बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

जब एक कलेक्टर ने सीधे जिला जज को लिखा कड़ा पत्र...

 जब एक कलेक्टर ने सीधे जिला जज को लिखा कड़ा पत्र... क्या IAS अफसर पर हो सकती है बड़ी कार्रवाई?



क्या आपने कभी सुना है कि जिले का सबसे बड़ा प्रशासनिक अधिकारी, यानी एक IAS कलेक्टर, किसी आरोपी की जमानत से इतना नाराज हो जाए कि वो सीधे प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश (District Judge) को चिट्ठी लिख दे?

 कार्यपालिका (Executive) और न्यायपालिका (Judicial system) के इतिहास में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने प्रशासनिक और न्यायिक हलकों में हड़कंप मचा दिया है।

छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर (सरगुजा) के कलेक्टर अजीत वसंत ने बहुचर्चित रिंगबांध जमीन फर्जीवाड़ा मामले के मुख्य आरोपी आजाद इराकी को कोर्ट से मिली जमानत के विरोध में प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश को एक कड़ा पत्र लिख डाला है।

कलेक्टर साहब का आरोप है कि कोर्ट ने बिना अभियोजन (सरकारी पक्ष) की बात सुने ही आरोपी को जमानत दे दी!

लेकिन दोस्तों, यहाँ सवाल सिर्फ एक जमानत का नहीं है। सवाल यह है कि:

  • क्या एक कलेक्टर जज के फैसले पर इस तरह सीधा सवाल उठा सकता है?
  • कानून के तहत जिला मजिस्ट्रेट (DM) या कलेक्टर के क्या अधिकार होते हैं?
  • और सबसे बड़ा सवाल— क्या इस चिट्ठी की वजह से खुद कलेक्टर पर अवमानना (Contempt of Court) या किसी अनुशासनात्मक कार्रवाई का खतरा मंडरा रहा है?

आज के इस वीडियो में हम इस पूरे मामले की परत-दर-परत खोलेंगे, कानूनी पहलुओं को समझेंगे और जानेंगे कि क्या IAS अधिकारी अजीत वसंत का यह कदम सही था या उन्होंने अपनी हद पार कर दी?

वीडियो अंत तक ज़रूर देखिएगा क्योंकि यह मामला देश के प्रशासनिक और कानूनी इतिहास की एक बहुत बड़ी नज़ीर बनने वाला है!


 सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि यह मामला इतना गंभीर क्यों है?

अंबिकापुर के रिंगबांध इलाके में आदिवासियों की बहुमूल्य जमीनों की अवैध रूप से रजिस्ट्री कराई गई। और यह कोई साधारण रजिस्ट्री नहीं थी। इसमें फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र (Fake Death Certificate) और फर्जी दस्तावेज (Fake Documents) तैयार किए गए। यानी जो इंसान जिंदा है, उसे कागजों पर मुर्दा बताकर या मृतकों के फर्जी वारिस खड़े करके आदिवासियों की बेशकीमती जमीन हड़प ली गई!

इस पूरे फर्जीवाड़े का मुख्य आरोपी माना गया आजाद इराकी। पुलिस और प्रशासन ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इस पर शिकंजा कसा।

लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने सबको चौंका दिया। आरोपी आजाद इराकी को अदालत से जमानत मिल गई।

कलेक्टर अजीत वसंत का आरोप है कि निचली अदालत ने जमानत देते समय न्यायालयीन क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) का ध्यान नहीं रखा और बिना अभियोजन पक्ष (Prosecution/Government Counsel) की दलीलें सुने ही आरोपी को राहत दे दी।

कलेक्टर साहब का कहना है कि इतने बड़े आदिवासी जमीन घोटाले में आरोपी का बाहर आना सबूतों के साथ छेड़छाड़ का कारण बन सकता है, इसलिए उन्होंने सीधे जिला जज को पत्र लिखकर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया है।


अब आते हैं सबसे अहम मोड़ पर। कानून इस बारे में क्या कहता है? क्या एक कलेक्टर के पास यह अधिकार है कि वह अदालत के किसी फैसले पर उंगली उठा सके?

  1. क्या कलेक्टर के पास न्यायिक शक्तियां होती हैं? दोस्तों, हमारे देश में शक्ति के पृथक्करण (Separation of Powers) का सिद्धांत है। संविधान के तहत कार्यपालिका (Executive) और न्यायपालिका (Judiciary) दोनों अलग-अलग काम करते हैं। कलेक्टर जिले का District Magistrate (DM) होता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS / पुरानी CrPC) के तहत DM को जिले में कानून-व्यवस्था (Law & Order) बनाए रखने और प्रशासनिक नियंत्रण की शक्तियां हासिल होती हैं।
  2. अगर राज्य सरकार/प्रशासन किसी जमानत से असंतुष्ट हो तो कानूनी रास्ता क्या है? कानून के मुताबिक, अगर पुलिस या जिला प्रशासन किसी आरोपी को मिली जमानत से असहमत है, तो इसका एक तयशुदा कानूनी प्रोसीजर (Legal Procedure) होता है:
    • रद्दीकरण की याचिका (Cancellation of Bail): प्रशासन को सरकारी वकील (Public Prosecutor) के जरिए संबंधित अदालत या उससे ऊपरी अदालत (Session Court या High Court) में जमानत रद्द करने की अर्जी लगानी होती है।
    • अपील या पुनरीक्षण (Appeal / Revision): जैसा कि इस मामले में भी तैयारी की जा रही है, राज्य सरकार आदेश के खिलाफ सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय (High Court) में अपील या रिवीज़न पिटीशन दायर कर सकती है।
  3. सीधे जज को पत्र लिखना कितना जायज? कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि किसी न्यायिक आदेश (Judicial Order) के खिलाफ प्रशासनीय पत्र (Administrative Letter) लिखना एक बेहद असामान्य और दुर्लभ कदम है। सामान्य तौर पर, किसी भी न्यायिक आदेश को चुनौती देने के लिए केवल न्यायिक प्रक्रिया (Judicial Process) का ही इस्तेमाल किया जाता है, पत्राचार का नहीं।


अब सबसे बड़ा सवाल— क्या कलेक्टर अजीत वसंत मुश्किल में पड़ सकते हैं? क्या उन पर कोई दंडात्मक कार्रवाई हो सकती है?

कानूनी जानकारों के अनुसार, अगर यह मामला आगे बढ़ता है तो कलेक्टर के सामने 3 बड़ी चुनौतियाँ आ सकती हैं:

  1. कोर्ट की अवमानना (Contempt of Court): अगर अदालत को यह लगता है कि कलेक्टर द्वारा लिखे गए पत्र से न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुँची है या न्यायिक प्रक्रिया में दखल देने की कोशिश की गई है, तो हाई कोर्ट या संबंधित अदालत Contempt of Courts Act, 1971 के तहत कलेक्टर के खिलाफ अवमानना का नोटिस जारी कर सकती है।
  2. न्यायिक टिप्पणी (Adverse Judicial Remarks): अदालत सुनवाई के दौरान कलेक्टर के इस कदम पर कड़ी मौखिक या लिखित टिप्पणी कर सकती है और भविष्य के लिए हिदायत दे सकती है कि प्रशासनिक अधिकारी न्यायिक क्षेत्राधिकार में पत्र के माध्यम से हस्तक्षेप न करें।
  3. प्रशासनिक या अनुशासनात्मक कार्रवाई (Service Rules & Disciplinary Action): अगर न्यायपालिका की तरफ से राज्य सरकार या मुख्य सचिव (Chief Secretary) को कोई शिकायत भेजी जाती है, तो ऑल इंडिया सर्विसेज (Conduct) रूल्स के तहत उनसे जवाब-तलब किया जा सकता है।

लेकिन... सिक्के का दूसरा पहलू भी है!

कलेक्टर के समर्थकों और प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि कलेक्टर ने यह कदम अपनी व्यक्तिगत दुश्मनी में नहीं, बल्कि जनहित (Public Interest) और आदिवासियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए उठाया है। उन्होंने एक बड़े भूमि घोटाले के मुख्य आरोपी को बिना पक्ष सुने राहत दिए जाने पर प्रक्रियात्मक खामी (Procedural Lapse) की ओर ध्यान आकर्षित कराया है।

 मामला भारतीय नौकरशाही और न्यायपालिका के बीच के संतुलन का एक बेहद अनूठा उदाहरण बन गया है।

एक तरफ जहां आदिवासियों की जमीन बचाने और फर्जीवाड़े के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने के लिए कलेक्टर के इस कदम की सराहना की जा रही है, वहीं दूसरी तरफ कानूनी प्रक्रिया के उल्लंघन को लेकर यह मामला विवादों में आ चुका है।

अब देखना यह होगा कि जब यह मामला हाई कोर्ट या सेशन कोर्ट में अपील के लिए जाता है, तो अदालत इस पूरे घटनाक्रम पर क्या रुख अपनाती है। क्या कलेक्टर की इस चिन्ता को जायज ठहराया जाएगा, या फिर कानूनी प्रक्रियाओं के पालन पर जोर दिया जाएगा?

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

जीवनदायिनी नदियों का घोंटा जा रहा गला: 30 हजार मामले दर्ज, फिर भी जिम्मेदार मौन!

 जीवनदायिनी नदियों का घोंटा जा रहा गला: 30 हजार मामले दर्ज, फिर भी जिम्मेदार मौन!



जिस पानी को हम आचमन करते हैं, जिस नदी को हम माँ का दर्जा देते हैं, आज वही नदियां अपना अस्तित्व बचाने के लिए सिसक रही हैं। छत्तीसगढ़—जिसे नदियों और प्राकृतिक संसाधनों का प्रदेश कहा जाता है, वहां की नदियां आज नालों में तब्दील हो चुकी हैं।

जलशक्ति मंत्रालय को भेजी गई जुलाई 2026 की रिपोर्ट ने जो आंकड़े पेश किए हैं, वे सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि प्रशासन और सरकार की नाकामी का वह काला चिट्ठा हैं जिसे देखकर किसी का भी कलेजा कांप जाए।

प्रदेश की नदियों को प्रदूषित करने के 30,000 से अधिक प्रकरण दर्ज हो चुके हैं! जी हां, 30 हजार! लेकिन सवाल यह है कि इतने मामले दर्ज होने के बाद भी क्या एक भी नदी का पानी साफ हुआ? क्या एक भी लापरवाह अफसर पर गाज गिरी? या फिर 'प्रस्ताव तैयार हो रहा है' के ढोंग तले पूरी व्यवस्था सो रही है?

आंकड़ों की जुबानी समझिए कि हमारी जीवनदायिनी नदियों के साथ कितना बड़ा खिलवाड़ हो रहा है। जलशक्ति मंत्रालय को भेजी गई रिपोर्ट के मुताबिक:

  • कुल दर्ज प्रकरण: पूरे छत्तीसगढ़ में 30 हजार से ज्यादा नदियों के प्रदूषण के मामले दर्ज हैं।
  • रायपुर (राजधानी की पोल): अकेले राजधानी रायपुर में 17,371 प्रकरण दर्ज किए गए हैं, जो पूरे प्रदेश में सबसे दर्ज हैं।
  • बिलासपुर: न्यायधानी बिलासपुर में 3,729 प्रकरण दर्ज हुए हैं।
  • कोरबा: ऊर्जाधानी कोरबा में 1,204 प्रकरण दर्ज किए गए हैं।

सोचिए, जहां सरकार बैठती है, जहां मुख्यमंत्री और तमाम मंत्री बैठते हैं, जहां पर्यावरण संरक्षण मंडल का मुख्यालय है, उसी रायपुर में 17 हजार से अधिक बार नदियों के सीने पर प्रदूषण का प्रहार हुआ। शहरों के अनचारित (untreated) सीवरेज, नालियों का गंदा पानी और औद्योगिक कचरा सीधे नदियों में उड़ेला जा रहा है।

सवाल यह उठता है कि क्या सरकार सिर्फ आंकड़े गिनने के लिए बैठी है? 30 हजार से ज्यादा मामले दर्ज होना इस बात का सबूत है कि अपराध लगातार जारी है। जब हर दिन गंदा पानी नदियों में मिल रहा है, तो पर्यावरण मंडल और जिम्मेदार विभाग क्या कर रहे हैं?

रिपोर्ट में लिखा गया है— "प्रदूषण फैलाने वालों पर कड़ी कार्रवाई का प्रस्ताव तैयार हो रहा है।" वाह! क्या शानदार व्यवस्था है! नदियां मर रही हैं, लोग विषैला पानी पीने को मजबूर हैं, और सरकार 'प्रस्ताव' तैयार कर रही है! यह प्रस्ताव कब लागू होगा? जब नदियां पूरी तरह सूखकर गंदे नाले का रूप ले लेंगी?

क्या उद्योगों की चिमनियों और जहरीले नालों के आगे शासन-प्रशासन ने घुटने टेक दिए हैं? भारी-भरकम बजट और 'नदी बचाओ' के बड़े-बड़े विज्ञापनों का पैसा आखिर कहां जा रहा है?

नदियों का यह प्रदूषण केवल पानी की खराबी नहीं है, यह सीधे तौर पर लाखों लोगों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ है। जब सीवरेज और कारखानों का जहरीला केमिकल पानी में घुलता है, तो वही पानी पाइपलाइनों के जरिए हमारे और आपके घरों तक पहुंचता है।

कैंसर, त्वचा रोग, पेट की गंभीर बीमारियों और जलजनित बीमारियों का ग्राफ प्रदेश में लगातार बढ़ रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां लोग सीधे नदी के पानी पर निर्भर हैं, वहां स्थिति और भी भयावह है। इसके बावजूद, ठोस सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) बनाने या उन्हें सुचारू रूप से चलाने में सरकार की कोई दिलचस्पी नजर नहीं आती।

छत्तीसगढ़ की जनता आज सरकार से सीधी जवाबदेही मांग रही है:

  1. 30 हजार प्रकरण दर्ज होने के बाद कितने दोषियों पर आपराधिक कार्रवाई हुई और कितनों को जेल भेजा गया?
  2. राजधानी रायपुर में दर्ज 17,371 मामलों के लिए कौन से अधिकारी जिम्मेदार हैं?
  3. कार्रवाई के नाम पर सिर्फ 'प्रस्ताव' बनाने का छलावा कब तक चलेगा?

अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। नदियां सिर्फ पानी का स्रोत नहीं, हमारी संस्कृति और जीवन का आधार हैं। इन्हें बचाना होगा, कागजों पर नहीं, धरातल पर!

 "एनजीटी (NGT): क्या भूमिका सिर्फ 'नोटिस' देने तक सीमित रह गई है?"

कागजी चेतावनी और बेअसर नोटिस: क्या दांतहीन संस्था बन चुका है एनजीटी?

पर्यावरण की रक्षा और नदियों को प्रदूषण मुक्त कराने के लिए देश में 'नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल' यानी NGT का गठन इस उम्मीद के साथ किया गया था कि यह संस्था पर्यावरण के दुश्मनों पर नकेल कसेगी। लेकिन आज स्थिति क्या है?

छत्तीसगढ़ में नदियों के प्रदूषण के 30 हजार से ज्यादा मामले दर्ज हो चुके हैं। जलशक्ति मंत्रालय तक रिपोर्टें भेजी जा रही हैं। लेकिन क्या NGT की धमक धरातल पर दिख रही है? या फिर एनजीटी की भूमिका अब महज 'नोटिस जारी करने' और 'जवाब मांगने' तक सिमट कर रह गई है?

नदियों में गिरता औद्योगिक कचरा, शहरों का बिना ट्रीट किया गया सीवरेज और लगातार बिगड़ती जल गुणवत्ता। यह तस्वीर किसी एक जिले की नहीं, बल्कि रायपुर (17,371 मामले), रायगढ़ (6,520 मामले), बिलासपुर (3,729 मामले) और कोरबा (1,204 मामले) की है।

जब भी कोई बड़ा प्रदूषण का मामला सामने आता है, एनजीटी संज्ञान लेता है, रिपोर्ट मांगता है और राज्य सरकार या संबंधित निकायों को नोटिस थमा देता है। लेकिन उस नोटिस का असर क्या होता है?

  • नोटिस नंबर 1: रिपोर्ट पेश करो।
  • नोटिस नंबर 2: जवाब संतोषजनक नहीं है, दोबारा एफिडेविट दो।
  • नोटिस नंबर 3: जुर्माना लगाया जाएगा।

और इसके बाद मामला फाइलों में दफन हो जाता है!

सवाल बहुत सीधा और कड़वा है— क्या एनजीटी सिर्फ एक नोटिस जारी करने वाली एजेंसी बनकर रह गया है?

  1. कार्यान्वयन (Execution) का अभाव: एनजीटी बड़े-बड़े जुर्माने तो लगा देता है, लेकिन क्या वह जुर्माना कभी वसूला जाता है? या फिर सरकारी महकमे कोर्ट और ट्रिब्यूनल के चक्कर काटकर समय बिता देते हैं?
  2. धरातल पर शून्य असर: रायपुर में 17 हजार से अधिक प्रकरण दर्ज होना यह बताता है कि प्रदूषण फैलाने वालों में न तो पर्यावरण विभाग का खौफ है और ना ही एनजीटी के निर्देशों का।
  3. 'प्रस्ताव' की आड़ में खेल: जलशक्ति मंत्रालय को भेजी गई जुलाई 2026 की रिपोर्ट में कहा गया है कि "कड़ी कार्रवाई का प्रस्ताव तैयार हो रहा है।" एनजीटी के सख्त निर्देशों के बावजूद अगर सालों-साल सिर्फ 'प्रस्ताव' ही बनते रहेंगे, तो फिर ऐसे ट्रिब्यूनल का औचित्य ही क्या रह जाता है?

 अगर पर्यावरण अदालतें सिर्फ कागजी आदेश जारी करती रहेंगी और जमीनी स्तर पर नदियां नाले में बदलती रहेंगी, तो जनता का इस व्यवस्था से विश्वास उठ जाएगा।

एनजीटी को अब सिर्फ 'नोटिस जारी करने वाली संस्था' से आगे बढ़कर कड़े फैसले लेने होंगे—दोषी अधिकारियों पर सीधी एफआईआर (FIR), प्रदूषण फैलाने वाली फैक्ट्रियों पर स्थाई ताला और सीवरेज बहाने वाले निकायों के प्रमुखों पर सीधी जवाबदेही तय करनी होगी। वरना 'नदी बचाओ' के सारे दावे सिर्फ कागजी आंकड़ों में ही बह जाएंगे।

सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

गरीबों का हक मारो और अपने करीबियों में रेवड़ियां बांटो!

गरीबों का हक मारो और अपने करीबियों में रेवड़ियां बांटो!


 सोचिए, अगर किसी गरीब के घर में कोई गंभीर बीमारी से जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहा हो... किसी बेबस मां के पास बच्चे के इलाज के लिए पैसे न हों... और वो सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर थक जाए... लेकिन उसे एक रुपया न मिले!

और दूसरी तरफ, उसी जनता के टैक्स के पैसों से बने 'स्वेच्छानुदान फंड' से विधायकों के सगे भाइयों, बहनों, भांजों, ड्राइवरों और करोड़पति भाजपाइयों के खातों में लाखों रुपये ट्रांसफर कर दिए जाएं?

जी हां! छत्तीसगढ़ में 'जीरो टॉलरेंस' का ढोल पीटने वाली सरकार के माननीय विधायकों ने गरीबों की मदद के लिए बने फंड को अपनी 'पारिवारिक प्रॉपर्टी' समझ लिया है! महासमुंद से लेकर साजा और सीधे प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल के घर तक... हर जगह एक ही खेल चल रहा है— 'गरीबों का हक मारो और अपने करीबियों में रेवड़ियां बांटो!'

आज के इस वीडियो में हम आपको सबूतों के साथ दिखाएंगे कि कैसे जनता के खून-पसीने की कमाई को अपनों की जेब में डाला गया। पूरी वीडियो अंत तक देखिएगा, क्योंकि आज हम किसी को बख्शने वाले नहीं हैं!"

 : "सबसे पहले बात करते हैं महासमुंद के बीजेपी विधायक योगेश्वर राजू सिन्हा की। हाल ही में खबर आई कि विधायक जी ने 'स्वेच्छानुदान निधि' से 30 लाख 30 हजार रुपये बांट दिए! अब आप सोचेंगे कि इसमें क्या गलत है? विधायक तो गरीबों को बांटने के लिए ही पैसे पाते हैं ना?

ठहरिए! जरा लिस्ट खोलकर देखिए कि ये पैसे गए किसकी जेब में:

  • विधायक जी की सगी बहनें— ललिता सिन्हा, रयवती सिन्हा और जितेश्वरी सिन्हा!
  • विधायक जी के ड्राइवर और उनके करीबी!
  • इतना ही नहीं, बीजेपी के रसूखदार नेता, पूर्व पार्षद और यहां तक कि उन नेताओं के परिवार, जिनके घर में पहले से सरकारी नौकरी है! (जैसे बीजेपी नेता संदीप दीवान, जिनकी पत्नी खुद सरकारी टीचर हैं!)

नियमानुसार यह पैसा कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे गरीबों, बेबस विधवाओं या अनाथ बच्चों की पढ़ाई के लिए होता है। लेकिन महासमुंद में पात्र गरीब भटकते रहे और विधायक जी अपने रिश्तेदारों का घर भरते रहे!

और जब मीडिया ने विधायक जी से पूछा कि 'मालिक, ये क्या कर दिया?' तो विधायक योगेश्वर राजू सिन्हा का घमंड देखिए! वो कहते हैं— 'आपको जो सही लगता है छापो, क्या ऐसी बातों का जवाब दूं!'

सुन लिया आपने? जनता के पैसों की लूट पर सवाल पूछो तो माननीय को जवाब देना भी फालतू लगता है!"

: "अब आप सोच रहे होंगे कि क्या यह सिर्फ महासमुंद तक सीमित है? जी नहीं!

ज़रा साजा विधानसभा चलिए। वहां से विधायक हैं ईश्वर साहू। ईश्वर साहू जी को जनता ने किस उम्मीद से चुना था, यह सब जानते हैं। लेकिन विधायक बनते ही उन्होंने स्वेच्छानुदान निधि में क्या किया?

साजा में स्वेच्छानुदान निधि की जो लिस्ट सामने आई, उसमें विधायक ईश्वर साहू के बेटे, उनके सगे भाइयों और करीबी रिश्तेदारों के नाम दर्ज थे! जिस फंड पर किसी गरीब किसान, मजदूर या बीमार व्यक्ति का हक होना चाहिए था, उस फंड से विधायक जी ने अपने ही परिवार की 'आर्थिक सहायता' कर दी!

जब साजा की जनता और विपक्ष ने इस पर सवाल उठाए, तो लीपापोती करने की कोशिशें शुरू हो गईं। क्या साजा की गरीब जनता इसलिए वोट देती है कि विधायक बनते ही सबसे पहले अपने ही बेटे-बेटियों का बैंक बैलेंस मजबूत किया जाए? क्या यह जनता के भरोसे का कत्ल नहीं है?"

: "और अब आते हैं सबसे बड़े मामले पर... बात सिर्फ विधायकों तक खत्म नहीं होती, बात पहुंचती है सीधे प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल तक!

जी हां, वही मंत्री जिनके कंधे पर पूरे प्रदेश के गरीबों को इलाज मुहैया कराने की जिम्मेदारी है!

श्याम बिहारी जायसवाल के मनेन्द्रगढ़/बैकुंठपुर क्षेत्र से जब स्वेच्छानुदान की सूची बाहर आई, तो लोग दंग रह गए। स्वास्थ्य मंत्री जी ने अपने रिश्तेदारों, अपने जिला पंचायत/जनपद के करीबी नेताओं, कार्यकर्ताओं और संपन्न लोगों को स्वेच्छानुदान के चेक बांट दिए!

सोचिए! जो व्यक्ति प्रदेश का स्वास्थ्य मंत्री है, जिसके पास गरीबों को 'आयुष्मान योजना' या 'संजीवनी कोष' से करोड़ों का इलाज दिलवाने का अधिकार है... वो अपने विधायक स्वेच्छानुदान फंड से भी अपनों को ही रेवड़ियां बांट रहा है!

एक तरफ राज्य के सरकारी अस्पतालों में दवाइयां नहीं हैं, गरीब वेंटिलेटर और स्ट्रेचर के लिए तरस रहे हैं, और दूसरी तरफ स्वास्थ्य मंत्री जी के अपने लोग सरकारी खजाने से मजे मार रहे हैं! क्या इसे भ्रष्टाचार नहीं कहेंगे? क्या यह सत्ता का सीधा दुरुपयोग नहीं है?"


महासमुंद के योगेश्वर राजू सिन्हा, साजा के ईश्वर साहू, और स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल... ये तीनों मामले कोई इत्तेफाक नहीं हैं! यह एक सोची-समझी कार्यप्रणाली बन चुकी है।

हर साल हर विधायक को जनता की मदद के लिए लाखों-करोड़ों रुपये का स्वेच्छानुदान फंड मिलता है। अगर हर विधायक अपने रिश्तेदारों और कार्यकर्ताओं में ही 30-40 लाख रुपये बांट देगा, तो इस प्रदेश का गरीब कहां जाएगा? वो गरीब जो एक-एक हजार रुपये की दवा के लिए अपने बर्तन और जेवर बेचने पर मजबूर होता है!

सरकारें बदलती हैं, चेहरे बदलते हैं, लेकिन क्या गरीबों की किस्मत कभी बदलेगी? भाजपा सरकार 'जीरो टॉलरेंस' की बात करती है। मुख्यमंत्री जी से हमारा सीधा सवाल है—

  • क्या अपने इन विधायकों और मंत्रियों पर कोई जांच बैठाई जाएगी?
  • क्या गरीबों के हक का पैसा छीनकर अपने रिश्तेदारों को देने वालों पर कार्रवाई होगी?
  • या फिर यह मान लिया जाए कि 'स्वेच्छानुदान' का मतलब है— 'अपनी स्वेच्छा से अपनों को लूटने की छूट'?

रविवार, 11 अक्टूबर 2026

अब बीजेपी की पत्रिका में जेन जी के लिए अपशब्द

 अब बीजेपी की पत्रिका में जेन जी के लिए अपशब्द 



देश में राजनीति के कई रंग देखने को मिलते हैं, लेकिन जब सत्ता और उसकी पत्रिकाएं भाषा की मर्यादा की सीमाओं को लांघने लगें, तो सवाल पूछना ज़रूरी हो जाता है। आज हम बात कर रहे हैं छत्तीसगढ़ से प्रकाशित होने वाली बीजेपी की मासिक पत्रिका 'दीप कमल' के सितंबर अंक की।

यह अंक 'पीएम मोदी विशेषांक' के रूप में छापा गया है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुणों का बखान किया गया है। रामचरितमानस की चौपाइयों का सहारा लेकर सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेतृत्व की तारीफ की गई है। लेकिन इस तारीफ के आवरण में जिस तरह की भाषा और शब्दों का इस्तेमाल विपक्षी नेताओं, युवाओं और आंदोलनों के लिए किया गया है, उसने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है।


 पत्रिका के संपादकीय में दिल्ली में हुए जेन-जी (Gen-Z) के आंदोलनों और युवाओं का जिक्र इशारों-इशारों में किया गया है। लेकिन इसके लिए किन शब्दों का प्रयोग हुआ? संपादकीय में लिखा गया है कि "नालायक और निकम्मे तिलचट्टों (कॉकरोचों) के प्रति भी मोदी जी ने सदाशयता दिखाई है"।

सोचिए, जो युवा अपने अधिकारों, शिक्षा या रोज़गार के लिए आवाज़ उठाते हैं या आंदोलन करते हैं, उन्हें 'नालायक' और 'निकम्मा तिलचट्टा' कहा जा रहा है। लोकतांत्रिक देश में असहमति और आंदोलन का अपना स्थान होता है, लेकिन विरोध को इस तरह की शब्दावली से संबोधित करना सत्ता के अहंकार और संवाद की कमी को दर्शाता है।


बात यहीं खत्म नहीं होती। इस संपादकीय में मुख्य विपक्षी नेता राहुल गांधी को 'लिलजिला और पिलपिता' तक कह दिया गया है।

अब सवाल यह उठता है कि यह भाषा लिखी किसने है? छत्तीसगढ़ में छपने वाली इस पत्रिका के संपादक हैं पंकज झा। पंकज झा कोई साधारण पत्रकार या लेखक नहीं हैं, बल्कि वे राज्य के मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार भी हैं। जब संवैधानिक पद के करीब बैठा कोई व्यक्ति इस प्रकार का संपादकीय लिखता है, तो सवाल सीधा सरकार और उसकी मंशा पर उठता है।


शुरुआती दौर से ही जेएनयू और युवा आंदोलनों को लेकर बीजेपी के केंद्रीय व प्रांतीय नेताओं के बयान लगातार चर्चा में रहे हैं। चाहे देश के शीर्ष नेतृत्व के बयान हों या संगठन के अन्य नेताओं के—अक्सर युवा आंदोलनों और विचारधाराओं पर तीखे हमले किए गए हैं।

जब सत्ता में बैठे नेता या उनके सलाहकार संस्थाओं और युवाओं को लेकर ऐसा रुख अपनाते हैं, तो यह केवल एक बयान नहीं रहता, बल्कि यह एक राजनीतिक दृष्टिकोण बन जाता है। एक तरफ जहां पीएम मोदी के गुणों के गान के लिए धार्मिक ग्रंथों की चौपाइयों का सहारा लिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ लोकतंत्र में सवाल पूछने वालों के लिए ऐसी भाषा का प्रयोग किया जाता है।


लोकतंत्र में किसी नेता की तारीफ करना या उनके योगदान को रेखांकित करना गलत नहीं है, लेकिन इसके लिए विरोधियों या युवाओं को नीचा दिखाना और अमर्यादित भाषा का सहारा लेना कितना सही है? क्या एक सरकारी/पक्षीय पत्रिका के संपादकीय में इस तरह की शब्दावली होनी चाहिए?

शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

बैलाडीला का 'लूपहोल' खेल: 57 बनाम 59 का असली सच!

 


बैलाडीला का 'लूपहोल' खेल: 57 बनाम 59 का असली सच!


"छत्तीसगढ़ के बस्तर से निकलने वाला लोहा... जो देश-दुनिया की फैक्ट्रियों को चमकाता है, उसी लोहे के काले खेल को लेकर एक ऐसी खबर आई जिसने विजिलेंस से लेकर रेलवे तक के होश उड़ा दिए। हर जगह चर्चा थी कि बैलाडीला से 52 वैगन की जगह 59 वैगन भेजे गए। लेकिन रुकिए! असली खेल डिब्बों की गिनती का नहीं... असली खेल तो कागजों और रॉयल्टी के वजन का है!

आज हम आपको बताने जा रहे हैं इस खेल के पीछे की वो कड़वी हकीकत, जिसे दबाने की पूरी कोशिश की गई। कहानी 52 डिब्बों की नहीं, बल्कि **57 लाख और 59 लाख मीट्रिक टन** के उस हेरफेर की है, जिसमें सीधे-सीधे 2 लाख मीट्रिक टन लोहा सिस्टम की नाक के नीचे से 'गायब' करने की तैयारी थी! आखिर ये 2 लाख का अतिरिक्त माल किसके इशारे पर जा रहा था? और कौन है इस पूरे सिंडिकेट का मास्टरमाइंड? चलिए पूरा खेल खोलते हैं!"

 आंकड़ेबाजी का मायाजाल 


"आम जनता को उलझाया गया वैगनों की गिनती में, ताकि असली आंकड़ों पर किसी की नजर न जाए। विजिलेंस की गहरी जांच में जो सच सामने आया है, वो चौंकाने वाला है। रिकॉर्ड्स के मुताबिक, जहां सिर्फ **57 लाख** की परमिशन, रॉयल्टी और पास वैध थे... वहां असलियत में वजन पहुंच गया **59 लाख** पर!

यानी सीधे-सीधे **2 लाख** का यह अतिरिक्त माल... जिसका न कोई सरकारी टैक्स चुकाया गया, न कोई वैध ट्रांजिट पास (TP) था। अब सवाल यह उठता है कि क्या बस्तर के पहाड़ों से लोहा बिना किसी की इजाजत के अपने आप ट्रेन पर लोड हो गया? क्या NMDC के लोडिंग सुपरवाइजर सो रहे थे? या फिर रेलवे के वेब्रिज (कांटा) पर बैठे अधिकारियों की आंख पर नोटों की पट्टी बंधी थी?"


"अब समझिए कि यह खेल काम कैसे करता है। ट्रेन बुक होती है एक बड़े सरकारी या प्रतिष्ठित संस्थान, जैसे 'विशाखापट्टनम स्टील प्लांट' के नाम पर। क्यों? क्योंकि सरकारी प्लांट के नाम पर आने-जाने वाली गाड़ियों पर कोई शक नहीं करता। ग्रीन सिग्नल मिलता जाता है और ट्रेनें बिना किसी रुकावट के केके लाइन (KK Line) से आगे बढ़ती रहती हैं।

लेकिन इस बड़े रैक की आड़ में जो **2 लाख का अतिरिक्त माल** छुपाया गया था, उसकी सेटिंग कहीं और थी। विशाखापट्टनम पहुंचने से पहले या वहां के बड़े यार्ड्स में, इस एक्स्ट्रा माल को चुपके से 'शंटिंग' और 'री-मार्शलिंग' के जरिए प्राइवेट पैलेट प्लांट्स, निजी स्पंज आयरन फैक्ट्रियों या फिर समुद्र के रास्ते विदेश भेजने वाले एक्सपोर्टर्स के खाते में डाल दिया जाता है। यानी, नाम सरकारी प्लांट का... और मलाई प्राइवेट माफिया की!"


"विजिलेंस ने इस रैक को इंटरसेप्ट करके चोरी तो पकड़ ली, लेकिन यह सिर्फ एक रैक की बात नहीं है। सवाल यह है कि ऐसे कितने '2 लाख' के फेरबदल पास्ट में हो चुके हैं, जो फाइलों में कभी दर्ज ही नहीं हुए? बिना टॉप-लेवल की मिलीभगत के, इतनी बड़ी मात्रा में आयरन ओर का अवैध परिवहन नामुमकिन है। यह बस्तर के प्राकृतिक संसाधनों की खुली डकैती है, जिसमें रॉयल्टी का करोड़ों रुपया सरकार के खजाने में जाने के बजाय सीधे सिंडिकेट की जेब में जा रहा था।

अब देखना यह है कि विजिलेंस की इस कार्रवाई के बाद क्या सिर्फ छोटे कर्मचारियों को बली का बकरा बनाया जाएगा, या फिर उन सफेदपोश चेहरों और बड़े अफसरों तक भी कानून के हाथ पहुंचेंगे जो विशाखापट्टनम से लेकर छत्तीसगढ़ तक इस पूरे रैकेट को ऑपरेट कर रहे हैं।"