यूरोक्रेसी का 'रिमोट कंट्रोल' या मंत्रियों की लाचारी? छत्तीसगढ़ में 'तालमेल' की पटरी से उतरी सरकार!
2. 2 साल, आधा दर्जन कमिश्नर: छत्तीसगढ़ चिकित्सा शिक्षा (Medical Education) विभाग बना अफसरों की 'म्यूजिकल चेयर'।
3. सुशासन का दावा बनाम '2005 बैच' का दबदबा: फाइलों की खींचतान में पिस रही छत्तीसगढ़ की जनता।
छत्तीसगढ़ में सुशासन (Sushasan) और 'डबल इंजन' रफ्तार का दावा क्या सिर्फ कागजी है? राज्य के गलियारों से छनकर आ रही खबरें और लगातार हो रहे प्रशासनिक फेरबदल कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। मंत्रियों और उनके विभागों के आला अधिकारियों (सचिवों/आयुक्तों) के बीच पटरी न बैठने से न केवल विकास कार्य ठप हैं, बल्कि महत्वपूर्ण विभाग प्रशासनिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहे हैं। इसका सबसे ताजा और हैरान करने वाला उदाहरण प्रदेश का चिकित्सा शिक्षा विभाग (Medical Education Department) है, जहां पिछले दो सालों में करीब आधा दर्जन आयुक्त (Commissioners) बदले जा चुके हैं।
1. चिकित्सा शिक्षा विभाग में अफसरों की 'म्यूजिकल चेयर':
मुद्दा: चिकित्सा शिक्षा विभाग जैसी महत्वपूर्ण रीढ़, जो डॉक्टरों के निर्माण और मेडिकल कॉलेजों के टेंडर व संचालन की कमान संभालती है, वहां अफसरों के टिकने की मियाद कुछ महीने ही रह गई है।
इतिहास और वर्तमान: भूपेश सरकार के समय इस विभाग को सुचारू बनाने के लिए चिकित्सा शिक्षा आयुक्त (Medical Education Commissioner) के पद का सृजन हुआ था। पहली कमिश्नर नम्रता गांधी (31 जनवरी 2024) बनीं। तब से लेकर अब तक अब्दुल कैसर, जेपी मौर्य, जेपी पाठक, चंदन कुमार, किरण कौशल और रितेश अग्रवाल जैसे कई अधिकारियों के पास यह जिम्मेदारी आई और गई।
खोजी सवाल: क्या चिकित्सा शिक्षा आयुक्त का पद इतना 'मलाईदार' या दबाव वाला है कि किसी भी अधिकारी की पटरी मंत्री या सचिव के साथ लंबे समय तक नहीं बैठ पा रही? बार-बार अधिकारियों के बदलने से मेडिकल कॉलेजों के टेंडर और स्वास्थ्य ढांचा पूरी तरह प्रभावित हो रहा है।
2. मंत्रियों बनाम सचिवों की जंग (Who is the Boss?):
अधिकारियों का दबदबा: राजनीतिक गलियारों में चर्चा आम है कि छत्तीसगढ़ सरकार को मंत्री नहीं बल्कि अफसर चला रहे हैं। विशेषकर '2005 बैच' के चुनिंदा आईएएस अधिकारियों के दबदबे को लेकर खुद सत्ताधारी दल के भीतर असंतोष सुलग रहा है।
सीएम सचिवालय बनाम अन्य विभाग: मुख्यमंत्री के सचिवालय (विशेषकर राहुल भगत) और वित्त विभाग (ओपी चौधरी) के निर्णयों और अन्य मंत्रियों के बीच का नीतिगत तालमेल कमजोर दिख रहा है।
विवाद के चेहरे: चिकित्सा शिक्षा मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल और विभाग के सचिव अमित कटारिया (जो कभी पीएम के सामने चश्मा पहनने और अपनी कार्यशैली को लेकर चर्चा में रहे) के बीच के प्रशासनिक तालमेल पर भी सवाल उठ रहे हैं।
3. जनता पर सीधा असर: इलाज महंगा, जांच के नाम पर 'लूट':
सरकारी अस्पतालों में जहां एमआरआई (MRI) और सीटी स्कैन (CT Scan) जैसी सुविधाएं मुफ्त या न्यूनतम शुल्क पर होनी चाहिए, वहां कथित तौर पर प्राइवेट अस्पतालों को फायदा पहुंचाने के लिए भारी शुल्क वसूला जा रहा है।
आयुष्मान कार्ड (Ayushman Card) और जन आरोग्य जैसी जनकल्याणकारी योजनाएं जमीनी स्तर पर दम तोड़ रही हैं। इसी का नतीजा है कि मुख्य विपक्षी दल अब स्वास्थ्य मंत्री के बंगले के घेराव की रणनीति बना रहा है।
4. पुराना चिकित्सा उपकरण घोटाला और अधूरी कार्रवाई:
पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने चिकित्सा उपकरणों की खरीदी में करोड़ों के कथित घोटाले की शिकायत पीएमओ, ईडी और सीबीआई से की थी।
इस शिकायत के बाद हालांकि कुछ कार्रवाई हुई और आधा दर्जन अधिकारियों पर गाज गिरी, लेकिन कई दागी चेहरे आज भी अन्य महत्वपूर्ण विभागों में जमे हुए हैं, जो सुशासन के दावों पर सवालिया निशान खड़ा करता है।
प्रिंट मीडिया के लिए कुछ विशेष इनपुट्स (आपकी जानकारी के लिए अतिरिक्त तथ्य):
यदि आप इस पर ग्राउंड रिपोर्टिंग या फॉलो-अप करना चाहते हैं, तो इन बिंदुओं को अपनी जांच का हिस्सा बना सकते हैं:
1. फाइलों का 'गो-स्लो' मूवमेंट: मंत्रालय (महानदी भवन) से डेटा निकालें कि पिछले 6 महीनों में चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग की कितनी महत्वपूर्ण फाइलें मंत्रियों और सचिवों की 'सहमति/असहमतियों' के फेर में अटकी रहीं।
2. मेडिकल कॉलेजों में बुनियादी ढांचे की कमी: अंबिकापुर, जगदलपुर या रायपुर (मेकाहारा) जैसे प्रमुख मेडिकल कॉलेजों में नई मशीनों की खरीदी के टेंडरों की स्थिति क्या है? क्या आयुक्तों के बार-बार बदलने से टेंडर प्रक्रिया अटकी पड़ी है?
3. अन्य विभागों में भी यही हाल: सिर्फ चिकित्सा शिक्षा ही नहीं, बल्कि कई अन्य तकनीकी विभागों (जैसे पीएचई, माइनिंग और वन विभाग) में भी मंत्रियों और उनके मातहत आईएएस अधिकारियों के बीच फाइलों के नोटिंग्स पर खींचतान चल रही है, जिसे आप इस रिपोर्ट में 'बॉक्स आइटम' के रूप में जोड़ सकते हैं।
निष्कर्ष (Conclusion):
यह स्टोरी न केवल छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी के भीतर मचे घमासान को उजागर करेगी, बल्कि सुशासन और जीरो टॉलरेंस के नारों के पीछे छिपी जमीनी हकीकत को भी पाठकों के सामने रखेगी। प्रिंट मीडिया में खोजी पत्रकारिता के दृष्टिकोण से यह एक बेहद दमदार और जन-सरोकार से जुड़ी रिपोर्ट साबित हो सकती है।



