शनिवार, 25 जुलाई 2026

सत्ता का चक्रव्यूह और अनुशासन का बुलडोज़र

 सत्ता का चक्रव्यूह और अनुशासन का बुलडोज़र

मंत्रिमंडल फेरबदल की सुगबुगाहट, दिग्गजों के तेवर और रायपुर से दिल्ली तक छिड़ी अंदरूनी महाभारत



छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों एक ऐसी हलचल मची हुई है [00:07], जिसने सत्ता के गलियारों से लेकर दिल्ली दरबार तक सरगर्मियां तेज कर दी हैं। कल तक जो भारतीय जनता पार्टी 'ऑल इज़ वेल' और 'कड़े अनुशासन' का दावा करती थी [00:15], आज उसी पार्टी के अंदरूनी खाने में छिड़ी खींचतान और महाभारत की परतें धीरे-धीरे खुलकर बाहर आने लगी हैं।

छत्तीसगढ़ में बैठी डबल इंजन की सरकार को लगभग ढाई साल पूरे होने को हैं [00:46]। चुनावी वादों और परफॉर्मेंस की समीक्षा के बीच खबर यह उठी कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय अपने मंत्रिमंडल का विस्तार और फेरबदल करना चाहते हैं [00:56]। मंशा साफ थी—खराब प्रदर्शन करने वाले मंत्रियों की छुट्टी कर अपने पसंदीदा और वफादार विधायकों को जगह देना, ताकि आगामी चुनाव के लिए नई बिसात बिछाई जा सके। लेकिन, दिल्ली से आए फरमान ने फिलहाल इस फेरबदल पर ब्रेक लगा दिया है [01:13]—"अभी रुको, देखते हैं।"

आखिर ऐसा क्या हुआ कि फेरबदल का प्रस्ताव लेकर दिल्ली गए नेतृत्व को खाली हाथ लौटना पड़ा? [01:36] बंद कमरों में हुई बैठक में ऐसा कौन सा पेंच फंसा, जिससे सत्ता और संगठन का यह मास्टर प्लान खटाई में पड़ गया?

बंद कमरे की इनसाइड स्टोरी: पाँच दिग्गजों के तेवर से फंसा पेंच

सूत्रों और अंदरूनी राजनीतिक रिपोर्टों के मुताबिक [01:56], मंत्रिमंडल फेरबदल के रास्ते में पाँच प्रमुख नेताओं के रुख और सियासी समीकरण सबसे बड़ी दीवार बनकर खड़े हो गए हैं:

1. रामविचार नेताम का असंतोष [02:09]: सरगुल ज़ोन के बड़े आदिवासी चेहरा और कद्दावर नेता रामविचार नेताम को कोर ग्रुप से हटाए जाने के बाद से वे बेहद खफा बताए जा रहे हैं [04:54]। सरगुजा संभाग में आदिवासियों के बीच उनके असर को देखते हुए पार्टी के लिए उनकी नाराजगी को दरकिनार करना इतना आसान नहीं दिख रहा है [05:02]।

2. रेणुका सिंह का खुलकर सामने आना [02:09]: पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ विधायक रेणुका सिंह के नाम से वायरल हुए कथित ऑडियो ने सियासी माहौल में आग में घी डालने का काम किया है [05:21]। हालाँकि, ऑडियो की आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन इसने पार्टी के भीतर पनप रहे असंतोष को उजागर कर दिया है [05:30]। कांग्रेस भी इस मौके को लपकते हुए साय सरकार को 'रिमोट कंट्रोल से चलने वाली सरकार' बताकर हमलावर है [05:46]।

3. विजय शर्मा और गृह मंत्रालय की खींचतान [02:09]: गृह मंत्री विजय शर्मा को लेकर चर्चा है कि राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति और राजधानी में चाकूबाजी/अपराधों की घटनाओं के चलते [06:51] उन्हें दिल्ली की केंद्रीय संगठन राजनीति में शिफ्ट करने का प्रस्ताव था [07:08]। लेकिन खबरें हैं कि विजय शर्मा न केवल प्रदेश छोड़ने को तैयार नहीं हैं, बल्कि गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी भी अपने पास ही रखना चाहते हैं [07:16]।

4. ओपी चौधरी और पसंद-नापसंद की सूची [02:09]: फेरबदल की कवायद में ओपी चौधरी द्वारा सौंपी गई संभावित सूची को लेकर भी तालमेल का अभाव दिखा [07:44]। सूची में शामिल कुछ नामों और बदलाव के तरीकों पर शीर्ष नेतृत्व व मंत्रियों के बीच अनबन की खबरें छन-छन कर बाहर आ रही हैं [08:06]।

5. डिप्टी सीएम अरुण साव और साहू वोट बैंक का समीकरण [02:09]: उप-मुख्यमंत्री और साहू समाज के बड़े चेहरे अरुण साव के विभागों को लेकर भी कई सवाल उठ रहे थे [08:35]। चर्चा थी कि उनका विभाग बदला जा सकता है या फेरबदल की गाज गिर सकती है [08:45]। लेकिन, साहू समाज के विशाल वोट बैंक और पार्टी के अंदरूनी समीकरणों के चलते यह फैसला इतना आसान नहीं रहा [08:24]।

शिकायतों का गुबार और 'सत्ता बचाने' की हिदायत

हाल ही में आयोजित बीजेपी की उच्चस्तरीय बैठकों में दिल्ली से आए पर्यवेक्षकों व नेताओं के सामने मंत्रियों के प्रदर्शन, उनके ओएसडी (OSD) व विशेष सहायकों की कार्यशैली को लेकर जमकर शिकायतें पहुँची थीं [03:28]।

दिल्ली के केंद्रीय नेतृत्व ने विधायकों और नेताओं को शांत करते हुए कड़ा संदेश भी दिया था—"सत्ता चली गई तो किसी के पास कुछ नहीं बचेगा [04:11] आपसी नाराजगी भूलकर संगठन के लिए काम कीजिए, आपकी शिकायतों पर गंभीरता से विचार किया जाएगा [04:19]"

आगे क्या? अनुशासन की परीक्षा और बड़ा सवाल

फिलहाल, फेरबदल का यह पेंच सुलझने के बजाय और उलझ गया है [09:25]। दिग्गजों के रुख ने यह साबित कर दिया है कि सत्ता संतुलन बनाना किसी चुनौती से कम नहीं है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या आने वाले दिनों में केंद्रीय नेतृत्व इस उलझे हुए समीकरण को सुलझा पाएगा, या फिर असंतोष के इस गुबार के बीच फेरबदल की योजना लंबे समय के लिए ठंडे बस्ते में चली जाएगी? [09:45] राजनीति के इस शतरंज पर छत्तीसगढ़ की जनता और राजनीतिक विश्लेषकों की नज़रें लगातार बनी हुई हैं।

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शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

सीजी में डॉक्टर बनने के लिए ‘पूजा खेडकर’ स्टाइल फर्जीवाड़ा:

 


डॉक्टर बनने के लिए ‘पूजा खेडकर’ स्टाइल फर्जीवाड़ा: बिलासपुर तहसील से EWS के नाम पर जारी हुए फर्जी सर्टिफिकेट, जांच में खुली पोल

 MBBS वेरिफिकेशन में पकड़ में आया फर्जीवाड़ा; तहसीलदार के जाली दस्तखत से बने थे आर्थिक पिछड़ा वर्ग के प्रमाण पत्र

 भाजपा नेता और रसूखदारों पर उठे गंभीर सवाल, क्या सिर्फ बाबू पर गाज गिराकर मामले को दबाने की हो रही कोशिश?

विशेष संवाददाता | रायपुर/बिलासपुर

महाराष्ट्र की चर्चित ट्रेनी आईएएस पूजा खेडकर का फर्जी सर्टिफिकेट प्रकरण अभी देश के जेहन से मिटा भी नहीं था कि छत्तीसगढ़ में ठीक उसी तर्ज पर एमबीबीएस (MBBS) में सीट हासिल करने के लिए फर्जी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) प्रमाण पत्र जारी करने का बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर हुआ है। बिलासपुर तहसील कार्यालय की आड़ में रसूखदारों और भू-माफियाओं की साठगांठ से फर्जी सील-सिक्के और तहसीलदार के फर्जी हस्ताक्षरों से EWS सर्टिफिकेट जारी कर दिए गए।

इस पूरे खेल का भंडाफोड़ तब हुआ जब नीट (NEET) के जरिए एमबीबीएस में प्रवेश के बाद मेडिकल काउंसिल और प्रशासनिक स्तर पर भौतिक सत्यापन (वेरिफिकेशन) किया गया। जांच में सामने आया कि जिन रोल नंबर और दस्तखत के आधार पर गरीब कोटे (EWS) से डॉक्टरों की पढ़ाई की सीट ली गई थी, उनका तहसील कार्यालय के सरकारी रिकॉर्ड से कोई वास्ता ही नहीं था।

तहसीलदार के फर्जी हस्ताक्षर, भाजपा नेता की बेटी समेत तीन छात्राओं के नाम उजागर

मामले की जब गहराई से पड़ताल की गई तो बिलासपुर तहसील में पदस्थ तहसीलदार गरिमा सिंह के नाम से जारी सात प्रमाण पत्रों पर संदेह हुआ। जब इन हस्ताक्षरों का मिलान तहसीलदार के असल हस्ताक्षरों से कराया गया, तो दस्तखत पूरी तरह जाली पाए गए।

अब तक सामने आए तीन प्रमुख मामलों में बिलासपुर के सरकंडा और सीपत क्षेत्र के रसूखदारों के नाम सामने आए हैं:

1. सुभान सिंह गुप्ता: बिलासपुर (सरकंडा) निवासी भाजपा नेता सतीश गुप्ता की बेटी।

2. भाव्या मिश्रा: सरकंडा निवासी सूरज मिश्रा की बेटी।

3. सुहानी सिंह: सीपत निवासी सुधीर कुमार सिंह की बेटी।

आरोप है कि इन सभी ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के कोटे का नाजायज फायदा उठाने के लिए कूटरचित (फर्जी) दस्तावेज तैयार कराए।

सिर्फ बाबू को नोटिस या आकाओं पर भी होगी कार्रवाई?

फर्जीवाड़े की बू आते ही शुरुआती प्रशासनिक खानापूर्ति करते हुए संबंधित बाबू को शो-कॉज (कारण बताओ) नोटिस थमा दिया गया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या बिना किसी प्रशासनिक संरक्षण और सत्ता-संगठन के प्रभाव के इतनी बड़ी जालसाजी मुमकिन है?

स्थानीय चर्चाओं और सूत्रों की मानें तो इस पूरे नेक्सस (गिरोह) के पीछे भाजपा नेता सतीश गुप्ता व अन्य रसूखदारों की मुख्य भूमिका बताई जा रही है, जिन्होंने तहसील कार्यालय की लचर व्यवस्था और दलालों के साथ मिलकर यह पूरा ताना-बाना बुना।

जाति से लेकर दिव्यांग कोटे तक; क्या पूरे प्रदेश में फैला है फर्जी प्रमाण पत्रों का दीमक?

यह कोई पहला मौका नहीं है जब राज्य में इस तरह का फर्जीवाड़ा सामने आया हो। इससे पहले भी प्रदेश के कई जिलों में फर्जी दिव्यांग (PWD) और फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाकर मेडिकल, इंजीनियरिंग और यहां तक कि राज्य लोक सेवा आयोग (CGPSC) के जरिए डिप्टी कलेक्टर और पुलिस सेवा में नौकरी पाने के संगीन आरोप लगते रहे हैं। राज्य के वास्तविक दिव्यांग युवा लंबे समय से फर्जी प्रमाण पत्र धारकों के खिलाफ आंदोलन करते आ रहे हैं, लेकिन हर बार मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।

बिलासपुर का यह मामला तो महज "आइसबर्ग का सिरा" (सिर्फ एक हिस्सा) माना जा रहा है। अगर निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच (SIT या न्यायिक जांच) बैठाई जाए, तो EWS और अन्य आरक्षित कोटों के तहत पिछले कुछ सालों में हुए सैकड़ों दाखिलों और नौकरियों की पोल खुल सकती है।

उठते तीखे सवाल:

1. सत्ता का संरक्षण: जब भाजपा नेता की बेटी का नाम सीधे तौर पर फर्जी EWS मामले से जुड़ रहा है, तो क्या निष्पक्ष कार्रवाई होगी या मामले को दबाने का खेल शुरू हो चुका है?

2. असली पीड़ितों का हक किसने मारा?: जिन वास्तविक गरीब और मेधावी छात्र-छात्राओं का EWS कोटे पर अधिकार था, उनका भविष्य इस रसूखदार फर्जीवाड़े की बलि चढ़ गया।

3. सिस्टम का कौन सा पेंच ढीला?: क्या बिलासपुर तहसील कार्यालय फर्जी दस्तावेज बनाने की फैक्ट्री बन चुका है? सिर्फ निचले कर्मचारी को बलि का बकरा बनाकर बड़े मगरमच्छों को बचाने का प्रयास क्यों?

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गुरुवार, 23 जुलाई 2026

साय सरकार का उद्योगों से ये कैसा डील

साय सरकार का उद्योगों से ये कैसा डील


एमओयू और प्लेसमेंट कैंपों के खोखले दावों के बीच पिस रही छत्तीसगढ़ की युवा पीढ़ी; सस्ती जमीन और संसाधनों के एवज में राज्य को क्या मिला?


'इन्वेस्ट गढ़ छत्तीसगढ़' के गूंजते नारों और हजारों करोड़ रुपये के एमओयू (MoU) के बड़े-बड़े विज्ञापनों के बीच छत्तीसगढ़ का युवा आज एक बुनियादी सवाल पूछ रहा है—आखिर यह चमक-दमक किसके लिए है? प्रदेश में रोजगार के नाम पर एमओयू के रंग-बिरंगे पोस्टर तो सज रहे हैं, लेकिन धरातल पर न तो बड़ी फैक्ट्रियां आकार ले रही हैं और न ही स्थानीय युवाओं के चूल्हे जल रहे हैं [01:06]।

पंजीकृत बेरोजगारों की लंबी कतार

सरकारी फाइलों और आंकड़ों पर नजर डालें तो प्रदेश में पंजीकृत बेरोजगारों की स्थिति काफी भयावह नजर आती है। रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत आंकड़ों के अनुसार:

 12वीं पास: 4,08,049 युवा [02:48]

 तकनीकी शिक्षा प्राप्त: 3,54,811 युवा [02:58]

 स्नातक (Graduate): 2,61,412 युवा [03:06]

 स्नातकोत्तर (Post Graduate): 1,56,998 युवा [03:10]

 10वीं पास: 63,880 युवा [03:15]

लाखों डिग्रीधारी युवाओं की इस जमात को स्थायी सरकारी या औद्योगिक नौकरियों के बजाय 'प्लेसमेंट कैंपों' के भरोसे छोड़ दिया गया है [02:17]।

प्लेसमेंट शो: महा-आयोजन या महज औपचारिकता?

सरकारी स्तर पर अब तक 556 से अधिक प्लेसमेंट कैंप आयोजित किए जा चुके हैं, जिन पर भारी-भरकम राशि खर्च की गई [02:25]। लेकिन इनका परिणाम क्या रहा?

हालिया आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024-25 में आयोजित 311 प्लेसमेंट कैंपों में 3,000 से अधिक अभ्यर्थी पहुंचे, जिनमें से केवल 534 युवाओं को नौकरी मिल सकी [04:35]। वहीं वर्ष 2025-26 के 245 आयोजनों में यह आंकड़ा सिमटकर 449 पर ही रह गया [04:50]। हाल ही में हुए एक आयोजन में 6,366 युवाओं ने रुचि दिखाई, 18,000 को बुलाया गया, लेकिन महज 290 लोग ही पहुंचे [04:08]।

युवाओं के इस मोहभंग का मुख्य कारण है:

1. अत्यधिक कम वेतन: 4 साल की इंजीनियरिंग के बाद भी 8,000 से 9,000 रुपये प्रति माह का ऑफर [01:46, 11:00]।

2. अमानवीय काम के घंटे: बिना किसी सुरक्षा या मेडिकल सुविधा के 12 से 14 घंटे काम [05:11, 06:40]।

3. अस्थायी नौकरी: 6 महीने का कॉन्ट्रैक्ट, जिसमें न पीएफ (PF) की गारंटी है और न ही नौकरी की स्थायित्व [06:40]।

एमओयू का सच: जमीन पर सन्नाटा

राज्य सरकार ने स्टील प्लांट, सोलर हब और आईटी सेक्टर के नाम पर कई बड़े उद्योगपतियों के साथ एमओयू किए हैं [05:36]। परंतु रायपुर, बिलासपुर, भिलाई जैसे बड़े औद्योगिक केंद्रों में भी ऐसी कोई नई बड़ी फैक्ट्री खड़ी नहीं दिखती जो 5,000 स्थानीय युवाओं को सम्मानजनक रोजगार दे सके [05:59]। कई कंपनियां सैकड़ों एकड़ उपजाऊ जमीन अधिग्रहित कर सिर्फ बाउन्ड्री वॉल बनाकर गायब हो चुकी हैं [09:04]।

'स्किल' के नाम पर छलावा और बाहरी बनाम स्थानीय का खेल

जब भी नए उद्योग स्थापित होते हैं, प्रबंधन 'कुशल जनशक्ति' (Skilled Manpower) की कमी का हवाला देकर स्थानीय युवाओं को दरकिनार कर देता है [06:51]।

 मैनेजर और इंजीनियर: बिहार, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, गुजरात और मुंबई जैसे राज्यों से बुलाए जाते हैं [07:45]।

 स्थानीय युवाओं की स्थिति: जिन ग्रामीणों की जमीनें फैक्ट्री के नाम पर ली गईं, वे अपनी ही जमीन पर गार्ड या लेबर की नौकरी पाने के लिए राजनीतिक पहुंच और सिफारिशें लगाने को मजबूर हैं [08:24, 11:21]।

हाल ही में बेरला की बारूद फैक्ट्री और धरसींवा के औद्योगिक हादसों में भी यह उजागर हुआ कि वहां सुरक्षा मानकों की अनदेखी के साथ-साथ मजदूरों तक की भर्तियां बाहरी राज्यों से की गई थीं [08:04]।

युवाओं का दर्द: "डिग्री हमारी, जमीन हमारी, पर रोजगार दूसरों का"

 एक इंजीनियरिंग छात्र का कहना है: "हम लाखों रुपये खर्च कर चार साल पढ़ाई करते हैं ताकि बड़ा अफसर बनें, लेकिन हमें 9,000 रुपये में 14 घंटे खटने का ऑफर मिलता है।" [10:48]

 एक प्रभावित ग्रामीण ने बताया: "फैक्ट्री लगाने के वक्त बड़े-बड़े वादे किए गए थे। आज हमारी खेती भी चली गई और अब हमें सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी के लिए भी गिड़गिड़ाना पड़ता है।" [11:12]

अनुत्तरित सवाल

1. यदि राज्य का जल, जंगल, कोयला, लोहा और बॉक्साइट उद्योगपतियों को रियायती दरों पर दिया जा रहा है, तो उसके बदले स्थानीय युवाओं को गारंटीड रोजगार क्यों नहीं मिल रहा? [08:44, 10:02]

2. एमओयू के नाम पर जमीन रोककर बैठने वाली और रोजगार न देने वाली कंपनियों पर कड़ा एक्शन क्यों नहीं लिया जाता? [09:14]

3. क्या प्लेसमेंट कैंपों के नाम पर सिर्फ आंकड़ेबाजी और बजट का खेल चल रहा है? [09:40]

छजीसगढ़ का टैलेंट और संसाधन दोनों दांव पर हैं [10:02]। यदि सरकार ने ठोस नीतियां बनाकर स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता नहीं दी, तो 'विकास' का यह ढांचा सिर्फ कागजों और विज्ञापनों तक ही सीमित रह जाएगा [01:27]।

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