शनिवार, 27 जून 2026

45 करोड़ की बर्बादी के बाद अब 30 करोड़ के नए टेंडर की तैयारी

 स्मार्ट सिटी का 'स्मार्ट' खेल: 45 करोड़ की बर्बादी के बाद अब 30 करोड़ के नए टेंडर की तैयारी, किसका भरेगा पेट?



 एक तरफ छत्तीसगढ़ सरकार अपनी महत्वकांक्षी योजनाओं को अमली जामा पहनाने के लिए लगातार कर्ज के दलदल में डूबती जा रही है, वहीं दूसरी तरफ टैक्सपेयर्स (जनता) की गाढ़ी कमाई के पैसों को किस बेरहमी से सफेद हाथी योजनाओं में फूंका जा रहा है, इसका सबसे घिनौना और जीता-जागता उदाहरण देखना हो तो नया रायपुर चले आइए। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वकांक्षी '100 स्मार्ट सिटी योजना' के तहत रायपुर में विकास के नाम पर जो तमाशा चल रहा है, वह अब पूरी तरह आईने की तरह साफ हो चुका है। सवाल उठने लगा है कि क्या स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट सिर्फ अफसरों और रसूखदारों के लिए 'पैसा उगाहने और भ्रष्टाचार का जरिया' बनकर रह गया है?

सात समुंदर पार 'श्रीलंका' से आई थीं साइकिलें, आज कबाड़खाना बना सिस्टम

कहानी शुरू होती है साल 2016-17 में। रायपुर की सड़कों पर 'स्मार्टनेस' का तड़का लगाने के लिए करीब 45 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से 102 किलोमीटर लंबा साइकिल ट्रैक बनाया गया। भारतीय साइकिलों को ठेंगा दिखाकर, भारी कमीशनखोरी के आरोपों के बीच, सात समुंदर पार श्रीलंका से हाईटेक साइकिलें मंगवाई गईं। बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगे, खूब ढिंढोरा पीटा गया।

लेकिन हकीकत क्या है? शुरुआती दो-चार महीनों के बाद ही यह पूरा प्रोजेक्ट फुस्स हो गया। आज नया रायपुर के साइकिल स्टैंड्स पर नजर डालेंगे तो 10 में से 8 स्टैंड पूरी तरह खाली पड़े हैं। जो साइकिलें बची हैं, उनके टायर फट चुके हैं, चेनों में जंग लग चुका है और विदेशी तकनीक से लैस बताया जाने वाला यह पूरा सिस्टम खुद 'पंचर' होकर कबाड़खाने में तब्दील हो चुका है। जनता के 45 करोड़ रुपये सीधे पानी में बह गए।

उल्टा लटकाने के दावे हवा, भ्रष्टाचारियों को अभयदान!

हैरानी की बात यह है कि जब वर्तमान सत्ताधारी दल विपक्ष में था, तब मंचों से चीख-चीखकर बड़े-बड़े दावे किए जाते थे कि 'सत्ता में आते ही भ्रष्टाचारियों को उल्टा लटकाकर सीधा कर देंगे।' लेकिन आज नया रायपुर में जनता के 45 करोड़ रुपये डुबाने वाले उन नीति-निर्माताओं और अफसरों पर कोई आंच नहीं आई। श्रीलंका से कबाड़ साइकिलें मंगवाने का तुगलकी फरमान जारी करने वाले किस रसूखदार अफसर के खिलाफ अब तक कार्रवाई हुई? जवाब है- शून्य। अफसरों को खुला संरक्षण मिला हुआ है और फाइलों पर धूल जम रही है।

डूब चुके प्रोजेक्ट को 30 करोड़ का नया 'ऑक्सीजन', या फिर बंदरबांट की तैयारी?

हद तो तब हो गई जब इस पूरी तरह फेल हो चुके, मरे हुए प्रोजेक्ट को जिंदा करने यानी 'ऑक्सीजन' देने के नाम पर अब 30 करोड़ रुपये का नया टेंडर लाने का खेल खेला जा रहा है। गजब की जिद है- सब कुछ फेल हो चुका है, फिर भी जनता का पैसा बहाने की सनक बरकरार है।

सवाल यह उठता है कि क्या साय सरकार इस बात की लिखित गारंटी देगी कि जो नए 30 करोड़ रुपये फूंकने की तैयारी है, उसका हश्र भी पहले जैसा नहीं होगा? या फिर यह नया टेंडर भी सिर्फ नई कमीशनखोरी और पैसों की बंदरबांट का एक नया जरिया है?

प्रचार पर करोड़ों का धुआं, जेब में सौ तो दिखावे में एक

स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की शुरुआत से ही इसके प्रचार-प्रसार के खर्चों पर गंभीर उंगलियां उठती रही हैं। रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़ या दुर्ग जैसे शहरों को जितना बजट बुनियादी सुविधाओं के लिए नहीं मिलता, उससे कहीं ज्यादा रकम सिर्फ विज्ञापनों और बुकलेट्स की छपाई में फूंक दी गई। अंदरखाने की चर्चाओं की मानें तो प्रचार के नाम पर '₹1 खर्च कर ₹100 जेब में डालने' का खेल खेला गया। महंगे ब्रोशर और प्रचार सामग्री कागजों पर हजारों-लाखों की संख्या में छपवाकर सरकारी खजाने को जमकर चूना लगाया गया।

असमंजस में सिस्टम: नगर निगम, प्लेसमेंट एजेंसियां और सियासी रंजिश

सिर्फ साइकिल ट्रैक ही नहीं, रायपुर स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत बनी अन्य संरचनाएं भी राजनीतिक रंजिश और अव्यवस्था की शिकार हैं। साइंस कॉलेज के पास करोड़ों की लागत से बनी चौपाटी को सरकार बदलते ही सिर्फ एक विधायक की राजनीतिक जीत की जिद के चलते नेस्तनाबूत (ढहा) कर दिया गया। वहां भी करोड़ों की सीधी बर्बादी हुई। इसके अलावा, नगर निगम और स्मार्ट सिटी प्रबंधन के बीच आपसी खींचतान जगजाहिर है। प्लेसमेंट एजेंसियों के जरिए रखे गए गरीब कर्मचारियों को कम तनख्वाह देकर ज्यादा राशि के वाउचर पर दस्तखत कराने जैसे गंभीर शोषण के आरोप भी इस विभाग पर लगते रहे हैं।

विधानसभा में मंत्रियों के रटे-रटाए जुमले: 'दिखवा लेंगे, अकेले में रिपोर्ट देख लेना'

जब-जब जनप्रतिनिधियों या विधायकों द्वारा सदन में इन घोटालों और फिजूलखर्ची पर तीखे सवाल दागे जाते हैं, तब-तब मंत्रियों के पास वही पुराने, रटे-रटाए तीन जुमले तैयार मिलते हैं:

1. "मामला संज्ञान में आया है, दिखवा लेंगे।"

2. "दोषी पाए जाने पर भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।"

3. "आपको ज्यादा जानकारी चाहिए या रिपोर्ट देखनी है, तो अकेले में केबिन में आकर देख लीजिए।"

सदन के भीतर की यह लीपापोती साफ बताती है कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं। बहरहाल, नया रायपुर की सड़कों पर दम तोड़ चुकी साइकिलें और अब 30 करोड़ का नया टेंडर, चीख-चीखकर गवाही दे रहा है कि विकास की इस 'स्मार्ट' परिभाषा में जनता सिर्फ मूकदर्शक है और मलाईदार अफसरशाहों व ठेकेदारों का नया सिंडिकेट एक बार फिर तिजोरियां भरने की फिराक में है। देखना होगा कि इस नए खेल पर मुख्यमंत्री की जीरो टॉलरेंस की नीति का हंटर चलता है या फिर यह फाइल भी 'दिखवा लेंगे' की भेंट चढ़ जाती है।

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शुक्रवार, 26 जून 2026

छत्तीसगढ़ की सत्ता में 'भाटिया' ब्रांड की धमक

 छत्तीसगढ़ की सत्ता में 'भाटिया' ब्रांड की धमक: चेहरे बदले, पर क्या बदल पाई व्यवस्था?



छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद से ही यहां की सियासत में एक यक्ष प्रश्न हमेशा तैरता रहा है कि 'सत्ता का असली रिमोट कंट्रोल किसके हाथ में है?' चाहे अजीत जोगी का दौर रहा हो या डॉ. रमन सिंह के 15 साल, या फिर भूपेश बघेल का कार्यकाल—हर दौर में कुछ रसूखदार नौकरशाहों और करीबियों के नाम चर्चा में रहे जो परदे के पीछे से सरकार चलाते दिखे। वर्तमान में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के कार्यकाल में भी यही सवाल एक बार फिर पूरी शिद्दत के साथ गलियारों में गूंज रहा है।

सियासी और प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि सरकार के बड़े फैसलों और नीतिगत बदलावों के पीछे न तो कद्दावर मंत्रियों की चल पा रही है और न ही आला अफसरों की। इस दौर में जिस एक नाम की धमक मंत्रालय (महानदी भवन) की पांचवीं मंजिल से लेकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों तक महसूस की जा रही है, वह है प्रदेश के दिग्गज शराब कारोबारी और बीसीसीआई (BCCI) के कोषाध्यक्ष प्रभतेज सिंह भाटिया।

ननकीराम कंवर के पत्र ने बढ़ाई सियासी तपिश

इस रसूख को लेकर सुगबुगाहट तब और तेज हो गई जब प्रदेश के पूर्व गृहमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ आदिवासी नेता ननकीराम कंवर ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिख दिया। इस पत्र में उन्होंने वरिष्ठ शराब कारोबारी बलदेव सिंह भाटिया (पप्पू भाटिया) और उनके बेटे प्रभतेज सिंह भाटिया के साथ-साथ वरिष्ठ आईएएस अधिकारी सुबोध सिंह की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कंवर ने अपने पत्र में चेताया है कि जिस तरह 2018 में कुछ चेहरों के अति-प्रभाव और घिराव के कारण भाजपा को सत्ता गंवानी पड़ी थी, वही इतिहास दोहराया जा रहा है। वरिष्ठ नेता का यह कदम साफ करता है कि मामला सिर्फ विपक्ष के आरोपों तक सीमित नहीं है, बल्कि पार्टी के भीतर भी इसे लेकर गहरी खींचतान चल रही है।

एक हाथ में अरबों का साम्राज्य, दूसरे में क्रिकेट के खजाने की चाबी

प्रभतेज सिंह भाटिया के रसूख का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके पास न सिर्फ 'सिंबा' (Simba) जैसे बड़े बियर ब्रांड और अरबों रुपये का कारोबारी साम्राज्य है, बल्कि वे दुनिया के सबसे अमीर खेल संगठन बीसीसीआई के संयुक्त सचिव रहने के बाद सितंबर 2025 में इसके कोषाध्यक्ष (Treasurer) की कुर्सी तक पहुंचे हैं। छत्तीसगढ़ क्रिकेट एसोसिएशन से शुरू हुआ उनका यह सफर देश की खेल राजनीति के शीर्ष तक जा पहुंचा है।

दिल्ली का वरदहस्त और साय सरकार की 'मजबूरी'?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रभतेज भाटिया की इस असीमित धमक की असली वजह दिल्ली के शीर्ष नेतृत्व से उनकी नजदीकी है। बीसीसीआई के सचिव और देश के सबसे कद्दावर राजनेता के पुत्र जय शाह से उनकी पटरी इस कदर बैठती है कि प्रादेशिक स्तर पर उनके फैसलों को टालना या उनकी बात को नकारना राज्य सरकार के लिए आसान नहीं रह गया है। आबकारी विभाग से जुड़े नीतिगत फैसले, प्लेसमेंट एजेंसियों की भूमिका से लेकर प्लास्टिक की बोतलों में शराब बेचने तक के निर्णयों के पीछे 'भाटिया सिंडिकेट' की सोच और दखल की चर्चाएं गर्म हैं। इस रसूख के आगे मुख्यमंत्री के खास समझे जाने वाले नौकरशाह राहुल भगत, वित्त मंत्री ओपी चौधरी और दिल्ली से भेजे गए आईएएस सुबोध सिंह भी हाशिए पर नजर आ रहे हैं।

हर दौर में बुलंद रहा 'भाटिया परिवार' का परचम

यह पहली बार नहीं है जब भाटिया परिवार का सिक्का छत्तीसगढ़ की सत्ता पर चल रहा हो। इनका इतिहास हर दौर की सत्ता के साथ कदमताल मिलाने का रहा है। एक जमाने में बलदेव सिंह भाटिया दिग्गज कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ल के सबसे करीबी सिपहसालारों में गिने जाते थे। शुक्ल के बाद जब राज्य में डॉ. रमन सिंह का दौर आया, तो भाटिया परिवार भाजपा सरकार के सबसे निष्ठावान और शक्तिशाली करीबियों में शुमार हो गया। दौर बदला, मुख्यमंत्री बदले, लेकिन व्यवस्था और रसूख का केंद्र बिंदु आज भी जस का तस बना हुआ है।

पीएमओ (PMO) की दहलीज तक पहुंचे इस मामले ने अब छत्तीसगढ़ की राजनीति में नए समीकरण बना दिए हैं। देखना दिलचस्प होगा कि अंदरूनी कलह और दिल्ली के रसूख के बीच फंसी साय सरकार इस परदे के पीछे के साम्राज्य से खुद को कितना मुक्त रख पाती है, या फिर यह 'धमक' आने वाले समय में सरकार के लिए कोई बड़ा सियासी संकट खड़ा करेगी।

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गुरुवार, 25 जून 2026

आदिवासी महिलाओं से अरबों की ठगी; सीधे मंत्रियों और अफसरों पर गंभीर आरोप!

 छत्तीसगढ़ में 'रक्षक ही भक्षक': राष्ट्रीय आजीविका मिशन के नाम पर 40,000 आदिवासी महिलाओं से अरबों की ठगी; सीधे मंत्रियों और अफसरों पर गंभीर आरोप!


- मोदी सरकार की लखपति दीदी और आत्मनिर्भर योजना को लगा बट्टा; 'फ्लोरोमैक्स' कंपनी के झांसे में आकर बर्बाद हुईं छत्तीसगढ़ की ग्रामीण बहनें।

- पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने खोला मोर्चा, कहा—"यह सिर्फ लूट नहीं, प्रधानमंत्री को बदनाम करने की साजिश", सीबीआई जांच की मांग।

- राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की सख्ती: गुमराह करने वाले कलेक्टर के बाद अब सीधे मुख्य सचिव को दिल्ली दरबार में किया तलब।

- "कर्ज चुकाने के लिए किडनी बेचो या खुद को बेचो..." बैंक दे रहे धमकियां, रोते-बिलखते हुए महिलाओं ने मंत्रियों को घेरा तो मिला 'नाटकबाजी' का ताना।


जिस राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की गरीब और आदिवासी महिलाओं की तकदीर बदलने, उन्हें 'लखपति दीदी' बनाने और आर्थिक रूप से सशक्त करने का सबसे बड़ा जरिया बताया था, छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचलों में उसी योजना की आड़ में एक ऐसा खौफनाक खेल खेला गया है जिसकी कल्पना भी रूह कंपा देने वाली है। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और विशेषकर कोरबा तथा आसपास के आदिवासी क्षेत्रों की लगभग 40,000 से अधिक लाचार और भोली-भाली महिलाओं को एक सोची-समझी साजिश के तहत अरबों रुपए की महालूट का शिकार बना दिया गया है।

हैरानी और शर्म की बात यह है कि जब ये ठगी गईं महिलाएं अपनी बर्बादी का रोना लेकर सरकार के पास पहुंचती हैं, तो रक्षक ही भक्षक की भूमिका में नजर आते हैं। आरोप सीधे प्रदेश सरकार के दो कद्दावर मंत्रियों—उद्योग मंत्री लखन लाल देवांगन और कृषि मंत्री रामविचार नेताम पर लग रहे हैं। वहीं, जिला प्रशासन और कलेक्टर पर इस महाघोटाले के आरोपियों को खुला संरक्षण देने और फाइलों को दबाने के संगीन आरोप लगे हैं।

मंत्रियों के चेहरे देख लिया था लोन, अब वही कह रहे 'नाटक बंद करो'

पीड़ित महिलाओं का रो-रोकर बुरा हाल है। ग्राउंड जीरो से आ रही तस्वीरें और महिलाओं के बयान दिल दहला देने वाले हैं। महिलाओं का आरोप है कि 'फ्लोरोमैक्स' (Fluoromax) नाम की एक निजी कंपनी ने उन्हें रोजगार और मोटी कमाई का झांसा देकर बैंकों से बड़े-बड़े लोन दिलवाए। इस कंपनी के प्रमोशन और उद्घाटन में खुद प्रदेश के उद्योग मंत्री लखन लाल देवांगन और पुलिस विभाग के बड़े अधिकारी शामिल हुए थे। मंत्रियों और सरकार के चेहरे को देखकर ही इन गरीब महिलाओं ने बैंकों से कर्ज उठाया था कि उनका घर सुधरेगा।

लेकिन आज आलम यह है कि कंपनी पैसा लेकर रफूचक्कर हो चुकी है, बैंक वाले महिलाओं के घरों पर दबिश दे रहे हैं और उन्हें प्रताड़ित कर रहे हैं। पीड़ित महिलाओं ने रोते हुए कैमरे पर आपबीती सुनाई कि बैंक के अधिकारी और रिकवरी एजेंट उनसे कह रहे हैं—"कर्ज चुकाने के लिए चाहे अपना घर बेचो, अपनी किडनी बेचो या खुद को बेचो, लेकिन पैसा पटाओ।"

हद तो तब हो गई जब पिछले दिनों प्रवास पर पहुंचे कृषि मंत्री रामविचार नेताम और उद्योग मंत्री लखन लाल देवांगन को महिलाओं ने घेरकर अपना दुखड़ा सुनाना चाहा। मदद और सांत्वना देने के बजाय कृषि मंत्री रामविचार नेताम ने महिलाओं के आंदोलन और आंसुओं को 'नाटक' करार दे दिया। उन्होंने कड़े लहजे में महिलाओं से कहा—"लोन लेते समय हमसे पूछा था क्या? यह सब नाटकबाजी बंद करो।" पीड़ित महिलाओं का सवाल है कि सरकार हमसे बनती है, हम सरकार से नहीं। जब उद्घाटन के समय नेता भरोसा देने आ सकते हैं, तो आज मौत के मुहाने पर खड़ी महिलाओं का कर्ज माफ कराने वे आगे क्यों नहीं आ रहे?

राष्ट्रीय जनजाति आयोग में हड़कंप, मुख्य सचिव तलब

यह मामला अब सिर्फ छत्तीसगढ़ की गलियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसकी गूंज देश की राजधानी दिल्ली तक पहुंच चुकी है। जब यह पूरा मामला चौंकाने वाले सबूतों के साथ राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) के सामने पहुंचा, तो आयोग के अधिकारी भी दंग रह गए।

सूत्रों के मुताबिक, आयोग ने इस मामले में तत्कालीन कलेक्टर से जवाब तलब किया था और उन्हें हाजिर होने का आदेश दिया था। लेकिन प्रशासनिक तानाशाही और रसूखदारों को बचाने के चक्कर में आयोग को ही गुमराह करने की कोशिश की गई। कलेक्टर ने आदेश के बावजूद 30 दिनों के भीतर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की और फाइल को दबाए रखा। इस पर सख्त नाराजगी जताते हुए राष्ट्रीय जनजाति आयोग ने अब सीधे छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव (Chief Secretary) को समन जारी कर दिल्ली दफ्तर में व्यक्तिगत रूप से तलब कर लिया है।

अंतरराज्यीय गिरोह का शक, बीजेपी के ही कद्दावर नेता ने मांगी सीबीआई जांच

इस महालूट के खिलाफ विपक्ष तो दूर, खुद सत्ताधारी दल बीजेपी के वरिष्ठ आदिवासी नेता और पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। ननकीराम कंवर ने इस पूरे मामले को एक बेहद गंभीर साजिश बताते हुए सीधे 'सीबीआई (CBI) जांच' की मांग कर दी है।

कंवर का मानना है कि यह केवल 40 हजार महिलाओं की लूट का स्थानीय मामला नहीं है। यह एक बहुत बड़ा अंतरराज्यीय गिरोह (Inter-state Gang) है, जिसने छत्तीसगढ़ के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों के आदिवासियों को भी निशाना बनाया है। उन्होंने बेहद तीखा हमला करते हुए कहा कि यह छत्तीसगढ़ की आदिवासी बहनों की अस्मिता और पेट पर लात मारने के साथ-साथ देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साख और उनकी जनकल्याणकारी योजनाओं को बदनाम करने की एक गहरी राजनीतिक और आर्थिक साजिश है।

बड़ा सवाल: हसदेव की तरह क्या यहां भी दफन हो जाएगा न्याय?

हसदेव अरण्य के आदिवासियों के साथ जो हुआ, वह जगजाहिर है। वहां भी आयोग की सिफारिशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। अब सवाल यह उठता है कि क्या छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार अपने दागदार मंत्रियों और भ्रष्ट नौकरशाहों को बचाएगी या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को बेदाग रखने के लिए इस अरबों रुपए के घोटाले की जांच सीबीआई को सौंपेगी?

यदि 5 साल के लिए चुनी गई सत्ता अहंकार में चूर होकर आदिवासियों की इस चीख को 'नाटक' समझती रहेगी, तो लोकतंत्र में जनता का भरोसा उठना लाजिमी है। फिलहाल, दिल्ली से लेकर रायपुर तक मचे इस हड़कंप के बाद देखना होगा कि इन बेसहारा और प्रताड़ित बहनों को न्याय मिलता है या फिर यह फाइल भी फाइलों के अंबार में कहीं दफन हो जाएगी।

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https://youtu.be/4KeBOfdeK7Y?si=e-tAut4GdaTYZC6g


बुधवार, 24 जून 2026

'दो दर्जन' रसूखदार अफसरों का 'सिंडिकेट' आज भी हावी!

 मुख्यमंत्री बदले, चेहरे बदले; लेकिन व्यवस्था पर 'दो दर्जन' रसूखदार अफसरों का 'सिंडिकेट' आज भी हावी!



छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद यह माना जा रहा था कि प्रशासनिक स्तर पर एक बड़ा शुद्धिकरण देखने को मिलेगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' का दम भरने वाली सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन राज्य के प्रशासनिक गलियारे की एक कड़वी हकीकत यह भी है कि चेहरों के बदलने से व्यवस्था का बुनियादी ढर्रा नहीं बदला है। सूत्रों और दस्तावेजी कड़ियों की मानें तो राज्य में करीब दो दर्जन ऐसे आईएएस अधिकारियों का एक मजबूत 'नेक्सेस' (प्रशासनिक सिंडिकेट) सक्रिय है, जिसके रसूख के आगे सत्ता की चाबुक भी बेअसर साबित हो रही है। यह सिंडिकेट इस कदर हावी है कि केंद्र सरकार के मंत्रालयों से आने वाले कड़े निर्देश और जांच की चिट्ठियां भी राज्य के सचिवालय में कहीं न कहीं फाइलों के नीचे दबा दी जाती हैं।

केंद्र की चिट्ठियां रद्दी की टोकरी में!

प्रशासनिक हलकों में इन दिनों सबसे बड़ी चर्चा केंद्र सरकार के कार्मिक विभाग (DoPT) और गृह मंत्रालय की उन गोपनीय और अर्ध-शासकीय चिट्ठियों की है, जो राज्य के रसूखदार अफसरों के खिलाफ आई गंभीर शिकायतों के बाद भेजी गई थीं। इन पत्रों में टेंडर प्रक्रियाओं में गड़बड़ी, पद का दुरुपयोग, आय से अधिक संपत्ति और वित्तीय अनियमितताओं की तत्काल जांच कर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश थे। विडंबना यह है कि इन निर्देशों के बावजूद न तो कोई ठोस जांच आगे बढ़ी और न ही संबंधित अधिकारियों पर कोई गाज गिरी।

इस मुद्दे पर समय-समय पर खुद भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर तथा अधिवक्ता नरेश चंद्र गुप्ता जैसे लोगों ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO), राष्ट्रपति और केंद्रीय जांच एजेंसियों को लगातार शिकायतें भेजी हैं। इसके बावजूद राज्य के सिस्टम के भीतर बैठा यह कॉरपोरेट-प्रशासनिक गठजोड़ इतना ताकतवर है कि वह हर कार्रवाई को ठंडे बस्ते में डालने का हुनर जानता है।

दागी और विवादित चेहरों की लंबी फेहरिस्त

यदि राज्य के प्रशासनिक इतिहास और हालिया विवादों पर नजर डालें, तो कई ऐसे बड़े नाम सामने आते हैं जिन पर गंभीर आरोप लगने या केंद्रीय एजेंसियों (ED/CBI) की रडार पर आने के बावजूद लंबे समय तक मुख्यधारा के पदों पर संरक्षण मिलता रहा।

इस नेक्सेस या विवादों के दायरे में आए प्रमुख नामों में निम्नलिखित अधिकारी विभिन्न समय पर चर्चा का विषय बने रहे:

 अनिल टूटेजा और समीर बिश्नोई: अनुपातहीन संपत्ति और फॉरेन एक्सचेंज मामलों से लेकर विभिन्न नीतिगत विवादों में घिरे रहे।

 विवेक ढांड तामन सिंह सोनवानी: नजूल जमीन के मामलों से लेकर अन्य कई गंभीर प्रशासनिक विसंगतियों के आरोप इन पर लगते रहे।

 डॉ. आलोक शुक्ला निरंजन दास: सरकारी धन के कथित विचलन और आबकारी से जुड़े बड़े नीतिगत फैसलों को लेकर लगातार सुर्खियों में रहे।

 संजय कुमार अलंग, कुलदीप शर्मा, सुरेंद्र कुमार जायसवाल, गौरव द्विवेदी: इनके कार्यकाल के दौरान टेंडर प्रक्रियाओं, सर्व शिक्षा अभियान और आईसीटी प्रोजेक्ट्स में गड़बड़ियों की शिकायतें समय-समय पर राजनेताओं और शिकायतकर्ताओं द्वारा उठाई गईं।

 इसके अलावा नरेंद्र दुग्गा, सुधाकर खलगो, राजेश सिंह राणा, डीडी सिंह, एस प्रकाश, अमृत खलगो, नुपुर शर्मा, किरण कौशल, टी राधा कृष्णन, संजीव कुमार झा और भुवनेश कुमार यादव जैसे अधिकारियों के नाम भी किसी न किसी विभागीय स्तर पर या शिकायतों के संदर्भ में इस प्रशासनिक चक्रव्यूह के इर्द-गिर्द चर्चा में बने रहे।

प्यादों पर गाज, वजीर सुरक्षित: कैसा है ये शतरंज का खेल?

प्रशासनिक हलकों में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब भी भ्रष्टाचार पर हल्ला मचता है, तो कार्रवाई केवल 'प्यादों' पर क्यों होती है? उदाहरण के तौर पर, हाल ही में आबकारी विभाग के करीब 29 अधीनस्थ अधिकारियों व कर्मचारियों पर विभागीय कार्रवाई की गई, लेकिन इस पूरे खेल की नीति बनाने वाले और पर्दे के पीछे बैठे 'शतरंज के बड़े मोहरों' को छूने से भी व्यवस्था बचती नजर आती है।

इस पूरे खेल के पीछे एक सोची-समझी क्रोनोलॉजी काम करती है:

1. मलाईदार पदों का प्रबंधन: बड़े सप्लायर, रसूखदार ठेकेदार और बिचौलिए मिलकर सत्ता के शीर्ष गलियारों को इस तरह प्रभावित करते हैं कि उनके अनुकूल काम करने वाले अफसर हमेशा मलाईदार या नीतिगत रूप से महत्वपूर्ण पदों पर बने रहें।

2. संविदा का खेल: यदि इस सिंडिकेट का कोई मुख्य मोहरा सेवानिवृत्त (Retire) भी हो जाता है, तो उसे व्यवस्था को सुचारू रूप से "मैनेज" रखने के लिए संविदा नियुक्ति देकर दोबारा महत्वपूर्ण कुर्सी पर बिठा दिया जाता है।

क्या 2005 बैच का एक सिंडिकेट चला रहा है समानांतर व्यवस्था?

गलियारों में सबसे चौंकाने वाली चर्चा यह है कि मौजूदा दौर में 2005 बैच के एक प्रभावी अधिकारी के इर्द-गिर्द पूरा प्रशासनिक चक्रव्यूह घूम रहा है। इस गुट ने मुख्यमंत्री सचिवालय से लेकर नीति-निर्धारक विभागों तक अपनी ऐसी अदृश्य घेराबंदी कर रखी है कि जमीनी हकीकत और ईमानदार अफसरों की आवाजें शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच ही नहीं पा रही हैं।

ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार की जवाबदेही बड़ी है या फिर सालों से कुर्सियों को जकड़े बैठे इन चंद नौकरशाहों का सिंडिकेट? यदि केंद्र सरकार की चिट्ठियों और जांच एजेंसियों की रिपोर्टों को इसी तरह ठंडे बस्ते में डाला जाता रहा, तो छत्तीसगढ़ की जनता के साथ 'सुशासन' का वादा सिर्फ कागजी बनकर रह जाएगा।

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मंगलवार, 23 जून 2026

विकास की वेदी पर 'नरबलि': छत्तीसगढ़ के औद्योगिक क्षेत्र क्यों बन रहे हैं 'डेथ जोन'?

 विकास की वेदी पर 'नरबलि': छत्तीसगढ़ के औद्योगिक क्षेत्र क्यों बन रहे हैं 'डेथ जोन'?


 मुनाफे की अंधी दौड़, लचर सिस्टम और कॉरपोरेट की लापरवाही के बीच घुटती मजदूरों की सांसें। क्या चंद रुपयों का मुआवजा ही है गरीब के खून की कीमत?

मौत का खूनी आंकड़ा

छत्तीसगढ़, जिसे हम देश के विकास के पावरहाउस के रूप में देखते हैं, आज वहां के कारखानों से उठती चिमनियों का धुआं सिर्फ उद्योगों की तरक्की नहीं, बल्कि गरीब मजदूरों की अर्थियों का मंजर भी बयां कर रहा है । हाल ही में सक्ती जिले के डबरा थाना क्षेत्र के सिंघी तराई में स्थित वेदांता पावर प्लांट में हुआ भीषण बॉयलर ब्लास्ट इस बात का ताजा और खौफनाक सबूत है । इस हादसे में चार दर्जन से अधिक लोग इसकी चपेट में आ गए।

लेकिन यह कोई इकलौता हादसा नहीं है। आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले दो सालों (2024 से 2026 तक) में राज्य के उद्योगों में मरने वाले मजदूरों की संख्या 300 के पार पहुंच चुकी है 。 सवाल यह उठता है कि यह महज औद्योगिक दुर्घटनाएं हैं या फिर सिस्टम और कॉरपोरेट के गठजोड़ द्वारा किया जा रहा सीधा-सीधा 'कत्ल'? 

'डेथ जोन' में तब्दील होते चार प्रमुख जिले

छत्तीसगढ़ का औद्योगिक मॉडल आज एक डरावने रूप में सामने आ रहा है । राज्य के चार प्रमुख जिले—रायपुर, रायगढ़, दुर्ग और सक्ती—मजदूरों के लिए 'डेथ जोन' बन चुके हैं ।

 खुद सरकारी आंकड़े (विधानसभा के बजट सत्र की रिपोर्ट के अनुसार) यह स्वीकार करते हैं कि राज्य में कुल 7,324 फैक्ट्रियां हैं ।

 इनमें से 948 फैक्ट्रियों को सरकार खुद बेहद खतरनाक मानती है 。

 इन खतरनाक फैक्ट्रियों में से भी 32 उद्योग ऐसे हैं जो 'अति-संवेदनशील और खतरनाक' श्रेणी में आते हैं ।

इसके बावजूद, इन फैक्ट्रियों में सुरक्षा मानकों को ताक पर रख दिया गया है। ना तो मजदूरों को मानक सुरक्षा उपकरण दिए जाते हैं और ना ही उनके पास सिर छिपाने के लिए सही हेलमेट होते हैं ।

हादसे के बाद 'मैनेजमेंट' का खूनी खेल

जब भी कोई बड़ी दुर्घटना होती है, जैसे कुछ समय पहले रायगढ़ के 'रियल स्पार्क एंड पावर' में छह लोगों की मौत हुई या बेनला ब्लॉक की 'स्पेशल ब्लास्ट फैक्ट्री' में धमाका हुआ, तो उसके बाद एक तयशुदा स्क्रिप्ट पर काम शुरू होता है 。

1. एफआईआर में झोल: स्थानीय प्रशासन और कॉरपोरेट के बीच ऐसा गठजोड़ होता है कि एफआईआर की धाराएं बेहद कमजोर और मामूली लापरवाही की लगाई जाती हैं ।

2. नेताओं और रसूखदारों का कवच: कई बार मिल मालिकों को राजनीतिक रसूख या बड़े नेताओं के रिश्तेदार होने का फायदा मिलता है, जिससे वे आसानी से बच निकलते हैं ।

3. बलि का बकरा: किसी भी बड़े उद्योगपति, मालिक या मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) को कभी जेल जाते नहीं देखा जाता । गिरफ्तारी के नाम पर केवल छोटे प्लांट मैनेजरों या सेफ्टी अफसरों को आगे कर दिया जाता है, जिन्हें तुरंत जमानत मिल जाती है ।

मुआवजा: खून की कीमत या पल्ला झाड़ने का जरिया?

हादसे के तुरंत बाद सरकार और कंपनियां मुआवजे का ऐलान कर देती हैं—मृतकों को 2 लाख और घायलों को 50 हजार रुपये । पिछले दो सालों में करीब 17 करोड़ रुपये से अधिक का मुआवजा बांटा जा चुका है ।

परंतु क्या किसी गरीब के घर का चिराग बुझने की कीमत महज कुछ लाख रुपये है? श्रमिक संगठनों और ग्रामीणों का अब एक ही साफ और कड़ा रुख है: "हमें मुआवजे की भीख नहीं, बल्कि काम के दौरान सुरक्षा की गारंटी चाहिए।" 

यदि सरकार दिखावे के लिए किसी फैक्ट्री को सील भी करती है, तो जन आक्रोश ठंडा होते ही दो-चार महीने में उसे चुपके से दोबारा चालू करवा दिया जाता है ।

बड़ा सवाल: गैर-इरादतन हत्या का मामला क्यों नहीं?

श्रम कानूनों का खुलेआम उल्लंघन होने के बावजूद इन औद्योगिक घरानों पर 'गैर-इरादतन हत्या' (Culpable Homicide) का मामला दर्ज क्यों नहीं किया जाता?  सच तो यह है कि जब 'पैसा बोलता है, तब सत्ता खामोश हो जाती है' । हर तीन महीने में छत्तीसगढ़ के किसी न किसी कोने से मजदूरों के चीखने और अपंग होने की खबरें आती हैं 。

निष्कर्ष और मांग

छत्तीसगढ़ में औद्योगिक प्रगति की जो इमारत खड़ी की जा रही है, उसकी बुनियाद में मजदूरों का खून लगा है । अब समय आ गया है कि सरकार खोखले दावों से ऊपर उठकर इन 948 खतरनाक फैक्ट्रियों की सुरक्षा ऑडिट कराए । विपक्ष और मजदूर यूनियनों की मांग भी जायज है कि गंभीर घायलों को कम से कम 50 लाख और मृतकों के परिवारों को 1 करोड़ रुपये का मुआवजा मिले और दोषियों को सीधे जेल भेजा जाए ।

जब तक कॉरपोरेट जवाबदेही तय नहीं होगी और मुनाफाखोरी से ऊपर इंसानी जान को अहमियत नहीं दी जाएगी, तब तक छत्तीसगढ़ के ये 'डेथ जोन' इसी तरह बेकसूरों की बलि लेते रहेंगे ।

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