विकास का ख़ूनी इतिहास और 'शांति के टापू' में सुलगते सवाल
सूरजपुर भूमि अधिग्रहण संघर्ष और राज्य-जनता का बढ़ता टकराव
प्रस्तावना: खाकी की ढाल और बंजर होते सपने
छत्तीसगढ़ को देश में सदैव ‘शांति का टापू’ और अपार प्राकृतिक संपदाओं एवं धन-धान्य से परिपूर्ण राज्य के रूप में देखा गया है। लेकिन जब विकास की परिभाषा केवल खदानों की खुदाई और कॉर्पोरेट घरानों के मुनाफे तक सीमित हो जाए, तो मिट्टी की खुशबू बारूद और आंसुओं के धुएं में बदलने लगती है।
हाल ही में सूरजपुर जिले के धर्मपुर गांव [00:35] में जो कुछ भी हुआ, उसने एक बार फिर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और आम नागरिकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि "क्या विकास की अंतिम कीमत केवल किसान, मजदूर और ग्रामीण ही भुगतेंगे?"
ग्राउंड ज़ीरो: धर्मपुर में आखिर क्या हुआ?
सूरजपुर के धर्मपुर क्षेत्र में कोल इंडिया की सहायक कंपनी SECL (साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड) [03:34] को कोयला खदान विस्तार के लिए भूमि आवंटित की गई है। शुक्रवार की सुबह जब भारी पुलिस बल के साथ प्रशासन भूमि का अधिग्रहण करने पहुंचा, तो ग्रामीणों का सब्र का बांध टूट गया।
ग्रामीणों का आरोप है कि:
1. उचित मुआवजे का अभाव: पुश्तैनी जमीनों के एवज में मिलने वाली राशि अत्यंत अपर्याप्त है [03:55]।
2. रोजगार की अनिश्चितता: जिनकी जमीनें ली जा रही हैं, उनके परिजनों को स्थायी नौकरी देने पर कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया जा रहा [04:02]।
3. फर्जी ग्राम सभाएं: 'पेसा कानून' (PESA Act) और पंचायती राज अधिनियम को ताक पर रखकर कथित तौर पर कागजों में ही अनुमोदन की खानापूर्ति कर ली गई [06:14]।
बातचीत से शुरू हुई चर्चा देखते ही देखते हिंसक टकराव में बदल गई। पुलिस द्वारा किए गए लाठीचार्ज के जवाब में ग्रामीणों ने गुलेल और पत्थरों से मोर्चा खोल दिया [04:58]। इस हिंसक भिड़ंत में एक डीएसपी सहित लगभग दो दर्जन पुलिसकर्मी घायल हुए [00:44], वहीं दूसरी ओर पुलिस की लाठियों के शिकार तीन दर्जन से अधिक ग्रामीण (महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग) हुए [03:24]।
संवैधानिक अधिकार बनाम सत्ता की लाठी
भारतीय संविधान, पंचायती राज व्यवस्था और पेसा (PESA) कानून स्पष्ट रूप से यह अधिकार देते हैं कि किसी भी ग्रामीण या अनुसूचित क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण से पूर्व पारदर्शी तरीके से 'ग्राम सभा' की सहमति अत्यंत आवश्यक है [06:14]।
परंतु जब स्थानीय प्रशासन और जिला पुलिस बल उद्योगपतियों के हितों के संरक्षण के लिए ढाल बनकर खड़े होने लगते हैं, तब आम जनता का कानून-व्यवस्था और शासन से भरोसा उठने लगता है [01:24]। धर्मपुर की यह घटना इस बात की बानगी है कि जब पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोई गई जमीन को जबरन छीनने की कोशिश की जाती है, तो शांत और सीधे-साधे ग्रामीणों का गुस्सा आक्रोश में बदल जाता है।
खुफिया तंत्र की नाकामी और पूर्व चेतावनियां
धर्मपुर की हिंसक घटना कोई अचानक घटी इत्तेफाक की बात नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक उदासीनता और खुफिया तंत्र (Intelligence Failure) की घोर विफलता का नतीजा है [05:59]। इससे पूर्व रायगढ़ जिले के तमनार क्षेत्र में भी भूमि अधिग्रहण को लेकर इसी तरह का उग्र जनाक्रोश देखा जा चुका है [06:41]।
जगह-जगह हो रहे ये हिंसक टकराव इस बात की सीधी चेतावनी हैं कि अगर सरकार ने अपनी नीतियों और नियत में बदलाव नहीं किया, तो यह असंतोष किसी एक जिले तक सीमित नहीं रहेगा।
संपादकीय दृष्टिकोण: उठते यक्ष प्रश्न
1. तनख्वाह जनता की, वफादारी कॉर्पोरेट की?
जिस पुलिस बल को जनता की जान-माल की रक्षा के लिए करदाताओं के पैसों से वेतन मिलता है, वह सत्ता के इशारे पर ग्रामीणों पर लाठियां भांजने के लिए क्यों मजबूर की जाती है? [01:24]
2. उद्योगपतियों का हित या किसान का वजूद?
बड़ी-बड़ी चुनावी सभाओं में "किसान हित" और "अन्नदाता" के नारे लगाने वाली सरकारें आखिर फैसला लेते वक्त उद्योगपतियों के पक्ष में क्यों खड़ी नजर आती हैं? [01:49]
3. विकास का असली हकदार कौन?
यदि विकास की परिपरिभाषा में अपनी जल, जंगल और जमीन गंवाने वाला मूल निवासी ही बेघर और घायल हो जाए, तो ऐसा विकास किसके लिए है?
निष्कर्ष
सूरजपुर का धर्मपुर गांव आज शांति और न्याय की गुहार लगा रहा है। छत्तीसगढ़ की जनता अपनी सहनशीलता और शांतिप्रिय स्वभाव के लिए जानी जाती है, लेकिन शांति को कमजोरी समझ लेना किसी भी सरकार के लिए घातक साबित हो सकता है। सरकार और प्रशासन को बल प्रयोग का रास्ता छोड़कर संवाद, पारदर्शिता और न्यायसंगत पुनर्वास नीति का मार्ग अपनाना होगा, वरना विकास की यह होड़ राज्य के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर देगी।


