छत्तीसगढ़ में 'ऑपरेशन साइडलाइन': क्या अब केदार कश्यप की बारी है?
छत्तीसगढ़ की राजनीति में इस समय एक ऐसी 'अदृश्य सर्जिकल स्ट्राइक' चल रही है, जिसकी धमक से मंत्रालय से लेकर बस्तर के जंगलों तक सन्नाटा पसरा हुआ है!
सवाल सीधा है— क्या छत्तीसगढ़ बीजेपी के सीनियर दिग्गज नेताओं को एक-एक करके किनारे लगाया जा रहा है?
ज़रा इतिहास के पन्ने पलटिए। बृजमोहन अग्रवाल को दिल्ली की राजनीति में भेजकर राज्य से विदा कर दिया गया। रामविचार नेताम, अमर अग्रवाल और राजेश मूणत— जो रमन सरकार में पावर सेंटर हुआ करते थे, आज उनके पास वैसा रसूख नहीं बचा। और अब... अब निशाने पर कौन है?
राजनीतिक गलियारों की सुगबुगाहट पर यकीन करें, तो अब अगला नंबर कैबिनेट मंत्री केदार कश्यप का है!
चौंकिए मत! ये हम हवा-हवाई बात नहीं कर रहे हैं। जिस तरह से एक के बाद एक उनके सबसे वफादार ओएसडी (OSD) और पीए (PA) को रातों-रात हटाया गया है, जिस तरह से उनके खिलाफ विवादों की झड़ी लगी है— यह कोई इत्तेफाक नहीं है। यह एक वेल-प्लान्ड 'ऑपरेशन कट-टू-साइज' का हिस्सा दिख रहा है।
आज के इस स्पेशल वीडियो में हम जोड़ेंगे वो सारे तार... OSD की बर्खास्तगी से लेकर RDA जमीन विवाद, सर्किट हाउस थप्पड़ कांड और बस्तर के वन बैरियर तक। पूरा वीडियो ध्यान से देखिएगा, क्योंकि आज छत्तीसगढ़ पॉलिटिक्स का असली 'गेम' खुलने वाला है!
किसी भी मंत्री की सबसे मजबूत ढाल और उनकी आँख-कान होते हैं उनके OSD और PA। अगर सरकार को किसी मंत्री पर शिकंजा कसना होता है, तो सबसे पहले उनके इसी 'इनर सर्किल' को ध्वस्त किया जाता है।
केदार कश्यप के साथ ठीक यही हुआ:
1. पहला झटका: मंत्री जी के भरोसेमंद OSD सुनील तिवारी को अचानक आदेश जारी करके पद से हटा दिया गया।
2. दूसरा झटका: कुछ ही समय बाद उनके निज सहायक (PA) संकर्षण सिंह की संविदा सेवा अचानक समाप्त कर दी गई।
अब यहाँ एक बहुत बड़ा टेक्निकल पेंच समझिए! आमतौर पर मंत्रियों के साथ उनके निजी स्टाफ की नियुक्ति 'को-टर्मिनस' आधार पर होती है— यानी जब तक मंत्री पद पर हैं, उनका स्टाफ बना रहता है। लेकिन यहाँ मंत्री तो अपने पद पर बने हुए हैं, पर उनका पूराअमला एक-एक करके साफ किया जा रहा है!
मंत्रालय के गलियारों में चर्चा है कि यह केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है, यह सरकार का अपने ही मंत्री को सीधा और कड़ा संदेश है कि "आपकी हर गतिविधि पर पैनी नज़र है।"
स्टाफ हटाना तो सिर्फ शुरुआत थी, असली घेराबंदी हुई रायपुर विकास प्राधिकरण (RDA) की जमीन पुनर्पुनर्विन्यास (Land Readjustment Scheme) योजना में!
मामला क्या है?
विपक्ष का सीधा आरोप है कि केदार कश्यप की पत्नी से जुड़ी एक कंपनी— राधिका पैलेस प्राइवेट लिमिटेड को कचना की एक संकरी सड़क की जमीन के बदले सड्डू चौक पर मुख्य 150 फीट चौड़ी रोड पर करीब 20 करोड़ रुपये मूल्य का 23,327 वर्गफीट काकमर्शियल प्राइम प्लॉट अलॉट किया जा रहा है!
विपक्ष पूछ रहा है कि यह मेहरबानी क्यों? क्या यह 'वीआईपी ट्रीटमेंट' और पद का दुरुपयोग नहीं है?
और बात यहीं खत्म नहीं हुई! इस मामले में एक और ऐसा बखेड़ा खड़ा हुआ जिसने सबको चौंका दिया। बस्तर के सबसे बड़े आदिवासी चेहरों में से एक केदार कश्यप के परिवार से जुड़ी इस फाइल में जाति श्रेणी 'सामान्य' (General) दर्ज थी! हालाँकि RDA और सत्तापक्ष ने सफाई दी कि 'कंपनी की कोई जाति नहीं होती, इसलिए तकनीकी तौर पर सामान्य लिखा जाता है।' लेकिन राजनीतिक नुकसान तो हो चुका था! छवि को जो डेंट लगना था, वो लग
सर्किट हाउस 'थप्पड़ कांड' और बस्तर वन बैरियर की आग
विवादों की यह फेहरिस्त यहीं नहीं रुकती। केदार कश्यप लगातार अपनी बयानबाजी और विवादित घटनाओं के कारण सुर्खियों में रहे हैं।
1. जगदलपुर सर्किट हाउस थप्पड़ कांड: जगदलपुर के सर्किट हाउस में 20 साल से काम कर रहे एक चतुर्थ श्रेणी संविदा कर्मचारी ने मंत्री जी पर आरोप लगाया कि उन्होंने चाय-नाश्ता और कमरे के ताले को लेकर गालियां दीं, कॉलर पकड़ा और थप्पड़ मारे! संविदा कर्मचारी ने थाने में लिखित शिकायत तक दे दी। कांग्रेस ने इसे हाथों-हाथ लिया और मंत्री के इस्तीफे की मांग कर दी। भले ही मंत्री जी ने इसे झूठा बताया, लेकिन जनता के बीच संदेश गलत चला गया।
2. चित्रकूट व बस्तर वन बैरियर विवाद: वन मंत्री बनने के बाद बस्तर के चित्रकूट मार्ग पर स्थित वन बैरियर पर इमली, महुआ और स्थानीय व्यापारियों से अवैध वसूली की शिकायतें उठीं। विपक्ष और स्थानीय ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि मंत्री के संरक्षण में ये बैरियर 'उगाही के केंद्र' बन गए हैं।
पुरानी रमन सरकार के वक्त का वो "मुन्ना भाई MA परीक्षा कांड" (जहाँ उनकी पत्नी की जगह फर्जी परीक्षार्थी के बैठने का आरोप लगा था) आज भी लोगों के जेहन में ताजा है। यानी विवादों का एक पूरा पहाड़ खड़ा हो चुका है!
क्या यह 'सीनियर नेताओं का सफाया अभियान' है?
अब आइए सबसे अहम और बड़े सवाल पर— आखिर छत्तीसगढ़ बीजेपी में चल क्या रहा है?
दोस्तों, 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद जब छत्तीसगढ़ में नई सरकार बनी, तो हाईकमान का मैसेज बिल्कुल साफ था— 'न्यूलीडरशिप' यानी नई पीढ़ी को आगे लाना।
बृजमोहन अग्रवाल: रायपुर के सबसे कद्दावर नेता, जिन्हें सांसद बनाकर दिल्ली भेज दिया गया।
अमर अग्रवाल और राजेश मूणत: रमन सिंह के दौर के सबसे ताकतवर मंत्री, जिन्हें इस बार मंत्रिमंडल में जगह तक नहीं मिली।
रामविचार नेताम: सरगुजा के बड़े आदिवासी चेहरे, जिन्हें भी पावर सेंटर से दूर रखा गया।
और अब केदार कश्यप, जो बस्तर से आते हैं, स्व. बलिराम कश्यप के बेटे हैं और बस्तर में बीजेपी का सबसे बड़ा आदिवासी चेहरा माने जाते हैं।
जब किसी मंत्री का OSD हटाया जाता है, उनका PA हटाया जाता है, उनके विभागों और जमीनी फैसलों पर समीक्षा बैठा दी जाती है, और उनके पुराने-नए विवादों को हवा मिलने दी जाती है— तो राजनीति समझने वाले जानते हैं कि यह उन्हें 'साइडलाइन' करने की पटकथा है!
क्या हाईकमान और राज्य नेतृत्व यह सुनिश्चित कर रहा है कि पुरानी सरकार का कोई भी दिग्गज इतना मजबूत न हो सके कि वो नए सत्ता केंद्र के लिए चुनौती बन जाए? क्या केदार कश्यप को यह अहसास कराया जा रहा है कि अब वो पुरानी छूट का फायदा नहीं उठा सकते?
, ओएसडी की छुट्टी, पीए पर कार्रवाई, आरडीए का 20 करोड़ी प्लॉट विवाद, और थप्पड़ कांड... ये अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं, ये एक ही बड़ी तस्वीर के छोटे-छोटे टुकड़े हैं!
अब देखना यह होगा कि बस्तर का यह कद्दावर नेता इस सियासी दबाव से कैसे उबरता है? क्या केदार कश्यप खुद को साबित कर पाएंगे, या फिर छत्तीसगढ़ बीजेपी के 'पुराने दिग्गजों' की लिस्ट में उनका नाम भी पूरी तरह साइडलाइन नेताओं में शुमार हो जाएगा?
आपको क्या लगता है? क्या केदार कश्यप के खिलाफ साज़िश हो रही है या फिर यह सिर्फ भ्रष्टाचार पर नकेल कसने की कार्रवाई है? कमेंट करके अपनी राय ज़रूर बताइए!




