मंगलवार, 26 मई 2026

छत्तीसगढ़ का 'गुजराती' सौदा!

 छत्तीसगढ़ का 'गुजराती' सौदा!

अमित शाह की 'क्रोनोलॉजी', बस्तर का 'विकास मॉडल 2.0' और छत्तीसगढ़ के जल-जंगल-जमीन पर कॉर्पोरेट पहरा।

कौशल तिवारी “ मयूख”

[INTRO

राजनीति और कॉर्पोरेट जगत की जुगलबंदी में कोई भी कदम यूं ही नहीं उठाया जाता; हर बड़े दौरे के पीछे एक सोची-समझी 'क्रोनोलॉजी' होती है और हर क्रोनोलॉजी के पीछे अरबों रुपये की एक बड़ी डील। जब देश के गृह मंत्री अमित शाह बस्तर की धरती पर कदम रखते हैं और दावा करते हैं कि 5 साल में बस्तर के आदिवासियों की आमदनी छह गुना बढ़ जाएगी, तो वह एक सुनहरे भविष्य का सपना बेच रहे होते हैं । लेकिन इसी बीच सत्ता के गलियारों से एक ऐसी सूची (List) लीक होती है, जो गृह मंत्री के दावों की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी है ।

यह कहानी सिर्फ 'नक्सल मुक्त बस्तर' की नहीं है, बल्कि 'संसाधन मुक्त छत्तीसगढ़' की है । एक तरफ बस्तर में सुरक्षा कैंपों को 'वीर शहीद गुंडादूर सेवा डेरा' में तब्दील करने का प्रशासनिक ढोल पीटा जा रहा है, तो दूसरी तरफ परदे के पीछे से अडानी से लेकर टोरेंट तक की गुजराती लॉबी को छत्तीसगढ़ के जल-जंगल और जमीन सौंपने का पूरा खाका तैयार हो चुका है ।

1. शाह का 'बस्तर मॉडल 2.0': सेवा का मुखौटा या जमीन की घेराबंदी?

गृह मंत्री अमित शाह ने बस्तर दौरे में केरल जितने बड़े भूभाग को नक्सलवाद से मुक्त कराने के लिए 200 सुरक्षा कैंपों में से 70 को 'वीर शहीद गुंडादूर सेवा डेरा' बनाने का एलान किया । दावा है कि यहाँ बैंकिंग, आधार कार्ड और 371 सरकारी योजनाएं सीधे आदिवासियों के दरवाजे तक पहुंचेंगी ।

लेकिन स्थानीय जानकारों और राजनीति के इनसाइडर्स का सवाल कुछ और है: क्या ये 'सेवा डेरे' सिर्फ आदिवासियों की भलाई के लिए हैं, या फिर बस्तर के दुर्गम और खनिज-समृद्ध इलाकों में कॉर्पोरेट कंपनियों की सुरक्षित एंट्री के लिए बनाए गए सेफ पैसेज (Safe Passage) हैं?

2. वो 'वायरल लिस्ट': छत्तीसगढ़ की छाती पर 'सूरत और अहमदाबाद' का पहरा

जैसे ही गृह मंत्री का दौरा खत्म होता है, छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक हलकों में एक सूची तैरने लगती है। यह सूची बताती है कि राज्य की विष्णुदेव साय सरकार ने गुजरात की दिग्गज कंपनियों के लिए रेड कारपेट बिछा दिया है :

 अडानी पावर  अडानी एंटरप्राइजेज (अहमदाबाद): ऊर्जा और केमिकल प्रोजेक्ट्स के लिए सरगुजा की हसदेव-समृद्ध वादियों में बड़े पैमाने पर जमीन की तलाश और हरी झंडी ।

 आरसेलर मित्तल निपॉन (सूरत): बस्तर के लौह-अयस्क (Iron Ore) के गढ़ में भारी उद्योग लगाने की तैयारी ।

 टोरेंट फार्मास्यूटिकल्स और लाइस्टियम लाइफ साइंसेज (अहमदाबाद): दवा उद्योग के नाम पर राजधानी रायपुर के आसपास की महंगी जमीनों पर नजर ।

 सफायर सेमीकॉम (अहमदाबाद): इलेक्ट्रॉनिक सेमीकंडक्टर हब के लिए रायपुर में पैठ ।

 अंबुजा सीमेंट: छत्तीसगढ़ के लाइमस्टोन (चूना पत्थर) बेल्ट पर पूरी तरह काबिज होने की कवायद, जिस पर पहले ही अवैध वसूली के संगीन आरोप लग चुके हैं ।

3. मुर्दों के अंगूठे और फर्जी जनसुनवाई का 'सच्चा चिट्ठा'

विकास की इस चमचमाती कहानी का सबसे काला अध्याय है—'जमीन हड़पने का खेल'। मैदानी हकीकत यह है कि इन बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों को स्थापित करने के लिए जनसुनवाइयों का मजाक उड़ाया जा रहा है । कई इलाकों से रिपोर्ट आ रही है कि प्रशासन की मिलीभगत से फर्जी जनसुनवाइयां की गईं और जो ग्रामीण सालों पहले मर चुके हैं, उनके नाम पर अंगूठे लगवाकर उद्योगों के पक्ष में सहमति दिखा दी गई । सरकार पूरी तरह से उद्योगपतियों की गोद में बैठी नजर आ रही है ।

4. छत्तीसगढ़िया युवा: सिर्फ 'चपरासी और गार्ड' बनने की योग्यता?

डबल इंजन सरकार का सबसे बड़ा खोखला दावा है—'स्थानीय युवाओं को रोजगार']। कड़वा सच तो यह है कि स्किल डेवलपमेंट के नाम पर छत्तीसगढ़ के युवाओं को अपने ही जल-जंगल-जमीन पर महज चपरासी या सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी भी नसीब नहीं हो रही है ।

हाल ही में राज्य के उद्योगों में हुई जानलेवा दुर्घटनाओं ने इस सच से पर्दा उठा दिया कि मरने वाले अधिकांश मजदूर बाहरी राज्यों के थे। उद्योगपतियों की क्रूर नीति साफ है—स्थानीय लोगों को नौकरी पर मत रखो, क्योंकि अगर वे हक मांगेंगे तो 'आंदोलन' का खतरा रहेगा। इसलिए मजदूर भी बाहर से मंगाए जा रहे हैं ।

5. 'उलगुलान' की गूंज और सुलगती सियासत

इस गुजराती घुसपैठ के खिलाफ अब बस्तर और सरगुजा ही नहीं, बल्कि छुईखदान समेत छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों में भी 'जल-जंगल-जमीन' की रक्षा के लिए 'उलगुलान' (क्रांति) के नारे गूंजने लगे हैं ।

क्षेत्रीय दलों जैसे छत्तीसगढ़ समाज पार्टी, क्रांति सेना और जय जोहार पार्टी ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है । उनका सीधा आरोप है कि दिल्ली के आकाओं (नरेंद्र मोदी और अमित शाह) के दबाव में विष्णुदेव साय सरकार छत्तीसगढ़ की अस्मिता और संपदा को गुजरात के उद्योगपतियों के हाथों गिरवी रख रही है ।

[OUTRO/CONCLUSION: निष्कर्ष]

क्या छत्तीसगढ़ का नक्शा अब पूरी तरह बदलने वाला है? क्या छत्तीसगढ़िया जनता का सदियों से चला आ रहा शोषण अब कॉर्पोरेट गुलामी के एक नए युग में तब्दील हो जाएगा? 

अमित शाह का बस्तर आना और तत्काल बाद गुजराती कंपनियों को ताबड़तोड़ हरी झंडी मिलना, यह चीख-चीख कर गवाही दे रहा है कि लोकतंत्र की आड़ में कॉर्पोरेट लूट का एक विशाल नेटवर्क काम कर रहा है । पर्यावरण की तबाही और स्थानीय जनता को चपरासी बनाने की कीमत पर खड़ा किया जा रहा यह 'गुजरात मॉडल', छत्तीसगढ़ के सुनहरे भविष्य का निर्माण नहीं, बल्कि उसकी बर्बादी का नया दस्तावेज है।

सोमवार, 25 मई 2026

कांग्रेस का साय सरकार पर चौतरफा हमला

कांग्रेस  का साय सरकार पर चौतरफा हमला



छत्तीसगढ़ में चरमराती कानून-व्यवस्था और बढ़ती बेरोजगारी को मुद्दा बनाकर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने राज्य की विष्णु देव साय सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज के तेवर के चलते सियासी गलियारों में हलचल तेज है, वहीं कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने इस बहाने भाजपा की 'डबल इंजन' सरकार पर तीखे प्रहार किए है और कांग्रेस  के इस तेवर के चलते विभिन्न क्षेत्रों से पीड़ित और त्रस्त लोग लगातार जुड़ रहे हैं । लोहारा की महिलाओं से लेकर बलौदा बाजार अग्निकांड में पुलिसिया कार्रवाई से पीड़ित सतनामी समाज के लोग, कवर्धा की जनता और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता रहे दिवंगत संतोष पटेल (जिन्होंने आत्महत्या कर ली थी) के पीड़ित परिजन पहले ही न्याय यात्रा में शामिल होकर अपनी व्यथा साझा चुके  हैं । इसके अलावा स्पेशल ब्लास्ट फैक्ट्री विस्फोट से प्रभावित लोग भी यात्रा का हिस्सा बन चुके  हैं । जनता के बीच पैठ मजबूत करने के लिए कांग्रेस ने रायपुर के जय स्तंभ चौक पर नुक्कड़ नाटक का भी आयोजन किया, जिसके जरिए साय सरकार की कथित विफलताओं को उजागर किया गया ।

नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत के बदले तेवर

आमतौर पर अपने शांत स्वभाव के लिए जाने जाने वाले नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत इस बार बेहद आक्रामक नजर आ रहे हैं । यात्रा में शामिल पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और कांग्रेस प्रभारी सचिन पायलट जैसे बड़े नेताओं की मौजूदगी के बीच महंत ने राज्य सरकार की नीतियों की पोल खोली ।

महंत ने बेरोजगारी और ठप पड़े विकास कार्यों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा, "जब से छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार आई है, गांवों में स्वीकृत विकास कार्य रोक दिए गए हैं और उनके पैसे वापस मंगा लिए गए हैं । नरेंद्र मोदी द्वारा किए गए रोजगार के वादे पूरी तरह खोखले साबित हुए हैं। सुशासन का दावा करने वाली सरकार में आज गरीब, आदिवासी, ओबीसी, व्यापारी या नौकरीपेशा—कोई भी वर्ग सुखी नहीं है । किसी एक भी व्यक्ति का नाम बता दीजिए जो इस सरकार में खुश हो।"

कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक फेरबदल पर उठाए सवाल

डॉ. महंत ने राज्य की कानून-व्यवस्था को लेकर साय सरकार को 'असंवेदनशील' करार दिया । उन्होंने कहा कि आदिवासी जिलों और प्रदेश के अन्य हिस्सों में जिस तरह हत्या, बलात्कार और लूटपाट की घटनाएं बढ़ी हैं, वैसी स्थिति छत्तीसगढ़ के इतिहास में पहले कभी नहीं देखी गई ।

प्रशासनिक स्तर पर मचे घमासान का जिक्र करते हुए नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि सरकार एक साल भी ठीक से काम नहीं कर पाई है। मंत्रियों के ओएसडी (OSD) के धड़ाधड़ ट्रांसफर हो रहे हैं और बिलासपुर कमिश्नर का ट्रांसफर तो महज दो घंटे के भीतर बदल दिया गया । उन्होंने आरोप लगाया कि निचले स्तर पर तहसीलदारों और अधिकारियों के माध्यम से खुली वसूली का खेल चल रहा है, जिससे आम जनता त्रस्त है और कांग्रेस इस पर आंखें बंद नहीं रख सकती ।

गांधीवादी नीति से सामाजिक सौहार्द की बहाली

महंत ने स्पष्ट किया कि भाजपा सरकार के कार्यकाल में जो सामाजिक ताना-बाना और सौहार्द बिगड़ा है, उसे ठीक करने के लिए ही कांग्रेस  यात्रा निकाल रही है । उन्होंने कहा कि कांग्रेस एकजुट है और आपसी कटुता का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यह पूरी यात्रा गांधीवादी नीति और भाईचारे के संदेश पर आधारित है ।

निष्कर्ष:

अब देखना यह होगा कि इस यात्रा से मिले जनसमर्थन के बाद कांग्रेस आने वाले दिनों में साय सरकार को घेरने के लिए क्या नई रणनीति तैयार करती है 

रविवार, 24 मई 2026

सर्किट हाउस जमींदोज, आरटीआई में जांच रिपोर्ट 'लापता'

 पीडब्ल्यूडी का 'डिमोलिशन खेल': 95 साल पुराना मजबूत सर्किट हाउस जमींदोज, आरटीआई में जांच रिपोर्ट 'लापता'



 हेरिटेज बिल्डिंग गिराने के नाम पर करोड़ों के 'संगठित खेल' की बू; बिना तकनीकी कमेटी और फॉर्म नंबर 136 के ही ढहा दिया ब्रिटिश काल का ऐतिहासिक ढांचा।

 प्रदेश में करीब 50 और सरकारी भवनों के नवनिर्माण की तैयारी, आरटीआई एक्टिविस्ट ने लगाया भ्रष्टाचार का गंभीर आरोप।


छत्तीसगढ़ का लोक निर्माण विभाग (PWD) एक बार फिर बड़े विवादों के घेरे में है। उपमुख्यमंत्री व पीडब्ल्यूडी मंत्री अरुण साव के कार्यकाल के दौरान विभाग पर एक ऐसा गंभीर आरोप लगा है, जिसने विभाग की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला राजधानी रायपुर के 95 साल पुराने ऐतिहासिक सर्किट हाउस (ओल्ड बिल्डिंग) को जमींदोज करने और उससे जुड़ी तकनीकी जानकारियों को आरटीआई (सूचना के अधिकार) के तहत छुपाने का है।

आरोप है कि जिस ब्रिटिश कालीन मजबूत इमारत को 100 साल और सुरक्षित रखा जा सकता था, उसे सिर्फ नए निर्माण और 'कमीशन के खेल' के लिए आनन-फानन में ढहा दिया गया। चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरी कवायद में नियमों को ताक पर रखने की बात सामने आ रही है।

लाखों खर्च कर संवारा, फिर चला दिया बुलडोजर

सूत्रों और आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार, पिछली सरकारों के दौरान ही इस सर्किट हाउस के कई कमरों को चमकाने, नई टाइल्स और दरवाजे लगाने में लाखों-करोड़ों रुपए खर्च किए गए थे। जनता की गाढ़ी कमाई से हुए इस जीर्णोद्धार के कुछ समय बाद ही अचानक इस पूरी बिल्डिंग को 'जर्जर' घोषित कर नेस्तनाबूद कर दिया गया।

आरटीआई में खुलासा: गायब है फॉर्म नंबर 136 और जांच प्रतिवेदन

इस पूरे मामले को लेकर आरटीआई एक्टिविस्ट राकेश चौबे ने विभाग से जब जानकारी मांगी, तो पीडब्ल्यूडी के अफसरों के हाथ-पांव फूल गए। राकेश चौबे के मुताबिक:

1 विभाग ने पहली आरटीआई में सिर्फ इतना जवाब दिया कि "भवन जर्जर हो चुका था, इसलिए इसे तोड़ा गया।"

2 जब दोबारा आरटीआई लगाकर भवन के निरीक्षण की तकनीकी रिपोर्ट मांगी गई, तो विभाग कोई पुख्ता दस्तावेज नहीं दे सका।

3 नियमतः किसी भी सरकारी बिल्डिंग को तोड़ने से पहले तकनीकी विशेषज्ञों और इंजीनियरों की 3 से 5 सदस्यीय कमेटी बनती है। यह कमेटी 'फॉर्म नंबर 136' (निरीक्षण रिपोर्ट) पर हस्ताक्षर करती है। लेकिन इस मामले में न तो कोई आधिकारिक जांच प्रतिवेदन है और न ही फॉर्म नंबर 136।

आरोप लग रहे हैं कि किसी एक चहेते इंजीनियर की कथित मौखिक या फर्जी रिपोर्ट के आधार पर इस ऐतिहासिक हेरिटेज ढांचे को गिरा दिया गया, ताकि नए सिरे से करोड़ों का टेंडर निकाला जा सके।

क्या प्रदेश में सक्रिय है 'संगठित डिमोलिशन गिरोह'?

आरटीआई एक्टिविस्ट राकेश चौबे का कहना है कि यह केवल एक बिल्डिंग का मामला नहीं है। विभाग अब प्रदेश भर में ऐसे लगभग 50 सरकारी प्रोजेक्ट्स और भवनों को फिर से नवनिर्मित (पुनर्वास) करने की तैयारी कर रहा है। आशंका जताई जा रही है कि तोड़ने और दोबारा बनाने के नाम पर विभाग में एक 'संगठित गिरोह' काम कर रहा है, जिसका मुख्य उद्देश्य सरकारी पैसे का बंदरबांट करना है।

हेरिटेज को सहेजने के बजाय मिटा दी पहचान

विशेषज्ञों के अनुसार, ब्रिटिश शासनकाल के दौरान बनी इस इमारत के स्ट्रक्चर में लगे बीम, कॉलम और लोहे इतने मजबूत थे कि यह इमारत अगली एक सदी तक खड़ी रह सकती थी। जहां एक तरफ ऐतिहासिक इमारतों को 'हेरिटेज' घोषित कर सहेजा जाता है, वहीं रायपुर में पीडब्ल्यूडी ने इसे मलबे में तब्दील कर दिया।

मामला जाएगा अपीलीय फोरम और कोर्ट

जानकारी छुपाने और टालमटोल रवैये को लेकर आरटीआई एक्टिविस्ट अब विभाग के प्रथम अपीलीय अधिकारी के पास जा रहे हैं। यदि वहां भी सही जानकारी (निरीक्षण रिपोर्ट और फॉर्म 136) नहीं मिलती है, तो मामले को संबंधित सक्षम फोरम और न्यायालय में ले जाने की तैयारी है, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।

बड़ा सवाल: मुख्यमंत्री के कड़े रुख के बाद भी PWD बेलगाम क्यों?

एक तरफ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय राजस्व जैसे विभागों में सालों से जमे अधिकारियों और पटवारियों को हटाने के कड़े आदेश दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पीडब्ल्यूडी में सालों से एक ही मलाईदार कुर्सी पर जमे अधिकारियों की 'रीति-नीति' पर कोई अंकुश नहीं दिख रहा है। अब देखना यह होगा कि भ्रष्टाचार के इन गंभीर आरोपों पर उपमुख्यमंत्री अरुण साव और मुख्यमंत्री साय क्या संज्ञान लेते हैं।

Vidio देखें 

https://youtu.be/7aEMtv3yqPE?si=f_h2rBwdRnHYnrsw


कहानी: 'चुनावी चाय' और बंधुआ रिमोट

 कहानी: 'चुनावी चाय' और बंधुआ रिमोट


एक बार की बात है, छत्तीसगढ़ के "सियासतपुर" गांव के चौराहे पर मंगलू की चाय दुकान सजी हुई थी। मंगलू की दुकान की खासियत थी कि वहां चाय कम और राजनीति की कड़क चर्चाएं ज्यादा उबलती थीं।

शाम का समय था, और तभी 'वीरू  बाबू' (जो गांव के नए मुखिया बने थे) वहां आकर बैठ गए। वीरू बाबू थोड़े परेशान दिख रहे थे। वह अपनी चाय का घूंट ले ही रहे थे कि तभी वहां से हाथ में झोला टांगे और 125 किलोमीटर की 'पैदल न्याय यात्रा' करके आ रहे ' भोपू भैया' अपनी टोली के साथ गुजरे।

भोपू भैया ने जैसे ही वीरू बाबू को देखा, उन्होंने जोर से ताना मारा, "अरे वीरू  बाबू! अपनी चाय की केतली तो संभाल लो! गांव में बिजली कट रही है, स्कूल के बच्चे परेशान हैं, और आप यहां आराम से चाय पी रहे हो? पहले अपनी केतली की समीक्षा करो!"

विरु  बाबू ने मुस्कुराते हुए कहा, "भैया, सब ठीक चल रहा है। मैं तो बस गांव की कानून-व्यवस्था देख रहा हूं।"

इस पर भोपू भैया हंसते हुए बोले, "अरे क्या देख रहे हो! रिमोट कंट्रोल तो नागपुर वाले भाईसाहब के पास है। तुम तो बस वहां के 'बंधुआ मजदूर' बन गए हो [! बटन वहां दबता है, और चाय तुम्हारी दुकान पर उबलती है!"

"बंधुआ मजदूर" का शब्द सुनते ही पूरी चाय दुकान पर सन्नाटा छा गया!

तभी कोने में बैठे एक बुजुर्ग ने हुक्का गुड़गुड़ाते हुए कहा, "भैया हो! राजनीति भी अजब चीज है। जब भोपू भैया सत्ता में थे, तब विपक्ष उन पर निशाना साधता था, उनके पूरे परिवार के खातों की जांच की बातें होती थीं । अब वीरू बाबू  आए हैं, तो भोपू भैया उन पर 'नागपुर का रिमोट' होने का ठप्पा लगा रहे हैं।"

भोपू भैया ने कड़क चाय का एक कुल्हड़ हाथ में लिया और बोले, "हम डरने वाले नहीं हैं बाबू! चाहे जितने हमले हों, जनता के लिए हमारी न्याय यात्रा चलती रहेगी!"

वीरू  बाबू ने भी मुस्कुराते हुए अपनी चाय खत्म की और कहा, "भैया, रिमोट किसी के हाथ में हो या न हो, पर चाय तो मंगलू के हाथ की ही कड़क रहेगी!"

सीख: राजनीति में चाहे कितने भी "घाट-प्रतिघात"  और तीखे बयान चलें, चाय की दुकान पर बैठने वाली जनता सब समझती है और अंत में मजे लेकर अपनी कड़क चाय का आनंद उठाती है!


Vidio देखें 


https://youtu.be/n7CJrZDoC_c?si=fd2tDg2AEfsOljZW



शनिवार, 23 मई 2026

धर्म के 'सौदागर' और राजनीति का 'झूठा' खेल: पाखंड का पर्दाफाश!

 धर्म के 'सौदागर' और राजनीति का 'झूठा' खेल: पाखंड का पर्दाफाश!



जब बात धर्म की राजनीति करने और दूसरों पर उंगली उठाने की हो, तो कुछ राजनेताओं की जुबान सबसे तेज चलती है। लेकिन जब खुद की ही निष्ठा और पवित्रता कसौटी पर हो, तो ये नेता कैमरे के सामने ऐसे बेनकाब होते हैं कि उनकी बोलती बंद हो जाती है। उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध महाकाल मंदिर से एक ऐसा ही सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने कथित 'धर्म रक्षकों' के दोहरे चरित्र को सरेआम उजागर कर दिया है

महाकाल का प्रसाद और बीजेपी नेता की 'झूठ'

तिरुपति मंदिर के लड्डू विवाद को लेकर देश में मचे शुद्धिकरण और प्रायश्चित के शोर के बीच, अब बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन से एक शर्मनाक वीडियो वायरल हुआ है । यह वीडियो किसी विपक्षी दल के नेता का नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) के महामंत्री संजय अग्रवाल का है ।

दरअसल, महाकाल मंदिर परिसर में एक गेट गिरने से हुए हादसे का निरीक्षण करने बीजेपी के नेता पहुंचे थे। इस दौरान उन्हें वहां प्रसाद (लड्डू-पैकेट के लिए चना) बनने की प्रक्रिया दिखाने ले जाया गया । लेकिन कैमरे में जो कैद हुआ, उसने आस्थावानों के पैरों तले जमीन खिसका दी। बीजेपी नेता संजय अग्रवाल ने प्रसाद के चने की सामग्री में से एक मुट्ठी चना उठाया, उसे चखा (मुंह में डाला) और उसी हाथ में बचे हुए चने को वापस प्रसाद के ढेर में डाल दिया !

करोड़ों भक्तों की आस्था के प्रतीक बाबा महाकाल के महाप्रसाद को इस तरह 'जूठा' करने का वीडियो जैसे ही कांग्रेस ने जारी किया, वैसे ही हड़कंप मच गया ।

चौतरफा घिरे तो मांगी माफी, पर 'हिंदुत्व' के ठेकेदार चुप क्यों?

वीडियो के सोशल मीडिया पर आग की तरह फैलते ही चारों तरफ थू-थू होने लगी। खुद को चौतरफा घिरा देख बीजेपी नेता संजय अग्रवाल ने तुरंत सफाई दी और माफी मांग ली । उन्होंने दलील दी कि मुंह में डालने के बाद हाथ में बची सामग्री झूठी नहीं हुई थी । लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या आस्था के साथ इस तरह का खिलवाड़ माफी योग्य है?

सबसे बड़ा और तीखा सवाल उन तमाम तथाकथित हिंदू संगठनों और कट्टरपंथियों पर उठता है, जो दूसरों की छोटी सी चूक पर भी सड़कों पर उतर आते हैं, 'थूक जिहाद' जैसे नैरेटिव गढ़ने लगते हैं और प्रधानमंत्री तक का खून खौल उठता है । आज वही संगठन इस मामले पर पूरी तरह 'मौन व्रत' धारण किए हुए हैं । आखिर यह चुप्पी क्यों? क्या हिंदुत्व की भावनाएं सिर्फ तभी आहत होती हैं जब आरोपी विपक्ष का हो या किसी दूसरे समुदाय का ?

डबल इंजन की सरकार में 'ढहती' व्यवस्था

यह घटना उस वक्त की है जब महाकाल मंदिर का एक द्वार ढहने से दो मासूमों की जान चली गई और कई लोग घायल हो गए थे । इससे पहले भी उज्जैन में आए आंधी-तूफान में करोड़ों की लागत से बनी मूर्तियां ताश के पत्तों की तरह बिखर गई थीं, जिन्हें जेसीबी से बेहद अमानवीय और मनमाने तरीके से उठाया गया था ।

चाहे अयोध्या के राम मंदिर की छत से पानी टपकने का मामला हो या महाकाल में घोटालों और हादसों की फेहरिस्त—इस डबल इंजन की सरकार में आस्था के केंद्रों का रख-रखाव और नेताओं का आचरण, दोनों ही कटघरे में हैं ।

बड़ा सवाल: आस्था पर विश्वासघात कब तक?

यह वीडियो उन तमाम लोगों की आंखें खोलने के लिए काफी है, जो धर्म की पट्टी बांधकर किसी एक राजनीतिक दल या संगठन पर आंख मूंदकर भरोसा करते हैं । सच तो यह है कि आम जनता की भावनाओं और श्रद्धा के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात वही लोग कर रहे हैं, जो खुद को धर्म का सबसे बड़ा अलमबरदार बताते हैं ।

महाकाल के दरबार में हुआ यह कृत्य महज एक नेता की लापरवाही नहीं, बल्कि सत्ता के अहंकार और धर्म के नाम पर की जाने वाली पाखंडी राजनीति का सरेआम सबूत है।

Vidio देखें 


https://youtu.be/YEPHEl0KUSU?si=LdiZpzoNDkWLk4P8


शुक्रवार, 22 मई 2026

छत्तीसगढ़ के हक पर 'सर्जिकल स्ट्राइक', मुनाफे वाली कंपनी गई

छत्तीसगढ़ के हक पर 'सर्जिकल स्ट्राइक', मुनाफे वाली कंपनी गई 


 छत्तीसगढ़ के संसाधनों और औद्योगिक पहचान पर दिल्ली से एक और बड़ा प्रहार हुआ है। हसदेव के जंगलों में चल रही हलचल के बीच, अब मध्य भारत के स्टील हब 'भिलाई' की धड़कन कहे जाने वाले फेरो स्क्रैप निगम लिमिटेड (FSNL) को केंद्र सरकार ने विदेशी हाथों में सौंप दिया है। लगातार मुनाफे में चल रही और भिलाई स्टील प्लांट (BSP) की रीढ़ मानी जाने वाली इस सरकारी कंपनी को जापान की 'कोनोई ट्रांसपोर्ट कंपनी लिमिटेड' (Konoike Transport Co. Ltd.) ने महज 320 करोड़ रुपये की उच्चतम बोली लगाकर खरीद लिया है।

इस सौदे के सामने आते ही भिलाई सहित पूरे प्रदेश के श्रमिक संगठनों, जागरूक नागरिकों और राजनीतिक गलियारों में आक्रोश का माहौल है। सवाल उठ रहे हैं कि जो कंपनी खुद हर साल सरकार की झोली में करोड़ों का मुनाफा डाल रही थी, उसे बेचने की इतनी जल्दबाजी क्यों थी?

कैसा अर्थशास्त्र: 3 साल के मुनाफे की कीमत पर पूरी कंपनी साफ!

विभागीय सूत्रों और वित्तीय आंकड़ों पर नजर डालें तो FSNL का यह विनिवेश किसी बड़े घोटाले से कम नजर नहीं आता।

 सालाना मुनाफा: FSNL कोई बीमार या घाटे में चल रही इकाई नहीं थी। यह हर साल औसतन 100 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा कमाकर केंद्र सरकार को दे रही थी।

 पेंडिंग ऑर्डर्स: विनिवेश के वक्त भी कंपनी के पास स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAIL) के विभिन्न प्लांटों से जुड़े 1000 करोड़ रुपये से अधिक के ठेके (वर्क ऑर्डर) पेंडिंग थे।

 खुद की संपत्ति: कंपनी के पास 50 करोड़ रुपये से अधिक की तो अपनी अचल संपत्ति और इंफ्रास्ट्रक्चर है। वहीं शेयर बाजार में भी इस कंपनी की साख मजबूत थी और इसके शेयर की कीमत 729 रुपये के स्तर को छू रही थी।

जानकारों का कहना है कि जो कंपनी अगले तीन साल में अपनी बिक्री की पूरी कीमत (320 करोड़) खुद कमाकर सरकारी खजाने को लौटा देती, उसे महज इतनी छोटी रकम में जापान की कंपनी को सौंप देना केंद्र सरकार की नीति और नीयत दोनों पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

तीन केंद्रीय मंत्रियों के हस्ताक्षर, पर छत्तीसगढ़ सरकार मौन

दिल्ली में केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और उद्योग मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी की मौजूदगी में इस सौदे पर अंतिम मुहर लगाई गई। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम पर छत्तीसगढ़ की 'डबल इंजन' सरकार की खामोशी सबसे ज्यादा चौंकाने वाली है।

भिलाई के श्रमिक नेताओं का आरोप है कि राज्य की विष्णुदेव साय सरकार दिल्ली के फैसलों के सामने असहाय नजर आ रही है। स्थानीय रोजगार और राज्य के आर्थिक हितों की रक्षा करने के बजाय सूबे की सरकार ने इस संवेदनशील मुद्दे पर पूरी तरह से मौन साध लिया है। विपक्ष भी इस मुद्दे पर केवल चुनावी और सियासी यात्राओं तक सीमित है, जमीन पर मजदूरों की लड़ाई लड़ने वाला कोई नहीं दिख रहा।

हजारों परिवारों के भविष्य पर छाए संकट के बादल

FSNL में सीधे तौर पर काम करने वाले नियमित कर्मचारियों के अलावा, स्क्रैप प्रोसेसिंग और परिवहन कार्य में हजारों ठेका मजदूर और स्थानीय युवा जुड़े हुए हैं। जापान की निजी कंपनी के हाथ में कमान जाते ही अब यहां 'ठेका पद्धति' और 'छंटनी' का डर हावी हो गया है। स्थानीय लोगों ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा है कि आत्मनिर्भर भारत का नारा देने वाली सरकार स्थानीय युवाओं को विदेशी कॉर्पोरेट का गुलाम बनाने पर तुली है।

अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, भारतीय जनता पार्टी के कुछ स्थानीय नेता भी इस फैसले से असहज हैं और दबी जुबान में इसका विरोध कर रहे हैं, लेकिन आलाकमान के खौफ के कारण कोई भी खुलकर सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।

क्या अब नगरनार की बारी?

FSNL के इस अचानक हुए निजीकरण ने बस्तर के नगरनार स्टील प्लांट (NMDC) को लेकर भी डर बढ़ा दिया है। हालांकि सरकार लगातार नगरनार के निजीकरण का खंडन करती रही है, लेकिन FSNL के हश्र को देखकर भिलाई और बस्तर के उद्योग जगत में यह चर्चा तेज है कि आज FSNL बिका है, कल नगरनार की बारी भी आ सकती है।

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