मंगलवार, 3 नवंबर 2026

आम जनता महंगाई से बेहाल, और विधायकों के लिए राजमहल!"

 आम जनता महंगाई से बेहाल, और विधायकों के लिए राजमहल!"


क्या चल रहा है देश और आपके राज्य में? महंगाई का आलम यह है कि आम आदमी की थाली से दाल-सब्जी गायब होती जा रही है, पेट्रोल-डीजल, गैस सिलेंडर और बच्चों की फीस भरते-भरते आम इंसान की रीढ़ की हड्डी टूट चुकी है। लेकिन... लेकिन जनाब, हमारे नुमाइंदों यानी विधायकों की जिंदगी देखिए! उनके ठाठ-बाठ देखकर तो राजा-महाराजा भी शरमा जाएं।

अभी हाल ही में छत्तीसगढ़ के नवा रायपुर (सेक्टर-25) से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसे पढ़कर और सुनकर हर उस आम नागरिक का खून खौल उठेगा जो टैक्स के एक-एक पाई चुकाता है। खबर क्या है? खबर यह है कि विधायकों के लिए बनने वाले फ्लैट्स का नक्शा बदल दिया गया है! पहले भाईसाहब 3 BHK फ्लैट बनने वाले थे, लेकिन अब उन्हें अपग्रेड करके 4 BHK आलीशान फ्लैट बना दिया गया है! और तो और, लागत कितनी बढ़ गई? सीधे 80 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी!

आज इसी पर करेंगे कड़वी बात, तीखा विश्लेषण। वीडियो को अंत तक देखिएगा, क्योंकि आज सवाल सिर्फ एक सरकार या पार्टी का नहीं, बल्कि हमारी व्यवस्था और प्राथमिकताओं का है।"

खबर का कच्चा-चिट्ठा - क्या है पूरा मामला?

: "चलिए,आपको तारीख और आंकड़ों के साथ पूरी सच्चाई बताता हूँ। हमारे पास जो जानकारी और दस्तावेज (तस्वीर) सामने आए हैं, उसके मुताबिक:

  • नवा रायपुर के सेक्टर-25 में प्रदेश के विधायकों के लिए प्रस्तावित आवासीय परिसर को अब और ज्यादा भव्य बनाया जा रहा है।
  • पहले पूर्व भूपेश बघेल सरकार के कार्यकाल में यह तय हुआ था कि 78 विधायकों के लिए 3 BHK फ्लैट्स बनाए जाएंगे।
  • लेकिन अब प्लान बदल चुका है। अब सभी 90 विधायकों के लिए 4 BHK आलीशान फ्लैट्स का नक्शा तैयार किया गया है।

भाई, सिर्फ कमरों की संख्या ही नहीं बढ़ी, सुविधाएं सुनिए जरा!

  • इसमें स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, कैफेटेरिया, मल्टीपरपज हॉल और सर्वेंट क्वार्टर जैसी हाईटेक और लग्जरी सुविधाएं जोड़ी जा रही हैं।
  • और इन सब 'शाही बदलावों' की वजह से प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत सीधे 80 करोड़ रुपये बढ़ गई है।
  • तर्क यह दिया जा रहा है कि पीडब्ल्यूडी (PWD) ने विधायकों के सुझावों और वर्तमान जरूरतों को ध्यान में रखते हुए यह नया खाका तैयार किया है। वाह! जनता की जरूरत महंगाई के इस दौर में दो वक्त की रोटी जुटाना है, और विधायकों की जरूरत 'सर्वेंट क्वार्टर और स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स' वाली आलीशान कोठियां हैं!"
  • जनता का दर्द बनाम जनप्रतिनिधियों की ऐश 

जरा सोचकर देखिए एक तरफ देश और प्रदेश का आम आदमी महंगाई की चक्की में पिस रहा है। दूध, आटा, चावल, दाल सब पर टैक्स लग रहा है। मिडिल क्लास आदमी बैंक की EMI चुकाते-चुकाते अपनी आधी जवानी गुजार देता है। उसे 2 BHK फ्लैट खरीदने के लिए भी जिंदगीभर की जमापूंजी लगानी पड़ती है या लोन के जाल में फंसना पड़ता है।

लेकिन हमारे माननीय विधायकों को देखिए! जनता के टैक्स के पैसों से उनके आराम का पूरा ख्याल रखा जा रहा है। 3 BHK से सीधा 4 BHK पर छलांग! क्या विधायकों के परिवार इतने बड़े हो गए हैं कि उन्हें 3 कमरे कम पड़ने लगे? या जनता की गाढ़ी कमाई को पानी की तरह बहाना ही इन सबका मुख्य एजेंडा बन गया है?

जब जनता रोजगार मांगती है, तो बजट नहीं होने का रोना रोया जाता है। जब किसानों को उनके फसलों का सही दाम देने की बात आती है, तो खजाने खाली होने का पाठ पढ़ाया जाता है। जब सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की हालत सुधारने की बात होती है, तो कहा जाता है कि 'धन की कमी है'। लेकिन जब बात हमारे साहब लोगों के आलीशान आवास और सुविधाओं की आती है, तो 80 करोड़ रुपये चुटकी बजाते ही बढ़ जाते हैं! ये पैसा किसका है? क्या यह किसी राजनेता के बाप की जागीर है? नहीं! यह आपका और हमारा खून-पसीने की कमाई का टैक्स है।"

सिस्टम पर सवाल और नेताओं की प्राथमिकताएं]

"यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारें चाहे किसी की भी रहें—चाहे पुरानी सरकार हो या वर्तमान सरकार—जनता से जुड़े मुद्दों पर नीतियां बदलती हैं या नहीं बदलतीं, लेकिन नेताओं की सुख-सुविधाओं के मामले में कभी कोई कटौती नहीं होती। सब मिलकर एक ही थाली के चट्टे-बट्टे साबित होते हैं।

विधायकों को वेतन मिलता है, भत्ते मिलते हैं, मुफ्त बिजली-पानी मिलती है, मेडिकल सुविधा मिलती है, पेंशन मिलती है—और उसके बाद भी उनके रहने के लिए राजमहल जैसे फ्लैट्स पर जनता के करोड़ों रुपये फूंक दिए जाते हैं। क्या एक विधायक आम जनता से इतना ऊपर हो गया है कि उसे जनता के दुखों से कोई फर्क ही नहीं पड़ता?

यह सिर्फ एक इमारत या 4 BHK फ्लैट का मामला नहीं है, यह हमारी राजनीतिक संस्कृति की बानो है, जहाँ जनसेवक, 'शासक' बन बैठे हैं।"

वक्त आ गया है कि हम सवाल पूछना सीखें। सोशल मीडिया पर स्टेटस लगाने या रील्स देखने से काम नहीं चलेगा। जब तक हम अपने इन चुने हुए नुमाइंदों से यह नहीं पूछेंगे कि 'भाई, हमारी महंगाई कम करने के लिए क्या योजना है?' और 'हमारे पैसों से राजमहल क्यों बनाए जा रहे हैं?', तब तक ये लोग हमें ऐसे ही हल्के में लेते रहेंगे।

अब आपको तय करना है कि क्या आप ऐसे ही चुपचाप सब देखते रहेंगे या सवाल उठाएंगे। इस वीडियो को देश के हर उस नागरिक तक शेयर कीजिए जो महंगाई से परेशान है और नेताओं की इस अय्याशी से आहत है।

नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखिए कि क्या विधायकों के लिए 80 करोड़ अतिरिक्त खर्च करके 4 BHK फ्लैट बनाना सही है? 

सांसद को 'जो करना है कर लो' कहने वाले IAS अमित कटारिया फिर विवादों में! काला चश्मा से लेकर हाईकोर्ट के चाबुक तक..."

 सांसद को 'जो करना है कर लो' कहने वाले IAS अमित कटारिया फिर विवादों में! काला चश्मा से लेकर हाईकोर्ट के चाबुक तक..."



कहते हैं कि सियासत और ब्यूरोक्रेसी यानी नौकरशाही, ये दोनों जब आपस में टकराती हैं, तो चिंगारी दूर-दूर तक जाती है। लेकिन छत्तीसगढ़ में आजकल जो कुछ चल रहा है, वो सिर्फ चिंगारी नहीं, बल्कि सीधे तौर पर प्रशासनिक अहंकार और लोकतंत्र के बीच एक महासंग्राम बन चुका है।

और इस महासंग्राम के केंद्र में हैं— छत्तीसगढ़ के एक बेहद चर्चित, रईस और दबंग आईएएस अधिकारी, अमित कटारिया!

वही अमित कटारिया, जो कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने काला चश्मा पहनकर खड़े होने की वजह से पूरे देश की सुर्खियों में आ गए थे। जो कागजों पर तो सिर्फ एक रुपया सैलरी लेने वाले फकीर नुमा अफसर दिखते हैं, लेकिन जिनकी असलियत और रुतबे के चर्चे हर तरफ हैं।

लेकिन अब मामला सिर्फ एक-दो पुराने किस्सों तक सीमित नहीं है। ताजा खबर ये है कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अमित कटारिया समेत कई बड़े अधिकारियों को अवमानना (Contempt of Court) का नोटिस थमा दिया है! इतना ही नहीं, कुछ समय पहले रायपुर के वरिष्ठ सांसद और दिग्गज नेता बृजमोहन अग्रवाल के साथ उनकी बदसलूकी का मामला सीधे लोकसभा अध्यक्ष तक पहुंच गया था! और तो और, भाई साहब... इनके नाम पर छत्तीसगढ़ में फर्जी वसूली और धमकियों का बाजार भी गर्म रहा है।

आखिर चल क्या रहा है छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य विभाग में? क्या ब्यूरोक्रेसी इतनी बेलगाम हो चुकी है कि उसे जनता के चुने हुए नुमाइंदों और अदालत के आदेशों की भी परवाह नहीं है? आज की इस वीडियो में हम पर्दाफाश करेंगे अमित कटारिया के पूरे विवादित इतिहास का—बस्तर के 'काला चश्मा' कांड से लेकर, सांसद से पंगा और ताजा कानूनी डंडे तक! एक-एक बात खुलकर सामने आएगी।

ताजा विवाद - छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का डंडा और अवमानना नोटिस 

शुरुआत करते हैं एकदम ताजा और सनसनीखेज अपडेट से। मामला जुड़ा है छत्तीसगढ़ स्टेट फार्मेसी काउंसिल में रजिस्ट्रार की नियुक्ति के विवाद से।

हवा में तीर चलाने के बजाय जरा तथ्यों को समझिए। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 3 मार्च 2026 को साफ-साफ निर्देश दिया था कि तत्कालीन रजिस्ट्रार को हटाया जाए। इसके बाद 15 मई 2026 को पूर्णकालिक रजिस्ट्रार नियुक्त करने का आदेश हुआ और अदालत ने इसके लिए आठ हफ्ते की सख्त समय सीमा तय की थी।

लेकिन हमारी आका-ब्यूरोक्रेसी ने क्या किया? कोर्ट के आदेश को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया! तय समय में जब नियुक्ति नहीं हुई, तो मजबूरन अदालत में अवमानना याचिका (Contempt Petition) दाखिल करनी पड़ी।

और अब परिणाम क्या आया है? छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए स्वास्थ्य विभाग के सचिव IAS अमित कटारिया, स्वास्थ्य संचालक संजीव झा और काउंसिल के अध्यक्ष अरुण मिश्रा को नोटिस जारी कर दिया है! अदालत ने इन तीनों से तीन हफ्ते के भीतर जवाब मांगा है कि आखिर कोर्ट के आदेश की अवहेलना क्यों की गई?

जरा सोचिए! जिस महकमे के मुखिया पर कानून का पालन कराने की जिम्मेदारी हो, अगर वही महकमा हाईकोर्ट के आदेशों की धज्जियां उड़ाएगा, तो आम जनता न्याय के लिए कहां जाएगी? यह सिर्फ एक नोटिस नहीं है, बल्कि सिस्टम के मुंह पर एक करारा तमाचा है।

सांसद बृजमोहन अग्रवाल बनाम IAS अमित कटारिया - "जो करना है कर लो!" 

लेकिन भाई, अमित कटारिया का विवादों से पुराना नाता है। हाईकोर्ट के इस मामले से ठीक कुछ महीने पहले, इसी साल मध्य में रायपुर के सांसद और राज्य के पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के साथ उनका जो टकराव हुआ, उसने तो दिल्ली तक भूचाल ला दिया था!

हुआ यूं कि 20 मई को सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने जनहित से जुड़े कुछ जरूरी मामलों और पत्रों के जवाब को लेकर स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया को फोन किया। सोचिए, राज्य की राजधानी का एक वरिष्ठ सांसद, जो जनता द्वारा चुना गया प्रतिनिधि है, वो जब एक आईएएस अधिकारी को फोन करे, तो उम्मीद क्या होती है? सम्मान की, संवाद की!

लेकिन आरोप है कि अमित कटारिया ने न सिर्फ महीनों तक सांसद के पत्रों के जवाब नहीं दिए, बल्कि फोन पर बेहद रुखे और घमंड भरे लहजे में बात की। सूत्रों और शिकायतों के मुताबिक, बातचीत के दौरान आईएएस अमित कटारिया ने सांसद से यहां तक कह दिया— "जो करना है कर लो!" (Do whatever you want!)

भाई साहब! एक आईएएस अफसर एक निर्वाचित सांसद को खुलेआम ये कह रहा है कि 'जो करना है कर लो'! क्या यह लोकतंत्र का अपमान नहीं है?

मामला इतना बढ़ा कि बृजमोहन अग्रवाल ने इसे सीधे तौर पर अपने विशेषाधिकार का हनन (Breach of Privilege) मानते हुए लोकसभा अध्यक्ष के पास लिखित शिकायत दर्ज करा दी। लोकसभा सचिवालय ने भी इस मामले को गंभीरता से लेते हुए DoPT (कार्मिक मंत्रालय) से तथ्यात्मक रिपोर्ट मांग ली।

इस पूरे मामले पर सियासत भी गरमा गई। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल तक को कूदना पड़ा। उन्होंने साफ कहा कि यह घटना इस बात का सबूत है कि छत्तीसगढ़ के अफसरों को जनता या जनप्रतिनिधियों की कोई परवाह नहीं है, उन्हें सिर्फ अपनी कुर्सी से मतलब है। सोचिए, जनता के वोट से चुने गए नेता की इज्जत एक कुर्सी पर बैठे नौकरशाह के सामने किस तरह तार-तार की जा रही है!

अमित कटारिया के नाम पर फर्जी वसूली और धमकियों का खेल! 


अब आइए इस कहानी के सबसे खतरनाक और काले पहलू पर। जब अफसर का खौफ और दबंगई इस स्तर पर बढ़ जाती है, तो सिस्टम के नीचे पलने वाले दलाल और ठग भी इसका पूरा फायदा उठाने लगते हैं।

कुछ समय पहले छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से एक बहुत बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया था। एक शातिर ठग ने क्या किया? उसने खुद को स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया का बेहद करीबी और खास आदमी बताकर शहर के निजी अस्पतालों (Private Hospitals) को फोन करना शुरू कर दिया!

अस्पतालों को बड़े-बड़े प्रशासनिक एक्शन का डर दिखाया गया, नियमों की आड़ में डराया-धमकाया गया और उनके नाम पर मोटी रकम की अवैध वसूली (Extortion) की गई! सोचकर देखिए, जब किसी अधिकारी की छवि 'दबंग' और 'किसी की न सुनने वाले' अफसर के तौर पर स्थापित हो जाती है, तो अपराधियों को यह यकीन दिलाने में आसानी हो जाती है कि "अरे, ये तो किसी की नहीं सुनते, इनके नाम पर डराओगे तो अस्पताल वाले तुरंत पैसे दे देंगे।"

भले ही पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई की हो, लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर किसी अधिकारी के नाम का ऐसा खौफ या दुरुपयोग मार्केट में क्यों पनपता है? क्यों ठगों को यह भरोसा होता है कि उस बड़े साहब का नाम लेते ही लोग कांप जाएंगे? यह अपने आप में एक बहुत बड़ा गंभीर सवाल है जो प्रशासन की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगाता है।

पुराना इतिहास - वो 'काला चश्मा' और 1 रुपये की सैलरी का ड्रामा 

, अगर आपको लगता है कि अमित कटारिया सिर्फ अब ऐसे तेवर दिखा रहे हैं, तो आपका इतिहास कमजोर है। जनाब का रिकॉर्ड शुरू से ऐसा ही रहा है!

फ्लैशबैक में चलिए—साल 2015, मई का महीना। अमित कटारिया तब बस्तर के कलेक्टर हुआ करते थे। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बस्तर के दौरे पर आए थे। प्रोटोकॉल के मुताबिक देश के प्रधानमंत्री का स्वागत करना था। बाकी सारे अधिकारी कायदे से हाथ जोड़े खड़े थे, लेकिन हमारे अमित कटारिया साहब... उन्होंने प्रधानमंत्री के सामने भी अपनी शान बनाए रखने के लिए चेहरे पर ब्रांडेड काला चश्मा (Sunglasses) चढ़ा रखा था!

तस्वीरें नेशनल मीडिया में वायरल हो गईं। प्रोटोकॉल तोड़ने और वीवीआईपी विजिट में इस तरह की असहज शैली को लेकर भारी बवाल मचा। तत्कालीन रमन सिंह सरकार को मजबूरन नोटिस जारी करना पड़ा था।

इसके अलावा, मीडिया में उनकी एक और यूएसपी खूब गाई जाती है कि भाई, ये तो 'सबसे अमीर आईएएस' हैं—जिनका परिवार रियल एस्टेट के बड़े कारोबार से जुड़ा है, जिनकी पत्नी एक कमर्शियल पायलट हैं, और जो शुरुआती दिनों में अपनी सेवा के नाम पर सिर्फ ₹1 (एक रुपया) सैलरी लेने का दावा करते थे।

लेकिन सवाल यह है कि एक रुपये की सांकेतिक सैलरी लेने का दिखावा करने वाले या करोड़ों की संपत्ति के मालिक होने का गुरूर रखने वाले, क्या जनता के प्रति अपनी जवाबदेही भूल गए हैं? क्या एक करोड़पति या दबंग अफसर होने का मतलब यह है कि आप जनप्रतिनिधियों को अपमानित करेंगे और अदालत के आदेशों को कचरे के डिब्बे में डाल देंगे?

लोकतंत्र में संविधान सबसे ऊपर है। यहाँ न तो कोई नेता सर्वसर्वा है और न ही कोई आईएएस अधिकारी कानून से ऊपर है। जनप्रतिनिधि जनता की आवाज होते हैं और अदालत न्याय का मंदिर। अगर नौकरशाही इसी तरह अहंकार में चूर होकर "जो करना है कर लो" की भाषा बोलने लगेगी, तो आम जनता का इस तंत्र से भरोसा उठ जाएगा।

हाईकोर्ट के इस ताजा नोटिस ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं, चाहे आप कितने भी पावरफुल कुर्सी पर क्यों न बैठे हों।

अब देखना यह होगा कि स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया और बाकी अधिकारी कोर्ट के इस डंडे के आगे क्या जवाब देते हैं, और सरकार इस बेलगाम होती प्रशासनिक संस्कृति पर लगाम लगाती है या नहीं।

आपकी इस पूरे मामले पर क्या राय है? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी बेबाक राय जरूर लिखिए। क्या ऐसे अधिकारियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए या नहीं?


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सीजी में युवा सिर्फ वोट देने की मशीन

 सीजी में युवा सिर्फ वोट देने की मशीन 


क्या इस देश और राज्य में युवा सिर्फ वोट देने के लिए रह गए हैं? क्या नौकरियां अब सिर्फ चुनावी घोषणापत्रों के पन्नों तक सीमित रहेंगी?

आज हम बात कर रहे हैं उन लाखों युवाओं की, जिन्होंने दिन-रात एक करके पढ़ाई की, परीक्षा दी, और अब सिर्फ रिजल्ट, जॉइनिंग और नई भर्तियों के लिए सड़कों पर धक्के खा रहे हैं। कभी कोर्ट का सहारा, कभी रोस्टर में गड़बड़ी, कभी जांच का बहाना और कभी-कभी तो प्रशासनिक ताने-बाने में फाइलों का खो जाना! आखिरकार कब तक युवाओं के भविष्य के साथ यह खिलवाड़ चलता रहेगा?

आज के इस विशेष रिपोर्ट में हम एक-एक करके बात करेंगे:

  1. विश्वविद्यालय भर्तियों में आरक्षण और रोस्टर की गड़बड़ी का जो नया मामला सामने आया है।
  2. डी.एड (D.Ed/D.El.Ed) अभ्यर्थियों का आंदोलन और उनकी मांगें।
  3. ASI भर्ती के 1500 पदों की अटकी हुई सूची।
  4. 57,000 शिक्षक भर्ती की गारंटी और अतिथि शिक्षकों (Guest Teachers) का अनिश्चित भविष्य।

अगर आप भी इनमें से किसी भर्ती का इंतजार कर रहे हैं या युवाओं के इस हक की लड़ाई में साथ हैं, तो इस वीडियो को अंत तक जरूर देखें और शेयर करें।"

विश्वविद्यालयों में भर्ती गड़बड़ी और जांच का पेंच

"सबसे पहले नजर डालते हैं हाल ही में सामने आए विश्वविद्यालय भर्ती विवाद पर। राज्यपाल सचिवालय के आदेशानुसार, विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक पदों की भर्ती से लेकर भवन निर्माण और रखरखाव कार्यों में कथित अनियमितताओं की शिकायतों का संज्ञान लिया गया है। कुलाधिपति ने इसकी जांच और प्रगति का निरीक्षण करने के निर्देश दिए हैं।

लेकिन शिकायतें क्या हैं? जरा गौर से सुनिए:

  • आरक्षण और रोस्टर में गड़बड़ी: पदों के आरक्षण में तय नियमों की अनदेखी की गई।
  • स्वीकृत पदों से ज्यादा का विज्ञापन: जितने पद स्वीकृत नहीं थे, उससे अधिक पर विज्ञापन निकाल दिए गए।
  • रोस्टर में मनमाना बदलाव: प्रक्रिया के बीच में ही तय रोस्टर को बदल दिया गया।
  • कार्य परिषद (Executive Council) की बिना मंजूरी: भर्ती प्रक्रिया को आगे बढ़ा दिया गया।

इसके अलावा बैकलॉग पद, शिक्षकों की पदोन्नति और वेतन संरक्षण जैसे कई मुद्दे इसमें शामिल हैं। अब सवाल यह उठता है कि जब विज्ञापन निकाला जाता है, तब जिम्मेदार अधिकारी इन नियमों को क्यों भूल जाते हैं? क्या यह जानबूझकर किया जाता है ताकि मामला कोर्ट या जांच में अटके और भर्ती लटक जाए?"

 डी.एड (D.Ed) अभ्यर्थी और 57,000 शिक्षकों का वादा

: "अब बात करते हैं शिक्षा विभाग की। चुनावों के समय 57,000 शिक्षकों की भर्ती की गारंटी और वादे बड़े-बड़े मंचों से किए गए थे। लेकिन धरातल पर क्या है?

डी.एड (D.Ed) अभ्यर्थी आज सड़कों पर आंदोलन करने को मजबूर हैं। न्यायालय के फैसलों के बावजूद, प्राथमिक शिक्षक भर्तियों में डी.एड अभ्यर्थियों को उनका हक समय पर नहीं मिल पा रहा है। काउंसिलिंग, दस्तावेज सत्यापन और फिर अंतिम सूची जारी करने में महीनोंलगा दिए जाते हैं।

दूसरी तरफ, जो अतिथि शिक्षक (Guest Teachers) सालों से बेहद कम मानदेय पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं, उनका भविष्य भी अधर में है। न तो नई नियमित भर्तियां पूरी हो पा रही हैं और न ही अतिथि शिक्षकों के समायोजन को लेकर कोई ठोस नीति बन पा रही है। नतीजा यह है कि स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं और योग्य अभ्यर्थी सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं।"

ASI भर्ती के 1500 पद और रुकी हुई अन्य परीक्षाएं

"शिक्षकों के बाद अब आइए पुलिस महकमे और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की ओर। ASI (सहायक उपनिरीक्षक) भर्ती के लगभग 1500 पदों की चयन सूची महीनों से लटकी हुई है। अभ्यर्थियों ने शारीरिक दक्षता (Physical Test), लिखित परीक्षा सब पार कर लिया। लेकिन चयन सूची जारी क्यों नहीं हो रही? इसका कोई ठोस जवाब किसी विभाग के पास नहीं है।

यही हाल कई अन्य व्यावसायिक और लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं का है:

  • किसी परीक्षा का रिजल्ट रोक दिया जाता है।
  • किसी में मॉडल आंसर-की को लेकर विवाद खड़ा हो जाता है।
  • तो किसी भर्ती प्रक्रिया पर कोर्ट का स्टे (Stay) लग जाता है।

युवा सालों-साल अपने घर-परिवार से दूर रहकर, किराए के कमरों में तंगी की जिंदगी जीकर तैयारी करते हैं। लेकिन जब परीक्षा का परिणाम ही सालों तक न आए, तो उनकी मानसिक स्थिति क्या होगी, इसका अंदाजा किसी अधिकारी या राजनेता को शायद नहीं है।"

लेट-लतीफी' का पैटर्न और युवाओं का नुकसान

"दोस्तों, अगर आप ध्यान से देखें तो हर भर्ती में एक जैसा पैटर्न नजर आता है:

  1. पहले बड़ी धूमधाम से भर्ती का विज्ञापन निकाला जाता है।
  2. फॉर्म भरवाकर करोड़ों रुपये की फीस जमा की जाती है।
  3. फिर रोस्टर या आरक्षण में ऐसी खामियां छोड़ दी जाती हैं, जिससे मामला कोर्ट चला जाए।
  4. और फिर मामला जांच, कोर्ट और प्रशासनिक कमेटियों के चक्कर में सालों तक घूमता रहता है।

इस पूरे खेल में नुकसान किसका होता है? नुकसान उस युवा का होता है जिसकी उम्र सीमा (Age Limit) धीरे-धीरे खत्म हो रही है। नुकसान उस गरीब मां-बाप का होता है जो पेट काटकर अपने बच्चे को पढ़ा रहे हैं।"

"सरकार और प्रशासन को यह समझना होगा कि युवा सिर्फ वोट बैंक नहीं हैं। भर्तियों में पारदर्शिता, समयबद्ध चयन प्रक्रिया और रोस्टर का सही पालन प्रशासन की पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए।

  • 1500 ASI पदों की रुकी हुई सूची तुरंत जारी हो!
  • डी.एड अभ्यर्थियों और शिक्षक भर्ती की मांगों का पारदर्शी हल निकले!
  • 57,000 शिक्षक पदों के वादे पर अमल शुरू हो!
  • और विश्वविद्यालयों में जो गड़बड़ियां हुई हैं, उनकी निष्पक्ष जांच करके दोषियों पर कार्रवाई हो और सही अभ्यर्थियों को मौका मिले!

आपकी इस पूरे मुद्दे पर क्या राय है? क्या आप भी इनमें से किसी भर्ती के अटकने से प्रभावित हुए हैं? कमेंट सेक्शन में अपनी बात जरूर रखें।

#YouthProtest #TeacherRecruitment #ASIRecruitment #JusticeForStudents #EducationSystem

सोमवार, 2 नवंबर 2026

भ्रष्टाचारियों को बचाने का अजब खेल

 भ्रष्टाचारियों को बचाने का अजब खेल



आज बात सिर्फ एक सरकारी खरीदी की नहीं है... आज बात है कि कैसे आम जनता के टैक्स के पैसों पर डाका डाला जाता है और जब मामला सामने आता है, तो छोटे कर्मचारियों को आगे करके बड़े-बड़े मंत्री और सचिव स्तर के लोग पर्दे के पीछे छिप जाते हैं!

रायपुर के आदिम जाति विकास विभाग से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसे सुनकर आपका खून खौल उठेगा। पूरे 1.92 करोड़ रुपये की रोटी मेकर खरीदी! जी हां, सही सुना आपने—रोटी बनाने वाली मशीनों की खरीदी में करोड़ों का घोल! लेकिन सबसे बड़ा तमाशा यह नहीं है कि घोटाला हुआ... तमाशा यह है कि जब मामला खुला, तो सरकार ने क्या किया? सिर्फ एक इंक्रीमेंट (वेतन वृद्धि) रोक कर मामला रफा-दफा करने की कोशिश की!


"आइए पहले मामले को समझते हैं। रायपुर में आदिम जाति विकास विभाग ने 1.92 करोड़ रुपये की रोटी मेकर मशीनें खरीदीं। नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाई गईं। शिकायतकर्ताओं ने जब आवाज उठाई कि घोर अनियमितता हुई है, तब जांच का नाटक शुरू हुआ।

लेकिन देखिए 'सरकारी सजा' का तमाशा! 20 अप्रैल 2026 को लोक सेवा आयोग (PSC) ने असंचयी प्रभाव (non-cumulative) से सिर्फ एक वेतन वृद्धि (increment) रोकने पर सहमति दी!

आप समझ रहे हैं इसका मतलब? इसका मतलब यह है कि सजा सिर्फ नाम-मात्र की है! आगे चल कर सैलरी फिर से नॉर्मल हो जाएगी! 1.92 करोड़ रुपये के घोटाले-आरोप के बदले सिर्फ एक इंक्रीमेंट का कटना? क्या यह सजा है या खानापूर्ति?"

अब आते हैं सबसे बड़े झोल पर! शिकायतों में तत्कालीन सहायक आयुक्त तारकेश्वर देवांगन और विजय कंवर की भूमिका पर सवाल उठे। लेकिन तारकेश्वर देवांगन जी जुलाई 2026 में रिटायर हो गए!

अरे भाई, रिटायरमेंट से ठीक पहले ऐसी मेहरबानी क्यों? शिकायतकर्ताओं ने साफ सवाल उठाया है कि क्या विभागीय कार्रवाई को जानबूझकर इतना हल्का रखा गया ताकि रिटायरमेंट के बाद मामला अपने आप ठंडा पड़ जाए?

आपने उन्हें आसानी से रिटायर होने दिया, उनके बकाया पैसों का भुगतान भी कर दिया! अगर सरकारी खजाने को नुकसान हुआ है, तो उसकी भरपाई कौन करेगा? क्या आम जनता के टैक्स का पैसा ऐसे ही बांटा जाएगा?"

"अब आते हैं सबसे कड़वे और सीधे सवाल पर! शिकायतों और जांच में सिर्फ दो-तीन अफसर के नाम आगे करके मामले को दबा दिया गया। लेकिन असली सवाल यह है:

  • फाइल किसने तैयार की?
  • खरीदी को अप्रूवल (मंजूरी) किस स्तर पर मिली?
  • पेमेंट किसने पास करवाया?
  • नियमों को दरकिनार करने में और कौन-कौन से बड़े अधिकारी शामिल थे?

क्या आपको लगता है कि 1.92 करोड़ का मामला सिर्फ एक सहायक आयुक्त के लेवल पर निपट गया होगा? बिल्कुल नहीं! बात तो यह उठ रही है कि इस पूरे खेल में सचिव स्तर तक पैसा पहुंचने की बातें सामने आ रही हैं! मंत्री तक पर लेन-देन के गंभीर आरोप लग रहे हैं!

जब इतनी बड़ी रकम का लेन-देन होता है, तो कट हर लेवल पर बंटता है! लेकिन जब जांच की बात आती है, तो सिर्फ छोटे अफसर पर एक वेतन वृद्धि रोक कर बाकी पूरे सिस्टम को बचाने की कोशिश की जाती है!"

"सरकार को जवाब देना होगा! अगर यह सिर्फ दो लोगों का मामला था, तो बकाया भुगतान क्यों हुआ? और अगर इसमें बड़े-बड़े सचिव और मंत्री शामिल हैं, तो उन पर एफआईआर और सीबीआई/एसीबी जांच क्यों नहीं?

केवल एक इंक्रीमेंट रोक कर आप 1.92 करोड़ के नुकसान का हिसाब नहीं छिपा सकते। आम जनता की गाढ़ी कमाई की लूट पर यह खानापूर्ति अब नहीं चलेगी!

आप लोग इस विषय पर क्या सोचते हैं? क्या रिटायरमेंट के बाद अफसर को ऐसी मेहरबानी मिलनी चाहिए? क्या मंत्री और सचिव स्तर पर इसकी जांच नहीं होनी चाहिए? मुझे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

स्वास्थ्य सेवा या लूट का धंधा? आयुष्मान योजना में फ़र्ज़ीवाड़ा,

 स्वास्थ्य सेवा या लूट का धंधा? आयुष्मान योजना में फ़र्ज़ीवाड़ा, दवाओं के भारी रेट और सुप्रीम कोर्ट का बड़ा चाबुक!



क्या इलाज करवाना अब आम इंसान के बस की बात नहीं रही? क्या देश का हेल्थकेयर सिस्टम किसी सेवा केंद्र की जगह मनमानी वसूली और झोलझाल का अड्डा बनता जा रहा है?

सोचिए, जिस दवा की असली लागत 10 रुपये है, उसके लिए आपसे 100 या 200 रुपये वसूले जाएँ! और जब सरकार गरीबों के लिए आयुष्मान भारत जैसी योजना चलाए, तो कुछ अस्पताल उसमें भी झोल करके करोड़ों का चूना लगा दें!

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं के बढ़ते दामों, अस्पतालों की मनमानी और हेल्थकेयर में चल रही इस गुंडागर्दी पर जो सख्त रुख अपनाया है, उसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। दूसरी तरफ, ज़मीनी हक़ीकत यह है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (NHA) को अब अस्पतालों की जांच के लिए सख्त कदम उठाने पड़ रहे हैं।

आज की इस रिपोर्ट में हम परत-दर-परत खोलेंगे कि कैसे आम मरीज के जेब पर डाका डाला जा रहा है, छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली तक कौन-कौन से अस्पताल जांच के घेरे में आए हैं, और सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले में केंद्र सरकार और संबंधित तंत्र को क्या अल्टीमेटम दिया है।"

आयुष्मान भारत योजना में गड़बड़ी की पड़ताल]

"सबसे पहले बात करते हैं उस योजना की, जिसे गरीबों का सबसे बड़ा सहारा कहा गया था—आयुष्मान भारत योजना।

लेकिन इस योजना में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की आशंकाओं को देखते हुए जांच तेज़ कर दी गई है। अगर हम केवल छत्तीसगढ़ की बात करें, तो राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (NHA) ने 'VERY HIGH RISK' स्कोर वाले 17 अस्पतालों को चिह्नित किया है, जिनकी अब गहन जांच चल रही है।

ये कौन-कौन से अस्पताल हैं जो जांच के दायरे में हैं?

  • राजनैतिक व प्रशासनिक केंद्र रायपुर के 7 अस्पताल
  • बिलासपुर के 3 अस्पताल
  • दुर्ग के 2 अस्पताल
  • इसके अलावा सरगुजा, बस्तर, कबीरधाम, कोंडागांव और कोरबा का 1-1 अस्पताल इस लिस्ट में शामिल है।

  • एससीएच हॉस्पिटल — बस्तर


    अशोक प्रसूति मंदिर — बिलासपुर


    केयर एन क्योर मल्टी-स्पेशियलिटी हॉस्पिटल — बिलासपुर


    मेहता चिल्ड्रन नर्सिंग होम — बिलासपुर


    श्री शंकराचार्य इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस — दुर्ग


    पल्स हॉस्पिटल — दुर्ग


    जय जगन्नाथ हेल्थकेयर — कबीरधाम


    नेताम हॉस्पिटल एंड इनफर्टिलिटी सेंटर — कोंडागांव


    हरि कृष्णा केयर हॉस्पिटल — कोरबा


    एसआरआईएमएसआर श्री रावतपुरा सरकार हॉस्पिटल — रायपुर


    श्री अनंत साईं हॉस्पिटल — रायपुर


    श्री महावीर हॉस्पिटल — रायपुर


    श्रीनिवास हॉस्पिटल — रायपुर


    एसके केयर हॉस्पिटल — रायपुर


    विजन सेंटर आई हॉस्पिटल — रायपुर


    डीएचटी केयर हॉस्पिटल — सरगुजा


    वरदान हॉस्पिटल — रायपुर


जांच में आखिर क्या-क्या पकड़ा जा रहा है? जांच दल यह देख रहा है कि क्या वाकई मरीजों को आयुष्मान योजना के नियमों के मुताबिक इलाज मिल रहा था या सिर्फ कागजों पर फर्जी मरीज भर्ती दिखाकर सरकारी बजट का गबन किया जा रहा था। भर्ती की प्रक्रिया, दिए गए इलाज की प्रामाणिकता और योजना के तहत जमा किए गए दावों (Claims) की पाई-पाई की पड़ताल की जा रही है।"

कड़ा एक्शन - दो अस्पतालों को योजना से बाहर किया, यह जांच सिर्फ कागजी नहीं है, बल्कि इस पर सख्त एक्शन भी होना शुरू हो गया है।

राज्य स्तरीय जांच दल की अनुशंसा और सिफारिशों के आधार पर रायपुर के दो नामी अस्पतालों पर सीधी गाज गिरी है:

  1. मेडीलाइफ़ हॉस्पिटल (Medilife Hospital)
  2. लोटस हॉस्पिटल (Lotus Hospital)

इन दोनों ही अस्पतालों को आयुष्मान भारत योजना के पैनल से बाहर (Blacklist/Panel Out) करने की प्रक्रिया पूरी कर ली गई है। यह इस बात का सबूत है कि किस तरह से मरीजों के नाम पर फर्जी दावे पेश किए जा रहे थे और योजना का गलत इस्तेमाल हो रहा था।"

दवाओं के रेट में झपलेबाजी और कई गुना वसूली

"अब आइए इस पूरे मामले के सबसे बड़े और खौफनाक पहलू पर—दवाइयों की दरों में झपलेबाजी!

आप जब भी किसी प्राइवेट अस्पताल में भर्ती होते हैं या किसी गंभीर बीमारी का इलाज कराते हैं, तो सबसे बड़ा झटका आपको अस्पताल के बिल और दवाइयों की लिस्ट देखकर लगता है।

  • MRP का खेल: फार्मा कंपनियों द्वारा जेनरिक दवाओं और ब्रांडेड दवाओं पर 500% से लेकर 1000% तक का मार्जिन तय किया जाता है। जिस दवा को बनाने का खर्च 5 से 10 रुपये आता है, उसकी MRP 150 से 200 रुपये छाप दी जाती है।
  • हॉस्पिटल की मनमानी: कई बड़े प्राइवेट अस्पताल मरीजों को बाध्य करते हैं कि वे दवाइयां बाहर से नहीं, बल्कि अस्पताल के अंदर मौजूद अपने मेडिकल स्टोर से ही खरीदें। वहां मरीजों को न तो कोई डिस्काउंट मिलता है और न ही सस्ती जेनेरिक दवाओं का विकल्प दिया जाता है।
  • जरूरत से ज्यादा दवाइयां: जांच में यह भी सामने आया है कि आयुष्मान योजना या कैशलेस बीमा वाले मरीजों के नाम पर ऐसी-ऐसी महंगी दवाइयां और इंजेक्शन बिल में जोड़ दिए जाते हैं, जो मरीज को कभी दिए ही नहीं गए!"

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार और चाबुक] 

"दवाओं की इस खुली लूट और हेल्थकेयर में बढ़ते माफियाराज पर अब देश की शीर्ष अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त रवैया अपनाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान साफ-साफ शब्दों में कहा कि:

'इलाज पाना देश के हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, और स्वास्थ्य सेवा को किसी भी सूरत में अनियंत्रित व्यापार नहीं बनने दियाजा सकता।'

अदालत ने सरकार और नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइजिंग अथॉरिटी (NPPA) को आड़े हाथों लेते हुए पूछा कि अति-आवश्यक दवाओं की कीमतें आम आदमी की पहुंच में लाने के लिए ठोस कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं? सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक दवाओं के मार्जिन और अस्पतालों के चार्ज पर एक पारदर्शी और राष्ट्रीय नीति नहीं बनेगी, तब तक गरीब और मध्यम वर्ग इसी तरह पिसता रहेगा।

अदालत ने यह भी संकेत दिया है कि सरकार को प्राइवेट अस्पतालों के रेट्स और आयुष्मान जैसी योजनाओं में हो रही अनियमितताओं पर पूरे देश में एक सख्त केंद्रीय मॉनिटरिंग सिस्टम बनाना होगा। अगर कोई अस्पताल नियमों की अनदेखी करता है या मरीजों का शोषण करता है, तो सिर्फ पैनल से हटाना काफी नहीं है, बल्कि जिम्मेदार लोगों पर आपराधिक मुकदमे भी दर्ज होने चाहिए।"

सवाल यह उठता है कि आखिर कब तक एक आम इंसान बीमारी के डर से ज्यादा अस्पताल के बिल और दवाओं के रेट से डरता रहेगा?

छत्तीसगढ़ में जो 17 अस्पतालों पर जांच की कार्रवाई शुरू हुई है और जिन दो अस्पतालों को बाहर किया गया है, यह तो बस एक शुरुआत है। अगर हर राज्य में इसी तरह ईमानदारी से निष्पक्ष जांच हो, तो देश भर के सैंकड़ों फर्जीवाड़े करने वाले अस्पताल बेनकाब होंगे।

सुप्रीम कोर्ट की इस फटकार के बाद अब गेंद केंद्र और राज्य सरकारों के पाले में है। क्या सरकारें दवाओं के एमआरपी (MRP) के खेल को खत्म करेंगी? क्या आयुष्मान योजना का लाभ वाकई बिना किसी झोल के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचेगा?

आपकी इस पर क्या राय है? क्या आपके साथ या आपके किसी परिचित के साथ भी कभी दवाओं या अस्पताल के बिलों में इस तरह की मनमानी हुई है? हमें कमेंट सेक्शन में लिखकर जरूर बताएं।