शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026

57,000 का वादा, 3,000 पर कैंची! छत्तीसगढ़ के शिक्षकों के भविष्य के साथ ये कैसा खिलवाड़?

 57,000 का वादा, 3,000 पर कैंची! छत्तीसगढ़ के शिक्षकों के भविष्य के साथ ये कैसा खिलवाड़? | CG Teacher Bharti

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आज मैं किसी राजनीतिक पार्टी की तारीफ करने नहीं बैठा हूं, ना ही किसी के एजेंडे को आगे बढ़ाने आया हूं। आज बात होगी छत्तीसगढ़ के उन लाखों युवाओं की, जिनके सपनों का गला घोंटा जा रहा है, जिनके सब्र का इम्तिहान लिया जा रहा है और जिनके भविष्य के साथ हर सरकार ने सिर्फ और सिर्फ खिलवाड़ किया है।

साथियों, जरा याद कीजिए वो दिन... चुनाव से पहले बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगे थे, मंचों से दहाड़ कर 'मोदी की गारंटी' दी गई थी कि छत्तीसगढ़ में सत्ता में आते ही 57,000 शिक्षकों की भर्ती की जाएगी। युवाओं की आंखों में एक उम्मीद चमकी थी कि चलो, अब बेरोजगारी का अंधेरा छटेगा, हमारे पढ़े-लिखे युवा स्कूलों में पढ़ाएंगे।

लेकिन सरकार बदली, चेहरे बदले, और वादों का क्या हुआ? वो वादे हवा हो गए! आज स्थिति ये है कि 57 हजार का वो बड़ा आंकड़ा सिमटते-सिमटते सिर्फ 2,900 के आसपास के पदों पर आ पहुंचा और अब उस पर भी हाईकोर्ट का ग्रहण लग गया है, रोक लग गई है! आखिर कब तक छत्तीसगढ़ का युवा इस सिस्टम की चक्की में पिसता रहेगा? आज इसी पर पर्दाफाश करेंगे, वीडियो को अंत तक देखिएगा।"


"आइए जरा सिलसिलेवार तरीके से याददाश्त तरोताजा करते हैं कि छत्तीसगढ़ के बेरोजगार युवाओं के साथ पिछले कुछ सालों में क्या-क्या खेल खेला गया है।

  • सबसे पहले, जब चुनाव का समय आया, तो बीजेपी ने सत्ता में आने से पहले पूरे 57,000 शिक्षकों की बंपर भर्ती करने की 'मोदी की गारंटी' दी थी। युवाओं को लगा कि चलो, अब सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के खाली पड़े हजारों पद भर जाएंगे।
  • इसके बाद, जब चुनाव सिर पर थे और सियासी माहौल गर्म था, तब तत्कालीन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल साहब ने बयान दिया कि सरकार 35,000 शिक्षकों की भर्ती करने जा रही है। युवाओं को एक बार फिर उम्मीद की एक किरण दिखाई दी।
  • लेकिन भाई, जैसे ही चुनाव बीते, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जी की सरकार ने इस आंकड़े को और सिकोड़ दिया और बात सिर्फ 5,000 शिक्षक भर्ती पर आकर टिक गई।
  • और हद तो तब हो गई जब इन वादों के नाम पर ऊंट के मुंह में जीरे की तरह सिर्फ 2,900 कुछ पदों के लिए ही भर्ती निकाली गई! यानी 57,000 का सपना दिखाने वाली सरकार ने ऊंट के मुंह में जीरा देकर इतिश्री कर ली।"

भर्ती पर कानूनी ब्रेक और युवाओं का आक्रोश - 

"चलो भाई, मान लिया कि सरकार ने 57 हजार के बजाय 3 हजार के करीब ही पद निकाले, कम से कम उन युवाओं का तो भला होता जो सालों से लाइब्रेरी और कमरों में दिन-रात एक करके तैयारी कर रहे हैं। लेकिन नहीं! सरकार की नीयत में खोट कहें या प्रशासनिक लापरवाही... अब इन बचे-कुचे पदों पर भी हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है!

जरा सोचिए, उस युवा पर क्या बीत रही होगी जिसने दिन-रात मेहनत करके परीक्षा पास की या फॉर्म भरा, और अब उसे पता चलता है कि भर्ती प्रक्रिया पर ब्रेक लग गया है!

  • मिली जानकारी के अनुसार, छत्तीसगढ़ में सहायक शिक्षक और शिक्षक भर्ती को लेकर ये बड़ा संकट खड़ा हुआ है।
  • मामला ये है कि भर्ती विज्ञापन में दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने इस भर्ती परीक्षा पर रोक लगा दी है और राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
  • खास तौर पर यह पूरा मामला पूर्ण दृष्टिबाधित अभ्यर्थियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलने से जुड़ा हुआ है।

अरे भाई! सरकार की नीतियां ऐसी क्यों होती हैं कि हर बार विज्ञापन निकलते ही कोर्ट में मामला अटक जाए? क्या सरकार के नुमाइंदे, उनके कानूनी सलाहकार आंखें बंद करके बैठे रहते हैं? क्या जानबूझकर ऐसे पेंच छोड़े जाते हैं ताकि भर्तियां अटकी रहें और युवाओं की उम्र निकलती रहे? आज छत्तीसगढ़ का युवा गुस्से से उबल रहा है। उसकी आंखों में आंसू हैं और दिल में सरकार के प्रति भयंकर आक्रोश है।"

सरकार से तीखे सवाल

"आज मैं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जी से, शिक्षा विभाग के मंत्रियों से और तमाम जिम्मेदारों से सीधे तौर पर पूछना चाहता हूं—

  1. कहाँ गई वो 'मोदी की गारंटी' जिसमें 57,000 शिक्षकों का वादा किया गया था?
  2. क्या युवाओं के साथ सिर्फ चुनावी जुमलेबाज़ी करने के लिए ही सत्ता हासिल की गई थी?
  3. अगर कानूनी अड़चनें आनी थीं, तो विभाग पहले से सतर्क क्यों नहीं था? क्यों हर बार युवाओं के भविष्य की बलि दी जाती है?

युवाओं का धैर्य अब जवाब दे चुका है। डिग्रियां हाथ में लिए दर-दर की ठोकर खाते इन बेरोजगारों का गुस्सा अब सड़कों पर फूटने लगा है। अगर सरकार ने जल्द से जल्द हाईकोर्ट में मजबूती से पक्ष रखकर इस कानूनी अड़चन को दूर नहीं किया और इन पदों पर पारदर्शी तरीके से भर्ती प्रक्रिया शुरू नहीं की, तो आने वाले समय में ये युवा सरकार को इसका करारा जवाब देंगे।

साथियों, आपकी इस पूरी स्थिति पर क्या राय है? क्या वाकई सरकार युवाओं को धोखा दे रही है? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखिए, ज्यादा से ज्यादा शेयर कीजिए ताकि यह आवाज़ बहरे कानों तक पहुँच सके।

दोनों डिप्टी सीएम की खीचतान में योजना बर्बाद

दोनों डिप्टी सीएम की खीचतान में योजना बर्बाद 


 छत्तीसगढ़ में जल जीवन मिशन का हाल और अटकी नीति

"हर घर जल... शुद्ध जल! मोदी सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना का मकसद देश के हर ग्रामीण घर तक नल से जल पहुंचाना था। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त क्या है? क्या वाकई लोगों को पानी मिल रहा है? आज हम बात करने वाले हैं छत्तीसगढ़ की, जहाँ जल जीवन मिशन का बुरा हाल है। ठेकेदार परेशान हैं, पानी घर-घर पहुँच नहीं रहा है, और सबसे बड़ा झटका यह है कि इस पूरी योजना की 'नीति' ही पिछले एक साल से सरकारी फाइलों में अटकी हुई है! तो चलिए, आज इस वीडियो में गहराई से समझते हैं कि आखिर कहाँ फंसा है पूरा मामला।"

एक साल से सरकारी फाइल में अटकी नीति 

 इस पूरे मामले के केंद्र में जो सबसे बड़ी वजह बनकर सामने आई है, वह है संचालन और रखरखाव की नीति। इसे 'ओएंडएम' यानी ऑपरेशन एंड मेंटेनेंस नीति कहा जाता है। यह नीति तय करती है कि योजना बनने के बाद उसका संचालन कैसे होगा, और पानी की सप्लाई व रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी होगी। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि छत्तीसगढ़ में इस नीति का प्रस्ताव करीब एक साल से लंबित बताया जा रहा है। इसका प्रारूप तैयार हो चुका है, लेकिन इसे अब तक अंतिम मंजूरी नहीं मिल सकी है। ठेकेदार संगठन के मुताबिक, पंचायत विभाग और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) के बीच तालमेल की कमी है, और इसी आपसी खींचतान के कारण नीति को लागू करने में देरी हो रही है। और तो और, इस देरी का सीधा असर केंद्र से मिलने वाली राशि पर भी पड़ रहा है।"

केंद्र से पैसा मिलने में कहां फंसा 

अब सवाल ये उठता है कि क्या पैसों की भी कोई किल्लत है? जी हाँ! वित्त वर्ष 2025-26 में केंद्रीय हिस्से की राशि नहीं मिलने का मामला सामने आया था। इसके बाद राज्य सरकार ने अपने संसाधनों से निर्माण एजेंसियों को भुगतान किया। लेकिन अब वित्त वर्ष 2026-27 में आगे के भुगतान को लेकर गंभीर परेशानी बताई जा रही है। ठेकेदार संगठन का साफ कहना है कि राज्य सरकार पहले केंद्रीय प्रतिपूर्ति मिलने की बात कह रही है, जिसके चलते भुगतान का चक्रव्यूह उलझता जा रहा है। जब नीति ही नहीं होगी और फंड्स समय पर नहीं मिलेंगे, तो ठेकेदार काम कैसे करेंगे और जनता को पानी कैसे मिलेगा?"

ठेकेदारों का संकट और ज़मीनी हक़ीक़त 


  • इस पूरी व्यवस्था की पिसने वाली कड़ी हैं—आम जनता और ठेकेदार। एक तरफ ठेकेदार संगठन वित्तीय संकट और विभागों के बीच आपसी समन्वय की कमी से जूझ रहे हैं, तो दूसरी तरफ ग्रामीण इलाकों में लोग आज भी बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। योजना कागजों पर तो बड़ी भव्य दिखती है, लेकिन जब बात ज़मीन पर उतरने की आती है, तो समन्वय की कमी और प्रशासनिक सुस्ती के कारण सब कुछ ठप पड़ जाता है। जिन गाँवों में नल तो लग गए, लेकिन पानी नहीं आया, वहाँ के लोग आज भी सरकार की तरफ उम्मीद भरी नज़रों से देख रहे हैं।"
  • "तो निष्कर्ष यह निकलता है कि छत्तीसगढ़ में जल जीवन मिशन की गाड़ी केवल इसलिए रुकी हुई है क्योंकि विभाग आपस में तालमेल नहीं बिठा पा रहे हैं और 'ओएंडएम' नीति एक साल से धूल फांक रही है। अगर सरकार और प्रशासन वाकई इस योजना को सफल बनाना चाहते हैं, तो सबसे पहले नीति को तुरंत मंजूरी देनी होगी और वित्तीय लेन-देन के मामलों को सुलझाना होगा ताकि ठेकेदार बिना किसी रुकावट के काम पूरा कर सकें और जनता का गला तर हो सके। दोस्तों, आपकी इस पर क्या राय है? क्या आपके इलाके में भी जल जीवन मिशन का यही हाल है? हमें नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

छत्तीसगढ़ में 'ऑपरेशन साइडलाइन': क्या अब केदार कश्यप की बारी है?

 छत्तीसगढ़ में 'ऑपरेशन साइडलाइन': क्या अब केदार कश्यप की बारी है?


छत्तीसगढ़ की राजनीति में इस समय एक ऐसी 'अदृश्य सर्जिकल स्ट्राइक' चल रही है, जिसकी धमक से मंत्रालय से लेकर बस्तर के जंगलों तक सन्नाटा पसरा हुआ है!

सवाल सीधा है— क्या छत्तीसगढ़ बीजेपी के सीनियर दिग्गज नेताओं को एक-एक करके किनारे लगाया जा रहा है?

ज़रा इतिहास के पन्ने पलटिए। बृजमोहन अग्रवाल को दिल्ली की राजनीति में भेजकर राज्य से विदा कर दिया गया। रामविचार नेताम, अमर अग्रवाल और राजेश मूणत— जो रमन सरकार में पावर सेंटर हुआ करते थे, आज उनके पास वैसा रसूख नहीं बचा। और अब... अब निशाने पर कौन है?

राजनीतिक गलियारों की सुगबुगाहट पर यकीन करें, तो अब अगला नंबर कैबिनेट मंत्री केदार कश्यप का है!

चौंकिए मत! ये हम हवा-हवाई बात नहीं कर रहे हैं। जिस तरह से एक के बाद एक उनके सबसे वफादार ओएसडी (OSD) और पीए (PA) को रातों-रात हटाया गया है, जिस तरह से उनके खिलाफ विवादों की झड़ी लगी है— यह कोई इत्तेफाक नहीं है। यह एक वेल-प्लान्ड 'ऑपरेशन कट-टू-साइज' का हिस्सा दिख रहा है।

आज के इस स्पेशल वीडियो में हम जोड़ेंगे वो सारे तार... OSD की बर्खास्तगी से लेकर RDA जमीन विवाद, सर्किट हाउस थप्पड़ कांड और बस्तर के वन बैरियर तक। पूरा वीडियो ध्यान से देखिएगा, क्योंकि आज छत्तीसगढ़ पॉलिटिक्स का असली 'गेम' खुलने वाला है!


किसी भी मंत्री की सबसे मजबूत ढाल और उनकी आँख-कान होते हैं उनके OSD और PA। अगर सरकार को किसी मंत्री पर शिकंजा कसना होता है, तो सबसे पहले उनके इसी 'इनर सर्किल' को ध्वस्त किया जाता है।

केदार कश्यप के साथ ठीक यही हुआ:

1. पहला झटका: मंत्री जी के भरोसेमंद OSD सुनील तिवारी को अचानक आदेश जारी करके पद से हटा दिया गया।

2. दूसरा झटका: कुछ ही समय बाद उनके निज सहायक (PA) संकर्षण सिंह की संविदा सेवा अचानक समाप्त कर दी गई।

अब यहाँ एक बहुत बड़ा टेक्निकल पेंच समझिए! आमतौर पर मंत्रियों के साथ उनके निजी स्टाफ की नियुक्ति 'को-टर्मिनस' आधार पर होती है— यानी जब तक मंत्री पद पर हैं, उनका स्टाफ बना रहता है। लेकिन यहाँ मंत्री तो अपने पद पर बने हुए हैं, पर उनका पूराअमला एक-एक करके साफ किया जा रहा है!

मंत्रालय के गलियारों में चर्चा है कि यह केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है, यह सरकार का अपने ही मंत्री को सीधा और कड़ा संदेश है कि "आपकी हर गतिविधि पर पैनी नज़र है।"


स्टाफ हटाना तो सिर्फ शुरुआत थी, असली घेराबंदी हुई रायपुर विकास प्राधिकरण (RDA) की जमीन पुनर्पुनर्विन्यास (Land Readjustment Scheme) योजना में!

मामला क्या है?

विपक्ष का सीधा आरोप है कि केदार कश्यप की पत्नी से जुड़ी एक कंपनी— राधिका पैलेस प्राइवेट लिमिटेड को कचना की एक संकरी सड़क की जमीन के बदले सड्डू चौक पर मुख्य 150 फीट चौड़ी रोड पर करीब 20 करोड़ रुपये मूल्य का 23,327 वर्गफीट काकमर्शियल प्राइम प्लॉट अलॉट किया जा रहा है!

विपक्ष पूछ रहा है कि यह मेहरबानी क्यों? क्या यह 'वीआईपी ट्रीटमेंट' और पद का दुरुपयोग नहीं है?

और बात यहीं खत्म नहीं हुई! इस मामले में एक और ऐसा बखेड़ा खड़ा हुआ जिसने सबको चौंका दिया। बस्तर के सबसे बड़े आदिवासी चेहरों में से एक केदार कश्यप के परिवार से जुड़ी इस फाइल में जाति श्रेणी 'सामान्य' (General) दर्ज थी! हालाँकि RDA और सत्तापक्ष ने सफाई दी कि 'कंपनी की कोई जाति नहीं होती, इसलिए तकनीकी तौर पर सामान्य लिखा जाता है।' लेकिन राजनीतिक नुकसान तो हो चुका था! छवि को जो डेंट लगना था, वो लग 

सर्किट हाउस 'थप्पड़ कांड' और बस्तर वन बैरियर की आग


विवादों की यह फेहरिस्त यहीं नहीं रुकती। केदार कश्यप लगातार अपनी बयानबाजी और विवादित घटनाओं के कारण सुर्खियों में रहे हैं।

1. जगदलपुर सर्किट हाउस थप्पड़ कांड: जगदलपुर के सर्किट हाउस में 20 साल से काम कर रहे एक चतुर्थ श्रेणी संविदा कर्मचारी ने मंत्री जी पर आरोप लगाया कि उन्होंने चाय-नाश्ता और कमरे के ताले को लेकर गालियां दीं, कॉलर पकड़ा और थप्पड़ मारे! संविदा कर्मचारी ने थाने में लिखित शिकायत तक दे दी। कांग्रेस ने इसे हाथों-हाथ लिया और मंत्री के इस्तीफे की मांग कर दी। भले ही मंत्री जी ने इसे झूठा बताया, लेकिन जनता के बीच संदेश गलत चला गया।

2. चित्रकूट व बस्तर वन बैरियर विवाद: वन मंत्री बनने के बाद बस्तर के चित्रकूट मार्ग पर स्थित वन बैरियर पर इमली, महुआ और स्थानीय व्यापारियों से अवैध वसूली की शिकायतें उठीं। विपक्ष और स्थानीय ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि मंत्री के संरक्षण में ये बैरियर 'उगाही के केंद्र' बन गए हैं।

पुरानी रमन सरकार के वक्त का वो "मुन्ना भाई MA परीक्षा कांड" (जहाँ उनकी पत्नी की जगह फर्जी परीक्षार्थी के बैठने का आरोप लगा था) आज भी लोगों के जेहन में ताजा है। यानी विवादों का एक पूरा पहाड़ खड़ा हो चुका है!

क्या यह 'सीनियर नेताओं का सफाया अभियान' है?


अब आइए सबसे अहम और बड़े सवाल पर— आखिर छत्तीसगढ़ बीजेपी में चल क्या रहा है?

दोस्तों, 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद जब छत्तीसगढ़ में नई सरकार बनी, तो हाईकमान का मैसेज बिल्कुल साफ था— 'न्यूलीडरशिप' यानी नई पीढ़ी को आगे लाना।

 बृजमोहन अग्रवाल: रायपुर के सबसे कद्दावर नेता, जिन्हें सांसद बनाकर दिल्ली भेज दिया गया।

 अमर अग्रवाल और राजेश मूणत: रमन सिंह के दौर के सबसे ताकतवर मंत्री, जिन्हें इस बार मंत्रिमंडल में जगह तक नहीं मिली।

 रामविचार नेताम: सरगुजा के बड़े आदिवासी चेहरे, जिन्हें भी पावर सेंटर से दूर रखा गया।

और अब केदार कश्यप, जो बस्तर से आते हैं, स्व. बलिराम कश्यप के बेटे हैं और बस्तर में बीजेपी का सबसे बड़ा आदिवासी चेहरा माने जाते हैं।

जब किसी मंत्री का OSD हटाया जाता है, उनका PA हटाया जाता है, उनके विभागों और जमीनी फैसलों पर समीक्षा बैठा दी जाती है, और उनके पुराने-नए विवादों को हवा मिलने दी जाती है— तो राजनीति समझने वाले जानते हैं कि यह उन्हें 'साइडलाइन' करने की पटकथा है!

क्या हाईकमान और राज्य नेतृत्व यह सुनिश्चित कर रहा है कि पुरानी सरकार का कोई भी दिग्गज इतना मजबूत न हो सके कि वो नए सत्ता केंद्र के लिए चुनौती बन जाए? क्या केदार कश्यप को यह अहसास कराया जा रहा है कि अब वो पुरानी छूट का फायदा नहीं उठा सकते?

, ओएसडी की छुट्टी, पीए पर कार्रवाई, आरडीए का 20 करोड़ी प्लॉट विवाद, और थप्पड़ कांड... ये अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं, ये एक ही बड़ी तस्वीर के छोटे-छोटे टुकड़े हैं!

अब देखना यह होगा कि बस्तर का यह कद्दावर नेता इस सियासी दबाव से कैसे उबरता है? क्या केदार कश्यप खुद को साबित कर पाएंगे, या फिर छत्तीसगढ़ बीजेपी के 'पुराने दिग्गजों' की लिस्ट में उनका नाम भी पूरी तरह साइडलाइन नेताओं में शुमार हो जाएगा?

आपको क्या लगता है? क्या केदार कश्यप के खिलाफ साज़िश हो रही है या फिर यह सिर्फ भ्रष्टाचार पर नकेल कसने की कार्रवाई है? कमेंट करके अपनी राय ज़रूर बताइए!

प्रो. डॉ. लवली शर्मा: खैरागढ़ से ग्वालियर तक विवादों और सवालों की पूरी इनसाइड स्टोरी!

 प्रो. डॉ. लवली शर्मा: खैरागढ़ से ग्वालियर तक विवादों और सवालों की पूरी इनसाइड स्टोरी! 



 जब देश के बड़े कला और संगीत विश्वविद्यालयों की बात आती है, तो उम्मीद की जाती है कि उनका नेतृत्व करने वाले कुलपति विवादों से दूर रहकर उच्च शैक्षणिक मानक स्थापित करेंगे। लेकिन क्या हो जब एक नाम जहाँ भी प्रशासनिक ज़िम्मेदारी संभाले, वहाँ विवादों, नियुक्तियों के बवंडर और वित्तीय सवालों का सिलसिला साथ-साथ चलने लगे?

आज हम बात कर रहे हैं प्रो. डॉ. लवली शर्मा की, जो वर्तमान में छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ स्थित 'इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय' की कुलपति हैं। इससे पहले वे मध्य प्रदेश के ग्वालियर स्थित 'राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय' में कुलपति की कमान संभाल चुकी हैं। दयालबाग शैक्षणि संस्थान (आगरा) से लेकर ग्वालियर और अब खैरागढ़ तक—आखिर क्यों इनके कार्यकाल के दौरान प्रशासनिक कार्यशैली, नियुक्तियाँ और शोध से जुड़े मामले लगातार सवालों के घेरे में रहे हैं?

और सबसे बड़ा सवाल—जब खैरागढ़ में इनकी नियुक्ति का आदेश आया था, तब सत्तारूढ़ दल के अपने ही छात्र संगठन ABVP ने सड़कों पर उतरकर भारी विरोध प्रदर्शन और धरना क्यों दिया था? बाद में ऐसा क्या बदला कि विरोध की आवाज़ें शांत हो गईं? आज इस पूरी कहानी की एक-एक परत खोलेंगे।"

- खैरागढ़ विश्वविद्यालय: सोशल मीडिया का भूचाल और गंभीर आरोप

"शुरुआत करते हैं खैरागढ़ के इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय से, जहाँ का माहौल हाल के दिनों में फिर गरमा गया है।

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक के बाद एक कई पोस्ट्स और शिकायतें वायरल हुईं। इन पोस्ट्स में कुलपति डॉ. लवली शर्मा के कार्यकाल पर सीधे तीखे प्रहार किए गए:

  1. नियुक्तियों में गड़बड़ी: दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों की भर्ती व्यवस्था और नियमों की अनदेखी पर सवाल।
  2. शोध पंजीयन और पीएचडी आवंटन: पीएचडी के पंजीयन, गाइड्स के चयन और चहेतों को लाभ पहुँचाने के आरोप।
  3. निरीक्षण दल और वित्तीय मामले: विश्वविद्यालय के निरीक्षण दलों (Inspection Teams) में बाहरी सदस्यों की नियुक्ति और रायगढ़ कार्यक्रमों व दीक्षांत समारोह के वित्तीय खर्चों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए।

मामला इतना बढ़ गया कि विश्वविद्यालय प्रशासन को सामने आकर बयान जारी करना पड़ा। प्रशासन का कहना है कि ये सभी आरोप तथ्यहीन और भ्रामक हैं तथा सभी प्रक्रियाएं नियमानुसार हुई हैं। लेकिन सवाल वही है कि धुआं बार-बार क्यों उठता है?"

- ग्वालियर कार्यकाल: राजा मानसिंह तोमर यूनिवर्सिटी के विवाद

अब बात करते हैं ग्वालियर की। खैरागढ़ आने से पहले डॉ. लवली शर्मा मध्य प्रदेश के ग्वालियर स्थित 'राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय' की कुलपति थीं।

ग्वालियर में उनके कार्यकाल के दौरान भी प्रशासनिक कार्यशैली और नियुक्तियों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए थे:

  • योग्यता और अनुभव पर सवाल: उनकी नियुक्ति के समय ही यह आरोप लगा था कि पद के लिए आवश्यक 10 वर्षों के प्रोफेसर स्तर के शैक्षणिक व प्रशासनिक अनुभव के मापदंडों पर सवाल उठाए गए थे।
  • अंदरूनी खींचतान और मनमानी: ग्वालियर में प्राध्यापकों, स्टाफ और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच लगातार खींचतान की खबरें आती रहीं। आरोप थे कि प्रशासनिक निर्णयों और वित्तीय मामलों में पारदर्शिता की कमी रही।

यानी ग्वालियर से लेकर खैरागढ़ तक, पेटर्न एक जैसा ही नज़र आता है—जहाँ भी वे प्रशासनिक शीर्ष पर रहीं, वहाँ नियमों की व्याख्या और नियुक्तियों के तरीक़ों पर सवाल उठे।"

नियुक्ति के समय का वो ड्रामा: ABVP का विरोध प्रदर्शन

"अब आते हैं इस पूरी कहानी के सबसे चौंकाने वाले मोड़ पर। जब खैरागढ़ में इनकी नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही थी, तब विरोध विपक्षी दलों ने नहीं, बल्कि भाजपा के अपने ही छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने किया था!

ABVP के कार्यकर्ताओं ने कुलपति की नियुक्ति का जमकर विरोध किया। विश्वविद्यालय परिसर और प्रशासनिक भवनों के सामने ज़ोरदार प्रदर्शन और धरने दिए गए। ABVP का स्पष्ट आरोप था कि अतीत में विवादित कार्यकाल और कार्यशैली को देखते हुए ऐसे व्यक्ति को इतने प्रतिष्ठित कला-संगीत विश्वविद्यालय की ज़िम्मेदारी नहीं दी जानी चाहिए।

लेकिन फिर क्या हुआ? जैसे-जैसे समय बीता, विरोध की धार धीमी होती गई और अंततः मामला शांत हो गया। अंदरखाने चर्चाएँ शुरू हुईं कि क्या राजनीतिक तालमेल बिठा लिया गया या प्रशासनिक दबाव में विरोध को दबा दिया गया? जो संगठन शुरुआत में नियुक्ति रद्द करने की माँग पर अड़ा था, उसने बाद में चुप्पी क्यों साध ली? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब आज भी छात्र खोज रहे हैं।"

- प्रशासनिक सफाई और वर्तमान तस्वीर

"दूसरी तरफ, अगर कुलपति और विश्वविद्यालय परिवार के पक्ष को देखें, तो उनका कहना है कि डॉ. लवली शर्मा एक प्रतिष्ठित सितार वादक और देश की पहली महिला D.Litt. धारक हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन का तर्क है कि समय पर परीक्षा परिणाम घोषित करना, शैक्षणिक अनुशासन बनाना और दीक्षांत समारोह में कम खर्च करना उनकी उपलब्धियाँ हैं। सोशल मीडिया पर उठने वाले आरोपों को वे विश्वविद्यालय की छवि धूमिल करने की साज़िश बताते हैं।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि एक तरफ प्रतिष्ठित उपलब्धियाँ और दूसरी तरफ लगातार पीछा करते विवाद—इन दोनों के बीच सच कहाँ छुपा है?"

विश्वविद्यालय सिर्फ़ ईंट-पत्थर की इमारतें नहीं होते, वे युवाओं के भविष्य और देश की संस्कृति के केंद्र होते हैं। चाहे ग्वालियर हो या खैरागढ़, अगर बार-बार नियुक्तियों, शोध और पैसों के लेन-देन पर सवाल उठ रहे हैं, तो इसकी निष्पक्ष जाँच होना बेहद ज़रूरी है ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।

आप इस पूरे मामले पर क्या राय रखते हैं? क्या छात्र संगठनों का विरोध सही था या यह सब सिर्फ़ अंदरूनी गुटबाज़ी का नतीजा है? कमेंट बॉक्स में अपनी राय ज़रूर शेयर करें।

अदानी पॉवर में घोर लापरवाही, दो गुटों में भिड़ंत

 अदानी पॉवर में घोर लापरवाही, दो गुटों में भिड़ंत 


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से सटे धरसींवा-खरोरा इलाके के रायखेड़ा में स्थित अडानी पावर प्लांट में आखिर ऐसा क्या हुआ कि देखते ही देखते पूरा परिसर जंग का मैदान बन गया? पत्थर चले, गाड़ियां फोड़ी गईं, सरपंच की गाड़ी के कांच टूटे और बीच-बचाव करने पहुंची पुलिस टीम पर भी पथराव हुआ—जिसमें खरोरा थाना प्रभारी (TI) समेत कई पुलिसकर्मी घायल हो गए।

लेकिन सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि उस दिन क्या हुआ। असली सवाल यह है कि इस विवाद की जड़ में क्या है? क्या यह सिर्फ दो गुटों का आपसी झगड़ा था, या इसके पीछे लंबे समय से सुलग रही ‘स्थानीय बनाम बाहरी’ (Local vs Outsider) की वह आग है, जो छत्तीसगढ़ के औद्योगिक इलाकों में लगातार सुलग रही है?

आज की इस विस्तृत रिपोर्ट में हम इस पूरी घटना की एक-एक परत खोलेंगे। जानेंगे कि विवाद कैसे शुरू हुआ, अवैध शराब का इसमें क्या एंगल है, और क्यों उद्योगों में स्थानीय युवाओं का गुस्सा अब धीरे-धीरे सड़कों पर आने लगा है। घटनाक्रम: उस दिन आखिर हुआ क्या?

सबसे पहले समझते हैं कि उस दिन रायखेड़ा स्थित अडानी पावर प्लांट (रायपुर एनेरजेन लिमिटेड) के भीतर और बाहर क्या-क्या घटा।

खबरों और स्थानीय सूत्रों के अनुसार, घटना की शुरुआत प्लांट परिसर और आसपास के इलाके में अवैध रूप से बेची जा रही शराब के विरोध को लेकर हुई। बताया जा रहा है कि प्लांट के भीतर काम करने वाले मजदूरों के दो गुटों के बीच पहले कहासुनी हुई। देखते ही देखते बात इतनी बढ़ी कि दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए।

एक तरफ स्थानीय मजदूर थे और दूसरी तरफ बाहर से (विशेषकर बिहार और अन्य राज्यों से) आए मजदूर। विवाद इतना गहराया कि लाठी-डंडे और पत्थर चलने लगे। भगदड़ मच गई और जो भी बीच में आया, उसे निशाना बनाया गया।

घटना की खबर मिलते ही रायखेड़ा के स्थानीय सरपंच दिनेश वर्मा मौके पर पहुंचे ताकि स्थिति को शांत कराया जा सके, लेकिन उग्र भीड़ ने उनकी गाड़ी पर भी हमला कर दिया और वाहन के कांच फोड़ दिए।

जब स्थिति बेकाबू होने लगी, तो खरोरा थाने की पुलिस टीम मौके पर पहुंची। पुलिस ने जैसे ही दोनों गुटों को तितर-बितर करने और स्थिति पर काबू पाने की कोशिश की, उपद्रवियों ने पुलिस पर ही पथराव शुरू कर दिया। इस हमले में खरोरा टीआई सहित कई पुलिस जवान चोटिल हुए। इसके बाद अतिरिक्त पुलिस बल बुलाया गया, तब जाकर स्थिति को नियंत्रण में लिया जा सका।

स्थानीय बनाम बाहरी: विवाद का असली केंद्र

ऊपरी तौर पर देखने पर यह मामला सिर्फ शराब की बिक्री या दो मजदूरों के झगड़े का लग सकता है, लेकिन अगर आप छत्तीसगढ़ के औद्योगिक क्षेत्रों की जमीनी हकीकत को समझते हैं, तो आपको इसके पीछे की गहरी वजह साफ नजर आएगी।

और वह वजह है—‘स्थानीय बनाम बाहरी’ का तनाव।

छत्तीसगढ़ में जब भी कोई बड़ा उद्योग या पावर प्लांट लगता है, तो स्थानीय ग्रामीणों और युवाओं से कई बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं:

  1. जमीन देने वाले परिवारों को स्थायी रोजगार मिलेगा।
  2. स्थानीय युवाओं को योग्यता के अनुसार प्राथमिकता दी जाएगी।
  3. क्षेत्र का विकास होगा।

लेकिन रायखेड़ा और आसपास के इलाकों के ग्रामीणों की शिकायत सालों से रही है कि हकीकत इसके बिल्कुल उलट है।

पहला मुद्दा—रोजगार और ठेकेदारी: संयंत्रों में अधिकतर बड़े ठेके बाहरी ठेकेदारों को दे दिए जाते हैं। ये ठेकेदार लागत कम करने और अपनी जान-पहचान के आधार पर बिहार, झारखंड या उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से सस्ते दामों पर मजदूरों को लेकर आते हैं। परिणाम स्वरूप, स्थानीय युवाओं को या तो काम नहीं मिलता, या उन्हें सबसे निचले स्तर के और कम मजदूरी वाले कामों में धकेल दिया जाता है।

दूसरा मुद्दा—असंतोष और सांस्कृतिक टकराव: जब किसी एक ही परिसर में स्थानीय और बाहर से आए सैकड़ों-हजारों मजदूर एक साथ काम करते हैं, और उनके बीच सुविधाओं व मजदूरी को लेकर विषमता (disparity) होती है, तो छोटी-सी बात भी बड़े विवाद का रूप ले लेती है। रायखेड़ा की घटना में भी यही देखने को मिला। अवैध शराब का मुद्दा सिर्फ एक चिनगारी था, लेकिन बारूद पहले से ही जमा था।

सुरक्षा, अवैध कारोबार और प्रशासन की भूमिका

अब सवाल यह भी उठता है कि इतने बड़े पावर प्लांट परिसर के भीतर या उसके ठीक आसपास अवैध शराब का कारोबार फल-फूल कैसे रहा था?

  • संयंत्र प्रबंधन की सुरक्षा पर सवाल: इतने बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान में सुरक्षा गार्ड्स और सीसीटीवी कैमरे होने के बावजूद परिसर के आसपास ऐसा माहौल कैसे बना? क्या प्रबंधन ने समय रहते अंदर पनप रहे असंतोष और अवैध गतिविधियों पर ध्यान नहीं दिया?
  • स्थानीय पुलिस और आबकारी विभाग: क्या स्थानीय पुलिस और आबकारी विभाग को इस बात की भनक नहीं थी कि औद्योगिक क्षेत्र में मजदूरों के बीच अवैध शराब खपाई जा रही है? अगर समय रहते इन अवैध गतिविधियों पर नकेल कसी जाती, तो शायद बात इतनी नहीं बिगड़ती।
  • कानून व्यवस्था का सवाल: पुलिस पर पथराव होना और थाना प्रभारी का घायल होना यह दर्शाता है कि उपद्रवियों के भीतर कानून का खौफ खत्म हो चुका था।

पुलिस ने अब इस मामले में बलवा, तोड़फोड़ और सरकारी काम में बाधा डालने की धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया है और वीडियो फुटेज के आधार पर उपद्रवियों की पहचान की जा रही है। कई लोगों को हिरासत में भी लिया गया है।

रायखेड़ा की घटना एक चेतावनी है। अगर इसे सिर्फ एक 'क्राइम न्यूज़' मानकर फाइल बंद कर दी गई, तो ऐसी घटनाएं बार-बार दोहराई जाएंगी। जरूरत इस बात की है कि इसके मूल कारणों पर ध्यान दिया जाए।

1. स्थानीय युवाओं को रोजगार नीति का पारदर्शी पालन: राज्य सरकार और औद्योगिक घरानों को यह सुनिश्चित करना होगा कि छत्तीसगढ़ नीति के तहत जो 80-90% स्थानीय रोजगार का नियम है, उसका पालन कागजों पर नहीं बल्कि जमीन पर हो।

2. बाहरी मजदूरों का वेरिफिकेशन: प्लांट्स में काम करने वाले सभी बाहरी मजदूरों और ठेकेदारों का पुलिस वेरिफिकेशन अनिवार्य होना चाहिए, ताकि आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों पर रोक लग सके।

3. अवैध कारोबार पर नकेल: औद्योगिक बस्तियों के आसपास अवैध शराब, गांजा और जुए जैसे अड्डों को तुरंत बंद कराया जाना चाहिए, जो अक्सर ऐसे बड़े विवादों की वजह बनते हैं।

रायखेड़ा स्थित अडानी प्लांट की यह घटना सिर्फ दो गुटों की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह उस असंतोष का नतीजा है जो स्थानीय अधिकारों की अनदेखी और प्रशासनिक लापरवाही से पैदा होता है।

इस पूरे मामले पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि उद्योगों में स्थानीय युवाओं को उनका हक न मिलना ही ऐसे विवादों की मुख्य वजह है? अपनी राय नीचे कमेंट सेक्शन में जरूर लिखें।