खाकी पर सुप्रीम सवाल — हिरासत में मौत और पुलिस महकमे की साख पर बट्टा
महज ₹100 की शराब जब्ती का मामला, ढाई साल तक एफआईआर दबाने की कोशिश और शीर्ष अदालत की कड़ी टिप्पणी: "छत्तीसगढ़ में न्याय मिलना मुश्किल"
जब अदालत के इतिहास में उठा अभूतपूर्व सवाल
किसी भी राज्य की कानून व्यवस्था की कमान उस प्रदेश के सबसे बड़े पुलिस अधिकारी यानी डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (DGP) के हाथों में होती है। लेकिन जब देश की शीर्ष अदालत (Supreme Court) भरी अदालत में किसी राज्य के सबसे बड़े पुलिस कप्तान की कार्यशैली और प्रशासनिक क्षमता पर सवाल उठा दे, तो मामला केवल एक पुलिसिया चूक का नहीं रह जाता, बल्कि पूरे शासन-प्रशासन की नियत पर बड़ा सवाल बन जाता है।
छत्तीसगढ़ में बिगड़ती कानून व्यवस्था, बढ़ते अपराध और पुलिस कस्टडी में मौतों को लेकर राजनीतिक गलियारों में पहले से ही घमासान मचा हुआ था। लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ के सामने आए एक कस्टोडियल डेथ (Custodial Death) के मामले ने पूरे महकमे को हिलाकर रख दिया है।
2. मामला: ₹100 की शराब और एक जान की कीमत
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत जनवरी 2024 में हुई थी [03:20]। छत्तीसगढ़ पुलिस ने एक 34 वर्षीय व्यक्ति को हिरासत में लिया। आरोपी पर महज ₹100 की अवैध शराब रखने का मामूली आरोप था [03:41]।
लेकिन गिरफ्तारी के मात्र तीन दिन भीतर ही उस व्यक्ति की तबीयत बिगड़ने का हवाला दिया गया और अस्पताल ले जाते समय उसकी मौत हो गई [03:53]। पुलिस का शुरुआती रुख हमेशा की तरह यही था कि यह एक स्वाभाविक मौत (Natural Death) है [04:02]।
3. न्यायिक जांच से पर्दाफाश: स्वाभाविक नहीं, जानलेवा हमला
पुलिस की इस थ्योरी को मृतक की पत्नी (लहराबाई) और उनकी बेटियों ने सिरे से खारिज कर दिया [04:13]। परिजन न्याय के लिए दर-दर भटकते रहे। जब प्रशासनिक दबाव बढ़ा, तो मामले की न्यायिक जांच के आदेश दिए गए [04:44]।
जब न्यायिक जांच की रिपोर्ट सामने आई, तो पुलिस की बनाई कहानी की धज्जियां उड़ गईं:
जांच रिपोर्ट का निष्कर्ष: रिपोर्ट में साफ दर्ज था कि व्यक्ति की मौत स्वाभाविक नहीं थी [04:54]।
मौत का कारण: सिर पर किसी भारी, ठोस या धारहीन हथियार (Blunt Weapon) से मारी गई गंभीर चोट के कारण मौत हुई थी [05:05]।
नियम के मुताबिक, इस रिपोर्ट के आते ही कस्टोडियल टॉर्चर का मामला दर्ज कर दोषी पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया जाना चाहिए था, लेकिन प्रशासनिक ढिलाई का आलम यह रहा कि घटना जनवरी 2024 की थी और एफआईआर जुलाई 2026 (लगभग ढाई साल बाद) दर्ज की गई [06:07]।
4. सुप्रीम कोर्ट का रुख: "राज्य में न्याय मिलना मुश्किल"
स्थानीय स्तर पर जब सुनवाई के सारे दरवाजे बंद महसूस हुए, तो पीड़ित परिवार ने सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया [06:28]।
मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत का पारा गर्म हो गया। कोर्ट ने पूछा कि ढाई साल तक एफआईआर दर्ज क्यों नहीं हुई? जब राज्य के डीजीपी से जवाब मांगा गया, तो उनकी दलील थी कि जांच रिपोर्ट से कोई 'संज्ञेय अपराध' स्पष्ट नहीं हो रहा था [07:04]।
इस दलील पर जस्टिस संदीप मेहता की तीखी टिप्पणी आई:
हमें यह दर्ज करते हुए खेद हो रहा है कि राज्य के डीजीपी पूरी तरह अयोग्य हैं... क्या सिर पर गंभीर चोट से हुई मौत अपराध की श्रेणी में नहीं आती?"
अदालत ने न केवल अवमानना (Contempt) की चेतावनी दी, बल्कि यह भी संकेत दिया कि चूंकि राज्य प्रशासन निष्पक्ष जांच करने में सक्षम नहीं दिखता, इसलिए मामले की जांच किसी स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी को सौंपी जानी चाहिए [08:06]।
5. राजनीतिक घेराबंदी और विपक्षी हमला
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद राज्य में राजनीतिक पारा चढ़ गया है [02:11]:
गृह मंत्री पर निशाना: विपक्षी दल (कांग्रेस) गृह मंत्री और प्रशासन से लगातार इस्तीफे की मांग कर रहे हैं [00:20]।
सड़कों पर विरोध: राजधानी से लेकर जिलों तक में बढ़ते अपराध, नशे के कारोबार और ढीली पुलिसिंग को लेकर पुतला दहन और जोरदार प्रदर्शन जारी हैं [02:24]।
पुराने मामलों की याद: अंबिकापुर के चर्चित मामलों में भी कस्टोडियल हिंसा को लेकर कोर्ट की ऐसी ही सख्त सख्त हिदायतें सामने आ चुकी हैं [08:45]।
6. निष्कर्ष: साख बचाने की चुनौती
यह मामला सिर्फ ₹100 की शराब जब्ती या एक लॉकेअप मौत तक सीमित नहीं है। यह सवाल उठाता है उस लोकतांत्रिक व्यवस्था पर जो आम नागरिकों की सुरक्षा के लिए बनी है। यदि कस्टडी में हुई हिंसा और मौतों पर पर्दा डालने की कोशिश होगी, तो आम जनता का भरोसा कानून से उठने लगेगा।
शीर्ष अदालत का यह रुख पूरे प्रशासनिक और पुलिस ढांचे के लिए एक बड़ा सबक है। अब देखना यह है कि इस करारी फटकार के बाद शासन स्तर पर क्या ठोस सुधारात्मक कदम उठाए जाते हैं और दोषियों पर क्या कार्रवाई होती है




