छत्तीसगढ़ में 'वर्दी' का दम घोंट रही सियासत? दिल्ली की दौड़ में सूबे के होनहार IPS!
खास रिपोर्ट: कैडर रिव्यू में लेत-लतीफी, नेताओं की 'दबंगई' और कॉरपोरेट-पॉलिटिकल नेक्सस से व्यथित होकर केंद्रीय प्रतिनियुक्ति की कतार में खड़े हुए छत्तीसगढ़ के कई आला पुलिस अफसर; कानून-व्यवस्था पर उठ रहे गंभीर सवाल।
छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक और पुलिसिया गलियारों में इन दिनों एक बेहद संवेदनशील और चौंकाने वाली चर्चा आम है— *'क्या छत्तीसगढ़ के होनहार और कड़क आईपीएस अधिकारियों का राज्य में दम घुट रहा है?'* यह सवाल इसलिए मौजूं हो गया है क्योंकि राज्य के कई सीनियर और काबिल आईपीएस (IPS) अफसर अचानक छत्तीसगढ़ छोड़कर दिल्ली (केंद्रीय प्रतिनियुक्ति) जाने के लिए बेताब दिखाई दे रहे हैं। प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि जब पुलिसिंग पर सियासत का पहिया जरूरत से ज्यादा भारी होने लगता है, तो वर्दीधारी अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए 'डेपुटेशन' के आवेदन को ही आखिरी हथियार बना लेते हैं।
कहा जा रहा है कि मौजूदा 'डबल इंजन' सरकार के दौर में आईपीएस लॉबी के भीतर असंतोष की एक अंडरकरेंट दौड़ रही है। राज्य के भीतर कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति और हाल ही में असम में छत्तीसगढ़ पुलिस के साथ हुए बेहद शर्मनाक वाकये ने इस आग में घी का काम किया है।
## **फुटबॉल बनी 'खाकी': कैडर रिव्यू में देरी और लूप लाइन का खेल**
जानकारों का मानना है कि छत्तीसगढ़ में आईपीएस अधिकारियों को राजनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर 'फुटबॉल' बनाकर रख दिया गया है। राज्य में लंबे समय से लंबित **कैडर रिव्यू (Cadre Review) में हो रही देरी** और वरिष्ठ पदों की कमी के चलते कई अधिकारियों को अपना भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा है। वरिष्ठता और काबिलियत को नजरअंदाज कर चहेतों को मलाईदार पोस्टिंग देने और फील्ड में बेहतर रिकॉर्ड रखने वाले प्रभावशाली अफसरों को 'लूप लाइन' में धकेलने के खेल ने पुलिस महकमे के भीतर गहरा नैराश्य पैदा किया है।
अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर भेजने का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा है। पूर्व में अमित कुमार, नीतू कमल और दालूरी श्रवण जैसे अधिकारी केंद्र जा चुके हैं, तो वहीं हाल के दिनों में अभिषेक सांडिल, रामगोपाल गर्ग, दीपक झा और जितेंद्र सिंह मीणा जैसे नामी अफसरों ने भी दिल्ली की राह पकड़ ली है। अब कतार में कुछ और बड़े नाम हैं।
> **संतोष सिंह और अमरेश मिश्रा भी कतार में!**
> औद्योगिक बेल्ट रायगढ़, कवर्धा समेत कई जिलों की कमान सफलतापूर्वक संभाल चुके आईपीएस **संतोष सिंह** का स्वयं इच्छा से दिल्ली डेपुटेशन पर जाने की तैयारी करना चौंकाता है। वहीं, राज्य के सबसे पावरफुल और चर्चित चेहरों में से एक— एसीबी (ACB) चीफ **अमरेश मिश्रा** के भी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने की गंभीर चर्चाएं हैं। सवाल उठ रहा है कि यदि इतने रसूखदार और रडार पर रहने वाले अधिकारी राज्य छोड़ना चाहते हैं, तो पर्दे के पीछे की कहानी कितनी पेचीदा होगी?
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## **नेताओं की 'चमकाऊ' नीति और कॉरपोरेट की गुलामी का आरोप**
अखबार को मिले इनपुट्स के अनुसार, छत्तीसगढ़ में इन दिनों पुलिसिंग का ढर्रा पूरी तरह बदल चुका है। विपक्ष और अंदरूनी सूत्रों का आरोप है कि पुलिस को अपराधियों को पकड़ने के बजाय **'कॉरपोरेट घरानों की चौकीदारी'** में झोंक दिया गया है। जमीनी स्तर पर अपराध बढ़ रहे हैं, लेकिन पुलिस के आला अफसरों को कथित तौर पर निर्देश हैं कि वे कॉरपोरेट हितों की रक्षा को प्राथमिकता दें।
इसके अलावा, सत्ताधारी दल के स्थानीय नेताओं और रसूखदारों की 'दबंगई' ने पुलिस के इकबाल को भारी चोट पहुंचाई है। सोशल मीडिया पर हाल ही में ऐसे कई वीडियो वायरल हुए हैं जहां कभी कलेक्टर तो कभी एसपी और थानेदारों को सरेआम 'चमकाने' (धमकाने) की कोशिश की गई। जब थाने से लेकर जिला मुख्यालय तक राजनीतिक दबाव इस कदर हावी हो जाए कि जायज कार्रवाई पर भी नेताओं की डांट सुननी पड़े, तो वर्दी का स्वाभिमान डगमगाना लाजमी है।
## **सांसदों की 'गोटी' और वसूली के संगीन आरोप**
इस पूरे खेल का एक और स्याह पहलू भी सामने आ रहा है। गलियारों में सुगबुगाहट है कि छत्तीसगढ़ से दिल्ली भागने की इस होड़ में कुछ अफसर बकायदा दिल्ली में बैठे प्रभावशाली सांसदों के जरिए अपनी 'गोटी' फिट कर रहे हैं। चर्चा तो यहां तक है कि पसंदीदा केंद्रीय विंग (जैसे CBI, IB या NIA) में जगह पाने के लिए बड़े स्तर पर 'लेनदेन' और 'सेटिंग' का खेल चल रहा है।
दूसरी तरफ, राज्य की सबसे बड़ी जांच एजेंसी एसीबी-ईओडब्ल्यू पर भी दाग लगे हैं। हालांकि अमरेश मिश्रा के कमान संभालने के बाद पटवारियों, आरआई और एसडीएम पर ताबड़तोड़ कार्रवाई हुई है; लेकिन राज्य के चर्चित शराब घोटाला, कोयला परिवहन घोटाला, डीएमएफ और पीएससी घोटाले के आरोपियों से **'एजेंसी के ही कुछ अफसरों द्वारा मोटी वसूली'** किए जाने के संगीन आरोप लगे हैं। नव्या मलिक ड्रग्स केस में भी डायरी के कुछ कथित पन्ने सोशल मीडिया पर तैरते रहे, जो खाकी की साख पर बट्टा लगाते हैं।
## **असम कांड: जब अपनों ने ही अपनों की 'भद्र' पीटी!**
इस पूरे प्रशासनिक संकट के बीच, हाल ही में असम के गुवाहाटी में जो हुआ, उसने छत्तीसगढ़ पुलिस के मनोबल को पाताल में धकेल दिया है। डिजिटल अरेस्ट के एक बड़े मामले में अपराधियों को दबोचने गई छत्तीसगढ़ पुलिस की टीम को वहां की स्थानीय जनता के विरोध के बाद **असम पुलिस ने ही हिरासत में ले लिया।**
यह घटना छत्तीसगढ़ सरकार की कूटनीति और पुलिस समन्वय पर बहुत बड़ा तमाचा है।
1. **पहला सवाल:** क्या छत्तीसगढ़ पुलिस ने असम जाने से पहले कानूनी और वैधानिक प्रक्रियाओं के तहत वहां की पुलिस को सूचना नहीं दी थी?
2. **दूसरा सवाल:** केंद्र, असम और छत्तीसगढ़— तीनों जगह भारतीय जनता पार्टी (BJP) की 'डबल-ट्रिपल इंजन' सरकार होने के बावजूद राज्यों के बीच इतना खराब कोऑर्डिनेशन क्यों है?
अपराधियों को पकड़ने गई पुलिस जब खुद हवालात की हवा खाने लगे, तो इससे अपराधियों के हौसले बुलंद होना और पुलिस का मनोबल टूटना तय है।
## **दावे बनाम हकीकत: सरकार के 'ऑल इज वेल' पर भारी पड़ते सवाल**
इस पूरे बवाल पर जब मुख्यमंत्री और गृह मंत्री (विजय शर्मा) से बात की जाती है, तो सरकार का आधिकारिक रुख यही होता है कि *"राज्य में कानून व्यवस्था सुदृढ़ है और सब कुछ ठीक चल रहा है।"* तकनीकी रूप से यह भी दलील दी जाती है कि नियमों के मुताबिक हर आईपीएस को केंद्र में 2 साल सेवाएं देनी ही होती हैं।
लेकिन कागजी नियमों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर साफ दिख रहा है। यदि राज्य में काम करने का माहौल इतना ही बेहतरीन है, तो अचानक से होनहार अफसरों की फौज छत्तीसगढ़ को 'बाय-बाय' कहने के लिए इतनी उतावली क्यों है? बहरहाल, देखना दिलचस्प होगा कि गृह मंत्रालय इस प्रशासनिक असंतोष को कैसे थामता है, या फिर आने वाले दिनों में कुछ और बड़े आईपीएस अफसर छत्तीसगढ़ से बोरिया-बिस्तर समेटकर दिल्ली कूच कर जाते हैं।
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