गुरुवार, 2 जुलाई 2026

'अंतरराष्ट्रीय' बहाने और तमनार के जलते सवाल!

 छत्तीसगढ़ को राख, महाराष्ट्र को चकाचौंध: एनजीटी के 'अंतरराष्ट्रीय' बहाने और तमनार के जलते सवाल!

गारे पेलमा सेक्टर-2 कोयला खदान को हरी झंडी मिलने से रायगढ़ के 14 आदिवासी गाँव विनाश के कगार पर। 2024 में जनसुनवाई को 'धांधली' बताने वाली एनजीटी ने अब रूस-यूक्रेन युद्ध और खाड़ी संकट का हवाला देकर आदिवासियों के वजूद का ही गला घोंट दिया। क्या कॉर्पोरेट मित्रों के दबाव के आगे बौनी हो गई 'डबल इंजन' सरकार?



जिस जमीन, महुआ के पेड़ों और पुरखों के जंगलों को बचाने के लिए रायगढ़ के तमनार क्षेत्र के आदिवासी सालों से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे थे, उसे नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के एक ही फैसले ने उजाड़ कर रख दिया है। यह सिर्फ एक सरकारी मंजूरी नहीं है, बल्कि उन हजारों आदिवासियों के लोकतांत्रिक अधिकारों का कत्ल है, जो संविधान की पांचवीं अनुसूची और पेसा (PESA) कानून को अपनी ढाल मानते आए हैं।

तमनार और रायगढ़ की माटी आज अपनों के छल पर रो रही है, लेकिन सत्ता के गलियारों और उद्योगपतियों के वातानुकूलित दफ्तरों में जश्न का माहौल है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या एनजीटी ने यह हरी झंडी पर्यावरण संरक्षण के नियमों के तहत दी है, या फिर यह देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट घराने 'अडानी समूह' के सीधे दबाव का नतीजा है?

पर्दे के पीछे का खेल: सीधे अडानी को नहीं, वाया महाराष्ट्र रूट!

गारे पेलमा सेक्टर-2 (Gare Palma Sector-2) नाम की इस विशालकाय कोयला खदान की क्षमता हर साल 23.6 मिलियन टन कोयला उत्पादन की है। सरकार और कॉरपोरेट तंत्र का खेल इतना शातिर है कि बदनामी से बचने के लिए राज्य और केंद्र सरकार ने यह खदान सीधे अडानी समूह को आवंटित नहीं की।

रणनीति के तहत, पहले यह खदान 'महाराष्ट्र राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी' (Mahagenco) को सौंपी गई। फिर, महाराष्ट्र की इस सरकारी कंपनी ने बेहद सफाई से खनन और विकास (MDO) का ठेका देश के प्रधानमंत्री के सबसे करीबी मित्र कहे जाने वाले अडानी समूह को सौंप दिया। यानी छत्तीसगढ़ की छाती चीरकर कोयला निकाला जाएगा, उजाला महाराष्ट्र के शहरों और सड़कों पर चमकेगा, और छत्तीसगढ़ के हिस्से आएगी सिर्फ राख, प्रदूषण, बीमारी और विस्थापन का दंश।

विनाश के कगार पर खड़े वो 14 गाँव: जहाँ पसरेगा अंधेरा

इस खदान को हरी झंडी मिलने का सीधा मतलब है तमनार क्षेत्र के 14 आदिवासी गाँवों का नक्शे से पूरी तरह मिट जाना। सरकारी आंकड़ों में इन गाँवों में 10,679 परिवार दर्ज हैं, लेकिन जमीनी हकीकत पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का दावा है कि यहाँ प्रभावित परिवारों की वास्तविक संख्या 15,000 से भी अधिक है। इन गाँवों की आने वाली नस्लें अब अपनी जमीन पर कभी कदम नहीं रख पाएंगी:

झीली, रामपुर, कुंजमेरा, गारे, सरईटोला, मुड़ागाँव, रौंदापाली, पाटा, चितवाही, ढोला, नारा, ढोलनारा, जिंगाबहाड़, डोलेसरा, मालूमरा और सरसमल।

इन गाँवों में रहने वाले हजारों आदिवासियों के बच्चों की किलकारियां अब कॉर्पोरेट मशीनों के शोर में दफन होने जा रही हैं।

एनजीटी का अजूबा तर्क: तमनार के जंगल कटने से थमेगा वैश्विक संकट?

एनजीटी (NGT) के जस्टिस शिव कुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्य सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ ने जो फैसला सुनाया है, वह पर्यावरण इतिहास के सबसे हास्यास्पद और डराने वाले बहानों में गिना जाएगा। अपने आदेश में ट्रिब्यूनल ने तर्क दिया है कि:

"वर्तमान में रूस-यूक्रेन युद्ध और खाड़ी देशों (ईरान-अमेरिका) के बीच वैश्विक तनाव चल रहा है।"

"इस वैश्विक संकट के कारण आने वाले दिनों में देश में ऊर्जा सुरक्षा का भारी संकट सकता है।"

लिहाजा, राष्ट्रीय और वैश्विक महत्व को देखते हुए स्थानीय पर्यावरण और नियमों की कुछ अनदेखी की जा सकती है!"

अखबार का तीखा सवाल: रूस और यूक्रेन की लड़ाई की कीमत छत्तीसगढ़ का आदिवासी अपनी जमीन और फेफड़े देकर क्यों चुकाए? क्या पर्यावरण अदालत का काम पर्यावरण बचाना है या युद्ध का बहाना बनाकर जंगलों को काटने का रास्ता साफ करना?

2024 में 'धांधली' तो 2026 में 'सच्ची' कैसे हो गई जनसुनवाई?

इतिहास गवाह है कि इसी गारे पेलमा सेक्टर-2 के खिलाफ जब 2024 में गाँव वालों ने एनजीटी का दरवाजा खटखटाया था, तब कोर्ट ने माना था कि खदान के लिए की गई पर्यावरणीय जनसुनवाई में भारी धांधली हुई थी। पर्यावरण नियमों को ताक पर रखा गया था।

मात्र दो सालों के भीतर ऐसा क्या बदल गया? क्या पर्यावरण सुधर गया या फिर राज्य में बैठी 'डबल इंजन' सरकार का दबाव बढ़ गया? जानकारों का कहना है कि सूबे के कद्दावर नौकरशाह से नेता बने वित्त मंत्री और रायगढ़ के स्थानीय रसूखदारों ने परदे के पीछे ऐसा चक्रव्यूह रचा, जिसने आदिवासियों की आवाज को दिल्ली के ट्रिब्यूनल तक पहुँचने ही नहीं दिया।

उबल रहा है जन-आक्रोश: नेताओं के खिलाफ तीखी भाषा और आक्रोश

इस फैसले के बाद से पूरे तमनार क्षेत्र में तनाव और दहशत का माहौल है। बस्तर से लेकर सरगुजा और रायगढ़ तक, आदिवासियों का गुस्सा फूट पड़ा है। आंदोलनकारियों का सीधा आरोप है कि सरकार जनप्रितिनिधियों को बंधक बनाकर उद्योगपतियों की दलाली कर रही है।

हाल ही में प्रभावित क्षेत्रों में जाने से विपक्ष के जनप्रतिनिधियों और आदिवासी नेताओं को पुलिस बल का दुरुपयोग करके रोका गया। आंदोलन की अगुवाई कर रहे स्थानीय नेताओं का कहना है, "छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भले ही आदिवासी चेहरा (विष्णुदेव साय) हों, लेकिन पूरी कमान उद्योगपतियों के इशारे पर काम करने वाले चंद कद्दावर मंत्रियों और नौकरशाहों के हाथ में है। आदिवासियों के संवैधानिक और पेसा कानून के अधिकारों को पैरों तले रौंदा जा रहा है।"

तीखे सवाल, जिनका जवाब सरकार को देना होगा:

1. पेसा (PESA) और ग्राम सभा की 'ना' का क्या हुआ? जब आदिवासियों की ग्राम सभा ने इस खनन योजना को सिरे से खारिज कर दिया था, तो क्या दिल्ली और रायपुर की सरकारें ग्राम सभा से ऊपर हैं?

2. मुआवजा तो दे दोगे, पुरखों की पहचान कहाँ से लाओगे? आदिवासियों को कुछ लाख रुपए का मुआवजा देकर शहरों की झुग्गियों में धकेल दिया जाएगा। उनके जल, जंगल, जमीन और संस्कृति की भरपाई कौन सा कॉरपोरेट घराना करेगा?

3. छत्तीसगढ़ सिर्फ दोहन के लिए क्यों? हसदेव से लेकर तमनार तक, छत्तीसगढ़ के फेफड़ों (जंगलों) को काटा जा रहा है। क्या छत्तीसगढ़ की नियति सिर्फ देश को रोशन करना और खुद प्रदूषण के अंधेरे में डूब जाना है?

निष्कर्ष: अभी लड़ाई खत्म नहीं हुई है...

कोयला तो कुछ सालों में जलकर राख हो जाएगा और अडानी की तिजोरियां भर जाएंगी, लेकिन एक बार अगर तमनार का यह समृद्ध पर्यावरण और आदिवासियों का वजूद हाथ से निकल गया, तो उसे कोई वैज्ञानिक या सरकार दोबारा वापस नहीं ला पाएगी।

एनजीटी ने भले ही कागजों पर उद्योगपतियों के लिए रास्ते साफ कर दिए हों, लेकिन तमनार की धरती पर आदिवासियों की 'ग्राम सभा' अभी भी जिंदा है। जल-जंगल-जमीन की यह लड़ाई अब ट्रिब्यूनल के कमरों से निकलकर रायगढ़ की सड़कों और जंगलों में लड़ी जाएगी। सरकार को यह याद रखना होगा कि इतिहास में आदिवासियों ने कभी भी अपनी माटी का सौदा आसानी से नहीं होने दिया है।


बुधवार, 1 जुलाई 2026

आधा दर्जन IPS-अफ़सरों पर गिरफ्तारी की तलवार!

 ED की ₹1700 करोड़ की चोट के बाद अब CBI पर दबाव, पूर्व CM भूपेश बघेल और आधा दर्जन IPS-अफ़सरों पर गिरफ्तारी की तलवार!



भिलाई से लेकर दुबई तक अरबों रुपयों का साम्राज्य खड़ा करने वाले 'महादेव ऑनलाइन सट्टा ऐप' मामले में अब तक की सबसे बड़ी हलचल देखने को मिल रही है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा दुबई की बुर्ज खलीफा की आलीशान संपत्तियों सहित करीब 1700 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति अटैच (कुर्क) किए जाने के बाद, अब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) पर भी कड़ा एक्शन लेने का भारी दबाव बन गया है। सूत्रों का दावा है कि सीबीआई अब इस मामले में शामिल 'बड़े मगरमच्छों' पर शिकंजा कसने और उन्हें पूछताछ के बहाने बुलाकर सीधे गिरफ्तार करने की फुलप्रूफ प्लानिंग में जुट गई है।

बुर्ज खलीफा से लेकर दिल्ली तक जब्ती, कुल आंकड़ा ₹4336 करोड़ पार

बुधवार को ईडी द्वारा जारी आधिकारिक बयान के मुताबिक, रायपुर क्षेत्रीय कार्यालय ने मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत बड़ी कार्रवाई करते हुए दुबई के प्राइम लोकेशन पर मौजूद 18 और दिल्ली की 2 अचल संपत्तियों को कुर्क किया है। इसमें दुनिया की सबसे ऊंची इमारत 'बुर्ज खलीफा' के लग्जरी अपार्टमेंट, दुबई हिल्स स्टेट के विला और कई हाई-एंड फ्लैट्स शामिल हैं, जिनकी बाजार कीमत करीब 1700 करोड़ रुपये आंकी गई है। इस ताजी कार्रवाई के बाद महादेव ऐप मामले में अब तक कुल फ्रीज और कुर्क की गई चल-अचल संपत्ति का आंकड़ा चौंकाने वाले ₹4,336 करोड़ के पार पहुंच चुका है।

आरोपी नंबर-6 पूर्व CM भूपेश बघेल और IPS लॉबी राडार पर

महादेव सट्टा ऐप को राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण देने के आरोपों को लेकर सीबीआई की चार्जशीट में बड़े खुलासे हुए हैं। सीबीआई की एफआईआर में छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को 'आरोपी नंबर-6' बनाया गया है। इसके अलावा प्रदेश के आधा दर्जन से अधिक रसूखदार पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी सीबीआई के सीधे राडार पर हैं।

इनमें आईपीएल स्तर के अधिकारी और अन्य बड़े नाम शामिल हैं:

 आनंद छाबड़ा (प्रशासनिक/पुलिस अधिकारी)

 अभिषेक पल्लव (प्रशासनिक/पुलिस अधिकारी)

 प्रशांत अग्रवाल

 आरिफ शेख

 संजय ध्रुव (राज्य प्रशासनिक सेवा)

 चंद्रभूषण वर्मा (जमानत पर बाहर एएसआई)

सीबीआई की जांच के मुताबिक, ये तमाम अधिकारी महादेव सट्टा ऐप को बेखौफ चलाने और प्रोटेक्शन देने के एवज में हर महीने ₹10 लाख से लेकर ₹20 लाख तक की मोटी प्रोटेक्शन मनी वसूलते थे। इन सभी के खिलाफ धारा 120B और 420 के तहत केस दर्ज किया जा चुका है और कभी भी इनकी गिरफ्तारी की जा सकती है।

एक तरफ जांच का शिकंजा, दूसरी तरफ अफ़सरों को प्रमोशन का 'इनाम'?

इस पूरे मामले में एक तीखा और गंभीर विरोधाभास भी सामने आया है। एक तरफ जहां मौजूदा सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस और 'अपराधियों को उल्टा लटकाकर सीधा करने' की हुंकार भरती है, वहीं दूसरी तरफ महादेव सट्टा ऐप के आरोपी घेरे में आए आनंद छाबड़ा और लोहारीडीह कांड के बाद हटाए गए अभिषेक पल्लव जैसे अधिकारियों को वेतन वृद्धि और प्रमोशन का 'इनाम' दिए जाने की खबरें हैं। सरकार की इस कथनी और करनी को लेकर अब सियासी गलियारों में तीखे सवाल उठने लगे हैं।

सिंडिकेट का नया पैंतरा: बैन के बावजूद बदले डोमेन, विपक्ष ने घेरा

हंगामा मचने और महादेव ऐप पर प्रतिबंध की बातों के बीच सट्टा सिंडिकेट ने 'गोल्ड 365', 'टाइगर एक्सचेंज' और 'लेजर 247' जैसे नए डोमेन बनाकर इस अवैध खेल को बदस्तूर जारी रखा। इधर विपक्ष (कांग्रेस) ने केंद्र सरकार पर इस ऐप को पूरी तरह बैन न करने का आरोप लगाते हुए पलटवार किया है कि महादेव ऐप का पैसा अब सत्ताधारी दल के एक बेहद प्रभावशाली नेता तक पहुंच रहा है, जिसके चलते मुख्य आरोपियों (सौरभ चंद्राकर और रवि उत्पल) को अभी भी राजनीतिक संरक्षण मिल रहा है।

फिलहाल, ईडी की इस बड़ी चोट के बाद अब गेंद सीबीआई के पाले में है। देखना यह होगा कि धीमी रफ्तार से चल रही यह जांच कब अंजाम तक पहुंचती है, क्योंकि जनता के बीच अब यह चर्चा आम है कि 'डिलेड जस्टिस इज नो जस्टिस' (देर से मिला न्याय, न्याय नहीं होता)।

वीडियो देखें 

मंगलवार, 30 जून 2026

छत्तीसगढ़ के जल-जंगल-जमीन की कीमत पर भरी जा रही है सत्ता की तिजोरी?

 कॉरपोरेट चंदे का 'खेला': क्या छत्तीसगढ़ के जल-जंगल-जमीन की कीमत पर भरी जा रही है सत्ता की तिजोरी?

 


ADR की रिपोर्ट का बड़ा खुलासा— राजस्थान, मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों को पछाड़कर बीजेपी के लिए 'दुधारू गाय' बना छोटा सा छत्तीसगढ़; कॉरपोरेट मेहरबानी और आदिवासियों की बेबसी के बीच का कड़वा सच।


जब देश के गृह मंत्री अमित शाह ने रायगढ़ विधानसभा क्षेत्र की एक चुनावी सभा में गरजते हुए कहा था कि "ओपी चौधरी को विधायक बनाओ, इन्हें बड़ा आदमी बनाने की जिम्मेदारी मेरी है," तब शायद ही किसी ने सोचा था कि इस 'बड़ा आदमी' बनाने के खेल के पीछे छत्तीसगढ़ के संसाधनों की इतनी बड़ी बिसात बिछाई जा रही है। आज यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या छत्तीसगढ़ के राजनेता बड़े आदमी बन पाए या नहीं, यह तो जांच का विषय है, लेकिन छत्तीसगढ़ के आसरे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) देश की सबसे ज्यादा चंदा लेने वाली पार्टी जरूर बन गई है ।

एडीआर (ADR) की रिपोर्ट और चंदे का चौंकाने वाला गणित

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की हालिया रिपोर्ट ने छत्तीसगढ़ की राजनीति में भूचाल ला दिया है। विधानसभा चुनावों के दौरान चंदा उगाहने के मामले में भाजपा ने विपक्षी दलों को कोसों पीछे छोड़ दिया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान और मध्य प्रदेश के मुकाबले छत्तीसगढ़ एक छोटा राज्य माना जाता है, लेकिन चंदे के मामले में इसने मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्य को भी पीछे छोड़ दिया है ।

आंकड़ों की बाजीगरी को समझें तो:

 छत्तीसगढ़: भाजपा को यहाँ से कुल 76 करोड़ 29 लाख रुपये का चंदा मिला है, जबकि देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को मात्र 27 लाख रुपये ही नसीब हुए ।

 मध्य प्रदेश: भाजपा को 54 करोड़ 3 लाख रुपये मिले, जबकि कांग्रेस को 1 करोड़ 34 लाख रुपये मिले।

 राजस्थान: भाजपा को 87 करोड़ 51 लाख रुपये का चंदा मिला ।

छत्तीसगढ़ से मिले कुल 76 करोड़ से अधिक के चंदे में से लगभग 70 करोड़ रुपये सीधे कॉरपोरेट घरानों की जेब से आए हैं । अब सबसे बड़ा और तीखा सवाल यही उठता है कि क्या सत्ता के दम पर कॉरपोरेट घरानों से यह 'उगाही' की जा रही है? आखिर एक छोटे से राज्य से कॉरपोरेट घराने सत्तारूढ़ दल पर इतने मेहरबान क्यों हैं?

'चंदा दो, धंधा लो'— क्या दांव पर है छत्तीसगढ़ के संसाधन?

छत्तीसगढ़ में जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए एक लंबा और दमनकारी दौर चल रहा है। हसदेव से लेकर बस्तर तक आदिवासियों का आंदोलन जारी है। राजनीतिक गलियारों और जमीन पर यह सीधा आरोप लग रहा है कि छत्तीसगढ़ को कॉरपोरेट घरानों के हाथों बेचा जा रहा है । यह चर्चा आम है कि सूबे में मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों तक का चयन इस तरह किया गया है कि वे दिल्ली दरबार के इशारों पर काम कर सकें, जिसके चलते सूबे में कॉरपोरेट घरानों की मनमानी एंट्री हुई है ।

यूं तो देश में केवल 'अडानी' का नाम ही सबसे ज्यादा गूंजता है क्योंकि वे हर राज्य और हर बड़े ठेके में मौजूद हैं। लेकिन खेल सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। बस्तर में खदानों की नीलामी से लेकर कोरबा, रायगढ़ और सरगुजा जैसे समृद्ध क्षेत्रों में अडानी के साथ-साथ कई अन्य कॉरपोरेट घरानों को मनमर्जी के मौके दिए जा रहे हैं । एडीआर के ये आंकड़े साफ इशारा करते हैं कि छत्तीसगढ़ में एक नया समीकरण काम कर रहा है— "चंदा दो और छत्तीसगढ़ के प्राकृतिक संसाधन ले जाओ" ।

संगीनों के साए में विकास या विनाश? रायगढ़ का वो वायरल सच

इस कॉरपोरेट मेहरबानी की सबसे डरावनी और दर्दनाक तस्वीर इन दिनों रायगढ़ के जेजामूड़ा से सामने आई है, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है । जेजामूड़ा में अडानी की रेल लाइन बिछाने के काम को शुरू करने के लिए भारी पुलिस बल और कॉरपोरेट बाउंसरों की फौज तैनात की गई । संगीनों के साए में, पुलिस प्रशासन की मौजूदगी में ग्रामीणों की आवाज को दबाया गया ।

इस पूरी बर्बरता के बीच एक आदिवासी महिला की बेबसी और चीख देश के लोकतंत्र के मुंह पर करारा तमाचा है। उस महिला के पति को पुलिस ने सिर्फ इसलिए गिरफ्तार कर लिया ताकि कॉरपोरेट का काम बिना किसी बाधा के चल सके । रोती-बिलखती उस महिला ने कैमरे के सामने जो कहा, वह छत्तीसगढ़ की नियति बन चुका है:

"मेरे पतिदेव को पहले छोड़ दो, फिर अपना काम करवाते रहना। हम अपनी जमीन फ्री में दान दे देंगे, हम एक रुपया भी पैसा नहीं लेंगे, बस मेरे पतिदेव को छोड़ दो..."

"

यह बयान साबित करता है कि आज छत्तीसगढ़ का आम नागरिक, किसान और आदिवासी कॉरपोरेट और सत्ता के गठजोड़ के सामने कितना लाचार और असहाय हो चुका है। पुलिस और प्रशासन जनता की रक्षा करने के बजाय कॉरपोरेट के 'एजेंट' की भूमिका में नजर आ रहे हैं

निष्कर्ष: क्या यही है नए छत्तीसगढ़ की परिभाषा?

एडीआर की इस रिपोर्ट ने उस पर्दे को हटा दिया है जिसके पीछे विकास का ढोंग रचा जा रहा था। जब कॉरपोरेट की थैलियों से करोड़ों रुपये सत्ताधारी दल की तिजोरियों में पहुंचते हैं, तो नीतियां जनता के हित में नहीं, बल्कि उन थैलियों को भरने वालों के हित में बनती हैं।

सवाल अनुत्तरित है: क्या आने वाले दिनों में छत्तीसगढ़ के बचे-खुचे प्राकृतिक संसाधनों को भी इसी तरह कॉरपोरेट के हवाले कर दिया जाएगा? और क्या छत्तीसगढ़ की जनता को अपनी ही जमीन पर बंधक बनकर रहना होगा? चंदे की यह सियासत छत्तीसगढ़ को विकास की ओर ले जा रही है या विनाश की ओर, इसका फैसला आने वाला वक्त और प्रदेश की जागरूक जनता ही करेगी।

वीडियो देखें