शनिवार, 8 अगस्त 2026

महतारी वंदन: पोर्टल का ताला!

 महतारी वंदन: पोर्टल का ताला!


28 महीने, 3 लाख नई विवाहित बेटियां और बंद पोर्टल—क्या चुनावी मास्टरस्ट्रोक अब छत्तीसगढ़ के सरकारी बजट पर भारी पड़ रहा 

छत्तीसगढ़ में 'कथनी और करनी' का अंतर कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब मामला राज्य की आधी आबादी के आर्थिक स्वावलंबन का हो, तो सरकार की हर नीति और नीयत पर जनता की गहरी नज़र होती है। चुनाव के दौरान मंचों से गूंजने वाला 'महतारी वंदन योजना' का वादा सत्ता मिलते ही जिस तेजी से प्रशासनिक उलझनों और बंद पोर्टलों के पीछे छुपाया जा रहा है, उसने राज्य के लाखों मध्यमवर्गीय और ग्रामीण परिवारों में आक्रोश की चिन्गारी भड़का दी है।

1. 'सतत' योजना पर 28 महीने का ताला

चुनाव के दौरान और योजना के शुभारंभ के समय मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और राज्य सरकार ने बड़े तामझाम के साथ घोषणा की थी कि महतारी वंदन योजना एक 'सतत प्रक्रिया' (Continuous Process) होगी। इसका सीधा अर्थ था कि जैसे-जैसे राज्य में बेटियों के हाथ पीले होंगे या वे पात्रता उम्र (21 वर्ष) पूरी करेंगी, उन्हें बिना किसी अड़चन के प्रति माह ₹1,000 की सम्मान राशि मिलने लगेगी।

मार्च 2024 में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस योजना की औपचारिक शुरुआत की थी। लेकिन मार्च 2024 से जुलाई 2026 तक के 28 महीनों के सफर की धरातलीय सच्चाई यह है कि सरकारी पोर्टल पर ताला जड़ दिया गया है।

छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार, राज्य में हर साल औसतन 1.5 लाख से 2 लाख बेटियों की शादी होती है। इस गणित से बीते 28 महीनों में राज्य की 3 लाख से अधिक नवविवाहिताएं इस योजना के प्रशासनिक दायरे में कानूनी और नीतिगत रूप से हकदार बन चुकी हैं। परंतु, जब ये महिलाएं आंगनबाड़ी केंद्रों या लोक सेवा केंद्रों (चॉइस सेंटर) का चक्कर लगाती हैं, तो उन्हें एक ही जवाब मिलता है—"सरकार ने पोर्टल बंद कर दिया है, नए फॉर्म स्वीकार नहीं होंगे।

"1,000 की यह राशि केवल एक सरकारी मदद नहीं, बल्कि ग्रामीण और निम्न-मध्यमवर्गीय महिलाओं के लिए उनके आत्मसम्मान और छोटी-मोटी आत्मनिर्भर जरूरतों का एकमात्र जरिया है। ऐसे में पोर्टल पर ताला लगाना महिलाओं के अधिकार पर प्रशासनिक प्रहार है

2. 'साइलेंट छंटनी': सत्यापन के नाम पर नाम काटने का खेल

कहानी का सबसे बड़ा और चिंताजनक पहलू यह है कि एक तरफ जहां नई पात्र महिलाओं को जोड़ने का रास्ता बंद कर दिया गया है, वहीं दूसरी तरफ पहले से पंजीकृत महिलाओं के नाम चुपचाप काटे जा रहे हैं।

मानसून सत्र के दौरान विधानसभा में गूंजे सवालों ने शासन की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए। महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े ने विधानसभा के पटल पर यह स्वीकार किया कि सत्यापन (Verification) प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर लाभार्थियों के नाम छांटे गए हैं।

[बॉक्स: विधानसभा में सरकार की दलील और आधिकारिक तर्क]

 मृत्यु के मामले: सरकार के अनुसार कई पंजीकृत लाभार्थियों की मृत्यु हो जाने के कारण नाम हटाए गए।

 आयकरदाता एवं शासकीय सेवा: कई मामलों में पाया गया कि लाभार्थी परिवार का कोई सदस्य आयकर दाता है या शासकीय सेवा में है। सरकार ऐसे मामलों में नाम काटने के साथ-साथ दी गई राशि की रिकवरी (वसूली) भी कर रही है।

 गलत तथ्य प्रस्तुत करना: शुरुआती दौर में हड़बड़ी में भरे गए फॉर्मों में दी गई गलत जानकारी का हवाला देकर नाम पृथक किए जा रहे हैं।

हालांकि, विपक्ष और विभागीय सूत्रों का दावा है कि सत्यापन के नाम पर अब तक 1.5 लाख से अधिक महिलाओं के नाम काटे जा चुके हैं। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह केवल प्रक्रियात्मक शुद्धिकरण है या फिर सरकारी खजाने पर बढ़ते आर्थिक बोझ को कम करने का एक 'साइलेंट फार्मूला'?

3. बजट का गणित: क्या भारी पड़ने लगी है योजना?

महतारी वंदन योजना के तहत वर्तमान में लगभग 69 लाख महिलाओं को हर महीने ₹1,000 की राशि हस्तांतरित की जा रही है। इसका सालाना बजटीय आवंटन लगभग ₹8,000 करोड़ बैठता है।

राज्य के कुल राजस्व बजट में ₹8,000 करोड़ का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। सूत्रों के मुताबिक, सत्यापन के जरिए हर महीने की जा रही छंटनी से सरकार के करोड़ों रुपये बच रहे हैं। यही वजह है कि जानकार इस बात से इनकार नहीं कर रहे कि बजटीय दबाव के चलते ही नए आवेदनों के लिए पोर्टल खोलने में शासन द्वारा लगातार देरी की जा रही है।

4. तीखे सवाल: शासन की नीयत और भविष्य का रास्ता

महतारी वंदन योजना के इस चक्रव्यूह ने राज्य के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में तीन बड़े यक्ष प्रश्न खड़े कर दिए हैं:

1. सतत प्रक्रिया का वादा कहां गया? जब योजना लागू करते समय इसे निरंतर चलने वाली प्रक्रिया बताया गया था, तो 28 महीनों से नए आवेदनों के लिए पोर्टल बंद क्यों है?

2. एरियर और बैकडेट पात्रता का क्या? भविष्य में जब भी पोर्टल पुनः खोला जाएगा, क्या मार्च 2024 से अब तक शादीशुदा हुई बेटियों को उनकी शादी या पात्रता की तिथि से पूरा एरियर दिया जाएगा?

3. बची हुई राशि का क्या इस्तेमाल? नाम काटने और सत्यापन के जरिए जो करोड़ों रुपये बचाए जा रहे हैं, क्या उनका इस्तेमाल नई पात्र महिलाओं को जोड़ने में होगा या बजटीय घाटा पटाने में?

[संपादकीय निष्कर्ष]

लोकतंत्र में योजनाएं चुनाव जीतने का जरिया हो सकती हैं, लेकिन वे जनता के भरोसे की बुनियाद होती हैं। महतारी वंदन योजना ने राज्य की लाखों महिलाओं में एक उम्मीद जगाई थी। यदि बजटीय सीमाओं के चलते सरकार इस योजना से हाथ खींच रही है या नए आवेदकों के लिए दरवाजे बंद रख रही है, तो यह प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों ही मोर्चों पर सवाल खड़े करता है। अब देखना यह होगा कि क्या साय सरकार आने वाले समय में पोर्टल खोलकर नवविवाहिताओं को उनका हक देती है या फिर यह इंतजार अगले चुनावों तक लंबा खींचता है।

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शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

खाकी का खूनी सच—क्या रक्षक ही बन बैठे हैं भक्षक?

  खाकी का खूनी सच—क्या रक्षक ही बन बैठे हैं भक्षक?



 बंद कमरों में कानून का कत्ल

जिस खाकी को जनता की सुरक्षा और कानून की रखवाली का जिम्मा सौंपा गया है, जब वही पुलिस लॉकअप के बंद कमरों में जुल्म और हिंसा की सीमाएं लांघ जाए, तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ही नहीं, बल्कि आम नागरिक की न्याय व्यवस्था पर से आस्था डिगने लगती है।

छत्तीसगढ़ के सरगुजा-बस्तर से लेकर उत्तर प्रदेश, बिहार और तमिलनाडु तक—हिरासत में टॉर्चर और मौत (Custodial Death) के मामले देश की न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। हाल ही में छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर से आए एक 7 साल पुराने मामले में अदालत के सख्त रुख ने एक बार फिर बहस छेड़ दी है कि क्या कानून के रखवाले ही कानून के हत्यारे बन रहे हैं?

1. अंबिकापुर का पंकज बेग मामला: 7 साल बाद अदालत का बड़ा हथौड़ा

अंबिकापुर (छत्तीसगढ़) के कोतवाली थाने का मामला वर्ष 2019 का है [02:48]। सूरजपुर जिले के अग्नाहारी गांव के रहने वाले आदिवासी युवक पंकज बेग को पुलिस ने केवल एक मामूली चोरी के संदेह में 21 जुलाई 2019 को हिरासत में लिया था [03:02]।

अगले ही दिन (22 जुलाई 2019) पंकज की लाश थाने से कुछ दूरी पर फंदे से लटकी मिली [03:28]। पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए एक थ्योरी गढ़ी कि आरोपी लॉकअप से फरार हो गया था और उसने आत्महत्या कर ली [03:41]। दूसरी तरफ, परिजनों का सीधा आरोप था कि पंकज को लॉकअप में ही पीट-पीटकर मार डाला गया और मामले की लीपापोती करने के लिए उसे फांसी पर लटकाकर फरारी का नाटक रचा गया [03:52]।

 विधानसभा से सड़कों तक प्रदर्शन: इस आदिवासी युवक की मौत के बाद भारी राजनीतिक और सामाजिक बवाल हुआ [04:27]। तत्कालीन थाना प्रभारी (TI) समेत 5 पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया और IPC धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत मामला दर्ज किया गया [04:51]।

 फाइल बंद करने की कोशिश और कोर्ट का हस्तक्षेप: समय बीतने के साथ पुलिस प्रशासन ने मामले पर पर्दा डालने और क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने की कोशिश की [05:08]। परंतु 30 जून 2026 को अंबिकापुर के सप्तम अपर सत्र न्यायाधीश ने पुलिस की 'आत्महत्या व फरारी' की कहानी को सिरे से खारिज कर दिया [05:36]।

 री-इन्वेस्टिगेशन और SIT का गठन: अदालत ने मामले की दोबारा जांच (Re-investigation) का आदेश देते हुए सरगुजा SP की देखरेख में स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) गठित करने का निर्देश दिया [06:08]। परिजन अब भी निष्पक्षता के लिए मामले की CBI जांच की मांग कर रहे हैं [06:19]।

2. देश भर में हिरासत में मौतों के भयावह आंकड़े

अंबिकापुर का मामला कोई इकलौती घटना नहीं है। एनसीआरबी (NCRB) के आंकड़े गवाही देते हैं कि देश में हर साल 2,000 से अधिक लोगों की मौत पुलिस/न्यायिक हिरासत में होती है, जिनमें से 150 से 200 मौतें सीधे पुलिस लॉकअप के भीतर दर्ज की जाती हैं [01:41]।

 उत्तर प्रदेश और बिहार की स्थिति: उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में कस्टोडियल टॉर्चर और एनकाउंटर की थ्योरी पर लगातार सवाल उठते रहे हैं [02:05]।

 बिहार का भरत तिवारी एनकाउंटर मामला: हाल ही में बिहार में भरत तिवारी एनकाउंटर मामले को लेकर सोशल मीडिया और आम जनता में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली, जहाँ पुलिसिया कार्रवाई के वीडियो सामने आने पर कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक मंशा पर सीधे सवाल खड़े हुए [02:05]।

3. तमिलनाडु का सात्तांकुलम (Sathankulam) केस: न्याय की एक ऐतिहासिक नजीर

जब भी पुलिस टॉर्चर और हिरासत में मौत की बात होती है, तमिलनाडु का चर्चित सात्तांकुलम (साधना कुलम) मामला सबसे बड़ी नजीर बनकर सामने आता है [06:37]।

 क्या था मामला? लॉकडाउन के दौरान मामूली दुकान समय सीमा का उल्लंघन करने पर पुलिस पिता-पुत्र (जयराज और बेनिक्स) को उठाकर थाने ले गई और रात भर बर्बरतापूर्वक पीट-पीटकर उनकी हत्या कर दी [06:46]।

 अदालत का ऐतिहासिक फैसला: मदुरै कोर्ट और जांच एजेंसियों के कड़े रुख के बाद आरोपी 9 पुलिसकर्मियों को कड़ा सबक सिखाया गया [06:55]। अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी की थी कि "जो कानून के रक्षक हैं, उन्होंने ही कानून का कत्ल किया है।" [07:05]

 अंबिकापुर केस के लिए उम्मीद: तमिलनाडु का यह फैसला देश भर के कस्टोडियल डेथ मामलों के लिए एक नजीर बन चुका है [07:15]। यदि तमिलनाडु में बर्बरता करने वाले पुलिसकर्मी कानून के शिकंजे में आ सकते हैं, तो छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में 5 पुलिसकर्मियों पर कानून का शिकंजा क्यों नहीं कसा जा सकता? [07:27]

4. सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस और संवैधानिक अधिकार

भारत के संविधान और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार:

1. सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी पुलिस की: यदि कोई व्यक्ति पुलिस की हिरासत में है, तो उसकी शारीरिक सुरक्षा की 100% जिम्मेदारी पुलिस प्रशासन की होती है [07:44]।

2. सामान्य या प्राकृतिक मौत का बहाना नहीं: कस्टडी में हुई किसी भी संदिग्ध मौत को आसानी से 'आत्महत्या' या 'प्राकृतिक मौत' बताकर खारिज नहीं किया जा सकता [07:58]।

3. डी.के. बासु गाइडलाइन्स: सुप्रीम कोर्ट की डी.के. बासु गाइडलाइन्स के तहत गिरफ्तारी के दौरान परिजनों को सूचना देना, मेडिकल जांच कराना और टॉर्चर न करना अनिवार्य है।

निष्कर्ष: क्या अंबिकापुर के पीड़िता परिवार को मिलेगा न्याय?

अंबिकापुर कोर्ट का नया आदेश पुलिस विभाग की कार्यशैली पर करारा तमाचा है। अब देखना यह होगा कि सरगुजा पुलिस की SIT इस मामले में कितनी निष्पक्षता से जांच करती है या परिजनों की CBI जांच की मांग को स्वीकार किया जाता है [08:06]।

सवाल केवल एक पंकज बेग या जयराज-बेनिक्स का नहीं है; सवाल इस बात का है कि क्या खाकी वर्दी पहनने वाले अधिकारियों को कानून से ऊपर रहने की छूट मिलती रहेगी, या न्याय का हथौड़ा इसी तरह चलता रहेगा?

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गुरुवार, 6 अगस्त 2026

ई-20 का 'साइलेंट किलर': गाड़ियों का 'इंजन तबाह', जेबें साफ़, और अब कोर्ट की ऐतिहासिक 'फटकार'!

 ई-20 का 'साइलेंट किलर': गाड़ियों का 'इंजन तबाह', जेबें साफ़, और अब कोर्ट की ऐतिहासिक 'फटकार'!


प्रदूषण कम करने और ग्रीन फ्यूल के नाम पर मिल रहा इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल गाड़ियों के इंजनों में 'सफेद दही' जमा कर रहा है। रायपुर उपभोक्ता आयोग के एक फैसले ने मारुति सुजुकी और ऑटो कंपनियों की नींद उड़ा दी है। जानिए कैसे हरित क्रांति का यह दावा आम आदमी के लिए जी का जंजाल बन गया है!

1. मेहनत की कमाई और 'दीमक' बना ईंधन

जिस पेट्रोल पंप पर आप हर महीने हज़ारों रुपये का ईंधन अपनी चमचमाती कार या बाइक में डलवाते हैं, क्या वही ईंधन आपकी गाड़ी को अंदर ही अंदर खत्म कर रहा है?

ग्रीन एनर्जी और विदेशी मुद्रा बचाने के ढोल के बीच एक कड़वी सच्चाई सामने आई है—E-20 पेट्रोल (20% इथेनॉल मिश्रित ईंधन)। सड़कों पर सरपट दौड़ती गाड़ियों के साइलेंसर और फ्यूल टैंक में 'सफेद दही' या गाढ़ा चिपचिपा कचरा जमा हो रहा है, जिससे गाड़ियाँ अचानक बीच सड़क पर खड़ी हो रही हैं और इंजन 'चोक' हो रहे हैं।

2. ऐतिहासिक फैसला: रायपुर से उठी न्याय की गूंज

यह कोई काल्पनिक कहानी या हवाई दावा नहीं है, बल्कि देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी Maruti Suzuki को लगा वह कानूनी झटका है, जिसने पूरे ऑटोमोबाइल सेक्टर में खलबली मचा दी है।

मामला क्या था?

 पीड़ित: रायपुर (छत्तीसगढ़) के जाने-माने नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. प्रेमराज देवता।

 घटनाक्रम: जून 2024 में उन्होंने मैक्स मैगनेटो (रायपुर) से Maruti Grand Vitara (स्ट्रांग हाइब्रिड) कार खरीदी।

 धोखाधड़ी खराबी: डॉक्टर साहब को नई गाड़ी बताकर 2023 मॉडल की कार थमा दी गई। गाड़ी जब 21,000 किलोमीटर चली, तो बीच सड़क पर हिचकोले खाकर बंद होने लगी और डैशबोर्ड पर Engine Malfunction की वार्निंग लाइट जल उठी।

 कंपनी का पल्ला झाड़ना: 5 बार सर्विस सेंटर जाने के बाद भी कंपनी और डीलर ने सारा ठीकरा ग्राहक के सिर फोड़ दिया—दावा किया कि "आपने मिलावटी पेट्रोल डाला है।"

लैब टेस्ट में खुला खौफनाक सच

जब पेट्रोल का लैब टेस्ट कराया गया, तो रिपोर्ट ने सबको चौंका दिया! पेट्रोल मिलावटी नहीं था, बल्कि यह वही E-20 (इथेनॉल ब्लेंडेड) पेट्रोल था जो सरकार के आदेश पर हर पंप पर धड़ल्ले से बिक रहा है। इथेनॉल नमी सोखकर टैंक के नीचे गाढ़ा, दही जैसा पदार्थ जमा कर रहा था, जिसने पूरी फ्यूल सप्लाई लाइन को जाम कर दिया था।

3. उपभोक्ता आयोग का कड़ा चाबुक: "कंपनियों की जिम्मेदारी, ग्राहक की नहीं!"

उपभोक्ता आयोग (रायपुर) के अध्यक्ष प्रशांत कुंडू और सदस्य डॉ. आनंद वर्गीस की बेंच ने मारुति सुजुकी और डीलर के तमाम तर्कों की धज्जियाँ उड़ा दीं।

कोर्ट की ऐतिहासिक टिप्पणी:

"आज देश के हर पेट्रोल पंप पर डिफ़ॉल्ट रूप से E-20 पेट्रोल ही मिल रहा है। आम नागरिक के पास बिना इथेनॉल वाला पेट्रोल चुनने का कोई विकल्प (Choice) नहीं है। ऐसे में यह पूरी तरह कार निर्माता कंपनियों की जवाबदेही है कि वे ऐसे वाहन बनाकर बेचें जो इस ईंधन को बिना किसी खराबी के झेल सकें। यदि गाड़ियाँ यह ईंधन नहीं सह पा रही हैं, तो यह सीधे तौर पर अनुचित व्यापार व्यवहार (Unfair Trade Practice) और सेवा में गंभीर कमी है।"

फैसला:

1. ग्राहक को नई कार दी जाए या पूरे पैसे (लगभग ₹20 लाख+) ब्याज सहित वापस किए जाएँ।

2. ₹1 लाख का भारी जुर्माना और केस का कानूनी खर्च भी चुकाया जाए।

4. ई-20 का गणित और तकनीकी खतरा: क्यों 'जहर' बन रहा इथेनॉल?

 नमी सोखने की प्रवृत्ति (Hygroscopic Nature): इथेनॉल हवा से नमी (पानी) सोखता है। यदि आपकी गाड़ी 4-5 दिन भी खड़ी रह जाए, तो इथेनॉल पानी सोखकर पेट्रोल से अलग हो जाता है।

 रबर और मेटल का क्षरण: पुरानी गाड़ियों (2023 से पहले बनी) के रबर होस (Hoses), सील और मेटल टैंक इथेनॉल के केमिकल रिएक्शन को नहीं झेल पाते, जिससे वे गलने लगते हैं।

 माइलेज में 5 से 10% की गिरावट: खुद सरकारी डेटा और ऑटो एक्सपर्ट्स स्वीकार करते हैं कि इथेनॉल मिश्रित ईंधन से वाहनों का माइलेज 5 किमी/लीटर तक गिर जाता है। यानी ब्रोशर में माइलेज देखकर गाड़ी खरीदने वाला ग्राहक शुरू से ही ठगा जा रहा है।

5. देश भर में बढ़ता विरोध और उठते सुलगते सवाल

रायपुर का यह मामला तो महज एक बानगी है। पूरे देश में वाहन मालिकों और ऑटो एक्सपर्ट्स के बीच गुस्सा पनप रहा है:

1. पुरानी गाड़ियों का क्या होगा?

देश में करोड़ों गाड़ियाँ 2023 से पहले की निर्मित हैं। जब पेट्रोल पंपों पर नॉर्मल पेट्रोल मिलना बंद हो चुका है, तो इन गाड़ियों के इंजन खराब होने का हर्जाना कौन भरेगा?

2. ग्राहक पर दोहरा बोझ:

 महंगा पेट्रोल खरीदो।

 कम माइलेज से जेब ढीली करो।

 इंजन खराब होने पर लाखों का रिपेयरिंग बिल खुद चुकाओ!

3. पारदर्शिता का अभाव:

ऑटो कंपनियाँ विज्ञापनों में 'E-20 Ready' का बड़ा-बड़ा ठप्पा तो लगा देती हैं, लेकिन वास्तविक सड़क परिस्थितियों में ये गाड़ियाँ दगा दे जाती हैं।

6. निष्कर्ष: क्या बदलेगी सरकार और कंपनियों की नीतियाँ?

छत्तीसगढ़ उपभोक्ता आयोग के इस फैसले ने देश के करोड़ों वाहन चालकों के हाथ में एक बड़ा कानूनी हथियार दे दिया है। यदि आपकी गाड़ी भी E-20 पेट्रोल की वजह से बार-बार बंद हो रही है या झटके ले रही है, तो अब खामोश बैठने का वक्त नहीं है।

यह फैसला कार निर्माताओं के लिए एक चेतावनी है—या तो वे अपनी टेक्नोलॉजी सुधारें, या फिर ग्राहकों के नुकसान का हर्जाना भरने के लिए तैयार रहें!

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