कांग्रेस आलाकमान को बदलना होगा राज्यों में सत्ता सौंपने का फॉर्मूला?
विधानसभा चुनाव के अप्रत्याशित परिणामों ने एक बार फिर देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस को आत्ममंथन के चौराहे पर खड़ा कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में अब यह बहस तेज हो गई है कि क्या कांग्रेस अपनी ही अंदरूनी कमियों और राज्यों के कद्दावर नेताओं (छत्रपों) की अति-महत्वाकांक्षा के कारण जीती-जिताई बाजी हारने में माहिर हो चुकी है? हरियाणा में जिस तरह से कांग्रेस के हाथ में आई हुई सत्ता की थाली सरक गई, उसने एक बार फिर छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान के बीते विधानसभा चुनावों की यादें ताजा कर दी हैं।
वही पुरानी गलती, वही पुराना दांव
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर आंख मूंदकर भरोसा करना कांग्रेस आलाकमान की ठीक वैसी ही भूल थी, जैसी उसने पूर्व में हिंदी बेल्ट के तीन प्रमुख राज्यों में की थी। आलाकमान ने राज्यों के इन बड़े चेहरों की मर्जी के आगे पूरी पार्टी को दांव पर लगा दिया, जिसका नतीजा अंततः हार के रूप में सामने आया।
राजस्थान से मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का 'सिंड्रोम'
यदि सिलसिलेवार ढंग से पिछले चुनावों पर नजर डालें, तो कांग्रेस ने हर राज्य में अंदरूनी कलह और एकतरफा फैसलों के आगे घुटने टेके:
1 राजस्थान: यहाँ अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच का शीतयुद्ध जगजाहिर था। टिकट वितरण से लेकर संगठन के फैसलों तक में लगातार विवाद होते रहे। अंत समय में डैमेज कंट्रोल की कोशिशें तो हुईं, लेकिन धरातल पर उसका कोई बड़ा असर नहीं दिखा और पार्टी को सत्ता गंवानी पड़ी।
2 मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश की कमान पूरी तरह कमलनाथ के हाथों में सौंप दी गई थी। नतीजतन, पार्टी के भीतर असंतोष इस कदर बढ़ा कि ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे मजबूत नेता को पार्टी छोड़नी पड़ी। इसके बाद भी आलाकमान मध्य प्रदेश की जमीनी हकीकत और कमलनाथ की कार्यशैली को भांपने में नाकाम रहा।
3 छत्तीसगढ़: छत्तीसगढ़ का उदाहरण सबसे ज्यादा चौंकाने वाला रहा। कथित तौर पर ढाई-ढाई साल के मुख्यमंत्री के बंटवारे को लेकर जो खींचतान शुरू हुई, उसने सरकार की छवि को खासा नुकसान पहुंचाया। तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर आलाकमान का भरोसा अटूट रहा, जबकि धरातल पर कोयला घोटाला, शराब घोटाला और पीएससी (PSC) जैसे गंभीर घोटालों और प्रशासनिक मनमानी की फेहरिस्त लंबी होती जा रही थी। जन-असंतोष को भांपने के बजाय आलाकमान ने स्थानीय नेतृत्व पर भरोसा जारी रखा और परिणाम स्वरूप छत्तीसगढ़ की सत्ता भी भाजपा की झोली में चली गई।
हरियाणा में भी दोहराया गया इतिहास
इन तीन राज्यों की हार से सबक लेने के बजाय कांग्रेस ने हरियाणा में भी हुड्डा गुट की अनदेखी न करने की मजबूरी के आगे घुटने टेक दिए। वहां भी टिकट बंटवारे से लेकर चुनावी रणनीति तक, सब कुछ एक ही धड़े के इर्द-गिर्द घूमता रहा। चुनावी राजनीति में यह सच है कि क्षेत्रीय क्षत्रपों की अनदेखी नहीं की जा सकती, लेकिन सिर्फ उनके ही भरोसे पूरी चुनावी वैतरणी पार नहीं की जा सकती—यह बात आलाकमान समझने में लगातार विफल हो रहा है।
अब आगे क्या? बदलाव की मांग
हरियाणा के झटके के बाद अब कांग्रेस के भीतर से ही यह आवाज उठने लगी है कि क्या इन पुराने क्षत्रपों को किनारे कर नए और युवा चेहरों को आगे लाने का वक्त आ गया है? आगामी महाराष्ट्र और झारखंड जैसे राज्यों के विधानसभा चुनावों को देखते हुए कांग्रेस को अपनी इस रणनीति में आमूल-चूल बदलाव करना होगा।
यदि पार्टी अब भी राज्यों में बैठे कद्दावर नेताओं पर ही आंख मूंदकर भरोसा करती रही, तो आगामी राज्यों में भी सत्ता की चाबी आसानी से भारतीय जनता पार्टी के हाथों में सौंप दी जाएगी। राजनीतिक पंडितों का साफ कहना है कि अब समय आ गया है जब कांग्रेस आलाकमान को कड़े फैसले लेने होंगे और 'एकतरफा छत्रप मॉडल' से बाहर निकलकर सामूहिक नेतृत्व और जमीनी फीडबैक के आधार पर चुनाव लड़ना होगा।
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हार के तीन मुख्य सबक:
भीतरी कलह पर नियंत्रण का अभाव: राज्यों के शीर्ष नेताओं के आपसी विवाद को समय रहते न सुलझाना कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी साबित हो रहा है।
भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलता की अनदेखी: छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में घोटालों के आरोपों के बावजूद नेतृत्व परिवर्तन न करना पार्टी को भारी पड़ा।
एक ही चेहरे पर अति-निर्भरता: संगठन को मजबूत करने के बजाय केवल एक ही नेता को सर्वेसर्वा बना देना, बाकी कार्यकर्ताओं और धड़ों को उदासीन कर देता है।
Vidio देखें
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