मंगलवार, 3 नवंबर 2026

सीजी में युवा सिर्फ वोट देने की मशीन

 सीजी में युवा सिर्फ वोट देने की मशीन 


क्या इस देश और राज्य में युवा सिर्फ वोट देने के लिए रह गए हैं? क्या नौकरियां अब सिर्फ चुनावी घोषणापत्रों के पन्नों तक सीमित रहेंगी?

आज हम बात कर रहे हैं उन लाखों युवाओं की, जिन्होंने दिन-रात एक करके पढ़ाई की, परीक्षा दी, और अब सिर्फ रिजल्ट, जॉइनिंग और नई भर्तियों के लिए सड़कों पर धक्के खा रहे हैं। कभी कोर्ट का सहारा, कभी रोस्टर में गड़बड़ी, कभी जांच का बहाना और कभी-कभी तो प्रशासनिक ताने-बाने में फाइलों का खो जाना! आखिरकार कब तक युवाओं के भविष्य के साथ यह खिलवाड़ चलता रहेगा?

आज के इस विशेष रिपोर्ट में हम एक-एक करके बात करेंगे:

  1. विश्वविद्यालय भर्तियों में आरक्षण और रोस्टर की गड़बड़ी का जो नया मामला सामने आया है।
  2. डी.एड (D.Ed/D.El.Ed) अभ्यर्थियों का आंदोलन और उनकी मांगें।
  3. ASI भर्ती के 1500 पदों की अटकी हुई सूची।
  4. 57,000 शिक्षक भर्ती की गारंटी और अतिथि शिक्षकों (Guest Teachers) का अनिश्चित भविष्य।

अगर आप भी इनमें से किसी भर्ती का इंतजार कर रहे हैं या युवाओं के इस हक की लड़ाई में साथ हैं, तो इस वीडियो को अंत तक जरूर देखें और शेयर करें।"

विश्वविद्यालयों में भर्ती गड़बड़ी और जांच का पेंच

"सबसे पहले नजर डालते हैं हाल ही में सामने आए विश्वविद्यालय भर्ती विवाद पर। राज्यपाल सचिवालय के आदेशानुसार, विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक पदों की भर्ती से लेकर भवन निर्माण और रखरखाव कार्यों में कथित अनियमितताओं की शिकायतों का संज्ञान लिया गया है। कुलाधिपति ने इसकी जांच और प्रगति का निरीक्षण करने के निर्देश दिए हैं।

लेकिन शिकायतें क्या हैं? जरा गौर से सुनिए:

  • आरक्षण और रोस्टर में गड़बड़ी: पदों के आरक्षण में तय नियमों की अनदेखी की गई।
  • स्वीकृत पदों से ज्यादा का विज्ञापन: जितने पद स्वीकृत नहीं थे, उससे अधिक पर विज्ञापन निकाल दिए गए।
  • रोस्टर में मनमाना बदलाव: प्रक्रिया के बीच में ही तय रोस्टर को बदल दिया गया।
  • कार्य परिषद (Executive Council) की बिना मंजूरी: भर्ती प्रक्रिया को आगे बढ़ा दिया गया।

इसके अलावा बैकलॉग पद, शिक्षकों की पदोन्नति और वेतन संरक्षण जैसे कई मुद्दे इसमें शामिल हैं। अब सवाल यह उठता है कि जब विज्ञापन निकाला जाता है, तब जिम्मेदार अधिकारी इन नियमों को क्यों भूल जाते हैं? क्या यह जानबूझकर किया जाता है ताकि मामला कोर्ट या जांच में अटके और भर्ती लटक जाए?"

 डी.एड (D.Ed) अभ्यर्थी और 57,000 शिक्षकों का वादा

: "अब बात करते हैं शिक्षा विभाग की। चुनावों के समय 57,000 शिक्षकों की भर्ती की गारंटी और वादे बड़े-बड़े मंचों से किए गए थे। लेकिन धरातल पर क्या है?

डी.एड (D.Ed) अभ्यर्थी आज सड़कों पर आंदोलन करने को मजबूर हैं। न्यायालय के फैसलों के बावजूद, प्राथमिक शिक्षक भर्तियों में डी.एड अभ्यर्थियों को उनका हक समय पर नहीं मिल पा रहा है। काउंसिलिंग, दस्तावेज सत्यापन और फिर अंतिम सूची जारी करने में महीनोंलगा दिए जाते हैं।

दूसरी तरफ, जो अतिथि शिक्षक (Guest Teachers) सालों से बेहद कम मानदेय पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं, उनका भविष्य भी अधर में है। न तो नई नियमित भर्तियां पूरी हो पा रही हैं और न ही अतिथि शिक्षकों के समायोजन को लेकर कोई ठोस नीति बन पा रही है। नतीजा यह है कि स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं और योग्य अभ्यर्थी सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं।"

ASI भर्ती के 1500 पद और रुकी हुई अन्य परीक्षाएं

"शिक्षकों के बाद अब आइए पुलिस महकमे और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की ओर। ASI (सहायक उपनिरीक्षक) भर्ती के लगभग 1500 पदों की चयन सूची महीनों से लटकी हुई है। अभ्यर्थियों ने शारीरिक दक्षता (Physical Test), लिखित परीक्षा सब पार कर लिया। लेकिन चयन सूची जारी क्यों नहीं हो रही? इसका कोई ठोस जवाब किसी विभाग के पास नहीं है।

यही हाल कई अन्य व्यावसायिक और लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं का है:

  • किसी परीक्षा का रिजल्ट रोक दिया जाता है।
  • किसी में मॉडल आंसर-की को लेकर विवाद खड़ा हो जाता है।
  • तो किसी भर्ती प्रक्रिया पर कोर्ट का स्टे (Stay) लग जाता है।

युवा सालों-साल अपने घर-परिवार से दूर रहकर, किराए के कमरों में तंगी की जिंदगी जीकर तैयारी करते हैं। लेकिन जब परीक्षा का परिणाम ही सालों तक न आए, तो उनकी मानसिक स्थिति क्या होगी, इसका अंदाजा किसी अधिकारी या राजनेता को शायद नहीं है।"

लेट-लतीफी' का पैटर्न और युवाओं का नुकसान

"दोस्तों, अगर आप ध्यान से देखें तो हर भर्ती में एक जैसा पैटर्न नजर आता है:

  1. पहले बड़ी धूमधाम से भर्ती का विज्ञापन निकाला जाता है।
  2. फॉर्म भरवाकर करोड़ों रुपये की फीस जमा की जाती है।
  3. फिर रोस्टर या आरक्षण में ऐसी खामियां छोड़ दी जाती हैं, जिससे मामला कोर्ट चला जाए।
  4. और फिर मामला जांच, कोर्ट और प्रशासनिक कमेटियों के चक्कर में सालों तक घूमता रहता है।

इस पूरे खेल में नुकसान किसका होता है? नुकसान उस युवा का होता है जिसकी उम्र सीमा (Age Limit) धीरे-धीरे खत्म हो रही है। नुकसान उस गरीब मां-बाप का होता है जो पेट काटकर अपने बच्चे को पढ़ा रहे हैं।"

"सरकार और प्रशासन को यह समझना होगा कि युवा सिर्फ वोट बैंक नहीं हैं। भर्तियों में पारदर्शिता, समयबद्ध चयन प्रक्रिया और रोस्टर का सही पालन प्रशासन की पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए।

  • 1500 ASI पदों की रुकी हुई सूची तुरंत जारी हो!
  • डी.एड अभ्यर्थियों और शिक्षक भर्ती की मांगों का पारदर्शी हल निकले!
  • 57,000 शिक्षक पदों के वादे पर अमल शुरू हो!
  • और विश्वविद्यालयों में जो गड़बड़ियां हुई हैं, उनकी निष्पक्ष जांच करके दोषियों पर कार्रवाई हो और सही अभ्यर्थियों को मौका मिले!

आपकी इस पूरे मुद्दे पर क्या राय है? क्या आप भी इनमें से किसी भर्ती के अटकने से प्रभावित हुए हैं? कमेंट सेक्शन में अपनी बात जरूर रखें।

#YouthProtest #TeacherRecruitment #ASIRecruitment #JusticeForStudents #EducationSystem

सोमवार, 2 नवंबर 2026

भ्रष्टाचारियों को बचाने का अजब खेल

 भ्रष्टाचारियों को बचाने का अजब खेल



आज बात सिर्फ एक सरकारी खरीदी की नहीं है... आज बात है कि कैसे आम जनता के टैक्स के पैसों पर डाका डाला जाता है और जब मामला सामने आता है, तो छोटे कर्मचारियों को आगे करके बड़े-बड़े मंत्री और सचिव स्तर के लोग पर्दे के पीछे छिप जाते हैं!

रायपुर के आदिम जाति विकास विभाग से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसे सुनकर आपका खून खौल उठेगा। पूरे 1.92 करोड़ रुपये की रोटी मेकर खरीदी! जी हां, सही सुना आपने—रोटी बनाने वाली मशीनों की खरीदी में करोड़ों का घोल! लेकिन सबसे बड़ा तमाशा यह नहीं है कि घोटाला हुआ... तमाशा यह है कि जब मामला खुला, तो सरकार ने क्या किया? सिर्फ एक इंक्रीमेंट (वेतन वृद्धि) रोक कर मामला रफा-दफा करने की कोशिश की!


"आइए पहले मामले को समझते हैं। रायपुर में आदिम जाति विकास विभाग ने 1.92 करोड़ रुपये की रोटी मेकर मशीनें खरीदीं। नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाई गईं। शिकायतकर्ताओं ने जब आवाज उठाई कि घोर अनियमितता हुई है, तब जांच का नाटक शुरू हुआ।

लेकिन देखिए 'सरकारी सजा' का तमाशा! 20 अप्रैल 2026 को लोक सेवा आयोग (PSC) ने असंचयी प्रभाव (non-cumulative) से सिर्फ एक वेतन वृद्धि (increment) रोकने पर सहमति दी!

आप समझ रहे हैं इसका मतलब? इसका मतलब यह है कि सजा सिर्फ नाम-मात्र की है! आगे चल कर सैलरी फिर से नॉर्मल हो जाएगी! 1.92 करोड़ रुपये के घोटाले-आरोप के बदले सिर्फ एक इंक्रीमेंट का कटना? क्या यह सजा है या खानापूर्ति?"

अब आते हैं सबसे बड़े झोल पर! शिकायतों में तत्कालीन सहायक आयुक्त तारकेश्वर देवांगन और विजय कंवर की भूमिका पर सवाल उठे। लेकिन तारकेश्वर देवांगन जी जुलाई 2026 में रिटायर हो गए!

अरे भाई, रिटायरमेंट से ठीक पहले ऐसी मेहरबानी क्यों? शिकायतकर्ताओं ने साफ सवाल उठाया है कि क्या विभागीय कार्रवाई को जानबूझकर इतना हल्का रखा गया ताकि रिटायरमेंट के बाद मामला अपने आप ठंडा पड़ जाए?

आपने उन्हें आसानी से रिटायर होने दिया, उनके बकाया पैसों का भुगतान भी कर दिया! अगर सरकारी खजाने को नुकसान हुआ है, तो उसकी भरपाई कौन करेगा? क्या आम जनता के टैक्स का पैसा ऐसे ही बांटा जाएगा?"

"अब आते हैं सबसे कड़वे और सीधे सवाल पर! शिकायतों और जांच में सिर्फ दो-तीन अफसर के नाम आगे करके मामले को दबा दिया गया। लेकिन असली सवाल यह है:

  • फाइल किसने तैयार की?
  • खरीदी को अप्रूवल (मंजूरी) किस स्तर पर मिली?
  • पेमेंट किसने पास करवाया?
  • नियमों को दरकिनार करने में और कौन-कौन से बड़े अधिकारी शामिल थे?

क्या आपको लगता है कि 1.92 करोड़ का मामला सिर्फ एक सहायक आयुक्त के लेवल पर निपट गया होगा? बिल्कुल नहीं! बात तो यह उठ रही है कि इस पूरे खेल में सचिव स्तर तक पैसा पहुंचने की बातें सामने आ रही हैं! मंत्री तक पर लेन-देन के गंभीर आरोप लग रहे हैं!

जब इतनी बड़ी रकम का लेन-देन होता है, तो कट हर लेवल पर बंटता है! लेकिन जब जांच की बात आती है, तो सिर्फ छोटे अफसर पर एक वेतन वृद्धि रोक कर बाकी पूरे सिस्टम को बचाने की कोशिश की जाती है!"

"सरकार को जवाब देना होगा! अगर यह सिर्फ दो लोगों का मामला था, तो बकाया भुगतान क्यों हुआ? और अगर इसमें बड़े-बड़े सचिव और मंत्री शामिल हैं, तो उन पर एफआईआर और सीबीआई/एसीबी जांच क्यों नहीं?

केवल एक इंक्रीमेंट रोक कर आप 1.92 करोड़ के नुकसान का हिसाब नहीं छिपा सकते। आम जनता की गाढ़ी कमाई की लूट पर यह खानापूर्ति अब नहीं चलेगी!

आप लोग इस विषय पर क्या सोचते हैं? क्या रिटायरमेंट के बाद अफसर को ऐसी मेहरबानी मिलनी चाहिए? क्या मंत्री और सचिव स्तर पर इसकी जांच नहीं होनी चाहिए? मुझे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

स्वास्थ्य सेवा या लूट का धंधा? आयुष्मान योजना में फ़र्ज़ीवाड़ा,

 स्वास्थ्य सेवा या लूट का धंधा? आयुष्मान योजना में फ़र्ज़ीवाड़ा, दवाओं के भारी रेट और सुप्रीम कोर्ट का बड़ा चाबुक!



क्या इलाज करवाना अब आम इंसान के बस की बात नहीं रही? क्या देश का हेल्थकेयर सिस्टम किसी सेवा केंद्र की जगह मनमानी वसूली और झोलझाल का अड्डा बनता जा रहा है?

सोचिए, जिस दवा की असली लागत 10 रुपये है, उसके लिए आपसे 100 या 200 रुपये वसूले जाएँ! और जब सरकार गरीबों के लिए आयुष्मान भारत जैसी योजना चलाए, तो कुछ अस्पताल उसमें भी झोल करके करोड़ों का चूना लगा दें!

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं के बढ़ते दामों, अस्पतालों की मनमानी और हेल्थकेयर में चल रही इस गुंडागर्दी पर जो सख्त रुख अपनाया है, उसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। दूसरी तरफ, ज़मीनी हक़ीकत यह है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (NHA) को अब अस्पतालों की जांच के लिए सख्त कदम उठाने पड़ रहे हैं।

आज की इस रिपोर्ट में हम परत-दर-परत खोलेंगे कि कैसे आम मरीज के जेब पर डाका डाला जा रहा है, छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली तक कौन-कौन से अस्पताल जांच के घेरे में आए हैं, और सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले में केंद्र सरकार और संबंधित तंत्र को क्या अल्टीमेटम दिया है।"

आयुष्मान भारत योजना में गड़बड़ी की पड़ताल]

"सबसे पहले बात करते हैं उस योजना की, जिसे गरीबों का सबसे बड़ा सहारा कहा गया था—आयुष्मान भारत योजना।

लेकिन इस योजना में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की आशंकाओं को देखते हुए जांच तेज़ कर दी गई है। अगर हम केवल छत्तीसगढ़ की बात करें, तो राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (NHA) ने 'VERY HIGH RISK' स्कोर वाले 17 अस्पतालों को चिह्नित किया है, जिनकी अब गहन जांच चल रही है।

ये कौन-कौन से अस्पताल हैं जो जांच के दायरे में हैं?

  • राजनैतिक व प्रशासनिक केंद्र रायपुर के 7 अस्पताल
  • बिलासपुर के 3 अस्पताल
  • दुर्ग के 2 अस्पताल
  • इसके अलावा सरगुजा, बस्तर, कबीरधाम, कोंडागांव और कोरबा का 1-1 अस्पताल इस लिस्ट में शामिल है।

  • एससीएच हॉस्पिटल — बस्तर


    अशोक प्रसूति मंदिर — बिलासपुर


    केयर एन क्योर मल्टी-स्पेशियलिटी हॉस्पिटल — बिलासपुर


    मेहता चिल्ड्रन नर्सिंग होम — बिलासपुर


    श्री शंकराचार्य इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस — दुर्ग


    पल्स हॉस्पिटल — दुर्ग


    जय जगन्नाथ हेल्थकेयर — कबीरधाम


    नेताम हॉस्पिटल एंड इनफर्टिलिटी सेंटर — कोंडागांव


    हरि कृष्णा केयर हॉस्पिटल — कोरबा


    एसआरआईएमएसआर श्री रावतपुरा सरकार हॉस्पिटल — रायपुर


    श्री अनंत साईं हॉस्पिटल — रायपुर


    श्री महावीर हॉस्पिटल — रायपुर


    श्रीनिवास हॉस्पिटल — रायपुर


    एसके केयर हॉस्पिटल — रायपुर


    विजन सेंटर आई हॉस्पिटल — रायपुर


    डीएचटी केयर हॉस्पिटल — सरगुजा


    वरदान हॉस्पिटल — रायपुर


जांच में आखिर क्या-क्या पकड़ा जा रहा है? जांच दल यह देख रहा है कि क्या वाकई मरीजों को आयुष्मान योजना के नियमों के मुताबिक इलाज मिल रहा था या सिर्फ कागजों पर फर्जी मरीज भर्ती दिखाकर सरकारी बजट का गबन किया जा रहा था। भर्ती की प्रक्रिया, दिए गए इलाज की प्रामाणिकता और योजना के तहत जमा किए गए दावों (Claims) की पाई-पाई की पड़ताल की जा रही है।"

कड़ा एक्शन - दो अस्पतालों को योजना से बाहर किया, यह जांच सिर्फ कागजी नहीं है, बल्कि इस पर सख्त एक्शन भी होना शुरू हो गया है।

राज्य स्तरीय जांच दल की अनुशंसा और सिफारिशों के आधार पर रायपुर के दो नामी अस्पतालों पर सीधी गाज गिरी है:

  1. मेडीलाइफ़ हॉस्पिटल (Medilife Hospital)
  2. लोटस हॉस्पिटल (Lotus Hospital)

इन दोनों ही अस्पतालों को आयुष्मान भारत योजना के पैनल से बाहर (Blacklist/Panel Out) करने की प्रक्रिया पूरी कर ली गई है। यह इस बात का सबूत है कि किस तरह से मरीजों के नाम पर फर्जी दावे पेश किए जा रहे थे और योजना का गलत इस्तेमाल हो रहा था।"

दवाओं के रेट में झपलेबाजी और कई गुना वसूली

"अब आइए इस पूरे मामले के सबसे बड़े और खौफनाक पहलू पर—दवाइयों की दरों में झपलेबाजी!

आप जब भी किसी प्राइवेट अस्पताल में भर्ती होते हैं या किसी गंभीर बीमारी का इलाज कराते हैं, तो सबसे बड़ा झटका आपको अस्पताल के बिल और दवाइयों की लिस्ट देखकर लगता है।

  • MRP का खेल: फार्मा कंपनियों द्वारा जेनरिक दवाओं और ब्रांडेड दवाओं पर 500% से लेकर 1000% तक का मार्जिन तय किया जाता है। जिस दवा को बनाने का खर्च 5 से 10 रुपये आता है, उसकी MRP 150 से 200 रुपये छाप दी जाती है।
  • हॉस्पिटल की मनमानी: कई बड़े प्राइवेट अस्पताल मरीजों को बाध्य करते हैं कि वे दवाइयां बाहर से नहीं, बल्कि अस्पताल के अंदर मौजूद अपने मेडिकल स्टोर से ही खरीदें। वहां मरीजों को न तो कोई डिस्काउंट मिलता है और न ही सस्ती जेनेरिक दवाओं का विकल्प दिया जाता है।
  • जरूरत से ज्यादा दवाइयां: जांच में यह भी सामने आया है कि आयुष्मान योजना या कैशलेस बीमा वाले मरीजों के नाम पर ऐसी-ऐसी महंगी दवाइयां और इंजेक्शन बिल में जोड़ दिए जाते हैं, जो मरीज को कभी दिए ही नहीं गए!"

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार और चाबुक] 

"दवाओं की इस खुली लूट और हेल्थकेयर में बढ़ते माफियाराज पर अब देश की शीर्ष अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त रवैया अपनाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान साफ-साफ शब्दों में कहा कि:

'इलाज पाना देश के हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, और स्वास्थ्य सेवा को किसी भी सूरत में अनियंत्रित व्यापार नहीं बनने दियाजा सकता।'

अदालत ने सरकार और नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइजिंग अथॉरिटी (NPPA) को आड़े हाथों लेते हुए पूछा कि अति-आवश्यक दवाओं की कीमतें आम आदमी की पहुंच में लाने के लिए ठोस कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं? सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक दवाओं के मार्जिन और अस्पतालों के चार्ज पर एक पारदर्शी और राष्ट्रीय नीति नहीं बनेगी, तब तक गरीब और मध्यम वर्ग इसी तरह पिसता रहेगा।

अदालत ने यह भी संकेत दिया है कि सरकार को प्राइवेट अस्पतालों के रेट्स और आयुष्मान जैसी योजनाओं में हो रही अनियमितताओं पर पूरे देश में एक सख्त केंद्रीय मॉनिटरिंग सिस्टम बनाना होगा। अगर कोई अस्पताल नियमों की अनदेखी करता है या मरीजों का शोषण करता है, तो सिर्फ पैनल से हटाना काफी नहीं है, बल्कि जिम्मेदार लोगों पर आपराधिक मुकदमे भी दर्ज होने चाहिए।"

सवाल यह उठता है कि आखिर कब तक एक आम इंसान बीमारी के डर से ज्यादा अस्पताल के बिल और दवाओं के रेट से डरता रहेगा?

छत्तीसगढ़ में जो 17 अस्पतालों पर जांच की कार्रवाई शुरू हुई है और जिन दो अस्पतालों को बाहर किया गया है, यह तो बस एक शुरुआत है। अगर हर राज्य में इसी तरह ईमानदारी से निष्पक्ष जांच हो, तो देश भर के सैंकड़ों फर्जीवाड़े करने वाले अस्पताल बेनकाब होंगे।

सुप्रीम कोर्ट की इस फटकार के बाद अब गेंद केंद्र और राज्य सरकारों के पाले में है। क्या सरकारें दवाओं के एमआरपी (MRP) के खेल को खत्म करेंगी? क्या आयुष्मान योजना का लाभ वाकई बिना किसी झोल के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचेगा?

आपकी इस पर क्या राय है? क्या आपके साथ या आपके किसी परिचित के साथ भी कभी दवाओं या अस्पताल के बिलों में इस तरह की मनमानी हुई है? हमें कमेंट सेक्शन में लिखकर जरूर बताएं।


छत्तीसगड़ में किसानो से ये कैसा अन्याय


 छत्तीसगड़ में किसानो से ये कैसा अन्याय 

किसान देश की रीढ़ है', 'अन्नदाता सुखी भवः', 'किसान की आय 2022 तक दोगुनी हो जाएगी'... ये वो जुमले और नारे हैं जो हर चुनाव से पहले मंचों से गूंजते हैं। लेकिन जमीन पर सच्चाई क्या है? क्या छत्तीसगढ़ की सरकार किसान विरोधी रुख अपना रही है?

बात कड़वी है, लेकिन सच है। जिस छत्तीसगढ़ को 'धान का कटोरा' कहा जाता है, वहीं का किसान आज खाद की कालाबाजारी, फसल बीमा के गोलमाल, बकाया पैसों के लटके होने और समर्थन मूल्य के नाम पर हो रहे गणित के खेल से त्रस्त है। हालत यह है कि अब केवल विपक्षी दल ही नहीं, बल्कि आरएसएस (RSS) का अनुषांगिक संगठन भारतीय किसान संघ भी सड़क पर उतरने को मजबूर हो चुका है! जब अपने ही संगठन को नया रायपुर में रैली निकालनी पड़े और ज्ञापन सौंपना पड़े, तो समझ जाइए कि पानी सिर से ऊपर जा चुका है!"

 ₹3100 धान खरीदी और MSP की गणितीय बाजीगरी

केंद्र का MSP बढ़ाव बनाम राज्य का ₹3100 का फिक्स रेट

"आइए गणित समझते हैं, क्योंकि नेता आपको आंकड़ों के जाल में उलझाते हैं।

पिछले तीन सालों में केंद्र सरकार द्वारा धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में लगभग ₹258 की बढ़ोतरी हो चुकी है। लेकिन छत्तीसगढ़ में किसानों को धान का भाव आज भी घूम-फिरकर ₹3100 प्रति क्विंटल पर ही अटका हुआ है!

सवाल सीधा है—जब केंद्र से MSP बढ़ता है, तो उसका सीधा फायदा किसानों को राज्य की प्रोत्साहन राशि के ऊपर क्यों नहीं मिलता?

 क्या केंद्र द्वारा बढ़ाया गया पैसा किसान की जेब में जाने के बजाय कागजी समायोजन (Adjustment) में खप रहा है?

 ₹3100 का नारा देकर क्या किसानों का हक मारा जा रहा है?

चुनाव के समय बड़ी-बड़ी बातें की गईं, लेकिन आज समर्थन मूल्य की आड़ में किसानों को उनका असली हक देने में आनाकानी क्यों हो रही है? क्या किसान केवल वोट बैंक का साधन हैं?"

₹1700 करोड़ का बकाया – राजनीति में पिसता किसान


"अब बात करते हैं उस सबसे बड़े धोखे की, जो भूपेश बघेल सरकार के कार्यकाल से चला आ रहा है।

पिछली सरकार का ₹1700 करोड़ से ज्यादा का बोनस/बकाया आज तक किसानों के खातों में नहीं पहुंचा है। जब सरकार बदली, तो किसानों को उम्मीद थी कि नई सरकार आते ही यह बकाया तुरंत जारी होगा। लेकिन बहाना क्या बनाया जाता है? 'योजना पिछली सरकार की थी!'

अरे साहब, सरकारें बदलती हैं, नीतियां बदलती हैं, लेकिन क्या किसान बदल जाता है? फसल तो किसान ने उगाई थी! पसीना तो किसान ने बहाया था! फिर पिछली सरकार और नई सरकार की राजनीतिक खींचतान में किसान का पैसा क्यों फंसा हुआ है?

₹1700 करोड़ कोई छोटी रकम नहीं होती। यह छत्तीसगढ़ के लाखों किसान परिवारों के खून-पसीने की कमाई है। इसे अटका कर रखना क्या किसान-विरोधी मानसिकता का प्रमाण नहीं है?"

भारतीय किसान संघ का हल्लाबोल और जमीनी हकीकत


"अगर आपको लगता है कि यह सिर्फ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप है, तो ज़रा अपनी आंखें खोलिए।

हाल ही में भारतीय किसान संघ—जो कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ा संगठन है—उसने नया रायपुर में विशाल रैली निकाली, उग्र प्रदर्शन किया और सरकार को ज्ञापन सौंपा।

सोचिए! जो संगठन वैचारिक रूप से सत्ताधारी दल के करीब माना जाता है, उसे भी सड़कों पर उतरकर चक्काजाम और प्रदर्शन करने की नौबत क्यों आई?

कारण साफ़ है:

1. खाद की भयंकर कालाबाजारी: बोवनी और रोपाई के सीजन में किसानों को सोसायटियों में खाद नहीं मिलती। किसान लाइनों में खड़े रहते हैं, लाठियां खाते हैं, और वही खाद ब्लैक मार्केट में दोगुनी-तिगुनी कीमतों पर बेची जाती है।

2. समय पर संसाधनों का न मिलना: न बीज समय पर, न खाद समय पर, न बिजली की सही सप्लाई।

3. फसल बीमा की बदहाली: सूखा पड़े या अतिवृष्टि, फसल बीमा का पैसा कंपनियों के पेट में चला जाता है। जब किसान क्लेम करने जाता है, तो कागजी औपचारिकताओं में उसे ऐसा उलझाया जाता है कि उसे फूटी कौड़ी नहीं मिलती।

जब अपने ही संगठन सड़क पर उतरकर चेतावनी दे रहे हों, तो यह साफ है कि जमीनी हकीकत दावों से बिल्कुल उलट है।"

'आय दोगुनी' का वादा बनाम घटती कमाई की कड़वी सच्चाई


"प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के किसानों से वादा किया था कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी। आज हम 2026 में खड़े हैं!

आय दोगुनी होना तो दूर की बात है, महंगाई की वजह से किसान की लागत दोगुनी से ज्यादा बढ़ चुकी है:

 डीज़ल महंगा हो गया।

 कीटनाशक और दवाइयां महंगी हो गईं।

 खाद और बीज के दाम बढ़ गए।

 ट्रैक्टर और कृषि उपकरणों पर टैक्स की मार है।

लागत दिन-प्रतिदिन आसमान छू रही है और किसान की उपज का सही दाम गोलमाल की भेंट चढ़ रहा है। परिणाम? किसान की वास्तविक आय बढ़ने के बजाय और घटती जा रही है। कर्ज के बोझ तले दबा किसान आज भी वही सवाल पूछ रहा है—'आखिरहमारी आय दोगुनी कब होगी?'"

छत्तीसगढ़ का किसान सीधा-साधा जरूर है, लेकिन कमजोर नहीं। अगर सरकार सोचती है कि घोषणाओं का झुनझुना थमाकर, विज्ञापन चलाकर और भाषण देकर किसानों को शांत रखा जा सकता है, तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल है।

आज छत्तीसगढ़ के किसान के मुख्य सवाल यह हैं:

1. केंद्र द्वारा बढ़ाई गई MSP के हिसाब से धान का पूरा लाभ किसानों को तुरंत क्यों नहीं दिया जा रहा?

2. ₹1700 करोड़ का पुराना बकाया तुरंत जारी क्यों नहीं किया जाता?

3. खाद की कालाबाजारी करने वाले भू-माफियाओं और दलालों पर नकेल कब कसी जाएगी?

4. फसल बीमा का लाभ कंपनियों की जेब में जाने के बजाय किसान के खाते में कब पहुंचेगा?

अगर सरकार वाकई किसान हितैषी है, तो इन सवालों के जवाब कागजों पर नहीं, किसानों के बैंक खातों और सोसायटियों की व्यवस्था में दिखने चाहिए।"


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