बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

सरकारी निर्माण या भ्रष्टाचार का खेल? विधानसभा से लेकर संसद तक हाल बेहाल!

 सरकारी निर्माण या भ्रष्टाचार का खेल? विधानसभा से लेकर संसद तक हाल बेहाल!



आज बात करेंगे एक ऐसे गंभीर मुद्दे पर, जो सीधे तौर पर जनता के खून-पसीने की कमाई की बर्बादी से जुड़ा है। क्या हमारे देश में अब बड़े-बड़े सरकारी भवन और सड़कें सिर्फ कागजों पर मजबूत और असलियत में भ्रष्टाचार के नमूने बनकर रह गए हैं?

अभी हाल ही में रायपुर के नवा रायपुर स्थित हमारे नए छत्तीसगढ़ विधानसभा भवन से जो तस्वीरें सामने आई हैं, उसने हर किसी को चौंका दिया है। भई, ज़रा सोचिए—जिस विधानसभा भवन को बनाने में करीब 324 करोड़ रुपये खर्च किए गए हों, वहां कुछ ही महीनों के भीतर फॉल्स सीलिंग गिर जाए, कभी स्टील के पाइप नीचे आ जाएं और अब दीवार की 10 फीट लंबी टाइल्स भरभराकर नीचे गिर जाएं—इसे आप क्या कहेंगे? गनीमत ये रही कि उस वक्त वहां कोई मौजूद नहीं था, वरना कोई बड़ा हादसा भी हो सकता था। लेकिन सवाल ये है कि क्या सरकार किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रही है?


लेकिन कहानी सिर्फ रायपुर या छत्तीसगढ़ की नहीं है। बीमारी राष्ट्रीय स्तर पर फैल चुकी है! आइए राजधानी दिल्ली चलते हैं... वही दिल्ली, जहां देश का नया संसद भवन बना है। दुनिया भर में डंका पीटा गया कि आधुनिक सुविधाओं से लैस नया संसद भवन तैयार हुआ है। लेकिन जरा बरसात के मौसम की वो तस्वीरें याद कीजिए, जब संसद भवन के अंदर से पानी टपकने लगा था और छत टपकने की वजह से अंदर बाल्टी लगानी पड़ गई थी! भई वाह! देश के सर्वोच्च लोकतंत्र के मंदिर में अगर बारिश का पानी टपकेगा, तो आम जनता की बस्तियों और सरकारी दफ्तरों का क्या हाल होगा, इसका अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं।


और जरा इन सरकारी बाबूओं और ठेकेदारों के कारनामों का दायरा देखिए। बात सिर्फ इमारतों तक सीमित नहीं है, सड़कों का खेल तो इससे भी निराला है! चुनाव के वक्त या किसी बड़े नेता के दौरे से पहले रातों-रात सड़कें ऐसे बनाई जाती हैं, जैसे मानों कोई सोने की पट्टी बिछाई जा रही हो। लेकिन जनाब, पहली ही बारिश या थोड़ा सा ट्रैफिक क्या झेला, वो सड़कें ऐसे उखड़ने लगती हैं जैसे मक्खन पर से चादर हट रही हो! पैचवर्क के नाम पर जनता के करोड़ों रुपये हर साल पानी की तरह बहा दिए जाते हैं, और कुछ ही हफ्तों में सड़क पर बड़े-बड़े गड्ढे और धूल के गुबार उड़ने लगते हैं।

सवाल यह है कि आखिर इन प्रोजेक्ट्स की क्वालिटी चेक करने वाले इंजीनियर, अधिकारी और मंत्री कहां सोते रहते हैं? क्या 324 करोड़ या हजारों करोड़ के बजट में वाटर-प्रूफिंग, मजबूत दीवारों और टिकाऊ सड़कों का प्रावधान नहीं होता? या फिर बजट का बड़ा हिस्सा कमीशन और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है?

आज जरूरत सिर्फ इस बात की नहीं है कि गिरी हुई टाइल्स को दोबारा चिपका दिया जाए या टपकती छत पर पन्नी डाल दी जाए। जरूरत इस बात की है कि पूरे सिस्टम की, इन तमाम सरकारी भवनों की और निर्माण गुणवत्ता की एक उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच हो। ठेकेदारों और मिलीभगत करने वाले अधिकारियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई हो, ताकि जनता के टैक्स के एक-एक पाई का सही इस्तेमाल हो सके।

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026

स्कूलों की बर्बादी के गुनहगार

स्कूलों की बर्बादी के गुनहगार


 हिंदू-मुस्लिम' का शोर और सड़कों पर सिसकता भविष्य

स्कूल बर्बाद, पद खाली, संपत्तियां नीलाम... आखिर युवाओं और बच्चों के हिस्से में क्या आया?


सरकारी दफ्तरों से कुछ ही दूरी पर जब स्कूल की यूनिफॉर्म पहने मासूम बच्चे हाथों में तख्तियां लेकर सड़कों पर उतरने को मजबूर हो जाएं, तो समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था का ढांचा पूरी तरह चरमरा चुका है। हाल के दिनों में देश और राज्यों के अलग-अलग हिस्सों से आई तस्वीरों ने हर संवेदनशील नागरिक को झकझोर कर रख दिया है। जिन हाथों में किताबें, कलम और भविष्य के सपने होने चाहिए थे, वे हाथ आज अपने बुनियादी हक के लिए नारेबाजी कर रहे हैं।

लेकिन सवाल यह है कि सत्ता के गलियारों में बैठे हुक्मरानों की नजर इन सिसकती तस्वीरों पर क्यों नहीं पड़ रही?

1. धर्म का चश्मा और जहरीली राजनीति का शोर

जब-जब जनता ने अपने बुनियादी अधिकारों—बेहतर शिक्षा, अस्पताल, रोजगार और बुनियादी ढांचे—पर सवाल पूछे, तब-तब सत्ता की ओर से एक ही आजमाया हुआ फॉर्मूला पेश किया गया: सांप्रदायिक ध्रुवीकरण।

पिछले कुछ सालों के राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर डालें तो स्पष्ट दिखता है कि बहस के मुख्य मुद्दे बदलकर क्या कर दिए गए हैं:

  • असली मुद्दे: गिरता शिक्षा स्तर, खाली पड़े शिक्षकों के पद, बंद होते सरकारी स्कूल और युवाओं की बेरोजगारी।
  • बनाए गए मुद्दे: कौन क्या पहनेगा, कौन क्या खाएगा, किसका नाम बदला जाएगा और किस धर्म का प्रतीक बड़ा है।

राजनीतिक रैलियों से लेकर मुख्यधारा के मीडिया मंचों तक चौबीसों घंटे 'हिंदू-मुस्लिम' का विमर्श परोसा जा रहा है ताकि आम आदमी अपने बच्चे की खाली क्लासरूम और भविष्य के अंधेरे के बारे में सोचना ही भूल जाए।

2. संपत्तियों की 'महासेल' और सरकारी ढांचे का समर्पण

एक तरफ जहां देश के युवाओं को भावनात्मक मुद्दों में उलझाकर रखा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ पर्दे के पीछे सार्वजनिक संपत्तियों की अंधाधुंध बिक्री और निजीकरण का खेल जारी है।

  • निजीकरण की होड़: रेलवे, हवाई अड्डे, बंदरगाह, बिजली कंपनियां और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को एक-एक कर निजी हाथों में सौंपा जा रहा है।
  • सरकारी संपत्तियों का अवमूल्यन: 'राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन' (National Monetization Pipeline) जैसी योजनाओं के नाम पर दशकों में बनी राष्ट्रीय संपत्तियों को कॉरपोरेट मित्रों के हवाले किया जा रहा है।
  • जनता पर बोझ: निजीकरण के इस दौर में आम आदमी से सस्ती सरकारी सेवाएं छीनकर उन्हें कॉरपोरेट के महंगे टैरिफ और फीस के भरोसे छोड़ दिया गया है।

3. शिक्षा का विनाश और रिक्त पदों पर ताले

सड़कों पर उतरे स्कूली बच्चों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं का गुस्सा बेवजह नहीं है। आंकड़े और जमीनी हकीकत सत्ता के दावों की पोल खोलते हैं:

क्षेत्र

जमीनी हकीकत और आंकड़े

सरकारीस्कूल

हजारों सरकारी स्कूल 'मर्ज' करने के नाम पर बंद कर दिए गए हैं। जर्जर इमारतें, पीने के पानी और शौचालयों काअभाव।

शिक्षक भर्ती

लाखों पद सालों से खाली पड़े हैं। भर्ती परीक्षाएं होती हैं तो पेपर लीक हो जाते हैं, या फिर मामले सालों तक अदालतोंमें लटके रहते हैं।

अस्थायीव्यवस्था

स्थायी नौकरियों की जगह संविदा (Contractual) और आउटसोर्सिंग प्रथा को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि न्यूनतमवेतन पर काम कराया जा सके।

बजट मेंकटौती

जीडीपी का एक मामूली हिस्सा ही शिक्षा पर खर्च हो रहा है, जो विकसित राष्ट्र बनने के दावों के साथ भद्दा मजाक है।

4. सड़कों पर उतरा भविष्य: कब जागेगी सरकार?

जब सरकारी स्कूलों में शिक्षक नहीं होंगे, प्रयोगशालाओं में उपकरण नहीं होंगे और डिग्रियों के बावजूद रोजगार के अवसर नहीं होंगे, तो युवा और बच्चे सड़कों पर नहीं आएंगे तो कहाँ जाएंगे?

आज का छात्र और युवा यह समझ चुका है कि 'नफरत का शोर' उसके पेट की भूख नहीं मिटा सकता और न ही उसे एक सुरक्षित भविष्य दे सकता है। सत्ता में बैठे जिम्मेदार अधिकारियों और नेताओं को यह याद रखना होगा कि:

  1. मंदिर-मस्जिद के नाम पर चुनाव जीते जा सकते हैं, लेकिन देश का निर्माण केवल शिक्षा और रोजगार से होता है।
  2. संपत्तियों को बेचकर तात्कालिक राजस्व तो जुटाया जा सकता है, लेकिन आने वाली पीढ़ियों की आर्थिक नींव को हमेशा के लिए कमजोर कर दिया जाता है।

संपादकीय निष्कर्ष

सड़कों पर उतरे इन स्कूली बच्चों के चेहरे पर दिख रही लाचारी और गुस्सा किसी एक सरकार की नाकामी नहीं, बल्कि हमारी पूरी लोकतांत्रिक प्राथमिकता का रिपोर्ट कार्ड है। यदि अब भी नीति-निर्माताओं ने नफरत की राजनीति छोड़कर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर ध्यान नहीं दिया, तो इतिहास इस दौर को 'भविष्य की बलि चढ़ाने वाले युग' के रूप में याद रखेगा।

समय आ गया है कि जनता और खासकर युवा वर्ग, नफरती बयानों के बजाय सीधे सवाल पूछे: "हमारे स्कूल क्यों बंद हो रहे हैं? हमारी नौकरियां कहाँ हैं?"

झीरम घाटी कांड: दया की भीख, राजनीति और वो 'गोपनीय' खत जिसने सबको हिला दिया!

 झीरम घाटी कांड: दया की भीख, राजनीति और वो 'गोपनीय' खत जिसने सबको हिला दिया!



छत्तीसगढ़ के इतिहास का वो सबसे भयावह, सबसे काला पन्ना— झीरम घाटी कांड! वो खूनी खेल जिसमें कांग्रेस की पूरी की पूरी शीर्ष नेतृत्व वाली पंक्ति को गोलियों से भून दिया गया था। 25 मई 2013 की उस खूनी दोपहर को बीते कई साल हो चुके हैं, लेकिन आज भी इसके जख्म हरे हैं... और क्यों न हों? क्योंकि न्याय आज भी अधूरा है!

लेकिन आज झीरम कांड को लेकर चार अलग-अलग दिशाओं में ऐसी आग भड़की है जिसने पूरे प्रदेश के सियासी और प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है!

  • पहला रुख: सजायाफ्ता नक्सली महिला प्रमिला, जो जेल की सलाखों के पीछे से महामहिम राष्ट्रपति से अपनी दया की भीख मांग रही है।
  • दूसरा रुख: सर्व आदिवासी समाज, जो अदालत और सरकार के फैसलों से बुरी तरह नाराज और आंदोलित है।
  • तीसरा रुख: वो पीड़ित परिवार, जो आज भी अपनों को खोने का दर्द सीने में दबाए दिल्ली पहुंचे और राहुल गांधी से गुहार लगाई, जिसके बाद राहुल गांधी ने मामले के सारे गोपनीय रिकॉर्ड्स तलब कर लिए हैं।
  • और चौथा सबसे बड़ा खुलासा: तत्कालीन इंटेलिजेंस आईपीएस अफसर दीपांशु काबरा की वो 'अत्यंत गोपनीय' रिपोर्ट, जो झीरम हमले से ठीक एक महीने पहले भेजी गई थी और जिसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया!"
  • सजायाफ्ता प्रमिला की 'दया की भीख' 

"आइए सबसे पहले बात करते हैं उस प्रमिला की।

झीरम घाटी के सबसे क्रूर और जघन्य हत्याकांड में शामिल सजायाफ्ता नक्सली महिला प्रमिला ने अब राष्ट्रपति के सामने दया याचिका दायर की है। वो अपनी सजा कम कराने या माफी की भीख मांग रही है।

लेकिन सवाल यह उठता है कि जिस समय झीरम की वादियों में गोलियां गूंज रही थीं, जब बस्तर टाइगर महेंद्र कर्मा, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, विद्याचरण शुक्ल जैसे दिग्गजों को बर्बरता से मौत के घाट उतारा जा रहा था, तब दया कहाँ थी? जिन निर्दोष सुरक्षाकर्मियों और चालकों की जानें गईं, उनके परिवारों की दया याचिका कहाँ गई थी?

कानूनी प्रक्रिया के तहत याचिका दाखिल करना अधिकार हो सकता है, लेकिन जनता के मन में यह सवाल कौंध रहा है— क्या इतने बड़े जनसंहार के दोषियों को दया की गुंजाइश मिलनी चाहिए?"

सर्व आदिवासी समाज का आक्रोश 

"अब सिक्के का दूसरा पहलू देखिए— सर्व आदिवासी समाज!

एक तरफ प्रमिला की दया याचिका है, तो दूसरी तरफ सर्व आदिवासी समाज इस पूरे घटनाक्रम और कानूनी फैसलों से बेहद आक्रोशित है। समाज का सीधा आरोप है कि इस पूरे कांड में निर्दोष आदिवासियों को मोहरा बनाया गया या फिर बस्तर के असली गुनाहगारों को बचाने के लिए पूरी पटकथा को अलग मोड़ दिया गया।

आदिवासी समाज का कहना है कि जब तक इस बड़े राजनीतिक षड्यंत्र का पर्दाफाश नहीं होता, जब तक पर्दे के पीछे छिपे असली 'मास्टरमाइंड' बेनकाब नहीं होते, तब तक न्याय अधूरा है। आदिवासी समाज का यह गुस्सा बता रहा है कि बस्तर की आबोहवा में न्याय की आस अब भी सुलग रही है।"

- पीड़ित परिवार और राहुल गांधी की एंट्री

"तीसरा और सबसे दर्दनाक पहलू— वो पीड़ित परिवार जिन्होंने इस खूनी मंजर में अपनों को खोया।

सालों से दर-दर भटक रहे पीड़ित परिवार हाल ही में दिल्ली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मिलने पहुंचे। सालों से न्याय की आस लगाए इन परिवारों ने राहुल गांधी के सामने अपना दर्द बयां किया। उन्होंने साफ़ कहा कि 'हमें न्याय नहीं मिला, जांच आयोग बनते रहे, राजनीति होती रही, लेकिन असली गुनाहगार आज भी आज़ाद घूम रहे हैं!'

और इस मुलाकात के बाद बड़ा मोड़ आया! राहुल गांधी ने इस पूरे झीरम कांड से जुड़े तमाम दस्तावेज, जांच रिपोर्ट और रिकॉर्ड्स मांग लिए हैं। अब सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी के इस कदम से झीरम की फाइलों में बंद वो सच बाहर आ पाएगा, जिसे सालों से दबाने की कोशिश की जा रही है?"

महा-खुलासा! आईपीएस दीपांशु काबरा का वो गोपनीय पत्र 

"और अब आते हैं आज के सबसे बड़े और सनसनीखेज खुलासे पर!

मेरे हाथ में जो पत्र है, उसे ध्यान से देखिए। यह पत्र इंटेलिजेंस की जिम्मेदारी संभाल रहे तत्कालीन आईपीएस अधिकारी दीपांशु काबरा द्वारा 17 अप्रैल 2013 को यानी झीरम हमले से ठीक 38 दिन पहले पुलिस मुख्यालय (PHQ) को भेजा गया था!

इस पत्र पर ऊपर साफ अक्षरों में लिखा था— 'सर्वथा गोपनीय'।

इस इंटेलिजेंस रिपोर्ट में क्या लिखा था? ज़रा ध्यान से सुनिए! रिपोर्ट में लिखा गया था कि इंटेलिजेंस सूत्रों से पक्की सूचना मिली है कि माओवादियों द्वारा कांग्रेस के पूर्व विधायक और पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा (दंतेवाड़ा) और कांग्रेस नेता राजकुमार नामदेव (दंतेवाड़ा) को मारने के लिए एक 'एक्शन टीम' गठित की गई है!

इतना ही नहीं, इस पत्र में हमलावरों की पूरी कुंडली थी!

  • इसमें लिखा था कि माओवादी मिलिशिया कम्पनी नंबर 02 का प्लाटून कमेटी सदस्य राकेश इसका प्रभारी है।
  • भैरमगढ़ प्लाटून, गंगालूर प्लाटून और मंगाली LOS से सदस्यों को इसमें शामिल किया गया है।
  • एक्शन टीम प्रभारी को 9 mm पिस्तौल और सदस्यों को रिवॉल्वर उपलब्ध कराई गई है।

पत्र के अंत में आईपीएस दीपांशु काबरा ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि 'उनकी सुरक्षा में तैनात कर्मचारियों को विशेष सतर्कता बरतनेहेतु निर्देशित किया जाए और सुरक्षा मापदंड के अनुरूप आवश्यक सुरक्षा अमला बनाए रखना सुनिश्चित करें'। यह कॉपी एडीजी इंटेलिजेंस, एडीजी नक्सल अभियान, आईजी बस्तर और एसपी दंतेवाड़ा को भी भेजी गई थी!

अब मेरा सीधा सवाल: जब 17 अप्रैल 2013 को ही खुफिया विभाग के पास इतनी सटीक जानकारी थी कि महेंद्र कर्मा की हत्या के लिए 9mm पिस्तौल और रिवॉल्वर से लैस विशेष टीम बन चुकी है... तो 25 मई 2013 को झीरम घाटी में परिवर्तन यात्रा के दौरान सुरक्षा में इतनी भारी चूक कैसे हुई?

किसने इस इंटेलिजेंस रिपोर्ट को दरकिनार किया? किसने वीवीआईपी सुरक्षा के मानकों की अनदेखी की? क्या यह सिर्फ एक लापरवाही थी, या फिर किसी गहरी साजिश का हिस्सा?"

झीरम घाटी कांड सिर्फ एक नक्सली हमला नहीं था, यह लोकतंत्र पर एक गहरा आघात था।

आज एक तरफ नक्सली प्रमिला दया मांग रही है, सर्व आदिवासी समाज आक्रोश में है, पीड़ित परिवार राहुल गांधी के दरवाजे पर न्याय मांग रहे हैं, और दूसरी तरफ दीपांशु काबरा का यह 17 अप्रैल 2013 का खत चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि 'खतरा मालूमथा, फिर भी कदम नहीं उठाए गए!'

आखिर इस महा-लापरवाही या महा-षड्यंत्र का जिम्मेदार कौन है? क्या कभी झीरम का पूरा सच जनता के सामने आ पाएगा?

आप इस पूरे मामले पर क्या सोचते हैं? क्या दीपांशु काबरा की इस खुफिया रिपोर्ट के बाद नए सिरे से जांच होनी चाहिए? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।

महिला एवं बाल विकास विभाग में महा-घोटाला? | कागजों में गोद भराई, पोषण किट गायब और भ्रष्टाचार का सच!

 महिला एवं बाल विकास विभाग में महा-घोटाला? | कागजों में गोद भराई, पोषण किट गायब और भ्रष्टाचार का सच!



क्या आपने कभी सोचा है कि जिस देश में महिलाओं और छोटे मासूम बच्चों की देखभाल के लिए एक पूरा विभाग बनाया गया हो, जहाँ गर्भवती माताओं और कुपोषित बच्चों के लिए करोड़ों रुपये का बजट आता हो... अगर वही बजट कागजों में सिमटकर रह जाए, तो क्या होगा?

आज हम बात कर रहे हैं महिला एवं बाल विकास विभाग की। एक ऐसा विभाग, जिसका काम है देश की नींव—यानी हमारी माताओं और बच्चों—को मजबूत बनाना। लेकिन लगातार सामने आती मीडिया रिपोर्ट्स और घोटालों की परतें देखें, तो लगता है कि यहाँ योजनाओं के नाम पर सिर्फ ‘खानापूर्ति’ और ‘बड़ा खेल’ चल रहा है!"


पोषण किट और गोद भराई का कड़वा सच

हाल ही में सामने आई रिपोर्ट को देखिए। सरकार की तरफ से बड़े-बड़े दावे किए गए थे कि 'मुख्यमंत्री सुपोषण न्यूट्री किट योजना' के तहत गर्भवती महिलाओं को पोषण किट दिए जाएंगे। योजना यह थी कि गर्भावस्था के आखिरी 5 महीनों में महिलाओं को देशी घी, खजूर, मखाने, भुने चने और ड्राई फ्रूट्स जैसे माइक्रोन्यूट्रीएंट्स से भरे किट मिलेंगे।

लेकिन हकीकत क्या निकली? कागजों पर 'गोद भराई' की रस्में मना लीगईं, बड़ी-बड़ी तस्वीरें खिंचवा ली गईं। लेकिन जब किट बांटने की बारी आई, तो 2,200 महिलाओं की मांग के मुकाबले सिर्फ 844 किट ही भेजी गईं! नौ महीने से ज्यादा का वक्त बीत गया, लेकिन 1,400 से ज्यादा पंजीकृत गर्भवती महिलाएं आज भी पोषण किट के इंतजार में हैं।"

इसका नतीजा क्या हुआ पता है? दर्ज की गई महिलाओं में से करीब 70 फीसदी महिलाएं एनीमिया (खून की कमी) से पीड़ित हैं! लगभग 10 प्रतिशत महिलाओं में हीमोग्लोबिन का स्तर 7 से भी नीचे है। नौबत यह आ गई है कि हर तीसरे प्रसव (Delivery) के वक्त महिलाओं को खून चढ़ाने की जरूरत पड़ रही है। सवाल यह है कि जब बजट जारी होता है, योजनाएं बनती हैं, तो फिर यह न्यूट्री-किट महिलाओं तक क्यों नहीं पहुँचती? यह सामान बीच में कहाँ गायब हो जाता है?"

"लेकिन बात सिर्फ इस एक योजना या पोषण किट की नहीं है। अगर आप इस विभाग के पिछले कुछ सालों के मामलों को खंगालेंगे, तो आपको एक के बाद एक कई पैटर्न नजर आएंगे।

पहला है — सप्लाई और राशन घोटाला।

आंगनवाड़ी केंद्रों के जरिए बच्चों और गर्भवती महिलाओं को जो 'टेक-होम राशन' (Sattu, दलिया, पंजीरी) भेजा जाता है, उसमें अक्सर यह देखा गया है कि सामान की क्वालिटी बेहद खराब होती है या फिर सप्लाई सिर्फ कागजों पर ही दर्ज कर दी जाती है।

यह आरोप सामने आते हैं कि जिन गाड़ियों से राशन ढोने का दावा किया जाता है, उनके नंबर चेक करने पर वे दोपहिया वाहन या ऑटो रिक्शा निकलते हैं! करोड़ों रुपये का बजट कागजों पर पास हो जाता है, सप्लायर और अधिकारियों की जेबें भर जाती हैं, लेकिन आंगनवाड़ी तक पहुँचती है तो सिर्फ घटिया सामग्री या खाली हाथ!"

साड़ी और वर्दी घोटाला

"और सिर्फ खाने-पीने के सामान में ही नहीं, दोस्तों... यहाँ तक कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को दी जाने वाली साड़ियों और यूनिफॉर्म में भी खेल हो जाता है!

विभाग की तरफ से हर साल आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को पहचान के रूप में साड़ियां देने का नियम है। इसके लिए करोड़ों का टेंडर निकाला जाता है। लेकिन असलियत में क्या होता है? कम लागत की, बेहद घटिया क्वालिटी की साड़ियां खरीदकर भारी-भरकम दामों में बिल बना दिए जाते हैं। कई जगहों पर तो कार्यकर्ताओं की शिकायत होती है कि सालों-साल तक उन्हें साड़ियां मिलती ही नहीं, जबकि फाइलों में सब 'ओके' (Distributed) दर्ज हो चुका होता है। सोचिए, जो विभाग महिलाओं के सम्मान और पहचान के लिए साड़ी खरीद रहा है, उसमें भी कमिशनखोरी का जाल फैला हुआ है!"

फर्जी नियुक्ति और मानदेय का खेल


 "अब आते हैं तीसरे सबसे बड़े मुद्दे पर — भ्रष्टाचार और फर्जी नियुक्तियों का खेल।

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, सहायिका और सुपरवाइजर पदों की भर्ती प्रक्रिया में बार-बार गड़बड़ियों के आरोप लगते रहे हैं।

  • कहीं फर्जी प्रमाण पत्रों और फर्जी निवास प्रमाणपत्रों के आधार पर चहेतों को नौकरी दे दी जाती है।
  • तो कहीं बिना किसी पारदर्शिता के मेरिट लिस्ट को रातों-रात बदल दिया जाता है।
  • इतना ही नहीं, कागजों में 'भूतिया' (Ghost) कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के नाम दर्ज करके हर महीने उनके नाम का मानदेय (Salary) निकाला जाता है और यह पैसा सीधे बिचौलियों की जेब में जाता है!"

जब हम किसी विभाग में घोटाला सुनते हैं, तो हमें लगता है कि यह सिर्फ पैसों का नुकसान है। लेकिन महिला एवं बाल विकास विभाग में होने वाला भ्रष्टाचार सीधे तौर पर आने वाली पीढ़ी के स्वास्थ्य और माताओं की जिंदगी के साथ खिलवाड़ है।

जब 70% गर्भवती महिलाएं एनीमिया से जूझ रही हों, जब हर तीसरी महिला को बच्चे को जन्म देते समय खून की जरूरत पड़ रही हो... तो कागजों में चलाई जा रही 'गोद भराई' और 'पोषण योजनाएं' सिर्फ एक कड़वा मजाक बनकर रह जाती हैं।

अगर इस विभाग की हर योजना—चाहे वो सप्लाई हो, साड़ी वितरण हो, न्यूट्री-किट हो या नियुक्तियां हों—की निष्पक्ष जाँच की जाए और दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो, तभी असल मायनों में महिलाओं और बच्चों का विकास संभव है।

आप इस पूरे मुद्दे पर क्या सोचते हैं? क्या आपके इलाके में आंगनवाड़ी केंद्रों की स्थिति ठीक है? नीचे कमेंट करके जरूर बताइए।

सोमवार, 26 अक्टूबर 2026

चार नेहा- जिन्होंने सत्ता की चूलें हिला दी

 चार नेहा- जिन्होंने सत्ता की चूलें हिला दी 


भारत में नेहा नाम की लड़की सबसे मज़बूत इरादे वाली और किसी के सामने नहीं झुकने वाली मशहूर हुई


आगे बढ़ने से पहले बता दूँ कि नेहा नाम का अर्थ प्यार , स्नेह , ओस की बूंद होता है , नेहा नाम की लड़कियों ने हमेशा देश के लिये कुछ ना कुछ योगदान दिया है , 


1 - पहली नेहा बोरा  : JNU की छात्रा नेहा बोरा जिसने हमेशा जुल्म के खिलाफ़ मज़बूती से आवाज उठाई फिर वो बिलकिस बानो वाला मुद्दा हो , UGC वाला मुद्दा हो , CAA NRC वाला मुद्दा हो NEET पेपर लीक वाला मुद्दा हो , नेहा बोरा ने हमेशा निडर होकर समाज की भलाई और इंसाफ के लिये काम किया , जंतर मंतर 23 दिन की भूख हड़ताल पर बैठकर उन्होंने देश के युवाओ और छात्रों को इंसाफ दिलाने का काम किया ,


नेहा बोरा मूल रूप से उत्तराखंड की रहने वाली हैं। बचपन का कुछ समय उनका पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में बीता। पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने थिएटर और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय भागीदारी निभाई। नेहा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से B.A. किया इसके बाद डॉ. बी.आर. अंबेडकर यूनिवर्सिटी से M.A. की डिग्री हासिल की। वर्तमान में नेहा जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) के स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स से Ph.D कर रही हैं। पढ़ाई के साथ-साथ वो लंबे वक्त से छात्र आंदोलनों और सामाजिक मुद्दों पर एक्टिव भी हैं। 


नेहा बोरा फिलहाल ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष हैं। याद रहे कि JNU की छात्र राजनीति में AISA लंबे समय से सक्रिय संगठन रहा है। नेहा अपने साथियों के साथ भी कई बार हंसते, मस्ती करते तस्वीरों में दिखाई देती हैं। वो एक Gen Z स्टूडेंट लीडर हैं तो ये बात सामान्य है कि उनका तरीका और अंदाज भी अलग है। उनका ये अंदाज सबके दिलों में गहरी छाप छोड़ता है। प्रोटेस्ट खत्म होने के बाद वो एक वीडियो में दोस्तों के साथ डांस करती नजर भी आ रही हैं।


जंतर-मंतर आंदोलन से पहले भी नेहा बोरा कई सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर खुलकर बोलती रही हैं। शिक्षा के निजीकरण, पेपर लीक, मॉब लिंचिंग, बिलकिस बानो मामले में न्याय और गाजा के मानवीय संकट जैसे विषयों पर उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखी हैं। नेहा की सक्रियता केवल यूनिवर्सिटी कैंपस तक सीमित नहीं रही, बल्कि कई और आंदोलनों में भी उनकी भागीदारी देखने को मिलीं।


हर आंदोलन कुछ ऐसे लोगों को जन्म देता है, जिनकी पहचान सिर्फ उनके संगठन या पद से नहीं होती, बल्कि उनके अपने संघर्षों से बनती है। नेहा बोरा की पहचान भी कुछ ऐसी ही बनकर सामने आई है।


जब जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP इस आंदोलन की कहानी लिखी जाएगी तो नेहा बोरा का नाम उसमें प्रमुखता से दर्ज होगा। ये बात लिखने में कोई दो राय नहीं कि नेहा बोरा संघर्ष, धैर्य और अपनी बात पर अडिग रहने की कहानी हैं। चाहे कोई उनके विचारों से सहमत हो या असहमत, जंतर-मंतर आंदोलन में उनकी भूमिका ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक चर्चित छात्र नेता के रूप में स्थापित कर दिया है। 


2 - दूसरी नेहा सिंह राठौड़ : यूपी - बिहार की मशहूर लोकगायिका नेहा सिंह राठौड़ भोजपुरी गाने से चर्चा में आने वाली एक मज़बूत इरादो वाली महिला है , जिन्होंने अपने ऊपर FIR दर्ज होने पर भी घुटने नहीं टेके , यूपी में का बा, बिहार में का बा नाम के गानो से इन्हे काफी प्रसिद्धि मिली ,


एक लोकप्रिय भारतीय लोक गायिका और राजनीतिक व्यंग्यकार (political satirist) हैं, जो मुख्य रूप से भोजपुरी भाषा में अपने तीखे और सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों से जुड़े गीतों के लिए जानी जाती हैं। उनका जन्म वर्ष 1997 में बिहार के कैमूर (या जंदाहा) जिले में हुआ था। वह विशेष तौर पर अपने वायरल गानों "बिहार में का बा" (2020) और "यूपी में का बा" (2022) के जरिए चर्चा में आई थीं। 


3 - तीसरी नेहा भारती : नेहा भारती एक NGO से जुड़ी हुई लड़की है जो अक्सर गरीबो की मदद के लिये जानी जाती है हालांकि वो सोशल मीडिया पर भी काफी चर्चा में रहती है , करोड़ो की संख्या में GENZ उनके दिए गए बयानों को सुनते है और सीखते है , नेहा भारती एक दलित है और हिंदू मुस्लिम सभी धर्मों के लोगो के अधिकार के लिये लड़ती है , नेहा भारती रमजान महीने में पूरे 30 दिन दिल्ली की जामा मस्जिद में देश भर से आने वाले मुसाफिरो को इफ्तार करवाती है ,


नेहा भारती एक सोशल एक्टिविस्ट और सोशल वर्कर हैं, जो पुरानी दिल्ली के चावड़ी बाजार की रहने वाली हैं और दिल्ली यूनिवर्सिटी से राजनीति शास्त्र में एमए कर चुकी हैं। वह मुख्य रूप से सामाजिक-जातिगत मुद्दों पर अपनी मुखर बेबाक राय रखने के कारण चर्चा में आई हैं। और समाज के दबे-कुचले व वंचित वर्गों की आवाज उठाने के लिए जानी जाती हैं।


4 - चौथी नेहा सिंह : नेहा सिंह एक लेखक और समाजसेविका है , जिन्होंने समाज में लड़कियों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ़ आवाज उठाई,  उन्होंने महिलाओ की ख़राब हालत पर भी बुक्स लिखी , नेहा सिंह ने महिलाओं को आजादी से रहने पर आंदोलन किया था ,


नेहा सिंह मुंबई स्थित एक प्रसिद्ध बाल साहित्य लेखिका, Neha Singh थिएटर कलाकार और महिला अधिकार कार्यकर्ता हैं। उन्होंने बच्चों के लिए कई लोकप्रिय किताबें लिखी हैं और बच्चों की पत्रिकाओं में भी योगदान दिया है


नेहा नाम की लड़कियों में जुल्म और अन्याय के खिलाफ़ लड़ने का जूनून होता है , चट्टान जैसे मज़बूत इरादे वाली होती है , जो ना किसी के सामने झुकती है ना किसी से डरती है,