मंगलवार, 9 जून 2026

रिश्तों की बलि, करोड़ों का खेल!

 रिश्तों की बलि, करोड़ों का खेल!

 भारतमाला मुआवजा घोटाला: जब रसूख और रुपयों की हवस में अपनों के नाम और सिंदूर की मर्यादा भी दांव पर लग गई


 जिस देश और प्रदेश में एक आम किसान अपनी ही पुश्तैनी जमीन का जायज मुआवजा पाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर अपनी चप्पलें घिस देता है, वहीं रसूखदारों के एक पूरे कुनबे ने कागजों पर जालसाजी का ऐसा शर्मनाक खेल खेला है जिसे सुनकर किसी का भी कलेजा कांप जाए। यह सनसनीखेज कहानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी 'भारतमाला परियोजना' के तहत दुर्ग और राजनांदगांव के बीच (विशेषकर पाटन तहसील में) हुए भूमि अधिग्रहण मुआवजे की है। इस पूरे महाघोटाले में अब प्रवर्तन निदेशालय (ED) की एंट्री हो चुकी है, और जो तथ्य सामने आ रहे हैं, उन्होंने न केवल कानून बल्कि सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों की पवित्रता को भी तार-तार कर दिया है।

करोड़ों का लालच और रिश्तों का 'बदला हुआ' भूगोल

कहते हैं कि भारतीय समाज में विवाह के सात फेरे, सिंदूर की मर्यादा और पारिवारिक रिश्ते सबसे अनमोल होते हैं। लेकिन जब बात करोड़ों रुपये के सरकारी मुआवजे की आई, तो पूर्व मंत्री और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के कथित 'संस्कारों' की दुहाई देने वाले एक बड़े रसूखदार परिवार ने लाज-शर्म को ताक पर रख दिया।

मुआवजे का नियम कहता है कि जमीन के जितने टुकड़े होंगे और जितने अलग-अलग खातेदार होंगे, मुआवजा राशि उतनी ही मोटी और अलग-अलग हिस्सों में बढ़कर मिलेगी। बस, इसी कानूनी छिद्र का फायदा उठाने के लिए इस रसूखदार परिवार ने घर की महिलाओं को मोहरा बनाया या वे खुद इस खेल में शामिल हो गईं। एक ही नाम पर जमीन होने से मुआवजा सीमित रहता, इसलिए जमीन के टुकड़े किए गए और कागजों पर पतियों, पिताओं और ससुरों के नाम इस तरह बदले गए मानो आपस में कोई खून का रिश्ता ही न हो।

पैसे की भूख: किसी ने पति का नाम छुपाया, तो किसी ने बदला ससुर

इस पारिवारिक ड्रामे ने रातों-रात पूरे कुनबे को करोड़पति बना दिया। इस घोटाले की जद में पूर्व मंत्री के सगे भतीजे से लेकर बहुएं और भाभियां तक शामिल हैं। ईडी की जांच और राजस्व दस्तावेजों से जो प्रमुख नाम बेनकाब हुए हैं, वे इस प्रकार हैं:

1 रंजीता चंद्राकर (ग्राम कुरूद): इन्होंने मुआवजे की रकम को कई गुना बढ़ाने के लिए सरकारी कागजों में पति या पिता के नाम की जगह अपने 'ससुर' का नाम दर्ज करा दिया।

2 वाणी श्री चंद्राकर: इन्होंने तो हद ही कर दी; करोड़ों के फेर में शादी के पवित्र बंधन और पति के नाम को ही कागजों से गायब कर दिया और उसकी जगह अपने स्वर्गीय पिता का नाम दर्ज करा दिया।

3 अन्य संदेहास्पद नाम: इस पूरे खेल में पूर्व मंत्री के भतीजे सौरभ चंद्राकर, भाभी अरुणा चंद्राकर सहित परिवार के अन्य सदस्य—भरतलाल, मनोहर चंद्राकर, सुषमा चंद्राकर, विशाखा चंद्राकर, योगेश चंद्राकर, रेखा चंद्राकर और मीना चंद्राकर की भूमिका भी जांच के दायरे में है।

यह छत्तीसगढ़ की उस पारिवारिक पृष्ठभूमि पर एक बड़ा तमाचा है जहां रिश्तों को रुपयों से ऊपर माना जाता है। सवाल यह उठता है कि क्या इन महिलाओं ने केवल पुरुषों के दबाव में आकर अपने सिंदूर और पहचान का सौदा किया, या फिर पैसे की हवस में वे खुद इस धोखाधड़ी की सूत्रधार थीं?

अंधा तंत्र, गदगद अफसरशाही: पटवारी से लेकर एसडीएम तक मौन

यह घोटाला सिर्फ एक रसूखदार परिवार की चालाकी का नतीजा नहीं है। यह मुमकिन ही नहीं था कि इतना बड़ा पारिवारिक खेल बिना प्रशासनिक मिलीभगत के खेला जा सके। जब कागजों पर ससुर को पिता और पति को अजनबी बनाया जा रहा था, तब इलाके के पटवारी, तहसीलदार, एसडीएम और लैंड एक्विजिशन (भूमि अधिग्रहण) ऑफिसर अपनी आंखें मूंदे बैठे थे।

आशंका जताई जा रही है कि या तो इन अधिकारियों के टेबल के नीचे नोटों की मोटी गड्डियां पहुंचाई गईं या फिर पूर्व मंत्री के रसूख और धौंस के आगे पूरा तंत्र नतमस्तक हो गया। राजनांदगांव और पाटन क्षेत्र से ऐसी भी खबरें हैं कि जो जमीनें एक्सप्रेसवे के मुख्य निर्माण से 100 मीटर से लेकर 1 किलोमीटर तक दूर थीं, उनका भी नियम विरुद्ध जाकर करोड़ों का मुआवजा बांट दिया गया।

आरएसएस के 'संस्कार' और दावों पर बड़ा सवाल

यह मामला इसलिए भी राजनीतिक गलियारों में गरमा गया है क्योंकि आरोपी कुनबा उस पार्टी और विचारधारा से ताल्लुक रखता है जो खुद को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के संस्कारों से पोषित बताती है। जो संगठन देश में सांस्कृतिक विरासत और पारिवारिक ताने-बाने को मजबूत करने का दावा करता है, उसी के एक पूर्व कद्दावर मंत्री का परिवार पैसों के लिए अपनी पहचान बदलने पर आमादा हो गया।

ED की एंट्री से हड़कंप, चेहरों से नकाब उतरना तय

भारतमाला परियोजना के इस 'मुआवजा घोटाले' की परतें अब तेजी से उखड़ रही हैं। ईडी की एंट्री के बाद से ही दोषी रसूखदारों और भ्रष्ट अधिकारियों की रातों की नींद उड़ी हुई है। शुरुआती जांच ने इस बात को पुख्ता कर दिया है कि यह देश के विकास मॉडल की आड़ में रसूखदारों द्वारा अपने 'कुनबे के विकास' का एक घृणित और सुनियोजित प्रयास था।

आने वाले दिनों में ईडी की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, कई सफेदपोशों और बड़े अधिकारियों की गिरफ्तारी तय मानी जा रही है। देखना होगा कि कानून इन 'रिश्तों के सौदागरों' को उनके किए की क्या सजा देता है।

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काले कोयले का 'मिस्टर इंडिया' खेल: लारा प्लांट के रास्ते से 573 टेलर गायब, कागजों पर बिका करोड़ों का कोयला!

 काले कोयले का 'मिस्टर इंडिया' खेल: लारा प्लांट के रास्ते से 573 टेलर गायब, कागजों पर बिका करोड़ों का कोयला!

तलाई पाली माइन से एनटीपीसी लारा प्लांट के बीच ₹200 करोड़ की 'महाडकैती'; राजनेता, अफसरशाह और ट्रांसपोर्टर सिंडिकेट के गठजोड़ पर अब सीबीआई की नजर।



छत्तीसगढ़ में कोयले के काले कारोबार का एक ऐसा जादुई खेल सामने आया है, जिसने देश के बड़े-बड़े जादूगरों और जांच एजेंसियों को हैरान कर दिया है। इसे केवल एक 'घोटाला' कहना इस पूरे घटनाक्रम के साथ न्याय नहीं होगा, बल्कि यह सीधे-सीधे समूचे तंत्र की मौजूदगी में की गई एक 'महाडकैती' है । मामला नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (NTPC) के लारा प्लांट से जुड़ा है, जहां से प्रारंभिक अनुमानों के मुताबिक करीब ₹200 करोड़ का कोयला हवा में गायब कर दिया गया ।

क्या है पूरा 'लारा कांड'?

दस्तावेजों और प्रारंभिक जांच के अनुसार, रायगढ़ की तलाई पाली माइंस (Talaipali Mines) से एनटीपीसी के लारा प्लांट (Lara Plant) के लिए भारी मात्रा में कोयला रवाना किया गया था । कागजों पर बकायदा धर्म कांटे (वेब्रिज) में कोयले का वजन दर्ज हुआ, एंट्री की गई और गेट पास भी जारी हुए । लेकिन, तलाई पाली माइन से निकला कोयला लारा प्लांट पहुंचा ही नहीं ।

हैरतअंगेज बात यह है कि 573 भारी-भरकम टेलर (ट्रक) रास्ते से ही मिस्टर इंडिया की तरह गायब हो गए । रायगढ़ और उसौर के बीच के चंद किलोमीटर के सफर में हजारों टन कोयला लदे सैकड़ों ट्रक कहां विलीन हो गए, इसका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है ।

बिना फिजिकल वेरिफिकेशन के हुआ भुगतान

खोजी कड़ियों को जोड़ने पर पता चलता है कि यह खेल बिना आंतरिक मिलीभगत के नामुमकिन था। तलाई पाली माइंस से फर्जी एंट्री और गेट पास के सहारे इन टेलरों को रवाना दिखाया गया । रास्ते में ही इस कोयले को किसी गुप्त स्थान पर डंप कर (उतार) दिया गया । सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि लारा प्लांट में बिना किसी 'फिजिकल वेरिफिकेशन' (भौतिक सत्यापन) के कागजों पर ही एंट्री कर ली गई कि माल सुरक्षित पहुंच चुका है और इसके आधार पर करोड़ों रुपये का भुगतान भी जारी कर दिया गया ।

इस पूरे घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:

 जब सैकड़ों ट्रक गायब हो रहे थे, तब वहां तैनात सुरक्षा बल (CISF) और माइनिंग विभाग क्या कर रहे थे? 

 इतने बड़े फर्जीवाड़े के बावजूद संबंधित ट्रांसपोर्टर के खिलाफ तत्काल कड़ा एक्शन क्यों नहीं लिया गया? 

सफेदपोश, अफसर और माफिया का 'सिंडिकेट'

इस खेल के पीछे किसी आम अपराधी का हाथ नहीं, बल्कि एक रसूखदार 'सिंडिकेट' काम कर रहा है, जिसमें सफेदपोश राजनेता, एनटीपीसी व तलाई पाली माइंस के उच्च अधिकारी, भ्रष्ट अफसरशाह और कोयला माफिया शामिल हैं । सूत्र बताते हैं कि कोयला लेवी के खेल के लिए पहले से चर्चित कुछ दिग्गज नेताओं और बड़े उद्योगपतियों ने अपने राजनीतिक रसूख के दम पर इस पूरे सिंडिकेट को संरक्षण दे रखा था।

सीबीआई के हाथ में कमान: क्या खुलेगा राज?

मामले की गंभीरता को देखते हुए इस 'कोयला परिवहन घोटाले' की जांच अब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंप दी गई है और एफआईआर भी दर्ज हो चुकी है । सीबीआई के सामने अब सबसे बड़ी चुनौतियां हैं:

1 गायब हुआ हजारों टन कोयला आखिरकार किस जगह डंप किया गया?

2 उन 573 ट्रेलरों के असली मालिक कौन हैं, जिनके जरिए इस बेखौफ डकैती को अंजाम दिया गया? 

3 पर्दे के पीछे बैठे वे कौन से वीआईपी और सफेदपोश चेहरे हैं, जो इस सिंडिकेट की कमान संभाल रहे थे? 

छत्तीसगढ़ में कोयला घोटालों का पुराना इतिहास

छत्तीसगढ़ के लिए कोयला परिवहन और लेवी का यह विवाद नया नहीं है । पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल के दौरान भी कोयला घोटाले को लेकर दिल्ली की संसद से लेकर छत्तीसगढ़ की गलियों तक सियासी पारा गर्म रहा था 。 उस दौरान प्रवर्तन निदेशालय (ED) की एंट्री हुई थी और सूर्यकांत तिवारी, अनिल टुटेजा समेत कई रसूखदार अधिकारियों और करीब आधा दर्जन आईपीएस (IPS) अफसरों से लंबी पूछताछ हुई थी, जिससे प्रदेश की राजनीति की दिशा ही बदल गई ।

अब जबकि राज्य में एक बार फिर नए सिरे से 'लारा कांड' के रूप में ₹200 करोड़ की कोयला डकैती सामने आई है जनता और राजनीतिक विश्लेषकों की निगाहें सीबीआई की कार्रवाई पर टिकी हैं  देखना दिलचस्प होगा कि इस जादुई सिंडिकेट के कौन-कौन से बड़े किरदार सलाखों के पीछे पहुंचते हैं !

वीडियो देखें 

https://youtu.be/G7BitLUQiGw?si=HT6cZtxYAC5ScEJC


रविवार, 7 जून 2026

रबर स्टैंप' के तमगे से 'अल्टीमेट पावर सेंटर' तक: छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय का डबल गेम!

रबर स्टैंप' के तमगे से 'अल्टीमेट पावर सेंटर' तक: छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय का डबल गेम!



दिसंबर 2023 में जब छत्तीसगढ़ की सत्ता की कमान विष्णुदेव साय को सौंपी गई थी, तब दिल्ली से लेकर रायपुर तक के राजनीतिक पंडितों और विपक्ष ने एक ही सुर में दावा किया था— *“यह सरकार रबर स्टैंप है, रिमोट कंट्रोल से चलेगी।”* लेकिन साल 2026 आते-आते छत्तीसगढ़ के सियासी और प्रशासनिक गलियारों में एक ऐसा गुप्त, आक्रामक और खामोश खेल खेला जा चुका है जिसने सबको चौंका दिया है।

सियासत की बिसात पर शह और मात का यह खेल इतनी चालाकी से चल रहा है कि दिल्ली को इसकी भनक कितनी है, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन मुख्यमंत्री साय ने राज्य में अपना एक 'अभेद और निर्विवाद सिस्टम' खड़ा कर लिया है।

### **1. रिमोट की छटपटाहट और खामोश बगावत**

राजनीति में जो सीधा और सरल दिखता है, अमूमन वह वैसा होता नहीं। विपरीत परिस्थितियों में कद्दावर नेताओं को पटखनी देकर आए विष्णुदेव साय के भीतर 'रिमोट कंट्रोल सरकार' के नैरेटिव को लेकर एक गहरी छटपटाहट थी। इसी छटपटाहट ने एक ऐसी रणनीति को जन्म दिया, जिसने राज्य के स्थापित पावर सेंटर्स की नींव हिला दी। मुख्यमंत्री ने खुद को मजबूत करने के लिए उन चेहरों को खंगालना शुरू किया जो प्रभावशाली तो थे, लेकिन जिन पर किसी खास गुट या बड़े नेता का 'ठप्पा' नहीं लगा था।

### **2. ब्यूरोक्रेसी का महामंथन: 43 अफसरों के तबादले और मलाईदार विभागों पर कब्ज़ा**

कहा जाता है कि किसी भी मुख्यमंत्री की असली ताकत उसकी ब्यूरोक्रेसी होती है। शुरुआत में साय को दूसरों पर निर्भर रहना पड़ा था; चाहे वह वित्त मंत्री ओपी चौधरी की दमदारी हो या 2005 बैच के आईएएस अधिकारियों का प्रशासनिक नियुक्तियों में दबदबा।

लेकिन बिना किसी शोर-शराबे के, मुख्यमंत्री ने हाल ही में **43 आईएएस अफसरों का ट्रांसफर** कर पूरी बिसात ही पलट दी। खनिज, राजस्व, वन और गृह जैसे सबसे संवेदनशील और मलाईदार विभागों में उन्होंने अपने सबसे भरोसेमंद और निर्विवाद अफसरों को तैनात कर दिया है। यह सीधे तौर पर प्रशासनिक नियंत्रण अपने हाथ में लेने का साय का सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक है।

### **3. 'डबल गेम' और कद्दावर नेताओं की 'पॉलिटिकल क्लीनिंग'**

प्रशासन के बाद बारी राजनीति को साधने की थी। इस 'साइलेंट ऑपरेशन' के तहत उन भारी-भरकम चेहरों को हाशिए पर धकेल दिया गया जो खुद को मुख्यमंत्री से कम नहीं समझते थे या भविष्य के दावेदार थे:

 * **दिग्गजों की विदाई:** डॉ. रमन सिंह, बृजमोहन अग्रवाल, राजेश मूणत, विक्रम उसेंडी, रामविचार नेताम और रेणुका सिंह जैसे कद्दावर नेताओं को कोर ग्रुप से धीरे से किनारे कर दिया गया।

 * **परंपराओं का खात्मा:** पार्टी की स्थापित परंपराओं को तोड़ते हुए विशेष आमंत्रित सदस्यों की सूची से **23 विधायकों को बाहर** का रास्ता दिखा दिया गया। इसकी जगह मुख्यमंत्री ने पहली बार जीतकर आए युवा और प्रभावशाली विधायकों की एक नई फौज खड़ी कर दी है जो सीधे उनके प्रति वफादार हैं।

### **4. दिल्ली को विश्वास में लेकर खुद का कुनबा मजबूत करना**

इस पूरे खेल की सबसे तीखी सच्चाई यह है कि इसे **'डबल गेम'** कहा जा रहा है। मुख्यमंत्री और उनके रणनीतिकार अफसरों ने बड़ी चालाकी से दिल्ली के केंद्रीय नेतृत्व को यह विश्वास दिलाया कि यह सब 'सीनियर नेताओं को किनारे कर नए प्रयोग' करने के लिए किया जा रहा है।

यानी, **"दिल्ली को विश्वास में लो और राज्य में अपना खुद का अभेद साम्राज्य खड़ा कर लो।"** अब स्थिति यह है कि यदि कोई कद्दावर नेता दिल्ली जाकर शिकायत भी करे, तो उसका कोई असर नहीं होने वाला, क्योंकि साय का कुनबा पूरी तरह से स्थापित हो चुका है।

 निष्कर्ष (Punchline)

छत्तीसगढ़ में भले ही कानून-व्यवस्था की स्थिति और अपराधों को लेकर सवाल उठ रहे हों, लेकिन प्रशासनिक और राजनीतिक मोर्चे पर विष्णुदेव साय ने खुद को 'अल्टीमेट पावर सेंटर' के रूप में स्थापित कर लिया है। जो लोग साय को सीधा और खामोश समझते थे, वे उनके इस 'डबल गेम' के चक्रव्यूह में फंस चुके हैं। यह साय का नया युग है— जहाँ चेहरा सीधा है, लेकिन चालें बेहद गहरी और अचूक हैं!

वीडियो देखें 

https://youtu.be/dMcfBCq1Ee8?si=3NbNC4HtQV_MGx-D


खाकी' का नया खेल: सत्ता के रसूख में 'पीड़ित' ही बना 'लुटेरा'

 खाकी' का नया खेल: सत्ता के रसूख में 'पीड़ित' ही बना 'लुटेरा', कानून को 'वॉशिंग मशीन' बनाने की जिद!



छत्तीसगढ़ में सत्ता बदलते ही क्या न्याय की परिभाषा भी बदल गई है? क्या सूबे की 'डबल इंजन सरकार' में अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि अब रसूखदारों के आगे खाकी (पुलिस) नतमस्तक होकर पीड़ित को ही मुलजिम बनाने का खेल खेल रही है? ये सवाल हम नहीं, बल्कि बेमेतरा जिले के साजा विधानसभा क्षेत्र से आ रही वह हैरान करने वाली तस्वीरें और पुलिसिया कार्रवाई की स्क्रिप्ट चीख-चीख कर कह रही है, जिसने पूरे प्रदेश की कानून व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।

ताजा मामला साजा विधानसभा के हाईप्रोफाइल भाजपा विधायक ईश्वर साहू के पुत्र कृष्णा साहू से जुड़ा है। आरोप है कि सत्ता की धमक और अहंकार के नशे में चूर विधायक पुत्र को बचाने के लिए साजा पुलिस ने एक ऐसा 'कुचक्र' रचा है, जिससे पीड़ित आदिवासी परिवार ही अब सहमा हुआ है।

दशहरे की रात का वो खूनी खेल और 'खाकी' की सुस्ती

घटना बीती 12 अक्टूबर यानी दशहरे की रात की है। आरोप है कि विधायक पुत्र कृष्णा साहू ने अपने साथियों के साथ मिलकर मनीष मंडावी (एक आदिवासी युवक) और उसके चाचा के साथ जमकर मारपीट की। मारपीट इस कदर बेरहमी से की गई कि पीड़ित का सिर तक फट गया। जातिसूचक गालियां दी गईं। लेकिन हद तो तब हो गई जब इस गंभीर मामले की रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए पीड़ित को घंटों थाने के चक्कर काटने पड़े। साजा पुलिस सत्ता के दबाव में एफआईआर दर्ज करने से कतराती रही। आखिरकार जब आदिवासी समाज ने एकजुट होकर तीखा आक्रोश जताया और पुलिस पर भारी दबाव बनाया, तब कहीं जाकर साजा पुलिस ने विधायक पुत्र कृष्णा साहू के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट (ST/ST Act) और अन्य गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया।

काउंटर एफआईआर का 'पटकथा': 45 घंटे बाद याद आई लूट?

कहानी में असली ट्विस्ट इसके बाद आता है। जैसे ही विधायक पुत्र पर गैर-जमानती धाराओं में केस दर्ज हुआ, साजा पुलिस ने कथित तौर पर रसूखदारों को 'वॉशिंग मशीन' में डालकर पाक-साफ करने की स्क्रिप्ट लिख डाली। अमूमन ऐसी संगीन धाराओं के तहत आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी होनी चाहिए, लेकिन कृष्णा साहू बेखौफ अंदाज में ठसक के साथ थाने पहुंचता है।

पुलिस उसे गिरफ्तार करने की बजाय उसकी एक ऐसी शिकायत पर तुरंत मुहर लगा देती है, जिसे सुनकर कोई भी हैरान रह जाए। घटना के लगभग 45 घंटे बाद विधायक पुत्र की तरफ से काउंटर रिपोर्ट लिखवाई जाती है कि पीड़ित मनीष मंडावी और उसके चाचा ने मिलकर उनसे ₹40,000 लूट लिए! पुलिस बिना किसी जांच के, बिना समय गंवाए पीड़ित पक्ष के खिलाफ ही लूट (Dacoity/Robbery) जैसी गंभीर धारा के तहत काउंटर एफआईआर दर्ज कर लेती है।

सवाल: क्या समझौते का दबाव बनाने के लिए रचा गया कुचक्र?

राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि पुलिस अक्सर रसूखदारों को बचाने के लिए काउंटर केस का सहारा लेती है ताकि गरीब पीड़ित पक्ष पर दबाव बनाया जा सके और वह 'समझौता' करने को मजबूर हो जाए।

 पहला सवाल: विधायक बनने से पहले और बाद की जीवनशैली को देखें, तो क्या सचमुच ₹40,000 की लूट की रिपोर्ट लिखवाने में विधायक पुत्र को 45 घंटे से ज्यादा का वक्त लग गया?

 दूसरा सवाल: एसटी/एससी एक्ट के तहत नामजद आरोपी थाने में खुलेआम घूम रहा है और पुलिस उससे पूछताछ करने के बजाय उसकी 'लूट' की थ्योरी पर आंख मूंदकर भरोसा कर लेती है, ऐसा क्यों?

 तीसरा सवाल: यह पूरा इलाका प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और गृहमंत्री विजय शर्मा के प्रभाव वाला क्षेत्र माना जाता है, ऐसे में गृहमंत्री की नाक के नीचे कानून का यह कैसा माखौल उड़ाया जा रहा है?

लोहारीडीह की आग से भी नहीं सीखा सबक?

इसी कवर्धा-बेमेतरा बेल्ट में पिछले दिनों 'लोहारीडीह कांड' हुआ था, जहां एक रसूखदार भाजपा नेता के आतंक से तंग आकर उग्र भीड़ ने कानून अपने हाथ में ले लिया था और पूरा गांव जेल की सलाखों के पीछे चला गया था। साजा की यह घटना बताती है कि प्रशासन ने लोहारीडीह की त्रासदी से कोई सबक नहीं सीखा है। जब पुलिस निष्पक्ष न्याय देने की बजाय सत्ता के औजार के रूप में काम करने लगे, तो जनता का कानून से विश्वास उठने लगता है।

नवा बैला के नवा सींग... सत्ता का अहंकार?

छत्तीसगढ़ी में एक बड़ी मशहूर कहावत है— "नवा बैला के नवा सींग, चरे बैला टंगे टिंग" (यानी नया-नया पद या ताकत मिलने पर जरूरत से ज्यादा धमक दिखाना)। साजा में भी यही देखने को मिल रहा है। विपक्ष अब इस मुद्दे पर पूरी तरह मुखर है और सरकार को घेरने की तैयारी में है। सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री और गृहमंत्री अपने ही विधायक के पुत्र के इस 'गुंडाराज' पर लगाम कसेंगे या फिर साजा पुलिस का यह 'शर्मनाक खेल' यूं ही जारी रहेगा और एक गरीब आदिवासी न्याय की भीख मांगते-मांगते खुद ही लुटेरा बनकर सलाखों के पीछे डाल दिया जाएगा?

जवाब का इंतजार सूबे की जनता को है।

वीडियो देखें


https://youtu.be/8wLJBtZ6Q4Y?si=Q6XZYs_ObqrHeiL1

गुरुवार, 4 जून 2026

राष्ट्रवाद की नई परिभाषा या विभाजन की पुरानी लकीरें


 राष्ट्रवाद की नई परिभाषा या विभाजन की पुरानी लकीरें?

 इतिहास के पन्नों से वर्तमान की राजनीति तक का एक गहरा और निष्पक्ष विश्लेषण



 1. प्रस्तावना: इतिहास की गूंज और वर्तमान का कोलाहल

सन् 1947 का अगस्त महीना सिर्फ एक देश की आजादी का गवाह नहीं था, बल्कि उपमहाद्वीप के सीने पर खिंची उस खूनी लकीर का भी गवाह था जिसने रातों-रात करोड़ों लोगों को अपनी ही जमीन पर पराया बना दिया। आज जब हम इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में खड़े हैं, तब भी नागरिकता, राष्ट्रवाद और पहचान के सवाल थमे नहीं हैं।

अक्सर यह माना जाता है कि इतिहास बीत चुका समय है, लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप के संदर्भ में इतिहास एक जीवंत इकाई है जो हर रोज हमारी सुबह के अखबारों और शाम की टीवी डिबेट्स को तय करती है। आज देश के राजनीतिक गलियारों से लेकर चाय की टपरियों तक जिस 'राष्ट्रवाद' पर सबसे तीखी बहस हो रही है, उसकी जड़ें दरअसल आज की राजनीति में नहीं, बल्कि सन 47 और उसके बाद के दशकों में लिए गए राजनीतिक फैसलों में छिपी हैं। सवाल यह उठता है कि क्या हम आज वाकई राष्ट्र की सुरक्षा और संप्रभुता की नई इबारत लिख रहे हैं, या सिर्फ अतीत के घावों को कुरेदकर वर्तमान की राजनीतिक गोटियां सेट कर रहे हैं?

## 2. नेहरू-लियाकत समझौते से असम अकॉर्ड तक: इतिहास का वो सच जो छिपाया गया

विभाजन के तुरंत बाद सबसे बड़ा संकट शरणार्थियों का था। दोनों ओर से इंसानों का ऐसा रेला चला जिसकी कल्पना इतिहास में कभी नहीं की गई थी। इस मानवीय त्रासदी को संभालने और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए 1950 में 'नेहरू-लियाकत समझौता' (दिल्ली पैक्ट) हुआ। इस समझौते का मूल उद्देश्य यह था कि दोनों देश अपने-अपने यहाँ अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे और जो शरणार्थी वापस जाना चाहते हैं, उन्हें उनकी संपत्ति वापस मिलेगी।

> **इतिहास का अंतर्विरोध:**

> दस्तावेज़ गवाह हैं कि भारत ने इस समझौते की शर्तों का पूरी निष्ठा से पालन किया, लेकिन तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) और पश्चिमी पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों (विशेषकर हिंदुओं, सिखों, बौद्धों) पर अत्याचार का सिलसिला थमा नहीं। नतीजतन, सीमाओं के पार से आबादी का पलायन रुक-रुक कर चलता रहा।

इसके बाद दूसरा सबसे बड़ा मोड़ आया सन 1971 में, जब बांग्लादेश का जन्म हुआ। इस दौरान एक बार फिर लाखों की संख्या में शरणार्थी भारत, विशेषकर असम और पश्चिम बंगाल की सीमाओं में दाखिल हुए। असम की जनसांख्यिकी (Demography) में आए इस अचानक बदलाव ने वहां एक बड़े सांस्कृतिक और सामाजिक आंदोलन को जन्म दिया, जिसे हम 'असम आंदोलन' के नाम से जानते हैं। छह साल चले इस खूनी संघर्ष का अंत 1985 के 'असम समझौते' (Assam Accord) से हुआ, जिसने नागरिकता के लिए 25 मार्च 1971 की कट-ऑफ तारीख तय की।

विडंबना देखिए कि जो असम समझौता असम की अस्मिता को बचाने के लिए हुआ था, वही आगे चलकर देश की नागरिकता बहस का सबसे पेचीदा कानूनी दस्तावेज बन गया।

## 3. कानून, नागरिकता और पहचान की कानूनी भूलभुलैया

नागरिकता किसी भी संप्रभु राष्ट्र का सबसे बुनियादी अधिकार होती है। भारत के संविधान के भाग-2 (अनुच्छेद 5 से 11) में नागरिकता के प्रावधान दिए गए हैं। लेकिन समय के साथ इसमें कई बदलाव किए गए। 1955 के मूल नागरिकता कानून में 1986, 1992, 2003, 2005, 2015 और हाल ही में सीएए (CAA) के जरिए संशोधन किए गए।

इन संशोधनों की यात्रा को देखें तो समझ आता है कि भारत की नागरिकता की अवधारणा 'भूमंडलीय अधिकार' (Jus Soli - जन्म के आधार पर) से खिसककर 'रक्त संबंध/धार्मिक प्रताड़ना' (Jus Sanguinis - वंश या पृष्ठभूमि के आधार पर) की तरफ बढ़ी है।

4. राष्ट्रवाद का नया 'कॉर्पोरेट मॉडल': चुनावी ध्रुवीकरण और क्रोनोलॉजी का खेल

आज की सत्ता ने राजनीति को एक ऐसे 'इवेंट मैनेजमेंट' में बदल दिया है, जहाँ देश की सुरक्षा और नागरिकों की पहचान सिर्फ चुनावी विज्ञापनों के टूलकिट बन कर रह गए हैं। जो मुद्दा कभी देश की संप्रभुता से जुड़ा गंभीर विषय हुआ करता था, उसे आज बेहद शातिर तरीके से 'क्रोनोलॉजी' के खेल में बदल दिया गया है। गृह मंत्रालय की फाइलें बाद में हिलती हैं, पहले सत्ताधारी दल के आईटी सेल और गोदी मीडिया के स्टूडियोज में 'देशभक्त बनाम देशद्रोही' की स्क्रिप्ट लिख दी जाती है।

यह आज की सत्ता की सबसे बड़ी 'करतूत' है कि उसने जनता को बुनियादी सवालों से पूरी तरह काट दिया है।

 जब युवा बेरोजगारी पर सवाल उठाता है, तो उसे सीमा पार के दुश्मनों का डर दिखाया जाता है।

 जब किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) या अपनी बदहाली पर बात करता है, तो विमर्श को अचानक नागरिकता, घुसपैठियों और धर्म के चश्मे पर लाकर खड़ा कर दिया जाता है।

सत्ता का दोहरा चरित्र:

एक तरफ तो कागजों पर 'वसुधैव कुटुंबकम्' का ढोंग रचा जाता है, और दूसरी तरफ घरेलू राजनीति में अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए समाज के एक हिस्से को लगातार 'खलनायक' (Villain) के रूप में पेश किया जाता है। यह राष्ट्रवाद नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद की आड़ में खेली 5. जांच एजेंसियों का तमाशा और संस्थाओं का आत्मसमर्पण

इतिहास गवाह है कि जब-जब सरकारें जन-आकांक्षाओं को पूरा करने में विफल होती हैं, तब-तब वो भय का माहौल बनाती हैं। आज की सत्ता की सबसे बड़ी करतूत यह है कि उसने देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं की रीढ़ को ही तोड़ दिया है। जो चुनाव आयोग, जो अदालतें और जो जांच एजेंसियां किसी भी लोकतंत्र का सुरक्षा कवच होती हैं, उन्हें आज सत्ता के इशारे पर नाचने वाली कठपुतलियों में तब्दील कर दिया गया है।

विपक्ष की आवाज को दबाने के लिए कभी देशद्रोह के मुकदमों का सहारा लिया जाता है, तो कभी केंद्रीय एजेंसियों को पीछे छोड़ दिया जाता है। लेकिन जब बात असल घुसपैठ, सीमाओं पर चीन की दादागिरी या आंतरिक सुरक्षा की आती है, तो सत्ता की 'छप्पन इंच' की छाती अचानक चुप्पी साध लेती है। इतिहास की गलतियों को सुधारने का दावा करने वाले हुक्मरान आज इतिहास के सबसे कमजोर और डरे हुए दौर का निर्माण कर रहे हैं, जहाँ सवाल पूछना ही सबसे बड़ा अपराध बन चुका है।

6. निष्कर्ष: क्या राजा नंगा हो चुका है?

कवि अज्ञेय ने कभी लिखा था कि "सांप, तुम सभ्य तो हुए नहीं..."। आज की सत्ता पर यह बात बिल्कुल सटीक बैठती है। राष्ट्रवाद का जो चोगा इस सरकार ने ओढ़ रखा है, उसकी सिलाई अब उधड़ने लगी है। नागरिकता के नाम पर गरीबों को ट्रिब्यूनल की अंतहीन लाइनों में खड़ा कर देना और खुद बड़े-बड़े मंचों से राष्ट्रभक्ति के सर्टिफिकेट बांटना, अब जनता के सामने बेनकाब हो चुका है।

यह लेख आज के हुक्मरानों को यह याद दिलाने के लिए है कि इतिहास सिर्फ दर्ज नहीं होता, इतिहास हिसाब भी रखता है। जब आने वाली पीढ़ियां इस दौर का मूल्यांकन करेंगी, तो वो इस बात पर थूकेगी कि जब देश को अस्पतालों, स्कूलों और नौकरियों की जरूरत थी, तब देश की सत्ता मजहब की दीवारें और नफरत की नई लकीरें खींचने में मशगूल थी। राजा भले ही खुद को अजेय समझे, लेकिन लोकतंत्र की जनता कभी न कभी यह चिल्लाकर जरूर कहेगी कि—"राजा नंगा है।"

"सच्चा राष्ट्रवाद सीमाओं पर तैनात फौजी के सम्मान और देश के आखिरी गरीब के पेट की भूख से तय होता है, न कि सत्ता की भूख मिटाने के लिए टीवी चैनलों पर परोसी जाने वाली नफरत की खुराक से।"

वीडियो देखें 

https://youtu.be/O9wDbpEtyK4?si=qIhxnQSFl-8SwAus


बुधवार, 3 जून 2026

कहीं नकली दवाइयां तो कहीं अस्पतालों का जहरीला कचरा ले रहा है जनता की सांसें!

 डबल इंजन सरकार के दावों के बीच सुलगते दो गंभीर सवाल: कहीं नकली दवाइयां तो कहीं अस्पतालों का जहरीला कचरा ले रहा है जनता की सांसें!


 देशभर में जीवन रक्षक 53 दवाइयां अमानक, कंपनियों का दावा- 'ये दवाइयां हमारी हैं ही नहीं'; क्या धड़ल्ले से बिक रहा है नकली मौत का सामान?

 छत्तीसगढ़ के 91 अस्पतालों में 5 महीने से डंप है 'बायो-मेडिकल वेस्ट', भुगतान न होने से कचरा उठाने वाली कंपनी ने खड़े किए हाथ; बिलासपुर-सरगुजा संभाग में महामारी का खतरा।


राज्य से लेकर केंद्र तक में बैठी ‘डबल इंजन’ की सरकारें एक तरफ आयुष्मान कार्ड और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभूतपूर्व विस्तार के बड़े-बड़े दावे कर रही हैं, लेकिन धरातल की हकीकत बेहद खौफनाक और चौंकाने वाली है। देश में एक तरफ जहां डॉक्टरों के पर्चे पर लिखी जा रही दवाइयां नकली होने की कगार पर हैं, वहीं दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के अस्पतालों से निकलने वाला घातक मेडिकल कचरा (Bio-Medical Waste) आम जनता के स्वास्थ्य के लिए 'टाइम बम' बन चुका है। अस्पतालों के भीतर इलाज और अस्पतालों के बाहर फैला जहर अब सीधे तौर पर लोगों की जान से खिलवाड़ कर रहा है।

पार्ट- 1: मौत का खुला बाजार! अमानक ही नहीं, अब 'नकली' दवाओं का खौफ

हाल ही में केंद्रीय दवा नियामक संस्था की जांच में देशभर की 53 जीवन रक्षक दवाइयां अमानक (घटिया स्तर की) पाई गई थीं। मामला सिर्फ दवाओं के घटिया होने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे एक कदम और आगे बढ़कर बेहद डरावना हो चुका है।

कंपनियों का पल्ला झाड़ना: इस जांच के बाद संबंधित दवा निर्माता कंपनियों में से कई ने साफ तौर पर यह कहकर हाथ खड़े कर दिए हैं कि 'ये दवाइयां उनकी कंपनी ने बनाई ही नहीं हैं'।

सवालिया निशान: इसका सीधा और साफ मतलब यह है कि देश के बाजारों, स्टॉकिस्टों और नामी दवा दुकानों तक सीधे तौर पर 'नकली दवाइयां' सप्लाई की जा रही हैं।

जिम्मेदार कौन?: जब मरीज डॉक्टर की सलाह पर महंगी और जरूरी दवाइयां खरीदता है और वह दवा ही नकली निकले, तो इलाज बेअसर होना लाजमी है। ऐसे में होने वाली मौतों के लिए क्या डॉक्टर जिम्मेदार हैं या वह पूरा सिस्टम, जो नकली दवाओं के इस नेक्सस को रोकने में नाकाम रहा है?

इलेक्टोरल बॉन्ड और घटिया दवाओं का कड़वा सच: इस पूरे मामले के तार चुनावी चंदे (इलेक्टोरल बॉन्ड) से भी जुड़ते दिख रहे हैं। पूर्व में सामने आई रिपोर्ट्स के अनुसार, चंदा देने वाली कंपनियों में कम से कम 5 ऐसी दवा कंपनियां भी शामिल थीं, जिनकी दवाइयां पहले घटिया पाई गई थीं। राजनीतिक चंदे की आड़ में जनता की सेहत को ताक पर रखने का यह खेल अब जानलेवा साबित हो रहा है।

पार्ट- 2: छत्तीसगढ़ के 91 अस्पतालों में छुपाया जा रहा है 'जहरीला कचरा'

एक तरफ नकली दवाओं का प्रहार है, तो दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ राज्य के भीतर स्वास्थ्य महकमे की एक और बड़ी लापरवाही सामने आई है। प्रदेश के 91 सरकारी व बड़े अस्पताल इस वक्त बायो-मेडिकल वेस्ट (अस्पताल के कचरे) के ढेर पर बैठे हैं।

4 से 5 महीनों से नहीं उठा कचरा: नियमों के मुताबिक अस्पतालों से निकलने वाले बेहद खतरनाक और संक्रमित कचरे को 24 घंटे के भीतर नष्ट करना अनिवार्य होता है। लेकिन छत्तीसगढ़ के 91 अस्पतालों में पिछले 4-5 महीनों से कचरा उठाया ही नहीं गया है।

अस्पताल प्रबंधन की चालाकी: इस कचरे को सही तरीके से डिस्पोज करने के बजाय, कई जगहों पर अस्पताल प्रबंधन इसे छुपाने की कोशिश कर रहा है, जिससे पर्यावरण और अस्पताल आने वाले मरीजों व तीमारदारों को संक्रमण का भारी खतरा है।

क्यों थमा कचरा उठान?

राज्य सरकार ने अस्पतालों के कचरे को नष्ट करने का ठेका 'इनवायरो केयर इंटरनेशनल' (Enviro Care International) नामक कंपनी को दिया है। इस कंपनी के जिम्वे रेलवे के अस्पतालों का भी काम है। सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राज्य सरकार द्वारा इस कंपनी का करीब 41 लाख रुपये का भुगतान अटका कर रखा गया है। बजट न मिलने के कारण कंपनी डीजल का खर्च और अपने कर्मचारियों को वेतन देने में असमर्थ है, जिसके चलते दूरस्थ अंचलों में काम पूरी तरह ठप हो गया है।

ये 5 जिले सबसे ज्यादा प्रभावित:

इस कचरों के न उठने से बिलासपुर और सरगुजा संभाग का सबसे बुरा हाल है। सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में शामिल हैं: बिलासपुर, जांजगीर-चांपा, मुंगेली, कोरबा और संबंधित संभाग का पांचवा जिला। इन बड़े जिलों के अस्पतालों में प्रतिदिन हजारों-लाखों मरीज आते हैं, जो अनजाने में इस फैलते संक्रमण की चपेट में आ रहे हैं।

बड़ा सवाल: विकास की इस गति का क्या फायदा?

दावा था कि केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकार (डबल इंजन) होने से विकास के काम बुलेट ट्रेन की रफ्तार से दौड़ेंगे। लेकिन अगर गरीबों को पक्के मकान और पक्की सड़कें मिल भी जाएं, और उनके जीवन की मूल आवश्यकता यानी 'स्वास्थ्य' को ही दांव पर लगा दिया जाए, तो ऐसे विकास के क्या मायने हैं? देश में बिना बीमारी के चलते-फिरते, नाचते-गाते युवाओं की अचानक आ रही मौतें और अस्पतालों का यह कुप्रबंधन चीख-चीख कर व्यवस्था में बड़े सुधार की मांग कर रहा है।

रेलवे अस्पताल भी अछूता नहीं!

हैरान करने वाली बात यह है कि कचरा न उठाए जाने वाले इन 91 प्रभावित अस्पतालों की सूची में केंद्र सरकार के अधीन आने वाला रेलवे का अस्पताल भी शामिल है। यानी बजट और कुप्रबंधन की यह मार सिर्फ राज्य स्तर पर नहीं, बल्कि सीधे केंद्र सरकार के विभागों को भी अपनी चपेट में ले चुकी है।

Vidio देखें 


https://youtu.be/-qGNTx_J5TQ?si=Kc8pOTKxPlSzj8ks


मंगलवार, 2 जून 2026

छत्तीसगढ़ में जल जीवन मिशन की 'पाइपलाइन' में लीकेज

 छत्तीसगढ़ में जल जीवन मिशन की 'पाइपलाइन' में लीकेज: 'डबल इंजन' सरकार में भी ठेकेदारों की मनमानी, जनता त्रस्त



 देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक 'जल जीवन मिशन' छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में खुद प्यासी नजर आ रही है। प्रदेश के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (PHE) विभाग और उपमुख्यमंत्री अरुण साव के कड़े बयानों और चेतावनियों के दावों के उलट, जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक है । ग्रामीण इलाकों में योजना का काम या तो अधर में लटका हुआ है या फिर ठेकेदार काम बीच में ही छोड़कर रफूचक्कर हो चुके हैं। हालात यह हैं कि कई गांवों में आधी-अधूरी पाइपलाइन बिछाकर सड़कें खोद दी गई हैं, जिससे लोगों का चलना भी दूभर हो गया है ।

कागजों पर चेतावनी, जमीन पर 'गलबहियां'

पिछले दिनों उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने पीएचई विभाग की बैठक लेकर लापरवाह ठेकेदारों और अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी थी । इससे पहले छह इंजीनियरों को निलंबित भी किया जा चुका है लेकिन धरातल पर सख्त कार्रवाई की जगह ठेकेदारों और अधिकारियों के बीच 'गलबहियां' का खेल चल रहा है । सत्ता के गलियारों और मंत्री बंगले तक मजबूत पकड़ रखने वाले रसूखदार ठेकेदारों के आगे अधिकारी भी नतमस्तक नजर आ रहे हैं 

केस स्टडी: गरियाबंद के दही गांव में छह महीने से काम ठप

योजना में जारी इस खेल का सबसे ताजा और बड़ा उदाहरण गरियाबंद जिले के देवभोग ब्लॉक अंतर्गत आने वाले 'दही गांव' में देखने को मिला है । यहां घर-घर पानी पहुंचाने का जिम्मा 'देव साई ट्रेडर्स' नाम की एजेंसी को मिला है । ग्रामीणों का आरोप है कि पिछले छह महीने से गांव में काम पूरी तरह से ठप पड़ा हुआ है । ग्रामीण लगातार इसकी शिकायत लेकर दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन 'देव साई ट्रेडर्स' का नाम सुनते ही अधिकारियों के हाथ-पांव फूल जाते हैं। सूत्रों के मुताबिक, इस ठेकेदार की पहुंच सीधे मंत्री बंगले और सत्तारूढ़ दल के दिग्गज नेताओं तक है, जिसके कारण इसके खिलाफ कोई भी कार्रवाई करने से बच रहा है ।

विधानसभा में भी गूंजा मामला, घिरे विभागीय मंत्री

यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले विधानसभा सत्र के दौरान भी जल जीवन मिशन में हो रही गड़बड़ियों को लेकर विभागीय मंत्री अरुण साव विपक्ष के तीखे हमलों से बुरी तरह घिरे थे सदन में धमतरी जिले का मामला विशेष रूप से गूंजा था, जहां घटिया निर्माण सामग्री के उपयोग और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे । मंत्री के आश्वासन के बाद भी गरियाबंद, बलौदाबाजार, धमतरी और महासमुंद जैसे जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों से लगातार शिकायतें आ रही हैं कि काम या तो बंद है या फिर बेहद घटिया दर्जे की सामग्री का इस्तेमाल किया जा रहा है ।

विधायकों की भी सुनवाई नहीं!

सूत्रों का कहना है कि स्थिति इतनी बेकाबू हो चुकी है कि खुद सत्तापक्ष और विपक्ष के कई विधायक अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याओं को लेकर लगातार मंत्री बंगले और अधिकारियों को फोन कर रहे हैं । लेकिन शासन-प्रशासन और ठेकेदारों के बीच बनी कथित 'गिरोहबंदी' के कारण जनप्रतिनिधियों की बातों को भी अनसुना किया जा रहा है 

मुख्य बिंदु: क्यों फेल हो रहा है मिशन?

 रसूखदारों को शह: मंत्री बंगले और राजनीतिक रसूख के दम पर ठेकेदार मनमानी कर रहे हैं ।

 घटिया सामग्री का उपयोग: कई जिलों में पाइपलाइन और टंकियों के निर्माण में स्तरहीन सामग्री का इस्तेमाल हो रहा है ।

 अधिकारियों की लाचारी: कार्रवाई करने के बजाय पीएचई विभाग के अधिकारी रसूखदार एजेंसियों के सामने मौन हैं ।

 जनता की दोहरी मार: पानी तो मिला नहीं, उलटे पाइपलाइन के लिए खोदी गई सड़कों ने ग्रामीणों की मुसीबत दोगुनी कर दी है ।

निष्कर्ष: छत्तीसगढ़ में 'डबल इंजन' की सरकार होने के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी के इस ड्रीम प्रोजेक्ट की ऐसी दुर्दशा कई गंभीर सवाल खड़े करती है । यदि समय रहते इस 'सिंडिकेट' पर नकेल नहीं कसी गई, तो करोड़ों की यह योजना केवल भ्रष्टाचार की भेंट चढ़कर रह जाएगी और ग्रामीणों का 'हर घर जल' का सपना सिर्फ सपना ही बना रहेगा।


Vidio देखें 


https://youtu.be/GYVzcgBej3U?si=mHGnFj7QTAuYejZW