मिडिया पर मिडिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मिडिया पर मिडिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

यह अखबार की दादागिरी है या प्रशासन की नपुंसकता...

अग्रिम आधिपत्य पर ही बिल्डिंग खड़ी हो गई... 
छत्तीसगढ़ के  प्रतिष्ठित कहे जाने वाले दैनिक अखबार नवभारत ने अग्रिम आधिपत्य मिलते ही बिल्डिंग तान दी और शासन प्रशासन मूकदर्शक  बना रहा। यहां तक  कि लोग बोलते रहे लेकिन अवैध निर्माण पर कोई कुछ नहीं बोला। इस बीच शहर में कितनी ही अवैध निर्माण उजाड़ दिया गया लेकिन इस  बिल्डिंग का  बाल बांका भी नहीं हुआ।
 राजधानी में चल रहे इस गोरखधंधे पर किसी का लगाम नहीं है। अखबारी जमीनों का व्यवसायिक  उपयोग धड़ल्ले से हो रहा है और शासन-प्रशासन तमाशबीन बने हुए हैं।
प्राप्त जानकारी के  अनुसार प्रदेश शासन राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग मंत्रालय का पत्र क्रमांक 4-117/साल-1/06 रायपुर दिनांक  25.7.2008 के  अनुसार नवभारत प्रेस रायपुर को रजबंधा मैदान स्थित भूमि ब्लाक  नं. 9 प्लाट नं. 1 में से रकबा 60750 वर्गफीट भूमि को  प्रेस स्थापना हेतु स्थाई पट्टे पर प्रावधानों के  अनुरूप प्रब्याजि एवं भूभाटक  लेकर आबंटन की स्वीकृति  प्रदान की  गई है।
उक्त आदेश के  परिलब्धन के  अनुसार 24.8.2008 के  अनुसार 4 करोड़ 47 लाख 12 हजार का प्रब्याजि तथा 33 लाख 53 हजार 400 रूपये वार्षिक  भू-भाटक  जमा करने नवभारत को  सूचित किया  गया लेकिन  6 माह बीत जाने के  बाद भी नवभारत ने उक्त राशि जमा नहीं कराई। उल्टा शासन को  रूपये कम करने के  लिए आवेदन दे दिया।
आश्चर्य का  विषय तो यह है कि नियमानुसार राशि जमा नहीं करने पर पट्टा नहीं दिया जा सकता और स्थाई पट्टा प्राप्त किये  बिना भवन निर्माण नहीं किया जा सकता लेकिन  पूरा शहर गवाह है कि राज्य बनने के  पहले ही नवभारत ने बिल्डिंग तान दी और बिल्डिंग के  एक  हिस्से को  एक  सरकारी विभाग को  किराये पर भी दे दिया। इतना सब कुछ होने के  बाद भी शासन-प्रशासन ने कार्रवाई नहीं की । ये वहीं प्रशासन-शासन है जो अवैध निर्माण करने वालों के  खिलाफ कितनी  बार ही बुलडोजर चला चुका  है। लेकिन नवभारत के  खिलाफ कार्रवाई की  हिम्मत नहीं जुटा पाये। जबकि  ये वहीं निगम प्रशासन है जो तरूण छत्तीसगढ़ जब बन रहा था और अग्रिम आधिपत्य पर बिल्डिंग बना रहा था तो बुलडोजर चला चुका है। बताया जाता है कि ऐसा भी नहीं है कि नवभारत के  खिलाफ कार्रवाई की  कोशिश नहीं हुई है लेकिन चर्चा है कि ऐसी सोच रखने वाले अधिकारी ही दूसरे दिन हकाल दिये गये। ट्रांसफर कर दिया गया।
स्वच्छ शासन का दावा करने वाले डॉ.रमन सिंह को  भी नवभारत के कारनामों की  शिकायत की  गई है लेकिन कहा जाता है कि ऐसी शिकायतें रद्दी की  टोकरी में डाल दिया गया।
बहरहाल नवभारत की  बिल्डिंग अवैध निर्माण के  लिए आम लोगों को  चिढ़ा रही है तो एप्रोच वालों का  हौसला अफजाई कर रही है देखना है कि शासन कबतक  इस ओर से आंख मूंदे रहेगा।

सोमवार, 9 अगस्त 2010

बुलंद का शानदार 21 माह का सफर



पत्रकारिता के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित करने और नई आजादी की लड़ाई में निकल चुके बुलंद परिवार ने रविवार 1 अगस्त को शानदार कार्यक्रम आयोजित किया। बुलंद परिवार के इस आयोजन में परिवार के लोग न केवल शिरकत किए बल्कि इस बात का निश्चय किया कि सिर्फ विज्ञापन के लिए वे ढुकुर सुहाती नहीं करेंगे। हर गलत का विरोध और सच का साथ देने के बीच परिवार के बस्तर से लेकर सरगुजा तक के सदस्यों ने धमतरी के प्रमोद यादव के हैरत अंगेज कार्यक्रम देखे जिनमें प्रमोद ने 1 मिनट में 111 नारियल मुक्के से मारकर फोड़ा। इसी तरह बुगी-बुगी फ्रेम ने शानदार नृत्य प्रस्तुति दी। इसके अलावा अब्दुल मतीन ने अपने गलत-गीतों से कार्यक्रमों में समा बांधा। इसी तरह पहली बार डिफेंस में पत्रकारिता के लिए चुनी गई छत्तीसगढ़ की संगीता गुप्ता का भी सम्मान किया गया। कार्यक्रम में विशेष रुप से इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकील राजेन्द्र पाण्डेय एवं डा. अर्चना पाण्डेय ने पत्रकारों का उत्साहवर्धन करते हुए कहा कि सच से दूर होने की जरूरत नहीं है। कार्यक्रम में विशेष रुप से अहफाज रशीद, ललित शर्मा और तपेश जैन भी उपस्थित थे और इन्होंने भी अपने उद्बोधन से उत्साहवर्धन किया। अहफाज रशीद द्वारा नक्सली हमले पर बनाई फिल्म और छत्तीसगढ़ की परम्परा और लोक गीतों पर बनी फिल्म हमर छत्तीसगढ़ की प्रस्तुति के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

रविवार, 18 जुलाई 2010

जनसंपर्क आयुक्त का मीडिया की स्वतंत्रता पर हमला!


बड़ों को बांटा-छोटों को डांटा
सरकार के इशारे पर हो रही कार्रवाई!
वैसे तो कोई भी सरकार अखबारों के खिलाफ मौका तलाशने से परहेज नहीं करती लेकिन भाजपा सरकार इस मामले में कुछ यादा ही बदनाम है। ताजा मामला जनसंपर्क आयुक्त एन. बैजेन्द्र कुमार का नवभारत में छपा वह बयान है जिसमें उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं के प्रचार संख्या की जांच करने कलेक्टरों से कहते हुए विज्ञापन नहीं देने की बात कही है जबकि बड़े अखबारों को विज्ञापन की एवज में एडवांश राशि दी जा रही है। इतने बड़े निर्णय क्या सरकार के इशारे पर हुए हैं या अपनी करतूत छापने वाले अखबारों को सबक सीखने किया गया है। यह जांच का विषय है।
वैसे मीडिया जगत में इस बात की चर्चा शुरु से रही है कि जब से एन. बैजेन्द्र कुमार ने आयुक्त जनसंपर्क का पद संभाला है तभी से वे सरकार के खिलाफ छपने वाली खबरों को लेकर मीडिया के खिलाफ तीखी टिप्पणी करना शुरु कर दिया था। हालांकि तब से किसी ने भी गंभीरता से नहीं लिया था। बताया जाता है कि उनके आने के बाद जनसंपर्क व संवाद में घपलेबाजी बढ़ने लगी और इसे दबाने नवभारत, भास्कर, नईदुनिया जैसे बड़े अखबारों को एडवांश में राशि दी जाने लगी और छोटे अखबार खासकर वे अखबार जो जनसंपर्क व संवाद की करतूत छाप रहे थे उन पर नकेल कसना शुरु कर दिया। उन्हीं छोटे अखबारों को विज्ञापन दिए जाने लगे जो चापलूसी करते थे और उनमें भी यादा चापलूसी करने वालों को अधिक विज्ञापन दिया जाने लगा।
बताया जाता है कि छत्तीसगढ़ सरकार की रूचि शुरु से ही स्थानीय अखबारों व पत्रकारों को प्रताड़ित करने की मानी जाती है। यही वजह है कि भोपाल या प्रदेश के बाहर से प्रकाशित होने वाले अखबारों को मनमाने तरीके से अनाप-शनाप कीमतों का विज्ञापन दिया जाने लगा और छत्तीसगढ़ से प्रकाशित होने वाले अखबारों को प्रताड़ित किया गया।
यहीं नहीं पिछले दिनों तो जनसंपर्क आयुक्त एन. बैजेन्द्र कुमार ने अति कर दी जब वे आरएनआई द्वारा डी ब्लाक किए जाने के मौके का फायदा उठाते हुए यह कह दिया कि इन अखबारों के प्रसार की कलेक्टरों द्वारा जांच कराई जाएगी और इन्हें विज्ञापन भी नहीं दिए जाएंगे। उल्लेखनीय है कि एडवांश राशि का भरपूर विज्ञापन पाने वाले अखबार तो सरकार की चापलूसी करते हैं जबकि छोटे अखबार वाले सरकार के खिलाफ जमकर छापते हैं। यही वजह है कि सरकार ऐसे अखबारों पर शिकंजा कसने की कोशिश करती है। इस संबंध में श्रमजीवी पत्रकार संघ ने ऐसे अखबार वालों की बैठक बुलाते हुए कहा है कि सरकार के इशारे पर आयुक्त ने जो बात कही है उसके लिए वे माफी मांगे अन्यथा पत्रकार संघ सड़क की लड़ाई लड़ेगी।

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

छापा पड़ा तो अखबार ने दुश्मनी भंजा ली...

तब विज्ञापन नहीं दिए अब भुगतो
शहर के एक प्रतिष्ठित दैनिक ने आयकर विभाग द्वारा की गई छापे की कार्रवाई की आड़ में जमकर दुश्मनी भुनाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। भारत को नया बनाने के चक्कर में लगे इस अखबार पर प्लांटेशन की आड़ में आम लोगों का करोड़ों रुपए हजम कर लेने का भी आरोप है।
छत्तीसगढ़ में व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा ने अखबारों का स्तर किस हद तक गिरा दिया है और मैनेजमेंट किस हद तक हावी है इसका उदाहरण हाल ही में बिल्डरों के खिलाफ आयकर विभाग द्वारा मारे गए छापों की खबरों से देखा जा सकता है। अखबार बेचने सनसनीखेज खबरें बनाने का आरोप तो मीडिया पर लगता ही रहा है लेकिन दुश्मनी भुनाने भ्रामक खबरें छापने की नई परम्परा भी शुरू हो गई है।
बताया जाता है कि आयकर विभाग ने भाजपा नेताओं के आरती बिल्डकान, कांग्रेस के अविनाश बिल्डर्स, अटलानी और रहेजा ग्रुप पर छापे की कार्रवाई की गई लेकिन इस छापे में भाजपा की सत्ता होने की वजह से राजीव अग्रवाल और छगन मूंदड़ा सर्वाधिक चर्चा में आए। बताया जाता है कि आम लोगों में अपनी विश्वसनियता की आड़ में एक अखबार ने आरती बिल्डकॉन के खिलाफ इसलिए अभियान छेड़ दिया क्योंकि इसने कभी इस अखबार पर विज्ञापन का रिस्पांस नहीं मिलने का आरोप लगाते हुए पैकेज में विज्ञापन देने से मना कर दिया और इसके प्रतिद्वंदी अखबार को विज्ञापन दिया।
खबरों को भ्रामक बनाते हुए आरती बिल्डकॉन के खिलाफ जमकर खबर प्रकाशित की गई और खबरें इस तरह बनाई गई कि लाकर जो मिले वो इन्ही ग्रुप के मिले। आयकर विभाग के सूत्रों के मुताबिक आरती बिल्डकॉन से केवल 1 लाकर मिला वह भी छगन मूंदड़ा के मां के नाम पर बैंक आफ बड़ौंदा का है छगन मूंदड़ा से 5 लाख केस बरामद हुआ जबकि यहां सोना नहीं मिला राजीव अग्रवाल से न कोई लाकर बरामद हुआ और न ही नगद रकम ही जब्त की गई। 700 ग्राम सोना जरूर जब्त हुआ वह भी बिस्किट की शक्ल में होने की वजह से। बताया जाता है कि बिल्डरों ने भारी रकम आयकर विभाग में सरेंडर की है और इस मामले में अभी भी कार्रवाई चल रही है।
हमारे सूत्रों के मुताबिक आरती बिल्डकॉन के खिलाफ किसी विमल के द्वारा लगातार की गई शिकायत पर कार्रवाई हुई और इस कार्रवाई में विमल के पार्टनर भी चपेट में आ गए। इधर कांग्रेस और भाजपा में भी यह मामला गर्म होता जा रहा है और दोनों ही दलों में इन बिल्डरों के विरोधी इन्हें पार्टी से निकालने में सक्रिय हो गए हैं।
बहरहाल छापे की कार्रवाई और इसके बाद छपी खबरों ने विज्ञापन की लालच में फंसे अखबार की प्रतिष्ठा पर आंच पहुंचाई है। कहा जाता है कि इस अखबार ने पार्षद चुनाव में भी पैकेज को लेकर महापौर किरणमयी नायक, सभापति संजय श्रीवास्तव और भाजपा प्रत्याशी विनोद अग्रवाल को भी परेशान कर चुके हैं।
मुसिबत के लिए रखे पैसे
ने मुसीबत बढ़ाई

बिल्डरों के यहां पड़े छापे में उन बिल्डरों की मुसीबत बढ़ा दी है जहां मोटी रकम बरामद हुई है। बताया जाता है कि पति से छिपा कर पैसा रखने की महिलाओं की प्रवृत्ति की वजह से बिल्डरों के घरों में मोटी रकम बरामद हुई। ऐसे ही एक बिल्डर की पत्नी ने कहा कि वे इसलिए थोड़ा-थोड़ा पैसा छिपाकर इकट्ठा रखती थी ताकि मुसीबत या अचानक जरूरत के समय काम आ सके लेकिन आयकर वालों की नजरों से ये पैसे नहीं बच सके।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

मुख्यमंत्री के खिलाफ छाप लो, संवाद प्रभारी के खिलाफ छापा तो नौकरी गई...


छत्तीसगढ़ में अफसर राज हावी है इसका यह नमूना मात्र है। छत्तीसगढ़ में सरकारी विज्ञापन के मोह ने पत्रकारिता की ऐसी-तैसी करने में कोई कमी नहीं छोड़ा है। यही वजह है कि यहां अधिकारियों के खिलाफ खबर छपते ही उसकी तीखी प्रतिक्रिया होती है।
पिछले दिनों मृत्युजंय मिश्रा ने अपनी नौकरी से हटाये जाने को लेकर संवाद प्रभारी कोरेटी के खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस ली। ढसाढस भरे प्रेस कांफ्रेंस में वैसे तो सभी अखबारों के पत्रकार मौजूद थे लेकिन रोज निकलने वाले अखबारों में से दो-तीन अखबारों में ही यह खबर प्रकाशित हो पाई। इनमें से प्रतिदिन राजधानी में भी यह खबर प्रमुखता से छप गई। इस खबर को ठाकुर नामक पत्रकार ने बनाया था। जैसे ही अखबार में खबर छपी हड़कम्प मच गया। जब हमने पत्रकारिता की शुरुआत की थी मुझे याद है। तब हड़कम्प मचाने वाली खबरों पर संपादन के द्वारा पत्रकारों की पीठ थपथपाई जाती थी लेकिन यहां तो उल्टा ही हो गया। इस पत्रकार की नौकरी ही चली गई।
पत्रकारिता के इस नए मापदंड से कोई पत्रकार हैरान भी नहीं है क्योंकि ऐसा यहां अक्सर होने लगा है और कभी नेता या अधिकारियों द्वारा पत्रकारों को नौकरी से निकलवाने की धमकी नई भी नहीं है। लेकिन सिर्फ सरकारी विज्ञापन के लिए जनसंपर्क के अधिकारियों से ऐसी घनिष्ठता आश्चर्यजनक है। छत्तीसगढ़ में यही सब कुछ हो रहा है और विज्ञापन देने वाली इस संस्था के अधिकारियों का प्रभाव बड़े-बड़े बैनरों पर भी स्पष्ट देखा जा सकता है। कई पत्रकार तो अब आपसी चर्चा में व्यंग्य तक करने लगे हैं कि मुख्यमंत्री के खिलाफ छाप सकते हो लेकिन जनसंपर्क या संवाद के अधिकारियों की करतूत को छापोगे तो नौकरी चली जाएगी। छत्तीसगढ़ में अखबार मालिकों के इस रवैये की वजह से ही शासन-प्रशासन में स्वेच्छाचारिता बढ़ी है और यही हाल रहा तो पत्रकारिता पर यह कलंक धुलने वाला नहीं है।
और अंत में...जनसंपर्क में नौकरी वही लोग कर सकते हैं जो अपना वेतन भी अधिकारियों पर कुर्बान कर दे। ऐसे ही एक युवक यहां अपने नियमित होने के इंतजार में आधा वेतन अधिकारियों के लिए छोड़ देता है। इसके सर्टिफिकेट भी फर्जी होने की चर्चा है।

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

दलालों के जाल में बड़े अखबार

अब जमाना बदल गया है इसके साथ अखबारों की सोच में भी बदलाव हुआ है। कभी मिशन के रुप में चलने वाले इस धंधे पर अब पूरी तरह व्यवसायिकता हावी है और इस व्यवसाय को सत्ता के दलालों ने अपने कब्जे में कर लिया है।
प्रतिष्ठित अखबारों के रुप में अपनी पहचान बना चुके अखबारों में सत्ता के दलाल किस कदर हावी है इसकी कल्पना आम आदमी शायद ही कर पाए। ऐसा ही मध्यप्रदेश से प्रकाशित होने वाला एक अखबार जो छत्तीसगढ़ में स्वयं को स्थापित करने में लगा है। इस अखबार ने स्वयं को स्थापित करने पाठकों की बजाय सत्ता के एक ऐसे दलाल को अपने पाले में कर रखा है जो भाजपा के एक प्रदेश पदाधिकारी का न केवल रिश्तेदार है बल्कि भाजपाई उसे आम बोल चाल में सीएम का दत्तक पुत्र भी कहते हैं।
यह अलग बात है कि उसने इस अखबार को जमीन दिलाते-दिलाते स्वयं के लिए कौड़ी मोल में सरकारी जमीन हथिया ली। पेशे से डाक्टर इस दलाल के बारे में यह भी चर्चा है कि वह इस अखबार के परिशिष्ठ के लिए सरकार से लाखों रुपए का विज्ञापन तक दिलवाता है।
यह सिर्फ एक अखबार की कहानी है। ऐसे ही कई सत्ता के या मंत्री के दलाल रोज शाम संपादकों के कमरे में कॉफी की चुस्कियां लेते दिखाई पड़ जाएंगे।
आश्चर्य का विषय तो यह है कि स्वयं के अखबार में खबर नहीं छाप पाने वाले ये संपादक दूसरे पत्रकारों तक को दलाली करने की प्रेरणा देते नहीं शर्माते। सत्ता के दलालों के चंगुल में फंसते अखबार खबरों को किस तरह से पेश करते होंगे। समझा जा सकता है।
और अंत में...
किसानों के आंदोलन को असफल बनाने जब पूरा सरकारी तंत्र लगा हुआ था तब जनसंपर्क विभाग का एक अधिकारी सरकार के निर्देशों के विरुध्द पत्रकारों को फोन कर इसकी सफलता की कहानी सुनाने में व्यस्त था। सालों से जमें इस अधिकारी के रवैये से पत्रकार भी हैरान थे कि आखिर कुर्सी पाते ही ये सरकार के विरोधी कैसे हो गए।

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

पुलिस बुलवाकर पिटवाने का मतलब

अखबार को संसार बताने वाले राजधानी के एक प्रतिष्ठित कहे जाने वाले इस अखबार में बीते सप्ताह जो कुछ हुआ वह शर्मनाक है। शॉपिंग माल बनाने के चक्कर में किराये के भवन में संचालित इस अखबार के प्रबंधकों की मनमानी की कहानी वैसे तो नई नहीं है। अपने अखबार में कार्यरत पत्रकारों को दो कौड़ी का कहने वाले प्रबंधकों की दादागिरी के कई उदाहरण है।
बीते सप्ताह इस अखबार के दफ्तर में विज्ञापन विभाग से मोबाइल चोरी चला गया। संदेह पर यहां कार्यरत नए नवेले चपरासी को न केवल पुलिस में दिया गया बल्कि उसे पीटने का भी फरमान सुना दिया। पुलिस तो वैसे भी पीटने में माहिर है और जब इतने बड़े समूह का वरदहस्त हो जाए तो फिर क्या कहना। पुलिस इस चपरासी को थाने ले गई और पूछताछ के बहाने उसकी तबियत से धुनाई की।
इस घटना से यहां कार्यरत पत्रकार आक्रोशित जरूर हैं लेकिन नौकरी के मोह की वजह से वे खामोश है। यहां कार्यरत एक पत्रकार का कहना था कि यह तो अखबार का दुरुपयोग है और पुलिस की बेशर्मी का नमूना है।
यह घटना अखबार की दादागिरी का एक नमूना है और अखबार में मैनेजमेंट के बढ़ते दखल की कहानी है और जब पुलिसिया अत्याचार में अखबार ही सहभागी बने तो फिर पुलिस का अत्याचार कौन रोक सकेगा।
राजधानी के अखबार के दफ्तर तक पुलिस का आना और चपरासी की पिटाई को लेकर चर्चा तो है लेकिन अखबार के इस रवैये को लेकर भी तीखी प्रतिक्रिया है अखबार के व्यवसायिकता को लेकर कई तरह की चर्चाओं के बीच अपने ही कर्मचारियों को पुलिस से पिटवाने का यह नया खेल अखबार की प्रतिष्ठा को कहां ले जाएगा कोई नहीं जानता।
और अंत में....
राजधानी बनने के बाद पत्रकारों का वेतन तो बढ़ा है साथ ही काम भी बढ़ गया है। यह अलग बात है कि पहले की तरह पत्रकारिता नहीं हो पा रही है तो इसकी वजह सरकारी विज्ञापन की रफ्तार है जिसका मोह कोई छोड़ना नहीं चाहता।