सोमवार, 1 जून 2026

कांग्रेस आलाकमान को बदलना होगा राज्यों में सत्ता सौंपने का फॉर्मूला?

कांग्रेस आलाकमान को बदलना होगा राज्यों में सत्ता सौंपने का फॉर्मूला?



 विधानसभा चुनाव के अप्रत्याशित परिणामों ने एक बार फिर देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस को आत्ममंथन के चौराहे पर खड़ा कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में अब यह बहस तेज हो गई है कि क्या कांग्रेस अपनी ही अंदरूनी कमियों और राज्यों के कद्दावर नेताओं (छत्रपों) की अति-महत्वाकांक्षा के कारण जीती-जिताई बाजी हारने में माहिर हो चुकी है? हरियाणा में जिस तरह से कांग्रेस के हाथ में आई हुई सत्ता की थाली सरक गई, उसने एक बार फिर छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान के बीते विधानसभा चुनावों की यादें ताजा कर दी हैं।

वही पुरानी गलती, वही पुराना दांव

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर आंख मूंदकर भरोसा करना कांग्रेस आलाकमान की ठीक वैसी ही भूल थी, जैसी उसने पूर्व में हिंदी बेल्ट के तीन प्रमुख राज्यों में की थी। आलाकमान ने राज्यों के इन बड़े चेहरों की मर्जी के आगे पूरी पार्टी को दांव पर लगा दिया, जिसका नतीजा अंततः हार के रूप में सामने आया।

राजस्थान से मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का 'सिंड्रोम'

यदि सिलसिलेवार ढंग से पिछले चुनावों पर नजर डालें, तो कांग्रेस ने हर राज्य में अंदरूनी कलह और एकतरफा फैसलों के आगे घुटने टेके:

1 राजस्थान: यहाँ अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच का शीतयुद्ध जगजाहिर था। टिकट वितरण से लेकर संगठन के फैसलों तक में लगातार विवाद होते रहे। अंत समय में डैमेज कंट्रोल की कोशिशें तो हुईं, लेकिन धरातल पर उसका कोई बड़ा असर नहीं दिखा और पार्टी को सत्ता गंवानी पड़ी।

2 मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश की कमान पूरी तरह कमलनाथ के हाथों में सौंप दी गई थी। नतीजतन, पार्टी के भीतर असंतोष इस कदर बढ़ा कि ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे मजबूत नेता को पार्टी छोड़नी पड़ी। इसके बाद भी आलाकमान मध्य प्रदेश की जमीनी हकीकत और कमलनाथ की कार्यशैली को भांपने में नाकाम रहा।

3 छत्तीसगढ़: छत्तीसगढ़ का उदाहरण सबसे ज्यादा चौंकाने वाला रहा। कथित तौर पर ढाई-ढाई साल के मुख्यमंत्री के बंटवारे को लेकर जो खींचतान शुरू हुई, उसने सरकार की छवि को खासा नुकसान पहुंचाया। तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर आलाकमान का भरोसा अटूट रहा, जबकि धरातल पर कोयला घोटाला, शराब घोटाला और पीएससी (PSC) जैसे गंभीर घोटालों और प्रशासनिक मनमानी की फेहरिस्त लंबी होती जा रही थी। जन-असंतोष को भांपने के बजाय आलाकमान ने स्थानीय नेतृत्व पर भरोसा जारी रखा और परिणाम स्वरूप छत्तीसगढ़ की सत्ता भी भाजपा की झोली में चली गई।

हरियाणा में भी दोहराया गया इतिहास

इन तीन राज्यों की हार से सबक लेने के बजाय कांग्रेस ने हरियाणा में भी हुड्डा गुट की अनदेखी न करने की मजबूरी के आगे घुटने टेक दिए। वहां भी टिकट बंटवारे से लेकर चुनावी रणनीति तक, सब कुछ एक ही धड़े के इर्द-गिर्द घूमता रहा। चुनावी राजनीति में यह सच है कि क्षेत्रीय क्षत्रपों की अनदेखी नहीं की जा सकती, लेकिन सिर्फ उनके ही भरोसे पूरी चुनावी वैतरणी पार नहीं की जा सकती—यह बात आलाकमान समझने में लगातार विफल हो रहा है।

अब आगे क्या? बदलाव की मांग

हरियाणा के झटके के बाद अब कांग्रेस के भीतर से ही यह आवाज उठने लगी है कि क्या इन पुराने क्षत्रपों को किनारे कर नए और युवा चेहरों को आगे लाने का वक्त आ गया है? आगामी महाराष्ट्र और झारखंड जैसे राज्यों के विधानसभा चुनावों को देखते हुए कांग्रेस को अपनी इस रणनीति में आमूल-चूल बदलाव करना होगा।

यदि पार्टी अब भी राज्यों में बैठे कद्दावर नेताओं पर ही आंख मूंदकर भरोसा करती रही, तो आगामी राज्यों में भी सत्ता की चाबी आसानी से भारतीय जनता पार्टी के हाथों में सौंप दी जाएगी। राजनीतिक पंडितों का साफ कहना है कि अब समय आ गया है जब कांग्रेस आलाकमान को कड़े फैसले लेने होंगे और 'एकतरफा छत्रप मॉडल' से बाहर निकलकर सामूहिक नेतृत्व और जमीनी फीडबैक के आधार पर चुनाव लड़ना होगा।

बॉक्स आइटम (Story Side-Element):

हार के तीन मुख्य सबक:

 भीतरी कलह पर नियंत्रण का अभाव: राज्यों के शीर्ष नेताओं के आपसी विवाद को समय रहते न सुलझाना कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी साबित हो रहा है।

 भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलता की अनदेखी: छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में घोटालों के आरोपों के बावजूद नेतृत्व परिवर्तन न करना पार्टी को भारी पड़ा।

 एक ही चेहरे पर अति-निर्भरता: संगठन को मजबूत करने के बजाय केवल एक ही नेता को सर्वेसर्वा बना देना, बाकी कार्यकर्ताओं और धड़ों को उदासीन कर देता है।

Vidio देखें 



https://youtu.be/7-zJsORXpmc?si=h3mEuYh2SG2cAxcy


शनिवार, 30 मई 2026

राजस्व विभाग का 'जादू'

राजस्व विभाग का 'जादू'


छत्तीसगढ़ के राजस्व विभाग में इन दिनों 'सुशासन' का ऐसा अनूठा राग अलापा जा रहा है, जिसे सुनकर खुद यमराज भी अपने बही-खाते छुपा लें। हमारे 'पीए से प्रमोट होकर सीधे मंत्री' बने टंकराम वर्मा जी के विभाग में ऐसा 'तबादला एक्सप्रेस' दौड़ाया कि पटवारियों और तहसीलदारों को अपने घर का पता याद रखने के लिए गूगल मैप का सहारा लेना पड़ रहा है। लेकिन अफसोस! इस एक्सप्रेस पर हाई कोर्ट ने ऐसा चेन-पुलिंग किया है कि पूरी ट्रेन स्टेशन आने से पहले ही डिरेल हो गई

**बंगले की परिक्रमा और 'मनचाही' प्रसादी**

विभाग में सुशासन का नया क्राइटेरिया (नियम) सामने आया है। नियम बड़ा सरल है—"जो मंत्री बंगले के सामने जितना लंबा साष्टांग दंडवत करेगा, उसे रायपुर-दुर्ग की मलाई उतनी ही जल्दी मिलेगी।" जिन्होंने शीश नवाया, वे रायपुर आ गए और जिन्होंने नियम-कायदे की बात की, उन्हें सीधे सुकमा और बलरामपुर के घने जंगलों में 'प्रकृति दर्शन' के लिए भेज दिया गया।

तहसीलदार संघ के अध्यक्ष नीलमणि दुबे ने जब इस 'ट्रांसफर-उद्योग' के ढोल को जोर से बजाया, तो सरकार ने सुशासन की लाज रखते हुए उन्हें सस्पेंड कर दिया। दुबे जी का कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने पूछ लिया—"साहब, 2 साल में मेरा छठा ट्रांसफर है, क्या सरकार मुझे तहसीलदार मानती है या कोई टूरिस्ट?"

#### **हाई कोर्ट का 'स्टे' और सरकार का 'सन्नाटा'**

जब मंत्री जी के दरबार से न्याय नहीं मिला, तो 18 पीड़ित तहसीलदार 'तबादला चालीसा' पढ़ते हुए हाई कोर्ट पहुंच गए। कोर्ट ने जब ट्रांसफर की लिस्ट देखी, तो शायद वो भी मुस्कुरा दिए होंगे। जिन अधिकारियों का प्रमोशन होना था, उन्हें डिमोशन जैसी सजा दे दी गई। कोर्ट ने बिना देर किए सरकार की इस 'कलाकारी' पर 'स्टे' का ऐसा हथौड़ा मारा कि 18 के 18 तहसीलदार वापस अपनी पुरानी कुर्सियों पर चिपक गए। अब मंत्री जी सोच रहे होंगे कि ट्रांसफर की जो 'मेहनत' (अप्रत्यक्ष रूप से) की गई थी, उसका हिसाब-किताब कैसे बराबर होगा?

> **"सुशासन का ढोल अंदर से पोल है..."**

> यह हम नहीं कह रहे, यह तो खुद विभाग के सस्पेंडेड साहब कह गए। वैसे इस लिस्ट में बच्चों को जेल भेजने की धमकी देने वाली मशहूर तहसीलदार माया अंचल जी भी शामिल हैं। कोर्ट के स्टे के बाद अब देखना है कि वे बच्चों को जेल भेजती हैं या खुद अपनी पुरानी कुर्सी पर वापस बैठती हैं।

#### **हवा में उड़ते मंत्री जी और सीएम की 'ग्राउंडिंग'**

गलियारों में जोरों से चर्चा है कि इस पूरे ड्रामे से मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय इतने 'हैरान-परेशान' हुए कि उन्होंने टंकराम जी को बुलाकर साफ कह दिया—*"मंत्री जी, थोड़ा जमीन पर रहिए, हवा में उड़ना बंद कीजिए।"* इतना ही नहीं, नागपुर वाले 'संघ' के बड़े भाइयों ने भी मंत्री जी की ऐसी क्लास ली है, जैसी स्कूल में होमवर्क न करने वाले बच्चों की ली जाती है।

#### **ओपी चौधरी का 'कवच' और बीजेपी में 'दो-फाड़'**

इस पूरे सर्कस में एक और मजेदार मोड़ तब आया, जब पता चला कि वित्त मंत्री ओपी चौधरी जी इस पूरे खेल में टंकराम जी के पीछे 'ढाल' बनकर खड़े हैं। अब बीजेपी के भीतर ही दो गुट बन गए हैं—एक वो जो ट्रांसफर की मलाई से वंचित रह गए, और दूसरे वो जो चौधरी साहब के 'कवच' के भरोसे हैं।

**चलते-चलते:**

राजस्व विभाग के अधिकारी इस समय सरकार से इतने 'गदगद' (पढ़ें: नाराज) हैं कि आने वाले दिनों में सुशासन का यह ढोल और जोर से फटने वाला है। देखना दिलचस्प होगा कि ओपी चौधरी जी अपने 'खास' टंकराम जी को हाई कोर्ट और सीएम की फटकार से कैसे बचा पाते हैं!

शुक्रवार, 29 मई 2026

65 की उम्र में 25 का दिखने का 'अंधा लालच' और करोड़ों की ठगी!

 65 की उम्र में 25 का दिखने का 'अंधा लालच' और करोड़ों की ठगी!

राजीव और रश्मी दुबे का 'जवान बनाने' का मायाजाल; लोकलाज के डर से थानों में नहीं पहुंचे सैकड़ों शिकार



कहते हैं इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी उसका बुढ़ापा और ढलती उम्र होती है, और इसी कमजोरी को जब शातिर ठग अपना हथियार बना लें, तो देश के सबसे सुरक्षित दावों वाले सूबे में भी करोड़ों का खेल हो जाता है। ऐसा ही एक सनसनीखेज और हैरान कर देने वाला मामला उत्तर प्रदेश के कानपुर से सामने आया है, जिसने पुलिस प्रशासन से लेकर आम जनता के होश उड़ा दिए हैं। 

यहाँ राजीव दुबे और रश्मी दुबे नाम के एक शातिर दंपति ने लोगों को दोबारा 'जवान' बनाने का एक ऐसा मायाजाल बुना कि सैकड़ों संभ्रांत लोग इसके शिकार हो गए। 

क्या था ठगी का 'ऑक्सीजन थेरेपी' फॉर्मूला?

राजीव और रश्मी दुबे ने कानपुर में बाकायदा एक बड़ा प्रचार तंत्र खड़ा किया।  उन्होंने दावा किया कि वे एक विशेष 'ऑक्सीजन थेरेपी' (Oxygen Therapy) देते हैं।  इस थेरेपी का झांसा इतना तगड़ा था कि '65 साल की उम्र में भी आप 25 साल के नौजवान दिखने लगेंगे।' आज के इस दौर में जहां हर कोई खूबसूरत और युवा दिखना चाहता है, लोग इस जाल में अंधे होकर फंसते चले गए। 

पिरामिड स्कीम का चक्रव्यूह और करोड़ों की चपत

सिर्फ थेरेपी ही नहीं, इस शातिर जोड़ी ने पैसे ऐंठने के लिए एक 'पिरामिड स्कीम' (Pyramid Scheme) भी तैयार की थी। लोगों से भारी-भरकम रकम जमा कराई गई और उन्हें आगे और लोगों को जोड़ने का लालच दिया गया। देखते ही देखते सैकड़ों लोगों ने अपनी गाढ़ी कमाई इस तथाकथित 'जवान' होने की स्कीम में झोंक दी। 

हंसी उड़ने के डर से घुटते रहे शिकार

इस पूरी ठगी की सबसे कड़वी और चौंकाने वाली हकीकत यह रही कि ठगे जाने का अहसास होने के बाद भी सैकड़ों लोग थानों की चौखट तक नहीं पहुंचे। भुक्तभोगियों को यह डर सता रहा था कि अगर वे पुलिस के पास गए, तो समाज में उनकी थू-थू होगी और लोग उनकी 'जवान होने की चाहत' पर हंसेंगे।  इसी 'लोकलाज और सामाजिक हंसी' के डर का फायदा उठाकर राजीव और रश्मी लंबे समय तक बेखौफ होकर अपनी जेबें भरते रहे। 

एक महिला की हिम्मत ने खोला राज

इस अंधेरगर्दी का अंत तब हुआ जब इस ठगी का शिकार हुई एक हिम्मती महिला ने लोकलाज की परवाह न करते हुए सीधे थाने का रुख किया।  महिला की शिकायत पर जब पुलिस ने तफ्तीश शुरू की, तब जाकर इस महाठगी के विशाल साम्राज्य का भंडाफोड़ हुआ। 

योगीराज के दावों पर भी उठे सवाल?

यह पूरा मामला उस उत्तर प्रदेश का है, जहाँ अपराधियों के थर-थर कांपने और कानून व्यवस्था के कड़े होने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन कानपुर की इस घटना ने साफ कर दिया है कि ठगों ने अब अपराध के डिजिटल और मनोवैज्ञानिक तरीके ढूंढ लिए हैं, जहां वे कानून से ज्यादा इंसान की कमजोरी और लोकलाज का फायदा उठा रहे हैं। 

अपील: उम्र का बढ़ना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। किसी भी ऐसे भ्रामक विज्ञापनों या थेरेपी के चक्कर में न आएं जो आपको रातों-रात जवान बनाने का दावा करते हों। सजग रहें, सुरक्षित रहें।

गुरुवार, 28 मई 2026

एनजीटी का कड़ा हंटर: पर्यावरण को 'वसूली केंद्र' बनाने वाली छत्तीसगढ़ सरकार के फूले हाथ-पांव!

 एनजीटी का कड़ा हंटर: पर्यावरण को 'वसूली केंद्र' बनाने वाली छत्तीसगढ़ सरकार के फूले हाथ-पांव!


7 कड़े सवाल, हर 15 दिन में देनी होगी प्रगति रिपोर्ट; मंत्रालय से लेकर प्रदूषण विभाग तक हड़कंप

क्या छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार पर्यावरण संरक्षण के मोर्चे पर पूरी तरह फेल साबित हो चुकी है? क्या राज्य में प्रदूषण फैलाने वाले रसूखदारों और उद्योगपतियों को सत्ता का खुला संरक्षण हासिल है? ये तीखे सवाल हम नहीं, बल्कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के कड़े रुख और सरकार को थमाए गए ताजा फरमान के बाद प्रशासनिक गलियारों में गूंज रहे हैं। एनजीटी ने छत्तीसगढ़ सरकार की घोर लापरवाही पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए सात बिंदुओं पर कड़े निर्देश जारी किए हैं। इतना ही नहीं, ट्रिब्यूनल ने साफ कर दिया है कि अब 'कागजी घोड़े' दौड़ाने से काम नहीं चलेगा, सरकार को अब हर 15 दिन में अपनी प्रगति रिपोर्ट सौंपनी होगी। एनजीटी के इस 'पंद्रह दिनी अल्टीमेटम' से मंत्रालय से लेकर पर्यावरण विभाग तक हड़कंप मच गया है और अफसरों के हाथ-पांव फूल गए हैं। 

सात बिंदुओं का चक्रव्यूह: कागजी विकास की खुली पोल

एनजीटी ने जिन सात बिंदुओं पर सरकार से जवाब और एक्शन रिपोर्ट मांगी है, वे राज्य के प्रशासनिक तंत्र की उदासीनता को उजागर करते हैं। ट्रिब्यूनल ने साफ तौर पर निर्देश दिए हैं कि:

1 नदी-तालाबों में गंदा पानी बंद हो: नगरीय निकायों के आसपास बहने वाली नदियों और तालाबों में नालों का गंदा पानी सीधे प्रवाहित न किया जाए। इसके लिए नालों पर 'स्क्रीन जाली' लगाने जैसी पुख्ता व्यवस्था तुरंत की जाए। 

2 अतिक्रमण पर चले बुलडोजर: जल स्रोतों के आसपास भू-माफियाओं द्वारा किए गए अवैध कब्जों को कड़ाई से हटाया जाए, क्योंकि ये सीधे तौर पर जनता की जिंदगी से खिलवाड़ हैं। 

3 मूर्ति विसर्जन पर तुरंत सफाई: त्योहारों के बाद नदियों और तालाबों में होने वाले मूर्ति विसर्जन के तत्काल बाद नगरीय निकाय सफाई और जल सुधार का काम सुनिश्चित करें। 

4 ठोस अपशिष्ट का वैज्ञानिक निस्तारण: राज्य में सॉलिड वेस्ट (ठोस अपशिष्ट) के मैनेजमेंट को लेकर जो लापरवाही बरती जा रही है, उसे तुरंत खत्म कर वैज्ञानिक पद्धति अपनाई जाए!

'नोटिस और वसूली का खेल': उद्योगों को प्रदूषण फैलाने की खुली छूट?

वीडियो रिपोर्ट में पर्यावरण विभाग की कार्यप्रणाली पर बेहद संगीन आरोप लगाए गए हैं। हसदेव अरण्य में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और अडानी के प्रोजेक्ट्स का जिक्र करते हुए कहा गया है कि एनजीटी की प्रिंसिपल बेंच के कई फैसलों को ठेंगे पर रख दिया गया, जिससे ग्लोबल स्तर पर इकोसिस्टम को नुकसान पहुंच रहा है। 

सीमेंट प्लांट्स, स्पंज आयरन और कोल माइनिंग बेल्ट्स में पर्यावरण नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। आरोप है कि पर्यावरण विभाग के लिए एनजीटी क्लीयरेंस और प्रदूषण नियंत्रण महज 'करोड़ रुपए बटोरने की स्कीम' बनकर रह गया है। फैक्ट्रियों को नोटिस जारी किया जाता है, टेबल के नीचे से 'सैटलमेंट' होता है और फिर विभाग चुप्पी साध लेता है। इस 'खानापूर्ति' के खेल की वजह से फैक्ट्रियों के आसपास के ग्रामीण पलायन को मजबूर हैं, फसलें बर्बाद हो रही हैं और भूजल इतना जहरीला हो चुका है कि वह पीने लायक नहीं बचा। 

नदियों में जहर, तालाबों की 'कब्रगाह' बना रायपुर

राजधानी रायपुर का उदाहरण देते हुए रिपोर्ट में बताया गया कि कभी रायपुर को "छह कोरी छह आगर" यानी 126 तालाबों का शहर कहा जाता था। लेकिन आज भू-माफियाओं, बिल्डरों और प्रशासनिक सांठगांठ ने इन ऐतिहासिक तालाबों को पाटकर उन पर कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए हैं। 

कुम्हारी में केडिया डिस्टिलरी जैसी फैक्ट्रियों और स्पंज आयरन प्लांटों का जहरीला पानी सीधे नदियों में बहाया जा रहा है। भाटागांव के पास सालों से बन रहा प्यूरीफायर सिस्टम आज तक शुरू नहीं हो पाया। हकीकत यह है कि यदि आज छत्तीसगढ़ की किसी भी नदी के पानी का ईमानदारी से वैज्ञानिक परीक्षण करा लिया जाए, तो वह पानी पीने तो क्या, नहाने लायक भी नहीं मिलेगा। 

लीपापोती की सरकार, कोर्ट के भरोसे जनता

जब जनता प्रदूषण और अतिक्रमण से त्रस्त होकर गुहार लगाती है, तो सरकार जांच के नाम पर सिर्फ लीपापोती करती है। यही वजह है कि राज्य के जागरूक नागरिकों को सरकार पर भरोसा न रखकर अदालतों का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है। 

अब देखना यह है कि हर 15 दिन में प्रगति रिपोर्ट मांगने वाले एनजीटी के इस तल्ख तेवर के बाद क्या साय सरकार की नींद टूटेगी? या फिर हर बार की तरह इस बार भी फाइलें दबाकर और आंकड़ों की बाजीगरी कर एनजीटी की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश की जाएगी? जनता की सांसों पर पहरा देने वाले इस तंत्र का असली चेहरा अब बेनकाब हो चुका है। 

बुधवार, 27 मई 2026

ED की कार्रवाई पर सवाल: आईएएस अंदर, आईपीएस पर सिर्फ पूछताछ

 ED की कार्रवाई पर सवाल: आईएएस अंदर, आईपीएस पर सिर्फ पूछताछ


 छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित कोयला परिवहन लेवी वसूली मामले में करीब दो साल से जेल में बंद पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की उपसचिव (डिप्टी सेक्रेटरी) सौम्या चौरसिया को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई है। सौम्या चौरसिया की इस जमानत के बाद छत्तीसगढ़ के सियासी गलियारों, खासकर कांग्रेस के भीतर हलचल तेज हो गई है। हालांकि, इस राहत के बाद भी एक बड़ा सवाल यह खड़ा है कि वे जेल से बाहर कब आ पाएंगी? 

आय से अधिक संपत्ति का मामला बना बड़ी बाधा

कानूनी जानकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कोयला लेवी मामले में जमानत मिलने के बावजूद सौम्या चौरसिया की रिहाई तुरंत संभव नहीं दिख रही है।  उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति (Disproportionate Assets) का मामला भी चल रहा है, जिसके तहत उनकी गिरफ्तारी की गई थी।  अब उन्हें इस दूसरे मामले में भी जमानत लेनी होगी, जिसमें लंबा वक्त लग सकता है। 

राहत या टेंशन? कांग्रेस के भीतर चर्चाओं का बाजार गर्म

सौम्या चौरसिया को छत्तीसगढ़ की राजनीति को प्रभावित करने वाले सबसे शक्तिशाली चेहरों में से एक माना जाता रहा है। उनकी जमानत के बाद कांग्रेस का एक धड़ा, विशेषकर 'भूपेश बघेल खेमा' इसे बड़ी राहत के रूप में देख रहा है। कांग्रेस शुरू से ही इस पूरी कार्रवाई को पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उनकी सरकार को बदनाम करने की साजिश बताती रही है। लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी गंभीर चर्चा है कि जेल से बाहर आने के बाद सौम्या चौरसिया किसका टेंशन बढ़ाएंगी और किसके लिए सुकून की बात होंगी। 

ईडी की कार्यप्रणाली और भेदभाव पर फिर उठे सवाल

इस मामले के सामने आने के बाद एक बार फिर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की भूमिका और उसकी जांच के तरीके पर सवाल खड़े होने लगे हैं।  चर्चा यह भी है कि ईडी ने कार्रवाई के दौरान दोहरा मापदंड अपनाया। जहां रानू साहू और सौम्या चौरसिया जैसी आईएएस/राज्य सेवा की महिला अधिकारियों को सलाखों के पीछे भेज दिया गया, वहीं इस पूरे खेल में संदिग्ध भूमिका वाले आईपीएस अधिकारियों (पुलिस कप्तानों) से सिर्फ पूछताछ करके छोड़ दिया गया। यदि ईडी पूरी निष्पक्षता से जांच करती, तो कई बड़े पुलिस अफसरों पर भी गाज गिर सकती थी।  इसके अलावा, लेवी वसूली और शराब घोटाले से जुड़े बड़े-बड़े उद्योगपतियों और रसूखदारों को भी हाथ नहीं लगाया गया, जो ईडी की मंशा पर संदेह पैदा करता है। 

फिलहाल, सौम्या चौरसिया की इस जमानत ने राज्य में घोटालों (कोयला, शराब, महादेव ऐप और पीएससी घोटाला) के दौर की यादें ताजा कर दी हैं और आने वाले दिनों में इसके गंभीर राजनीतिक परिणाम देखने को मिल सकते हैं।

Vidio देखें 


https://youtu.be/ofDhi12e3RI?si=srjnelmFSxq4KZen


आस्था की आड़, आधुनिक 'कल्ट' संस्कृति और न्याय के तीखे सवाल

आस्था की आड़, आधुनिक 'कल्ट' संस्कृति और न्याय के तीखे सवाल


 मद्रास हाईकोर्ट की एक सख्त टिप्पणी ने अध्यात्म, राजनीति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उस त्रिकोण को फिर चर्चा में ला दिया है, जहाँ रसूखदार गुरुओं को 'विशेष विशेषाधिकार' मिलने के आरोप लगते रहे हैं


क्या आधुनिक अध्यात्म की चकाचौंध के पीछे पारिवारिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने वाली कोई गहरी कल्ट (Cult) संस्कृति काम कर रही है? क्या वैश्विक स्तर पर रसूख रखने वाले और अंग्रेजी में धाराप्रवाह प्रवचन देने वाले 'सफेदपोश गुरुओं' के लिए कानून के तराजू और सामाजिक जवाबदेही के मायने बदल जाते हैं? ये सवाल किसी बंद कमरे में नहीं, बल्कि देश की एक प्रतिष्ठित उच्च न्यायालय की दहलीज पर गूंजे हैं, जिसने देश के सबसे चर्चित आध्यात्मिक गुरुओं में से एक, ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु जग्गी वासुदेव को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

### मद्रास हाईकोर्ट का वो सवाल, जिसने हिला दी आध्यात्मिक सत्ता

मामला तब चर्चा में आया जब मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस एस.एम. सुब्रमण्यम और जस्टिस वी. शिवज्ञानम की पीठ ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका पर सुनवाई करते हुए बेहद तीखा और सीधा सवाल पूछा। कोर्ट ने कहा,

> **"एक व्यक्ति जिसने अपनी खुद की बेटी की शादी करवाकर उसे जीवन में अच्छी तरह व्यवस्थित किया, वह दूसरों की बेटियों को सिर मुड़वाकर सन्यासिनी का जीवन जीने और आश्रमों में रहने के लिए क्यों प्रेरित कर रहा है?"**

यह याचिका कोयंबटूर के पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर डॉ. कामराज द्वारा दायर की गई थी। उनका आरोप है कि उनकी दो बेहद पढ़ी-लिखी बेटियों (जिनमें से एक यूके से एम.टेक है) का ईशा फाउंडेशन के कोयंबटूर स्थित आश्रम में 'ब्रेनवॉश' किया गया और उन्हें वहीं रहने के लिए मजबूर किया गया। हालांकि, आश्रम और खुद उन दोनों युवतियों का कहना है कि वे अपनी मर्जी से और बिना किसी दबाव के वहां रह रही हैं। लेकिन 10 साल से न्याय की गुहार लगा रहे एक पिता का दर्द और उस पर हाईकोर्ट की यह टिप्पणी महज़ एक कानूनी विवाद नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक सामाजिक व्यवस्था पर चोट करती है जहाँ धर्म और संन्यास के नाम पर परिवारों के बिखरने की कहानियां अक्सर दबी रह जाती हैं।

### कॉरपोरेट स्पिरिचुअलिटी: अंग्रेजी का मुलम्मा और रसूख का पहरा

पारंपरिक बाबाओं (जैसे आसाराम या गुरमीत राम रहीम) की तुलना में जग्गी वासुदेव का उभार भारतीय अध्यात्म में एक नया मोड़ था। 1982 से अपनी यात्रा शुरू करने वाले और 1993 में ईशा फाउंडेशन की नींव रखने वाले जग्गी वासुदेव ने पारंपरिक भारतीय गुरुओं की छवि को पूरी तरह बदल दिया। धाराप्रवाह अंग्रेजी, वैश्विक मंचों (जैसे वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम) पर कॉर्पोरेट स्टाइल में भाषण, पर्यावरण और वैश्विक संकटों पर आधुनिक तर्क और युवाओं से सीधे संवाद ने उन्हें 'उच्च-मध्यम वर्ग' और अप्रवासियों के बीच एक 'कूल और बौद्धिक गुरु' के रूप में स्थापित किया।

लेकिन आलोचकों का मानना है कि इस कॉरपोरेट अध्यात्म की आड़ में एक ऐसा साम्राज्य खड़ा किया गया जो कानून और स्थानीय प्रशासन से ऊपर काम करता दिखता है। पर्यावरण संबंधी नियमों के उल्लंघन के आरोपों से लेकर जमीन विवादों तक, ईशा फाउंडेशन कई बार विवादों में रहा है, लेकिन उनका वैश्विक रसूख और कॉर्पोरेट मैनेजमेंट की तरह काम करने का तरीका हमेशा उनके लिए एक सुरक्षा कवच बना रहा। जग्गी वासुदेव ने खुद अपनी बेटी 'राधे जग्गी' की शादी बड़े तामझाम के साथ विदेशों में की, लेकिन जब बात आम लोगों की बेटियों की आती है, तो उनके आश्रम में उन्हें मुंडित कर वैराग्य का पाठ पढ़ाया जाता है—यही वो विरोधाभास है जिस पर अदालत ने उंगली उठाई है।

### राजनीतिक झुकाव और 'प्रिविलेज' का कवच

इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इन आधुनिक गुरुओं को मिलने वाला राजनीतिक संरक्षण है। जग्गी वासुदेव का झुकाव और उनके बयान अक्सर केंद्र की सत्ताधारी विचारधारा और आरएसएस के अनुकूल रहे हैं। चाहे वह बांग्लादेश संकट पर हिंदुओं के प्रति चिंता जताना हो, या हाल ही में तिरुपति के 'चर्बी विवाद' के समय चंद्रबाबू नायडू के सुर में सुर मिलाकर बीफ (गाय का मांस) खिलाए जाने का सीधा आरोप लगाना हो (जिस पर बाद में सुप्रीम कोर्ट ने नायडू को भी फटकार लगाई थी)। वर्ष 2017 में उन्हें दिया गया 'पद्म विभूषण' सम्मान भी इसी राजनीतिक और सामाजिक रसूख की तस्दीक करता है।

जानकारों का कहना है कि जब कोई आध्यात्मिक गुरु किसी राजनीतिक दल या विचारधारा के लिए 'वोट बैंक' या 'सांस्कृतिक एंकर' का काम करने लगता है, तो उसे एक अघोषित 'विशेषाधिकार' (Privilege) मिल जाता है। यही कारण है कि गंभीर से गंभीर विवादों और अदालती फटकार के बाद भी मुख्यधारा का मीडिया इन मामलों पर चुप्पी साधे रहता है।

**आस्था की राजनीति और कानून की ढाल**

 * **राम रहीम:** संगीन अपराधों (हत्या और बलात्कार) में सजा काटने के बावजूद चुनाव आते ही बार-बार मिलने वाली पैरोल न्याय व्यवस्था और राजनीतिक साठगांठ का सबसे बड़ा उदाहरण है।

 * **प्रदीप मिश्रा व अन्य:** हाल के दिनों में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कथावाचकों द्वारा मंचों से दिए जाने वाले उग्र बयान (जैसे चौराहे पर जिंदा जला देना) इस बात का प्रमाण हैं कि अध्यात्म अब आत्म-कल्याण का माध्यम नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक ध्रुवीकरण का जरिया बन चुका है।

 * **आसाराम बापू:** एक दौर में देश के सबसे ताकतवर गुरुओं में शामिल, लेकिन कानून के शिकंजे ने साबित किया कि आस्था के पीछे छिपा साम्राज्य कितना खतरनाक हो सकता है।

### व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम परिवार का अधिकार: एक जटिल बहस

कानूनी तौर पर यह मामला बेहद पेचीदा है। भारतीय संविधान हर वयस्क नागरिक को अपनी मर्जी से जीने, अपना धर्म चुनने और कहीं भी रहने की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) देता है। यदि ईशा फाउंडेशन में रह रही युवतियां बालिग हैं और कोर्ट के सामने स्वेच्छा से वहां रहने की बात स्वीकार करती हैं, तो कानूनन उन्हें वहां से जबरन नहीं निकाला जा सकता।

परंतु, समाजशास्त्रियों का मानना है कि 'कल्ट' संस्कृतियों में मनोवैज्ञानिक नियंत्रण (Psychological Manipulation) इस कदर गहरा होता है कि व्यक्ति को अपनी स्वतंत्रता ही गुलामी में नजर आने लगती है। हाईकोर्ट ने इसी बारीक नस पर हाथ रखा है। कोर्ट का इशारा साफ है कि अगर संन्यास और वैराग्य इतना ही महान और मोक्षदायी मार्ग है, तो गुरुओं के अपने परिवार इसके अपवाद क्यों होते हैं?

### निष्कर्ष: मुख्यधारा के मीडिया की चुप्पी और भविष्य के सवाल

आज जब सोशल मीडिया और स्वतंत्र पत्रकार वीडियो के जरिए इन मुद्दों को उठा रहे हैं, तब मुख्यधारा के प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की इस पर रहस्यमयी चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। क्या कॉरपोरेट विज्ञापन का दबाव या राजनीतिक आकाओं का खौफ मीडिया को इस सच को उजागर करने से रोकता है?

मद्रास हाईकोर्ट का यह कदम देश के नागरिकों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम आस्था के नाम पर किस तरह के समाज का निर्माण कर रहे हैं—जहाँ गुरुओं के अपने बच्चे आलीशान शादियां रचाते हैं और आम नागरिकों के बच्चे वैराग्य के नाम पर अपना जीवन होम कर देते हैं।

**स्रोत एवं संदर्भ:** *यह रिपोर्ट मद्रास हाईकोर्ट में दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (डॉ. कामराज बनाम ईशा फाउंडेशन), माननीय न्यायालय द्वारा की टिप्पणी और मीडिया  द्वारा जुटाए गए इनपुट्स पर आधारित है।*


Vidio देखें 


https://youtu.be/ZeowU1MuTuE?si=Aq0dMqE5dyQ7G2Qc


मंगलवार, 26 मई 2026

छत्तीसगढ़ का 'गुजराती' सौदा!

 छत्तीसगढ़ का 'गुजराती' सौदा!


अमित शाह की 'क्रोनोलॉजी', बस्तर का 'विकास मॉडल 2.0' और छत्तीसगढ़ के जल-जंगल-जमीन पर कॉर्पोरेट पहरा।

कौशल तिवारी “ मयूख”

[INTRO

राजनीति और कॉर्पोरेट जगत की जुगलबंदी में कोई भी कदम यूं ही नहीं उठाया जाता; हर बड़े दौरे के पीछे एक सोची-समझी 'क्रोनोलॉजी' होती है और हर क्रोनोलॉजी के पीछे अरबों रुपये की एक बड़ी डील। जब देश के गृह मंत्री अमित शाह बस्तर की धरती पर कदम रखते हैं और दावा करते हैं कि 5 साल में बस्तर के आदिवासियों की आमदनी छह गुना बढ़ जाएगी, तो वह एक सुनहरे भविष्य का सपना बेच रहे होते हैं । लेकिन इसी बीच सत्ता के गलियारों से एक ऐसी सूची (List) लीक होती है, जो गृह मंत्री के दावों की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी है ।

यह कहानी सिर्फ 'नक्सल मुक्त बस्तर' की नहीं है, बल्कि 'संसाधन मुक्त छत्तीसगढ़' की है । एक तरफ बस्तर में सुरक्षा कैंपों को 'वीर शहीद गुंडादूर सेवा डेरा' में तब्दील करने का प्रशासनिक ढोल पीटा जा रहा है, तो दूसरी तरफ परदे के पीछे से अडानी से लेकर टोरेंट तक की गुजराती लॉबी को छत्तीसगढ़ के जल-जंगल और जमीन सौंपने का पूरा खाका तैयार हो चुका है ।

1. शाह का 'बस्तर मॉडल 2.0': सेवा का मुखौटा या जमीन की घेराबंदी?

गृह मंत्री अमित शाह ने बस्तर दौरे में केरल जितने बड़े भूभाग को नक्सलवाद से मुक्त कराने के लिए 200 सुरक्षा कैंपों में से 70 को 'वीर शहीद गुंडादूर सेवा डेरा' बनाने का एलान किया । दावा है कि यहाँ बैंकिंग, आधार कार्ड और 371 सरकारी योजनाएं सीधे आदिवासियों के दरवाजे तक पहुंचेंगी ।

लेकिन स्थानीय जानकारों और राजनीति के इनसाइडर्स का सवाल कुछ और है: क्या ये 'सेवा डेरे' सिर्फ आदिवासियों की भलाई के लिए हैं, या फिर बस्तर के दुर्गम और खनिज-समृद्ध इलाकों में कॉर्पोरेट कंपनियों की सुरक्षित एंट्री के लिए बनाए गए सेफ पैसेज (Safe Passage) हैं?

2. वो 'वायरल लिस्ट': छत्तीसगढ़ की छाती पर 'सूरत और अहमदाबाद' का पहरा

जैसे ही गृह मंत्री का दौरा खत्म होता है, छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक हलकों में एक सूची तैरने लगती है। यह सूची बताती है कि राज्य की विष्णुदेव साय सरकार ने गुजरात की दिग्गज कंपनियों के लिए रेड कारपेट बिछा दिया है :

 अडानी पावर  अडानी एंटरप्राइजेज (अहमदाबाद): ऊर्जा और केमिकल प्रोजेक्ट्स के लिए सरगुजा की हसदेव-समृद्ध वादियों में बड़े पैमाने पर जमीन की तलाश और हरी झंडी ।

 आरसेलर मित्तल निपॉन (सूरत): बस्तर के लौह-अयस्क (Iron Ore) के गढ़ में भारी उद्योग लगाने की तैयारी ।

 टोरेंट फार्मास्यूटिकल्स और लाइस्टियम लाइफ साइंसेज (अहमदाबाद): दवा उद्योग के नाम पर राजधानी रायपुर के आसपास की महंगी जमीनों पर नजर ।

 सफायर सेमीकॉम (अहमदाबाद): इलेक्ट्रॉनिक सेमीकंडक्टर हब के लिए रायपुर में पैठ ।

 अंबुजा सीमेंट: छत्तीसगढ़ के लाइमस्टोन (चूना पत्थर) बेल्ट पर पूरी तरह काबिज होने की कवायद, जिस पर पहले ही अवैध वसूली के संगीन आरोप लग चुके हैं ।

3. मुर्दों के अंगूठे और फर्जी जनसुनवाई का 'सच्चा चिट्ठा'

विकास की इस चमचमाती कहानी का सबसे काला अध्याय है—'जमीन हड़पने का खेल'। मैदानी हकीकत यह है कि इन बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों को स्थापित करने के लिए जनसुनवाइयों का मजाक उड़ाया जा रहा है । कई इलाकों से रिपोर्ट आ रही है कि प्रशासन की मिलीभगत से फर्जी जनसुनवाइयां की गईं और जो ग्रामीण सालों पहले मर चुके हैं, उनके नाम पर अंगूठे लगवाकर उद्योगों के पक्ष में सहमति दिखा दी गई । सरकार पूरी तरह से उद्योगपतियों की गोद में बैठी नजर आ रही है ।

4. छत्तीसगढ़िया युवा: सिर्फ 'चपरासी और गार्ड' बनने की योग्यता?

डबल इंजन सरकार का सबसे बड़ा खोखला दावा है—'स्थानीय युवाओं को रोजगार']। कड़वा सच तो यह है कि स्किल डेवलपमेंट के नाम पर छत्तीसगढ़ के युवाओं को अपने ही जल-जंगल-जमीन पर महज चपरासी या सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी भी नसीब नहीं हो रही है ।

हाल ही में राज्य के उद्योगों में हुई जानलेवा दुर्घटनाओं ने इस सच से पर्दा उठा दिया कि मरने वाले अधिकांश मजदूर बाहरी राज्यों के थे। उद्योगपतियों की क्रूर नीति साफ है—स्थानीय लोगों को नौकरी पर मत रखो, क्योंकि अगर वे हक मांगेंगे तो 'आंदोलन' का खतरा रहेगा। इसलिए मजदूर भी बाहर से मंगाए जा रहे हैं ।

5. 'उलगुलान' की गूंज और सुलगती सियासत

इस गुजराती घुसपैठ के खिलाफ अब बस्तर और सरगुजा ही नहीं, बल्कि छुईखदान समेत छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों में भी 'जल-जंगल-जमीन' की रक्षा के लिए 'उलगुलान' (क्रांति) के नारे गूंजने लगे हैं ।

क्षेत्रीय दलों जैसे छत्तीसगढ़ समाज पार्टी, क्रांति सेना और जय जोहार पार्टी ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है । उनका सीधा आरोप है कि दिल्ली के आकाओं (नरेंद्र मोदी और अमित शाह) के दबाव में विष्णुदेव साय सरकार छत्तीसगढ़ की अस्मिता और संपदा को गुजरात के उद्योगपतियों के हाथों गिरवी रख रही है ।

[OUTRO/CONCLUSION: निष्कर्ष]

क्या छत्तीसगढ़ का नक्शा अब पूरी तरह बदलने वाला है? क्या छत्तीसगढ़िया जनता का सदियों से चला आ रहा शोषण अब कॉर्पोरेट गुलामी के एक नए युग में तब्दील हो जाएगा? 

अमित शाह का बस्तर आना और तत्काल बाद गुजराती कंपनियों को ताबड़तोड़ हरी झंडी मिलना, यह चीख-चीख कर गवाही दे रहा है कि लोकतंत्र की आड़ में कॉर्पोरेट लूट का एक विशाल नेटवर्क काम कर रहा है । पर्यावरण की तबाही और स्थानीय जनता को चपरासी बनाने की कीमत पर खड़ा किया जा रहा यह 'गुजरात मॉडल', छत्तीसगढ़ के सुनहरे भविष्य का निर्माण नहीं, बल्कि उसकी बर्बादी का नया दस्तावेज है।