सांसद को 'जो करना है कर लो' कहने वाले IAS अमित कटारिया फिर विवादों में! काला चश्मा से लेकर हाईकोर्ट के चाबुक तक..."
कहते हैं कि सियासत और ब्यूरोक्रेसी यानी नौकरशाही, ये दोनों जब आपस में टकराती हैं, तो चिंगारी दूर-दूर तक जाती है। लेकिन छत्तीसगढ़ में आजकल जो कुछ चल रहा है, वो सिर्फ चिंगारी नहीं, बल्कि सीधे तौर पर प्रशासनिक अहंकार और लोकतंत्र के बीच एक महासंग्राम बन चुका है।
और इस महासंग्राम के केंद्र में हैं— छत्तीसगढ़ के एक बेहद चर्चित, रईस और दबंग आईएएस अधिकारी, अमित कटारिया!
वही अमित कटारिया, जो कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने काला चश्मा पहनकर खड़े होने की वजह से पूरे देश की सुर्खियों में आ गए थे। जो कागजों पर तो सिर्फ एक रुपया सैलरी लेने वाले फकीर नुमा अफसर दिखते हैं, लेकिन जिनकी असलियत और रुतबे के चर्चे हर तरफ हैं।
लेकिन अब मामला सिर्फ एक-दो पुराने किस्सों तक सीमित नहीं है। ताजा खबर ये है कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अमित कटारिया समेत कई बड़े अधिकारियों को अवमानना (Contempt of Court) का नोटिस थमा दिया है! इतना ही नहीं, कुछ समय पहले रायपुर के वरिष्ठ सांसद और दिग्गज नेता बृजमोहन अग्रवाल के साथ उनकी बदसलूकी का मामला सीधे लोकसभा अध्यक्ष तक पहुंच गया था! और तो और, भाई साहब... इनके नाम पर छत्तीसगढ़ में फर्जी वसूली और धमकियों का बाजार भी गर्म रहा है।
आखिर चल क्या रहा है छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य विभाग में? क्या ब्यूरोक्रेसी इतनी बेलगाम हो चुकी है कि उसे जनता के चुने हुए नुमाइंदों और अदालत के आदेशों की भी परवाह नहीं है? आज की इस वीडियो में हम पर्दाफाश करेंगे अमित कटारिया के पूरे विवादित इतिहास का—बस्तर के 'काला चश्मा' कांड से लेकर, सांसद से पंगा और ताजा कानूनी डंडे तक! एक-एक बात खुलकर सामने आएगी।
ताजा विवाद - छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का डंडा और अवमानना नोटिस
शुरुआत करते हैं एकदम ताजा और सनसनीखेज अपडेट से। मामला जुड़ा है छत्तीसगढ़ स्टेट फार्मेसी काउंसिल में रजिस्ट्रार की नियुक्ति के विवाद से।
हवा में तीर चलाने के बजाय जरा तथ्यों को समझिए। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 3 मार्च 2026 को साफ-साफ निर्देश दिया था कि तत्कालीन रजिस्ट्रार को हटाया जाए। इसके बाद 15 मई 2026 को पूर्णकालिक रजिस्ट्रार नियुक्त करने का आदेश हुआ और अदालत ने इसके लिए आठ हफ्ते की सख्त समय सीमा तय की थी।
लेकिन हमारी आका-ब्यूरोक्रेसी ने क्या किया? कोर्ट के आदेश को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया! तय समय में जब नियुक्ति नहीं हुई, तो मजबूरन अदालत में अवमानना याचिका (Contempt Petition) दाखिल करनी पड़ी।
और अब परिणाम क्या आया है? छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए स्वास्थ्य विभाग के सचिव IAS अमित कटारिया, स्वास्थ्य संचालक संजीव झा और काउंसिल के अध्यक्ष अरुण मिश्रा को नोटिस जारी कर दिया है! अदालत ने इन तीनों से तीन हफ्ते के भीतर जवाब मांगा है कि आखिर कोर्ट के आदेश की अवहेलना क्यों की गई?
जरा सोचिए! जिस महकमे के मुखिया पर कानून का पालन कराने की जिम्मेदारी हो, अगर वही महकमा हाईकोर्ट के आदेशों की धज्जियां उड़ाएगा, तो आम जनता न्याय के लिए कहां जाएगी? यह सिर्फ एक नोटिस नहीं है, बल्कि सिस्टम के मुंह पर एक करारा तमाचा है।
सांसद बृजमोहन अग्रवाल बनाम IAS अमित कटारिया - "जो करना है कर लो!"
लेकिन भाई, अमित कटारिया का विवादों से पुराना नाता है। हाईकोर्ट के इस मामले से ठीक कुछ महीने पहले, इसी साल मध्य में रायपुर के सांसद और राज्य के पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के साथ उनका जो टकराव हुआ, उसने तो दिल्ली तक भूचाल ला दिया था!
हुआ यूं कि 20 मई को सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने जनहित से जुड़े कुछ जरूरी मामलों और पत्रों के जवाब को लेकर स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया को फोन किया। सोचिए, राज्य की राजधानी का एक वरिष्ठ सांसद, जो जनता द्वारा चुना गया प्रतिनिधि है, वो जब एक आईएएस अधिकारी को फोन करे, तो उम्मीद क्या होती है? सम्मान की, संवाद की!
लेकिन आरोप है कि अमित कटारिया ने न सिर्फ महीनों तक सांसद के पत्रों के जवाब नहीं दिए, बल्कि फोन पर बेहद रुखे और घमंड भरे लहजे में बात की। सूत्रों और शिकायतों के मुताबिक, बातचीत के दौरान आईएएस अमित कटारिया ने सांसद से यहां तक कह दिया— "जो करना है कर लो!" (Do whatever you want!)
भाई साहब! एक आईएएस अफसर एक निर्वाचित सांसद को खुलेआम ये कह रहा है कि 'जो करना है कर लो'! क्या यह लोकतंत्र का अपमान नहीं है?
मामला इतना बढ़ा कि बृजमोहन अग्रवाल ने इसे सीधे तौर पर अपने विशेषाधिकार का हनन (Breach of Privilege) मानते हुए लोकसभा अध्यक्ष के पास लिखित शिकायत दर्ज करा दी। लोकसभा सचिवालय ने भी इस मामले को गंभीरता से लेते हुए DoPT (कार्मिक मंत्रालय) से तथ्यात्मक रिपोर्ट मांग ली।
इस पूरे मामले पर सियासत भी गरमा गई। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल तक को कूदना पड़ा। उन्होंने साफ कहा कि यह घटना इस बात का सबूत है कि छत्तीसगढ़ के अफसरों को जनता या जनप्रतिनिधियों की कोई परवाह नहीं है, उन्हें सिर्फ अपनी कुर्सी से मतलब है। सोचिए, जनता के वोट से चुने गए नेता की इज्जत एक कुर्सी पर बैठे नौकरशाह के सामने किस तरह तार-तार की जा रही है!
अमित कटारिया के नाम पर फर्जी वसूली और धमकियों का खेल!
अब आइए इस कहानी के सबसे खतरनाक और काले पहलू पर। जब अफसर का खौफ और दबंगई इस स्तर पर बढ़ जाती है, तो सिस्टम के नीचे पलने वाले दलाल और ठग भी इसका पूरा फायदा उठाने लगते हैं।
कुछ समय पहले छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से एक बहुत बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया था। एक शातिर ठग ने क्या किया? उसने खुद को स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया का बेहद करीबी और खास आदमी बताकर शहर के निजी अस्पतालों (Private Hospitals) को फोन करना शुरू कर दिया!
अस्पतालों को बड़े-बड़े प्रशासनिक एक्शन का डर दिखाया गया, नियमों की आड़ में डराया-धमकाया गया और उनके नाम पर मोटी रकम की अवैध वसूली (Extortion) की गई! सोचकर देखिए, जब किसी अधिकारी की छवि 'दबंग' और 'किसी की न सुनने वाले' अफसर के तौर पर स्थापित हो जाती है, तो अपराधियों को यह यकीन दिलाने में आसानी हो जाती है कि "अरे, ये तो किसी की नहीं सुनते, इनके नाम पर डराओगे तो अस्पताल वाले तुरंत पैसे दे देंगे।"
भले ही पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई की हो, लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर किसी अधिकारी के नाम का ऐसा खौफ या दुरुपयोग मार्केट में क्यों पनपता है? क्यों ठगों को यह भरोसा होता है कि उस बड़े साहब का नाम लेते ही लोग कांप जाएंगे? यह अपने आप में एक बहुत बड़ा गंभीर सवाल है जो प्रशासन की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगाता है।
पुराना इतिहास - वो 'काला चश्मा' और 1 रुपये की सैलरी का ड्रामा
, अगर आपको लगता है कि अमित कटारिया सिर्फ अब ऐसे तेवर दिखा रहे हैं, तो आपका इतिहास कमजोर है। जनाब का रिकॉर्ड शुरू से ऐसा ही रहा है!
फ्लैशबैक में चलिए—साल 2015, मई का महीना। अमित कटारिया तब बस्तर के कलेक्टर हुआ करते थे। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बस्तर के दौरे पर आए थे। प्रोटोकॉल के मुताबिक देश के प्रधानमंत्री का स्वागत करना था। बाकी सारे अधिकारी कायदे से हाथ जोड़े खड़े थे, लेकिन हमारे अमित कटारिया साहब... उन्होंने प्रधानमंत्री के सामने भी अपनी शान बनाए रखने के लिए चेहरे पर ब्रांडेड काला चश्मा (Sunglasses) चढ़ा रखा था!
तस्वीरें नेशनल मीडिया में वायरल हो गईं। प्रोटोकॉल तोड़ने और वीवीआईपी विजिट में इस तरह की असहज शैली को लेकर भारी बवाल मचा। तत्कालीन रमन सिंह सरकार को मजबूरन नोटिस जारी करना पड़ा था।
इसके अलावा, मीडिया में उनकी एक और यूएसपी खूब गाई जाती है कि भाई, ये तो 'सबसे अमीर आईएएस' हैं—जिनका परिवार रियल एस्टेट के बड़े कारोबार से जुड़ा है, जिनकी पत्नी एक कमर्शियल पायलट हैं, और जो शुरुआती दिनों में अपनी सेवा के नाम पर सिर्फ ₹1 (एक रुपया) सैलरी लेने का दावा करते थे।
लेकिन सवाल यह है कि एक रुपये की सांकेतिक सैलरी लेने का दिखावा करने वाले या करोड़ों की संपत्ति के मालिक होने का गुरूर रखने वाले, क्या जनता के प्रति अपनी जवाबदेही भूल गए हैं? क्या एक करोड़पति या दबंग अफसर होने का मतलब यह है कि आप जनप्रतिनिधियों को अपमानित करेंगे और अदालत के आदेशों को कचरे के डिब्बे में डाल देंगे?
लोकतंत्र में संविधान सबसे ऊपर है। यहाँ न तो कोई नेता सर्वसर्वा है और न ही कोई आईएएस अधिकारी कानून से ऊपर है। जनप्रतिनिधि जनता की आवाज होते हैं और अदालत न्याय का मंदिर। अगर नौकरशाही इसी तरह अहंकार में चूर होकर "जो करना है कर लो" की भाषा बोलने लगेगी, तो आम जनता का इस तंत्र से भरोसा उठ जाएगा।
हाईकोर्ट के इस ताजा नोटिस ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं, चाहे आप कितने भी पावरफुल कुर्सी पर क्यों न बैठे हों।
अब देखना यह होगा कि स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया और बाकी अधिकारी कोर्ट के इस डंडे के आगे क्या जवाब देते हैं, और सरकार इस बेलगाम होती प्रशासनिक संस्कृति पर लगाम लगाती है या नहीं।
आपकी इस पूरे मामले पर क्या राय है? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी बेबाक राय जरूर लिखिए। क्या ऐसे अधिकारियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए या नहीं?
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