रविवार, 7 जून 2026

खाकी' का नया खेल: सत्ता के रसूख में 'पीड़ित' ही बना 'लुटेरा'

 खाकी' का नया खेल: सत्ता के रसूख में 'पीड़ित' ही बना 'लुटेरा', कानून को 'वॉशिंग मशीन' बनाने की जिद!



छत्तीसगढ़ में सत्ता बदलते ही क्या न्याय की परिभाषा भी बदल गई है? क्या सूबे की 'डबल इंजन सरकार' में अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि अब रसूखदारों के आगे खाकी (पुलिस) नतमस्तक होकर पीड़ित को ही मुलजिम बनाने का खेल खेल रही है? ये सवाल हम नहीं, बल्कि बेमेतरा जिले के साजा विधानसभा क्षेत्र से आ रही वह हैरान करने वाली तस्वीरें और पुलिसिया कार्रवाई की स्क्रिप्ट चीख-चीख कर कह रही है, जिसने पूरे प्रदेश की कानून व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।

ताजा मामला साजा विधानसभा के हाईप्रोफाइल भाजपा विधायक ईश्वर साहू के पुत्र कृष्णा साहू से जुड़ा है। आरोप है कि सत्ता की धमक और अहंकार के नशे में चूर विधायक पुत्र को बचाने के लिए साजा पुलिस ने एक ऐसा 'कुचक्र' रचा है, जिससे पीड़ित आदिवासी परिवार ही अब सहमा हुआ है।

दशहरे की रात का वो खूनी खेल और 'खाकी' की सुस्ती

घटना बीती 12 अक्टूबर यानी दशहरे की रात की है। आरोप है कि विधायक पुत्र कृष्णा साहू ने अपने साथियों के साथ मिलकर मनीष मंडावी (एक आदिवासी युवक) और उसके चाचा के साथ जमकर मारपीट की। मारपीट इस कदर बेरहमी से की गई कि पीड़ित का सिर तक फट गया। जातिसूचक गालियां दी गईं। लेकिन हद तो तब हो गई जब इस गंभीर मामले की रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए पीड़ित को घंटों थाने के चक्कर काटने पड़े। साजा पुलिस सत्ता के दबाव में एफआईआर दर्ज करने से कतराती रही। आखिरकार जब आदिवासी समाज ने एकजुट होकर तीखा आक्रोश जताया और पुलिस पर भारी दबाव बनाया, तब कहीं जाकर साजा पुलिस ने विधायक पुत्र कृष्णा साहू के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट (ST/ST Act) और अन्य गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया।

काउंटर एफआईआर का 'पटकथा': 45 घंटे बाद याद आई लूट?

कहानी में असली ट्विस्ट इसके बाद आता है। जैसे ही विधायक पुत्र पर गैर-जमानती धाराओं में केस दर्ज हुआ, साजा पुलिस ने कथित तौर पर रसूखदारों को 'वॉशिंग मशीन' में डालकर पाक-साफ करने की स्क्रिप्ट लिख डाली। अमूमन ऐसी संगीन धाराओं के तहत आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी होनी चाहिए, लेकिन कृष्णा साहू बेखौफ अंदाज में ठसक के साथ थाने पहुंचता है।

पुलिस उसे गिरफ्तार करने की बजाय उसकी एक ऐसी शिकायत पर तुरंत मुहर लगा देती है, जिसे सुनकर कोई भी हैरान रह जाए। घटना के लगभग 45 घंटे बाद विधायक पुत्र की तरफ से काउंटर रिपोर्ट लिखवाई जाती है कि पीड़ित मनीष मंडावी और उसके चाचा ने मिलकर उनसे ₹40,000 लूट लिए! पुलिस बिना किसी जांच के, बिना समय गंवाए पीड़ित पक्ष के खिलाफ ही लूट (Dacoity/Robbery) जैसी गंभीर धारा के तहत काउंटर एफआईआर दर्ज कर लेती है।

सवाल: क्या समझौते का दबाव बनाने के लिए रचा गया कुचक्र?

राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि पुलिस अक्सर रसूखदारों को बचाने के लिए काउंटर केस का सहारा लेती है ताकि गरीब पीड़ित पक्ष पर दबाव बनाया जा सके और वह 'समझौता' करने को मजबूर हो जाए।

 पहला सवाल: विधायक बनने से पहले और बाद की जीवनशैली को देखें, तो क्या सचमुच ₹40,000 की लूट की रिपोर्ट लिखवाने में विधायक पुत्र को 45 घंटे से ज्यादा का वक्त लग गया?

 दूसरा सवाल: एसटी/एससी एक्ट के तहत नामजद आरोपी थाने में खुलेआम घूम रहा है और पुलिस उससे पूछताछ करने के बजाय उसकी 'लूट' की थ्योरी पर आंख मूंदकर भरोसा कर लेती है, ऐसा क्यों?

 तीसरा सवाल: यह पूरा इलाका प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और गृहमंत्री विजय शर्मा के प्रभाव वाला क्षेत्र माना जाता है, ऐसे में गृहमंत्री की नाक के नीचे कानून का यह कैसा माखौल उड़ाया जा रहा है?

लोहारीडीह की आग से भी नहीं सीखा सबक?

इसी कवर्धा-बेमेतरा बेल्ट में पिछले दिनों 'लोहारीडीह कांड' हुआ था, जहां एक रसूखदार भाजपा नेता के आतंक से तंग आकर उग्र भीड़ ने कानून अपने हाथ में ले लिया था और पूरा गांव जेल की सलाखों के पीछे चला गया था। साजा की यह घटना बताती है कि प्रशासन ने लोहारीडीह की त्रासदी से कोई सबक नहीं सीखा है। जब पुलिस निष्पक्ष न्याय देने की बजाय सत्ता के औजार के रूप में काम करने लगे, तो जनता का कानून से विश्वास उठने लगता है।

नवा बैला के नवा सींग... सत्ता का अहंकार?

छत्तीसगढ़ी में एक बड़ी मशहूर कहावत है— "नवा बैला के नवा सींग, चरे बैला टंगे टिंग" (यानी नया-नया पद या ताकत मिलने पर जरूरत से ज्यादा धमक दिखाना)। साजा में भी यही देखने को मिल रहा है। विपक्ष अब इस मुद्दे पर पूरी तरह मुखर है और सरकार को घेरने की तैयारी में है। सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री और गृहमंत्री अपने ही विधायक के पुत्र के इस 'गुंडाराज' पर लगाम कसेंगे या फिर साजा पुलिस का यह 'शर्मनाक खेल' यूं ही जारी रहेगा और एक गरीब आदिवासी न्याय की भीख मांगते-मांगते खुद ही लुटेरा बनकर सलाखों के पीछे डाल दिया जाएगा?

जवाब का इंतजार सूबे की जनता को है।

वीडियो देखें


https://youtu.be/8wLJBtZ6Q4Y?si=Q6XZYs_ObqrHeiL1

गुरुवार, 4 जून 2026

राष्ट्रवाद की नई परिभाषा या विभाजन की पुरानी लकीरें


 राष्ट्रवाद की नई परिभाषा या विभाजन की पुरानी लकीरें?

 इतिहास के पन्नों से वर्तमान की राजनीति तक का एक गहरा और निष्पक्ष विश्लेषण



 1. प्रस्तावना: इतिहास की गूंज और वर्तमान का कोलाहल

सन् 1947 का अगस्त महीना सिर्फ एक देश की आजादी का गवाह नहीं था, बल्कि उपमहाद्वीप के सीने पर खिंची उस खूनी लकीर का भी गवाह था जिसने रातों-रात करोड़ों लोगों को अपनी ही जमीन पर पराया बना दिया। आज जब हम इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में खड़े हैं, तब भी नागरिकता, राष्ट्रवाद और पहचान के सवाल थमे नहीं हैं।

अक्सर यह माना जाता है कि इतिहास बीत चुका समय है, लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप के संदर्भ में इतिहास एक जीवंत इकाई है जो हर रोज हमारी सुबह के अखबारों और शाम की टीवी डिबेट्स को तय करती है। आज देश के राजनीतिक गलियारों से लेकर चाय की टपरियों तक जिस 'राष्ट्रवाद' पर सबसे तीखी बहस हो रही है, उसकी जड़ें दरअसल आज की राजनीति में नहीं, बल्कि सन 47 और उसके बाद के दशकों में लिए गए राजनीतिक फैसलों में छिपी हैं। सवाल यह उठता है कि क्या हम आज वाकई राष्ट्र की सुरक्षा और संप्रभुता की नई इबारत लिख रहे हैं, या सिर्फ अतीत के घावों को कुरेदकर वर्तमान की राजनीतिक गोटियां सेट कर रहे हैं?

## 2. नेहरू-लियाकत समझौते से असम अकॉर्ड तक: इतिहास का वो सच जो छिपाया गया

विभाजन के तुरंत बाद सबसे बड़ा संकट शरणार्थियों का था। दोनों ओर से इंसानों का ऐसा रेला चला जिसकी कल्पना इतिहास में कभी नहीं की गई थी। इस मानवीय त्रासदी को संभालने और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए 1950 में 'नेहरू-लियाकत समझौता' (दिल्ली पैक्ट) हुआ। इस समझौते का मूल उद्देश्य यह था कि दोनों देश अपने-अपने यहाँ अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे और जो शरणार्थी वापस जाना चाहते हैं, उन्हें उनकी संपत्ति वापस मिलेगी।

> **इतिहास का अंतर्विरोध:**

> दस्तावेज़ गवाह हैं कि भारत ने इस समझौते की शर्तों का पूरी निष्ठा से पालन किया, लेकिन तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) और पश्चिमी पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों (विशेषकर हिंदुओं, सिखों, बौद्धों) पर अत्याचार का सिलसिला थमा नहीं। नतीजतन, सीमाओं के पार से आबादी का पलायन रुक-रुक कर चलता रहा।

इसके बाद दूसरा सबसे बड़ा मोड़ आया सन 1971 में, जब बांग्लादेश का जन्म हुआ। इस दौरान एक बार फिर लाखों की संख्या में शरणार्थी भारत, विशेषकर असम और पश्चिम बंगाल की सीमाओं में दाखिल हुए। असम की जनसांख्यिकी (Demography) में आए इस अचानक बदलाव ने वहां एक बड़े सांस्कृतिक और सामाजिक आंदोलन को जन्म दिया, जिसे हम 'असम आंदोलन' के नाम से जानते हैं। छह साल चले इस खूनी संघर्ष का अंत 1985 के 'असम समझौते' (Assam Accord) से हुआ, जिसने नागरिकता के लिए 25 मार्च 1971 की कट-ऑफ तारीख तय की।

विडंबना देखिए कि जो असम समझौता असम की अस्मिता को बचाने के लिए हुआ था, वही आगे चलकर देश की नागरिकता बहस का सबसे पेचीदा कानूनी दस्तावेज बन गया।

## 3. कानून, नागरिकता और पहचान की कानूनी भूलभुलैया

नागरिकता किसी भी संप्रभु राष्ट्र का सबसे बुनियादी अधिकार होती है। भारत के संविधान के भाग-2 (अनुच्छेद 5 से 11) में नागरिकता के प्रावधान दिए गए हैं। लेकिन समय के साथ इसमें कई बदलाव किए गए। 1955 के मूल नागरिकता कानून में 1986, 1992, 2003, 2005, 2015 और हाल ही में सीएए (CAA) के जरिए संशोधन किए गए।

इन संशोधनों की यात्रा को देखें तो समझ आता है कि भारत की नागरिकता की अवधारणा 'भूमंडलीय अधिकार' (Jus Soli - जन्म के आधार पर) से खिसककर 'रक्त संबंध/धार्मिक प्रताड़ना' (Jus Sanguinis - वंश या पृष्ठभूमि के आधार पर) की तरफ बढ़ी है।

4. राष्ट्रवाद का नया 'कॉर्पोरेट मॉडल': चुनावी ध्रुवीकरण और क्रोनोलॉजी का खेल

आज की सत्ता ने राजनीति को एक ऐसे 'इवेंट मैनेजमेंट' में बदल दिया है, जहाँ देश की सुरक्षा और नागरिकों की पहचान सिर्फ चुनावी विज्ञापनों के टूलकिट बन कर रह गए हैं। जो मुद्दा कभी देश की संप्रभुता से जुड़ा गंभीर विषय हुआ करता था, उसे आज बेहद शातिर तरीके से 'क्रोनोलॉजी' के खेल में बदल दिया गया है। गृह मंत्रालय की फाइलें बाद में हिलती हैं, पहले सत्ताधारी दल के आईटी सेल और गोदी मीडिया के स्टूडियोज में 'देशभक्त बनाम देशद्रोही' की स्क्रिप्ट लिख दी जाती है।

यह आज की सत्ता की सबसे बड़ी 'करतूत' है कि उसने जनता को बुनियादी सवालों से पूरी तरह काट दिया है।

 जब युवा बेरोजगारी पर सवाल उठाता है, तो उसे सीमा पार के दुश्मनों का डर दिखाया जाता है।

 जब किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) या अपनी बदहाली पर बात करता है, तो विमर्श को अचानक नागरिकता, घुसपैठियों और धर्म के चश्मे पर लाकर खड़ा कर दिया जाता है।

सत्ता का दोहरा चरित्र:

एक तरफ तो कागजों पर 'वसुधैव कुटुंबकम्' का ढोंग रचा जाता है, और दूसरी तरफ घरेलू राजनीति में अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए समाज के एक हिस्से को लगातार 'खलनायक' (Villain) के रूप में पेश किया जाता है। यह राष्ट्रवाद नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद की आड़ में खेली 5. जांच एजेंसियों का तमाशा और संस्थाओं का आत्मसमर्पण

इतिहास गवाह है कि जब-जब सरकारें जन-आकांक्षाओं को पूरा करने में विफल होती हैं, तब-तब वो भय का माहौल बनाती हैं। आज की सत्ता की सबसे बड़ी करतूत यह है कि उसने देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं की रीढ़ को ही तोड़ दिया है। जो चुनाव आयोग, जो अदालतें और जो जांच एजेंसियां किसी भी लोकतंत्र का सुरक्षा कवच होती हैं, उन्हें आज सत्ता के इशारे पर नाचने वाली कठपुतलियों में तब्दील कर दिया गया है।

विपक्ष की आवाज को दबाने के लिए कभी देशद्रोह के मुकदमों का सहारा लिया जाता है, तो कभी केंद्रीय एजेंसियों को पीछे छोड़ दिया जाता है। लेकिन जब बात असल घुसपैठ, सीमाओं पर चीन की दादागिरी या आंतरिक सुरक्षा की आती है, तो सत्ता की 'छप्पन इंच' की छाती अचानक चुप्पी साध लेती है। इतिहास की गलतियों को सुधारने का दावा करने वाले हुक्मरान आज इतिहास के सबसे कमजोर और डरे हुए दौर का निर्माण कर रहे हैं, जहाँ सवाल पूछना ही सबसे बड़ा अपराध बन चुका है।

6. निष्कर्ष: क्या राजा नंगा हो चुका है?

कवि अज्ञेय ने कभी लिखा था कि "सांप, तुम सभ्य तो हुए नहीं..."। आज की सत्ता पर यह बात बिल्कुल सटीक बैठती है। राष्ट्रवाद का जो चोगा इस सरकार ने ओढ़ रखा है, उसकी सिलाई अब उधड़ने लगी है। नागरिकता के नाम पर गरीबों को ट्रिब्यूनल की अंतहीन लाइनों में खड़ा कर देना और खुद बड़े-बड़े मंचों से राष्ट्रभक्ति के सर्टिफिकेट बांटना, अब जनता के सामने बेनकाब हो चुका है।

यह लेख आज के हुक्मरानों को यह याद दिलाने के लिए है कि इतिहास सिर्फ दर्ज नहीं होता, इतिहास हिसाब भी रखता है। जब आने वाली पीढ़ियां इस दौर का मूल्यांकन करेंगी, तो वो इस बात पर थूकेगी कि जब देश को अस्पतालों, स्कूलों और नौकरियों की जरूरत थी, तब देश की सत्ता मजहब की दीवारें और नफरत की नई लकीरें खींचने में मशगूल थी। राजा भले ही खुद को अजेय समझे, लेकिन लोकतंत्र की जनता कभी न कभी यह चिल्लाकर जरूर कहेगी कि—"राजा नंगा है।"

"सच्चा राष्ट्रवाद सीमाओं पर तैनात फौजी के सम्मान और देश के आखिरी गरीब के पेट की भूख से तय होता है, न कि सत्ता की भूख मिटाने के लिए टीवी चैनलों पर परोसी जाने वाली नफरत की खुराक से।"

वीडियो देखें 

https://youtu.be/O9wDbpEtyK4?si=qIhxnQSFl-8SwAus


बुधवार, 3 जून 2026

कहीं नकली दवाइयां तो कहीं अस्पतालों का जहरीला कचरा ले रहा है जनता की सांसें!

 डबल इंजन सरकार के दावों के बीच सुलगते दो गंभीर सवाल: कहीं नकली दवाइयां तो कहीं अस्पतालों का जहरीला कचरा ले रहा है जनता की सांसें!


 देशभर में जीवन रक्षक 53 दवाइयां अमानक, कंपनियों का दावा- 'ये दवाइयां हमारी हैं ही नहीं'; क्या धड़ल्ले से बिक रहा है नकली मौत का सामान?

 छत्तीसगढ़ के 91 अस्पतालों में 5 महीने से डंप है 'बायो-मेडिकल वेस्ट', भुगतान न होने से कचरा उठाने वाली कंपनी ने खड़े किए हाथ; बिलासपुर-सरगुजा संभाग में महामारी का खतरा।


राज्य से लेकर केंद्र तक में बैठी ‘डबल इंजन’ की सरकारें एक तरफ आयुष्मान कार्ड और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभूतपूर्व विस्तार के बड़े-बड़े दावे कर रही हैं, लेकिन धरातल की हकीकत बेहद खौफनाक और चौंकाने वाली है। देश में एक तरफ जहां डॉक्टरों के पर्चे पर लिखी जा रही दवाइयां नकली होने की कगार पर हैं, वहीं दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के अस्पतालों से निकलने वाला घातक मेडिकल कचरा (Bio-Medical Waste) आम जनता के स्वास्थ्य के लिए 'टाइम बम' बन चुका है। अस्पतालों के भीतर इलाज और अस्पतालों के बाहर फैला जहर अब सीधे तौर पर लोगों की जान से खिलवाड़ कर रहा है।

पार्ट- 1: मौत का खुला बाजार! अमानक ही नहीं, अब 'नकली' दवाओं का खौफ

हाल ही में केंद्रीय दवा नियामक संस्था की जांच में देशभर की 53 जीवन रक्षक दवाइयां अमानक (घटिया स्तर की) पाई गई थीं। मामला सिर्फ दवाओं के घटिया होने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे एक कदम और आगे बढ़कर बेहद डरावना हो चुका है।

कंपनियों का पल्ला झाड़ना: इस जांच के बाद संबंधित दवा निर्माता कंपनियों में से कई ने साफ तौर पर यह कहकर हाथ खड़े कर दिए हैं कि 'ये दवाइयां उनकी कंपनी ने बनाई ही नहीं हैं'।

सवालिया निशान: इसका सीधा और साफ मतलब यह है कि देश के बाजारों, स्टॉकिस्टों और नामी दवा दुकानों तक सीधे तौर पर 'नकली दवाइयां' सप्लाई की जा रही हैं।

जिम्मेदार कौन?: जब मरीज डॉक्टर की सलाह पर महंगी और जरूरी दवाइयां खरीदता है और वह दवा ही नकली निकले, तो इलाज बेअसर होना लाजमी है। ऐसे में होने वाली मौतों के लिए क्या डॉक्टर जिम्मेदार हैं या वह पूरा सिस्टम, जो नकली दवाओं के इस नेक्सस को रोकने में नाकाम रहा है?

इलेक्टोरल बॉन्ड और घटिया दवाओं का कड़वा सच: इस पूरे मामले के तार चुनावी चंदे (इलेक्टोरल बॉन्ड) से भी जुड़ते दिख रहे हैं। पूर्व में सामने आई रिपोर्ट्स के अनुसार, चंदा देने वाली कंपनियों में कम से कम 5 ऐसी दवा कंपनियां भी शामिल थीं, जिनकी दवाइयां पहले घटिया पाई गई थीं। राजनीतिक चंदे की आड़ में जनता की सेहत को ताक पर रखने का यह खेल अब जानलेवा साबित हो रहा है।

पार्ट- 2: छत्तीसगढ़ के 91 अस्पतालों में छुपाया जा रहा है 'जहरीला कचरा'

एक तरफ नकली दवाओं का प्रहार है, तो दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ राज्य के भीतर स्वास्थ्य महकमे की एक और बड़ी लापरवाही सामने आई है। प्रदेश के 91 सरकारी व बड़े अस्पताल इस वक्त बायो-मेडिकल वेस्ट (अस्पताल के कचरे) के ढेर पर बैठे हैं।

4 से 5 महीनों से नहीं उठा कचरा: नियमों के मुताबिक अस्पतालों से निकलने वाले बेहद खतरनाक और संक्रमित कचरे को 24 घंटे के भीतर नष्ट करना अनिवार्य होता है। लेकिन छत्तीसगढ़ के 91 अस्पतालों में पिछले 4-5 महीनों से कचरा उठाया ही नहीं गया है।

अस्पताल प्रबंधन की चालाकी: इस कचरे को सही तरीके से डिस्पोज करने के बजाय, कई जगहों पर अस्पताल प्रबंधन इसे छुपाने की कोशिश कर रहा है, जिससे पर्यावरण और अस्पताल आने वाले मरीजों व तीमारदारों को संक्रमण का भारी खतरा है।

क्यों थमा कचरा उठान?

राज्य सरकार ने अस्पतालों के कचरे को नष्ट करने का ठेका 'इनवायरो केयर इंटरनेशनल' (Enviro Care International) नामक कंपनी को दिया है। इस कंपनी के जिम्वे रेलवे के अस्पतालों का भी काम है। सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राज्य सरकार द्वारा इस कंपनी का करीब 41 लाख रुपये का भुगतान अटका कर रखा गया है। बजट न मिलने के कारण कंपनी डीजल का खर्च और अपने कर्मचारियों को वेतन देने में असमर्थ है, जिसके चलते दूरस्थ अंचलों में काम पूरी तरह ठप हो गया है।

ये 5 जिले सबसे ज्यादा प्रभावित:

इस कचरों के न उठने से बिलासपुर और सरगुजा संभाग का सबसे बुरा हाल है। सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में शामिल हैं: बिलासपुर, जांजगीर-चांपा, मुंगेली, कोरबा और संबंधित संभाग का पांचवा जिला। इन बड़े जिलों के अस्पतालों में प्रतिदिन हजारों-लाखों मरीज आते हैं, जो अनजाने में इस फैलते संक्रमण की चपेट में आ रहे हैं।

बड़ा सवाल: विकास की इस गति का क्या फायदा?

दावा था कि केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकार (डबल इंजन) होने से विकास के काम बुलेट ट्रेन की रफ्तार से दौड़ेंगे। लेकिन अगर गरीबों को पक्के मकान और पक्की सड़कें मिल भी जाएं, और उनके जीवन की मूल आवश्यकता यानी 'स्वास्थ्य' को ही दांव पर लगा दिया जाए, तो ऐसे विकास के क्या मायने हैं? देश में बिना बीमारी के चलते-फिरते, नाचते-गाते युवाओं की अचानक आ रही मौतें और अस्पतालों का यह कुप्रबंधन चीख-चीख कर व्यवस्था में बड़े सुधार की मांग कर रहा है।

रेलवे अस्पताल भी अछूता नहीं!

हैरान करने वाली बात यह है कि कचरा न उठाए जाने वाले इन 91 प्रभावित अस्पतालों की सूची में केंद्र सरकार के अधीन आने वाला रेलवे का अस्पताल भी शामिल है। यानी बजट और कुप्रबंधन की यह मार सिर्फ राज्य स्तर पर नहीं, बल्कि सीधे केंद्र सरकार के विभागों को भी अपनी चपेट में ले चुकी है।

Vidio देखें 


https://youtu.be/-qGNTx_J5TQ?si=Kc8pOTKxPlSzj8ks


मंगलवार, 2 जून 2026

छत्तीसगढ़ में जल जीवन मिशन की 'पाइपलाइन' में लीकेज

 छत्तीसगढ़ में जल जीवन मिशन की 'पाइपलाइन' में लीकेज: 'डबल इंजन' सरकार में भी ठेकेदारों की मनमानी, जनता त्रस्त



 देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक 'जल जीवन मिशन' छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में खुद प्यासी नजर आ रही है। प्रदेश के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (PHE) विभाग और उपमुख्यमंत्री अरुण साव के कड़े बयानों और चेतावनियों के दावों के उलट, जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक है । ग्रामीण इलाकों में योजना का काम या तो अधर में लटका हुआ है या फिर ठेकेदार काम बीच में ही छोड़कर रफूचक्कर हो चुके हैं। हालात यह हैं कि कई गांवों में आधी-अधूरी पाइपलाइन बिछाकर सड़कें खोद दी गई हैं, जिससे लोगों का चलना भी दूभर हो गया है ।

कागजों पर चेतावनी, जमीन पर 'गलबहियां'

पिछले दिनों उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने पीएचई विभाग की बैठक लेकर लापरवाह ठेकेदारों और अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी थी । इससे पहले छह इंजीनियरों को निलंबित भी किया जा चुका है लेकिन धरातल पर सख्त कार्रवाई की जगह ठेकेदारों और अधिकारियों के बीच 'गलबहियां' का खेल चल रहा है । सत्ता के गलियारों और मंत्री बंगले तक मजबूत पकड़ रखने वाले रसूखदार ठेकेदारों के आगे अधिकारी भी नतमस्तक नजर आ रहे हैं 

केस स्टडी: गरियाबंद के दही गांव में छह महीने से काम ठप

योजना में जारी इस खेल का सबसे ताजा और बड़ा उदाहरण गरियाबंद जिले के देवभोग ब्लॉक अंतर्गत आने वाले 'दही गांव' में देखने को मिला है । यहां घर-घर पानी पहुंचाने का जिम्मा 'देव साई ट्रेडर्स' नाम की एजेंसी को मिला है । ग्रामीणों का आरोप है कि पिछले छह महीने से गांव में काम पूरी तरह से ठप पड़ा हुआ है । ग्रामीण लगातार इसकी शिकायत लेकर दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन 'देव साई ट्रेडर्स' का नाम सुनते ही अधिकारियों के हाथ-पांव फूल जाते हैं। सूत्रों के मुताबिक, इस ठेकेदार की पहुंच सीधे मंत्री बंगले और सत्तारूढ़ दल के दिग्गज नेताओं तक है, जिसके कारण इसके खिलाफ कोई भी कार्रवाई करने से बच रहा है ।

विधानसभा में भी गूंजा मामला, घिरे विभागीय मंत्री

यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले विधानसभा सत्र के दौरान भी जल जीवन मिशन में हो रही गड़बड़ियों को लेकर विभागीय मंत्री अरुण साव विपक्ष के तीखे हमलों से बुरी तरह घिरे थे सदन में धमतरी जिले का मामला विशेष रूप से गूंजा था, जहां घटिया निर्माण सामग्री के उपयोग और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे । मंत्री के आश्वासन के बाद भी गरियाबंद, बलौदाबाजार, धमतरी और महासमुंद जैसे जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों से लगातार शिकायतें आ रही हैं कि काम या तो बंद है या फिर बेहद घटिया दर्जे की सामग्री का इस्तेमाल किया जा रहा है ।

विधायकों की भी सुनवाई नहीं!

सूत्रों का कहना है कि स्थिति इतनी बेकाबू हो चुकी है कि खुद सत्तापक्ष और विपक्ष के कई विधायक अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याओं को लेकर लगातार मंत्री बंगले और अधिकारियों को फोन कर रहे हैं । लेकिन शासन-प्रशासन और ठेकेदारों के बीच बनी कथित 'गिरोहबंदी' के कारण जनप्रतिनिधियों की बातों को भी अनसुना किया जा रहा है 

मुख्य बिंदु: क्यों फेल हो रहा है मिशन?

 रसूखदारों को शह: मंत्री बंगले और राजनीतिक रसूख के दम पर ठेकेदार मनमानी कर रहे हैं ।

 घटिया सामग्री का उपयोग: कई जिलों में पाइपलाइन और टंकियों के निर्माण में स्तरहीन सामग्री का इस्तेमाल हो रहा है ।

 अधिकारियों की लाचारी: कार्रवाई करने के बजाय पीएचई विभाग के अधिकारी रसूखदार एजेंसियों के सामने मौन हैं ।

 जनता की दोहरी मार: पानी तो मिला नहीं, उलटे पाइपलाइन के लिए खोदी गई सड़कों ने ग्रामीणों की मुसीबत दोगुनी कर दी है ।

निष्कर्ष: छत्तीसगढ़ में 'डबल इंजन' की सरकार होने के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी के इस ड्रीम प्रोजेक्ट की ऐसी दुर्दशा कई गंभीर सवाल खड़े करती है । यदि समय रहते इस 'सिंडिकेट' पर नकेल नहीं कसी गई, तो करोड़ों की यह योजना केवल भ्रष्टाचार की भेंट चढ़कर रह जाएगी और ग्रामीणों का 'हर घर जल' का सपना सिर्फ सपना ही बना रहेगा।


Vidio देखें 


https://youtu.be/GYVzcgBej3U?si=mHGnFj7QTAuYejZW


सोमवार, 1 जून 2026

कांग्रेस आलाकमान को बदलना होगा राज्यों में सत्ता सौंपने का फॉर्मूला?

कांग्रेस आलाकमान को बदलना होगा राज्यों में सत्ता सौंपने का फॉर्मूला?



 विधानसभा चुनाव के अप्रत्याशित परिणामों ने एक बार फिर देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस को आत्ममंथन के चौराहे पर खड़ा कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में अब यह बहस तेज हो गई है कि क्या कांग्रेस अपनी ही अंदरूनी कमियों और राज्यों के कद्दावर नेताओं (छत्रपों) की अति-महत्वाकांक्षा के कारण जीती-जिताई बाजी हारने में माहिर हो चुकी है? हरियाणा में जिस तरह से कांग्रेस के हाथ में आई हुई सत्ता की थाली सरक गई, उसने एक बार फिर छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान के बीते विधानसभा चुनावों की यादें ताजा कर दी हैं।

वही पुरानी गलती, वही पुराना दांव

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर आंख मूंदकर भरोसा करना कांग्रेस आलाकमान की ठीक वैसी ही भूल थी, जैसी उसने पूर्व में हिंदी बेल्ट के तीन प्रमुख राज्यों में की थी। आलाकमान ने राज्यों के इन बड़े चेहरों की मर्जी के आगे पूरी पार्टी को दांव पर लगा दिया, जिसका नतीजा अंततः हार के रूप में सामने आया।

राजस्थान से मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का 'सिंड्रोम'

यदि सिलसिलेवार ढंग से पिछले चुनावों पर नजर डालें, तो कांग्रेस ने हर राज्य में अंदरूनी कलह और एकतरफा फैसलों के आगे घुटने टेके:

1 राजस्थान: यहाँ अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच का शीतयुद्ध जगजाहिर था। टिकट वितरण से लेकर संगठन के फैसलों तक में लगातार विवाद होते रहे। अंत समय में डैमेज कंट्रोल की कोशिशें तो हुईं, लेकिन धरातल पर उसका कोई बड़ा असर नहीं दिखा और पार्टी को सत्ता गंवानी पड़ी।

2 मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश की कमान पूरी तरह कमलनाथ के हाथों में सौंप दी गई थी। नतीजतन, पार्टी के भीतर असंतोष इस कदर बढ़ा कि ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे मजबूत नेता को पार्टी छोड़नी पड़ी। इसके बाद भी आलाकमान मध्य प्रदेश की जमीनी हकीकत और कमलनाथ की कार्यशैली को भांपने में नाकाम रहा।

3 छत्तीसगढ़: छत्तीसगढ़ का उदाहरण सबसे ज्यादा चौंकाने वाला रहा। कथित तौर पर ढाई-ढाई साल के मुख्यमंत्री के बंटवारे को लेकर जो खींचतान शुरू हुई, उसने सरकार की छवि को खासा नुकसान पहुंचाया। तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर आलाकमान का भरोसा अटूट रहा, जबकि धरातल पर कोयला घोटाला, शराब घोटाला और पीएससी (PSC) जैसे गंभीर घोटालों और प्रशासनिक मनमानी की फेहरिस्त लंबी होती जा रही थी। जन-असंतोष को भांपने के बजाय आलाकमान ने स्थानीय नेतृत्व पर भरोसा जारी रखा और परिणाम स्वरूप छत्तीसगढ़ की सत्ता भी भाजपा की झोली में चली गई।

हरियाणा में भी दोहराया गया इतिहास

इन तीन राज्यों की हार से सबक लेने के बजाय कांग्रेस ने हरियाणा में भी हुड्डा गुट की अनदेखी न करने की मजबूरी के आगे घुटने टेक दिए। वहां भी टिकट बंटवारे से लेकर चुनावी रणनीति तक, सब कुछ एक ही धड़े के इर्द-गिर्द घूमता रहा। चुनावी राजनीति में यह सच है कि क्षेत्रीय क्षत्रपों की अनदेखी नहीं की जा सकती, लेकिन सिर्फ उनके ही भरोसे पूरी चुनावी वैतरणी पार नहीं की जा सकती—यह बात आलाकमान समझने में लगातार विफल हो रहा है।

अब आगे क्या? बदलाव की मांग

हरियाणा के झटके के बाद अब कांग्रेस के भीतर से ही यह आवाज उठने लगी है कि क्या इन पुराने क्षत्रपों को किनारे कर नए और युवा चेहरों को आगे लाने का वक्त आ गया है? आगामी महाराष्ट्र और झारखंड जैसे राज्यों के विधानसभा चुनावों को देखते हुए कांग्रेस को अपनी इस रणनीति में आमूल-चूल बदलाव करना होगा।

यदि पार्टी अब भी राज्यों में बैठे कद्दावर नेताओं पर ही आंख मूंदकर भरोसा करती रही, तो आगामी राज्यों में भी सत्ता की चाबी आसानी से भारतीय जनता पार्टी के हाथों में सौंप दी जाएगी। राजनीतिक पंडितों का साफ कहना है कि अब समय आ गया है जब कांग्रेस आलाकमान को कड़े फैसले लेने होंगे और 'एकतरफा छत्रप मॉडल' से बाहर निकलकर सामूहिक नेतृत्व और जमीनी फीडबैक के आधार पर चुनाव लड़ना होगा।

बॉक्स आइटम (Story Side-Element):

हार के तीन मुख्य सबक:

 भीतरी कलह पर नियंत्रण का अभाव: राज्यों के शीर्ष नेताओं के आपसी विवाद को समय रहते न सुलझाना कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी साबित हो रहा है।

 भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलता की अनदेखी: छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में घोटालों के आरोपों के बावजूद नेतृत्व परिवर्तन न करना पार्टी को भारी पड़ा।

 एक ही चेहरे पर अति-निर्भरता: संगठन को मजबूत करने के बजाय केवल एक ही नेता को सर्वेसर्वा बना देना, बाकी कार्यकर्ताओं और धड़ों को उदासीन कर देता है।

Vidio देखें 



https://youtu.be/7-zJsORXpmc?si=h3mEuYh2SG2cAxcy


शनिवार, 30 मई 2026

राजस्व विभाग का 'जादू'

राजस्व विभाग का 'जादू'


छत्तीसगढ़ के राजस्व विभाग में इन दिनों 'सुशासन' का ऐसा अनूठा राग अलापा जा रहा है, जिसे सुनकर खुद यमराज भी अपने बही-खाते छुपा लें। हमारे 'पीए से प्रमोट होकर सीधे मंत्री' बने टंकराम वर्मा जी के विभाग में ऐसा 'तबादला एक्सप्रेस' दौड़ाया कि पटवारियों और तहसीलदारों को अपने घर का पता याद रखने के लिए गूगल मैप का सहारा लेना पड़ रहा है। लेकिन अफसोस! इस एक्सप्रेस पर हाई कोर्ट ने ऐसा चेन-पुलिंग किया है कि पूरी ट्रेन स्टेशन आने से पहले ही डिरेल हो गई

**बंगले की परिक्रमा और 'मनचाही' प्रसादी**

विभाग में सुशासन का नया क्राइटेरिया (नियम) सामने आया है। नियम बड़ा सरल है—"जो मंत्री बंगले के सामने जितना लंबा साष्टांग दंडवत करेगा, उसे रायपुर-दुर्ग की मलाई उतनी ही जल्दी मिलेगी।" जिन्होंने शीश नवाया, वे रायपुर आ गए और जिन्होंने नियम-कायदे की बात की, उन्हें सीधे सुकमा और बलरामपुर के घने जंगलों में 'प्रकृति दर्शन' के लिए भेज दिया गया।

तहसीलदार संघ के अध्यक्ष नीलमणि दुबे ने जब इस 'ट्रांसफर-उद्योग' के ढोल को जोर से बजाया, तो सरकार ने सुशासन की लाज रखते हुए उन्हें सस्पेंड कर दिया। दुबे जी का कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने पूछ लिया—"साहब, 2 साल में मेरा छठा ट्रांसफर है, क्या सरकार मुझे तहसीलदार मानती है या कोई टूरिस्ट?"

#### **हाई कोर्ट का 'स्टे' और सरकार का 'सन्नाटा'**

जब मंत्री जी के दरबार से न्याय नहीं मिला, तो 18 पीड़ित तहसीलदार 'तबादला चालीसा' पढ़ते हुए हाई कोर्ट पहुंच गए। कोर्ट ने जब ट्रांसफर की लिस्ट देखी, तो शायद वो भी मुस्कुरा दिए होंगे। जिन अधिकारियों का प्रमोशन होना था, उन्हें डिमोशन जैसी सजा दे दी गई। कोर्ट ने बिना देर किए सरकार की इस 'कलाकारी' पर 'स्टे' का ऐसा हथौड़ा मारा कि 18 के 18 तहसीलदार वापस अपनी पुरानी कुर्सियों पर चिपक गए। अब मंत्री जी सोच रहे होंगे कि ट्रांसफर की जो 'मेहनत' (अप्रत्यक्ष रूप से) की गई थी, उसका हिसाब-किताब कैसे बराबर होगा?

> **"सुशासन का ढोल अंदर से पोल है..."**

> यह हम नहीं कह रहे, यह तो खुद विभाग के सस्पेंडेड साहब कह गए। वैसे इस लिस्ट में बच्चों को जेल भेजने की धमकी देने वाली मशहूर तहसीलदार माया अंचल जी भी शामिल हैं। कोर्ट के स्टे के बाद अब देखना है कि वे बच्चों को जेल भेजती हैं या खुद अपनी पुरानी कुर्सी पर वापस बैठती हैं।

#### **हवा में उड़ते मंत्री जी और सीएम की 'ग्राउंडिंग'**

गलियारों में जोरों से चर्चा है कि इस पूरे ड्रामे से मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय इतने 'हैरान-परेशान' हुए कि उन्होंने टंकराम जी को बुलाकर साफ कह दिया—*"मंत्री जी, थोड़ा जमीन पर रहिए, हवा में उड़ना बंद कीजिए।"* इतना ही नहीं, नागपुर वाले 'संघ' के बड़े भाइयों ने भी मंत्री जी की ऐसी क्लास ली है, जैसी स्कूल में होमवर्क न करने वाले बच्चों की ली जाती है।

#### **ओपी चौधरी का 'कवच' और बीजेपी में 'दो-फाड़'**

इस पूरे सर्कस में एक और मजेदार मोड़ तब आया, जब पता चला कि वित्त मंत्री ओपी चौधरी जी इस पूरे खेल में टंकराम जी के पीछे 'ढाल' बनकर खड़े हैं। अब बीजेपी के भीतर ही दो गुट बन गए हैं—एक वो जो ट्रांसफर की मलाई से वंचित रह गए, और दूसरे वो जो चौधरी साहब के 'कवच' के भरोसे हैं।

**चलते-चलते:**

राजस्व विभाग के अधिकारी इस समय सरकार से इतने 'गदगद' (पढ़ें: नाराज) हैं कि आने वाले दिनों में सुशासन का यह ढोल और जोर से फटने वाला है। देखना दिलचस्प होगा कि ओपी चौधरी जी अपने 'खास' टंकराम जी को हाई कोर्ट और सीएम की फटकार से कैसे बचा पाते हैं!