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रविवार, 2 मई 2021

पागलपन का फटना...

 

कहते हैं जब सत्ता अचानक मिल जाती है तो फिर उनके भीतर का पागलपन फट पड़ता है और उसकों तबाही और अपने मन की बात करने के अलावा कुछ नहीं सुझता? वह अपनी करतूत को छुपाने सब-कुछ आग के हवाले कर देना चाहता है? और सब तरफ जलती लाशों का धुंआ होता है? यह धुंआ भी उसे विषैला नहीं लगता बल्कि वह आखरी दम तक बड़ी मासूमियत और भोलेपन से यही कहता है कि उसने तो जो कुछ किया देश हित में किया जबकि वह अपने भीतर के नफरत को तबाही में बदल रहा होता है।

आज के दौर में सच को पकडऩा कितना दुश्वार हो गया है, पहली बार संसद भवन की सीढ़ी में माथा टेकना सच था या उसके बाद उस संसद भवन को ही नेस्तनाबूत कर देने की कोशिश सच है? पहली बार हिन्दू प्रधानमंत्री बनने का उद्घोष सच था या अब्दुल कलाम आजाद को राष्ट्रपति बनाना सच था। न्यायालय के फैसले से बन रहा राम मंदिर सच था या सत्ता की ताकत से बन रहा राम मंदिर सच है? नोट बंदी की वजह से लाईन में मर रहे लोग सच था या नोटबंदी की वजह से कालाधन की वापसी, आतंकवाद की कमर टूट जाना सच था?

मॉब लिचिंग, हिन्दू राष्ट्र, जीएसटी के अव्यवहारिक होने से आत्महत्या को मजबूर व्यापारी, कोरोना की चेतावनी को नजर अंदाज करते नमस्ते ट्रम्प, एमपी की सत्ता लोभ, कुंभ, चुनावी भीड़, आक्सीजन की कमी से मरते लोग, रेमडेसिविर का 25 हजार में बिकना, किसान बिल, सीएए, आप ऐसे कितने ही सच को पकड़ते-पकड़ते थक जाओगे लेकिन सत्ता न अपनी जिम्मेदारी मानेगी और न ही लापरवाही?

आज तक के एंकर रोहित सरदाना के दुखद निधन को लेकर किस तरह की प्रतिक्रिया सोशल मीडिया में आती रही, वह हैरान और परेशान कर देने वाला है! मेरा दावा है कि ये देश ऐसा कभी नहीं रहा, किसी की मौत पर ऐसी प्रतिक्रिया सभ्य समाज, या विश्व गुरु के लिए लालायित देश का नहीं हो सकता लेकिन आप पायेंगे कि शुरुआत उन्हीं से हुई है।

मैं उदाहरण के साथ कह सकता हूं कि सिने अभिनेता ऋषि कपूर के निधन पर कुंठित हिन्दुओं की प्रतिक्रिया थी, गौ मांस खाने वालों का यही हश्र होना था, मॉब लिचिंग के प्रवक्ता को काहे की श्रद्धांजलि। सिने अभिनेता इरफान खान को लेकर भी नफरत भरी टिप्पणी और आजकल चर्चित एक साधु ने तो अब्दुल कलाम आजाद की देश के प्रति वफादारी पर तो सवाल उठाये ही है उन्हें गद्दार तक कह डाला। 

ये सच है कि बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय लेकिन हम अपने देश को किस रास्ते पर ले जा रहे हैं। क्या नफरती लोगों को ये नहीं लगता कि ये हालात हमारी आने वाली पीढ़ी को कैसा जीवन देगी। इस पागलपन के दौर में कोरोना संक्रमण से निपटने जिस तरह से हर धर्म, हर जाति के लोग कंधा से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं उसके बाद भी यदि किसी को लगता है कि ये छलावा है तो इसका मतलब साफ है कि राजनीति में बैठे लोग अपनी कुर्सी के लिए इस देश को बेच देना चाहते हैं, अपने पागलपन से तबाही मचाकर कुर्सी बचाना चाहते है। सिर्फ एक रेल दुर्घटना से व्यथित रेल मंत्री का इस्तीफा सच है या गिरते लाशों के बीच सत्ता का अट्टाहास सच है। एक मिनट रुक कर सच को पकडऩे की कोशिश जरुर कीजिएगा।

बुधवार, 24 मार्च 2021

सत्ता की तिलमिलाहट...


देश में बदहाल होती अर्थव्यवस्था, बढ़ती महंगाई, नाराज होते किसान, निजीकरण के नाम पर आरक्षण पर प्रहार, बढ़ती बेरोजगारी से त्रस्त युवा और प्रधानमंत्री की अमर्यादित भाषा ही यदि अच्छे दिन की आहट है तो फिर दिल्ली में एलजी का पावर और बढ़ाने तथा महाराष्ट्र और बंगाल में प्रपंच भी किसी तमाशा से कम नहीं है।

शुरुआत दिल्ली में केजरीवाल के कामकाज से शुरु किया जा सकता है जहां की योजनाओं के परिणाम ने विकास के नए दरवाजे ही नहीं खोले हैं बल्कि मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की लोकप्रियता को भी बढय़ा है ऐसे में एलजी को अधिकाधिक महत्व देना क्या केन्द्र की सत्ता की सोची समझी रणनीति नहीं है।

तब मुंबई में आईपीएस परमबीर सिंह के एक पत्र को लेकर मचा बवाल को षडय़ंत्र का हिस्सा मानने से कैसे इंकार किया जा सकता है।

भले ही नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री है लेकिन भाजपा के पास न देश की राजधानी की सत्ता है और न ही आर्थिक राजनीति मानी जाने वाली मुंबई की ही सत्ता है। ऐसे में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती स्वयं को बचाये रखने की है, मुंबई जब आर्थिक राजनीति है तो वहां से पार्टियों को फलने फुलने का साधन भी पर्याप्त मिलता है ऐसे में मुंबई की सत्ता होने का मतलब साफ है।

इन दो महानगरों की सत्ता जब विरोधियों के पास हो और तीसरे महानगर चेन्नई की सत्ता दूर की कौड़ी हो तो कलकत्ता के लिए तिलमिलाहट तो स्वाभाविक है और इस तिलमिलाहट में प्रधानमंत्री की अमर्यादित भाषा उनके भाषणों में साफ दिखने लगा है। टीएमसी का मतलब समझाने में लगे प्रधानमंत्री की मंशा पर जो लोग आज ताली बजा रही है वही जब कोई भारतीय जनता पार्टी का मतलब भारतीय जनता पार्टी या भुगतों जनता पार्टी कहने पर नाराज होते है।

दरअसल सात साल की सत्ता की नीति ने देश को जिस राह पर चलाया है उससे देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था ने आम आदमी का जीवन स्तर नीचे की ओर ले गया है। आम आदमी को धर्म जाति में इस तरह उलझा दिया है कि उनकी सोच ही बदल गई है। जिन लोगों का गुस्सा बढ़ती-महंगाई, छिनते रोजगार पर निकलना चाहिए वह गुस्सा प्यारे बच्चे पर निकलने लगा है।

कोई भी देश यदि अपने धर्म और जाति की श्रेष्ठता को लेकर उलझा रहेगा तो वहां आप किसी जरूरी मूलभूत मुद्दे पर ध्यान केन्द्रित कर ही नहीं सकते, यही वजह है कि अब दूसरे राजनैतिक दल भी अपने को हिन्दूवादी साबित करने में लगे है।

राजनैतिक दलों में सत्ता हासिल करने की होड़ होनी चाहिए लेकिन उनके मुद्दे धर्म और जाति की बजाय आम आदमी से जुड़े होने चाहिए लेकिन पिछले कुछ सालों में जिस तरह से राष्ट्रवाद और हिन्दूवाद के नाम पर लोगों के दिमाग को मपा गया उसने देश के लोकतांत्रिक ढांचे को हिलाकर रख दिया है।

ऐसे में जब देश के प्रधानमंत्री की भाषा ही मर्यादा की सीमा लांघने लगे, किसी के साथ हुई दुर्घटना को मजाक बना दिया जाए और सत्ता के लिए सिर्फ झूठ का सहारा लिया जाए या नफरत फैलाई जाए तो इसका मतलब साफ है कि देश से बड़ा पार्टी हो गया है।

गुरुवार, 11 मार्च 2021

सबसे बड़ा रुपैया !

 

सत्ता का अपना चरित्र है, तो पैसे वालों का भी अपना चरित्र है। फिर नामधारियों का चरित्र भी अपनी तरह का है? ये तीनों प्रजाति कितने भी गरीबी से उठे हो सबकुछ छिन्न भिन्न हो जाता है।

जिस भ्रष्टाचार, अपराध, कालाधन बेरोजगारी और महंगाई को लेकर सत्ता में जब मोदी सरकार आई तब देश को नई उम्मीद जगी थी! लेकिन पिछले 6 सालों में क्या हुआ? इसका जवाब किसी के पास नहीं है क्योंकि मोदी को लेकर भले ही कोई उम्मीद न हो लेकिन विपक्ष के प्रति नाउम्मीद कायम है!

तो क्या भारतीय समाज ने भ्रष्टाचार, अपराध, महंगाई और बेरोजगारी को अपनी नियति मान चुका है या उन्होंने यह स्वीकार कर लिया है कि सत्ता किसी की भी हो यह सब तो चलता ही रहता है? तब इसका अभिप्राय क्या समझा जाए!

पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, इन राज्यों में सत्ता किसकी होगी यह तो 2 मई को ही पता चलेगा लेकिन सबसे दिलचस्प चुनाव बंगाल में हो रहा है, प्रधानमंत्री बंगाल में लगभग दो दर्जन रैली करेंगे? दिलचस्प इसलिए है क्योंकि उनकी भाषण शैली में अब भी जोश बाकी है, बढ़ती बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई, बिकते सार्वजनिक उपक्रम, भाजपा में अपराध से जुड़े लोगों को शामिल करने और धनबल के तमाम प्रदर्शन के बाद भी कोई हुंकार भर सकता है तो यह काम प्रधानमंत्री मोदी ही कर सकते है।

ऐसे में जिन लोगों को मिथुन चक्रवर्ती के भाजपा प्रवेश से हैरानी हो रही है उन्हें शायद पता नहीं है कि मिथुन चक्रवर्ती के बेटे पर एक महिला ने बलात्कार का आरोप लगाया था? ब्रिगेडियर परेड ग्राउण्ड में जिस परिवर्तन रैली की बात प्रधानमंत्री ने की वह परिवर्तन तो पूरे देश की जरुरत है लेकिन चुनाव तो बंगाल में हो रहे है ऐसे में नक्सली से लेकर कई तरह के आरोप के बाद भी मिथुन चक्रवर्ती भाजपा को इसलिए प्रिय है क्योंकि मिथुन चक्रवर्ती भाजपा को वोट दिला सकते हैं और जब वोट दिला सकते हैं। और जब वोट हासिल करना ही असली मकसद हो तब न प्रधानमंत्री मोदी की नैतिकता को देखनी चाहिए और न ही मिथुन चक्रवर्ती की ही नैतिकता या नास्तिकता वाली बात पर ध्यान देना चाहिए?

सवाल सिर्फ इन पांच राज्यों के चुनाव का नहीं है, और न ही सवाल इसके परिणाम का ही है? सवाल तो आम लोगों का है जिसका वर्तमान दौर में कोई मतलब ही नहीं रह गया है? आप आंकड़े गिनाते रहिए कि मोदी सरकार के दौर में इस देश में बेरोजगारी दर 40 फीसदी से उपर हो गया, महंगाई भी चरम पर है और आर्थिक हालत इतने खस्ते हो चले हैं कि न केवल सार्वजनिक उपक्रम बेचे जा रहे हैं बल्कि रिजर्व बैंक ने रिजर्व फंड भी खर्च किये जा रहे है, ईडी, सीबीआई या आयकर का इस्तेमाल लोगों को चुप कराने या पार्टी में लाने किया जा रहा है, धनबल से सत्ता को खरीदा जा रहा है? आम लोगों को इन बातों से क्या लेना देना है क्योंकि सत्ता की ताकत के खिलाफ आम आदमी कैसे लड़े वह तो अपने परिवार के पालन पोषण में ही उलझा हुआ है और जिसे लडऩा है वे या तो देशद्रोह कहलाने के डर से चुप हैं या पैसों से खरीदे जा चुके है!