राजनीतिक पहलू समझिए दोस्तों! छत्तीसगढ़ में 'नान घोटाला' (NAN Scam) कोई नया शब्द नहीं है। 2015 का चर्चित नान घोटाला आपको याद ही होगा, जिसने पूरे प्रदेश की राजनीति में आग लगा दी थी। कांग्रेस जब विपक्ष में थी, तो उसने नान घोटाले को लेकर सड़क से संसद तक लड़ाई लड़ी। फिर 2018 में सत्ता में आई, तो जांच की बात हुई... लेकिन 5 साल निकल गए।

अब 2026 में, जब भारतीय जनता पार्टी की विष्णु देव साय सरकार सत्ता में है... तो सवाल उठना लाजमी है! विपक्ष में रहते हुए बीजेपी जिस पारदर्शिता की बात करती थी, आज उसी सरकार के राज में अगर 1 लाख मीट्रिक टन धान गायब हो रहा है और हेलेना तिग्गा जैसे मामलों में PMO की चिट्ठी के बावजूद 5 महीने तक जांच रिपोर्ट गायब रहती है, तो जवाबदेही किसकी बनती है?

विपक्ष आरोप लगा रहा है कि निचले स्तर के कर्मचारियों पर गाज गिराकर बड़े अफसरों और राइस मिलरों के सिंडिकेट को बचाया जा रहा है। वहीं सरकार का दावा रहता है कि हम जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम कर रहे हैं। लेकिन अगर नीति जीरो टॉलरेंस की है, तो 5 महीने से वो फाइल किसकी टेबल के नीचे दबी हुई है? जनता को यह जानने का हक है या नहीं?"

छत्तीसगढ़ का किसान आज भी बोनस और समर्थन मूल्य के इंतजार में रहता है, लेकिन सिस्टम के भीतर बैठा भ्रष्टाचार का यह ढांचा करोड़ों रुपये डकार जाता है।

चाहे पेपर लीक का मामला हो या फिर धान-चावल में करोड़ों की हेराफेरी... जब तक सख्त कार्रवाई सिर्फ छोटे मोहरों पर होगी और बड़ी मछलियां बचती रहेंगी, तब तक यह खेल ऐसे ही चलता रहेगा।

क्या आपको लगता है कि इस 1 लाख मीट्रिक टन धान गायब होने के मामले और नान रायपुर प्रभारी के मामले की निष्पक्ष CBI या स्वतंत्र एजेंसी से जांच होनी चाहिए? क्या 5 महीने तक फाइल दबाने वाले अफसरों पर कार्रवाई होनी चाहिए?

अपनी राय कमेंट सेक्शन में खुलकर लिखिए!

साड़ी घोटाले के आरोपियों को कौन बचा रहा

 साड़ी घोटाले के आरोपियों को कौन बचा रहा 



क्या इस देश में कानून सिर्फ आम जनता के लिए है? अगर कोई छोटा-मोटा व्यापारी या आम आदमी एक पैसे की भी गड़बड़ी कर दे, तो पुलिस और प्रशासन उसके पीछे हाथ धोकर पड़ जाता है। लेकिन जब मामला करोड़ों के घोटाले का हो, सीनियर IAS अफसरों और मंत्रियों के करीबियों का हो, तो फाइलें दबा दी जाती हैं!

छत्तीसगढ़ में बीते साल हुआ 'साड़ी घोटाला' याद है आपको? लगभग 9.70 लाख साड़ियों की खरीदी में जो बड़ा झोल हुआ था, उस पर अब एक साल बाद ऐसा पर्दा डाला जा रहा है जिसे देखकर आप भी हैरान रह जाएंगे। जांच खत्म, मामला ठंडे बस्ते में, और किसी एक भी व्यक्ति पर कोई कार्रवाई नहीं!

घोटाले की पूरी कहानी 

बात शुरू होती है छत्तीसगढ़ के महिला एवं बाल विकास विभाग और खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड से। राज्य की गरीब महिलाओं और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए साड़ियों की खरीदी का आदेश जारी हुआ। 9 लाख 70 हजार साड़ियों का बड़ा ऑर्डर दिया गया।

लेकिन जब साड़ियां पहुंचीं, तो पता चला कि खरीदी में बड़े पैमाने पर धांधली हुई है। साड़ियों की क्वालिटी से लेकर रेट्स तक में जमकर बंदरबांट की गई। जब मामला मीडिया में उछला, तो आनन-फानन में जांच के आदेश दिए गए। जनता को लगा कि इस बार तो भ्रष्टाचारियों को सजा मिलेगी, लेकिन जो सच सामने आया, वो प्रशासनिक लीपापोती का सबसे बड़ा उदाहरण है।"

कौन है ज़िम्मेदार?

"अब सबसे बड़ा सवाल: इस घोटाले की ज़िम्मेदारी किसकी थी? अगर आप अखबार की कटिंग्स और रिपोर्ट्स देखें, तो आरोप सीधे-सीधे मंत्री बंगले के पदस्थ अधिकारियों और सीनियर आईएएस अफसर पी.एल. एल्मा (P.L. Elma) पर उठे।

अब इसमें सबसे मजेदार और हास्यास्पद बात क्या है पता है? जिस वक्त यह खरीदी हुई, उस वक्त पी.एल. एल्मा साहब 'महिला एवं बाल विकास विभाग' के डायरेक्टर भी थे और 'खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड' के मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) भी!

यानि ध्यान से समझिए:

  1. साड़ी का सप्लाई ऑर्डर देने वाले कौन? - पी.एल. एल्मा!
  2. साड़ी की खरीदी करने और ऑर्डर रिसीव करने वाले कौन? - पी.एल. एल्मा!

एक ही अधिकारी ऑर्डर दे रहा है, वही अधिकारी खरीद रहा है, और जब घोटाला सामने आता है, तो साहब कहते हैं—'सप्लाई करने वालों को तो मैंने ही नोटिस दिया था, पेमेंट रोक दिया था, और अब तो मैं उस विभाग में हूं ही नहीं!' क्या बात है! खुद ही खरीदार, खुद ही सप्लायर के निरीक्षक, और जब जांच की बारी आई तो हाथ खड़े कर दिए!"

लीपापोती और सिस्टम का बचाव 

एक साल बीत गया है दोस्तों, पूरा एक साल! न तो किसी बड़े अफसर को आरोपी बनाया गया, न ही किसी मंत्री के बंगले में बैठे साहबों पर कोई आंच आई। नए आदेश जारी करके जांच को ऐसे समाप्त किया जा रहा है जैसे कुछ हुआ ही नहीं था।

  • मंत्री जी के करीबियों को बचा लिया गया।
  • कटघरे में खड़े अफसरों को सुरक्षित निकाल लिया गया।
  • और पूरे 9.70 लाख साड़ियों के इस खेल को कागजों में समेट दिया गया।

क्या जांच का मतलब सिर्फ इतना होता है कि मामला जब तक गर्म है, तब तक कमेटी-कमेटी खेलो, और जैसे ही जनता भूल जाए, मामले को रफा-दफा कर दो? जनता के टैक्स के पैसों का ऐसा मजाक कब तक चलेगा?"

"यह सिर्फ एक साड़ी घोटाले की बात नहीं है। यह उस ढर्रे की बात है जहां बड़े-बड़े अधिकारी और रसूखदार घोटालों पर कुंडली मारकर बैठ जाते हैं और कार्रवाई के नाम पर शून्य सन्नाटा छा जाता है।

  • अगर आईएएस अफसर और मंत्री बंगले के अधिकारी निर्दोष थे, तो जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?
  • अगर घोटाला हुआ था, तो 9.70 लाख साड़ियों के नुकसान की भरपाई किससे की जाएगी?
  • क्या किसी एक भी व्यक्ति पर कार्रवाई न होना यह साबित नहीं करता कि पूरे सिस्टम ने मिलकर अपनों को बचाया है?"

आपकी इस पूरे मामले पर क्या राय है? क्या आपको लगता है कि प्रशासनिक जांच सिर्फ एक छलावा बनकर रह गई है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखिए।

राष्ट्रपति के सामने बस्तर की परंपरा से फर्जीवाड़ा?

 

    • "राष्ट्रपति के सामने बस्तर की परंपरा से फर्जीवाड़ा?"
    • "काछन देवी विवाद: अफसरों की लापरवाही या परंपरा का अनादर?"

क्या देश की सर्वोच्च संवैधानिक कुर्सी पर बैठी देश की पहली आदिवासी राष्ट्रपति के सामने ही... बस्तर की 600 साल पुरानी लोक-आस्था और परंपरा का फर्जीवाड़ा कर दिया गया?

क्या वीआईपी प्रोटोकॉल, अपनी पीठ थपथपाने की होड़ और प्रशासनिक खानापूर्ति के चक्कर में अफसरों ने उस मासूम बच्ची का हक मार दिया, जिसने कांटों की सेज पर बैठकर बस्तर के सबसे बड़े त्योहार—बस्तर दशहरा की अनुमति दी थी?

जी हां! बस्तर दशहरा के इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि जिस 'काछन देवी' (मासूम बच्ची पीहू) ने कांटों के झूले पर बैठकर धार्मिक रस्म निभाई, उसे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से नहीं मिलवाया गया... बल्कि उनकी जगह किसी दूसरी बच्ची को 'काछन देवी' बनाकर राष्ट्रपति के सामने खड़ा कर दिया गया!

इस एक लापरवाही ने बस्तर के पनका समाज को आक्रोश से भर दिया है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या अब वीआईपी चमक-धमक के आगे हमारी सैकड़ों साल पुरानी परंपराएं छोटी पड़ गई हैं? आज बात इसी विवाद की, प्रशासनिक नाकामी की और उस सवाल की... जो पूरे बस्तर की अस्मिता से जुड़ा है!"

क्या है 'काछन गादी' की परंपरा? 

विवाद की गहराई को समझने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि 'काछन गादी' बस्तर के लिए सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि बस्तर की आत्मा है।

बस्तर का विश्वप्रसिद्ध 75 दिनों तक चलने वाला दशहरा... राजा-महाराजाओं के ज़माने से लेकर आज तक तब तक शुरू नहीं होता, जब तक 'काछन देवी' की अनुमति न मिले। और यह अनुमति कौन देती है? पनका समाज की एक छोटी सी मासूम बालिका, जिसके शरीर पर काछन देवी की सवारी आती है।

वह बच्ची नुकीले कांटों से बने झूले पर बैठती है, जिसे 'कांटों की सेज' कहा जाता है। वहां देवी की अनुमति स्वरूप फूल चढ़ाया जाता है और उसके बाद ही बस्तर दशहरा का आगाज़ होता है। इस साल भी यह पवित्र रस्म पूरी निष्ठा के साथ निभाई गई। पनका समाज की बेटी पीहू ने कांटों की सेज पर बैठकर यह रस्म पूरी की।

पूरा बस्तर इस रस्म के आगे शीश झुकाता है। लेकिन 23 अक्टूबर को जब देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू बस्तर दशहरा की प्रदर्शनी देखने जगदलपुर पहुंचीं... तो वहां एक ऐसा खेल खेला गया, जिसने आस्था पर करारी चोट की।"

23 और 24 अक्टूबर का पूरा घटनाक्रम 

"अब ध्यान से सुनिए कि आखिर जगदलपुर के लालबाग मैदान में हुआ क्या!

राष्ट्रपति का दौरा बस्तर के लिए ऐतिहासिक क्षण था। प्रशासन ने बस्तर की संस्कृति को दर्शाने के लिए प्रदर्शनी लगाई। यहां तक तो सब ठीक था। लेकिन जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 'काछन देवी' की झांकी/प्रदर्शनी के पास पहुंचीं, तो वहां क्या हुआ?

जिस बच्ची (पीहू) ने कांटों के झूले पर बैठकर वास्तविक धार्मिक विधान पूरा किया था, उसे वहां लाया ही नहीं गया! उसकी जगह किसी और बच्ची को 'काछन देवी' का प्रतीकात्मक रूप देकर राष्ट्रपति से मिलवा दिया गया और अफसरों ने तालियां बजवा दीं!

सोचिए... जिस परिवार और जिस समाज ने पीहू को देवी स्वरूपा मानकर हफ्तों का कड़ा नियम-संयम निभाया, जिस समाज की पहचान इस परंपरा से है, जब उन्हें पता चला कि राष्ट्रपति से किसी और बच्ची को मिलवा दिया गया है, तो उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

काछन गुड़ी के मुख्य पुजारी गणेश दास और पनका समाज के प्रतिनिधियों ने जब यह देखा, तो उनका गुस्सा फूट पड़ा। समाज ने इसे 'धोखेबाजी' और 'परंपरा का सीधा अपमान' करार दिया।

नाराजगी इतनी बढ़ी कि 24 अक्टूबर को होने वाली 'कांटे के झूले का विसर्जन' की रस्म को पनका समाज ने रोक दिया! समाज ने साफ कह दिया—'जिस बच्ची को राष्ट्रपति से मिलवाया है, अब विसर्जन भी उसी से करवा लो!' बस्तर के इतिहास में रस्म का इस तरह रुकना प्रशासनिक अधिकारियों के मुंह पर एक बहुत बड़ा तमाचा है!"

"इस पूरे मामले में अब लिपापोती की कोशिशें शुरू हो गई हैं। नेता आ रहे हैं, बयान दे रहे हैं कि 'हम दिल्ली ले जाकर राष्ट्रपति से मिलवा देंगे।' लेकिन सवाल यह है कि गलती बस्तर में हुई, तो सफाई दिल्ली के लॉलीपॉप से क्यों दी जा रही है?

आज इस रिपोर्ट के ज़रिए हम सरकार, स्थानीय प्रशासन और बस्तर दशहरा समिति से कुछ सीधे और तीखे सवाल पूछते हैं:

  1. पहला सवाल: क्या प्रशासनिक अधिकारियों के लिए बस्तर की 600 साल पुरानी परंपराएं सिर्फ एक 'इवेंट' या 'फोटो-ऑप' (Photo-op) बनकर रह गई हैं?
  2. दूसरा सवाल: किस अधिकारी के इशारे पर वास्तविक काछन देवी (पीहू) को दरकिनार किया गया? क्या यह सिर्फ लापरवाही है या इसके पीछे अपनी पसंदीदा एंट्री कराने का कोई वीआईपी खेल था?
  3. तीसरा सवाल: देश की राष्ट्रपति खुद एक आदिवासी समाज से आती हैं। बस्तर के आदिवासी और पारंपरिक समाजों की आस्था के साथ राष्ट्रपति के सामने ही ऐसा 'फर्जीवाड़ा' करके अफसरों ने राष्ट्रपति भवन की गरिमा को ठेस नहीं पहुंचाई?
  4. चौथा सवाल: जब पनका समाज ने विसर्जन रस्म रोक दी और बस्तर दशहरा के बहिष्कार की चेतावनी दी, तब जाकर जनप्रतिनिधि क्यों जागे? क्या बस्तर के रीति-रिवाजों की कोई कीमत अफसरों की नज़रों में नहीं है?
  5. पांचवां सवाल: 'दिल्ली में राष्ट्रपति से मिलवा देंगे'—यह आश्वासन देकर क्या मामले को दबाने की कोशिश हो रही है? दोषी अधिकारियों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई?"


 बस्तर दशहरा कोई आम मेला या सरकारी सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं है। यह सदियों पुरानी लोक-आस्था, संस्कृति और जनजातीय अस्मिता का प्रतीक है। जब प्रशासन इस तरह की परंपराओं में 'डमी' या फर्जी विकल्प खड़े करने लगता है, तो समाज का विश्वास टूटता है।

आज पनका समाज आहत है। मुख्य पुजारी आहत हैं। और बस्तर का हर वो नागरिक दुखी है जो इस परंपरा को अपनी पहचान मानता है।

अगर आज इस लापरवाही पर जवाबदेही तय नहीं हुई, अगर जिम्मेदार अफसरों पर गाज नहीं गिरी, तो कल को किसी और परंपरा के साथ ऐसा ही खिलवाड़ होगा।

आप इस पूरे विवाद पर क्या सोचते हैं? क्या प्रशासन की इस गंभीर लापरवाही पर सख्त से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए या नहीं? क्या 'दिल्ली ले जाकर मिलाने' का आश्वासन काफी है?

अपनी राय कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें।