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शनिवार, 8 मई 2021

प्रधानमंत्री की प्राथमिकता...

 

दिल्ली हाईकोर्ट ने केन्द्र सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए जब कहा कि कड़ी कार्रवाई के लिए मजबूर न करें! तो यह सवाल उठाया जाना चाहिए कि इस भीषण महामारी में भी केन्द्र की सरकार आखिर लोगों की जान से खिलवाड़ क्यों कर रही है, उसकी प्राथमिकता क्या जनकल्याण नहीं होनी चाहिए? आखिर वह एक कदम आगे बढ़कर देश के लोगों के कल्याण की बात क्यों नहीं कर रही है। क्या वह जानती है कि कुछ भी नहीं करने के बाद भी सिर्फ हिन्दु-मुस्लिम के सहारे वह सत्ता में फिर से आ जायेगी?

यह सवाल अब हर उस देशप्रेमी की जुबान बनने लगी है जो भीषण महामारी से तड़पते जिन्दगी को अपनी खुली आंखों से देख पा रहे हैं। बंगाल चुनाव के नतीजे आने के बाद जिस तरह से वहां भाजपा और तृणमूल कांग्रेस की लड़ाई को हिन्दू-मुस्लिम का रुप देने की कोशिश की गई, उसका सच सामने आने लगा है, दुनियाभर की हिंसा की तस्वीरों को बंगाल की हिंसा बताकर नफरत फैलाने की कोशिश किस तरह की गई, भारतीय जनता पार्टी ने किस तरह से देशभर में धरना प्रदर्शन किया वह अब स्पष्ट होने लगा है।

ऐसे में एक बात तो तय है कि इस भीषण महामारी से अब इस देश की जनता को खुद ही निपटना है, क्योंकि बीस हजार करोड़ के सेन्ट्रल विस्टा को लेकर दायर याचिका पर न्यायालय ने भी हाथ खड़े कर दिये हैं। तब सवाल यही है कि मोदी सत्ता की प्राथमिकता क्या है। महामारी से निपटने मोदी सत्ता को राष्ट्रीय प्लान बनाने, आक्सीजन की सुचारु आपूर्ति और वैक्सीन को लेकर न्यायालयों ने लगातार लानत भेजी है लेकिन सरकार ने रईसी बरकरार रखने का उपाय अपनी प्राथमिकता में रखी है। यही वजह है कि तमाम विरोध के बाद भी इस महामारी में सेन्ट्रल विस्टा का काम बेधड़क चल रहा है और उसमें भी महल जैसे प्रधानमंत्री आवास सबसे पहली प्राथमिकता है जिसे हर हाल में दिसम्बर 2022 तक पूरा किया जाना है।

सरकार की दूसरी प्राथमिकता की रईसी बरकरार रखने की है इसलिए इस महामारी के दौर में सिर्फ आईडीबीआई बैक को बेचने के लिए कैबिनेट की बैठक बुलाई जाती है। इस सरकार की प्राथमिकता तो शुरु ही राज्यों में सत्ता प्राप्ति की रही है इसलिए जब भी किसी राज्य में चुनाव होता है प्रधानमंत्री सहित पूरी कैबिनेट वहां होती है और कई बार तो साफ लगता है कि ये प्रधानमंत्री देश के नहीं सिर्फ भारतीय जनता पार्टी के नेता बस हैं। यही नहीं ट्रम्प को जिताने भी रैलियां होती है और कोरोना की अनदेखई तब तक की जाती रही जब तक मध्यप्रदेश में सरकार नहीं बन गई।

सवाल बहुत से है लेकिन कोरोना काल में भी सरकार की प्राथमिकता यदि सत्ता की रईसी बरकरार रखने की है तो फिर दूसरी-तीसरी क्या चौथी लहर में भी कुछ नहीं होने वाला है। क्या देश के प्रधानमंत्री को इस भीषण महामारी से निपटने कोई योजना नहीं बनानी चाहिए? क्या मध्यम व लघु व्यापारियों या उद्योगपतियों के लिए कोई योजना नहीं बनानी चाहिए? क्या मध्यम वर्ग के लोगों की तकलीफ दूर करने योजना नहीं बनानी चाहिए। क्या रोज कमाने-खाने वालों के लिए इस सरकार ने कोई योजना बनाई है। सभी को आक्सीजन और वैक्सीन मिल जाये इसकी कोई योजना है। महामारी से बर्बाद हो चुके परिवार के परिवार और अनाथ हो चुके बच्चों के लिए कौन सी योजना है। 

सरकार जानती है कि बेबसी में तड़पते लोग भले ही आज गाली दे रहे है लेकिन वोट उन्हें ही देंगे क्योंकि हिन्दुत्व खतरे में है? राहुल गांधी के परिवार ने देश के लिए कुछ नहीं किया? तब इन सवालों का क्या अर्थ रह जाता है। जिस तरह से असम जीते वैसे ही 2024 में देश जीत लेंगे?

गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

कोरोना की दूसरी लहर और मोदी सत्ता...

 

कोरोना की दूसरी लहर इतनी भयावह होगी, यह किसने सोचा था? क्या पहली लहर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए चेतावनी थी कि वह पूरा ध्यान स्वास्थ्य सुविधा पर दे? सवाल कई है क्योंकि अस्पताल और दवाई से जूझ रहे लोगों को यह जानना चाहिए कि पिछले साल कोरोना की पहली लहर से निबटने डब्ल्यू.एस.ओ, आईएमएफ और एशियन डेवलपमेंट बैंक ने भारत को करीब 53 हजार 620 करोड़ रुपए दिये थे ताकि मोदी सत्ता स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करे। इसके अलावा पीएम केयर फंड में भी करोड़ों अरबों रुपए जमा हुए थे! लेकिन मोदी सत्ता ने क्या किया?

सवाल बहुत से है लेकिन सारे सवाल का हिन्दू-मुस्लिम ही जवाब हो तो फिर गुस्सा और करुणा में लाशें गिनने के अलावा जनता कर भी क्या सकती है। देश का कोई राज्य नहीं है जहां स्वास्थ्य सुविधा मजबूत हो, हर जगह सरकारी लापरवाही साफ दिख रहा है, उपर से कुंभ और चुनाव ने मोदी सत्ता की लापरवाही के सारे रिकार्ड तोड़ दिये हैं?

कोरोना को लेकर जब पिछले साल सारी दुनिया उपाय ढूंढ रही थी तब हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नमस्ते ट्रम्प के चक्कर में थे लेकिन इसका दुष्परिणाम क्या हुआ। न यार मिला न बिसार सनम के तर्ज पर कोरोना तो बढ़ा ही अमेरिका से दुश्मनी अलग मोल ले ली। लापरवाही यही नहीं रुकी जब तक मध्यप्रदेश में सत्ता नहीं बन गई तब तक हाथ बांधे इंतजार किया गया। राहुल गांधी ने जब कोरोना को सुनामी और अर्थव्यवस्था को लेकर चेतावनी दी तो मोदी सत्ता सहित पूरी भाजपा मजाक बनाने लगे। यानी जिस सत्ता को विपक्ष का अच्छा सुझाव भी गंवारा नहीं उस सत्ता के अहंकार का असर जनता ही भुगतेगी। लेकिन सत्ता इन सब बातों से इसलिए बेपवाह है क्योंकि उनके पास लोगों का दिल जीतने धर्म और राष्ट्रवाद का ब्रम्हा है।

खैर सवाल तो यही है कि सालभर के समय मिलने के बाद भी मोदी सत्ता ने अस्पताल दवाई और डॉक्टर के बारे में क्या किया। कुछ नहीं किया और हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा कहा जाए तो गलत नहीं है। दुनिया की शायद यह पहली सत्ता है जिसका विरोध करना देशद्रोह है, पैसों का हिसाब मांगना देशद्रोही और हिन्दू विरोधी है। कब्रिस्तान की तरह श्मशान में बढ़ोत्तरी की मंशा सबके सामने है। उपर से सत्ता का जिम्मेदारी से भागना तो बेशर्मी की हद पार करना है। हर बात पर हिन्दू-मुस्लिम और राष्ट्रवाद के ढोंग ने देश के सामने भयावह संकट खड़ा कर दिया है। चिकित्सा सुविधा को मजाक बना देने और निजी अस्पतालों को प्रश्रय देने का नतीजा सबके सामने है। तब सवाल है आम आदमी क्या करे, एक तरफ सरकारी अस्पतालों में सुविधा का अभाव और दूसरी तरफ निजी अस्पतालों की महंगी होती चिकित्सा सुविधा में आम जन मरे नहीं तो क्या होगा। हम निजी अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था को लूट इसलिए नहीं कहेंगे क्योंकि ये सिस्टम क अंग है। जब सरकार ही सुविधा देने के नाम पर कमीशनखोरी और लूट मचा रखी है तब किसी एक संस्थान पर लूट का आरोप बेमानी है।

जब सत्ता ही आपदा को अवसर में बदलने का राग अलाप रहा हो तो कालाबाजारी कैसे गलत हो सकता है आखिर वे गलत क्या कर रहे है। जैसी राजा वैसी प्रजा तो 2014 के बाद से चल रही है।

शनिवार, 10 अप्रैल 2021

शाबास प्रधानमंत्री जी...

 

क्या बात है... देश में फिर कोरोना हाहाकार मचाने लगा है। रोज हजारों लोग मरने लगे हैं, देश की जनता तो सीधी-साधी है और सबसे भोले हैं हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी। और उनसे भी लाख गुना सीधे है हमारे गृहमंत्री अमित शाह जी। दुनिया में आग लग जाए इन लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता। फिर पहुंच जायेंगे बंगाल और जुटा लेंगे लाखों की भीड़।

मुझे एक बात प्रधानमंत्री से सीधी पूछनी है कि क्या आपकी रैलियों में जो भीड़ जुट रही है उससे कोरोना नहीं फैलता क्या? चंद रुपयों की खातिर रैली में आने वालों के लिए तो भूख पहले से ही महत्वपूर्ण रहा है लेकिन देश में जिस तरह से कोरोना के कहर से लाशों में लोग तब्दिल हो रहे हैं क्या वह भई दिखाई नहीं दे रहा है या चुनावी जीत के लिए लोगों की जान को दांव में लगा देना उचित है?

शाबास की हेडलाईन इसलिए लगाया ताकि भाजपा के वे लोग भी पढ़े और एक बार चिंतन करें कि चुनावी जीत क्या इतना जरूरी है। प्रधानमंत्री जी आप देश के मुखिया हैं और मुखिया का व्यवहार और कर्तव्य सब लोगों के हित के लिए होना चाहिए। हम मानते हैं कि चुनाव में जीत महत्वपूर्ण है लेकिन एक दो राज्य गंवा देने से क्या फर्क पड़ जायेगा, पहले भी तो छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली गंवा ही चुके हो।

एक तरफ देश में कोरोना ने हाहाकार मचा दिया है, नाईट कफ्र्यू, लॉकडाउन ने आम आदमी को प्रताडि़त किया है तो दूसरी ओर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चुनावी सभा लेने में व्यस्त है, दिनभर चुनावी सभा और शाम को दो गज की दूरी और मास्क जरूरी की बात क्या बेमानी नहीं है।

हमने पहले ही कहा है कि इस देश में कोरोना के लिए हाउडी ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सत्ता की भूख ही जिम्मेदार है, और इस बार फिर कहते हैं कि चुनावी सभा में जुटाये जा रहे भीड़ इस देश को नरक बना देने वाला है। सत्ता और राजनेताओं की बेशर्मी के कितने ही किस्से हैं लेकिन जब देश का प्रधानमंत्री ही चुनावी जीत के लिए जनता की जान को ही दांव पर लगा दे तो इसका मतलब साफ है कि हाउडी ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सत्ता बनते तक का इंतजार भी क्या ऐसा ही कुछ नहीं था।

हैरानी तो इस बात की है कि करोड़ों लोगों की जान दांव में लगते देख भी राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट ने आंखे बंद कर रखी है बाजार में भीड़ पर हल्ला मचाने वाली मीडिया को भी चुनावी रैली में भीड़ जुटाने वालों के तलवे चाटना पसंद है। जब देश की तमाम संवैधानिक संस्था, समाजसेवी कलाकार सब चुप हो तो जनता क्या करें।

वैसे भी इस देश ने गरीबी और भूखमरी के सारे रिकार्ड तोड़ दिये हैं, चंद पैसों के लिए जो लोग अपनी जान को जोखिम में डाल रहे हैं उनका ही दोष गिनाया जायेगा, कोई यह मानने को तैयार नहीं है कि प्रधानमंत्री की चुनावी सभा से कोरोना की स्थिति आने वाले दिनों में भयावह होने वाला है। लेकिन प्रधानमंत्री जी अब तो फैसला लिजिए, लोगों को बख्श दीजिए, बंगाल तो आते-जाते रहेगा लेकिन जब लोग ही नहीं रहेंगे तब...!

रविवार, 4 अप्रैल 2021

ये चेतावनी है...!

 

पंजाब में भाजपा के विधायक नारंग की किसानों ने पिटाई कर नंगा कर दिया। खबर को लेकर निंदा करते हुए जो प्रतिक्रिया आ रही है वह हैरान करने वाली है। इनमें से सबसे हैरान करने वाली प्रतिक्रिया थी, वे किसान थे यदि भाजपा या संघ के होते तो मॉब लिचिंग होता!

हमारी सोच, हमारी दशा क्या होते जा रहा है, गांधी-नेहरू के भारत से इतर हम इस देश को कहां ले जा रहे है, नानक-बुद्ध-महावीर के इस देश में ऐसी प्रतिक्रिया का कोई स्थान नहीं होना चाहिए लेकिन बीते सालों में राष्ट्रवाद और हिन्दूत्व की चाशनी में अच्छे दिन का सपना दिखाकर जो जहर फैलाया गया उसकी प्रतिक्रिया का अंदेशा किसे था?

कुर्सी की लड़ाई ने पहले ही इस देश में लोगों को बांटने का काम किया है और जब लड़ाई किसी को खत्म करने की ईच्छा में तब्दिल हो जाये तो इसका नुकसान समाज और देश भुगतता है। विरोधियों को समाप्त करने की सोच लोकतांत्रिक नहीं है यह सोच राजा महाराजा या तानाशाही सोच है।

हमने पहले ही कहा है कि यदि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष नहीं होगा तो सत्ता के खिलाफ विपक्ष की भूमिका में जनता सड़कों पर आ जायेगी और यह क्रांति कहलाता है और क्रांति से सत्ता और उनसे जुड़े लोग ही प्रभावित होते हैं।

पंजाब में भाजपा विधायक के साथ जो कुछ हुआ वह सत्ता के लिए चेतावनी है क्योंकि जनता का क्रोध को कमजोर करने का काम विपक्ष करता है, अपनी तकलीफ को विपक्ष के द्वारा उठाये जाने से आम आदमी थोड़ी राहत महसूस करता है और अपनी बात सत्ता तक पहुंच जाने से नरम भी पड़ता है लेकिन सोटिये जब विपक्ष नहीं होगा तब क्या वह अपनी तकलीफ सीधे सत्ता तक पहुंचाने की कोशिश नहीं करेगा। और इस कोशिश में वह क्या करेगा, अकेला हो तो स्वयं को नुकसान पहुंचाएगा और भीड़ हो तो प्रदर्शन तोडफ़ोड़ और...!

ऐसे में इस घटना से मुंह फेर लेने का मतलब क्या है? इस घटना के लिए जितने किसान दोषी है उससे ज्यादा दोषी वह सत्ता है जो मनमानी में विपक्ष को ही समाप्त कर देना चाहता है। चार माह से किसान आंदोलित है और सत्ता के पास यदि बात करने का भी समय न हो तो इसका मतलब क्या है।

सवाल किसानों की मांगों के उचित-अनुचित का नहीं है, सवाल तो यही है कि जब इस कानून में किसान अपनी बरबादी देख रहे हैं तो फिर उसे सत्ता क्यों थोपना चाहती है। चुनाव जीत कर सत्ता हासिल करने का यह कतई मतलब नहीं है कि उसे मनमानी की छूट है। और न ही यह मतलब है कि हारे हुए नेता कुछ बोल न सके।

ऐसे में यजि जनता विपक्ष की भूमिका में न आ जाये यह सत्ता को देखनी है!

शनिवार, 3 अप्रैल 2021

लोकतंत्र की डकैती !

 

सवाल यह नहीं है कि ईवीएम में गड़बड़ी की जा सकती है या नहीं? सवाल तो यह है कि भाजपा और कम्यूनिस्ट पार्टी को छोड़ जब देश की तमाम पार्टियों ने ईवीएम से चुनाव को संदिग्ध बताकर विरोध किया है तब ईवीएम से चुनाव क्यों? और इससे भी बड़ा सवाल तो यह है कि ईवीएम के विरोध पर केवल भाजपा के लोग ही क्यों चिढ़ते है?

क्या ईवीएम से चुनाव निष्पक्ष नहीं हो रहा है? यह सवाल सबसे पहले 2009 में भाजपा के लालकृष्ण आडवानी ने ही उठाये थे  और फिर एक अन्य भाजपाई नेता नरसिम्हन ने तो ईवीएम से फ्राड चुनाव को लेकर पूरी किताब ही लिख दी है। ऐसे में जब ईवीएम को लेकर संदिग्धता बनी हुई है तो क्या इस देश के लोकतंत्र को हड़पा जा रहा है।

पांच राज्यों में हो रहे चुनाव में भी ईवीएम को लेकर हर दौर में सवाल उठ रहे हैं। सवाल तो चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी उठे हैं। याद कीजिए टीएन शेषण का दौर तो लगगता ही नहीं कि चुनाव आयोग नाम की कोई संस्था भी है।

असम में भाजपा प्रत्याशी के बेलेरो से ईवीएम बरामदगी का मामला ही चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा करने के लिए काफई है। हालांकि चुनाव आयोग ने स्वयं को निष्पक्ष बताने चार अफसरों को निलंबित कर उस बूथ में फिर से मतदान कराने का निर्णय लिया है लेकिन सच तो यह है कि बाकी केन्द्रों में सब ठीक-ठाक हुआ है उसकी गारंटी कौन देगा?

हैरानी की बात तो यह है कि इस पूरे मामले में भाजपा की तरफ से ऐसा कुछ नहीं किया गया जिससे लोगों में चुनाव को लेकर भरोसा जगे। हालांकि कांग्रेस सहित अन्य विपक्षियों ने तो भाजपा नेता कृष्णेन्द्रु पॉल की उम्मीदवारी खारिज करने की मांग की है लेकिन पॉल अभी तक भाजपा में बने हुए है।

लोकतंत्र की डकैती पूंजीवाद का शगल है, और पूंजीवाद का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि सत्ता का हस्तांतरण भी पूंजी के बल पर होने लगा है। अब तो सोशल मीडिया में कई तरह के किस्से पढ़े जा सकते हैं। असम हो या मणिपुर यहां तक कि मध्यप्रदेश में सत्ता का हस्तांतरण कैसे हुआ यह किसी से छिपा नहीं है, ऐसे में आम आदमी अपने को ठगा महसूस नहीं करे तो क्या करें।

वोट किसी को भी दो सरकार तो हमारी ही बनेगी का खेल क्या लोकतंत्र की डकैती नहीं है?

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

कहानी कुछ अलग है...

 

ये रोटी के लिए झगड़ते बंदरों को मुर्ख बनाते सियार की कहानी कतई नहीं है और न ही डाकू गब्बर सिंह की ही कहानी है यह तो साफ-साफ उस सोने के कंगन के लालच में दलदल में बैठे आदमखोर के पास लाकर अपनी मौत मरने की कहानी है।

गुलनार साहेब ने कहा था कि बेहतर की तलाश में ऐसा न हो कि हम बेहतरीन दिन खो दें। लेकिन दिवारों में लिखी ईबादत को कौन पूछता है? सबकी अपनी सोच है और अपनी सुविधानुसार परिभाषा गढऩे की आजादी। ऐसे में हम किसी को आदर्श भले ही कह दें लेकिन उस रास्ते पर कौन चलता है।

अच्छे दिन आयेंगे का मतलब का हम बेहतर चाहते हैं, हर व्यक्ति चाहता है कि उसका आने वाला दिन बेहतर हो लेकिन ठंड से बचने के लिए कोई घर को ही आग नहीं लगाता। सत्ता का अपना चरित्र है और सत्ताधारी नेताओं के चरित्र की बात ही बेमानी है, विपक्ष में रहते जिन मुद्दों पर वह हाय तौबा मचाती है, सत्ता आते ही वही मुद्दे उन्हें देशद्रोही लगने लगता है! देशद्रोही की नई परिभाषाएं गढ़ी जाने लगी है, आलोचना को बर्दाश्त करने की ताकत सत्ता के पास कब रही है। 

सत्ता पाने नफरत की दीवारें खड़ी करने का खेल तो स्वतंत्रता आंदोलन के दौर से ही शुरु हो गया था। साथ ही शुरु हुआ था हिन्दुत्व का खेल। इस खेल को मजेदार और विजयी बनाने नफरत, अफवाह और झूठ की चाशनी में लपेटा जाने लगा। अच्छे दिन के सपने दिखाये जाने लगे। हिन्दूत्व के अस्तित्व को खतरा बताने के लिए लालच देने का दौर का लंबा इतिहास है। पंचतंत्र के उस आदमखोर शेर की तरह सोने का कंगन तलाशा गया और जो भी इस कंगन को पाने जाता वह मारा जाता लेकिन वह कहानी है, इसलिए इसमें फेरबदल किया गया। कंगन की जगह अच्छे दिन के सपने सजाये गए। उस कहानी में तो सिर्फ लालची आदमी मारा जाता था लेकिन इस कहानी में सद्भावना, प्रेम, एकता, भाईचारा समाप्त होने लगी लेकिन बेहतर की तलाश में समाप्त होते रिश्ते की मौन परवाह करता है। कीचड़ मौजूद रहे बस। सत्ता की यही कोशिश रही ताकि लोग फंसते रहेे।

लोकतंत्र का मतलब ही बदल गया। लोकतंत्र का मतलब जन सरोकार की बजाय चुनावी जीत हो गया। और उस आस्था को इतना बड़ा कर दिया गया जो अंधविश्वास के रास्ते पर चल पड़े। आस्था से उत्पन्न अंधविश्वास की पराकाष्ठा सबके सामने है, जिस देश में सत्य और अहिंसा के दम पर आजादी मिली वहां झूठ स्वीकार्य हो गया, यह अलग बात है कि जो लोग अपनी पत्नी और बच्चे के झूठ पर क्रोधित हो जाते हैं उन्हें साहेब का झूठ अपनी बरबादी और देश की बरबादी के स्तर पर पसंद है।

सोमवार, 1 मार्च 2021

चुनाव, स्टेडियम, जनसरोकार

 

निर्वाचन आयोग ने पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है। किसान आंदोलन के दौर में हो रहे इस चुनाव का परिणाम क्या होगा? और इससे मोदी सत्ता को कोई फर्क पड़ेगा कहना कठिन है क्योंकि सत्ता की रईसी को कायम रखने का जो तरीका वर्तमान दौर में चल पड़ा है उससे जन सरोकार कोई मायने नहीं रखता।

जन सरोकार सामने रखता तो बंगाल को लेकर जो बवाल काटा जा रहा है उसका कोई मतलब ही नहीं होता। क्योंकि बंगाल में ममता बेनर्जी को लेकर जिस तरह के सवाल खड़ा किया जा रहा है वह राजनीति का महज एक हिस्सा है। बंगाल इस देश का ऐसा राज्य है जिसकी तुलना भाजपा शासित प्रदेशों से की जाये तो वह बीस ही बैठेगा।  जीडीपी ग्रोथ हो या कृषि उत्पादन, बेरोजगारी दर की ही बात कर ली जाये तो वह भाजपा शासित उत्तरप्रदेश, हरियाणा, बिहार से बेहतर स्थिति में है, तब सवाल यह है कि क्या ये सब चुनाव में मुद्दे बनेंगे।

बिल्कुल नहीं बनेंगे क्योंकि ये मुद्दे भाजपा को नुकसान पहुंचा सकते है। सवाल उठ सकता है कि बंगाल को यह किस दम पर बेहतर करने का दावा कर रहे है जबकि उसके द्वारा शासित प्रदेश उत्तर प्रदेश, हरियाणा में बेरोजगारी दर बंगाल के मुकाबले क्यों खराब है। पर केपिटल इंकम के मामले में भी बंगाल की स्थिति उत्तर प्रदेश -बिहार से बेहतर है।

ऐसे में क्या बंगाल में चुनाव का मुद्दा राष्ट्रवाद और धर्म नहीं होगा? यह सवाल भले ही गैर जरूरी लगे लेकिन सच तो यही है कि  इन राज्यों के चुनाव में भाजपा को सत्ता तक लाने के लिए यही एकमात्र मुद्दा है।

हम यह नहीं कहते कि किसान आंदोलन के इस दौर में भाजपा कृषि बिल को लेकर कोई मुद्दा छोड़ सकता है बल्कि यह देखना होगा कि किसान आंदोलन का इस चुनाव में क्या असर होगा। बढ़ती महंगाई भी मुद्दा बनेगा। पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमत का असर चुनाव में कितना पडेगा?

सत्ता की रईसी को लेकर जो लोग नाराज है वे कई तरह के मुद्दों को हवा दे सकते हैं लेकिन क्या सरदार वल्लभ भाई पटेल स्टेडियम का नाम गुपचुप ढंग से नरेन्द्र मोदी स्टेडियम किया जाना इन चुनाव का मुद्दा होगा?

हालांकि इस नामकरण को लेकर जब सवाल उठने लगे तो इसकी सफाई में केन्द्रीय मंत्री तो सामने आये ही ट्रोल आर्मी और वॉट्सअप युनिर्वसिटी के छात्र भी गांधी-नेहरु परिवार के नाम पर देशभर में चल रहे संस्थानों, सड़क चौक की सूची जारी कर दी। लेकिन वे जब अपनी ही सूची में फंसने लगे तो नेहरु के भारत रत्न को लेकर सवाल खड़ा करना शुरु कर दिया लेकिन नेहरु के भारत रत्न को लेकर सवाल खड़ा करने वाले यह भूल गये कि नेहरु को भारत रत्न तब के राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने बगैर केन्द्रीय सत्ता के सिफारिश की ही थी और उनके साथ सर्वपल्ली राधा कृष्णन सहित कई लोग थे जो तब सत्ता में थे।

लेकिन चुपचाप स्टेडियम का नामकरण कहीं वह डर तो नहीं है कि सत्ता जाने के बाद क्या होगा? खैर मामला कुछ भी हो लेकिन सोशल मीडिया में वायरल हो रहे इस मुद्दे में सबसे मजेदार मुद्दा हिटलर और सद्दाम हुसैन के द्वारा नामकरण को लेकर की जा रही तुलना है। ऐसे में इन राज्यों के चुनाव में एक बात तो तय है कि राजनीति जनसरोकार से दूर होता जा रहा है और चुनाव जीतने का मतलब सत्ता की रईसी को भोगना है। जन सरोकार कोई मायने नहीं रखता।

शनिवार, 26 अक्टूबर 2013

लालच बुरी बला है...


हर व्यक्ति बचपन से सुन रहा है कि लालच बुरी बला है! सत्य पर आधारित कितनी ही कहानियां सुनी-सुनाई जाती है, पर आम लोगों में न तो लालच कम हो रहा है और न ही वे लालच के फेर में अपराध करने से ही हिचक रहे हैं।
खासकर इन दिनों राजनेताओं में बढ़ते लालच से आम आदमी क्षुब्द है। उनका गुस्सा बढ़ता ही जा रहा है। अरबो-खरबों के घोआले के बाद भी उनका लोकतंत्र पर भरोसा है तो इसके पीछे यह उम्मीद है कि देर सबेर ऐसे लोगों को उनके कर्मों की सजा जरुर मिलेगी...
देश भर में नेताओं के बढ़ते लालच ने नेताओं का जो विभत्स रूप जनता के जजेहन में स्थापित किया है हम यहां उसकी चर्चा फिर कभी करेंगे, लेकिन छत्तीसगढ़ निमा्रण के बाद यहां के नेताओं ने जो अकृत संपत्ति अर्जित की है वह शर्मसार कर देने वाला जरुर है।
हम यहां किसी लालची नेता की कथा सुनाने इच्छुक है और न ही सत्ता मद में डुबे नेताओं की करतुतों पर ही अभी कुछ कहने वाले हैं। क्योंकि हर कोई जानता है कि विधायक या मंत्री बनने के पहले इनकी हैसियत क्या थी और आज क्या हो गई है।
हम यहां कोयले की कमाई में मुख्यमंत्री के शामिल होने या भाई भतीजावाद पर ही कुछ लिखना चाहते हैं और न ही गर्भाशय कांड या आँख फोडऩे वाले डॉक्टरों की घटना को ही याद दिलाना चाहते हैं क्योंकि इइन सब घोटालों पर काफी कुछ लिखा जा युका है और शायद जनता ने भी तय कर लिया होगा कि वे इस बार किसे जिताना चाहते हैं।
पिछले चुनाव में भी जनता ने जिन्हें वह पसंद नहीं करती है लेकिन संविधानिक व्यवस्था के चलते वे लोग भी विधायक बन गए या उन लोगों की सरकार बन गई जो आधे से कम वोट पाये।
यह स्थिति पूरे देश भर के राज्यों की है। 50 फीसदी जनता के विरोध में मत डालने के बाद भी वे इसलिए विधायक बन जाते हैं क्योंकि वोटों के बंटवारे की वजह से उनका वोट सबसे अधिक होता है।
छत्तीसगढ़ में गिनती के विधायक हैं जिन्हें पचास फीसदी से अधिक लोग पसंद करते हैं और डॉ. रमन सिंह की दूसरी पारी तो सिर्फ 42 फीसदी वोटों के भरोसे बनी यानी 58 फीसदी लागों ने नकार दिया था।
हम तो यहां सिर्फ उन नेताओं को याद दिलाना चाहते हैं जो लालच में अंधे होकर सिर्फ पैसा कमाने में लगे हैं और जनता के हितों की ही अनदेखी कर रहे हैं बल्कि सरकारी धनों में सेंध लगाकर अपनी तिजौरी भर रहे हैं। हम ऐसे कृत्यों को देशद्रोह मानते हैं और हमें विश्वास है कि भले ही आज के कानून के दायरे से बाहर है लेकिन देर सबेर न केवल उनको इसकी सजा मिलेगी बल्कि उन पर आंसू बहाने वाला भी नहीं होगा।
हम यह बात उन नेताओं से फिर से कहना चाहेंगे उनकी लालच की वजह से ही छत्तीसगढ़ में विकास अभी  भी कोसो दूर हो गया है। उनकी लालच की वजह से ही महंगाई बढ़ रही है, आम आदमी को सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी बुनियादी जरुरतों से मरहूम होना पड़ रहा है।
नेताओं को लोकतंत्र में नौकरशाह को सही रास्ते पर काम कराने के लिए चुना जाता है लेकिन नेताओं और नौकरशाह ने अपराधियों से गठजोड़ बनाकर आम लोगों के हितों पर डाका डालने का काम शुरु कर दिया है। नेताओं ने अकूृत संपत्ति अर्जित कर ली है लेकिन वे भूल जाते हैं कि देर सबेर जनता उन्हें उनके इस बढ़ते वैभव की सजा जरुर देगी और उन्हें जेल तक जाना पड़ेगा।  क्योंकि लालच बुरी बला है और जनता यह बात अच्छी तरह जानती है, और वह भूलती भी नहीं है...
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