मंगलवार, 18 अगस्त 2026

ढाई हजार करोड़ की 'पैरी परियोजना' और 'सिंडिकेट' का खेल

 ढाई हजार करोड़ की 'पैरी परियोजना' और 'सिंडिकेट' का खेल


हाईकोर्ट से हरी झंडी, लेकिन पारदर्शिता पर उठे गंभीर सवाल; क्या भोपाल-नागपुर कनेक्शन से आसान हुई दिलीप बिल्डकॉन की राह?

जब सरकार ढाई हजार करोड़ रुपये जैसी विशालकाय राशि का ढांचागत (Infrastructure) प्रोजेक्ट लेकर आती है, तो यह केवल सीमेंट, गिट्टी, कंक्रीट और पाइपलाइन बिछाने का साधारण मामला नहीं होता। [00:08] यह सीधे तौर पर जनता के पसीने की कमाई और टैक्स के पैसों का मामला होता है। [00:17] यही वजह है कि जब भी ऐसी महात्वाकांक्षी योजनाएं धरातल पर उतरती हैं, तो नेताओं, अफ़सरों, ठेकेदारों और दलालों का एक बड़ा सिंडिकेट अपनी नज़रें गड़ा लेता है। [00:26]

हाल ही में छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग द्वारा शुरू की गई पैरी परियोजना [00:40] (सिकासेर जलाशय से कोडार जलाशय तक बड़ी लिंक नहर और पाइपलाइन निर्माण) को लेकर उठा बवंडर इस बात का साफ़ प्रमाण है। [01:06] प्रोजेक्ट के ऐलान के साथ ही इसके टेंडर की प्रक्रिया विवादों के घेरे में आ गई और मामला हाईकोर्ट के दरवाज़े तक पहुँच गया। [01:06]

भले ही उच्च न्यायालय ने तकनीकी आपत्तियों और याचिकाओं को खारिज करते हुए टेंडर हासिल करने वाली कंपनी दिलीप बिल्डकॉन (Dilip Buildcon) का रास्ता साफ कर दिया हो [01:14], लेकिन इस पूरी प्रक्रिया ने राज्य के प्रशासनिक गलियारों में 'सत्ता, सिंडिकेट और कॉरपोरेट नेक्सस' की एक नई बहस को जन्म दे दिया है। [01:26]

आधी रात को फैसला: क्या था टेंडर का पूरा घटनाक्रम?

पैरी परियोजना छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए निस्संदेह बेहद फायदेमंद और सिंचाई व्यवस्था का कायाकल्प करने वाली योजना है। [02:31] सिकासेर से कोडार जलाशय तक पाइपलाइन और लिंक नहर बिछने से लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि को पानी मिलेगा। [02:44] इसलिए परियोजना की मंशा और उपयोगिता पर कोई सवाल नहीं है [02:55], लेकिन सवाल उठे हैं टेंडर आवंटन के तरीके पर [02:55]:

1. मई-जून का टेंडर चक्र: मई में परियोजना के लिए टेंडर जारी किया जाता है और जून भर प्रक्रिया चलती है। [03:06]

2. 'शुद्धि-पत्र' (Corrigendum) का खेल: प्री-बिड (Pre-Bid) बैठकों के दौरान तकनीकी शर्तों में अचानक ऐसे संशोधन और 'शुद्धि-पत्र' जोड़े जाते हैं, जिसने कई स्थानीय व मंझे हुए ठेकेदारों के गणित को बिगाड़ दिया। [05:16]

3. समय देने से इनकार: जब प्रतिद्वंद्वी कंपनियों ने शर्तों में हुए बदलाव का अध्ययन करने और नए सिरे से कागज़ात जमा करने के लिए समय सीमा बढ़ाने की मांग की, तो विभाग ने उसे ठुकरा दिया। [04:32]

4. आधी रात की घोषणा: जुलाई के अंतिम सप्ताह में अचानक आधी रात को दिलीप बिल्डकॉन को L-1 (लॉएस्ट बिडर) घोषित कर दिया गया। [03:16]

शर्तों के इस फेरबदल और समय न दिए जाने को लेकर असंतुष्ट पक्ष हाईकोर्ट पहुँचे। [03:30] हालांकि, हाईकोर्ट ने याचिकाओं को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि "याचिकाकर्ता अपने आरोपों के समर्थन में पक्षपात, दुर्भावना या किसी विशेष पक्ष को अनुचित लाभ पहुँचाने का कोई ठोस विधिक आधार प्रस्तुत नहीं कर पाए।" [03:41]

कानूनी रूप से रास्ता भले साफ हो गया हो, लेकिन नैतिक और प्रशासनिक पारदर्शिता पर उठते सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। [05:40]

भोपाल से नागपुर तक: 'पॉवर कॉरिडोर्स' का प्रभाव?

इस पूरे मामले में सबसे ज़्यादा चर्चा जिस पहलू की है, वह है—'भोपाल और नागपुर कनेक्शन'। [01:37] छत्तीसगढ़ के राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा जोरों पर है कि किस तरह मध्य प्रदेश और केंद्रीय स्तर के 'पॉवर कॉरिडोर्स' का इस्तेमाल कर टेंडर के समीकरणों को प्रभावित किया गया। [01:48]

 दिलीप बिल्डकॉन का उभार: भोपाल से शुरुआत करने वाली कंपनी 'दिलीप बिल्डकॉन' और उसके कर्ताधर्ता दिलीप सूर्यवंशी का नाम मध्य प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में नया नहीं है। [06:03] मध्य प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल के दौरान इस कंपनी ने अभूतपूर्व तरक्की की और एक छोटे ठेकेदार से देश की अग्रणी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी बन गई। [06:14]

 नागपुर और राष्ट्रीय नेटवर्क: चर्चाएं यह भी हैं कि मध्य प्रदेश में मिली सफलता के बाद कंपनी का प्रभाव राष्ट्रीय राजमार्गों और केंद्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स तक फैला, जहाँ केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय (नागपुर लॉबी) के तहत बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स हासिल किए गए। [06:46]

 छत्तीसगढ़ में एंट्री का पैटर्न: जानकारों का मानना है कि छत्तीसगढ़ में 2,500 करोड़ रुपये के इस महा-प्रोजेक्ट में भी उसी पुराने राजनीतिक अप्रोच और 'नेक्सस' का सहारा लिया गया [07:19]। टेंडर प्रक्रिया के अंतिम चरण में जो 'शुद्धि-पत्र' लाया गया, उसे इसी राजनीतिक छत्रछाया का नतीजा माना जा रहा है। [07:27]

प्रशासनिक घालमेल या राजस्व का बड़ा नुकसान?

इस पूरे घटनाक्रम से तीन ऐसे गंभीर प्रशासनिक और आर्थिक सवाल खड़े होते हैं, जिनका जवाब सरकार और जल संसाधन विभाग को देना होगा:

1. कम प्रतिस्पर्धा (Low Competition) से घाटा: कठोर और अचानक बदली गई शर्तों की वजह से कई राष्ट्रीय व राज्यस्तरीय प्रतिस्पर्धी रेस से बाहर हो गए। जब बिडिंग में प्रतिस्पर्धा कम होती है, तो क्या सरकार को प्रतिस्पर्धी दरें (Competitive Rates) मिल पाती हैं? क्या इससे राज्य के खजाने को भारी राजस्व नुकसान पहुँचा? [07:47]

2. पारदर्शिता बनाम कानूनी वैधता: हाईकोर्ट का फैसला प्रक्रिया को कानूनी रूप से वैध (Technically Legal) भले बना दे [05:40], लेकिन क्या आधी रात को टेंडर फाइनल करना और शुद्धि-पत्र के नाम पर प्रतिस्पर्धा को सीमित करना एक पारदर्शी सरकार के दावों पर खरा उतरता है? [04:12]

3. 30 महीने और 5 साल का मेंटेनेंस: अनुबंध के मुताबिक, दिलीप बिल्डकॉन को 30 महीने के भीतर सिकासेर से कोडार तक का काम पूरा करना है और 5 साल तक रख-रखाव (Maintenance) की ज़िम्मेदारी संभालनी है। [04:41] क्या पूर्व में विवादित रही प्रक्रियाओं के बाद यह कंपनी गुणवत्ता और समय-सीमा के मानकों पर खरी उतर पाएगी? [05:02]

बड़ा सवाल: विकास या सिंडिकेट का विस्तार?

छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद सुशासन और शून्य भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े दावे किए गए थे। लेकिन पैरी परियोजना में जिस तरह 'भोपाल-नागपुर' के रसूखदार कनेक्शन की छाया देखने को मिली है, उससे क्षेत्रीय ठेकेदारों और आम जनता में असंतोष है। [01:37]

हाईकोर्ट के फैसले ने भले ही विभागीय अफसरों और संबंधित कंपनी को फिलहाल राहत दे दी हो [05:40], लेकिन जनता की अदालत में यह सवाल तैर रहा है—क्या यह 2500 करोड़ का प्रोजेक्ट किसानों की किस्मत बदलने के लिए है, या फिर पड़ोसी राज्यों से संचालित होने वाले कॉरपोरेट-राजनीतिक सिंडिकेट की तिजोरियाँ भरने का नया ज़रिया? [00:08]

इस पूरे खेल का कच्चा-चिट्ठा अब सामने आ चुका है [02:09]। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रोजेक्ट की गुणवत्ता और निर्माण की गति पर जनता और मीडिया की निगरानी कितनी कड़क रहती है। [08:07]

प्रमुख बिंदु (Box Highlights for Magazine)

 परियोजना का नाम: पैरी परियोजना (सिकासेर जलाशय से कोडार जलाशय लिंक नहर एवं पाइपलाइन निर्माण) [00:51]

 कुल अनुमानित लागत: लगभग ₹2,500 करोड़ [00:00]

 आवंटित कंपनी: दिलीप बिल्डकॉन (भोपाल आधारित) [01:14]

 समय-सीमा: 30 माह निर्माण + 5 साल मेंटेनेंस [05:02]

 प्रमुख विवाद: अंतिम समय में शुद्धि-पत्र (Corrigendum), बिड जमा करने हेतु समय न देना और आधी रात को L-1 घोषित करना।

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शनिवार, 15 अगस्त 2026

प्रशासनिक तंत्र पर उठे सवाल

प्रशासनिक तंत्र पर उठे सवाल



छत्तीसगढ़ का राजनीतिक माहौल इन दिनों एक बार फिर प्रशासनिक खींचतान और अफसरों की कार्यशैली को लेकर पूरी तरह गरमा गया है। सत्ता के गलियारों में प्रशासनिक तालमेल और नौकरशाही के रवैये पर सवाल खड़े होने लगे हैं। हाल ही में वरिष्ठ भाजपा नेताओं और सांसदों की ओर से आई प्रतिक्रियाओं के बाद राज्य की राजनीति में प्रशासनिक हस्तक्षेप और अधिकारों को लेकर बहस छिड़ गई है।

सांसदों का कड़ा रुख और विशेषाधिकार हनन का मामला

राजनीतिक हलकों में उस वक्त हलचल तेज हो गई जब रायपुर के सांसद बृजमोहन अग्रवाल और आईएएस अधिकारी अमित कटारिया के बीच फोन पर हुई बहस की खबरें सामने आईं। इस घटनाक्रम के बाद बृजमोहन अग्रवाल ने लोकसभा में विशेषाधिकार हनन की शिकायत दर्ज कराई। इसी कड़ी में दुर्ग के सांसद विजय बघेल ने भी अधिकारियों के रवैये से आहत होकर लोकसभा का रुख किया है।

विजय बघेल द्वारा 'मोदी की गारंटी' और अनियमित कर्मचारियों के मुद्दों को लेकर दिए गए बयानों के बाद प्रशासनिक स्तर पर संवादहीनता की स्थिति देखी गई, जिससे यह मामला और तूल पकड़ गया।

सत्ता के समीकरण और नौकरशाही की भूमिका

राजनीतिक विश्लेषकों और वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि राज्य में मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था में 2004-05 बैच के अधिकारियों का प्रभाव काफी बढ़ चुका है। मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री सचिवालय से लेकर मैदानी जिलों तक तैनात कुछ अफसरों की कार्यशैली पर जनप्रतिनिधियों के काम में अनदेखी करने के आरोप लग रहे हैं।

चर्चा यह भी है कि राज्य में प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर दो प्रमुख केंद्र सक्रिय हैं—एक तरफ मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और दूसरी तरफ वित्त मंत्री ओपी चौधरी। ऐसे में कई विधायक और सांसद महसूस कर रहे हैं कि नौकरशाही अपनी सीमाओं से बाहर जाकर काम कर रही है।

विधायकों में भी पनप रहा असंतोष

केवल सांसद ही नहीं, बल्कि कई प्रमुख विधायकों की तरफ से भी इसी तरह की शिकायतें उभरकर सामने आई हैं:

 राजेश मूणत (रायपुर पश्चिम): प्रशासनिक निर्णयों और कार्यशैली को लेकर अपने स्पष्ट विचार रख चुके हैं।

 ननकीराम कंवर: कोरबा जिले के प्रशासनिक रवैये और कलेक्टर के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए धरने तक पहुंच गए थे।

 सरगुजा संभाग के प्रतिनिधि: सरगुजा क्षेत्र के कई विधायक स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यप्रणाली की शिकायत लेकर पार्टी संगठन के वरिष्ठ नेताओं तक पहुंचे।

 केदार कश्यप: बस्तर क्षेत्र में प्रशासनिक तालमेल को लेकर पूर्व में अधिकारियों से तीखी चर्चा की खबरें सामने आई थीं।

रमन सिंह कार्यकाल के 'प्रशासनिक आतंकवाद' से तुलना

राज्य की मौजूदा परिस्थितियों की तुलना पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के कार्यकाल के उस दौर से की जा रही है, जब विपक्षी दलों द्वारा "प्रशासनिक आतंकवाद" जैसा शब्द इस्तेमाल किया जाता था। हालांकि, मौजूदा साय सरकार पर आधिकारिक रूप से ऐसा कोई तमगा नहीं लगा है, लेकिन जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच बढ़ती खाई से शासन की साख पर असर पड़ रहा है।

प्रशासनिक माहौल में उपजे इस तनाव के कारण कई वरिष्ठ आईएएस और विशेष रूप से आईपीएस अधिकारी केंद्र सरकार की प्रतिनियुक्ति (डेपुटेशन) पर दिल्ली जाने के इच्छुक बताए जा रहे हैं।

आगे की राह और सरकार के सामने चुनौती

एक तरफ जहां सांसद और विधायक लगातार अपनी ही सरकार के प्रशासनिक तंत्र से अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार के सामने जन प्रतिनिधियों और नौकरशाही के बीच संतुलन बनाए रखने की बड़ी चुनौती है। आने वाले दिनों में यदि और भी जनप्रतिनिधि खुलकर सामने आते हैं, तो यह मुद्दा राज्य सरकार के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकट बन सकता है।

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शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

राजनीति का अजब रंग: जब अपनों ने मोड़ा मुंह, तो विरोधियों ने बनाई ढाल!

 राजनीति का अजब रंग: जब अपनों ने मोड़ा मुंह, तो विरोधियों ने बनाई ढाल!


 राजनीति के शतरंज पर कौन कब मोहरा बन जाए और कौन शह दे दे, यह कहना मुश्किल होता है। छत्तीसगढ़ की सियासत में इन दिनों कुछ ऐसा ही चौंकाने वाला दृश्य देखने को मिल रहा है [00:00]। रायपुर से लगातार आठ बार विधायक रहे और वर्तमान सांसद बृजमोहन अग्रवाल [00:07], जिन्हें कभी प्रदेश का सबसे असरदार और कद्दावर नेता माना जाता था, आज अपनी ही पार्टी और सरकार में अलग-थलग पड़ते दिखाई दे रहे हैं [02:51]।

अजीब विडंबना यह है कि जिस नेता की मदद और रहमों-करम पर दर्जनों राजनीतिक करियर खड़े हुए, आज वे संकट के समय चुप्पी साधे बैठे हैं [01:07]। वहीं दूसरी ओर, जीवन भर जिन कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ उन्होंने राजनीतिक लड़ाई लड़ी, वे आज उनके समर्थन में ढाल बनकर खड़े हैं [01:18]।

विवाद की चिंगारी: IAS अफसर से तल्खी और लोकसभा में शिकायत

पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब सांसद बृजमोहन अग्रवाल द्वारा जनता के कामों के लिए लिखे गए पत्रों को लेकर प्रशासनिक उपेक्षा की बात सामने आई [02:02]। जब उन्होंने मुख्यमंत्री सचिवालय में इसकी शिकायत की, तो आईएएस अधिकारी अमित कटारिया के साथ उनकी बातचीत कहासुनी में बदल गई [02:22]। आरोप है कि अफसर के तीखे रवैये से आहत होकर सांसद बृजमोहन अग्रवाल को लोकसभा में विशेषाधिकार हनन (Privilege Motion) की शिकायत दर्ज करानी पड़ी [00:18]।

पार्टी के भीतर सन्नाटा: क्या यह सत्ता का डर है या रणनीतिक किनारा?

सांसद बृजमोहन अग्रवाल के इस स्टैंड के बाद उम्मीद की जा रही थी कि पूरी पार्टी और संगठन उनके साथ खड़ा होगा [00:43]। लेकिन इसके उलट, भाजपा संगठन और सरकार में बैठे दिग्गजों ने साध ली है चुप्पी [01:46]।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता के नए समीकरणों के चलते कोई भी नेता अनुशासन का डंडा चलने के डर से बृजमोहन अग्रवाल के समर्थन में बयान देने का जोखिम नहीं उठाना चाहता [03:12]। चर्चाएं तो यह भी हैं कि प्रशासनिक अधिकारियों को मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और वित्त मंत्री ओपी चौधरी जैसे दिग्गजों का वरदहस्त प्राप्त है, जिसके कारण नेता खुलकर सामने आने से बच रहे हैं [03:47]।

विरोधी बने ढाल: कांग्रेस ने उठाया प्रशासनिक अराजकता का मुद्दा

एक तरफ जहां अपनों ने मुंह फेर लिया है, वहीं कांग्रेस नेता इस मुद्दे पर पूरी ताकत से बृजमोहन अग्रवाल के समर्थन में उतर आए हैं [01:18]।

 भूपेश बघेल का हमला: पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने तंज कसते हुए कहा कि जब राज्य की कमान नागपुर और दिल्ली से संचालित होगी, तो चुने हुए जनप्रतिनिधियों का ऐसा अपमान होना स्वाभाविक है [05:27]।

 डॉ. शिव डहरिया की आपत्ति: पूर्व मंत्री डॉ. शिव डहरिया ने आरोप लगाया कि प्रदेश में प्रशासनिक अराजकता का माहौल है और अफसरों को कुछ मंत्रियों का संरक्षण मिला हुआ है [06:08]।

 मोहम्मद अकबर का पत्र: पूर्व मंत्री मोहम्मद अकबर ने तो मुख्य सचिव को पत्र लिखकर जनप्रतिनिधियों के सम्मान और उनके पत्रों पर कड़ाई से अमल करने के शासकीय परिपत्रों की याद दिलाई है [06:45]।

भविष्य की सियासत: टकराव या नया मोड़?

चाहे पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्टेडियम का मामला हो या मंत्री पद से अचानक इस्तीफे का घटनाक्रम [07:37], बृजमोहन अग्रवाल को किनारे करने के संकेत काफी समय से मिल रहे थे [07:37]। लेकिन एक आईएएस अफसर और वरिष्ठ सांसद के बीच शुरू हुई यह तल्खी अब सिर्फ व्यक्तिगत विवाद नहीं रही, बल्कि इसने सत्ता-संगठन और विपक्ष के बीच एक बड़ा राजनीतिक रूप ले लिया है [08:01]।

देखना दिलचस्प होगा कि छत्तीसगढ़ की राजनीति का यह 'बरगद' इस राजनीतिक और प्रशासनिक झोंके से खुद को कैसे संभालता है!

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गुरुवार, 13 अगस्त 2026

श्रद्धा का व्यापार या कमीशनखोरी का नया मॉडल?

 श्रद्धा का व्यापार या कमीशनखोरी का नया मॉडल?


अटल जी के नाम पर आस्था का ढोंग और 46 करोड़ के 'कांस्य घोटाले' का पूरा सच


प्रस्तावना: जब विचार और प्रतीक भी टेंडर बन जाएं

राजनीति में जब निष्ठा का स्थान अवसरवादिता और सिद्धांतों का स्थान कमीशनखोरी ले ले, तो महापुरुषों के नाम और स्मृतियां भी महज वित्तीय घोटालों के आवरण (कवर) बन जाती हैं। छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माता और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के प्रति राज्य में हर राजनीतिक दल का सम्मान रहा है। परंतु, वर्तमान में प्रदेश की विष्णुदेव साय सरकार के दौरान 'श्रद्धेय' के नाम पर जो कुछ देखने को मिल रहा है, उसने प्रशासनिक पारदर्शिता और नैतिक राजनीति दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

छत्तीसगढ़ के 187 नगरीय निकायों में ₹46 करोड़ की लागत से बनने वाले 'अटल परिसर' और वहां स्थापित की जाने वाली कांस्य (Bronze) की प्रतिमाओं के नाम पर जो भ्रष्टाचार का खेल उजागर हुआ है, उसने राज्य की सियासत में भूचाल ला दिया है।

दावे बनाम हकीकत: पहली बारिश में उतर गया आस्था का रंग

राज्य सरकार ने बड़े जोर-शोर से घोषणा की थी कि प्रदेश के सभी 187 नगरीय निकायों में अटल जी की याद में 'अटल परिसर' का निर्माण किया जाएगा। प्रत्येक निकाय में लगभग ₹14 लाख की लागत से अटल जी की अष्टधातु या कांस्य की विशाल प्रतिमा स्थापित करने के लिए बजट स्वीकृत किया गया।

लेकिन पहली ही बारिश ने सत्ता और ठेकेदारों के इस गठजोड़ की पोल खोलकर रख दी:

1. कटघोरा (कोरबा) मामला: कटघोरा के अटल परिसर में स्थापित ₹14 लाख की तथाकथित 'कांस्य प्रतिमा' पर जब पहली मानसूनी बारिश पड़ी, तो ऊपर का धात्विक पेंट बह गया। पेंट बहते ही नीचे से सीमेंट और प्लास्टर का ढांचा बाहर आ गया। यानी कागजों पर कांस्य प्रतिमा दिखाकर जनता के पैसे से सीमेंट की मूर्ति लगा दी गई [07:39]।

2. मरवाही का विवाद: मरवाही में स्थापित की गई अटल जी की प्रतिमा में कुछ ही दिनों के भीतर बड़ी-बड़ी दरारें आ गईं, जिससे मूर्ति के निर्माण में इस्तेमाल हुई घटिया सामग्री साफ नजर आने लगी [08:51]।

जिस महापुरुष के नाम पर 'हम बनाए हैं, हम ही संवारेंगे' का नारा दिया जाता रहा, उन्हीं की प्रतिमा के नाम पर सीमेंट-प्लास्टर का गोलमाल कर करोड़ों रुपये डकार लिए गए।

भ्रष्टाचार का डिसेंट्रलाइज्ड मॉडल: क्यों नहीं हुआ केंद्रीकृत टेंडर?

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा प्रशासनिक सवाल इसके टेंडर प्रक्रिया पर उठ रहा है। जानकारों और स्थानीय मूर्तिकारों का कहना है कि यदि सरकार चाहती तो पूरे प्रदेश की 187 मूर्तियों के लिए एक पारदर्शी, राज्य-स्तरीय केंद्रीकृत टेंडर (Centralized Tender) जारी कर सकती थी, जिससे गुणवत्ता सुनिश्चित होती।

इसके बजाय, पैसों को अलग-अलग निकायों में बांट दिया गया। आरोप है कि "अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपने को दे" की तर्ज पर स्थानीय स्तर पर अपने पसंदीदा ठेकेदारों और सत्ताधारी दल से जुड़े लोगों को उपकृत करने के लिए टुकड़ों में काम बांटा गया [06:25]।

 स्थानीय मूर्तिकारों की अनदेखी की गई।

 बाहरी व प्रभावशील ठेकेदारों को मनमाने दामों पर काम सौंपा गया।

 गुणवत्ता जांच (Quality Control) के नाम पर जिम्मेदार अधिकारियों ने आंखें मूंद लीं।

अतीत के पन्नों से: जब श्रद्धांजलि में लगे थे ठहाके

अटल जी की स्मृतियों के अनादर का यह कोई पहला मामला नहीं है। वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, अतीत में जब डॉ. रमन सिंह के शासनकाल के दौरान राज्य में अटल जी की 'अस्थि कलश यात्रा' निकाली गई थी, तब भी मंच पर मौजूद तत्कालीन कद्दावर मंत्रियों के ठहाके लगाते हुए वीडियो वायरल हुए थे [04:33]।

उस समय भी पार्टी और सरकार की भारी किरकिरी हुई थी। अब अस्थि कलश से शुरू हुआ यह उपेक्षा का सफर 'प्रतिमा घोटाले' तक पहुंच चुका है।

विपक्ष का हमला और जनता के सवाल

प्रतिमाओं में फर्जीवाड़े और दरारें आने की खबरें सार्वजनिक होते ही विपक्षी दलों और युवा संगठनों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है [09:00]। कांग्रेस और युवा कांग्रेस का आरोप है कि जो पार्टी खुद को अटल जी के विचारों की वाहक बताती है, उसी के शासनकाल में उनकी मूर्तियों पर कमीशनखोरी की जा रही है।

जनता के तीन सीधे सवाल:

1. टैक्सपेयर्स के पैसे का हिसाब कौन देगा? जनता की कमाई के 46 करोड़ रुपये में से कितनी राशि कांसा के नाम पर सीमेंट में तब्दील हुई?

2. दोषी ठेकेदारों और अधिकारियों पर कार्रवाई कब? क्या सीमेंट पर कांस्य का पेंट चढ़ाने वाले ठेकेदारों पर ब्लैकलिस्टिंग और एफआईआर (FIR) दर्ज होगी?

3. क्या आस्था भी अब टेंडर का हिस्सा है? राम मंदिर के चढ़ावे से लेकर अटल जी की प्रतिमा तक, क्या हर धार्मिक और वैचारिक प्रतीक केवल कटमनी (Cut-money) का माध्यम बन गया है?

निष्कर्ष: दिखावे की राजनीति पर भारी पड़ती हकीकत

अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था— "सरकारें आएंगी, जाएंगी, पार्टियां बनेंगी, बिगड़ेंगी; मगर यह देश रहना चाहिए, इस देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिए।"

परंतु आज के दौर में जिस तरह महापुरुषों के सिद्धांतों और स्मृतियों को केवल राजनीतिक ब्रांडिंग और बजट खपाने का जरिया बना दिया गया है, वह लोकतंत्र और जन-विश्वास दोनों के लिए चिंताजनक है। बारिश के पानी ने सिर्फ मूर्ति का पेंट नहीं धोया, बल्कि उन दावों के रंग भी उतार दिए हैं जो सुशासन और जीरो टॉलरेंस का ढिंढोरा पीटते नहीं थकते।

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