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शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2024

अम्बेडकर और आरएसएस

 अम्बेडकर और आरएसएस


इन दिनों पूरे देश में संविधान को लेकर चल रही बहस के बीच आरएसएस और बीजेपी में संविधान निर्माता अम्बेडकर से निकटता

दिखाने के लिए तरह तरह के तर्क प्रस्तुत किए जा रहे है, और इन तर्को की पुष्टि के लिए कांग्रेस से बाबा साहेब के मतभेद को बढ़ा चढ़ाकर पेश भी किया जा रहा है ताकि उस झूठ को सच साबित किया जा सके ।

जबकि बाबा साहेब ने अपनी किताब पाकिस्तान एंड पाकिस्तान ऑफ़ इंडिया में हिन्दूराष्ट्र को स्वतंत्रता, मानवता और बंधुत्व का दुश्मन बता चुके है। ऐसे में हिन्दूराष्ट्र की वकालत करने वाले मोहन भागवत और बीजेपी  का अम्बेडकर के प्रति प्रेम उमड़ना क्या दर्शाता है?

अम्बेडकर को लेकर निकटता दर्शाने की कोशिश को लेकर अम्बेडकरवादी दिलीप मण्डल का यह लेख सब कुछ स्पष्ट करता है, उनके द्वारा उठाये सवाल गंभीर है…

सबसे पहले जान लेते हैं कि आरएसएस डॉ. आंबेडकर के साथ अपने संबंधों को स्थापित करने के लिए कौन सी बातों को सामने रख रहा है.

आरएसएस का पूरा तर्क इन चार बिंदुओं पर खड़ा है-

1. बाबा साहेब का आरएसएस से कोई वैचारिक विरोध नहीं था. वे तो संघ के एक कार्यक्रम में भी आए थे.

2. बाबा साहेब के चुनाव में इलेक्शन एजेंट दत्तोपंत ठेंगड़ी थे, जो आरएसएस के नेता थे

3. ठेंगड़ी बाबा साहेब के संगठन शिड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के सेक्रेटरी थे.

4. बाबा साहेब ने भारतीय जनसंघ के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था.

ये चारों बातें अप्रामाणिक हैं. आरएसएस इन बातों के समर्थन में दत्तोपंत ठेंगड़ी की लिखी एक किताब और अपनी ही पत्रिका ऑर्गनाइजर के लेख आदि को प्रमाण के तौर पर पेश करता है, जिसकी कोई विश्वसनीयता नहीं है.

इतिहास लेखन में स्रोत के चयन का निर्णायक महत्व है. स्रोत अगर गलत होंगे तो गलत बात स्थापित हो जाएगी.

इस बुनियादी सिद्धांत के आधार पर अगर आरएसएस की स्थापनाओं को देखें तो आप समझ पाएंगे कि आरएसएस की बातें क्यों अप्रामाणिक हैं. बाबा साहेब ने अपने तमाम लेख और भाषणों का ब्यौरा रखा था. वे पश्चिमी शिक्षा परंपरा में दीक्षित थे और वहां डॉक्युमेंटेशन का बहुत महत्व माना जाता है. बाबा साहेब धुरंधर लेखक थे. उनके रचना संग्रह का वजन ही कई किलो है. उनका सारा लेखन महाराष्ट्र सरकार और भारत सरकार ने प्रकाशित किया है. उनके जीवन काल और उनकी जीवन की घटनाओं और विचारों को समझने का सबसे प्रामाणिक स्रोत उनके लेख और भाषणों का संग्रह है, जिसे भारत सरकार ने डिजिटल रूप में भी प्रकाशित किया है.

आश्चर्यजनक है कि आरएसएस जब बाबा साहेब से अपनी नजदीकी दिखाता है तो स्रोत सामग्री के रूप में उसके पास डॉ. आंबेडकर के रचना संग्रह से कोई प्रमाण नहीं है.

बाबा साहेब के समय की घटनाओं का दूसरा प्रमाण उस समय के अखबार और पत्रिकाएं भी हो सकती हैं. मिसाल के तौर पर बाबा साहेब अगर संघ संस्थापक हेडगेवार से मिलते या संघ की शाखा देखने के लिए जाते तो ये दोनों अपने समय के इतने बड़े नेता थे कि उस समय पुणे के अखबारों में इसका कवरेज जरूर मिलता. यह दिलचस्प है कि आरएसएस के पास स्रोत के नाम पर उस समय के अखबार या पत्रिकाएं भी नहीं हैं.

बाबा साहेब और आरएसएस के तथाकथित अंतर्संबंधों के बारे में तीसरा स्रोत आरएसएस के तत्कालीन सरसंघचालकों का लेखन भी हो सकता है. मैं तो उन्हें भी प्रमाण मानने के लिए तैयार हूं. लेकिन हेडगेवार या गोलवलकर के लेखन में भी उन चार बातों का जिक्र नहीं है, जिसका जिक्र करके आज आरएसएस के लोग भ्रम फैला रहे हैं.

चौथी सामग्री उस समय प्रकाशित आरएसएस की पत्रिकाएं भी हो सकती हैं. लेकिन आरएसएस की उपर्युक्त चारों बातों के लिए उन पत्रिकाओं में भी कोई प्रमाण नहीं है.

एक और बात, आज जो लोग आरएसएस और बाबा साहेब के बारे में भ्रम फैला रहे हैं वे न तो आरएसएस के शीर्ष नेता हैं और न ही प्रवक्ता. कल आरएसएस आसानी से कह सकता है कि वे तो निजी विचार थे और आरएसएस उनके विचारों से सहमत नहीं है.

आरएसएस चीफ मोहन भागवत ने सिर्फ एक बार इस बारे में अपनी बात कही है. उनका कहना है कि बाबा साहेब 1939 में पुणे में संघ के प्रशिक्षण शिविर में गए थे और वहां दलित विषय पर उनके भाषण की व्यवस्था संघ के संस्थापक हेडगेवार ने की थी. सवाल उठता है कि बाबा साहेब का वह भाषण बाबा साहेब के भाषण और लेखों के संग्रह में क्यों नहीं है? सिर्फ वहीं क्यों, पुणे के तत्कालीन अखबारों में इसकी रिपोर्टिंग है तो उसे ही पेश किया जाए. ये भी नहीं है तो हेडगेवार की जीवनी या उनके लेखन से ही इसका प्रमाण प्रस्तुत किया जाए. जाहिर है कि ऐसा कोई प्रमाण कभी प्रस्तुत नहीं किया गया.

बाबा साहेब का हर अध्येता जानता है बाबा साहेब और आरएसएस दो परस्पर विरोधी विचार परंपराओं से आते हैं. 1936 में एनिहिलेशन ऑफ कास्ट भाषण में बाबा साहेब कहते हैं कि वे हिंदू धर्म छोड़ देंगे और इसके 20 साल बाद 1956 में वे हिंदू धर्म का त्याग कर देते हैं. इस दौरान हिंदू धर्म औऱ हिंदू राज को लेकर उनके विचारों की निरंतरता कहीं नहीं टूटती. हिंदू धर्म और उसकी समाज व्यवस्था के पक्ष में बाबा साहेब ने न कहीं कुछ लिखा है और न कुछ बोला है. ये बात मैं पूरी प्रामाणिकता से कह रहा हूं.

अपनी इस बात के पक्ष में मैं बाबा साहेब के लेखन से सैकड़ों प्रमाण दे सकता हूं और इसके लिए मुझे दत्तोपंत ठेंगड़ी की किताब जैसे सेकेंडरी सोर्स या आरएसएस की पत्रिका के 2019 के लेख जैसे अपुष्ट और अप्रामाणिक स्रोत का हवाला देने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

मिसाल के तौर पर, अगर मैं ये लिखूं कि बाबा साहेब ने कहा था कि ‘आदर्श हिंदू को एक चूहे की तरह अपने ही बिल में रहना चाहिए’ या कि हिंदू धर्म में सुधार करना है तो उसके धर्म ग्रंथों ‘वेदों और शास्त्रों में डायनामाइट लगा देना होगा’ को तो मैं इसके प्रमाण के तौर पर ठेंगड़ी जैसे किसी लेखक की किताब नहीं, भारत सरकार या कोलंबिया यूनिवर्सिटी द्वारा प्रकाशित बाबा साहेब के रचना समग्र का हवाला दूंगा और कहूंगा कि ये बात एनिहिलेशन ऑफ कास्ट के क्रमश: 6ठें और 22वें अध्याय में दर्ज है.

या अगर मैं ये कहूं बाबा साहेब हिंदू राज के विरोधी थे और उन्होंने कहा था कि ‘अगर हिंदू राष्ट्र बनता है तो ये इस देश के लिए बड़ी आपदा होगी. हिंदू चाहें जो भी कहें, हिंदूवाद स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का दुश्मन है. हिंदू राष्ट्र को हर कीमत पर रोकना होगा.’ तो इस बात के प्रमाण के तौर पर मैं 2019 में छपी किसी पत्रिका के लेख को नहीं, बल्कि फिर भारत सरकार द्वारा प्रकाशित बाबा साहेब के रचना समग्र को ही कोट करूंगा और कहूंगा कि ये बात बाबा साहेब ने अपनी किताब पाकिस्तान एंड पार्टिशन ऑफ इंडियामें कही थी.


संघ ने तब तिरंगा फहराने वाले युवाओं को जेल में डलवा दिया था

संघ ने तब तिरंगा फहराने वाले युवाओं को जेल में डलवा दिया था 

भले ही बीजेपी अब राष्ट्रवाद का नारा लगाते हुए घर घर तिरंगा का आयोजन कर रही हो लेकिन तिरंगा को लेकर संघ का रवैया नकारात्मक रहा है ।
संघ पर तिरंगा विरोधी का तमगा यूँ ही नहीं लगा है
संघ के इस रवैये को लेकर उठते सवालों में यह घटना बेहद ही महत्वपूर्ण है 
1950 के बाद आरएसएस मुख्यालय पर तिरंगा तब तक नहीं फहराया गया जब तक कि 26 जनवरी 2001 को राष्ट्रप्रेमी युवा दल के तीन सदस्यों ने आरएसएस प्रशासन की इच्छा के विरुद्ध आरएसएस स्मृति भवन में जबरन राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराया। इसके बाद तीनों पर मामला दर्ज किया ... 
ये तीनों युवकों को २०१३ में बरी किया गया
पीटीआई के मुताबिक़ इन तीनों युवाओं को झंडा फहराने से रोकने वाले का नाम सुनील कोठाले था जो प्रभारी था।

२००१ के इस घटना के बाद २६ जनवरी २००२ से संघ ने अपनी मर्ज़ी से तिरंगा फहराना शुरू किया।
दरअसल तिरंगा को लेकर आरएसएस की सोच के तथ्य पर गौर करे तो विवाद की शुरुआत गुरु गोवलकर और ऑर्गनाइज़र में छपे लेख से समझ सकते है-
आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक एमएस गोलवलकर ने अपनी पुस्तक बंच ऑफ थॉट्स में तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने के कांग्रेस के फैसले की आलोचना की थी।

"हमारे नेताओं ने हमारे देश के लिए एक नया झंडा बनाया है। उन्होंने ऐसा क्यों किया? यह सिर्फ़ बहकने और नकल करने का मामला है। यह झंडा कैसे अस्तित्व में आया? फ्रांसीसी क्रांति के दौरान, फ्रांसीसियों ने 'समानता', 'बंधुत्व' और 'स्वतंत्रता' के तीन विचारों को व्यक्त करने के लिए अपने झंडे पर तीन पट्टियाँ रखीं। इसी तरह के सिद्धांतों से प्रेरित अमेरिकी क्रांति ने कुछ बदलावों के साथ इसे अपनाया। इसलिए तीन पट्टियाँ हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के लिए भी एक तरह का आकर्षण थीं। इसलिए, इसे कांग्रेस ने अपनाया," गोलवलकर ने लिखा था।
आरएसएस नेता ने तिरंगे की भी आलोचना करते हुए कहा कि यह "सांप्रदायिक" है, उन्होंने लिखा, "फिर इसे विभिन्न समुदायों की एकता के रूप में व्याख्यायित किया गया- भगवा रंग हिंदू का, हरा रंग मुस्लिम का और सफेद रंग अन्य सभी समुदायों का प्रतीक है। गैर-हिंदू समुदायों में से, मुस्लिम का नाम विशेष रूप से इसलिए लिया गया क्योंकि उनमें से अधिकांश प्रतिष्ठित नेताओं के मन में मुस्लिम प्रमुख थे और उनका नाम लिए बिना वे नहीं सोचते थे कि हमारी राष्ट्रीयता पूरी हो सकती है! जब कुछ लोगों ने बताया कि यह सांप्रदायिक दृष्टिकोण की बू आती है, तो एक नया स्पष्टीकरण सामने लाया गया कि 'भगवा' बलिदान का प्रतीक है, 'सफेद' शुद्धता का और 'हरा' शांति का प्रतीक है और इसी तरह।"

1947 में आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गनाइजर ने भी तिरंगे पर आपत्ति जताते हुए लिखा था कि भारतीय नेता "हमारे हाथों में तिरंगा दे सकते हैं, लेकिन हिंदू इसका कभी सम्मान नहीं करेंगे और इसे अपनाएंगे नहीं। तीन शब्द अपने आप में एक बुराई है और तीन रंगों वाला झंडा निश्चित रूप से बहुत बुरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा करेगा और देश के लिए हानिकारक है।"

आरएसएस ने 2015 में यह भी कहा था कि “राष्ट्रीय ध्वज पर केवल भगवा रंग ही होना चाहिए क्योंकि अन्य रंग सांप्रदायिक सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं।"

हालाँकि, वर्तमान आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने 2018 में कहा था कि आरएसएस “अपने जन्म से ही तिरंगे के सम्मान के साथ निकटता से जुड़ा हुआ है।”
यानी आरएसएस और बीजेपी को तिरंगा को स्वीकार करने में दर्शकों लगे।

बुधवार, 16 अक्टूबर 2024

सुभाष बाबू को क्या संघ ने धोखा दिया...

सुभाष बाबू को क्या संघ ने धोखा दिया...


अंग्रेजी अत्याचार के खिलाफ़ जब समूचा देश खड़ा हो रहा था , तभी ब्रिटिश रणनीतिकारों के ने आक्रोश को दबाने का कुचक्र किया। इस कुचक्र के दौर में ही पहले मुस्लिम लीग फिर हिन्दू‌महासभा और संघ का गठन हुआ । इनका ब्रिटिश कुचक्र से कितना लेना देना था कहना कठिन है।

लेकिन इसी दौर में देश के नौजवानों ने सर पर कफ़न बांध कर ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ हथियार भी उठाये तो गांधी ने अहिंसक आदोलन की सोच पर कांग्रेस को अपनी मुट्ठी में रख लिया, सरदार पटेल, पंडित नेहरू और सुभाष बापू ने गांधी के विचार पर मतमेद को अपने अपने ढंग से प्रद‌र्शित भी किया । 

और सुभाष बाबू ने तो कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लड़कर एक तरह से गांधी को खुली चुनौती तक दे डाली। सुभाष बाबू चुनाव भी जीत गए लेकिन उन्हें इस्तीफा देना पड़ा और वे फारवर्ड ब्लाद बनाकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई के लिए अलग रास्ता चुन लिया। 

इस दौर में सुभाष बाबू की लोकप्रियता चरम पर थी और ऐतिहासिक तथ्य कहते है कि संघ के पास इस दौर में 60 हजार से अधिक स्वयं सेवक थे। लेकिन संघ का ध्येय हिदुत्व पर टिका था। उन्हें केबी हेगडेवार को संघ के विस्तार की चिंता थी।

केबी हेगड़‌वार का संघ पर पूरी तरह से पकड़ थी, और सरसंघ कार्यवाह हुद्‌दार जन भावना के अनुरुप चाहते थे कि संघ भी ब्रिटिश अत्याचार के खिलाफ खुलकर आ जाए।

इ‌धर नेताजी सुभाष भी ब्रिटिश विरोधी संघर्ष के लिए विकल्प तलाश कर रहे थे और इसी प्रयास में हेगड़े‌वार को मनाने के लिए हुद्‌दार को शामिल किया गया लेकिन हुद्‌दार असफल हो गये।  कहते है कि हेगडे‌वार ने तबियत खराब होने का हवाला देकर सुभाष बाबू से दूरी बना ली।

इसके  बाद एक सितम्बर 1939-40 में सुभाष बाबू के दो विश्वासपात्र करीबी जोगेश चन्द्र चटर्जी और त्रैलोक्य नाथ चक्रवती ने हेगड़ेवार को मनाने का एक और प्रयास किया । वह भी असफल रहा । 

आज भले ही संघ और समूची बीजेपी सुभाष बाबू को लेकर कुछ भी दावा करते हो लेकिन ऐतिहासिक तथ्य कुछ और ही बयान करता है । 

मंगलवार, 15 अक्टूबर 2024

हिन्दू महासभा ने रखी थी संघ कि नींव…

 हिन्दू महासभा ने रखी थी संघ कि नींव…

 


यह बात बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि आरएसएस की स्थापना हिंदू महासभा के उन नेताओं ने करवाई जो मदन मोहन मालवीय के प्रभाव में अपनी बात शायद नहीं रख पाते रहे होंगे, लेकिन शायद हिंदू महासभा से अलग दिखाने की कोशिश में यही प्रचारित किया गया कि आरएसएस की स्थापना के बी हेगडेवार ने किया , हेगडेवार ने इसकी घोषणा ज़रूर की और वे आजीवन मुखिया भी रहे । 

आरएसएस के गठन में कौन कौन शामिल थे और हिंदू महासभा की क्या भूमिका थी यह बताये उससे पहले इसके गठन के समय देश की परिस्थिति को जानना ज़रूरी है…

 आर एस एस की स्थापना ऐसे समय में हुई जब देश ब्रिटिश अत्याचार के चरम को झेल रहा था। राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन को छिन्न-भिन्न करने ब्रिटिश हुकुमत का बंगाल विभाजन के फैसले को लेकर हिन्दू-मुस्लिम एकता में दरार डालने की कोशिश का असर होने लगा था।

1906 में सबसे पहले मुसलमानों का एक संगठन बन गया, मुस्लिम लीग ।  जिन्हें लगता था कि भारत पर मुसलमानो का अधिकार है, और वे मुस्लिम हित की आड़ लेकर अंग्रेजों के साथ मिलकर  अलग राह चुनने भी लगे ।

कहा जाता है कि मुस्लिम लीग के गठन के बाद भी निष्कंटक  राज्य चलाने को लेकर अंग्रेज आस्वस्त नहीं थे, क्योंकि कांग्रेस  का जन आन्दोलन बड़ा होता जा रहा था और कांग्रेस के साथ अब भी बड़ी संख्या में मुसलमान जुड़े हुए थे।

ऐसे में हिन्दू महासमा का गठन भी हो गया। अब राष्ट्रीय आदोलन से जुड़े हिंदू और मुसलमानों का एक बड़े वर्ग को धर्म के आधार पर बाँटने  की  ब्रिटिश सोच को परवान चढ्ने लगा।

स्वाभाविक तौर पर नाम के अनुरुप मुस्लिम लीग और हिन्दू महासमा का जो भी आंदोलन  होता वह अपने धर्म के अनुरूप होता।

कहा जाता है कि इस बीच हिन्दू महासमा में में बीएस मुंजे ताकतवर हो गये और  फिर आर एस एस की स्थापना की नींव रखी गई।आरएसएस 

की स्थापना में बी एस मुंजे की महत्वपूर्ण भूमिका रही ।आरएसएस  की स्थापना हिन्दू‌महासभा  ने की कहा जाय तो गलत इसलिए नहीं होगा क्योंकि प्रारंभिक बैठक में हेगडे‌वार के अलावा हिन्दू महासभा के चार नेता बीएस मुजे, गणेश सावरकर, एल वी परांजपे और बीबी ठोकलकर के बीच हुई थी।

हालाँकि अब संघ कभी हिंदूमहासभा की भूमिका को स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि वह प्रारंभ से स्थापना की श्रेय हेगडेवार को ही देता आया है जबकि हेगडेवार ने घोषणा की थी और वे इसके प्रथम प्रमुख थे ।



सोमवार, 14 अक्टूबर 2024

संघ का वह सच जो आपको जानना चाहिये….

संघ का वह सच जो आपको जानना चाहिये….


भाजपा को सांगठित व वैचारिक ताकत प्रदान करने वाली राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का गठन जब 1925 में किया गया तब समूचा देश कांग्रेस के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई लड़ रहा था ।

सावरकर के हिन्दूत्व से प्रभावित केबी हेगडेवार के इससे पहले कांग्रेस में मंझोले कद के नेता थे और वे जेल भी जा चुके थे, लेकिन हिन्दू‌महासभा के सावरकर से प्रभावित होकर या अंग्रेजी हुकूमत के प्रभाव,  में से उन पर कौन ज्यादा हावी हुआ यह कहना मुश्किल है क्योंकि  इतिहास में इसके तथ्य नहीं मिलते ।

लेकिन यदि आरएसएस के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान को लेकर जब खोज हुई तो जो तथ्य सामने आये वह चौंकाने वाले है। 

1925 से अपने गठन के बाद से आजादी मिलने तक 1947 तक के  इतने साल के सफर में उन लोगों का कोई नामो निशान नहीं मिलता जो आज प्रखर स्वर में राष्ट्र‌वादी होने का दंभ भरते है। इस साफ दिखाई देने वाली अनुपस्थति की वजह से संघ को अंग्रेजों के शुभचिंतक के तौर पर या वफादार के तौर पर जोड़ा जाता है।


तथ्य यहीं कि 1925 से लेकर 1947 तक संघ ने कांग्रेस या किसी अन्य समूह या दल द्वारा  चलाए गए अंग्रेजों के खिलाफ किसी अभियान या आन्दोलन में भागीदारी की ही नहीं , और न ही अपने संगठन के द्वारा ही अंग्रेजो के खिलाए कोई आन्दोलन ही चलाया।

राष्ट्रवाद को अपना धर्म बताने वाले आरएसएस के लिए वास्तव में यह एक काला अध्याय है।

दरअसल इस तथ्यों से एक बात और स्पष्ट होता है कि इनका धर्म भारतीय राष्ट्रवाद नहीं हिन्दू राष्ट्रवाद है।

मृदुला मुखर्जी जेएनयू के इतिहास विभाग की पूर्व प्रोफेसर और नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी की पूर्व निदेशक ने अपने एक लेख में लिखा है कि  तथ्य यह है कि इसके संस्थापक हेडगेवार नागपुर में कांग्रेस के एक मझोले दर्जे के नेता थे और असहयोग आंदोलन के दौरान जेल भी गए थे. लेकिन वे इटली की यात्रा करने वाले और वहां मुसोलिनी से मिलने वाले, इटली के फासीवादी संस्थानों का अध्ययन करने वाले और उनसे जबरदस्त तरीके से प्रभावित हिंदू महासभा के एक नेता बीएस मूंजे के कट्टर अनुयायी थे.

यह भी माना जाता है कि वे वीडी सावरकर की किताब ‘हिंदुत्व’ से प्रभावित थे, जो प्रकाशित 1923 में हुई थी, लेकिन प्रसार में इससे पहले से थी, जिसमें सावरकर ने हिंदुत्व की विचारधारा का मूल विचार दिया था कि भारत हिंदुओं की भूमि है और उनकी जिनकी पुण्यभूमि और पितृभूमि भारत में है. यह विचार इस तरह से मुस्लिमों और ईसाइयों और इस परिभाषा की कसौटी पर खरा न उतरने वाले किसी भी अन्य को भारतीय राष्ट्र से बाहर कर देता है.

यह भी अनुमान लगाया जाता है कि हेडगेवार मुख्य तौर पर एक सांगठनिक व्यक्ति थे और बौद्धिक और वैचारिक इनपुट या निर्देश वास्तव में सावरकर से ही आता था, जो अंडमान जेल से रिहा होने के बाद भी रत्नागिरी तक ही सीमित थे, क्योंकि वो इस शर्त से बंधे थे कि वे राजनीति में भाग नहीं लेंगे और रत्नागिरी के बाहर कहीं यात्रा नहीं करेंगे.

इस अनुमान को इस तथ्य से भी बल मिलता है कि सावरकर के बड़े भाई बाबूराव सावरकर 1925 में नागपुर में हुई उस बैठक में मौजूद पांच लोगों में से थे, जिसमें आरएसएस की स्थापना हुई थी. और बाद में उन्होंने अपने संगठन तरुण भारत संघ का विलय आरएसएस में कर दिया था.

आरएसएस के गठन के दो साल बाद देशभर में साइमन कमीशन विरोधी प्रदर्शन हो रहे थे, लेकिन इनमें आरएसएस कहीं नहीं था. कुछ समय बाद दिसंबर, 1929 में जवाहर लाल नेहरू ने लाहौर में कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में पार्टी अध्यक्ष के तौर पर भारत के राष्ट्रीय ध्वज को फहराया और पूर्ण स्वराज को पार्टी का मकसद घोषित किया. कांग्रेस ने 26 जनवरी, 1930 को स्वतंत्रता दिवस के तौर पर मनाने का भी फैसला लिया, जिसमें राष्ट्र ध्वज को हर शहर और गांव-गांव में फहराया जाना था और सभी उपस्थित लोगों को एक राष्ट्रीय शपथ लेनी थी.

हेडगेवार ने दावा किया कि चूंकि आरएसएस पूर्ण स्वराज में यकीन करता है, इसलिए यह स्वतंत्रता दिवस तो मनाएगा, लेकिन यह तिरंगे की जगह भगवा झंडा फहराएगा. यह आरएसस की राष्ट्रवादी जैसे दिखने मगर वास्तविक राष्ट्रीय आंदोलन से खुद को दूर रखनेवाली  कार्यपद्धति का एक सटीक उदाहरण था.

इसी तरह से जब उस साल बाद में सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया गया, हेडगेवार ने फैसला किया कि वे निजी तौर पर इसमें शामिल होंगे, लेकिन एक संगठन के तौर पर आरएसएस इसमें शिरकत नहीं करेगा. इसलिए वे अपनी राष्ट्रवादी साख को बनाए रखने और साथ ही, बकौल उनके आधिकारिक जीवनीकार, जेल में बंद कांग्रेस के कैडर को आरएसएस की तरफ आकर्षित करने के लिए जेल गए.

पूरे 1930 के दशक के दौरान आरएसएस का ध्यान संगठन खड़ा करने की तरफ रहा. आरएएस और हिंदू महासभा के बीच कुछ तनाव हुआ था, खासकर सावरकर के खुलकर सामने आने के बाद, क्योंकि महासभा ज्यादा सक्रिय राजनीतिक भूमिका, खासकर चुनावी क्षेत्र में निभाना चाहती थी.

रविवार, 13 अक्टूबर 2024

सरदार पटेल के संघ को लेकर विचार…

 


सौ वी स्थापना वर्ष की ओर बढ़ रहे संघ को लेकर यदि किसी के मन में कोई दुविधा हो तो उन्हें पंडित नेहरू की भविष्यवाणी के अलावा उस सरदार पटेल का महात्मा गांधी की हत्या के बाद आयोजित शोक सभा में दिये वक्तव्य को ज़रूर पढ़ लेना चाहिये, जिसमें उन्होंने न केवल संघ को खूब गरियाया बल्कि बाद में संघ पर प्रतिबंध लगाया।

यदि आप सोच रहे हों कि जब पटेल के संघ के प्रति यह विचार था तो फिर संघ पटेल की तारीफ़ क्यों करता है, मोदी ने उनका सबसे बड़ी प्रतिमा क्यों बनाई ? दरअसल संघ का यही खेल है, झूठ और अफ़वाह का खेल, 

नेहरू-गांधी के आकर्षण को धूमिल करने के इस खेल में वह अपने उन कर्मों को जायज़ ठहराने या छुपा लेने की कोशिश करता है जो इस के लिए ख़तरनाक माना जाता है 

इसलिए आप यदि संघ के इस खेल पर नज़र डाले तो आप पायेंगे कि वह कभी पटेल के पीछे छुपता है तो कभी सुभाष बाबू या भगतसिंह के पीछे ( आगे बतायेंगे कि संघ और हिन्दुवादियो का भगत सिंह और सुभाष बाबू के प्रति रवैया)

भ्रम पैदा कर अपनी राजनीति में माहिर संघ को लेकर सरदार पटेल ने क्या कहा , आज ये जान लें…

गांधी  की हत्या के बाद 2 फरवरी 1948 को आयोजित शोकसभा में सरदार पटेल जब भाषण देने खड़े हुए तो उनकी आंखों में आंसू थे. वह बोलने की हालत में नहीं थे. लेकिन जवाहरलाल नेहरू के बाद देश के दूसरे बड़े नेता के रूप में बोलना उनकी मजबूरी थी और वे बोले भी.

उन्होंने कहा, ‘जब दिल दर्द से भरा होता है, तब जबान खुलती नहीं है और कुछ कहने का दिल नहीं होता है. इस मौके पर जो कुछ कहने को था, भाई जवाहरलाल नेहरू ने कह दिया, मैं क्या कहूं?’

पटेल ने कहा था, ‘हां, हम यह कह सकते हैं कि यह काम एक पागल आदमी ने किया. लेकिन मैं यह काम किसी अकेले पागल आदमी का नहीं मानता. इसके पीछे कितने पागल हैं? और उनको पागल कहा जाए कि शैतान कहा जाए, यह कहना भी मुश्किल है. जब तक आप लोग अपने दिल साफ कर हिम्मत से इसका मुकाबला नहीं करेंगे, तब तक काम नहीं चलेगा. अगर हमारे घर में ऐसे छोटे बच्चे हों, घर में ऐसे नौजवान हों, जो उस रास्ते पर जाना पसंद करते हों तो उनको कहना चाहिए कि यह बुरा रास्ता है और तुम हमारे साथ नहीं रह सकते.’ (भारत की एकता का निर्माण, पृष्ठ 158)

सरदार ने अपने व्यक्तिगत जीवन में बदलाव और स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने में भी गांधी को प्रेरणा का प्रमुख स्रोत बताया और कहा था कि अगर गांधी न होते तो मेरा कोई अस्तित्व नहीं होता. उन्होंने कहा था, ‘जब मैंने सार्वजनिक जीवन शुरू किया, तब से मैं उनके साथ रहा हूं. अगर वे हिंदुस्तान न आए होते तो मैं कहां जाता और क्या करता, उसका जब मैं ख़्याल करता हूं तो एक हैरानी सी होती है. तीन दिन से मैं सोच रहा हूं कि गांधी जी ने मेरे जीवन में कितना परिवर्तन किया? इसी तरह से लाखों आदमियों के जीवन में उन्होंने किस तरह से बदला? सारे भारतवर्ष के जीवन में उन्होंने कितना बदला. यदि वह हिंदुस्तान में न आए होते तो राष्ट्र कहां जाता? हिंदुस्तान कहां होता? सदियों हम गिरे हुए थे. वह हमें उठाकर कहां तक ले आए? उन्होंने हमें आजाद बनाया.’ (भारत की एकता का निर्माण, पृष्ठ 157)

उस समय सांप्रदायिक दंगों की आग में जल रहे भारत में सरदार पटेल और खून खराबा नहीं चाहते थे. लोगों में आक्रोश था. उन्होंने अपने भाषण में ज़िक्र किया कि कम्युनिस्टों का गांधी की हत्या के विरोध में एक जुलूस निकला, उस जुलूस में वे कहते थे कि हम बदला लेंगे. सरदार ने इसका जिक्र करते हुए बदला लेने की भावना को गांधी की विचारधारा के विरुद्ध करार देते हुए कहा, ‘बदला लेना हमारा काम नहीं है. अगर आपको कोई चीज मालूम हो तो तुरंत हुकूमत को बता देना चाहिए कि इस प्रकार के लोग काम करते हैं.’ पटेल का संदेश साफ था कि हत्यारी और पागलपन वाली विचारधारा से सरकार को निपटना है और किसी भी हालत में खून खराबा नहीं होना चाहिए.

गांधी की हत्या के बाद देश भर में गोडसे के विचारधारा के लोगों ने जश्न मनाया था. गोडसे भले ही मर गया है, लेकिन उसकी विचारधारा आज भी नहीं मरी है. अभी भी भारत में तमाम ऐसे लोग हैं, जो उस हत्यारे को महान मानते हैं और उसका महिमामंडन करते हैं. उसे वैचारिक और देशभक्त करार देते हैं. तमाम तरह की कहानियां भी बनाई गई हैं कि एक हिंदूवादी महंत ने गोडसे को रिवाल्वर मुहैया कराई थी.

इस समय भाजपा और आरएसएस से जुड़े युवा सरदार पटेल को लेकर दिग्भ्रमित हैं. प्रधानमंत्री मोदी बार-बार अपने भाषणों में ज़िक्र करते हैं और यह जताने की कोशिश करते हैं कि पटेल के साथ नाइंसाफी की गई और संकेतों में कहते हैं कि वह नाइंसाफी जवाहरलाल नेहरू ने की. साथ ही भाजपा समर्थक गांधी को भी आरोपित करते हैं कि उन्होंने अपना उत्तराधिकारी पटेल को नहीं चुना. पटेल के मन में गांधी को लेकर कभी कोई पीड़ा नहीं रही. उन्होंने गांधी के बारे में कहा है, ‘उनका कमजोर बदन था. इतने कमजोर बदन में से जो पतली सी आवाज निकलती थी, वह इतनी जबरदस्त आवाज थी कि वह सीधे हमारे हृदय पर लग जाती थी.’

इस समय आम लोगों के मन में जातीय और धार्मिक घृणा फैली हुई है. इसी तरह की धार्मिक घृणा स्वतंत्रता के समय भी फैली हुई थी और पूरे देश, खासकर सीमावर्ती इलाकों में खून खराबा मचा हुआ था. गांधी की मौत के बाद भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के लोग सदमे में थे और धीरे-धीरे खून खराबा बंद हो गया. उस समय पटेल ने कहा था, ‘हमें निश्चय कर लेना चाहिए कि हिंदुस्तान में जितने लोग हैं, सबको हिल मिलकर, भाई-भाई की तरह रहना है. एक दूसरे के साथ घुड़का घुड़की करने से कोई काम नहीं होगा और इस तरह से नहीं करना चाहिए. कोई भी कौम हो, हिंदू हो, मुसलमान हो, सिख हो, पारसी हो, ईसाई हो, सबको यह समझना चाहिए कि यही हमारा मुल्क है. इसी मुल्क, इसी युग में दुनिया में सबसे बड़ा व्यक्ति (गांधी) पैदा हुआ, जिसने हमारी इज्जत दुनिया में बढ़ाई और इतना बड़ी विरासत हमारे सामने रखी, उसे फेंक नहीं देना है बल्कि उसको ज्यादा बढ़ाना है.’ (गांधी जी से हमने क्या सीखा, पेज 162)


शनिवार, 12 अक्टूबर 2024

संघ पर नेहरू की भविष्य वाणी…

 राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपने सौ वी स्थापना दिवस मनाने की ओर अग्रसर है। २७ सितंबर १९२५ को स्थापित यह संगठन कैसा काम करता है, हिंदू राष्ट्र को लेकर इसकी सोच और संस्कार देने के दावे सब कुछ हम आपको किश्तों में पढ़वायेंगे, कोशिश करेंगे कि आप तक रोज़ कुछ न कुछ पठनीय सामग्री पहुँच सके….

संघ को जानने समझने की कोशिश इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि संघ के अपने दावे है जिसका एक पहलू अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाकर अपने एजेंडे को देश पर थोपना है तो दूसरा दावा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के तराज़ू में संस्कार देना ।

शुरुआत देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की संघ को लेकर की गई भविष्यवाणी से-

आरएसएस की १००वें स्थापना दिवस पर पढ़िए पंडित नेहरू की भविष्यवाणी:

संघ पर नेहरू की भविष्य वाणी…


हमारे पास इस बात के ढेरों सबूत हैं, जिससे यह पता चलता है कि आरएसएस अपने स्वभाव से निजी सेनाओं के जैसा संगठन है, जो नीति और संगठन के मामले में साफ़ तौर पर नाज़ियों का अनुसरण कर रहा है....

मुझे जर्मनी में शुरू हुए नाज़ी आंदोलन की कुछ जानकारी है. इसने अपने ऊपरी दिखावे और सख्त अनुशासन से लोगों को आकर्षित किया. इसमें बड़ी संख्या में लोअर मिडिल क्लास के नौजवान पुरुष और महिलाएं शामिल थे. यह लोग सामान्य तौर पर बहुत ज़्यादा योग्य नहीं थे और न ही इनके लिए जीवन में बहुत सारी संभावनाएं थीं. इसलिए ये लोग नाज़ी पार्टी की ओर मुड़ गए, क्योंकि इसकी नीति और प्रोग्राम बहुत सरल थे. वह नेगेटिव थे और उनमें दिमाग़ के सक्रिय इस्तेमाल की कोई ज़रूरत नहीं थी. नाज़ी पार्टी ने जर्मनी को तबाह कर दिया और मुझे बिल्कुल संदेह नहीं है कि अगर यह प्रवृत्तियां इसी तरह भारत में बढ़ती रहीं, तो वह भी भारत को बहुत ज़्यादा नुक़सान पहुंचाएंगी. इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत फिर भी रहेगा, लेकिन उसे बहुत गहरा घाव लग जाएगा और इससे उबरने में लंबा वक़्त लगेगा.'