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गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

सत्ता का तांड़व...

 

क्या आपने उन भेडिय़ा बच्चों के बारे में सुना है जो चांद की तरफ मुंह उठाकर हुंकाती मादा की घातक छातियों से दूध पीते है, और जब उस बच्चे को झुण्ड से अलग कर बचा लिया जाता है तो वह सबसे पहले बचाने वालों को ही काटता है। उनमें न तहजीब होती है और न ही उससे प्रेम की कल्पना ही की जा सकती है।

आप यकीन नहीं करेंगे लेकिन सत्ता में बैठे लोगों की लापरवाही और गैर जिम्मेदाराना हरकत किसी भेडिय़ा बच्चे से कम नहीं है। बदइंतजामी ने तो जिन्दा लोगों को लाश में तब्दिल करने में कोई कसर नहीं छोड़ा है। इस माह यानी अप्रैल में ही कोरोना से मरने वालों का आंकड़ा पचास हजार पार कर चुका है और विशेषज्ञों की माने तो आने वाले दिनों में इसमें और तेजी आएगी। लोगों को तो पचास हजार वाले सरकारी आंकड़ों पर यकीन ही नहीं है वे इसे कई गुणा बता रहे हैं।

अपनी नाकामी छुपाने कोई सत्ता किस हद तक निचता पर उतर जाये ये कहना मुश्किल हो गया है। सत्ता की बेशर्मी आप गिनते रह जाएंगे और उससे ज्यादा निचता और बेशर्मी तो उन लोगों की है जो अपनी हिन्दू कुंठा के चलते देश को पहले ही बर्बाद कर देना चाहते हैं। देशभर में जिस तरह से कब्रिस्तान से श्मशान घाट तक लाशों की लाईने दिखाई देने लगी है वह किसी भी संवेदनशील सरकार के मुंह में तमाचा है लेकिन केन्द्र सरकार अभी भी सिर्फ और सिर्फ राजनीति कर रही है। लगता है कि भाजपा शासित राज्य के मुख्यमंत्री तो मोदी-शाह से इस कदर दहशत में है कि न तो वो एक देश एक कीमत पर ही कुछ बोल पा रहे हैं और न टीका को सभी तरह के टेक्स फ्री पर ही कुछ बोल पा रहे हैं। यदि हम महामारी में भी केन्द्र की सत्ता वेक्सीन में टैक्स माफ नहीं कर पा रही है तो इसका मतलब क्या है। 

पहले ही सरकार की लापरवाही, बदइंतजामी और लॉकडाउन के चलते कालाबाजारी की मार झेल रही जनता यदि सरकारी स्तर पर भी आपदा में अवसर की शिकार होकर अपने जान-माल को नहीं बचा पा रही है तो इस सरकार को होने का मतलब क्या है। अब तो इस सरकार की लापरवाही और बदइंतजामी को गिनाने का कोई मतलब ही नहीं है क्योंकि इस लापरवाही की लाश पर अब भी कुंठित हिन्दू बेशर्मी से जश्न मनाने का मौका ढूंढते रहते है। संघी नफरत का जज्बा लिये झपट्टा मारने को तत्पर गिद्ध की तरह वे केन्द्र की लापरवाही का ठिकरा राज्यों पर फोडऩा चाहते हैं।

हैरानी तो इस बात की है कि वे पिछली गलतियों से सबक लेने की बजाय नई-नई गलितयां कर अपनी बेशर्मी का परिचय देते हैं। और हद तो यह है कि वे अब भी यह मानने को तैयार नहीं है कि उनकी लापरवाही और अहंकार की वजह से दूसरी लहर में मौत का तांडव मचा है। सबसे शर्मनाक और हैरानी की बात तो यह है कि सत्ता अब भी इस विपदा से निपटने की कोई कारगार कोशिश नहीं कर रही है। जबकि विशेषज्ञों  की राय में आने वाला वक्त बेहद मुश्किल भरा होगा। ऐसे में आत्मा चित्कार उठता है और कहता है-

बस-बस-बस

सत्ता का हवस, बस-बस

झूठ का साहस, बस-बस

कोरोना के कहर से सब बेबस

छाती पे जलती लाश बस-बस

बदइंतजामी, बेरुखी का कॉकस 

सत्ता का अट्हास बस बस बस

सत्ता की रईसी, प्राण वायु की गरीबी

दबता जनता का नस, बस बस बस

कौशल दबा दो सत्ता का नस

न हो सके टस से मस।।

बस बस बस...

मंगलवार, 9 मार्च 2021

घोर दरिद्रता...


 

अपने को विश्व का सबसे बड़ी पार्टी मानने घोर दरिद्रता से जूझ रही है! इतिहास की इस बेरुखी ने उन्हें इस कदर दरिद्र कर दिया है कि वे दूसरे दलों के नेताओं के पीछे छुप कर अपने इतिहास को छुपाने की कोशिश में लगी है।

यह बात हम पहले भी लिख चुके है कि माफी मांगने वाले वीर सावरकर, गोडसे, दीनदयाल उपाध्याय और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के इस पार्टी के सामने यह संकट सदैव रहेगा कि आजादी की लड़ाई में उनके तरफ से किसी योद्धा का इतिहास में वह नाम नहीं है जिस पर गौरव करके वोट हासिल किया जा सके। यही वजह है कि पांच राज्यों के चुनाव में  उन्हें फिर से एक बार उन महान नेताओं के पीछे छुपना पड़ रहा है जिन्होंने कभी भी संघ के समर्थन में एक शब्द नहीं कहे बल्कि विरोध में खड़े रहे!

हालांकि जंग और चुनाव में सब जायज है बावजूद इसे मानसिक दिवालियेपन की नजर से देखने के बजावय इतिहास को फिर से समझने की जरूरत है। बंगाल चुनाव में भारतीय जनता पार्टी सुभाष बाबू, रविन्द्र नाथ टैगोर, बकिमचंद्र चटर्जी या अरविन्दो का सहारा ले रही है जबकि उसके अपने नायक श्यामा प्रसाद मुखर्जी इसी बंगाल से है लेकिन उन पर मुस्लिम लीग से मिलकर कांग्रेस के खिलाफ सरकार बनाने, गठजोड़ करने का ही इतिहास नहीं है बल्कि भारत छोड़ो आंदोलन के खिलाफ आवाज बुलंद करने का भी आरोप है। इसलिए उन्हें वे किनारे कर सुभाष बाबू के पीछे खड़े हैं। ये अलग बात है कि सुभाष बाबू की मौत पर राजनीति करने वाले और कांग्रेस पर आरोप लगाने वाले 6 साल की सत्ता में किसी रहस्य को नहीं खोज पाये लेकिन यह सवाल कौन पूछे?

इससे भी भयावह राजनीति तो तमिलनाडु के चुनाव में चल रही है। तमिलनाडु की राजनीति के महान सपूत कामराज को कौन नहीं जानता, 15 साल की उम्र में आजादी की लड़ाई और कांग्रेस के इस महान नेता को लोग  आज भी याद करते है। मिड डे मिल और फ्री स्कूली शिक्षा के जानक के रुप में जाने जाने वाले कामराज ने लाल बहादुर शाी और इंदिरा गांधी की सत्ता के सबसे दमदार चेहरे रहे हैं।

ऐसे नेता कामराज के फोटो और कटआउट के साथ तमिलनाडु चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कट आउट का अर्थ क्या है जबकि वे जीवन पर्यन्त संघ का विरोध करते रहे हैं। क्या राजनीति का स्तर और भी गिरने वाला है। बेशर्मी क्या और बढ़ाने वाली है। आप इन सवालों को नजरअंदाज भले ही कर दें लेकिन सवाल उनके भीतर की आदमियत को समाप्त तो कर ही दिया है जो सत्ता मोह में बेशर्मी के हद तक गिर रहे हैं।