"छोटे को डांटा, बड़ों को बांटा? प्रशासन में दोहरी नीति पर तीखा सवाल!"
आज हम बात करेंगे छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक व्यवस्था के एक ऐसे कड़वे सच पर, जो अक्सर फाइलों के नीचे दबा दिया जाता है।
अरे भई, सरकारें बदलती हैं, चेहरे बदलते हैं, मुख्यमंत्री बदलते हैं, बड़ी-बड़ी घोषणाएं होती हैं—कि गड़बड़ी मिलेगी तो किसी को नहीं छोड़ेंगे, सीधे कलेक्टर नपेंगे! लेकिन जब ज़मीन पर एक्शन की बारी आती है, तो नजारा कुछ और ही होता है। क्या वाकई हमारे सिस्टम में न्याय सबके लिए बराबर है? या फिर नियम सिर्फ छोटे कर्मचारियों, तहसीलदारों और ठेकेदारों के लिए बने हैं, और बड़े आईएएस अधिकारियों, यानी कलेक्टरों को बचाने के लिए शासन के हाथ कांप जाते हैं?
आज हमारे पास दो बड़ी खबरें हैं, जिन्हें देखकर यह सवाल पूछना लाज़मी हो जाता है—क्या वाकई 'छोटों को प्रताड़ना और बड़ों को गोद में बिठाना' का खेल चल रहा है? आइए, इस पूरी पोल खोल को विस्तार से समझते हैं।
सीएम हेल्पलाइन की समीक्षा और पिपरिया तहसीलदार
सबसे पहले बात करते हैं पहली खबर की। हाल ही में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए सभी 33 जिलों के कलेक्टरों और अधिकारियों की क्लास ली। मुद्दा था—सीएम हेल्पलाइन 1076!
समीक्षा में यह सामने आया कि पिछले साढ़े चार महीनों में 2 लाख 31 हजार से ज्यादा शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें से 2 लाख 5 हजार से ज्यादा का निराकरण करने का दावा किया गया। मुख्यमंत्री ने कड़े तेवर दिखाते हुए साफ कहा कि शिकायतें सिर्फ कागजों पर हल नहीं होनी चाहिए, ज़मीन पर दिखनी चाहिए।
नतीजा क्या हुआ? कबीरधाम जिले के पिपरिया के तहसीलदार प्रमोद कुमार चंद्रवंशी को डेढ़ साल से लंबित सीमांकन के मामले में तुरंत निलंबित कर दिया गया। इतना ही नहीं, बंटवारे के बाद राजस्व अभिलेख दुरुस्त न करने पर एक अन्य तहसीलदार को कारण बताओ नोटिस भी थमा दिया गया।
भाई, एक्शन हुआ, अच्छी बात है। जनता की समस्याओं का समाधान होना ही चाहिए। लेकिन असली ट्विस्ट तो इसके बाद शुरू होता है!
पीएम आवास योजना में गड़बड़ी और ठेकेदारों पर FIR
अब ज़रा रुख करते हैं दूसरी खबर की तरफ। मुद्दा है गरीबों के सपनों का आशियाना—प्रधानमंत्री आवास योजना और जनमन आवास योजना।
उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि गरीबों के हक की राशि का दुरुपयोग कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कबीरधाम जिले के विकासखंड बोड़ला के अंतर्गत, विशेष पिछड़ी जनजाति (बैगा जनजाति) के 9 हितग्राहियों से आवास निर्माण के नाम पर 5 लाख 9 हजार रुपए हड़प लिए गए। और इसके बाद क्या हुआ? प्रशासन ने तुरंत दो अलग-अलग मामलों में ठेकेदारों के खिलाफ चिल्फी और तरेगांव जंगल थाने में एफआईआर दर्ज कर ली।
ठेकेदारों ने गड़बड़ी की, पैसा खाया, जेल जाने का रास्ता साफ हुआ—यह बिल्कुल सही कदम है। गरीबों के साथ धोखाधड़ी करने वालों को बख्शा नहीं जाना चाहिए।
मुख्य सवाल: क्या कलेक्टरों पर कार्रवाई के वक्त कांपते हैं हाथ?
अब असली और चुभने वाला सवाल उठता है!
जरा सोचिए—जब प्रधानमंत्री आवास योजना या सरकारी योजनाओं में इतनी बड़ी लापरवाही सामने आती है, तो क्या इसकी जिम्मेदारी सिर्फ एक ठेकेदार की होती है? क्या ज़मीन पर मॉनिटरिंग करने वाले प्रशासनिक अमले, यानी जिले के मुखिया 'कलेक्टर' की कोई जवाबदेही नहीं है?
मुख्यमंत्री जी ने पहले बहुत स्पष्ट घोषणा की थी कि अगर प्रधानमंत्री आवास योजना में गड़बड़ी हुई, तो सीधे कलेक्टर नपेंगे! लेकिन ज़रा हकीकत के आईने में देखिए—क्या किसी बड़े कलेक्टर पर आज तक कोई ठोस गाज गिरी? क्या बड़े अधिकारियों पर कार्रवाई करते समय शासन-प्रशासन के हाथ कांपने लगते हैं?
आज स्थिति यह है कि कई ऐसे विवादास्पद कलेक्टर और बड़े अधिकारी मलाईदार पदों पर आराम से बैठे हुए हैं। जब गलती होती है, तो ठीकरा फोड़ने के लिए हमेशा नीचे के मोहरों—यानी छोटे तहसीलदारों, बाबुओं या ठेकेदारों को चुन लिया जाता है।
इसे आप क्या कहेंगे? क्या यही है वह पुरानी कहावत—"छोटों को डांटा, बड़ों को बांटा"? या फिर कहें कि "छोटों को प्रताड़ना, बड़े को गोद में बिठाना"?
लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही सबसे ऊपर होती है। सीएम हेल्पलाइन या पीएम आवास योजना जैसी योजनाएं सीधे तौर पर जनता के विश्वास से जुड़ी हैं। अगर सरकार वाकई ज़ीरो टॉलरेंस की नीति पर चलना चाहती है, तो यह कार्रवाई सिर्फ नीचे के स्तर तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए। बड़ों को बचाना और छोटों को बलि का बकरा बनाना बंद होना चाहिए, तभी जाकर व्यवस्था में सुधार आ पाएगा।





