शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

छत्तीसगढ़ का 'गुजराती' सौदा!

 छत्तीसगढ़ का 'गुजराती' सौदा!


अमित शाह की 'क्रोनोलॉजी', बस्तर का 'विकास मॉडल 2.0' और छत्तीसगढ़ के जल-जंगल-जमीन पर कॉर्पोरेट पहरा

राजनीति और कॉर्पोरेट जगत की जुगलबंदी में कोई भी कदम यूं ही नहीं उठाया जाता; हर बड़े दौरे के पीछे एक सोची-समझी 'क्रोनोलॉजी' होती है और हर क्रोनोलॉजी के पीछे अरबों रुपये की एक बड़ी डील। जब देश के गृह मंत्री अमित शाह बस्तर की धरती पर कदम रखते हैं और दावा करते हैं कि 5 साल में बस्तर के आदिवासियों की आमदनी छह गुना बढ़ जाएगी, तो वह एक सुनहरे भविष्य का सपना बेच रहे होते हैं । लेकिन इसी बीच सत्ता के गलियारों से एक ऐसी सूची (List) लीक होती है, जो गृह मंत्री के दावों की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी है ।

यह कहानी सिर्फ 'नक्सल मुक्त बस्तर' की नहीं है, बल्कि 'संसाधन मुक्त छत्तीसगढ़' की है । एक तरफ बस्तर में सुरक्षा कैंपों को 'वीर शहीद गुंडादूर सेवा डेरा' में तब्दील करने का प्रशासनिक ढोल पीटा जा रहा है, तो दूसरी तरफ परदे के पीछे से अडानी से लेकर टोरेंट तक की गुजराती लॉबी को छत्तीसगढ़ के जल-जंगल और जमीन सौंपने का पूरा खाका तैयार हो चुका है ।

1. शाह का 'बस्तर मॉडल 2.0': सेवा का मुखौटा या जमीन की घेराबंदी?

गृह मंत्री अमित शाह ने बस्तर दौरे में केरल जितने बड़े भूभाग को नक्सलवाद से मुक्त कराने के लिए 200 सुरक्षा कैंपों में से 70 को 'वीर शहीद गुंडादूर सेवा डेरा' बनाने का एलान किया । दावा है कि यहाँ बैंकिंग, आधार कार्ड और 371 सरकारी योजनाएं सीधे आदिवासियों के दरवाजे तक पहुंचेंगी ।

लेकिन स्थानीय जानकारों और राजनीति के इनसाइडर्स का सवाल कुछ और है: क्या ये 'सेवा डेरे' सिर्फ आदिवासियों की भलाई के लिए हैं, या फिर बस्तर के दुर्गम और खनिज-समृद्ध इलाकों में कॉर्पोरेट कंपनियों की सुरक्षित एंट्री के लिए बनाए गए सेफ पैसेज (Safe Passage) हैं?

2. वो 'वायरल लिस्ट': छत्तीसगढ़ की छाती पर 'सूरत और अहमदाबाद' का पहरा

जैसे ही गृह मंत्री का दौरा खत्म होता है, छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक हलकों में एक सूची तैरने लगती है। यह सूची बताती है कि राज्य की विष्णुदेव साय सरकार ने गुजरात की दिग्गज कंपनियों के लिए रेड कारपेट बिछा दिया है :

 अडानी पावर व अडानी एंटरप्राइजेज (अहमदाबाद): ऊर्जा और केमिकल प्रोजेक्ट्स के लिए सरगुजा की हसदेव-समृद्ध वादियों में बड़े पैमाने पर जमीन की तलाश और हरी झंडी ।

 आरसेलर मित्तल निपॉन (सूरत): बस्तर के लौह-अयस्क (Iron Ore) के गढ़ में भारी उद्योग लगाने की तैयारी ।

 टोरेंट फार्मास्यूटिकल्स और लाइस्टियम लाइफ साइंसेज (अहमदाबाद): दवा उद्योग के नाम पर राजधानी रायपुर के आसपास की महंगी जमीनों पर नजर ।

 सफायर सेमीकॉम (अहमदाबाद): इलेक्ट्रॉनिक सेमीकंडक्टर हब के लिए रायपुर में पैठ ।

 अंबुजा सीमेंट: छत्तीसगढ़ के लाइमस्टोन (चूना पत्थर) बेल्ट पर पूरी तरह काबिज होने की कवायद, जिस पर पहले ही अवैध वसूली के संगीन आरोप लग चुके हैं ।

3. मुर्दों के अंगूठे और फर्जी जनसुनवाई का 'सच्चा चिट्ठा'

विकास की इस चमचमाती कहानी का सबसे काला अध्याय है—'जमीन हड़पने का खेल'। मैदानी हकीकत यह है कि इन बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों को स्थापित करने के लिए जनसुनवाइयों का मजाक उड़ाया जा रहा है । कई इलाकों से रिपोर्ट आ रही है कि प्रशासन की मिलीभगत से फर्जी जनसुनवाइयां की गईं और जो ग्रामीण सालों पहले मर चुके हैं, उनके नाम पर अंगूठे लगवाकर उद्योगों के पक्ष में सहमति दिखा दी गई । सरकार पूरी तरह से उद्योगपतियों की गोद में बैठी नजर आ रही है ।

4. छत्तीसगढ़िया युवा: सिर्फ 'चपरासी और गार्ड' बनने की योग्यता?

डबल इंजन सरकार का सबसे बड़ा खोखला दावा है—'स्थानीय युवाओं को रोजगार']। कड़वा सच तो यह है कि स्किल डेवलपमेंट के नाम पर छत्तीसगढ़ के युवाओं को अपने ही जल-जंगल-जमीन पर महज चपरासी या सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी भी नसीब नहीं हो रही है ।

हाल ही में राज्य के उद्योगों में हुई जानलेवा दुर्घटनाओं ने इस सच से पर्दा उठा दिया कि मरने वाले अधिकांश मजदूर बाहरी राज्यों के थे। उद्योगपतियों की क्रूर नीति साफ है—स्थानीय लोगों को नौकरी पर मत रखो, क्योंकि अगर वे हक मांगेंगे तो 'आंदोलन' का खतरा रहेगा। इसलिए मजदूर भी बाहर से मंगाए जा रहे हैं ।

5. 'उलगुलान' की गूंज और सुलगती सियासत

इस गुजराती घुसपैठ के खिलाफ अब बस्तर और सरगुजा ही नहीं, बल्कि छुईखदान समेत छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों में भी 'जल-जंगल-जमीन' की रक्षा के लिए 'उलगुलान' (क्रांति) के नारे गूंजने लगे हैं ।

क्षेत्रीय दलों जैसे छत्तीसगढ़ समाज पार्टी, क्रांति सेना और जय जोहार पार्टी ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है । उनका सीधा आरोप है कि दिल्ली के आकाओं (नरेंद्र मोदी और अमित शाह) के दबाव में विष्णुदेव साय सरकार छत्तीसगढ़ की अस्मिता और संपदा को गुजरात के उद्योगपतियों के हाथों गिरवी रख रही है ।

[OUTRO/CONCLUSION: निष्कर्ष]

क्या छत्तीसगढ़ का नक्शा अब पूरी तरह बदलने वाला है? क्या छत्तीसगढ़िया जनता का सदियों से चला आ रहा शोषण अब कॉर्पोरेट गुलामी के एक नए युग में तब्दील हो जाएगा? 

अमित शाह का बस्तर आना और तत्काल बाद गुजराती कंपनियों को ताबड़तोड़ हरी झंडी मिलना, यह चीख-चीख कर गवाही दे रहा है कि लोकतंत्र की आड़ में कॉर्पोरेट लूट का एक विशाल नेटवर्क काम कर रहा है । पर्यावरण की तबाही और स्थानीय जनता को चपरासी बनाने की कीमत पर खड़ा किया जा रहा यह 'गुजरात मॉडल', छत्तीसगढ़ के सुनहरे भविष्य का निर्माण नहीं, बल्कि उसकी बर्बादी का नया दस्तावेज है।

छत्तीसगढ़ में 'Gen Z' का भविष्य खतरे में, वित्त मंत्री की ढिलाई और सरकार पर सीधा हमला

 छत्तीसगढ़ में 'Gen Z' का भविष्य खतरे में, वित्त मंत्री की ढिलाई और सरकार पर सीधा हमला



आज हम बात करने जा रहे हैं छत्तीसगढ़ के उस कड़वे सच की, जिसे छुपाने के लिए विज्ञापनों और बड़े-बड़े दावों का सहारा लिया जा रहा है।

जरा सोचिए—एक इंसान की संदिग्ध हालत में मौत हो जाती है... अब सवाल ये उठता है कि उसकी मौत कैसे हुई? क्या वो कोई हादसा था? क्या वो हत्या थी? या फिर उसे जहर देकर मार दिया गया? इन सारे रहस्यों से पर्दा उठाने की जिम्मेदारी होती है 'मेडिको लीगल संस्थान' की।

लेकिन ज़रा आँखें खोलकर इस रिपोर्ट को देखिए—छत्तीसगढ़ का इकलौता मेडिको लीगल संस्थान आज खुद वेंटिलेटर पर है! यहाँ विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है। और सबसे शर्मनाक बात ये है कि पिछले 25 साल से इस संस्थान में कोई नियमित भर्ती ही नहीं हुई है! यानी एक चौथाई सदी से भर्ती प्रक्रिया ठप्प है और फाइलें सरकारी दफ्तरों में धूल फांक रही हैं!"

वित्त विभाग और ओपी चौधरी पर तीखा हमला - 

: "अब सवाल उठता है कि आखिर इन फाइलों को रोककर किसने रखा है? किसके इशारे पर छत्तीसगढ़ के युवाओं का हक मारा जा रहा है?

भाइयों और बहनों, इस संस्थान में नियमित भर्तियों के लिए सिर्फ 84 लाख रुपए सालाना के अतिरिक्त खर्च का प्रस्ताव भेजा गया था। सरकारें इवेंट्स पर और वाहवाही लूटने में अरबों रुपए बहा देती हैं, लेकिन जब बात राज्य में न्याय व्यवस्था और युवाओं को रोजगार देने की आती है, तो वित्त विभाग को इस 84 लाख के प्रस्ताव पर 'आपत्ति' नजर आने लगती है!

और इस वित्त विभाग के मुखिया कौन हैं? हमारे वित्त मंत्री श्री ओपी चौधरी जी! वही ओपी चौधरी, जिन्हें केंद्र की मोदी सरकार और खुद प्रधानमंत्री मोदी बड़े गर्व से 'युवा आइकॉन' बनाकर पेश करते हैं। ज़रा विडंबना देखिए! एक तरफ मोदी जी मंचों से युवाओं को प्रेरणा देने की बात करते हैं, और दूसरी तरफ उन्हीं के चहेते 'युवा आइकॉन' मंत्री के विभाग में ही नियुक्तियों पर रोक लगी हुई है। क्या यही है युवाओं का विकास? क्या यही है 'युवा आइकॉन' का असली चेहरा?"

न्याय व्यवस्था से खिलवाड़ 

सोचिए कि इसके परिणाम कितने खतरनाक हैं। अगर राज्य में जाँच करने वाले पर्याप्त विशेषज्ञ ही नहीं होंगे, तो गंभीर मामलों में मौत की असली वजह कभी सामने कैसे आएगी?

इसका मतलब तो यही हुआ कि अपराधियों के हौसले बुलंद रहेंगे, क्योंकि उन्हें पता है कि यहाँ वैज्ञानिक जाँच करने के लिए डॉक्टर ही नहीं हैं। क्या छत्तीसगढ़ की जनता न्याय पाने के लिए भी तरसेगी? एक तरफ सरकार पारदर्शिता के दावे करती है, और दूसरी तरफ बजट की आड़ लेकर जरूरी नियुक्तियों को रोक दिया जाता है।"

Gen Z का आंदोलन और युवाओं का भविष्य 

और अब बात करते हैं उस सबसे अहम मुद्दे की, जिससे सत्ता में बैठे लोगों की नींद उड़ी हुई है—Gen Z (जेन जी)!

आज की नई पीढ़ी, यानी हमारे 'Gen Z' युवा, जो सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक अपने हकों के लिए आवाज़ उठा रहे हैं और एक नया युवा आंदोलन खड़ा कर रहे हैं। ये 'Gen Z' युवा अब सरकार के बहकावे में आने वाले नहीं हैं। ये रील्स बनाने वाले युवा अब सरकार से अपनी डिग्रियों, अपनी मेहनत और अपने भविष्य का हिसाब मांग रहे हैं।

जब 'Gen Z' युवा रात-दिन पढ़ाई करके परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, तो उन्हें क्या मिलता है? रुकी हुई नियुक्तियाँ, अटकी हुई फाइलें और वित्त विभाग की आपत्तियाँ!

मोदी जी जिसे 'युवा आइकॉन' बनाकर प्रमोट कर रहे हैं, वही 'युवा आइकॉन' आज इसी 'Gen Z' के भविष्य पर ताला लगाकर बैठे हैं। लेकिन सरकार एक बात कान खोलकर सुन ले—यह 'Gen Z' का दौर है। अगर आपने युवाओं को रोजगार नहीं दिया और नियुक्तियों पर लगी रोक तुरंत नहीं हटाई, तो यही 'Gen Z' का आंदोलन इस सत्ता की नींव हिलाकर रख देगा।"

अब वक्त आ गया है कि सिर्फ बयानों पर भरोसा न किया जाए, बल्कि सीधे सवाल पूछे जाएं।

अगर वित्त मंत्री ओपी चौधरी जी सच में युवाओं के हमदर्द हैं, तो वे सार्वजनिक रूप से जवाब दें कि 84 लाख के उस छोटे से प्रस्ताव पर रोक क्यों लगाई गई? विभागों में खाली पड़े पदों पर नियमित भर्तियां क्यों नहीं की जा रही हैं?

छत्तीसगढ़ का युवा अब चुप बैठने वाला नहीं है। अगर सरकार ने अपनी रोजगार विरोधी नीतियों को नहीं सुधारा, तो राज्य का हर 'Gen Z' युवा सड़क पर उतरकर अपना हक छीनना जानता है।


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गुरुवार, 5 नवंबर 2026

स्मृति ईरानी के व्यवहार को लेकर उठते सवाल

स्मृति ईरानी के व्यवहार को लेकर उठते सवाल 


 क्या छत्तीसगढ़ के नेता सिर्फ दिल्ली दरबार की जी-हुज़ूरी करने के लिए बचे हैं? क्या हमारे सूबे में बाहर से आए किसी नेता को इतना हक मिल जाता है कि वो हमारे ही चुने हुए प्रतिनिधियों का, हमारे जन-प्रतिनिधियों का सरेआम अपमान कर दे?

पिछले दिनों में छत्तीसगढ़ के राजनीतिक गलियारों में जो कुछ हुआ है, उसने राज्य के स्वाभिमान पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। भाजपा की एक बड़ी केंद्रीय नेता... अपने वही जाने-पहचाने 'तीखे तेवरों' के साथ दो दिन के दौरे पर छत्तीसगढ़ आईं।

लेकिन ये कोई सामान्य दौरा नहीं था यह दौरा था - तिरस्कार का! अपमान का! और घमंड के सरेआम प्रदर्शन का!

सोचिए... जो नेता स्वागत में मुस्कुराते हुए फूल देने आ रहे थे, उनका गुलदस्ता तक स्वीकार नहीं किया गया! जिस छत्तीसगढ़िया संस्कृति में 'गमछा' पहनाकर सम्मान देना परंपरा है, उस गमछे को ओढ़ने से इनकार कर दिया गया! हद तो तब हो गई जब स्वागत करने खड़े एक स्थानीय नेता को कैमरे के सामने डांटते हुए कह दिया गया— "अरे भाई! पहले अपना चश्मा उतारो!"

आज के इस रिपोर्ट में हम बात करेंगे— इस दो दिवसीय दौरे की पूरी इनसाइड स्टोरी की! बैठक के भीतर बंद कमरों में जो अपमान की पटकथा लिखी गई उसकी! और साथ ही याद दिलाएंगे कि कैसे गोवा से लेकर दिल्ली तक, विवादों से इस नेता का पुराना नाता रहा है।

चलिए सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं कि आखिर इन दो दिनों में हुआ क्या!

जैसे ही प्रभारी महोदया का विमान रायपुर एयरपोर्ट पर लैंड हुआ, कार्यकर्ताओं में उत्साह था। ढोल-नगाड़े थे, फूलों के गुलदस्ते थे, छत्तीसगढ़ी परंपरा के मुताबिक गमछा ओढ़ाकर स्वागत करने की तैयारी थी।

लेकिन जैसे ही नेताजी गाड़ी से उतरीं... नजारा ही बदल गया!

  1. पहला वाक्या: गुलदस्ते का अपमान कार्यकर्ता बड़ी उम्मीद और सम्मान के साथ फूलों का गुलदस्ता आगे बढ़ाते हैं... लेकिन नेताजी का हाथ आगे नहीं बढ़ता! वे रुखाई से फूल लेने से इनकार कर देती हैं। गुलदस्ता वही हवा में लटका रह जाता है और कार्यकर्ता का चेहरा उतर जाता है।
  2. दूसरा वाक्या: गमछे से परहेज छत्तीसगढ़ में गमछा सिर्फ कपड़े का टुकड़ा नहीं है दोस्तों, यह हमारी माटी की अस्मिता है, अतिथि देवो भव: का प्रतीक है। लेकिन जब स्थानीय नेता गमछा ओढ़ाने लगे, तो उन्होंने साफ मना कर दिया!
  3. तीसरा वाक्या: "चश्मा उतारो!" सबसे शर्मनाक बात तो तब हुई जब स्वागत लाइन में खड़े एक वरिष्ठ कार्यकर्ता/नेता की तरफ इशारा करके बड़े कड़क अंदाज़ में कहा गया— "सामने खड़े हो तो चश्मा उतारकर बात करो!" सोचिए, सरेआम सैकड़ों कैमरों और कार्यकर्ताओं के सामने इस तरह डांटना... क्या यह नेता का व्यवहार है या किसी तानाशाह का आदेश?


इसके बाद जब गाड़ियों का काफिला प्रदेश कार्यालय पहुंचा, तो वहां कार्यकर्ताओं को उम्मीद थी कि शायद अब मिज़ाज ठीक होगा। लेकिन असली क्लास तो बंद कमरों की बैठकों में लगनी बाकी थी!

बंद कमरे की बैठकें - समीक्षा या स्वाभिमान का हनन?


के अंदर जो हुआ, वो सुनकर आप हैरान रह जाएंगे!

जब प्रदेश स्तर के बड़े-बड़े नेता, मंत्री और पदाधिकारी टेबल के चारों तरफ बैठे थे, तो उम्मीद थी कि सरकार और संगठन के कामकाज पर स्वस्थ चर्चा होगी। लेकिन गूंज रही थी तो सिर्फ एक ही आवाज़— डांट-फटकार और झिड़की!

  • "तुम लोग काम क्या कर रहे हो?"
  • "संगठन ऐसे चलता है क्या?"
  • "समीक्षा रिपोर्ट कहां है?"

सवाल पूछना गलत नहीं है दोस्तों। संगठन में अनुशासन ज़रूरी है। लेकिन सवाल पूछने का अंदाज़ और नीयत क्या थी? प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो बैठक में किसी भी स्थानीय नेता को अपनी बात रखने का ढंग से मौका तक नहीं दिया गया। जो बोलने उठा, उसे बिठा दिया गया। जो रिपोर्ट दिखाने लगा, उसे कागज़ की कमियां बताकर खारिज कर दिया गया।

छत्तीसगढ़ के वो नेता, जिन्होंने सालों-साल माटी में पसीना बहाकर, संघर्ष करके पार्टी को खड़ा किया... वो उस कमरे में चुपचाप सिर झुकाए डांट सुनते रहे!

सवाल यह है: क्या छत्तीसगढ़ के स्थानीय नेताओं की कोई इज्जत नहीं है? क्या दिल्ली से आया कोई भी प्रतिनिधि हमारे नेताओं को इस तरह बेइज्जत करके चला जाएगा और सब खामोश रहेंगे?

विवादों से पुराना नाता - गोवा से दिल्ली तक का ट्रैक रिकॉर्ड

जो लोग इस नेता के इस व्यवहार से हैरान हैं, मैं उन्हें बता दूं... यह कोई पहली बार नहीं है! इनका विवादों और तीखे तेवरों से बहुत पुराना नाता रहा है।

आइए थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं।

आपको याद होगा गोवा का वो दौर! गोवा में जब ये ज़िम्मेदारी संभाल रही थीं, तब भी वहां के स्थानीय कैडर और पार्टी के पुराने नेताओं के साथ इनका भारी टकराव हुआ था। गोवा के स्थानीय नेताओं का आरोप था कि बाहरी नेतृत्व उनके स्वाभिमान को कुचल रहा है। वहां भी 'हाईकमान कल्चर' का ऐसा प्रदर्शन किया गया कि कई पुराने कार्यकर्ता किनारे कर दिए गए या बगावत पर उतर आए।

गोवा ही नहीं, केंद्र और संगठन के अन्य मामलों में भी— चाहे वो टीवी डिबेट्स हों, सार्वजनिक मंच हों या आंतरिक बैठकें— इनका रवैया हमेशा से 'माय वे या हाईवे' (My way or the highway) वाला रहा है।

यानी: "मैं जो कहूं वही सही, बाकी सब बेवकूफ!"

और आज वही 'गोवा मॉडल ऑफ इंसल्ट' छत्तीसगढ़ में लागू करने की कोशिश की जा रही है!

छत्तीसगढ़ियों का अपमान - आखिर कब तक?

अब आते हैं सबसे बड़े और कड़वे सवाल पर!

छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया... यह सिर्फ एक कहावत नहीं है। यह इस प्रदेश का चरित्र है। यहां के लोग सीधे, सरल और मेहमाननवाज़ होते हैं। लेकिन इस सरलता का मतलब यह कतई नहीं है कि आप हमारी सरलता को हमारी कमजोरी समझ लें!

ज़रा सोचिए:

  • जब आप एक छत्तीसगढ़िया नेता को सरेआम चश्मा उतारने को कहते हैं, तो आप सिर्फ उस व्यक्ति का नहीं, उसके पीछे खड़े हज़ारों कार्यकर्ताओं का अपमान करते हैं!
  • जब आप हमारे प्रेम से दिए गए फूलों और गमछे को ठुकराते हैं, तो आप छत्तीसगढ़ की परंपरा और सम्मान का अपमान करते हैं!
  • जब आप बंद कमरे में जनप्रतिनिधियों को स्कूली बच्चों की तरह डांटते हैं, तो आप उस जनता का अपमान करते हैं जिसने उन्हें चुनकर भेजा है!

छत्तीसगढ़ बीजेपी के नेताओं से भी मेरा एक सवाल है— "आख़िर आपकी खामोशी की वजह क्या है?" सत्ता और संगठन के पद इतने बड़े हो गए कि अपने ही स्वाभिमान की बलि चढ़ा दी जाए? क्या दिल्ली के सामने इतना डर है कि कोई एक शब्द बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा?

अगर आज आपने इस अपमान को चुपचाप सह लिया, तो कल कोई भी बाहर से आकर आपको ऐसे ही जलील करेगा!

राजनीति अपनी जगह है, पार्टियां अपनी जगह हैं। लेकिन राजनीति से ऊपर होता है— राज्य का सम्मान और कार्यकर्ताओं का आत्मसम्मान!

दो दिनों का यह दौरा खत्म हो गया। गाड़ियां रायपुर से दिल्ली उड़ गईं। लेकिन पीछे छोड़ गईं कई कड़वे सवाल, सहमे हुए कार्यकर्ता और एक दबा हुआ गुस्सा!

क्या इस तीखे तेवर से संगठन मजबूत होगा? या फिर यह गुस्सा चुनाव और आने वाले वक्त में पार्टी के लिए ही भारी पड़ने वाला है? यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

लेकिन आपकी इस पर क्या राय है? क्या प्रभारी महोदया का यह रवैया सही था? क्या किसी नेता का इस तरह स्वागत ठुकराना और डांटना जायज है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखिए!


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छत्तीसगढ़ के इन इलाकों में सुलग रही है बगावत की आग!

 

  • छत्तीसगढ़ बीजेपी में बड़ा भूचाल! 
  • संगठन में सब कुछ ठीक नहीं? छत्तीसगढ़ के इन इलाकों में सुलग रही है बगावत की आग!


छत्तीसगढ़ की सियासत में इन दिनों कुछ बहुत बड़ा पक रहा है! एक तरफ सरकार अपनी योजनाओं और दावों की पीठ थपथपा रही है, तो दूसरी तरफ सत्ताधारी दल यानी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के अंदर से ही बगावत के सुर अब दबी जुबान में नहीं, बल्कि खुलेआम सड़कों और सोशल मीडिया पर सुनाई देने लगे हैं।

साथियों, सवाल ये उठ रहा है कि क्या छत्तीसगढ़ बीजेपी में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है? क्या जिन कार्यकर्ताओं ने खून-पसीना बहाकर सरकार बनाई थी, आज वही खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं? और सबसे बड़ा सवाल—क्या रवि भगत जैसे युवा और फायरब्रांड नेता का पार्टी से किनारा कर लेना किसी बड़े भूचाल की आहट है?

आज के इस रिपोर्ट में हम चीर-फाड़ करेंगे छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जिलों की जमीनी हकीकत की—चाहे बात डोंगरगढ़ की हो, मोहला-मानपुर की हो, सारंगढ़ की हो या फिर लैलूंगा से लेकर रायपुर तक सुलग रही असंतोष की आग की। वीडियो बहुत दिलचस्प और महत्वपूर्ण होने वाला है, अंत तक बने रहिएगा।"

रवि भगत का इस्तीफा और संगठन की कार्यशैली पर सवाल

"शुरुआत करते हैं छत्तीसगढ़ बीजेपी के उस झटके से, जिसने राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया है। हम बात कर रहे हैं भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और कद्दावर नेता रवि भगत की।

रवि भगत ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपना इस्तीफा मंडल अध्यक्ष को भेजा, जो अब सोशल मीडिया पर आग की तरह वायरल हुआ है। हालांकि इस्तीफे में उन्होंने 'निजी कारणों' का हवाला दिया है, लेकिन राजनीतिक पंडित अच्छी तरह समझते हैं कि इसके पीछे की असल कहानी क्या है।

याद कीजिए, पिछले साल जुलाई 2025 में पार्टी संगठन ने रवि भगत को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। उनकी गलती क्या थी? उनकी गलती ये थी कि उन्होंने अपनी ही सरकार के सामने जनता और गांवों के विकास के लिए 'DMF फंड' (जिला खनिज न्यास) के इस्तेमाल को लेकर खुलकर सवाल खड़े किए थे। उन्होंने कहा था कि गांवों की सड़क और पानी जैसी बुनियादी समस्याओं के लिए इस फंड का सही जगह इस्तेमाल होना चाहिए। लेकिन जनहित की बात उठाने पर एक तेज-तर्रार युवा नेता को अनुशासन का पाठ पढ़ा दिया गया, नोटिस थमा दिया गया।

और नतीजा क्या निकला? आखिरकार एक जमीनी नेता को घुटन महसूस हुई और उसने पार्टी से नाता तोड़ लिया। राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा आम है कि रवि भगत का जाना सिर्फ एक बानगी है, आने वाले दिनों में कई और बड़े और नाराज नेता भी इस फेहरिस्त में शामिल हो सकते हैं।"

सारंगढ़ से लेकर डोंगरगढ़ और मोहला-मानपुर तक सुलगता असंतोष 

, मामला सिर्फ रवि भगत तक सीमित नहीं है। छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से ऐसी तस्वीरें सामने आ रही हैं जो बीजेपी के लिए खतरे की घंटी हैं।

अभी हाल ही में सारंगढ़ जिला भाजपा की बैठक का एक वाकया देखिए। बैठक में कार्यकर्ताओं का गुस्सा इस कदर फूटा कि जिला अध्यक्ष ज्योति पटेल और जिला प्रभारी शंकरलाल अग्रवाल की कार्यशैली पर खुलेआम सवाल खड़े किए गए। हालात तब और बिगड़ गए जब सारंगढ़ नगर मंडल अध्यक्ष जयप्रकाश बानी को पद से हटा दिया गया। इसके बाद कार्यकर्ताओं का सब्र टूट गया, बैठक के बाद जमकर नारेबाजी हुई और मांग उठी कि प्रभारी मंत्री और संगठन के प्रभारियों को तुरंत बदला जाए! सोचिए, एक पार्टी बैठक जहां रणनीति बननी चाहिए थी, वहां विरोध प्रदर्शन और नारेबाजी हो रही है।

यही हाल डोंगरगढ़ क्षेत्र और मोहला-मानपुर क्षेत्र का भी है। इन इलाकों से लगातार खबरें आ रही हैं कि स्थानीय कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के बीच एक भारी दूरी बनती जा रही है। कार्यकर्ताओं का दर्द यह है कि सरकार बनने के बाद उनकी पूछपरख बंद हो गई है। जिन लोगों ने विपक्ष में रहकर लाठियां खाईं, संघर्ष किया, आज सत्ता आने के बाद वे खुद को हाशिए पर पा रहे हैं। संगठन के बड़े फैसले ऊपर से थोपे जा रहे हैं, और जमीनी कार्यकर्ताओं की राय को पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है।"

छत्तीसगढ़ सरकार की नीतियां और नौकरशाही का दखल 

"आखिर इस बगावत की जड़ में क्या है? क्यों छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जिलों में पार्टी के भीतर ही घमासान मचा हुआ है?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इसके पीछे सरकार की कार्यशैली और नौकरशाही (ब्यूरोक्रैसी) का बढ़ता दखल है। कार्यकर्ताओं का सीधा आरोप है कि सरकार चलाने वाले नेता अब आम जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं से कटते जा रहे हैं। फाइलें अफसरों के दफ्तरों में घूमती हैं, और जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों या पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं की सुनवाई नहीं होती।

जब रवि भगत जैसे नेता ने डीएमएफ (DMF) फंड जैसे मुद्दों पर जनता की आवाज उठाई, तो उन्हें दबाने की कोशिश की गई। यह संदेश कार्यकर्ताओं में बहुत गलत गया। कार्यकर्ताओं के मन में यह सवाल उठ रहा है कि अगर पार्टी के भीतर ही सच बोलने पर पाबंदी लग जाएगी, जनता की बुनियादी बात रखने पर नोटिस थमा दिए जाएंगे, तो फिर आम आदमी की सुनवाई कहां होगी?"

लब्बोलुआब यह है कि छत्तीसगढ़ बीजेपी के अंदर सब कुछ अंदरखाने खौल रहा है। सारंगढ़ की खींचतान, डोंगरगढ़ और मोहला-मानपुर का असंतोष, और रवि भगत का पार्टी छोड़ना—ये महज छिटपुट घटनाएं नहीं हैं, बल्कि यह एक गहरी नाराजगी का संकेत हैं। यदि समय रहते शीर्ष नेतृत्व ने इस आंतरिक असंतोष को नहीं संभाला, कार्यकर्ताओं को सम्मान नहीं दिया और तानाशाही रवैये को खत्म नहीं किया, तो आने वाले समय में यह चिंगारी बड़ा रूप ले सकती है। चर्चा यह भी है कि कई अन्य असंतुष्ट नेता भी सही वक्त का इंतजार कर रहे हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल आपसे है—आपको क्या लगता है? क्या छत्तीसगढ़ में बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं की यह नाराज़गी आने वाले दिनों में पार्टी के लिए बहुत भारी पड़ने वाली है? क्या रवि भगत के बाद कुछ और बड़े चेहरे भी पार्टी छोड़ सकते हैं?

नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर बताइएगा।

उद्यानिकी विभाग का यह कच्चा चिट्ठा

 उद्यानिकी विभाग का यह कच्चा चिट्ठा 


छत्तीसगढ़ में किसानों को उन्नत खेती से जोड़ने और उनकी आय बढ़ाने के लिए चलाई जाने वाली योजनाएं अक्सर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं। ताजा मामला उद्यानिकी विभाग से जुड़ा है, जहाँ मसाला विस्तार योजना के तहत हल्दी और अदरक के बीज वितरण में लगभग 10 करोड़ रुपये की भारी-भरकम गड़बड़ी के आरोप सामने आए हैं। इस खुलासे के बाद से ही कृषि और उद्यानिकी महकमे में हड़कंप मच गया है। सवाल यह है कि आखिरकिसानों के नाम पर चल रही इन योजनाओं में मुनाफाखोरी और मनमानी का खेल कैसे चल रहा है? आइए, इस पूरी पड़ताल पर विस्तार से नजर डालते हैं।

25 करोड़ की योजना और 10 करोड़ की कथित गड़बड़ी - 

  • योजना का दायरा: छत्तीसगढ़ में मसाला विस्तार योजना के तहत कुल लगभग 25 करोड़ रुपये की लागत से 2,076 हेक्टेयर क्षेत्र में हल्दी और अदरक की खेती कराने का लक्ष्य रखा गया था।
  • वितरण व्यवस्था: इस योजना के तहत किसानों को बीज उपलब्ध कराने के लिए कुल 10 एजेंसियों को जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
  • अनियमितता के आरोप: सामने आई शिकायतों के मुताबिक, कायदे से अलग-अलग जिलों के लिए अलग एजेंसियां होनी थीं, लेकिन बीरगांव की मात्र एक ही एजेंसी ने रायपुर से लेकर कोंडागांव, बीजापुर और जगदलपुर समेत कई जिलों में बीज की धड़ल्ले से आपूर्ति कर दी। इस एक ही एजेंसी को कई जिलों का ठेका मिलने और सप्लाई करने से बीज की गुणवत्ता, उसकी कीमत और संपूर्ण वितरण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

विभाग की कार्यप्रणाली और सप्लाई को लेकर विवाद 

  • किसानों को लूटने का खेल: उद्यानिकी और कृषि विभाग में इससे पहले भी कई तरह के घपले-घोटाले सामने आते रहे हैं। जानकारों और स्थानीय सूत्रों का कहना है कि किसानों को मिलने वाली सब्सिडी और बीजों के वितरण में हमेशा से बिचौलियों और चुनिंदा ठेकेदारों को फायदा पहुँचाने का खेल चलता रहा है।
  • ठेके में देने के आरोप: विभाग के कामकाज और सप्लाई के मामलों को लेकर लगातार यह विवाद गहराता जा रहा है कि क्या मंत्री स्तर पर पूरे विभाग को चुनिंदा हाथों या ठेके पर दे दिया गया है? यही कारण है कि एक ही एजेंसी को नियमों को ताक पर रखकर इतने बड़े पैमाने पर सप्लाई का जिम्मा मिल गया।

जांच के दायरे और आगे की कार्रवाई 

  • कृषि मंत्री के निर्देश: मामले के तूल पकड़ने और गंभीर शिकायतें सामने आने के बाद कृषि मंत्री रामविचार नेताम के सख्त निर्देशों पर अब इस पूरे मामले की आधिकारिक जांच शुरू कर दी गई है।
  • उद्यानिकी संचालनालय की टीम: इस खुलासे के तुरंत बाद उद्यानिकी संचालनालय ने एक विशेष जांच टीम का गठन किया है।
  • जांच के मुख्य बिंदु:
    • यह पता लगाया जाएगा कि वास्तव में मैदान में किसानों को कितने बीज वितरित किए गए।
    • सप्लाई किए गए बीजों की गुणवत्ता तय मानकों के अनुरूप थी या नहीं।
    • सब्सिडी की वास्तविक राशि किन-किन हितग्राहियों के खातों या तक पहुँची है।
    • इसके लिए जिलों से हितग्राहियों कीवार जानकारी और उससे जुड़े तमाम मूल दस्तावेज तलब किए गए हैं।

साफ है कि मसाला विस्तार योजना के नाम पर हुआ यह खेल सिर्फ एक बानगी है कि कैसे कागजों पर योजनाएं बड़ी दिखती हैं, लेकिन जमीन पर व्यवस्था किस तरह चरमरा जाती है। अब सबकी निगाहें उद्यानिकी संचालनालय की जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं कि क्या इस मामले में संलिप्त बड़े अधिकारियों और एजेंसियों पर कोई ठोस कार्रवाई होती है या यह जांच भी फाइलों में ही दबी रह जाती है।