शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

विकास या विनाश का 'एथेनॉल जाल': सुलगती ज़मीन, छिनती साँसें और खाली हाथ किसान

विकास या विनाश का 'एथेनॉल जाल': सुलगती ज़मीन, छिनती साँसें और खाली हाथ किसान



20% एथेनॉल ब्लेंडिंग का सुनहरा सपना या छत्तीसगढ़ के जल-जंगल-ज़मीन पर डाका? जानिए कैसे पर्यावरण और रोज़गार के नाम पर चांदी काट रहे हैं पूंजीपति और राइस मिलर्स, जबकि स्थानीय युवाओं के हिस्से आई सिर्फ़ 8 हज़ार की गार्डगिरी!

छत्तीसगढ़ में इन दिनों पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने की राष्ट्रीय नीति के तहत एक के बाद एक एथेनॉल प्लांट्स (Ethanol Plants) लगाने की बाढ़ आ गई है [01:26, 02:21]। सरकार इसे कृषि और ऊर्जा क्रांति का प्रतीक बता रही है—यह दावा किया जा रहा है कि अन्नदाता अब 'ऊर्जादाता' बनेगा [00:45]।

लेकिन कवर्धा से लेकर बेमेतरा के बेरला, पथर्रा, राका और चुन्नू जैसे ग्रामीण इलाकों में ज़मीनी हकीकत इस गुलाबी तस्वीर के बिल्कुल विपरीत है [00:55, 02:43, 02:54]। राज्य में लगभग 29 से 42 प्लांटों को मंज़ूरी दी गई है और ₹5200 करोड़ से अधिक के एमओयू (MoU) साइन किए गए हैं [02:31, 03:04]। मगर इस उद्योग क्रांति की आड़ में जो तबाही पक रही है, उसने दर्जनों गाँवों के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है [00:55, 02:12]।

2. भूजल पर डाका: प्यासा होगा छत्तीसगढ़?

पर्यावरण विशेषज्ञों और शोध रिपोर्टों के अनुसार, 1 लीटर एथेनॉल बनाने के लिए लगभग 5 से 7 लीटर साफ़ पानी का इस्तेमाल होता है [03:48]।

 रोज़ाना लाखों लीटर एथेनॉल बनाने वाली ये फैक्ट्रियाँ हर दिन करोड़ों लीटर पानी सोखेंगी [03:56, 04:08]।

 बेमेतरा और बेरला जैसे मैदानी क्षेत्र पहले से ही 'डार्क ज़ोन' (Dark Zone) की कगार पर हैं, जहाँ गर्मियों में हैंडपंप और ट्यूबवेल जवाब दे जाते हैं [04:17, 04:27]।

 सवाल यह उठ रहा है कि जो इलाका पहले से ही पानी की किल्लत झेल रहा है, वहाँ जल-भंडार का सीना चीरकर इन फैक्ट्रियों को अरबों लीटर भूजल दोहन की छूट किसने और क्यों दी? [04:35, 04:48]

3. 'रोज़गार' का लॉलीपॉप और भूमपुत्रों के साथ छल

प्लांट लगाने से पहले जनसुनवाई में ग्रामीणों को बड़े-बड़े सपने दिखाए गए थे कि स्थानीय पढ़े-लिखे युवाओं को सम्मानजनक नौकरियां मिलेंगी [04:55, 05:08]। लेकिन सच्चाई बेहद कड़वी है:

 एथेनॉल प्लांट पूरी तरह ऑटोमेटिक और हाई-टेक तकनीक पर चलते हैं, जहाँ डिस्टिलरी एक्सपर्ट्स, केमिकल इंजीनियरों और लैब तकनीशियनों की ज़रूरत होती है [05:25]।

 स्थानीय युवाओं के पास डिग्रियाँ तो हैं, लेकिन इस विशिष्ट तकनीक का अनुभव न होने का बहाना बनाकर बाहरी राज्यों के लोगों को मलाईदार और मोटी तनख्वाह वाले पदों पर बैठा दिया गया है [05:38, 05:50]।

 ज़मीन गंवाने वाले भूमिपुत्रों को बदले में मिली तो बस 8,000 से 10,000 रुपये की सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी, हमाली या साफ़-सफ़ाई का काम [05:59]।

4. किसान बेहाल, सिंडिकेट की चाँदी

दावा था कि मक्का और धान उगाने वाले किसानों को इस क्रांति से सीधे नकद फ़ायदा होगा [03:16, 06:10]। लेकिन ज़मीनी खेल कुछ और ही है:

 ये निजी कम्पनियाँ छोटे किसानों से सीधे अनाज नहीं खरीदतीं [06:20]।

 इनका सीधा गठजोड़ और सिंडिकेट बड़े राइस मिलर्स के साथ है, जहाँ से भारी मात्रा में 'कनकी' (टूटा चावल) और राइस ब्रान उठाया जाता है [06:29, 06:39]।

 आम किसान आज भी अपनी फ़सल बेचने के लिए सरकारी उपार्जन केंद्रों (सोसायटियों) की लंबी कतारों में खड़ा है [06:47, 06:56]। इस पूरी नीति का सीधा मुनाफ़ा उद्योगपतियों और मिलरों की तिजोरी में जा रहा है [06:39, 06:47]।

5. ज़हरीली हवा, दूषित पानी और जन-आक्रोश

कवर्धा और बेरला क्षेत्र के ग्रामीणों का कहना है कि इन प्लांट्स से निकलने वाला गंदा पानी और तीखी ज़हरीली बदबू आने वाले 10 किलोमीटर के दायरे में हवा और पानी को ज़हरीला बना रही है [07:25, 08:03]। ग्रामीणों में यह खौफ़ है कि आने वाले समय में यहाँ की हवा-पानी इतनी दूषित हो जाएगी कि उल्टी, सांस की बीमारियाँ और खेती का बंज़र होना तय है [08:03, 08:33]।

प्रमुख सवाल जो शासन-प्रशासन से जवाब मांगते हैं:

1. वाटर ऑडिट क्यों नहीं? क्या सरकार इन भारी जल-शोषण करने वाले प्लांट्स पर कड़ा वाटर ऑडिट लागू करेगी [08:13]?

2. रोज़गार कानून कब? क्या स्थानीय युवाओं के लिए कम से कम 80% नौकरियों की कानूनी गारंटी तय की जाएगी [08:24]?

3. पर्यावरण की रक्षा का क्या प्लान है? क्या चंद उद्योगपतियों के मुनाफ़े के लिए आने वाली पीढ़ियों के हिस्से का पानी और साफ़ हवा छीन लेना ही 'सुशासन' है 


गुरुवार, 30 जुलाई 2026

वीआईपी सपनों’ के नीचे कुचला गया ‘नकटी’: कौन है सत्ता, शासन और तंत्र का असली 'खलनायक'?

 वीआईपी सपनों’ के नीचे कुचला गया ‘नकटी’: कौन है सत्ता, शासन और तंत्र का असली 'खलनायक'?



छत्तीसगढ़ की राजधानी की नाक के ठीक नीचे स्थित 'नकटी' गांव में हाल ही में चली बुलडोजर कार्रवाई ने राज्य की प्रशासनिक और राजनीतिक समरसता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विधायकों के लिए बनने वाली आलीशान कॉलोनी और रसूखदारों के वीआईपी प्रोजेक्ट्स की खातिर सदियों पुराने बसे-बसाए आशियाने ढहा दिए गए और मवेशियों का चारागाह निगल लिया गया। मूसलाधार बरसात के बीच सिर से छत छिन जाने के बाद, नया रायपुर के सेक्टर-30 के छोटे कमरों के आवंटन को ठुकराकर ग्रामीण फिर से उसी मलबे और खंडहरों में अपनी रातें काटने को मजबूर हैं [05:42]।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद केवल बुलडोजर की गड़गड़ाहट शांत नहीं हुई है, बल्कि सत्ता के गलियारों में जवाबदेही और राजनीतिक साख को लेकर घमासान छिड़ गया है।

1. मौन स्वीकृति या नीतिगत विफलता?

सुशासन का दावा करने वाले मुख्यमंत्री कार्यालय की भूमिका पर अब सीधे सवाल उठ रहे हैं [01:45]। सवाल यह उठ रहा है कि क्या विधायकों और रसूखदारों के ऐशो-आराम के लिए गरीबों के आशियानों को उजाड़ने से पहले प्रशासनिक संवेदनशीलता को पूरी तरह ताक पर रख दिया गया? स्कूल खुलने के ठीक बाद, बारिश के इस मौसम में बच्चों और महिलाओं की चीख-पुकार के बीच मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों के आवासों का घेराव यह साफ़ संकेत दे रहा है कि जनता की नजर में सत्ता शीर्ष का यह मौन किसी अपराध से कम नहीं है [02:35]।

2. नीति या हठ? किसके इशारे पर चली कार्रवाई?

राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में इस वक्त प्रदेश के वित्त मंत्री ओपी चौधरी और राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा की भूमिका है [02:58]।

 ओपी चौधरी का 'मास्टरमाइंड' एंगल: पूर्व आईएएस अधिकारी होने के नाते नियम-कायदों की बारीक समझ रखने वाले ओपी चौधरी के शंकर नगर स्थित आवास पर ग्रामीणों का फूटा गुस्सा यह बताता है कि इस 'वीआईपी प्रोजेक्ट' को अमलीजामा पहनाने की जिद का ठीकरा प्रशासनिक से ज्यादा नीतिगत स्तर पर फोड़ा जा रहा है [03:19]।

 राजस्व विभाग का मौन: जमीन और बेदखली का सीधा ताल्लुक राजस्व विभाग से होता है। पटवारी भर्ती और ट्रांसफर-पोस्टिंग के पुराने विवादों से घिरे टंकराम वर्मा के मातहत अमले ने जिस तत्परता से बेदखली को अंजाम दिया, उससे राजस्व अमले की मंशा पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं [04:31]।

3. 'रील और रियल' के बीच फंसे जनप्रतिनिधि

 अनुज शर्मा पर जनता का गुस्सा: क्षेत्रीय विधायक अनुज शर्मा को शायद पहली बार रील और रियल लाइफ के फर्क का कड़वा अहसास हुआ है [07:00]। बेघर हुई महिलाओं का आक्रोश और सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो क्षेत्रीय नेतृत्व की नाकामी को उजागर कर रहे हैं।

 बृजमोहन अग्रवाल का 'सहानुभूति कार्ड': सांसद बृजमोहन अग्रवाल द्वारा जारी वीडियो संदेश और अफसरों पर कार्रवाई की मांग वाले पत्र को जनता महज "राजनीतिक नौटंकी" करार दे रही है [09:31]। सवाल उठ रहा है कि यदि सरकार और सत्ता उनकी अपनी है, तो उनके ही नाक के नीचे अधिकारी इतनी बड़ी कार्रवाई करने की जुर्रत कैसे कर सकते हैं? क्या यह अपनी साख बचाने की कोशिश है [10:12]?

4. दागी अफ़सर के हाथों में बेदखली की कमान

मामले में सबसे सनसनीखेज पहलू कार्रवाई का नेतृत्व करने वाले अफसर कीर्तिमान सिंह राठौर का ट्रैक रिकॉर्ड है [11:04]।

 विवादित ट्रैक रिकॉर्ड: बिलासपुर में पदस्थापना के दौरान बहुचर्चित 'अरपा भैंसाझार सिंचाई परियोजना' के मुआवजा वितरण में अनियमितताओं और रसूखदारों को फायदा पहुंचाने के गंभीर आरोपों के तहत राठौर जांच के दायरे में हैं [11:39]।

 EOW की जांच का दायरा: एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) और इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (EOW) में मामला दर्ज होने और जांच की अनुमति मिलने के बावजूद ऐसे विवादित अधिकारी को जमीनी स्तर पर बेदखली और तोड़फोड़ का कमान सौंपना, पूरे प्रशासनिक ढर्रे की नीयत पर सीधे प्रश्नचिह्न लगाता है [13:06]।

सियासत गर्माई, खंडर में तब्दील जिंदगी

एक तरफ कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर गांव में डेरा जमाए हुए है और इसे प्रशासनिक बर्बरता करार दे रही है [06:13], वहीं दूसरी तरफ नकटी के मासूम बच्चे और परिवार तिरपाल के नीचे बरसात से बचने की जद्दोजहद कर रहे हैं [05:53]। सत्ता की हनक और अफसरों की बेदर्दी के बीच नकटी का यह सच अब किसी एक गांव की नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही के पतन की दास्तान बन चुका है।

वीडियो देखें 

बुधवार, 29 जुलाई 2026

नव्या मलिक ड्रग्स केस: रायपुर के 8 बड़े होटल-पब ED के रडार पर, चीन दौरों और वसूली डायरी से हिला सिस्टम

 नव्या मलिक ड्रग्स केस: रायपुर के 8 बड़े होटल-पब ED के रडार पर, चीन दौरों और वसूली डायरी से हिला सिस्टम 


छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित नव्या मलिक ड्रग्स केस में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ताबड़तोड़ एंट्री के बाद इस हाई-प्रोफाइल सिंडिकेट के तार लगातार गहराते जा रहे हैं [00:10]। इंटीरियर डिजाइनर से ड्रग्स सिंडिकेट के केंद्र तक पहुंची नव्या मलिक मामले में अब राजधानी रायपुर के 8 बड़े प्रतिष्ठित होटल और पब्स ईडी के सीधे निशाने पर आ चुके हैं [00:19]। ईडी की जांच में वित्तीय लेनदेन, इंटरनेशनल हवाला नेटवर्क, शेल कंपनियों और रसूखदारों से ब्लैकमेलिंग-उगाही का एक बड़ा ढांचा सामने आ रहा है।

1. 850 रईसजादे, अश्लील तस्वीरें और उगाही का खेल

पुलिस जांच और शुरुआती दावों के मुताबिक, नव्या मलिक के नेटवर्क में शहर के लगभग 850 रईसजादे और हाई-प्रोफाइल लोग जुड़े हुए थे [02:25]। आरोप है कि ड्रग्स पार्टियों के बहाने रसूखदारों को फंसाया जाता था और बाद में अश्लील तस्वीरों व वीडियो के जरिए उनसे मोटी रकम की उगाही की जाती थी [02:37]। पुलिस को नव्या मलिक के इस पूरे खेल की प्राथमिक जानकारी उसके मंगेतर के जरिए ही मिली थी, जिसके बाद उसे गिरफ्तार किया गया था [02:08]।

2. पुलिस की 'वसूली डायरी' और SIT का गठन

मामले ने तब राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में तहलका मचा दिया, जब पुलिस की कथित 'वसूली की डायरी' के पन्ने सोशल मीडिया पर वायरल हो गए [03:07]।

 इस डायरी में किस-किस रसूखदार और अधिकारी को मामले से बचाने के लिए कितनी रकम दी गई, इसका ब्योरा दर्ज होने की बात सामने आई [03:27]।

 पुलिस पर ही बड़े चेहरों को बचाने और उगाही करने के आरोप लगने के बाद मामले की जांच के लिए एसआईटी (SIT) का गठन किया गया [03:52]।

3. ED की एंट्री: विदेशी यात्राएं और 'चीन कनेक्शन'

करोड़ों रुपये के संदिग्ध लेनदेन और हवाला सिंडिकेट का संदेह गहराते ही केस में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की एंट्री हुई [04:02]। ईडी ने नव्या मलिक के पासपोर्ट और बैंक अकाउंट्स को खंगालना शुरू किया [04:11]।

 12 विदेशी यात्राएं और 8 बार चीन का दौरा: जांच में खुलासा हुआ कि नव्या मलिक ने दर्जनभर विदेशी यात्राएं कीं, जिनमें से 8 बार उसने चीन (China) की यात्रा की थी [06:36]।

 हवाला और शेल कंपनियां: ईडी को अंदेशा है कि इन विदेशी दौरों की फंडिंग और संदिग्ध बैंक खातों के पीछे अंतरराष्ट्रीय हवाला नेटवर्क और शेल कंपनियों का हाथ है [04:32]।

4. रायपुर के 8 बड़े होटल व पब्स बने अड्डे

ईडी के सूत्रों के मुताबिक, नव्या मलिक ने रायपुर के 8 प्रमुख होटलों और पब्स को अपने सिंडिकेट का मुख्य अड्डा बना रखा था [05:13]।

 इन होटलों और पब्स में वीकेंड्स पर लाखों रुपये का नशे का कारोबार होता था [05:32]।

 ईडी अब इन 8 होटलों के मालिकों, प्रमोटर्स और मैनेजर्स के बैंक खातों तथा नव्या मलिक के सीधे वित्तीय संबंधों की कड़ियों की गहन पड़ताल कर रही है [05:56]।

क्या नव्या महज एक 'मोहरा' है?

इस पूरे केस में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या नव्या मलिक सिर्फ इस सिंडिकेट का चेहरा (फ्रंटमैन) थी [07:08]? ईडी अब यह पता लगाने में जुटी है कि पर्दे के पीछे बैठकर रायपुर के नाइटलाइफ और ड्रग्स सिंडिकेट को कंट्रोल करने वाले 'असली वजीर' कौन हैं [07:20]। आने वाले दिनों में रायपुर के कई बड़े प्रमोटरों और रसूखदारों पर ईडी की कड़ी कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है [06:19]।

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मंगलवार, 28 जुलाई 2026

निजी खर्च पर हुए मोतियाबिंद ऑपरेशनों को सरकारी उपलब्धि बता थपथपाई जा रही पीठ!

 निजी खर्च पर हुए मोतियाबिंद ऑपरेशनों को सरकारी उपलब्धि बता थपथपाई जा रही पीठ!


 1,08,000 ऑपरेशनों के लक्ष्य के मुकाबले सरकारी अस्पतालों और एनजीओ की कुल साख महज 38,365 पर सिमटी

 नाकामी छिपाने को आम जनता द्वारा निजी अस्पतालों में अपनी जेब से कराए गए 70,983 ऑपरेशनों को सरकारी आंकड़ों में जोड़ा गया

 प्रदेश भर के सरकारी मेडिकल कॉलेजों की लचर स्थिति: साल भर में दर्ज हुए मात्र 1,409 ऑपरेशन

रायपुर।

प्रदेश में ‘डबल इंजन’ सरकार के बड़े-बड़े विज्ञापनों और स्वास्थ्य सेवाओं के दावों के बीच एक चौंकाने वाली हकीकत सामने आई है। राज्य के स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी सरकारी आंकड़ों के पोस्टमार्टम से खुलासा हुआ है कि गरीबों को मुफ्त इलाज और मोतियाबिंद से मुक्ति दिलाने का दावा करने वाला सरकारी तंत्र पूरी तरह वेंटिलेटर पर है। अपनी नाकामी और लचर व्यवस्था को छिपाने के लिए विभाग ने ऐसा खेल खेला है, जिसे आंकड़ों की बाजीगरी और जनता के साथ धोखाधड़ी कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

साल 2025-26 के लिए राज्य सरकार ने पूरे छत्तीसगढ़ में 1 लाख 8 हजार गरीबों के मोतियाबिंद का मुफ्त ऑपरेशन करने का लक्ष्य तय किया था। लेकिन जब विभागीय समीक्षा रिपोर्ट के आंकड़े सामने आए, तो सरकारी दावों की हवा निकल गई।

सरकारी तंत्र की पोल खोलते आंकड़े (2025-26):

1. सरकारी मेडिकल कॉलेज: प्रदेश भर के तमाम बड़े और आधुनिक समझे जाने वाले सरकारी मेडिकल कॉलेज मिलकर पूरे साल में महज 1,409 मोतियाबिंद ऑपरेशन ही कर पाए। [02:05]

2. जिला सिविल केंद्रीय अस्पताल: राज्य के सभी जिला और सिविल अस्पतालों का कुल प्रदर्शन 31,146 ऑपरेशनों तक सीमित रहा। [02:19]

3. गैर सरकारी संस्थाएं (NGOs): एनजीओ के माध्यम से 5,810 ऑपरेशन कराए गए। [02:28]

यदि इन सभी सरकारी व्यवस्थाओं और एनजीओ के आंकड़ों को जोड़ भी दिया जाए, तो कुल जमा आंकड़ा 38,365 ऑपरेशनों पर ही अटक जाता है। [02:38] यह आंकड़ा तय लक्ष्य (1.08 लाख) के आधे हिस्से तक भी नहीं पहुंच पाता।

यूं रची गई आंकड़ों की 'चालाकी'

जब लक्ष्य और उपलब्धि के बीच एक बड़ा गड्ढा दिखने लगा, तो स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारियों ने अपनी साख बचाने के लिए एक अजीबो-गरीब पैंतरा अपनाया। प्रदेश के जिन आम नागरिकों ने मजबूरी में, कर्ज लेकर या अपनी जमीन-जायदाद गिरवी रखकर निजी अस्पतालों में अपनी जेब से 70,983 मोतियाबिंद ऑपरेशन [01:27] कराए, सरकार ने उन निजी ऑपरेशनों को भी अपनी सरकारी रिपोर्ट में घसीट लिया।

सरकारी ऑपरेशनों (38,365) और निजी खर्च पर हुए ऑपरेशनों (70,983) को एक साथ जोड़कर रिपोर्ट तैयार की गई और ढिंढोरा पीटा गया कि "सरकार ने मोतियाबिंद मुक्ति के लक्ष्य को लगभग हासिल कर लिया है।"

'आंख फोड़वा कांड' का डरावना अतीत और वर्तमान का अंधेरा

स्वास्थ्य विभाग की यह बदहाली छत्तीसगढ़ के लिए नई नहीं है। राज्य में पूर्ववर्ती रमन सरकार के कार्यकाल के दौरान महासमुंद, बालोद, बिलासपुर और जगदलपुर जैसे क्षेत्रों में हुए 'आंख फोड़वा कांड' की दर्दनाक यादें आज भी ताजा हैं, [04:49] जब घटिया दवाओं और लापरवाही के कारण दर्जनों गरीबों ने अपनी आंखों की रोशनी हमेशा के लिए गंवा दी थी।

आज सरकार और चेहरे भले बदल गए हों, लेकिन जमीनी हकीकत नहीं बदली। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों का न होना, मशीनों का खराब रहना और महीनों लंबी तारीखें मिलना आम बात हो गई है। मजबूरी में गरीब बुजुर्ग अपनी जिंदगी भर की कमाई निजी अस्पतालों में लुटा रहे हैं और सरकार उन्हीं के आंकड़ों पर श्रेय बटोर रही है।

3 तीखे सवाल, जिनका जवाब सरकार को देना होगा:

1. जिम्मेदारी तय क्यों नहीं?: जब सरकारी और एनजीओ तंत्र मिलकर लक्ष्य का 40% भी पूरा नहीं कर पाया, तो इस विफलता के लिए जिम्मेदार स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई?

2. क्या यह जनता से धोखा नहीं?: आम नागरिकों द्वारा अपनी गाढ़ी कमाई से निजी अस्पतालों में कराए गए इलाज को सरकारी रिपोर्ट में शामिल करना क्या सीधे तौर पर आंकड़ों की जालसाजी नहीं है?

3. करोड़ों का स्वास्थ्य बजट कहां?: आयुष्मान योजना और स्वास्थ्य विभाग के भारी-भरकम बजट के बावजूद यदि गरीब को प्राइवेट अस्पताल का ही दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है, तो विभाग का असल काम क्या रह गया है?

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