मंगलवार, 11 अगस्त 2026

विकास का ख़ूनी इतिहास और 'शांति के टापू' में सुलगते सवाल

 विकास का ख़ूनी इतिहास और 'शांति के टापू' में सुलगते सवाल



सूरजपुर भूमि अधिग्रहण संघर्ष और राज्य-जनता का बढ़ता टकराव

प्रस्तावना: खाकी की ढाल और बंजर होते सपने

छत्तीसगढ़ को देश में सदैव ‘शांति का टापू’ और अपार प्राकृतिक संपदाओं एवं धन-धान्य से परिपूर्ण राज्य के रूप में देखा गया है। लेकिन जब विकास की परिभाषा केवल खदानों की खुदाई और कॉर्पोरेट घरानों के मुनाफे तक सीमित हो जाए, तो मिट्टी की खुशबू बारूद और आंसुओं के धुएं में बदलने लगती है।

हाल ही में सूरजपुर जिले के धर्मपुर गांव [00:35] में जो कुछ भी हुआ, उसने एक बार फिर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और आम नागरिकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि "क्या विकास की अंतिम कीमत केवल किसान, मजदूर और ग्रामीण ही भुगतेंगे?"

ग्राउंड ज़ीरो: धर्मपुर में आखिर क्या हुआ?

सूरजपुर के धर्मपुर क्षेत्र में कोल इंडिया की सहायक कंपनी SECL (साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड) [03:34] को कोयला खदान विस्तार के लिए भूमि आवंटित की गई है। शुक्रवार की सुबह जब भारी पुलिस बल के साथ प्रशासन भूमि का अधिग्रहण करने पहुंचा, तो ग्रामीणों का सब्र का बांध टूट गया।

ग्रामीणों का आरोप है कि:

1. उचित मुआवजे का अभाव: पुश्तैनी जमीनों के एवज में मिलने वाली राशि अत्यंत अपर्याप्त है [03:55]।

2. रोजगार की अनिश्चितता: जिनकी जमीनें ली जा रही हैं, उनके परिजनों को स्थायी नौकरी देने पर कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया जा रहा [04:02]।

3. फर्जी ग्राम सभाएं: 'पेसा कानून' (PESA Act) और पंचायती राज अधिनियम को ताक पर रखकर कथित तौर पर कागजों में ही अनुमोदन की खानापूर्ति कर ली गई [06:14]।

बातचीत से शुरू हुई चर्चा देखते ही देखते हिंसक टकराव में बदल गई। पुलिस द्वारा किए गए लाठीचार्ज के जवाब में ग्रामीणों ने गुलेल और पत्थरों से मोर्चा खोल दिया [04:58]। इस हिंसक भिड़ंत में एक डीएसपी सहित लगभग दो दर्जन पुलिसकर्मी घायल हुए [00:44], वहीं दूसरी ओर पुलिस की लाठियों के शिकार तीन दर्जन से अधिक ग्रामीण (महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग) हुए [03:24]।

संवैधानिक अधिकार बनाम सत्ता की लाठी

भारतीय संविधान, पंचायती राज व्यवस्था और पेसा (PESA) कानून स्पष्ट रूप से यह अधिकार देते हैं कि किसी भी ग्रामीण या अनुसूचित क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण से पूर्व पारदर्शी तरीके से 'ग्राम सभा' की सहमति अत्यंत आवश्यक है [06:14]।

परंतु जब स्थानीय प्रशासन और जिला पुलिस बल उद्योगपतियों के हितों के संरक्षण के लिए ढाल बनकर खड़े होने लगते हैं, तब आम जनता का कानून-व्यवस्था और शासन से भरोसा उठने लगता है [01:24]। धर्मपुर की यह घटना इस बात की बानगी है कि जब पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोई गई जमीन को जबरन छीनने की कोशिश की जाती है, तो शांत और सीधे-साधे ग्रामीणों का गुस्सा आक्रोश में बदल जाता है।

खुफिया तंत्र की नाकामी और पूर्व चेतावनियां

धर्मपुर की हिंसक घटना कोई अचानक घटी इत्तेफाक की बात नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक उदासीनता और खुफिया तंत्र (Intelligence Failure) की घोर विफलता का नतीजा है [05:59]। इससे पूर्व रायगढ़ जिले के तमनार क्षेत्र में भी भूमि अधिग्रहण को लेकर इसी तरह का उग्र जनाक्रोश देखा जा चुका है [06:41]।

जगह-जगह हो रहे ये हिंसक टकराव इस बात की सीधी चेतावनी हैं कि अगर सरकार ने अपनी नीतियों और नियत में बदलाव नहीं किया, तो यह असंतोष किसी एक जिले तक सीमित नहीं रहेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण: उठते यक्ष प्रश्न

1. तनख्वाह जनता की, वफादारी कॉर्पोरेट की?

जिस पुलिस बल को जनता की जान-माल की रक्षा के लिए करदाताओं के पैसों से वेतन मिलता है, वह सत्ता के इशारे पर ग्रामीणों पर लाठियां भांजने के लिए क्यों मजबूर की जाती है? [01:24]

2. उद्योगपतियों का हित या किसान का वजूद?

बड़ी-बड़ी चुनावी सभाओं में "किसान हित" और "अन्नदाता" के नारे लगाने वाली सरकारें आखिर फैसला लेते वक्त उद्योगपतियों के पक्ष में क्यों खड़ी नजर आती हैं? [01:49]

3. विकास का असली हकदार कौन?

यदि विकास की परिपरिभाषा में अपनी जल, जंगल और जमीन गंवाने वाला मूल निवासी ही बेघर और घायल हो जाए, तो ऐसा विकास किसके लिए है?

निष्कर्ष

सूरजपुर का धर्मपुर गांव आज शांति और न्याय की गुहार लगा रहा है। छत्तीसगढ़ की जनता अपनी सहनशीलता और शांतिप्रिय स्वभाव के लिए जानी जाती है, लेकिन शांति को कमजोरी समझ लेना किसी भी सरकार के लिए घातक साबित हो सकता है। सरकार और प्रशासन को बल प्रयोग का रास्ता छोड़कर संवाद, पारदर्शिता और न्यायसंगत पुनर्वास नीति का मार्ग अपनाना होगा, वरना विकास की यह होड़ राज्य के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर देगी।

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सोमवार, 10 अगस्त 2026

सत्ता, पूंजी और 'अज्ञात' की ढाल

  सत्ता, पूंजी और 'अज्ञात' की ढाल


तिलदा-नेवरा से हसदेव तक: फर्जी ग्राम सभाओं का खेल और लीपापोती का पूरा सच

 कार्रवाई पंजी की दो पंक्तियाँ और लोकतंत्र पर डकैती: जब उद्योगपतियों को बचाने के लिए फाइलों में सिमट गया सच!

: विकास का ढोंग और कागजी लोकतंत्र

"मुँह में राम, बगल में छुरी" और "सैंया भय कोतवाल, तो डर काहे का!"—ये दो मुहावरे आज छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था पर सटीक बैठते हैं। ग्रामीण भारत में लोकतंत्र की सबसे प्राथमिक और पवित्र इकाई 'ग्राम सभा' को माना गया है, जिसे भारतीय संविधान और पंचायती राज अधिनियम के तहत स्थानीय विकास व औद्योगिक अनुमति का अधिकार प्राप्त है। लेकिन जब भारी-भरकम पूंजी और औद्योगिक हित सामने आते हैं, तो इस संवैधानिक अधिकार को एक बंद कमरे में कलम चलाकर कुचल दिया जाता है।

राजधानी रायपुर से महज़ कुछ दूरी पर स्थित तिलदा-नेवरा क्षेत्र का हालिया मामला इसका जीता-जागता प्रमाण है। कागजों पर एक 'जादुई ग्राम सभा' आयोजित कर ली गई, जिसकी जानकारी खुद गाँव वालों को तब हुई जब उद्योगपति जमीन और पर्यावरण मंजूरी का दावा करने लगे। यह केवल तिलदा का मामला नहीं है, बल्कि रायगढ़, हसदेव और बस्तर से लेकर पूरे प्रदेश में फैल चुके उस खतरनाक ढर्रे की मिसाल है, जहाँ जल-जंगल-जमीन की बलि चढ़ाने के लिए 'फर्जी ग्राम सभा' का शॉर्टकट अपनाया जा रहा है।

2. तिलदा का खेल: दो बड़े प्रोजेक्ट और कागजी हेरफेर

तिलदा-नेवरा क्षेत्र में दो बड़े और भारी प्रदूषण फैलाने वाले औद्योगिक प्रोजेक्ट्स को स्थापित करने की तैयारी चल रही थी:

1. ग्राम अल्दा: यहाँ 'बालाजी स्पंज एंड आयरन लिमिटेड' के विस्तार की योजना थी, जिसके पीछे राम प्रकाश गोयल, नवीन गोयल और प्रवीण गोयल जैसे बड़े औद्योगिक नाम जुड़े हैं।

2. ग्राम देवरी: यहाँ 'अग्रसेन स्टील एंड पावर लिमिटेड' द्वारा भारी-भरकम यूनिट लगाने की तैयारी थी, जिसके प्रमोटर्स बाबूलाल अग्रवाल और अमित अग्रवाल हैं।

नियमानुसार, किसी भी ग्रामीण इलाके में इस तरह के भारी उद्योग/प्रदूषणकारी संयंत्र लगाने से पहले स्थानीय ग्राम सभा से लिखित अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) लेना अनिवार्य है। ग्रामीणों को यह तय करने का अधिकार है कि उन्हें अपनी कृषि भूमि, पर्यावरण और स्वास्थ्य की कीमत पर उद्योग चाहिए या नहीं।

लेकिन आरोपों के मुताबिक, दोनों उद्योगपतियों ने जन-सुनवाई और जन-सहमति के लंबे रास्ते को दरकिनार कर 'शॉर्टकट' चुना। ग्राम सभा की कार्यवाही पंजी (Proceeding Register) में चालाकी से दो लाइनें जोड़ दी गईं और यह दिखा दिया गया कि ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से उद्योगों को एनओसी दे दी है। इसी फर्जी कागजी सहमति के आधार पर राज्य और केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में पर्यावरण मंजूरी की फाइलें दौड़ने लगीं।

3. तीन-सदस्यीय जांच रिपोर्ट का सच: खुलासा तो हुआ, पर कार्रवाई गायब

जब ग्रामीणों को इस धोखाधड़ी की भनक लगी, तो उन्होंने चुप रहने के बजाय विरोध का बिगुल फूंक दिया। पुलिस-प्रशासन के भारी दबाव और कुछ ग्रामीणों की गिरफ्तारियों के बावजूद जन-आंदोलन ठंडा नहीं पड़ा।

बढ़ते बवाल को देखते हुए प्रशासन को मजबूरन तीन-सदस्यीय जांच समिति का गठन करना पड़ा, जिसमें:

 जनपद सीईओ

 संबंधित क्षेत्र के तहसीलदार

 नायब तहसीलदार

शामिल थे। इस जांच समिति ने जब मूल फाइलों और पंजी का अवलोकन किया, तो वे हैरान रह गए। 30 जून 2025 को सौंपी गई इस जांच रिपोर्ट में साफ हो गया कि संबंधित तारीखों में वैसी कोई ग्राम सभा आयोजित ही नहीं हुई थी जैसी फाइलों में दिखाई गई थी और रजिस्टर में बाद में दो पंक्तियाँ जोड़कर कूटरचना (Forgery) की गई थी।

4. जून 2025 से जून 2026: एक साल की लीपापोती और 'अज्ञात' की ढाल

सामान्य परिस्थितियों में, किसी सरकारी दस्तावेज में कूटरचना और धोखाधड़ी सिद्ध होने पर तत्काल जालसाजी और धोखाधड़ी की धाराओं के तहत नामजद एफआईआर दर्ज कर दोषियों को जेल भेजा जाना चाहिए था। लेकिन तिलदा मामले में उल्टी गंगा बहने लगी:

 रिपोर्ट आने के एक साल बाद तक चुप्पी: जून 2025 में जांच रिपोर्ट आने के बावजूद पूरे एक साल तक फाइल दबाकर रखी गई।

 'अज्ञात' के खिलाफ एफआईआर: जब ग्रामीणों का धरना-प्रदर्शन उग्र हुआ और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल समेत विपक्षी नेताओं ने गाँव में डेरा डालकर अल्टीमेटम दिया, तब जाकर 22 जून 2026 को पुलिस एफआईआर दर्ज करने पर सहमत हुई।

 राजनीतिक प्रशासनिक संरक्षण: एफआईआर तो दर्ज हुई, लेकिन उसमें उद्योगपतियों या जिम्मेदार अधिकारियों का नाम डालने के बजाय मामला "अज्ञात" के खिलाफ दर्ज कर दिया गया।

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस मामले में कंपनी के नाम, प्रमोटर्स के नाम, जांच समिति के दस्तखत और कूटरचना का तरीका पूरी तरह साफ है, उसमें आरोपी 'अज्ञात' कैसे हो सकता है? बिना उद्योगपतियों की मिलीभगत और शीर्ष राजनीतिक-प्रशासनिक शह के ग्राम सभा पंजी में दो पंक्तियाँ कौन जोड़ेगा? क्या इसमें उद्योग मंत्रालय, गृह मंत्रालय या स्थानीय प्रशासन की मौन सहमति शामिल है?

5. पर्यावरण मंत्रालय का ब्रेक और राज्य का पैटर्न

भले ही राज्य स्तर पर इस मामले को दबाने की कोशिशें हुईं, लेकिन जैसे ही फर्जी ग्राम सभा और कूटरचना का यह मामला केंद्रीय पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तक पहुँचा, केंद्रीय अधिकारियों ने फिलहाल पर्यावरण मंजूरी देने से साफ इनकार कर दिया और फाइल लौटा दी।

हालाँकि, केंद्रीय स्तर पर फाइल रुकने से खतरा टला नहीं है, क्योंकि छत्तीसगढ़ में यह कोई अकेला मामला नहीं है:

 हसदेव अरण्य: हसदेव के जंगलों में कोल खदानों को अनुमति दिलाने के लिए कई गांवों में फर्जी ग्राम सभा के प्रस्ताव पारित करने के गंभीर आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं।

 रायगढ़ औद्योगिक बेल्ट: रायगढ़ के वनांचल व ग्रामीण इलाकों में स्पंज आयरन और पावर प्लांटों के लिए जमीनों के अधिग्रहण में ग्राम सभाओं को दरकिनार करने की शिकायतें आम हैं।

 बस्तर: बस्तर में भी खदानों और औद्योगिक इकाइयों की स्थापना के दौरान ग्रामीणों और जल-जंगल-जमीन आंदोलनकारियों का मुख्य आरोप फर्जी एनओसी का ही रहा है।

6. निष्कर्ष: सवाल जो व्यवस्था से पूछे जाने चाहिए

तिलदा-नेवरा का यह मामला सिर्फ दो कंपनियों या दो गांवों का नहीं है; यह 'डबल इंजन' सरकार के काम करने के तरीके और लोकतंत्र के जमीनी ढाँचे पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।

1. यदि जांच समिति की रिपोर्ट में फर्जीवाड़ा साबित हो चुका है, तो एक साल बीत जाने के बाद भी नामजद गिरफ्तारियाँ क्यों नहीं हुईं?

2. 'अज्ञात' के नाम पर एफआईआर दर्ज करके किस-किस मंत्री या अधिकारी को बचाने की कोशिश हो रही है?

3. क्या औद्योगिक निवेश की आड़ में ग्रामीणों के संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों की इस तरह बलि दी जाती रहेगी?

जब तक फर्जी ग्राम सभा के इस पूरे नेक्सस (उद्योगपति-अधिकारी-नेता) पर सख्त नामजद आपराधिक कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह लड़ाई अधूरी है। लोकतंत्र की रक्षा कागजी दावों से नहीं, बल्कि दोषियों को सलाखों के पीछे भेजने से ही संभव होगी।

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रविवार, 9 अगस्त 2026

सत्ता की राजनीति, टूटते परिवार और सड़कों पर युवा आक्रोश

 सत्ता की राजनीति, टूटते परिवार और सड़कों पर युवा आक्रोश



जब घर के चिराग़ ही व्यवस्था से बग़ावत कर बैठें

राजनीति जब तक बैठकों, रैलियों और टीवी स्क्रीन तक सीमित रहती है, तब तक समाज उसे दूर से देखता है। लेकिन जब वही राजनीति घर के ड्राइंग रूम, रसोई और पारिवारिक रिश्तों के बीच दरार पैदा करने लगे, तो यह एक गंभीर सामाजिक संकट का संकेत होता है।

हाल ही में नीट (NEET) पेपर लीक और राष्ट्रीय परीक्षाओं में हुई अनियमितताओं के विरोध में राजधानी दिल्ली से लेकर राज्यों की राजधानियों तक छात्रों का बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ है। इस आंदोलन में सिर्फ़ व्यवस्था के ख़िलाफ़ आक्रोश ही नहीं दिख रहा, बल्कि पारिवारिक और वैचारिक ध्रुवीकरण का वह भयानक चेहरा भी सामने आया है जिसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की थी।

हमें अपना मुँह छुपाकर बोलना पड़ रहा है, हम घर से भागकर आए हैं। मेरे पिताजी और पूरा परिवार बीजेपी के नेता हैं, लेकिन हमें अपने ही घर में लड़ना पड़ रहा है..."

दिल्ली की सड़कों पर अपना चेहरा मास्क से ढके एक युवा छात्र के ये शब्द सिर्फ़ एक व्यक्ति का दर्द नहीं हैं, बल्कि यह उस पीढ़ी की आवाज़ है जो एक तरफ भविष्य की अनिश्चितता से जूझ रही है और दूसरी तरफ पारिवारिक प्राथमिकताओं व वैचारिक टकराव के चक्रव्यूह में फँसी हुई है।

1. पेपर लीक और भविष्य का अंधकार: युवाओं की लाचारी

छात्र आंदोलन का मूल कारण लगातार हो रहे पेपर लीक, परीक्षा प्रणाली में धाँधली और सरकारी नौकरियों की अनिश्चितता है।

 आंकड़े और आत्महत्याएं: विपक्षी दावों और आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में दर्जनों बार विभिन्न भर्ती व प्रवेश परीक्षाओं के पेपर लीक होने की घटनाएँ हुई हैं [04:39]।

 मानसिक तनाव: सालों-साल तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए पेपर निरस्त होना या परिणाम में गड़बड़ी की खबरें आना मानसिक रूप से तोड़ देने वाला होता है [04:50]। हालिया नीट विवाद के बाद कई निराशाजनक खबरें सामने आईं और युवाओं द्वारा उठाए गए आत्मघाती कदम इस संकट की विभीषिका को रेखांकित करते हैं [05:08]।

2. राजनीति का दोहरा चेहरा: ड्राइंग रूम तक पहुँची वैचारिक दरार

यह आंदोलन केवल प्रशासनिक विफलता का मामला नहीं रहा, बल्कि इसने सामाजिक और पारिवारिक संरचना पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

 घर के भीतर वैचारिक जंग: जब युवा अपने भविष्य, महंगाई और पेपर लीक पर सवाल उठाते हैं, तो कई बार उन्हें अपने ही घर के बड़ों या समाज द्वारा 'राजनीति से प्रेरित' या 'विपक्षी एजेंडे का हिस्सा' मान लिया जाता है।

 पहचान छुपाने की मजबूरी: आंदोलनकारी छात्रों का अपने ही परिजनों के राजनीतिक जुड़ाव से अलग हटकर सड़कों पर उतरना और पहचान छुपाने के लिए मास्क लगाना यह दर्शाता है कि संवाद के रास्ते बंद हो चुके हैं [07:09]।

3. शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की माँग और प्रशासनिक गतिरोध

छात्रों और विपक्षी दलों की प्रमुख माँग शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े को लेकर है [00:32]।

 आंदोलनकारियों का रुख: छात्रों का मानना है कि परीक्षा एजेंसियों की बारंबार विफलता की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए नेतृत्व को पद छोड़ना चाहिए।

 सत्ता पक्ष का पक्ष: सरकार का तर्क है कि वे पूरे मामले की निष्पक्ष जाँच करा रहे हैं और सुधारत्मक कदम उठाए जा रहे हैं। हालाँकि, विपक्ष का आरोप है कि आंदोलन को दबाने और भटकाने के लिए इसे 'विदेशी फंडिंग' या 'देशविरोधी साजिश' का रंग देने का प्रयास किया जाता है [00:21]।

4. राज्यों में आँच: छत्तीसगढ़ का राजनीतिक घमासान

नीट पेपर लीक और छात्र आंदोलन की आँच देशव्यापी स्तर पर फैलते हुए राज्यों तक पहुँच गई है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी इस मुद्दे को लेकर तीखी राजनीतिक झड़पें देखने को मिली हैं [11:39]।

 कांग्रेस बनाम बीजेपी: नई दिल्ली में राहुल गांधी के प्रदर्शनों के बाद रायपुर में बीजेपी और कांग्रेस के कार्यकर्ता आमने-सामने आ गए।

 आरोप-प्रत्यारोप:

 कांग्रेस का पक्ष: कांग्रेस नेताओं (जैसे सुशील आनंद शुक्ला व प्रमोद दुबे) का आरोप है कि सत्ता के दबाव में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों और कांग्रेस कार्यालय पर पक्षपातपूर्ण कार्रवाई की, आँसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज किया [12:31, 13:17]।

 बीजेपी का रुख: भारतीय जनता पार्टी के नेताओं का कहना है कि विपक्ष छात्रों के कंधों पर बंदूक रखकर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेक रहा है और माहौल ख़राब करने का प्रयास कर रहा है।

निष्कर्ष: समाधान का रास्ता क्या हो?

राहत इंदौरी का वह मशहूर शेर—"लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में, यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है"—वर्तमान परिस्थितियों पर सटीक बैठता है [09:19]।

यदि युवाओं के भविष्य, पारदर्शी परीक्षा प्रणाली और निष्पक्ष रोज़गार के मुद्दों को राजनीतिक ध्रुवीकरण के चश्मे से ही देखा जाता रहा, तो इसका नुक़सान किसी एक दल का नहीं, बल्कि पूरे देश की नींव का होगा। सरकार को चाहिए कि वह छात्रों की जायज़ मांगों पर सहानभूतिपूर्वक विचार करे, परीक्षा सुधार लागू करे और संवाद की प्रक्रिया को दोबारा बहाल करे ताकि घरों और सड़कों का यह असंतोष एक सकारात्मक दिशा पा सके।

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