रविवार, 21 जून 2026

स्वास्थ्य सचिव के नाम पर डॉक्टरों को चमकाने वाला 'अजय अग्रवाल' कौन?

 मंत्रालय के 'कमरा नंबर' से चल रहा था वसूली का खेल: स्वास्थ्य सचिव के नाम पर डॉक्टरों को चमकाने वाला 'अजय अग्रवाल' कौन?


अमित कटारिया (स्वास्थ्य सचिव) की पुलिस कमिश्नर को चिट्ठी से मचा हड़कंप; रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर के नर्सिंग होम संचालकों में दहशत। दो मोबाइल नंबर होने के बावजूद पंद्रह दिन बाद भी पुलिस के हाथ खाली, क्या सफेदपोशों का है वरदहस्त?


छत्तीसगढ़ के पावर कॉरिडोर (मंत्रालय) और प्रशासनिक हलकों में इन दिनों एक ऐसे 'अदृश्य' गिरोह की चर्चा है, जिसने सीधे प्रदेश के रसूखदार डॉक्टरों और निजी अस्पताल संचालकों की नींद उड़ा दी है। यह पूरा खेल किसी छोटे-मोटे साइबर ठग का नहीं, बल्कि एक सुनियोजित और संगठित सिंडिकेट का नजर आ रहा है, जिसे सत्ता के गलियारों से जुड़े किसी बड़े रसूखदार का संरक्षण प्राप्त होने की आशंका जताई जा रही है

क्या है पूरा मामला?

मामला तब खुला जब छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया के नाम का इस्तेमाल कर रायपुर, दुर्ग, भिलाई और बिलासपुर के बड़े नर्सिंग होम संचालकों को फोन पर धमकाया जाने लगा । फोन करने वाला खुद को स्वास्थ्य सचिव के निजी स्थापना (पर्सनल स्टाफ) का कर्मी बताता है और अपना नाम 'अजय अग्रवाल' बताता है

वह बकायदा स्वास्थ्य सचिव के कार्यालय और मंत्रालय के कमरा नंबर का हवाला देकर डॉक्टरों से कहता है कि "आपके अस्पताल के खिलाफ गंभीर कमियों और नियमों के उल्लंघन की शिकायत आई है" । इसके बाद, फाइल को दबाने और शिकायत को समाप्त करने के एवज में वह परोक्ष रूप से मोटी रकम (अवैध वसूली) की मांग करता है और डॉक्टरों पर मानसिक दबाव बनाता है

मंत्रालय बुलाकर बाहर से ही लौटाने का खेल

सूत्रों के मुताबिक, यह खेल इस कदर शातिर तरीके से खेला गया कि कुछ अस्पताल संचालकों को बाकायदा मंत्रालय (महानदी भवन) भी बुलाया गया था। वहां कथित आरोपी उन्हें बाहर ही मिला और स्वास्थ्य सचिव की 'अहम मीटिंग' का हवाला देकर उन्हें कुछ देर रोके रखने के बाद बाहर से ही रवाना कर दिया गया ताकि डॉक्टरों को पूरा भरोसा हो जाए कि मामला सीधे ऊपर से जुड़ा है

सचिव खुद हुए हैरान, लिखनी पड़ी चिट्ठी

जब पीड़ित डॉक्टरों और नर्सिंग होम एसोसिएशन की नाराजगी और दहशत की बात खुद स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया तक पहुंची, तो प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया। सचिव ने तुरंत एक्शन लेते हुए रायपुर के पुलिस कमिश्नर को एक आधिकारिक पत्र लिखकर कड़ी नाराजगी जताई और तत्काल एफआईआर दर्ज कर आरोपी की गिरफ्तारी की मांग की है । इस पत्र में आरोपी द्वारा इस्तेमाल किए गए दो मोबाइल नंबरों (जिसमें से एक 76520 94640 बताया जा रहा है) का भी उल्लेख है । रायपुर से लेकर दुर्ग, बिलासपुर, राजनांदगांव और कोरबा पुलिस को भी अलर्ट मोड पर डाला गया है 

पर्दे के पीछे कौन? पुलिस की सुस्ती पर उठते सवाल:

1. मोबाइल नंबर एक्टिव, फिर भी गिरफ्तारी क्यों नहीं? स्वास्थ्य सचिव की चिट्ठी में साफ तौर पर मोबाइल नंबर दर्ज हैं। सर्विलांस और साइबर सेल के आधुनिक युग में दो सप्ताह बीत जाने के बाद भी 'अजय अग्रवाल' पुलिस की पकड़ से बाहर क्यों है? 

2. मोहरा या मास्टरमाइंड? कयास लगाए जा रहे हैं कि पुलिस किसी छोटे मोहरे को पकड़कर खानापूर्ति कर सकती है, जबकि मंत्रालय के भीतर बैठकर कमान संभालने वाले असली चेहरे (मास्टरमाइंड) पर्दे के पीछे ही रह जाएंगे

3. कमरा नंबर की सटीक जानकारी कैसे? बिना किसी अंदरूनी मिलीभगत या बड़े अधिकारी/नेता के संरक्षण के, कोई बाहरी ठग डॉक्टरों को मंत्रालय के कमरा नंबर और विभागीय अंदरूनी शिकायतों की सटीक जानकारी कैसे दे सकता है? 

विपक्ष का हमला: "बिना सत्ता के संरक्षण के यह संभव नहीं"

इस मामले को लेकर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने सरकार और कानून व्यवस्था को आड़े हाथों लिया है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने आरोप लगाया है कि प्रदेश में असामाजिक तत्वों और ठगों के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि अब वे सीधे आईएएस अधिकारियों के नाम पर सरेआम वसूली कर रहे हैं । उन्होंने कहा कि बिना सत्ता के शीर्ष संरक्षण के कोई भी व्यक्ति आधे दर्जन से अधिक डॉक्टरों को मंत्रालय का हवाला देकर इस तरह भयादोहन नहीं कर सकता; प्रदेश में कानून व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है


मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) तक भी इस मामले की गूंज पहुंचने की खबर है। अब देखना यह है कि क्या पुलिस निष्पक्ष जांच कर 'शासन के इस खेल' के असली किरदारों को बेनकाब करती है, या फिर यह मामला भी ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा।

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शनिवार, 20 जून 2026

अनियमित कर्मचारियों के जख्मों पर प्रशासनिक नमक!

 वादों की फाइलें और अतिरिक्त प्रभार का 'खेल', अनियमित कर्मचारियों के जख्मों पर प्रशासनिक नमक!


छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के ढाई साल बाद भी दैनिक वेतन भोगी और अनियमित कर्मचारियों की तकदीर नहीं बदल सकी है। नियमितीकरण का लुभावना वादा कर सत्ता के शिखर तक पहुंचने वाली सरकार अब अपने ही वादों से पैर खींचती नजर आ रही है। आलम यह है कि नियमितीकरण तो दूर, अब कर्मचारियों को दी जाने वाली महज चार हजार रुपये की सम्मान राशि पर भी संशय के बादल मंडराने लगे हैं। इसी बीच सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) द्वारा जारी एक ताजा प्रशासनिक आदेश ने प्रदेश के लाखों कर्मचारियों के आक्रोश की आग में घी डालने का काम किया है। कर्मचारी संगठन इसे सरकार का 'तुगलकी फरमान' और मांगों को ठंडे बस्ते में डालने की सुनियोजित प्रशासनिक चाल बता रहे हैं।

8 जून का वह आदेश, जिसने बढ़ाई बेचैनी

नया रायपुर स्थित मंत्रालय से 8 जून 2026 को अवर सचिव मनराखन बुरारे के हस्ताक्षर से जारी एक आदेश ने नौकरशाही की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस आदेश के तहत दो वरिष्ठ अधिकारियों को महत्वपूर्ण विभागों का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है:

1. हेमंत कुमार पांडे (अवर सचिव): इन्हें सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के साथ-साथ 'जन निवारण विभाग' का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है।

2. विमल कुमार सांडिले (अपर सचिव): इन्हें योजना आर्थिक सांख्यिकी के साथ 'धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग' की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई है।

दिखने में यह एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया लग सकती है, लेकिन इसके पीछे छिपी क्रोनोलॉजी को लेकर कर्मचारियों में भारी नाराजगी है।

अतिरिक्त प्रभार के भरोसे 'जन शिकायत निवारण', कैसे सुधरेगी व्यवस्था?

कर्मचारी संगठनों का सीधा आरोप है कि जब धरातल पर नियमितीकरण, सम्मान निधि और जन शिकायतों को लेकर लाखों कर्मचारी और आम जनता दफ्तरों के चक्कर काट रही है, तब सरकार नीतिगत फैसले लेने के लिए 'फुल-टाइम' (पूर्णकालिक) अफसरों की नियुक्ति क्यों नहीं कर रही?

जिस जन शिकायत निवारण विभाग के पास प्रदेशभर की शिकायतें पहुंचती हैं, उसे ही अतिरिक्त प्रभार के भरोसे छोड़ दिया गया है। जब मूल जिम्मेदारी के साथ अधिकारी अन्य विभागों का बोझ संभालेंगे, तो जनता और कर्मचारियों की फाइलों का निपटारा किस रफ्तार से होगा, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। इसे कर्मचारी 'तारीख पर तारीख' और 'टेबल-टू-टेबल' फाइलें उलझाने की नीति मान रहे हैं।

चार हजार की सम्मान राशि पर भी आनाकानी!

कड़वा सच यह भी है कि आसमान छूती महंगाई के इस दौर में बेहद कम मानदेय पर काम कर रहे अनियमित कर्मचारियों को जो न्यूनतम सम्मान राशि मिलनी चाहिए, उसे लेकर भी प्रशासनिक स्तर पर आनाकानी की खबरें आ रही हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि सरकार इसे सीमित करने या कमेटियों के मकड़जाल में दफन करने की तैयारी में है। प्रशासनिक आदेशों की इस प्रतिलिपि में हर बड़े विभाग का जिक्र है, लेकिन उस आम कर्मचारी की चिंताओं का कोई स्थान नहीं है जो चिलचिलाती धूप में सरकार की योजनाओं को जमीनी स्तर पर लागू करता है।

चुनावी वादे बनाम ढाई साल की जमीनी हकीकत

यह वही छत्तीसगढ़ है जहां चुनाव से ठीक पहले भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष अरुण साव ने खुद कर्मचारी संगठनों के आंदोलन स्थल पर पहुंचकर मंच से वादा किया था कि सरकार बनते ही उन्हें नियमित किया जाएगा। मगर आज ढाई साल बीत जाने के बाद भी सरकार के पास नियमितीकरण का कोई ठोस रोडमैप दिखाई नहीं देता। कमेटियों की रिपोर्ट और प्रशासनिक उलझनों के बीच लाखों दैनिक वेतन भोगी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

कर्मचारियों की दोटूक: 'हक मांग रहे हैं, भीख नहीं'

प्रदेश के अनियमित कर्मचारी संगठनों का कहना है कि वे सरकार से अपना जायज हक मांग रहे हैं, कोई खैरात नहीं। यदि सरकार की यही नीति रही और फाइलों को इसी तरह लटकाया जाता रहा, तो आने वाले समय में इसका बड़ा राजनीतिक खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। प्रशासनिक ढांचा इस वक्त अतिरिक्त प्रभार के सहारे रेंग रहा है, जिससे न केवल शासन की कार्यप्रणाली प्रभावित हो रही है, बल्कि मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री की मंशा पर भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या वाकई सरकार का खजाना खाली है या फिर नियत में खोट है?

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शुक्रवार, 19 जून 2026

सहकारी समितियों में 'पसंदीदा' चेहरों को बिठाने पर गहराया विवाद

 आदिवासी बहुल क्षेत्रों में अस्मिता और हक की लड़ाई: सहकारी समितियों में 'पसंदीदा' चेहरों को बिठाने पर गहराया विवाद


छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल इलाकों में आदिम जाति सेवा सहकारी समितियों (LAMPS) के भीतर चल रही प्रशासनिक और राजनैतिक नियुक्तियों को लेकर विवाद गहरा गया है। आदिवासी समाज ने इसे अपने अधिकारों पर 'अघोषित डाका' करार देते हुए सड़क पर उतरने की चेतावनी दी है। ताजा मामला कोरिया (बैकुंठपुर) और बस्तर संभाग के विभिन्न क्षेत्रों से सामने आया है, जहां इन समितियों के शीर्ष पदों पर गैर-आदिवासी (ओबीसी व अन्य) वर्गों के लोगों को पिछले दरवाजे से बिठाने का आरोप लग रहा है।

पांचवीं अनुसूची केवल कागजों तक सीमित का आरोप:

आदिवासी नेताओं और जागरूक नागरिकों का कहना है कि प्रदेश में आदिवासी मुख्यमंत्री और आदिवासी वन व कृषि मंत्रियों के होने के बावजूद जमीनी स्तर पर आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों की उपेक्षा की जा रही है। आदिवासी नेता रमेश टेकान और विष्णु परस्ते के अनुसार, इन क्षेत्रों में 'पांचवीं अनुसूची' लागू होने के दावों के विपरीत, सहकारी समितियों की कमान सामान्य व अन्य पिछड़ वर्ग के राजनैतिक चेहरों को सौंप दी गई है। इसके खिलाफ कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया गया है, लेकिन धरातल पर नियमों की धज्जियां लगातार उड़ाई जा रही हैं।

बिचौलियों का बढ़ा प्रभाव, किसान परेशान:

प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि जिन समितियों का गठन आदिवासियों के आर्थिक उत्थान, खाद-बीज और ऋण की सुगम उपलब्धता के लिए किया गया था, वहां अब राजनैतिक बंदरबांट चल रही है। गैर-आदिवासी नेतृत्व होने के कारण स्थानीय आदिवासी किसानों को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए बिचौलियों का सहारा लेना पड़ रहा है, जिससे उनका आर्थिक शोषण बढ़ गया है।

राजस्थान की तर्ज पर बड़े आंदोलन की चेतावनी:

आदिवासी समाज ने हाल ही में कोरिया में एक बड़ा प्रदर्शन कर प्रशासन को ज्ञापन सौंपा है। समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि यदि इन नियुक्तियों में सुधार कर केवल आदिवासी चेहरों को जिम्मेदारी नहीं दी गई, तो यह असंतोष एक बड़े आंदोलन का रूप ले लेगा। उन्होंने राजस्थान के बाड़मेर का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी ऐसे ही एक फैसले के खिलाफ आदिवासियों ने मोर्चा खोला था, जिसके बाद सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े थे। छत्तीसगढ़ में भी वैसी ही स्थिति निर्मित होने की संभावना जताई जा रही है।

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गुरुवार, 18 जून 2026

छत्तीसगढ़ में 'वर्दी' का दम घोंट रही सियासत? दिल्ली की दौड़ में सूबे के होनहार IPS!


छत्तीसगढ़ में 'वर्दी' का दम घोंट रही सियासत? दिल्ली की दौड़ में सूबे के होनहार IPS!


खास रिपोर्ट: कैडर रिव्यू में लेत-लतीफी, नेताओं की 'दबंगई' और कॉरपोरेट-पॉलिटिकल नेक्सस से व्यथित होकर केंद्रीय प्रतिनियुक्ति की कतार में खड़े हुए छत्तीसगढ़ के कई आला पुलिस अफसर; कानून-व्यवस्था पर उठ रहे गंभीर सवाल।


छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक और पुलिसिया गलियारों में इन दिनों एक बेहद संवेदनशील और चौंकाने वाली चर्चा आम है— *'क्या छत्तीसगढ़ के होनहार और कड़क आईपीएस अधिकारियों का राज्य में दम घुट रहा है?'* यह सवाल इसलिए मौजूं हो गया है क्योंकि राज्य के कई सीनियर और काबिल आईपीएस (IPS) अफसर अचानक छत्तीसगढ़ छोड़कर दिल्ली (केंद्रीय प्रतिनियुक्ति) जाने के लिए बेताब दिखाई दे रहे हैं। प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि जब पुलिसिंग पर सियासत का पहिया जरूरत से ज्यादा भारी होने लगता है, तो वर्दीधारी अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए 'डेपुटेशन' के आवेदन को ही आखिरी हथियार बना लेते हैं।

कहा जा रहा है कि मौजूदा 'डबल इंजन' सरकार के दौर में आईपीएस लॉबी के भीतर असंतोष की एक अंडरकरेंट दौड़ रही है। राज्य के भीतर कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति और हाल ही में असम में छत्तीसगढ़ पुलिस के साथ हुए बेहद शर्मनाक वाकये ने इस आग में घी का काम किया है।

## **फुटबॉल बनी 'खाकी': कैडर रिव्यू में देरी और लूप लाइन का खेल**

जानकारों का मानना है कि छत्तीसगढ़ में आईपीएस अधिकारियों को राजनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर 'फुटबॉल' बनाकर रख दिया गया है। राज्य में लंबे समय से लंबित **कैडर रिव्यू (Cadre Review) में हो रही देरी** और वरिष्ठ पदों की कमी के चलते कई अधिकारियों को अपना भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा है। वरिष्ठता और काबिलियत को नजरअंदाज कर चहेतों को मलाईदार पोस्टिंग देने और फील्ड में बेहतर रिकॉर्ड रखने वाले प्रभावशाली अफसरों को 'लूप लाइन' में धकेलने के खेल ने पुलिस महकमे के भीतर गहरा नैराश्य पैदा किया है।

अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर भेजने का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा है। पूर्व में अमित कुमार, नीतू कमल और दालूरी श्रवण जैसे अधिकारी केंद्र जा चुके हैं, तो वहीं हाल के दिनों में अभिषेक सांडिल, रामगोपाल गर्ग, दीपक झा और जितेंद्र सिंह मीणा जैसे नामी अफसरों ने भी दिल्ली की राह पकड़ ली है। अब कतार में कुछ और बड़े नाम हैं।

> **संतोष सिंह और अमरेश मिश्रा भी कतार में!**

> औद्योगिक बेल्ट रायगढ़, कवर्धा समेत कई जिलों की कमान सफलतापूर्वक संभाल चुके आईपीएस **संतोष सिंह** का स्वयं इच्छा से दिल्ली डेपुटेशन पर जाने की तैयारी करना चौंकाता है। वहीं, राज्य के सबसे पावरफुल और चर्चित चेहरों में से एक— एसीबी (ACB) चीफ **अमरेश मिश्रा** के भी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने की गंभीर चर्चाएं हैं। सवाल उठ रहा है कि यदि इतने रसूखदार और रडार पर रहने वाले अधिकारी राज्य छोड़ना चाहते हैं, तो पर्दे के पीछे की कहानी कितनी पेचीदा होगी?

## **नेताओं की 'चमकाऊ' नीति और कॉरपोरेट की गुलामी का आरोप**

अखबार को मिले इनपुट्स के अनुसार, छत्तीसगढ़ में इन दिनों पुलिसिंग का ढर्रा पूरी तरह बदल चुका है। विपक्ष और अंदरूनी सूत्रों का आरोप है कि पुलिस को अपराधियों को पकड़ने के बजाय **'कॉरपोरेट घरानों की चौकीदारी'** में झोंक दिया गया है। जमीनी स्तर पर अपराध बढ़ रहे हैं, लेकिन पुलिस के आला अफसरों को कथित तौर पर निर्देश हैं कि वे कॉरपोरेट हितों की रक्षा को प्राथमिकता दें।

इसके अलावा, सत्ताधारी दल के स्थानीय नेताओं और रसूखदारों की 'दबंगई' ने पुलिस के इकबाल को भारी चोट पहुंचाई है। सोशल मीडिया पर हाल ही में ऐसे कई वीडियो वायरल हुए हैं जहां कभी कलेक्टर तो कभी एसपी और थानेदारों को सरेआम 'चमकाने' (धमकाने) की कोशिश की गई। जब थाने से लेकर जिला मुख्यालय तक राजनीतिक दबाव इस कदर हावी हो जाए कि जायज कार्रवाई पर भी नेताओं की डांट सुननी पड़े, तो वर्दी का स्वाभिमान डगमगाना लाजमी है।

## **सांसदों की 'गोटी' और वसूली के संगीन आरोप**

इस पूरे खेल का एक और स्याह पहलू भी सामने आ रहा है। गलियारों में सुगबुगाहट है कि छत्तीसगढ़ से दिल्ली भागने की इस होड़ में कुछ अफसर बकायदा दिल्ली में बैठे प्रभावशाली सांसदों के जरिए अपनी 'गोटी' फिट कर रहे हैं। चर्चा तो यहां तक है कि पसंदीदा केंद्रीय विंग (जैसे CBI, IB या NIA) में जगह पाने के लिए बड़े स्तर पर 'लेनदेन' और 'सेटिंग' का खेल चल रहा है।

दूसरी तरफ, राज्य की सबसे बड़ी जांच एजेंसी एसीबी-ईओडब्ल्यू पर भी दाग लगे हैं। हालांकि अमरेश मिश्रा के कमान संभालने के बाद पटवारियों, आरआई और एसडीएम पर ताबड़तोड़ कार्रवाई हुई है; लेकिन राज्य के चर्चित शराब घोटाला, कोयला परिवहन घोटाला, डीएमएफ और पीएससी घोटाले के आरोपियों से **'एजेंसी के ही कुछ अफसरों द्वारा मोटी वसूली'** किए जाने के संगीन आरोप लगे हैं। नव्या मलिक ड्रग्स केस में भी डायरी के कुछ कथित पन्ने सोशल मीडिया पर तैरते रहे, जो खाकी की साख पर बट्टा लगाते हैं।

## **असम कांड: जब अपनों ने ही अपनों की 'भद्र' पीटी!**

इस पूरे प्रशासनिक संकट के बीच, हाल ही में असम के गुवाहाटी में जो हुआ, उसने छत्तीसगढ़ पुलिस के मनोबल को पाताल में धकेल दिया है। डिजिटल अरेस्ट के एक बड़े मामले में अपराधियों को दबोचने गई छत्तीसगढ़ पुलिस की टीम को वहां की स्थानीय जनता के विरोध के बाद **असम पुलिस ने ही हिरासत में ले लिया।**

यह घटना छत्तीसगढ़ सरकार की कूटनीति और पुलिस समन्वय पर बहुत बड़ा तमाचा है।

 1. **पहला सवाल:** क्या छत्तीसगढ़ पुलिस ने असम जाने से पहले कानूनी और वैधानिक प्रक्रियाओं के तहत वहां की पुलिस को सूचना नहीं दी थी?

 2. **दूसरा सवाल:** केंद्र, असम और छत्तीसगढ़— तीनों जगह भारतीय जनता पार्टी (BJP) की 'डबल-ट्रिपल इंजन' सरकार होने के बावजूद राज्यों के बीच इतना खराब कोऑर्डिनेशन क्यों है?

अपराधियों को पकड़ने गई पुलिस जब खुद हवालात की हवा खाने लगे, तो इससे अपराधियों के हौसले बुलंद होना और पुलिस का मनोबल टूटना तय है।

## **दावे बनाम हकीकत: सरकार के 'ऑल इज वेल' पर भारी पड़ते सवाल**

इस पूरे बवाल पर जब मुख्यमंत्री और गृह मंत्री (विजय शर्मा) से बात की जाती है, तो सरकार का आधिकारिक रुख यही होता है कि *"राज्य में कानून व्यवस्था सुदृढ़ है और सब कुछ ठीक चल रहा है।"* तकनीकी रूप से यह भी दलील दी जाती है कि नियमों के मुताबिक हर आईपीएस को केंद्र में 2 साल सेवाएं देनी ही होती हैं।

लेकिन कागजी नियमों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर साफ दिख रहा है। यदि राज्य में काम करने का माहौल इतना ही बेहतरीन है, तो अचानक से होनहार अफसरों की फौज छत्तीसगढ़ को 'बाय-बाय' कहने के लिए इतनी उतावली क्यों है? बहरहाल, देखना दिलचस्प होगा कि गृह मंत्रालय इस प्रशासनिक असंतोष को कैसे थामता है, या फिर आने वाले दिनों में कुछ और बड़े आईपीएस अफसर छत्तीसगढ़ से बोरिया-बिस्तर समेटकर दिल्ली कूच कर जाते हैं।

वीडियो देखें 

https://youtu.be/WCc0filkMAE?si=vAXlfJtZkvnkp7IQ

बुधवार, 17 जून 2026

विकास की फाइलों पर 4 नहीं, अब 7 फीसदी कमीशन की 'अघोषित' जंग!

  'डबल इंजन' में भ्रष्टाचार का हाई-स्पीड गियर? विकास की फाइलों पर 4 नहीं, अब 7 फीसदी कमीशन की 'अघोषित' जंग!


मंत्रालय के गलियारों से ग्राउंड जीरो तक की पड़ताल

पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने कभी देश के सामने एक कड़वी हकीकत बयां की थी कि "केंद्र से चलने वाला ₹1 जनता तक पहुंचते-पहुंचते महज 15 पैसे रह जाता है।" करीब चार दशक बाद आज छत्तीसगढ़ में भी यही सवाल फिर से जोर-शोर से गूंज रहा है। राज्य में भले ही 'डबल इंजन' की सरकार होने और भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े दावों के साथ सत्ता परिवर्तन हुआ हो, लेकिन मंत्रालय के बंद कमरों से छनकर आ रही खबरें चौकाने वाली हैं। प्रशासनिक हलकों और गलियारों में चर्चा आम है कि विकास कार्यों और केंद्रीय ग्रांट की फाइलों को आगे बढ़ाने के लिए 'कमीशन का रेट' 4 फीसदी से बढ़ाकर 7 फीसदी कर दिया गया है। इसी 'अघोषित तकरार' के चलते विकास की अरबों रुपयों की फाइलें मंत्रालय में धूल खा रही हैं।

₹6,700 करोड़ का भारी-भरकम बजट और प्यासी जनता

केंद्रीय वित्त आयोग (Finance Commission) के तहत छत्तीसगढ़ के नगरीय निकायों और पंचायतों को चमकाने, बुनियादी सुविधाएं सुधारने और आपदा प्रबंधन के लिए ₹6,700 करोड़ से अधिक की भारी-भरकम राशि जारी की जाती है। नियमतः इस राशि का आधा हिस्सा शुद्ध पेयजल और स्वच्छता (पानी और सफाई) पर खर्च होना अनिवार्य है।

लेकिन ग्राउंड जीरो की हकीकत भयावह है। एक तरफ जहां शहरों की नालियां बजबजा रही हैं और सफाई व्यवस्था भगवान भरोसे है, वहीं ग्रामीण इलाकों की तस्वीरें कलेजा कपा देने वाली हैं। भीषण गर्मी के इस दौर में जल जीवन मिशन और वित्त आयोग की राशि के बावजूद ग्रामीण बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। कई गांवों में 1,000 से अधिक घरेलू नल सूखे पड़े हैं। ग्रामीणों को सिर पर गुंडी (बर्तन) रखकर दो से तीन किलोमीटर दूर दूसरे गांवों में पानी की तलाश में भटकना पड़ रहा है। 'जल संरक्षण दिवस' जैसी सरकारी औपचारिकताएं तो पूरी हो जाती हैं, लेकिन धरातल पर प्यास का सन्नाटा पसरा हुआ है।

टेंडर की शर्तों का 'मायाजाल' और चहेते ठेकेदारों की मोनोपॉली

इस पूरे खेल की शुरुआत जमीनी स्तर पर नहीं, बल्कि मंत्रालय स्तर से ही शुरू हो जाती है। सूत्रों के मुताबिक, वित्त आयोग की राशि से होने वाले कार्यों के लिए टेंडरों में ऐसी जटिल और चुनिंदा शर्तें (Conditions) जोड़ दी जाती हैं, जिससे आम या स्थानीय ठेकेदार रेस से बाहर हो जाएं। इसके चलते कुछ खास और 'चहेते ठेकेदारों' की मोनोपॉली (एकाधिकार) स्थापित हो चुकी है। स्थानीय स्तर के जनप्रतिनिधि और अधिकारी इस बड़े खेल के आगे मूकदर्शक बने हुए हैं, क्योंकि पूरा ताना-बाना ऊपर से ही तय होकर आता है।

फाइलों पर लगी 'कमीशन' की दीमक; 4% से बढ़कर हुआ 7%?

राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में सबसे बड़ी चर्चा कमीशन की दरें बढ़ने को लेकर है। विभागीय सूत्रों की मानें तो पहले जहां केंद्रीय ग्रांट की फाइलों को हरी झंडी दिखाने के लिए कथित तौर पर 4 फीसदी का लेन-देन चर्चाओं में रहता था, वहीं अब इसे बढ़ाकर 7 फीसदी किए जाने की मांग हो रही है। यही वजह है कि जब तक यह 'डील' फाइनल नहीं होती, तब तक विकास कार्यों की फाइलें वित्त और संबंधित मंत्रालयों के दफ्तरों से आगे नहीं खिसक पा रही हैं।

विपक्ष और कांग्रेस के ग्रामीण अध्यक्षों (जैसे पप्पू बंजारे व अन्य) ने भी सरकार को घेरते हुए आरोप लगाया है कि प्रदेश में विकास कार्य पूरी तरह ठप पड़ गए हैं। विधानसभा के भीतर भी विपक्ष ने पुरजोर तरीके से यह मुद्दा उठाया था कि विकास कार्यों की प्रशासनिक स्वीकृति होने के बावजूद वित्त मंत्रालय फाइलों को दबाकर बैठा हुआ है।

रडार पर भारी-भरकम मंत्रालय: मंत्रियों की खामोशी पर सवाल

इस पूरी व्यवस्था में उन प्रमुख मंत्रालयों पर उंगलियां उठ रही हैं, जिनके पास ग्रामीण और शहरी विकास का सीधा जिम्मा है:

1. पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्रालय (मंत्री: विजय शर्मा): जहां ग्रामीण क्षेत्रों की पेयजल व्यवस्था और पंचायतों के ग्रांट की फाइलें अटकी पड़ी हैं।

2. नगरीय प्रशासन एवं विकास मंत्रालय (उपमुख्यमंत्री मंत्री: अरुण साव): जल जीवन मिशन में हो रही कथित गड़बड़ियों और शहरी निकायों की बदहाली को लेकर विधानसभा से लेकर सड़क तक घिरे हुए हैं।

3. वित्त मंत्रालय (मंत्री: .पी. चौधरी): जिन पर विपक्ष ने सीधे तौर पर 'चेहरा देखकर' फाइलों को मंजूरी देने और जानबूझकर विकास के बजट को रोकने का आरोप लगाया है।

जनता का सवाल: भ्रष्टाचारियों को 'उल्टा लटकाने' के वादे का क्या हुआ?

चुनाव के वक्त मंचों से दहाड़ते हुए बड़े-बड़े नेताओं ने दावा किया था कि भ्रष्टाचारियों को 'उल्टा लटकाकर सीधा' कर दिया जाएगा। लेकिन आज जब केंद्र और राज्य दोनों जगह एक ही दल की सरकार है, तब भी यदि केंद्रीय पैसे का एक बड़ा हिस्सा बीच रास्ते में ही दम तोड़ रहा है, तो आम जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है। देखना होगा कि विकास की इन फाइलों से '7 फीसदी' का यह अघोषित ग्रहण कब हटता है और छत्तीसगढ़ के प्यासे गांवों तक पानी कब पहुंचता है।

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मंगलवार, 16 जून 2026

छत्तीसगढ़ बीजेपी में छिड़ी अंदरूनी महाभारत, 'अनुशासन का बुलडोज़र' हुआ पंचर!

 छत्तीसगढ़ बीजेपी में छिड़ी अंदरूनी महाभारत, 'अनुशासन का बुलडोज़र' हुआ पंचर!


रायपुर: छत्तीसगढ़ की सियासत में इन दिनों पर्दे के पीछे एक ऐसी राजनीतिक पटकथा लिखी जा रही है, जिसने रायपुर से लेकर दिल्ली दरबार तक हलचल मचा दी है। कल तक जो भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) 'ऑल इज वेल' और 'अनुशासन का डंडा' होने का दम भरती थी, आज उसी के भीतर चल रही अंदरूनी कलह और गुटबाजी की खबरें बाहर आने लगी हैं। छत्तीसगढ़ में डबल इंजन की सरकार को बैठे लगभग ढाई साल हो चुके हैं, और इस समय सबसे बड़ा मुद्दा कैबिनेट में फेरबदल और मंत्रियों के परफॉर्मेंस का बना हुआ है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय चाहते हैं कि मंत्रिमंडल में फेरबदल हो ताकि वे अपने चहेते विधायकों को जगह दे सकें और खराब परफॉर्मेंस या संगठन विरोधी सुर अपनाने वाले मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखा सकें, क्योंकि अगले ढाई साल बाद राज्य में चुनाव होने हैं। हालांकि, दिल्ली दरबार से फिलहाल इस फेरबदल को हरी झंडी नहीं मिली है और कहा गया है—"अभी रुको, देखते हैं।" ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या मोदी-शाह का रसूख भी राज्य के दिग्गज नेताओं के आगे बौना साबित हो रहा है?

बंद कमरे की 'इनसाइड स्टोरी': पाँच दिग्गजों ने फंसाया पेंच

राजनीतिक गलियारों और बंद कमरों से आ रही खबरों के मुताबिक, राज्य के आधा दर्जन दिग्गज नेताओं के तेवरों ने इस फेरबदल के पहियों पर ब्रेक लगा दिया है। आइए जानते हैं कि इन दिग्गज नेताओं के रुख ने कैसे इस पूरी कवायद को रोक दिया:

1. रामविचार नेताम और रेणुका सिंह (सरगुजा का आदिवासी असंतोष):

हाल ही में हुई बीजेपी की कोर ग्रुप की बैठक में भारी फेरबदल किया गया, जिससे दिग्गज आदिवासी नेता रामविचार नेताम को कोर ग्रुप से हटा दिया गया। सरगुजा क्षेत्र में आदिवासियों के बीच गहरा प्रभाव रखने वाले नेताम इस फैसले से बेहद खफा हैं और उन्होंने अपनी नाराजगी केंद्रीय नेतृत्व के सामने दर्ज कराई है। दूसरी तरफ, पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ विधायक रेणुका सिंह के तेवर भी तीखे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक कथित ऑडियो (जिसकी पुष्टि आधिकारिक तौर पर नहीं है) को लेकर विपक्ष भी हमलावर है और कांग्रेस का कहना है कि बीजेपी के वरिष्ठ नेता खुद मान रहे हैं कि यह सरकार दिल्ली के रिमोट कंट्रोल से चल रही है।

2. विजय शर्मा (गृह मंत्रालय छोड़ने को तैयार नहीं):

मंत्रिमंडल की संभावित बदलाव सूची में सबसे पहला नाम गृह मंत्री विजय शर्मा का चल रहा था। राज्य, विशेषकर राजधानी रायपुर में लगातार बढ़ती चाकूबाजी, तलवारबाजी, लूट और बमबारी जैसी घटनाओं के कारण कानून-व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। चर्चा थी कि उन्हें मंत्री पद से हटाकर बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में नई जिम्मेदारी देकर दिल्ली शिफ्ट किया जाएगा। लेकिन अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, विजय शर्मा दिल्ली जाने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं और वे न केवल राज्य की राजनीति में बने रहना चाहते हैं, बल्कि गृह मंत्रालय भी छोड़ने को राजी नहीं हैं।

3. ओपी चौधरी और सीएम के बीच अनबन की सुगबुगाहट:

मंत्रिमंडल फेरबदल की इस रेस में ओपी चौधरी काफी सक्रिय नजर आ रहे थे। कहा जा रहा है कि उन्होंने जो फेरबदल की सूची थमाई थी, उसमें कुछ ऐसे नाम शामिल थे जो मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के बेहद करीबी मंत्रियों के थे। इसी बात को लेकर मुख्यमंत्री और चौधरी के बीच अनबन या खींचतान की स्थिति पैदा हुई। बताया जा रहा है कि इस फेरबदल के तरीके से ओपी चौधरी भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं।

4. अरुण साव (साहू समाज और विभागीय खींचतान):

डिप्टी सीएम अरुण साव को लेकर भी कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। लोक निर्माण जैसे अहम विभागों में कथित तौर पर मची 'लूट-खसोट' के कारण उनका विभाग बदलने की चर्चा जोरों पर थी। वहीं, पार्टी के कुछ अन्य नेता और 'सुपर सीएम' कहे जाने वाले चेहरे चाहते हैं कि साव को मंत्रिमंडल से ही बाहर कर दिया जाए, ताकि वे स्वयं राज्य की पिछड़े वर्ग (साहू समाज) की राजनीति का नेतृत्व कर सकें। हालांकि, अरुण साव के प्रभारी नितिन नवीन के साथ अच्छे संबंधों के कारण फिलहाल मामला टल गया है।

दिल्ली में मंत्रियों की 'करतूतों' का पहुंचा पुलिंदा

इस पूरे खेल की शुरुआत बीजेपी की कोर ग्रुप की बैठक से हुई थी। दिल्ली से आए केंद्रीय नेताओं के सामने कई मंत्रियों की कार्यप्रणाली, उनके ओएसडी (OSD) और विशेष सहायकों के भ्रष्टाचार व मनमानी की शिकायतों का पुलिंदा रखा गया। कार्यकर्ताओं का यह गुस्सा देखकर केंद्रीय नेताओं ने आश्वासन दिया था कि, "आपकी शिकायतों को गंभीरता से लिया जाएगा, लेकिन फिलहाल आप व्यक्ति विशेष के बजाय पार्टी के लिए काम करें। अगर सत्ता हाथ से चली गई तो कुछ नहीं बचेगा।"

पार्टी के 'अनुशासन' पर खड़े हुए बड़े सवाल

मंत्रिमंडल के इस फेरबदल के टलने और अंदरूनी कलह के सतह पर आने के बाद अब संगठन की एकजुटता और अनुशासन की पोल खुलती नजर आ रही है। केंद्रीय नेतृत्व और मुख्यमंत्री साय के फैसलों को जिस तरह से सूबे के दिग्गज नेताओं ने चुनौती दी है, उससे आने वाले दिनों में पार्टी के भीतर की रार और बढ़ने की आशंका है।

अब देखना दिलचस्प होगा कि दिल्ली दरबार और मुख्यमंत्री साय मिलकर इस उलझे हुए राजनीतिक पेंच को कैसे सुलझाते हैं और आने वाले दिनों में ऊँट किस करवट बैठता है।

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