शुक्रवार, 22 मई 2026

छत्तीसगढ़ के हक पर 'सर्जिकल स्ट्राइक', मुनाफे वाली कंपनी गई

छत्तीसगढ़ के हक पर 'सर्जिकल स्ट्राइक', मुनाफे वाली कंपनी गई 


 छत्तीसगढ़ के संसाधनों और औद्योगिक पहचान पर दिल्ली से एक और बड़ा प्रहार हुआ है। हसदेव के जंगलों में चल रही हलचल के बीच, अब मध्य भारत के स्टील हब 'भिलाई' की धड़कन कहे जाने वाले फेरो स्क्रैप निगम लिमिटेड (FSNL) को केंद्र सरकार ने विदेशी हाथों में सौंप दिया है। लगातार मुनाफे में चल रही और भिलाई स्टील प्लांट (BSP) की रीढ़ मानी जाने वाली इस सरकारी कंपनी को जापान की 'कोनोई ट्रांसपोर्ट कंपनी लिमिटेड' (Konoike Transport Co. Ltd.) ने महज 320 करोड़ रुपये की उच्चतम बोली लगाकर खरीद लिया है।

इस सौदे के सामने आते ही भिलाई सहित पूरे प्रदेश के श्रमिक संगठनों, जागरूक नागरिकों और राजनीतिक गलियारों में आक्रोश का माहौल है। सवाल उठ रहे हैं कि जो कंपनी खुद हर साल सरकार की झोली में करोड़ों का मुनाफा डाल रही थी, उसे बेचने की इतनी जल्दबाजी क्यों थी?

कैसा अर्थशास्त्र: 3 साल के मुनाफे की कीमत पर पूरी कंपनी साफ!

विभागीय सूत्रों और वित्तीय आंकड़ों पर नजर डालें तो FSNL का यह विनिवेश किसी बड़े घोटाले से कम नजर नहीं आता।

 सालाना मुनाफा: FSNL कोई बीमार या घाटे में चल रही इकाई नहीं थी। यह हर साल औसतन 100 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा कमाकर केंद्र सरकार को दे रही थी।

 पेंडिंग ऑर्डर्स: विनिवेश के वक्त भी कंपनी के पास स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAIL) के विभिन्न प्लांटों से जुड़े 1000 करोड़ रुपये से अधिक के ठेके (वर्क ऑर्डर) पेंडिंग थे।

 खुद की संपत्ति: कंपनी के पास 50 करोड़ रुपये से अधिक की तो अपनी अचल संपत्ति और इंफ्रास्ट्रक्चर है। वहीं शेयर बाजार में भी इस कंपनी की साख मजबूत थी और इसके शेयर की कीमत 729 रुपये के स्तर को छू रही थी।

जानकारों का कहना है कि जो कंपनी अगले तीन साल में अपनी बिक्री की पूरी कीमत (320 करोड़) खुद कमाकर सरकारी खजाने को लौटा देती, उसे महज इतनी छोटी रकम में जापान की कंपनी को सौंप देना केंद्र सरकार की नीति और नीयत दोनों पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

तीन केंद्रीय मंत्रियों के हस्ताक्षर, पर छत्तीसगढ़ सरकार मौन

दिल्ली में केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और उद्योग मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी की मौजूदगी में इस सौदे पर अंतिम मुहर लगाई गई। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम पर छत्तीसगढ़ की 'डबल इंजन' सरकार की खामोशी सबसे ज्यादा चौंकाने वाली है।

भिलाई के श्रमिक नेताओं का आरोप है कि राज्य की विष्णुदेव साय सरकार दिल्ली के फैसलों के सामने असहाय नजर आ रही है। स्थानीय रोजगार और राज्य के आर्थिक हितों की रक्षा करने के बजाय सूबे की सरकार ने इस संवेदनशील मुद्दे पर पूरी तरह से मौन साध लिया है। विपक्ष भी इस मुद्दे पर केवल चुनावी और सियासी यात्राओं तक सीमित है, जमीन पर मजदूरों की लड़ाई लड़ने वाला कोई नहीं दिख रहा।

हजारों परिवारों के भविष्य पर छाए संकट के बादल

FSNL में सीधे तौर पर काम करने वाले नियमित कर्मचारियों के अलावा, स्क्रैप प्रोसेसिंग और परिवहन कार्य में हजारों ठेका मजदूर और स्थानीय युवा जुड़े हुए हैं। जापान की निजी कंपनी के हाथ में कमान जाते ही अब यहां 'ठेका पद्धति' और 'छंटनी' का डर हावी हो गया है। स्थानीय लोगों ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा है कि आत्मनिर्भर भारत का नारा देने वाली सरकार स्थानीय युवाओं को विदेशी कॉर्पोरेट का गुलाम बनाने पर तुली है।

अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, भारतीय जनता पार्टी के कुछ स्थानीय नेता भी इस फैसले से असहज हैं और दबी जुबान में इसका विरोध कर रहे हैं, लेकिन आलाकमान के खौफ के कारण कोई भी खुलकर सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।

क्या अब नगरनार की बारी?

FSNL के इस अचानक हुए निजीकरण ने बस्तर के नगरनार स्टील प्लांट (NMDC) को लेकर भी डर बढ़ा दिया है। हालांकि सरकार लगातार नगरनार के निजीकरण का खंडन करती रही है, लेकिन FSNL के हश्र को देखकर भिलाई और बस्तर के उद्योग जगत में यह चर्चा तेज है कि आज FSNL बिका है, कल नगरनार की बारी भी आ सकती है।

Vidio देखें 


https://youtu.be/S3LubnY1E-M?si=BUeOeqAhl5mViTrX


गुरुवार, 21 मई 2026

संघ की क्लास की परतें खुलने लगी

 संघ की क्लास की परतें खुलने लगी

आ गया एक एक सच सामने 


छत्तीसगढ़ की राजनीति में सत्ता और संगठन के बीच चल रही खींचतान ने अब एक बेहद गंभीर और नया मोड़ ले लिया है। रायपुर के रोहिणीपुरम स्थित सरस्वती शिक्षण संस्थान के कार्यालय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और प्रदेश सरकार के 5 दिग्गज मंत्रियों के बीच हुई 'समन्वय बैठक' की परतें अब एक-एक कर खुलने लगी हैं।

सूत्रो के मुताबिक, यह महज कोई औपचारिक समन्वय बैठक नहीं थी, बल्कि मंत्रियों की बाकायदा 'क्लास' ली गई थी। इस क्लास में प्रदेश के पांच ताकतवर मंत्रियों— गृहमंत्री विजय शर्मा, वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी, स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल, वन मंत्री केदार कश्यप और राजस्व मंत्री टंक राम वर्मा को विशेष तौर पर तलब किया गया था ।

CBI के पर कतरने के पीछे क्या नागपुर कनेक्शन?

इस तीखी रिपोर्ट में सबसे बड़ा और गंभीर सवाल गृह मंत्रालय के उस फैसले पर उठाया गया है, जिसके तहत छत्तीसगढ़ में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के अधिकारों को सीमित कर दिया गया है । राजनीतिक गलियारों में यह सवाल बड़ी शिद्दत से गूंज रहा है कि आखिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि मोदी-शाह की दिल्ली वाली महाशक्तिशाली CBI की एंट्री पर छत्तीसगढ़ सरकार को अंकुश लगाने की हिमाकत करनी पड़ी?

दावा किया जा रहा है कि संघ (RSS) से जुड़े कई रसूखदार और बड़े अधिकारियों के नाम CBI की जांच के दायरे में आ चुके हैं । इन अधिकारियों ने अपनी गर्दन फंसती देख संघ के बड़े पदाधिकारियों के सामने गुहार लगाई थी और अपनी व्यथा सुनाई थी। आरोप है कि अपने चहेते और खास नौकरशाहों को CBI की सीधी और ताबड़तोड़ कार्रवाई (पूछताछ और गिरफ्तारी) से बचाने के लिए ही गृह मंत्रालय के जरिए यह पूरी चक्रव्यूह रचना तैयार की गई है ।

जांच की आंच में घिरे बड़े नाम!

वीडियो में वरिष्ठ पत्रकार ने साफ तौर पर इशारा किया है कि पूर्ववर्ती सरकार के दौरान हुए शराब घोटाले, महादेव सट्टा ऐप कांड, कोयला घोटाले और बहुचर्चित PSC घोटाले की जांच में कई IAS और IPS अधिकारियों के नाम लगातार तैर रहे हैं । इसमें जनसंपर्क और परिवहन विभाग संभाल चुके IPS दीपांशु काबरा जैसे चर्चित नामों का भी जिक्र नागपुर कनेक्शन के हवाले से किया गया है । चूंकि PSC घोटाले की जांच अब CBI के हाथों में है, इसलिए जांच का दायरा कहां तक फैलेगा, इसे लेकर सत्ता और संघ के भीतर भारी घबराहट देखी जा रही थी ।

विपक्ष और गलियारों में चर्चा: 'सिर्फ बचाना नहीं, मलाईदार पोस्टिंग भी देनी है'

चर्चाएं सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं हैं। भाजपा खेमे और प्रशासनिक हल्कों में दबी जुबान से यह बात चीख-चीख कर कही जा रही है कि गृहमंत्री विजय शर्मा को सिर्फ CBI पर लगाम लगाने का ही फरमान नहीं मिला है, बल्कि संघ की ओर से बाकायदा उन पसंदीदा अफसरों और कर्मचारियों की एक सीक्रेट लिस्ट सौंपी गई है जिन पर कोई कार्रवाई नहीं की जानी है । इतना ही नहीं, आदेश यह भी है कि इन्हें हटाना तो दूर, बल्कि जल्द से जल्द मलाईदार और अच्छी जगहों पर पोस्टिंग दी जाए ।

तीखा सवाल:

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार स्वतंत्र रूप से फैसले ले रही है, या फिर पर्दे के पीछे से सरकार की कमान और मंत्रियों के विभागों का रिमोट कंट्रोल पूरी तरह से संघ कार्यालय से संचालित हो रहा है?

अभी तो सिर्फ गृह मंत्रालय का पत्ता खुला है, आने वाले दिनों में बाकी के 4 मंत्रियों— ओ.पी. चौधरी, केदार कश्यप, श्याम बिहारी जायसवाल और टंक राम वर्मा के विभागों से संघ के एजेंडे वाले क्या-क्या आदेश निकलते हैं, इस पर पूरी राजनीतिक बिरादरी की नजरें टिकी हुई हैं !

Vidio देखें 


https://youtu.be/kfLU-rsmGpI?si=9P9NGqFiNFic2TzW


कहानी: सिस्टम का सच और रेंजर की बेबसी कवर्धा जिले के डाल मोहा गांव की सीमा पर सूरज डूबने को था, लेकिन नदियों के किनारे ट्रैक्टरों और पोकलेन मशीनों की गड़गड़ाहट शांत नहीं हुई थी। वन विभाग के दो ईमानदार रेंजरों को खबर मिली कि सरकारी आदेशों की धज्जियां उड़ाकर खुलेआम अवैध रेत खनन किया जा रहा है। अपनी ड्यूटी के प्रति वफादार, दोनों रेंजरों ने सोचा कि कानून का डंडा माफियाओं को रोक देगा। वे दल-बल के साथ वहां पहुंचे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि कवर्धा, जो खुद सूबे के गृह मंत्री का गृह जिला है, वहां कानून का नहीं बल्कि रेत माफियाओं का खौफ चलता है। जैसे ही अधिकारियों ने गाड़ियों को रोकने की कोशिश की, माफियाओं की गुंडों की फौज उन पर टूट पड़ी। बड़े अधिकारी किसी तरह जान बचाकर भागे, लेकिन दो रेंजर उनके चंगुल में फंस गए। बीच सड़क पर, सरेआम उन्हें दौड़ा-दौड़ा कर बेरहमी से पीटा गया, जब तक कि वे लहूलुहान नहीं हो गए। यह घटना सिर्फ एक मारपीट नहीं थी, बल्कि सिस्टम के गाल पर एक करारा तमाचा थी। उधर राजधानी रायपुर का हाल भी जुदा नहीं था। एक पुलिस आरक्षक अपने छोटे बच्चे के साथ सड़क से गुजर रहा था। एक मामूली सी टक्कर क्या हुई, बदमाशों ने पुलिस की वर्दी का खौफ भूलकर उस रेंजर की तरह ही उस आरक्षक को भी सड़क पर धुन दिया। आम जनता सोच रही थी—जब रेंजर और पुलिस वाले ही सुरक्षित नहीं हैं, तो हमारी क्या बिसात? इसी दौरान, राजधानी के तूता मैदान में धूप और धूल के बीच बैठे संविदा और नियमितीकरण की मांग करने वाले प्रदेश के सैकड़ों कर्मचारी अपनी 'मोदी की गारंटी' पूरी होने का इंतजार कर रहे थे। सरकार को आए अभी एक साल भी नहीं हुआ था, लेकिन चारों तरफ असंतोष की आग सुलग रही थी। सियासी गलियारों में भी हलचल तेज थी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता टी.एस. सिंहदेव (बाबा) जब लोहारीडीह कांड के सिलसिले में जेल में बंद ग्रामीणों से मिलकर बाहर आए, तो उन्होंने मीडिया के सामने एक और चौंकाने वाला सच रखा। उन्होंने बताया कि पुलिस ने बर्बरता की हदें पार करते हुए उन निर्दोष ग्रामीणों को भी जेल में डाल दिया है जो घटना के वक्त गांव में थे ही नहीं। दूसरी तरफ, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कार्यकाल की उपसचिव सौम्या चौरसिया को कोयला घोटाले में कोर्ट से जमानत तो मिल गई थी, लेकिन अन्य मामलों के चलते उनका जेल से बाहर आना अब भी मुश्किल था। सरकार के भीतर की इस खलबली से खुद भाजपा के कद्दावर नेता भी अछूते नहीं थे। सांसद बृजमोहन अग्रवाल और दुर्ग के सांसद विजय बघेल ने सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। विजय बघेल ने कर्मचारियों के नियमितीकरण के मुद्दे पर सरकार को कड़े तेवर दिखाते हुए चिट्ठी लिख डाली थी। नदियों के किनारे अवैध माइनिंग का खेल बेखौफ जारी था। कांकेर, राजिम, महासमुंद और बलौदाबाजार जैसे जिले माफियाओं के गढ़ बन चुके थे। कलेक्टर फाइलों पर कड़े आदेश तो दस्तखत कर रहे थे, लेकिन जमीन पर अफसर, नेता और माफियाओं का गठजोड़ (नेक्सेस) इतना मजबूत था कि हर आदेश बेअसर साबित हो रहा था। कहानी का अंत एक बड़े सवाल पर आकर रुकता है: जब कड़े तेवर और बड़े-बड़े दावों के बीच ईमानदारी से काम करने वाले अफसरों को लहूलुहान होकर भागना पड़े, तो क्या वाकई सूबे की विष्णुदेव साय सरकार और गृह मंत्री विजय शर्मा कानून व्यवस्था को संभाल पा रहे हैं, या फिर यह व्यवस्था पूरी तरह फेल हो चुकी है?

 कहानी: सिस्टम का सच और वर्दी की बेबसी और बहुत कुछ 


कवर्धा जिले के डाल मोहा गांव की सीमा पर सूरज डूबने को था, लेकिन नदियों के किनारे ट्रैक्टरों और पोकलेन मशीनों की गड़गड़ाहट शांत नहीं हुई थी। वन विभाग के दो ईमानदार रेंजरों को खबर मिली कि सरकारी आदेशों की धज्जियां उड़ाकर खुलेआम अवैध रेत खनन किया जा रहा है। अपनी ड्यूटी के प्रति वफादार, दोनों रेंजरों ने सोचा कि कानून का डंडा माफियाओं को रोक देगा।

वे दल-बल के साथ वहां पहुंचे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि कवर्धा, जो खुद सूबे के गृह मंत्री का गृह जिला है, वहां कानून का नहीं बल्कि रेत माफियाओं का खौफ चलता है। जैसे ही अधिकारियों ने गाड़ियों को रोकने की कोशिश की, माफियाओं की गुंडों की फौज उन पर टूट पड़ी। बड़े अधिकारी किसी तरह जान बचाकर भागे, लेकिन दो रेंजर उनके चंगुल में फंस गए। बीच सड़क पर, सरेआम उन्हें दौड़ा-दौड़ा कर बेरहमी से पीटा गया, जब तक कि वे लहूलुहान नहीं हो गए। यह घटना सिर्फ एक मारपीट नहीं थी, बल्कि सिस्टम के गाल पर एक करारा तमाचा थी।

उधर राजधानी रायपुर का हाल भी जुदा नहीं था। एक पुलिस आरक्षक अपने छोटे बच्चे के साथ सड़क से गुजर रहा था। एक मामूली सी टक्कर क्या हुई, बदमाशों ने पुलिस की वर्दी का खौफ भूलकर उस रेंजर की तरह ही उस आरक्षक को भी सड़क पर धुन दिया। आम जनता सोच रही थी—जब रेंजर और पुलिस वाले ही सुरक्षित नहीं हैं, तो हमारी क्या बिसात?

इसी दौरान, राजधानी के तूता मैदान में धूप और धूल के बीच बैठे संविदा और नियमितीकरण की मांग करने वाले प्रदेश के सैकड़ों कर्मचारी अपनी 'मोदी की गारंटी' पूरी होने का इंतजार कर रहे थे। सरकार को आए अभी एक साल भी नहीं हुआ था, लेकिन चारों तरफ असंतोष की आग सुलग रही थी।

सियासी गलियारों में भी हलचल तेज थी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता टी.एस. सिंहदेव (बाबा) जब लोहारीडीह कांड के सिलसिले में जेल में बंद ग्रामीणों से मिलकर बाहर आए, तो उन्होंने मीडिया के सामने एक और चौंकाने वाला सच रखा। उन्होंने बताया कि पुलिस ने बर्बरता की हदें पार करते हुए उन निर्दोष ग्रामीणों को भी जेल में डाल दिया है जो घटना के वक्त गांव में थे ही नहीं। दूसरी तरफ, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कार्यकाल की उपसचिव सौम्या चौरसिया को कोयला घोटाले में कोर्ट से जमानत तो मिल गई थी, लेकिन अन्य मामलों के चलते उनका जेल से बाहर आना अब भी मुश्किल था।

सरकार के भीतर की इस खलबली से खुद भाजपा के कद्दावर नेता भी अछूते नहीं थे। सांसद बृजमोहन अग्रवाल और दुर्ग के सांसद विजय बघेल ने सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। विजय बघेल ने कर्मचारियों के नियमितीकरण के मुद्दे पर सरकार को कड़े तेवर दिखाते हुए चिट्ठी लिख डाली थी।

नदियों के किनारे अवैध माइनिंग का खेल बेखौफ जारी था। कांकेर, राजिम, महासमुंद और बलौदाबाजार जैसे जिले माफियाओं के गढ़ बन चुके थे। कलेक्टर फाइलों पर कड़े आदेश तो दस्तखत कर रहे थे, लेकिन जमीन पर अफसर, नेता और माफियाओं का गठजोड़ (नेक्सेस) इतना मजबूत था कि हर आदेश बेअसर साबित हो रहा था।

कहानी का अंत एक बड़े सवाल पर आकर रुकता है: जब कड़े तेवर और बड़े-बड़े दावों के बीच ईमानदारी से काम करने वाले अफसरों को लहूलुहान होकर भागना पड़े, तो क्या वाकई सूबे की विष्णुदेव साय सरकार और गृह मंत्री विजय शर्मा कानून व्यवस्था को संभाल पा रहे हैं, या फिर यह व्यवस्था पूरी तरह फेल हो चुकी है?


मंगलवार, 19 मई 2026

‘डबल इंजन’ में टकराव या अपनों को बचाने का ‘कवच’? साय सरकार ने कतरे मोदी की CBI के पर!

 ‘डबल इंजन’ में टकराव या अपनों को बचाने का ‘कवच’? साय सरकार ने कतरे मोदी की CBI के पर!


भ्रष्टाचारियों को 'उल्टा लटकाने' की गारंटी देने वाली भाजपा सरकार ने ही छत्तीसगढ़ के लोकसेवकों को दिया सुरक्षा घेरा; अब बिना राज्य सरकार की लिखित अनुमति के सीधे कार्रवाई नहीं कर पाएगी देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी।


छत्तीसगढ़ की सियासत में 'डबल इंजन' की सरकार को लेकर एक ऐसा विरोधाभास सामने आया है, जिसने राजनीतिक गलियारों से लेकर प्रशासनिक महकमे तक हड़कंप मचा दिया है। चुनाव प्रचार के दौरान गृहमंत्री अमित शाह ने मंचों से दहाड़ते हुए छत्तीसगढ़ के भ्रष्टाचारियों को 'उल्टा लटकाकर सीधा करने' की जो गारंटी दी थी, उस गारंटी पर अब खुद विष्णुदेव साय सरकार ने एक बड़ा 'स्पीड ब्रेकर' लगा दिया है।

गृह विभाग द्वारा जारी एक ताजा अधिसूचना ने देश की सबसे प्रतिष्ठित जांच एजेंसी, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) के अधिकारों को राज्य में बेहद सीमित कर दिया है। नई शर्तों के मुताबिक, सीबीआई अब छत्तीसगढ़ सरकार के नियंत्रण वाले किसी भी लोकसेवक (अधिकारी-कर्मचारी) के खिलाफ राज्य सरकार की पूर्व लिखित अनुमति के बिना न तो जांच कर पाएगी और न ही कोई सीधी कार्रवाई।

भूपेश सरकार की 'बंदिश' हटाई, फिर खुद ही लगा दी!

दिलचस्प और हैरान करने वाली बात यह है कि तत्कालीन कांग्रेस (भूपेश बघेल) सरकार ने जब छत्तीसगढ़ में सीबीआई की सीधी एंट्री पर रोक लगाई थी, तब भाजपा ने इसे 'भ्रष्टाचार को छुपाने का प्रयास' बताया था। दिसंबर 2023 में जैसे ही विष्णुदेव साय के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी, आनंद-फानन में पहला बड़ा फैसला लेते हुए भूपेश सरकार के उस प्रतिबंध को हटा दिया गया और सीबीआई को बेधड़क कार्रवाई की खुली छूट दी गई।

लेकिन, महज कुछ महीनों के भीतर ऐसा क्या हुआ कि साय सरकार को भी ममता बनर्जी और भूपेश बघेल की राह पर चलते हुए सीबीआई के पर कतरने पड़े?

अधिसूचना के बारीक अक्षर, जो बयां कर रहे हैं डर!

गृह विभाग की अधिसूचना को यदि बारीकी से पढ़ा जाए, तो साफ होता है कि सीबीआई को केंद्र सरकार के कर्मचारियों, केंद्रीय उपक्रमों और निजी व्यक्तियों पर कार्रवाई की पूरी आजादी  तो है, लेकिन असली पेंच राज्य के लोकसेवकों को लेकर फंसाया गया है। अधिसूचना में स्पष्ट तौर पर यह शर्त जोड़ दी गई है कि "छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा नियंत्रित लोक सेवकों से संबंधित मामलों में राज्य सरकार की पूर्व लिखित अनुमति के बिना ऐसा कोई अन्वेषण (Investigation) नहीं किया जाएगा।" 

सवाल: आखिर किसे बचाने की है तैयारी?

इस नए आदेश के बाद प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। राज्य सरकार ने सत्ता में आते ही बहुचर्चित पीएससी (PSC) घोटाला समेत कई बड़े और संवेदनशील मामलों की जांच सीबीआई को सौंपी थी । इन मामलों के तार राज्य के कई मौजूदा और रसूखदार अधिकारियों-कर्मचारियों से जुड़े हुए हैं। ऐसे में यह तीखा सवाल उठना लाजिमी है कि:

1 क्या सीबीआई की जांच की आंच कुछ ऐसे चेहरों तक पहुंच रही थी, जिन्हें बचाना सरकार की सियासी मजबूरी है?

2 क्या 'डबल इंजन' की साय सरकार को अब केंद्रीय नेतृत्व या गृह मंत्रालय की मंशा पर भरोसा नहीं रहा?

3 क्या राज्य सरकार को यह डर सताने लगा है कि दिल्ली के इशारे पर सीबीआई कभी भी राज्य के अफसरों पर शिकंजा कस सकती है, जिससे पूरी सरकार बैकफुट पर आ जाएगी?

विपक्ष हमलावर: "भ्रष्टाचार को ढंकने की कोशिश"

इस आदेश को लेकर विपक्ष ने सरकार को आड़े हाथों लिया है। कांग्रेस संचार विभाग के प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला ने इसे सीधे तौर पर सरकार की कमजोरी और भ्रष्टाचार को संरक्षण देने वाला कदम बताया है 

कांग्रेस का आरोप है कि जो भाजपा कल तक सीबीआई की दुहाई देती नहीं थकती थी, वह आज अपने ही अधिकारियों को बचाने के लिए जांच एजेंसी का गला घोंट रही है। इस आदेश के बाद अब निष्पक्ष जांच की उम्मीद बेमानी हो चुकी है क्योंकि सरकार कभी भी अपने खास अधिकारियों के खिलाफ सीबीआई को लिखित अनुमति नहीं देगी ।

कटाक्ष: क्या अमित शाह की 'गारंटी' फेल?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला सीधे तौर पर केंद्रीय गृह मंत्रालय और अमित शाह के उस रसूख को चुनौती है, जिसके दम पर भाजपा ने छत्तीसगढ़ का चुनाव जीता था। यदि राज्य में भ्रष्टाचार मुक्त शासन का दावा है, तो फिर केंद्रीय जांच एजेंसी से यह परहेज क्यों? क्या अब भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की स्क्रिप्ट दिल्ली के बजाय रायपुर के 'महानदी भवन' (मंत्रालय) से लिखी जाएगी?

यह देखना दिलचस्प होगा कि इस 'अदृश्य राजनैतिक युद्ध' में जीत किसकी होती है—भ्रष्टाचार पर वार करने का दावा करने वाली केंद्रीय नीति की या फिर अपनों को सुरक्षित रखने की राज्य की इस नई 'ढाल' की!

अखबार के लिए विशेष 'साइड बॉक्सेस' (Side Elements):

बॉक्स 1: 'क्रोनोलॉजी' समझिए...

 दिसंबर 2018: भूपेश सरकार ने सीबीआई को दी गई 'सामान्य सहमति' वापस ली, राज्य में एंट्री बैन की।

 दिसंबर 2023: साय सरकार ने आते ही प्रतिबंध हटाया, सीबीआई को खुली छूट दी 

 सितंबर 2024 (ताजा): साय सरकार ने नया आदेश जारी कर फिर लगाया 'लिखित अनुमति' का पहरा 

बॉक्स 2: तीखे सवाल (Bullet Points):

 जब पीएससी घोटाले की जांच सीबीआई कर रही है, तो अधिकारियों पर कार्रवाई के लिए हर बार लिखित अनुमति का पेंच क्यों? 

 क्या विपक्ष की तरह अब भाजपा शासित राज्यों को भी केंद्रीय एजेंसियों के 'दुरुपयोग' का डर सताने लगा है? 

 'भ्रष्टाचारियों को उल्टा लटकाने' का वादा करने वाली भाजपा इस यू-टर्न पर जनता को क्या जवाब देगी? 

Video देखे


https://youtu.be/BHxMyeerKtM?si=6G3cLnI2oVuidbbq


सोमवार, 18 मई 2026

जब साय सरकार के 'ज़ीरो टॉलरेंस' पर उठे सवाल

 जब साय सरकार के 'ज़ीरो टॉलरेंस' पर उठे सवाल


छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद भ्रष्टाचार पर 'ज़ीरो टॉलरेंस' का दावा करने वाली विष्णुदेव साय सरकार इस वक्त दोतरफा विवादों में घिर गई है। एक ओर जहाँ स्कूली बच्चों की मुफ्त किताबें कबाड़ की दुकानों और पेपर मिलों में बेचे जाने का मामला राष्ट्रीय स्तर पर तूल पकड़ा था  वहीं दूसरी ओर राजस्व विभाग में बड़े पैमाने पर लेन-देन और 'तबादला उद्योग' चलाने के गंभीर आरोपों ने सरकार की साख पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।

दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही मामलों में सरकार की कार्रवाई की दिशा पर सवाल उठ रहे हैं। जहाँ भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले तहसीलदार संघ के अध्यक्ष को निलंबित कर दिया गया, वहीं दूसरी ओर पाठ्य पुस्तक निगम घोटाले की जांच के लिए बनाई गई कमेटी में दागी चेहरों को ही शामिल कर लिया गया।

राजस्व विभाग में 'तबादला उद्योग': आवाज उठाने पर  नेता निलंबित

राजस्व विभाग में हाल ही में हुए तबादलों के बाद संघ के प्रांतीय अध्यक्ष नीलमणि दुबे ने सीधे राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा की कार्यप्रणाली और उनके बंगले पर सवाल उठाए थे। दुबे का आरोप है कि नियमों को ताक पर रखकर बड़े पैमाने पर वित्तीय लेन-देन के आधार पर मनचाही पोस्टिंग दी जा रही है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जो दागी अधिकारी या पटवारी पहले दुर्ग-भिलाई या अन्य क्षेत्रों में विवादित रहे, उन्हें राजधानी रायपुर में मलाईदार कुर्सियां सौंप दी गईं।

निशाने पर आए संघ के पदाधिकारी

इस कथित घोटाले के खिलाफ आवाज उठाने का खामियाजा तहसीलदार संघ को भुगतना पड़ा है। सरकार ने जांच बिठाने के बजाय प्रांतीय अध्यक्ष नीलमणि दुबे को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। इसके साथ ही संघ के अन्य सक्रिय पदाधिकारियों—सचिव गुरुदत्त पंचभाई (दुर्ग से बलरामपुर), प्रवक्ता पखन टंडन (सुकमा) और अंजलि शर्मा (धमतरी)—का प्रशासनिक आधार पर दूर-दराज के क्षेत्रों में ट्रांसफर कर दिया गया। संघ ने इसे 'टारगेटेड' कार्रवाई और आवाज दबाने की कोशिश करार दिया है।

पाठ्य पुस्तक निगम घोटाला: बच्चों की किताबें कबाड़ के हवाले

दूसरा बड़ा मोर्चा शिक्षा विभाग में खुला है। प्रदेश के सात अलग-अलग जिलों (धमतरी, जशपुर, सूरजपुर, अंबिकापुर आदि) से सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए छपीं मुफ्त पाठ्य पुस्तकें सीधे कबाड़ की दुकानों और रिसाइक्लिंग के लिए पेपर मिलों में भेज दी गईं। कांग्रेस के पूर्व विधायक विकास उपाध्याय ने इस मामले को रंगे हाथों पकड़ा, जिसके बाद यह राष्ट्रीय सुर्खियां बन गया।

इस मामले में सरकार ने आनन-फानन में पाठ्य पुस्तक निगम के महाप्रबंधक प्रेम प्रकाश शर्मा को निलंबित तो कर दिया, लेकिन असली विवाद तब खड़ा हुआ जब जांच कमेटी के गठन की परतें खुलीं। विपक्ष का आरोप है कि पांच सदस्यीय जांच कमेटी में दो ऐसे अधिकारियों को शामिल किया गया है, जो खुद पहले से ही भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरे हैं। ऐसे में जांच की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

'पीए से मंत्री' के सफर पर उठ रहे राजनीतिक सवाल

राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा पर लग रहे इन आरोपों के बाद अब राजनीतिक गलियारों में उनके अतीत को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। पूर्व में कई बड़े नेताओं और मंत्रियों के पीए (Personal Assistant) रह चुके टंकराम वर्मा के अचानक कैबिनेट मंत्री बनने और अब उनके विभाग में ट्रांसफर-पोस्टिंग के विवाद सामने आने के बाद विपक्ष आक्रामक है। कांग्रेस का आरोप है कि साय सरकार में 'साय-साय भ्रष्टाचार' चल रहा है और इस लड़ाई को सड़क से लेकर सदन और जरूरत पड़ने पर न्यायालय तक ले जाया जाएगा।

सवालों के घेरे में जमीनी हकीकत

नया शिक्षा सत्र शुरू हुए तीन से चार महीने बीत चुके हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि राज्य के कई दूरस्थ अंचलों में बच्चों को अब तक न तो पूरी किताबें मिल पाई हैं और न ही सरकारी मुफ्त यूनिफॉर्म (स्कूली ड्रेस)। जनता और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच अब यह बड़ा सवाल तैर रहा है कि क्या मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय अपने मंत्रियों और बेलगाम हो चुके नौकरशाहों पर लगाम कसकर 'ज़ीरो टॉलरेंस' के अपने वादे को साबित कर पाएंगे, या फिर यह सिर्फ एक चुनावी नारा बनकर रह जाएगा?



रविवार, 17 मई 2026

लोहारीडीह का खौफनाक सच, अब भी दहशत…

 लोहारीडीह का खौफनाक सच, अब भी दहशत…




छत्तीसगढ़ का लोहारी डीह कांड भला कौन भूल सकता है, भाजपा नेता की गुंडागर्दी से निजात पाने जब गांववालों का कानून से भरोसा उठ गया तो गांववालों ने ख़ुद ही इस दहशत से मुक्ति के लिए बीजेपी नेता को घर में बंद कर आग लगाकर मार डाला और इसके बाद सत्ता में बैठी बीजेपी सरकार की पुलिस का नंगा नाच ने मानवता को शर्मसार तो किया ही पूरे गांव को दहशत में भर दिया क्या गांववाले इस दहशत से उबर पाए, क्या उन्हें न्याय मिला, ऐसे कई सवालों के बीच यह रिपोर्ट जो बताती है तब क्या क्या हुआ 

छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री विजय शर्मा के गृह क्षेत्र कवर्धा के रेंगाखार अंतर्गत आने वाले लोहारीडीह गांव का एक ऐसा भयावह सच सामने आया है, जिसने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। पुलिस कस्टडी में प्रशांत साहू की मौत के बाद अब जो खुलासे हो रहे हैं, वे रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। राज्य महिला आयोग की टीम द्वारा जेल में बंद महिला बंदियों से मुलाकात के बाद यह साफ हो गया है कि कानून व्यवस्था को कायम करने के नाम पर पुलिस ने बर्बरता की सारी हदें पार कर दी थीं।

आधी रात का तांडव: खींचकर निकाला और पीटा

जेल का दौरा कर लौटीं राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष किरणमयी नायक ने बंद कमरे में महिला डॉक्टरों और तहसीलदार की मौजूदगी में महिला बंदियों के बयान दर्ज किए और उनकी चोटों की जांच की। उन्होंने बताया, "गांव में पुलिसिया बर्बरता चरम पर थी। 16 सितंबर की रात करीब 12 बजे पुलिस कर्मियों ने ग्रामीणों के घरों के दरवाजे तोड़ दिए। महिलाओं को घसीटते हुए बाहर निकाला गया और रेंगाखार थाने ले जाकर उन्हें डंडे, बेल्ट और पट्टों से बेरहमी से पीटा गया। छह दिन बीत जाने के बाद भी उनके शरीरों पर चोट और सूजन के गहरे निशान मौजूद हैं।" आयोग ने जेल डॉक्टरों को घुटनों और अन्य अंगों की सूजन की पुष्टि के लिए तत्काल एक्स-रे कराने के निर्देश दिए हैं।

रिश्तों की दुहाई भी न आई काम, पूरे-पूरे परिवार बंद

घटना के बाद पुलिस ने गांव से ताबड़तोड़ 69 लोगों को गिरफ्तार किया है। इस कार्रवाई में पुलिस ने बिना सोचे-समझे पूरे-पूरे परिवारों को जेल भेज दिया है। जेल में बंदियों की स्थिति बताते हुए महिला आयोग ने दर्ज किया कि कहीं सास-बहू एक साथ सलाखों के पीछे हैं, तो कहीं देवरानी-जेठानी को बंद कर दिया गया है। सबसे ज्यादा असंवेदनशीलता इस बात पर दिखी कि पुलिस कस्टडी में अपनी जान गंवाने वाले मृतक प्रशांत साहू की पीड़ित मां को भी पुलिस ने आरोपी बनाकर जेल में डाल दिया है।

[विशेष बॉक्स 1] गांव में पसरा सन्नाटा, घरों में लटके ताले

पुलिसिया खौफ का आलम यह है कि आज लोहारीडीह गांव पूरी तरह से वीरान हो चुका है। कई घरों पर ताले लटके हुए हैं और ग्रामीण पुलिस के डर से अपने घर-बार, मवेशी छोड़कर जंगलों या सुरक्षित ठिकानों की ओर भाग गए हैं। इस आधुनिक युग में भी किसी गांव का पुलिस के डर से खाली हो जाना शासन और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा सवालिया निशान है।

[विशेष बॉक्स 2] मजिस्टेरियल जांच पर भूपेश बघेल ने उठाए सवाल

इस पूरे घटनाक्रम पर सूबे की सियासत भी उबल पड़ी है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सरकार द्वारा गठित मजिस्टेरियल जांच समिति को 'लीपापोती' की कोशिश करार दिया है। उन्होंने सवाल उठाया कि एक छोटा प्रशासनिक अधिकारी (SDM) भला जिले के कलेक्टर और एसपी (SP) के खिलाफ कैसे निष्पक्ष जांच कर सकता है? इधर, साहू समाज में भारी आक्रोश व्याप्त है और उन्होंने ज्ञापन सौंपकर तत्कालीन एसपी अभिषेक पल्लव को तुरंत निलंबित कर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की है। विपक्षी दल अब सीधे गृह मंत्री विजय शर्मा के इस्तीफे की मांग पर अड़ गए हैं।

राज्यपाल और चीफ जस्टिस को सौंपी जाएगी गोपनीय रिपोर्ट

महिला आयोग की अध्यक्ष ने कहा कि चूंकि यह मामला बेहद संवेदनशील और कानूनी पेचीदगियों से जुड़ा है, इसलिए इसकी पूरी विस्तृत और तकनीकी रिपोर्ट राज्य के राज्यपाल और छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को सौंपी जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में सभी पीड़ित महिलाओं की चोटों की फोटोग्राफी कराई जानी चाहिए ताकि पुलिसिया बर्बरता के पुख्ता सबूत कानूनी रिकॉर्ड का हिस्सा बन सकें।