छत्तीसगड़ में किसानो से ये कैसा अन्याय
किसान देश की रीढ़ है', 'अन्नदाता सुखी भवः', 'किसान की आय 2022 तक दोगुनी हो जाएगी'... ये वो जुमले और नारे हैं जो हर चुनाव से पहले मंचों से गूंजते हैं। लेकिन जमीन पर सच्चाई क्या है? क्या छत्तीसगढ़ की सरकार किसान विरोधी रुख अपना रही है?
बात कड़वी है, लेकिन सच है। जिस छत्तीसगढ़ को 'धान का कटोरा' कहा जाता है, वहीं का किसान आज खाद की कालाबाजारी, फसल बीमा के गोलमाल, बकाया पैसों के लटके होने और समर्थन मूल्य के नाम पर हो रहे गणित के खेल से त्रस्त है। हालत यह है कि अब केवल विपक्षी दल ही नहीं, बल्कि आरएसएस (RSS) का अनुषांगिक संगठन भारतीय किसान संघ भी सड़क पर उतरने को मजबूर हो चुका है! जब अपने ही संगठन को नया रायपुर में रैली निकालनी पड़े और ज्ञापन सौंपना पड़े, तो समझ जाइए कि पानी सिर से ऊपर जा चुका है!"
₹3100 धान खरीदी और MSP की गणितीय बाजीगरी
केंद्र का MSP बढ़ाव बनाम राज्य का ₹3100 का फिक्स रेट
"आइए गणित समझते हैं, क्योंकि नेता आपको आंकड़ों के जाल में उलझाते हैं।
पिछले तीन सालों में केंद्र सरकार द्वारा धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में लगभग ₹258 की बढ़ोतरी हो चुकी है। लेकिन छत्तीसगढ़ में किसानों को धान का भाव आज भी घूम-फिरकर ₹3100 प्रति क्विंटल पर ही अटका हुआ है!
सवाल सीधा है—जब केंद्र से MSP बढ़ता है, तो उसका सीधा फायदा किसानों को राज्य की प्रोत्साहन राशि के ऊपर क्यों नहीं मिलता?
क्या केंद्र द्वारा बढ़ाया गया पैसा किसान की जेब में जाने के बजाय कागजी समायोजन (Adjustment) में खप रहा है?
₹3100 का नारा देकर क्या किसानों का हक मारा जा रहा है?
चुनाव के समय बड़ी-बड़ी बातें की गईं, लेकिन आज समर्थन मूल्य की आड़ में किसानों को उनका असली हक देने में आनाकानी क्यों हो रही है? क्या किसान केवल वोट बैंक का साधन हैं?"
₹1700 करोड़ का बकाया – राजनीति में पिसता किसान
"अब बात करते हैं उस सबसे बड़े धोखे की, जो भूपेश बघेल सरकार के कार्यकाल से चला आ रहा है।
पिछली सरकार का ₹1700 करोड़ से ज्यादा का बोनस/बकाया आज तक किसानों के खातों में नहीं पहुंचा है। जब सरकार बदली, तो किसानों को उम्मीद थी कि नई सरकार आते ही यह बकाया तुरंत जारी होगा। लेकिन बहाना क्या बनाया जाता है? 'योजना पिछली सरकार की थी!'
अरे साहब, सरकारें बदलती हैं, नीतियां बदलती हैं, लेकिन क्या किसान बदल जाता है? फसल तो किसान ने उगाई थी! पसीना तो किसान ने बहाया था! फिर पिछली सरकार और नई सरकार की राजनीतिक खींचतान में किसान का पैसा क्यों फंसा हुआ है?
₹1700 करोड़ कोई छोटी रकम नहीं होती। यह छत्तीसगढ़ के लाखों किसान परिवारों के खून-पसीने की कमाई है। इसे अटका कर रखना क्या किसान-विरोधी मानसिकता का प्रमाण नहीं है?"
भारतीय किसान संघ का हल्लाबोल और जमीनी हकीकत
"अगर आपको लगता है कि यह सिर्फ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप है, तो ज़रा अपनी आंखें खोलिए।
हाल ही में भारतीय किसान संघ—जो कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़ा संगठन है—उसने नया रायपुर में विशाल रैली निकाली, उग्र प्रदर्शन किया और सरकार को ज्ञापन सौंपा।
सोचिए! जो संगठन वैचारिक रूप से सत्ताधारी दल के करीब माना जाता है, उसे भी सड़कों पर उतरकर चक्काजाम और प्रदर्शन करने की नौबत क्यों आई?
कारण साफ़ है:
1. खाद की भयंकर कालाबाजारी: बोवनी और रोपाई के सीजन में किसानों को सोसायटियों में खाद नहीं मिलती। किसान लाइनों में खड़े रहते हैं, लाठियां खाते हैं, और वही खाद ब्लैक मार्केट में दोगुनी-तिगुनी कीमतों पर बेची जाती है।
2. समय पर संसाधनों का न मिलना: न बीज समय पर, न खाद समय पर, न बिजली की सही सप्लाई।
3. फसल बीमा की बदहाली: सूखा पड़े या अतिवृष्टि, फसल बीमा का पैसा कंपनियों के पेट में चला जाता है। जब किसान क्लेम करने जाता है, तो कागजी औपचारिकताओं में उसे ऐसा उलझाया जाता है कि उसे फूटी कौड़ी नहीं मिलती।
जब अपने ही संगठन सड़क पर उतरकर चेतावनी दे रहे हों, तो यह साफ है कि जमीनी हकीकत दावों से बिल्कुल उलट है।"
'आय दोगुनी' का वादा बनाम घटती कमाई की कड़वी सच्चाई
"प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के किसानों से वादा किया था कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी। आज हम 2026 में खड़े हैं!
आय दोगुनी होना तो दूर की बात है, महंगाई की वजह से किसान की लागत दोगुनी से ज्यादा बढ़ चुकी है:
डीज़ल महंगा हो गया।
कीटनाशक और दवाइयां महंगी हो गईं।
खाद और बीज के दाम बढ़ गए।
ट्रैक्टर और कृषि उपकरणों पर टैक्स की मार है।
लागत दिन-प्रतिदिन आसमान छू रही है और किसान की उपज का सही दाम गोलमाल की भेंट चढ़ रहा है। परिणाम? किसान की वास्तविक आय बढ़ने के बजाय और घटती जा रही है। कर्ज के बोझ तले दबा किसान आज भी वही सवाल पूछ रहा है—'आखिरहमारी आय दोगुनी कब होगी?'"
छत्तीसगढ़ का किसान सीधा-साधा जरूर है, लेकिन कमजोर नहीं। अगर सरकार सोचती है कि घोषणाओं का झुनझुना थमाकर, विज्ञापन चलाकर और भाषण देकर किसानों को शांत रखा जा सकता है, तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल है।
आज छत्तीसगढ़ के किसान के मुख्य सवाल यह हैं:
1. केंद्र द्वारा बढ़ाई गई MSP के हिसाब से धान का पूरा लाभ किसानों को तुरंत क्यों नहीं दिया जा रहा?
2. ₹1700 करोड़ का पुराना बकाया तुरंत जारी क्यों नहीं किया जाता?
3. खाद की कालाबाजारी करने वाले भू-माफियाओं और दलालों पर नकेल कब कसी जाएगी?
4. फसल बीमा का लाभ कंपनियों की जेब में जाने के बजाय किसान के खाते में कब पहुंचेगा?
अगर सरकार वाकई किसान हितैषी है, तो इन सवालों के जवाब कागजों पर नहीं, किसानों के बैंक खातों और सोसायटियों की व्यवस्था में दिखने चाहिए।"
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