रविवार, 18 अक्टूबर 2026

"छोटे को डांटा, बड़ों को बांटा? प्रशासन में दोहरी नीति पर तीखा सवाल!"

 "छोटे को डांटा, बड़ों को बांटा? प्रशासन में दोहरी नीति पर तीखा सवाल!"


आज हम बात करेंगे छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक व्यवस्था के एक ऐसे कड़वे सच पर, जो अक्सर फाइलों के नीचे दबा दिया जाता है।

अरे भई, सरकारें बदलती हैं, चेहरे बदलते हैं, मुख्यमंत्री बदलते हैं, बड़ी-बड़ी घोषणाएं होती हैं—कि गड़बड़ी मिलेगी तो किसी को नहीं छोड़ेंगे, सीधे कलेक्टर नपेंगे! लेकिन जब ज़मीन पर एक्शन की बारी आती है, तो नजारा कुछ और ही होता है। क्या वाकई हमारे सिस्टम में न्याय सबके लिए बराबर है? या फिर नियम सिर्फ छोटे कर्मचारियों, तहसीलदारों और ठेकेदारों के लिए बने हैं, और बड़े आईएएस अधिकारियों, यानी कलेक्टरों को बचाने के लिए शासन के हाथ कांप जाते हैं?

आज हमारे पास दो बड़ी खबरें हैं, जिन्हें देखकर यह सवाल पूछना लाज़मी हो जाता है—क्या वाकई 'छोटों को प्रताड़ना और बड़ों को गोद में बिठाना' का खेल चल रहा है? आइए, इस पूरी पोल खोल को विस्तार से समझते हैं।

सीएम हेल्पलाइन की समीक्षा और पिपरिया तहसीलदार 

सबसे पहले बात करते हैं पहली खबर की। हाल ही में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए सभी 33 जिलों के कलेक्टरों और अधिकारियों की क्लास ली। मुद्दा था—सीएम हेल्पलाइन 1076!

समीक्षा में यह सामने आया कि पिछले साढ़े चार महीनों में 2 लाख 31 हजार से ज्यादा शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें से 2 लाख 5 हजार से ज्यादा का निराकरण करने का दावा किया गया। मुख्यमंत्री ने कड़े तेवर दिखाते हुए साफ कहा कि शिकायतें सिर्फ कागजों पर हल नहीं होनी चाहिए, ज़मीन पर दिखनी चाहिए।

नतीजा क्या हुआ? कबीरधाम जिले के पिपरिया के तहसीलदार प्रमोद कुमार चंद्रवंशी को डेढ़ साल से लंबित सीमांकन के मामले में तुरंत निलंबित कर दिया गया। इतना ही नहीं, बंटवारे के बाद राजस्व अभिलेख दुरुस्त न करने पर एक अन्य तहसीलदार को कारण बताओ नोटिस भी थमा दिया गया।

भाई, एक्शन हुआ, अच्छी बात है। जनता की समस्याओं का समाधान होना ही चाहिए। लेकिन असली ट्विस्ट तो इसके बाद शुरू होता है!

पीएम आवास योजना में गड़बड़ी और ठेकेदारों पर FIR

अब ज़रा रुख करते हैं दूसरी खबर की तरफ। मुद्दा है गरीबों के सपनों का आशियाना—प्रधानमंत्री आवास योजना और जनमन आवास योजना।

उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि गरीबों के हक की राशि का दुरुपयोग कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कबीरधाम जिले के विकासखंड बोड़ला के अंतर्गत, विशेष पिछड़ी जनजाति (बैगा जनजाति) के 9 हितग्राहियों से आवास निर्माण के नाम पर 5 लाख 9 हजार रुपए हड़प लिए गए। और इसके बाद क्या हुआ? प्रशासन ने तुरंत दो अलग-अलग मामलों में ठेकेदारों के खिलाफ चिल्फी और तरेगांव जंगल थाने में एफआईआर दर्ज कर ली।

ठेकेदारों ने गड़बड़ी की, पैसा खाया, जेल जाने का रास्ता साफ हुआ—यह बिल्कुल सही कदम है। गरीबों के साथ धोखाधड़ी करने वालों को बख्शा नहीं जाना चाहिए।

मुख्य सवाल: क्या कलेक्टरों पर कार्रवाई के वक्त कांपते हैं हाथ?

अब असली और चुभने वाला सवाल उठता है!

जरा सोचिए—जब प्रधानमंत्री आवास योजना या सरकारी योजनाओं में इतनी बड़ी लापरवाही सामने आती है, तो क्या इसकी जिम्मेदारी सिर्फ एक ठेकेदार की होती है? क्या ज़मीन पर मॉनिटरिंग करने वाले प्रशासनिक अमले, यानी जिले के मुखिया 'कलेक्टर' की कोई जवाबदेही नहीं है?

मुख्यमंत्री जी ने पहले बहुत स्पष्ट घोषणा की थी कि अगर प्रधानमंत्री आवास योजना में गड़बड़ी हुई, तो सीधे कलेक्टर नपेंगे! लेकिन ज़रा हकीकत के आईने में देखिए—क्या किसी बड़े कलेक्टर पर आज तक कोई ठोस गाज गिरी? क्या बड़े अधिकारियों पर कार्रवाई करते समय शासन-प्रशासन के हाथ कांपने लगते हैं?

आज स्थिति यह है कि कई ऐसे विवादास्पद कलेक्टर और बड़े अधिकारी मलाईदार पदों पर आराम से बैठे हुए हैं। जब गलती होती है, तो ठीकरा फोड़ने के लिए हमेशा नीचे के मोहरों—यानी छोटे तहसीलदारों, बाबुओं या ठेकेदारों को चुन लिया जाता है।

इसे आप क्या कहेंगे? क्या यही है वह पुरानी कहावत—"छोटों को डांटा, बड़ों को बांटा"? या फिर कहें कि "छोटों को प्रताड़ना, बड़े को गोद में बिठाना"?

लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही सबसे ऊपर होती है। सीएम हेल्पलाइन या पीएम आवास योजना जैसी योजनाएं सीधे तौर पर जनता के विश्वास से जुड़ी हैं। अगर सरकार वाकई ज़ीरो टॉलरेंस की नीति पर चलना चाहती है, तो यह कार्रवाई सिर्फ नीचे के स्तर तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए। बड़ों को बचाना और छोटों को बलि का बकरा बनाना बंद होना चाहिए, तभी जाकर व्यवस्था में सुधार आ पाएगा।

छत्तीसगढ़ की संपदा की खुली डकैती!

 छत्तीसगढ़ की संपदा की खुली डकैती! बालको, FSNL, सेक्टर 9 अस्पताल के बाद अब BSP की बारी?


आज बात किसी एक कंपनी की नहीं, बात छत्तीसगढ़ के अस्तित्व की है! बात उस मिट्टी की है, जिसकी छाती चीरकर पूरे देश को लोहा, कोयला और एल्यूमीनियम मिला, और आज उसी माटी के स्वाभिमान को दिल्ली के हुक्मरानों द्वारा अपने पसंदीदा कॉरपोरेट मित्रों की झोली में परोसा जा रहा है!

सोचिए... पहले बालको को बेचा गया, भिलाई की फेरो स्क्रैप निगम लिमिटेड (FSNL) को बेचने का सौदा हुआ, भिलाई के जीवनदाता सेक्टर 9 अस्पताल तक को निजी हाथों में सौंपने की साजिश रची गई, और अब सीधी नज़र टिका दी गई है छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े गौरव—भिलाई इस्पात संयंत्र (BSP) पर!

क्या छत्तीसगढ़ सिर्फ कॉरपोरेट्स का 'शॉपिंग मॉल' बनकर रह गया है, जहाँ आओ, बोली लगाओ और राज्य की बेशकीमती संपदा को कौड़ियों के दाम खरीदकर ले जाओ?"

बालको से लेकर FSNL और सेक्टर 9 अस्पताल तक—बेचने की क्रोनोलॉजी समझिए!

"निजीकरण का यह खेल आज का नहीं है, यह एक सोची-समझी क्रोनोलॉजी है!

  1. पहला वार—BALCO पर: छत्तीसगढ़ के एल्यूमीनियम के नवरत्न 'बालको' को औने-पौने दामों में निजी कंपनी के हवाले कर दिया गया। वादा था कि रोजगार बढ़ेगा, विकास होगा! लेकिन क्या हुआ? स्थानीय युवाओं के हक और अधिकारों पर ताला लग गया।
  2. दूसरा वार—FSNL और सेक्टर 9 अस्पताल पर हमला: भिलाई में स्थित FSNL (फेरो स्क्रैप निगम लिमिटेड), जो देश के बड़े-बड़े स्टील प्लांटों का स्क्रैप प्रोसेस करके मुनाफा कमाती थी, उसे बेचने का षड्यंत्र रचा गया। और तो और, भिलाई के लाखों मजदूरों और आम जनता की सेहत का ख्याल रखने वाले ऐतिहासिक सेक्टर 9 अस्पताल तक को पीपीपी (PPP) मोड या निजी हाथों में सौंपने की सुगबुगाहट शुरू कर दी गई! जिस अस्पताल ने पीढ़ियों का इलाज किया, उसे भी मुनाफे का सौदा बना दिया गया!
  3. और अब तीसरा वार—भिलाई स्टील प्लांट (BSP): जी हाँ! भिलाई स्टील प्लांट सिर्फ ईंट-पत्थर या लोहे का ढांचा नहीं है, यह छत्तीसगढ़ का दिल है, देश का स्टील मैन्युफैक्चरिंग हब है! लेकिन अब इसकी जमीनों और इसकी संपदा पर देश के सबसे बड़े कॉरपोरेट घराने की सीधी नज़र पड़ चुकी है!"

भूपेश बघेल का तीखा प्रहार—"बीएसपी छत्तीसगढ़ की आत्मा है!"



"इस मामले पर छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सीधे केंद्र सरकार और उद्योगपतियों के गठजोड़ की धज्जियां उड़ाते हुए ट्वीट किया है। उन्होंने साफ-साफ शब्दों में लिखा है:

'पता चला है कि अडानी भिलाई इस्पात संयंत्र यानी हमारे बीएसपी को देखने आने वाले हैं। अडानी के बीएसपी आने का क्या मतलबहै समझ रहे हैं ना? इसका मतलब ये है कि देश बेचने का अभियान चला रहे नरेंद्र मोदी जी की नज़र अब हमारे बीएसपी पर है। औरउनके प्रिय खरीदार मुआयना करने आ रहे हैं। मोदी जी समझ लें कि बीएसपी छत्तीसगढ़ की आत्मा है। और हम छत्तीसगढ़वासी इसेकिसी सूरत में बिकने नहीं देंगे। किसी भी सूरत में नहीं। यह बात छत्तीसगढ़ भाजपा के नेता भी समझ लें कि बीएसपी बिकाऊ नहीं है।'

दोस्तों! भूपेश बघेल का यह हमला सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं है। यह उस हर एक मजदूर, हर मरीज और हर छत्तीसगढ़िया का गुस्सा है, जिसकी कई पीढ़ियों ने भिलाई को खून-पसीने से सींचा है!"

छत्तीसगढ़ की खनिज संपदा की डकैती!


"अब सवाल उठता है कि ये उद्योगपति छत्तीसगढ़ पर ही आँखें क्यों गड़ाए बैठे हैं?

क्योंकि छत्तीसगढ़ की धरती के नीचे सोने का अंडा देने वाली मुर्गियां दबी हैं!

  • यहाँ का आयरन ओर (लोह अयस्क) दुनिया में सबसे बेहतरीन क्वालिटी का है।
  • यहाँ कोयला, लिथियम, बॉक्साइट, डोलोमाइट का अटूट खजाना है।
  • यहाँ की नदियां, जंगल और जमीन प्रकृति का अनमोल उपहार हैं।

जब आप बीएसपी, उसकी इकाइयों या उसके अस्पतालों को बेचते हैं, तो आप सिर्फ एक फैक्ट्री नहीं बेचते! आप उस फैक्ट्री के साथ मिलने वाली हजारों एकड़ की बेशकीमती जमीन, खानों के लीज और प्राकृतिक संसाधनों की चाबी भी उस कॉरपोरेट मालिक को सौंप देते हैं!"

आम जनता को क्या मिलेगा? सिर्फ बेरोजगारी और भुखमरी?

"केंद्र सरकार से हमारा सीधा सवाल है—

  • क्या गरीबों का इलाज करने वाले सेक्टर 9 जैसे अस्पतालों को भी उद्योगपतियों के हवाले करना ही आपका 'विकास' है?
  • जब सारी कंपनियां प्राइवेट हो जाएंगी, तो हमारे एससी, एसटी और ओबीसी भाइयों के आरक्षण का क्या होगा?
  • स्थानीय युवाओं को रोजगार की जगह क्या सिर्फ कॉरपोरेट का शोषण मिलेगा?

छत्तीसगढ़ की माटी से निकलने वाला लोहा पूरे देश का ढांचा खड़ा करता है, और उसी छत्तीसगढ़ के लोगों को अपने ही हक के लिए सड़कों पर उतरना पड़ रहा है!"

यह लड़ाई छत्तीसगढ़ के वजूद की है!

अब चुप रहने का समय नहीं बचा है! बालको बिका, FSNL की बोली लगी, सेक्टर 9 अस्पताल पर नजर पड़ी और अब अगर बीएसपी के अस्तित्व पर आंच आई, तो छत्तीसगढ़ की जनता खामोश नहीं बैठेगी!

भिलाई इस्पात संयंत्र और इसकी धरोहर छत्तीसगढ़ का स्वाभिमान है, और यह किसी कॉरपोरेट घराने की जागीर नहीं बन सकता!

न्याय मांगने गए बच्चों पर अधिकारी की धौंस!"

  "बिलासपुर कलेक्ट्रेट में असंवेदनशीलता: न्याय मांगने गए बच्चों पर अधिकारी की धौंस!"



"क्या इस देश में मासूम बच्चों का रोना, उनकी तकलीफें और उनका न्याय मांगना गुनाह हो गया है? क्या सरकारी कुर्सियों पर बैठे अधिकारी इतने अंधे और बहरे हो चुके हैं कि उन्हें स्कूली बच्चों का भविष्य नहीं, बल्कि सिर्फ अपना अहंकार दिखाई देता है?

तस्वीरें देखिए आपकी स्क्रीन पर! बिलासपुर कलेक्ट्रेट का वह शर्मनाक नजारा, जहां सरकारी स्कूलों के बे-हाल बच्चे, अपनी बदकिस्मती का रोना रोने और न्याय की गुहार लगाने पहुंचे थे... लेकिन बदले में क्या मिला? मिला अधिकारियों का रौब, धमकी और उनका घमंड!

आज इस वीडियो में हम पर्दाफाश करेंगे उस सिस्टम का जो बच्चों का भविष्य खा रहा है, और उन अधिकारियों का जो अन्नदाता या जनसेवक होने का ढोंग तो करते हैं, लेकिन मासूम बच्चों को डराने से भी बाज नहीं आते!"

बैकग्राउंड और ग्राउंड रियलिटी: क्या है स्कूलों का हाल?]


"जरा सोचिए, जिन बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए, जो देश का भविष्य हैं, वो आज कलेक्ट्रेट की दहलीज पर क्यों भटक रहे हैं? वजह दिल दहला देने वाली है:

  • शिक्षकों की भारी कमी: स्कूलों में पढ़ाने के लिए टीचर तक नहीं हैं, आखिर बच्चे पढ़ाई करें तो कैसे?
  • ज़हरीला और कीड़ेयुक्त मिड-डे मील: बच्चों को जो मध्याह्न भोजन (मिड-डे मील) मिल रहा है, वो पोषण देने के बजाय उनकी जान ले रहा है - खाने में कीड़े निकल रहे हैं!
  • बदहाल बुनियादी ढांचा: स्कूल के भवन जर्जर हो चुके हैं, सिर पर छत गिरने का खतरा मंडरा रहा है। स्कूलों में शौचालय तक नहीं हैं और बाउंड्री वॉल न होने के कारण सुरक्षा का भारी संकट है।"

प्रशासनिक संवेदनहीनता: जब बच्चे पहुंचे शिकायत लेकर

"जब सिस्टम के इन नाकारा तरीकों से तंग आकर ये मासूम बच्चे अपनी शिकायत लेकर बिलासपुर कलेक्ट्रेट पहुंचे, तो इनकी सुनने के बजाय नए अधिकारियों ने इन्हें डराना-धमकाना शुरू कर दिया।

अरे शर्म आनी चाहिए ऐसे प्रशासनिक अमले को! जो बच्चे अपनी किताबों की जगह कलेक्ट्रेट के फर्श पर न्याय मांगने आएं, उन्हें न्याय देने के बजाय आप उन्हें अपनी धौंस दिखा रहे हैं? क्या इसलिए बैठाया गया है आपको उस कुर्सी पर?"

पुराना इतिहास और सिस्टम का दोहरा रवैया


"और ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है, दोस्तों! ये कोई छिटपुट घटना नहीं है, बल्कि इस बीमार व्यवस्था का एक पुराना और दर्दनाक इतिहास रहा है। याद कीजिए, थोड़े दिन पहले भी ऐसा ही एक वाकया हुआ था, जब एक रोती हुई बच्ची कलेक्ट्रेट से बाहर निकली थी — उस प्रशासनिक अधिकारी की संवेदनहीनता इतनी बढ़ गई थी कि बाद में उसे निलंबित करना पड़ा था। इतना ही नहीं, जब वही बच्चियां अपनी मांगों को लेकर धरने पर बैठी थीं, तब भी एसडीएम मैडम ने उन्हें कैसे 'चमकाया' था, कैसे डराया था, ये किसी से छिपा नहीं है!

मतलब साफ है—साहेब लोग अपनी गलतियां सुधारने के बजाय, बच्चों की आवाज को कुचलना चाहते हैं।"


"आज सवाल सिर्फ बिलासपुर का नहीं है, सवाल पूरे छत्तीसगढ़ और देश की शिक्षा व्यवस्था का है। क्या हमारे बच्चे अब इतने लाचार हो गए हैं कि वे अपना हक मांगेंगे तो उन्हें अधिकारियों की डांट और धौंस सुननी पड़ेगी?

मैं आपसे पूछता हूँ—क्या इन अधिकारियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई नहीं होनी चाहिए? क्या इन बच्चों को उनका हक नहीं मिलना चाहिए?

शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

₹2,500 करोड़ का सिकासार टेंडर विवाद

  ₹2,500 करोड़ का सिकासार टेंडर विवाद: बड़ा सवाल या सिर्फ प्रशासनिक फैसला?



जब 2,500 करोड़ रुपये का सरकारी प्रोजेक्ट सामने आता है, तो वह सिर्फ सीमेंट, गिट्टी या पाइपलाइन का मामला नहीं रहता... वह जनता के टैक्स के पैसे का मामला होता है!

छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग में इन दिनों ₹2,524 करोड़ से ज़्यादा का एक टेंडर सुर्खियों में है। सिकासार से कोडर जलाशय लिंक नहर परियोजना!

मई में टेंडर निकलता है, जून में प्रक्रिया आगे बढ़ती है और जुलाई के आखिरी हफ्ते में 'दिलीप बिल्डकॉन' यानी DBL को L-1 बिडर घोषित कर दिया जाता है।

पहली नज़र में यह एक सामान्य सरकारी प्रक्रिया दिखती है। लेकिन जब इस पूरे मामले के पन्नों को पलटते हैं, तो कई ऐसे सवाल खड़े होते हैं जिन्हें लेकर अब राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में सरकार को घेरा जा रहा है!

क्या इस मेगा टेंडर में नियमों के खेल हुए? क्या शुद्धि-पत्र (Corrigendum) का इस्तेमाल प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए हुआ या किसी को फ़ायदा पहुँचाने के लिए? और सबसे बड़ा सवाल—जब विरोधी ठेकेदारों ने समय बढ़ाने की मांग की, तो सरकार ने इतनी जल्दीबाज़ी क्यों दिखाई?

आज के इस वीडियो में हम इस 2,500 करोड़ रुपये के टेंडर खेल की पूरी इनसाइड स्टोरी आपके सामने रखेंगे!"


"सबसे पहले आसान भाषा में समझिए कि यह प्रोजेक्ट क्या है।

पैरी परियोजना के तहत सिकासार जलाशय से कोडर जलाशय तक एक बड़ी लिंक नहर और पाइपलाइन बिछाई जानी है।

  • लागत: ₹2,524.32 करोड़ (बिना GST के)।
  • समय सीमा: 30 महीने।
  • काम: पाइपलाइन बिछाना, टेस्टिंग, कमीशनिंग और अगले 5 साल तक इसका मेंटेनेंस (O&M)।

यह प्रोजेक्ट छत्तीसगढ़ के एक बड़े हिस्से के किसानों और सिंचाई व्यवस्था के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि प्रोजेक्ट की ज़रूरत है।

लेकिन सवाल प्रोजेक्ट की नीयत पर नहीं, टेंडर की प्रक्रिया पर उठ रहे हैं!"

विवाद की असली जड़ - 'शुद्धि-पत्र' का खेल 

"अब आते हैं विवाद की असली क्रोनोलॉजी पर।

मई 2026 में टेंडर जारी होता है। 15 जून तक बोली लगाने की तारीख तय की जाती है। लेकिन इस बीच जल संसाधन विभाग की तरफ से जारी होते हैं कई 'शुद्धि-पत्र' यानी Corrigendum!

अब आप पूछेंगे कि Corrigendum क्या होता है? साधारण शब्दों में, जब टेंडर की शर्तों या नियमों में कोई बदलाव या संशोधन करना होता है, तो विभाग शुद्धि-पत्र जारी करता है।

लेकिन आरोप क्या हैं? आरोप यह लग रहे हैं कि प्री-बिड मीटिंग के बाद पात्रता (Eligibility) और तकनीकी शर्तों में ऐसे संशोधन किए गए, जिससे कई स्थानीय और मंझे हुए ठेकेदारों के समीकरण बिगड़ गए।

जब नियमों में बदलाव हुआ, तो बोली लगाने वाली कंपनियों ने मांग की कि उन्हें नए नियमों के अनुसार कागजात तैयार करने के लिए अतिरिक्त समय (Extension of time) दिया जाए।

लेकिन आरोप है कि समय बढ़ाने की मांग को नज़रअंदाज़ कर दिया गया!

यहाँ सवाल उठता है—इतने बड़े ₹2,500 करोड़ के प्रोजेक्ट में आखिर इतनी हड़बड़ी क्यों? अगर शर्तें बदली गईं, तो प्रतिस्पर्धा (Competition) को बढ़ाने के लिए extra time देने में क्या हर्ज था?"

कोर्ट की दहलीज तक पहुँचा मामला

"बात सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं रही। मामला छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय तक पहुँचा। M/s Shiv Shakti Construction Company जैसी संस्थाओं ने इस प्रक्रिया को चुनौती दी।

अदालत में सरकार और विभाग का अपना तर्क था। सरकार ने कहा कि शुद्धि-पत्र जारी करना एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है और प्रोजेक्ट की जनहित में urgency को देखते हुए टेंडर समय पर पूरा कराना ज़रूरी था।

कानूनी तौर पर कोर्ट ने माना कि प्रक्रियात्मक संशोधनों में कोई सीधी अवैधता नहीं है, इसलिए टेंडर प्रक्रिया आगे बढ़ी।

लेकिन दोस्तों, 'कानूनी रूप से सही होना' और 'प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता होना'—इन दोनों बातों में बहुत फर्क होता है!

जनता का सवाल कानून की बारीकियों से परे यह है कि क्या ₹2,500 करोड़ का काम ऐसा माहौल बनाकर दिया गया जहाँ सिर्फ गिनी-चुनी बड़ी जॉइंट वेंचर कंपनियां ही रेस में टिक सकें?"


"25 जून को टेक्निकल और फाइनेंशियल बिड खुलती हैं। और 27-28 जुलाई के आसपास विभाग आखिरकार दिलीप बिल्डकॉन (DBL) के जॉइंट वेंचर को L-1 बिडर घोषित कर देता है।

28 जुलाई को कंपनी बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) को आधिकारिक जानकारी देती है कि उन्हें छत्तीसगढ़ सरकार से ₹2,524 करोड़ का यह मेगा प्रोजेक्ट मिल चुका है।

अब जरा पूरे चक्र को देखिए: मई में टेंडर → जून में संशोधन और आपत्तियां → जुलाई के अंत में L-1 का ऐलान!

जब विपक्ष इस मामले में सरकार की पारदर्शी कार्यशैली पर सवाल उठाता है, तो सरकार का 

जवाब होता है 'सब नियम के तहत हुआ है'। लेकिन विपक्ष का कहना है कि नियमों को इस तरह मोड़ा गया कि मनचाही कंपनी फिट बैठ जाए!"


"आज छत्तीसगढ़ की जनता

 और करदाता के तौर पर हमें सरकार और प्रशासन से 3 सीधे सवाल पूछने होंगे:

  1. पहला सवाल: यदि टेंडर में संशोधन किए गए, तो अन्य प्रतिस्पर्धी कंपनियों को तैयारी का पूरा समय देने से मना क्यों किया गया?
  2. दूसरा सवाल: क्या इतने बड़े टेंडर में प्रतिस्पर्धा सीमित होने से राज्य के खजाने को नुकसान नहीं होता?
  3. तीसरा और सबसे अहम सवाल: जल संसाधन विभाग में बड़े टेंडरों को लेकर बार-बार उठने वाले विवादों पर सरकार की चुप्पी का क्या मतलब निकाला जाए?

विकास होना चाहिए, सिकासार का पानी कोडर तक पहुँचना चाहिए, इसमें किसी को एतराज नहीं है। लेकिन विकास का रास्ता पारदर्शिता से होकर जाना चाहिए, न कि संदिग्ध प्रक्रियाओं से!

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

क्यों फेल होने लगा बीजेपी आईटी सेल

 क्यों फेल होने लगा बीजेपी आईटी सेल 


आज हम बात करेंगे उस सिस्टम की, जिसे कभी देश का सबसे बड़ा 'ओपिनियन मेकर' कहा जाता था—बीजेपी का आईटी सेल और तथाकथित वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी।

सालों तक एक ही नैरेटिव को बार-बार दोहराकर जनता की सोच बदलने का दावा करने वाला यह तंत्र... आखिर आज ज़मीन पर क्यों धड़ाम हो गया? क्यों फेक न्यूज़, ट्रोलिंग और मैन्युफैक्चर्ड ट्रेंड्स की धार अब कुंद पड़ चुकी है?

आज जब 'जैन जी' (Gen Z)—यानी हमारी युवा पीढ़ी—डिजिटल दुनिया के केंद्र में आई है, तो इस आईटी सेल के सारे पुराने पैंतरे पस्त क्यों हो गए? आइए, इसे 5 बड़े कारणों से समझते हैं।"


पुराने दौर में वॉट्सऐप ग्रुप पर आए किसी भी मैसेज को लोग सच मानकर फॉरवर्ड कर दिया करते थे। लेकिन 'जैन जी' इंटरनेट पर पली-बढ़ी पीढ़ी है।

  • वे किसी फॉरवर्ड किए गए मैसेज पर आंख बंद करके भरोसा नहीं करते।
  • वे तुरंत गूगल (Google), ऑल्ट न्यूज़, या इंडिपेंडेंट डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर जाकर फैक्ट-चेक (Fact-Check) करते हैं।
  • अगर आईटी सेल कोई फ़ेक वीडियो या अधूरा बयान चलाता है, तो यह युवा पीढ़ी 5 मिनट के भीतर उसका 'ओरिजिनल अनकट वीडियो' निकालकर कमेंट सेक्शन में पोस्ट कर देती है। यानी झूठ की उम्र अब सिर्फ कुछ मिनटों की रह गई है।"

"दूसरा कारण—नैरेटिव की थकान!

आईटी सेल की सबसे बड़ी ताकत थी उनका 'कॉपी-पेस्ट मॉडल'। 10,000 हैंडल्स से एक ही लाइन ट्वीट करवाना। शुरुआत में तो यह प्रभावशाली लगा, लेकिन अब जनता इसका पैटर्न समझ चुकी है। जब भी कोई बड़ा मुद्दा आता है—चाहे वो बेरोजगारी हो, महंगाई हो या परीक्षा लीक का मामला—आईटी सेल का जवाब वही पुराना और घिसा-पिटा होता है। जनता अब समझ गई है कि यह स्वतःस्फूर्त जनआक्रोश नहीं, बल्कि स्पॉन्सर टूल (Paid Strategy) है।"

"तीसरा कारण—ज़मीनी सच्चाई और डिजिटल नैरेटिव का फासला।

आईटी सेल चाहे कितना भी ट्रेंड चला ले कि 'सब ठीक है', लेकिन जब युवा पेपर लीक की वजह से सड़कों पर आता है, जब डिग्री हाथ में होने के बावजूद नौकरी नहीं मिलती, तो वॉट्सऐप का कोई मैसेज उसकी जेब का खालीपन नहीं भर सकता। 'परसेप्शन मैनेजमेंट' तब तक काम करता है जब तक पेट भरा हो, जब मुद्दे रोज़गार और अस्तित्व के हों, तो आईटी सेल के मीम्स (Memes) फेल हो जाते हैं।"

"चौथा कारण—अल्टरनेटिव मीडिया का उभार।

पहले मुख्यधारा (Mainstream) मीडिया में जो दिखाया जाता था, वही सच मान लिया जाता था। लेकिन आज यूट्यूब, इंस्टाग्राम और डिजिटल पोर्टल्स पर स्वतंत्र पत्रकारों और क्रिएटर्स का एक बड़ा वर्ग खड़ा हो चुका है। आईटी सेल के ट्रोल्स किसी एक एंकर को डरा सकते हैं, लेकिन इंटरनेट पर मौजूद लाखों जागरूक क्रिएटर्स को एक साथ चुप नहीं करा सकते। अब हर दूसरे दिन कोई न कोई यूट्यूबर इनके फर्जी दावों की पोल खोल देता है।"

प्रचार (Propaganda) की एक सीमा होती है, लेकिन सत्य की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती।

आईटी सेल और वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी का मॉडल इसलिए फेल हो रहा है क्योंकि उन्होंने जनता की समझदारी को बहुत कम आंका। 'जैन जी' और आज का जागरूक नागरिक अब प्रोपेगैंडा और ग्राउंड रियलिटी का फर्क अच्छी तरह समझता है।