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मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

चमचा गिरी का पुरस्कार



हालांकि छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में चमचागिरी का महत्व तो शुरु से ही रहा है। इस चत्र में दारुखोर से लेकर दलाल तक पत्रकार बन बैठे थे। जिन्होंने कभी एक लाईन खबरें नहीं लिखी हो वे भी संपादक की चमचागिरी करते हुए शहर में रौब जमाने से परहेज नही किया। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष के प्रभाव में चंद साल पहले रायपुर आने वाले एक पत्रकार को जब पिछली बार यह पुरस्कार मिला था तभी से पुरस्कारों को लेकर पत्रकार जगत मे तरह तरह की चर्चा शुरु हो गई थी। और इसका ज्यादा इस बार भी चमचागिरी करने वालों ने ही उठा लिया। विधानसभा में इस बार भी जिद करो दुनिया बदलो के उस पत्रकार को पुरस्कार मिल गया जिसकी ड्यूटी प्रेस की तरफ से नहीं लगाई गई थी । इस प्रेस से प्रथम पाली के राजेश व द्वितीय पाली के गोविंद ताकते ही रह गए। और पुरस्कार कोई और ले उड़ा। दूसरा पुरस्कार जिन्हें मिला वह भी उस संसथान को अलविदा कह दिया था। पुरस्कार किस मंत्री के चमचागिरी की वजह से मिला यह सभी जानते हैं।



प्रियंका के नौकरी छोड़ने का राज

इलेक्ट्रानिक मीडिया में अपने कार्यों से धूम मचाने वाली प्रियंका कौशल को छत्तीसगढ़ छोड़ना पड़ा। सीधे लकीर देखने वाले तो यही समझ रहे हैं कि शादी ही प्रमुख वजह रही है। अपनी भाषा शैली और कार्यों से पत्रकारिता में स्थापित हुई इस युवती की चले जाने की वजह क्या सिर्फ शादी है या मैंनेजमैंट की नादिरशाही? सवाल सभी का है और जवाब सिर्फ प्रियंका दे सकती है। लेकिन वह भी चुपके से खिसक गई। आखिर छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में अपने तेज तर्रार शैली व काम से अपनी पहचान बनाने वाली प्रियंका को क्यों जाना पड़ा। चमचागिरी के बल पर काम नहीं करने वाले की जगह हमेशा सुरक्षित रहती है और काम करने वाले हमेशा ही प्रताड़ित रहते हैं।

मीडिया में बढ़ते इस खेल से लोग हतप्रभ भी है।



सोनी-पारे में भिडंत

इन दिनों राजधानी में दो पत्रकार प्रफुल्ल पारे और राजकुमार सोनी के बीच की लड़ाई पुलिस तक पहुंच गई है। दोनों की लड़ाई की वजह सिर्फ ब्लॉग में की गई टिपण्णी होगी कहना कठिन है। प्रफुल्ल पारे को भोपाल से आया बता देना या राजकुमार सोनी को भिलाई छाप कह देने से बात नहीं बढ़ सकती। वैसे भी इस शहर के पत्रकारों के लिए न तो प्रफुल्ल पारे ही अनजान है और न ही राजकुमार सोनी। दोनों ही पत्रकारों की अधिकारियों से मधूर संबंध है और वे जाने भी इसलिए जाते हैं।

राजकुमार सोनी ने अपने खिलाफ रिपोर्ट लिखे जाने को षडयंत्र बताया है। यह सच भी हो सकता है क्योंकि हाल ही में उन्होंने एडीजी रामनिवास के खिलाफ यादव ब्रिगेड वाली खबर छापा था। तभी से यह चर्चा रही है कि राजकुमार सोनी से रामनिवास जी नाराज हैं। यह भी कितना सच है या सिर्फ शिगूफा ?

इधर पुलिस के द्वारा जुर्म दर्ज किये जाने को लेकर बिरादरी में नाराजगी है। पहले डीएसपी स्तर के अधिकारी जांच करे तब ही जुर्म दर्जं किया जाना चाहिए। और यह पत्रकारों को भी सोचना होगा कि उनकी कमजोरी का फायदा उठाने में प्रशासन देर नहीं करती।



प्रेस क्लब अध्यक्ष की परेशानी

लगभग पांच से प्रेस क्लब का अध्यक्ष पद संभालने वाले अनिल पुसदकर इन दिनों वसूली बाज पत्रकारों से परेशान है। दामू काड के बाद से प्रेस क्लब मे ऐसे पत्रकारों की शिकायतें कुछ ज्यादा ही आने लगी है। ज्यादातर इलेक्ट्रानिक मीडिया से है। आईडी लेकर धौंस जमाने वाले वसूली के लिए घुम रहे हैं और परेशान लोग अध्यक्ष को फोन कर देते हैं। पांच साल में नाम तो होना ही है और नाम वाले को ही तो लोग फोन करेंगे।



धमकाने वाले अब भी फरार

पत्रकाररिता में अपनी कलम के लिए पहचाने जाने वाले आसिफ इकबाल को धमकाने वाले अब भी पुलिस पकड़ से बाहर है। अब तो पुलिस पर संदेह होने लगा है कि वह जानबुझकर अपराधीयों को नहीं पकड़ रही हैं आखिर पत्रकारों से दुखी भी सबसे ज्यादा पुलिस वाले ही होते हैं और पत्रकार संगठन भी इस मामले में कुछ नहीं बोल रहा है और पत्रकाररिता का दम भाने वाले पत्रकार भी फालो अप नहीं कर रहे हैं। अब क्या कहा जाये।


और अंत में...

पत्रकारिता में चमचागिरी अब संपादको तक ही नही रह गया है संपादक भी मंत्री के चमचे कहलाने लगे हैं। प्रतिष्ठित अखबार के रंगा-बिल्ला की चमचागिरी से नेताओं के चमचों को भी शर्म आने लगी है।

रविवार, 3 अप्रैल 2011

हम तो सरे राह लिये बैठे हैं चिंगारी,जिसका जी चाहे चिरागों को जला ले जाए...





पता नहीं छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता का कैसा दौर चल रहा है। अखबार मालिक तो सरकारी विज्ञापनों की लालच में फंसे हैं। पत्रकारिता से उनका कोई सरोकार नहीं रह गया है। दमदार पत्रकारों को अपने मतलब के लिए रखते हैं और युज एंड थ्रो की नीति बना रखे हैं।

विज्ञापन की बाढ़ ने अखबारों की बाढ़ ला दी है।राजधानी में पत्रकार कहलाने वालों कि संख्या में बेतहाशा इजाफा हुआ है और इसके साथ ही वसूली बाजों कि भी भरमार हो गई है। भ्रष्ट अधिकारी व मंत्री बेहिसाब भ्रष्टाचार कर पैसे बांट रहे हैं और वसूली बाजों की निकल पड़ी है।

यही वजह है कि अखबारों की बाढ़ तो आई ही है। इलेक्ट्रानिक मीडिया का आई डी लेकर घुमने वालों की संख्या भी बढ़ गई है।

वसूली बाजों की हिम्मत इतनी बढ़ गई है कि वे अपने मतलब के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं।

उनकी हिम्मत का इससे बड़ा उदाहरन और क्या होगा कि पिछले दिनों कुछ वसूली बाज वरिष्ठ पत्रकार आसिफ इकबाल के घर पहुंच गये और अपने साथ एक वर्दी वाले को भी ले जाकर तीन लाख रुपये की मांग कर बैठे।

आसिफ इकबाल जैसे वरिष्ठ पत्रकार जिन्होंने अपने जीवन में पत्रकारिता का नया आयाम रचा हो। शासन-प्रशासन में जिनकी तूती बोलती हो जिनके सामने आज भी हमारे जैसे जूनियर पत्रकार बैठेने की हिमाकत न कर सके। ऐसे पत्रकार से वसूली के लिए पहुंचना कई सवाल खड़े करता है।

आसिफ इकबाल पत्रकारिता जगत का ऐसा नाम है जिनके तेवर से 6 साल पहले तक के पत्रकार अच्छी तरह जानते हैं। उनके जैसे पत्रकारों की लेखनी और सोच की वजह से ही छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता का पूरा देश में नाम रहा है। अच्छे-अच्छे अखबार मालिक तक उनकी खुशामद करते रहे हैं और इस शहर में पदस्थ अधिकारी हो या नेता,उद्योगपति हो या समाजसेवी सभी उनके कम के कायल रहे हैं।

लेकिन इस घटना ने पत्रकारिता के वर्तमान स्थिति को रेखांकित कर दिया है। और यही हाल रहा तो ईमानदार पत्रकारों को अधिकारी या गलत काम करने वाले धमकाने लगेंगे और भ्रष्ट अधिकारियों के संरक्षन में वसूली बाज मजा करते रहेंगे।



और अंत में ...

राजधानी में पत्रकारों की बढ़ती मांग के बावजूद नेशनल लुक के बंद हो जाने के बाद भी कुछ पत्रकार काम पर नहीं लग पा रहे हैं। वजह को लेकर चर्चा सुननी हो तो ‘ प्रेस क्लब अच्छा स्थान है।

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

पत्रकारिता का नया अनुभव

 वैसे तो आदमी जीवन भर कुछ न कुछ सीखते रहता है। पत्रकारिता  में भी यही सब होता है। रोज नए तरह की  खबरों को  नए तरह से शब्दों  में पिरोना और कुछ न कुछ सीखना लगा रहता है।

वैसे मैंने पत्रकारिता को कभी भी जीविकोपार्जन का  साधन नहीं माना और न ही खबरों को  रोकने की  ही कोशिश  की  लेकिन शायद अब पत्रकारिता का  ढंग बदल चुका  है। यही वजह है की कभी भी दिक्कते  भी आ जाती है यह उन सभी लोगों के  साथ आती है जो पत्रकारिता को  दिल से लगाकर चलते हैं।

ताजा मामला रामकृष्ण  के  भरोसे केयर करने वाले इस अस्पताल का  है जहां विज्ञापन देने के  नाम पर बुलाया जाता है। जहां पहुंचने पर विज्ञापन की  वजाय इस अस्पताल के खिलाफ  छपने वाली खबरों पर इस तरह चर्चा की  जाती है जैसे खबर ही गलत हो। डा€टर की  बजाय उनकी  पत्नी का  व्यवहार अपमानजनक  तो था ही उनकी  भाव भंगिमा भी अपमानजनक  रही। रोकर अपनी बातें रखी गई इस दौरान वहां मौजूद एक  बुजुर्ग द्वारा मानहानि की  धमकी  भी दी गई।

वैसे तो मुझे मुंह फट कहा  जाता है लेकिन  एक  महिला को  रोते हुए चिल्लाना और अपनी मेहनत का  बखान करना सचमुच मुझेस्तब्ध कर  देने वाला था। कभी नहीं डरने का  दावा करने वाला मैं इस अचानक  आये परिस्थिति से डर भी गया। पूरी घटना  के  दौरान ठाकुरराम साहू जेसे वरिष्ठ पत्रकार  भी साथ में थे।

महिला का  विलाप और एक  तरह से दुव्र्यवहार व धमकी  ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया की मुझसे गलती कहां हो गई। विज्ञापन के  बहाने बुलाकर इस तरह का  दुव्र्यवहार कीतना उचित था यह तो पाठक  ही तय  रेंगे।

जबकी - खबर गलत थी तो वे सीधे मुझसे शलीन शब्दों  में बात कर सकते थे या मानहानि का दावा भी ठोंक सकते  थे।

मैंने उस महिला को  यह भी समझाने की  कोशिश की  मैं गलत नहीं हूँ मेरे पास जो सबूत थे और मृतक के  पिता का  कथन इलाज में खर्च की  गई और आपके  द्वारा लौटाई गई राशि ही खबर का  प्रमुख  आधार है पर वह तो सुनने को  तैयार ही नहीं थी।

इस घटना के   बाद डा€टर साहब आए। स्वभावतः वे शांत स्वभाव के  है और उनमें  शालीनता भी है उद्बहोंने अपना पक्ष रखते हुए कहा की  खबर छपने से पहले बात कर लेनी थी इस खबर से मेरे अस्पताल का  प्रचार ही हुआ है और मैं चेक  से पेमेंट करके फंसता थोड़ी न। लेकिन  संजीवनी योजना से  दो लाख 45 हजार मिले यदि नहीं मिले तो इतनी राशि क्यों  दी गई और मृतक के  पिता का कथन ऐसा क्यों  है, का  कोई जवाब नहीं रहा।

पत्रकारिता करते  इतने वर्षों में मेरा यह पहला अनुभव था। अपनी तरह का  अनोखा क्योकि  मुझ पर इस दौरान कई तरह के  आरोप भी लगाये गए  जबकि  मैं खबरें लिखता हूँ। सबूतों के  आधार पर। यदि मैं नहीं लिखता तो अखबार मालिक - दूसरों से लिखवा सकता हैं यह बात भी मैने समझाने --की --ोशिश की  पर वे सुनने -को  तैयार नहीं थे।

इस घटना  से मैं बेहद उद्देलित रहा और सोचने लगा की  सभी सबूतों के  बाद भी -कितना जरूरी है सभी पक्षों से चर्चा करना? मेरी गलती कहां थी? और €या विज्ञापन  का  मतलब खबरों से समझौता करना है।

सवाल का  जवाब ढूंढ रहा हूँ उम्मीद  है आप भी सुझाव देंगे।

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

बाजारवाद से मंडी बनता मीडिया

क  2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में जिस तरह से मीडिया जगत पर कालिख पुती है वह मालिकों के लिए नया सबक हो लेकिन पत्रकारों के लिए किसी शर्मिन्दगी से कम नहीं है। विज्ञापन के नाम पर खबरें बेचे जाने की सोच ने इस चौथे स्तंभ पर बाजारवाद के बढ़ते प्रभाव को खतरनाक स्थिति पर लाने लगा है। खासकर अब तक अछूते रहे प्रिंट मीडिया पर जिस तरह से बाजारवाद हावी होने लगा है वह पत्रकारिता गरिमा को खंडित करने वाला है। कभी अखबार निकालना एक मिशन हुआ करता था लेकिन मालिकों के पैसे की भूख ने मीडिया को मंडी और रंडी तक कहने मजबूर कर दिया है। क्या मीडिया सिर्फ अपने ग्राहकों के लिए है जो मोटी रकम दी जाती है।
इस सवाल को यदि नहीं रोका गया तो आने वाले दिनों में उनकी गिनती भी नेता और अधिकारियों के साथ होने लगेगी। यह सच है कि इस अर्थ युग में हर संस्थानों का क्षरण हुआ है लेकिन आज भी लोगों का विश्वास अखबार जगत के प्रति बना हुआ है। आज भी लोग व्यवस्था बनाए रखने में अखबार की भूमिका पर विश्वास करते हैं लोग नेता अधिकारियों के निरंकुशता के खिलाफ अखबार को ही प्रमुख हथियार मान कर अपनी बात कहने में संकोच नहीं करते हैं। लेकिन जिस तरह से 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में भास्कर ग्रुप का नाम सामने आया है वह दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं शर्मनाक भी है। इसे यहीं रोक देना चाहिए अन्यथा पत्रकारों के पास कुछ भी नहीं बचेगा। सिर्फ नौकरी और जीवन चलाने की मंशा रखने वालों के लिए किसी को कुछ नहीं कहना है लेकिन जो लोग सामाजिक जिम्मेदारी के तहत इस मिशन से जुड़े हैं वे जरुर सोचे कि वे किस तरह से किनके लिए काम कर रहे हैं।
भटनागर की माया
वैसे तो छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद आए दिन नए-नए अखबारों का प्रकाशन होने लगा है कभी अजीत जोगी के खास रहे अशोक भटनागर ने भी लोकमाया के नाम से दैनिक अखबार शुरु कर दिया है। कभी मीडियेटर के रुप में ख्याति प्राप्त अशोक भटनागर को पत्रकार नहीं मिल रहा है तो इसकी वजह उनकी अपनी ईमेज ही है।
रोजी रोटी जरूरी है...
इन दिनों राजधानी के ख्यातिनाम पत्रकार से लेकर फोटोग्राफर एक मंत्री की सेवा बजा रहे हैं। इस दौड़ में सबसे अच्छी बात यह है कि खबरों को लेकर मन मारना नहीं पड़ेगा और वेतन तो अच्छा खासा है ही साथ ही मंत्री जी के साथ रहने से खाने पीने की भी दिक्कत नहीं होगी।
रे की छुट्टी
अंग्रेजी पत्रिका सम-अप से पत्रकारिता करने की सोचने वाले आईएएस अधिकारी बी.के.एस. रे की छुट्टी हो गई है। कहा जाता है कि मंत्रालय में बैठे अफसरों के पंगे से त्रस्त कटारिया को यह फैसला करना पड़ा।
और अंत में...
आज की जनधारा के बिकने की खबर इतनी बार उड़ चुकी है कि अब इस खबर पर कोई ध्यान नहीं देता।

बुधवार, 15 दिसंबर 2010

मिला मौका, मारा चौका

 छत्तीसगढ़ के अखबारों में इन दिनों जबरदस्त प्रतिस्पर्धा चल रही है। एक दूसरे से आगे नि·लने की होड़ के बीच दैनिक भास्कर और पत्रिका में जंग छिड़ चुका है। कौन आगे है यह आम जनता समझ भी रही है लेकिन एक दूसरे के खिलाफ कोई मौका नहीं छोडऩे की हठ ने पाठकों को नई खुशी दी है। दैनिक भास्कर का नाम 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में आते ही पत्रिका की बांहे खिल गई उसने भी मसालेदार खबर तैयार की और दैनिक भास्कर ग्रुप और रमेश अग्रवाल के इस तरह से कपड़े उतारे मानों वे दूध के धूले हो। पत्रिका किस तरह से दूध का धूला है यह तो वही जाने लेकिन भास्कर फिलहाल चुप है। तूफान के पूर्व की शांति।
विज्ञापन और आत्मा
पिछले दिनों कलकत्ता से आए कुछ लोगों ने प्रेस क्लब में संगोष्ठि रखी कि मीडिया ने विज्ञापन के लिए अपनी आत्मा बेच दी है। आयोजकों को उम्मीद थी कि इस बहस का असर होगा लेकिन यहां के संपादक कम खाटी नहीं है वे यह साबित करने में लगे रहे कि विज्ञापन का दबाव होता जरूर है पर इतना नहीं कि आत्मा बिक जाए।
रंगा-बिल्ला की करतूत
कहते हैं शहर का सर्वाधिक प्रसारित इस अखबर में जब से बिहारी बाबूओं ने डेरा जमाया है तब से ठेके में चले जाने की चर्चा आम हो गई है अब तो इस अखबार के रिपोर्टर तक हैरान है कि सरकार तो छोडि़ए पैसे वाले कांग्रेसियों के खिलाफ भी खबर नहीं छापी जा रही है सीधे सौदा किए जा रहे हैं।
असहायों से भी कमाई
कभी आयुर्वेद का प्रचार करते करते अखबार लाईन में आए इस मैनेजमेंट वाले का कोई जवाब नहीं है। सारा संसार अखबार में आते ही बड़े बड़ों से सेटिंग की और जब लगा कि मालिक निकालने वाले है तो अपनी दुनिया बसा ली। यहां भी वे अपनी हर·त से बाज नहीं आ रहे हैं कहते हैं अखबार का प्रभाव दिखा·र वह असहायों से कमाई की आकांक्षा पाले हुए है और इसके लिए अपनी पत्नी को हथियार बना रहे हैं।
पुसदकर का स्वदेश प्रेम
प्रेस क्लब के अध्यक्ष अनिल पुसदvर ने स्वदेश ज्वाईन कर लिया है। संपादक बन गए है और समय भी देने की कोशिश में है पर कितना दिन। आखिर वहां भी तो एत से एत बरकर है।
और अंत में...
लोग जबरदस्ती जोसेफ जी का उदाहरण देते है अब पाण्डे जी भी आ गए हैं संदर्भ ग्रंथ लेकर।

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

सजा के jishm न बेचें तो और क्या बेंचे,गरीब लोग हैं घर में दुकान रखते हैं

छत्तीसगढ rajya  बनने के बाद अखबारों की बाढ़ सी आ गई है। कई पत्रकार नौकरी करने की बजाय अपना अखबार निकाल रहे हैं तो राय सरकार की विज्ञापन नीति से प्रभावित होकर बड़े ग्रुप भी कूद गए हैं। अखबार क्या अच्छा खासा मनोरंजन का साधन बन गया है। खबरों के नाम पर सूचना या फिर ओब्लाईजेशन का नजारा ही अधिक दिखाई देने लगा है। सारे बड़े अखबार पेज मेकर के हवाले हैं। खबरें कैसे बननी है इसकी बजाय अखबार कैसे सजाए जाएं इस पर यादा ध्यान हैं। विज्ञापन बटोरने के अलावा लोग बनाने की तमन्ना भी यादा दिखलाई पड़ रहा है। ऐसे में पत्रकार से अखबार मालिक बने लोगों की अपनी पीड़ा है अच्छी खबरों के बाद भी पढ़ने वालों की कमी से जूझ रहे अखबार भी अब साज-साा पर जोर देने लगे हैं।
पिछला सप्ताह यानी काला सप्ताह
पिछले सप्ताह पुलिस ने दो पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई की। दामू आम्बेडारे तो दामू बदनाम हुआ डार्लिंग तेरे लिए का गाना गाते घूम रहा है। बमुश्किल से जमानत मिलने के बाद प्रेस क्लब से निलंबित भी किए गए। 15 दिन के भीतर जवाब सही मिला तो ठीक वरना। दूसरा मामला धोखाधड़ी का है। हैलो रायपुर निकाल रहा मधुर को जमीन का कारोबार रास नहीं आया लोग दूसरा काम छोड़ अखबार निकाल रहे है और ये अखबार से दूसरे काम की ओर जा रहा है तो फंसना तो है ही।
छत्तीसगढ़ अब सुबह की ओर...
एक कहावत है कि सुबह का भूला शाम को घर लौट आए तो इसे भूला नहीं कहते। सांध्य दैनिक छत्तीसगढ़ निकाल रहे सुनील कुमार अब सुबह का अखबार निकालने की कोशिश में है। इसे देर आए दुरुस्त आए भी कहा जा सकता है। अखबार भी अच्छा निकालों और दो घंटे में पढ़ाओं। यह अकल तो पहले आनी चाहिए थी। पर हाइवे का भूत अब जाकर उतरा है।
भास्कर की छटपटाहट
मीडिया जगत के इस नए छत्रप की दिक्कते बढ ग़ई है। अपनी जमीन में बनी बिल्डिंग को तोड़कर 14 मंडिला बनाने की कवायद में किराए के भवन में जाना पड़ा तो नेशनल लुक भी वहीं पहुंच गया और अब पत्रिका दुश्मन बन गया है। ऐसे में विज्ञापन दर कम करने की मजबूरी के बाद भी सर्कुलेशन कम होने लगे तो छटपटाहट स्वाभाविक है।
प्रेस क्लब का चुनाव जनवरी में
प्रेस क्लब का चुनाव जनवरी के प्रथम सप्ताह में कराए जाने की सुगबुगाहट शुरु हो गई है। इसके पहले मतदाता सूची और आडिट रिपोर्ट का काम चल रहा है। दावेदार भी अभी से गुणा-भाग करने लगे हैं।
और अंत में...
राजधानी की चिंता के साथ छत्तीसगढ़ में कदम रखने वाले पत्रिका का तेवर कहां है? यह सवाल करने वाले अब इसे उसके दुश्मन भास्कर से ही तुलना करने लगे है ''अरे यह तो दूसरा भास्कर है।''

शनिवार, 20 नवंबर 2010

बात जब निकली है तो दूर तलक जायेगी!

पत्रिका का आना खबर प्रेमियों के लिए शुभ साबित हो रहा है तो नेताओं और अधिकारियों की बेचैनी बढ़ गई है। यह बात अलग है कि बेशर्मी इतनी ज्यादा  है कि कार्रवाी नहीं हो रही है लेकिन सिर्फ कार्रवाई नहीं होने के नाम पर खबर तो नहीं रोकी जा सकती।
लगातार भ्रष्ट आचरण की खबरों से सरकार और उसमें बैठे अधिकारी परेशान है। लेकिन बचने के रास्ते निकाल लिए जा रहे हैं और जिम्मेदारी से मुकरा जा रहा है।
छत्तीसगढ़ के मीडिया के इस तेवर से हैरानी भले ही न हो लेकिन अचानक चले इस बयार से राज्य  बनने के पहले की प्रतिष्ठा को लौटा दी है। उन लोगों के मुंह में भी तमाचा जड़ गया है जो लोग मीडिया को सेटर और बिक जाने का दावा करते थे। अब तो सिर्फ सरकारी बेशर्मी की चर्चा ही अधिक हो रही है।
मृत देश की चर्चा
छत्तीसगढ़ से एक बड़े कांग्रेसी नेता के भाई के अखबार ने अपने शिक्षण संस्थान में गबन पर खूब हल्ला मचाया। हालाकि गबन का आरोपी धरा गया और उसे जेल भिजवा कर ही दम लिया गया लेकिन आम लोगों की चर्चा का क्या वे तो बोल ही रहे कि दो-ढाई लाख के गबन पर इतना हाय तौबा मचाने वाले जब ग्रामोद्योग में करोड़ों का गबन करते हैं तब दूसरे लोगों को भी हल्ला मचाना चाहिए।
बेचारा दामू
प्रेस क्लब के इस स.सचिव दामू आम्बेडोर को कानूनी दांव पेंच की वजह से अंदर होना पड़ा। दरअसल प्रेम प्यार के फेर में फंसे इस पत्रकार को फंसा दिया गया और उसके सहयोगी पदाधिकारियों ने भी पल्ला झाड़ लिया। सब कुछ शांति से निपटने से पुलिस भी राहत में है क्योंकि मामला ही ऐसा था कि किसी की कुछ बोलने की हिम्मत  ही नहीं हुई।
बौना बंधु फुर्र हुए
प्रेस क्लब में पिछले दिनों बौना बंधुओं ने कांफ्रेंस रखी। उनकी अपनी पीड़ा है लेकिन संयोग से पत्रिका मे भी एक फोटोग्राफर बौना बंधु है। संगठन से जुड़ने इस बंधु को जब साथी फोटोग्राफरों ने दबाव डाला तो वह भाग लिया। ग्रुप फोटो के दौरान हीरा की खोज खबर होते रही।
और अंत में ...
राज्य  बनने के बाद छत्तीसगढ़ के प्रिंट मीडिया में हरियाली है। वेतन के लिए दिन नहीं गिनने पड़ते लेकिन डीडी न्यूज में काम करने वाले परेशान है। 12 लाख आने की खबर की खुशी भी इंतजार में खत्म होने लगी है।

गुरुवार, 18 नवंबर 2010

पत्रकारों के फायदे, फोटोग्राफरों का दुख

वैसे तो दीपावली अखबार वालों के लिए कमाई का एक बड़ा जरिया है। भरपूर विज्ञापन बटोरने और खबरों को किनारे करने की होड़ में सर्वाधिक फायदा पत्रकारों को ही मिलता है। खबरें भी कम लिखों और गिफ्ट लिफाफा जमकर बटोरो। इस मामले में रायपुर मीडिया वैसे तो दूर रहा है लेकिन इस बार इस लिफाफा से वह भी नहीं बचा है। ईमानदारी का लबादा ओढऩे वाले बड़े अखबारों के पत्रकार भी लिफाफा बटोरने की आपा-धापी में शामिल हो गए।
खनिज, आबकारी, फुड के अलावा मंत्रियों के बंगलों में भी पत्रकारों की आमद रही। औकात के हिसाब से लिफाफा दिया गया और दीपावली धूमधाम से मनाई गई। समाचार से जुड़़े फोटोग्राफरों को इस बार भी लालीपाप ही मिला। कुछ एक फोटोग्राफरों ने अपने बैनरों का उपयोग कर लिफाफा जरूर बटेारा पर अधिकांश फोटोग्राफरों को लिफाफा नहीं मिल पाने की पीड़ा उनके चेहरे पर पढ़ी जा सकती थी। एक फोटोग्राफर तो चर्चा के दौरान फट पड़ा। कहा- फोटो खिंचाने के चक्कर में आगे-आगे रहने वाले सब नेता गायब हो गए हैं। दीपावली गुजरने दो तब मजा चखाएंगे। अब फोटोग्राफरों को कौन समझाए कि अब भी रिपोर्टर ही तय करता है कि कौन सी फोटो जानी है और यह बात नेता लोग समझ गए हैं इसलिए लिफाफा बचाने गायब हो गए हैं। कई रिपोर्टर इस मामले में खुशनसीब रहे कि उन्हें दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़े। बल्कि लिफाफा देने वाले अखबार के दफ्तर ही पहुंच रहे थे।
मुकेश की पीड़ा
कहते है भले लोगों के साथ कई बार अच्छा नहीं होता और इलेक्ट्रानिक मीडिया के इस मुकेश वर्मा के साथ इन दिनों जो कुछ हो रहा है वह ठीक कतई नहीं है। आए दिन नौकरी से अंदर-बाहर के फेर में परेशानी तो बढ़ ही जाती है वह तो वीआईपी रोड के होटल वालों की भलमनसाहत है जो मुकेश के हुनर को समझकर अपने यहां आयोजित कार्यक्रमों के लिए मौका दे देते हैं वरना दिक्कत जो हो रही थी उसे मीडिया वाले समझने तैयार नहीं है।
अमृत संदेश का नया गणित...
कहते हैं कभी-कभी पैसा सर चढक़र बोलता है। राज्य निर्माण के बाद अमृत संदेश की स्थिति में भी सुधार हुआ है। कांग्रेस की राजनीति के बाद भी भाजपा सरकार से सेटिंग ने विज्ञापन खूब कमाए हैं। भले ही यहां पत्रकार नहीं ठहरते हो लेकिन तामझाम में कोई कमी नहीं होने दी जाएगी। इसी कड़ी में अब गिनती के लोग बच गए हैं और उन्हें भी कैमरे की नजर पर रखा गया है। अब बचे खुचों को बचाने की कवायद है या आक्रोश रोकने की कोशिश यह तो वे ही जाने।
और अंत में...
पूरे शहर की आवाज उठाने का ठेका लेने वाले नए नवेले अखबार के एक रिपोर्टर को वन मंत्री के यहां से जब खाली लौटना पड़ा तो वह साथी पर ही गुस्सा उतारने लगा। कहा मिला कुछ नहीं और तेरे चक्कर में बदनामी अलग हो गई।

बुधवार, 10 नवंबर 2010

अंधा पीसे, कुत्ता खाय...

यह तो अंधा पीसे कत्ता खाय की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना स्वयं को स्थापित और बड़ा अखबार बनने की जिद में पत्रकारिता की दिनाें दिन यह दुर्गति नहीं होती। पिछले कुछ सालों से राजधानी के पत्रकारों में ही नहीं पत्रकारिता में भी बदलाव की बयार चली है। खरबों को तोड़ मरोड़ कर सनसनी फैलाने की नई परम्परा के साथ-साथ संबंधों को यादा अहमियत दी गई। अखबारों से पाठकों के साथ संबंधाें को अहमियत दी जाती है तो सवाल कभी नहीं उठते लेकिन अहमियत दी गई अफसरों और नेताओं से संबंध स्थापित करने की। इसके चलते पत्रकारों की सोच में तो अदलाव आया ही पत्रकारिता की दुर्गति भी हुई। खासकर एम्सवन्लूजिव्ह और खोजी पत्रकारिता को तो बड़ा झटका लगा है। खबरों की तह तक जाने की परम्परा का भी अनादर हुआ। इससे अखबार मालिक और पत्रकार दोनों खुश है लेकिन पाठकों का एक वर्ग जो व्यवस्था की चोर से पीड़ित है उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ा है। अब तो अखबारों में सामाजिक और सरकारी खबरें ही यादा दिखाई देती है। अपराधिक खबरों में भी वही खबर छपती है जो पुलिस बना देती है। मेरा दावा है कि राजधानी के अखबारों में काम करने वाले क्राईम रिपोर्टरों में आधे रिपोर्टर ऐसे होंगे जो राजधानी के 23 थानों और चौकियों को महिनों से नहीं देखे होंगे। ऐसे में उन थानों या चौकियों में हो रही अच्छी या बुरी कार्रवाई की खबरें कैसे छपती होगी अंदाज लगाया जा सकता है। संपादकों का क्या? अब तो रोज संपादकीय लिखना भी जरूरी नहीं है। ग्रुप के अखबारों में काम करने वाले संपादकों को कलम चलाने की बंदिशे भी कम नहीं होती। उनकों जवाबदारी तो प्रतिध्दंदी अखबाराें से तुलना करने और छुटी खबरों के बारें में पूछताछ में ही गुजर जाती है। इस सबके बाद यदि समय बचा तो अधिकारियों और नेताओं से अखबार हित में संबंध बनाने में चला जाता है। पत्रकारिता के इस स्तर तक पहुंचने में अखबार मालिकों का खैया तो जिम्मेदार रहा ही है। स्वयं पत्रकारों का खैया भी कम जिम्मेदार नहीं है। कुछ साल पहले की बात है शहर के एक नामी गिरामी अखबार के एक रिपोर्टर ने जब आलीशान बंगला तैयार किया तो अन्य रिपोर्टर उन्हें खुब गाली देते थे लेकिन अब न तो पत्रकारिता की ऊचाई की बात होती है और न ही किसी का बंगले पर ही चर्चा होती है। जब तनख्वाह कम थी तब पत्रकारों में दुनिया बदलने का हौसला होता था लेकिन अब जब सुविधाएं बड़ गई है तो सुविधाएं बढ़ाने की जिद भी बढ़ी है। सुविधाएं छिन जाने का डर उन्हें बेहतर पत्रकारिता या खबरों से दूर रखता है। वे सोचते हैं खबरें छपने पर क्या होगा। अल्टा वे दुश्मन बन जायेंगे और इससे मिलने वाली सुविधाएं से वंचित होंगे। और फिर इस खबर के नहीं छपने से क्या होगा? बस इसी सोच के चलते ही हौज में दूध नहीं भर पाया था सभी शिष्यों ने अंधेरे का फायदा उठाकर गुरू के निर्देश की अवहेलना कर हौज को दूध की जगह पानी से भर दिया था। पत्रकारिता में भी सुविधाएं छिनने का डर कलम पर जंजीरे कसने लगी है।
और अंत में
अवैध प्लाटिंग की लगातार छप रही खबरों से दुखी एक बिल्डर ने सरकार के इस खैये का जब विरोध किया तो एक अखबार सारा संसार के रिपोर्टर ने उसे सलाह दी इस विरोध का कोई मतलब नहीं है विरोध करना है तो अखबारों के अवैध और मंत्री को दमदारी दिखाने ज्ञापन सौंपो तो कुछ हल निकल आयेगा।

बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

ये कौन सी लड़ाई है अखबारों की...

पिछले हफ्ते फिर पत्रिका के कर्मचारियों ने भास्कर की गाड़ी को चोरी का बंडल ले जाते पकड़ा। प्रशासन हैरान है पर कार्रवाई नहीं कर रहा है। आखिर भास्कर का अपना रुतबा है। वह कानून तोड़े तब भी सरकार में हिम्मत नहीं है कि वह कुछ कर सके। दूसरा कोई होता तो दफा 279 लगाकर अंदर कर दिया जाता और पत्रिका जैसे दमदार होता तो लूट की धाराएं भी लग जाती। लेकिन मामला भास्कर का है इसलिए पुलिस भी चुप है। लड़े-मरे क्या करना है। मर्डर-वर्डर हो तब कार्रवाई होगी। मारपीट तो हो ही चुकी है। वैसे भास्कर पर यह आरोप नया नहीं है। पहले उसकी लड़ाई नवभारत और देशबंधु से हो चुकी है। नवभारत का तो वह कुछ नहीं बिगाड़ पाया लेकिन बेचारा देशबंधु घुन की तरह पीस गया।
वैसे भास्कर पर एक और आरोप लगे हैं छत्तीसगढ़ के पत्रकारों की छुट्टी कटौती का। होली तक में भास्कर निकल चुका है। इसके अलावा पत्रकारिता को कलंकित करने का आरोप भी कम नहीं है। दो-पांच सौ में पत्रकार मिलते हैं यह जुमला भी काफी चर्चा में रहा है। कहते हैं भास्कर के आने के पहले छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता के स्तर को लेकर कसमें खाई जाती थी लेकिन उसके आने के बाद जिस तरह से परिवर्तन आया है वह किसी से छिपा नहीं है। अब तो खबरें भी कालम सेमी में बिकने लगी है।
जब रिपोर्टर को जीआरपी
में बैठना पड़ा...
नया अखबार आया है तो कुछ नए लोग भी पत्रकार बन गए है। ऐसा ही एक पत्रिका का राहुल जैन है। पिछले हफ्ते वह रिपोर्टिंग के लिए रेलवे स्टेशन पहुंचा तो जीआरपी वाले उन्हें पकड़ कर थाने ले आए। वह चिखता रहा कि वह पत्रकार है लेकिन साहब के आने तक बिठा दिया गया। कुछ बड़े पत्रकारों के हस्तक्षेप के बाद ही उसे जाने दिया गया।
जीम का असर
पिछले हफ्ते मेकाहारा के गार्ड ने पत्रिका के फोटोग्राफर से उलझने की गुस्ताखी की और वह पिटा गया। वैसे हीरा को देखकर कोई नहीं कहेगा की वह पिटाई कर सकता है वह पिटा भी नहीं। हीरा के साथ हुई घटना का दूसरे को पता चला तो अन्य फोटोग्राफर पहुंचकर यह कारनामा कर गए। अब प्रेस क्लब में जिम खुल गया है। पत्रकार अब माफी नहीं मंगवाते तुरंत हिसाब करते हैं। सावधान...।
और अंत में...
जनसंपर्क अधिकारी स्वराज दास की मनमानी की चिट्ठी अखबार में क्या छपी। हालत खराब हो गई। आनन-फानन में फोटोग्राफरों की नियुक्ति का फरमान जारी हो गया। लेकिन आदत से मजबूर मनमानी अब भी जारी है। चुन-चुन कर चहेतों को ही कॉल लेटर भेजा गया। प्रतिभाशाली फोटोग्रॉफर अपनी डिग्री को कोस रहे हैं।

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

चुनौती देकर पीछे हटना...

छत्तीसगढ़ में वैसे तो अखबार का व्यवसाय सबसे चोखा धंधा है इसकी आड़ में बड़े बड़े खेल खेले जा रहे हैं जमीन से लेकर खदान और उद्योग से लेकर लोगों को ठगने में अखबार की भूमिका जबरदस्त रुप से हावी है। हाल ही में आए अखबार ने तो यहां पहले से स्थापित अखबारों को चुनौती दी कि हम खबरें नहीं गढ़ते, हालात बदलते हैं, जनता की आवाज उठाने वाला कौन जैसे जुमले से शुरु हुआ अखबार अब उसी ढर्रे पर उतर आया है। मंत्रियों के प्रति निष्ठा ने गोल मोल खबरें देने मजबूर कर दिया और उसकी चुनौती को लेकर दूसरे अखबारों ने जो कदम उठाया यह नया नवेला अखबार उतना भी नहीं कर पाया है। जनता जान गई अरे इसे भी तो धंधा ही करना है।
हग--मूत ही रहेंगे?
कभी अर्जुन सिंह का खास रहकर वीसी शुक्ला के पीछे पड़े रहने वाले इस अखबार की अपनी कहानी है। कहने को तो यह दलाली करने वाले अखबार की श्रेणी में भी नहीं आते हैं और खिलाफत भी जमकर करते हैं लेकिन चमचाई में भी इनकी सोच सारी लकीरों को बौनी साबित कर देती है अब 15 अक्टूबर को ही देख लिजिए? है किसी में इतना घूसने की हिम्मत?रंगा-बिल्ला की सेटिंग-
नागपुर में बंटवारा क्या हुआ रायपुर में रंगा
-बिल्ला की निकल पड़ी है। प्रतिष्ठित माने जाने वो इस अखबार के संपादक-प्रबंधक यानी रंगा-बिल्ला सेटिंग में उतर आए हैं। जब पत्रिका उसके दुश्मन भास्कर को ही निपटाने में पूरी ताकत लगा दे तो फिर इन्हें क्या फर्क पडऩा है। वेटरों से मार खाकर भी शर्म बेचने वाले इन रंगा-बिल्ला को पैसा देने वाले कुछ भी कह देते हैं लेकिन इसका कोई फर्क नहीं पड़ता?
लुक में बेचैनी
डाल्फिन स्कूल के शिक्षकों ने अपने ही छात्र से अप्राकृतिक कृत्य क्या किया नेशनल लुक के रिपोर्टरों की बेचैनी बढ़ गई है। उन्हें जवाब देते नहीं बन रहा है कि यह सब कैसे हो गया आखिर तनख्वाह भी तो स्कूल के पैसे ही मिलती है। कुछ तो पाप न लगे इसलिए मंदिरों में मत्था टेक रहे हैं
?
ड्रेस कोड के बाद
जूता जरूरी
...

हरिभूमि में हर शनिवार को सफेद टी शर्ट पहनना जरूरी है बेचारे इस बैंडपार्टी से बेचैन है कि पत्रिका में अप टू डेट रखने की मुहिम छिड़ गई है भले ही वेतन कम मिले जूता पहनना जरूरी है वह भी चमकदार व साफ सुथरा हो?
और अंत में...
घर का भेदी की कहावत इन दिनों जनसंपर्क में पूरी तरह हावी है। यहां की हर बात चर्चा में है। चर्चा इस बात की भी है कि एक अधिकारी जो वर्तमान में निगम में है वह किस तरह से संवाद को चूना लगा रहा है और पैसा अखबार में लगा रहा है नाम किसी भी भिखारी का दो पता तो लोगों को चल ही जाता है।

गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

स्वराज दास की मनमानी की कहानी...

कुरेटी के कारनामों की कहानी अभी लोगों की जुबान से उतर भी नहीं पाई है कि जनसंपर्क के एक और अधिकारी स्वराज दास की मनमानी चर्चे में हैं। मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के घर पदस्थ इस अधिकारी स्वराज दास पर अब अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर मनमानी किए जाने को लेकर पत्र मिला है। पत्र को हम हू-बहू प्रकाशित नहीं कर सकते इसलिए उसके अर्थ ही प्रकाशित किए जा रहे हैं।
पत्र के अनुसार किसी समय अजीत जोगी के करीबी रहकर राजनीति का गुण सीखने वाले स्वराज दास ने अब जनसंपर्क में अपने प्रभाव के चलते राजनीति कर रहे हैं। चूंकि सचिव बैजेन्द्र कुमार जनसंपर्क से यादा पर्यावरण विभाग में यादा रूचि रखते हैं इसलिए भी यहां सब कुछ ठीक नहीं है। स्वराज दास जी जनसंपर्क के स्थापना व समाचार शाखा के भी प्रभारी है और उन पर पदोन्नति संबंधी फाईल दो सालों से रोक लेने का आरोप है। शासकीय कार्यक्रमों के कव्हरेज के लिए गाड़ी नहीं देकर कर्मचारियों को परेशान करने के अलावा संविदा कम्प्यूटर कर्मचारी को अनावश्यक परेशान करने का भी आरोप लगााया गया है। यही नहीं अखबारों को विलंब से समाचार भेजने व फोटोग्राफरों से दर्ुव्यवहार की भी शिकायत है।
पत्र के अनुसार मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने 27 सितम्बर 2008 की बैठक में संचालनालय व बड़े जिलों में फोटो ग्राफरों की सीधी भर्ती का निर्णय लिया था लेकिन जानबूझकर भर्ती नहीं की जा रही है जिसकी वजह से कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के कव्हरेज में दिक्कत आ रही है और अनुबंधित फोटोग्राफरों की सेवा ली जा रही है।
प्रताड़ित पत्रकार की पीड़ा
रामनगर से साप्ताहिक समाचार ओम दर्पण निकालने वाले पत्रकार ओम प्रकाश सिंह की पीड़ा यह है कि उसके साथ पुलिस वालों ने तो बदतमीजी की ही महिला सीएसपी श्वेता सिन्हा ने उन्हें एनकाउंडर करने की धमकी भी दी अब उन्हें झूठे केस में फंसा लेने का डर सता रहा है और उसने अपने साथ हुई घटना की शिकायत उच्चाधिकारियों से भी की है लेकिन कार्रवाई कोई नहीं कर रहा है।
चौथे स्तम्भ की शान
वफादार साथी द्वारा कथित रुप से प्रताड़ित होने वाले रेंजर एमआर साहू ने पत्रकार वार्ता लेकर अपनी आप बीती सुनाई है। श्री साहू का कहना है कि वे दुखी हैं एक तो नक्सली क्षेत्र में काम कर रहे हैं और उनके साथ गलत हो रहा है उनके साथ हो रहे गलत को छापने से चौथे स्तम्भ की शान बचाई जा सकती है।
और अंत में...
सीधे भास्कर के खिलाफ छापने वाली पत्रिका को अब सचेत होना होगा क्योंकि भास्कर भी बड़ी तैयारी में है और बलात छापने से भास्कर परहेज भी नहीं करने वाला है।

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

प्रतिष्ठा कुछ नहीं, आफत में अस्तित्व

छत्तीसगढ़ में पत्रिका ने जिस ढंग से आगाज किया उससे प्रतिष्ठित माने जाने वाले अखबारों का बौखलाना स्वाभाविक है। छत्तीसगढ़ के लूट में शामिल अखबार कैसे बंटवारा स्वीकार करे इसलिए सारी लड़ाई अस्तित्व को लेकर है। हम ही नहीं विष्णु सिंहा ने अग्रदूत में सोच की लकीर में कह दिया कि राजस्थानी और भोपाली अखबारों की लड़ाई से सारे नियम कायदे ताक पर रख दिया गया। भास्कर को तो पत्रिका का बंडल चुराते पकड़ा गया और शासन-प्रशासन मूक दर्शक बनी रही। किरायेदारों के अपराध पर मकान मालिक को धर दबोचने वाली इस सरकार ने इस अशांति फैलाने वाली करतूत पर सिर्फ जुर्म दर्ज किया वह भी पत्रिका के दबाव पर।
सोच की लकीर में विष्णु सिन्हा ने अखबारों के बेशर्मी को भी उजागर किया है कि किस तरह से नवभारत ने अग्रिम आधिपत्य पर बिल्डिंग खड़ा कर दी या समवेत शिखर को कैसे जमीन मिल गई। अमृत संदेश के अवैध निर्माण पर भी शासन-प्रशासन चुप है तो यह छत्तीसगढ़ को लुटने की साजिश नहीं तो और क्या है। जिस तह से सरकारी विज्ञापनों के लिए जीभ लपलपाई जाती है और चरण वंदन कर छत्तीसगढ़ को लुटने वाले अधिकारी व नेताओं का यशोगान किया जाता है उससे आम आदमी बेहद दुखी है वह चाहता है कि जब अवैध निर्माण टूटे तो अखबारों पर भी कार्रवाई हो। जब नियम कायदों की बात हो तो इसके जद में अखबार भी रहे।
राजस्थानी और भोपाली के अलावा धंधेबाजों के अखबारों का एक ही मकसद रहा है और सरकार में बैठे लोग भी इन धंधेबाजों को मदद करने आतुर है। अखबार मालिकों की इस करतूत पर सरकार जिस तरह से मुहर लगाकर अपना उल्लू सीधा कर रही है वह अंयंत्र देखने को नहीं मिलेगा। नियमों को ताक पर रखकर पत्रकारों को कीड़े-मकौड़े की तरह इस्तेमाल करने वाले अखबारों ने पत्रकारिता ही नहीं इस देश का भी नुकसान किया है। यदि किसी सरकार को बनियों की सरकार कहा जाता है तो कई अखबार भी इन्हीं की है जिनका मकसद सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाना है ऐसे में सरकार किस नियम के तहत इन्हें कौड़ियों के मोल जमीन व विज्ञापन देती है यह सरकार ही जाने। हमारे पास ढेरों शिकायतें अखबारों की दादागिरी की आती है और हम कोशिश करते हैं कि पत्रकारिता अब भी मिशन के रुप में चले। देश निर्माण की जिम्मेदारी वहन करें।
और अंत में...
कहते हैं लोग अपने दुख से कम दूरे के सुख से यादा दुखी है यही हाल अखबारों में भी है। पत्रिका के आने से कई अखबार वाले विज्ञापन के बंटवारे से दुखी है लेकिन एक अखबार ऐसा है जिसे पत्रिका के आने से नुकसान तो हुआ है लेकिन वह इस नुकसान के बाद भी खुशी मना रहा है क्योंकि अकेले भास्कर से लड़ाई संभव नहीं अब दो मिलकर भास्कर को निपटायेंगे। दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है न।

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

जो है नाम वाला, वही तो बदनाम है!

छत्तीसगढ़ की राजधानी में इन दिनों बड़े व प्रतिष्ठित माने जाने वाले अखबारों ने नया खेल शुरु किया है । अपनी प्रतिष्ठा बचाने के फेर में 'नवभारत' ने तो जग हंसाई कर दी। पता नहीं यह मैनेजमेंट का दिमाग था या शहर को नहीं जानने वाले संपादक का। हुआ यूं कि सीजी-04 में नार्को टेस्ट की कहानी छापी गई और कहा गया कि इसमें एक मंत्री व अधिकारी को बैंक मैनेजर सिंहा को बचाने करोड़ रुपए का लेन देन का खुलासा हुआ है और जिन्हें यह नार्को टेस्ट की सीडी देखना है वे नवभारत आकर देख सकते हैं। अब जिन्हें छत्तीसगढ़ का ज्ञान न हो वह ऐसी बचकानी हरकत कर सकता है क्योंकि यहां के लोग सीडी देखने पहुंच गए। अब उन्हें बगैर सीडी दिखाए लौटाया जा रहा है। यदि यही हरकत छोटे अखबार वाले करते तो इसे ब्लैकमेलिंग की संज्ञा दे दी जाती? आश्चर्य तो यह है कि यह सीडी नवभारत में काम करने वाले ही नहीं देख पाए है? यानी फुल सेटिंग? वसूली? या इसे और नाम कमाने का या पेपर बेचने का फार्मूला क्या कहें।
क्या पत्रिका भी इसी राह पर
रायपुर की आवाज उठाने का दावा करने वाले नए नेवले अखबार ने अपनी आमद से दूसरे बड़े अखबारों को हिला जरूर दिया है लेकिन उसके तेवर फिलहाल दिखाई नहीं पड़ रहे हैं। खबरें नहीं गढ़ने का दावा तो बाद में ही पता चलेगा लेकिन फ्रंट पेज में फुल पेज विज्ञापन छाप कर उसने भी वहीं किया है जो दूसरे बड़े अखबार कर रहे हैं यानी गुड़ के भाई पा...!
सीनियर फोटोग्राफर जब डर गए...
पिछले दिनों डांस बार में भाजपा नेता प्रभाष झा के बेटे के साथ मारपीट के मामले में गिरफ्तार शिव सैनिक प्रमुख धनंजय सिंह परिहार को जब पुलिस ने अदालत में पेश किया तो सीनियर फोटोग्राफरों की हवा निकल गई। पहचान और संबंध था या डर ये तो वही जाने लेकिन सीनियरों ने जूनियरों को फोटो खींचने लगा दिया। स्वयं बचने लगे। केवल विनय शर्मा ही ऐसे थे जो फोटो खींचने पहुंचे। अब चर्चा इस बात की है कि कौन-कौन बार में डांस देख चुका है?
हिमांशु का खेल...
वैसे तो इस बंदे का कोई जवाब नहीं है चाहे कर्मचारियों पर दबाव बनाने की बात हो या मालिकों पर प्रेशर बनाने की। समय के अनुरूप दबाव बनाओं और अपना उल्लू सीधा करो? ऐसे में पत्रिका के दहशत पर अपना उल्लू सीधा कर लिया जाए तो बुराई क्या है?
रमन प्रिंट में
हिन्दुस्तान से प्रताड़ित होने वाले इलेक्ट्रानिक मीडिया का यह कैमरा मेन इन दिनों हरिभूमि का फोटोग्राफर बन गया है। अब वह इलेक्ट्रानिक मीडिया से यादा खुश है।
रामकुमार की जनसत्ता से छुट्टी
भास्कर को अपना ईमान समझने के बाद भी जब वहां से हटाए गए तो रामकुमार परमार ने जनसत्ता का रुख किया अब वे वहां से भी चले गए। कहां जाना है अभी तय नहीं है।
'पप्पू' भी होगा पास...
मौका सबका आता है। जब बड़े-बड़े लोग सुपर स्टार बन रहे हैं तो पप्पू पटेल भला क्यों पीछे रहें? दो फीट का पप्पू पटेल भी बहुत जल्द एक छत्तीसगढ़ी फिल्म में हीरो बनकर आ रहा है। डोंगरगढ़ और इसके आसपास के इलाकों में इस फिल्म की शूटिंग जोर-शोर से चल रही है। पप्पू पटेल को पूरा विश्वास है कि छत्तीसगढ़ के दर्शक उसे जरूर पसंद करेंगे।



और अंत में...
एआईसीसी के इस मेंबर ने इतना अवैध निर्माण कर लिया है कि उसे बचाने भाजपाई नेताओं से गिड़गिड़ाना ही पड़ेगा। अब जनसंपर्क वाले मजा लें तो लेते रहें।

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

फिर वेतन बढ़ने का मौसम आया...

वैसे तो सरकारी विज्ञापन से ही नहीं सेटिंग करके जमीन से लेकर खदान लेने वाले अखबार मालिक अपने पत्रकारों व दूसरे मीडिया कर्मियों को फूटी कौड़ी देना पसंद नहीं करते लेकिन जब भी नए ग्रुप की आमद होती है वे भीतर तक डर जाते हैं। इन दिनों छत्तीसगढ़ की राजधानी में यही सब कुछ हो रहा है। पत्रिका, राज एक्सप्रेस सहित कई नए अखबार के आमद ने प्रतिष्ठित अखबारों को भीतर तक हिला दिया है। तोड़फोड़ से भयभीत अखबार मालिक अब पत्रकारों की खुशामद में लग गए हैं। दैनिक भास्कर को पत्रिका से सर्वाधिक खतरा महसूस होने लगा है इसलिए उसने अपने यहां के पत्रकारों ही नहीं अन्य कर्मचारियों का वेतन बढ़ा दिया है। बावजूद टूटन जारी है।
भास्कर के मार्केटिंग वाले पत्रिका पहुंचे...
दैनिक भास्कर ने अपने कर्मचारियों का वेतन तो बढ़ा दिया है लेकिन लगता है पत्रिका को चैन नहीं है वह भास्कर से दुश्मनी भुनाने में लगा है। सर्कुलेशन, संपादकीय व विज्ञापन विभाग में तोड़फोड़ के बाद उसे मार्केटिंग में भी तोड़फोड़ में सफलता मिल गई है। भास्कर के मार्केटिंग के सौरभ श्रीवास्तव, आदर्श पाठक, देवेश नगड़िया और आदित्य पत्रिका पहुंच गए हैं।
मनोज हरिभूमि छोड़ नई दुनिया में...
हरिभूमि का फोटो ग्राफर मनोज साहू को नई दुनिया रास आने लगा है। नई दुनिया यादा वेतन देकर मनोज को अपने यहां बुला लिया। कहा जा रहा है कि हरिभूमि में वैसे भी मनोज परेशान था।
भाई खुश हुआ...
वैसे तो इन भाई फोटो ग्राफरों का सभी मजाक उड़ाते है। अच्छी तस्वीरें खींचने के बावजूद उन्हें अब तक तवाों नहीं मिल रही थी। वेतन की कमी अलग रही ऐसे में पत्रिका में जोर लगाना ही था और वे सफल भी हो गए। अब इन्हें झमरु-डमरु कहो या त्रिलोचन-हीरा मानिकपुरी कह लो। दिन तो बहुर ही गए।
वाह पाण्डे जी
हरिभूमि में क्राईम-क्राईम खेलने वाले सतीश पाण्डे ने ऊंची-छलांग लगा ली है। पहले हल्ला मचाया कि पत्रिका में जा रहा हूं पहले ही दहशत में रहे हिमांशु ने उसकी तनख्वाह तीन हजार बढ़ा दी। अभियान सफल रहा।
इलेक्ट्रानिक में दारू वालों की आमद...
लंबी खामोशी के बाद एक फिर इलेक्ट्रानिक मीडिया में हलचल होने लगी है। जी-24 के गिरते ग्राफ ने इसके मालिक को एम चैनल में पार्टनरशिप लेने मजबूर किया तो मंजित अमोलक जैसे दारु वाले इस व्यवसाय में कदम रखने लगे हैं। भास्कर का क्या वह तो 51 प्रतिशत में स्वयं है बाकी 49 में कोई भी खेल।
और अंत में...
जब से जनसंपर्क का कार्यभार अमन सिंह ने संभाला है तभी से संवाद व जनसंपर्क के भ्रष्ट अधिकारी सक्रिय हो गए हैं। वे आपस में यही चर्चा कर रहे हैं कि कैसे साहब को अपनी करनी छुपायें और खुश करने कौन सा गिफ्ट दें।

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

घर तो छोड़िये, भगवान को भी नहीं छोड़ा...





अपनी करनी छुपाने सरकारी विज्ञापन के मार्फत खजाना लुटाने की कोशिश में छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राय में अखबार की बाढ़ आ गई है। बड़े प्रतिष्ठित माने जाने वाले अखबार बिरादरी की आमद ने पत्रकारों का भाव तो बढ़ाया ही है आम लोगों को परेशान कर दिया है। सुबह से शाम तक घूम रह सर्वे टीम ने घरों का चैन छिन लिया है। कभी अखबार की स्कीम समझाई जाती है तो कभी दरवाजों पर विज्ञापन बोर्ड लगाने पहुंच जाते हैं। अब अखबार वालों से पंगा कौन लें सो अखबार वाले मनमानी पर उतर आए है। धर नहीं हुआ अखबार का प्रचार तंत्र हो गया है। घरों में घर मालिक का बोर्ड लगा हो या न लगा हो अखबारों का विज्ञापन बोर्ड जरूर लग गया है। इसके एवज में मुफ्त में अखबार भी नहीं दिया जा रहा है। हालांकि कुछ कालोनी में विज्ञापन के एवज में अखबार मांगने की सुगबुगाहट हैं।
घरों को तो छोड़िए दैनिक भास्कर ने तो अपने प्रचार के लिए मंदिरों को भी नहीं बख्शा है। राजधानी रायपुर के तो प्राय: सभी मंदिरों में उनके विज्ञापन बोर्ड लगे है। दो-पांच सौ रुपए खर्च करने में ऐसा प्रचार कहां मिलेगा। वहीं कोई कंपनी बोर्ड लगा देती तो हिन्दुओं के कथित रक्षक पिल पड़ते लेकिन अखबार वालों के इस कारनामे पर किसी का मुंह नहीं खुलता। मंदिर वाले भी क्या करें। समझ सब रहे हैं लेकिन अखबारी दादागिरी के खिलाफ बोलने की हिम्मत किसमे हैं।
पत्रिका का भास्कर पर प्रहार
अभी नेशनल लुक के वार से दैनिक भास्कर संभल भी नहीं पाया था कि पत्रिका ने हमला बोल दिया नेशनल लुक ने संपादकीय विभाग पर हमला किया था तो पत्रिका ने मैनेजमेंट की बजा दी। भास्कर में सरकारी विज्ञापन की देखरेख करने वाले प्रकाश सौरे पत्रिका में स्टेट हेड हो गए है जबकि सरकुलेशन संभालने वाले सुरेन्द्र मिश्रा और गोविन्द ठाकरे को भी पत्रिका ने तोड़ लिया है।
चंदू का इलेक्ट्रानिक मीडिया प्रेम
स्मार्ट कहलाने वाले चंद्रप्रकाश जैन ने किन परिस्थितियों में नवभारत छोड़ नईदुनिया की राह पकड़ी थी यह तो वही जाने लेकिन लगता है उन्हें भी अब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का ग्लैमर भाने लगा है तभी तो वे जी-24 वाईन कर गए। अब चर्चा तो कई तरह की है चर्चा का क्या कहें।
अजय सक्सेना पत्रिका में
कार्टून बनाते-बनाते कार्टून की हालत में पहुंच चुके अजय सक्सेना का अपने फिल्ड में कोई जवाब नहीं है। लेकिन वेतन जहां यादा होगा वहीं काम करेंगे के तर्ज पर अब वे पत्रिका पहुंच गए हैं।
राजेश सोनकर हरिभूमि में
फोटोग्राफी अच्छी है पर स्थापित होने की चाह में लगे राजेश सोनकर हरिभूमि पहुंच गए हैं। देर आए दुरुस्त आए की तर्ज पर
शशांक देशबंधु पहुंचे
युगबोध प्रकाशन की पत्रकारिता से हाइवे में संपादक बनने वाले शशांक शर्मा अब देशबंधु पहुंच गए हैं। यह अलग बात है कि उनके देशबंधु पहुंचने से कई लोगों को दिक्कतें शुरु हो गई है।
और अंत में...
नवभारत को ठेके पर लेने का दावा करने वाले रंगा-बिल्ला अब उस एडवरटाईजर्स को ढूंढ रहे हैं जिन्होंने ठेके पर लेने की खबर को लीक कर प्रचारित किया है। बेचारा स्वयं को बचाने सफाई देते घूम रहा है।

बुधवार, 8 सितंबर 2010

बिकी तो नहीं ठेके पर चला गया...

नवभारत के मालिकों में इन दिनों बंटवारे को लेकर मीडिया जगत में जबदस्त चर्चा है। कभी रायपुर संभाल रहे प्रफुल्ल माहेश्वरी का अब यहां से कोई लेना नहीं रहा तो चर्चा इस बात की है कि बंटवारे में मिले रायपुर नवभारत को समीर जी चलाना नहीं चाहते। जिंदल से जोगी तक खरीदने की चर्चा में अब यह चर्चा भी है कि रायपुर नवभारत ठेके पर चला गया है। ठेका कभी सूर्या में घपला करने वाले ने लिया है। मालिक को पैसे से मतलब है यह ठेकेदार सबको यही समझाकर विज्ञापन या नगद ले रहा है। सच्चाई तो समीर जी जाने। लेकिन जब बिल्डिंग की वैधता को लेकर ही तलवारें लटक रही हो तो बदनामी से काहे का डर वैसे भी एनबी प्लांटेशन के बाद भी क्या बिगड़ गया सरकार तो वैसे ही जेब में हैं।
भास्कर में भी बिहारी बाबू
इन दिनों भास्कर के बिहारी बाबू की जबरदस्त चर्चा है। डीजी बिहारी हैं तो डर काहे का की तर्ज पर जब तक गोली मारने की धमकी से यहां कई लोग परेशान हैं और जब मालिक की नीति ही फूट डालो राज करों की हो तो विवाद कैसा? फिर कब तक सिर्फ बातों का जमा खर्च है गोली चली भी नहीं है तो शिकायतों पर ध्यान देने की जरूरत भी नहीं है।
सौम्या की छलांग
जनसंपर्क में अधिकारी रहे मिश्रा जी की बिटिया ने अपने ताऊ के अखबार से छुट्टी ले ली है जब भास्कर जैसा बैनर हो और वेतन भी 60 हजार हो तो कौन पूछता है वैसे भी घर की मुर्गी दाल बराबर मानी जाती है और कभी ऊंच-नीच हो भी गया तो ताऊ-पापा तो हैं ही।
दिवाकर की पीड़ा
गजानन माधव मुक्तिबोध ने साहित्य व समाज को बहुत कुछ दिया लेकिन दिवाकर मुक्तिबोध की पीड़ा कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है। भास्कर से जनधारा तक का सफर भारी पड़ रहा है। युगधर्म में चंगु-मंगु ने संपादकीय छुड़वा दी थी तो जनधारा में चहेती बिटिया ने अपमानित किया अब जब काम करना है तो इतना तो सहना ही पड़ेगा। भले ही कल का देवेन्द्र बड़ा पद ले ले।
देवेन्द्र खुश हुआ
नौकरी के लिए अच्छा पत्रकार होना जरूरी नहीं है। न ही खबरें लिखना ही जरूरी है। अधिकारियों से सेटिंग हो तो मालिक भी खुश रहता है। इस रणनीति पर चलने वाले खुश रहते हैं। हरिभूमि छोडक़र जनधारा पहुंचे देवेन्द्र कर अब अखबार का प्रकाशक-मुद्रक हो गया है तो खुश तो होगा ही।
यशवंत भास्कर में
कभी हरिभूमि रायपुर से हरिभूमि बिलासपुर पहुंचे यशवंत गोहिल इन दिनों बिलासपुर भास्कर पहुंच गए हैं। उनका सफर भास्कर तक ही है यह कहना कठिन है लेकिन सफर को लेकर बिलासपुर में जबरदस्त चर्चा है।
प्राण चड्डा और एसएमएस
भास्कर में सलाहकार संपादक रहे प्राण चड्डा अब यहां से रिटायर्ड हो गए हैं। ढलहा बनिया हलाये कन्हिया की तर्ज पर इन दिनों उनकी सुबह एसएमएस भेजने से शुरु होती है और रात गुडनाईट के एसएमएस से खत्म होती है। उनके एसएमएस भी निराले हैं पत्रकार तो डरने लगे है कि कहीं एसएमएस डिलिट नहीं हुआ तो क्या होगा इसलिए तत्काल डिलिट करते हैं ताकि घरवालों से तो बच सकें।
राजीव पहुंचे पत्रिका
सांध्य दैनिक छत्तीसगढ़ में अपनी फोटोग्राफी का रंग दिखा चुका बिहारी बाबू राजीव अब पत्रिका में चले गए हैं। वैसे भी छत्तीसगढ़ में वे परेशान थे। वजह तो मालिक जाने।
मधु बीमार
जनधारा और अग्रदूत की पत्रकारिता में नाम कमा चुके मधुसूदन शर्मा की तबियत इन दिनों बेहद खराब है। उनके स्वास्थ्य लाभ की हम सब कामना करते है। उन्हें पैरालिसिस अटैक के चलते नागपुर अस्पताल में शिफ्ट किया गया है।
और अंत में...
शहर में भास्कर को मात देने के लिए आ रहे एक अखबार को जिस तरह का पत्रकार चाहिए वह मिल नहीं रहा है। या फिर पत्रकार ढूंढने वाले का चेहरा देख लोग भाग रहे हैं। यह सवाल इन दिनों मीडिया जगत में चर्चा में हैं।

सोमवार, 30 अगस्त 2010

सालों बाद निमोरा में दिखा जागरूकता...

राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता को ग्रहण लगने लगा था। मालिको के सरकारी विज्ञापन के प्रति जीभ लपलपाने की बढ़ती प्रवृत्ति ने छत्तीसगढ़ की पहचान पर ही सवाल उठाये थे। बाल्को कांड हो या मंत्रियों की घपलेबाजी, आईएएस अफसरों की काली करतूतें हो या डीजी का साहित्य प्रेम सब कुछ सरकारी विज्ञापन की बलि चढ़ रही थी। ऐसे में धरसींवा के पास निमोरा में हुई तीन मासूमों की हत्या केबाद छत्तीसगढ़ के मीडिया ने जिस तरह से रिपोर्टिंग की वह यहां के पुराने तेवर को ताजा कर दिया। हर मामले को कुरेदकर सरकार को कार्रवाई के लिए मजबूर करने वाला तेवर ही छत्तीसगढ़ के मीडिया की पहचान है। बहुत संभव है अब यह तेवर फिर से दिखने लगेगा हम यही आशा कर सकते हैं...!
सनत फिर भास्कर में
अपनी सीधे साधे छवि के लिए जाने जाने वाले वरिष्ठ पत्रकार सनत चतुर्वेदी ने फिर दैनिक भास्कर ज्वाईन कर लिया है। जनसत्ता से वे भास्कर क्यों गये यह पता नहीं चला है पर तीसरी बार वे भास्कर को सेवा दे रहे हैं। कितने दिन देंगे? सवाल कायम है?
सुरेन्द्र का भ्रम टूटा
देशबंधु को अपना सब कुछ मानकर सुबह से रात तक सेवा बजाने वाले सुरेन्द्र शुक्ला ने पत्रिका की ओर रूख किया तो कई लोग अचरज में रह गये कि आखिर देशबंधु में यह सब क्या हो रहा है। अब तो दामादों का खौफ भी नहीं है। इसी तरह बेर ने नई दुनिया ज्वाईन कर लिया है।
पी. बुद्धदेव की वापसी
दैनिक समवेत शिखर से भास्कर रायपुर फिर रायपुर में सब कुछ बेच-बाच कर इंदौर गए भरत पी. बुद्धदेव को इंदौर रास नहीं आया और एक बार फिर वे दैनिक भास्कर आ गए हैं। उनका मकान खरीदना इन दिनों चर्चा में है।
डीबी का हंगामा
वैसे तो भास्कर हमेशा कुछ न कुछ नया कर सुर्खियों में बना रहना चाहता है। पत्रिका के आने की हड़बड़ाहट भी भास्कर में झलकने लगी है पहले ही नेशनल लुक और नई दुनिया से झटका खा चुके भास्कर समूह कोई रिस्क लेना नहीं चाहता इसलिए डीबी स्टार शुरु कर दिया है। अब स्टोरी इसमें क्या जा रही है अभी मत पूछना? कैसे भी हो हंगामा खड़ा होना चाहिए।
पैसा कम दो दस्तखत अधिक में कराओ
कांग्रेस के प्रतिष्ठित परिवार द्वारा निकाले जा रहे अखबार में इन दिनों यही सब कुछ हो रहा अब कर्मचारी तो कर्मचारी, पत्रकार भी मजबूर है नौकरी जो आसानी से नहीं मिलती। दरअसल ऐसे दस्तखत करने वाले पत्रकार ही कब थे।

मालिक  को खुश रखो नौकरी दो जगह करो
कई पत्रकारों के लिए यह जुमला कारगर हुआ है कि ऐड़ा बनकर पेड़ा खाओ। प्रेस लाईन में दत्तक पुत्र के रूप में मशहूर पाटन छाप पत्रकार ने अब दो जगह नौकरी बजाना शुरू कर दिया है। उन्हें ‘अ’ रास आ गया है पहले भी खाने पीने के नाम से बदनाम इस युवा पत्रकार के सीधाई का लोहा सभी मानते हैं।
लुक ही नहीं दिख रहा...
भास्कर को हलाकान करने वाले नेशनल लुक अब मैनेजमेंट की वजह से गायब होते जा रहा है खबरें अब भी अच्छी है लेकिन जब बांट ही नहीं पाओंगे तो पढ़ेगा कौन ? सरकारी विज्ञापन लेते रहो।
तरूण की पीड़ा
पहले ही निगम की तोडफ़ोड़ से पीडि़त सांध्य दैनिक तरूण छत्तीसगढ़ इन दिनों पार्किंग की वजह से परेशान है। नियमानुसार बिल्डिंग बनी है या नहीं यह तो निगम और तरूण छत्तीसगढ़ वाले जाने लेकिन जिस तरह से नवभारत ने टूटने वाले बिल्डिंगों की सूची में तरूण छत्तीसगढ़ का नाम छापा है उससे तरूण छत्तीसगढ़ बेहद खफा है लेकिन छोटा आदमी बड़ों का कर क्या सकता है?
और अंत में ...
पत्रकारों की जमीन पर अपनी बिल्डिंग तानने वाले एक सांध्य दैनिक के मालिक ने हाईरईश कमेटी से दस मंजिल का परमिशन क्या लिया अच्छे अच्छों की नींद उड़ गई। दूसरा सांध्य दैनिक अब जुगाड़ में है कि परमिशन कैसे लिया जाए।

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

जितना पैसा, उतना काम पत्रकारिता का काम तमाम

छत्तीसगढ़ में अखबारों का जितना व्यवसायीकरण हुआ है उससे यादा पत्रकारिता और पत्रकारों का व्यवसायीकरण हुआ है खबरें इंच सेमी में बेचने में तो प्रतिष्ठत माने जाने वाले अखबार भी पीछे नहीं है। चुनाव लड़ने वाले राजनैतिक दल के प्रत्याशियों से पैकेज लेने की तो जैसे परम्परा ही चल पड़ी है। ऐसे में पत्रकारिता करने वाले भी कहां पीछे हटते। रोज छपने वाले अखबारों के पत्रकार तो जितना पैसा उतना काम की रणनीति ही नहीं अख्तियार किये हैं बल्कि अलग अलग बीटों में बंट गये है। हालत यह है कि अपनी बीट को छोड़ दूसरे के बीट की तरफ कोई देखता भी नहीं है चाहे कितनी भी बड़ी खबर हो। पिछले दिनों पंडरी के एक दंपत्ति अपने पुत्र की हत्या की आशंका जताते हुए प्रेस क्लब पहुंचे यहां नवभारत भास्कर सहित कई अखबारों के प्रतिनिधि मौजूद थे। ये सब प्रेस कांफ्रेस अटेंड करने आये थे। प्राय सभी का यही जवाब था। पुलिस दूसरा देखता है। प्रेस आ जाना। यानी इस दंपत्ति की बात सुननी तो दूर विज्ञप्ति तक कोई लेने तैयार नहीं था।
यह पत्रकारिता की भयंकर भूल हो सकती है आरै भटकते लोगों के साथ ये अन्याय नहीं तो और क्या है जबकि आज भी आम लोगों की पत्रकारिता से बेहद उम्मीद है।
देहाड़ी मजदूरी भी शुरू
 वैसे तो भास्कर के नित नये प्रयोग किसी से छिपे नहीं है। प्रयोगवादी इस अखबार ने अपने को स्थापित करने आये दिन कुछ नया करने रहता है। इस बार उसने अपने स्टार में देहाड़ी मजदूर की परम्परा शुरू की है। महिने का तनख्वाह वाला सिस्टम खतम। सप्ताह का झंझट भी कौन पाले। इसलिए रोज जाओ काम करो पैसा पाओ। अब काम करने वाला ज्ञान हो या ...क्या फर्क पड़ता है।
डर का भूत
पिछले दिनों संजय पाठक की भास्कर में वापसी हुई। इससे पहले वह भास्कर छोड़कर हरिभूमि गया था। कहते हैं भास्कर छोड़ते की वजह नवीन थे और नवीन हरिभूमि पहुंचा तो वह हरिभूमि छोड़ दिया। प्रेस क्लब में इसकी बेहद चर्चा है और नवभारत के पत्रकारों के मुताबिक नवीन तो अब राव की भूमिका में हैं।

हड़ताल नहीं करने का फल भुगतो
अखबार लाईन में एक कहावत है तनख्वाह बढानी हो तो अखबार जल्दी बदलों। लेकिन ऐसा पहली बार हुआ कि हड़ताल में शामिल नहीं होने पर नौकरी से निकाल दे और हड़ताल करने वालों की नौकरी बरकरार रहे। यह सब हुआ है हिन्दूस्तान में यही सब हुआ। पिछले माह हड़ताल हुई तो कुछ लोग काम करते रहे और जब मामला सुलझा हड़ताल खतम हुआ तो उसके सप्ताह भर बाद हड़ताल नहीं करने वाले चैनल से भगा दिये गए। यानी नौकरी तो गई ही साथियों के साथ गद्दारी का तोहमत अलग लगा।
और ..में ....
पूरे प्रेस को व्यवसायिकता के रंग में रगने वाले एक अखबार मालिक को अब कांग्रेस की राजनीति भारी पड़ सकती है। कभी इस अखबार मालिक की जी हुजुरी करने वाले संवाद के अधिकारी अब प्रेस के अवैध निर्माण को तुड़वाने ऐसे बंदे की तलाश कर रहे हैं जो कोर्ट में याचिका दायर कर सके और सेट भी न हो।

रविवार, 8 अगस्त 2010

नाराज अधिकारी की 'हकीकत'

छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित अखबार का हकीकत जनसंपर्क विभाग से संबंधित वह अधिकारी द्वारा लिखा जा रहा है जो सरकार से नाराज है। यह खुलासा होने के बाद हिन्दी तक ठीक से नहीं बोल सकने के द्वारा हकीकत लिखने के भ्रम पर से परदा उठ चुका है। हालांकि पत्रकारों को पहले से ही किसी शासकीय अधिकारी पर शक था कि सरकार के भीतर की इतनी जानकारी कैसे बाहर आ रही है अब जनसंपर्क के इस अधिकारी की करतूत सामने आ चुकी है और हकीकत पर से परदा हट चुका है। हालांकि हकीकत पर परदा डालने की कोशिश तो पहले ही दिन से हो रही थी और अधूरे नाम से छापा जा रहा था।

जीएम के चमचे
की पिटाई...

हालांकि कानून की दृष्टि से किसी पिटाई अपराध है और यह स्थिति किसी कर्मचारी के लिए तभी उत्पन्न होती है जब पानी सिर से उपर चला जाता है। ऐसा ही वाक्या एक अंग्रेजी अखबार में हुआ। बताया जाता है कि इस अंग्रेजी दैनिक के पत्रकार ही नहीं अन्य कर्मचारी भी जीएम और उनके चमचों की करतूत से परेशान थे। आए दिन 'माउजर' से धमकाया जाता था। पिछले दिनों जीएम का चमचा कर्मचारी से जा भिड़ा। बस क्या था चमचे की पिटाई हुई। प्रेस के भीतर तो पिटा ही गया बाहर निकाल कर भी तबियत से धूना गया।

पत्रिका का भय

पत्रिका से भयभीत एक अखबार के संपादक द्वारा अब अपने पत्रकारों को चमकाने का मामला सामने आने लगा है। सत्ता प्रमुख के दत्तक पुत्र के मार्फत अनाप-शनाप पैसा कमाने में लगे इस संपादक को पद भी एप्रोच से ही मिला था और पत्रिका में सर्वाधिक इसी अखबार से लोग जा रहे हैं। अपनी करतूत छुपाने या सुधारने की बजाय मातहतों पर गुस्सा करना अच्छी बात नहीं। यह संपादक को समझ में नहीं आ रहा है।

देश का हाल
कभी प्रेस क्लब का रेडियो गायब करने के आरोप से मुक्त होकर अखबार मालिक बने, इस अखबार ने कई उतार चढ़ाव देखे। कभी अपने सगे पुत्रों के प्रति व्यवहार को लेकर चर्चा में रहे तो कभी कर्मचारियों का पीएफ तक डकार देने का आरोप मुस्कुराकर झेल जाते है। इन दिनों सिटी रिपोर्टर की कमी इस अखबार में हो गई है। कुल जमा तीन लोग है उनका भी तीन हाल है। एक तो रोज 10 बजे रात खिसककर 'नेशनल-लुक' में सेवा बजा रहा है तो दूसरा नाम का ही डाक्टर है।

और अंत में....

राजेश मूणत की कार्रवाई देख अवैध निर्माण और कब्जा करने वाले एक अखबार मालिक इन दिनों तेल लगाने में व्यस्त है। कभी ये मंत्री के घोर विरोधी थे और अब वे मंत्रीजी को पटाने में लगे है। है न कहावत सही 'वक्त आने पर गधे को भी बाप कहना पड़ता है।' या आदमी कब अपनी जात बदल दे कोई नहीं जानता।