डिप्टी सीएम नहीं संभाल पा रहे
ठेकेदारों का गुस्सा फूटा
गाँवों में पानी की टंकियाँ तो खड़ी हो गईं, घर-घर नल के कनेक्शन भी दिख रहे हैं... लेकिन जब नल की टोटी खोलो, तो पानी की जगह सिर्फ हवा निकलती है! आखिर क्यों छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में जल जीवन मिशन का सच इतना कड़वा है? क्यों करोड़ों रुपए खर्च होने के बाद भी जनता एक-एक बूंद पानी के लिए तरस रही है?
छत्तीसगढ़ के जल जीवन मिशन में अटके करीब 1,100 करोड़ से 1,200 करोड़ रुपए के उस बड़े संकट की, जिसने न सिर्फ ठेकेदारों की कमर तोड़ दी है, बल्कि राज्य की पेयजल व्यवस्था को ठप करके रख दिया है!"
: "मामला क्या है, आसान भाषा में समझिए। राज्य में 58 मल्टी विलेज योजनाएँ चल रही हैं। इसका सीधा मतलब यह था कि किसी नदी या बड़े जलस्रोत से पानी लाया जाएगा, उसे वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट में साफ किया जाएगा और फिर पाइपलाइन के जरिए गाँवों की टंकियों तक पहुँचाया जाएगा।
ठेकेदारों ने अपनी जमा पूँजी लगाई, कर्ज लिया और करीब 80 प्रतिशत काम पूरा कर दिया। गाँवों के भीतर टंकियाँ बन गईं, गली-मोहल्लों में पाइप बिछ गए... लेकिन मुख्य स्रोत से पानी लाने वाली मेन लाइन और ट्रीटमेंट सिस्टम का काम ही अधूरा छोड़ दिया गया। अब आप खुद सोचिए—जब टंकी में पानी पहुँचेगा ही नहीं, तो ग्रामीणों के घरों के नल कैसे चलेंगे? यह तो वही बात हो गई कि गाड़ी खरीदकर खड़ी कर दी, लेकिन उसमें इंजन ही नहीं लगाया!"
"छत्तीसगढ़ कांट्रेक्टर्स एसोसिएशन का कहना है कि अगस्त 2025 के बाद से उन्हें फूटी कौड़ी नहीं मिली है।
- रिकॉर्ड पर ₹569.32 करोड़ की भुगतान मांग लंबित है।
- इसके अलावा लगभग ₹500 से ₹600 करोड़ का काम ऐसा हो चुका है, जिसके बिल विभाग दर्ज तक नहीं कर रहा है!
कुल मिलाकर करीब 1,100 से 1,200 करोड़ रुपए का भुगतान अटका हुआ है। नतीजे क्या हैं? कई ठेकेदारों के बैंक खाते NPA (Non-Performing Asset) हो चुके हैं या होने की कगार पर हैं। मजदूरों की मजदूरी नहीं दी जा रही, कर्मचारियों का वेतन अटका है और सामग्री सप्लाई करने वाले अपने पैसे माँग रहे हैं। स्थिति इतनी भयावह है कि कुछ काम पूरे करके विभाग को सौंपे जा चुके हैं, पर उनका पैसा भी दबाकर रखा गया है।
छत्तीसगढ़ कांट्रेक्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष वीरेश शुक्ला ने साफ चेतावनी दी है कि अगर त्योहारों/दिवाली से पहले उनका बकाया नहीं मिला, तो पूरे प्रदेश के ठेकेदार सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे।"
: "अब सवाल उठता है कि इस पूरे तंत्र का जिम्मेदार कौन है? यह लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHED) सीधे राज्य के उप-मुख्यमंत्री अरुण साव के पास है।
जनता और ठेकेदार यह सवाल पूछने पर मजबूर हैं कि जब ग्रामीण पेयजल जैसी बुनियादी और प्राथमिकता वाली योजना का यह हाल है, तो आखिर विभाग का ध्यान किस तरफ है?
विधानसभा तक में जल जीवन मिशन की गड़बड़ियों और घोटालों का मुद्दा गूँज चुका है। सदन में हंगामे के बाद विभागीय लीपापोती में आधा दर्जन से ज्यादा अफसरों और कर्मचारियों पर निलंबन की गाज भी गिरी। लेकिन क्या सिर्फ छोटे अफसरों को सस्पेंड कर देने से समस्या हल हो जाएगी?
आरोप यह लग रहे हैं कि विभाग का मुख्य ध्यान योजनाओं को पारदर्शी तरीके से पूरा करने और गुणवत्तापूर्ण काम सुनिश्चित करने के बजाय—अधिकारियों-कर्मचारियों के तबादले, पदस्थापना (Transfer-Posting) और आंतरिक खींचतान में ही ज्यादा लगा हुआ है। जब पूरा प्रशासनिक अमला ट्रांसफर-पोस्टिंग के खेल में उलझा रहेगा, तो ठेकेदारों के बिल पास कौन करेगा? काम की मॉनिटरिंग कौन करेगा?"
"जल जीवन मिशन का मूल मकसद था—हर घर तक साफ पेयजल पहुँचाना। लेकिन आज स्थिति यह है कि सरकार के चक्कर में ठेकेदार कर्ज के बोझ तले दबकर बर्बाद हो रहे हैं, और दूसरी तरफ ग्रामीण जनता अधूरी योजनाओं के बीच पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रही है।
अरुण साव जी, आप राज्य के उप-मुख्यमंत्री हैं और यह विभाग आपकी सीधी जिम्मेदारी में आता है। जब 1100 करोड़ का भुगतान रोककर काम ठप कर दिया जाएगा, तो क्या जल जीवन मिशन का सपना पूरा हो पाएगा? क्या ठेकेदारों के सड़कों पर उतरने के बाद ही शासन जागेगा?"
यह सिर्फ ठेकेदारों के पैसे का सवाल नहीं है, यह छत्तीसगढ़ के लाखों ग्रामीणों के हक के पानी का सवाल है। अगर काम पूरा हुआ है तो भुगतान तुरंत क्यों दर्ज नहीं किया जा रहा? इस पूरे मामले पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि प्रशासनिक लापरवाही और तबादला-उद्योग के चक्कर में यह योजना बलि चढ़ रही है?





