शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

राजनीति का अजब रंग: जब अपनों ने मोड़ा मुंह, तो विरोधियों ने बनाई ढाल!

 राजनीति का अजब रंग: जब अपनों ने मोड़ा मुंह, तो विरोधियों ने बनाई ढाल!


 राजनीति के शतरंज पर कौन कब मोहरा बन जाए और कौन शह दे दे, यह कहना मुश्किल होता है। छत्तीसगढ़ की सियासत में इन दिनों कुछ ऐसा ही चौंकाने वाला दृश्य देखने को मिल रहा है [00:00]। रायपुर से लगातार आठ बार विधायक रहे और वर्तमान सांसद बृजमोहन अग्रवाल [00:07], जिन्हें कभी प्रदेश का सबसे असरदार और कद्दावर नेता माना जाता था, आज अपनी ही पार्टी और सरकार में अलग-थलग पड़ते दिखाई दे रहे हैं [02:51]।

अजीब विडंबना यह है कि जिस नेता की मदद और रहमों-करम पर दर्जनों राजनीतिक करियर खड़े हुए, आज वे संकट के समय चुप्पी साधे बैठे हैं [01:07]। वहीं दूसरी ओर, जीवन भर जिन कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ उन्होंने राजनीतिक लड़ाई लड़ी, वे आज उनके समर्थन में ढाल बनकर खड़े हैं [01:18]।

विवाद की चिंगारी: IAS अफसर से तल्खी और लोकसभा में शिकायत

पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब सांसद बृजमोहन अग्रवाल द्वारा जनता के कामों के लिए लिखे गए पत्रों को लेकर प्रशासनिक उपेक्षा की बात सामने आई [02:02]। जब उन्होंने मुख्यमंत्री सचिवालय में इसकी शिकायत की, तो आईएएस अधिकारी अमित कटारिया के साथ उनकी बातचीत कहासुनी में बदल गई [02:22]। आरोप है कि अफसर के तीखे रवैये से आहत होकर सांसद बृजमोहन अग्रवाल को लोकसभा में विशेषाधिकार हनन (Privilege Motion) की शिकायत दर्ज करानी पड़ी [00:18]।

पार्टी के भीतर सन्नाटा: क्या यह सत्ता का डर है या रणनीतिक किनारा?

सांसद बृजमोहन अग्रवाल के इस स्टैंड के बाद उम्मीद की जा रही थी कि पूरी पार्टी और संगठन उनके साथ खड़ा होगा [00:43]। लेकिन इसके उलट, भाजपा संगठन और सरकार में बैठे दिग्गजों ने साध ली है चुप्पी [01:46]।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता के नए समीकरणों के चलते कोई भी नेता अनुशासन का डंडा चलने के डर से बृजमोहन अग्रवाल के समर्थन में बयान देने का जोखिम नहीं उठाना चाहता [03:12]। चर्चाएं तो यह भी हैं कि प्रशासनिक अधिकारियों को मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और वित्त मंत्री ओपी चौधरी जैसे दिग्गजों का वरदहस्त प्राप्त है, जिसके कारण नेता खुलकर सामने आने से बच रहे हैं [03:47]।

विरोधी बने ढाल: कांग्रेस ने उठाया प्रशासनिक अराजकता का मुद्दा

एक तरफ जहां अपनों ने मुंह फेर लिया है, वहीं कांग्रेस नेता इस मुद्दे पर पूरी ताकत से बृजमोहन अग्रवाल के समर्थन में उतर आए हैं [01:18]।

 भूपेश बघेल का हमला: पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने तंज कसते हुए कहा कि जब राज्य की कमान नागपुर और दिल्ली से संचालित होगी, तो चुने हुए जनप्रतिनिधियों का ऐसा अपमान होना स्वाभाविक है [05:27]।

 डॉ. शिव डहरिया की आपत्ति: पूर्व मंत्री डॉ. शिव डहरिया ने आरोप लगाया कि प्रदेश में प्रशासनिक अराजकता का माहौल है और अफसरों को कुछ मंत्रियों का संरक्षण मिला हुआ है [06:08]।

 मोहम्मद अकबर का पत्र: पूर्व मंत्री मोहम्मद अकबर ने तो मुख्य सचिव को पत्र लिखकर जनप्रतिनिधियों के सम्मान और उनके पत्रों पर कड़ाई से अमल करने के शासकीय परिपत्रों की याद दिलाई है [06:45]।

भविष्य की सियासत: टकराव या नया मोड़?

चाहे पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्टेडियम का मामला हो या मंत्री पद से अचानक इस्तीफे का घटनाक्रम [07:37], बृजमोहन अग्रवाल को किनारे करने के संकेत काफी समय से मिल रहे थे [07:37]। लेकिन एक आईएएस अफसर और वरिष्ठ सांसद के बीच शुरू हुई यह तल्खी अब सिर्फ व्यक्तिगत विवाद नहीं रही, बल्कि इसने सत्ता-संगठन और विपक्ष के बीच एक बड़ा राजनीतिक रूप ले लिया है [08:01]।

देखना दिलचस्प होगा कि छत्तीसगढ़ की राजनीति का यह 'बरगद' इस राजनीतिक और प्रशासनिक झोंके से खुद को कैसे संभालता है!

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गुरुवार, 13 अगस्त 2026

श्रद्धा का व्यापार या कमीशनखोरी का नया मॉडल?

 श्रद्धा का व्यापार या कमीशनखोरी का नया मॉडल?


अटल जी के नाम पर आस्था का ढोंग और 46 करोड़ के 'कांस्य घोटाले' का पूरा सच


प्रस्तावना: जब विचार और प्रतीक भी टेंडर बन जाएं

राजनीति में जब निष्ठा का स्थान अवसरवादिता और सिद्धांतों का स्थान कमीशनखोरी ले ले, तो महापुरुषों के नाम और स्मृतियां भी महज वित्तीय घोटालों के आवरण (कवर) बन जाती हैं। छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माता और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के प्रति राज्य में हर राजनीतिक दल का सम्मान रहा है। परंतु, वर्तमान में प्रदेश की विष्णुदेव साय सरकार के दौरान 'श्रद्धेय' के नाम पर जो कुछ देखने को मिल रहा है, उसने प्रशासनिक पारदर्शिता और नैतिक राजनीति दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

छत्तीसगढ़ के 187 नगरीय निकायों में ₹46 करोड़ की लागत से बनने वाले 'अटल परिसर' और वहां स्थापित की जाने वाली कांस्य (Bronze) की प्रतिमाओं के नाम पर जो भ्रष्टाचार का खेल उजागर हुआ है, उसने राज्य की सियासत में भूचाल ला दिया है।

दावे बनाम हकीकत: पहली बारिश में उतर गया आस्था का रंग

राज्य सरकार ने बड़े जोर-शोर से घोषणा की थी कि प्रदेश के सभी 187 नगरीय निकायों में अटल जी की याद में 'अटल परिसर' का निर्माण किया जाएगा। प्रत्येक निकाय में लगभग ₹14 लाख की लागत से अटल जी की अष्टधातु या कांस्य की विशाल प्रतिमा स्थापित करने के लिए बजट स्वीकृत किया गया।

लेकिन पहली ही बारिश ने सत्ता और ठेकेदारों के इस गठजोड़ की पोल खोलकर रख दी:

1. कटघोरा (कोरबा) मामला: कटघोरा के अटल परिसर में स्थापित ₹14 लाख की तथाकथित 'कांस्य प्रतिमा' पर जब पहली मानसूनी बारिश पड़ी, तो ऊपर का धात्विक पेंट बह गया। पेंट बहते ही नीचे से सीमेंट और प्लास्टर का ढांचा बाहर आ गया। यानी कागजों पर कांस्य प्रतिमा दिखाकर जनता के पैसे से सीमेंट की मूर्ति लगा दी गई [07:39]।

2. मरवाही का विवाद: मरवाही में स्थापित की गई अटल जी की प्रतिमा में कुछ ही दिनों के भीतर बड़ी-बड़ी दरारें आ गईं, जिससे मूर्ति के निर्माण में इस्तेमाल हुई घटिया सामग्री साफ नजर आने लगी [08:51]।

जिस महापुरुष के नाम पर 'हम बनाए हैं, हम ही संवारेंगे' का नारा दिया जाता रहा, उन्हीं की प्रतिमा के नाम पर सीमेंट-प्लास्टर का गोलमाल कर करोड़ों रुपये डकार लिए गए।

भ्रष्टाचार का डिसेंट्रलाइज्ड मॉडल: क्यों नहीं हुआ केंद्रीकृत टेंडर?

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा प्रशासनिक सवाल इसके टेंडर प्रक्रिया पर उठ रहा है। जानकारों और स्थानीय मूर्तिकारों का कहना है कि यदि सरकार चाहती तो पूरे प्रदेश की 187 मूर्तियों के लिए एक पारदर्शी, राज्य-स्तरीय केंद्रीकृत टेंडर (Centralized Tender) जारी कर सकती थी, जिससे गुणवत्ता सुनिश्चित होती।

इसके बजाय, पैसों को अलग-अलग निकायों में बांट दिया गया। आरोप है कि "अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपने को दे" की तर्ज पर स्थानीय स्तर पर अपने पसंदीदा ठेकेदारों और सत्ताधारी दल से जुड़े लोगों को उपकृत करने के लिए टुकड़ों में काम बांटा गया [06:25]।

 स्थानीय मूर्तिकारों की अनदेखी की गई।

 बाहरी व प्रभावशील ठेकेदारों को मनमाने दामों पर काम सौंपा गया।

 गुणवत्ता जांच (Quality Control) के नाम पर जिम्मेदार अधिकारियों ने आंखें मूंद लीं।

अतीत के पन्नों से: जब श्रद्धांजलि में लगे थे ठहाके

अटल जी की स्मृतियों के अनादर का यह कोई पहला मामला नहीं है। वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, अतीत में जब डॉ. रमन सिंह के शासनकाल के दौरान राज्य में अटल जी की 'अस्थि कलश यात्रा' निकाली गई थी, तब भी मंच पर मौजूद तत्कालीन कद्दावर मंत्रियों के ठहाके लगाते हुए वीडियो वायरल हुए थे [04:33]।

उस समय भी पार्टी और सरकार की भारी किरकिरी हुई थी। अब अस्थि कलश से शुरू हुआ यह उपेक्षा का सफर 'प्रतिमा घोटाले' तक पहुंच चुका है।

विपक्ष का हमला और जनता के सवाल

प्रतिमाओं में फर्जीवाड़े और दरारें आने की खबरें सार्वजनिक होते ही विपक्षी दलों और युवा संगठनों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है [09:00]। कांग्रेस और युवा कांग्रेस का आरोप है कि जो पार्टी खुद को अटल जी के विचारों की वाहक बताती है, उसी के शासनकाल में उनकी मूर्तियों पर कमीशनखोरी की जा रही है।

जनता के तीन सीधे सवाल:

1. टैक्सपेयर्स के पैसे का हिसाब कौन देगा? जनता की कमाई के 46 करोड़ रुपये में से कितनी राशि कांसा के नाम पर सीमेंट में तब्दील हुई?

2. दोषी ठेकेदारों और अधिकारियों पर कार्रवाई कब? क्या सीमेंट पर कांस्य का पेंट चढ़ाने वाले ठेकेदारों पर ब्लैकलिस्टिंग और एफआईआर (FIR) दर्ज होगी?

3. क्या आस्था भी अब टेंडर का हिस्सा है? राम मंदिर के चढ़ावे से लेकर अटल जी की प्रतिमा तक, क्या हर धार्मिक और वैचारिक प्रतीक केवल कटमनी (Cut-money) का माध्यम बन गया है?

निष्कर्ष: दिखावे की राजनीति पर भारी पड़ती हकीकत

अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था— "सरकारें आएंगी, जाएंगी, पार्टियां बनेंगी, बिगड़ेंगी; मगर यह देश रहना चाहिए, इस देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिए।"

परंतु आज के दौर में जिस तरह महापुरुषों के सिद्धांतों और स्मृतियों को केवल राजनीतिक ब्रांडिंग और बजट खपाने का जरिया बना दिया गया है, वह लोकतंत्र और जन-विश्वास दोनों के लिए चिंताजनक है। बारिश के पानी ने सिर्फ मूर्ति का पेंट नहीं धोया, बल्कि उन दावों के रंग भी उतार दिए हैं जो सुशासन और जीरो टॉलरेंस का ढिंढोरा पीटते नहीं थकते।

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बुधवार, 12 अगस्त 2026

सरगुजा में उठी बगावत की नई आवाज

 सरगुजा में उठी बगावत की नई आवाज


 क्या सत्ता के समीकरण बिगाड़ेंगे रवि भगत? 


छत्तीसगढ़ के उत्तरी बेल्ट—सरगुजा और रायगढ़ अंचल से इन दिनों एक ऐसा राजनीतिक तूफान उठ रहा है, जिसकी गूंज आने वाले समय में रायपुर की सत्ता के गलियारों तक सुनाई देगी [00:11]। कभी भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के प्रदेश अध्यक्ष रहे एक युवा आदिवासी चेहरे ने अपनी ही सरकार की नीतियों और प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं [00:22]।

हम बात कर रहे हैं रवि भगत की [00:57]। रवि भगत को पहले कारण बताओ नोटिस (Showcause Notice) थमाया गया, फिर पद से हटाया गया और अब लैलूंगा में 'साइकिल कांड' के दौरान हुए विरोध प्रदर्शन के बाद सलाखों के पीछे धकेल दिया गया है [00:35], [06:50]।

लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या रवि भगत सिर्फ घटिया साइकिल या डीएमएफ (District Mineral Foundation) फंड का मुद्दा उठा रहे हैं, या फिर वे सरगुजा संभाग में एक नया आदिवासी शक्ति केंद्र बनने की राह पर हैं? [01:22]

1. बगावत की वजह: DMF फंड और जल-जंगल-जमीन का सवाल [03:42]

रवि भगत के इस कड़े रुख और बगावत की शुरुआत डीएमएफ (DMF) फंड के मुद्दे से हुई [03:42]।

 क्या है नियम: नियम के मुताबिक, जिस इलाके में खदानें और उद्योग चल रहे हैं, वहाँ के आदिवासी प्रदूषण और तबाही झेलते हैं, इसलिए डीएमएफ का पैसा सीधे वहीं के प्रभावित गांवों के विकास पर खर्च होना चाहिए [03:42]।

 सीधा सवाल: खुद इसी आदिवासी अंचल से आने वाले रवि भगत ने अपनी ही सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों से पूछ लिया कि तमनार और रायगढ़ के खनन प्रभावित गांवों का हक मारकर यह पैसा कहाँ भेजा जा रहा है? [04:04]

इसी सवाल के बाद राजनीति गरमा गई [04:28]। रायगढ़ का इलाका, जिसे राज्य के वित्त मंत्री ओपी चौधरी अपना गढ़ बनाने में लगे हुए हैं, वहाँ रवि भगत की इस आवाज ने सत्ता को असहज कर दिया [04:28], [04:43]। सत्ता के पावर सेंटर और रवि भगत के बीच ऑल इज नॉट वेल (All is not well) की खबरें छन-छन कर बाहर आने लगीं [04:57]।

2. कारण बताओ नोटिस से गिरफ्तारी तक का सफर [05:08]

 अनुशासनहीनता का आरोप: जब रवि भगत ने डीएमएफ फंड और स्थानीय आदिवासियों की आवाज उठाई, तो पार्टी हाईकमान ने इसे अनुशासनहीनता मानकर शोकाज नोटिस जारी किया [05:08]।

 इस्तीफा और सीधा संघर्ष: रवि भगत ने झुकने के बजाय पार्टी से इस्तीफा दे दिया और स्थानीय मुद्दों (पेड़ों की कटाई, घटिया सड़क निर्माण, और भ्रष्टाचार) को लेकर जनता के बीच चले गए [05:34], [06:21]।

 साइकिल घोटाला विरोध और गिरफ्तारी: लैलूंगा में सरस्वती साइकिल योजना के तहत आदिवासी बच्चियों को दी जा रही घटिया साइकिलों के विरोध में जब रवि भगत अपने समर्थकों के साथ पहुँचे [06:50], तो प्रशासन ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया [07:01]।

 मांग: रवि भगत ने सवाल उठाया कि आदिवासी बच्चियों को घटिया साइकिलें बाँटने के बजाय सरकार सीधे उनके खातों में फंड क्यों स्थानांतरित नहीं कर देती? [07:23]

गिरफ्तारी के वक्त रवि भगत ने आक्रामक अंदाज में कहा कि “2 तारीख का प्रस्तावित आंदोलन रुकेगा नहीं, हर व्यक्ति रवि भगत बनकर इस आंदोलन को सफल बनाएगा। [06:41], [07:13]

3. सामाजिक और जनसांख्यिकीय गणित: उरांव बनाम कंवरा समीकरण [08:07]

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रवि भगत की गिरफ्तारी सिर्फ एक तात्कालिक कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह संदेश देने की कोशिश है कि सत्ता और नेतृत्व के खिलाफ उठने वाली आवाज को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा [07:44]। हालांकि, यह दांव पासा उल्टा भी कर सकता है [08:07]:

1. आबादी का गणित: रवि भगत उरांव जनजाति से आते हैं [08:07]। छत्तीसगढ़ की कुल जनसंख्या में उरांव समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 9% के आसपास है [08:41]।

2. मुख्यमंत्री का समीकरण: राज्य के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय कंवर समुदाय से आते हैं, जिसकी जनसंख्या राज्य में लगभग 11% से अधिक है [08:20], [08:30]।

3. सरगुजा का जनमत: पिछले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने सरगुजा संभाग की सभी 14 सीटें जीतकर क्लीन स्वीप किया था [06:10]। ऐसे में उरांव बहुल इलाकों में रवि भगत का उभार भाजपा के बने-बनाए समीकरणों को बिगाड़ सकता है [01:44], [08:07]।

4. क्या मैदानी अंचल के अमित बघेल की तर्ज पर उभरेगा सरगुजा का नया शक्ति केंद्र? [01:56]

मैदानी इलाकों में जिस तरह जय जोहार पार्टी/क्रांति सेना के अमित बघेल ने 'छत्तीसगढ़ियावाद' के मुद्दे पर कांग्रेस और भाजपा दोनों की नींद उड़ा रखी है (और लंबे समय तक जेल में रहने के बाद हाल ही में जमानत पर छूटे हैं) [02:20], [02:45], ठीक उसी तर्ज पर क्या रवि भगत भी सरगुजा और रायगढ़ अंचल में एक नया क्षेत्रीय/आदिवासी शक्ति केंद्र बन जाएंगे? [01:56], [03:19]

छत्तीसगढ़ में अतीत का इतिहास यह भी दर्शाता है कि भाजपा की अनुशासित कार्यशैली में जो भी बड़ा चेहरा पार्टी लाइन से अलग हटा, उसका करियर धीरे-धीरे हाशिए पर चला गया [09:15]। चाहे बस्तर के सोहन पोटाई हों, सरगुजा संभाग के वरिष्ठ नेता नंदकुमार साय हों, या फिर ननकीराम कंवर—कई बड़े आदिवासी नेताओं को किनारे किया जा चुका है [09:33]।

निष्कर्ष: सत्ता के लिए नई सिरदर्दी या बगावत का अंत? [09:54]

रवि भगत का यह तेवर सिर्फ वित्त मंत्री ओपी चौधरी ही नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और रायगढ़-सरगुजा अंचल की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बनता दिख रहा है [09:54]।

क्या रवि भगत जेल से बाहर आकर अपने संघर्ष को एक बड़े जन-आंदोलन में बदल पाएंगे [09:02]? या फिर अनुशासित संगठन की मशीनरी इस बगावत को शांत कर देगी? यह तो आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन इतना तय है कि सरगुजा की वादियों में उठा यह तूफान रायपुर की सत्ता को आराम से बैठने नहीं देगा [00:11]।

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मंगलवार, 11 अगस्त 2026

विकास का ख़ूनी इतिहास और 'शांति के टापू' में सुलगते सवाल

 विकास का ख़ूनी इतिहास और 'शांति के टापू' में सुलगते सवाल



सूरजपुर भूमि अधिग्रहण संघर्ष और राज्य-जनता का बढ़ता टकराव

प्रस्तावना: खाकी की ढाल और बंजर होते सपने

छत्तीसगढ़ को देश में सदैव ‘शांति का टापू’ और अपार प्राकृतिक संपदाओं एवं धन-धान्य से परिपूर्ण राज्य के रूप में देखा गया है। लेकिन जब विकास की परिभाषा केवल खदानों की खुदाई और कॉर्पोरेट घरानों के मुनाफे तक सीमित हो जाए, तो मिट्टी की खुशबू बारूद और आंसुओं के धुएं में बदलने लगती है।

हाल ही में सूरजपुर जिले के धर्मपुर गांव [00:35] में जो कुछ भी हुआ, उसने एक बार फिर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और आम नागरिकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि "क्या विकास की अंतिम कीमत केवल किसान, मजदूर और ग्रामीण ही भुगतेंगे?"

ग्राउंड ज़ीरो: धर्मपुर में आखिर क्या हुआ?

सूरजपुर के धर्मपुर क्षेत्र में कोल इंडिया की सहायक कंपनी SECL (साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड) [03:34] को कोयला खदान विस्तार के लिए भूमि आवंटित की गई है। शुक्रवार की सुबह जब भारी पुलिस बल के साथ प्रशासन भूमि का अधिग्रहण करने पहुंचा, तो ग्रामीणों का सब्र का बांध टूट गया।

ग्रामीणों का आरोप है कि:

1. उचित मुआवजे का अभाव: पुश्तैनी जमीनों के एवज में मिलने वाली राशि अत्यंत अपर्याप्त है [03:55]।

2. रोजगार की अनिश्चितता: जिनकी जमीनें ली जा रही हैं, उनके परिजनों को स्थायी नौकरी देने पर कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया जा रहा [04:02]।

3. फर्जी ग्राम सभाएं: 'पेसा कानून' (PESA Act) और पंचायती राज अधिनियम को ताक पर रखकर कथित तौर पर कागजों में ही अनुमोदन की खानापूर्ति कर ली गई [06:14]।

बातचीत से शुरू हुई चर्चा देखते ही देखते हिंसक टकराव में बदल गई। पुलिस द्वारा किए गए लाठीचार्ज के जवाब में ग्रामीणों ने गुलेल और पत्थरों से मोर्चा खोल दिया [04:58]। इस हिंसक भिड़ंत में एक डीएसपी सहित लगभग दो दर्जन पुलिसकर्मी घायल हुए [00:44], वहीं दूसरी ओर पुलिस की लाठियों के शिकार तीन दर्जन से अधिक ग्रामीण (महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग) हुए [03:24]।

संवैधानिक अधिकार बनाम सत्ता की लाठी

भारतीय संविधान, पंचायती राज व्यवस्था और पेसा (PESA) कानून स्पष्ट रूप से यह अधिकार देते हैं कि किसी भी ग्रामीण या अनुसूचित क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण से पूर्व पारदर्शी तरीके से 'ग्राम सभा' की सहमति अत्यंत आवश्यक है [06:14]।

परंतु जब स्थानीय प्रशासन और जिला पुलिस बल उद्योगपतियों के हितों के संरक्षण के लिए ढाल बनकर खड़े होने लगते हैं, तब आम जनता का कानून-व्यवस्था और शासन से भरोसा उठने लगता है [01:24]। धर्मपुर की यह घटना इस बात की बानगी है कि जब पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोई गई जमीन को जबरन छीनने की कोशिश की जाती है, तो शांत और सीधे-साधे ग्रामीणों का गुस्सा आक्रोश में बदल जाता है।

खुफिया तंत्र की नाकामी और पूर्व चेतावनियां

धर्मपुर की हिंसक घटना कोई अचानक घटी इत्तेफाक की बात नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक उदासीनता और खुफिया तंत्र (Intelligence Failure) की घोर विफलता का नतीजा है [05:59]। इससे पूर्व रायगढ़ जिले के तमनार क्षेत्र में भी भूमि अधिग्रहण को लेकर इसी तरह का उग्र जनाक्रोश देखा जा चुका है [06:41]।

जगह-जगह हो रहे ये हिंसक टकराव इस बात की सीधी चेतावनी हैं कि अगर सरकार ने अपनी नीतियों और नियत में बदलाव नहीं किया, तो यह असंतोष किसी एक जिले तक सीमित नहीं रहेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण: उठते यक्ष प्रश्न

1. तनख्वाह जनता की, वफादारी कॉर्पोरेट की?

जिस पुलिस बल को जनता की जान-माल की रक्षा के लिए करदाताओं के पैसों से वेतन मिलता है, वह सत्ता के इशारे पर ग्रामीणों पर लाठियां भांजने के लिए क्यों मजबूर की जाती है? [01:24]

2. उद्योगपतियों का हित या किसान का वजूद?

बड़ी-बड़ी चुनावी सभाओं में "किसान हित" और "अन्नदाता" के नारे लगाने वाली सरकारें आखिर फैसला लेते वक्त उद्योगपतियों के पक्ष में क्यों खड़ी नजर आती हैं? [01:49]

3. विकास का असली हकदार कौन?

यदि विकास की परिपरिभाषा में अपनी जल, जंगल और जमीन गंवाने वाला मूल निवासी ही बेघर और घायल हो जाए, तो ऐसा विकास किसके लिए है?

निष्कर्ष

सूरजपुर का धर्मपुर गांव आज शांति और न्याय की गुहार लगा रहा है। छत्तीसगढ़ की जनता अपनी सहनशीलता और शांतिप्रिय स्वभाव के लिए जानी जाती है, लेकिन शांति को कमजोरी समझ लेना किसी भी सरकार के लिए घातक साबित हो सकता है। सरकार और प्रशासन को बल प्रयोग का रास्ता छोड़कर संवाद, पारदर्शिता और न्यायसंगत पुनर्वास नीति का मार्ग अपनाना होगा, वरना विकास की यह होड़ राज्य के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर देगी।

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