रविवार, 12 जुलाई 2026

मोदी के फैसले और छत्तीसगढ़ की बदहाली का सच

 मोदी के फैसले और छत्तीसगढ़ की बदहाली का सच 




 क्या छत्तीसगढ़ में आने वाले दिनों में कर्मचारियों को वेतन बांटना भी मुश्किल हो जाएगा? क्या राज्य 'बीमारू' राज्यों की श्रेणी में खड़ा होने की कगार पर है? यह मामला सिर्फ 'आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपैया' का नहीं है, बल्कि केंद्र और राज्य सरकार की उन नीतियों का है जिसने छत्तीसगढ़ को ₹1 लाख करोड़ से अधिक के कर्ज के दलदल में धकेल दिया है। आज बात करेंगे कि कैसे मोदी सरकार के फैसलों और डबल इंजन सरकार के वित्तीय कुप्रबंधन ने छत्तीसगढ़ को बदहाली की ओर मोड़ दिया है।

1. वन नेशन, वन टैक्स (GST) का असली झटका

[ग्राफिक्स/टेक्स्ट ऑन स्क्रीन: 1 जुलाई 2017 - जीएसटी का असर]

याद कीजिए 1 जुलाई 2017 का वो दिन, जब 'वन नेशन, वन टैक्स' के नाम पर देश में GST लागू किया गया था। दावा था कि इससे राज्यों को फायदा होगा, लेकिन छत्तीसगढ़ की हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।

 GST लागू होने से पहले, छत्तीसगढ़ को टैक्स के रूप में हर तिमाही (Quarter) में ₹1,000 करोड़ से अधिक की शुद्ध और पक्की कमाई होती थी।

 नुकसान की भरपाई के लिए केंद्र ने 'कंपनसेशन' (मुआवजा) देने का वादा किया था, लेकिन जून 2022 से मोदी सरकार ने इस कंपनसेशन को भी पूरी तरह बंद कर दिया।

 आज स्थिति यह है कि राज्य को हर महीने औसतन सिर्फ ₹2,800 करोड़ से ₹3,200 करोड़ के बीच ही जीएसटी मिल रहा है, जो राज्य की जरूरतों के मुकाबले बेहद कम है। ऊपर से यह पैसा भी केंद्र से समय पर नहीं मिलता।

2. कोयला, लोहा और सीमेंट का नुकसान

[विजुअल: छत्तीसगढ़ के माइनिंग क्षेत्र और कारखाने]

छत्तीसगढ़ देश के प्रमुख कोयला और खनिज उत्पादक राज्यों में गिना जाता है। हमारी सबसे ज्यादा कमाई सीमेंट, कोयला और लोहे से होती है। लेकिन केंद्र के फैसलों के कारण कोयले पर जीएसटी का स्लैब सिर्फ 5% तय किया गया है, जिसने राज्य की कमाई के एक बड़े जरिए को सीमित कर दिया है। संसाधन हमारे, माइनिंग हमारे यहाँ, लेकिन मलाई और टैक्स का कंट्रोल केंद्र के पास!

3. ₹36,000 करोड़ से ₹1 लाख करोड़ का कर्ज

[ग्राफिक्स: कर्ज का बढ़ता ग्राफ - 2016 बनाम 2026]

आइए आंकड़ों की जुबानी समझते हैं कि छत्तीसगढ़ कैसे कर्जदार बना:

 साल 2016-17 में छत्तीसगढ़ पर कुल कर्ज करीब ₹36,000 करोड़ था, जो उस वक्त राज्य की जीडीपी (GSDP) का सिर्फ 15 से 16% था।

 लेकिन आज, यह कर्ज बढ़कर ₹1 लाख करोड़ से ऊपर जा चुका है।

 इस भारी-भरकम कर्ज का नतीजा यह है कि राज्य सरकार को अपने कुल बजट का 10 से 12% हिस्सा सिर्फ कर्ज और उसका ब्याज चुकाने में खर्च करना पड़ रहा है। हर साल ₹7,500 करोड़ से ₹8,000 करोड़ रुपए तो सिर्फ ब्याज देने में चले जाते हैं। विकास कार्यों के लिए पैसा बचेगा कहां से?

4. श्रेय मोदी का, बोझ छत्तीसगढ़ पर: 40% की पार्टनरशिप

[ग्राफिक्स: केंद्र की योजनाएं और 40% वित्तीय बोझ]

अक्सर मोदी सरकार अपनी कल्याणकारी योजनाओं की पीठ थपथपाती है, लेकिन इसके पीछे का सच यह है कि डबल इंजन की सरकार होने के नाते छत्तीसगढ़ चुपचाप सारा वित्तीय बोझ अपने सिर ले रहा है। पहले इन योजनाओं में राज्यों की हिस्सेदारी बेहद कम (10 से 20%) होती थी, लेकिन अब इसे बढ़ाकर 40% कर दिया गया है:

 पीएम आवास योजना: राज्य की हिस्सेदारी 40%।

 जल जीवन मिशन: राज्य की हिस्सेदारी 40% (जिसमें भारी भ्रष्टाचार की शिकायतें भी हैं)।

 आयुष्मान कार्ड योजना: राज्य की हिस्सेदारी 40%।

 राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन समग्र शिक्षा अभियान: राज्य की हिस्सेदारी 40%।

 मनरेगा के बदले आई नई योजना (जीवी राम जी योजना): इसमें भी राज्यों पर 40% का भारी वित्तीय बोझ डाल दिया गया है।

यानी विज्ञापन और श्रेय में नाम प्रधानमंत्री का, लेकिन तिजोरी छत्तीसगढ़ की खाली हो रही है।

5. वित्तीय कुप्रबंधन और बैंकों का रुख

[क्लोजिंग टोन: तीखे सवाल]

चुनावी वादों जैसे महतारी वंदन योजना या ₹3100 में धान खरीदी ने राज्य की तिजोरी पर असर तो डाला ही है, लेकिन उससे भी बड़ा झटका केंद्र की थोपी हुई नीतियां और साय सरकार का लचर वित्तीय प्रबंधन है। हालत यह है कि रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य को अब बैंकों से ऊंचे ब्याज दरों पर कर्ज उठाना पड़ रहा है और एनपीए (NPA) लगातार बढ़ रहा है।

अब सवाल यह उठता है कि क्या छत्तीसगढ़ को इस बदहाली से निकालने के लिए आने वाले दिनों में यहां के जल, जंगल और जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों को बेचना पड़ेगा? या फिर केंद्र के सामने आंखें मूंदकर बैठी यह डबल इंजन सरकार कोई ठोस कदम उठाएगी?

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शनिवार, 11 जुलाई 2026

अब पृथ्वी के फेफड़े को क्यो बेचने की तैयारी

 अब पृथ्वी के फेफड़े को क्यो बेचने की तैयारी 


छत्तीसगढ़ में 'डबल इंजन' की सरकार बनते ही बस्तर और सरगुजा के विकास तथा कानून-व्यवस्था को लेकर कई बड़े दावे किए जा रहे हैं [00:08]। लेकिन विकास की इसी अंधी दौड़ के बीच एक ऐसा गंभीर सवाल उठ खड़ा हुआ है, जिसने वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और स्थानीय आदिवासियों की रातों की नींद उड़ा दी है। सवाल यह है कि क्या पर्यटन और रोजगार के नाम पर हम अपनी सदियों पुरानी प्राकृतिक विरासत को हमेशा के लिए दफन करने जा रहे हैं? [00:26]

यह चिंता बस्तर की कांगेर घाटी में स्थित एक अनमोल और अद्भुत धरोहर 'ग्रीन केव' (Green Cave) को लेकर है [02:04]। कांगेर घाटी में खोजी गई कुल 27 गुफाओं में से यह गुफा सबसे अनोखी और जादुई मानी जाती है [02:53]। सरकार इसे 'इको टूरिज्म' का एक बड़ा जरिया मानकर आम पर्यटकों के लिए खोलने की तैयारी में है, लेकिन विशेषज्ञ इसे एक आत्मघाती कदम बता रहे हैं।

क्या है 'ग्रीन केव' का जादुई रहस्य?

वैज्ञानिकों के अनुसार, यह गुफा एक 'टाइम कैप्सूल' की तरह है जहाँ लाखों सालों का इतिहास सुरक्षित है [01:45], [03:26]। इस गुफा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि दोपहर के समय केवल 60 मिनट (एक घंटे) के लिए सूर्य की किरणें एक विशेष कोण (angle) से इसके भीतर प्रवेश करती हैं [03:04]। इसी सीमित रोशनी के सहारे यहाँ मौजूद अत्यंत सूक्ष्म जीव (माइक्रोब्स) जीवित रहते हैं, जो गुफा की दीवारों को एक जादुई हरा रंग प्रदान करते हैं [03:13]।

इस गुफा का तापमान हमेशा एक समान (स्थिर) रहता है [03:37]। यहाँ पाए जाने वाले दुर्लभ अंधे केकड़े और विलक्षण प्रजाति के मेंढक पूरी तरह से इसी नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र (Eco-system) पर निर्भर हैं [03:37]।

रोजगार बनाम विनाश का सरकारी तर्क

राज्य सरकार और वन मंत्री केदार कश्यप का तर्क है कि इस गुफा को पर्यटकों के लिए खोलने से स्थानीय युवाओं को गाइड के रूप में रोजगार मिलेगा, होम-स्टे का व्यवसाय बढ़ेगा और बस्तर की गरीबी दूर होगी [03:49], [03:58]। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू बेहद खौफनाक है।

वैज्ञानिक जयंत विश्वास और लखनऊ के प्रोफेसर महेश ठक्कर जैसे विशेषज्ञों ने कड़ी चेतावनी दी है कि इस गुफा के द्वार खोलना इसके अस्तित्व को पूरी तरह से समाप्त कर देगा [02:32], [03:26], [04:37]। विशेषज्ञों का कहना है कि:

1. सांसों की गर्मी का खतरा: यदि प्रतिदिन 500 पर्यटक भी इस गुफा के भीतर जाते हैं, तो इंसानी सांसों से निकलने वाली गर्मी और कार्बन डाइऑक्साइड गुफा के भीतर के रासायनिक संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ देगी [04:18], [04:27]। इससे गुफा का खूबसूरत हरा रंग हमेशा के लिए काला पड़ जाएगा [04:37]।

2. बायो-फिल्म का नष्ट होना: अनजाने में भी अगर कोई पर्यटक इन दीवारों को छूता है, तो हजारों साल पुरानी 'बायो-फिल्म' पल भर में नष्ट हो जाएगी [04:37]।

3. कृत्रिम रोशनी (Lampenflora) का कहर: गुफा के अंदर पर्यटकों के लिए लगाई जाने वाली कृत्रिम लाइटों से वहां एक आक्रामक शैवाल (algae) पैदा हो जाएगा, जो यहाँ के मूल जादुई सूक्ष्म जीवों को खाकर खत्म कर देगा [04:59]।

आदिवासी आस्था और पर्यावरणविदों की गुहार

यह गुफा केवल एक वैज्ञानिक धरोहर नहीं है, बल्कि कुटुंबसर के कंपार्टमेंट 85 में स्थित यह स्थल स्थानीय आदिवासियों की गहरी आस्था का भी प्रतीक है [08:05]। पर्यावरणविदों ने इस खतरे को भांपते हुए वन सचिव से भी औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है [08:15]।

बड़ा सवाल: क्या प्रकृति को बेचकर ही आएगा विकास?

बस्तर के जंगलों और इस 'ग्रीन केव' को मध्य भारत या पृथ्वी का एक महत्वपूर्ण 'फेफड़ा' कहा जाता है [05:30], [05:48]। पत्रकारिता और समाज के सामने आज यह यक्ष प्रश्न खड़ा है कि क्या हम वाकई इतने गरीब हो चुके हैं कि हमें अपनी अनमोल प्राकृतिक विरासत को दांव पर लगाकर रोजगार पैदा करना पड़ रहा है? [01:15], [05:12]

यह एक ऐसी धरोहर है जो एक बार नष्ट हो गई, तो इसे दोबारा बनाना इंसान या विज्ञान किसी के बस में नहीं होगा [06:16]। अब फैसला सरकार और समाज को करना है कि हमें चंद रुपयों का क्षणिक पर्यटन चाहिए या लाखों साल पुरानी यह नायाब विरासत?

वीडियो देखें 

https://youtu.be/PMndlSt7kDY?si=hrd44SWW8HWfLHkK


शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

सरकारी राशन की 'कस्टम मिलिंग' में अंतरराज्यीय सिंडिकेट

 सरकारी राशन की 'कस्टम मिलिंग' में अंतरराज्यीय सिंडिकेट; छत्तीसगढ़ का धान, ओडिशा में खेल!


गरीबों के निवाले और किसानों के पसीने की कमाई पर डाका डालने वाला एक बहुत बड़ा अंतरराज्यीय सिंडिकेट इस समय सक्रिय है। सरकारी खरीद के धान की 'कस्टम मिलिंग' (Custom Milling) के नाम पर नियमों को ताक पर रखकर करोड़ों रुपये के वारे-न्यारे किए जा रहे हैं। सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच का यह फासला किसी तकनीकी चूक का नतीजा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी प्रशासनिक और व्यापारिक साठगांठ का हिस्सा है। इस पूरे खेल का केंद्र बिंदु है—छत्तीसगढ़ का सीमावर्ती इलाका और पड़ोसी राज्य ओडिशा।

क्या है पूरा मामला?

सरकार किसानों से समर्थन मूल्य पर धान की खरीदी करती है। इस धान को चावल में बदलने के लिए राइस मिलर्स को दिया जाता है, जिसे 'कस्टम मिलिंग' कहते हैं। नियम के मुताबिक, मिलर्स को तय समय सीमा के भीतर धान का उठाव करके, उसकी मिलिंग कर चावल सरकारी गोदामों या मार्कफेड (MARKFED) को सौंपना होता है। लेकिन धरातल पर कहानी पूरी तरह बदली हुई है।

जांच में यह बात सामने आई है कि छत्तीसगढ़ के बंपर धान उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा मिलिंग के तय नियमों का उल्लंघन करते हुए अवैध तरीके से सीमा पार ओडिशा भेजा जा रहा है। वहां इस धान को खपाने और कागजी हेरफेर करने का एक समानांतर नेटवर्क चल रहा है।

मार्कफेड (MARKFED) की सुस्ती और प्रशासनिक साठगांठ पर सवाल

इस पूरे घालमेल में सबसे बड़ी उंगली नोडल एजेंसियों और मार्कफेड के कामकाज पर उठती है। करोड़ों रुपये के धान के परिवहन और मिलिंग की निगरानी करने वाली व्यवस्था ने आख़िरकार अपनी आँखें क्यों मूंद रखी हैं?

1. परिवहन में हेरफेर: बिना वैध परमिट या बोगस दस्तावेजों के सहारे धान की बोरियों से लदे ट्रक अंतरराज्यीय सीमाओं को पार कर रहे हैं।

2. कागजी मिलिंग (Paper Milling): कई मामलों में संदेह है कि धान का भौतिक रूप से उठाव और मिलिंग केवल रजिस्टरों में दर्ज है, जबकि वास्तविक स्टॉक को खुले बाजार में या ऊंचे दामों पर ठिकाने लगाया जा रहा है।

3. लापरवाही या शह?: जब छत्तीसगढ़ के गोदामों और सोसायटियों से धान का उठाव समय पर नहीं होता, तो वह सड़ने की कगार पर पहुंच जाता है। इसी 'सड़न' और 'शॉर्टेज' की आड़ में इस अवैध परिवहन को छुपाया जाता है।

ओडिशा कनेक्शन: सीमाओं के पार रची जा रही साजिश

छत्तीसगढ़ से सटे ओडिशा के सीमावर्ती जिलों के राइस मिलर्स और बिचौलियों की भूमिका इसमें सबसे संदिग्ध है। छत्तीसगढ़ के कोटे का धान ओडिशा के मिलों में पहुंच रहा है, जहां इसे स्थानीय बताकर या री-साइकलिंग के जरिए सरकारी सिस्टम में वापस धकेल दिया जाता है। इस प्रक्रिया से न केवल छत्तीसगढ़ सरकार के राजस्व को चपत लग रही है, बल्कि केंद्र सरकार की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) को भी सीधे तौर पर निशाना बनाया जा रहा है।

नुकसान किसका?

 आम जनता और टैक्सपेयर: सरकार जो सब्सिडी और प्रोत्साहन राशि मिलर्स और परिवहनकर्ताओं को देती है, वह सीधे तौर पर जनता के टैक्स का पैसा है। इस घोटाले से सरकारी खजाने को सीधे करोड़ों का नुकसान हो रहा है।

 छोटे किसान: जहां एक तरफ वास्तविक किसान अपने दाने-दाने के भुगतान के लिए कतारों में खड़ा रहता है, वहीं बिचौलियों का यह सिंडिकेट रातों-रात अमीर हो रहा है।

निष्कर्ष और कड़े कदम उठाने की जरूरत

'कस्टम मिलिंग' के इस अंतरराज्यीय खेल को रोकने के लिए केवल कागजी कार्रवाई काफी नहीं है। इसके लिए दोनों राज्यों की सीमाओं पर कड़े चेकपोस्ट, ट्रकों की जीपीएस (GPS) ट्रैकिंग और मार्कफेड के अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी जरूरी है। यदि इस सिंडिकेट को वक्त रहते नहीं तोड़ा गया, तो यह सरकारी राशन व्यवस्था की रीढ़ को पूरी तरह खोखला कर देगा।

यह जांच का विषय है कि इस पूरे खेल का 'मास्टरमाइंड' कौन है और राजनीतिक-प्रशासनिक संरक्षण के बिना क्या इतना बड़ा अंतरराज्यीय नेटवर्क चलाया जाना संभव है?


गुरुवार, 9 जुलाई 2026

शिक्षा विभाग में 40 'दागी' अफसरों का सिंडिकेट

 छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग में 40 'दागी' अफसरों का सिंडिकेट: करोड़ों का बजट और सत्ता का खेल 


 छत्तीसगढ़ में 'हम ही बनाया है, हम ही संवारेंगे' के गूंजते नारों के बीच देश का भविष्य गढ़ने वाले शिक्षा विभाग की एक ऐसी कड़वी और स्याह हकीकत सामने आई है, जिसने पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। छत्तीसगढ़ के नौनिहालों का भविष्य संवारने का जिम्मा जिन कंधों पर है, वे खुद भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर दलदल में धंसे हुए हैं। शिक्षा विभाग के भीतर 40 से अधिक ऐसे 'दागी' अफसर मलाईदार पदों पर कुंडली मारकर बैठे हैं, जिन्हें कायदे से सलाखों के पीछे या सस्पेंशन लिस्ट में होना चाहिए था।

करोड़ों रुपए के भारी-भरकम बजट वाले इस सबसे महत्वपूर्ण विभाग को दीमक की तरह चाट रहे इन चेहरों और सत्ता के बीच की गलबहियां अब खुलकर उजागर होने लगी हैं।

युक्ति-युक्तकरण के नाम पर स्कूलों पर ताले, बेटियों की सुरक्षा दांव पर

[00:59] छत्तीसगढ़ में डबल इंजन की सरकार पर सवाल तब से ही उठने शुरू हो गए थे, जब 57 हजार शिक्षकों की भर्ती की प्रक्रिया को अटका दिया गया। इसके बाद विभाग ने 'युक्ति-युक्तकरण' (Rationalization) के नाम पर राज्य भर में हजारों सरकारी स्कूलों को बंद करने या मर्ज करने का फरमान सुना दिया।

 गरियाबंद का कन्याशाला विवाद [01:18]: गरियाबंद में 1965 से संचालित हो रहे एक नामी गर्ल्स स्कूल को बंद कर जब दूसरे को-एड स्कूल (ठाकुर दलगंजन स्कूल) में मर्ज करने का प्रयास किया गया, तो छात्राओं और अभिभावकों का गुस्सा फूट पड़ा। छात्राओं ने स्कूल में ताला जड़कर उग्र प्रदर्शन किया।

 असुरक्षित माहौल और बदहाली [02:14]: छात्राओं और परिजनों का सीधा आरोप है कि जिस स्कूल में उन्हें भेजा जा रहा है, वहां न तो पढ़ाई का स्तर अच्छा है, न ही वहां का माहौल बेटियों के लिए सेफ है। बुनियादी सुविधाएं जैसे शौचालय तक बदहाल हैं। इस तुगलकी नीति के कारण 40 से 50 छात्राएं टीसी (Transfer Certificate) लेकर स्कूल छोड़ने को मजबूर हो गईं।

 बिलासपुर में आदिवासियों पर मार [03:15]: बिलासपुर संभाग में भी इसी अविवेकपूर्ण नीति के चलते पंडो जनजाति के मासूम बच्चों को स्कूल पहुंचने के लिए 7 से 8 किलोमीटर का लंबा सफर तय करना पड़ रहा है। थक-हारकर कई गरीब आदिवासियों ने अपने बच्चों को स्कूल भेजना ही बंद कर दिया है।

40 घोटाले, ठंडे बस्ते में जांच और सत्ता का संरक्षण

[04:35] एक तरफ समय पर बच्चों को न तो कॉपी-किताबें मिल पा रही हैं और न ही स्कूल ड्रेस, वहीं दूसरी तरफ करोड़ों के बजट को ठिकाने लगाने वाले 40 दागी चेहरों पर कार्रवाई करने के बजाय सरकार उन्हें अपनी गोद में बिठाए हुए है। इन अफसरों पर भ्रष्टाचार से लेकर कुकर्मों तक के गंभीर मामले दर्ज हैं, लेकिन नेताओं और नौकरशाहों का नेक्सेस इतना मजबूत है कि तमाम जांचें ठंडे बस्ते में डाल दी गई हैं।

[05:42] सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस सिंडिकेट की पहुंच और ठसक सीधे सत्ता के शीर्ष तक है। वर्तमान शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और यहां तक कि स्वयं मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के पास भी कुछ समय के लिए यह विभाग रहा, लेकिन इन दागियों का बाल भी बांका नहीं हो सका। राजनैतिक गलियारों में चर्चा है कि इनमें से कई अफसरों को सुचिता और संस्कारों की बात करने वाले 'संघ' (RSS) का भी आंतरिक समर्थन प्राप्त है, जिसके दम पर ये मलाईदार कुर्सियों का आनंद ले रहे हैं।

सलाखों के बजाय मलाईदार पदों पर ताजपोशी

[07:54] जिन अधिकारियों की जगह जेल की कोठरी में होनी चाहिए थी, वे आज प्रदेश की पूरी शिक्षा व्यवस्था की नीतियां तय कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ के भविष्य के साथ हो रहे इस बड़े खिलवाड़ को लेकर अब विपक्ष और आम जनता में भारी आक्रोश है। यह 40 चेहरों का सिंडिकेट महज़ एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक सुनियोजित वित्तीय और नीतिगत घोटाला है।

अगर सरकार की नीयत वाकई साफ है, तो उसे तुरंत इन 40 दागी अफसरों की सूची पर संज्ञान लेते हुए इन्हें निलंबित करना चाहिए और बंद किए गए स्कूलों को दोबारा खोलना चाहिए। अन्यथा, छत्तीसगढ़ का भविष्य संवरने के बजाय इन दागियों के भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाएगा।

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बुधवार, 8 जुलाई 2026

नहीं बदला दो दर्जन IAS अफसरों का 'सिंडिकेट राज'!

 चेहरे बदले, सरकारें बदलीं... पर छत्तीसगढ़ में नहीं बदला दो दर्जन IAS अफसरों का 'सिंडिकेट राज'!


छत्तीसगढ़ में सत्ता और मुख्यमंत्री का चेहरा बदलने के बाद सुशासन के बड़े-बड़े दावे किए गए थे, लेकिन प्रशासनिक गलियारों की जमीनी हकीकत आज भी वही है। राज्य में दो दर्जन से अधिक रसूखदार आईएएस अफसरों का एक ऐसा मजबूत 'सिंडिकेट' सक्रिय है, जिसने पूरे सिस्टम को बंधक बना रखा है।

केंद्र की चिट्ठियां रद्दी की टोकरी में

यह नेक्सेस इतना ताकतवर है कि केंद्र सरकार के कार्मिक विभाग, गृह मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) से आने वाले जांच के सख्त निर्देशों को भी यहां बड़ी आसानी से दबा दिया जाता है। हैरानी की बात यह है कि टेंडर प्रक्रियाओं में गड़बड़ी, आय से अधिक संपत्ति और पद के दुरुपयोग की शिकायतों पर केंद्र द्वारा मांगे गए जवाब आज भी फाइलों में धूल फांक रहे हैं।

अपनी ही सरकार के दावों पर सवाल

भाजपा के वरिष्ठ नेता ननकीराम कंवर और कई अधिवक्ताओं ने पीएमओ से लेकर मुख्यमंत्री तक इन अफसरों के खिलाफ अनगिनत शिकायतें की हैं। कोरबा कलेक्टर के पद के दुरुपयोग से लेकर नजूल जमीन घोटाले तक, हर मामले में ठोस सबूत होने के बावजूद कार्रवाई की फाइलें गायब कर दी जाती हैं।

'प्यादों' पर एक्शन, असली खिलाड़ियों को अभयदान

आबकारी से लेकर स्वास्थ्य विभाग तक, जब भी घोटालों का शोर मचता है, प्रशासन सिर्फ निचले स्तर के 'प्यादों' पर कार्रवाई कर खानापूर्ति कर देता है। लेकिन शतरंज के उन असली खिलाड़ियों पर हाथ डालने से सरकार के पसीने छूटते हैं, जो वास्तव में मलाईदार पदों पर बैठे हैं।

2005 बैच का नया 'नेक्सेस'

प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि अब पूरा नेक्सेस 2005 बैच के एक रसूखदार अधिकारी के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गया है। मुख्यमंत्री सचिवालय से लेकर दफ्तरों तक इन्हीं अफसरों का वर्चस्व है। आलम यह है कि जो अफसर विवादित रहे, उन्हें रिटायरमेंट के बाद भी संविदा नियुक्तियों के जरिए मलाईदार कुर्सियां थमा दी जाती हैं।

बड़ा सवाल:

क्या छत्तीसगढ़ की जनता द्वारा चुनी गई सरकार, इन दो दर्जन अफसरों के सिंडिकेट से बड़ी है? कब तक केंद्र के निर्देशों का अपमान और जनता के अधिकारों का हनन जारी रहेगा?

वीडियो देखे