सोमवार, 15 जून 2026

छत्तीसगढ़ में 'अटैचमेंट-डीअटैचमेंट' का महाखेल: कोर्ट के आदेश और सीएम की दहाड़ भी बेअसर!

 छत्तीसगढ़ में 'अटैचमेंट-डीअटैचमेंट' का महाखेल: कोर्ट के आदेश और सीएम की दहाड़ भी बेअसर!

एजुकेशन  और स्वास्थ्य विभाग में मलाईदार कुर्सियों का अजब जुगाड़; संघ की कथित सिफारिश और करोड़ों के लेन-देन का सनसनीखेज घालमेल



छत्तीसगढ़ में इन दिनों एक ऐसा प्रशासनिक खेल चल रहा है जिसे सुनकर सुशासन के दावों की हवा निकल जाती है। एक तरफ सूबे के मुख्यमंत्री मंच से गरजते हुए भ्रष्टाचार पर 'जीरो टॉलरेंस' और मलाईदार पदों पर सालों से जमे अधिकारियों-कर्मचारियों का अटैचमेंट तत्काल समाप्त करने की मुनादी करते हैं, वहीं दूसरी तरफ राज्य की बेलगाम अफसरशाही और शातिर दिमाग अधिकारी न तो मुख्यमंत्री के आदेशों की परवाह कर रहे हैं और न ही हाईकोर्ट की सख्त फटकार की। ट्रांसफर की आड़ में 'अटैचमेंट' और फिर 'डी-अटैचमेंट' का एक ऐसा समानांतर और गैरकानूनी सिंडिकेट खड़ा हो चुका है, जिसने राज्य की बुनियादी स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था को दीमक की तरह खोखला कर दिया है।

पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को ठेंगा दिखाने वाले इस खेल की परतें जब खुलती हैं, तो यह साफ हो जाता है कि सरकार चाहे जिसकी भी हो, सिस्टम को हांकने वाले चेहरे अपने ऐश-ओ-आराम के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। मुख्यमंत्री कहते हैं कि 'अटैचमेंट बंद करो और मूल विभाग में जाओ', लेकिन शातिर अधिकारियों के पास हर आदेश का कानूनी और गैर-कानूनी तोड़ पहले से तैयार रहता है। करोड़ों रुपये के लेन-देन और कथित तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कुछ रसूखदार चेहरों की सिफारिशों के दम पर चल रहे इस खेल ने पूरी प्रशासनिक साख पर सवालिया निशान लगा दिया है।

### **मंत्रालय (महानदी भवन) का अजूबा खेल: 10-10 साल से जमे हैं 'साहब'**

इस पूरे खेल का सबसे बड़ा अड्डा राज्य का दिल कहे जाने वाला मंत्रालय यानी 'महानदी भवन' बना हुआ है। सूत्रों के मुताबिक, अकेले मंत्रालय में 200 से अधिक कर्मचारी और अधिकारी अटैचमेंट के सहारे कुंडली मारकर बैठे हैं। नियमतः इन्हें फील्ड पर होना चाहिए था, जहां इन्हें धूप, बरसात और ठंड में जनता के बीच काम करना था। लेकिन फील्ड की मुश्किलों से बचने और राजधानी की सुख-सुविधाओं का आनंद लेने के लिए भारी-भरकम लेन-देन और राजनीतिक आकाओं की पैरवी का इस्तेमाल किया जाता है।

चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से कई अधिकारी और कर्मचारी पिछले 10-10 साल से एक ही जगह जमे हुए हैं। मंत्रालय कर्मचारी संघ ने इस विसंगति को लेकर सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) से कई बार लिखित शिकायतें की हैं। हर बार सिर्फ खोखले आश्वासन मिलते हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर फाइलें दबा दी जाती हैं। वजह साफ है—इस सिंडिकेट में ऊपर से लेकर नीचे तक पैसों की मलाई बंटती है और 'भाई साहबों' की सिफारिश के आगे नियम-कायदे घुटने टेक देते हैं।

> ### **केस स्टडी: अंबिकापुर का 'जादुई' डी-अटैचमेंट फॉर्मूला**

> जब विधानसभा में स्वास्थ्य विभाग के अटैचमेंट का मुद्दा गूंजा, तो स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने बड़े तामझाम के साथ घोषणा की कि सभी अटैचमेंट तत्काल प्रभाव से निरस्त किए जा रहे हैं। जिला प्रमुखों को पत्र जारी हुए। अंबिकापुर में चौतरफा दबाव के बाद जिला अधिकारी ने 16 कर्मचारियों का अटैचमेंट समाप्त कर उन्हें मूल स्थापना में भेजने का आदेश निकाला। लेकिन यह सिर्फ आंखों में धूल झोंकने का नाटक था। जैसे ही मामला शांत हुआ, अधिकारियों ने एक नया 'जादुई' आदेश जारी कर दिया। बहाना बनाया गया कि *"कर्मचारियों के जाने से विभाग का काम प्रभावित हो रहा है, अतः इन्हें वापस डी-अटैच (उसी मलाईदार पद पर अटैच) किया जाता है।"* यह फॉर्मूला अब पूरे प्रदेश के विभागों में धड़ल्ले से लागू किया जा रहा है।


### **शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग पर वज्रपात: नौनिहालों का भविष्य अंधकार में**

इस अटैचमेंट और डी-अटैचमेंट के खेल की सबसे भारी कीमत सूबे के गरीब बच्चे और मरीज चुका रहे हैं। शिक्षा विभाग का हाल यह है कि बड़े पैमाने पर प्राचार्य, व्याख्याता और शिक्षक गांवों के स्कूलों को छोड़कर शहरों के दफ्तरों या मलाईदार अटैचमेंट सीटों पर बैठे हैं। नतीजा यह है कि ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में पढ़ाई पूरी तरह ठप है। कहीं पांच क्लास के बच्चों को अकेला एक शिक्षक संभाल रहा है, तो कहीं स्कूलों के कमरों में ताले लटक रहे हैं। सरकार एक तरफ सरकारी स्कूलों में फीस लेने जैसे नए-नए आदेश निकाल रही है, जिससे विपक्ष को यह आरोप लगाने का मौका मिल रहा है कि सरकार सरकारी शिक्षा तंत्र को ही बंद करना चाहती है।

यही भयावह स्थिति स्वास्थ्य विभाग की भी है। ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ अटैचमेंट के जरिए जिला मुख्यालयों या राजधानी के एअर-कंडीशंड कमरों में आराम फरमा रहे हैं। सुदूर अंचलों में गरीब मरीज स्ट्रेचर पर दम तोड़ रहे हैं, प्रसव के लिए महिलाएं तड़प रही हैं, लेकिन उनके हक के डॉक्टर और कर्मचारी प्रशासनिक जादूगरी के दम पर ऊंची कुर्सियों का सुख ले रहे हैं।

| विभाग | कागजी दावा / सीएम का आदेश | ग्राउंड रियलिटी (अटैचमेंट का सच) |

*मंत्रालय (जीएडी)** | सभी कर्मचारी फील्ड पर जाएं, अटैचमेंट पूरी तरह खत्म। | 200 से अधिक रसूखदार कर्मचारी 10 साल से पैरवी के दम पर जमे हैं। |

| **शिक्षा विभाग** | शिक्षकों की कमी दूर होगी, कोई अटैचमेंट नहीं रहेगा। | प्राचार्य और व्याख्याता दफ्तरों में बाबू बने हैं, स्कूलों में ताले लटक रहे हैं। |

| **स्वास्थ्य विभाग** | विधानसभा में घोषणा—सभी स्वास्थ्यकर्मी मूल पोस्टिंग पर भेजे गए। | अंबिकापुर जैसी 'डी-अटैचमेंट' की चालबाजी से सभी वापस एसी कमरों में लौटे। |

### **हाईकोर्ट की फटकार भी बेअसर: क्या यह सीधे तौर पर अवमानना नहीं?**

इस पूरे मामले में सबसे गंभीर पहलू यह है कि बिलासपुर हाईकोर्ट इस अटैचमेंट प्रथा को लेकर बेहद सख्त रुख अपना चुका है। माननीय न्यायालय ने कई मामलों की सुनवाई के दौरान साफ तौर पर कहा है कि ट्रांसफर या पोस्टिंग की आड़ में किसी को मनमर्जी से अटैच करना कानूनी अधिकार नहीं है, यह पूरी तरह गैरकानूनी है। हाईकोर्ट ने अफसरशाही के कई ऐसे मनमाने आदेशों को निरस्त भी किया है। जब-जब कोर्ट का डंडा चलता है, जनता तालियां बजाती है कि अब व्यवस्था सुधरेगी। लेकिन राज्य की बेलगाम हो चुकी अफसरशाही को न तो कोर्ट की अवमानना का डर है और ना ही मुख्यमंत्री के विशेषाधिकार का।

विभागीय सूत्रों के अनुसार, इस खेल के पीछे एक बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा है। तबादला उद्योग पर कागजी रोक लगने के बाद 'अटैचमेंट' को ही कमाई का नया जरिया बना लिया गया है। मनशाई जगह पर टिके रहने के लिए लाखों रुपये का एडवांस और हर महीने का फिक्स कमीशन इस सिंडिकेट के शीर्ष तक पहुंचता है। जब कोई ईमानदार मंत्री या अधिकारी इस पर रोक लगाने की कोशिश करता है, तो संघ (आरएसएस) के बड़े पदाधिकारियों के नाम का इस्तेमाल कर 'ऊपर' से दबाव डलवा दिया जाता है।

> ### **सत्ता के गलियारों से सीधे सवाल...**

>  1. जब मुख्यमंत्री स्वयं मंच से 'जीरो टॉलरेंस' की घोषणा करते हैं, तो उनके मातहत अधिकारी उनके ही आदेशों का मजाक उड़ाने की हिम्मत कैसे कर पाते हैं?

>  2. क्या स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल को यह पता है कि उनके द्वारा विधानसभा में दी गई क्लीन चिट को जमीनी अफसरों ने 'डी-अटैचमेंट' के जरिए रद्दी की टोकरी में डाल दिया है?

>  3. बिलासपुर हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद जो अफसर 'अटैचमेंट' का खेल खेल रहे हैं, उन पर सीधे तौर पर न्यायालय की अवमानना का मुकदमा क्यों नहीं चलना चाहिए?

>  4. क्या 'डबल इंजन' की सरकार में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) जैसी संस्था के रसूख का इस्तेमाल भ्रष्ट और कामचोर कर्मचारियों को संरक्षण देने के लिए किया जा रहा है?

निष्कर्ष: कथनी और करनी के बीच सुलगते सवाल**

छत्तीसगढ़ की जनता ने जिस सुशासन और बदलाव के भरोसे पर नई सरकार को चुना था, उसे ये शातिर अधिकारी अपनी चालाकी से मटियामेट करने में तुले हुए हैं। अगर करोड़ों रुपये के लेन-देन के इस 'अटैचमेंट उद्योग' को तुरंत ध्वस्त नहीं किया गया, तो मुख्यमंत्री के 'जीरो टॉलरेंस' के वादे का हश्र भी पिछली सरकारों जैसा ही होगा। अब गेंद पूरी तरह मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के पाले में है। क्या वे इन बेलगाम अफसरों पर नकेल कसकर अपनी प्रशासनिक धमक दिखाएंगे, या फिर छत्तीसगढ़ की जनता इसी तरह सिस्टम के इस क्रूर तमाशे को देखने के लिए मजबूर रहेगी? जनता जवाब का इंतजार कर रही है।

वीडियो देखें 

https://youtu.be/5as2DabotK4?si=ffaUdOWOzEuC6zWH


रविवार, 14 जून 2026

बस्तर में 'विकास' की नई क्रोनोलॉजी


 बस्तर में 'विकास' की नई क्रोनोलॉजी


जल, जंगल, जमीन पर 'बाहरी' पहरा या छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान से समझौता?


क्या छत्तीसगढ़ के अमूल्य संसाधनों का सौदा हो चुका है? एक तरफ बस्तर को नक्सलवाद से मुक्त कर आदिवासियों तक 'सेवा डेरा' पहुँचाने का सरकारी दावा, तो दूसरी तरफ पर्दे के पीछे से राज्य के खनिज, जमीन और उद्योगों को गुजरात की बड़ी कॉरपोरेट लॉबी के हवाले करने की सुगबुगाहट। क्या यह महज एक संयोग है या एक सोची-समझी क्रोनोलॉजी? पढ़िए, डबल इंजन सरकार के इस नए इंडस्ट्रियल पुश का पूरा कच्चा-चिट्ठा।

### **1. बस्तर का नया चेहरा: सुरक्षा कैंप से 'सेवा डेरा' का सफर**

राजनीति का एक स्थापित नियम है—कोई भी दौरा बेमकसद नहीं होता, हर कदम के पीछे एक बड़ी डील और एक गहरी क्रोनोलॉजी होती है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का हालिया बस्तर दौरा भी इसी का एक बड़ा उदाहरण बनकर उभरा है।

सरकार का दावा है कि बस्तर अब नक्सलवाद के खात्मे की कगार पर है और अगले पांच वर्षों में यहाँ के लोगों की आमदनी छह गुना बढ़ जाएगी। इस दावे को जमीन पर उतारने के लिए **'बस्तर विकास मॉडल 2.0'** के तहत एक महत्वाकांक्षी योजना शुरू की गई है। केरल जितने बड़े भूभाग में फैले बस्तर के सात जिलों को सुरक्षा देने के लिए स्थापित किए गए 200 सुरक्षा कैंपों में से 70 कैंपों को **"वीर शहीद गुंडादूर सेवा डेरा"** में तब्दील किया जा रहा है।

इन सेवा डेरों की संकल्पना यह है कि सरकार खुद आदिवासियों के दरवाजे तक पहुंचेगी। एक ही छत के नीचे बैंकिंग, आधार कार्ड, राशन और डिजिटल सेवाओं समेत केंद्र व राज्य सरकार की 371 योजनाओं का लाभ सीधे स्थानीय जनता को मिलेगा। पहली नजर में यह बस्तर के कायाकल्प की एक बेहद खूबसूरत तस्वीर पेश करता है, लेकिन इस चमकते विकास मॉडल के पीछे एक दूसरी कहानी भी आकार ले रही है।

### **2. वायरल लिस्ट का सच: छत्तीसगढ़ के संसाधनों पर किसका पहरा?**

जैसे ही बस्तर में विकास के कसीदे पढ़े जा रहे थे, ठीक उसी वक्त छत्तीसगढ़ के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में एक सूची (लिस्ट) वायरल हो गई। यह सूची चीख-चीख कर सवाल पूछ रही है कि आखिर छत्तीसगढ़ के सारे बड़े ठेके, जमीनें और उद्योग एक विशेष राज्य की लॉबी की झोली में ही क्यों जा रहे हैं?

रायपुर से लेकर बस्तर तक, और सरगुजा से लेकर रायगढ़-राजनांदगांव तक, कॉरपोरेट दिग्गजों ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए हैं। हालांकि इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं है कि यह सूची गृह मंत्री के दौरे से सीधे जुड़ी है, लेकिन उद्योग जगत में मची यह हलचल इस प्रकार है:

 * **अडानी पावर और अडानी एंटरप्राइजेस (अहमदाबाद):** ऊर्जा और केमिकल क्षेत्र के भारी-भरकम प्रोजेक्ट्स के लिए इन्हें हरी झंडी मिलने की खबरें हैं, और ये सरगुजा संभाग में बड़े पैमाने पर जमीन की तलाश में हैं।

 * **आरसेलर मित्तल निपॉन प्राइवेट लिमिटेड (सूरत):** बस्तर के खनिज-समृद्ध क्षेत्र में विशाल उद्योग स्थापित करने की तैयारी में है।

 * **सफायर सेमीकॉम प्राइवेट लिमिटेड:** अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक सेमीकंडक्टर क्षेत्र की यह कंपनी राजधानी रायपुर के रणनीतिक इलाकों में स्थापित होने जा रही है।

 * **टोरेंट फार्मास्यूटिकल्स और लाइस्टियम लाइफ साइंस (अहमदाबाद):** दवा निर्माण क्षेत्र की इन बड़ी कंपनियों को छत्तीसगढ़ के प्रमुख शहरों से सटी बेशकीमती जमीनें आवंटित की जा रही हैं।

 * **ओक्स श्री इंसाल (राजकोट):** केंद्र सरकार के विजन के अनुरूप ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ की जमीन का उपयोग करने की तैयारी में है।

 * **अंबुजा सीमेंट:** प्रचुर चूना पत्थर (लाइमस्टोन) वाले क्षेत्रों में अपना साम्राज्य बढ़ा रही है, जो पहले ही सीमेंट की कीमतों और कथित अवैध वसूलियों को लेकर विवादों में रही है।

### **3. रोजगार का छलावा: 'लोकल' को चपरासी की नौकरी भी नहीं?**

सरकार इन बड़े उद्योगों के निवेश को 'रोजगार के सुनहरे अवसर' के रूप में पेश कर रही है। लेकिन छत्तीसगढ़ का कड़वा इतिहास कुछ और ही बयां करता है। स्थानीय युवाओं को स्किल डेवलपमेंट के नाम पर अक्सर चपरासी या सुरक्षा गार्ड जैसी बेहद मामूली नौकरियां देकर टरका दिया जाता है, और कभी-कभी तो वह भी नसीब नहीं होती।

हाल के दिनों में प्रदेश में हुई बड़ी औद्योगिक दुर्घटनाओं ने एक भयावह सच को उजागर किया है। हादसों में जान गंवाने वाले मजदूरों की सूची में अधिकांश नाम दूसरे राज्यों के श्रमिकों के थे। उद्योगों के भीतर यह अंदरूनी नीति साफ दिखती है कि स्थानीय युवाओं को काम पर रखने से बचा जाए, क्योंकि स्थानीय लोगों के शामिल होने से भूमि, पर्यावरण और मजदूरी को लेकर आंदोलन का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में सवाल उठता है: **यदि छत्तीसगढ़ के युवाओं को जल, जंगल और जमीन खोने के बाद मजदूर बनने का भी हक नहीं मिलेगा, तो यह विकास किसके लिए है?**

### **4. फर्जी जनसुनवाई और 'उलगुलान' की गूंज**

सत्ता की ताकत के दम पर छत्तीसगढ़ के मैदानी और पहाड़ी इलाकों में उद्योगों को स्थापित करने के लिए 'फर्जी जनसुनवाई' के गंभीर आरोप लग रहे हैं। खबरों के मुताबिक, कई जगहों पर तो मृत व्यक्तियों के अंगूठे के निशान लगाकर कॉरपोरेट घरानों को जमीनें सौंपने का खेल खेला गया है।

इस शोषण और दमन के खिलाफ अब छत्तीसगढ़ का आदिवासी और स्थानीय समाज चुप बैठने को तैयार नहीं है। बस्तर और सरगुजा से लेकर छुईखदान के मैदानी इलाकों तक जल, जंगल और जमीन को बचाने की लड़ाई एक बार फिर तेज हो गई है। जंगलों के भीतर **'उलगुलान'** (क्रांति) के नारे गूंजने लगे हैं।

### **5. सुलगते राजनीतिक सवाल: क्या बदल जाएगा छत्तीसगढ़ का नक्शा?**

इस वायरल सूची और ताबड़तोड़ फैसलों ने छत्तीसगढ़ की राजनीति में भूचाल ला दिया है। क्षेत्रीय राजनीतिक दल और संगठन जैसे **छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना, छत्तीसगढ़ समाज पार्टी और जय जोहार पार्टी** ने सरकार के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया है। उनका सीधा आरोप है कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के केंद्रीय दबाव में आकर छत्तीसगढ़ को गुजरात के उद्योगपतियों के हाथों 'गिरवी' रख रही है।

**निष्कर्ष:

क्या 'डबल इंजन' की यह रफ्तार छत्तीसगढ़िया अस्मिता और पर्यावरण को कुचल कर आगे बढ़ेगी? क्या करोड़ों-अरबों के इस निवेश से स्थानीय युवाओं का भविष्य सचमुच सुधरेगा, या छत्तीसगढ़ की नियति सिर्फ अपने बहुमूल्य संसाधनों को लुटते हुए देखना रह जाएगी? ये वो सवाल हैं जिनका जवाब आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की जनता को खुद तय करना होगा, क्योंकि इस बार लड़ाई सिर्फ रोजगार की नहीं, बल्कि अस्तित्व और पहचान की है।

वीडियो देखें 


https://youtu.be/tKxuX5pVeEs?si=XwNdU1Vy2YXAhOYV



शनिवार, 13 जून 2026

अडानी डिमांड' से साय सरकार के हाथ-पांव फूले!

 अडानी डिमांड' से साय सरकार के हाथ-पांव फूले!


क्या कॉरपोरेट दबाव और जन-आक्रोश के बीच फंस गई है छत्तीसगढ़ की डबल इंजन सरकार? राजस्थान को जरूरत नहीं, फिर भी 'मध्य भारत के फेफड़े' पर क्यों चल रही है कुल्हाड़ी? एकInside रिपोर्ट।



छत्तीसगढ़ में हसदेव अरण्य के जंगलों को बचाने की जंग एक बार फिर बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गई है। एक तरफ जहां हसदेव अरण्य में राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (RRVUNL) के नाम पर संचालित होने वाली तीसरी खदान 'केते एक्सटेंशन' (Kete Extension) को गुपचुप तरीके से मंजूरी मिलने के बाद स्थानीय आदिवासियों और पर्यावरणविदों ने आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है , वहीं दूसरी तरफ कॉरपोरेट दिग्गज अडानी समूह की एक नई और गुप्त फरमाइश ने राज्य की विष्णुदेव साय सरकार की रातों की नींद उड़ा दी है ।

उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार, अडानी पावर लिमिटेड और अडानी एंटरप्राइजेज केमिकल ने छत्तीसगढ़ सरकार को पत्र लिखकर सरगुजा क्षेत्र में भारी-भरकम जमीन और इंफ्रास्ट्रक्चर (बिजली-पानी) की मांग की है । इस मांग ने सरकार के भीतर एक ऐसा राजनीतिक असमंजस पैदा कर दिया है कि मामले को सुलझाने के लिए सीधे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के हस्तक्षेप की जरूरत महसूस की जा रही है ।

पेंच नंबर 1: जब राजस्थान को कोयले की जरूरत ही नहीं, तो हसदेव का विनाश क्यों?

इस पूरी कहानी का सबसे चौंकाने वाला पहलू 'सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी' (CEA) के संशोधित आंकड़े हैं । सरकारी दावों में बार-बार कहा जाता है कि राजस्थान के पावर प्लांटों को चालू रखने के लिए हसदेव का कोयला अनिवार्य है। लेकिन सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है:

1. सरप्लस बिजली का सच: CEA के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, साल 2025-26 से 2035-36 के बीच राजस्थान की बिजली मांग के पुराने अनुमान (20,000 मेगावाट) को घटाकर अब 16,000 मेगावाट कर दिया गया है । इसके साथ ही, राजस्थान के पास वर्तमान में 840 मेगावाट सरप्लस (अतिरिक्त) बिजली मौजूद है ।

2. सौर ऊर्जा की क्रांति: राजस्थान खुद सौर ऊर्जा (Solar Energy) के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो रहा है, जहां अकेले 32,000 मेगावाट की सौर परियोजनाएं कतार में हैं ।

3. सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा: खुद पूर्ववर्ती सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र देकर स्वीकार किया था कि राजस्थान की अगले 20 वर्षों की कोयला जरूरत अकेले 'परसा केते बासेन' (PKB) ब्लॉक से पूरी हो सकती है ।

बड़ा सवाल: जब राजस्थान को अतिरिक्त कोयले की आवश्यकता ही नहीं है, तो हसदेव के पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील (Ecologically Sensitive) क्षेत्र को क्यों उजाड़ा जा रहा है? 

पेंच नंबर 2: 'लेजेंड' के नाम पर खुद के पावर प्लांटों को फायदा पहुंचाने का खेल?

ग्राउंड रिपोर्ट और स्थानीय कार्यकर्ताओं का आरोप है कि हसदेव से निकलने वाले कोयले का इस्तेमाल राजस्थान के लिए कम और अडानी समूह के निजी थर्मल पावर प्लांटों (रायपुर, कोरबा और रायगढ़ स्थित प्लांट) के लिए ज्यादा किया जा रहा है । बिलासपुर-सरगुजा हाईवे पर चौबीसों घंटे बाय-रोड ट्रकों के माध्यम से भारी मात्रा में कोयला निजी प्लांटों की तरफ डंप किया जा रहा है । 'केते एक्सटेंशन' की तीसरी खदान को मिली मंजूरी को इसी बड़ी क्रोनी-कैपिटलिज्म (Crony Capitalism) की साजिश का हिस्सा माना जा रहा है ।

पर्यावरणीय तबाही: 'रेगिस्तान' बनने की कगार पर छत्तीसगढ़

हसदेव का जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि पूरे मध्य भारत का 'फेफड़ा' (Lung of Central India) है । अब तक दो खदानों के चक्कर में 10,000 एकड़ जंगल तबाह हो चुका है और करीब 6 लाख पेड़ काटे जा चुके हैं ।

तीसरी मंजूरी (केते एक्सटेंशन) का सच:

 घना जंगल: इस प्रस्तावित ब्लॉक का 98% इलाका बेहद घना जंगल है ।

 पेड़ों की बलि: स्थानीय संघर्ष समितियों के मुताबिक, इस तीसरे ब्लॉक के खुलने से 5 लाख से अधिक पेड़ और साफ कर दिए जाएंगे ।

 विलुप्ति का खतरा: 'भारतीय वन्यजीव संस्थान' (WII) ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट चेतावनी दी थी कि यहां खनन से मिनीमाता हसदेव बांगो बांध का अस्तित्व खतरे में आ जाएगा , जिससे छत्तीसगढ़ की कृषि व्यवस्था चरमरा जाएगी।

 मानव-हाथी संघर्ष: हाथियों के 2000 वर्ग किमी के प्राकृतिक कॉरिडोर और हाथी रिजर्व के बीच खनन होने से हाथियों का गुस्सा अब सीधे इंसानी बस्तियों पर फूटेगा ।

 आदिवासियों पर चोट: स्थानीय आदिवासियों की 70% आजीविका इसी जंगल पर निर्भर है, जो अब पूरी तरह उजड़ जाएगी ।

पेंच नंबर 3: बस्तर से डरकर सरगुजा में 'जमीन की नई डिमांड'

इस पूरे विवाद के बीच 'इनसाइड स्टोरी' यह है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य में निवेश बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर उद्योगपतियों (जिंदल, मित्तल आदि) को आमंत्रित किया है । अडानी समूह को बस्तर में पहले ही लौह अयस्क (Iron Ore) की एक खदान आवंटित है, लेकिन पिछले 8 महीनों से वहां काम ठप है क्योंकि 150 से अधिक गांवों के आदिवासी इसका उग्र विरोध कर रहे हैं ।

नक्सलवाद और जन-विरोध के डर से अब अडानी समूह ने अपना रुख बदलते हुए सरगुजा क्षेत्र में ऊर्जा केमिकल सेक्टर के लिए नई जमीन मांग ली है।

राजनीतिक गलियारों में हड़कंप: आगे कुआं, पीछे खाई

सूत्रों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ की एक दमदार मंत्री ने इस विषय पर प्रदेश प्रभारी नितिन नवीन से भी चर्चा की है । सरकार के सामने सबसे बड़ी दुविधा यह है:

 अगर अडानी की मांग मानी: तो आदिवासियों का आक्रोश इस कदर भड़केगा कि साय सरकार के लिए अगला विधानसभा चुनाव जीतना नामुमकिन हो जाएगा। छत्तीसगढ़ पहले ही अभूतपूर्व गर्मी (ग्लोबल वार्मिंग) और जल संकट से जूझ रहा है , ऐसे में और जंगल काटना आत्मघाती होगा।

 अगर मांग ठुकराई: तो दिल्ली दरबार (मोदी-शाह) की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है ।

क्लाइमेक्स (आगे क्या?):

आगामी 19-20 तारीख को बस्तर में होने वाली 'मध्य क्षेत्रीय बैठक' में देश के गृह मंत्री अमित शाह शामिल होने आ रहे हैं। माना जा रहा है कि इस बैठक के इतर साय सरकार के शीर्ष नेता इस 'कॉरपोरेट डिमांड' और 'हसदेव विवाद' पर बीच का रास्ता निकालने के लिए अमित शाह के सामने अपनी बात रख सकते हैं ।

क्या छत्तीसगढ़ की डबल इंजन सरकार छत्तीसगढ़ के जल, जंगल और जमीन की रक्षा कर पाएगी या कॉरपोरेट दबाव के आगे नतमस्तक होना पड़ेगा? यह आने वाला वक्त तय करेगा।

सदन के संकल्प का क्या हुआ?

याद रहे कि 26 जुलाई 2022 को छत्तीसगढ़ विधानसभा में सभी 90 विधायकों (भाजपा और कांग्रेस दोनों) ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर हसदेव के सभी कोयला ब्लॉकों को निरस्त करने का संकल्प लिया था । तत्कालीन सरकार ने इसी आधार पर केते एक्सटेंशन की जनसुनवाई और भूमि अधिग्रहण को रोका था । लेकिन सत्ता बदलते ही उसी संकल्प को ठंडे बस्ते में डालकर तीसरी खदान को हरी झंडी दे दी गई । यहाँ तक कि अनुसूचित जनजाति आयोग के कड़े तेवरों और फर्जी जनसुनवाई की शिकायतों को भी दरकिनार कर दिया गया है!

वीडियो देखें 

https://youtu.be/cg5leyPmvr8?si=e3NPyppgBxjmyYSj

शुक्रवार, 12 जून 2026

धान का कटोरा या मानव तस्करों का 'सॉफ्ट टारगेट'?

 धान का कटोरा या मानव तस्करों का 'सॉफ्ट टारगेट'?

 सुशासन के दावों के बीच खुफिया तंत्र और पुलिस की नाकामी पर उठे तीखे सवाल



जिसे हम 'धान का कटोरा' और 'शांति का टापू' कहते आए हैं, क्या वह अब मानव तस्करों के लिए सबसे आसान शिकारगाह बन चुका है? रोजगार और बेहतर जिंदगी का झांसा देकर छत्तीसगढ़ की 35 बेटियों को पड़ोसी राज्य झारखंड में ले जाकर एक बंद कमरे में बंधक बना दिया गया। यह महज एक अपराध नहीं, बल्कि राज्य की कानून-व्यवस्था, गृह विभाग की मुस्तैदी और सीमा सुरक्षा के दावों की पोल खोलने वाली एक खौफनाक हकीकत है। सरकारें जब 'सुशासन त्योहार' मनाने में व्यस्त हैं, तब छत्तीसगढ़ के गांव-गांव में सक्रिय दलाल मासूम जिंदगियों का सौदा कर रहे हैं। 

एक वीडियो कॉल ने खोला राज, वरना सोया रहता सिस्टम

तस्करी का यह डरावना खेल तब सामने आया जब बंधक बनाई गई लड़कियों में से एक ने हिम्मत दिखाई और अपने किसी परिचित को वीडियो कॉल कर आपबीती सुनाई।  इसके बाद ही प्रशासनिक अमला हरकत में आया। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी तंत्र तभी जागेगा जब पानी सिर से ऊपर चला जाएगा? उन 35 परिवारों की उम्मीदें आज झारखंड के किसी अज्ञात बंद कमरे में घुट रही हैं, जिनकी सुध लेने वाला कोई नहीं था। 

खुफिया तंत्र फेल या सिर्फ 'वसूली' में व्यस्त?

सबसे तीखा सवाल राज्य के गृह विभाग, खुफिया एजेंसियों और बॉर्डर चेक पोस्ट पर खड़ा होता है। 35 लड़कियां किसी अदृश्य विमान में बैठकर तो राज्य की सीमा पार नहीं कर गईं? कांकेर और ग्रामीण अंचलों से राजधानी होते हुए ये लड़कियां बसों या सड़क मार्ग के जरिए ही झारखंड ले जाई गईं।  जब गाड़ियों और बसों का हुजूम राज्य की सीमाओं को पार करता है, तो वहां तैनात पुलिस और चेकिंग पॉइंट क्या कर रहे होते हैं?  क्या खुफिया तंत्र केवल कागजों पर सिमट कर रह गया है या फिर बॉर्डर चेक पोस्ट सिर्फ ट्रकों से 'कलेक्शन' और अवैध वसूली का जरिया बनकर रह गए हैं? 

पुराना पैंतरा: गरीबी का फायदा और दलालों का जाल

तस्करों का तरीका आज भी वही पुराना और आजमाया हुआ है—गांव के गरीब परिवारों को पकड़ो, मोटी कमाई और काम का लालच दो, और उनकी लाचारी का फायदा उठाकर उन्हें दूसरे राज्यों में धकेल दो।  'बेटी बचाओ' के गगनभेदी नारे और पलायन रोकने के नाम पर करोड़ों रुपयों के सरकारी बजट का खेल सिर्फ फाइलों और विज्ञापनों तक सीमित नजर आता है।  धरातल पर सच यह है कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर न होने के कारण इन बेटियों को तस्करों के जाल में फंसना पड़ रहा है। 

'ट्रांसफर-पोस्टिंग' की राजनीति में उलझा गृह विभाग

राज्य में अपराधों का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है और कानून-व्यवस्था बद से बदतर होती जा रही है। विपक्ष और जानकारों का सीधा आरोप है कि पूरी सरकार और गृह विभाग केवल अधिकारियों के तबादलों, बैठकों और राजनीतिक नफा-नुकसान की गणित बिठाने में व्यस्त हैं। छत्तीसगढ़ में कानून-व्यवस्था की स्थिति इस कदर चरमरा गई है कि अब नैतिक जिम्मेदारी का सवाल उठने लगा है। विपक्ष तो गृह मंत्री के इस्तीफे और बर्खास्तगी तक की मांग कर चुका है, क्योंकि मौजूदा तंत्र बढ़ते अपराधों को रोकने में पूरी तरह पंगु नजर आ रहा है।

मिलीभगत के बिना यह खेल मुमकिन नहीं

यह पूरा घटनाक्रम किसी बड़े रैकेट की ओर इशारा करता है। ग्राम पंचायत स्तर से लेकर स्थानीय पुलिस और ऊंचे रसूखदारों की मिलीभगत के बिना इतने बड़े पैमाने पर मानव तस्करी मुमकिन नहीं है।तस्करों का यह जाल भिलाई से लेकर बस्तर के सुदूर गांवों तक फैला हुआ है, जहां से लड़कियों को ले जाकर कई बार देह व्यापार के दलदल में भी झोंक दिया जाता है।  झारखंड की यह घटना सिर्फ एक बानगी है, यह सिस्टम को एक गंभीर चेतावनी है। यदि अब भी कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो छत्तीसगढ़ की न जाने कितनी और बेटियां इस अंधकार में विलीन हो जाएंगी।

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गुरुवार, 11 जून 2026

सुशासन का सच: जब एक अदद छत के लिए अफसरों के पैरों में साष्टांग हुए राष्ट्रपति के 'दत्तक पुत्र'


सुशासन का सच: जब एक अदद छत के लिए अफसरों के पैरों में साष्टांग हुए राष्ट्रपति के 'दत्तक पुत्र'


लोकतंत्र के बंद कमरों में बैठकर जब योजनाएं बनती हैं, तो सरकारी फाइलों और विज्ञापनों पर 'सबका साथ, सबका विकास' और 'अंत्योदय' की चमक बिखरती है। लेकिन जब इन दावों की हकीकत जमीन पर उतरती है, तो वह गरियाबंद जिले के देवभोग में आयोजित 'सुशासन त्योहार' जैसी झकझोर देने वाली तस्वीरों में बदल जाती है।

हाल ही में देवभोग में सरकारी तामझाम के साथ विकास के कसीदे पढ़े जा रहे थे। इसी बीच, पंडाल में कुछ ऐसा हुआ जिसने व्यवस्था के संवेदनहीन चेहरे को पूरी तरह बेनकाब कर दिया। विशेष पिछड़ी जनजाति (कमार) के बेबस आदिवासी महिला-पुरुष अपने हाथों में पात्रता के दस्तावेज लिए जिला पंचायत सीईओ के पैरों में साष्टांग दंडवत हो गए। आँखों में आंसू, सीने में बेबसी और जुबां पर एक अदद प्रधानमंत्री आवास (PM Awas) की गुहार। यह दृश्य सिर्फ आवेदन देने का कोई तरीका नहीं था, बल्कि यह हमारे सिस्टम की उस कड़वी हकीकत का प्रमाण था जो यह सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर 'आदिवासी बहुल' और 'आदिवासी मुख्यमंत्री' वाले राज्य में मूल निवासी इस कदर मजबूर क्यों हैं?

### **'डबल इंजन' के दावे बनाम दफ्तरों के चक्कर**

सूबे में सत्ता परिवर्तन के बाद पहली ही कैबिनेट में 18 लाख प्रधानमंत्री आवास स्वीकृत करने का बड़ा ऐलान किया गया था। खुद मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने मंचों से साफ लहजे में चेतावनी दी थी कि, *"अगर पीएम आवास को लेकर कहीं से भी कोई शिकायत आई, तो सीधे उस जिले के कलेक्टर के ऊपर कार्रवाई होगी।"* मुख्यमंत्री की इस सख्त हिदायत के बावजूद जमीनी हकीकत जस की तस है।

पैर पकड़ने को मजबूर हुए कमार आदिवासियों का दर्द है कि वे दफ्तरों के सैकड़ों चक्कर काट चुके हैं। हर बार उन्हें 'कल आना', 'फंड नहीं आया' या 'सर्वे में नाम नहीं है' जैसे जुमले थमाकर टरका दिया जाता है। अंत में थक-हारकर, बेबसी के इस चरम पर उन्होंने अफसरों के पैरों में गिरना ही अपना आखिरी रास्ता चुन लिया।

### **स्वाभिमानी समाज को घुटनों पर लाने का जिम्मेदार कौन?**

विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि व्यवस्था के आगे गिड़गिड़ाने वाले ये लोग कमार जनजाति से आते हैं, जिन्हें देश में राष्ट्रपति का 'दत्तक पुत्र' माना जाता है और संविधान में विशेष संरक्षण प्राप्त है। जो आदिवासी समाज अपनी आत्मनिर्भरता, जल-जंगल-जमीन की रक्षा और अद्वितीय स्वाभिमानी संस्कृति के लिए जाना जाता है, जो कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाता, उस समाज को एक छत के लिए अफसरों के पैरों की धूल चाटने पर मजबूर होना पड़ रहा है।

इस घटना के बाद राजनीतिक गलियारों में भी घमासान शुरू हो गया है। विपक्ष ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा है कि सरकार करोड़ों रुपये विज्ञापनों और सुशासन उत्सवों में अपनी छवि चमकाने के लिए पानी की तरह बहा रही है, लेकिन अंत्योदय की कतार में खड़ा आखिरी व्यक्ति आज भी बुनियादी हकों से महरूम है।

 मुख्यमंत्री की चेतावनी बेअसर, नौकरशाही बेफिक्र?**

> मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने साफ कहा था कि पीएम आवास में गड़बड़ी होने पर कलेक्टर नापे जाएंगे। गरियाबंद की इस मर्मांतक घटना के बाद अब जनता पूछ रही है कि क्या संवेदनहीनता की पराकाष्ठा पार करने वाले इस सिस्टम और जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई ठोस जवाबदेही तय होगी या खोखली चेतावनियों के सहारे ही सुशासन का ढोल पीटा जाता रहेगा?

विज्ञापनों की चमक में गुम होती आदिवासियों की चीख**

> राज्य में बड़े-बड़े आयोजनों, उत्सवों और प्रचार-प्रसार पर जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। विडंबना देखिए कि एक तरफ सरकार अपनी पीठ थपथपाने में व्यस्त है, तो दूसरी तरफ एक गरीब परिवार को महज कुछ हजार रुपयों की आवास की किश्त के लिए प्रशासनिक चौखट पर अपना आत्मसम्मान गिरवी रखना पड़ रहा है।

### **बड़ा सवाल: यह विकास है या विनाश?**

मौके पर मौजूद अधिकारियों ने कैमरों की चमक को देखते हुए आदिवासियों को जमीन से उठा तो दिया, क्योंकि उनके पास पद और कलम की ताकत थी, लेकिन सवाल यह है कि क्या उनका मकान स्वीकृत हुआ? यह घटना केवल एक ब्लॉक या जिले की नहीं है, बल्कि यह उस प्रशासनिक ढर्रे (Pattern) को उजागर करती है जहां आम नागरिक को अपने हक की भीख मांगनी पड़ती है।

छत्तीसगढ़ आज नक्सलवाद को पीछे छोड़कर जब शांति और मुख्यधारा की ओर बढ़ रहा है, तब आदिवासियों के मन में व्यवस्था के प्रति ऐसा अविश्वास पैदा करना बेहद खतरनाक हो सकता है। आज अगर इस प्रशासनिक संवेदनहीनता पर सवाल नहीं उठाए गए, तो यह सड़न कल किसी के भी दरवाजे तक पहुंच सकती है। सवाल सीधे सरकार की नीयत और नौकरशाही के रवैये पर खड़ा है।

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पड़ोसी राज्यों से लात खाई ब्लैकलिस्टेड कंपनियों के लिए छत्तीसगढ़ में 'रेड कारपेट'

 डबल इंजन सरकार में भ्रष्टाचार का 'सुपरफास्ट' सिंडिकेट: पड़ोसी राज्यों से लात खाई ब्लैकलिस्टेड कंपनियों के लिए छत्तीसगढ़ में 'रेड कारपेट'

जीरो टॉलरेंस का दावा हवा-हवाई; नियमों को ठेंगे पर रख अपात्र कंपनियों को बांटे जा रहे 13 करोड़ के संवेदनशील ठेके; मासूम बच्चों के शोषकों पर मेहरबान सिस्टम, क्या जनता की जान इतनी सस्ती है?

 


क्या आपने कभी सोचा है कि जिस दागी और धोखेबाज कंपनी को पड़ोसी राज्यों के कई विभागों ने 'अयोग्य' घोषित कर लात मारकर बाहर निकाल दिया हो, उसके स्वागत में छत्तीसगढ़ की 'डबल इंजन' सरकार पलक-पावड़े बिछाए खड़ी है?  सुशासन और 'जीरो टॉलरेंस' का दम भरने वाली मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार के राज में पर्दे के पीछे भ्रष्टाचार का एक ऐसा अनोखा और खौफनाक सिंडिकेट चल रहा है, जिसे न तो नियमों की परवाह है, न जनता के टैक्स के पैसों की और न ही इंसानी जिंदगियों की। 

पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश में जिस शराब कंपनी पर मासूम बच्चों के शोषण और अवैध परमिट के गंभीर आरोप लगे, उसे छत्तीसगढ़ में एंट्री देने की तैयारी है, तो दूसरी तरफ सड़क, बिजली और खेल मैदानों के नाम पर करोड़ों रुपये के सरकारी ठेके रेवड़ियों की तरह उन अपात्र कंपनियों को बांटे जा रहे हैं जो तकनीकी रूप से पूरी तरह अयोग्य हैं। आखिर जनता की गाढ़ी कमाई से हो रहे इस 'खूनी खेल' का असली मास्टरमाइंड कौन है?

क्रोनोलॉजी ऑफ करप्शन: 13 करोड़ की बंदरबांट और मौत को आमंत्रण

इस पूरे घोटाले की कड़ियों को जोड़ें तो अफसरों और अयोग्य ठेकेदारों की जुगलबंदी के तीन बड़े और बेहद संवेदनशील मामले सामने आते हैं: 

1. रायपुर-धमतरी-कुरूद: अयोग्य हाथों में बिजली का करंट (ठेका राशि: 6 करोड़)

रायपुर-धमतरी-कुरूद मार्ग पर बिजली लाइन शिफ्टिंग और विद्युतीकरण (कोड आईडी: CGER7424) का बेहद संवेदनशील काम एक ऐसी अपात्र कंपनी को सौंप दिया गया, जिसे छत्तीसगढ़ के ही दूसरे विभाग पहले ब्लैकलिस्ट कर चुके हैं।  जरा सोचिए, जिस दौर में जरा से शॉर्ट सर्किट से लोगों की जान चली जाती है, वहां हाई-वोल्टेज बिजली का काम एक दागी कंपनी को देना क्या सीधे-सीधे लोगों को मौत के मुंह में धकेलना नहीं है?

2. बिलासपुर न्यायधानी: खेल परिसर के नाम पर बड़ा खेल (ठेका राशि: 4.87 करोड़)

बिलासपुर खेल परिषद (स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स) के निर्माण, विद्युत नवीनीकरण और मेंटेनेंस के नाम पर करीब पौने पांच करोड़ का ठेका एक और अपात्र कंपनी की झोली में डाल दिया गया। बच्चों और खिलाड़ियों के भविष्य से जुड़े इस परिसर में तकनीकी रूप से अक्षम कंपनी से काम कराना किसी बड़े हादसे को न्योता देने जैसा है। क्या माननीय हाईकोर्ट को इस पर स्वतः संज्ञान नहीं लेना चाहिए? 

3. नवा रायपुर-महासमुंद: चमचमाती सड़कों के नीचे 'अंधेरा' (ठेका राशि: 2.15 करोड़)

नवा रायपुर और महासमुंद में सड़क चौड़ीकरण के दौरान बिजली लाइन की शिफ्टिंग के नाम पर सवा दो करोड़ रुपये का ठेका भी अपात्रों को ही रेवड़ी की तरह बांट दिया गया। 

बड़ा सवाल: जनता की जान दांव पर, क्या कमीशन का है चक्कर?

कुल 13 करोड़ रुपये के ये तीनों ठेके यह चीख-चीख कर कह रहे हैं कि यह कोई प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश है।  क्या ये अपात्र कंपनियां अधिकारियों को भारी-भरकम कमीशन दे रही हैं, जिसके बदले जनता की सुरक्षा को ताक पर रख दिया गया? खराब गुणवत्ता, ओवर-बिलिंग (बिल बढ़ाकर राशि हड़पना) और राजस्व की बर्बादी का यह खुला खेल धड़ल्ले से जारी है। 

अधिकारियों का लचर बहाना:

जब इस घालमेल पर अधिकारियों से सवाल किया जाता है, तो उनका रटा-रटाया जवाब आता है कि "हमने शपथ-पत्र (Affidavit) मांगा है, अगर वो झूठा निकला तो ठेकेदार को जेल भेजेंगे।"  लेकिन साहब, जब तक आपकी कागजी कार्रवाई पूरी होगी और ठेकेदार जेल जाएगा, तब तक अगर घटिया काम की वजह से किसी बेकसूर की जान चली गई, तो उसका जिम्मेदार कौन होगा? क्या 'पैसे दो, ठेका लो और नियमों को जेब में रखो' ही इस सरकार की नई नीति बन चुकी है? 

शर्मनाक: बाल शोषकों के लिए 'रेड कारपेट'!

भ्रष्टाचार की हद तो तब हो जाती है जब शराब के काले कारोबार में लिप्त दागी कंपनियों को राज्य में तवज्जो दी जाती है। साल 2024 में मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में 'सोम डिस्टिलरी' का एक खौफनाक मामला सामने आया था, जहां 59 मासूम बच्चों को बंधक बनाकर काम कराया जा रहा था।केमिकल की वजह से उन बच्चों के हाथ तक झुलस चुके थे। मध्य प्रदेश सरकार ने इस कंपनी को ब्लैकलिस्ट किया और हाईकोर्ट ने इसका लाइसेंस सस्पेंड कर दिया।अब सवाल यह उठता है कि क्या ऐसी अमानवीय और कानून द्वारा सस्पेंड की गई कंपनियों के लिए छत्तीसगढ़ का आबकारी और प्रशासनिक अमला पलक-पावड़े बिछा रहा है? कल को अगर ये शराब सप्लाई में कोई बड़ा खिलवाड़ कर दें, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

बदहाल कानून व्यवस्था: 10 हजार की भीड़ के बीच मर्डर और लूट, बेबस सरकार!

यह सिर्फ आर्थिक भ्रष्टाचार का मामला नहीं है, बल्कि राज्य की कानून व्यवस्था भी पूरी तरह वेंटिलेटर पर आ चुकी है। कोटनी में साप्ताहिक बाजार के दौरान, जहां 10 से 15 हजार लोगों की भारी भीड़ मौजूद थी, वहां तीन बेखौफ अपराधी आते हैं, एक सराफा व्यवसायी को सरेआम गोली मारते हैं और लगभग 65 लाख रुपये से अधिक के सोने-चांदी के जेवरात लूटकर फरार हो जाते हैं। 

इस दुस्साहस के बाद पूरे इलाके में आक्रोश है, पीड़ित परिवार रो-रोकर बेहाल है और जनता शव को सड़क पर रखकर प्रदर्शन करने को मजबूर है।  कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए सीधा सवाल दागा है कि “मुख्यमंत्री जी और गृहमंत्री जी, बताइए कि इस राज्य में जनता की रक्षा कौन करेगा?” जब अपराधी इतने बेखौफ हैं कि हजारों की भीड़ के बीच हत्या करके निकल जाते हैं, तो आम नागरिक खुद को सुरक्षित कैसे महसूस करे?  टिप्पणी (Conclusion):

छत्तीसगढ़ में 'बदलाव' का नारा देकर सत्ता में आई सरकार आज खुद कटघरे में है। एक तरफ अयोग्य और ब्लैकलिस्टेड ठेकेदारों को संवेदनशील सरकारी काम सौंपकर जनता को मौत के मुहाने पर खड़ा किया जा रहा है, तो दूसरी तरफ सरेआम गोलियां चल रही हैं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और उपमुख्यमंत्री व लोक निर्माण मंत्री अरुण साव को अब फाइलों से बाहर निकलकर जनता को जवाब देना होगा। शपथ-पत्रों के पीछे छिपने वाले अफसर याद रखें कि जनता का टैक्स उनकी अय्याशी के लिए नहीं है, और न ही जनता की जान इतनी सस्ती है कि उसे कमीशनखोरी की भेंट चढ़ा दिया जाए। उच्च स्तरीय जांच और दोषियों पर एफआईआर ही अब एकमात्र रास्ता है! 

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