श्रद्धा का व्यापार या कमीशनखोरी का नया मॉडल?
अटल जी के नाम पर आस्था का ढोंग और 46 करोड़ के 'कांस्य घोटाले' का पूरा सच
प्रस्तावना: जब विचार और प्रतीक भी टेंडर बन जाएं
राजनीति में जब निष्ठा का स्थान अवसरवादिता और सिद्धांतों का स्थान कमीशनखोरी ले ले, तो महापुरुषों के नाम और स्मृतियां भी महज वित्तीय घोटालों के आवरण (कवर) बन जाती हैं। छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माता और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के प्रति राज्य में हर राजनीतिक दल का सम्मान रहा है। परंतु, वर्तमान में प्रदेश की विष्णुदेव साय सरकार के दौरान 'श्रद्धेय' के नाम पर जो कुछ देखने को मिल रहा है, उसने प्रशासनिक पारदर्शिता और नैतिक राजनीति दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
छत्तीसगढ़ के 187 नगरीय निकायों में ₹46 करोड़ की लागत से बनने वाले 'अटल परिसर' और वहां स्थापित की जाने वाली कांस्य (Bronze) की प्रतिमाओं के नाम पर जो भ्रष्टाचार का खेल उजागर हुआ है, उसने राज्य की सियासत में भूचाल ला दिया है।
दावे बनाम हकीकत: पहली बारिश में उतर गया आस्था का रंग
राज्य सरकार ने बड़े जोर-शोर से घोषणा की थी कि प्रदेश के सभी 187 नगरीय निकायों में अटल जी की याद में 'अटल परिसर' का निर्माण किया जाएगा। प्रत्येक निकाय में लगभग ₹14 लाख की लागत से अटल जी की अष्टधातु या कांस्य की विशाल प्रतिमा स्थापित करने के लिए बजट स्वीकृत किया गया।
लेकिन पहली ही बारिश ने सत्ता और ठेकेदारों के इस गठजोड़ की पोल खोलकर रख दी:
1. कटघोरा (कोरबा) मामला: कटघोरा के अटल परिसर में स्थापित ₹14 लाख की तथाकथित 'कांस्य प्रतिमा' पर जब पहली मानसूनी बारिश पड़ी, तो ऊपर का धात्विक पेंट बह गया। पेंट बहते ही नीचे से सीमेंट और प्लास्टर का ढांचा बाहर आ गया। यानी कागजों पर कांस्य प्रतिमा दिखाकर जनता के पैसे से सीमेंट की मूर्ति लगा दी गई [07:39]।
2. मरवाही का विवाद: मरवाही में स्थापित की गई अटल जी की प्रतिमा में कुछ ही दिनों के भीतर बड़ी-बड़ी दरारें आ गईं, जिससे मूर्ति के निर्माण में इस्तेमाल हुई घटिया सामग्री साफ नजर आने लगी [08:51]।
जिस महापुरुष के नाम पर 'हम बनाए हैं, हम ही संवारेंगे' का नारा दिया जाता रहा, उन्हीं की प्रतिमा के नाम पर सीमेंट-प्लास्टर का गोलमाल कर करोड़ों रुपये डकार लिए गए।
भ्रष्टाचार का डिसेंट्रलाइज्ड मॉडल: क्यों नहीं हुआ केंद्रीकृत टेंडर?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा प्रशासनिक सवाल इसके टेंडर प्रक्रिया पर उठ रहा है। जानकारों और स्थानीय मूर्तिकारों का कहना है कि यदि सरकार चाहती तो पूरे प्रदेश की 187 मूर्तियों के लिए एक पारदर्शी, राज्य-स्तरीय केंद्रीकृत टेंडर (Centralized Tender) जारी कर सकती थी, जिससे गुणवत्ता सुनिश्चित होती।
इसके बजाय, पैसों को अलग-अलग निकायों में बांट दिया गया। आरोप है कि "अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपने को दे" की तर्ज पर स्थानीय स्तर पर अपने पसंदीदा ठेकेदारों और सत्ताधारी दल से जुड़े लोगों को उपकृत करने के लिए टुकड़ों में काम बांटा गया [06:25]।
स्थानीय मूर्तिकारों की अनदेखी की गई।
बाहरी व प्रभावशील ठेकेदारों को मनमाने दामों पर काम सौंपा गया।
गुणवत्ता जांच (Quality Control) के नाम पर जिम्मेदार अधिकारियों ने आंखें मूंद लीं।
अतीत के पन्नों से: जब श्रद्धांजलि में लगे थे ठहाके
अटल जी की स्मृतियों के अनादर का यह कोई पहला मामला नहीं है। वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, अतीत में जब डॉ. रमन सिंह के शासनकाल के दौरान राज्य में अटल जी की 'अस्थि कलश यात्रा' निकाली गई थी, तब भी मंच पर मौजूद तत्कालीन कद्दावर मंत्रियों के ठहाके लगाते हुए वीडियो वायरल हुए थे [04:33]।
उस समय भी पार्टी और सरकार की भारी किरकिरी हुई थी। अब अस्थि कलश से शुरू हुआ यह उपेक्षा का सफर 'प्रतिमा घोटाले' तक पहुंच चुका है।
विपक्ष का हमला और जनता के सवाल
प्रतिमाओं में फर्जीवाड़े और दरारें आने की खबरें सार्वजनिक होते ही विपक्षी दलों और युवा संगठनों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है [09:00]। कांग्रेस और युवा कांग्रेस का आरोप है कि जो पार्टी खुद को अटल जी के विचारों की वाहक बताती है, उसी के शासनकाल में उनकी मूर्तियों पर कमीशनखोरी की जा रही है।
जनता के तीन सीधे सवाल:
1. टैक्सपेयर्स के पैसे का हिसाब कौन देगा? जनता की कमाई के 46 करोड़ रुपये में से कितनी राशि कांसा के नाम पर सीमेंट में तब्दील हुई?
2. दोषी ठेकेदारों और अधिकारियों पर कार्रवाई कब? क्या सीमेंट पर कांस्य का पेंट चढ़ाने वाले ठेकेदारों पर ब्लैकलिस्टिंग और एफआईआर (FIR) दर्ज होगी?
3. क्या आस्था भी अब टेंडर का हिस्सा है? राम मंदिर के चढ़ावे से लेकर अटल जी की प्रतिमा तक, क्या हर धार्मिक और वैचारिक प्रतीक केवल कटमनी (Cut-money) का माध्यम बन गया है?
निष्कर्ष: दिखावे की राजनीति पर भारी पड़ती हकीकत
अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था— "सरकारें आएंगी, जाएंगी, पार्टियां बनेंगी, बिगड़ेंगी; मगर यह देश रहना चाहिए, इस देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिए।"
परंतु आज के दौर में जिस तरह महापुरुषों के सिद्धांतों और स्मृतियों को केवल राजनीतिक ब्रांडिंग और बजट खपाने का जरिया बना दिया गया है, वह लोकतंत्र और जन-विश्वास दोनों के लिए चिंताजनक है। बारिश के पानी ने सिर्फ मूर्ति का पेंट नहीं धोया, बल्कि उन दावों के रंग भी उतार दिए हैं जो सुशासन और जीरो टॉलरेंस का ढिंढोरा पीटते नहीं थकते।


