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मंगलवार, 5 अगस्त 2025

अमित शाह ने भरी संसद में झूठ बोला

अमित शाह ने भरी संसद में झूठ बोला 



मानहानि के एक केस में कोर्ट के जज ने चीन मामले में जो टिप्पणी की क्या वह सत्ता की बौखलाहट है इसे कुछ ऐसे समझ ले कि…


जब  संसद में ऑपरेशन सिंदूर के बहस के दौरान अमित शाह जी ने संसद में खड़े हो कर लगातार तीन गलत बयानी किया

(ऐसा नहीं है कि इसके पहले भाजपा के सांसदों ने संसद में गलत बयानी नहीं की है बहुत बार किया है)

उस के बाद एक बात बोला जो झूठ था या सच ये पता नहीं 

खैर पहले वो तीन गलत बयानी पढ़ लेते है

1. मैं इतिहास का विद्यार्थी हूं (जबकि विकिपीडिया के हिसाब से अमित शाह जी बायो केमिस्ट्री पढ़े थे)

2. सरदार पटेल जी ने 1960 में विरोध किया (जबकि सरदार पटेल का देहांत 1950 में ही हो गया था)

3. जयशंकर home minister है (जबकि वो विदेश मंत्री है)


फिर सीज़फायर पर अमित शाह जी ने बोला कि

अपने देश के होम मिनिस्टर के बात पे यकीन नहीं है

वो एक संवैधानिक पद पे है

ट्रंप के बात पे यकीन है

फिर

राहुल गांधी जी ने उकसाया कि इंदिरा गांधी का 50% भी है तो मोदी जी संसद में बोले कि ट्रंप ने सीज़फायर नहीं कराया

अगर दम है तो आज शाम मोदी जी बोले कि ट्रंप झूठ बोल रहा है

"‘Say Donald Trump is a liar’.."


मोदी जी भावुक हो गए और सारा कूटनीति भूल गए 

और बोल दिया कि

किसी देश के किसी नेता ने सीज़फायर के लिए कुछ नहीं कहा


अगले दिन अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जी ने भारत पर 25% टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी

क्योंकि ट्रंप साहब को उनका नोबेल प्राइज छूटता दिख रहा था


*"आप क्रोनोलॉजी समझिएगा"*


और लास्ट में एक बात पे गौर कीजियेगा


ये राहुल गांधी कर क्या रहा है


विपक्ष में रह कर मोदी जी और अमित शाह जी से वो बोलवा दे रहा है जो उन्हें नहीं बोलना चाहिए था

और

विपक्ष में रह कर सरकार से वो काम करवा दे रहा है जिसको मोदी जी और अमित शाह जी ने मना कर दिया था

जैसे

जाति जनगणना


राहुल गांधी जी ने बोला था

हम सरकार को मजबूर कर देंगे जाति जनगणना के लिए


एक so called "पप्पू" क्या क्या कर रहा है

ऐसे में मानहानि के एक मामले पर भी बातें होनी चाहिए कि क्या चीन को लेकर कोर्ट ने राहुल गांधी को जो बात बोली है, असल में वो पूरे देश के लिए ये संदेश है कि इस सरकार के खिलाफ अपना मुंह बंद रखिए।


वरना कौन नहीं जानता की चीन ने हमारी ज़मीन कब्जाई है, कुछ नये मैप भी जारी हुए जहां भारत के कयी हिस्सों को चीन का हिस्सा बताया गया।


विदेशी अखबारों से लेकर सैकड़ों आर्टिकलों में भी ये खबर छपी है। स्थानीय लोगों द्वारा बताया गया कि हमारी ज़मीन पर चीन घुसा है।


राहुल गांधी ने वही बात कही है,जिसे कोर्ट गलत बता रहा है,एक बात नोट कर लीजिए, आहिस्ता आहिस्ता हमारे देश की एक एक ईंट गिराई जा रही है।


लोकतांत्रिक ढांचे को जर्जर किया जा रहा है, दुश्मन के खिलाफ मुंह खोलने वाले को चुप किया जा रहा है।


कुल मिलाकर देश को बर्बाद करने की प्रषठभूमि तैयार है, उसमें एक यही बंदा है जो आड़े आ रहा है, इसलिए ये संघियों की नजर में खटकता है।


और हां दुनियां में चीन से बढ़कर हमारा कोई दुश्मन नहीं है, दुश्मन की सरपरस्ती अब कोर्ट भी कर रहा है,वो पट्ठा तो पहले से कर ही रहा था।


हम लुट पिट चुके हैं, और इस लूट में मीडिया और सरकार के साथ अब कोर्ट भी आ गया है.. क्योंकि गौतम अडाणी को चाइना के साथ मिलकर धंधा भी करना है।


और जो धंधे के लिए देश के साथ गद्दारी करेगा, ज्यादा दिन तक आवाम अब उसे मांफ नहीं करने वाली है, सत्ता परिवर्तन के बाद इन लोगों को राहुल गांधी भी नहीं छोड़ने वाले हैं।


ये बात राहुल गांधी खुद भी बोल चुके हैं,भूल ना जाये, इसलिए मैं भी लिखे दे रहा हूं।

हमलोग उसका memes खोजने में व्यस्त है

वो विपक्ष का नेता का भूमिका बेहतरीन तरीके से निभा रहा है(साभार)

शुक्रवार, 1 अगस्त 2025

ट्रंप कितना भी जुतियाये पर राहुल को कोई हक़ नहीं…

 ट्रंप कितना भी जुतियाये  पर राहुल को कोई हक़ नहीं…


क्या हो गया है बीजेपी को, क्या हो गया है मोदी सत्ता को, यह सवाल अब इसलिए बड़ा होने लगा है क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति लगातार मर्यादा लांघ भारत और प्रधानमंत्री का लगातार अपमान करते जा रहे है, यहाँ तक कि अब अर्थव्यवस्था को ही मृत कह दिया लेकिन पूरी बीजेपी चुप रही लेकिन जब पत्रकारों ने राहुल से ट्रंप के इस मृत अर्थव्यवस्था को लेकर सवाल पूछा तो राहुल ने जैसे ही इस पर हामी भरी पूरी बीजेपी राहुल पर पिल पड़ी, ऐसे में ट्रंप पर चुप्पी से उठते सवाल….

सवाल ये है कि_

ट्रंप ने जब भारत की अर्थव्यवस्था को मृत कह दिया,

तब पूरी मोदी/बीजेपी सरकार ने ट्रंप की निंदा क्यों नहीं की..? 


लेकिन प्रेस के पूछने पर जैसे ही

राहुल गांधी ने कहा_ हां सही कहा है कि 

मोदी/बीजेपी ने अपनी नीतियों से देश की अर्थव्यवस्था को मृत कर दिया है..


तो ट्रम्प पर चुप्पी और पूंछ दबाये 

बीजेपी के सांसदों ने राहुल पर हमला बोल दिया..


सवाल ये है कि जब ट्रम्प ने ये बात कही तब_

बीजेपी ने ऐसी बात कहने के लिये ट्रंप की आलोचना में कुछ भी क्यों नहीं कहा? 


बात केवल ट्रेड टैरिफ की नहीं है, 

सवाल इसका है कि ट्रंप भारत का नाम जिस संदर्भ में ले रहे हैं, उसे क्यों सहन किया जा रहा है? 

वे भारत की नीतियों का मज़ाक उड़ा रहे हैं, 

रुस से तेल खरीदने पर भारत पर जुर्माना लगा रहे हैं, 

भारत की कंपनियों पर प्रतिबंध लगा रहे हैं, 

क्या यह किसी भी तरह से मोदी के मित्र का व्यवहार है? 

राहुल पर बोलने वाला मोदी गैंग_ट्रम्प पर चुप क्यों है..??

क्या अंग्रेजी की गुलामी से पैंशन लेने‌ वाले मुखबिर क्या फिर से ट्रम्प को ईस्ट इंडिया बनाने की साजिश में मुंह में दही जमा लिये हैं..??

रविवार, 27 जुलाई 2025

अहमदाबाद प्लेन क्रैश साज़िश…

 अहमदाबाद प्लेन क्रैश साज़िश…


अहमदाबाद में हुई हवाई जहाज़ दुर्घटना क्या किसी की साज़िश थी, इस खेल में कौन शामिल है, प्रारंभिक रिपोर्ट का सामने आना भी क्या षड्यंत्र का हिस्सा है , ऐसे कई सवालों के जवाब इंटरनेट में बिखरे पड़े है ऐसे में भास्कर की रिपोर्ट भी तो साज़िश की ओर इशारा कर रही है , तब कुछ बातें ऐसी समझी जानी चाहिए 

मात्र 43 सेकेंड मे टेक आँफ और क्रँश की घटना हुवी..

अगर ये आखरी सेकेंड थे तो फिर एक पायलट द्वारा ये पुछा जाना - क्या तुमने इंजन बंद किया ?

दुसरे पायलट का जवाब - मैने इंजन बंद नही किया..


फिर मेडे..मेडे..मेडे का मँसेज.


ब्लँक बाँक्स के आधार पर बनाई गई लगभग 35 पन्नो की प्रायमरी जांच मे ये सबकुछ बतलाया गया है..


ये किस आधार पर बतलाया गया ?


विमान मे 2 ब्लँक बाँक्स होते है और इन्हे विमान के पिछले हिस्से मे पुछ की तरफ रखा जाता है..


विमान की पुछ सुरक्षित थी..

मोदी जब घटनास्थल गए तो विमान के पिछले हिस्से की फोटो और वीडियो सार्वजनिक की गई थी..


भौतिकी नियम के अनुसार विमान मुंंह की तरफ से गिरता है..


इस लिये ब्लँक बाँक्स को विमान की पिछली साईड मे रखा जाता है..


दुर्घटना होने के एक दिन पहेले ये विमान पँरीस से आया था..


रात भर अडानी एअरपोर्ट (सरदार वल्लभभाई एअरपोर्ट) पर पार्क किया हुवा था..


मतलब ये विमान अडानी एअरपोर्ट के संबंधित प्रशासन की कस्टडी मे था..


टर्कीश कंपनी की तरफ ध्यान भटकाए जाने के बाद टर्कीश कंपनी ने बयान देकर कहा के इस विमान का मेंटेनेंस हमने नही किया है..


जिस कंपनी ने किया है ऊसका नाम हमे पता है मगर हम किसी विवाद मे पडना नही चाहते..


संघ के और भाजपा के पुर्व मुख्यमंत्री की इस दुर्घटना मे मौत होने के बाद भी देश के किसी भी संघी या भाजपाई के मुंह से ' श्र 'ध्दांजलि का 'श्र' शब्द भी ना निकलना परेशान करता है..


ग्रीन एनर्जी से संबंधित देश का बिजनेस टाइकुन कौन है..?

संबंधित विमान रातभर कहां पार्क था..?

ग्रीन एनर्जी से रूपाणी क्यो खफा थे ?

पता नही..


ऐसे संदेहास्पद वातावरण मे..

ऊसी दिन सुबह 'मिड डे' अखबार मे विमान का बिल्डिंग के बाहर निकला हुवा हिस्सा बतलाया गया था और कुछ घंटो बाद इसी तरह से अहमदाबाद विमान हादसा हुवा..


विश्व को यूरोप अमेरिका  नही चलाते..


विश्व को खुफिया ताकते चलाती है..


यूरोप अमेरिका समेत विश्व के सभी देशो के शासको को यही खुफिया ताकते अपने इशारो से चलाती है..


ये ताकते Jओ* निस्ट है मगर शैतान की ऊपासक होती है..


इन ताकतो को जब भी कोई षडयंत्र या कांड करना होता है तो ये इशारो इशारो मे पहेले ही सार्वजनिक रूप से बतला देते है..


ऐसा करने से पाप नही लगता ऐसा शैतान ऊपासको का विश्वास होता है..


सिमसन कार्टून , द इकानामिक टाईम्स वगैरह के माध्यम से अगले साल दस साल वाली प्रमुख घटनाए सांकेतिक तौर पर बतला दी जाती है..


ऐसे बहोत सारे ऊदाहरण दिये जा सकते है..


खुफिया ताकतो द्वारा बिल्डिंग मे फंसे एअर इंडिया लिखे विमान का फोटो ऊसी दिन सुबह मतलब 12 जुन को प्रकाशित किया जाना और  गुजरात के पुर्व मुख्यमंत्री रूपाणी का ग्रीन एनर्जी से जुडे किसी विवाद के दरमियान हवाई यात्रा करना..


खुफिया ताकतो और रूपाणी  के दुश्मनो का गठजोड होने का संदेह पैदा करती है..


खुफिया ताकतो की अपनी एक सच्चाई है..


टारटेनिक जहाज भी खुफिया ताकतो ने ही डुबोया था..


इस जहाज मे सैर करने के लिये ऊन ऊद्योगपतियो को आमंत्रित किया गया था जो फेडरल बँन्क की स्थापना का विरोध कर रहे थे..


और जहुदियो के आर्थिक जाल को तोडने के लिये समानांतर आर्थिक संस्था खडी करना चाहते थे..


मिड डे मे प्रकाशित चित्र की वजह से विमान मे कोई खराबी हुवी हो ऐसा मानने को मन नही करता..


क्यो की ऐसी घटना घटित होने का समय से पहेले ही इशारा कर देना खुफिया ताकतो की मोडस आँपरेंडी है..


ऊपरोक्त सभी जानकारी के आधार इंटरनेट पर जगह जगह फैले पडे है..


कमेंट मे इसी पर आधारित एक रिल का लिंक कमेंट करने का प्रयास किया जाऐंगा..(साभार)

रविवार, 20 जुलाई 2025

काशी को क्योटा बनाने के बाद अब पटना को पुणे और मोतिहारी को मुंबई…

 काशी को क्योटा बनाने के बाद अब पटना को पुणे और मोतिहारी को मुंबई…


ग़ज़ब दौर है, लोग सच न देखना चाहते हैं और न ही सुनना, सत्ता में बैठे लोग कुछ भी बोलने लगे हैं और लोग ताली बजा रहे हैं । धर्म का नैरेटिव्ह सेट है इसलिए हर चुनाव के पहले इस पर नमक मिर्च का तड़का डाल दिया जाता है और फिर ताली बचाने लगते हैं, कंगना रानौत की हिमाक़त किसी मूर्खता से कम नहीं तो पटना को पुणे बनाने की घोषणा को बेशर्मी नहीं कहा जाना चाहिए…

प्रसिद्ध व्यंगकार हरिशंकर परसाई ने कहा था 

बुद्धिजीवी इस समय संशय से भरे हैं और मूर्ख भरपूर आत्मविश्वास से.

हालांकि इन पर बात करना भी नहीं करने के बराबर ही है. लेकिन जरा सोचिए अगर यह सारी धरती इन्हीं लोल लोगों से भर गई तब बातचीत के विषय कैसे होंगे? कोई भी आकर कह देगा देश को आजादी चिड़िया के अंडे से मिली है. या यह देश डेढ़ सौ सालो की लीज पर है.

कोई यह भी कह सकता है कि नेहरू और गांधी एक भूत है.

हवाई जहाज की खोज हमारे पतंग उड़ाने से हुई है. 

कोई पासपोर्ट की रैंकिंग गिरने को उपलब्धि बता सकता है

और इसलिए कंगना कह रही है कि सरदार पटेल को अंग्रेज़ी नहीं आती इसलिए वे प्रधानमंत्री नहीं बन पाये और अमित शाह का तो दवा है कि अंग्रेज़ी बोलने वालों को एक दिन शर्म आएगी..

ऐसे में समझो कि कुछ तो झोल है 

क्योंकि सरदार पटेल ने लंदन में बाक़ायदा बेरिस्टरी की है

अब थोड़ी बात नॉनबायोलॉजिकल के लिए हो जाये यानी इस झोल पर…

मोदी जानते हैं कि कहाँ क्या बोलना है क्योंकि यह देश दो धड़ों में बंट चुका है जिनमें मिडिल क्लास वर्ग का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया जा रहा। हालात यह है कि ऊंचे दाम और ऊंचे पकवान के क्राइटेरिया में या तो आप खुद को शामिल कीजिए, या फिर अति गरीबी की श्रेणी में जाकर अपना गुजर बसर कीजिए। जाकर 5 किलो राशन की लाइन में लग जाइए तभी आपका घर चल पाएगा।

जनता इतनी मासूम है कि वो साफ साफ ये देख ही नहीं पा रही कि चुनाव आते ही ये मुगलकालीन इतिहास की कब्रें सिर्फ हिन्दू मुसलमान करने के लिए खोदी जा रही है। बहस के ऐसे ऐसे चिन्हित मुद्दों को उकेरा जा रहा है जिनमें हिन्दू मुसलमान की बहस हो। अब करणी सेना के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का स्टेटमेंट ही देख लीजिए सांसद इकरा हसन के लिए। सत्ता जानती है कि इस मुद्दे पर बहस होनी ही है। सत्ता उकसाती है और जनता उछल उछल कर प्रतिक्रिया देने उतर आती है।

असल मुद्दे जनता के बीच से गायब है। रोजगार का इनके पास कोई मॉडल नहीं है। देश को हलक तक कर्ज में डुबाए बैठे है जिसकी भरपाई जनता की जेबों से की जा रही है। आपके अकाउंट से कभी मेंटेनेंस के नाम पर तो कभी एटीएम चार्ज के नाम पर तो कभी यूपीआई चार्ज के नाम पर बिना बताए पैसे काट ले रहे है। आप ट्रेन की टिकट कटाए तो बिना थर्ड पार्टी ऐप के (जिनका चार्ज लगभग 250 से 300 रुपए ज्यादा लगता है) आप आसानी से कर ही नहीं पा रहे। चिड़ियाघर और म्यूजियम जैसे पर्यटन स्थलों पर 25 रुपए की टिकट अब दो गुनी तीन गुनी होकर बिक रही है। एयरपोर्ट में और तीर्थ स्थलों पर ठेके वाली कैंटीनों में डंके की चोट पर 25 का माल 50 में बेचा जा रहा है। 

तब जब थोड़े लोग सत्ता से न डिग सके इसलिए कुछ विकास का दावा कर दो।

लोगो ने काशी को क्योटा बनते तो देख ही लिया है अब पटना को पुणे और मोतिहारी को मुंबई बनते भी देख ही लेंगे…

शनिवार, 19 जुलाई 2025

तब जनसंघ ही नहीं कांग्रेस के भीतर का विरोध भी नहीं डिगा पाई इंदिरा को

 तब जनसंघ ही नहीं कांग्रेस के भीतर का विरोध भी नहीं डिगा पाई इंदिरा को…


अब जब अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत के पाँच विमान गिरने का दावा कर दिया है तब भी प्रधानमंत्री की चुप्पी देश को अपमानित कराने के अलावा क्या है लेकिन आज हम बात कर रहे है उस लौह महिला की जिन्होंने 19 जुलाई 1969 को वह कर दिया जो आज देश के माध्यम और ग़रीब वर्ग का जीवन है…

56 साल पहले 19 जुलाई 1969 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने का ऐतिहासिक फैसला लिया था। इस कदम ने लाखों आम लोगों और ग्रामीणों को बैंकिंग सेवाओं के दायरे में लाया और बैंकिंग संस्थानों को निजी मुनाफे से परे देश के विकास लक्ष्यों के साथ जोड़ा।  

आज, स्वतंत्रता के बाद के भारत को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण सरकारी कदमों में बैंक राष्ट्रीयकरण का एक प्रमुख स्थान है। इसने भारतीय अर्थव्यवस्था को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, और इसके प्रभावों पर आज भी विभिन्न दृष्टिकोणों से चर्चा जारी है।  

1969 से पहले, बड़े निजी बैंक मुख्य रूप से अपने मालिकों और अन्य धनी व्यक्तियों के व्यावसायिक हितों के लिए ही ऋण देते थे। कृषि क्षेत्र को केवल 2% बैंक ऋण मिलता था। लेकिन हरित क्रांति के माध्यम से बड़े कृषि परिवर्तन का लक्ष्य रखने वाले देश के लिए, कृषि क्षेत्र को बैंकिंग समर्थन को कई गुना बढ़ाने की जरूरत थी। यही वह प्रेरणा थी जिसने निजी स्वामित्व से बैंकों को सार्वजनिक क्षेत्र में लाने का फैसला लिया। 1990 के दशक तक, कृषि क्षेत्र के लिए ऋण 15% तक बढ़ गया, जो राष्ट्रीयकरण का एक सकारात्मक परिणाम था।  

राष्ट्रीयकरण से पहले ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाएँ बहुत सीमित थीं। उस समय देश में केवल 7,219 बैंक शाखाएँ थीं, जिनमें से अधिकांश बड़े शहरों और मध्यम आकार के कस्बों में थीं। लेकिन राष्ट्रीयकरण के बाद, बैंकिंग गतिविधियाँ उत्साह के साथ ग्रामीण क्षेत्रों तक फैलीं। अगले चौथाई सदी में बैंक शाखाओं की संख्या आठ गुना बढ़ गई।  

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए यह फैसला लेना आसान नहीं था। विरोधी पक्ष में केवल धनी उद्योगपति ही नहीं थे, बल्कि संगठन परिवार की तत्कालीन राजनीतिक पार्टी जनसंघ और राजगोपालाचारी की स्वतंत्र पार्टी भी थीं, जिन्होंने संसद में बैंक राष्ट्रीयकरण बिल का विरोध किया। कांग्रेस के भीतर भी मोरारजी देसाई जैसे कुछ लोग शुरू में इसके खिलाफ थे। इंदिरा गांधी ने वित्त मंत्री मोरारजी देसाई को हटाकर ही यह फैसला लागू किया। बाद में हुए राष्ट्रपति चुनाव और कांग्रेस के विभाजन में भी बैंक राष्ट्रीयकरण एक महत्वपूर्ण कारक बन गया।  

हालांकि, बैंक प्रशासन में राजनीतिक नियंत्रण और बढ़ते गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) के कारण इसे कई बार आलोचना का सामना करना पड़ा, फिर भी 1969 का बैंक राष्ट्रीयकरण भारत के इतिहास में एक निर्णायक आर्थिक कदम के रूप में आज भी चर्चा में रहता है, जो इसकी प्रासंगिकता और महत्व को रेखांकित करता है।(साभार)

शनिवार, 12 जुलाई 2025

क्या ट्रंप के इशारे पर आया विमान हादसे की यह रिपोर्ट…

 क्या ट्रंप के इशारे पर आया

विमान हादसे की यह रिपोर्ट…


अहमदाबाद में जिस बोईंग ने चार सौ से अधिक लोगों की जान ले ली, उसकी प्रारंभिक रिपोर्ट में बोईंग कंपनी को बचाने का पूरा इंतज़ाम कर लिया गया है, रिपोर्ट में पायलट की भूमिका को लेकर कही गई बात  भारतीयों को बेवक़ूफ़ समझने की कोशिश है, और यह बात तो अंधभक्त भी नहीं पचा सकते कि इतने अनुभवी पायलट फ़्यूल स्विच बंद रखे या बंद कर दें तो क्या यह रिपोर्ट संकेत नहीं दे रहा कि ट्रंप के आगे सत्ता किस कदर नतमस्तक है…

मुझे नहीं मालुम आप लोग इस बात पर क्या प्रतिक्रिया देंगे लेकिन यह सिद्ध हो गया है कि हमारा नेतृत्व एक भीगी बिल्ली कर रही है और ट्रंप हमारे पालन हार बन चुके है।  अहमदाबाद में हुए एयर इंडिया ड्रीमलाइनर के हादसे की एक रिपोर्ट आज लीक हुई है। वैश्विक मीडिया के समझदार एक्सपर्ट बता रहे है कि किसी नतीजे पर पहुँचने में एक साल का समय लगेगा लेकिन भारत ने जो पंद्रह पेज की रिपोर्ट बनाई है उसे वाल स्ट्रीट जर्नल ने लीक कर दिया। 

 रिपोर्ट ने इनडायरेक्ट इशारा किया है कि फ्यूल स्विच पायलट ने ऑफ किया था जिसकी वजह से इंजन को ईंधन नहीं मिला और ड्रीमलाइनर ऊपर नहीं उठ पाया। इस बात  को मोदी के अंधभक्त भी गले नहीं उतारेंगे कि दोनों पायलट इस उड़ान से पहले नौ हजार घंटों की उड़ान का अनुभव रखते हुए काम कर रहे थे। इतने अनुभवी पायलट भला इस तरह की बेवकूफी कैसे कर सकते है ? 

अब आइये इस लेख की शुरूआती लाइन पर।  ड्रीमलाइनर बोईंग का प्रोडक्ट है।  बोईंग आज दस लाख करोड़ की कंपनी है।  जब आप यह पढ़ रहे है तब बोईंग के कम से कम तीन हजार प्लेन कही से उड़ान भर रहे हैं , कहीं उतर रहे है , कहीं हवा में होंगे।  अगर इस रिपोर्ट में एक लाइन भी बोईंग के खिलाफ होती तो बोईंग का स्टॉक मार्किट ओपन होते ही दस परसेंट का गोता लगाता नजर आता। 


सनद रहे। अमेरिका इस समय एक सनकी के हाथ में है , और यह सनकी अपने देश को लेकर अपने वाले से ज्यादा पसेसिव है। उसके देश की किसी कंपनी की गुडविल खराब हो वह बर्दाश्त नहीं करेगा ! बस अपनी भीगी बिल्ली ने उस लकड़बग्घे को खुश करने के लिए सारा दोष अपने निर्दोष पायलटों पर डाल  दिया। शहीद अपनी सफाई देने नहीं आने वाले। पन्दरह दिन बाद किसी को याद भी नहीं रहेगा कि अहमदाबाद ने ऐतिहासिक विध्वंस देखा है।(साभार)

बुधवार, 9 जुलाई 2025

ऑपरेशन सिंदूर पर राफ़ेल का ये सच मोदी की नींद उड़ा देगा…

 ऑपरेशन सिंदूर पर राफ़ेल का ये

 सच मोदी की नींद उड़ा देगा…


आज फ्रांस से खबर आई है की राफेल विमान बनाने वाली कंपनी द साल्ट ने एक बयान जारी किया और उसमें कहा स्ट्राइक में एक ही राफेल गिरा है और उसकी वजह भी कुछ तकनीकी खामी है! द साल्ट ने यह भी कहा भारत में विमान की देखरेख उपयुक्त तरीके से नहीं हो रही है उल्लेखनीय है विमान की देखभाल का ठेका सरकार ने अनिल अंबानी को दिया था! 

द साल्ट यह भी कहा भारत की  ट्रेनिंग में कमी है इस वजह से उपयुक्त पायलट नहीं है! 


द सॉल्ट ने भारत सरकार से आग्रह किया कि वह एक ऑडिट कंपनी भारत भेजना चाहता है, जो बचे हुए राफेल की जांच करना चाहती है और यह भौतिक रूप से सत्यापित करना चाहती है कितने राफेल धारा शाही हुए लेकिन भारत सरकार ने द साल्ट को पूरी तरह मना कर दिया! सरकार ने कहा यह हमारे आंतरिक मामले में दखल होगा!

इस परिपेक्ष को यूं भी समझा जा सकता है भारत सरकार सच्चाई बताने की इच्छुक नहीं है! 

राहुल गांधी ने एक सवाल पूछा और एक विचारधारा ने उन्हें देशद्रोही करार  दे दिया! अब वही सवाल देश की जनता को परेशान कर रहा है! 

इधर भारत के मुख्य रक्षा अधिकारी सीडीएस चौहान साहब ने सिंगापुर में बयान दिया था, विमान के संदर्भ में सेना के पक्ष पर तकनीकी त्रुटियां हुई थी और फिर उसे हमने सुधारा और पाकिस्तान के ठिकानों पर आक्रमण किया? उन्होंने स्वीकार किया हमारे कुछ विमान गिरे थे! 

इंडोनेशिया में डिफेंस अटैची शिवकुमार ने कहा भारतीय सेना के हाथ सरकार ने बांधे हुए थे इस वजह से हमारे विमान गिरे! 

और 2 दिन पहले उप सेना अध्यक्ष राहुल  के सिंह का बयान भी सुर्खियों में रहा , जिसमें  भी उन्होंने यह सवाल उठाए की सरकार ने हमें पूरी इजाजत नहीं दी इस वजह से हमारे विमानो का नुकसान हुआ! 

भाजपा के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी दावा करते हैं पांच राफेल गिरे! 

अंतरराष्ट्रीय मीडिया में रायटर के , अल जजीरा के अलग-अलग दावे हैं!

एक तरफ हमारे सेना के अधिकारी मान रहे हैं, हमारे एक से अधिक विमान का नुकसान हुआ वही द साल्ट का कहना है की एक ही राफेल गिरा! और अंतरराष्ट्रीय मीडिया का अलग ही कहना है!

द साल्ट एक विमान कंपनी है और एक राफेल की कीमत ढाई हजार बिलियन डॉलर है ऐसे में यदि यह सिद्ध हो जाता है चीनी मिसाइल ने भारत के राफेल गिरा दिए तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार में राफेल की मार्केटिंग बिल्कुल शून्य हो जाएगी क्योंकि इतने महंगे विमान पर लोगों का भरोसा खत्म हो जाएगा!

विश्लेषक यह भी मानते हैं राफेल का स्टैंड इसी के चलते पतली गली निकालने की कोशिश कर रहा है!

 लेकिन क्या सरकार का दायित्व नहीं बनता प्रमाणिकता से देश की जनता को सही बात बताएं ताकि एक तो यह कंट्रोवर्सी बंद हो और दूसरा सेना के पराक्रम को कोई प्रश्न चिन्हित नहीं कर सके?

और जवाब आने के बाद शायद देशद्रोही कौन इसका भी फैसला हो जाएगा! और सबसे बड़ी बात तो यह है कि साल्ट के इस सच ने मोदी सत्ता की करतूत खोल कर रख दी है…


क्योंकि कहीं-कहीं पूरे संदर्भ में और सेना के अधिकारियों के बयान के परिपेक्ष में ऐसा लगता है सरकार अपनी गलतियां सेना के सिर पर कर कर स्वयं बचना चाहती है!


जिस तरह सत्ता के प्रतिनिधियों ने सेना के अधिकारियों का 

अपमानित किया है, उनको आरोपित किया है, सेना के पराक्रम पर सवाल खड़े किए हैं उससे इस बात को और ज्यादा बल मिलता है!

गुरुवार, 26 जून 2025

आपात काल का एक और सच…

 आधी रोटी खाएँगे , इंदिरा वापस लायेंगे…

और इस नारे ने इंदिरा को वापस सत्ता में ले आये..


लेकिन संसद की देहरी से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आपातकाल की याद दिलाते समय यह बात भूल गये, भूले तो वे विनोबा जी द्वारा इस आपात काल को अनुशासन पर्व कहा था,, हम आपात काल की वकालत नहीं बल्कि एक और सच्चाई आपको दिखा रहे है…

दरअसल आरएसएस और बीजेपी के पास गाड़े मुर्दे उखाड़ने के अलावा कुछ बचा भी नहीं है तब सीतामढ़ी के राजकुमार गुप्ता ने जो लिखा वह भी लोगों को जानना चाहिए…  

इंदिरा गांधी ने संविधान के दायरे में रहते हुए अराजकता, देशविरोध और विदेशी एजेंटों से  देश को बचाया. अगर वह निर्णय नहीं लिया गया होता, तो भारत का राजनीतिक और सामाजिक ढांचा नष्ट हो जाता.


आपातकाल को केवल एकतरफा आलोचना से नहीं, बल्कि उस समय की ऐतिहासिक परिस्थितियों, सामाजिक विघटन और विद्रोह के प्रयासों की पृष्ठभूमि में देखना होगा।


जब देश अराजकता के कगार पर था, तब एक स्त्री ने " आयरन लेडी " ने सही निर्णय लेकर भारत को बचाया.... 

                        


नए संसद सत्र प्रारंभ के ठीक पूर्व संसद की देहरी से आपातकाल की याद दिलाते नरेंद्र मोदी शायद यह भूल रहे हैं कि इन्हीं के पितृ संगठन आरएसएस की बढ़ती अनुशासनहीनता के कारण ही आपातकाल लगाया गया था जिसे विनोबा जी ने अनुशासन पर्व की संज्ञा दी थी. 


इस दौर में हर जगह संघ के संधियों की साहूकारी चल रही थी. मुनाफाखोरी और गोदामों में अनाज भरकर कालाबाजारी की जा रही थी. जबकि किसान और आम आदमी कर्ज़ के तले दबा जा रहा था. लोगों की निजी संपत्ति और ज़मीन जायदाद इन लोगों के अधीन गिरवी होते जा रहे थे. मजदूर बंधुआ मजदूरी करने विवश किए जा रहे थे.


कालेज, यूनिवर्सिटीज बंद से हो गए थे और पाठ्यक्रम तीन साल पीछे चल रहा था. हर जगह अव्यवस्था का आलम सम्पूर्ण क्रांति के नाम पर चल रहा था. 


ट्रेन घंटों पीछे चला करती थी और इनके साथी जार्ज फर्नांडिस डायनामाइट लगा कर बड़ौदा में ट्रेन उड़ाने का षड्यंत्र रच रहे थे. 

जेपी ने पुलिस और सेना से सरकार का आदेश न मानने का आह्वाहन कर डाला. यह सब भारत जैसे लोकतंत्र में सीधे विद्रोह की चेष्टा थी. अगर यह सब चलता रहता, तो भारत एक अराजक, विखंडित और गृहयुद्ध की ओर बढ़ता देश बन जाता.


इंदिरा जी ने आपातकाल लगा कर देश को विखंडन और विदेशी षड्यंत्रों से बचाने का एक रणनीतिक कदम उठाया, सब चीजों को व्यवस्थित किया. बीस सूत्री कार्यक्रम लागू किया जिससे हर वंचित को लाभ पहुंचाने के वास्तविक प्रयत्न किए गए. बैंक फाइनेंस की झड़ी लगा दी गई ताकि हर व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुसार व्यवसाय और जीवनयापन कर सके. 


ट्रेन इतने समय पर चलने लगी थीं कि उनके आगमन से लोग अपनी घड़ी मिलाने लगे थे. हर किस्म की हड़तालें बंद हो गई थी और कल कारखाने पूर्ववत चालू हो गए थे.  जनता एक तरह से खुश हो रही थी. यह कदम भारत को अराजकता, सामाजिक विघटन, और विदेशी प्रायोजित "टुकड़े-टुकड़े गैंग" के हाथों में गिरवी रखने से बचाने का था।


सबसे ज्यादा  संघ परिवार के लोग ही जेल भेजे गए थे. यही वे संघी थे जो जेल से अपने माफीनामे सरकार को भेजा करते थे और उनका विधिवत प्रकाशन समाचार पत्रों में सशुल्क छपवाते थे, और तब पैरोल पर जेल से छूटते थे. एक प्रकार से तब वे अपने आप में सावरकर को दोहरा रहे थे. देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने की यह कोई बड़ी सजा नहीं.

सेना के साथ मिलकर कुछ लोग सत्ता हथियाना चाहते थे. वो इलाहाबाद का जज भी जे पी का रिश्तेदार था. कमाल तो देखो, इनके समुदाय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपने को sc ( हरिजन ) घोषित करने का मुकदमा कर रखा है जो आज भी लंबित है. बुरा दौर था. मैं उसका समर्थन नहीं करता. लेकिन आज का दौर उससे भी बुरा है.

यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि इंदिरा गांधी जब इमरजेंसी हटाने पर विचार कर रही थीं तो कौन लोग इमरजेंसी के पक्ष में बयान दे रहे थे? अगर विकीपीडिया पर भरोसा करें तो इमरजेंसी हटाए जाने की घोषणा के महज चार महीने पहले- यानी नवंबर 1976 में माधवराव मुले, दत्तोपंत ठेंगड़ी और मोरोपंत पिंगले के नेतृत्व में 30 से ज़्यादा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने इंदिरा गांधी को चिट्ठी लिखकर कहा था कि अगर आरएसएस कार्यकर्ताओं को रिहा कर दिया जाए तो वे लोग इमरजेंसी का समर्थन करेंगे. वाजपेयी भी इसके पक्ष में थे.

संजय गांधी की नसबंदी की जबराना हरकतों की वजह से इंदिरा गांधी चुनाव हारी और बाद में जो संघनीत सरकार बनी, उसने सबसे पहले ऐसे तमाम जेल यात्रियों के लिए स्वतंत्रता सेनानियों की तरह पेंशन शुरू की गई जिसका लाभ उन्हें अब तक मिल रहा है जो अभी शायद 25000 प्रतिमाह है. आंदोलनजीवी को अशांति फैलाने का यह पुरस्कार कितना वाजिब है यह देश तय करेगा.

 इमरजेंसी उपरांत इंदिरा जी चुनाव हार गयीं और इंदिरा जी के विरूद्ध भ्रष्टाचार और तमाम फालतू के आरोप लगाकर जांच करने के लिए गुजरात के एक जज छोटा भाई शाह के नेतृत्व में शाह कमीशन बनाया गया ।

वरिष्ठ पत्रकार खुशवंत सिंह ने कहा था कि शाह कमीशन में कार्यवाही नहीं खिलवाड़ हो रहा था।

उस कमीशन के सामने कांग्रेस सांसद शशि भूषण बाजपेई ने ३५० पन्नों की साक्ष्य प्रस्तुत की जिसमें जनसंघ के एकाउंट नंबर और उनमें आने वाले पैसे का जिक्र किया गया और शाह कमीशन की रिपोर्ट बिल्कुल पढ़ी नहीं गयी।

जनता पार्टी की सरकार मोरारजी देसाई के नेतृत्व में बनी और वो बेटे को दलाली करवाने लगे और ये पहले लिख चुका हूं और जयप्रकाश नारायण दिल्ली आये और दलाली देखी तो उनको दिल्ली के मौर्या शेरेटन होटल में पूरे सम्मान के साथ नजरबंद कर दिया गया और कुछ दिन बाद जेपी किडनी पकड़कर बिहार वापस चले गये।

 कुछ ही दिनों बाद सारा झूठ का महल भरभरा कर गिर गया और लोग चीखने लगे " आधी रोटी खाएंगे इंदिरा वापस लायेंगे" 

कुदरत ने आगे और खेल दिखाया आगे चलकर। 

देश के साथ गद्दारी करने वाले निक्सन के दलाल जेपी कैसे निपटे? अटल बिहारी वाजपेई और जार्ज फर्नांडिस दस दस साल देश के साथ गद्दारी करने की सजा पाकर मरे और उनका बास रिचर्ड निक्सन अमरीका में जलील करके वाटरगेट कांड में महाभियोग के जरिए हटाया गया और आज कैनेडी, आइजनहावर या ओबामा की तरह उसे कोई याद करने वाला नहीं है और शेरनी की तरह मुस्कुराते हुए शहीद हुयीं इंदिरा जी को कोई भूलने वाला नहीं है। 

तुम मर जाओ जेपी ... 

क्या आप जानते है कि जेपी के कंधों पर सवार होकर आने वाली जनता सरकार, जेपी की मौत के लिए कितनी उत्साह से भरी हुई थी। जेपी, जो आंदोलन के नेता थे, जनता सरकार की सत्ता में दलाली देखकर टूट गए। मौर्या शेरेटन होटल में नजरबंद किए गए और बीमार होकर लौटे।

हांजी, बीमार जेपी के मरने के पहले ही उन्हें संसद में हड़बड़ तड़बड़ श्रद्धाजंलि भी दे दी थी। फिर पता चला, अभी साहब जिंदा है, तो भरी संसद से माफी मांगी गयी। 

गूगल कीजिए, मिल जाएगा। 

इंदिरा की "तानाशाही" के खिलाफ...? 

जेपी आंदोलन आखिर था क्यों? ऐसा कौन सा भ्रष्टाचार हो गया? जब नियमित चुनाव हो ही रहे थे, तो तानाशाही कैसे आ गयी? और जब माँग बिहार विधानसभा बरखास्त करने की थी, तो यह इंदिरा गांधी की सत्ता उखाड़ने की ओर क्यों बढ़ गयी?

◆◆◆◆

वे तानाशाहीपूर्ण निर्णय क्या थे?


प्रिवीपर्स खत्म करना?? बैंक नेशनलाइजेशन?? हरित क्रांति?? पाकिस्तान को दो टुकड़े करना??? या कांग्रेस के मोरारजी सहित कांग्रेस के सिंडिकेट को बेरोजगार कर देना?? 

आह, क्या मेस के खाने की फीस बढ़ जाना, गेहूं की कीमत बढ़ जाना, बेरोजगारी बढ़ जाना, रेलवे के वेतम भत्ते न बढ़ाना?? ये इतना बड़ा संकट था, कि देश की सेना और पुलिस से विद्रोह का आव्हान किया जाए। 

अगर हां, तो क्या आप आज के विपक्ष को, इन्हीं कृत्यों के लिए आप समर्थन देंगे?? 

●●

दरअसल 1975 की इमरजेंसी के बाद तो आप नसबन्दी, संजय गांधी, तुर्कमान गेट, मीसाबन्दी और किशोर कुमार के गाने न बजाने को तानाशाही गिना सकते हैं। 

लेकिन 1975 के इसके पहले कौन से निर्णय थे, जिसके खिलाफ जेपी आकर खड़े हो गए। 

कोई बताये...

मुस्लिम लीग जिन्ना के साथ सरकार बनाने वाले, अंग्रेजों के मुखबिर, गांधी के हत्यारे, सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह के विरोधी, संविधान और तिरंगा को जलाने वाले किस मुंह से संविधान रक्षा की बात करते हैं? 

जनता ने जल्द ही देखा कि संघ-जनसंघ-जनता पार्टी की सरकार न तो अनुशासन ला सकी, न विकास दे सकी। जल्द ही पूरे देश में नारा गूंजा —

"आधी रोटी खाएंगे, इंदिरा को लाएंगे!"

जनता का मन पलटा और 1980 में इंदिरा गांधी फिर सत्ता में लौटीं।

बा'द में जेपी ने इंदिराजी से माफ़ी मांगी थी- जेपी ने क़ुबूल किया था कि इंदिराजी के ख़िलाफ़ आंदोलन ग़लत था.(साभार)

बुधवार, 11 जून 2025

ट्रंप के भारत विरोधी एजेंडे की असली वजह…

 ट्रंप के भारत विरोधी एजेंडे की असली वजह…


यह पूरा देश जानता है कि कभी देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को अपना सबसे बड़ा मित्र बताया था तब ट्रंप आख़िर ऐसी हरकत क्यों कर रहा है जिससे मोदी की छीछालेदर तो हो ही रही है भारत का नाम भी न केवल दुनिया में ख़राब हो रहा है बल्कि नई तरह की मुसीबत खड़ी हो रही है…

क्या इसकी वजह नरेंद्र मोदी की कोई चाल है जिसकी वजह से ट्रंप नाराज़ हो गया, या फिर इसकी वजह मोदी का मित्र प्रेम है या फिर ब्रिक्स में डॉलर को चुनौती देना या फिर कुछ और …

सोशल मीडिया में कितने ही क़यास चल रहे है इन क़यासों के बीच रजनीश जैन लिखते हैं- लॉस एंजेलिस में चल रहे दंगे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के लिए सिरदर्द बनते जा रहे हैं, लेकिन उनका भारत-विरोधी एजेंडा रुकने का नाम नहीं ले रहा। वायरल तस्वीरों में एक अप्रवासी  भारतीय छात्र को हथकड़ियों और बेड़ियों में जकड़ा हुआ देखकर हर भारतीय का खून खौल उठता है। यह न केवल एक व्यक्ति का अपमान है, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के स्वाभिमान पर हमला है। फिर भी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रहस्यमयी चुप्पी देश को हैरान कर रही है।

ट्रम्प प्रशासन ने अवैध प्रवासियों के खिलाफ सख्ती बरतते हुए भारतीयों को निशाना बनाया है। 2025 में सैन्य विमानों से 104 भारतीयों को हथकड़ियों में वापस भेजने की घटना ने दुनिया भर में सुर्खियां बटोरीं। सामरिक विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने सही कहा कि भारत को अमेरिका से मानवीय व्यवहार की मांग करनी चाहिए थी, न कि अपराधियों सा बर्ताव स्वीकार करना चाहिए था। ट्रम्प का यह रवैया उनकी भारत-विरोधी नीतियों का हिस्सा है, जो भारत-पाकिस्तान युद्धविराम में मध्यस्थता के दावे और भारत के रूस-चीन संबंधों पर तंज से स्पष्ट है।

मोदी सरकार की चुप्पी इस मामले को और गंभीर बनाती है। कभी ट्रम्प के लिए "अबकी बार ट्रम्प सरकार" का नारा देने वाले मोदी आज उनके सामने भारत का सम्मान दांव पर लगने के बावजूद खामोश हैं। क्या यह वही "मजबूत" भारत है, जिसका दावा सरकार करती रही है? विदेश मंत्रालय की ओर से सिर्फ औपचारिक बयानबाजी और सहयोग की बातें सामने आ रही हैं, लेकिन ठोस कदमों का अभाव है।

भारत को अब कूटनीतिक दबाव बनाना होगा। ट्रम्प के टैरिफ और निर्वासन नीतियों का जवाब भारत को अपने व्यापारिक और सामरिक हितों की रक्षा करते हुए देना चाहिए। भारतीय छात्रों और प्रवासियों के सम्मान की रक्षा के लिए अमेरिका में भारतीय दूतावासों को सक्रिय होना होगा। मोदी सरकार को चाहिए कि वह ट्रम्प के सामने भारत का पक्ष मजबूती से रखे, न कि चुप्पी साधे। देश का स्वाभिमान दांव पर है, और अब समय है कि भारत अपनी आवाज बुलंद करे।  लेकिन सिंदूरी लाल अपने ग्यारह साल को सदी के बेहतरीन साल मनवाने को आमादा है।

रविवार, 8 जून 2025

मंदिर-मंदिर घुमते मस्क की सच्चाई क्या हिंदू धर्म का अपमान नहीं…

 मंदिर-मंदिर घुमते मस्क की सच्चाई क्या हिंदू धर्म का अपमान नहीं…


एलन मस्क के पिता एरोल के भारत आ कर मंदिर मंदिर घुमते तस्वीर को लेकर कितने ही सवाल है और सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि जिस व्यक्ति का पूरा जीवन सनातन धर्म के विपरीत रहा है उसे लेकर न तो नफ़रती चिंटुओं की भावना आहत हो रही है न ही मंदिर के पुजारियों की। गौ मांस का सेवन करने वाले एरोल सिर्फ़ बिज़नेस के लिए भारत आये हैं और वे मंदिर मंदिर सिर्फ़ सरकार को खुश करने घुम रहे हैं इसके बाद भी यदि नफ़रती चिंटुओं को उनके साथ तस्वीर खिंचाने में मज़ा आ रहा है तो आप भी जान ले कि एलन मस्क के इस पिता एरोल की हक़ीक़त…

एरोल ग्राहम मस्क का जन्म वाल्टर और कोरा अमेलिया मस्क ( नीरॉबिन्सन) के घर 25 मई 1946 को प्रिटोरिया में हुआ था। उनके पिता दक्षिण अफ़्रीकी थे और उनकी माँ अंग्रेज़ थीं। उन्होंने क्लैफ़हम हाई स्कूल में पढ़ाई की, जहाँ उनका मेय हल्दमैन के साथ रिश्ता शुरू हुआ [ 3 ] जिनसे उन्होंने 1970 में शादी की। [ 4 ] परिवार प्रिटोरिया में रहता था , जहाँ मेय ने आहार विशेषज्ञ और एक मॉडल के रूप में काम किया। [ 3 ] उनके पहले बच्चे, एलोन रीव मस्क का जन्म 28 जून 1971 को हुआ, जिसका नाम मेय के दादा जे. एलोन हल्दमैन के नाम पर रखा गया, रीव उनकी नानी का पहला नाम था। [ 3 [ 1 ]

1979 में मस्क और उनकी पत्नी मेय का तलाक हो गया। [ 3 [ 23 ] अपने संस्मरण में मेय ने अपनी शादी को अपमानजनक बताया और आरोप लगाया कि एरोल हिंसक था। [ 24 ] वह अपने तलाक के दौरान एक समय को याद करती है जब उसने एक पड़ोसी के घर में शरण ली थी जब एरोल उसे ढूंढते हुए चाकू लेकर आया था। [ 12 ] तलाक के बाद, मस्क ने अपने बच्चों की कस्टडी के लिए अपनी पूर्व पत्नी पर बार-बार मुकदमा किया। [ 12 ]उन्होंने कुछ समय के लिए सू नाम की एक महिला से शादी की थी। [ 12 ]

1990 के दशक की शुरुआत में, एरोल ने, जो उस समय 45 वर्ष के थे, 25 वर्षीय हेइडे बेजुइडेनहौट से विवाह किया, जिसके बारे में उन्होंने कहा कि वह "मेरे जीवन में देखी गई सबसे सुंदर महिलाओं में से एक थी।" [ 25 ] बेजुइडेनहौट से उनकी दो बेटियाँ थीं। [ 26 ]

1992 में एरोल मस्क दक्षिण अफ्रीका में Heidi Bezuidenhout नाम की महिला से दूसरी शादी करते हैं ,


● Heidi को पहली शादी से चार साल की बेटी Jana थी...!


● Jana जब जवान होती है तब एरोल मस्क अपनी इस सौतेली बेटी को पेट से कर देता है अब तो वो दो बच्चों की माँ हैदोनों केबीच 42 वर्ष का अंतर है...!


 एलन मस्क अपने पिता की हरकत पर उन्हें EVIL कहा हैइस बात की सच्चाई इसकी ख़ुद की वेबसाइट विकिपीडिया पर भीमौजुद है...!


● अब ऐसे आदमी को एक राज्य में मंदिर दर्शन के नाम पर स्टेट गेस्ट का दर्जा दिया जा रहा है क्या यह उचित है...?

दूसरी अहम बात ये एलन मस्क का पिता तो गौ मांस भी खाता है,

इसे प्रभु श्री राम जी के मंदिर औऱ अयोध्या में इतनी इज़्ज़त क्यो दी जा रही है VHP Digital वालो...?

या अब RSS org हिंदू की भावनाओं को रुपए में बेचते हो...?

● ज्ञात हो एलन मस्क ऐरोल मस्क की पहली बीवी से पैदा हुवे हैं जिसे ऐरोल मस्क ने तलाक़ देकर दूसरी महिला के साथ सालों तकलिव इन रिलेशनशिप में थे लेक़िन उससे कोई संतान नही होने से उससे अलग होकर तीसरी शादी Heidi Bezuidenhout नाम कीमहिला से किये जिस महिला की उसके पहले तलाकशुदा पति से महज 4 साल की बेटी थीजिसका नाम Jana है अब इसी सौतेलीबेटी के जवान होने पर ऐरोल मस्क को 2 औलाद Jana से हुवे हैं , ऐसे चरित्रहीन (कैरेक्टर लेसको मंदिरों में घुमाना स्टेट गेस्ट बनाना कितना  उचित है...!

शुक्रवार, 6 जून 2025

दोस्त दोस्त न रहा…

 दोस्त दोस्त न रहा…


दरअसल न तो ट्रंप किसी के दोस्त हो सकते हैं और न ही अमेरिका ? ऐसे में ट्रंप को जिताने के लिये जिस तरह से नमस्ते ट्रंप का नारा बेकार गया उसी तरह से एलन मस्क की दोस्ती भी छू हो गई । क्या होगा इसका दूरगामी परिणाम..

असल में दोस्ती बेहद ही नाजूक रिश्ता है, और यदि दोस्ती इसलिए हुई हो कि स्वार्थ पूरा हो तब इसका टूटना तय है और शायद यही वजह है कि अपनी दूसरी पारी में ट्रम्प ने इस दोस्ती की पोल खोल दी और न केवल मोदी सरकार बल्कि भारतीयों की बेइज्जत करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ा लेकिन मोदी ख़ामोश हैं । क्यों? ये बड़ा सवाल है ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अपने उद्योगपति मित्र की वजह से क्या ब्लेकमेलिंग का शिकार हो रहे हैं 

तो दूसरी तरफ़ एलन मस्क से भी ट्रंप के रिश्ते समाप्त होने की ख़बर हैं लेकिन मोदी की तरह मस्क चुप नहीं हैं बल्कि वे खुलकर सामने आ गये हैं।

हालाँकि दोनों तरफ से आरोपों की झड़ी लग चुकी है , एक दूसरे को बर्बाद करने की कस्मे खाई जा रही है।  मस्क ट्रम्प पर महाभियोग चलाने के लिए कांग्रेस के सदस्यों से अपनी आत्मा जगाने की बात कर रहे है। ट्रम्प सरकारी ठेकों से मस्क को निकालने की बात कर रहे है। 

इसी दौरान मस्क ने ' एप्सटीन ' फाइल को सार्वजनिक करने की मांग कर दी है।  रंगीन मिजाज यौन अपराधी जेफ्री एप्सटीन ने आत्म हत्या कर ली है लेकिन उनके मुक़दमे से संबंधित दस्तावेजों में ट्रम्प का नाम भी आया है। ट्रम्प का चरित्र वैसे भी खुली किताब रहा है। आप चाहे तो दो और दो का जोड़ लगाकर अपनी राय बना सकते है !

दो भैंसों की लड़ाई में हमेशा घाँस कुचली गई है। कल डोजोन्स गिरकर बंद हुआ और टेस्ला के शेयर इतिहास में दूसरी बार 14 परसेंट हलके हुए। मस्क की दौलत के सागर से 34 बिलियन डॉलर की बूंद छलक गई। 

है न ग़ज़ब क़िस्से, दोस्ती के ये दोनों क़िस्से इतिहास में दर्ज तो होंगे लेकिन इसे किस रूप में लिया जाएगा , कहना मुश्किल है।