रविवार, 9 अगस्त 2026

सत्ता की राजनीति, टूटते परिवार और सड़कों पर युवा आक्रोश

 सत्ता की राजनीति, टूटते परिवार और सड़कों पर युवा आक्रोश



जब घर के चिराग़ ही व्यवस्था से बग़ावत कर बैठें

राजनीति जब तक बैठकों, रैलियों और टीवी स्क्रीन तक सीमित रहती है, तब तक समाज उसे दूर से देखता है। लेकिन जब वही राजनीति घर के ड्राइंग रूम, रसोई और पारिवारिक रिश्तों के बीच दरार पैदा करने लगे, तो यह एक गंभीर सामाजिक संकट का संकेत होता है।

हाल ही में नीट (NEET) पेपर लीक और राष्ट्रीय परीक्षाओं में हुई अनियमितताओं के विरोध में राजधानी दिल्ली से लेकर राज्यों की राजधानियों तक छात्रों का बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ है। इस आंदोलन में सिर्फ़ व्यवस्था के ख़िलाफ़ आक्रोश ही नहीं दिख रहा, बल्कि पारिवारिक और वैचारिक ध्रुवीकरण का वह भयानक चेहरा भी सामने आया है जिसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की थी।

हमें अपना मुँह छुपाकर बोलना पड़ रहा है, हम घर से भागकर आए हैं। मेरे पिताजी और पूरा परिवार बीजेपी के नेता हैं, लेकिन हमें अपने ही घर में लड़ना पड़ रहा है..."

दिल्ली की सड़कों पर अपना चेहरा मास्क से ढके एक युवा छात्र के ये शब्द सिर्फ़ एक व्यक्ति का दर्द नहीं हैं, बल्कि यह उस पीढ़ी की आवाज़ है जो एक तरफ भविष्य की अनिश्चितता से जूझ रही है और दूसरी तरफ पारिवारिक प्राथमिकताओं व वैचारिक टकराव के चक्रव्यूह में फँसी हुई है।

1. पेपर लीक और भविष्य का अंधकार: युवाओं की लाचारी

छात्र आंदोलन का मूल कारण लगातार हो रहे पेपर लीक, परीक्षा प्रणाली में धाँधली और सरकारी नौकरियों की अनिश्चितता है।

 आंकड़े और आत्महत्याएं: विपक्षी दावों और आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में दर्जनों बार विभिन्न भर्ती व प्रवेश परीक्षाओं के पेपर लीक होने की घटनाएँ हुई हैं [04:39]।

 मानसिक तनाव: सालों-साल तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए पेपर निरस्त होना या परिणाम में गड़बड़ी की खबरें आना मानसिक रूप से तोड़ देने वाला होता है [04:50]। हालिया नीट विवाद के बाद कई निराशाजनक खबरें सामने आईं और युवाओं द्वारा उठाए गए आत्मघाती कदम इस संकट की विभीषिका को रेखांकित करते हैं [05:08]।

2. राजनीति का दोहरा चेहरा: ड्राइंग रूम तक पहुँची वैचारिक दरार

यह आंदोलन केवल प्रशासनिक विफलता का मामला नहीं रहा, बल्कि इसने सामाजिक और पारिवारिक संरचना पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

 घर के भीतर वैचारिक जंग: जब युवा अपने भविष्य, महंगाई और पेपर लीक पर सवाल उठाते हैं, तो कई बार उन्हें अपने ही घर के बड़ों या समाज द्वारा 'राजनीति से प्रेरित' या 'विपक्षी एजेंडे का हिस्सा' मान लिया जाता है।

 पहचान छुपाने की मजबूरी: आंदोलनकारी छात्रों का अपने ही परिजनों के राजनीतिक जुड़ाव से अलग हटकर सड़कों पर उतरना और पहचान छुपाने के लिए मास्क लगाना यह दर्शाता है कि संवाद के रास्ते बंद हो चुके हैं [07:09]।

3. शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की माँग और प्रशासनिक गतिरोध

छात्रों और विपक्षी दलों की प्रमुख माँग शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े को लेकर है [00:32]।

 आंदोलनकारियों का रुख: छात्रों का मानना है कि परीक्षा एजेंसियों की बारंबार विफलता की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए नेतृत्व को पद छोड़ना चाहिए।

 सत्ता पक्ष का पक्ष: सरकार का तर्क है कि वे पूरे मामले की निष्पक्ष जाँच करा रहे हैं और सुधारत्मक कदम उठाए जा रहे हैं। हालाँकि, विपक्ष का आरोप है कि आंदोलन को दबाने और भटकाने के लिए इसे 'विदेशी फंडिंग' या 'देशविरोधी साजिश' का रंग देने का प्रयास किया जाता है [00:21]।

4. राज्यों में आँच: छत्तीसगढ़ का राजनीतिक घमासान

नीट पेपर लीक और छात्र आंदोलन की आँच देशव्यापी स्तर पर फैलते हुए राज्यों तक पहुँच गई है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी इस मुद्दे को लेकर तीखी राजनीतिक झड़पें देखने को मिली हैं [11:39]।

 कांग्रेस बनाम बीजेपी: नई दिल्ली में राहुल गांधी के प्रदर्शनों के बाद रायपुर में बीजेपी और कांग्रेस के कार्यकर्ता आमने-सामने आ गए।

 आरोप-प्रत्यारोप:

 कांग्रेस का पक्ष: कांग्रेस नेताओं (जैसे सुशील आनंद शुक्ला व प्रमोद दुबे) का आरोप है कि सत्ता के दबाव में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों और कांग्रेस कार्यालय पर पक्षपातपूर्ण कार्रवाई की, आँसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज किया [12:31, 13:17]।

 बीजेपी का रुख: भारतीय जनता पार्टी के नेताओं का कहना है कि विपक्ष छात्रों के कंधों पर बंदूक रखकर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेक रहा है और माहौल ख़राब करने का प्रयास कर रहा है।

निष्कर्ष: समाधान का रास्ता क्या हो?

राहत इंदौरी का वह मशहूर शेर—"लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में, यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है"—वर्तमान परिस्थितियों पर सटीक बैठता है [09:19]।

यदि युवाओं के भविष्य, पारदर्शी परीक्षा प्रणाली और निष्पक्ष रोज़गार के मुद्दों को राजनीतिक ध्रुवीकरण के चश्मे से ही देखा जाता रहा, तो इसका नुक़सान किसी एक दल का नहीं, बल्कि पूरे देश की नींव का होगा। सरकार को चाहिए कि वह छात्रों की जायज़ मांगों पर सहानभूतिपूर्वक विचार करे, परीक्षा सुधार लागू करे और संवाद की प्रक्रिया को दोबारा बहाल करे ताकि घरों और सड़कों का यह असंतोष एक सकारात्मक दिशा पा सके।

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शनिवार, 8 अगस्त 2026

महतारी वंदन: पोर्टल का ताला!

 महतारी वंदन: पोर्टल का ताला!


28 महीने, 3 लाख नई विवाहित बेटियां और बंद पोर्टल—क्या चुनावी मास्टरस्ट्रोक अब छत्तीसगढ़ के सरकारी बजट पर भारी पड़ रहा 

छत्तीसगढ़ में 'कथनी और करनी' का अंतर कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब मामला राज्य की आधी आबादी के आर्थिक स्वावलंबन का हो, तो सरकार की हर नीति और नीयत पर जनता की गहरी नज़र होती है। चुनाव के दौरान मंचों से गूंजने वाला 'महतारी वंदन योजना' का वादा सत्ता मिलते ही जिस तेजी से प्रशासनिक उलझनों और बंद पोर्टलों के पीछे छुपाया जा रहा है, उसने राज्य के लाखों मध्यमवर्गीय और ग्रामीण परिवारों में आक्रोश की चिन्गारी भड़का दी है।

1. 'सतत' योजना पर 28 महीने का ताला

चुनाव के दौरान और योजना के शुभारंभ के समय मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और राज्य सरकार ने बड़े तामझाम के साथ घोषणा की थी कि महतारी वंदन योजना एक 'सतत प्रक्रिया' (Continuous Process) होगी। इसका सीधा अर्थ था कि जैसे-जैसे राज्य में बेटियों के हाथ पीले होंगे या वे पात्रता उम्र (21 वर्ष) पूरी करेंगी, उन्हें बिना किसी अड़चन के प्रति माह ₹1,000 की सम्मान राशि मिलने लगेगी।

मार्च 2024 में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस योजना की औपचारिक शुरुआत की थी। लेकिन मार्च 2024 से जुलाई 2026 तक के 28 महीनों के सफर की धरातलीय सच्चाई यह है कि सरकारी पोर्टल पर ताला जड़ दिया गया है।

छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार, राज्य में हर साल औसतन 1.5 लाख से 2 लाख बेटियों की शादी होती है। इस गणित से बीते 28 महीनों में राज्य की 3 लाख से अधिक नवविवाहिताएं इस योजना के प्रशासनिक दायरे में कानूनी और नीतिगत रूप से हकदार बन चुकी हैं। परंतु, जब ये महिलाएं आंगनबाड़ी केंद्रों या लोक सेवा केंद्रों (चॉइस सेंटर) का चक्कर लगाती हैं, तो उन्हें एक ही जवाब मिलता है—"सरकार ने पोर्टल बंद कर दिया है, नए फॉर्म स्वीकार नहीं होंगे।

"1,000 की यह राशि केवल एक सरकारी मदद नहीं, बल्कि ग्रामीण और निम्न-मध्यमवर्गीय महिलाओं के लिए उनके आत्मसम्मान और छोटी-मोटी आत्मनिर्भर जरूरतों का एकमात्र जरिया है। ऐसे में पोर्टल पर ताला लगाना महिलाओं के अधिकार पर प्रशासनिक प्रहार है

2. 'साइलेंट छंटनी': सत्यापन के नाम पर नाम काटने का खेल

कहानी का सबसे बड़ा और चिंताजनक पहलू यह है कि एक तरफ जहां नई पात्र महिलाओं को जोड़ने का रास्ता बंद कर दिया गया है, वहीं दूसरी तरफ पहले से पंजीकृत महिलाओं के नाम चुपचाप काटे जा रहे हैं।

मानसून सत्र के दौरान विधानसभा में गूंजे सवालों ने शासन की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए। महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े ने विधानसभा के पटल पर यह स्वीकार किया कि सत्यापन (Verification) प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर लाभार्थियों के नाम छांटे गए हैं।

[बॉक्स: विधानसभा में सरकार की दलील और आधिकारिक तर्क]

 मृत्यु के मामले: सरकार के अनुसार कई पंजीकृत लाभार्थियों की मृत्यु हो जाने के कारण नाम हटाए गए।

 आयकरदाता एवं शासकीय सेवा: कई मामलों में पाया गया कि लाभार्थी परिवार का कोई सदस्य आयकर दाता है या शासकीय सेवा में है। सरकार ऐसे मामलों में नाम काटने के साथ-साथ दी गई राशि की रिकवरी (वसूली) भी कर रही है।

 गलत तथ्य प्रस्तुत करना: शुरुआती दौर में हड़बड़ी में भरे गए फॉर्मों में दी गई गलत जानकारी का हवाला देकर नाम पृथक किए जा रहे हैं।

हालांकि, विपक्ष और विभागीय सूत्रों का दावा है कि सत्यापन के नाम पर अब तक 1.5 लाख से अधिक महिलाओं के नाम काटे जा चुके हैं। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह केवल प्रक्रियात्मक शुद्धिकरण है या फिर सरकारी खजाने पर बढ़ते आर्थिक बोझ को कम करने का एक 'साइलेंट फार्मूला'?

3. बजट का गणित: क्या भारी पड़ने लगी है योजना?

महतारी वंदन योजना के तहत वर्तमान में लगभग 69 लाख महिलाओं को हर महीने ₹1,000 की राशि हस्तांतरित की जा रही है। इसका सालाना बजटीय आवंटन लगभग ₹8,000 करोड़ बैठता है।

राज्य के कुल राजस्व बजट में ₹8,000 करोड़ का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। सूत्रों के मुताबिक, सत्यापन के जरिए हर महीने की जा रही छंटनी से सरकार के करोड़ों रुपये बच रहे हैं। यही वजह है कि जानकार इस बात से इनकार नहीं कर रहे कि बजटीय दबाव के चलते ही नए आवेदनों के लिए पोर्टल खोलने में शासन द्वारा लगातार देरी की जा रही है।

4. तीखे सवाल: शासन की नीयत और भविष्य का रास्ता

महतारी वंदन योजना के इस चक्रव्यूह ने राज्य के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में तीन बड़े यक्ष प्रश्न खड़े कर दिए हैं:

1. सतत प्रक्रिया का वादा कहां गया? जब योजना लागू करते समय इसे निरंतर चलने वाली प्रक्रिया बताया गया था, तो 28 महीनों से नए आवेदनों के लिए पोर्टल बंद क्यों है?

2. एरियर और बैकडेट पात्रता का क्या? भविष्य में जब भी पोर्टल पुनः खोला जाएगा, क्या मार्च 2024 से अब तक शादीशुदा हुई बेटियों को उनकी शादी या पात्रता की तिथि से पूरा एरियर दिया जाएगा?

3. बची हुई राशि का क्या इस्तेमाल? नाम काटने और सत्यापन के जरिए जो करोड़ों रुपये बचाए जा रहे हैं, क्या उनका इस्तेमाल नई पात्र महिलाओं को जोड़ने में होगा या बजटीय घाटा पटाने में?

[संपादकीय निष्कर्ष]

लोकतंत्र में योजनाएं चुनाव जीतने का जरिया हो सकती हैं, लेकिन वे जनता के भरोसे की बुनियाद होती हैं। महतारी वंदन योजना ने राज्य की लाखों महिलाओं में एक उम्मीद जगाई थी। यदि बजटीय सीमाओं के चलते सरकार इस योजना से हाथ खींच रही है या नए आवेदकों के लिए दरवाजे बंद रख रही है, तो यह प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों ही मोर्चों पर सवाल खड़े करता है। अब देखना यह होगा कि क्या साय सरकार आने वाले समय में पोर्टल खोलकर नवविवाहिताओं को उनका हक देती है या फिर यह इंतजार अगले चुनावों तक लंबा खींचता है।

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शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

खाकी का खूनी सच—क्या रक्षक ही बन बैठे हैं भक्षक?

  खाकी का खूनी सच—क्या रक्षक ही बन बैठे हैं भक्षक?



 बंद कमरों में कानून का कत्ल

जिस खाकी को जनता की सुरक्षा और कानून की रखवाली का जिम्मा सौंपा गया है, जब वही पुलिस लॉकअप के बंद कमरों में जुल्म और हिंसा की सीमाएं लांघ जाए, तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ही नहीं, बल्कि आम नागरिक की न्याय व्यवस्था पर से आस्था डिगने लगती है।

छत्तीसगढ़ के सरगुजा-बस्तर से लेकर उत्तर प्रदेश, बिहार और तमिलनाडु तक—हिरासत में टॉर्चर और मौत (Custodial Death) के मामले देश की न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। हाल ही में छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर से आए एक 7 साल पुराने मामले में अदालत के सख्त रुख ने एक बार फिर बहस छेड़ दी है कि क्या कानून के रखवाले ही कानून के हत्यारे बन रहे हैं?

1. अंबिकापुर का पंकज बेग मामला: 7 साल बाद अदालत का बड़ा हथौड़ा

अंबिकापुर (छत्तीसगढ़) के कोतवाली थाने का मामला वर्ष 2019 का है [02:48]। सूरजपुर जिले के अग्नाहारी गांव के रहने वाले आदिवासी युवक पंकज बेग को पुलिस ने केवल एक मामूली चोरी के संदेह में 21 जुलाई 2019 को हिरासत में लिया था [03:02]।

अगले ही दिन (22 जुलाई 2019) पंकज की लाश थाने से कुछ दूरी पर फंदे से लटकी मिली [03:28]। पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए एक थ्योरी गढ़ी कि आरोपी लॉकअप से फरार हो गया था और उसने आत्महत्या कर ली [03:41]। दूसरी तरफ, परिजनों का सीधा आरोप था कि पंकज को लॉकअप में ही पीट-पीटकर मार डाला गया और मामले की लीपापोती करने के लिए उसे फांसी पर लटकाकर फरारी का नाटक रचा गया [03:52]।

 विधानसभा से सड़कों तक प्रदर्शन: इस आदिवासी युवक की मौत के बाद भारी राजनीतिक और सामाजिक बवाल हुआ [04:27]। तत्कालीन थाना प्रभारी (TI) समेत 5 पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया और IPC धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत मामला दर्ज किया गया [04:51]।

 फाइल बंद करने की कोशिश और कोर्ट का हस्तक्षेप: समय बीतने के साथ पुलिस प्रशासन ने मामले पर पर्दा डालने और क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने की कोशिश की [05:08]। परंतु 30 जून 2026 को अंबिकापुर के सप्तम अपर सत्र न्यायाधीश ने पुलिस की 'आत्महत्या व फरारी' की कहानी को सिरे से खारिज कर दिया [05:36]।

 री-इन्वेस्टिगेशन और SIT का गठन: अदालत ने मामले की दोबारा जांच (Re-investigation) का आदेश देते हुए सरगुजा SP की देखरेख में स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) गठित करने का निर्देश दिया [06:08]। परिजन अब भी निष्पक्षता के लिए मामले की CBI जांच की मांग कर रहे हैं [06:19]।

2. देश भर में हिरासत में मौतों के भयावह आंकड़े

अंबिकापुर का मामला कोई इकलौती घटना नहीं है। एनसीआरबी (NCRB) के आंकड़े गवाही देते हैं कि देश में हर साल 2,000 से अधिक लोगों की मौत पुलिस/न्यायिक हिरासत में होती है, जिनमें से 150 से 200 मौतें सीधे पुलिस लॉकअप के भीतर दर्ज की जाती हैं [01:41]।

 उत्तर प्रदेश और बिहार की स्थिति: उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में कस्टोडियल टॉर्चर और एनकाउंटर की थ्योरी पर लगातार सवाल उठते रहे हैं [02:05]।

 बिहार का भरत तिवारी एनकाउंटर मामला: हाल ही में बिहार में भरत तिवारी एनकाउंटर मामले को लेकर सोशल मीडिया और आम जनता में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली, जहाँ पुलिसिया कार्रवाई के वीडियो सामने आने पर कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक मंशा पर सीधे सवाल खड़े हुए [02:05]।

3. तमिलनाडु का सात्तांकुलम (Sathankulam) केस: न्याय की एक ऐतिहासिक नजीर

जब भी पुलिस टॉर्चर और हिरासत में मौत की बात होती है, तमिलनाडु का चर्चित सात्तांकुलम (साधना कुलम) मामला सबसे बड़ी नजीर बनकर सामने आता है [06:37]।

 क्या था मामला? लॉकडाउन के दौरान मामूली दुकान समय सीमा का उल्लंघन करने पर पुलिस पिता-पुत्र (जयराज और बेनिक्स) को उठाकर थाने ले गई और रात भर बर्बरतापूर्वक पीट-पीटकर उनकी हत्या कर दी [06:46]।

 अदालत का ऐतिहासिक फैसला: मदुरै कोर्ट और जांच एजेंसियों के कड़े रुख के बाद आरोपी 9 पुलिसकर्मियों को कड़ा सबक सिखाया गया [06:55]। अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी की थी कि "जो कानून के रक्षक हैं, उन्होंने ही कानून का कत्ल किया है।" [07:05]

 अंबिकापुर केस के लिए उम्मीद: तमिलनाडु का यह फैसला देश भर के कस्टोडियल डेथ मामलों के लिए एक नजीर बन चुका है [07:15]। यदि तमिलनाडु में बर्बरता करने वाले पुलिसकर्मी कानून के शिकंजे में आ सकते हैं, तो छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में 5 पुलिसकर्मियों पर कानून का शिकंजा क्यों नहीं कसा जा सकता? [07:27]

4. सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस और संवैधानिक अधिकार

भारत के संविधान और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार:

1. सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी पुलिस की: यदि कोई व्यक्ति पुलिस की हिरासत में है, तो उसकी शारीरिक सुरक्षा की 100% जिम्मेदारी पुलिस प्रशासन की होती है [07:44]।

2. सामान्य या प्राकृतिक मौत का बहाना नहीं: कस्टडी में हुई किसी भी संदिग्ध मौत को आसानी से 'आत्महत्या' या 'प्राकृतिक मौत' बताकर खारिज नहीं किया जा सकता [07:58]।

3. डी.के. बासु गाइडलाइन्स: सुप्रीम कोर्ट की डी.के. बासु गाइडलाइन्स के तहत गिरफ्तारी के दौरान परिजनों को सूचना देना, मेडिकल जांच कराना और टॉर्चर न करना अनिवार्य है।

निष्कर्ष: क्या अंबिकापुर के पीड़िता परिवार को मिलेगा न्याय?

अंबिकापुर कोर्ट का नया आदेश पुलिस विभाग की कार्यशैली पर करारा तमाचा है। अब देखना यह होगा कि सरगुजा पुलिस की SIT इस मामले में कितनी निष्पक्षता से जांच करती है या परिजनों की CBI जांच की मांग को स्वीकार किया जाता है [08:06]।

सवाल केवल एक पंकज बेग या जयराज-बेनिक्स का नहीं है; सवाल इस बात का है कि क्या खाकी वर्दी पहनने वाले अधिकारियों को कानून से ऊपर रहने की छूट मिलती रहेगी, या न्याय का हथौड़ा इसी तरह चलता रहेगा?

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