गुरुवार, 11 जून 2026

सुशासन का सच: जब एक अदद छत के लिए अफसरों के पैरों में साष्टांग हुए राष्ट्रपति के 'दत्तक पुत्र'


सुशासन का सच: जब एक अदद छत के लिए अफसरों के पैरों में साष्टांग हुए राष्ट्रपति के 'दत्तक पुत्र'


लोकतंत्र के बंद कमरों में बैठकर जब योजनाएं बनती हैं, तो सरकारी फाइलों और विज्ञापनों पर 'सबका साथ, सबका विकास' और 'अंत्योदय' की चमक बिखरती है। लेकिन जब इन दावों की हकीकत जमीन पर उतरती है, तो वह गरियाबंद जिले के देवभोग में आयोजित 'सुशासन त्योहार' जैसी झकझोर देने वाली तस्वीरों में बदल जाती है।

हाल ही में देवभोग में सरकारी तामझाम के साथ विकास के कसीदे पढ़े जा रहे थे। इसी बीच, पंडाल में कुछ ऐसा हुआ जिसने व्यवस्था के संवेदनहीन चेहरे को पूरी तरह बेनकाब कर दिया। विशेष पिछड़ी जनजाति (कमार) के बेबस आदिवासी महिला-पुरुष अपने हाथों में पात्रता के दस्तावेज लिए जिला पंचायत सीईओ के पैरों में साष्टांग दंडवत हो गए। आँखों में आंसू, सीने में बेबसी और जुबां पर एक अदद प्रधानमंत्री आवास (PM Awas) की गुहार। यह दृश्य सिर्फ आवेदन देने का कोई तरीका नहीं था, बल्कि यह हमारे सिस्टम की उस कड़वी हकीकत का प्रमाण था जो यह सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर 'आदिवासी बहुल' और 'आदिवासी मुख्यमंत्री' वाले राज्य में मूल निवासी इस कदर मजबूर क्यों हैं?

### **'डबल इंजन' के दावे बनाम दफ्तरों के चक्कर**

सूबे में सत्ता परिवर्तन के बाद पहली ही कैबिनेट में 18 लाख प्रधानमंत्री आवास स्वीकृत करने का बड़ा ऐलान किया गया था। खुद मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने मंचों से साफ लहजे में चेतावनी दी थी कि, *"अगर पीएम आवास को लेकर कहीं से भी कोई शिकायत आई, तो सीधे उस जिले के कलेक्टर के ऊपर कार्रवाई होगी।"* मुख्यमंत्री की इस सख्त हिदायत के बावजूद जमीनी हकीकत जस की तस है।

पैर पकड़ने को मजबूर हुए कमार आदिवासियों का दर्द है कि वे दफ्तरों के सैकड़ों चक्कर काट चुके हैं। हर बार उन्हें 'कल आना', 'फंड नहीं आया' या 'सर्वे में नाम नहीं है' जैसे जुमले थमाकर टरका दिया जाता है। अंत में थक-हारकर, बेबसी के इस चरम पर उन्होंने अफसरों के पैरों में गिरना ही अपना आखिरी रास्ता चुन लिया।

### **स्वाभिमानी समाज को घुटनों पर लाने का जिम्मेदार कौन?**

विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि व्यवस्था के आगे गिड़गिड़ाने वाले ये लोग कमार जनजाति से आते हैं, जिन्हें देश में राष्ट्रपति का 'दत्तक पुत्र' माना जाता है और संविधान में विशेष संरक्षण प्राप्त है। जो आदिवासी समाज अपनी आत्मनिर्भरता, जल-जंगल-जमीन की रक्षा और अद्वितीय स्वाभिमानी संस्कृति के लिए जाना जाता है, जो कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाता, उस समाज को एक छत के लिए अफसरों के पैरों की धूल चाटने पर मजबूर होना पड़ रहा है।

इस घटना के बाद राजनीतिक गलियारों में भी घमासान शुरू हो गया है। विपक्ष ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा है कि सरकार करोड़ों रुपये विज्ञापनों और सुशासन उत्सवों में अपनी छवि चमकाने के लिए पानी की तरह बहा रही है, लेकिन अंत्योदय की कतार में खड़ा आखिरी व्यक्ति आज भी बुनियादी हकों से महरूम है।

 मुख्यमंत्री की चेतावनी बेअसर, नौकरशाही बेफिक्र?**

> मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने साफ कहा था कि पीएम आवास में गड़बड़ी होने पर कलेक्टर नापे जाएंगे। गरियाबंद की इस मर्मांतक घटना के बाद अब जनता पूछ रही है कि क्या संवेदनहीनता की पराकाष्ठा पार करने वाले इस सिस्टम और जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई ठोस जवाबदेही तय होगी या खोखली चेतावनियों के सहारे ही सुशासन का ढोल पीटा जाता रहेगा?

विज्ञापनों की चमक में गुम होती आदिवासियों की चीख**

> राज्य में बड़े-बड़े आयोजनों, उत्सवों और प्रचार-प्रसार पर जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। विडंबना देखिए कि एक तरफ सरकार अपनी पीठ थपथपाने में व्यस्त है, तो दूसरी तरफ एक गरीब परिवार को महज कुछ हजार रुपयों की आवास की किश्त के लिए प्रशासनिक चौखट पर अपना आत्मसम्मान गिरवी रखना पड़ रहा है।

### **बड़ा सवाल: यह विकास है या विनाश?**

मौके पर मौजूद अधिकारियों ने कैमरों की चमक को देखते हुए आदिवासियों को जमीन से उठा तो दिया, क्योंकि उनके पास पद और कलम की ताकत थी, लेकिन सवाल यह है कि क्या उनका मकान स्वीकृत हुआ? यह घटना केवल एक ब्लॉक या जिले की नहीं है, बल्कि यह उस प्रशासनिक ढर्रे (Pattern) को उजागर करती है जहां आम नागरिक को अपने हक की भीख मांगनी पड़ती है।

छत्तीसगढ़ आज नक्सलवाद को पीछे छोड़कर जब शांति और मुख्यधारा की ओर बढ़ रहा है, तब आदिवासियों के मन में व्यवस्था के प्रति ऐसा अविश्वास पैदा करना बेहद खतरनाक हो सकता है। आज अगर इस प्रशासनिक संवेदनहीनता पर सवाल नहीं उठाए गए, तो यह सड़न कल किसी के भी दरवाजे तक पहुंच सकती है। सवाल सीधे सरकार की नीयत और नौकरशाही के रवैये पर खड़ा है।

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पड़ोसी राज्यों से लात खाई ब्लैकलिस्टेड कंपनियों के लिए छत्तीसगढ़ में 'रेड कारपेट'

 डबल इंजन सरकार में भ्रष्टाचार का 'सुपरफास्ट' सिंडिकेट: पड़ोसी राज्यों से लात खाई ब्लैकलिस्टेड कंपनियों के लिए छत्तीसगढ़ में 'रेड कारपेट'

जीरो टॉलरेंस का दावा हवा-हवाई; नियमों को ठेंगे पर रख अपात्र कंपनियों को बांटे जा रहे 13 करोड़ के संवेदनशील ठेके; मासूम बच्चों के शोषकों पर मेहरबान सिस्टम, क्या जनता की जान इतनी सस्ती है?

 


क्या आपने कभी सोचा है कि जिस दागी और धोखेबाज कंपनी को पड़ोसी राज्यों के कई विभागों ने 'अयोग्य' घोषित कर लात मारकर बाहर निकाल दिया हो, उसके स्वागत में छत्तीसगढ़ की 'डबल इंजन' सरकार पलक-पावड़े बिछाए खड़ी है?  सुशासन और 'जीरो टॉलरेंस' का दम भरने वाली मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार के राज में पर्दे के पीछे भ्रष्टाचार का एक ऐसा अनोखा और खौफनाक सिंडिकेट चल रहा है, जिसे न तो नियमों की परवाह है, न जनता के टैक्स के पैसों की और न ही इंसानी जिंदगियों की। 

पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश में जिस शराब कंपनी पर मासूम बच्चों के शोषण और अवैध परमिट के गंभीर आरोप लगे, उसे छत्तीसगढ़ में एंट्री देने की तैयारी है, तो दूसरी तरफ सड़क, बिजली और खेल मैदानों के नाम पर करोड़ों रुपये के सरकारी ठेके रेवड़ियों की तरह उन अपात्र कंपनियों को बांटे जा रहे हैं जो तकनीकी रूप से पूरी तरह अयोग्य हैं। आखिर जनता की गाढ़ी कमाई से हो रहे इस 'खूनी खेल' का असली मास्टरमाइंड कौन है?

क्रोनोलॉजी ऑफ करप्शन: 13 करोड़ की बंदरबांट और मौत को आमंत्रण

इस पूरे घोटाले की कड़ियों को जोड़ें तो अफसरों और अयोग्य ठेकेदारों की जुगलबंदी के तीन बड़े और बेहद संवेदनशील मामले सामने आते हैं: 

1. रायपुर-धमतरी-कुरूद: अयोग्य हाथों में बिजली का करंट (ठेका राशि: 6 करोड़)

रायपुर-धमतरी-कुरूद मार्ग पर बिजली लाइन शिफ्टिंग और विद्युतीकरण (कोड आईडी: CGER7424) का बेहद संवेदनशील काम एक ऐसी अपात्र कंपनी को सौंप दिया गया, जिसे छत्तीसगढ़ के ही दूसरे विभाग पहले ब्लैकलिस्ट कर चुके हैं।  जरा सोचिए, जिस दौर में जरा से शॉर्ट सर्किट से लोगों की जान चली जाती है, वहां हाई-वोल्टेज बिजली का काम एक दागी कंपनी को देना क्या सीधे-सीधे लोगों को मौत के मुंह में धकेलना नहीं है?

2. बिलासपुर न्यायधानी: खेल परिसर के नाम पर बड़ा खेल (ठेका राशि: 4.87 करोड़)

बिलासपुर खेल परिषद (स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स) के निर्माण, विद्युत नवीनीकरण और मेंटेनेंस के नाम पर करीब पौने पांच करोड़ का ठेका एक और अपात्र कंपनी की झोली में डाल दिया गया। बच्चों और खिलाड़ियों के भविष्य से जुड़े इस परिसर में तकनीकी रूप से अक्षम कंपनी से काम कराना किसी बड़े हादसे को न्योता देने जैसा है। क्या माननीय हाईकोर्ट को इस पर स्वतः संज्ञान नहीं लेना चाहिए? 

3. नवा रायपुर-महासमुंद: चमचमाती सड़कों के नीचे 'अंधेरा' (ठेका राशि: 2.15 करोड़)

नवा रायपुर और महासमुंद में सड़क चौड़ीकरण के दौरान बिजली लाइन की शिफ्टिंग के नाम पर सवा दो करोड़ रुपये का ठेका भी अपात्रों को ही रेवड़ी की तरह बांट दिया गया। 

बड़ा सवाल: जनता की जान दांव पर, क्या कमीशन का है चक्कर?

कुल 13 करोड़ रुपये के ये तीनों ठेके यह चीख-चीख कर कह रहे हैं कि यह कोई प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश है।  क्या ये अपात्र कंपनियां अधिकारियों को भारी-भरकम कमीशन दे रही हैं, जिसके बदले जनता की सुरक्षा को ताक पर रख दिया गया? खराब गुणवत्ता, ओवर-बिलिंग (बिल बढ़ाकर राशि हड़पना) और राजस्व की बर्बादी का यह खुला खेल धड़ल्ले से जारी है। 

अधिकारियों का लचर बहाना:

जब इस घालमेल पर अधिकारियों से सवाल किया जाता है, तो उनका रटा-रटाया जवाब आता है कि "हमने शपथ-पत्र (Affidavit) मांगा है, अगर वो झूठा निकला तो ठेकेदार को जेल भेजेंगे।"  लेकिन साहब, जब तक आपकी कागजी कार्रवाई पूरी होगी और ठेकेदार जेल जाएगा, तब तक अगर घटिया काम की वजह से किसी बेकसूर की जान चली गई, तो उसका जिम्मेदार कौन होगा? क्या 'पैसे दो, ठेका लो और नियमों को जेब में रखो' ही इस सरकार की नई नीति बन चुकी है? 

शर्मनाक: बाल शोषकों के लिए 'रेड कारपेट'!

भ्रष्टाचार की हद तो तब हो जाती है जब शराब के काले कारोबार में लिप्त दागी कंपनियों को राज्य में तवज्जो दी जाती है। साल 2024 में मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में 'सोम डिस्टिलरी' का एक खौफनाक मामला सामने आया था, जहां 59 मासूम बच्चों को बंधक बनाकर काम कराया जा रहा था।केमिकल की वजह से उन बच्चों के हाथ तक झुलस चुके थे। मध्य प्रदेश सरकार ने इस कंपनी को ब्लैकलिस्ट किया और हाईकोर्ट ने इसका लाइसेंस सस्पेंड कर दिया।अब सवाल यह उठता है कि क्या ऐसी अमानवीय और कानून द्वारा सस्पेंड की गई कंपनियों के लिए छत्तीसगढ़ का आबकारी और प्रशासनिक अमला पलक-पावड़े बिछा रहा है? कल को अगर ये शराब सप्लाई में कोई बड़ा खिलवाड़ कर दें, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

बदहाल कानून व्यवस्था: 10 हजार की भीड़ के बीच मर्डर और लूट, बेबस सरकार!

यह सिर्फ आर्थिक भ्रष्टाचार का मामला नहीं है, बल्कि राज्य की कानून व्यवस्था भी पूरी तरह वेंटिलेटर पर आ चुकी है। कोटनी में साप्ताहिक बाजार के दौरान, जहां 10 से 15 हजार लोगों की भारी भीड़ मौजूद थी, वहां तीन बेखौफ अपराधी आते हैं, एक सराफा व्यवसायी को सरेआम गोली मारते हैं और लगभग 65 लाख रुपये से अधिक के सोने-चांदी के जेवरात लूटकर फरार हो जाते हैं। 

इस दुस्साहस के बाद पूरे इलाके में आक्रोश है, पीड़ित परिवार रो-रोकर बेहाल है और जनता शव को सड़क पर रखकर प्रदर्शन करने को मजबूर है।  कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए सीधा सवाल दागा है कि “मुख्यमंत्री जी और गृहमंत्री जी, बताइए कि इस राज्य में जनता की रक्षा कौन करेगा?” जब अपराधी इतने बेखौफ हैं कि हजारों की भीड़ के बीच हत्या करके निकल जाते हैं, तो आम नागरिक खुद को सुरक्षित कैसे महसूस करे?  टिप्पणी (Conclusion):

छत्तीसगढ़ में 'बदलाव' का नारा देकर सत्ता में आई सरकार आज खुद कटघरे में है। एक तरफ अयोग्य और ब्लैकलिस्टेड ठेकेदारों को संवेदनशील सरकारी काम सौंपकर जनता को मौत के मुहाने पर खड़ा किया जा रहा है, तो दूसरी तरफ सरेआम गोलियां चल रही हैं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और उपमुख्यमंत्री व लोक निर्माण मंत्री अरुण साव को अब फाइलों से बाहर निकलकर जनता को जवाब देना होगा। शपथ-पत्रों के पीछे छिपने वाले अफसर याद रखें कि जनता का टैक्स उनकी अय्याशी के लिए नहीं है, और न ही जनता की जान इतनी सस्ती है कि उसे कमीशनखोरी की भेंट चढ़ा दिया जाए। उच्च स्तरीय जांच और दोषियों पर एफआईआर ही अब एकमात्र रास्ता है! 

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बुधवार, 10 जून 2026

नान घोटाला: सुप्रीम कोर्ट के हथौड़े की गूंज से हिली छत्तीसगढ़ की सियासत; क्या खुलेंगे 'रहस्यमयी डायरी' के राज?

 नान घोटाला: सुप्रीम कोर्ट के हथौड़े की गूंज से हिली छत्तीसगढ़ की सियासत; क्या खुलेंगे 'रहस्यमयी डायरी' के राज?


11 साल बाद खुला फाइलों का बंद पन्ना, कानूनी चक्रव्यूह में घिरे नौकरशाह और रसूखदार; पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की बढ़ सकती हैं मुश्किलें, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- "गर्दन तक पहुंचेंगे कानून के हाथ।"




राजनीति में कुछ मुद्दे कभी मरते नहीं हैं, उन्हें बस वक्त के हिसाब से 'कोल्ड स्टोरेज' में डाल दिया जाता है। लेकिन जब देश की सर्वोच्च अदालत की सख्ती और हथौड़े की गूंज सुनाई देती है, तो बड़े-बड़ों के रसूख वाले महलों में भी नींद उड़ जाती है। छत्तीसगढ़ का बहुचर्चित 'नान घोटाला' (नागरिक आपूर्ति निगम घोटाला) एक बार फिर देश की सबसे बड़ी अदालत की दहलीज पर पूरी शिद्दत के साथ जिंदा हो गया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले का ट्रायल शुरू करने और सख्त रुख अपनाने के बाद सूबे के सियासी गलियारों से लेकर ब्यूरोक्रेसी तक हड़कंप मच गया है ।

क्या था साल 2015 का वह महा-घोटाला?

बात साल 2015 की है, जब छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार पूरे शबाब पर थी। इसी दौरान एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने नागरिक आपूर्ति निगम (NAN) के ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की । इस छापे ने पूरे देश को चौंका दिया था। जांच में केवल करोड़ों रुपए नगद ही बरामद नहीं हुए, बल्कि यह भी खुलासा हुआ कि कैसे मलाईदार पदों को बांटा जाता था ।

इस पूरे काले खेल की सबसे बड़ी धुरी बनी वह 'रहस्यमयी डायरी', जिसने तत्कालीन राजनीति में भूचाल ला दिया था। इस डायरी में 'डॉक्टर', 'मैडम' जैसे कई गुप्त कोड लिखे हुए थे, जिन्हें करोड़ों रुपए का कमीशन पहुंचाया जाता था।

ब्यूरोक्रेसी के 'सुपर पावर' और घटिया चावल का पाप

इस महा-घोटाले में तत्कालीन ब्यूरोक्रेसी के दो सबसे रसूखदार और ताकतवर चेहरे विलेन बनकर उभरे—आलोक शुक्ला और अनिल टूटेजा । तत्कालीन प्रशासनिक गलियारों में इन्हें 'सुपर पावर' माना जाता था ।

इस घोटाले का सबसे शर्मनाक और अमानवीय पहलू यह था कि इन रसूखदारों के संरक्षण में ₹3 प्रति मीट्रिक टन के हिसाब से कमीशन की जेबें तो गर्म हो रही थीं, लेकिन प्रदेश की गरीब और मासूम जनता की थाली तक 'घटिया और अमानक स्तर का चावल' परोसा जा रहा था । गरीबों के निवाले पर डाका डालकर रसूखदार अपनी तिजोरियां भर रहे थे ।

शिवशंकर भट्ट: वो 'विभीषण' जिसने खोल दिए राज

इस पूरी कानूनी लड़ाई के सबसे अहम किरदार हैं शिवशंकर भट्ट, जिन्हें छत्तीसगढ़ के राजनीतिक गलियारों में 'विभीषण' के नाम से भी जाना जाता है । भट्ट ने जब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपनी जुबान खोली और बकायदा शपथ पत्र दाखिल किया, तो पूरा देश हतप्रभ रह गया। उन्होंने सीधे तौर पर तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का नाम इस मामले में घसीटा ।

हालांकि, भाजपा ने इस शपथ पत्र को कभी गंभीरता से नहीं लिया । लेकिन हाल ही में डॉ. रमन सिंह को पार्टी के कोर ग्रुप से बाहर का रास्ता दिखाए जाने के फैसले को इसी नान घोटाले के ट्रायल से जोड़कर देखा जा रहा है। सवाल अब भी बरकरार है कि क्या डॉ. रमन सिंह वाकई इस पूरे खेल के मुखिया थे या उनकी नाक के नीचे उनकी मर्जी के बिना यह सब हो रहा था ?

11 साल का कानूनी पचड़ा और घूमता चक्रव्यूह

बीते 11 सालों में छत्तीसगढ़ की राजनीति में कई उतार-चढ़ाव आए । सरकारें बदलीं, चेहरे बदले, और जांच की कमान भी ACB से लेकर ED (प्रवर्तन निदेशालय) और SIT (विशेष जांच दल) के हाथों में घूमती रही । लेकिन रसूख की ताकत के दम पर यह मामला कानूनी दांवपेंचों में ऐसा उलझा कि लोग इसे लगभग भूलने लगे थे । रसूखदार अधिकारी और नेता जमानत और कानूनी सुरक्षा की आड़ में छिपे रहे ।

सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश: "सिस्टम सिर्फ गरीबों के लिए नहीं"

अब जब सुप्रीम कोर्ट ने सीधे तौर पर दखल देकर ट्रायल को हरी झंडी दे दी है, तो उम्मीद की एक नई किरण जागी है। अदालत ने कड़ा संदेश दिया है कि कानून के हाथ सिर्फ लंबे नहीं होते, वे जरूरत पड़ने पर गुनहगारों की गर्दन तक भी पहुंचते हैं ।

अब देखना यह होगा कि कोर्ट के इस 'फाइनल राउंड' में क्या आलोक शुक्ला और अनिल टूटेजा जैसे अफसर इस चक्रव्यूह से निकल पाएंगे? क्या डायरी के उन गुप्त कोड्स के पीछे छिपे 'मगरमच्छों' के असली चेहरे बेनकाब होंगे या एक बार फिर रसूख के आगे सिस्टम बौना साबित हो जाएगा ? जनता की नजरें अब देश की सबसे बड़ी अदालत के इस अंतिम फैसले पर टिकी हैं।

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मंगलवार, 9 जून 2026

रिश्तों की बलि, करोड़ों का खेल!

 रिश्तों की बलि, करोड़ों का खेल!

 भारतमाला मुआवजा घोटाला: जब रसूख और रुपयों की हवस में अपनों के नाम और सिंदूर की मर्यादा भी दांव पर लग गई


 जिस देश और प्रदेश में एक आम किसान अपनी ही पुश्तैनी जमीन का जायज मुआवजा पाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर अपनी चप्पलें घिस देता है, वहीं रसूखदारों के एक पूरे कुनबे ने कागजों पर जालसाजी का ऐसा शर्मनाक खेल खेला है जिसे सुनकर किसी का भी कलेजा कांप जाए। यह सनसनीखेज कहानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी 'भारतमाला परियोजना' के तहत दुर्ग और राजनांदगांव के बीच (विशेषकर पाटन तहसील में) हुए भूमि अधिग्रहण मुआवजे की है। इस पूरे महाघोटाले में अब प्रवर्तन निदेशालय (ED) की एंट्री हो चुकी है, और जो तथ्य सामने आ रहे हैं, उन्होंने न केवल कानून बल्कि सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों की पवित्रता को भी तार-तार कर दिया है।

करोड़ों का लालच और रिश्तों का 'बदला हुआ' भूगोल

कहते हैं कि भारतीय समाज में विवाह के सात फेरे, सिंदूर की मर्यादा और पारिवारिक रिश्ते सबसे अनमोल होते हैं। लेकिन जब बात करोड़ों रुपये के सरकारी मुआवजे की आई, तो पूर्व मंत्री और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के कथित 'संस्कारों' की दुहाई देने वाले एक बड़े रसूखदार परिवार ने लाज-शर्म को ताक पर रख दिया।

मुआवजे का नियम कहता है कि जमीन के जितने टुकड़े होंगे और जितने अलग-अलग खातेदार होंगे, मुआवजा राशि उतनी ही मोटी और अलग-अलग हिस्सों में बढ़कर मिलेगी। बस, इसी कानूनी छिद्र का फायदा उठाने के लिए इस रसूखदार परिवार ने घर की महिलाओं को मोहरा बनाया या वे खुद इस खेल में शामिल हो गईं। एक ही नाम पर जमीन होने से मुआवजा सीमित रहता, इसलिए जमीन के टुकड़े किए गए और कागजों पर पतियों, पिताओं और ससुरों के नाम इस तरह बदले गए मानो आपस में कोई खून का रिश्ता ही न हो।

पैसे की भूख: किसी ने पति का नाम छुपाया, तो किसी ने बदला ससुर

इस पारिवारिक ड्रामे ने रातों-रात पूरे कुनबे को करोड़पति बना दिया। इस घोटाले की जद में पूर्व मंत्री के सगे भतीजे से लेकर बहुएं और भाभियां तक शामिल हैं। ईडी की जांच और राजस्व दस्तावेजों से जो प्रमुख नाम बेनकाब हुए हैं, वे इस प्रकार हैं:

1 रंजीता चंद्राकर (ग्राम कुरूद): इन्होंने मुआवजे की रकम को कई गुना बढ़ाने के लिए सरकारी कागजों में पति या पिता के नाम की जगह अपने 'ससुर' का नाम दर्ज करा दिया।

2 वाणी श्री चंद्राकर: इन्होंने तो हद ही कर दी; करोड़ों के फेर में शादी के पवित्र बंधन और पति के नाम को ही कागजों से गायब कर दिया और उसकी जगह अपने स्वर्गीय पिता का नाम दर्ज करा दिया।

3 अन्य संदेहास्पद नाम: इस पूरे खेल में पूर्व मंत्री के भतीजे सौरभ चंद्राकर, भाभी अरुणा चंद्राकर सहित परिवार के अन्य सदस्य—भरतलाल, मनोहर चंद्राकर, सुषमा चंद्राकर, विशाखा चंद्राकर, योगेश चंद्राकर, रेखा चंद्राकर और मीना चंद्राकर की भूमिका भी जांच के दायरे में है।

यह छत्तीसगढ़ की उस पारिवारिक पृष्ठभूमि पर एक बड़ा तमाचा है जहां रिश्तों को रुपयों से ऊपर माना जाता है। सवाल यह उठता है कि क्या इन महिलाओं ने केवल पुरुषों के दबाव में आकर अपने सिंदूर और पहचान का सौदा किया, या फिर पैसे की हवस में वे खुद इस धोखाधड़ी की सूत्रधार थीं?

अंधा तंत्र, गदगद अफसरशाही: पटवारी से लेकर एसडीएम तक मौन

यह घोटाला सिर्फ एक रसूखदार परिवार की चालाकी का नतीजा नहीं है। यह मुमकिन ही नहीं था कि इतना बड़ा पारिवारिक खेल बिना प्रशासनिक मिलीभगत के खेला जा सके। जब कागजों पर ससुर को पिता और पति को अजनबी बनाया जा रहा था, तब इलाके के पटवारी, तहसीलदार, एसडीएम और लैंड एक्विजिशन (भूमि अधिग्रहण) ऑफिसर अपनी आंखें मूंदे बैठे थे।

आशंका जताई जा रही है कि या तो इन अधिकारियों के टेबल के नीचे नोटों की मोटी गड्डियां पहुंचाई गईं या फिर पूर्व मंत्री के रसूख और धौंस के आगे पूरा तंत्र नतमस्तक हो गया। राजनांदगांव और पाटन क्षेत्र से ऐसी भी खबरें हैं कि जो जमीनें एक्सप्रेसवे के मुख्य निर्माण से 100 मीटर से लेकर 1 किलोमीटर तक दूर थीं, उनका भी नियम विरुद्ध जाकर करोड़ों का मुआवजा बांट दिया गया।

आरएसएस के 'संस्कार' और दावों पर बड़ा सवाल

यह मामला इसलिए भी राजनीतिक गलियारों में गरमा गया है क्योंकि आरोपी कुनबा उस पार्टी और विचारधारा से ताल्लुक रखता है जो खुद को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के संस्कारों से पोषित बताती है। जो संगठन देश में सांस्कृतिक विरासत और पारिवारिक ताने-बाने को मजबूत करने का दावा करता है, उसी के एक पूर्व कद्दावर मंत्री का परिवार पैसों के लिए अपनी पहचान बदलने पर आमादा हो गया।

ED की एंट्री से हड़कंप, चेहरों से नकाब उतरना तय

भारतमाला परियोजना के इस 'मुआवजा घोटाले' की परतें अब तेजी से उखड़ रही हैं। ईडी की एंट्री के बाद से ही दोषी रसूखदारों और भ्रष्ट अधिकारियों की रातों की नींद उड़ी हुई है। शुरुआती जांच ने इस बात को पुख्ता कर दिया है कि यह देश के विकास मॉडल की आड़ में रसूखदारों द्वारा अपने 'कुनबे के विकास' का एक घृणित और सुनियोजित प्रयास था।

आने वाले दिनों में ईडी की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, कई सफेदपोशों और बड़े अधिकारियों की गिरफ्तारी तय मानी जा रही है। देखना होगा कि कानून इन 'रिश्तों के सौदागरों' को उनके किए की क्या सजा देता है।

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काले कोयले का 'मिस्टर इंडिया' खेल: लारा प्लांट के रास्ते से 573 टेलर गायब, कागजों पर बिका करोड़ों का कोयला!

 काले कोयले का 'मिस्टर इंडिया' खेल: लारा प्लांट के रास्ते से 573 टेलर गायब, कागजों पर बिका करोड़ों का कोयला!

तलाई पाली माइन से एनटीपीसी लारा प्लांट के बीच ₹200 करोड़ की 'महाडकैती'; राजनेता, अफसरशाह और ट्रांसपोर्टर सिंडिकेट के गठजोड़ पर अब सीबीआई की नजर।



छत्तीसगढ़ में कोयले के काले कारोबार का एक ऐसा जादुई खेल सामने आया है, जिसने देश के बड़े-बड़े जादूगरों और जांच एजेंसियों को हैरान कर दिया है। इसे केवल एक 'घोटाला' कहना इस पूरे घटनाक्रम के साथ न्याय नहीं होगा, बल्कि यह सीधे-सीधे समूचे तंत्र की मौजूदगी में की गई एक 'महाडकैती' है । मामला नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (NTPC) के लारा प्लांट से जुड़ा है, जहां से प्रारंभिक अनुमानों के मुताबिक करीब ₹200 करोड़ का कोयला हवा में गायब कर दिया गया ।

क्या है पूरा 'लारा कांड'?

दस्तावेजों और प्रारंभिक जांच के अनुसार, रायगढ़ की तलाई पाली माइंस (Talaipali Mines) से एनटीपीसी के लारा प्लांट (Lara Plant) के लिए भारी मात्रा में कोयला रवाना किया गया था । कागजों पर बकायदा धर्म कांटे (वेब्रिज) में कोयले का वजन दर्ज हुआ, एंट्री की गई और गेट पास भी जारी हुए । लेकिन, तलाई पाली माइन से निकला कोयला लारा प्लांट पहुंचा ही नहीं ।

हैरतअंगेज बात यह है कि 573 भारी-भरकम टेलर (ट्रक) रास्ते से ही मिस्टर इंडिया की तरह गायब हो गए । रायगढ़ और उसौर के बीच के चंद किलोमीटर के सफर में हजारों टन कोयला लदे सैकड़ों ट्रक कहां विलीन हो गए, इसका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है ।

बिना फिजिकल वेरिफिकेशन के हुआ भुगतान

खोजी कड़ियों को जोड़ने पर पता चलता है कि यह खेल बिना आंतरिक मिलीभगत के नामुमकिन था। तलाई पाली माइंस से फर्जी एंट्री और गेट पास के सहारे इन टेलरों को रवाना दिखाया गया । रास्ते में ही इस कोयले को किसी गुप्त स्थान पर डंप कर (उतार) दिया गया । सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि लारा प्लांट में बिना किसी 'फिजिकल वेरिफिकेशन' (भौतिक सत्यापन) के कागजों पर ही एंट्री कर ली गई कि माल सुरक्षित पहुंच चुका है और इसके आधार पर करोड़ों रुपये का भुगतान भी जारी कर दिया गया ।

इस पूरे घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:

 जब सैकड़ों ट्रक गायब हो रहे थे, तब वहां तैनात सुरक्षा बल (CISF) और माइनिंग विभाग क्या कर रहे थे? 

 इतने बड़े फर्जीवाड़े के बावजूद संबंधित ट्रांसपोर्टर के खिलाफ तत्काल कड़ा एक्शन क्यों नहीं लिया गया? 

सफेदपोश, अफसर और माफिया का 'सिंडिकेट'

इस खेल के पीछे किसी आम अपराधी का हाथ नहीं, बल्कि एक रसूखदार 'सिंडिकेट' काम कर रहा है, जिसमें सफेदपोश राजनेता, एनटीपीसी व तलाई पाली माइंस के उच्च अधिकारी, भ्रष्ट अफसरशाह और कोयला माफिया शामिल हैं । सूत्र बताते हैं कि कोयला लेवी के खेल के लिए पहले से चर्चित कुछ दिग्गज नेताओं और बड़े उद्योगपतियों ने अपने राजनीतिक रसूख के दम पर इस पूरे सिंडिकेट को संरक्षण दे रखा था।

सीबीआई के हाथ में कमान: क्या खुलेगा राज?

मामले की गंभीरता को देखते हुए इस 'कोयला परिवहन घोटाले' की जांच अब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंप दी गई है और एफआईआर भी दर्ज हो चुकी है । सीबीआई के सामने अब सबसे बड़ी चुनौतियां हैं:

1 गायब हुआ हजारों टन कोयला आखिरकार किस जगह डंप किया गया?

2 उन 573 ट्रेलरों के असली मालिक कौन हैं, जिनके जरिए इस बेखौफ डकैती को अंजाम दिया गया? 

3 पर्दे के पीछे बैठे वे कौन से वीआईपी और सफेदपोश चेहरे हैं, जो इस सिंडिकेट की कमान संभाल रहे थे? 

छत्तीसगढ़ में कोयला घोटालों का पुराना इतिहास

छत्तीसगढ़ के लिए कोयला परिवहन और लेवी का यह विवाद नया नहीं है । पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल के दौरान भी कोयला घोटाले को लेकर दिल्ली की संसद से लेकर छत्तीसगढ़ की गलियों तक सियासी पारा गर्म रहा था 。 उस दौरान प्रवर्तन निदेशालय (ED) की एंट्री हुई थी और सूर्यकांत तिवारी, अनिल टुटेजा समेत कई रसूखदार अधिकारियों और करीब आधा दर्जन आईपीएस (IPS) अफसरों से लंबी पूछताछ हुई थी, जिससे प्रदेश की राजनीति की दिशा ही बदल गई ।

अब जबकि राज्य में एक बार फिर नए सिरे से 'लारा कांड' के रूप में ₹200 करोड़ की कोयला डकैती सामने आई है जनता और राजनीतिक विश्लेषकों की निगाहें सीबीआई की कार्रवाई पर टिकी हैं  देखना दिलचस्प होगा कि इस जादुई सिंडिकेट के कौन-कौन से बड़े किरदार सलाखों के पीछे पहुंचते हैं !

वीडियो देखें 

https://youtu.be/G7BitLUQiGw?si=HT6cZtxYAC5ScEJC


रविवार, 7 जून 2026

रबर स्टैंप' के तमगे से 'अल्टीमेट पावर सेंटर' तक: छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय का डबल गेम!

रबर स्टैंप' के तमगे से 'अल्टीमेट पावर सेंटर' तक: छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय का डबल गेम!



दिसंबर 2023 में जब छत्तीसगढ़ की सत्ता की कमान विष्णुदेव साय को सौंपी गई थी, तब दिल्ली से लेकर रायपुर तक के राजनीतिक पंडितों और विपक्ष ने एक ही सुर में दावा किया था— *“यह सरकार रबर स्टैंप है, रिमोट कंट्रोल से चलेगी।”* लेकिन साल 2026 आते-आते छत्तीसगढ़ के सियासी और प्रशासनिक गलियारों में एक ऐसा गुप्त, आक्रामक और खामोश खेल खेला जा चुका है जिसने सबको चौंका दिया है।

सियासत की बिसात पर शह और मात का यह खेल इतनी चालाकी से चल रहा है कि दिल्ली को इसकी भनक कितनी है, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन मुख्यमंत्री साय ने राज्य में अपना एक 'अभेद और निर्विवाद सिस्टम' खड़ा कर लिया है।

### **1. रिमोट की छटपटाहट और खामोश बगावत**

राजनीति में जो सीधा और सरल दिखता है, अमूमन वह वैसा होता नहीं। विपरीत परिस्थितियों में कद्दावर नेताओं को पटखनी देकर आए विष्णुदेव साय के भीतर 'रिमोट कंट्रोल सरकार' के नैरेटिव को लेकर एक गहरी छटपटाहट थी। इसी छटपटाहट ने एक ऐसी रणनीति को जन्म दिया, जिसने राज्य के स्थापित पावर सेंटर्स की नींव हिला दी। मुख्यमंत्री ने खुद को मजबूत करने के लिए उन चेहरों को खंगालना शुरू किया जो प्रभावशाली तो थे, लेकिन जिन पर किसी खास गुट या बड़े नेता का 'ठप्पा' नहीं लगा था।

### **2. ब्यूरोक्रेसी का महामंथन: 43 अफसरों के तबादले और मलाईदार विभागों पर कब्ज़ा**

कहा जाता है कि किसी भी मुख्यमंत्री की असली ताकत उसकी ब्यूरोक्रेसी होती है। शुरुआत में साय को दूसरों पर निर्भर रहना पड़ा था; चाहे वह वित्त मंत्री ओपी चौधरी की दमदारी हो या 2005 बैच के आईएएस अधिकारियों का प्रशासनिक नियुक्तियों में दबदबा।

लेकिन बिना किसी शोर-शराबे के, मुख्यमंत्री ने हाल ही में **43 आईएएस अफसरों का ट्रांसफर** कर पूरी बिसात ही पलट दी। खनिज, राजस्व, वन और गृह जैसे सबसे संवेदनशील और मलाईदार विभागों में उन्होंने अपने सबसे भरोसेमंद और निर्विवाद अफसरों को तैनात कर दिया है। यह सीधे तौर पर प्रशासनिक नियंत्रण अपने हाथ में लेने का साय का सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक है।

### **3. 'डबल गेम' और कद्दावर नेताओं की 'पॉलिटिकल क्लीनिंग'**

प्रशासन के बाद बारी राजनीति को साधने की थी। इस 'साइलेंट ऑपरेशन' के तहत उन भारी-भरकम चेहरों को हाशिए पर धकेल दिया गया जो खुद को मुख्यमंत्री से कम नहीं समझते थे या भविष्य के दावेदार थे:

 * **दिग्गजों की विदाई:** डॉ. रमन सिंह, बृजमोहन अग्रवाल, राजेश मूणत, विक्रम उसेंडी, रामविचार नेताम और रेणुका सिंह जैसे कद्दावर नेताओं को कोर ग्रुप से धीरे से किनारे कर दिया गया।

 * **परंपराओं का खात्मा:** पार्टी की स्थापित परंपराओं को तोड़ते हुए विशेष आमंत्रित सदस्यों की सूची से **23 विधायकों को बाहर** का रास्ता दिखा दिया गया। इसकी जगह मुख्यमंत्री ने पहली बार जीतकर आए युवा और प्रभावशाली विधायकों की एक नई फौज खड़ी कर दी है जो सीधे उनके प्रति वफादार हैं।

### **4. दिल्ली को विश्वास में लेकर खुद का कुनबा मजबूत करना**

इस पूरे खेल की सबसे तीखी सच्चाई यह है कि इसे **'डबल गेम'** कहा जा रहा है। मुख्यमंत्री और उनके रणनीतिकार अफसरों ने बड़ी चालाकी से दिल्ली के केंद्रीय नेतृत्व को यह विश्वास दिलाया कि यह सब 'सीनियर नेताओं को किनारे कर नए प्रयोग' करने के लिए किया जा रहा है।

यानी, **"दिल्ली को विश्वास में लो और राज्य में अपना खुद का अभेद साम्राज्य खड़ा कर लो।"** अब स्थिति यह है कि यदि कोई कद्दावर नेता दिल्ली जाकर शिकायत भी करे, तो उसका कोई असर नहीं होने वाला, क्योंकि साय का कुनबा पूरी तरह से स्थापित हो चुका है।

 निष्कर्ष (Punchline)

छत्तीसगढ़ में भले ही कानून-व्यवस्था की स्थिति और अपराधों को लेकर सवाल उठ रहे हों, लेकिन प्रशासनिक और राजनीतिक मोर्चे पर विष्णुदेव साय ने खुद को 'अल्टीमेट पावर सेंटर' के रूप में स्थापित कर लिया है। जो लोग साय को सीधा और खामोश समझते थे, वे उनके इस 'डबल गेम' के चक्रव्यूह में फंस चुके हैं। यह साय का नया युग है— जहाँ चेहरा सीधा है, लेकिन चालें बेहद गहरी और अचूक हैं!

वीडियो देखें 

https://youtu.be/dMcfBCq1Ee8?si=3NbNC4HtQV_MGx-D


खाकी' का नया खेल: सत्ता के रसूख में 'पीड़ित' ही बना 'लुटेरा'

 खाकी' का नया खेल: सत्ता के रसूख में 'पीड़ित' ही बना 'लुटेरा', कानून को 'वॉशिंग मशीन' बनाने की जिद!



छत्तीसगढ़ में सत्ता बदलते ही क्या न्याय की परिभाषा भी बदल गई है? क्या सूबे की 'डबल इंजन सरकार' में अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि अब रसूखदारों के आगे खाकी (पुलिस) नतमस्तक होकर पीड़ित को ही मुलजिम बनाने का खेल खेल रही है? ये सवाल हम नहीं, बल्कि बेमेतरा जिले के साजा विधानसभा क्षेत्र से आ रही वह हैरान करने वाली तस्वीरें और पुलिसिया कार्रवाई की स्क्रिप्ट चीख-चीख कर कह रही है, जिसने पूरे प्रदेश की कानून व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।

ताजा मामला साजा विधानसभा के हाईप्रोफाइल भाजपा विधायक ईश्वर साहू के पुत्र कृष्णा साहू से जुड़ा है। आरोप है कि सत्ता की धमक और अहंकार के नशे में चूर विधायक पुत्र को बचाने के लिए साजा पुलिस ने एक ऐसा 'कुचक्र' रचा है, जिससे पीड़ित आदिवासी परिवार ही अब सहमा हुआ है।

दशहरे की रात का वो खूनी खेल और 'खाकी' की सुस्ती

घटना बीती 12 अक्टूबर यानी दशहरे की रात की है। आरोप है कि विधायक पुत्र कृष्णा साहू ने अपने साथियों के साथ मिलकर मनीष मंडावी (एक आदिवासी युवक) और उसके चाचा के साथ जमकर मारपीट की। मारपीट इस कदर बेरहमी से की गई कि पीड़ित का सिर तक फट गया। जातिसूचक गालियां दी गईं। लेकिन हद तो तब हो गई जब इस गंभीर मामले की रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए पीड़ित को घंटों थाने के चक्कर काटने पड़े। साजा पुलिस सत्ता के दबाव में एफआईआर दर्ज करने से कतराती रही। आखिरकार जब आदिवासी समाज ने एकजुट होकर तीखा आक्रोश जताया और पुलिस पर भारी दबाव बनाया, तब कहीं जाकर साजा पुलिस ने विधायक पुत्र कृष्णा साहू के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट (ST/ST Act) और अन्य गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया।

काउंटर एफआईआर का 'पटकथा': 45 घंटे बाद याद आई लूट?

कहानी में असली ट्विस्ट इसके बाद आता है। जैसे ही विधायक पुत्र पर गैर-जमानती धाराओं में केस दर्ज हुआ, साजा पुलिस ने कथित तौर पर रसूखदारों को 'वॉशिंग मशीन' में डालकर पाक-साफ करने की स्क्रिप्ट लिख डाली। अमूमन ऐसी संगीन धाराओं के तहत आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी होनी चाहिए, लेकिन कृष्णा साहू बेखौफ अंदाज में ठसक के साथ थाने पहुंचता है।

पुलिस उसे गिरफ्तार करने की बजाय उसकी एक ऐसी शिकायत पर तुरंत मुहर लगा देती है, जिसे सुनकर कोई भी हैरान रह जाए। घटना के लगभग 45 घंटे बाद विधायक पुत्र की तरफ से काउंटर रिपोर्ट लिखवाई जाती है कि पीड़ित मनीष मंडावी और उसके चाचा ने मिलकर उनसे ₹40,000 लूट लिए! पुलिस बिना किसी जांच के, बिना समय गंवाए पीड़ित पक्ष के खिलाफ ही लूट (Dacoity/Robbery) जैसी गंभीर धारा के तहत काउंटर एफआईआर दर्ज कर लेती है।

सवाल: क्या समझौते का दबाव बनाने के लिए रचा गया कुचक्र?

राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि पुलिस अक्सर रसूखदारों को बचाने के लिए काउंटर केस का सहारा लेती है ताकि गरीब पीड़ित पक्ष पर दबाव बनाया जा सके और वह 'समझौता' करने को मजबूर हो जाए।

 पहला सवाल: विधायक बनने से पहले और बाद की जीवनशैली को देखें, तो क्या सचमुच ₹40,000 की लूट की रिपोर्ट लिखवाने में विधायक पुत्र को 45 घंटे से ज्यादा का वक्त लग गया?

 दूसरा सवाल: एसटी/एससी एक्ट के तहत नामजद आरोपी थाने में खुलेआम घूम रहा है और पुलिस उससे पूछताछ करने के बजाय उसकी 'लूट' की थ्योरी पर आंख मूंदकर भरोसा कर लेती है, ऐसा क्यों?

 तीसरा सवाल: यह पूरा इलाका प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और गृहमंत्री विजय शर्मा के प्रभाव वाला क्षेत्र माना जाता है, ऐसे में गृहमंत्री की नाक के नीचे कानून का यह कैसा माखौल उड़ाया जा रहा है?

लोहारीडीह की आग से भी नहीं सीखा सबक?

इसी कवर्धा-बेमेतरा बेल्ट में पिछले दिनों 'लोहारीडीह कांड' हुआ था, जहां एक रसूखदार भाजपा नेता के आतंक से तंग आकर उग्र भीड़ ने कानून अपने हाथ में ले लिया था और पूरा गांव जेल की सलाखों के पीछे चला गया था। साजा की यह घटना बताती है कि प्रशासन ने लोहारीडीह की त्रासदी से कोई सबक नहीं सीखा है। जब पुलिस निष्पक्ष न्याय देने की बजाय सत्ता के औजार के रूप में काम करने लगे, तो जनता का कानून से विश्वास उठने लगता है।

नवा बैला के नवा सींग... सत्ता का अहंकार?

छत्तीसगढ़ी में एक बड़ी मशहूर कहावत है— "नवा बैला के नवा सींग, चरे बैला टंगे टिंग" (यानी नया-नया पद या ताकत मिलने पर जरूरत से ज्यादा धमक दिखाना)। साजा में भी यही देखने को मिल रहा है। विपक्ष अब इस मुद्दे पर पूरी तरह मुखर है और सरकार को घेरने की तैयारी में है। सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री और गृहमंत्री अपने ही विधायक के पुत्र के इस 'गुंडाराज' पर लगाम कसेंगे या फिर साजा पुलिस का यह 'शर्मनाक खेल' यूं ही जारी रहेगा और एक गरीब आदिवासी न्याय की भीख मांगते-मांगते खुद ही लुटेरा बनकर सलाखों के पीछे डाल दिया जाएगा?

जवाब का इंतजार सूबे की जनता को है।

वीडियो देखें


https://youtu.be/8wLJBtZ6Q4Y?si=Q6XZYs_ObqrHeiL1