सोमवार, 26 अक्टूबर 2026

दुर्ग संभाग के 7 जिलों में भाजपा विधायकों का रिपोर्ट कार्ड! क्यों बढ़ रही है नाराजगी?


 दुर्ग संभाग के 7 जिलों में भाजपा विधायकों का रिपोर्ट कार्ड! क्यों बढ़ रही है नाराजगी?

छत्तीसगढ़ की राजनीति में इस वक्त भूचाल आया हुआ है, और केंद्र बना हुआ है प्रदेश का सबसे महत्वपूर्ण दुर्ग संभाग।

वही दुर्ग संभाग जिसमें दुर्ग, बालोद, बेमेतरा, कबीरधाम और राजनांदगांव जैसे बड़े सियासी गढ़ शामिल हैं। सूत्रों और अंदरूनी रिपोर्ट्स के मुताबिक, संघ (RSS) और भाजपा के हालिया सर्वे ने पार्टी हाईकमान की नींद उड़ा दी है। कहा जा रहा है कि संभाग के लगभग 60% विधायक यानी 10 में से 6 से ज्यादा चेहरे 'रेड ज़ोन' में चले गए हैं!  

जनता की नाराजगी, विधायकों का बड़बोलेपन, ट्रांसफर-पोस्टिंग के आरोप, और स्थानीय कार्यकर्ताओं की अनदेखी—ऐसे कई मुद्दे हैं जिनकी वजह से भाजपा के इस मजबूत किले में दरारें दिखने लगी हैं। आज के इस वीडियो में हम दुर्ग संभाग के एक-एक जिले के सियासी समीकरण और विधायकों के रिपोर्ट कार्ड का तीखा विश्लेषण करेंगे।

 दुर्ग संभाग—सियासत का पावर सेंटर और 'रेड ज़ोन' का संकट

दुर्ग संभाग को छत्तीसगढ़ की राजनीति का 'हार्टलैंड' कहा जाता है। दुर्ग शहर, भिलाई, वैशाली नगर, अहिवारा, साजा, बेमेतरा, कवर्धा, और राजनांदगांव—यह पूरा इलाका तय करता है कि रायपुर के सिंहासन पर कौन बैठेगा।  

लेकिन चुनाव जीतने के कुछ ही समय बाद जब संघ और संगठन के स्तर पर जमीनी फीडबैक लिया गया, तो जो बातें सामने आईं, वे चौंकाने वाली हैं:

 दूरी और अनुपलब्धता: कई विधानसभाओं में जनता की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि चुनाव जीतने के बाद विधायक क्षेत्र से गायब हैं या सिर्फ खास समर्थकों के घेरे में रहते हैं।

 कार्यकर्ताओं की नाराजगी: जिन्होंने दिन-रात एक करके चुनाव जिताया, आज उन्हीं जमीनी कार्यकर्ताओं को थानों और तहसीलों में तवज्जो नहीं मिल रही है।

 अफ़सरशाही का हावी होना: स्थानीय स्तर पर अफसरों का दबदबा बढ़ा है, जिससे विधायकों की पकड़ कमजोर दिख रही है।"  

जिलेवार विधायकों की 'कार्यशैली' और विवादों का कच्चा-चिट्ठा


"अब बात करते हैं कि अलग-अलग जिलों में किस तरह के मुद्दे और विवाद पार्टी के लिए गले की फांस बने हुए हैं।  

1. कबीरधाम / कवर्धा जिला (धार्मिक ध्रुवीकरण बनाम विकास के वादे):

कवर्धा सीट हमेशा से सुर्खियों में रही है। यहाँ हिंदुत्व और फायरब्रांड बयानों के दम पर चुनाव तो जीत लिया गया, लेकिन अब जनता पूछ रही है कि वादों के मुताबिक विकास काम और रोजगार का क्या हुआ? स्थानीय स्तर पर अंदरूनी गुटबाजी और बड़बोली बयानबाजी की वजह से यहाँ जनप्रतिनिधि के प्रति असंतोष का ग्राफ बढ़ा है।

2. साजा और बेमेतरा बेल्ट (जमीनी पकड़ की कमी):

साजा और आसपास के इलाकों में बड़ा राजनीतिक उलटफेर हुआ था। लेकिन विधायक बनने के बाद प्रशासनिक तालमेल की कमी और स्थानीय मुद्दों को विधानसभा या शासन स्तर पर मजबूती से न उठा पाने के कारण जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है।  

3. दुर्ग और भिलाई शहरी क्षेत्र (कार्यकर्ताओं की अनदेखी और निष्क्रियता):

दुर्ग शहर, भिलाई नगर और वैशाली नगर जैसे शहरी इलाकों में भाजपा विधायकों का रिपोर्ट कार्ड काफी मिला-जुला है। दुर्ग के शहरी क्षेत्रों में बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर, सड़कों के रखरखाव और नगर निगम के साथ तालमेल में भारी कमी देखी जा रही है। वहीं, पुराने निष्ठावान भाजपाइयों को दरकिनार कर 'नए पावर सर्कल्स' खड़े करने से कैडर में भारी रोष है।  

4. राजनांदगांव और बालोद बेल्ट (गुटबाजी और असंतोष):

राजनांदगांव संभाग का बड़ा सियासी गढ़ है। यहाँ दिग्गज नेताओं के प्रभाव के बावजूद स्थानीय विधायकों और निचले स्तर के जनप्रतिनिधियों के बीच तालमेल शून्य के बराबर है। निर्माण कार्यों में कमीशनखोरी और ट्रांसफर-पोस्टिंग के आरोपों ने भी विधायकों की छवि को नुकसान पहुँचाया है।"

संघ (RSS) का 'रेड ज़ोन' अलर्ट क्या रंग लाएगा?


"राजनीतिक पंडित अच्छी तरह जानते हैं कि आरएसएस (RSS) का फीडबैक कभी हवाई नहीं होता। संघ की टीमें सीधे आम जनता, चाय की दुकानों और गांव के चौपालों से फीडबैक लेती हैं। जब संघ किसी विधायक को 'रेड ज़ोन' में रखता है, तो इसके सीधे 3 परिणाम होते हैं:

1. टिकट कटने की लटकती तलवार: अगर विधायकों ने समय रहते अपना रवैया और काम करने का तरीका नहीं बदला, तो अगले चुनाव में टिकट कटना शत-प्रतिशत तय है।

2. संगठन का कड़ा रुख: संगठन अब इन विधायकों की कार्यशैली पर सीधी नजर रखेगा और जल्द ही सख्त हिदायतें जारी की जा सकती हैं।

3. विपक्ष का हमलावर होना: इस तरह की रिपोर्ट्स से कांग्रेस को बैठे-बिठाए एक बड़ा मुद्दा मिल गया है, जिससे आने वाले उपचुनावों और स्थानीय चुनावों में भाजपा को नुकसान हो सकता है।"

कुल मिलाकर दुर्ग संभाग में भाजपा के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है। चुनाव जीतना एक बात है, लेकिन जनता का विश्वास बनाए रखना दूसरी बात। अगर सत्ता के नशे में जनता और कार्यकर्ताओं की अनदेखी होगी, तो 'रेड ज़ोन' की यह रिपोर्ट हकीकत में तब्दील होने में देर नहीं लगेगी।

आप दुर्ग संभाग के किस जिले या विधानसभा से हैं? आपके क्षेत्र के विधायक का काम कैसा है—हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं!  

रविवार, 25 अक्टूबर 2026

छत्तीसगढ़ की सियासत में भूचाल - रामविचार नेताम और कांग्रेस विधायक के फार्म हाउस वाली बैठक का पूरा सच


 छत्तीसगढ़ की सियासत में भूचाल - रामविचार नेताम और कांग्रेस विधायक के फार्म हाउस वाली बैठक का पूरा सच

राजनीति में कब, क्या और कैसे हो जाए, इसका अंदाजा लगाना बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषकों के लिए भी नामुमकिन होता है। छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों कुछ ऐसा ही चल रहा है। सत्ता के गलियारों से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने सियासी भूचाल ला दिया है! बात हो रही है प्रदेश के वरिष्ठ मंत्री और कद्दावर नेता रामविचार नेताम की।

क्या वाकई बीजेपी के अपने ही सीनियर नेता हाशिए पर धकेले जा रहे हैं? क्या मंत्रिमंडल में फेरबदल की सुगबुगाहट सच साबित होने वाली है? और सबसे बड़ा सवाल—जब सूबे के कृषि मंत्री एक कांग्रेस विधायक के फार्म हाउस में जाकर करोड़ों के विकास कार्यों का ऐलान कर दें, तो बवाल तो मचना ही था! आज के इस वीडियो में हम इसी पूरे राजनीतिक ड्रामे की परतें खोलेंगे। वीडियो को अंत तक जरूर देखिएगा, क्योंकि राजनीति के इस अंदरखाने की कहानी आपने कहीं नहीं सुनी होगी!"

मुख्य घटना - कांग्रेस विधायक के फार्म हाउस पर क्या हुआ?

तो चलिए, शुरुआत करते हैं हालिया घटनाक्रम से। मामला है राजनांदगांव और डोंगरगांव इलाके का। प्रदेश के कृषि मंत्री रामविचार नेताम गुरुवार को राजनांदगांव के दौरे पर थे। मां बम्लेश्वरी मंदिर में दर्शन के बाद वे सीधे पहुंचे डोंगरगांव के आलीवारा गांव।

अब यहाँ ट्विस्ट देखिए! आलीवारा गांव का यह फार्म हाउस किसी और का नहीं, बल्कि कांग्रेस विधायक दलेश्वर साहू का है! मंत्री जी इस फार्म हाउस में पहुंचे और वहाँ कांग्रेस पार्टी के सरपंचों की मौजूदगी में करोड़ों रुपये के विकास कार्यों की धुआँधार घोषणाएं कर डालीं। इतना ही नहीं, वहाँ संगोष्ठी के दौरान किसानों के लिए 'लीफ एनालिसिस मशीन' लगाने की भी घोषणा कर दी गई। भई, कांग्रेस विधायक के घर जाकर बीजेपी सरकार के मंत्री का इस तरह मेहरबान होना, सियासी गलियारों में चर्चा का विषय तो बनेगा ही!"

बीजेपी कार्यकर्ताओं में बगावत और नाराजगी 

"लेकिन असली कहानी इसके बाद शुरू होती है। इस पूरे दौरे की भनक स्थानीय बीजेपी संगठन, यानी डोंगरगांव और मुसरा बीजेपी मंडल के नेताओं को थी ही नहीं! सोचिए, पार्टी का एक सीनियर मंत्री जा रहा है, कांग्रेस विधायक के इलाके में बैठक कर रहा है, और स्थानीय बीजेपी कार्यकर्ताओं या पदाधिकारियों को इसकी कानोकान खबर तक नहीं होती।

नतीजा क्या हुआ? स्थानीय बीजेपी नेताओं और पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष दिनेश गांधी का गुस्सा फूट पड़ा। कार्यकर्ताओं ने सीधे प्रदेश अध्यक्ष किरणदेव से इसकी लिखित शिकायत कर दी है! उनका कहना है कि जब वे मंत्री से मिलने या विकास कार्यों के आवेदन देने गए, तो कथित तौर पर उन्हें यह कहकर लौटा दिया गया कि मंत्री जी सिर्फ 'फसल देखने आए हैं'। अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं को साइडलाइन कर कांग्रेस विधायक के क्षेत्र में करोड़ों बांटना, भाजपाइयों को हज़म नहीं हो रहा है। इसे लेकर पार्टी के भीतर सुगबुगाहट तेज हो गई है कि आखिर ये सब चल क्या रहा है?"

रामविचार नेताम की नाराजगी और 'खुला मोर्चा' 

"अब जरा इसके राजनीतिक बैकग्राउंड पर आते हैं। रामविचार नेताम पार्टी के वरिष्ठ और कद्दावर नेता हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से जिस तरह के किस्से सामने आ रहे हैं, उससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि सब कुछ ठीक नहीं है।

याद कीजिए पेंड्री जेम्स एंड ज्वेलरी पार्क का मामला! नेताम ने सीधे कलेक्टर को चिट्ठी लिखकर अपनी नाराजगी जाहिर की थी। इसके अलावा, सड़कों के मुद्दे पर PWD अधिकारियों के निलंबन का मामला भी खूब चर्चा में रहा। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि सीनियर नेताओं को जिस तरह से कथित तौर पर साइडलाइन करने की कोशिश हो रही है और मंत्रिमंडल फेरबदल में उनके पत्ते काटने की चर्चाएं हैं, उसके बाद से रामविचार नेताम ने मानो खुला मोर्चा खोल दिया है। क्या यह घटना उसी नाराजगी का एक नया एपिसोड है?"

विधायक दलेश्वर साहू का पक्ष 

"इस पूरे विवाद पर जब कांग्रेस विधायक दलेश्वर साहू से बात की गई, तो उनका कहना था कि कृषि मंत्री किसानों के उत्पादक समूह का कामकाज देखने और फसल की स्थिति का जायजा लेने आए थे। उन्होंने किसानों की समस्याएं सुनीं और उनके समाधान का भरोसा भी दिया। विधायक के मुताबिक, यह पूरी मुलाकात किसानों के हित में थी।

लेकिन सियासत में हर चीज के दो मायने होते हैं। एक तरफ जहां कांग्रेस इसे किसानों की भलाई बता रही है, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी के भीतर ही यह बड़ा सिरदर्द बन गया है कि आखिर पार्टी के वरिष्ठ मंत्री अपने ही संगठन को बिना बताए विपक्षी दल के विधायक के गढ़ में इतनी बड़ी घोषणाएं कैसे कर सकते हैं?"

 छत्तीसगढ़ की यह सियासी पिच अब काफी दिलचस्प हो चुकी है। क्या रामविचार नेताम का यह कदम पार्टी हाईकमान के लिए कोई संदेश है? क्या आने वाले दिनों में मंत्रिमंडल में कोई बड़ा फेरबदल देखने को मिलेगा?

आपकी इस पूरे मामले पर क्या राय है? नीचे कमेंट बॉक्स में हमें जरूर बताएं।

शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

अनुदान प्राप्त शिक्षकों की पेंशन पर सत्ता का चाबुक

 


अनुदान प्राप्त शिक्षकों की पेंशन पर सत्ता का चाबुक 

छत्तीसगढ़ में इस वक्त एक ऐसा मुद्दा गर्म हो चुका है जिसने सरकार, विपक्ष और हजारों बुजुर्ग रिटायर्ड प्रोफ़ेसर्स को आमने-सामने खड़ा कर दिया है!

इमेजिन कीजिए, आपने अपनी पूरी जिंदगी—30-40 साल—छात्रों का भविष्य बनाने में लगा दिए। आप रिटायर हुए, और आपको पिछले कई दशकों से पेंशन मिल रही है। लेकिन अचानक एक दिन एक सरकारी आदेश आता है और कहता है—"आपकी पेंशन और ग्रेच्युटी तत्काल प्रभाव से बंद की जाती है!"

जी हां, बिल्कुल सही सुना आपने! छत्तीसगढ़ के अनुदान प्राप्त अशासकीय महाविद्यालयों (Aided Private Colleges) के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर्स और कर्मचारियों के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है।


आइए पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं।

छत्तीसगढ़ के उच्च शिक्षा विभाग ने एक आदेश जारी किया है—आदेश क्रमांक ESTB/18649/2026/38-2, दिनांक 01/09/2026। इस आदेश के जरिए उन्होंने 12.10.2010 के उस पुराने आदेश को निरस्त कर दिया है जिसके तहत इन रिटायर्ड प्रोफ़ेसर्स को पिछले 40 सालों से पेंशन और ग्रेच्युटी का लाभ मिल रहा था।

आदेश आते ही मानो भूकंप आ गया! यह फैसला उन हजारों पेंशनर्स के लिए किसी झटके से कम नहीं है, जिनमें से कई बुजुर्ग प्राध्यापक 70, 80 और 90 साल की उम्र के हैं। उनकी दवाइयों का खर्चा, उनका जीवन-यापन सब इसी पेंशन पर निर्भर था।

इस फैसले के खिलाफ सबसे पहले अनुदान प्राप्त शिक्षकों ने मोर्चा खोला और प्रेस कॉन्फ्रेंस (पत्रकार वार्ता) करके अपना विरोध दर्ज करवाया। उनका कहना है कि यह उनके साथ घोर अन्याय है.

लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती! इस मुद्दे ने अब जोरदार सियासी रूप ले लिया है।

एक तरफ कांग्रेस के पूर्व विधायक विकास उपाध्याय ने सरकार के खिलाफ सीधे मोर्चा खोल दिया है और इस फैसले को रिटायर्ड कर्मचारियों के साथ धोखा बताया है।

लेकिन सबसे बड़ा ट्विस्ट तब आया जब इस मामले में भाजपा के वरिष्ठ नेता और रायपुर लोकसभा सांसद बृजमोहन अग्रवाल की एंट्री हुई!

जी हां, बृजमोहन अग्रवाल ने 1 अक्टूबर 2026 को सीधे मुख्यमंत्री जी को एक पत्र लिखा है। उन्होंने अपने पत्र में साफ लिखा है कि:

"जो प्राध्यापक 70, 80 और 90 वर्ष की आयु के हैं, उनका जीवन-यापन और चिकित्सा संबंधी आवश्यकताएं इसी पेंशन पर निर्भरहैं। चार दशकों से चली आ रही पेंशन को अचानक बंद करना उनके आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा पर गंभीर संकट है।"

बृजमोहन अग्रवाल ने मुख्यमंत्री से गुजारिश की है कि 1 सितंबर 2026 के इस आदेश पर तत्काल रोक लगाई जाए और पेंशन-ग्रेच्युटी व्यवस्था को पूर्ववत (जैसे पहले थी) बहाल किया जाए।


अब सवाल यह उठता है:

  1. क्या 40 साल से मिल रही पेंशन को एक आदेश से अचानक रोकना न्यायोचित है?
  2. जो रिटायर्ड शिक्षक आज 80-90 साल की उम्र में हैं, वे इस उम्र में आर्थिक संकट का सामना कैसे करेंगे?
  3. जब अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ सांसद सरकार के फैसले पर सवाल उठा रहे हैं, तो क्या उच्च शिक्षा विभाग अपना यह आदेश वापस लेगा?

यह मामला अब सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं रहा, बल्कि एक बेहद संवेदनशील मानवीय विषय बन चुका है।

आप लोगों का इस पूरे मामले पर क्या कहना है? क्या अनुदान प्राप्त शिक्षकों की पेंशन बहाल होनी चाहिए? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।

बस्तर में यूसीसी का बवाल और दूसरे समाजों की नाराजगी

 



बस्तर में यूसीसी का बवाल और दूसरे समाजों की नाराजगी



देश में इन दिनों जिस एक मुद्दे पर सबसे ज्यादा सियासी गर्मी और वैचारिक उबाल है, वह है— समान नागरिक संहिता (UCC)। लेकिन इस कानून के नाम पर छत्तीसगढ़ के बस्तर से लेकर राजधानी रायपुर तक और देश के अलग-अलग हिस्सों में जो सुगबुगाहट शुरू हुई है, उसने अब एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक घमासान का रूप ले लिया है।

कल जगदलपुर कलेक्ट्रेट में जो कुछ हुआ, उसने साफ कर दिया है कि यूसीसी की यह राह इतनी आसान नहीं होने वाली है। एक तरफ बस्तर में सर्व आदिवासी समाज ने कलेक्ट्रेट का घेराव कर दिया, जमकर हंगामा हुआ, अधिकारियों से तीखी नोंकझोक हुई; तो वहीं दूसरी तरफ सिर्फ आदिवासी समाज ही नहीं, बल्कि कई अन्य सामाजिक संगठन और वर्ग भी इस बात को लेकर सुलग रहे हैं कि आखिर इस कानून के दायरे और रूपरेखा पर सरकार का रुख साफ क्यों नहीं है?

आज के इस रिपोर्ट में हम विस्तार से समझेंगे कि आखिर जगदलपुर में ऐसा क्या हुआ कि आदिवासियों को सड़कों पर उतरना पड़ा? सिर्फ बस्तर ही नहीं, बल्कि दूसरे समाज के लोग क्यों इस प्रक्रिया से नाराज चल रहे हैं? और इस पूरे मामले की सियासी और कानूनी परतें क्या कहती हैं? रिपोर्ट को  आखिर तक बने पढ़ियेगा क्योंकि आज हम इसकी हर एक बारीक सच्चाई से पर्दा उठाने वाले हैं।"

जगदलपुर कलेक्ट्रेट में हंगामा— आखिर क्यों भड़का आदिवासी समाज?


"शुरुआत करते हैं बस्तर के जिला मुख्यालय जगदलपुर से। छत्तीसगढ़ सरकार ने यूसीसी का ड्राफ्ट और उस पर सुझाव लेने के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति बनाई है। इसी सिलसिले में जगदलपुर कलेक्ट्रेट के प्रेरणा हॉल में एक परामर्श बैठक बुलाई गई थी।

सरकार का दावा था कि इसमें तमाम वर्गों और समुदायों के लोगों को बुलाकर उनकी राय ली जाएगी। लेकिन असली खेल यहीं से शुरू होता है!

बैठक शुरू होने से पहले ही जब सर्व आदिवासी समाज के कई प्रमुख प्रतिनिधियों को यह पता चला कि उनका नाम आमंत्रण सूची (Invitation List) में है ही नहीं, तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। समाज के लोगों का कहना था कि बस्तर के मूल मालिकों और आदिवासियों को ही जब इस अहम चर्चा से बाहर रखा जाएगा, तो फिर यह बैठक किसके इशारे पर हो रही है?

देखते हीदेखते कलेक्ट्रेट परिसर रणक्षेत्र में बदल गया। सर्व आदिवासी समाज के लोग बड़ी संख्या में बाहर इकट्ठा हो गए और सरकार के खिलाफ जोरदार नारेबाजी शुरू कर दी। हालात इतने तनावपूर्ण हो गए कि प्रशासनिक अधिकारियों को खुद बीच-बचाव करना पड़ा और भारी गहमागहमी के बाद कुछ प्रतिनिधियों को अंदर जाने की अनुमति मिली।"

सात बड़े सवाल और आदिवासियों का कड़ा ऐतराज

अंदर बैठक तो जैसे-जैसे शुरू हुई, लेकिन असली विरोध तब सामने आया जब आदिवासी समाज ने सरकार के प्रतिनिधियों के सामने अपने सात तीखे सवाल रख दिए।

आदिवासियों का सीधा कहना है कि हमारे लिए संविधान की पांचवीं अनुसूची (5th Schedule) है, हमारे पास पेसा कानून (PESA Act) है, और हमारे अपने पारंपरिक रूढ़िगत कानून (Customary Laws) हैं जो सदियों से हमारी संस्कृति, हमारे जल, जंगल और जमीन की रक्षा करते आ रहे हैं।

समाज के नेताओं ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि:

  1. संविधानिक सुरक्षा का हनन: यदि यूसीसी यानी समान नागरिक संहिता लागू होती है, तो क्या हमारी रूढ़िगत परंपराएं, विवाह और उत्तराधिकार के स्थानीय नियम सुरक्षित रह पाएंगे?
  2. सांस्कृतिक पहचान पर खतरा: आदिवासी समुदाय अपनी पहचान को लेकर बहुत संवेदनशील है। उनका साफ कहना है कि देश में एक कानून का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि आदिवासियों की सदियों पुरानी विशिष्ट संस्कृति को मिटा दिया जाए।
  3. नाम बदलने पर भी रोष: सिर्फ यूसीसी ही नहीं, बल्कि बैठक के दौरान जब 'आदिम जाति कल्याण विभाग' का नाम बदलकर 'जनजाति कल्याण विभाग' किए जाने का मुद्दा उठा, उस पर भी समाज ने अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। उनका मानना है कि इस तरह के बदलावों के पीछे एक सोची-समझी नीति है जो उनकी पहचान को प्रभावित कर सकती है।

यही वजह है कि सर्व आदिवासी समाज ने मांग की है कि आदिवासी समुदायों को यूसीसी के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा जाए।"

सिर्फ आदिवासी ही नहीं... दूसरे समाज और वर्ग भी क्यों हैं नाराज?


"अब जरा इस दायरे को थोड़ा और बड़ा करते हैं। क्या सिर्फ आदिवासी समाज ही यूसीसी के इस पूरे प्रोसेस से नाराज है?

बिल्कुल नहीं! अगर आप छत्तीसगढ़ के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों की थाह लें, तो पाएंगे कि सिर्फ आदिवासी ही नहीं, बल्कि कई अन्य समुदाय और वर्ग भी अंदर ही अंदर इस बात को लेकर बेहद खफा हैं।

  • पारंपरिक और धार्मिक समुदायों की चिंताएं: चाहे अन्य पारंपरिक समुदाय हों या विभिन्न धार्मिक अल्पसंख्यक वर्ग, हर किसी के मन में यह डर बैठा हुआ है कि एक देश-एक कानून का यह मॉडल उनकी व्यक्तिगत पारिवारिक कानूनों (Personal Laws), रीति-रिवाजों और आस्था पर कुठाराघात साबित हो सकता है।
  • संवादहीनता का आरोप: विभिन्न सामाजिक संगठनों का यह भी आरोप है कि सरकार जिस जल्दबाजी में यह परामर्श बैठकें कर रही हैं, उसमें पारदर्शिता की कमी है। जनता के बीच स्पष्ट रूप से यह बात नहीं रखी जा रही है कि इस ड्राफ्ट का आम नागरिकों के अधिकारों पर क्या असर पड़ेगा।
  • राजनीतिक सुगबुगाहट: जानकारों का मानना है कि इस तरह के कानून जब बिना जमीनी आम सहमति के आगे बढ़ाए जाते हैं, तो समाज में दूरियां बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है। छत्तीसगढ़ में चूंकि अलग-अलग क्षेत्रों की अपनी सामाजिक और भौगोलिक विविधताएं हैं, इसलिए हर वर्ग यह पूछ रहा है कि क्या हमारी स्थानीय विशिष्टताओं को नजरअंदाज कर दिया जाएगा?"

 सियासी नफे-नुकसान का खेल और आगे क्या?


"अब सवाल यह उठता है कि इस पूरे ड्रामे के पीछे की सियासत क्या है?

एक तरफ सरकार यह दलील दे रही है कि यूसीसी से देश में एकरुपता आएगी और सभी नागरिकों को समान अधिकार मिलेंगे। वहीं दूसरी तरफ विपक्ष और आदिवासी संगठन इसे सीधे तौर पर संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची पर हमला बता रहे हैं।

छत्तीसगढ़ की राजनीति में बस्तर हमेशा से एक संवेदनशील और निर्णायक क्षेत्र रहा है। ऐसे में आदिवासी समाज को नाराज करके कोई भी राजनीतिक दल बड़ा जोखिम नहीं उठाना चाहेगा। जगदलपुर कलेक्ट्रेट का यह हंगामा महज़ एक छोटी सी बानगी है, आने वाले दिनों में अगर सरकार ने इस पर स्थिति स्पष्ट नहीं की, तो यह आंदोलन पूरे राज्य में फैल सकता है।"


"तो कुल मिलाकर स्थिति यह है कि यूसीसी का यह मुद्दा अब सिर्फ कागजों पर चर्चा का विषय नहीं रहा, बल्कि यह सड़कों पर उतर चुका है। आदिवासियों का आक्रोश और अन्य समाजों की सुलगती नाराजगी इस बात की गवाही दे रही है कि सरकार को हर कदम बहुत फूंक-फूंक कर रखना होगा।

आपकी इस पूरे मामले पर क्या राय है? क्या आपको लगता है कि आदिवासियों को यूसीसी के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए? या फिर देश में वाकई एक कानून की सख्त जरूरत है?

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026

57,000 का वादा, 3,000 पर कैंची! छत्तीसगढ़ के शिक्षकों के भविष्य के साथ ये कैसा खिलवाड़?

 57,000 का वादा, 3,000 पर कैंची! छत्तीसगढ़ के शिक्षकों के भविष्य के साथ ये कैसा खिलवाड़? | CG Teacher Bharti

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आज मैं किसी राजनीतिक पार्टी की तारीफ करने नहीं बैठा हूं, ना ही किसी के एजेंडे को आगे बढ़ाने आया हूं। आज बात होगी छत्तीसगढ़ के उन लाखों युवाओं की, जिनके सपनों का गला घोंटा जा रहा है, जिनके सब्र का इम्तिहान लिया जा रहा है और जिनके भविष्य के साथ हर सरकार ने सिर्फ और सिर्फ खिलवाड़ किया है।

साथियों, जरा याद कीजिए वो दिन... चुनाव से पहले बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगे थे, मंचों से दहाड़ कर 'मोदी की गारंटी' दी गई थी कि छत्तीसगढ़ में सत्ता में आते ही 57,000 शिक्षकों की भर्ती की जाएगी। युवाओं की आंखों में एक उम्मीद चमकी थी कि चलो, अब बेरोजगारी का अंधेरा छटेगा, हमारे पढ़े-लिखे युवा स्कूलों में पढ़ाएंगे।

लेकिन सरकार बदली, चेहरे बदले, और वादों का क्या हुआ? वो वादे हवा हो गए! आज स्थिति ये है कि 57 हजार का वो बड़ा आंकड़ा सिमटते-सिमटते सिर्फ 2,900 के आसपास के पदों पर आ पहुंचा और अब उस पर भी हाईकोर्ट का ग्रहण लग गया है, रोक लग गई है! आखिर कब तक छत्तीसगढ़ का युवा इस सिस्टम की चक्की में पिसता रहेगा? आज इसी पर पर्दाफाश करेंगे, वीडियो को अंत तक देखिएगा।"


"आइए जरा सिलसिलेवार तरीके से याददाश्त तरोताजा करते हैं कि छत्तीसगढ़ के बेरोजगार युवाओं के साथ पिछले कुछ सालों में क्या-क्या खेल खेला गया है।

  • सबसे पहले, जब चुनाव का समय आया, तो बीजेपी ने सत्ता में आने से पहले पूरे 57,000 शिक्षकों की बंपर भर्ती करने की 'मोदी की गारंटी' दी थी। युवाओं को लगा कि चलो, अब सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के खाली पड़े हजारों पद भर जाएंगे।
  • इसके बाद, जब चुनाव सिर पर थे और सियासी माहौल गर्म था, तब तत्कालीन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल साहब ने बयान दिया कि सरकार 35,000 शिक्षकों की भर्ती करने जा रही है। युवाओं को एक बार फिर उम्मीद की एक किरण दिखाई दी।
  • लेकिन भाई, जैसे ही चुनाव बीते, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जी की सरकार ने इस आंकड़े को और सिकोड़ दिया और बात सिर्फ 5,000 शिक्षक भर्ती पर आकर टिक गई।
  • और हद तो तब हो गई जब इन वादों के नाम पर ऊंट के मुंह में जीरे की तरह सिर्फ 2,900 कुछ पदों के लिए ही भर्ती निकाली गई! यानी 57,000 का सपना दिखाने वाली सरकार ने ऊंट के मुंह में जीरा देकर इतिश्री कर ली।"

भर्ती पर कानूनी ब्रेक और युवाओं का आक्रोश - 

"चलो भाई, मान लिया कि सरकार ने 57 हजार के बजाय 3 हजार के करीब ही पद निकाले, कम से कम उन युवाओं का तो भला होता जो सालों से लाइब्रेरी और कमरों में दिन-रात एक करके तैयारी कर रहे हैं। लेकिन नहीं! सरकार की नीयत में खोट कहें या प्रशासनिक लापरवाही... अब इन बचे-कुचे पदों पर भी हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है!

जरा सोचिए, उस युवा पर क्या बीत रही होगी जिसने दिन-रात मेहनत करके परीक्षा पास की या फॉर्म भरा, और अब उसे पता चलता है कि भर्ती प्रक्रिया पर ब्रेक लग गया है!

  • मिली जानकारी के अनुसार, छत्तीसगढ़ में सहायक शिक्षक और शिक्षक भर्ती को लेकर ये बड़ा संकट खड़ा हुआ है।
  • मामला ये है कि भर्ती विज्ञापन में दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने इस भर्ती परीक्षा पर रोक लगा दी है और राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
  • खास तौर पर यह पूरा मामला पूर्ण दृष्टिबाधित अभ्यर्थियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलने से जुड़ा हुआ है।

अरे भाई! सरकार की नीतियां ऐसी क्यों होती हैं कि हर बार विज्ञापन निकलते ही कोर्ट में मामला अटक जाए? क्या सरकार के नुमाइंदे, उनके कानूनी सलाहकार आंखें बंद करके बैठे रहते हैं? क्या जानबूझकर ऐसे पेंच छोड़े जाते हैं ताकि भर्तियां अटकी रहें और युवाओं की उम्र निकलती रहे? आज छत्तीसगढ़ का युवा गुस्से से उबल रहा है। उसकी आंखों में आंसू हैं और दिल में सरकार के प्रति भयंकर आक्रोश है।"

सरकार से तीखे सवाल

"आज मैं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जी से, शिक्षा विभाग के मंत्रियों से और तमाम जिम्मेदारों से सीधे तौर पर पूछना चाहता हूं—

  1. कहाँ गई वो 'मोदी की गारंटी' जिसमें 57,000 शिक्षकों का वादा किया गया था?
  2. क्या युवाओं के साथ सिर्फ चुनावी जुमलेबाज़ी करने के लिए ही सत्ता हासिल की गई थी?
  3. अगर कानूनी अड़चनें आनी थीं, तो विभाग पहले से सतर्क क्यों नहीं था? क्यों हर बार युवाओं के भविष्य की बलि दी जाती है?

युवाओं का धैर्य अब जवाब दे चुका है। डिग्रियां हाथ में लिए दर-दर की ठोकर खाते इन बेरोजगारों का गुस्सा अब सड़कों पर फूटने लगा है। अगर सरकार ने जल्द से जल्द हाईकोर्ट में मजबूती से पक्ष रखकर इस कानूनी अड़चन को दूर नहीं किया और इन पदों पर पारदर्शी तरीके से भर्ती प्रक्रिया शुरू नहीं की, तो आने वाले समय में ये युवा सरकार को इसका करारा जवाब देंगे।

साथियों, आपकी इस पूरी स्थिति पर क्या राय है? क्या वाकई सरकार युवाओं को धोखा दे रही है? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखिए, ज्यादा से ज्यादा शेयर कीजिए ताकि यह आवाज़ बहरे कानों तक पहुँच सके।