बुधवार, 24 जून 2026

'दो दर्जन' रसूखदार अफसरों का 'सिंडिकेट' आज भी हावी!

 मुख्यमंत्री बदले, चेहरे बदले; लेकिन व्यवस्था पर 'दो दर्जन' रसूखदार अफसरों का 'सिंडिकेट' आज भी हावी!



छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद यह माना जा रहा था कि प्रशासनिक स्तर पर एक बड़ा शुद्धिकरण देखने को मिलेगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' का दम भरने वाली सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन राज्य के प्रशासनिक गलियारे की एक कड़वी हकीकत यह भी है कि चेहरों के बदलने से व्यवस्था का बुनियादी ढर्रा नहीं बदला है। सूत्रों और दस्तावेजी कड़ियों की मानें तो राज्य में करीब दो दर्जन ऐसे आईएएस अधिकारियों का एक मजबूत 'नेक्सेस' (प्रशासनिक सिंडिकेट) सक्रिय है, जिसके रसूख के आगे सत्ता की चाबुक भी बेअसर साबित हो रही है। यह सिंडिकेट इस कदर हावी है कि केंद्र सरकार के मंत्रालयों से आने वाले कड़े निर्देश और जांच की चिट्ठियां भी राज्य के सचिवालय में कहीं न कहीं फाइलों के नीचे दबा दी जाती हैं।

केंद्र की चिट्ठियां रद्दी की टोकरी में!

प्रशासनिक हलकों में इन दिनों सबसे बड़ी चर्चा केंद्र सरकार के कार्मिक विभाग (DoPT) और गृह मंत्रालय की उन गोपनीय और अर्ध-शासकीय चिट्ठियों की है, जो राज्य के रसूखदार अफसरों के खिलाफ आई गंभीर शिकायतों के बाद भेजी गई थीं। इन पत्रों में टेंडर प्रक्रियाओं में गड़बड़ी, पद का दुरुपयोग, आय से अधिक संपत्ति और वित्तीय अनियमितताओं की तत्काल जांच कर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश थे। विडंबना यह है कि इन निर्देशों के बावजूद न तो कोई ठोस जांच आगे बढ़ी और न ही संबंधित अधिकारियों पर कोई गाज गिरी।

इस मुद्दे पर समय-समय पर खुद भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर तथा अधिवक्ता नरेश चंद्र गुप्ता जैसे लोगों ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO), राष्ट्रपति और केंद्रीय जांच एजेंसियों को लगातार शिकायतें भेजी हैं। इसके बावजूद राज्य के सिस्टम के भीतर बैठा यह कॉरपोरेट-प्रशासनिक गठजोड़ इतना ताकतवर है कि वह हर कार्रवाई को ठंडे बस्ते में डालने का हुनर जानता है।

दागी और विवादित चेहरों की लंबी फेहरिस्त

यदि राज्य के प्रशासनिक इतिहास और हालिया विवादों पर नजर डालें, तो कई ऐसे बड़े नाम सामने आते हैं जिन पर गंभीर आरोप लगने या केंद्रीय एजेंसियों (ED/CBI) की रडार पर आने के बावजूद लंबे समय तक मुख्यधारा के पदों पर संरक्षण मिलता रहा।

इस नेक्सेस या विवादों के दायरे में आए प्रमुख नामों में निम्नलिखित अधिकारी विभिन्न समय पर चर्चा का विषय बने रहे:

 अनिल टूटेजा और समीर बिश्नोई: अनुपातहीन संपत्ति और फॉरेन एक्सचेंज मामलों से लेकर विभिन्न नीतिगत विवादों में घिरे रहे।

 विवेक ढांड तामन सिंह सोनवानी: नजूल जमीन के मामलों से लेकर अन्य कई गंभीर प्रशासनिक विसंगतियों के आरोप इन पर लगते रहे।

 डॉ. आलोक शुक्ला निरंजन दास: सरकारी धन के कथित विचलन और आबकारी से जुड़े बड़े नीतिगत फैसलों को लेकर लगातार सुर्खियों में रहे।

 संजय कुमार अलंग, कुलदीप शर्मा, सुरेंद्र कुमार जायसवाल, गौरव द्विवेदी: इनके कार्यकाल के दौरान टेंडर प्रक्रियाओं, सर्व शिक्षा अभियान और आईसीटी प्रोजेक्ट्स में गड़बड़ियों की शिकायतें समय-समय पर राजनेताओं और शिकायतकर्ताओं द्वारा उठाई गईं।

 इसके अलावा नरेंद्र दुग्गा, सुधाकर खलगो, राजेश सिंह राणा, डीडी सिंह, एस प्रकाश, अमृत खलगो, नुपुर शर्मा, किरण कौशल, टी राधा कृष्णन, संजीव कुमार झा और भुवनेश कुमार यादव जैसे अधिकारियों के नाम भी किसी न किसी विभागीय स्तर पर या शिकायतों के संदर्भ में इस प्रशासनिक चक्रव्यूह के इर्द-गिर्द चर्चा में बने रहे।

प्यादों पर गाज, वजीर सुरक्षित: कैसा है ये शतरंज का खेल?

प्रशासनिक हलकों में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब भी भ्रष्टाचार पर हल्ला मचता है, तो कार्रवाई केवल 'प्यादों' पर क्यों होती है? उदाहरण के तौर पर, हाल ही में आबकारी विभाग के करीब 29 अधीनस्थ अधिकारियों व कर्मचारियों पर विभागीय कार्रवाई की गई, लेकिन इस पूरे खेल की नीति बनाने वाले और पर्दे के पीछे बैठे 'शतरंज के बड़े मोहरों' को छूने से भी व्यवस्था बचती नजर आती है।

इस पूरे खेल के पीछे एक सोची-समझी क्रोनोलॉजी काम करती है:

1. मलाईदार पदों का प्रबंधन: बड़े सप्लायर, रसूखदार ठेकेदार और बिचौलिए मिलकर सत्ता के शीर्ष गलियारों को इस तरह प्रभावित करते हैं कि उनके अनुकूल काम करने वाले अफसर हमेशा मलाईदार या नीतिगत रूप से महत्वपूर्ण पदों पर बने रहें।

2. संविदा का खेल: यदि इस सिंडिकेट का कोई मुख्य मोहरा सेवानिवृत्त (Retire) भी हो जाता है, तो उसे व्यवस्था को सुचारू रूप से "मैनेज" रखने के लिए संविदा नियुक्ति देकर दोबारा महत्वपूर्ण कुर्सी पर बिठा दिया जाता है।

क्या 2005 बैच का एक सिंडिकेट चला रहा है समानांतर व्यवस्था?

गलियारों में सबसे चौंकाने वाली चर्चा यह है कि मौजूदा दौर में 2005 बैच के एक प्रभावी अधिकारी के इर्द-गिर्द पूरा प्रशासनिक चक्रव्यूह घूम रहा है। इस गुट ने मुख्यमंत्री सचिवालय से लेकर नीति-निर्धारक विभागों तक अपनी ऐसी अदृश्य घेराबंदी कर रखी है कि जमीनी हकीकत और ईमानदार अफसरों की आवाजें शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच ही नहीं पा रही हैं।

ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार की जवाबदेही बड़ी है या फिर सालों से कुर्सियों को जकड़े बैठे इन चंद नौकरशाहों का सिंडिकेट? यदि केंद्र सरकार की चिट्ठियों और जांच एजेंसियों की रिपोर्टों को इसी तरह ठंडे बस्ते में डाला जाता रहा, तो छत्तीसगढ़ की जनता के साथ 'सुशासन' का वादा सिर्फ कागजी बनकर रह जाएगा।

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मंगलवार, 23 जून 2026

विकास की वेदी पर 'नरबलि': छत्तीसगढ़ के औद्योगिक क्षेत्र क्यों बन रहे हैं 'डेथ जोन'?

 विकास की वेदी पर 'नरबलि': छत्तीसगढ़ के औद्योगिक क्षेत्र क्यों बन रहे हैं 'डेथ जोन'?


 मुनाफे की अंधी दौड़, लचर सिस्टम और कॉरपोरेट की लापरवाही के बीच घुटती मजदूरों की सांसें। क्या चंद रुपयों का मुआवजा ही है गरीब के खून की कीमत?

मौत का खूनी आंकड़ा

छत्तीसगढ़, जिसे हम देश के विकास के पावरहाउस के रूप में देखते हैं, आज वहां के कारखानों से उठती चिमनियों का धुआं सिर्फ उद्योगों की तरक्की नहीं, बल्कि गरीब मजदूरों की अर्थियों का मंजर भी बयां कर रहा है । हाल ही में सक्ती जिले के डबरा थाना क्षेत्र के सिंघी तराई में स्थित वेदांता पावर प्लांट में हुआ भीषण बॉयलर ब्लास्ट इस बात का ताजा और खौफनाक सबूत है । इस हादसे में चार दर्जन से अधिक लोग इसकी चपेट में आ गए।

लेकिन यह कोई इकलौता हादसा नहीं है। आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले दो सालों (2024 से 2026 तक) में राज्य के उद्योगों में मरने वाले मजदूरों की संख्या 300 के पार पहुंच चुकी है 。 सवाल यह उठता है कि यह महज औद्योगिक दुर्घटनाएं हैं या फिर सिस्टम और कॉरपोरेट के गठजोड़ द्वारा किया जा रहा सीधा-सीधा 'कत्ल'? 

'डेथ जोन' में तब्दील होते चार प्रमुख जिले

छत्तीसगढ़ का औद्योगिक मॉडल आज एक डरावने रूप में सामने आ रहा है । राज्य के चार प्रमुख जिले—रायपुर, रायगढ़, दुर्ग और सक्ती—मजदूरों के लिए 'डेथ जोन' बन चुके हैं ।

 खुद सरकारी आंकड़े (विधानसभा के बजट सत्र की रिपोर्ट के अनुसार) यह स्वीकार करते हैं कि राज्य में कुल 7,324 फैक्ट्रियां हैं ।

 इनमें से 948 फैक्ट्रियों को सरकार खुद बेहद खतरनाक मानती है 。

 इन खतरनाक फैक्ट्रियों में से भी 32 उद्योग ऐसे हैं जो 'अति-संवेदनशील और खतरनाक' श्रेणी में आते हैं ।

इसके बावजूद, इन फैक्ट्रियों में सुरक्षा मानकों को ताक पर रख दिया गया है। ना तो मजदूरों को मानक सुरक्षा उपकरण दिए जाते हैं और ना ही उनके पास सिर छिपाने के लिए सही हेलमेट होते हैं ।

हादसे के बाद 'मैनेजमेंट' का खूनी खेल

जब भी कोई बड़ी दुर्घटना होती है, जैसे कुछ समय पहले रायगढ़ के 'रियल स्पार्क एंड पावर' में छह लोगों की मौत हुई या बेनला ब्लॉक की 'स्पेशल ब्लास्ट फैक्ट्री' में धमाका हुआ, तो उसके बाद एक तयशुदा स्क्रिप्ट पर काम शुरू होता है 。

1. एफआईआर में झोल: स्थानीय प्रशासन और कॉरपोरेट के बीच ऐसा गठजोड़ होता है कि एफआईआर की धाराएं बेहद कमजोर और मामूली लापरवाही की लगाई जाती हैं ।

2. नेताओं और रसूखदारों का कवच: कई बार मिल मालिकों को राजनीतिक रसूख या बड़े नेताओं के रिश्तेदार होने का फायदा मिलता है, जिससे वे आसानी से बच निकलते हैं ।

3. बलि का बकरा: किसी भी बड़े उद्योगपति, मालिक या मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) को कभी जेल जाते नहीं देखा जाता । गिरफ्तारी के नाम पर केवल छोटे प्लांट मैनेजरों या सेफ्टी अफसरों को आगे कर दिया जाता है, जिन्हें तुरंत जमानत मिल जाती है ।

मुआवजा: खून की कीमत या पल्ला झाड़ने का जरिया?

हादसे के तुरंत बाद सरकार और कंपनियां मुआवजे का ऐलान कर देती हैं—मृतकों को 2 लाख और घायलों को 50 हजार रुपये । पिछले दो सालों में करीब 17 करोड़ रुपये से अधिक का मुआवजा बांटा जा चुका है ।

परंतु क्या किसी गरीब के घर का चिराग बुझने की कीमत महज कुछ लाख रुपये है? श्रमिक संगठनों और ग्रामीणों का अब एक ही साफ और कड़ा रुख है: "हमें मुआवजे की भीख नहीं, बल्कि काम के दौरान सुरक्षा की गारंटी चाहिए।" 

यदि सरकार दिखावे के लिए किसी फैक्ट्री को सील भी करती है, तो जन आक्रोश ठंडा होते ही दो-चार महीने में उसे चुपके से दोबारा चालू करवा दिया जाता है ।

बड़ा सवाल: गैर-इरादतन हत्या का मामला क्यों नहीं?

श्रम कानूनों का खुलेआम उल्लंघन होने के बावजूद इन औद्योगिक घरानों पर 'गैर-इरादतन हत्या' (Culpable Homicide) का मामला दर्ज क्यों नहीं किया जाता?  सच तो यह है कि जब 'पैसा बोलता है, तब सत्ता खामोश हो जाती है' । हर तीन महीने में छत्तीसगढ़ के किसी न किसी कोने से मजदूरों के चीखने और अपंग होने की खबरें आती हैं 。

निष्कर्ष और मांग

छत्तीसगढ़ में औद्योगिक प्रगति की जो इमारत खड़ी की जा रही है, उसकी बुनियाद में मजदूरों का खून लगा है । अब समय आ गया है कि सरकार खोखले दावों से ऊपर उठकर इन 948 खतरनाक फैक्ट्रियों की सुरक्षा ऑडिट कराए । विपक्ष और मजदूर यूनियनों की मांग भी जायज है कि गंभीर घायलों को कम से कम 50 लाख और मृतकों के परिवारों को 1 करोड़ रुपये का मुआवजा मिले और दोषियों को सीधे जेल भेजा जाए ।

जब तक कॉरपोरेट जवाबदेही तय नहीं होगी और मुनाफाखोरी से ऊपर इंसानी जान को अहमियत नहीं दी जाएगी, तब तक छत्तीसगढ़ के ये 'डेथ जोन' इसी तरह बेकसूरों की बलि लेते रहेंगे ।

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सोमवार, 22 जून 2026

मलाईदार पदों पर 'दागी' मेहरबान, दांव पर नौनिहालों का भविष्य!

 मलाईदार पदों पर 'दागी' मेहरबान, दांव पर नौनिहालों का भविष्य!


 छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग में ४० से अधिक विवादित अफसरों को सत्ता का 'कवच', करोड़ों का बजट और जांच ठंडे बस्ते में।


छत्तीसगढ़ की सत्ता में "हम ही बनाया है, हम ही संवारेंगे" के बुलंद नारों के साथ आई डबल इंजन सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच एक बड़ा विरोधाभास सामने आया है। राज्य का सबसे संवेदनशील विभाग—शिक्षा विभाग—जिसके कंधों पर छत्तीसगढ़ के नौनिहालों का भविष्य गढ़ने की जिम्मेदारी है, वह खुद भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अनियमितताओं और संगीन आरोपों से घिरे अफसरों के सिंडिकेट से कराह रहा है। विभाग में ४० से अधिक ऐसे शीर्ष और मलाईदार पदों पर बैठे अधिकारी सक्रिय हैं, जो किसी न किसी बड़े घोटाले या विभागीय जांच के दायरे में हैं। लेकिन कार्रवाई के बजाय इन्हें सत्ता का वरदहस्त और मलाईदार पोस्टिंग का तोहफा मिल रहा है।

युक्तीकरण का खेल और सुलगते सवाल

छत्तीसगढ़ में शिक्षा विभाग पर सवालिया निशान उसी दिन गहरे हो गए थे, जब हजारों सरकारी स्कूलों को 'युक्तीकरण' (मर्जिंग) के नाम पर बंद या स्थानांतरित करने की कवायद शुरू हुई। गरियाबंद में वर्ष १९६५ से संचालित एक ऐतिहासिक गर्ल्स स्कूल (कन्याशाला) को जब दूसरे स्कूल में मर्ज करने का फैसला हुआ, तो छात्राओं और पालकों को सड़कों पर उतरना पड़ा। छात्राओं की सुरक्षा, बुनियादी सुविधाओं की कमी और लचर परीक्षा परिणामों वाले स्कूलों में जबरन भेजे जाने के इस फैसले ने सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए। इसी तरह, बिलासपुर संभाग में युक्तीकरण के आत्मघाती फैसलों के कारण 'पंडो' विशेष पिछड़ी जनजाति के मासूम बच्चों को स्कूल जाने के लिए ७ से ८ किलोमीटर का पैदल सफर तय करना पड़ रहा है, जिसके चलते कई बच्चों ने पढ़ाई ही छोड़ दी है।

एक तरफ ५७,००० शिक्षकों की बहुप्रतीक्षित भर्ती का विज्ञापन समय पर नहीं आ पाता, बच्चों को वक्त पर किताबें और यूनिफॉर्म नसीब नहीं होतीं, वहीं दूसरी तरफ विभाग के मलाईदार बजट को संभालने की चाबी उन चेहरों को सौंप दी गई है जिन्हें तकनीकी रूप से जेल की सलाखों के पीछे या सस्पेंशन लिस्ट में होना चाहिए था।

४० का सिंडिकेट: जांच ठंडे बस्ते में, नेता-अफसर नेक्सेस

यह महज संयोग नहीं बल्कि एक सोची-समझी प्रशासनिक गलबहियां है। जिन ४० से अधिक अफसरों पर करोड़ों रुपये के घोटालों, पद के दुरुपयोग और वित्तीय गड़बड़ियों के गंभीर आरोप हैं, उनके खिलाफ फाइलों को दबा दिया गया है।

इस सिंडिकेट को मिल रहे राजनीतिक संरक्षण का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य के महत्वपूर्ण राजनेताओं और मंत्रियों के साथ इन अफसरों के सीधे तार जुड़े हैं। वर्तमान शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, पूर्व शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और स्वयं मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय (जिनके पास कुछ समय के लिए यह विभाग था) के कार्यकाल के दौरान भी इन दागी चेहरों का बाल बांका नहीं होना, इस प्रशासनिक और राजनीतिक साठगांठ की गहराई को बयां करता है। सुचिता, संस्कार और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का दावा करने वाले संगठन भी इन 'दीमकों' पर कार्रवाई कराने में लाचार या मौन नजर आते हैं।

दागियों के भरोसे करोड़ों का बजट

शिक्षा के मंदिर को दागियों का जमावड़ा बना देने से न केवल सरकारी खजाने को चूना लग रहा है, बल्कि नीतिगत फैसले भी प्रभावित हो रहे हैं। प्राचार्यों और शिक्षकों के स्तर पर होने वाले नैतिक पतन और यौन शोषण के मामलों से इतर, यह शीर्ष स्तर का प्रशासनिक भ्रष्टाचार है जो पूरे महकमे को खोखला कर रहा है। करोड़ों रुपये के बजट वाली योजनाओं की कमान जब दागी अफसरों के सिंडिकेट और नेताओं के नेक्सेस के हाथ में हो, तो व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश खत्म होने लगती है।

मैगजीन व्यू: जनता की अदालत में सुलगते प्रश्न

 सुचिता का दावा बनाम दागियों को पनाह: क्या भ्रष्ट और विवादित अफसरों को गोद में बिठाकर छत्तीसगढ़ के नौनिहालों का भविष्य संवारा जा सकता है?

 युक्तीकरण या शिक्षा का संकुचन: आदिवासी और दूरस्थ अंचलों के बच्चों को स्कूल से दूर करने वाली नीतियों के पीछे असली एजेंडा क्या है?

 फाइलों पर कुंडली: इन ४० दागियों की जांच को ठंडे बस्ते में डालने के लिए जिम्मेदार राजनीतिक रसूखदार कौन हैं?

निष्कर्ष: छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में टाट-पट्टी पर बैठकर भविष्य का सपना देखने वाले गरीब बच्चों की उम्मीदें इन ४० दागियों के सिंडिकेट के बीच पिस रही हैं। यदि सरकार वास्तव में 'सुशासन' की पक्षधर है, तो इन दागी चेहरों को मलाईदार कुर्सियों से हटाकर सलाखों के पीछे भेजना होगा, वरना शिक्षा व्यवस्था का यह दाग कभी धुल नहीं पाएगा।

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रविवार, 21 जून 2026

स्वास्थ्य सचिव के नाम पर डॉक्टरों को चमकाने वाला 'अजय अग्रवाल' कौन?

 मंत्रालय के 'कमरा नंबर' से चल रहा था वसूली का खेल: स्वास्थ्य सचिव के नाम पर डॉक्टरों को चमकाने वाला 'अजय अग्रवाल' कौन?


अमित कटारिया (स्वास्थ्य सचिव) की पुलिस कमिश्नर को चिट्ठी से मचा हड़कंप; रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर के नर्सिंग होम संचालकों में दहशत। दो मोबाइल नंबर होने के बावजूद पंद्रह दिन बाद भी पुलिस के हाथ खाली, क्या सफेदपोशों का है वरदहस्त?


छत्तीसगढ़ के पावर कॉरिडोर (मंत्रालय) और प्रशासनिक हलकों में इन दिनों एक ऐसे 'अदृश्य' गिरोह की चर्चा है, जिसने सीधे प्रदेश के रसूखदार डॉक्टरों और निजी अस्पताल संचालकों की नींद उड़ा दी है। यह पूरा खेल किसी छोटे-मोटे साइबर ठग का नहीं, बल्कि एक सुनियोजित और संगठित सिंडिकेट का नजर आ रहा है, जिसे सत्ता के गलियारों से जुड़े किसी बड़े रसूखदार का संरक्षण प्राप्त होने की आशंका जताई जा रही है

क्या है पूरा मामला?

मामला तब खुला जब छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया के नाम का इस्तेमाल कर रायपुर, दुर्ग, भिलाई और बिलासपुर के बड़े नर्सिंग होम संचालकों को फोन पर धमकाया जाने लगा । फोन करने वाला खुद को स्वास्थ्य सचिव के निजी स्थापना (पर्सनल स्टाफ) का कर्मी बताता है और अपना नाम 'अजय अग्रवाल' बताता है

वह बकायदा स्वास्थ्य सचिव के कार्यालय और मंत्रालय के कमरा नंबर का हवाला देकर डॉक्टरों से कहता है कि "आपके अस्पताल के खिलाफ गंभीर कमियों और नियमों के उल्लंघन की शिकायत आई है" । इसके बाद, फाइल को दबाने और शिकायत को समाप्त करने के एवज में वह परोक्ष रूप से मोटी रकम (अवैध वसूली) की मांग करता है और डॉक्टरों पर मानसिक दबाव बनाता है

मंत्रालय बुलाकर बाहर से ही लौटाने का खेल

सूत्रों के मुताबिक, यह खेल इस कदर शातिर तरीके से खेला गया कि कुछ अस्पताल संचालकों को बाकायदा मंत्रालय (महानदी भवन) भी बुलाया गया था। वहां कथित आरोपी उन्हें बाहर ही मिला और स्वास्थ्य सचिव की 'अहम मीटिंग' का हवाला देकर उन्हें कुछ देर रोके रखने के बाद बाहर से ही रवाना कर दिया गया ताकि डॉक्टरों को पूरा भरोसा हो जाए कि मामला सीधे ऊपर से जुड़ा है

सचिव खुद हुए हैरान, लिखनी पड़ी चिट्ठी

जब पीड़ित डॉक्टरों और नर्सिंग होम एसोसिएशन की नाराजगी और दहशत की बात खुद स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया तक पहुंची, तो प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया। सचिव ने तुरंत एक्शन लेते हुए रायपुर के पुलिस कमिश्नर को एक आधिकारिक पत्र लिखकर कड़ी नाराजगी जताई और तत्काल एफआईआर दर्ज कर आरोपी की गिरफ्तारी की मांग की है । इस पत्र में आरोपी द्वारा इस्तेमाल किए गए दो मोबाइल नंबरों (जिसमें से एक 76520 94640 बताया जा रहा है) का भी उल्लेख है । रायपुर से लेकर दुर्ग, बिलासपुर, राजनांदगांव और कोरबा पुलिस को भी अलर्ट मोड पर डाला गया है 

पर्दे के पीछे कौन? पुलिस की सुस्ती पर उठते सवाल:

1. मोबाइल नंबर एक्टिव, फिर भी गिरफ्तारी क्यों नहीं? स्वास्थ्य सचिव की चिट्ठी में साफ तौर पर मोबाइल नंबर दर्ज हैं। सर्विलांस और साइबर सेल के आधुनिक युग में दो सप्ताह बीत जाने के बाद भी 'अजय अग्रवाल' पुलिस की पकड़ से बाहर क्यों है? 

2. मोहरा या मास्टरमाइंड? कयास लगाए जा रहे हैं कि पुलिस किसी छोटे मोहरे को पकड़कर खानापूर्ति कर सकती है, जबकि मंत्रालय के भीतर बैठकर कमान संभालने वाले असली चेहरे (मास्टरमाइंड) पर्दे के पीछे ही रह जाएंगे

3. कमरा नंबर की सटीक जानकारी कैसे? बिना किसी अंदरूनी मिलीभगत या बड़े अधिकारी/नेता के संरक्षण के, कोई बाहरी ठग डॉक्टरों को मंत्रालय के कमरा नंबर और विभागीय अंदरूनी शिकायतों की सटीक जानकारी कैसे दे सकता है? 

विपक्ष का हमला: "बिना सत्ता के संरक्षण के यह संभव नहीं"

इस मामले को लेकर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने सरकार और कानून व्यवस्था को आड़े हाथों लिया है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने आरोप लगाया है कि प्रदेश में असामाजिक तत्वों और ठगों के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि अब वे सीधे आईएएस अधिकारियों के नाम पर सरेआम वसूली कर रहे हैं । उन्होंने कहा कि बिना सत्ता के शीर्ष संरक्षण के कोई भी व्यक्ति आधे दर्जन से अधिक डॉक्टरों को मंत्रालय का हवाला देकर इस तरह भयादोहन नहीं कर सकता; प्रदेश में कानून व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है


मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) तक भी इस मामले की गूंज पहुंचने की खबर है। अब देखना यह है कि क्या पुलिस निष्पक्ष जांच कर 'शासन के इस खेल' के असली किरदारों को बेनकाब करती है, या फिर यह मामला भी ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा।

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