बैलाडीला का 'लूपहोल' खेल: 57 बनाम 59 का असली सच!
"छत्तीसगढ़ के बस्तर से निकलने वाला लोहा... जो देश-दुनिया की फैक्ट्रियों को चमकाता है, उसी लोहे के काले खेल को लेकर एक ऐसी खबर आई जिसने विजिलेंस से लेकर रेलवे तक के होश उड़ा दिए। हर जगह चर्चा थी कि बैलाडीला से 52 वैगन की जगह 59 वैगन भेजे गए। लेकिन रुकिए! असली खेल डिब्बों की गिनती का नहीं... असली खेल तो कागजों और रॉयल्टी के वजन का है!
आज हम आपको बताने जा रहे हैं इस खेल के पीछे की वो कड़वी हकीकत, जिसे दबाने की पूरी कोशिश की गई। कहानी 52 डिब्बों की नहीं, बल्कि **57 लाख और 59 लाख मीट्रिक टन** के उस हेरफेर की है, जिसमें सीधे-सीधे 2 लाख मीट्रिक टन लोहा सिस्टम की नाक के नीचे से 'गायब' करने की तैयारी थी! आखिर ये 2 लाख का अतिरिक्त माल किसके इशारे पर जा रहा था? और कौन है इस पूरे सिंडिकेट का मास्टरमाइंड? चलिए पूरा खेल खोलते हैं!"
आंकड़ेबाजी का मायाजाल
"आम जनता को उलझाया गया वैगनों की गिनती में, ताकि असली आंकड़ों पर किसी की नजर न जाए। विजिलेंस की गहरी जांच में जो सच सामने आया है, वो चौंकाने वाला है। रिकॉर्ड्स के मुताबिक, जहां सिर्फ **57 लाख** की परमिशन, रॉयल्टी और पास वैध थे... वहां असलियत में वजन पहुंच गया **59 लाख** पर!
यानी सीधे-सीधे **2 लाख** का यह अतिरिक्त माल... जिसका न कोई सरकारी टैक्स चुकाया गया, न कोई वैध ट्रांजिट पास (TP) था। अब सवाल यह उठता है कि क्या बस्तर के पहाड़ों से लोहा बिना किसी की इजाजत के अपने आप ट्रेन पर लोड हो गया? क्या NMDC के लोडिंग सुपरवाइजर सो रहे थे? या फिर रेलवे के वेब्रिज (कांटा) पर बैठे अधिकारियों की आंख पर नोटों की पट्टी बंधी थी?"
"अब समझिए कि यह खेल काम कैसे करता है। ट्रेन बुक होती है एक बड़े सरकारी या प्रतिष्ठित संस्थान, जैसे 'विशाखापट्टनम स्टील प्लांट' के नाम पर। क्यों? क्योंकि सरकारी प्लांट के नाम पर आने-जाने वाली गाड़ियों पर कोई शक नहीं करता। ग्रीन सिग्नल मिलता जाता है और ट्रेनें बिना किसी रुकावट के केके लाइन (KK Line) से आगे बढ़ती रहती हैं।
लेकिन इस बड़े रैक की आड़ में जो **2 लाख का अतिरिक्त माल** छुपाया गया था, उसकी सेटिंग कहीं और थी। विशाखापट्टनम पहुंचने से पहले या वहां के बड़े यार्ड्स में, इस एक्स्ट्रा माल को चुपके से 'शंटिंग' और 'री-मार्शलिंग' के जरिए प्राइवेट पैलेट प्लांट्स, निजी स्पंज आयरन फैक्ट्रियों या फिर समुद्र के रास्ते विदेश भेजने वाले एक्सपोर्टर्स के खाते में डाल दिया जाता है। यानी, नाम सरकारी प्लांट का... और मलाई प्राइवेट माफिया की!"
"विजिलेंस ने इस रैक को इंटरसेप्ट करके चोरी तो पकड़ ली, लेकिन यह सिर्फ एक रैक की बात नहीं है। सवाल यह है कि ऐसे कितने '2 लाख' के फेरबदल पास्ट में हो चुके हैं, जो फाइलों में कभी दर्ज ही नहीं हुए? बिना टॉप-लेवल की मिलीभगत के, इतनी बड़ी मात्रा में आयरन ओर का अवैध परिवहन नामुमकिन है। यह बस्तर के प्राकृतिक संसाधनों की खुली डकैती है, जिसमें रॉयल्टी का करोड़ों रुपया सरकार के खजाने में जाने के बजाय सीधे सिंडिकेट की जेब में जा रहा था।
अब देखना यह है कि विजिलेंस की इस कार्रवाई के बाद क्या सिर्फ छोटे कर्मचारियों को बली का बकरा बनाया जाएगा, या फिर उन सफेदपोश चेहरों और बड़े अफसरों तक भी कानून के हाथ पहुंचेंगे जो विशाखापट्टनम से लेकर छत्तीसगढ़ तक इस पूरे रैकेट को ऑपरेट कर रहे हैं।"




