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सोमवार, 22 जुलाई 2024

कालेज छात्रों को ड्रग्स का लत लगा रहा था संस्कारी संघी…

 कालेज छात्रों को ड्रग्स का लत लगा रहा था संस्कारी संघी…


अभी उत्तर प्रदेश के प्रयाग राज को एके 47 से दहलाने वाला भाजपा के पूर्व विधायक उदयभान करवरिया को समय पूर्व रिहाई का मामला ठंडा भी नहीं हो पाया था कि अब गुजरात से यह खबर आ गई कि कालेज छात्रों में ड्रग्स का लत लगाने वाले संघ के स्वयं सेवक और हिन्दू युवा वाहिनी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष विकास अहिर पकड़ा गया। वह अपना यह खेल आइसक्रीम पार्लर की आड़ में चला रहा था। योगी आदित्यनाथ से लेकर भाजपा के दिग्गजों के साल उनकी तस्बीर और फेसबुक प्रोफाईल ने संघ के संस्कार की पोल खोल कर रख दी है।


मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ गुजरात की सूरत शहर पुलिस ने एक सनसनीखेज मामले में हिंदूवादी नेता और बीजेपी कार्यकर्ता विकास अहीर समेत दो अन्य को एमडी ड्रग बेचने के मामले में अरेस्ट किया है। सोशल मीडिया पर मौजूद प्रोफाइल के अनुसार विकास अहीर हिंदू युवा वाहिनी गुजरात प्रदेश के पूर्व अध्यक्ष हैं। इसके साथ वह बीजेपी युवा मोर्चा से जुड़े हुए हैं। सूरत पुलिस आयुक्त अनुपम सिंह गहलोत ने प्रेस कांफ्रेंस करके शहर में एमडी ड्रग्स की बिक्री के मामले में पुलिस कार्रवाई की जानकारी दी। गहलोत ने कहा कि सूरत में पहले ड्रग्स की खेप मुंबई से आती थी, लेकिन पुलिस की सख्ती के बाद इस धंधे में लिप्त लोगों ने मॉड्स ऑपरेंडी में बदलाव किया है। अब राजस्थान से जरिए सूरत में ड्रग्स की बिक्री कर रहे हैं। पुलिस ने विकास अहीर के विकास के साथ चेतन साहू और अनीश खान पठान को गिरफ्तार किया है। पुलिस के इनके पास से 354 ग्राम एमडी ड्रग्स मिला है।

हिंदूवादी नेता की छवि 


सूरत पुलिस द्वारा ड्रग्स बेचने के मामले में गिरफ़्तार किए गए विकास अहीर ने सोशल मीडिया पर अपनी छवि एक हिंदू वादी नेता की बनाई है। एक्स पर अहीर ने अपने बॉयो में लिखा है कि पूर्व अध्यक्ष हिन्दू युवा वाहिनी गुजरात प्रदेश बताया है। इसके बाद अहीर ने खुद को बीजेपी युवा मोर्चा गुजरात से जुड़ा हुआ बताया है। अहीर ने बॉयो में खुद को आरएसएस को स्वयंसेवक भी बताया है। सूरत शहर पुलिस के अनुसार करीब एक महीने की होमवर्क और निगरानी के बाद तीनों आरोपियों को अरेस्ट किया गया है। पुलिस ने अनुसार पकड़े गए आरोपियों पर पहले भी कुल मामले दर्ज हैं। पुलिस ने अनुसार ड्रग्स राजस्थान के जरिए सूरत में लाया जा रहा था।

आप ने साधा निशाना 

एक तरफ जहां ड्रग्स बेचने के मामले में सूरत पुलिस ने पुलिस ने विकास अहीर और उसके 2 दोस्तों को अरेस्ट किया है तो वहीं दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गोपाल इटालिया ने इस मुद्दे पर बीजेपी पर हमला बोला है। इटालिया ने लिखा है हिंदुत्व के नाम पर 2022 के चुनाव में यही टोली उनके घर पर पहुंची थी।सूरत पुलिस आयुक्त अनुपम सिंह गहलोत ने कहा है कि सामने आया है कि आरोपी आइसक्रीम पॉर्लर की आड़ में एमडी ड्रग्स का धंधा कर रहे थे। ये टू व्हीलर से डिलीवरी भी करते थे। गहलोत ने कहा पिछले कुछ समय में सूरत में ड्रग्स बेचने के 37 मामले में दर्ज किए गए हैं। इनमें कुल 85 आरोपियों को अरेस्ट किया है। गहलोत ने कहा एनडीपीएस एक्ट में अरेस्ट आरोपियों की संपत्ति की जांच भी जा रही है। अवैध और काली कमाई से अर्जित की गई संपत्ति को सील किया जाएगा।

रविवार, 21 जुलाई 2024

गुजरात लॉबी का यह कैसा करतूत

 फिर जुड़‌ने लगा पीएमओ से तार…

गुजरात लॉबी का यह कैसा करतूत


इन दस सालों में का देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित्र शाह ने जो चक्रव्यूह रचा था, क्या उस चक्रव्यूह का खेल खत्म होने लगा है। पूंजी निवेश से लेकर बैंको के कर्जे ‌लेकर भागने का मामला हो या फिर भ्रष्टाचार के बड़े मामले, नीट पेपर लीक घोटाला हो या यूपीएससी का खेल ! आखिर सारे तार पीएमओ से क्यों जुड़ जाते है?

नीट पेपर लीक मामले में जिस तरह से गुजरात का गोधरा चर्चा में है। गोधरा के इस पेपर लीक मामले को लेकर हो रहे रोज खुलासे के बाद अब ट्रेनी आईएएस पूजा खेड्‌कर का मामला सामने आने के बाद एक बार फिर गुजरात लॉबी ही नहीं पीएमओ पर भी उंगली उठने लगी है। और इस विवाद के बीच जिस ताह से यूपीएससी के अध्यक्ष मनोज सोनी का इस्तीफ़ा सामने आया है वह हैरान करने वाला तो है ही बल्कि मोदी सत्ता के उस निर्णय की नीयत पर उंगली उठाता है जिसके तहत दर्जनौ लोगों को प्रोफेशनल नियुप्ति के नाम पर कहीं सचिव बना दिया गया तो कहीं अध्यक्ष या डायरेक्टर ।

यश बॉस के इस दौर में यह जान लेना ज़रूरी है कि आखिर मनोज सोनी के इस्तीफ़े को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,गृह मंत्री अमित शाह क्यों निशाने पर है।

क्या मनोज सोनी का इस्तीफ़ा फर्जी प्रमाणपत्र, सत्ता और विशेषाधिकार का कथित दुरुपयोग के बाद जिस तरह से कई आईपीएस और आईएएस के चयन पर उठ रही उंगली है। लेकिन पहले ये जान ले कि मोदी-शाह क्यों निशाने पर है। गुजरात के रहने वाले मनोज सोनी का अभी पांच साल का कार्यकाल बाकी था। सोनी ने अपने इस्तीफे में व्यक्तिगत कारणों का हवाला दिया है। सोनी का कार्यकाल 2029 में पूरा होना था। मनोज सोनी आयोग में 2017 में बतौर सदस्य नियुक्त हुए थे। उन्होंने 16 मई, 2023 को अध्यक्ष के रूप में शपथ ली। ऐसे में उन्होंने बतौर अध्यक्ष सिर्फ करीब 13 महीने काम किया। मनोज सोनी गुजरात के आणंद जिले से ताल्लुक रखते हैं। उनका परिवार मुंबई से गुजरात शिफ्ट हुआ था। उन्होंने बचपन के दिनों में अगरबत्तियां तक बेंची।

द हिंदू' ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उन्होंने लगभग एक महीने पहले इस्तीफा दे दिया था। सूत्रों के अनुसार वह गुजरात के शक्तिशाली स्वामीनारायण संप्रदाय की एक शाखा अनुपम मिशन को अधिक समय देना चाहते हैं। वह 2020 में दीक्षा प्राप्त करने के बाद मिशन में एक साधु या निष्काम कर्मयोगी बन गए थे। सोनी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करीबी माना जाता है, जिन्होंने उन्हें 2005 में वडोदरा में महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय (MSU) के कुलपति के रूप में चुना था। तब वह 40 वर्ष के थे। जिससे वह देश के सबसे कम उम्र के कुलपति बन गए थे। जून 2017 में यूपीएससी में नियुक्ति से पहले सोनी ने बाबासाहेब अम्बेडकर मुक्त विश्वविद्यालय (बीएओयू) के 1 अगस्त 2009 से 31 जुलाई 2015 तक कुलपति रहे थे। इसके बाद वह अप्रैल 2005 से अप्रैल 2008 तक वडोदरा में स्थित महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी ऑफ बड़ौदा के कुलपति रहे थे। 

 सोनी गुजरात विधानमंडल के एक अधिनियम द्वारा गठित एक अर्ध-न्यायिक निकाय के सदस्य भी रह चुके हैं। मनोज सोनी की गिनती उन लोगों में होती है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विश्वासपात्र माने जाते हैं। पीएम मोदी ने मनोज सोनी के संघर्ष को देखते हुए ही मुख्यमंत्री रहते हुए एमएसयू के वीसी की जिम्मेदारी सौंपी थी। एमएसयू में मनोज सोनी के वीसी रहते हुए कई आंदोलन हुए थे, लेकिन उन्होंने नो कंप्राेमाइज का फॉर्मूला अपनाया था। आर्ट्स फैकल्टी में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों से जुड़े विवाद में वह काफी सुर्खियों में रहे थे। ऐसा कहा जाता है कि इस विवाद के चलते उन्हें एमएसयू में दूसरा कार्यकाल नहीं मिल पाया था, हालांकि मनोज सोनी को बाद में बाबासाहेब अम्बेडकर मुक्त विश्वविद्यालय (बीएओयू) का वीसी बनाया गया था।

तब सवाल यही है कि क्या प्रोफ़ेशनलों की नियुक्ति की वजह क्या है…?


शनिवार, 27 मार्च 2021

किसान आंदोलन से डरने लगी सत्ता

 

किसानों के आंदोलन को तीन माह हो रहे हैं लेकिन पांच राज्यों के चुनाव में फंसी सत्ता को इससे कोई मतलब नहीं है, न ही आम जनमानस ही इस आंदोलन से उद्देलित है, ऐसे में किसान आंदोलन और भी लंबा चले तो किसी को क्या फर्क पड़ेगा लेकिन एक बात जान ले आंदोलन किसी सत्ता का विरोधी नहीं होता, आंदोलन का मतलब सत्ता की मनमानी से मुक्ति का रास्ता है, आखिर नमक आंदोलन छेड़ कर गांधी जी ने क्या किया था, मुठ्ठी भर नमक बिट्रिश सरकार का कुछ नहीं बिगाड़ सकती थी और न ही विदेशी वों की होली जलाने से ही बिट्रिश सत्ता के राजा को ही कोई फर्क पडऩे वाला था लेकिन हिन्दुस्तानियों का दिल जुड़ गया था।

और जब दिल जुड़ता है तो लोग जुड़े है तब मनमानी करने वाली सरकार का सिंहासन डोलने लगता है, वह जनता को एक साथ जुडऩे नहीं देता क्योंकि निरापद सामूहिक कर्म किसी भी आततायी सत्ता को कंधा देता है, उसे तो हिंसा चाहिए ताकि अपनी ताकत का इस्तेमाल कर सके इसलिए जब आंदोलन अहिंसक हो तो वह उसे हिंसक बनाने षडयंत्र रचता है ताकि भला मनुष्य खामोश बैठ जाए और सत्ता अपनी मनमानी करता रहे। अविश्वास भय और अलग-अलग झुंड चाहिए ताकि हर झुंड को वह अपनी ताकत से दबोच ले।

यही वजह है कि वह किसान आंदोलन ही नहीं इससे पहले हुए शाहिन बाग को लेकर भी भय, अफवाह फैलाते रहा, निजीकरण, बेरोजगारी और महंगाई से त्रस्त लोग एक साथ जमा न हो जाए इसलिए वह राष्ट्रवाद और हिन्दूत्व की चासनी में में डूबे रसगुल्ले परोसता है। क्योंकि सत्ता यह बात जानती है कि खुदीराम, आजाद, भगतसिंह से निपटना आसान है लेकिन गांधी से निपटना अब भी कठिन है क्योंकि गांधी का मतलब अहिंसा, सामूहिकता, समर्पण और भय से मुक्ति है।

किसानों के पास क्या है, दुनिया में किसी भी देश के किसानों से कम आय भारतीय किसानों की है जबकि दुनिया के देशों में कृषि उत्पादन के मामले में वह सबसे आगे की दौड़ में है तब किसान आंदोलन से सरकार क्यों डरे, क्योंकि किसानी से होने वाले नुकसान की वजह से हर साल लाखों युवा किसानी छोड़ दूसरे काम कर रहे हैं।

यही वजह है कि किसान आंदोलन को लेकर न सरकार गंभीर है और न ही आम लोग ही इससे जुड़ पा रहे हैं तब मोदी सत्ता की मनमानी के चलते झुंड में बंटे आंदोलनकारी निजीकरण, महंगाई, बेरोजगारी इकट्ठा क्यों नहीं हो पा रहे हैं।

किसानों ने पांच राज्यों के चुनाव में भाजपा के खिलाफ वोट डालने की अपील करते हुए आंदोलन का विस्तार तो कर दिया है तब क्या निजीकरण का खिलाफत करने वालों को भी इन राज्यों के चुनाव में अपनी भूमिका स्पष्ट नहीं करनी चाहिए।

किसानों के भारत बंद को जो लोग असफल बता रहे हैं उन्हें जानना चाहिए कि यदि किसानों का आंदोलन असफल है तो  अहमदाबाद में पत्रकार वार्ता के बीच किसान नेता की गिरफ्तारी पुलिस नहीं करती। सत्ता डरने लगी है यह ईशारा है।

शुक्रवार, 26 मार्च 2021

बोल के लब आजाद है तेरे...

 

यकीन मानिये महाराष्ट्र में जो लेटर बम फटा है, उसका कोई मतलब नहीं है, ये सिर्फ जनता को उसके असली मुद्दों से भटकाने का एक राजनैतिक तरीका है क्योंकि यही भाजपा खुद सत्ता में हो तो ऐसे लेटर का वही हश्र करती है जो आज महाराष्ट्र की सरकार कर रही है। यदि यकीन न हो तो गुजरात के संजीव भट्ट या असम के अखिल गोगई की याद दिला दूं।

संजीव भट्ट गुजरात केडर के अधिकारी ने अपने पत्र में कहा था कि गुजरात दंगे को भड़काने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी जिम्मेदार है लेकिन इसके बाद क्या हुआ, हंगामा मचा और संजीव भट्ट जेल में ढंंूस दिये गये। इस पत्र को लेकर अब शिवसेना हमलावर हो गई है।

असम के अखिल गोगई का पत्र तो और भी विस्फोटक है, जेल में बंद अखिल गोगई को एनआईए दफ्तर में भाजपा ज्वाईन करने, बीस करोड़ रुपये देकर अपना एनजीओ शुरु करने जैसे आरोप है। जेल से लिखे इस पत्र के बाद क्या भाजपा ने कोई कार्रवाई की। यही नहीं उत्तर प्रदेश के आईपीएस अमिताभ ठाकुर को जबरिया सेवानिवृत्त करने जैसे कितने ही आरोप भाजपा की झोली में है। सारदा स्कैम के आरोपी मुकुल राय का भाजपा प्रवेश क्या किसी लेटर बम से कम है।

ऐसे में कल बिहार विधानसभा में हुए शर्मसार कर देने वाली घटना से कौन शर्माये। महाराष्ट्र में ही अपराधियों का राजनैतिक दलों से संबंध किसी से नहीं छिपा है। उद्व ठाकरे मंत्रिमंडल के दो दर्जन सदस्यों पर आपराधिक मामले दर्ज है तो भाजपा के 105 विधायकों में से 60-65 विधायकों पर गंभीर आपराधिक प्रकरण दर्ज है।

हमाम में सभी नंगे है कि तर्ज पर जिस तरह से राजनीति ने आपराधियों को न केवल संरक्षण दिया है बल्कि उसे सत्ता की राह भी दिखाई है। मोदी सरकार के मंत्रिमंडल और सांसदों पर गंभीर अपराध की फेहरिस्त है ऐसे में महाराष्ट्र में लेटर बम को लेकर हंगामा क्या सिर्फ राजनैतिक नौटंकी नहीं है।

राजनैतिक दलों की अपनी सुविधानुसार परिभाषा देने की ललक से जो लोग भ्रमित है उनका क्या कहा जाए। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में संसद में जब कहा था कि वे जनप्रतिनिधियों के अपरधिक मामलों को शीघ्र निपटाने कमेटी बनायेंगे। किसी ने वह कमेटी देखी, या अपराधियों की टिकिट कटते ही देखी क्या? बल्कि दूसरे दलों के अपराधिक आरोप वाले नेताओं को भाजपा में प्रवेश भी मिल गया।

पिछले सात सालों में देश की हालत क्या हो गई है यह किसी से छिपा नहीं है, किसान कितने दिनों से आंदोलित है यह अब खबर ही नहीं बनता, खबर तो निजीकरण से आरक्षित वर्गों को हो रहे नुकसान भी नहीं है। खबत तो वही बनेगा जो सत्ता चाहेगी, इसलिए इन दिनों महाराष्ट्र ही खबर है।