मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

जीवनदायिनी नदियों का घोंटा जा रहा गला: 30 हजार मामले दर्ज, फिर भी जिम्मेदार मौन!

 जीवनदायिनी नदियों का घोंटा जा रहा गला: 30 हजार मामले दर्ज, फिर भी जिम्मेदार मौन!



जिस पानी को हम आचमन करते हैं, जिस नदी को हम माँ का दर्जा देते हैं, आज वही नदियां अपना अस्तित्व बचाने के लिए सिसक रही हैं। छत्तीसगढ़—जिसे नदियों और प्राकृतिक संसाधनों का प्रदेश कहा जाता है, वहां की नदियां आज नालों में तब्दील हो चुकी हैं।

जलशक्ति मंत्रालय को भेजी गई जुलाई 2026 की रिपोर्ट ने जो आंकड़े पेश किए हैं, वे सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि प्रशासन और सरकार की नाकामी का वह काला चिट्ठा हैं जिसे देखकर किसी का भी कलेजा कांप जाए।

प्रदेश की नदियों को प्रदूषित करने के 30,000 से अधिक प्रकरण दर्ज हो चुके हैं! जी हां, 30 हजार! लेकिन सवाल यह है कि इतने मामले दर्ज होने के बाद भी क्या एक भी नदी का पानी साफ हुआ? क्या एक भी लापरवाह अफसर पर गाज गिरी? या फिर 'प्रस्ताव तैयार हो रहा है' के ढोंग तले पूरी व्यवस्था सो रही है?

आंकड़ों की जुबानी समझिए कि हमारी जीवनदायिनी नदियों के साथ कितना बड़ा खिलवाड़ हो रहा है। जलशक्ति मंत्रालय को भेजी गई रिपोर्ट के मुताबिक:

  • कुल दर्ज प्रकरण: पूरे छत्तीसगढ़ में 30 हजार से ज्यादा नदियों के प्रदूषण के मामले दर्ज हैं।
  • रायपुर (राजधानी की पोल): अकेले राजधानी रायपुर में 17,371 प्रकरण दर्ज किए गए हैं, जो पूरे प्रदेश में सबसे दर्ज हैं।
  • बिलासपुर: न्यायधानी बिलासपुर में 3,729 प्रकरण दर्ज हुए हैं।
  • कोरबा: ऊर्जाधानी कोरबा में 1,204 प्रकरण दर्ज किए गए हैं।

सोचिए, जहां सरकार बैठती है, जहां मुख्यमंत्री और तमाम मंत्री बैठते हैं, जहां पर्यावरण संरक्षण मंडल का मुख्यालय है, उसी रायपुर में 17 हजार से अधिक बार नदियों के सीने पर प्रदूषण का प्रहार हुआ। शहरों के अनचारित (untreated) सीवरेज, नालियों का गंदा पानी और औद्योगिक कचरा सीधे नदियों में उड़ेला जा रहा है।

सवाल यह उठता है कि क्या सरकार सिर्फ आंकड़े गिनने के लिए बैठी है? 30 हजार से ज्यादा मामले दर्ज होना इस बात का सबूत है कि अपराध लगातार जारी है। जब हर दिन गंदा पानी नदियों में मिल रहा है, तो पर्यावरण मंडल और जिम्मेदार विभाग क्या कर रहे हैं?

रिपोर्ट में लिखा गया है— "प्रदूषण फैलाने वालों पर कड़ी कार्रवाई का प्रस्ताव तैयार हो रहा है।" वाह! क्या शानदार व्यवस्था है! नदियां मर रही हैं, लोग विषैला पानी पीने को मजबूर हैं, और सरकार 'प्रस्ताव' तैयार कर रही है! यह प्रस्ताव कब लागू होगा? जब नदियां पूरी तरह सूखकर गंदे नाले का रूप ले लेंगी?

क्या उद्योगों की चिमनियों और जहरीले नालों के आगे शासन-प्रशासन ने घुटने टेक दिए हैं? भारी-भरकम बजट और 'नदी बचाओ' के बड़े-बड़े विज्ञापनों का पैसा आखिर कहां जा रहा है?

नदियों का यह प्रदूषण केवल पानी की खराबी नहीं है, यह सीधे तौर पर लाखों लोगों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ है। जब सीवरेज और कारखानों का जहरीला केमिकल पानी में घुलता है, तो वही पानी पाइपलाइनों के जरिए हमारे और आपके घरों तक पहुंचता है।

कैंसर, त्वचा रोग, पेट की गंभीर बीमारियों और जलजनित बीमारियों का ग्राफ प्रदेश में लगातार बढ़ रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां लोग सीधे नदी के पानी पर निर्भर हैं, वहां स्थिति और भी भयावह है। इसके बावजूद, ठोस सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) बनाने या उन्हें सुचारू रूप से चलाने में सरकार की कोई दिलचस्पी नजर नहीं आती।

छत्तीसगढ़ की जनता आज सरकार से सीधी जवाबदेही मांग रही है:

  1. 30 हजार प्रकरण दर्ज होने के बाद कितने दोषियों पर आपराधिक कार्रवाई हुई और कितनों को जेल भेजा गया?
  2. राजधानी रायपुर में दर्ज 17,371 मामलों के लिए कौन से अधिकारी जिम्मेदार हैं?
  3. कार्रवाई के नाम पर सिर्फ 'प्रस्ताव' बनाने का छलावा कब तक चलेगा?

अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। नदियां सिर्फ पानी का स्रोत नहीं, हमारी संस्कृति और जीवन का आधार हैं। इन्हें बचाना होगा, कागजों पर नहीं, धरातल पर!

 "एनजीटी (NGT): क्या भूमिका सिर्फ 'नोटिस' देने तक सीमित रह गई है?"

कागजी चेतावनी और बेअसर नोटिस: क्या दांतहीन संस्था बन चुका है एनजीटी?

पर्यावरण की रक्षा और नदियों को प्रदूषण मुक्त कराने के लिए देश में 'नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल' यानी NGT का गठन इस उम्मीद के साथ किया गया था कि यह संस्था पर्यावरण के दुश्मनों पर नकेल कसेगी। लेकिन आज स्थिति क्या है?

छत्तीसगढ़ में नदियों के प्रदूषण के 30 हजार से ज्यादा मामले दर्ज हो चुके हैं। जलशक्ति मंत्रालय तक रिपोर्टें भेजी जा रही हैं। लेकिन क्या NGT की धमक धरातल पर दिख रही है? या फिर एनजीटी की भूमिका अब महज 'नोटिस जारी करने' और 'जवाब मांगने' तक सिमट कर रह गई है?

नदियों में गिरता औद्योगिक कचरा, शहरों का बिना ट्रीट किया गया सीवरेज और लगातार बिगड़ती जल गुणवत्ता। यह तस्वीर किसी एक जिले की नहीं, बल्कि रायपुर (17,371 मामले), रायगढ़ (6,520 मामले), बिलासपुर (3,729 मामले) और कोरबा (1,204 मामले) की है।

जब भी कोई बड़ा प्रदूषण का मामला सामने आता है, एनजीटी संज्ञान लेता है, रिपोर्ट मांगता है और राज्य सरकार या संबंधित निकायों को नोटिस थमा देता है। लेकिन उस नोटिस का असर क्या होता है?

  • नोटिस नंबर 1: रिपोर्ट पेश करो।
  • नोटिस नंबर 2: जवाब संतोषजनक नहीं है, दोबारा एफिडेविट दो।
  • नोटिस नंबर 3: जुर्माना लगाया जाएगा।

और इसके बाद मामला फाइलों में दफन हो जाता है!

सवाल बहुत सीधा और कड़वा है— क्या एनजीटी सिर्फ एक नोटिस जारी करने वाली एजेंसी बनकर रह गया है?

  1. कार्यान्वयन (Execution) का अभाव: एनजीटी बड़े-बड़े जुर्माने तो लगा देता है, लेकिन क्या वह जुर्माना कभी वसूला जाता है? या फिर सरकारी महकमे कोर्ट और ट्रिब्यूनल के चक्कर काटकर समय बिता देते हैं?
  2. धरातल पर शून्य असर: रायपुर में 17 हजार से अधिक प्रकरण दर्ज होना यह बताता है कि प्रदूषण फैलाने वालों में न तो पर्यावरण विभाग का खौफ है और ना ही एनजीटी के निर्देशों का।
  3. 'प्रस्ताव' की आड़ में खेल: जलशक्ति मंत्रालय को भेजी गई जुलाई 2026 की रिपोर्ट में कहा गया है कि "कड़ी कार्रवाई का प्रस्ताव तैयार हो रहा है।" एनजीटी के सख्त निर्देशों के बावजूद अगर सालों-साल सिर्फ 'प्रस्ताव' ही बनते रहेंगे, तो फिर ऐसे ट्रिब्यूनल का औचित्य ही क्या रह जाता है?

 अगर पर्यावरण अदालतें सिर्फ कागजी आदेश जारी करती रहेंगी और जमीनी स्तर पर नदियां नाले में बदलती रहेंगी, तो जनता का इस व्यवस्था से विश्वास उठ जाएगा।

एनजीटी को अब सिर्फ 'नोटिस जारी करने वाली संस्था' से आगे बढ़कर कड़े फैसले लेने होंगे—दोषी अधिकारियों पर सीधी एफआईआर (FIR), प्रदूषण फैलाने वाली फैक्ट्रियों पर स्थाई ताला और सीवरेज बहाने वाले निकायों के प्रमुखों पर सीधी जवाबदेही तय करनी होगी। वरना 'नदी बचाओ' के सारे दावे सिर्फ कागजी आंकड़ों में ही बह जाएंगे।

सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

गरीबों का हक मारो और अपने करीबियों में रेवड़ियां बांटो!

गरीबों का हक मारो और अपने करीबियों में रेवड़ियां बांटो!


 सोचिए, अगर किसी गरीब के घर में कोई गंभीर बीमारी से जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहा हो... किसी बेबस मां के पास बच्चे के इलाज के लिए पैसे न हों... और वो सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर थक जाए... लेकिन उसे एक रुपया न मिले!

और दूसरी तरफ, उसी जनता के टैक्स के पैसों से बने 'स्वेच्छानुदान फंड' से विधायकों के सगे भाइयों, बहनों, भांजों, ड्राइवरों और करोड़पति भाजपाइयों के खातों में लाखों रुपये ट्रांसफर कर दिए जाएं?

जी हां! छत्तीसगढ़ में 'जीरो टॉलरेंस' का ढोल पीटने वाली सरकार के माननीय विधायकों ने गरीबों की मदद के लिए बने फंड को अपनी 'पारिवारिक प्रॉपर्टी' समझ लिया है! महासमुंद से लेकर साजा और सीधे प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल के घर तक... हर जगह एक ही खेल चल रहा है— 'गरीबों का हक मारो और अपने करीबियों में रेवड़ियां बांटो!'

आज के इस वीडियो में हम आपको सबूतों के साथ दिखाएंगे कि कैसे जनता के खून-पसीने की कमाई को अपनों की जेब में डाला गया। पूरी वीडियो अंत तक देखिएगा, क्योंकि आज हम किसी को बख्शने वाले नहीं हैं!"

 : "सबसे पहले बात करते हैं महासमुंद के बीजेपी विधायक योगेश्वर राजू सिन्हा की। हाल ही में खबर आई कि विधायक जी ने 'स्वेच्छानुदान निधि' से 30 लाख 30 हजार रुपये बांट दिए! अब आप सोचेंगे कि इसमें क्या गलत है? विधायक तो गरीबों को बांटने के लिए ही पैसे पाते हैं ना?

ठहरिए! जरा लिस्ट खोलकर देखिए कि ये पैसे गए किसकी जेब में:

  • विधायक जी की सगी बहनें— ललिता सिन्हा, रयवती सिन्हा और जितेश्वरी सिन्हा!
  • विधायक जी के ड्राइवर और उनके करीबी!
  • इतना ही नहीं, बीजेपी के रसूखदार नेता, पूर्व पार्षद और यहां तक कि उन नेताओं के परिवार, जिनके घर में पहले से सरकारी नौकरी है! (जैसे बीजेपी नेता संदीप दीवान, जिनकी पत्नी खुद सरकारी टीचर हैं!)

नियमानुसार यह पैसा कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे गरीबों, बेबस विधवाओं या अनाथ बच्चों की पढ़ाई के लिए होता है। लेकिन महासमुंद में पात्र गरीब भटकते रहे और विधायक जी अपने रिश्तेदारों का घर भरते रहे!

और जब मीडिया ने विधायक जी से पूछा कि 'मालिक, ये क्या कर दिया?' तो विधायक योगेश्वर राजू सिन्हा का घमंड देखिए! वो कहते हैं— 'आपको जो सही लगता है छापो, क्या ऐसी बातों का जवाब दूं!'

सुन लिया आपने? जनता के पैसों की लूट पर सवाल पूछो तो माननीय को जवाब देना भी फालतू लगता है!"

: "अब आप सोच रहे होंगे कि क्या यह सिर्फ महासमुंद तक सीमित है? जी नहीं!

ज़रा साजा विधानसभा चलिए। वहां से विधायक हैं ईश्वर साहू। ईश्वर साहू जी को जनता ने किस उम्मीद से चुना था, यह सब जानते हैं। लेकिन विधायक बनते ही उन्होंने स्वेच्छानुदान निधि में क्या किया?

साजा में स्वेच्छानुदान निधि की जो लिस्ट सामने आई, उसमें विधायक ईश्वर साहू के बेटे, उनके सगे भाइयों और करीबी रिश्तेदारों के नाम दर्ज थे! जिस फंड पर किसी गरीब किसान, मजदूर या बीमार व्यक्ति का हक होना चाहिए था, उस फंड से विधायक जी ने अपने ही परिवार की 'आर्थिक सहायता' कर दी!

जब साजा की जनता और विपक्ष ने इस पर सवाल उठाए, तो लीपापोती करने की कोशिशें शुरू हो गईं। क्या साजा की गरीब जनता इसलिए वोट देती है कि विधायक बनते ही सबसे पहले अपने ही बेटे-बेटियों का बैंक बैलेंस मजबूत किया जाए? क्या यह जनता के भरोसे का कत्ल नहीं है?"

: "और अब आते हैं सबसे बड़े मामले पर... बात सिर्फ विधायकों तक खत्म नहीं होती, बात पहुंचती है सीधे प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल तक!

जी हां, वही मंत्री जिनके कंधे पर पूरे प्रदेश के गरीबों को इलाज मुहैया कराने की जिम्मेदारी है!

श्याम बिहारी जायसवाल के मनेन्द्रगढ़/बैकुंठपुर क्षेत्र से जब स्वेच्छानुदान की सूची बाहर आई, तो लोग दंग रह गए। स्वास्थ्य मंत्री जी ने अपने रिश्तेदारों, अपने जिला पंचायत/जनपद के करीबी नेताओं, कार्यकर्ताओं और संपन्न लोगों को स्वेच्छानुदान के चेक बांट दिए!

सोचिए! जो व्यक्ति प्रदेश का स्वास्थ्य मंत्री है, जिसके पास गरीबों को 'आयुष्मान योजना' या 'संजीवनी कोष' से करोड़ों का इलाज दिलवाने का अधिकार है... वो अपने विधायक स्वेच्छानुदान फंड से भी अपनों को ही रेवड़ियां बांट रहा है!

एक तरफ राज्य के सरकारी अस्पतालों में दवाइयां नहीं हैं, गरीब वेंटिलेटर और स्ट्रेचर के लिए तरस रहे हैं, और दूसरी तरफ स्वास्थ्य मंत्री जी के अपने लोग सरकारी खजाने से मजे मार रहे हैं! क्या इसे भ्रष्टाचार नहीं कहेंगे? क्या यह सत्ता का सीधा दुरुपयोग नहीं है?"


महासमुंद के योगेश्वर राजू सिन्हा, साजा के ईश्वर साहू, और स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल... ये तीनों मामले कोई इत्तेफाक नहीं हैं! यह एक सोची-समझी कार्यप्रणाली बन चुकी है।

हर साल हर विधायक को जनता की मदद के लिए लाखों-करोड़ों रुपये का स्वेच्छानुदान फंड मिलता है। अगर हर विधायक अपने रिश्तेदारों और कार्यकर्ताओं में ही 30-40 लाख रुपये बांट देगा, तो इस प्रदेश का गरीब कहां जाएगा? वो गरीब जो एक-एक हजार रुपये की दवा के लिए अपने बर्तन और जेवर बेचने पर मजबूर होता है!

सरकारें बदलती हैं, चेहरे बदलते हैं, लेकिन क्या गरीबों की किस्मत कभी बदलेगी? भाजपा सरकार 'जीरो टॉलरेंस' की बात करती है। मुख्यमंत्री जी से हमारा सीधा सवाल है—

  • क्या अपने इन विधायकों और मंत्रियों पर कोई जांच बैठाई जाएगी?
  • क्या गरीबों के हक का पैसा छीनकर अपने रिश्तेदारों को देने वालों पर कार्रवाई होगी?
  • या फिर यह मान लिया जाए कि 'स्वेच्छानुदान' का मतलब है— 'अपनी स्वेच्छा से अपनों को लूटने की छूट'?

रविवार, 11 अक्टूबर 2026

अब बीजेपी की पत्रिका में जेन जी के लिए अपशब्द

 अब बीजेपी की पत्रिका में जेन जी के लिए अपशब्द 



देश में राजनीति के कई रंग देखने को मिलते हैं, लेकिन जब सत्ता और उसकी पत्रिकाएं भाषा की मर्यादा की सीमाओं को लांघने लगें, तो सवाल पूछना ज़रूरी हो जाता है। आज हम बात कर रहे हैं छत्तीसगढ़ से प्रकाशित होने वाली बीजेपी की मासिक पत्रिका 'दीप कमल' के सितंबर अंक की।

यह अंक 'पीएम मोदी विशेषांक' के रूप में छापा गया है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुणों का बखान किया गया है। रामचरितमानस की चौपाइयों का सहारा लेकर सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेतृत्व की तारीफ की गई है। लेकिन इस तारीफ के आवरण में जिस तरह की भाषा और शब्दों का इस्तेमाल विपक्षी नेताओं, युवाओं और आंदोलनों के लिए किया गया है, उसने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है।


 पत्रिका के संपादकीय में दिल्ली में हुए जेन-जी (Gen-Z) के आंदोलनों और युवाओं का जिक्र इशारों-इशारों में किया गया है। लेकिन इसके लिए किन शब्दों का प्रयोग हुआ? संपादकीय में लिखा गया है कि "नालायक और निकम्मे तिलचट्टों (कॉकरोचों) के प्रति भी मोदी जी ने सदाशयता दिखाई है"।

सोचिए, जो युवा अपने अधिकारों, शिक्षा या रोज़गार के लिए आवाज़ उठाते हैं या आंदोलन करते हैं, उन्हें 'नालायक' और 'निकम्मा तिलचट्टा' कहा जा रहा है। लोकतांत्रिक देश में असहमति और आंदोलन का अपना स्थान होता है, लेकिन विरोध को इस तरह की शब्दावली से संबोधित करना सत्ता के अहंकार और संवाद की कमी को दर्शाता है।


बात यहीं खत्म नहीं होती। इस संपादकीय में मुख्य विपक्षी नेता राहुल गांधी को 'लिलजिला और पिलपिता' तक कह दिया गया है।

अब सवाल यह उठता है कि यह भाषा लिखी किसने है? छत्तीसगढ़ में छपने वाली इस पत्रिका के संपादक हैं पंकज झा। पंकज झा कोई साधारण पत्रकार या लेखक नहीं हैं, बल्कि वे राज्य के मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार भी हैं। जब संवैधानिक पद के करीब बैठा कोई व्यक्ति इस प्रकार का संपादकीय लिखता है, तो सवाल सीधा सरकार और उसकी मंशा पर उठता है।


शुरुआती दौर से ही जेएनयू और युवा आंदोलनों को लेकर बीजेपी के केंद्रीय व प्रांतीय नेताओं के बयान लगातार चर्चा में रहे हैं। चाहे देश के शीर्ष नेतृत्व के बयान हों या संगठन के अन्य नेताओं के—अक्सर युवा आंदोलनों और विचारधाराओं पर तीखे हमले किए गए हैं।

जब सत्ता में बैठे नेता या उनके सलाहकार संस्थाओं और युवाओं को लेकर ऐसा रुख अपनाते हैं, तो यह केवल एक बयान नहीं रहता, बल्कि यह एक राजनीतिक दृष्टिकोण बन जाता है। एक तरफ जहां पीएम मोदी के गुणों के गान के लिए धार्मिक ग्रंथों की चौपाइयों का सहारा लिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ लोकतंत्र में सवाल पूछने वालों के लिए ऐसी भाषा का प्रयोग किया जाता है।


लोकतंत्र में किसी नेता की तारीफ करना या उनके योगदान को रेखांकित करना गलत नहीं है, लेकिन इसके लिए विरोधियों या युवाओं को नीचा दिखाना और अमर्यादित भाषा का सहारा लेना कितना सही है? क्या एक सरकारी/पक्षीय पत्रिका के संपादकीय में इस तरह की शब्दावली होनी चाहिए?

शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

बैलाडीला का 'लूपहोल' खेल: 57 बनाम 59 का असली सच!

 


बैलाडीला का 'लूपहोल' खेल: 57 बनाम 59 का असली सच!


"छत्तीसगढ़ के बस्तर से निकलने वाला लोहा... जो देश-दुनिया की फैक्ट्रियों को चमकाता है, उसी लोहे के काले खेल को लेकर एक ऐसी खबर आई जिसने विजिलेंस से लेकर रेलवे तक के होश उड़ा दिए। हर जगह चर्चा थी कि बैलाडीला से 52 वैगन की जगह 59 वैगन भेजे गए। लेकिन रुकिए! असली खेल डिब्बों की गिनती का नहीं... असली खेल तो कागजों और रॉयल्टी के वजन का है!

आज हम आपको बताने जा रहे हैं इस खेल के पीछे की वो कड़वी हकीकत, जिसे दबाने की पूरी कोशिश की गई। कहानी 52 डिब्बों की नहीं, बल्कि **57 लाख और 59 लाख मीट्रिक टन** के उस हेरफेर की है, जिसमें सीधे-सीधे 2 लाख मीट्रिक टन लोहा सिस्टम की नाक के नीचे से 'गायब' करने की तैयारी थी! आखिर ये 2 लाख का अतिरिक्त माल किसके इशारे पर जा रहा था? और कौन है इस पूरे सिंडिकेट का मास्टरमाइंड? चलिए पूरा खेल खोलते हैं!"

 आंकड़ेबाजी का मायाजाल 


"आम जनता को उलझाया गया वैगनों की गिनती में, ताकि असली आंकड़ों पर किसी की नजर न जाए। विजिलेंस की गहरी जांच में जो सच सामने आया है, वो चौंकाने वाला है। रिकॉर्ड्स के मुताबिक, जहां सिर्फ **57 लाख** की परमिशन, रॉयल्टी और पास वैध थे... वहां असलियत में वजन पहुंच गया **59 लाख** पर!

यानी सीधे-सीधे **2 लाख** का यह अतिरिक्त माल... जिसका न कोई सरकारी टैक्स चुकाया गया, न कोई वैध ट्रांजिट पास (TP) था। अब सवाल यह उठता है कि क्या बस्तर के पहाड़ों से लोहा बिना किसी की इजाजत के अपने आप ट्रेन पर लोड हो गया? क्या NMDC के लोडिंग सुपरवाइजर सो रहे थे? या फिर रेलवे के वेब्रिज (कांटा) पर बैठे अधिकारियों की आंख पर नोटों की पट्टी बंधी थी?"


"अब समझिए कि यह खेल काम कैसे करता है। ट्रेन बुक होती है एक बड़े सरकारी या प्रतिष्ठित संस्थान, जैसे 'विशाखापट्टनम स्टील प्लांट' के नाम पर। क्यों? क्योंकि सरकारी प्लांट के नाम पर आने-जाने वाली गाड़ियों पर कोई शक नहीं करता। ग्रीन सिग्नल मिलता जाता है और ट्रेनें बिना किसी रुकावट के केके लाइन (KK Line) से आगे बढ़ती रहती हैं।

लेकिन इस बड़े रैक की आड़ में जो **2 लाख का अतिरिक्त माल** छुपाया गया था, उसकी सेटिंग कहीं और थी। विशाखापट्टनम पहुंचने से पहले या वहां के बड़े यार्ड्स में, इस एक्स्ट्रा माल को चुपके से 'शंटिंग' और 'री-मार्शलिंग' के जरिए प्राइवेट पैलेट प्लांट्स, निजी स्पंज आयरन फैक्ट्रियों या फिर समुद्र के रास्ते विदेश भेजने वाले एक्सपोर्टर्स के खाते में डाल दिया जाता है। यानी, नाम सरकारी प्लांट का... और मलाई प्राइवेट माफिया की!"


"विजिलेंस ने इस रैक को इंटरसेप्ट करके चोरी तो पकड़ ली, लेकिन यह सिर्फ एक रैक की बात नहीं है। सवाल यह है कि ऐसे कितने '2 लाख' के फेरबदल पास्ट में हो चुके हैं, जो फाइलों में कभी दर्ज ही नहीं हुए? बिना टॉप-लेवल की मिलीभगत के, इतनी बड़ी मात्रा में आयरन ओर का अवैध परिवहन नामुमकिन है। यह बस्तर के प्राकृतिक संसाधनों की खुली डकैती है, जिसमें रॉयल्टी का करोड़ों रुपया सरकार के खजाने में जाने के बजाय सीधे सिंडिकेट की जेब में जा रहा था।

अब देखना यह है कि विजिलेंस की इस कार्रवाई के बाद क्या सिर्फ छोटे कर्मचारियों को बली का बकरा बनाया जाएगा, या फिर उन सफेदपोश चेहरों और बड़े अफसरों तक भी कानून के हाथ पहुंचेंगे जो विशाखापट्टनम से लेकर छत्तीसगढ़ तक इस पूरे रैकेट को ऑपरेट कर रहे हैं।"

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

डिप्टी सीएम नहीं संभाल पा रहे ठेकेदारों का गुस्सा फूटा

डिप्टी सीएम नहीं संभाल पा रहे 

ठेकेदारों का गुस्सा फूटा 



 गाँवों में पानी की टंकियाँ तो खड़ी हो गईं, घर-घर नल के कनेक्शन भी दिख रहे हैं... लेकिन जब नल की टोटी खोलो, तो पानी की जगह सिर्फ हवा निकलती है! आखिर क्यों छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में जल जीवन मिशन का सच इतना कड़वा है? क्यों करोड़ों रुपए खर्च होने के बाद भी जनता एक-एक बूंद पानी के लिए तरस रही है?

छत्तीसगढ़ के जल जीवन मिशन में अटके करीब 1,100 करोड़ से 1,200 करोड़ रुपए के उस बड़े संकट की, जिसने न सिर्फ ठेकेदारों की कमर तोड़ दी है, बल्कि राज्य की पेयजल व्यवस्था को ठप करके रख दिया है!"

: "मामला क्या है, आसान भाषा में समझिए। राज्य में 58 मल्टी विलेज योजनाएँ चल रही हैं। इसका सीधा मतलब यह था कि किसी नदी या बड़े जलस्रोत से पानी लाया जाएगा, उसे वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट में साफ किया जाएगा और फिर पाइपलाइन के जरिए गाँवों की टंकियों तक पहुँचाया जाएगा।

ठेकेदारों ने अपनी जमा पूँजी लगाई, कर्ज लिया और करीब 80 प्रतिशत काम पूरा कर दिया। गाँवों के भीतर टंकियाँ बन गईं, गली-मोहल्लों में पाइप बिछ गए... लेकिन मुख्य स्रोत से पानी लाने वाली मेन लाइन और ट्रीटमेंट सिस्टम का काम ही अधूरा छोड़ दिया गया। अब आप खुद सोचिए—जब टंकी में पानी पहुँचेगा ही नहीं, तो ग्रामीणों के घरों के नल कैसे चलेंगे? यह तो वही बात हो गई कि गाड़ी खरीदकर खड़ी कर दी, लेकिन उसमें इंजन ही नहीं लगाया!"

 "छत्तीसगढ़ कांट्रेक्टर्स एसोसिएशन का कहना है कि अगस्त 2025 के बाद से उन्हें फूटी कौड़ी नहीं मिली है।

  • रिकॉर्ड पर ₹569.32 करोड़ की भुगतान मांग लंबित है।
  • इसके अलावा लगभग ₹500 से ₹600 करोड़ का काम ऐसा हो चुका है, जिसके बिल विभाग दर्ज तक नहीं कर रहा है!

कुल मिलाकर करीब 1,100 से 1,200 करोड़ रुपए का भुगतान अटका हुआ है। नतीजे क्या हैं? कई ठेकेदारों के बैंक खाते NPA (Non-Performing Asset) हो चुके हैं या होने की कगार पर हैं। मजदूरों की मजदूरी नहीं दी जा रही, कर्मचारियों का वेतन अटका है और सामग्री सप्लाई करने वाले अपने पैसे माँग रहे हैं। स्थिति इतनी भयावह है कि कुछ काम पूरे करके विभाग को सौंपे जा चुके हैं, पर उनका पैसा भी दबाकर रखा गया है।

छत्तीसगढ़ कांट्रेक्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष वीरेश शुक्ला ने साफ चेतावनी दी है कि अगर त्योहारों/दिवाली से पहले उनका बकाया नहीं मिला, तो पूरे प्रदेश के ठेकेदार सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे।"

: "अब सवाल उठता है कि इस पूरे तंत्र का जिम्मेदार कौन है? यह लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHED) सीधे राज्य के उप-मुख्यमंत्री अरुण साव के पास है।

जनता और ठेकेदार यह सवाल पूछने पर मजबूर हैं कि जब ग्रामीण पेयजल जैसी बुनियादी और प्राथमिकता वाली योजना का यह हाल है, तो आखिर विभाग का ध्यान किस तरफ है?

विधानसभा तक में जल जीवन मिशन की गड़बड़ियों और घोटालों का मुद्दा गूँज चुका है। सदन में हंगामे के बाद विभागीय लीपापोती में आधा दर्जन से ज्यादा अफसरों और कर्मचारियों पर निलंबन की गाज भी गिरी। लेकिन क्या सिर्फ छोटे अफसरों को सस्पेंड कर देने से समस्या हल हो जाएगी?

आरोप यह लग रहे हैं कि विभाग का मुख्य ध्यान योजनाओं को पारदर्शी तरीके से पूरा करने और गुणवत्तापूर्ण काम सुनिश्चित करने के बजाय—अधिकारियों-कर्मचारियों के तबादले, पदस्थापना (Transfer-Posting) और आंतरिक खींचतान में ही ज्यादा लगा हुआ है। जब पूरा प्रशासनिक अमला ट्रांसफर-पोस्टिंग के खेल में उलझा रहेगा, तो ठेकेदारों के बिल पास कौन करेगा? काम की मॉनिटरिंग कौन करेगा?"

"जल जीवन मिशन का मूल मकसद था—हर घर तक साफ पेयजल पहुँचाना। लेकिन आज स्थिति यह है कि सरकार के चक्कर में ठेकेदार कर्ज के बोझ तले दबकर बर्बाद हो रहे हैं, और दूसरी तरफ ग्रामीण जनता अधूरी योजनाओं के बीच पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रही है।

अरुण साव जी, आप राज्य के उप-मुख्यमंत्री हैं और यह विभाग आपकी सीधी जिम्मेदारी में आता है। जब 1100 करोड़ का भुगतान रोककर काम ठप कर दिया जाएगा, तो क्या जल जीवन मिशन का सपना पूरा हो पाएगा? क्या ठेकेदारों के सड़कों पर उतरने के बाद ही शासन जागेगा?"

यह सिर्फ ठेकेदारों के पैसे का सवाल नहीं है, यह छत्तीसगढ़ के लाखों ग्रामीणों के हक के पानी का सवाल है। अगर काम पूरा हुआ है तो भुगतान तुरंत क्यों दर्ज नहीं किया जा रहा? इस पूरे मामले पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि प्रशासनिक लापरवाही और तबादला-उद्योग के चक्कर में यह योजना बलि चढ़ रही है?

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

सरगुजा में क्यों बीजेपी के आधा दर्जन से अधिक विधायक रेड जोन में

सरगुजा में क्यों बीजेपी के आधा दर्जन से अधिक विधायक रेड जोन में 


 छत्तीसगढ़ की राजनीति से इस वक्त की सबसे बड़ी ख़बर निकलकर सामने आ रही है! और यह ख़बर सीधे जुड़ी है - सरगुजा संभागसे! वही सरगुजा, जहाँ 2023 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने क्लीन स्वीप करते हुए इतिहास रचा था और 14 की 14 सीटें अपनी झोली में डाल ली थीं। लेकिन दोस्तों, राजनीति में जो आज चमक रहा है, ज़रूरी नहीं कि कल भी उसकी चमक वैसी ही रहे!

अंदरखाने की ख़बर यह है कि संगठन और आरएसएस के हालिया इंटरनल सर्वे रिपोर्ट में सरगुजा संभाग के विधायकों की परफॉर्मेंस को लेकर बेहद चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। सूत्रों का दावा है कि सरगुजा के 14 में से 9 विधायकों की रिपोर्ट कार्ड 'रेड ज़ोन' यानी बेहद खराब पाई गई है!

अब सवाल यह उठता है कि आखिर अचानक ऐसा क्या हो गया? जिन विधायकों ने 2023 में बंपर जीत हासिल की थी, महज ढाई-तीन सालों में ही उनका रिपोर्ट कार्ड इतना खराब कैसे हो गया?

राजनीतिक विश्लेषकों और अंदरूनी सूत्रों की मानें, तो इसके पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण सामने आ रहे हैं:

  1. अफ़सरशाही पर लगाम न होना और जनप्रतिनिधियों का दबदबा कम होना: क्षेत्र की जनता का आरोप है कि काम के लिए उन्हें अधिकारियों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं और विधायक जी उनकी सुन नहीं रहे हैं।
  2. कार्यकर्ताओं में भारी असंतोष: चुनाव जिताने वाले ज़मीनी कार्यकर्ताओं को अब तवज्जो न मिलना और उनके काम अटकना।
  3. स्थानीय स्तर पर एंटी-इंकंबेंसी: विकास कार्यों की धीमी रफ्तार और विधायकों की अपने ही क्षेत्र से दूरी,
  4. आधिकारिक तौर पर तो पार्टी किसी विधायक की सर्वे रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं करती, लेकिन अगर हम सरगुजा के कुछ हाई-प्रोफाइल विधायकों की पृष्ठभूमि और हालिया विवादों पर नज़र डालें, तो तस्वीर काफी हद तक साफ़ हो जाती है।
  • रामकुमार टोप्पो (सीतापुर विधानसभा): पूर्व सैनिक रहे रामकुमार टोप्पो ने जब कांग्रेस के कद्दावर नेता अमरजीत भगत को चुनाव में हराया था, तब वे पूरे प्रदेश में 'जाइंट किलर' के रूप में उभरे थे। लेकिन हाल ही में जिस तरह से सीतापुर में नायब तहसीलदार और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ मारपीट और विवाद का मामला सामने आया, और दोनों पक्षों पर एफआईआर (FIR) दर्ज हुई, उससे स्थानीय प्रशासन और जनसामान्य के बीच इनकी छवि को भारी झटका लगा है।
  • राजेश अग्रवाल (अंबिकापुर विधानसभा): इन्होंने छत्तीसगढ़ के पूर्व डिप्टी सीएम टी.एस. सिंहदेव जैसे दिग्गज नेता को हराकर देश भर की मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचा था। व्यापारी वर्ग से आने वाले राजेश अग्रवाल जी से जनता की अपेक्षाएं बहुत ज्यादा थीं। लेकिन अंबिकापुर जैसे संवेदनशील शहर में बुनियादी समस्याओं और ज़मीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के साथ तालमेल की कमी को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।
  • भैयालाल राजवाड़े (बैकुंठपुर विधानसभा): वरिष्ठ नेता और अपनी बेबाक बयानबाज़ी के लिए जाने जाने वाले भैयालाल राजवाड़े का अपना प्रभाव तो है, लेकिन स्थानीय युवाओं और नए दौर की राजनीति के साथ कदम से कदम न मिला पाना और स्थानीय असंतोष इनके लिए एक चुनौती बनता दिख रहा है।

इसके अलावा, संभाग के अन्य नौसिखिए या पहली बार चुनकर आए विधायकों में से कई ऐसे हैं जो अब तक मंत्री पद या बड़ी ज़िम्मेदारियों की उम्मीद में अपने क्षेत्र की सुध ही नहीं ले पाए हैं।

बीजेपी हाईकमान का रुख हमेशा साफ़ रहता है—'परफॉर्म करो या बाहर जाओ।' अगर समय रहते इन विधायकों ने अपने-अपने क्षेत्रों में स्थिति नहीं सुधारी, कार्यकर्ताओं को साथ लेकर नहीं चले और जनता के काम नहीं करवाए, तो तय मानिए कि अगले चुनाव में संगठन नए चेहरों पर दांव खेलने से बिल्कुल नहीं हिचकिचाएगा!

अब आप मुझे कमेंट सेक्शन में बताइए—क्या आप सरगुजा संभाग से हैं? आपके क्षेत्र के विधायक का काम आपको कैसा लग रहा है? क्या वास्तव में ज़मीन पर स्थिति खराब है? अपनी राय कमेंट में ज़रूर लिखें!

मंगलवार, 29 सितंबर 2026

बैलाडीला का 'लूपहोल' खेल: 57 बनाम 59 का असली सच!

बैलाडीला का 'लूपहोल' खेल: 57 बनाम 59 का असली सच!



"छत्तीसगढ़ के बस्तर से निकलने वाला लोहा... जो देश-दुनिया की फैक्ट्रियों को चमकाता है, उसी लोहे के काले खेल को लेकर एक ऐसी खबर आई जिसने विजिलेंस से लेकर रेलवे तक के होश उड़ा दिए। हर जगह चर्चा थी कि बैलाडीला से 52 वैगन की जगह 59 वैगन भेजे गए। लेकिन रुकिए! असली खेल डिब्बों की गिनती का नहीं... असली खेल तो कागजों और रॉयल्टी के वजन का है!

आज हम आपको बताने जा रहे हैं इस खेल के पीछे की वो कड़वी हकीकत, जिसे दबाने की पूरी कोशिश की गई। कहानी 52 डिब्बों की नहीं, बल्कि **57 लाख और 59 लाख मीट्रिक टन** के उस हेरफेर की है, जिसमें सीधे-सीधे 2 लाख मीट्रिक टन लोहा सिस्टम की नाक के नीचे से 'गायब' करने की तैयारी थी! आखिर ये 2 लाख का अतिरिक्त माल किसके इशारे पर जा रहा था? और कौन है इस पूरे सिंडिकेट का मास्टरमाइंड? चलिए पूरा खेल खोलते हैं!"

 आंकड़ेबाजी का मायाजाल 


"आम जनता को उलझाया गया वैगनों की गिनती में, ताकि असली आंकड़ों पर किसी की नजर न जाए। विजिलेंस की गहरी जांच में जो सच सामने आया है, वो चौंकाने वाला है। रिकॉर्ड्स के मुताबिक, जहां सिर्फ **57 लाख** की परमिशन, रॉयल्टी और पास वैध थे... वहां असलियत में वजन पहुंच गया **59 लाख** पर!

यानी सीधे-सीधे **2 लाख** का यह अतिरिक्त माल... जिसका न कोई सरकारी टैक्स चुकाया गया, न कोई वैध ट्रांजिट पास (TP) था। अब सवाल यह उठता है कि क्या बस्तर के पहाड़ों से लोहा बिना किसी की इजाजत के अपने आप ट्रेन पर लोड हो गया? क्या NMDC के लोडिंग सुपरवाइजर सो रहे थे? या फिर रेलवे के वेब्रिज (कांटा) पर बैठे अधिकारियों की आंख पर नोटों की पट्टी बंधी थी?"


"अब समझिए कि यह खेल काम कैसे करता है। ट्रेन बुक होती है एक बड़े सरकारी या प्रतिष्ठित संस्थान, जैसे 'विशाखापट्टनम स्टील प्लांट' के नाम पर। क्यों? क्योंकि सरकारी प्लांट के नाम पर आने-जाने वाली गाड़ियों पर कोई शक नहीं करता। ग्रीन सिग्नल मिलता जाता है और ट्रेनें बिना किसी रुकावट के केके लाइन (KK Line) से आगे बढ़ती रहती हैं।

लेकिन इस बड़े रैक की आड़ में जो **2 लाख का अतिरिक्त माल** छुपाया गया था, उसकी सेटिंग कहीं और थी। विशाखापट्टनम पहुंचने से पहले या वहां के बड़े यार्ड्स में, इस एक्स्ट्रा माल को चुपके से 'शंटिंग' और 'री-मार्शलिंग' के जरिए प्राइवेट पैलेट प्लांट्स, निजी स्पंज आयरन फैक्ट्रियों या फिर समुद्र के रास्ते विदेश भेजने वाले एक्सपोर्टर्स के खाते में डाल दिया जाता है। यानी, नाम सरकारी प्लांट का... और मलाई प्राइवेट माफिया की!"


"विजिलेंस ने इस रैक को इंटरसेप्ट करके चोरी तो पकड़ ली, लेकिन यह सिर्फ एक रैक की बात नहीं है। सवाल यह है कि ऐसे कितने '2 लाख' के फेरबदल पास्ट में हो चुके हैं, जो फाइलों में कभी दर्ज ही नहीं हुए? बिना टॉप-लेवल की मिलीभगत के, इतनी बड़ी मात्रा में आयरन ओर का अवैध परिवहन नामुमकिन है। यह बस्तर के प्राकृतिक संसाधनों की खुली डकैती है, जिसमें रॉयल्टी का करोड़ों रुपया सरकार के खजाने में जाने के बजाय सीधे सिंडिकेट की जेब में जा रहा था।

अब देखना यह है कि विजिलेंस की इस कार्रवाई के बाद क्या सिर्फ छोटे कर्मचारियों को बली का बकरा बनाया जाएगा, या फिर उन सफेदपोश चेहरों और बड़े अफसरों तक भी कानून के हाथ पहुंचेंगे जो विशाखापट्टनम से लेकर छत्तीसगढ़ तक इस पूरे रैकेट को ऑपरेट कर रहे हैं।"