मंगलवार, 25 अगस्त 2026

डिजिटल जाल और अदृश्य अपराधी


 डिजिटल जाल और अदृश्य अपराधी

आपके एक क्लिक की कीमत: डीपफेक, एआई और साइबर ठगी का नया खौफनाक दौर

विशेष रिपोर्ट

1. एक अनजान कॉल और जिंदगी भर की कमाई गायब

"हेलो, मैं साइबर क्राइम ब्रांच से बात कर रहा हूँ। आपके नाम पर एक पार्सल ज़ब्त हुआ है, जिसमें अवैध सामान पाया गया है। अगर आप सहयोग नहीं करेंगे, तो 2 घंटे के भीतर आपको गिरफ्तार कर लिया जाएगा।"

दिल्ली के एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर के फोन पर आई इस एक कॉल ने उनके जीवन भर की जमापूंजी छीन ली। स्क्रीन पर दिख रहा व्यक्ति पुलिस की वर्दी में था, बैकग्राउंड में सरकारी दफ्तर जैसा ढांचा था और आवाज में वही कड़ापन था जो किसी असली अधिकारी का होता है। 72 घंटे के 'डिजिटल अरेस्ट' (Digital Arrest) के मानसिक दबाव में आकर उन्होंने अपने जीवन की पूरी बचत—लगभग 85 लाख रुपये—ठगों के बताए बैंक खातों में ट्रांसफर कर दिए।

यह केवल एक प्रोफेसर की कहानी नहीं है। हर रोज देश के अलग-अलग कोनों से ऐसी दर्जनों खबरें सामने आ रही हैं, जहाँ पढ़े-लिखे, आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करने वाले लोग भी साइबर अपराधियों के बिछाए जाल में फंस रहे हैं।

तकनीक जितनी तेजी से हमारी जिंदगी को आसान बना रही है, उससे कहीं अधिक तेजी से अपराधियों को ठगी के नए और खतरनाक हथियार दे रही है।

2. डीपफेक और AI: जब आपकी आँखें और कान भी धोखा खा जाएं

अब साइबर अपराध केवल किसी से OTP माँगने या फर्जी लकी ड्रॉ का झांसा देने तक सीमित नहीं रहा। आर्टिफिशिअल इंटेलिजेंस (AI) और डीपफेक (Deepfake) तकनीक ने इस खेल को एक नया और भयावह रूप दे दिया है।

 वॉइस क्लोनिंग (Voice Cloning): हालिया मामलों में देखा गया है कि ठग किसी व्यक्ति की महज 3-4 सेकंड की ऑडियो क्लिप (जो सोशल मीडिया पर रील्स या वीडियो से ली जाती है) से उसकी आवाज की सटीक नकल (Clone) बना लेते हैं। इसके बाद रिश्तेदारों या माता-पिता को फोन कर रोते हुए आवाज में एक्सीडेंट या पुलिस केस का हवाला देकर तुरंत पैसे मंगाए जाते हैं।

 वीडियो सिंथेसिस (Video Synthesis): डीपफेक के जरिए चेहरे बदलकर फर्जी वीडियो कॉल की जाती हैं। पीड़ित को लगता है कि वह अपने किसी परिचित या किसी बड़े अधिकारी से बात कर रहा है, जबकि असल में वह एआई के बनाए एक डिजिटल मुखौटे को देख रहा होता है।

मामला जो देश में गूँजा:

हाल ही में एक बिजनेसमैन को उनके पुराने दोस्त की वीडियो कॉल आई। वीडियो में दोस्त का चेहरा और आवाज बिल्कुल असली थी, जिसने इमरजेंसी का हवाला देकर 40 लाख रुपये ट्रांसफर करने को कहा। पैसे भेजने के बाद जब बिजनेसमैन ने असली दोस्त से संपर्क किया, तो पता चला कि उसने ऐसा कोई फोन ही नहीं किया था।

3. 'डिजिटल अरेस्ट': डर का नया मनोविज्ञान

आजकल साइबर अपराधियों का सबसे पसंदीदा हथियार है—मानसिक दबाव और डर।

यह कैसे काम करता है?

1. पहला कदम (फर्जी आरोप): आपको फोन कर बताया जाता है कि आपके आधार कार्ड या मोबाइल नंबर का इस्तेमाल किसी राष्ट्रविरोधी गतिविधि, मनी लॉन्ड्रिंग या ड्रग्स तस्करी में हुआ है।

2. दूसरा कदम (डिजिटल अरेस्ट): आपको Skype या WhatsApp वीडियो कॉल पर जुड़ने के लिए मजबूर किया जाता है। कमरे से बाहर जाने या किसी से बात करने पर सख्त पाबंदी लगा दी जाती है।

3. तीसरा कदम (ब्लैकमेलिंग): जांच के नाम पर आपके बैंक खातों का ब्योरा मांगा जाता है और 'वेरीफिकेशन' के नाम पर सारे पैसे एक सुरक्षित अकाउंट में भेजने को कहा जाता है।

भारतीय गृह मंत्रालय और नेशनल साइबर अपराध पोर्टल ने बार-बार स्पष्ट किया है कि कानून में 'डिजिटल अरेस्ट' नाम की कोई प्रक्रिया अस्तित्व में नहीं है। कोई भी पुलिस या जांच एजेंसी वीडियो कॉल पर किसी को अरेस्ट नहीं करती और न ही पैसे की मांग करती है।

4. 'जामताड़ा' से आगे का 'अदृश्य नेटवर्क'

एक समय था जब साइबर अपराध झारखंड के छोटे से इलाके 'जामताड़ा' तक सीमित माना जाता था, जहाँ से फर्जी बैंक कर्मचारी बनकर OTP माँगे जाते थे। लेकिन अब यह सिंडिकेट वैश्विक रूप ले चुका है।

 कंबोडिया, म्यांमार और लाओस के साइबर कैंप: रिपोर्टों के अनुसार, दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में बड़े-बड़े साइबर सिंडिकेट चल रहे हैं, जहाँ भारतीय युवाओं को अच्छी नौकरी का झांसा देकर ले जाया जाता है और फिर उनसे भारत के लोगों के खिलाफ डिजिटल ठगी करवाई जाती है।

 म्यूल अकाउंट्स (Mule Accounts): ठगी का पैसा सीधे अपराधियों के खाते में नहीं जाता। वे गरीब या अनपढ़ लोगों के डाक्यूमेंट्स पर फर्जी बैंक खाते खुलवाते हैं (जिन्हें म्यूल अकाउंट कहा जाता है)। पैसा इनमें आता है और मिनटों में क्रिप्टो-करेंसी या अन्य माध्यमों से विदेश ट्रांसफर हो जाता है।

5. बचाव ही एकमात्र सुरक्षा कवच है

डिजिटल दुनिया में सुरक्षा के लिए किसी भी कानून या पुलिस से ज्यादा आपकी सतर्कता मायने रखती है। साइबर विशेषज्ञों के अनुसार, इन 5 नियमों का पालन करके 99% ठगी से बचा जा सकता है:


सोमवार, 24 अगस्त 2026

खाकी पर सुप्रीम सवाल — हिरासत में मौत और पुलिस महकमे की साख पर बट्टा

 खाकी पर सुप्रीम सवाल — हिरासत में मौत और पुलिस महकमे की साख पर बट्टा


 महज ₹100 की शराब जब्ती का मामला, ढाई साल तक एफआईआर दबाने की कोशिश और शीर्ष अदालत की कड़ी टिप्पणी: "छत्तीसगढ़ में न्याय मिलना मुश्किल"

जब अदालत के इतिहास में उठा अभूतपूर्व सवाल

किसी भी राज्य की कानून व्यवस्था की कमान उस प्रदेश के सबसे बड़े पुलिस अधिकारी यानी डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (DGP) के हाथों में होती है। लेकिन जब देश की शीर्ष अदालत (Supreme Court) भरी अदालत में किसी राज्य के सबसे बड़े पुलिस कप्तान की कार्यशैली और प्रशासनिक क्षमता पर सवाल उठा दे, तो मामला केवल एक पुलिसिया चूक का नहीं रह जाता, बल्कि पूरे शासन-प्रशासन की नियत पर बड़ा सवाल बन जाता है।

छत्तीसगढ़ में बिगड़ती कानून व्यवस्था, बढ़ते अपराध और पुलिस कस्टडी में मौतों को लेकर राजनीतिक गलियारों में पहले से ही घमासान मचा हुआ था। लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ के सामने आए एक कस्टोडियल डेथ (Custodial Death) के मामले ने पूरे महकमे को हिलाकर रख दिया है।

2. मामला: ₹100 की शराब और एक जान की कीमत

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत जनवरी 2024 में हुई थी [03:20]। छत्तीसगढ़ पुलिस ने एक 34 वर्षीय व्यक्ति को हिरासत में लिया। आरोपी पर महज ₹100 की अवैध शराब रखने का मामूली आरोप था [03:41]।

लेकिन गिरफ्तारी के मात्र तीन दिन भीतर ही उस व्यक्ति की तबीयत बिगड़ने का हवाला दिया गया और अस्पताल ले जाते समय उसकी मौत हो गई [03:53]। पुलिस का शुरुआती रुख हमेशा की तरह यही था कि यह एक स्वाभाविक मौत (Natural Death) है [04:02]।

3. न्यायिक जांच से पर्दाफाश: स्वाभाविक नहीं, जानलेवा हमला

पुलिस की इस थ्योरी को मृतक की पत्नी (लहराबाई) और उनकी बेटियों ने सिरे से खारिज कर दिया [04:13]। परिजन न्याय के लिए दर-दर भटकते रहे। जब प्रशासनिक दबाव बढ़ा, तो मामले की न्यायिक जांच के आदेश दिए गए [04:44]।

जब न्यायिक जांच की रिपोर्ट सामने आई, तो पुलिस की बनाई कहानी की धज्जियां उड़ गईं:

 जांच रिपोर्ट का निष्कर्ष: रिपोर्ट में साफ दर्ज था कि व्यक्ति की मौत स्वाभाविक नहीं थी [04:54]।

 मौत का कारण: सिर पर किसी भारी, ठोस या धारहीन हथियार (Blunt Weapon) से मारी गई गंभीर चोट के कारण मौत हुई थी [05:05]।

नियम के मुताबिक, इस रिपोर्ट के आते ही कस्टोडियल टॉर्चर का मामला दर्ज कर दोषी पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया जाना चाहिए था, लेकिन प्रशासनिक ढिलाई का आलम यह रहा कि घटना जनवरी 2024 की थी और एफआईआर जुलाई 2026 (लगभग ढाई साल बाद) दर्ज की गई [06:07]।

4. सुप्रीम कोर्ट का रुख: "राज्य में न्याय मिलना मुश्किल"

स्थानीय स्तर पर जब सुनवाई के सारे दरवाजे बंद महसूस हुए, तो पीड़ित परिवार ने सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया [06:28]।

मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत का पारा गर्म हो गया। कोर्ट ने पूछा कि ढाई साल तक एफआईआर दर्ज क्यों नहीं हुई? जब राज्य के डीजीपी से जवाब मांगा गया, तो उनकी दलील थी कि जांच रिपोर्ट से कोई 'संज्ञेय अपराध' स्पष्ट नहीं हो रहा था [07:04]।

इस दलील पर जस्टिस संदीप मेहता की तीखी टिप्पणी आई:

हमें यह दर्ज करते हुए खेद हो रहा है कि राज्य के डीजीपी पूरी तरह अयोग्य हैं... क्या सिर पर गंभीर चोट से हुई मौत अपराध की श्रेणी में नहीं आती?"

अदालत ने न केवल अवमानना (Contempt) की चेतावनी दी, बल्कि यह भी संकेत दिया कि चूंकि राज्य प्रशासन निष्पक्ष जांच करने में सक्षम नहीं दिखता, इसलिए मामले की जांच किसी स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी को सौंपी जानी चाहिए [08:06]।

5. राजनीतिक घेराबंदी और विपक्षी हमला

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद राज्य में राजनीतिक पारा चढ़ गया है [02:11]:

 गृह मंत्री पर निशाना: विपक्षी दल (कांग्रेस) गृह मंत्री और प्रशासन से लगातार इस्तीफे की मांग कर रहे हैं [00:20]।

 सड़कों पर विरोध: राजधानी से लेकर जिलों तक में बढ़ते अपराध, नशे के कारोबार और ढीली पुलिसिंग को लेकर पुतला दहन और जोरदार प्रदर्शन जारी हैं [02:24]।

 पुराने मामलों की याद: अंबिकापुर के चर्चित मामलों में भी कस्टोडियल हिंसा को लेकर कोर्ट की ऐसी ही सख्त सख्त हिदायतें सामने आ चुकी हैं [08:45]।

6. निष्कर्ष: साख बचाने की चुनौती

यह मामला सिर्फ ₹100 की शराब जब्ती या एक लॉकेअप मौत तक सीमित नहीं है। यह सवाल उठाता है उस लोकतांत्रिक व्यवस्था पर जो आम नागरिकों की सुरक्षा के लिए बनी है। यदि कस्टडी में हुई हिंसा और मौतों पर पर्दा डालने की कोशिश होगी, तो आम जनता का भरोसा कानून से उठने लगेगा।

शीर्ष अदालत का यह रुख पूरे प्रशासनिक और पुलिस ढांचे के लिए एक बड़ा सबक है। अब देखना यह है कि इस करारी फटकार के बाद शासन स्तर पर क्या ठोस सुधारात्मक कदम उठाए जाते हैं और दोषियों पर क्या कार्रवाई होती है

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रविवार, 23 अगस्त 2026

राजनीतिक वर्चस्व की अघोषित जंग: राजनांदगांव में श्रेय लेने की होड़ और बिखरता संगठन

 राजनीतिक वर्चस्व की अघोषित जंग: राजनांदगांव में श्रेय लेने की होड़ और बिखरता संगठन


 एक ही क्षेत्र, एक ही पार्टी, लेकिन दिग्गजों के चार ठिकाने! जानिए कैसे विकास कार्यों से लेकर तबादलों तक 'क्रेडिट वार' में उलझ कर रह गई है राजनीति।

भूमिका: सत्ता के भीतर 'सह और मात' का खेल

छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों सबसे ज़बरदस्त राजनीतिक खींचतान का केंद्र बना हुआ है—राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र [00:07]। बाहर से शांत दिखने वाले इस क्षेत्र के अंदर सत्ता और संगठन के चार बड़े और कद्दावर चेहरों के बीच अघोषित जंग छिड़ चुकी है [00:43]।

विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह, डिप्टी सीएम विजय शर्मा, दो बार के सांसद संतोष पांडे और पंडरिया विधायक भावना बोहरा—ये सभी एक ही राजनीतिक दल से ताल्लुक रखते हैं [00:18]। लेकिन क्षेत्र में अपना एकछत्र वर्चस्व कायम करने और हर विकास कार्य का 'क्रेडिट' बटोरने की यह होड़ अब सरेआम हो चुकी है [00:43]।

1. नेशनल हाईवे-30: जब एक ही मांग पर दोबारा खिंची तस्वीर

श्रेय लेने की राजनीति का सबसे ताज़ा उदाहरण राष्ट्रीय राजमार्ग 30 (धवईपानिया से सिमगा) के चौड़ीकरण और उन्नयन के मामले में देखने को मिला [03:02]।

 हकीकत: प्रदेश के डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने मार्च 2026 में ही केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को पत्र लिखा था [03:34]। इसके बाद जून 2026 में कवर्धा-सिमगा हिस्से के डीपीआर का टेंडर भी बाकायदा जारी हो चुका था [03:58]।

 श्रेय की होड़: इसके बावजूद अगस्त 2026 में सांसद संतोष पांडे केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से मिलकर उसी सड़क की मांग का फोटो सोशल मीडिया पर शेयर करते नजर आए [03:14]। सवाल उठा कि क्या सांसद महोदय को जून में जारी टेंडर की खबर नहीं थी, या फिर यह सिर्फ तस्वीर खिंचाकर क्रेडिट बटोरने का प्रयास था? [04:07]

2. 7 साल पुरानी रेल लाइन की 'नई' स्वीकृति का दांव

क्रेडिट वार का दूसरा बड़ा मामला कटघोरा-डोंगरगढ़ रेल परियोजना को लेकर सामने आया [05:47]।

 सरकारी दावा: हाल ही में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, सांसद संतोष पांडे और केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू ने दावा किया कि केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से मुलाकात के बाद इस परियोजना की 'नई स्वीकृति' मिली है [06:40]।

 विपक्ष की चुटकी और जमीनी सच: कांग्रेस ने इस दावे की धज्जियां उड़ाते हुए याद दिलाया कि 6 अक्टूबर 2018 को तत्कालीन रेल मंत्री पीयूष गोयल, तत्कालीन सीएम डॉ. रमन सिंह और तत्कालीन सांसद अभिषेक सिंह की मौजूदगी में इस लाइन का भूमिपूजन पहले ही हो चुका था [07:30]। जो परियोजना 7 साल पहले स्वीकृत होकर ठप पड़ी थी, उसे 'नई परियोजना' बताकर श्रेय लेने की होड़ पर जमकर सवाल उठे [07:55]।

3. 'गायब नाम' और 'तबादलों पर ठन'

यह खींचतान सिर्फ विकास कार्यों के टेंडर तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासनिक फैसलों और सार्वजनिक कार्यक्रमों के निमंत्रण पत्रों में भी हावी है:

 निमंत्रण पत्रों से दूरी: हाल ही में रायपुर में आयोजित सेन समाज के बड़े कार्यक्रम में जिले भर के नेताओं के नाम निमंत्रण पत्र में थे, लेकिन कद्दावर नेता बृजमोहन अग्रवाल का नाम गायब था [01:24]। इसी तरह जंगल सफारी के उद्घाटन कार्यक्रम में विधायक भावना बोहरा का नाम गायब रहने पर भी भारी बवाल हुआ था [04:37]।

 थानेदार का तबादला: सूत्रों के अनुसार, एक मामूली थानेदार के तबादले को लेकर विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह और डिप्टी सीएम विजय शर्मा के बीच खींचतान की स्थितियां बन गई थीं [05:22]।

4. असमंजस में कार्यकर्ता: सामूहिक इस्तीफे से बढ़ा तनाव

नेताओं की इस आपसी प्रतिस्पर्धा ने धरातल पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को पूरी तरह भ्रमित कर दिया है [08:29]।

 डोंगरगढ़ में इसी अंदरूनी राजनीति से तंग आकर 100 से अधिक कार्यकर्ताओं ने सामूहिक इस्तीफा दे दिया [08:39]।

 हालांकि, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष किरण सिंहदेव ने कुछ कड़े फैसले लेकर डैमेज कंट्रोल की कोशिश की [08:50], लेकिन कवर्धा, पंडरिया, राजनांदगांव, अंबागढ़ चौकी और मोहला-मानपुर जैसे इलाकों में कार्यकर्ताओं के बीच दबाव और डर का माहौल बना हुआ है [09:09]।

निष्कर्ष: आगे क्या?

एक ही फ्लाईओवर, एक ही सड़क और एक ही रेल प्रोजेक्ट के लिए सोशल मीडिया पर अलग-अलग पोस्टरों और प्रेस रिलीज के जरिए श्रेय की राजनीति चरम पर है [09:36]। विकास के दावों के बीच राजनांदगांव का यह 'पावर गेम' संगठन को किस मोड़ पर ले जाएगा, यह आने वाला वक्त ही बताएगा

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शनिवार, 22 अगस्त 2026

एक तरफ शराब की दुकान, दूसरी तरफ नशा-मुक्ति अभियान!

 एक तरफ शराब की दुकान, दूसरी तरफ नशा-मुक्ति अभियान!



 सत्ता का दोहरा चरित्र: टैक्सपेयर्स के पैसों पर विज्ञापनों का खेल और पुलिस के डंडे के बल पर शराब का कारोबार

1. सत्ता का अनोखा 'डबल गेम'

छत्तीसगढ़ में इन दिनों साय सरकार का एक अनोखा 'डबल गेम' देखने को मिल रहा है [00:08]। एक ऐसा खेल जिस पर जनता हंसे या रोए, समझ नहीं आता [00:16]।

 पहला पहलू: किसी इलाके में जब ग्रामीण और महिलाएं शराब दुकान का विरोध करते हैं, तो सरकार आबकारी विभाग और भारी पुलिस बल लगाकर लाठी-डंडों के दम पर जबरन दुकान खुलवाती है [00:40]।

 दूसरा पहलू: दूसरी तरफ यही सरकार जनता की कमाई से जमा हुए करोड़ों-अरबों रुपये (टैक्सपेयर्स का पैसा) पानी की तरह बहाकर 'नशा-मुक्ति अभियान' के बड़े-बड़े पोस्टर-बैनर चमकाती है [00:51]।

यह वही बात हो गई—"चोर से कहो चोरी करो, और गृहस्थ से कहो जागते रहो!" [04:08]

2. बीजापुर का संगमपल्ली: स्कूल मांग रहे थे, मिली शराब की दुकान

छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के भोपालपटनम विकासखंड स्थित संगमपल्ली गांव की घटना सरकार की नीतियों की पोल खोलती है [01:19]।

 संगमपल्ली के ग्रामीण लगातार स्कूल, अस्पताल और बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे हैं [02:14]।

 लेकिन सरकार ने गांव में शासकीय विदेशी मदिरा दुकान खोलने का ऐलान कर दिया [01:32]।

 जब ग्रामीणों ने इसका विरोध किया, तो आबकारी विभाग ने समाधान तलाशने के बजाय बीजापुर SP को पत्र लिखकर पुलिस बल उपलब्ध कराने की मांग कर दी ताकि विरोध को दबाकर दुकान खोली जा सके [02:45]।

3. ओवररेटिंग का खेल और ₹3,870 करोड़ का घोटाला?

वीडियो में वरिष्ठ पत्रकार कौशल तिवारी द्वारा उठाए गए आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में शराब की ओवररेटिंग का बड़ा सिंडिकेट चल रहा है [05:05]:

 दैनिक मदिरा बिक्री (सरकारी दावा): लगभग 28,65,000 बोतलें [05:17]।

 अवैध ओवररेटिंग वसूली: हर बोतल पर ₹15 से अधिक की अतिरिक्त वसूली होती है [05:17]।

 दैनिक अवैध कमाई: लगभग ₹4.29 करोड़ प्रतिदिन [05:23]।

 वार्षिक गणित: यह आंकड़ा ₹1,548 करोड़ प्रति वर्ष बैठता है [05:32]।

 ढाई साल का हिसाब: लगभग ₹3,870 करोड़ की अवैध वसूली [05:05]।

बड़ा सवाल: क्या ED, CBI या EOW जैसी केंद्रीय एजेंसियां इस कथित ओवररेटिंग सिंडिकेट की जांच करने का साहस दिखाएंगी [05:40]?

4. 'महतारी वंदन' का ढोंग और स्मार्ट मीटर का बोझ

सरकार एक हाथ से 'महतारी वंदन योजना' में महिलाओं को पैसे देने का प्रचार करती है [03:04], लेकिन दूसरे हाथ से:

1. गांव-गांव शराब की दुकानें खोलकर घरों की शांति और आर्थिक स्थिति भंग की जा रही है [03:11]।

2. स्मार्ट मीटर के नाम पर बिजली बिलों से भारी वसूली की तैयारी है [03:04]।

3. गुजरात व अन्य राज्यों से आ रहे सूखे नशे पर रोक लगाने में कानून-व्यवस्था पूरी तरह विफल दिखती है [04:41]।

5. राष्ट्रीय मॉडल से जुड़ाव (मोदी शासन व डबल इंजन सरकार पर तंज)

केंद्र व राज्यों की तथाकथित 'डबल इंजन' सरकारों में एक पैटर्न साफ दिखाई देता है:

 इवेंट मैनेजमेंट पब्लिसिटी: विज्ञापनों और सरकारी अभियानों (जैसे नशा मुक्त भारत या नशामुक्ति पखवाड़ा) के जरिए ब्रांडिंग की जाती है [03:59]।

 कॉर्पोरेट रेवेन्यू सिंडिकेट: धरातल पर नीतियां इस तरह बनाई जाती हैं कि शराब और राजस्व सिंडिकेट को फलने-फूलने दिया जाए, भले ही उसके लिए पुलिस बल का इस्तेमाल क्यों न करना पड़े

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