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रविवार, 13 सितंबर 2026

छत्तीसगढ़ में 'पुत्रमोह' की सियासत: क्या बदलेगा दशकों पुराना इतिहास या दोहराई जाएगी कहानी?

 छत्तीसगढ़ में 'पुत्रमोह' की सियासत: क्या बदलेगा दशकों पुराना इतिहास या दोहराई जाएगी कहानी?


विशेष विश्लेषण | राजनीति

छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों एक सवाल फिज़ाओं में तैर रहा है—क्या राज्य को जल्द ही एक और 'सीएम सन' (मुख्यमंत्री का बेटा) बतौर प्रमुख नेता के रूप में स्थापित होता दिखेगा? पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के उनके जन्मदिन के अवसर पर दिए गए एक बयान ने प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है [01:41]। भूपेश बघेल ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पर तंज कसते हुए कहा था कि उनके बेटे चैतन्य बघेल ('बिट्टू') की राजनीति में आने की कोई मंशा नहीं थी, लेकिन जांच एजेंसियों और राजनीतिक घटनाक्रमों ने उन्हें नेता बनने पर मजबूर कर दिया [01:52]।

बघेल का यह बयान महज़ एक राजनीतिक तंज नहीं है, बल्कि इसे छत्तीसगढ़ की राजनीति में 'बिट्टू' की सियासी री-लॉन्चिंग के तौर पर देखा जा रहा है [02:12]। हालांकि, अगर छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास के पन्नों को पलटें, तो मुख्यमंत्रियों के बेटों या परिजनों की राजनीति में एंट्री कोई नई बात नहीं है [02:34]।

इतिहास के पन्ने: सफलता और सीमाओं का लेखा-जोखा

1. पंडित रविशंकर शुक्ल का दौर और श्यामाचरण शुक्ल की सफलता

अविभाजित मध्य प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल के पुत्र श्यामाचरण शुक्ल राजनीति में आए और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे [00:19]। उनके दूसरे पुत्र विद्याचरण शुक्ल ने भी केंद्र की राजनीति में अपनी धाक जमाई [00:32]। हालांकि, श्यामाचरण शुक्ल के पुत्र अमितेश शुक्ल विधायक और मंत्री पद तक तो पहुंचे, लेकिन उससे आगे की राह आसान नहीं रही [03:13]।

2. सारंगढ़ राजपरिवार की अनूठी राजनीतिक विरासत

सारंगढ़ के राजा नरेशचंद्र सिंह के पुत्र संग्राम सिंह चुनावी राजनीति में खास मुकाम नहीं बना पाए [03:25], लेकिन उनकी पत्नी ललिता देवी और तीन पुत्रियों ने इतिहास रचा। ललिता देवी पुसौर सीट से निर्विरोध विधायक चुनी गईं [03:49]। उनकी बेटी कमला देवी विधायक और मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री बनीं, जबकि पुष्पा देवी (रायगढ़) और रजनीगंधा (महासमुंद) ने सांसद का सफर तय किया [04:02]।

3. मोतीलाल वोरा और अजित जोगी का दौर

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे मोतीलाल वोरा के पुत्र अरुण वोरा विधायक तो बने, लेकिन मुख्यमंत्री स्तर की राजनीतिक सफलता उनसे दूर ही रही [04:37]।

छत्तीसगढ़ गठन के बाद प्रथम मुख्यमंत्री अजित जोगी के पुत्र अमित जोगी ने भारी मतों से अपनी पहली विधायकी जीती [05:00], लेकिन बाद के राजनीतिक घटनाक्रमों और उथल-पुथल के चलते उनकी राजनीतिक राह काफी चुनौतीपूर्ण हो गई [05:11]।

4. डॉ. रमन सिंह और अभिषेक सिंह

प्रदेश में 15 वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे डॉ. रमन सिंह ने भी अपने पुत्र अभिषेक सिंह को राजनीति में उतारा [05:32]। अभिषेक सिंह राजनांदगांव से सांसद चुने गए, लेकिन पनामा पेपर्स और विभिन्न विवादों के बाद वे मुख्यधारा की चुनावी राजनीति की रेस में पीछे छूट गए [05:46]।

चैतन्य बघेल 'बिट्टू': लॉन्चिंग और भावी चुनौतियाँ

पाटन से छह बार के विधायक और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पुत्र चैतन्य बघेल की राजनीति में शुरुआत से बहुत सक्रिय रुचि नहीं थी [06:13]। लेकिन ईडी, सीबीआई और अन्य जांच एजेंसियों की कार्रवाई के बीच उनका नाम सुर्खियों में आया [06:40]।

अब सवाल यह उठता है कि क्या भूपेश बघेल अपने बेटे की राजनीतिक ताजपोशी अपने पारंपरिक गढ़ पाटन से कराएंगे, या फिर दुर्ग ज़िले की किसी अन्य सीट या बालोद-गुंडायदेही जैसे सुरक्षित क्षेत्र से उन्हें मैदान में उतारेंगे [07:00]?

आगे की राह कितनी आसान?

 गुटबाज़ी और अंदरूनी समीकरण: कांग्रेस की मौजूदा राजनीति में अंदरूनी खींचतान और नए समीकरण बनते-बिगड़ते दिख रहे हैं [07:22]।

 विरोधी खेमा: भूपेश बघेल की अपनी राजनीतिक शैली के कारण एक तरफ जहाँ उनका मजबूत जनाधार है, वहीं विरोधियों की संख्या भी कम नहीं है [07:41]। ऐसे में 'बिट्टू' के लिए राह केवल टिकट हासिल करने तक सीमित नहीं होगी, बल्कि जीत दर्ज करना भी एक बड़ी परीक्षा होगी [07:50]।

निष्कर्ष: क्या टूटेगा सालों पुराना रिकॉर्ड?

छत्तीसगढ़ की राजनीति का इतिहास गवाह है कि पंडित रविशंकर शुक्ल के बाद कोई भी अन्य मुख्यमंत्री अपने बेटों को सत्ता के शीर्ष शिखर (मुख्यमंत्री पद) तक पहुँचाने में सफल नहीं हो पाया है [00:19]। अधिकांश 'सीएम सन' केवल विधायक या सांसद बनने तक ही सीमित रह गए [00:42]।

ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भूपेश बघेल का यह नया दांव छत्तीसगढ़ की राजनीति में 'पुत्रमोह' और 'विरासत' की पुरानी पटकथा को बदलेगा, या फिर चैतन्य बघेल भी इतिहास के उसी ढर्रे पर आगे बढ़ेंगे

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रविवार, 23 अगस्त 2026

राजनीतिक वर्चस्व की अघोषित जंग: राजनांदगांव में श्रेय लेने की होड़ और बिखरता संगठन

 राजनीतिक वर्चस्व की अघोषित जंग: राजनांदगांव में श्रेय लेने की होड़ और बिखरता संगठन


 एक ही क्षेत्र, एक ही पार्टी, लेकिन दिग्गजों के चार ठिकाने! जानिए कैसे विकास कार्यों से लेकर तबादलों तक 'क्रेडिट वार' में उलझ कर रह गई है राजनीति।

भूमिका: सत्ता के भीतर 'सह और मात' का खेल

छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों सबसे ज़बरदस्त राजनीतिक खींचतान का केंद्र बना हुआ है—राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र [00:07]। बाहर से शांत दिखने वाले इस क्षेत्र के अंदर सत्ता और संगठन के चार बड़े और कद्दावर चेहरों के बीच अघोषित जंग छिड़ चुकी है [00:43]।

विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह, डिप्टी सीएम विजय शर्मा, दो बार के सांसद संतोष पांडे और पंडरिया विधायक भावना बोहरा—ये सभी एक ही राजनीतिक दल से ताल्लुक रखते हैं [00:18]। लेकिन क्षेत्र में अपना एकछत्र वर्चस्व कायम करने और हर विकास कार्य का 'क्रेडिट' बटोरने की यह होड़ अब सरेआम हो चुकी है [00:43]।

1. नेशनल हाईवे-30: जब एक ही मांग पर दोबारा खिंची तस्वीर

श्रेय लेने की राजनीति का सबसे ताज़ा उदाहरण राष्ट्रीय राजमार्ग 30 (धवईपानिया से सिमगा) के चौड़ीकरण और उन्नयन के मामले में देखने को मिला [03:02]।

 हकीकत: प्रदेश के डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने मार्च 2026 में ही केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को पत्र लिखा था [03:34]। इसके बाद जून 2026 में कवर्धा-सिमगा हिस्से के डीपीआर का टेंडर भी बाकायदा जारी हो चुका था [03:58]।

 श्रेय की होड़: इसके बावजूद अगस्त 2026 में सांसद संतोष पांडे केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से मिलकर उसी सड़क की मांग का फोटो सोशल मीडिया पर शेयर करते नजर आए [03:14]। सवाल उठा कि क्या सांसद महोदय को जून में जारी टेंडर की खबर नहीं थी, या फिर यह सिर्फ तस्वीर खिंचाकर क्रेडिट बटोरने का प्रयास था? [04:07]

2. 7 साल पुरानी रेल लाइन की 'नई' स्वीकृति का दांव

क्रेडिट वार का दूसरा बड़ा मामला कटघोरा-डोंगरगढ़ रेल परियोजना को लेकर सामने आया [05:47]।

 सरकारी दावा: हाल ही में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, सांसद संतोष पांडे और केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू ने दावा किया कि केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से मुलाकात के बाद इस परियोजना की 'नई स्वीकृति' मिली है [06:40]।

 विपक्ष की चुटकी और जमीनी सच: कांग्रेस ने इस दावे की धज्जियां उड़ाते हुए याद दिलाया कि 6 अक्टूबर 2018 को तत्कालीन रेल मंत्री पीयूष गोयल, तत्कालीन सीएम डॉ. रमन सिंह और तत्कालीन सांसद अभिषेक सिंह की मौजूदगी में इस लाइन का भूमिपूजन पहले ही हो चुका था [07:30]। जो परियोजना 7 साल पहले स्वीकृत होकर ठप पड़ी थी, उसे 'नई परियोजना' बताकर श्रेय लेने की होड़ पर जमकर सवाल उठे [07:55]।

3. 'गायब नाम' और 'तबादलों पर ठन'

यह खींचतान सिर्फ विकास कार्यों के टेंडर तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासनिक फैसलों और सार्वजनिक कार्यक्रमों के निमंत्रण पत्रों में भी हावी है:

 निमंत्रण पत्रों से दूरी: हाल ही में रायपुर में आयोजित सेन समाज के बड़े कार्यक्रम में जिले भर के नेताओं के नाम निमंत्रण पत्र में थे, लेकिन कद्दावर नेता बृजमोहन अग्रवाल का नाम गायब था [01:24]। इसी तरह जंगल सफारी के उद्घाटन कार्यक्रम में विधायक भावना बोहरा का नाम गायब रहने पर भी भारी बवाल हुआ था [04:37]।

 थानेदार का तबादला: सूत्रों के अनुसार, एक मामूली थानेदार के तबादले को लेकर विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह और डिप्टी सीएम विजय शर्मा के बीच खींचतान की स्थितियां बन गई थीं [05:22]।

4. असमंजस में कार्यकर्ता: सामूहिक इस्तीफे से बढ़ा तनाव

नेताओं की इस आपसी प्रतिस्पर्धा ने धरातल पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को पूरी तरह भ्रमित कर दिया है [08:29]।

 डोंगरगढ़ में इसी अंदरूनी राजनीति से तंग आकर 100 से अधिक कार्यकर्ताओं ने सामूहिक इस्तीफा दे दिया [08:39]।

 हालांकि, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष किरण सिंहदेव ने कुछ कड़े फैसले लेकर डैमेज कंट्रोल की कोशिश की [08:50], लेकिन कवर्धा, पंडरिया, राजनांदगांव, अंबागढ़ चौकी और मोहला-मानपुर जैसे इलाकों में कार्यकर्ताओं के बीच दबाव और डर का माहौल बना हुआ है [09:09]।

निष्कर्ष: आगे क्या?

एक ही फ्लाईओवर, एक ही सड़क और एक ही रेल प्रोजेक्ट के लिए सोशल मीडिया पर अलग-अलग पोस्टरों और प्रेस रिलीज के जरिए श्रेय की राजनीति चरम पर है [09:36]। विकास के दावों के बीच राजनांदगांव का यह 'पावर गेम' संगठन को किस मोड़ पर ले जाएगा, यह आने वाला वक्त ही बताएगा

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बुधवार, 2 जुलाई 2025

पाकिस्तान के द्वारा यूएनएससी की कमान सँभालने का मतलब…

पाकिस्तान के द्वारा यूएनएससी की कमान सँभालने का मतलब…


भारत के लिए जुलाई माह  एक चुनौती है कि वह अपनी कूटनीति की धार तेज़ करे क्योंकि पाकिस्तान को अमेरिका जिस तरह से मदद कर रहा है और अब यूएनएससी का कमान… इसका क्या असर होगा…

1 जुलाई 2025 को पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मासिक अध्यक्षता हासिल की। यह उसके 2025-26 के गैर-स्थायी सदस्यता कार्यकाल का हिस्सा है। लेकिन सवाल ये है: क्या ये भारत और वैश्विक मंच के लिए गेम-चेंजर है? इसका भारत और दुनिया पर क्या असर होगा! 🇮🇳🌐

पाकिस्तान इस महीने दो बड़े आयोजन करेगा:

🔹 22 जुलाई: वैश्विक शांति और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर खुली बहस।

🔹 24 जुलाई: इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) और UN के बीच सहयोग पर चर्चा।

ये दोनों मौके पाकिस्तान को वैश्विक मंच पर अपनी बात रखने का सुनहरा अवसर देंगे। लेकिन क्या वो इसका फायदा उठाकर भारत के खिलाफ अपनी चाल चलेगा, जैसे कश्मीर मुद्दे को उछालना या ऑपरेशन सिंदूर पर सवाल उठाना? 😮


🇮🇳 भारत के लिए क्या मायने?


1. कश्मीर का खेल: पाकिस्तान पहले भी UNSC में कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मंच पर लाने की नाकाम कोशिश कर चुका है। भारत, जो इसे द्विपक्षीय मुद्दा मानता है, अपनी मज़बूत कूटनीति से ऐसी कोशिशों को फिर से पटरी से उतार सकता है। 💪

2. आतंकवाद और सुरक्षा: पाकिस्तान तालिबान प्रतिबंध समिति का भी अध्यक्ष है। भारत ने बार-बार उस पर आतंकियों को पनाह देने का आरोप लगाया है। क्या पाकिस्तान इस मंच का दुरुपयोग करेगा? भारत को अपनी नजरें खुली रखनी होंगी। 👀

3. आर्थिक दांव: पाकिस्तान अपनी छवि चमकाकर निवेश और सहायता हासिल करने की कोशिश कर सकता है। भारत को अपनी वैश्विक आर्थिक ताकत (G20, क्वाड) का इस्तेमाल कर इसकी काट ढूंढनी होगी।

4. मानवाधिकार का पाखंड?: पाकिस्तान की अपनी मानवाधिकार स्थिति (अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार) सवालों के घेरे में है। भारत अपनी लोकतांत्रिक छवि और उपलब्धियों (चंद्रयान, डिजिटल इंडिया) को उजागर कर इसका जवाब दे सकता है।

🌏 वैश्विक मंच पर असर?

▪️शांति या शोशेबाजी?: पाकिस्तान ने शांति और बहुपक्षीयता की बात की है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता संदिग्ध है। क्या वो यूक्रेन, मध्य पूर्व जैसे संकटों में निष्पक्ष भूमिका निभा पाएगा? 🤔

▪️UNSC सुधार: भारत स्थायी सीट की मांग कर रहा है, लेकिन पाकिस्तान इसका विरोध करता है। ये उसकी राह में रोड़ा बन सकता है।

▪️महाशक्तियों का खेल: चीन का समर्थन पाकिस्तान को ताकत देता है, लेकिन भारत की अमेरिका, फ्रांस, और जापान के साथ मज़बूत साझेदारी इसे बैलेंस कर सकती है।


🇮🇳 भारत की रणनीति?

🔥 अपनी कूटनीति को और धार देना।

🔥 वैश्विक मंच पर अपनी उपलब्धियों (इसरो, वैक्सीन कूटनीति) को ज़ोर-शोर से पेश करना।

🔥 आतंकवाद और जलवायु जैसे साझा मुद्दों पर नेतृत्व लेना।



#UNSCPresidency #PakistanUNSC #IndiaDiplomacy #GlobalPolitics #SouthAsia #IndiaVsPakistan #WorldPeace #Geopolitics

(साभार)

मंगलवार, 1 जुलाई 2025

छत्तीसगढ़ में साहित्यिक जागरण के अग्रदूत

छत्तीसगढ़ में साहित्यिक जागरण के अग्रदूत 


छत्तीसगढ़ में हिंदी पत्रकारिता का गौरवशाली युग रहा है। इस युग की नींव छत्तीसगढ़ मित्र के शलाका पुरुष माधव राव सप्रे ने।शलाका का अर्थ सत्यअहिंसासादगी और पवित्रता है। सप्रे जी की पत्रकारिता के ऐसे रत्न थे जिनकी प्रेरणा और प्रताप से छत्तीसगढ़की पत्रकारिता का स्वर्णिम युग प्रारम्भ हुआ। ऐसे ही युग के शिरोमणि रहे .स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी जीजिनकी आज जयंती है। हिंदीपत्रकारिता के शिरोमणि श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी का जन्म एक जुलाई 1920 को कानपुर के अकोढ़ी ग्राम में हुआ। लेकिनअविभाजित मध्यप्रदेश में छत्तीसगढ़ उनकी कर्मभूमि रही। पंडित स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी एक प्रसिद्ध पत्रकारसाहित्यकार और स्वतंत्रतासेनानी थे। उनके पिता श्री गयाचरण त्रिवेदी भी समाज सेवा और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय थे। त्रिवेदी जी ने अपनी शिक्षा छत्तीसगढ़कॉलेज से पूरी की और 1940 में कांग्रेस पार्टी के मुखपत्र “कांग्रेस पत्रिका” से जुड़े। पत्रकारिता और साहित्य में उनका योगदानअद्वितीय था। राष्ट्रीय आंदोलन की पृष्ठभूमि में जनचेतना के अग्रदूत स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में हिंदी साहित्यऔर पत्रकारिता की एक समृद्ध विरासत को जन्म दिया। राष्ट्रपिता महात्मा गांधीपंजवाहर लाल नेहरूराजेन्द्र बाबू और सरदारवल्लभ भाई पटेल का उनके जीवन में गहरा प्रभाव था। इसलिए राष्ट्रीय आंदोलन की प्रत्येक गतिविधियों से वे जुड़े रहे। अपने पिता कीतरह ही उनमें देश की आजादी के लिए मर मिटने की तमन्ना कूट कूट कर भरी हुई थी। बाल्यावस्था में ही साहित्यिक लेखन औरपत्रकारिता में उनका जुड़ाव बन गया था। खड़ी बोली हिन्दी में लिखना और अनुवाद में अभिरुचि ने उनके जीवन को एक खास दिशा दी।यही वो दिशा थी जब उनके व्यक्तित्व में एक पत्रकार के साथ-साथ एक कविकहानीकारनाटककार , निबंधकारव्यंग्यकार जैसेबहुआयामी प्रतिभा का विकास हुआ। कर्मवीर के संपादक एक भारतीय आत्मा .माखनलाल चतुर्वेदी का त्रिवेदी जी के व्यक्तित्वनिर्माण में काफी प्रभाव रहा। स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी एक निश्छल प्रकृति के सहज एवं स्वाभाविक पीर थे। इसलिए उनके लेखन मेंस्वतंत्र लेखन और मानव जीवन का समूचा दर्शन होता था। प्रकृति का सौंदर्य बोध उनके जीवन में छलकता था। उनकी अनगिनतसाहित्यिक कृतियों में प्रकृति और मनुष्य के भावों का साक्षात्कार देखा जा सकता है। देश की आजादी और नवचेतना की मशाल लेकरचलने वाले स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी का संपूर्ण व्यक्तित्व राष्ट्र के उत्थान के प्रति समर्पित रहा। राष्ट्रशिल्पी स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी केजीवन के चार प्रमुख पड़ाव थे। पहला पड़ाव त्रिवेदी जी ने साप्ताहिक “अग्रदूत” में सहायक संपादक के रूप में काम किया और बाद मेंइसके सलाहकार संपादक बने। दूसरा पड़ाव उन्होंने पंडित रविशंकर शुक्ल के अनुरोध पर साप्ताहिक “महाकोशल” का संपादन कियाऔर इस पत्र को लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचाया। तीसरा पड़ाव त्रिवेदी जी मध्यप्रदेश सरकार के जनसम्पर्क अधिकारी रहे औरउपसंचालक के पद से सेवानिवृत्त हुए। चौथा पड़ाव
उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को अपनी कविताओं में लिखा और कई प्रेरक रचनाएं लिखीं। उनकी कविता “तुम गए मिटे रह गईएक कहने को अमर कहानी है” बहुत प्रसिद्ध है।
स्वतंत्रता आंदोलन के लिए 1942 का समय बहुत महत्वपूर्ण था। इस क्रांति काल में समाचार पत्रपत्रिकाओं के तेवर देखते बनते थे।यही वो समय था जब रायपुर से श्री केशव प्रसाद वर्मा और श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी ने मिलकर साप्ताहिक ‘अग्रदूत’ का प्रकाशनकिया था। ‘अग्रदूत’ ने फिरंगी हुकूमत को ललकारा और बग़ावत का बिगुल बजा दिया। ब्रिटिश सरकार को अग्रदूत के तेवर पसंद नहींआए और और इसके संपादकों पर कड़ी निगरानी रखने लगे। 9 अगस्त 1942 को जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलनकी शुरुआत हुई तो अग्रदूत ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। भारत छोड़ो आंदोलन के चलते अंग्रेजों ने अग्रदूत के संपादकों श्री केशव प्रसादवर्मा और श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी के घरों की तलाशी ली और अग्रदूत पर सेंसर लगा दिया। श्री केशव प्रसाद वर्मा गिरफ्तार कर लिएगए। कुछ समय तक अग्रदूत का प्रकाशन स्थगित रहा। बाद में इसका प्रकाशन फिर शुरू हुआ जो आज दैनिक अखबार के रूप मेंप्रतिष्ठित है। श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी के संपादन में साप्ताहिक महाकौशल का पुनर्प्रकाशन 06 मार्च 1946 से रायपुर से शुरू हुआ।नए कलेवर के साथ शुरू हुए इस पत्र में राजनीति के अलावा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को भरपूर स्थान मिला। श्रीस्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी इस पत्र में महादेव घाट से एक लोकप्रिय स्तंभ लिखते थे जो अघोर भैरव के नाम से विख्यात था। श्री स्वराज्यप्रसाद त्रिवेदी ने महाकौशल को वर्ष 1951में दैनिक अखबार का स्वरूप दिया जिसकी व्यवस्था का जिम्मा श्री श्यामाचरण शुक्ल नेउठाया। श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी ने 1954 में मध्यप्रदेश सरकार में जनसंपर्क अधिकारी और बाद में उप संचालक जनसंपर्क अधिकारीके रूप में अपनी उल्लेखनीय सेवाएं दी। इस बीच महाकौशल के संपादन का दायित्व श्री विश्वनाथ वैशम्पायनजीने संभाला। इसकेबाद क्रमशः श्री विष्णु दत्त मिश्र तरंगीश्री गुरुदेव कश्यपश्री कमल दीक्षितश्री रमेश नैयरश्री कमल ठाकुरश्री जयशंकर नीरव जैसेलोकप्रिय संपादकों ने महाकौशल को आगे बढ़ाया। बाद में 1977 से 1983 तक पुनः श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी ने महाकौशल कासंपादन किया। श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी को एक सर्वश्रेष्ठ जनसंपर्क अधिकारी के रूप में भी ख्याति मिली। पब्लिक रिलेशन्ससोसाइटी आफ इंडिया रायपुर ने स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी जी के नाम से पुरस्कार भी शुरू किया है।
श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी जी को उनके कार्यों के लिए अनेकों सम्मान मिले हैं और उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर कई शोध कार्य हुए।लेखक को इस बात का गर्व है कि स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी जी के उनके अंतिम समय वर्ष 2009 तक जुड़े रहने का अवसर मिला। स्मरणआता है कि 88-89 वर्ष की आयु में भी वे काफी स्वस्थ और सीधे खड़े रहकर घंटों भाषण देते थे। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवंजनसंचार विश्वविद्यालय में इस अत्यधिक आयु में भी उन्होंने तत्कालीन कुलपति डॉ सच्चिदानन्द जोशी जी के निमंत्रण पर उन्होंनेविद्यार्थियों को बिना किसी सहारे के खड़े रहकर लगभग दो घंटे तक संबोधित किया। यह इस पीढ़ी का सौभाग्य था कि स्वतंत्रताआंदोलन के छत्तीसगढ़ के चितेरे पत्रकार स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी जी से साक्षात्कार का अवसर मिला और राष्ट्रीय आंदोलन के साक्षीसेनानी पत्रकार को सुनने का अवसर मिला। श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी के मेधावी सुपुत्र डॉ सुशील त्रिवेदी जो भारतीय प्रशासनिक सेवाऔर मुख्य निर्वाचन आयुक्त पद से सेवानिवृत्त हुए उनके निवास पर कई बार जाना हुआसिर्फ एक ऐसी हस्ती का दर्शन करने जो राष्ट्रीयआंदोलन के एक युग की जीवंत कहानी थे। सुप्रसिद्ध पत्रकार श्री हरि ठाकुर ने स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी के लिए कहा थाकि श्री स्वराज्यप्रसाद त्रिवेदी की रायपुर में साहित्यिक जागरण में प्रमुख भूमिका रही है।  जाने कितने साहित्यकारों को उन्होंने प्रेरित और प्रोत्साहितकिया। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उन्होंने युवा प्रतिभाओं को साथ लेकर उनका मार्गदर्शन किया। पंडित स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी एक महानपत्रकारसाहित्यकार और स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने अपने जीवन को समाज सेवा और साहित्य सृजन के लिए समर्पित किया। उनकीकविताएं और पत्रकारिता के कार्य आज भी प्रेरणा का स्रोत हैं। श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी जी ने अपनी कविता 42 का संघर्ष में जोलिखाआज उनके लिए ही है –
तुम गये मिटे , रह गई एक
कहने को अमर कहानी है।
दिल में तस्वीर तुम्हारी है,
आंखों में खारा पानी है।।(साभार)