योगी सरकार की हेकड़ी निकली
रात के लगभग ग्यारह बज रहे थे। नोएडा के एक छोटे से कमरे में जलती मद्धम रोशनी के बीच आकृति कागज़ों के ढेर में उलझी हुई थी। बाहर सड़क पर सन्नाटा था, लेकिन उसके ज़हन में उन मज़दूरों के चेहरों की चीखें तैर रही थीं—वही मज़दूर, जिनकी महीनों की बची-खुची दिहाड़ी मालिक दबाकर बैठ गए थे।
आकृति के लिए कानून महज़ किताबों में लिखी धाराएं नहीं थीं, वो किसी बेबस के हाथ में थमाया जाने वाला आखिरी हथियार था। जब नोएडा की सड़कों पर हज़ारों मज़दूरों का गुस्सा फूटा, तो आकृति उनके साथ पहली कतार में खड़ी थी। उसके लिए यह हक की लड़ाई थी, लेकिन सत्ता की आंखों में यह सीधे-सीधे 'बगावत' थी।
फिर वही हुआ जो अक्सर होता है। एक रात पुलिस की गाड़ियां हूटर बजाती हुईं आईं, दरवाजा खटखटाया गया और आकृति को उठा लिया गया। एफआईआर में संगीन धाराएं जोड़ी गईं और जब लगा कि जमानत मिल सकती है, तो आकाओं के इशारे पर फाइल पर एक नया ठप्पा लगा दिया गया—राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका)।
रासुका यानी एक ऐसा कानून, जहां इंसान बिना किसी पुख्ता सबूत के महीनों तक सलाखों के पीछे सड़ सकता है।
आकृति को जब जेल भेजा गया, तो कई लोगों को लगा कि एक आवाज़ हमेशा के लिए दबा दी गई है। जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) के दस्तखत वाली फाइल पर मुहर लग चुकी थी, थाना प्रभारी अपनी 'कामयाबी' पर पीठ थपथपा रहे थे और खाकी वर्दी की ऐंठ कायम थी। सलाखों के पीछे आकृति के दिन लंबे और रातें ठंडी थीं, लेकिन उसका हौसला टूटने के बजाय और पैना हो रहा था। उसके साथियों ने इस अन्याय के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
महीनों बाद, इलाहाबाद हाईकोर्ट के कोर्टरूम नंबर 4 में सन्नाटा पसरा हुआ था। जज साहब के सामने रासुका की वो फाइल रखी थी, जिस पर पुलिस और प्रशासन ने अपने दस्तखत किए थे।
जब मामले की सुनवाई शुरू हुई, तो सरकारी वकील के पास उन दलीलों का कोई जवाब नहीं था कि एक सामाजिक कार्यकर्ता पर रासुका जैसी सख्त कार्रवाई की जरूरत क्यों पड़ी? क्या हक की आवाज़ उठाना देश की सुरक्षा के लिए खतरा है?
न्यायाधीश ने फाइल पलटी, चश्मा उतारा और जो फैसला सुनाया, उसने यूपी प्रशासन के गलियारों में सन्नाटा खींच दिया।
कोर्ट ने न केवल आकृति चौधरी के खिलाफ रासुका की कार्रवाई को पूरी तरह रद्द कर दिया, बल्कि राज्य की निरंकुशता पर ऐसा चाबुक चलाया जिसकी गूंज बरसों तक सुनाई देगी।
अदालत ने सख्त लहजे में आदेश दिया:
"आकृति चौधरी को बिना किसी ठोस आधार के इतने महीनों तक हिरासत में रखना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है। राज्य सरकार उन्हें 5 लाख रुपये का मुआवजा दे।"
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। सबसे बड़ा झटका तो अभी बाकी था।
अदालत ने आगे कहा, "यह मुआवज़े की रकम सरकारी खजाने या करदाताओं की जेब से नहीं जाएगी। यह राशि इस अवैध कार्रवाई में शामिल अधिकारियों—नोएडा के डीएम से लेकर संबंधित थाना प्रभारी तक—के वेतन से वसूल की जाएगी।"
फैसले की खबर जब जेल के अंदर पहुंची, तो आकृति की आंखों में आंसू थे—कमजोरी के नहीं, जीत के। बाहर मज़दूरों में खुशी की लहर दौड़ गई।
यह सिर्फ आकृति की रिहाई की कहानी नहीं थी। यह उस व्यवस्था के मुंह पर एक करारा तमाचा था, जहां अफसर कलम की ताकत का गलत इस्तेमाल करके मासूमों की जिंदगी बर्बाद कर देते हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया कि कानून की लाठी अगर गरीब पर पड़ती है, तो वही कानून गलत फैसला लेने वाले अफसरों की जेब और पद की हेकड़ी भी निकाल सकता है।



