धान का कटोरा या मानव तस्करों का 'सॉफ्ट टारगेट'?
सुशासन के दावों के बीच खुफिया तंत्र और पुलिस की नाकामी पर उठे तीखे सवाल
जिसे हम 'धान का कटोरा' और 'शांति का टापू' कहते आए हैं, क्या वह अब मानव तस्करों के लिए सबसे आसान शिकारगाह बन चुका है? रोजगार और बेहतर जिंदगी का झांसा देकर छत्तीसगढ़ की 35 बेटियों को पड़ोसी राज्य झारखंड में ले जाकर एक बंद कमरे में बंधक बना दिया गया। यह महज एक अपराध नहीं, बल्कि राज्य की कानून-व्यवस्था, गृह विभाग की मुस्तैदी और सीमा सुरक्षा के दावों की पोल खोलने वाली एक खौफनाक हकीकत है। सरकारें जब 'सुशासन त्योहार' मनाने में व्यस्त हैं, तब छत्तीसगढ़ के गांव-गांव में सक्रिय दलाल मासूम जिंदगियों का सौदा कर रहे हैं।
एक वीडियो कॉल ने खोला राज, वरना सोया रहता सिस्टम
तस्करी का यह डरावना खेल तब सामने आया जब बंधक बनाई गई लड़कियों में से एक ने हिम्मत दिखाई और अपने किसी परिचित को वीडियो कॉल कर आपबीती सुनाई। इसके बाद ही प्रशासनिक अमला हरकत में आया। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी तंत्र तभी जागेगा जब पानी सिर से ऊपर चला जाएगा? उन 35 परिवारों की उम्मीदें आज झारखंड के किसी अज्ञात बंद कमरे में घुट रही हैं, जिनकी सुध लेने वाला कोई नहीं था।
खुफिया तंत्र फेल या सिर्फ 'वसूली' में व्यस्त?
सबसे तीखा सवाल राज्य के गृह विभाग, खुफिया एजेंसियों और बॉर्डर चेक पोस्ट पर खड़ा होता है। 35 लड़कियां किसी अदृश्य विमान में बैठकर तो राज्य की सीमा पार नहीं कर गईं? कांकेर और ग्रामीण अंचलों से राजधानी होते हुए ये लड़कियां बसों या सड़क मार्ग के जरिए ही झारखंड ले जाई गईं। जब गाड़ियों और बसों का हुजूम राज्य की सीमाओं को पार करता है, तो वहां तैनात पुलिस और चेकिंग पॉइंट क्या कर रहे होते हैं? क्या खुफिया तंत्र केवल कागजों पर सिमट कर रह गया है या फिर बॉर्डर चेक पोस्ट सिर्फ ट्रकों से 'कलेक्शन' और अवैध वसूली का जरिया बनकर रह गए हैं?
पुराना पैंतरा: गरीबी का फायदा और दलालों का जाल
तस्करों का तरीका आज भी वही पुराना और आजमाया हुआ है—गांव के गरीब परिवारों को पकड़ो, मोटी कमाई और काम का लालच दो, और उनकी लाचारी का फायदा उठाकर उन्हें दूसरे राज्यों में धकेल दो। 'बेटी बचाओ' के गगनभेदी नारे और पलायन रोकने के नाम पर करोड़ों रुपयों के सरकारी बजट का खेल सिर्फ फाइलों और विज्ञापनों तक सीमित नजर आता है। धरातल पर सच यह है कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर न होने के कारण इन बेटियों को तस्करों के जाल में फंसना पड़ रहा है।
'ट्रांसफर-पोस्टिंग' की राजनीति में उलझा गृह विभाग
राज्य में अपराधों का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है और कानून-व्यवस्था बद से बदतर होती जा रही है। विपक्ष और जानकारों का सीधा आरोप है कि पूरी सरकार और गृह विभाग केवल अधिकारियों के तबादलों, बैठकों और राजनीतिक नफा-नुकसान की गणित बिठाने में व्यस्त हैं। छत्तीसगढ़ में कानून-व्यवस्था की स्थिति इस कदर चरमरा गई है कि अब नैतिक जिम्मेदारी का सवाल उठने लगा है। विपक्ष तो गृह मंत्री के इस्तीफे और बर्खास्तगी तक की मांग कर चुका है, क्योंकि मौजूदा तंत्र बढ़ते अपराधों को रोकने में पूरी तरह पंगु नजर आ रहा है।
मिलीभगत के बिना यह खेल मुमकिन नहीं
यह पूरा घटनाक्रम किसी बड़े रैकेट की ओर इशारा करता है। ग्राम पंचायत स्तर से लेकर स्थानीय पुलिस और ऊंचे रसूखदारों की मिलीभगत के बिना इतने बड़े पैमाने पर मानव तस्करी मुमकिन नहीं है।तस्करों का यह जाल भिलाई से लेकर बस्तर के सुदूर गांवों तक फैला हुआ है, जहां से लड़कियों को ले जाकर कई बार देह व्यापार के दलदल में भी झोंक दिया जाता है। झारखंड की यह घटना सिर्फ एक बानगी है, यह सिस्टम को एक गंभीर चेतावनी है। यदि अब भी कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो छत्तीसगढ़ की न जाने कितनी और बेटियां इस अंधकार में विलीन हो जाएंगी।





