"छत्तीसगढ़ में खाकी और कुर्सी का खेल: महिला सुरक्षा पर सवाल और जांच का अंतहीन चक्र"
आज हम बात करने जा रहे हैं छत्तीसगढ़ की एक ऐसी कड़वी सच्चाई पर, जो व्यवस्था की सुस्त चाल और रसूखदारों के आगे झुकते कानून की पोल खोलती है।
दोस्तों, क्या आपने कभी सोचा है कि जब महकमे के बड़े अफसरों पर, जिन पर कानून की रक्षा करने या जनता को न्याय दिलाने की जिम्मेदारी होती है, वही जब खुद यौन उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोपों के घेरे में आ जाएं, तो क्या होता है? क्या उन्हें वाकई सजा मिलती है, या फिर मामला सिर्फ जांच की फाइलों में दफन होकर रह जाता है?
आज हम छत्तीसगढ़ के दो चर्चित मामलों पर खुलकर बात करेंगे—एक तरफ है निलंबित आईपीएस अधिकारी रतन लाल डांगी से जुड़ा हाई-प्रोफाइल मामला, जिसमें जांच अधिकारी बदलने का खेल चल रहा है! और दूसरी तरफ है राज्य पाठ्यपुस्तक निगम के पूर्व महाप्रबंधक अरविंद कुमार पांडेय का मामला, जिस पर हाईकोर्ट तक को दखल देना पड़ा।
आइए, एक-एक करके पर्दा उठाते हैं इस पूरे खेल से।
रतन लाल डांगी मामला और जांच अधिकारी बदलने का नया खेल
सबसे पहले बात करते हैं छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित निलंबित आईपीएस अधिकारी रमन लाल डांगी मामले की। इस पूरे मामले में जांच की प्रक्रिया एक बार फिर से बहुत बड़े सवालों के घेरे में आ खड़ी हुई है।
इस बार सवाल सिर्फ आरोपों या जांच की दिशा पर नहीं उठ रहा है, बल्कि उस अधिकारी के नाम को लेकर उठ रहा है, जिसे विभागीय जांच में सरकार का पक्ष रखने की जिम्मेदारी दी जानी थी!
जरा गौर फरमाइएगा तारीखों और नामों पर— 17 सितंबर 2026 को जो प्रस्ताव भेजा गया था, उसमें आईपीएस प्रशांत कुमार अग्रवाल का नाम प्रस्तुकर्ता अधिकारी (Presenting Officer) के तौर पर सामने आया था। लेकिन, इसके ठीक कुछ ही दिनों बाद, यानी 29 सितंबर को जो अंतिम आदेश जारी हुआ, उसमें बड़ा फेरबदल कर दिया गया। प्रशांत कुमार अग्रवाल की जगह यह जिम्मेदारी महिला आईपीएस पारुल माथुर को सौंप दी गई।
महज 12 दिनों के भीतर हुए इस अचानक बदलाव ने प्रशासनिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि महज 12 दिन के भीतर प्रस्तुकर्ता अधिकारी बदलना पड़ गया? क्या इसके पीछे कोई अंदरूनी दबाव है या फिर जांच को प्रभावित करने की कोई सोची-समझी रणनीति?
याद कीजिए, यह पूरा मामला शुरू कहां से हुआ था? रमन लाल डांगी के खिलाफ एक महिला ने बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई थी। पीड़िता ने सीधे पुलिस मुख्यालय में इसकी शिकायत दी थी। लेकिन जैसे ही जांच शुरू हुई, पीड़िता ने पूरी प्रक्रिया और उसकी निष्पक्षता पर ही सवाल खड़े कर दिए। मामला जब पुलिस महकमे के भीतर सुसझाई से हल नहीं हुआ, तो न्याय की उम्मीद में यह मामला अदालत तक जा पहुंचा। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में इस मामले को लेकर बाकायदा याचिका दायर की गई, जिसमें पूरी तरह से निष्पक्ष जांच की मांग उठाई गई।
हाईकोर्ट की सख्ती के बाद गृह सचिव और पुलिस मुख्यालय को जवाब तलब करना पड़ा। पीड़िता की तरफ से पहले की गई लीपापोती और जांच पर लगातार आपत्तियां दर्ज कराई जा रही थीं, और इसी वजह से आगे की जांच के लिए नई व्यवस्था पर विचार करने की बात कही गई थी। लेकिन नई व्यवस्था के नाम पर अधिकारियों का यह अदला-बदली का खेल जनता के मन में शक पैदा करता है कि क्या वाकई दूध का दूध और पानी का पानी हो पाएगा?
पाठ्यपुस्तक निगम के पूर्व GM अरविंद पांडेय का मामला - जब हाईकोर्ट को करनी पड़ी दखलअंदाजी:
ऐसा नहीं है कि यह मामला सिर्फ पुलिस विभाग तक सीमित है। छत्तीसगढ़ के दूसरे निगम-मंडलों और विभागों का भी यही हाल है। चलिए आपको ले चलते हैं एक ऐसे मामले की तरफ, जिसने प्रशासनिक तंत्र की संवेदनहीनता को बेनकाब कर दिया है।
हम बात कर रहे हैं छत्तीसगढ़ राज्य पाठ्यपुस्तक निगम के पूर्व महाप्रबंधक (GM) अरविंद कुमार पांडेय की। इन पर भी महिला कर्मचारियों द्वारा यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment) जैसे बेहद गंभीर आरोप लगाए गए थे।
लेकिन देखिए खेल कैसे खेला जाता है? जब महिला ने शिकायत की, तो खानापूर्ति करने के लिए 2 मार्च 2022 को एक पांच सदस्यीय आंतरिक शिकायत समिति (Internal Complaints Committee) का गठन कर दिया गया। लेकिन उस समिति की बनावट में ही खोट था!
पीड़ित महिला ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी कि समिति में जो सदस्य रखे गए हैं, वे तत्कालीन महाप्रबंधक (यानी आरोपी अधिकारी) से पदानुक्रम में कनिष्ठ (Junior) हैं। नियम यह कहता है कि निष्पक्ष जांच के लिए समिति के सदस्य उच्च या समकक्ष स्तर के होने चाहिए, लेकिन यहाँ तो हद यह थी कि उस पूरी समिति में एक भी महिला सदस्य तक को शामिल नहीं किया गया था!
जब निगम प्रबंधन से सवाल किया गया, तो उनका बेहद अजीब और गैर-जिम्मेदाराना तर्क सामने आया—उनका कहना था कि निगम में महिला कर्मचारियों की संख्या कम है, इसलिए जो उपलब्ध स्टाफ था, उसी से समिति बना दी गई! क्या वाहियात बहाना है! क्या न्याय का गला घोंटने के लिए ऐसी ओछी दलीलें काफी हैं?
लेकिन शुक्र है न्यायपालिका का। बिलासपुर हाईकोर्ट ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाया और इस पूरी दोषपूर्ण आंतरिक जांच समिति की रिपोर्ट को सिरे से खारिज करते हुए रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने साफ निर्देश दिए कि इस पूरे मामले की नए सिरे से निष्पक्ष जांच की जाए। जरा सोचिए, अगर पीड़िता हाईकोर्ट का दरवाजा न खटखटाती, तो क्या उस दोषपूर्ण जांच रिपोर्ट के सहारे आरोपी अधिकारी को क्लीन चिट मिल जाती? यह बहुत बड़ा सवाल है।
बड़ा सवाल - जांच और अधिकारी बदलने का खेल कब तक?
इन दोनों मामलों (चाहे वह आईपीएस रमन लाल डांगी का मामला हो, या पाठ्यपुस्तक निगम के पूर्व जीएम अरविंद पांडेय का मामला हो) को अगर आप गौर से देखेंगे, तो एक पैटर्न साफ नजर आएगा।
छत्तीसगढ़ में बड़े और रसूखदार अधिकारियों पर जब भी यौन शोषण या गंभीर उत्पीड़न के आरोप लगते हैं, तो सबसे पहले क्या होता है?
- मामला दबाने की कोशिश की जाती है।
- अगर बात बाहर आ जाए, तो लीपापोती करने के लिए ऐसी आंतरिक समितियां बना दी जाती हैं जो आरोपी के मातहत या दबाव में काम करें।
- और जब विरोध बढ़ता है, तो सिर्फ जांच के नाम पर तारीख पे तारीख दी जाती है, या फिर खेल-खेल में कभी जांच अधिकारी बदल दिए जाते हैं, तो कभी कमेटियां बदल दी जाती हैं।
बड़े अधिकारियों पर कभी सीधी और कड़ी विभागीय कार्रवाई या बर्खास्तगी जैसी त्वरित कार्रवाई देखने को क्यों नहीं मिलती? क्यों उन्हें सिर्फ निलंबित करके या उनका ट्रांसफर करके महकमे के भीतर ही उपकृत किया जाता है? क्या आम आदमी और एक बड़े आईपीएस या महाप्रबंधक के लिए कानून के मायने अलग-अलग हैं?
महिला सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे करने वाली सरकारों और विभागों के राज में जब इस तरह के मामलों में लीपापोती होती है, तो कार्यस्थल पर काम करने वाली हर उस महिला का भरोसा उठ जाता है जो इन दफ्तरों में सुरक्षित माहौल की उम्मीद लेकर आती है।
वक्त आ गया है कि इस तरह के मामलों में सिर्फ "जांच-जांच" का खेल बंद हो। जनता और पीड़ित महिलाओं को सिर्फ तारीखें और बदले हुए अधिकारियों के नाम नहीं, बल्कि ठोस और निष्पक्ष न्याय चाहिए।



