मोदी के फैसले और छत्तीसगढ़ की बदहाली का सच
क्या छत्तीसगढ़ में आने वाले दिनों में कर्मचारियों को वेतन बांटना भी मुश्किल हो जाएगा? क्या राज्य 'बीमारू' राज्यों की श्रेणी में खड़ा होने की कगार पर है? यह मामला सिर्फ 'आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपैया' का नहीं है, बल्कि केंद्र और राज्य सरकार की उन नीतियों का है जिसने छत्तीसगढ़ को ₹1 लाख करोड़ से अधिक के कर्ज के दलदल में धकेल दिया है। आज बात करेंगे कि कैसे मोदी सरकार के फैसलों और डबल इंजन सरकार के वित्तीय कुप्रबंधन ने छत्तीसगढ़ को बदहाली की ओर मोड़ दिया है।
1. वन नेशन, वन टैक्स (GST) का असली झटका
[ग्राफिक्स/टेक्स्ट ऑन स्क्रीन: 1 जुलाई 2017 - जीएसटी का असर]
याद कीजिए 1 जुलाई 2017 का वो दिन, जब 'वन नेशन, वन टैक्स' के नाम पर देश में GST लागू किया गया था। दावा था कि इससे राज्यों को फायदा होगा, लेकिन छत्तीसगढ़ की हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।
GST लागू होने से पहले, छत्तीसगढ़ को टैक्स के रूप में हर तिमाही (Quarter) में ₹1,000 करोड़ से अधिक की शुद्ध और पक्की कमाई होती थी।
नुकसान की भरपाई के लिए केंद्र ने 'कंपनसेशन' (मुआवजा) देने का वादा किया था, लेकिन जून 2022 से मोदी सरकार ने इस कंपनसेशन को भी पूरी तरह बंद कर दिया।
आज स्थिति यह है कि राज्य को हर महीने औसतन सिर्फ ₹2,800 करोड़ से ₹3,200 करोड़ के बीच ही जीएसटी मिल रहा है, जो राज्य की जरूरतों के मुकाबले बेहद कम है। ऊपर से यह पैसा भी केंद्र से समय पर नहीं मिलता।
2. कोयला, लोहा और सीमेंट का नुकसान
[विजुअल: छत्तीसगढ़ के माइनिंग क्षेत्र और कारखाने]
छत्तीसगढ़ देश के प्रमुख कोयला और खनिज उत्पादक राज्यों में गिना जाता है। हमारी सबसे ज्यादा कमाई सीमेंट, कोयला और लोहे से होती है। लेकिन केंद्र के फैसलों के कारण कोयले पर जीएसटी का स्लैब सिर्फ 5% तय किया गया है, जिसने राज्य की कमाई के एक बड़े जरिए को सीमित कर दिया है। संसाधन हमारे, माइनिंग हमारे यहाँ, लेकिन मलाई और टैक्स का कंट्रोल केंद्र के पास!
3. ₹36,000 करोड़ से ₹1 लाख करोड़ का कर्ज
[ग्राफिक्स: कर्ज का बढ़ता ग्राफ - 2016 बनाम 2026]
आइए आंकड़ों की जुबानी समझते हैं कि छत्तीसगढ़ कैसे कर्जदार बना:
साल 2016-17 में छत्तीसगढ़ पर कुल कर्ज करीब ₹36,000 करोड़ था, जो उस वक्त राज्य की जीडीपी (GSDP) का सिर्फ 15 से 16% था।
लेकिन आज, यह कर्ज बढ़कर ₹1 लाख करोड़ से ऊपर जा चुका है।
इस भारी-भरकम कर्ज का नतीजा यह है कि राज्य सरकार को अपने कुल बजट का 10 से 12% हिस्सा सिर्फ कर्ज और उसका ब्याज चुकाने में खर्च करना पड़ रहा है। हर साल ₹7,500 करोड़ से ₹8,000 करोड़ रुपए तो सिर्फ ब्याज देने में चले जाते हैं। विकास कार्यों के लिए पैसा बचेगा कहां से?
4. श्रेय मोदी का, बोझ छत्तीसगढ़ पर: 40% की पार्टनरशिप
[ग्राफिक्स: केंद्र की योजनाएं और 40% वित्तीय बोझ]
अक्सर मोदी सरकार अपनी कल्याणकारी योजनाओं की पीठ थपथपाती है, लेकिन इसके पीछे का सच यह है कि डबल इंजन की सरकार होने के नाते छत्तीसगढ़ चुपचाप सारा वित्तीय बोझ अपने सिर ले रहा है। पहले इन योजनाओं में राज्यों की हिस्सेदारी बेहद कम (10 से 20%) होती थी, लेकिन अब इसे बढ़ाकर 40% कर दिया गया है:
पीएम आवास योजना: राज्य की हिस्सेदारी 40%।
जल जीवन मिशन: राज्य की हिस्सेदारी 40% (जिसमें भारी भ्रष्टाचार की शिकायतें भी हैं)।
आयुष्मान कार्ड योजना: राज्य की हिस्सेदारी 40%।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन व समग्र शिक्षा अभियान: राज्य की हिस्सेदारी 40%।
मनरेगा के बदले आई नई योजना (जीवी राम जी योजना): इसमें भी राज्यों पर 40% का भारी वित्तीय बोझ डाल दिया गया है।
यानी विज्ञापन और श्रेय में नाम प्रधानमंत्री का, लेकिन तिजोरी छत्तीसगढ़ की खाली हो रही है।
5. वित्तीय कुप्रबंधन और बैंकों का रुख
[क्लोजिंग टोन: तीखे सवाल]
चुनावी वादों जैसे महतारी वंदन योजना या ₹3100 में धान खरीदी ने राज्य की तिजोरी पर असर तो डाला ही है, लेकिन उससे भी बड़ा झटका केंद्र की थोपी हुई नीतियां और साय सरकार का लचर वित्तीय प्रबंधन है। हालत यह है कि रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य को अब बैंकों से ऊंचे ब्याज दरों पर कर्ज उठाना पड़ रहा है और एनपीए (NPA) लगातार बढ़ रहा है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या छत्तीसगढ़ को इस बदहाली से निकालने के लिए आने वाले दिनों में यहां के जल, जंगल और जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों को बेचना पड़ेगा? या फिर केंद्र के सामने आंखें मूंदकर बैठी यह डबल इंजन सरकार कोई ठोस कदम उठाएगी?






