प्रो. डॉ. लवली शर्मा: खैरागढ़ से ग्वालियर तक विवादों और सवालों की पूरी इनसाइड स्टोरी!
जब देश के बड़े कला और संगीत विश्वविद्यालयों की बात आती है, तो उम्मीद की जाती है कि उनका नेतृत्व करने वाले कुलपति विवादों से दूर रहकर उच्च शैक्षणिक मानक स्थापित करेंगे। लेकिन क्या हो जब एक नाम जहाँ भी प्रशासनिक ज़िम्मेदारी संभाले, वहाँ विवादों, नियुक्तियों के बवंडर और वित्तीय सवालों का सिलसिला साथ-साथ चलने लगे?
आज हम बात कर रहे हैं प्रो. डॉ. लवली शर्मा की, जो वर्तमान में छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ स्थित 'इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय' की कुलपति हैं। इससे पहले वे मध्य प्रदेश के ग्वालियर स्थित 'राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय' में कुलपति की कमान संभाल चुकी हैं। दयालबाग शैक्षणि संस्थान (आगरा) से लेकर ग्वालियर और अब खैरागढ़ तक—आखिर क्यों इनके कार्यकाल के दौरान प्रशासनिक कार्यशैली, नियुक्तियाँ और शोध से जुड़े मामले लगातार सवालों के घेरे में रहे हैं?
और सबसे बड़ा सवाल—जब खैरागढ़ में इनकी नियुक्ति का आदेश आया था, तब सत्तारूढ़ दल के अपने ही छात्र संगठन ABVP ने सड़कों पर उतरकर भारी विरोध प्रदर्शन और धरना क्यों दिया था? बाद में ऐसा क्या बदला कि विरोध की आवाज़ें शांत हो गईं? आज इस पूरी कहानी की एक-एक परत खोलेंगे।"
- खैरागढ़ विश्वविद्यालय: सोशल मीडिया का भूचाल और गंभीर आरोप
"शुरुआत करते हैं खैरागढ़ के इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय से, जहाँ का माहौल हाल के दिनों में फिर गरमा गया है।
हाल ही में सोशल मीडिया पर एक के बाद एक कई पोस्ट्स और शिकायतें वायरल हुईं। इन पोस्ट्स में कुलपति डॉ. लवली शर्मा के कार्यकाल पर सीधे तीखे प्रहार किए गए:
- नियुक्तियों में गड़बड़ी: दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों की भर्ती व्यवस्था और नियमों की अनदेखी पर सवाल।
- शोध पंजीयन और पीएचडी आवंटन: पीएचडी के पंजीयन, गाइड्स के चयन और चहेतों को लाभ पहुँचाने के आरोप।
- निरीक्षण दल और वित्तीय मामले: विश्वविद्यालय के निरीक्षण दलों (Inspection Teams) में बाहरी सदस्यों की नियुक्ति और रायगढ़ कार्यक्रमों व दीक्षांत समारोह के वित्तीय खर्चों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए।
मामला इतना बढ़ गया कि विश्वविद्यालय प्रशासन को सामने आकर बयान जारी करना पड़ा। प्रशासन का कहना है कि ये सभी आरोप तथ्यहीन और भ्रामक हैं तथा सभी प्रक्रियाएं नियमानुसार हुई हैं। लेकिन सवाल वही है कि धुआं बार-बार क्यों उठता है?"
- ग्वालियर कार्यकाल: राजा मानसिंह तोमर यूनिवर्सिटी के विवाद
अब बात करते हैं ग्वालियर की। खैरागढ़ आने से पहले डॉ. लवली शर्मा मध्य प्रदेश के ग्वालियर स्थित 'राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय' की कुलपति थीं।
ग्वालियर में उनके कार्यकाल के दौरान भी प्रशासनिक कार्यशैली और नियुक्तियों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए थे:
- योग्यता और अनुभव पर सवाल: उनकी नियुक्ति के समय ही यह आरोप लगा था कि पद के लिए आवश्यक 10 वर्षों के प्रोफेसर स्तर के शैक्षणिक व प्रशासनिक अनुभव के मापदंडों पर सवाल उठाए गए थे।
- अंदरूनी खींचतान और मनमानी: ग्वालियर में प्राध्यापकों, स्टाफ और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच लगातार खींचतान की खबरें आती रहीं। आरोप थे कि प्रशासनिक निर्णयों और वित्तीय मामलों में पारदर्शिता की कमी रही।
यानी ग्वालियर से लेकर खैरागढ़ तक, पेटर्न एक जैसा ही नज़र आता है—जहाँ भी वे प्रशासनिक शीर्ष पर रहीं, वहाँ नियमों की व्याख्या और नियुक्तियों के तरीक़ों पर सवाल उठे।"
नियुक्ति के समय का वो ड्रामा: ABVP का विरोध प्रदर्शन
"अब आते हैं इस पूरी कहानी के सबसे चौंकाने वाले मोड़ पर। जब खैरागढ़ में इनकी नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही थी, तब विरोध विपक्षी दलों ने नहीं, बल्कि भाजपा के अपने ही छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने किया था!
ABVP के कार्यकर्ताओं ने कुलपति की नियुक्ति का जमकर विरोध किया। विश्वविद्यालय परिसर और प्रशासनिक भवनों के सामने ज़ोरदार प्रदर्शन और धरने दिए गए। ABVP का स्पष्ट आरोप था कि अतीत में विवादित कार्यकाल और कार्यशैली को देखते हुए ऐसे व्यक्ति को इतने प्रतिष्ठित कला-संगीत विश्वविद्यालय की ज़िम्मेदारी नहीं दी जानी चाहिए।
लेकिन फिर क्या हुआ? जैसे-जैसे समय बीता, विरोध की धार धीमी होती गई और अंततः मामला शांत हो गया। अंदरखाने चर्चाएँ शुरू हुईं कि क्या राजनीतिक तालमेल बिठा लिया गया या प्रशासनिक दबाव में विरोध को दबा दिया गया? जो संगठन शुरुआत में नियुक्ति रद्द करने की माँग पर अड़ा था, उसने बाद में चुप्पी क्यों साध ली? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब आज भी छात्र खोज रहे हैं।"
- प्रशासनिक सफाई और वर्तमान तस्वीर
"दूसरी तरफ, अगर कुलपति और विश्वविद्यालय परिवार के पक्ष को देखें, तो उनका कहना है कि डॉ. लवली शर्मा एक प्रतिष्ठित सितार वादक और देश की पहली महिला D.Litt. धारक हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन का तर्क है कि समय पर परीक्षा परिणाम घोषित करना, शैक्षणिक अनुशासन बनाना और दीक्षांत समारोह में कम खर्च करना उनकी उपलब्धियाँ हैं। सोशल मीडिया पर उठने वाले आरोपों को वे विश्वविद्यालय की छवि धूमिल करने की साज़िश बताते हैं।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि एक तरफ प्रतिष्ठित उपलब्धियाँ और दूसरी तरफ लगातार पीछा करते विवाद—इन दोनों के बीच सच कहाँ छुपा है?"
विश्वविद्यालय सिर्फ़ ईंट-पत्थर की इमारतें नहीं होते, वे युवाओं के भविष्य और देश की संस्कृति के केंद्र होते हैं। चाहे ग्वालियर हो या खैरागढ़, अगर बार-बार नियुक्तियों, शोध और पैसों के लेन-देन पर सवाल उठ रहे हैं, तो इसकी निष्पक्ष जाँच होना बेहद ज़रूरी है ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।
आप इस पूरे मामले पर क्या राय रखते हैं? क्या छात्र संगठनों का विरोध सही था या यह सब सिर्फ़ अंदरूनी गुटबाज़ी का नतीजा है? कमेंट बॉक्स में अपनी राय ज़रूर शेयर करें।






