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शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2024

अम्बेडकर और आरएसएस

 अम्बेडकर और आरएसएस


इन दिनों पूरे देश में संविधान को लेकर चल रही बहस के बीच आरएसएस और बीजेपी में संविधान निर्माता अम्बेडकर से निकटता

दिखाने के लिए तरह तरह के तर्क प्रस्तुत किए जा रहे है, और इन तर्को की पुष्टि के लिए कांग्रेस से बाबा साहेब के मतभेद को बढ़ा चढ़ाकर पेश भी किया जा रहा है ताकि उस झूठ को सच साबित किया जा सके ।

जबकि बाबा साहेब ने अपनी किताब पाकिस्तान एंड पाकिस्तान ऑफ़ इंडिया में हिन्दूराष्ट्र को स्वतंत्रता, मानवता और बंधुत्व का दुश्मन बता चुके है। ऐसे में हिन्दूराष्ट्र की वकालत करने वाले मोहन भागवत और बीजेपी  का अम्बेडकर के प्रति प्रेम उमड़ना क्या दर्शाता है?

अम्बेडकर को लेकर निकटता दर्शाने की कोशिश को लेकर अम्बेडकरवादी दिलीप मण्डल का यह लेख सब कुछ स्पष्ट करता है, उनके द्वारा उठाये सवाल गंभीर है…

सबसे पहले जान लेते हैं कि आरएसएस डॉ. आंबेडकर के साथ अपने संबंधों को स्थापित करने के लिए कौन सी बातों को सामने रख रहा है.

आरएसएस का पूरा तर्क इन चार बिंदुओं पर खड़ा है-

1. बाबा साहेब का आरएसएस से कोई वैचारिक विरोध नहीं था. वे तो संघ के एक कार्यक्रम में भी आए थे.

2. बाबा साहेब के चुनाव में इलेक्शन एजेंट दत्तोपंत ठेंगड़ी थे, जो आरएसएस के नेता थे

3. ठेंगड़ी बाबा साहेब के संगठन शिड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के सेक्रेटरी थे.

4. बाबा साहेब ने भारतीय जनसंघ के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था.

ये चारों बातें अप्रामाणिक हैं. आरएसएस इन बातों के समर्थन में दत्तोपंत ठेंगड़ी की लिखी एक किताब और अपनी ही पत्रिका ऑर्गनाइजर के लेख आदि को प्रमाण के तौर पर पेश करता है, जिसकी कोई विश्वसनीयता नहीं है.

इतिहास लेखन में स्रोत के चयन का निर्णायक महत्व है. स्रोत अगर गलत होंगे तो गलत बात स्थापित हो जाएगी.

इस बुनियादी सिद्धांत के आधार पर अगर आरएसएस की स्थापनाओं को देखें तो आप समझ पाएंगे कि आरएसएस की बातें क्यों अप्रामाणिक हैं. बाबा साहेब ने अपने तमाम लेख और भाषणों का ब्यौरा रखा था. वे पश्चिमी शिक्षा परंपरा में दीक्षित थे और वहां डॉक्युमेंटेशन का बहुत महत्व माना जाता है. बाबा साहेब धुरंधर लेखक थे. उनके रचना संग्रह का वजन ही कई किलो है. उनका सारा लेखन महाराष्ट्र सरकार और भारत सरकार ने प्रकाशित किया है. उनके जीवन काल और उनकी जीवन की घटनाओं और विचारों को समझने का सबसे प्रामाणिक स्रोत उनके लेख और भाषणों का संग्रह है, जिसे भारत सरकार ने डिजिटल रूप में भी प्रकाशित किया है.

आश्चर्यजनक है कि आरएसएस जब बाबा साहेब से अपनी नजदीकी दिखाता है तो स्रोत सामग्री के रूप में उसके पास डॉ. आंबेडकर के रचना संग्रह से कोई प्रमाण नहीं है.

बाबा साहेब के समय की घटनाओं का दूसरा प्रमाण उस समय के अखबार और पत्रिकाएं भी हो सकती हैं. मिसाल के तौर पर बाबा साहेब अगर संघ संस्थापक हेडगेवार से मिलते या संघ की शाखा देखने के लिए जाते तो ये दोनों अपने समय के इतने बड़े नेता थे कि उस समय पुणे के अखबारों में इसका कवरेज जरूर मिलता. यह दिलचस्प है कि आरएसएस के पास स्रोत के नाम पर उस समय के अखबार या पत्रिकाएं भी नहीं हैं.

बाबा साहेब और आरएसएस के तथाकथित अंतर्संबंधों के बारे में तीसरा स्रोत आरएसएस के तत्कालीन सरसंघचालकों का लेखन भी हो सकता है. मैं तो उन्हें भी प्रमाण मानने के लिए तैयार हूं. लेकिन हेडगेवार या गोलवलकर के लेखन में भी उन चार बातों का जिक्र नहीं है, जिसका जिक्र करके आज आरएसएस के लोग भ्रम फैला रहे हैं.

चौथी सामग्री उस समय प्रकाशित आरएसएस की पत्रिकाएं भी हो सकती हैं. लेकिन आरएसएस की उपर्युक्त चारों बातों के लिए उन पत्रिकाओं में भी कोई प्रमाण नहीं है.

एक और बात, आज जो लोग आरएसएस और बाबा साहेब के बारे में भ्रम फैला रहे हैं वे न तो आरएसएस के शीर्ष नेता हैं और न ही प्रवक्ता. कल आरएसएस आसानी से कह सकता है कि वे तो निजी विचार थे और आरएसएस उनके विचारों से सहमत नहीं है.

आरएसएस चीफ मोहन भागवत ने सिर्फ एक बार इस बारे में अपनी बात कही है. उनका कहना है कि बाबा साहेब 1939 में पुणे में संघ के प्रशिक्षण शिविर में गए थे और वहां दलित विषय पर उनके भाषण की व्यवस्था संघ के संस्थापक हेडगेवार ने की थी. सवाल उठता है कि बाबा साहेब का वह भाषण बाबा साहेब के भाषण और लेखों के संग्रह में क्यों नहीं है? सिर्फ वहीं क्यों, पुणे के तत्कालीन अखबारों में इसकी रिपोर्टिंग है तो उसे ही पेश किया जाए. ये भी नहीं है तो हेडगेवार की जीवनी या उनके लेखन से ही इसका प्रमाण प्रस्तुत किया जाए. जाहिर है कि ऐसा कोई प्रमाण कभी प्रस्तुत नहीं किया गया.

बाबा साहेब का हर अध्येता जानता है बाबा साहेब और आरएसएस दो परस्पर विरोधी विचार परंपराओं से आते हैं. 1936 में एनिहिलेशन ऑफ कास्ट भाषण में बाबा साहेब कहते हैं कि वे हिंदू धर्म छोड़ देंगे और इसके 20 साल बाद 1956 में वे हिंदू धर्म का त्याग कर देते हैं. इस दौरान हिंदू धर्म औऱ हिंदू राज को लेकर उनके विचारों की निरंतरता कहीं नहीं टूटती. हिंदू धर्म और उसकी समाज व्यवस्था के पक्ष में बाबा साहेब ने न कहीं कुछ लिखा है और न कुछ बोला है. ये बात मैं पूरी प्रामाणिकता से कह रहा हूं.

अपनी इस बात के पक्ष में मैं बाबा साहेब के लेखन से सैकड़ों प्रमाण दे सकता हूं और इसके लिए मुझे दत्तोपंत ठेंगड़ी की किताब जैसे सेकेंडरी सोर्स या आरएसएस की पत्रिका के 2019 के लेख जैसे अपुष्ट और अप्रामाणिक स्रोत का हवाला देने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

मिसाल के तौर पर, अगर मैं ये लिखूं कि बाबा साहेब ने कहा था कि ‘आदर्श हिंदू को एक चूहे की तरह अपने ही बिल में रहना चाहिए’ या कि हिंदू धर्म में सुधार करना है तो उसके धर्म ग्रंथों ‘वेदों और शास्त्रों में डायनामाइट लगा देना होगा’ को तो मैं इसके प्रमाण के तौर पर ठेंगड़ी जैसे किसी लेखक की किताब नहीं, भारत सरकार या कोलंबिया यूनिवर्सिटी द्वारा प्रकाशित बाबा साहेब के रचना समग्र का हवाला दूंगा और कहूंगा कि ये बात एनिहिलेशन ऑफ कास्ट के क्रमश: 6ठें और 22वें अध्याय में दर्ज है.

या अगर मैं ये कहूं बाबा साहेब हिंदू राज के विरोधी थे और उन्होंने कहा था कि ‘अगर हिंदू राष्ट्र बनता है तो ये इस देश के लिए बड़ी आपदा होगी. हिंदू चाहें जो भी कहें, हिंदूवाद स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का दुश्मन है. हिंदू राष्ट्र को हर कीमत पर रोकना होगा.’ तो इस बात के प्रमाण के तौर पर मैं 2019 में छपी किसी पत्रिका के लेख को नहीं, बल्कि फिर भारत सरकार द्वारा प्रकाशित बाबा साहेब के रचना समग्र को ही कोट करूंगा और कहूंगा कि ये बात बाबा साहेब ने अपनी किताब पाकिस्तान एंड पार्टिशन ऑफ इंडियामें कही थी.


संघ ने तब तिरंगा फहराने वाले युवाओं को जेल में डलवा दिया था

संघ ने तब तिरंगा फहराने वाले युवाओं को जेल में डलवा दिया था 

भले ही बीजेपी अब राष्ट्रवाद का नारा लगाते हुए घर घर तिरंगा का आयोजन कर रही हो लेकिन तिरंगा को लेकर संघ का रवैया नकारात्मक रहा है ।
संघ पर तिरंगा विरोधी का तमगा यूँ ही नहीं लगा है
संघ के इस रवैये को लेकर उठते सवालों में यह घटना बेहद ही महत्वपूर्ण है 
1950 के बाद आरएसएस मुख्यालय पर तिरंगा तब तक नहीं फहराया गया जब तक कि 26 जनवरी 2001 को राष्ट्रप्रेमी युवा दल के तीन सदस्यों ने आरएसएस प्रशासन की इच्छा के विरुद्ध आरएसएस स्मृति भवन में जबरन राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराया। इसके बाद तीनों पर मामला दर्ज किया ... 
ये तीनों युवकों को २०१३ में बरी किया गया
पीटीआई के मुताबिक़ इन तीनों युवाओं को झंडा फहराने से रोकने वाले का नाम सुनील कोठाले था जो प्रभारी था।

२००१ के इस घटना के बाद २६ जनवरी २००२ से संघ ने अपनी मर्ज़ी से तिरंगा फहराना शुरू किया।
दरअसल तिरंगा को लेकर आरएसएस की सोच के तथ्य पर गौर करे तो विवाद की शुरुआत गुरु गोवलकर और ऑर्गनाइज़र में छपे लेख से समझ सकते है-
आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक एमएस गोलवलकर ने अपनी पुस्तक बंच ऑफ थॉट्स में तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने के कांग्रेस के फैसले की आलोचना की थी।

"हमारे नेताओं ने हमारे देश के लिए एक नया झंडा बनाया है। उन्होंने ऐसा क्यों किया? यह सिर्फ़ बहकने और नकल करने का मामला है। यह झंडा कैसे अस्तित्व में आया? फ्रांसीसी क्रांति के दौरान, फ्रांसीसियों ने 'समानता', 'बंधुत्व' और 'स्वतंत्रता' के तीन विचारों को व्यक्त करने के लिए अपने झंडे पर तीन पट्टियाँ रखीं। इसी तरह के सिद्धांतों से प्रेरित अमेरिकी क्रांति ने कुछ बदलावों के साथ इसे अपनाया। इसलिए तीन पट्टियाँ हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के लिए भी एक तरह का आकर्षण थीं। इसलिए, इसे कांग्रेस ने अपनाया," गोलवलकर ने लिखा था।
आरएसएस नेता ने तिरंगे की भी आलोचना करते हुए कहा कि यह "सांप्रदायिक" है, उन्होंने लिखा, "फिर इसे विभिन्न समुदायों की एकता के रूप में व्याख्यायित किया गया- भगवा रंग हिंदू का, हरा रंग मुस्लिम का और सफेद रंग अन्य सभी समुदायों का प्रतीक है। गैर-हिंदू समुदायों में से, मुस्लिम का नाम विशेष रूप से इसलिए लिया गया क्योंकि उनमें से अधिकांश प्रतिष्ठित नेताओं के मन में मुस्लिम प्रमुख थे और उनका नाम लिए बिना वे नहीं सोचते थे कि हमारी राष्ट्रीयता पूरी हो सकती है! जब कुछ लोगों ने बताया कि यह सांप्रदायिक दृष्टिकोण की बू आती है, तो एक नया स्पष्टीकरण सामने लाया गया कि 'भगवा' बलिदान का प्रतीक है, 'सफेद' शुद्धता का और 'हरा' शांति का प्रतीक है और इसी तरह।"

1947 में आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गनाइजर ने भी तिरंगे पर आपत्ति जताते हुए लिखा था कि भारतीय नेता "हमारे हाथों में तिरंगा दे सकते हैं, लेकिन हिंदू इसका कभी सम्मान नहीं करेंगे और इसे अपनाएंगे नहीं। तीन शब्द अपने आप में एक बुराई है और तीन रंगों वाला झंडा निश्चित रूप से बहुत बुरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा करेगा और देश के लिए हानिकारक है।"

आरएसएस ने 2015 में यह भी कहा था कि “राष्ट्रीय ध्वज पर केवल भगवा रंग ही होना चाहिए क्योंकि अन्य रंग सांप्रदायिक सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं।"

हालाँकि, वर्तमान आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने 2018 में कहा था कि आरएसएस “अपने जन्म से ही तिरंगे के सम्मान के साथ निकटता से जुड़ा हुआ है।”
यानी आरएसएस और बीजेपी को तिरंगा को स्वीकार करने में दर्शकों लगे।

मंगलवार, 17 सितंबर 2024

फिर मोदी के आगे संघ शरणागत…!

 फिर मोदी के आगे संघ शरणागत !


 नान बायोलाजिकल क्रियेचर के इस दौर में एक बार फिर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी ताकत का रौब संघ को  दिखा दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अप्रत्यक्ष रुप से आलोचना करने में लगे संघ प्रमुख मोहन भागवत  की लाचारी के कई किस्सों के बीच अब जो क़िस्सा सामने आया है । उसने एक बार फिर साबित कर दिया है कि देश के प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी किसी और के लिए नान बायोलाजी हो  न हो, संघ के लिए तो है ही।

दरअसल लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद जिस तरह से संघ प्रमुख हमलावर थे उसे देखते हुए  स्वयंसेवकों और मोदी विरोधियों में नए तरह की आशा की उम्मीद जगी थी। और जब केरल में आयोजित बैठक  में भाजपाध्यक्ष जेजी नड्‌डा पहुंचे थे तो यह माना जा रहा था कि संघ अब मोदी सत्ता को कड़ा संदेश देगी। लेकिन कहा जाता है कि जेपी नड्‌डा ने ही मोदी का कड़ा संदेश सुनाकर मोहन भागवत की  बोलती बंद कर दी।

सूत्रों की माने तो जेपी नड्डा ने साफ तौर पर कह दिया कि बग़ैर सत्ता के संघ  का कोई मतलब नहीं रहेगा इसलिए आलोचना करने की बजाय अब तक बीजेपी के लिये जिस ताह से संघ काम करती रही है वैसा ही करे। यहीं नहीं राज्यों के चुनाव में भी संघ के लोगों को सक्रिय बनाने की रूपरेखा तैयार कर ले। और अपनी पूरी ताक़त लगाये।

कहा जाता है कि मोदी के इस स्पष्ट संदेश ने संघ प्रमुख को सकते में ला दिया है, क्योंकि एक तरफ कांग्रेस नेता राहुल गांधी के लगातार हमले से स्वयंसेवकों में घबराहट है और ऐसे में यदि मोदी ने भी हाथ खींच लिया तो मुश्किल बढ़ सकती है । इसलिए इस संदेश के बाद अब संघ ने बैठकों का सिलसिला शुरु करते में ही अपनी भलाई मानकर हरियाणा में वनवासी कल्याण आश्रम की बैठक तय कर ली है। जबकि हरियाणा में आदिवासियों की जनसंख्या क्या  है वह भी अच्छी तरह से जानते है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के तीन दिवसीय सम्मेलन का हरियाणा के समालखा में आयोजन होगा। इस सम्मेलन को लेकर तैयारी शुरू कर दी गई है। अखिल भारतीय वनवासी कल्याण के प्रचार प्रमुख प्रमोद पेठकर ने बताया कि इसमें करीब 80 जनजातियों को बुलाया गया है। इसमें दो हजार लोगों के शामिल होने की उम्मीद है।मोद पेठकर ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, "वनवासी कल्याण आश्रम के अखिल भारतीय सम्मेलन का 20, 21 और 22 सितंबर को हरियाणा के समालखा में आयोजन किया जाएगा। इसमें 80 जनजातियों को बुलाया गया है, जो अपनी पूजा-पद्धति को सामने रखेंगे। इसमें पूरे भारत के एकता के दर्शन हो पाएंगे। हम चाहते हैं कि समाज तक जनजातीय जीवन के गौरवपूर्ण पूजा-पद्धति को पहुंचाया जाए।



बुधवार, 11 सितंबर 2024

भाजपा का उजाला चार बीबी वाला...

 भाजपा का उजाला 

चार बीबी वाला...


जो किस भाजपा लव जिहाद और चार बीबी के मुद्दे को लेकर पूरे देश में हिन्दुओं का वोट हासिल करता हो, उसी भाजपा में यदि चार दो हिंदू औरतों के साथ चार बीबी वाला नत्थे खान पठान सालो से कद्‌द‌ावर नेता बना बैठा हो तब इसका मतलब क्या है।

यदि नत्थे खान पठान का होटल में गिलास की चुस्कियों के साथ एक महिला के अंतरंग वीडियो जारी नहीं होता तो न तो भाजपा उन्हें पद से हटाती और न ही भाजपा की इस करतूत का देश को पता ही चलता।

दरअसल पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी से चालीस साल से जुड़े कद्‌दावर नेता नत्थे ख़ान का एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें वे गिलास से चुस्कियाँ लगाते एक महिला के साथ अश्लिलता  करते दिखाई दे रहे है। कहा जाता है कि यह विडियो खुद नत्थे ख़ान ने बनाकर वाट्‌सअप ग्रुप में डाला था। और कहा जाता है कि जब 'नशा टूटा तो उन्होंने विडियों डिलिट कर भी दिया लेकिन डिलिट करने में इतना देर हो गया कि विडियों देश भर में फैल गया। 

विडियो वायरल होते ही राजस्थान बीजेपी में भी हड़कम्प मच गया और नत्थे ख़ान को पार्टी  के सभी पदों से हटाने की घोषणा भी कर ही लेकिन अभी भी नत्थे खान को पार्टी से हटाया गया है या नहीं कहना मुश्किल है क्योंकि भाजपा में अभी भी इस तरह के लोगों की फ़ेहरिस्त है।

इधर नत्थे ख़ान  ने विडियों बयान जारी कर   बताया है कि जिस महिला के साथ विडियों है वह महिला उनकी चौथी पत्नी है जिससे 6 साल पहले शादी हुई है । यानी 64 के उम्र वाले नत्थे ख़ान ने 58 के उम्र में चौथी शादी की है।

नत्थे खान की यह चौथी बीबी है जिसमें से दो बीबी हिन्दू है।

एक देश-एक बीबी, लव जेहाद जैसे नारा लगाने वाली भाजपा में यदि नत्थे ख़ान सालों से है और राजस्थान भाजपा के कद्‌दावर नेता माने जाते है तो अब यह कहा ही जा सकता है कि भाजपा को चाल चेहरा सौर चरित्र की बात नहीं करनी चाहिए।

शुक्रवार, 30 अगस्त 2024

दयाल दास की दुविधा…

 दयाल दास की दुविधा


बलौदा बाजार हिंसा में समाज की नाराजगी की परवाह नहीं कर विष्णु देव साय सरकार के लिए सीना ठोंक कर ढाल बनने वाले प्रदेश सरकार के मंत्री दयालदास बघेल इन दिनों भारी दुविधा में है, और कहा जा  रहा है कि इस दुविधा का असर भी अब दिखाई देने लगा है।

द‌याल दास की दुविधा क्या है यह हम बताये उससे पहले बता देते हैं कि रमन सरकार में दो दो बार मंत्री रह चुके द‌याल दास बघेल ने जब तीसरी पारी की शुरुआत की तब किसी ने नहीं सोचा होगा कि समाज के गुरु को चुनावी पटखनी देने के बाद उन्हें विष्णुदेव सरकार पर आये मुसिबत के लिए समाज से भी नाराजगी मोल लेनी होगी।

हालांकि आरक्षित सीटों से लड़ने वाले भाजपाई यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि चुनावी जीत में अपने समाज से ज्यादा दूसरे समाज के वोट से ही वे चुनाव जीतते हैं इसलिए बलौदाबार हिंसा को लेकर समाज के बेगुनाहो की पुलिसिया प्रताड़ना पर भी चुप्पी रही।वैसे भी इस तरह की नाराजगी की परवाह भाजपा से जुड़े नेता नहीं करते।

लेकिन दुविधा यह नहीं है कि समाज के लोग नाराज होंगे तो क्या होगा, दुविधा तो यह है कि  क्षेत्र के लोगों को अब मिलने के लिए नया रायपुर तक आना होगा। 

ऐसे में सतनाम सदन कैसे और कब छोड़ा जाए या नहीं छोड़ा जाए। दरअसल नई राजधानी में मंत्रियों के लिए बंगला तैयार हो चुका है और द‌यालदास बघेल के नाम एक बंगला आबंटित भी किया जा चुका है। बंगले के रखरखाव पर खर्च भी हो रहा है ऐसे में उन पर सतनाम सदन छोड्‌ने का दबाव भी बढ़‌ने लगा है।

एक तरफ नये बंगले में जाने का मोह तो दुसरी तरफ जनता से कटने का डर ? अब इस दुविधा से मुक्ति का मार्ग कोई कैसे सुझा सकता है। क्योंकि वे यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि पार्टी का रवैया क्या होगा।

सोमवार, 22 जुलाई 2024

कालेज छात्रों को ड्रग्स का लत लगा रहा था संस्कारी संघी…

 कालेज छात्रों को ड्रग्स का लत लगा रहा था संस्कारी संघी…


अभी उत्तर प्रदेश के प्रयाग राज को एके 47 से दहलाने वाला भाजपा के पूर्व विधायक उदयभान करवरिया को समय पूर्व रिहाई का मामला ठंडा भी नहीं हो पाया था कि अब गुजरात से यह खबर आ गई कि कालेज छात्रों में ड्रग्स का लत लगाने वाले संघ के स्वयं सेवक और हिन्दू युवा वाहिनी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष विकास अहिर पकड़ा गया। वह अपना यह खेल आइसक्रीम पार्लर की आड़ में चला रहा था। योगी आदित्यनाथ से लेकर भाजपा के दिग्गजों के साल उनकी तस्बीर और फेसबुक प्रोफाईल ने संघ के संस्कार की पोल खोल कर रख दी है।


मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ गुजरात की सूरत शहर पुलिस ने एक सनसनीखेज मामले में हिंदूवादी नेता और बीजेपी कार्यकर्ता विकास अहीर समेत दो अन्य को एमडी ड्रग बेचने के मामले में अरेस्ट किया है। सोशल मीडिया पर मौजूद प्रोफाइल के अनुसार विकास अहीर हिंदू युवा वाहिनी गुजरात प्रदेश के पूर्व अध्यक्ष हैं। इसके साथ वह बीजेपी युवा मोर्चा से जुड़े हुए हैं। सूरत पुलिस आयुक्त अनुपम सिंह गहलोत ने प्रेस कांफ्रेंस करके शहर में एमडी ड्रग्स की बिक्री के मामले में पुलिस कार्रवाई की जानकारी दी। गहलोत ने कहा कि सूरत में पहले ड्रग्स की खेप मुंबई से आती थी, लेकिन पुलिस की सख्ती के बाद इस धंधे में लिप्त लोगों ने मॉड्स ऑपरेंडी में बदलाव किया है। अब राजस्थान से जरिए सूरत में ड्रग्स की बिक्री कर रहे हैं। पुलिस ने विकास अहीर के विकास के साथ चेतन साहू और अनीश खान पठान को गिरफ्तार किया है। पुलिस के इनके पास से 354 ग्राम एमडी ड्रग्स मिला है।

हिंदूवादी नेता की छवि 


सूरत पुलिस द्वारा ड्रग्स बेचने के मामले में गिरफ़्तार किए गए विकास अहीर ने सोशल मीडिया पर अपनी छवि एक हिंदू वादी नेता की बनाई है। एक्स पर अहीर ने अपने बॉयो में लिखा है कि पूर्व अध्यक्ष हिन्दू युवा वाहिनी गुजरात प्रदेश बताया है। इसके बाद अहीर ने खुद को बीजेपी युवा मोर्चा गुजरात से जुड़ा हुआ बताया है। अहीर ने बॉयो में खुद को आरएसएस को स्वयंसेवक भी बताया है। सूरत शहर पुलिस के अनुसार करीब एक महीने की होमवर्क और निगरानी के बाद तीनों आरोपियों को अरेस्ट किया गया है। पुलिस ने अनुसार पकड़े गए आरोपियों पर पहले भी कुल मामले दर्ज हैं। पुलिस ने अनुसार ड्रग्स राजस्थान के जरिए सूरत में लाया जा रहा था।

आप ने साधा निशाना 

एक तरफ जहां ड्रग्स बेचने के मामले में सूरत पुलिस ने पुलिस ने विकास अहीर और उसके 2 दोस्तों को अरेस्ट किया है तो वहीं दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गोपाल इटालिया ने इस मुद्दे पर बीजेपी पर हमला बोला है। इटालिया ने लिखा है हिंदुत्व के नाम पर 2022 के चुनाव में यही टोली उनके घर पर पहुंची थी।सूरत पुलिस आयुक्त अनुपम सिंह गहलोत ने कहा है कि सामने आया है कि आरोपी आइसक्रीम पॉर्लर की आड़ में एमडी ड्रग्स का धंधा कर रहे थे। ये टू व्हीलर से डिलीवरी भी करते थे। गहलोत ने कहा पिछले कुछ समय में सूरत में ड्रग्स बेचने के 37 मामले में दर्ज किए गए हैं। इनमें कुल 85 आरोपियों को अरेस्ट किया है। गहलोत ने कहा एनडीपीएस एक्ट में अरेस्ट आरोपियों की संपत्ति की जांच भी जा रही है। अवैध और काली कमाई से अर्जित की गई संपत्ति को सील किया जाएगा।

शनिवार, 20 जुलाई 2024

नेम प्लेट- मुसलमानों के बहाने दलित-पिछड़ा निशाने पर

 नेम प्लेटः इस नफरत से उजड़ जायेंगे दलित-पिछड़े...


उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हिन्दू वोटरों के ध्रुवीकरण को लेकर कांवड़ यात्रा के मार्ग में दुकानदारों को नाम पट्टिका लगाने की अनिवार्यता थोपी है उससे मुसलमान कितने प्रभावित होंगे कहना मुश्किल है लेकिन इस आदेश से दलित और पिछ‌‌ड़े वर्ग के दुकामदार जरूर उज‌ड़ जायेंगे, क्योंकि हुए देश में सवर्ण समाज की मानसिकता अब भी नहीं बदली है और आज भी इसी भेदभाव के चलते दलितों की हत्या तक कर दी जाती है।

लोकसभा के बाद विधानसभा के उपचुनाव में हार से बौखलाए भाजपा को यदि हिंदू वोटो के ध्रुवीकारण की तलाश है तो उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी दस सीटों पर होने भाले उपचुनाव में स्वयं की कुर्सी बचा लेने का ख़तरा बढ़ गया है। और इसी खतरे को भांपते हुए ही कांवड़ यात्रा मार्ग को लेकर नाम पट्टिका वाला फरमान जारी किया गया है।

लेकिन इस फ़रमान के विरोध में खड़े लोगों को हिन्दू विरोधी तमगा देने से भी हिन्दूवादी संगठन पीछे नहीं है लेकिन क्या नफ़रत से जल रहे हिन्दुवादी इस देश के सच को देखना ही नहीं चाहते।

देश का सच भयावह है, कि आज भी सवर्ण समाज का एक बड़ा तपका दलितों और वंचितों के साथ बैठना तक नहीं चाहता । सिर्फ दलित या अति पिछड़‌ा वर्ग होने के नाम पर प्रताड़ना का दौर  कम होने का नाम ही नहीं ले रहा।गुजरात हो या राजस्थान, मध्यप्रदेश हो या उत्तरप्रदेश, आप किसी भी राज्य का नाम ले लें। सुदूर दक्षिण से लेकर उत्तर तक, पूरब से लेकर पश्चिम तक अब भी वंचित या पिछड़े वर्ग के दूल्हे के घोड़ी में बैठने मात्र से हत्या की घटना सुनाई पड़ जाती है।

ऐसी परिस्थिति में यदि नाम पट्टिका की अनिवार्यता क्या इन दलित और पिछ‌ड़े वर्ग के लोगों को प्रभावित नहीं करेंगी।

भले ही हिन्दू‌वादी संगठन योगी आदित्यनाथ के इस फैसले में मुसलमानों की पराजय देख रहे हो लेकिन सच तो यह है कि इससे  सर्वाधिक प्रभावित दलित और पिछड़े वर्ग के लोग ही होंगे।

क्या इन वर्गो के द्वारा बेचे जा रहे पूजन सामग्री ख़रीदेगा,  जब बाजू में ही ब्राम्हण बनिया ठाकुर की दुकान होगी। क्या इनके खाने पीने की सामग्री भी कोई खरीदेगा यदि बगल में ही सवर्गो की दूकान होगी।

सच तो यही है कि योगी आदित्यनाथ ने जिस राजनैतिक उद्देश्य से यह फैसला लिया है उससे मुसलमान कम दलित व पिछ‌ड़े ही अधिक प्रभावित होंगे।

शुक्रवार, 28 जून 2024

अपराधी चला रहे थाना फिर पुलिस से डर कैसा...

 अपराधी चला रहे थाना 

फिर पुलिस से डर कैसा...


रमन राज में जब पूर्व गृह‌मंत्री ननकी राम कंवर ने कहा था कि दस - दस हजार में थाने बिकते हैं और कलेक्टर- एस पी वसूलीबाज़ हो गये हैं, तब विधानसमा में इस बात को लेकर खूब हल्ला मचा तो क्या छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आते ही यही स्थिति बन गई है और बढ़ते अपराध की एक बड़ी वजह साँठ-गाँठ है, या फिर शराब के धंधे में लिए नेताओं को ऐसे ही लोग चाहिए जो उनके अवैध शराब के धंधे को फलने-फूलने का अवसर दें।

छत्तीसगढ़ में बढ़ते अपराध की खबर ने आम आदमी की चिन्ता बड़ा‌ दी है, हत्या - बलात्कार के बढ़‌ते मामलो के बीच अपराधियों को पकड़ने की बजाय शिकायत करने वालों को ही परेशान करने का मामला भी बढ़‌ता ही जा रहा है। और अपराधी कॉलर उठाये बेखौफ़ घूम रहे हैं।




राजधानी में अपराधियों के हौसले इतने बुलंद है कि वे थाने में ही गवाहों पर हमला करने लगे हैं।मीडिया रिपोर्ट के अनुसार थाने महिला आरोपी ने गवाह पर ब्लेड से हमला कर दिया। मामला शहर के संवेदनशील क्षेत्र माने जाने वाले मौदाहापारा का है, जहां उपद्रवियों ने जमकर उत्पात मचाया था। कांकेर सहित दूसरे स्थानो के हिस्टरी शिटर यहां रह रहे थे। गिरफ्तार उपद्र‌वियों में दो महिलाएं भी है। जिन पर आर्म एक्ट का मामला भी दर्ज हैं।

हालांकि पुलिस का कहना है कि काले धागे में बंधी ताबिज जैसी चीज से वार किया गया है। जबकि घायल युवक ब्लेड से वार करना बता रहा है। वह भी थाने के भीतर।


इधर पुलिस पर, चाकू से वार या हमले के मामले को धारदार नुकीले  चीजों से मारने का रिपोर्ट लिखकर या  लूट को चोरी, डकैती को चोरी बताकर मामले को कमजोर करने का आरोप भी लगता रहा है। तो अपराधियों को नहीं पकड़‌ने की बात आम है।

शहर के प्रतिष्ठित अख़बार नवभारत ने तो बकायदा इस शीर्षक के साथ समाचार प्रकाशित भी किया कि “पुलिस घेरे के बीच नजर आए कई फ़रार आरोपी' बाकायदा तस्वीर के साथ प्रकाशित इस रिपोर्ट  में बताया गया है कि जिन लोगों को पुलिस तलाश कर रही है या जिनके ख़िलाफ़ थाने में वारंट है वैसे लोग खुले-आम थाना आते जाते हैं और  पुलिस उन्हें गिरफ्तार नहीं करती।

सूत्रों की माने तो राजनैतिक पहुंच के चलते ही पुलिस अपराधियों को बख्श रही है।

गुरुवार, 27 जून 2024

साय का संविदा प्रेम...

साय का संविदा प्रेम...


मुख्यमंत्री बनने से चूक गये अरूण साव अब उपमुख्यमंत्री बनने के बाद ऐसा कोई मौका छोड़‌ना नहीं चाहते जो एक मुख्यमंत्री के हिस्से में न आता हो।  भारी भरकम कई विभाग संभाल रहे अरुण साव के किस्से अब बाहर आने लगे हैं तो इनकी वजह उनका संघ प्रेम भी है लेकिन कहा जाता है कि संघ प्रेम के साथ साथ वे संविदा प्रेमी भी बन गये हैं।

हिंग लगे ने फिटकिरी और रंग चोखा की तर्ज पर चल  इस खेल में नियम कायदों को ताक में रखकर  सेवानिवृत कर्मचारियों और अधिकारियों को संविदा नियुक्ति देने की चर्चा है ओर चर्चा तो उन लोगों को संविदा देने की भी है जो लेन-देन में खूब विश्वास रखते हैं, लेकिन अरुण साव का संबंध आरएसएस से है इसलिए वे इसमें कितना माहिर है, समझा जा सकता है।

चुनाव के पहले प्रदेश अध्यक्ष बनकर उन्होंने जो भूमिका निभाई थी, अब उसकी भी परते उघड़‌ने लगी है और अब उपमुख्यमंत्री बनकर वे कितनी सावधानी बरत रहे हैं वह भी काम नहीं आ रहा है।

कहा जाता है कि असल में उनका मुख्यमंत्री नहीं बन पाने की बड़ी वजह वे खुद भी नहीं तलाश पाये हैं, रमन सिंह ओपी चौधरी से लेकर संघ के एक बड़े पदाधिकारी हो या संगठन का काम देखने. चुनाव के दौरान दिल्ली से भेजे गये लोग ।

लेकिन अब अरुण साव किसी को भी कोई मौका देना नहीं चाहते इसलिए वे फूंक फूंक कर कदम तो उठा रहे हैं लेकिन ख़ैर, खून, खाँसी ख़ुशी के साथ प्रेम भी कहां छिपता है।

मंगलवार, 18 जून 2024

मंत्रालय में हावी हुआ भाई साहब… संस्कृति

 मंत्रालय में हावी हुआ 

भाई साहब… संस्कृति 



सत्रा बदलते ही मंत्रालय में क्या-क्या बदला कहना मुश्किल है क्योंकि मंत्रालय तो अफ़सर ही चलाते है लेकिन जिस बात से अफ़सर सबसे ज्यादा हैरान है वह है , मंत्रालय में तेजी से पनप रहे भाई साहब संस्कृति का ।

एक अफसर ने बड़े  दुखी मन से बताया कि सत्ता बदलते ही  मंत्रालय आने वाले नेताओं की वेशभूषा बदल गई है, नये-नये और ऐसे-ऐसे चेहरे दिखाई देने लगे है जो चेहरे से ही धंधे बाज लगते हैं, और इनके रौब के आगे मंत्रियों का रौब भी फीका पड़ जाये।

ऐसे लोग सीधे सचिवों के पास पहुंचते है और काम सौंपते हुए कहते हैं कि भाई साहब से बात हो गई है।

अब अफसर पूछ भी नहीं पा रहे हैं कि ये भाई साहब कौन है, क्योंकि भाजपा में  तो हर नेता, दूसरे नेता के लिए भाई साहब है, मुख्यमंत्री भी भाई साहब है तो प्रदेश अध्यत भी, गृह मंत्री भी भाई साहब है तो उपमुख्यमंत्री भी भाई साहब   है।