गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

प्रो. डॉ. लवली शर्मा: खैरागढ़ से ग्वालियर तक विवादों और सवालों की पूरी इनसाइड स्टोरी!

 प्रो. डॉ. लवली शर्मा: खैरागढ़ से ग्वालियर तक विवादों और सवालों की पूरी इनसाइड स्टोरी! 



 जब देश के बड़े कला और संगीत विश्वविद्यालयों की बात आती है, तो उम्मीद की जाती है कि उनका नेतृत्व करने वाले कुलपति विवादों से दूर रहकर उच्च शैक्षणिक मानक स्थापित करेंगे। लेकिन क्या हो जब एक नाम जहाँ भी प्रशासनिक ज़िम्मेदारी संभाले, वहाँ विवादों, नियुक्तियों के बवंडर और वित्तीय सवालों का सिलसिला साथ-साथ चलने लगे?

आज हम बात कर रहे हैं प्रो. डॉ. लवली शर्मा की, जो वर्तमान में छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ स्थित 'इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय' की कुलपति हैं। इससे पहले वे मध्य प्रदेश के ग्वालियर स्थित 'राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय' में कुलपति की कमान संभाल चुकी हैं। दयालबाग शैक्षणि संस्थान (आगरा) से लेकर ग्वालियर और अब खैरागढ़ तक—आखिर क्यों इनके कार्यकाल के दौरान प्रशासनिक कार्यशैली, नियुक्तियाँ और शोध से जुड़े मामले लगातार सवालों के घेरे में रहे हैं?

और सबसे बड़ा सवाल—जब खैरागढ़ में इनकी नियुक्ति का आदेश आया था, तब सत्तारूढ़ दल के अपने ही छात्र संगठन ABVP ने सड़कों पर उतरकर भारी विरोध प्रदर्शन और धरना क्यों दिया था? बाद में ऐसा क्या बदला कि विरोध की आवाज़ें शांत हो गईं? आज इस पूरी कहानी की एक-एक परत खोलेंगे।"

- खैरागढ़ विश्वविद्यालय: सोशल मीडिया का भूचाल और गंभीर आरोप

"शुरुआत करते हैं खैरागढ़ के इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय से, जहाँ का माहौल हाल के दिनों में फिर गरमा गया है।

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक के बाद एक कई पोस्ट्स और शिकायतें वायरल हुईं। इन पोस्ट्स में कुलपति डॉ. लवली शर्मा के कार्यकाल पर सीधे तीखे प्रहार किए गए:

  1. नियुक्तियों में गड़बड़ी: दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों की भर्ती व्यवस्था और नियमों की अनदेखी पर सवाल।
  2. शोध पंजीयन और पीएचडी आवंटन: पीएचडी के पंजीयन, गाइड्स के चयन और चहेतों को लाभ पहुँचाने के आरोप।
  3. निरीक्षण दल और वित्तीय मामले: विश्वविद्यालय के निरीक्षण दलों (Inspection Teams) में बाहरी सदस्यों की नियुक्ति और रायगढ़ कार्यक्रमों व दीक्षांत समारोह के वित्तीय खर्चों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए।

मामला इतना बढ़ गया कि विश्वविद्यालय प्रशासन को सामने आकर बयान जारी करना पड़ा। प्रशासन का कहना है कि ये सभी आरोप तथ्यहीन और भ्रामक हैं तथा सभी प्रक्रियाएं नियमानुसार हुई हैं। लेकिन सवाल वही है कि धुआं बार-बार क्यों उठता है?"

- ग्वालियर कार्यकाल: राजा मानसिंह तोमर यूनिवर्सिटी के विवाद

अब बात करते हैं ग्वालियर की। खैरागढ़ आने से पहले डॉ. लवली शर्मा मध्य प्रदेश के ग्वालियर स्थित 'राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय' की कुलपति थीं।

ग्वालियर में उनके कार्यकाल के दौरान भी प्रशासनिक कार्यशैली और नियुक्तियों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए थे:

  • योग्यता और अनुभव पर सवाल: उनकी नियुक्ति के समय ही यह आरोप लगा था कि पद के लिए आवश्यक 10 वर्षों के प्रोफेसर स्तर के शैक्षणिक व प्रशासनिक अनुभव के मापदंडों पर सवाल उठाए गए थे।
  • अंदरूनी खींचतान और मनमानी: ग्वालियर में प्राध्यापकों, स्टाफ और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच लगातार खींचतान की खबरें आती रहीं। आरोप थे कि प्रशासनिक निर्णयों और वित्तीय मामलों में पारदर्शिता की कमी रही।

यानी ग्वालियर से लेकर खैरागढ़ तक, पेटर्न एक जैसा ही नज़र आता है—जहाँ भी वे प्रशासनिक शीर्ष पर रहीं, वहाँ नियमों की व्याख्या और नियुक्तियों के तरीक़ों पर सवाल उठे।"

नियुक्ति के समय का वो ड्रामा: ABVP का विरोध प्रदर्शन

"अब आते हैं इस पूरी कहानी के सबसे चौंकाने वाले मोड़ पर। जब खैरागढ़ में इनकी नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही थी, तब विरोध विपक्षी दलों ने नहीं, बल्कि भाजपा के अपने ही छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने किया था!

ABVP के कार्यकर्ताओं ने कुलपति की नियुक्ति का जमकर विरोध किया। विश्वविद्यालय परिसर और प्रशासनिक भवनों के सामने ज़ोरदार प्रदर्शन और धरने दिए गए। ABVP का स्पष्ट आरोप था कि अतीत में विवादित कार्यकाल और कार्यशैली को देखते हुए ऐसे व्यक्ति को इतने प्रतिष्ठित कला-संगीत विश्वविद्यालय की ज़िम्मेदारी नहीं दी जानी चाहिए।

लेकिन फिर क्या हुआ? जैसे-जैसे समय बीता, विरोध की धार धीमी होती गई और अंततः मामला शांत हो गया। अंदरखाने चर्चाएँ शुरू हुईं कि क्या राजनीतिक तालमेल बिठा लिया गया या प्रशासनिक दबाव में विरोध को दबा दिया गया? जो संगठन शुरुआत में नियुक्ति रद्द करने की माँग पर अड़ा था, उसने बाद में चुप्पी क्यों साध ली? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब आज भी छात्र खोज रहे हैं।"

- प्रशासनिक सफाई और वर्तमान तस्वीर

"दूसरी तरफ, अगर कुलपति और विश्वविद्यालय परिवार के पक्ष को देखें, तो उनका कहना है कि डॉ. लवली शर्मा एक प्रतिष्ठित सितार वादक और देश की पहली महिला D.Litt. धारक हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन का तर्क है कि समय पर परीक्षा परिणाम घोषित करना, शैक्षणिक अनुशासन बनाना और दीक्षांत समारोह में कम खर्च करना उनकी उपलब्धियाँ हैं। सोशल मीडिया पर उठने वाले आरोपों को वे विश्वविद्यालय की छवि धूमिल करने की साज़िश बताते हैं।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि एक तरफ प्रतिष्ठित उपलब्धियाँ और दूसरी तरफ लगातार पीछा करते विवाद—इन दोनों के बीच सच कहाँ छुपा है?"

विश्वविद्यालय सिर्फ़ ईंट-पत्थर की इमारतें नहीं होते, वे युवाओं के भविष्य और देश की संस्कृति के केंद्र होते हैं। चाहे ग्वालियर हो या खैरागढ़, अगर बार-बार नियुक्तियों, शोध और पैसों के लेन-देन पर सवाल उठ रहे हैं, तो इसकी निष्पक्ष जाँच होना बेहद ज़रूरी है ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।

आप इस पूरे मामले पर क्या राय रखते हैं? क्या छात्र संगठनों का विरोध सही था या यह सब सिर्फ़ अंदरूनी गुटबाज़ी का नतीजा है? कमेंट बॉक्स में अपनी राय ज़रूर शेयर करें।

अदानी पॉवर में घोर लापरवाही, दो गुटों में भिड़ंत

 अदानी पॉवर में घोर लापरवाही, दो गुटों में भिड़ंत 


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से सटे धरसींवा-खरोरा इलाके के रायखेड़ा में स्थित अडानी पावर प्लांट में आखिर ऐसा क्या हुआ कि देखते ही देखते पूरा परिसर जंग का मैदान बन गया? पत्थर चले, गाड़ियां फोड़ी गईं, सरपंच की गाड़ी के कांच टूटे और बीच-बचाव करने पहुंची पुलिस टीम पर भी पथराव हुआ—जिसमें खरोरा थाना प्रभारी (TI) समेत कई पुलिसकर्मी घायल हो गए।

लेकिन सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि उस दिन क्या हुआ। असली सवाल यह है कि इस विवाद की जड़ में क्या है? क्या यह सिर्फ दो गुटों का आपसी झगड़ा था, या इसके पीछे लंबे समय से सुलग रही ‘स्थानीय बनाम बाहरी’ (Local vs Outsider) की वह आग है, जो छत्तीसगढ़ के औद्योगिक इलाकों में लगातार सुलग रही है?

आज की इस विस्तृत रिपोर्ट में हम इस पूरी घटना की एक-एक परत खोलेंगे। जानेंगे कि विवाद कैसे शुरू हुआ, अवैध शराब का इसमें क्या एंगल है, और क्यों उद्योगों में स्थानीय युवाओं का गुस्सा अब धीरे-धीरे सड़कों पर आने लगा है। घटनाक्रम: उस दिन आखिर हुआ क्या?

सबसे पहले समझते हैं कि उस दिन रायखेड़ा स्थित अडानी पावर प्लांट (रायपुर एनेरजेन लिमिटेड) के भीतर और बाहर क्या-क्या घटा।

खबरों और स्थानीय सूत्रों के अनुसार, घटना की शुरुआत प्लांट परिसर और आसपास के इलाके में अवैध रूप से बेची जा रही शराब के विरोध को लेकर हुई। बताया जा रहा है कि प्लांट के भीतर काम करने वाले मजदूरों के दो गुटों के बीच पहले कहासुनी हुई। देखते ही देखते बात इतनी बढ़ी कि दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए।

एक तरफ स्थानीय मजदूर थे और दूसरी तरफ बाहर से (विशेषकर बिहार और अन्य राज्यों से) आए मजदूर। विवाद इतना गहराया कि लाठी-डंडे और पत्थर चलने लगे। भगदड़ मच गई और जो भी बीच में आया, उसे निशाना बनाया गया।

घटना की खबर मिलते ही रायखेड़ा के स्थानीय सरपंच दिनेश वर्मा मौके पर पहुंचे ताकि स्थिति को शांत कराया जा सके, लेकिन उग्र भीड़ ने उनकी गाड़ी पर भी हमला कर दिया और वाहन के कांच फोड़ दिए।

जब स्थिति बेकाबू होने लगी, तो खरोरा थाने की पुलिस टीम मौके पर पहुंची। पुलिस ने जैसे ही दोनों गुटों को तितर-बितर करने और स्थिति पर काबू पाने की कोशिश की, उपद्रवियों ने पुलिस पर ही पथराव शुरू कर दिया। इस हमले में खरोरा टीआई सहित कई पुलिस जवान चोटिल हुए। इसके बाद अतिरिक्त पुलिस बल बुलाया गया, तब जाकर स्थिति को नियंत्रण में लिया जा सका।

स्थानीय बनाम बाहरी: विवाद का असली केंद्र

ऊपरी तौर पर देखने पर यह मामला सिर्फ शराब की बिक्री या दो मजदूरों के झगड़े का लग सकता है, लेकिन अगर आप छत्तीसगढ़ के औद्योगिक क्षेत्रों की जमीनी हकीकत को समझते हैं, तो आपको इसके पीछे की गहरी वजह साफ नजर आएगी।

और वह वजह है—‘स्थानीय बनाम बाहरी’ का तनाव।

छत्तीसगढ़ में जब भी कोई बड़ा उद्योग या पावर प्लांट लगता है, तो स्थानीय ग्रामीणों और युवाओं से कई बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं:

  1. जमीन देने वाले परिवारों को स्थायी रोजगार मिलेगा।
  2. स्थानीय युवाओं को योग्यता के अनुसार प्राथमिकता दी जाएगी।
  3. क्षेत्र का विकास होगा।

लेकिन रायखेड़ा और आसपास के इलाकों के ग्रामीणों की शिकायत सालों से रही है कि हकीकत इसके बिल्कुल उलट है।

पहला मुद्दा—रोजगार और ठेकेदारी: संयंत्रों में अधिकतर बड़े ठेके बाहरी ठेकेदारों को दे दिए जाते हैं। ये ठेकेदार लागत कम करने और अपनी जान-पहचान के आधार पर बिहार, झारखंड या उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से सस्ते दामों पर मजदूरों को लेकर आते हैं। परिणाम स्वरूप, स्थानीय युवाओं को या तो काम नहीं मिलता, या उन्हें सबसे निचले स्तर के और कम मजदूरी वाले कामों में धकेल दिया जाता है।

दूसरा मुद्दा—असंतोष और सांस्कृतिक टकराव: जब किसी एक ही परिसर में स्थानीय और बाहर से आए सैकड़ों-हजारों मजदूर एक साथ काम करते हैं, और उनके बीच सुविधाओं व मजदूरी को लेकर विषमता (disparity) होती है, तो छोटी-सी बात भी बड़े विवाद का रूप ले लेती है। रायखेड़ा की घटना में भी यही देखने को मिला। अवैध शराब का मुद्दा सिर्फ एक चिनगारी था, लेकिन बारूद पहले से ही जमा था।

सुरक्षा, अवैध कारोबार और प्रशासन की भूमिका

अब सवाल यह भी उठता है कि इतने बड़े पावर प्लांट परिसर के भीतर या उसके ठीक आसपास अवैध शराब का कारोबार फल-फूल कैसे रहा था?

  • संयंत्र प्रबंधन की सुरक्षा पर सवाल: इतने बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान में सुरक्षा गार्ड्स और सीसीटीवी कैमरे होने के बावजूद परिसर के आसपास ऐसा माहौल कैसे बना? क्या प्रबंधन ने समय रहते अंदर पनप रहे असंतोष और अवैध गतिविधियों पर ध्यान नहीं दिया?
  • स्थानीय पुलिस और आबकारी विभाग: क्या स्थानीय पुलिस और आबकारी विभाग को इस बात की भनक नहीं थी कि औद्योगिक क्षेत्र में मजदूरों के बीच अवैध शराब खपाई जा रही है? अगर समय रहते इन अवैध गतिविधियों पर नकेल कसी जाती, तो शायद बात इतनी नहीं बिगड़ती।
  • कानून व्यवस्था का सवाल: पुलिस पर पथराव होना और थाना प्रभारी का घायल होना यह दर्शाता है कि उपद्रवियों के भीतर कानून का खौफ खत्म हो चुका था।

पुलिस ने अब इस मामले में बलवा, तोड़फोड़ और सरकारी काम में बाधा डालने की धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया है और वीडियो फुटेज के आधार पर उपद्रवियों की पहचान की जा रही है। कई लोगों को हिरासत में भी लिया गया है।

रायखेड़ा की घटना एक चेतावनी है। अगर इसे सिर्फ एक 'क्राइम न्यूज़' मानकर फाइल बंद कर दी गई, तो ऐसी घटनाएं बार-बार दोहराई जाएंगी। जरूरत इस बात की है कि इसके मूल कारणों पर ध्यान दिया जाए।

1. स्थानीय युवाओं को रोजगार नीति का पारदर्शी पालन: राज्य सरकार और औद्योगिक घरानों को यह सुनिश्चित करना होगा कि छत्तीसगढ़ नीति के तहत जो 80-90% स्थानीय रोजगार का नियम है, उसका पालन कागजों पर नहीं बल्कि जमीन पर हो।

2. बाहरी मजदूरों का वेरिफिकेशन: प्लांट्स में काम करने वाले सभी बाहरी मजदूरों और ठेकेदारों का पुलिस वेरिफिकेशन अनिवार्य होना चाहिए, ताकि आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों पर रोक लग सके।

3. अवैध कारोबार पर नकेल: औद्योगिक बस्तियों के आसपास अवैध शराब, गांजा और जुए जैसे अड्डों को तुरंत बंद कराया जाना चाहिए, जो अक्सर ऐसे बड़े विवादों की वजह बनते हैं।

रायखेड़ा स्थित अडानी प्लांट की यह घटना सिर्फ दो गुटों की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह उस असंतोष का नतीजा है जो स्थानीय अधिकारों की अनदेखी और प्रशासनिक लापरवाही से पैदा होता है।

इस पूरे मामले पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि उद्योगों में स्थानीय युवाओं को उनका हक न मिलना ही ऐसे विवादों की मुख्य वजह है? अपनी राय नीचे कमेंट सेक्शन में जरूर लिखें।

बुधवार, 21 अक्टूबर 2026

छत्तीसगढ़ का ₹1000 करोड़ का दिव्यांग घोटाला

 छत्तीसगढ़ का ₹1000 करोड़ का दिव्यांग घोटाला



आज हम बात करने जा रहे हैं छत्तीसगढ़ के उस सबसे बड़े और बहुचर्चित घोटाले की, जिसे सुनकर आपकी रूह कांप जाएगी। सोचिए, जिस राज्य में गरीबों, दिव्यांगों और असहाय लोगों के कल्याण के लिए पैसा आया हो, उस फंड में ₹1000 करोड़ की कथित गड़बड़ी हो जाए!

यह कोई आम भ्रष्टाचार नहीं है, यह सीधे तौर पर इंसानियत के साथ खिलवाड़ है। मामला छत्तीसगढ़ के दिव्यांग कल्याण यानी SRC-PRRC का है। हाईकोर्ट के दखल के बाद यह जांच सीबीआई (CBI) को सौंपी गई थी। लेकिन आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि जांच शुरू कब हुई थी, बल्कि सबसे बड़ा और चुभने वाला सवाल यह है कि इस जांच के बाद कार्रवाई आखिर कब होगी? पिछले करीब एक साल से सीबीआई दस्तावेजों की पड़ताल, पूछताछ और सबूत जुटाने में लगी हुई है। अब खबर आ रही है कि जांच पूरी हो चुकी है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि चार्जशीट अभी तक अदालत में नहीं पहुंची है! आखिर कौन बचा रहा है इन ताकतों को? आइए, आज की इस वीडियो में परतों को खोलते हैं।"

अदालत की टिप्पणी और सिस्टम की पोल 

इस केस की सबसे अहम कड़ी है साल 2020 का वह हाईकोर्ट का ऐतिहासिक आदेश। जरा गौर से सुनिए कि अदालत ने तब क्या कहा था। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि इस मामले में जिन अधिकारियों के नाम सामने आए हैं, वे बेहद ऊंचे पदों पर रहे हैं। इसलिए अगर इसकी जांच स्थानीय स्तर पर कराई जाती, तो जांच प्रभावित होने की पूरी आशंका थी।

यही वह वजह थी जिसके बाद मजबूरन सीबीआई जैसी स्वतंत्र एजेंसी से इस मामले की जांच कराने के निर्देश देने पड़े। अदालत ने साफ-साफ आदेश दिया था कि सीबीआई तुरंत FIR दर्ज करे, मूल रिकॉर्ड ज़ब्त करे और बिना किसी दबाव के निष्पक्ष जांच जल्द से जल्द पूरी करे।

लेकिन सोचिए, जब अदालत जैसी सर्वोच्च संस्था को यह कहना पड़ जाए कि 'अधिकारी इतने ताकतवर हैं कि स्थानीय जांच नहीं हो सकती', तो हमारे सिस्टम की रीढ़ की हड्डी पर कितना बड़ा सवालिया निशान लग जाता है? क्या हमारे देश में कानून और कुर्सी की ताकत आम जनता के अधिकारों से इतनी बड़ी हो गई है?"

कौन-कौन से हैं वे बड़े नाम?

 "अब ज़रा उन चेहरों से पर्दा उठाते हैं, जिनका इस हाई-प्रोफाइल मामले में नाम उछला है। इस मामले की याचिका में जिन लोगों के नाम दर्ज हैं, उनकी फेहरिस्त बहुत लंबी और रसूखदार है:

  • पूर्व मुख्य सचिव: विवेक ढांड और सुनील कुजूर।
  • पूर्व वरिष्ठ IAS अधिकारी: आलोक शुक्ल, एमके राउत, और बीएल अग्रवाल।
  • अन्य बड़े प्रशासनिक अधिकारी: सतीश पांडे, पीपी सोती, राजेश तिवारी और अशोक तिवारी समेत कई अन्य अधिकारी।
  • राजनीतिक गलियारे से: तत्कालीन महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका सिंह का नाम भी इस मामले में शामिल है।

हालांकि, हमें यह भी समझना होगा कि किसी का नाम कोर्ट रिकॉर्ड में होना अपने आप में शत-प्रतिशत अपराध सिद्ध नहीं करता। कानून अपनी प्रक्रिया से चलता है। लेकिन जब इतने बड़े-बड़े ओहदेदार, जो कभी शासन और प्रशासन के सर्वेसर्वा हुआ करते थे, इस प्रकार के घोटालों के घेरे में आते हैं, तो यह सीधे तौर पर सरकारों और व्यवस्था के संरक्षण की ओर इशारा करता है।"

सरकार और अधिकारियों के संरक्षण पर सीधा प्रहार

 "सवाल यह उठता है कि आखिर इतने बड़े पैमाने पर गबन कैसे हो गया? क्या एक रात में करोड़ों रुपये गायब हो गए? नहीं! यह बिना किसी 'ऊपर के संरक्षण' के संभव ही नहीं है। जब बड़े पदों पर बैठे लोग खुद इस व्यवस्था का हिस्सा बन जाएं, तो गरीबों की आवाज़ दबा दी जाती है।

एक साल से अधिक का समय बीत चुका है, सीबीआई ने फाइलों को खंगाला, पूछताछ की, कागजात खंगाले, लेकिन जब बात चार्जशीट दाखिल करने की आती है, तो फाइलें धीमी क्यों पड़ जाती हैं? क्या सिस्टम के भीतर ही बैठे कुछ लोग इन भ्रष्ट अधिकारियों को बचाने की जुगत में लगे हैं?

सरकारें बदलती हैं, राजनीतिक दल अपनी पीठ थपथपाते हैं कि हमने जांच बैठा दी है, भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की बात की जाती है। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त क्या है? दिव्यांगों के हक का पैसा कागजों में घूमता रहता है और आरोपी बड़े आराम से अपने महलों में जीवन काटते हैं। जनता के टैक्स के पैसे से चलने वाली व्यवस्था जब खुद गुनाहगारों को ढाल देने लगे, तो लोकतंत्र पर से भरोसा उठने लगता है।"


यह लड़ाई सिर्फ एक घोटाले की नहीं है। यह लड़ाई उस हर एक दिव्यांग और लाचार व्यक्ति के हक की है, जिसके हिस्से का निवाला इन ताकतवर कुर्सियों पर बैठे लोगों ने छीना है। अगर अब भी इस मामले में पारदर्शी और कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो न्याय व्यवस्था से लोगों का भरोसा उठ जाएगा।

अब वक्त आ गया है कि जनता सवाल पूछे। नेताजी से लेकर बड़े अफसरों तक, हर किसी को जवाबदेह बनाना होगा।

आपकी इस पूरे मामले पर क्या राय है? क्या आपको लगता है कि इन बड़े अधिकारियों और नेताओं पर कभी असली कार्रवाई होगी या यह मामला भी फाइलों के कब्रिस्तानों में दफन हो जाएगा? हमें कमेंट करके जरूर बताएं

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मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

"छत्तीसगढ़ में खाकी और कुर्सी का खेल

 "छत्तीसगढ़ में खाकी और कुर्सी का खेल: महिला सुरक्षा पर सवाल और जांच का अंतहीन चक्र"



आज हम बात करने जा रहे हैं छत्तीसगढ़ की एक ऐसी कड़वी सच्चाई पर, जो व्यवस्था की सुस्त चाल और रसूखदारों के आगे झुकते कानून की पोल खोलती है।

दोस्तों, क्या आपने कभी सोचा है कि जब महकमे के बड़े अफसरों पर, जिन पर कानून की रक्षा करने या जनता को न्याय दिलाने की जिम्मेदारी होती है, वही जब खुद यौन उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोपों के घेरे में आ जाएं, तो क्या होता है? क्या उन्हें वाकई सजा मिलती है, या फिर मामला सिर्फ जांच की फाइलों में दफन होकर रह जाता है?

आज हम छत्तीसगढ़ के दो चर्चित मामलों पर खुलकर बात करेंगे—एक तरफ है निलंबित आईपीएस अधिकारी रतन लाल डांगी से जुड़ा हाई-प्रोफाइल मामला, जिसमें जांच अधिकारी बदलने का खेल चल रहा है! और दूसरी तरफ है राज्य पाठ्यपुस्तक निगम के पूर्व महाप्रबंधक अरविंद कुमार पांडेय का मामला, जिस पर हाईकोर्ट तक को दखल देना पड़ा।

आइए, एक-एक करके पर्दा उठाते हैं इस पूरे खेल से।

रतन लाल डांगी मामला और जांच अधिकारी बदलने का नया खेल

सबसे पहले बात करते हैं छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित निलंबित आईपीएस अधिकारी रमन लाल डांगी मामले की। इस पूरे मामले में जांच की प्रक्रिया एक बार फिर से बहुत बड़े सवालों के घेरे में आ खड़ी हुई है।

इस बार सवाल सिर्फ आरोपों या जांच की दिशा पर नहीं उठ रहा है, बल्कि उस अधिकारी के नाम को लेकर उठ रहा है, जिसे विभागीय जांच में सरकार का पक्ष रखने की जिम्मेदारी दी जानी थी!

जरा गौर फरमाइएगा तारीखों और नामों पर— 17 सितंबर 2026 को जो प्रस्ताव भेजा गया था, उसमें आईपीएस प्रशांत कुमार अग्रवाल का नाम प्रस्तुकर्ता अधिकारी (Presenting Officer) के तौर पर सामने आया था। लेकिन, इसके ठीक कुछ ही दिनों बाद, यानी 29 सितंबर को जो अंतिम आदेश जारी हुआ, उसमें बड़ा फेरबदल कर दिया गया। प्रशांत कुमार अग्रवाल की जगह यह जिम्मेदारी महिला आईपीएस पारुल माथुर को सौंप दी गई।

महज 12 दिनों के भीतर हुए इस अचानक बदलाव ने प्रशासनिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि महज 12 दिन के भीतर प्रस्तुकर्ता अधिकारी बदलना पड़ गया? क्या इसके पीछे कोई अंदरूनी दबाव है या फिर जांच को प्रभावित करने की कोई सोची-समझी रणनीति?

याद कीजिए, यह पूरा मामला शुरू कहां से हुआ था? रमन लाल डांगी के खिलाफ एक महिला ने बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई थी। पीड़िता ने सीधे पुलिस मुख्यालय में इसकी शिकायत दी थी। लेकिन जैसे ही जांच शुरू हुई, पीड़िता ने पूरी प्रक्रिया और उसकी निष्पक्षता पर ही सवाल खड़े कर दिए। मामला जब पुलिस महकमे के भीतर सुसझाई से हल नहीं हुआ, तो न्याय की उम्मीद में यह मामला अदालत तक जा पहुंचा। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में इस मामले को लेकर बाकायदा याचिका दायर की गई, जिसमें पूरी तरह से निष्पक्ष जांच की मांग उठाई गई।

हाईकोर्ट की सख्ती के बाद गृह सचिव और पुलिस मुख्यालय को जवाब तलब करना पड़ा। पीड़िता की तरफ से पहले की गई लीपापोती और जांच पर लगातार आपत्तियां दर्ज कराई जा रही थीं, और इसी वजह से आगे की जांच के लिए नई व्यवस्था पर विचार करने की बात कही गई थी। लेकिन नई व्यवस्था के नाम पर अधिकारियों का यह अदला-बदली का खेल जनता के मन में शक पैदा करता है कि क्या वाकई दूध का दूध और पानी का पानी हो पाएगा?

पाठ्यपुस्तक निगम के पूर्व GM अरविंद पांडेय का मामला - जब हाईकोर्ट को करनी पड़ी दखलअंदाजी: 

ऐसा नहीं है कि यह मामला सिर्फ पुलिस विभाग तक सीमित है। छत्तीसगढ़ के दूसरे निगम-मंडलों और विभागों का भी यही हाल है। चलिए आपको ले चलते हैं एक ऐसे मामले की तरफ, जिसने प्रशासनिक तंत्र की संवेदनहीनता को बेनकाब कर दिया है।

हम बात कर रहे हैं छत्तीसगढ़ राज्य पाठ्यपुस्तक निगम के पूर्व महाप्रबंधक (GM) अरविंद कुमार पांडेय की। इन पर भी महिला कर्मचारियों द्वारा यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment) जैसे बेहद गंभीर आरोप लगाए गए थे।

लेकिन देखिए खेल कैसे खेला जाता है? जब महिला ने शिकायत की, तो खानापूर्ति करने के लिए 2 मार्च 2022 को एक पांच सदस्यीय आंतरिक शिकायत समिति (Internal Complaints Committee) का गठन कर दिया गया। लेकिन उस समिति की बनावट में ही खोट था!

पीड़ित महिला ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी कि समिति में जो सदस्य रखे गए हैं, वे तत्कालीन महाप्रबंधक (यानी आरोपी अधिकारी) से पदानुक्रम में कनिष्ठ (Junior) हैं। नियम यह कहता है कि निष्पक्ष जांच के लिए समिति के सदस्य उच्च या समकक्ष स्तर के होने चाहिए, लेकिन यहाँ तो हद यह थी कि उस पूरी समिति में एक भी महिला सदस्य तक को शामिल नहीं किया गया था!

जब निगम प्रबंधन से सवाल किया गया, तो उनका बेहद अजीब और गैर-जिम्मेदाराना तर्क सामने आया—उनका कहना था कि निगम में महिला कर्मचारियों की संख्या कम है, इसलिए जो उपलब्ध स्टाफ था, उसी से समिति बना दी गई! क्या वाहियात बहाना है! क्या न्याय का गला घोंटने के लिए ऐसी ओछी दलीलें काफी हैं?

लेकिन शुक्र है न्यायपालिका का। बिलासपुर हाईकोर्ट ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाया और इस पूरी दोषपूर्ण आंतरिक जांच समिति की रिपोर्ट को सिरे से खारिज करते हुए रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने साफ निर्देश दिए कि इस पूरे मामले की नए सिरे से निष्पक्ष जांच की जाए। जरा सोचिए, अगर पीड़िता हाईकोर्ट का दरवाजा न खटखटाती, तो क्या उस दोषपूर्ण जांच रिपोर्ट के सहारे आरोपी अधिकारी को क्लीन चिट मिल जाती? यह बहुत बड़ा सवाल है।

बड़ा सवाल - जांच और अधिकारी बदलने का खेल कब तक?

इन दोनों मामलों (चाहे वह आईपीएस रमन लाल डांगी का मामला हो, या पाठ्यपुस्तक निगम के पूर्व जीएम अरविंद पांडेय का मामला हो) को अगर आप गौर से देखेंगे, तो एक पैटर्न साफ नजर आएगा।

छत्तीसगढ़ में बड़े और रसूखदार अधिकारियों पर जब भी यौन शोषण या गंभीर उत्पीड़न के आरोप लगते हैं, तो सबसे पहले क्या होता है?

  1. मामला दबाने की कोशिश की जाती है।
  2. अगर बात बाहर आ जाए, तो लीपापोती करने के लिए ऐसी आंतरिक समितियां बना दी जाती हैं जो आरोपी के मातहत या दबाव में काम करें।
  3. और जब विरोध बढ़ता है, तो सिर्फ जांच के नाम पर तारीख पे तारीख दी जाती है, या फिर खेल-खेल में कभी जांच अधिकारी बदल दिए जाते हैं, तो कभी कमेटियां बदल दी जाती हैं।

बड़े अधिकारियों पर कभी सीधी और कड़ी विभागीय कार्रवाई या बर्खास्तगी जैसी त्वरित कार्रवाई देखने को क्यों नहीं मिलती? क्यों उन्हें सिर्फ निलंबित करके या उनका ट्रांसफर करके महकमे के भीतर ही उपकृत किया जाता है? क्या आम आदमी और एक बड़े आईपीएस या महाप्रबंधक के लिए कानून के मायने अलग-अलग हैं?

महिला सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे करने वाली सरकारों और विभागों के राज में जब इस तरह के मामलों में लीपापोती होती है, तो कार्यस्थल पर काम करने वाली हर उस महिला का भरोसा उठ जाता है जो इन दफ्तरों में सुरक्षित माहौल की उम्मीद लेकर आती है।


वक्त आ गया है कि इस तरह के मामलों में सिर्फ "जांच-जांच" का खेल बंद हो। जनता और पीड़ित महिलाओं को सिर्फ तारीखें और बदले हुए अधिकारियों के नाम नहीं, बल्कि ठोस और निष्पक्ष न्याय चाहिए।

रेलवे की तिजोरी भरी, जनता बेहाल! बिलासपुर जोन का असली सच

 रेलवे की तिजोरी भरी, जनता बेहाल! बिलासपुर जोन का असली सच


  1. "बिजनेस मेरे खून में है..." पर क्या आम यात्री इंसान नहीं? SECR का कड़वा स
  2. ट्रेनें बंद, खाना खराब, लेट-लतीफी से परेशान छत्तीसगढ़: रेलवे बोर्ड का बड़ा खुलासा!



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने एक बार बड़े गर्व से कहा था—‘व्यापार तो मेरे खून में है।’ लेकिन क्या किसी ने सोचा था कि हुकूमत कायही 'व्यापारिक खून' एक दिन देश के आम नागरिकों की हड्डियों का चूरा बना देगा? क्या किसी ने सोचा था कि रेलवे जैसी जनसेवाको एक विशुद्ध मुनाफाखोर कंपनी में तब्दील कर दिया जाएगा, जहाँ इंसान की कीमत शून्य और मालगाड़ियों के कोयले की कीमतअरबों में मापी जाएगी?"

यह कोई हवाई आरोप नहीं है, बल्कि खुद रेलवे बोर्ड की उस सीक्रेट रिपोर्ट की पोल-पट्टी है, जिसने सरकार के उस असली चेहरे कोबेनकाब कर दिया है जहाँ जनहित नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ धंधा चलता है! रिपोर्ट कहती है कि दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे यानीबिलासपुर जोन माल ढुलाई से अपनी तिजोरियां ठसाठस भर रहा है—और इसी अंधाधुंध कमाई के चक्कर में छत्तीसगढ़ की आधी सेज़्यादा यात्री ट्रेनों को आउटर पर बलि चढ़ा दिया गया है!"  

"2 घंटे का सफर 8 घंटे में तब्दील हो रहा है! मरीज एम्बुलेंस के बजाय स्टेशन पर तड़प रहे हैं, छात्र परीक्षाओं से चूक रहे हैं, और ट्रेनोंमें मिलने वाला घटिया, बदबूदार खाना और गंदे टॉयलेट यह याद दिलाने के लिए काफी हैं कि इस सरकार की नज़र में आम यात्रीनागरिक नहीं, सिर्फ एक मजबूरी हैं! जब सरकार 'बिजनेसमैन' बन जाती है, तो जनता 'ग्राहक' भी नहीं रहती, सिर्फ एक शिकार बनजाती है।"

"छत्तीसगढ़, जो देश को बिजली के लिए कोयला देता है, लोहा देता है और रेलवे को सबसे ज़्यादा राजस्व देता है—आज उसी छत्तीसगढ़के यात्रियों के साथ यह दूसरा दर्जे का सौतेला व्यवहार क्यों? क्या रेलवे का काम सिर्फ खजाना भरना है या आम इंसान को मंजिल तकपहुँचाना? आज ठोककर सवाल पूछेंगे कि आखिर यह 'बिजनेस मॉडल' देश के रेल यात्रियों की बलि कब तक लेता रहेगा!

 अगर आप छत्तीसगढ़ में रहते हैं और ट्रेन से सफर करते हैं, तो आपने एक दर्द ज़रूर झेला होगा—घंटों लेट चलती ट्रेनें, अचानक रद्द होती गाड़ियां, और स्टेशनों पर बदहाल यात्री! लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि आखिर देश का सबसे ज़्यादा कमाई करने वाला रेलवे जोन—दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे (SECR)—अपने ही यात्रियों के साथ ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों कर रहा है?"
"हाल ही में रेलवे बोर्ड की एक रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि बिलासपुर जोन माल ढुलाई से अपनी तिजोरियां भर रहा है और इसी चक्कर में आधी से ज़्यादा यात्री ट्रेनों को लेट किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने एक बार कहा था—
‘व्यापार तो मेरे खून मेंहै।’ लेकिन जब यही व्यापार सरकार और रेलवे तंत्र पर इस कदर हावी हो जाए कि आम इंसान की सहूलियत, उसका समय और उसका स्वाभिमान पीछे छूट जाए, तो सवाल पूछना ज़रूरी हो जाता है।"

2. बिलासपुर जोन का गणित: तिजोरी फुल, सुविधाएं शून्य 

    • SECR (बिलासपुर) भारतीय रेलवे का सबसे मुनाफे वाला जोन है, जो देश के बड़े हिस्से में कोयला और खनिज पहुंचाता है।
    • रिपोर्ट का खुलासा: मालगाड़ियों को रास्ता देने (Line Clearance) के लिए पैसेंजर और एक्सप्रेस ट्रेनों को आउटर पर घंटों खड़ा रखा जाता है।
    • माल ढुलाई (Freight) से रेलवे को तुरंत और मोटा राजस्व (Revenue) मिलता है, जबकि पैसेंजर ट्रेनों को रेलवे 'सब्सिडी वाली सेवा' मानकर नज़रअंदाज़ करती है।

3. यात्रियों की बदहाली: लेट-लतीफी, बदबू और खराब खाना

    • समय की बर्बादी: 2 घंटे का सफर 6 घंटे में तय हो रहा है। मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुंच रहे, छात्र परीक्षाओं से चूक रहे हैं और नौकरीपेशा लोग परेशान हैं।
    • कैटरिंग का स्तर: पेंट्री कार और स्टेशनों पर मिलने वाले खाने की गुणवत्ता इतनी खराब है कि यात्री बीमारी के डर से पैकेज्ड फ़ूड ढूंढते हैं। ट्रेन लेट होने पर पानी तक की किल्लत हो जाती है।
    • रद्द होती ट्रेनें: बिना किसी पूर्व सूचना के लोकल और मेमू ट्रेनों को रद्द कर दिया जाता है, जो छत्तीसगढ़ के छोटे गांवों और कस्बों की जीवनरेखा हैं।

4. नीतिगत प्रहार: 'वेलफेयर स्टेट' बनाम 'बिजनेस मॉडल' 

:"संविधान के तहत भारत एक लोक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) है। रेलवे का प्राथमिक मकसद देश की आम जनता को किफायती और सुगम परिवहन देना था। लेकिन आज ऐसा लग रहा है कि रेलवे केवल एक कॉर्पोरेट कंपनी बन चुकी है, जिसका ध्यान सिर्फ बैलेंस शीट चमकाने और प्रॉफिट मार्जिन बढ़ाने पर है।"
"जब शीर्ष नेतृत्व कहता है कि व्यापार रगों में है, तो उसका असर नीचे प्रशासनिक फैसलों में दिखता है। अगर कोयला ढोने वाली ट्रेन से करोड़ों मिल रहे हैं, तो आम आदमी की पैसेंजर ट्रेन को आउटर पर 3 घंटे रोकना रेलवे के लिए 'गुड बिजनेस डिसीजन' बन जाता है! लेकिन सवाल यह है कि टैक्स देने वाले छत्तीसगढ़ के नागरिकों के समय की कीमत क्या शून्य है?"

"छत्तीसगढ़ देश को ऊर्जा देता है, कोयला देता है, रेलवे को सबसे ज़्यादा कमाई देता है। बदले में यहां के यात्रियों को क्या मिल रहा है? अनिश्चितता, गंदगी और घटिया खाना। अगर मुनाफा ही सब कुछ है, तो फिर पैसेंजर किरायों पर से 'सेवा' का ठप्पा हटा दीजिए।"
"क्या आपने भी हाल के दिनों में SECR की ट्रेनों में यह दुर्दशा झेली है? कमेंट में अपना अनुभव ज़रूर बताएं