छत्तीसगढ़ में ऐसे चल रहा अपराधियों अधिकारियों और नेताओं का गठजोड़ , पार्ट-एक
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शनिवार, 29 मार्च 2025
शुक्रवार, 6 सितंबर 2024
न निलंबन, न एफ़आईआर-कड़ी कार्रवाई का प्रचार
बच्ची का आंसू पोछने सत्त्रा व खेल...
न निलंबन, न एफ़आईआर-कड़ी कार्रवाई का प्रचार
आलीवारा की छात्रा को जिन्दगी भर जेल की हवा खिलाने की धमकी देने वाले जिला शिक्षा अधिकारी अभय जायसवाल को लोक शिक्षण संचालनालय में सहायक संचालक के पद पर बिठा दिया गया।
इस आदेश को सरकार और उससे जुड़े लोग मुख्यमंत्री के कड़े तेवर के रूप में प्रचारित-प्रसारित कर रहे हैं लेकिन यही सरकार जब न्यायालय में ट्रांसफर को सजा से इंकार करती है तब सवाल यही है कि क्या अभय जायसवाल को सरकार ने कोई सजा दी ?
सिर्फ कुर्सी बदला गया, सजा तो उसे मिली ही नहीं । लेकिन सत्ता का अपना चरित्र है और दलाल मिडिया' का अपना चरित्र।
दो दिन पहले अलिवारा स्कूल के छात्र-छात्राएं बड़ी संख्या में शिक्षकों की कमी दूर करने की मांग को लेकर जिला शिक्षा अधिकारी से मिलने पहुंचे थे जहाँ शिक्षा अधिकारी अभय जायसवाल ने बच्चों को जिन्दगी भर जेल की हवा खिलाने की धमकी देते हैं। सहमी बच्चियां इस धमकी से डरीसहमी बच्चियाँ शिक्षा अधिकारी के कक्ष से रोते-बिलखते बाहर निकलती है तो उस पर पत्रकारों की नजर पड़ जाती है और पत्रकारो ने जब रोने की वजह पूछी तो बच्चियों ने सब कुछ साफ-साफ बता दिया कि किस तरह से अभय जायसवाल ने उन्हें जेल की हवा खिलाने की धमकी दे रहे हैं।
इस धमकी का वीडियो जब वायरल हुआ तो प्रशासन के हाथ-पांव फूल गये, लेकिन अभय जायसवाल के खिलाक कार्रवाई करने की बजाय उनका तबादला कर यह प्रचारित किया गया कि बच्ची के आंसू देख मुख्यमंत्री ने कड़े तेवर दिखाते हुए जिला शिक्षा अधिकारी को हटा दिया।
जबकि कड़ा तेवर तो तब माना जाता जब अभय जायसवाल को निलंबित किया जाता और एफ़ आई आर की जाती।
लेकिन सूत्रों का कहना है कि लेन देन कर शिक्षा अधिकारी बनने-बनाने का खेल जब चलता हो तो फिर हटाने की प्रक्रिया को ही कड़ी कार्रवाई के रूप में प्रचारित किया जाता है। और इस मामले में भी यही हुआ। सच तो यह है कि जन आक्रोश से बचने का यह तरीक़ा है।
शनिवार, 31 अगस्त 2024
लौट के बुद्धू घर को आये...
लौट के बुद्धू घर को आये...
एक सामान्य आदमी के लिए विदेश जाने का मोह क्या होता है इसका तो पता नहीं, लेकिन सरकारी खर्चे में विदेश यात्रा के मोह से बच पाना हर किसी के बस में नहीं है। कई नेता तो सरकारी खर्च में विदेश जाने का फर्जी उपाय भी कर लेते हैं, कुछ सफल हो जाते हैं तो कुछ….!
ऐसे में छत्तीसगढ़ सरकार के उपमुख्यमंत्री अरुण साव का विदेश जाने के सपने का टूटना कितना गजब है यह बताने की इसलिए जरूरत नहीं है कि रिमोट पर चलने वाली सरकार के काम काज सुपर सीएम देख रहे हैं और अपने से कम होशियार या अनुभवहीन लोगों की फौज, कब किसकी बेइज्जती करवा दे, कहा नहीं जा सकता ।
लेकिन अमेरिका जाने के लिए मरे जा रहे की तर्ज पर दिल्ली में लगभग सप्ताह भर से डेरा डालने के बावजूद यदि ख़ाली हाथ लौट के आना बड़े तो इससे दुर्भाग्यजनक बात शायद दूसरी नहीं हो सकती। कहते हैं कि संघियों का अमेरिका के प्रति मोह नया नहीं है, संघ के प्रचारक से प्रधानमंत्री बने नरेद्र मोदी ने तो प्रधानमंत्री बनने के बाद अमेरिका जाने के लिए किसी ने सरकारी बुलावे का इंतजार तक नहीं कर सके थे।
ऐसे में यदि अरुण साव अपने अधिकारी कमलप्रीत के साथ वीजा लेने यदि दिल्ली में डेरा डाले थे तो क्या हुआ।
वैसे भी भारी माकम बजट वाले जल जीवन मिशन में उनके रहते कौन सा भ्रष्टाचार रूक गया है, लेकिन वीजा नहीं मिलने को लेकर मंत्रालय से लेकर पार्टी नेताओ में चल रहे क़िस्से भी कम खतरनाक नहीं है, नवा बईला के चिक्कन सिंग से लेकर अनाड़ी का… सत्यानाश तक की कहावत।
अब देखना है कि अनुभवहीनता के चलते इस घोर बेईज्जती का हिसाब किस-किस अधिकारियों से लिया जाना है।
बुधवार, 28 अगस्त 2024
दुविधा के दो घंटे मचता रहा हडकम्प...
दुविधा के दो घंटे मचता रहा हडकम्प...
बिलासपुर कमिश्नरी प्रभारी के हवाले
छत्तीसगढ़ के सबसे महत्वपूर्ण संभागों में से एक बिलासपुर संभाग अब प्रभारी कमिश्नर के हवाले कर दिया गया है। रायपुर के कमिश्नर महादेव कावरे के पास यह अतिरिक्त प्रभार आया है तो यह कावरे की काबिलियत है, वरना रिमोट से चलने के आरोप से जूझ रहे विष्णुदेव साय सरकार के सामने यह स्थिति कभी पैदा नहीं होती।
कहा जाता है कि बिलासपुर के एक दबंग नेता ने जब विछले हफ्ते सीधे मुख्यमंत्री से मिलकर कहा था कि नीलम नामदेव एक्का नहीं चलेगा तभी से उसकी बिलासपुर से छुट्टी तय हो चुकी थी, अब लोग सोच रहे होंगे कि आखिर कमिश्नर इतना प्रभावशाली पद कब से हो गया कि जन नेता उसके रहने या नहीं रहने को लेकर चिंता करने लगे। लेकिन जो लोग जमीन के कारोबार में है उनके लिए कमिश्नर क्या मायने रखता है ये वहीं जानते हैं। आम आदमी के लिए भले ही कमिश्नर का कोई मतलब न हो।
तो इस तय छुट्टी के तहत हफ्ते भर में यह तय कर दिया गया कि नीलम की जगह जनक पाठक को बिठाया जाये। कहते हैं जनक पाठक के नाम पर बिलासपुर के इस नेता ने सहमति दे दी तो आदेश जारी करने का फरमान सुना दिया गया ।
लेकिन जैसे ही आदेश जारी हुआ, रायगढ़ में हड्कंप मच गया और धनधनाते मोबाईल की घंटियों के बीच फरमान आया। जनक पाठक यही अच्छा काम कर रहे हैं, उनके काम से धन-धान्य की कोई कमी नहीं हो रही है। पार्टी को हो नहीं पार्टी से जुड़े लोगों का भी मुनाफ़ा बढ़ रहा है। कमिश्नरी बिल्कुल भी नहीं भेजा जाये ।
सुपर सीएम की तर्ज पर आये इस फ़रमान से मंत्रालय में हड़कम्प मच गया । नीलम को वापस भेजा नहीं जा सकता था, जनक को भेजना नहीं है तो बिलासपुर के राजस्व मामले को निपटराने में महादेव कावरे की काबिलियत पर किसी को शंका होनी नहीं चाहिए तो फैसला आ गया।
सोमवार, 26 अगस्त 2024
गये थे हरिभजन को वोटन लगे कपास…
गये थे हरिभजन को
वोटन लगे कपास…
यह तो गये थे हरिभजन को वोटन लगे कपास की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना मुख्यमंत्री बनकर छत्तीसगढ़ को भ्रष्टाचार मुक्त करने का दावा करने वाले उपमुख्यमंत्री अरुण साव के विभाग में भ्रष्टाचार की नदियां नहीं बहती। और न ही बटोर लेने का खेल इस पैमाने पर होता।
हालत यह है कि अब प्रभार वाद का नया खेल भी शुरू हो गया है सीनियर अफसरों को किनारे करके जूनियरों को प्रभार देने के इस खेल में लेन-देन की जो खबरें आ रही है वह हैरान कर देने वाला है तो जूनियर - सीनियर की लड़ाई ने कामकाज को भी बुरी तरह प्रभावित किया है।
कहा जाता है कि उपमुख्यमंत्री साव ने मुख्यमंत्री नहीं बन पाने की कमी को अपने विभाग में धौंस जमाकर पूरी कर ली है। नगरीय निकायों में मनमाने ढंग से संविदा नियुक्ति के बाद जल संसाधन और पीएचई में प्रभारवाद का खेल कम चर्चा में नहीं है।
वैसे भी जल जीवन मिशन को कबाड़ा करने का आरोप तो विधानसभा तक में सुर्ख़ियाँ बिखेर चुका है और कहा जाता है कि प्रधानमंत्री मोदी की हस महत्वाकांक्षी योजना का सबसे ज्यादा कबाड़ा तो धमतरी, बिलासपुर और महासमुंद जिले में निकल रहा है, जहाँ इंजिनियरों और ठेकेदारों की मिलीभगत से निकल रहा मलाई सीधे बंगले तक पहुंच रहा है।
सत्ता मिलते ही संघ का संस्कार किस तरह सिर चढ़ कर बोलता है यह किसी से छिपा नहीं है लेकिन जो लोग अरुण साव के क्रियाकलापों को देख समझ रहे हैं वे भी हैरान है।
इधर जल जीवन मिशन के बजट के बंदर बाँट को लेकर खेल नया नहीं है। इस लंबे चौड़े बजट के चक्कर में भूपेश बघेल और रुद्र गुरु की लड़ाई अभी लोग भूले नहीं है लेकिन साव के साथ अभी यह स्थति पैदा नहीं हुई है लेकिन यह स्थिति नहीं पैदा होगी कहना मुश्किल है।
कहा जाता है कि धमतरी, महासमुंद और बलौदाबाजार में चल रहे गोलमाल और छोटे ठेकेदारों की करतूत को लेकर चर्चा अब मुख्यमंत्री तक जा पहुंचा है।




