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मंगलवार, 20 अगस्त 2024

अमित शाह का टेंशन और हिदुत्व का खेल...

 अमित शाह का टेंशन और हिदुत्व का खेल...


इधर देश में बलात्कारियों की करतू‌तों को लेकर हंगामा मचा हुआ है, मणिपुर जल रहा जम्मू तक में आकर आतंकवादी अपनी करतू‌तों को अंजाम दे रहे हैं लेकिन देश के गृह मंत्री अमित शाह को बंग्लादेश और पाकिस्तान में हिंदुओं की घटती संख्या को लेकर टेंशन है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि क्या पाकिस्तान और बांग्लादेश मे हिंदुओं की  कथित दुर्दशा और कम होती जनसंख्या का सच क्या है। क्या  यह पूरा खेल भारत में हिंदू वोटरों के ध्रुवीकरण का खेल है। 

क्या लोगों को सच से दूर रखकर एक ख़ास वर्ग के प्रति नफरत फैलाकर अपनी राजनीति साधाने का प्रयास हर चुनाव के पहले किया जाता है।

ये सच है कि 1941 की जनगणना के मुताबिक वेस्ट पाकिस्तान (वर्तमान) में 14 फीसदी हिदू थे और ईस्ट पाकिस्तान (बांग्लादेश) में 26 फीसदी हिन्दू थे।

ऐसे में पाकिस्तान और बाग्लादेश मैं वर्तमान में हितुओं की संख्या  को लेकर बवाल मचाया जाता है कि देखिये पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिदुओं को काट डाला गया।

बहरहाल पाकिस्तान और बाग्लादेश में हिंदुओं की संख्या घटने के तीन प्रमुख कारण है जिसमें से पहला कारण तो सिम्पल स्टेस्टिक्स है तो दूसरा कन्वर्जन जबकि तीसरा कारण

माइग्रेशन है। इन तीनों कारणों से पहले के कारण भी महत्वपूर्ण है जो हिंदुओं की आबादी कम होने की वजह है।

अब 1941 की जनसंध्या के आंकड़े से आगे आ जाइये 1947 में। और 1947 के विभाजन में 50 लाख हिन्दू और सिख वेस्ट पाकिस्तान से भारत आ गये तब 1951 की जन‌ग़णना में हिन्दुओं की संख्या दो फीसदी रह गई। तब से लेकर आजतक उनकी जनसंख्या प्रतिशत में लगभग उतनी है बल्कि 0.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।

ईस्ट पाकिस्तान से भी बंटवारे के दौरान यानी 1947 में हिंदुओं की जनसंख्या  26 से गिरकर 22 फ़ीसदी हो गई।

लेकिन 1970 में पाकिस्तानी सरकार ने तमाम बंगालियों पर अत्याचार किये । मार्शल लॉ लगाया। दो करोड़ हिंदू शरणार्थी भारत की शरण में आ पहुंचे। मुसलमान कहां जाते इसलिए वे वही रहे, वे वहीं मरते रहे, अत्याचार सहते रहे।

अब 7 करोड़ की जनसंख्या में दो करोड़ यदि भारत आ गए तो हिसाब लगा लिजिए कि बांग्लादेश में हिन्दु‌ओं की संख्या कितनी घटी। तब से आज तक ओवर ऑल हिदुओं की संख्या 9-10 फीसदी बची है जो आज भी उतनी ही हैं।

इसी 9-10 फ़ीसदी आंकड़े को पकड़‌कर गृह मंत्री अमित शाह कलह मचाये हुए हैं।

जनसंख्या  घटने का एक और कारण कन्वर्जन को लेकर जो हल्ला मचाया जाता है वह कन्वर्जन प्रासिक्यूशन वहां भी वैसा है जैसे इंडिया में।

ईज्ज़त नौकरी, न्याय  अधिकार को लेकर कन्वर्जन इंडिया में क्या कम हुए है।

जहां तक धर्म के आधार पर विभाजन की बात है तो यह बिल्कुल गलत है लेकिन अमित शाह फिर द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को मुस्लिम लीग के साथ तालमेल बिठानेवाले सावरकर को सर आँखों पर क्यों  बिठाते हैं?

हैरानी की बात तो यह है कि सारा सच इंटरनेट पर मौजूद होने के बाद भी यदि लोग़ राष्ट्रवाद के नाम पर परोसे जा रहे झूठ  पर आखें बंद किये हुए है तो फिर गलत लोगों को राज करने से कोई कैसे रोक सकता है!

शुक्रवार, 16 अगस्त 2024

बांग्लादेश के हिदु‌ओं के लिए 25 सदस्यीय जत्था का तीर्थ यात्रा

 बांग्लादेश के हिदु‌ओं के लिए 25 सदस्यीय जत्था का तीर्थ यात्रा


बांग्ला देश के हालात को लेकर वैसे तो पूरा देश चिंतित है। ऐसे में वहां रह रहे हिन्दू समाज पर अत्याचार की खब‌रें विचलित करने वाली है। बांग्लादेश में शांति बहाली और हिंदुओं की जान माल की सुरक्षा को लेकर रायपुर उत्तर विधानसमा के पूर्व विधायक और छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रवक्ता श्रीचंद सुन्दरानी ने बालाजी महालक्ष्मी और रामेश्वरम की यात्रा की।

भाजपा प्रवक्ता श्री चंद सुंदरानी ने बगया कि बांग्लादेश की खबरें चिंताजनक है और वहां के हिदु‌ओं पर जिस तरह से हमले हो रहे हैं वे हिन्दुसमान के लिए चिंता की बात है और हिन्दू समाज के जानमाल की सुरक्षा और बांग्लादेश में शांति बहाली के लिए उन्होंने 25 सदस्यीय जत्था के साथ तिरुपति, बेल्लूर और रामेश्वरम् की यात्रा की जहां ईश्वर से हिन्दु समाज की सुरक्षा के लिए प्रार्थना की।

उन्होंने बताया कि बांग्लादेश में जिस तरह के हालात की खबरें आ रही है उससे पूरा मानव समाज़ चिंतित है इसलिए उन्होंने 25 सदस्यीय जत्थे के साथ यह धार्मिक यात्रा की।

उन्होंने कहा कि उन्हें विश्वास है कि भगवान् सबकी सुनते है और  बांग्लादेश में भी शीघ्र ही न केवल शांति बहाली होगी बल्कि हिन्दुओ के साथ हो रहे अत्याचार के मामले में भी न्याय होगा।

उनके साथ यात्रा में गये मोहन सुंदरानी ने कहा कि वे पहले भी कई धार्मिक यात्रा त्रा कर चुके हैं लेकिन यह यात्रा अद्‌भूत रही, और भगवान भोलेनाथ इस यात्रा के ध्येय को सफल बनायेंगे। यात्रा में मनोज दुबे, अर्जुनदास वासवानी, हरिभाई तलरेजा, नंदकिशोर अग्रवाल,अशोक कुमार मुजवारी, श्रीचंद कालाणी, दयाल राजपाल, गुलाब असरानी, नारायण हिदुजा,पवन कुमार भुलवानी, सुरेश परप्यानी शामिल थे।

पांच दिवसीय इस धार्मिक यात्रा में तिरुपति बालाजी, वेल्लूर में महालक्ष्मी और रामेश्वरम् ज्योर्लिंग के दर्शन कर हिंदुओं की सुरक्षा के लिए प्रार्थना की गई।

सोमवार, 5 अगस्त 2024

बंग्लादेश से भारत कितना अलग ?

 बंग्लादेश से भारत कितना अलग ? 

तुही के, हमी के-रजाकार रजाकार !


सवाल यह नहीं है कि बंग्लादेश के प्रधानमंत्री शेख हसीना का अब क्या होगा?

सवाल तो यह है कि लोक‌प्रियता की शिखर में बैठी शेख हसीना कैसे चूक गई और क्या इसका भारत के राज काज में कोई समानता है । हालांकि यह सवाल तो तब भी उठे थे जब श्रीलंका में भी आन्दोलन हुआ था।

लेकिन बांग्लादेश में यह स्थिति क्यों बनी इस सवाल का यदि एक लाईन में जवाब ढूँढा जाए तो सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि लोकप्रियता की शिखर में पहुंच कर शेख हसीना ने विरोध के स्वर को कुचलने के लिए जिस भाषा का इस्तेमाल किया, जिस तरह से विरोधियों को विदेशी एजेंट, देशद्रोही ओर गद्‌दार खुले आम कहने लगी उसका परिणाम सबके सामने है।

लोकप्रियता के शिखर में पहुंचने वाली शेख़ हसीना के पिता बंगबंधु मुजीबुर्ररहमान की बेटी है जिन्होंने पाकिस्तान से बंग्लादेश को आजाद कराया था और लोकतंत्र की हिमायती व नरम तेवर की मानी जाती रही है लेकिन लोकप्रियता की शिखर में पहुंचने के बाद उन्होंने विरोधियों को जिस तरह से ठेंगे पर रखा, उन्हें विदेशी एजेंट बताकर जेल में डाला,यह परिणाम उसी का है कहा जाय तो गलत नहीं होगा।

हर युद्ध के कई कारण होते हैं, वैसे ही तख्ता पलट के भी कई कारण होते है लेकिन तत्कालीक कारण ही ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। और यह कारण था बेरोजगारी के साथ आरक्षण पर सत्ता का निर्णय और विरोधियों पर बद‌जुबानी।

कोर्ट के फैसले के बाद जब छात्र भड़के तो प्रधानमंत्री शोख हसीना ने कह दिया कि यदि स्वतंत्रता सेनानियों को आरक्षण नहीं मिलेगा तो क्या रजाकारों (गद्‌दारों) को आरक्षण मिलेगा।

रजाकार (गद्दार) शब्द इतना तूल पक‌ड़‌ा कि ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने आंदोलन करते हुए नारा ही बुलंद कर दिया कि 'तुही के, हमी के, रजाकार रजाकार यानी तुम कौन- हम कौन गद्‌दार-गद्दार।

इस नारे ने इतना तूल पकड़‌ा कि शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़‌कर भागना पड़ा।

लोकप्रियता के मद में डूबे सत्ता ने क्या विरोधियों के खिलाफ भारत में भी विषवमन नहीं कर रही है, राहुल गांधी को चीनी एजेट तो किसानों को पाकिस्तान परस्त, एनआरसी-सीएए, से लेकर धारा 370 को हटाने का मामला हो या कोरेगांव ?

किस तरह से इस दौर में आन्दोलन को कुचलने के निए गोली मारों सालों को जैसे नारे नहीं उछाले गये, बढ़ती बेरोजगारी के बीच पेपर लीक का मामला हो या फिर चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर उठते सवाल? क्या लोगों में ग़ुस्सा नहीं बढ़ रहा?

हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण के लिए एक वर्ग विशेष को निशाने में लेने के ख़िलाफ़ उठते आवाज़ में विरोधियों को हिन्दू विरोधी करार देना।

शेख़ हसीना ने लोकतंत्र और संविधान को कुचल डाला था। 

जिसने भी विरोध किया उसे जेल में डाल दिया। 

विपक्ष के नेताओं को देशद्रोही और ग़द्दार कहा। 

विदेशी एजेंट कहा। 

छह महीने पहले 300 में 280 से ज़्यादा सीटें जीत गईं। क्योंकि विपक्ष ने चुनाव का बहिष्कार कर दिया था। 

शेख़ हसीना के इशारे पर नाचते थे टीवी चैनल। 

अदालतें उनके हिसाब से फ़ैसले लिखती थीं। 

दो बार की प्रधानमंत्री ख़ालिदा जिया को उन्होंने जेल में डाल दिया था। 

उन्हें इलाज तक के लिए नहीं जाने दिया। 

शेख़ हसीना को भ्रम था कि उनके "मन की बात" पूरे बांग्लादेश के मन की बात है। 

फिर जनता का ये भ्रम टूट गया।

शेख़ हसीना 5 बार प्रधानमंत्री रहीं। 

लेकिन अब बांग्लादेश के इतिहास पर धब्बा हैं।

जब आप जनता के प्यार को तानाशाही का लाइसेंस समझ लेते हैं तो नागरिक आपको नाज़ से नासूर में बदलते देर नहीं लगाता। 

लोग नीतियाँ बनाने के लिए वोट देते हैं विपक्षमुक्त करने के लिए नहीं।

शेख़ हसीना ने डेमोक्रेसी के सारे सिस्टम तहस-नहस कर डाले थे। 

नहीं जानती थीं कि विपक्ष को लेकर फैलाए गए झूठ, चुनाव आयोग के फ़रेब, अदालतों की बेहयाई से ऊबी ह जनता के सब्र का बांध टूटेगा तो चोरों की तरह भागना पड़ जाएगा।

विश्वगुरु भारत ने एक और पड़ोसी देश में भद पिटवा ली है। 

फिर साबित हुआ है कि एस जयशंकर को विदेश नीति की बारीक समझ नहीं है। 

वो बहुत अच्छे अफ़सर रहे होंगे, लेकिन उनके पास ऐसी सूक्ष्म नज़र नहीं जो नरसिम्हा राव, गुजराल या प्रणब मुखर्जी जैसे विदेश मंत्रियों पास थी॥


तब सवाल यही है कि क्या बांग्लादेश की घटना से सत्ता को सबक नहीं लेना चाहिए?


सोमवार, 12 अप्रैल 2021

सातवां बेड़ा...

 

अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में विदेशी  हस्तक्षेप को लेकर बाइडन ने साफ कह दिया था कि इसकी प्रतिक्रिया मिलेगी ! तब किसने सोचा था कि अमेरिका का निशाना सिर्फ रूस नहीं भारत भी होगा।

भारत के मामले में बिना चुनौती के इस तरह से सातवें बेड़े के भारतीय ईईंजेड में प्रवेश क्या अबकी बार ट्रम्प सरकार की प्रतिक्रिया है। अपने जहाज को भारत की सीमा में प्रवेश कराकर जिस तरह से प्रेस नोट जारी किया गया है वह पूरी दुनिया को जानकारी देना ही नहीं भारत की फजीहत करना भी है।

भारतीय विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया ये बता रही है कि ऐसा हुआ है। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में लिखा है कि यूएन कन्वेशन के तहत कोई भी देश, किसी दूसरे देश की ईईजेड में देश की अनुमति के बिना हथियार और साजो समान से लदे फ्लीट के साथ प्रवेश नहीं कर सकता। यदि जहाज में व्यापारिक वस्तएं है तो अनुमति की जरूरत नहीं।

हालांकि अमेरिका इसे अधिकार और आजादी का इस्तेमाल करने का दावा कर रही है और इसे फ्रीडम ऑफ नेविगेशन ऑपरेशन बता रही है और यह भी कहा है कि भारत के समुन्दर को लेकर किये जा रहे दावे को वह नहीं मानते और आगे भी ऐसा करते रहेंगे।

यह एक तरह से भारतीय संप्रभुता को खुलकर चुनौती है लेकिन इस मामले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चुप्पी हैरान कर देने वाला है। सांतवा बेड़ा नाम सुनकर 1971 जेहन में आने लगता है। तब पाकिस्तान पर हमला करने पर अमेरिका के द्वारा धमकी दी जा रही थी वो सातवां बेड़ा भेजेंगे। और अमेरिका ने हिन्द महासागर में सातवां बेड़ा उतार भी दिया लेकिन तब इस देश की लौह महिला ने अमेरिका को आंख दिखाकर न केवल सांतवा बेड़ा को लौटने मजबूर कर दिया था बल्कि पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिये थे।

अमेरिका द्वारा किये गये इस सार्वजनिक फजिहत से पहले पाठकों को यह जान लेना चाहिए कि इंदिरा गांधी उसी जवाहर लाल नेहरु की बेटी और राहुल गांधी की दादी है जिन पर परिवारवाद का आरोप जड़ा जाता है और 70 साल में कुछ नहीं किया का दावा किया जाता है। हैरानी तो यह है कि 70 साल में कुछ नहीं करने का दावा वे लोग भी समर्थन करते हैं जो सायकल से कार में पहुंच गए?

खैर राजनीति में झूठ नफरत और अफवाह ही जिनकी सोच हो उनके बारे में ज्यादा क्या कहा जाए? जिस तरह से झूठ और नफरत की दीवार खड़ी हुई है उसी तरह से ये गिर भी जायेगी? लेकिन तब देर न हो जाए।

ऐसे में यदि चीन के बाद दूर बैठे अमेरिका भी यदि भारतीय संप्रभुता को चुनौती देने लगे तो इसका करार जवाब दिया जाना चाहिए क्योंकि अमेरिका हर चुप्पी को कमजोरी समझता है तब अमेरिका यह भी जान ले कि कमजोर देश नहीं सत्ता  हो सकता है!

रविवार, 28 मार्च 2021

झूठ बोलने की बीमारी...

 

झूठ बोलने की बीमारी को माई थोमेनिया भी कह सकते हैं, यह उन व्यक्तियों में अधिक होती है जो स्वयं के धर्म-जाति को श्रेष्ठ बताते नहीं थकते, हालांकि माईथोमेनिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें झूठ बोलने या अतिश्योक्ति की असमान्य प्रवृत्ति होती है। यह एक तरह का मानसिक विकार है और जिसमें यह विकार आ जाता है वह यह कभी नहीं सोच पाता कि उसकी इस हरकत से वह स्वयं हंसी का पात्र हो सकता है या उसकी झूठ की वजह से देश समाज को शर्मिन्दा उठानी पड़ सकती है।

हालांकि झूठ बोलने वालों को पसंद करने वालों की तादात बढ़ी है और वे इस पर तर्क भी देते नहीं थकते कि झूठ बोलने से किसी का नुकसान न हो रहा हो या किसी की जान बच रही है तो झूठ बोलने में क्या हर्ज है। अपने झूठ से किसी दूसरे को चकित या भ्रमित करना उनके लिए किसी विश्व विजेता से कम नहीं है। लेकिन मनोचिकित्सकों का क्या, वे तो इसे मानसिक बीमारी ही कहते हैं।

मनोचिकित्सकों के अनुसार यह सब माहौल की वजह से होता है, आप जिस माहौल में अपना जीवन खफा देते हैं जहां झूठ, अफवाह और नफरत के अलावा स्वयं ही सर्वश्रेष्ठ है। इसका पता लगाने की जरूरत नहीं पड़ती वह स्वयं अपनी बीमार या विकार का प्रदर्शन कर देता है। और वह व्यर्थ की बातों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करता है।

मनोचिकित्सक तो यहां तक कहते हैं कि इस तरह से झूठ बोलने वाला व्यक्ति कभी वफादार नहीं होता। और स्वयं को असुरक्षित महसूस करता है और इस चक्कर में यदि इस बीमारी का शिकार व्यक्ति यदि उच्च पदों पर बैठा हो तो अपने पद का दुरुपयोग कर समाज-देश का नुकसान कर सकता है।

हालांकि ऐसा व्यक्ति अपनी वाकपटुता के चलते इसी तरह की बीमारी से ग्रस्त लोगों को न केवल अपना प्रशंसक बना लेता है बल्कि एक दो ऐसे काम कर लेता है जो अविश्वसनिय नजर आता है लेकिन कुल मिलाकर इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति से बड़े नुकसान की आशंका बनी रहती है।

हालांकि मनोचिकित्सकों ने झूठ बोलने की बीमारी को पकड़ लेने का दावा करते हैं और अब तो नार्को टेस्ट भी होता है लेकिन इसके बावजूद कुछ लोग इसलिए पकड़ में नहीं आते क्योंकि झूठ बोलने के लिए कोई खास संस्था से वे ट्रेनिंग लिये होते हैं।

झूठ बोलने की ट्रेनिंग देने वाली जाति या धर्म को ही महान बताकर युवाओं और बच्चों को आकर्षित तो करते ही है साथ ही सच की दीवार में झूठ का ऐसा सुराख करते हैं कि दीवार कम दिखे और सुराख ही बड़ा दिखे। आधा सच बताकर झूठ को ही सच बताने, अफवाह उड़ाने और अपने हालात के लिए दूसरे को जिम्मेदार बताकर नफरत का बीड़ा बोने वाली इन संस्थाओं को लेकर कुछ लोगों ने रिसर्च भी किया है।

खैर जब संस्था का उद्देश्य ही नफरत अफवाह और झूठ फैलाना हो तो आजादी की लड़ाई में हिस्सेदारी का क्या मतलब। अपने देश की आजादी हो या दूसरे देश की। बीमारी तो असर करेगा ही।

शनिवार, 27 मार्च 2021

किसान आंदोलन से डरने लगी सत्ता

 

किसानों के आंदोलन को तीन माह हो रहे हैं लेकिन पांच राज्यों के चुनाव में फंसी सत्ता को इससे कोई मतलब नहीं है, न ही आम जनमानस ही इस आंदोलन से उद्देलित है, ऐसे में किसान आंदोलन और भी लंबा चले तो किसी को क्या फर्क पड़ेगा लेकिन एक बात जान ले आंदोलन किसी सत्ता का विरोधी नहीं होता, आंदोलन का मतलब सत्ता की मनमानी से मुक्ति का रास्ता है, आखिर नमक आंदोलन छेड़ कर गांधी जी ने क्या किया था, मुठ्ठी भर नमक बिट्रिश सरकार का कुछ नहीं बिगाड़ सकती थी और न ही विदेशी वों की होली जलाने से ही बिट्रिश सत्ता के राजा को ही कोई फर्क पडऩे वाला था लेकिन हिन्दुस्तानियों का दिल जुड़ गया था।

और जब दिल जुड़ता है तो लोग जुड़े है तब मनमानी करने वाली सरकार का सिंहासन डोलने लगता है, वह जनता को एक साथ जुडऩे नहीं देता क्योंकि निरापद सामूहिक कर्म किसी भी आततायी सत्ता को कंधा देता है, उसे तो हिंसा चाहिए ताकि अपनी ताकत का इस्तेमाल कर सके इसलिए जब आंदोलन अहिंसक हो तो वह उसे हिंसक बनाने षडयंत्र रचता है ताकि भला मनुष्य खामोश बैठ जाए और सत्ता अपनी मनमानी करता रहे। अविश्वास भय और अलग-अलग झुंड चाहिए ताकि हर झुंड को वह अपनी ताकत से दबोच ले।

यही वजह है कि वह किसान आंदोलन ही नहीं इससे पहले हुए शाहिन बाग को लेकर भी भय, अफवाह फैलाते रहा, निजीकरण, बेरोजगारी और महंगाई से त्रस्त लोग एक साथ जमा न हो जाए इसलिए वह राष्ट्रवाद और हिन्दूत्व की चासनी में में डूबे रसगुल्ले परोसता है। क्योंकि सत्ता यह बात जानती है कि खुदीराम, आजाद, भगतसिंह से निपटना आसान है लेकिन गांधी से निपटना अब भी कठिन है क्योंकि गांधी का मतलब अहिंसा, सामूहिकता, समर्पण और भय से मुक्ति है।

किसानों के पास क्या है, दुनिया में किसी भी देश के किसानों से कम आय भारतीय किसानों की है जबकि दुनिया के देशों में कृषि उत्पादन के मामले में वह सबसे आगे की दौड़ में है तब किसान आंदोलन से सरकार क्यों डरे, क्योंकि किसानी से होने वाले नुकसान की वजह से हर साल लाखों युवा किसानी छोड़ दूसरे काम कर रहे हैं।

यही वजह है कि किसान आंदोलन को लेकर न सरकार गंभीर है और न ही आम लोग ही इससे जुड़ पा रहे हैं तब मोदी सत्ता की मनमानी के चलते झुंड में बंटे आंदोलनकारी निजीकरण, महंगाई, बेरोजगारी इकट्ठा क्यों नहीं हो पा रहे हैं।

किसानों ने पांच राज्यों के चुनाव में भाजपा के खिलाफ वोट डालने की अपील करते हुए आंदोलन का विस्तार तो कर दिया है तब क्या निजीकरण का खिलाफत करने वालों को भी इन राज्यों के चुनाव में अपनी भूमिका स्पष्ट नहीं करनी चाहिए।

किसानों के भारत बंद को जो लोग असफल बता रहे हैं उन्हें जानना चाहिए कि यदि किसानों का आंदोलन असफल है तो  अहमदाबाद में पत्रकार वार्ता के बीच किसान नेता की गिरफ्तारी पुलिस नहीं करती। सत्ता डरने लगी है यह ईशारा है।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

नरफत का मुंडन

नफरत का मुंडन
आदमी को आदमी बनाये रखना सबसे कठिन काम है। सत्ता की चाहत ने राजनेताओं को इस तरह स्वार्थी बना दिया है कि वह सहज जन की आस्था ही नहीं उसकी भीतरी ताकत व सुरक्षा को हिलाकर रख दिया है। उसकी अपनी आदमी होने की पहचान धर्म-जाति में सिमटने लगी है।
बचपन में एक कहानी पढ़ी थी। दो सेव के पेड़ आपस में बात कर रहे थे। एक सेव दूसरे सेव से कहता है। देख रहे हो धर्म जाति और रंग को लेकर आदमी इस कदर लड़ रहा है कि देखना एक दिन सब कुछ समाप्त हो जायेगा और हम सेव ही सेव बच जायेंगे। उसकी बात पर सहमति जताते हुए दूसरे सेव ने पूछा था कौन सा सेव? हरा या लाल? यानी यह लड़ाई कभी समाप्त नहीं होने वाली है? लेकिन क्या यह लड़ाई समाप्त नहीं होनी चाहिए?
यह सवाल आज मैं इसलिए उठा रहा हूं कि मुझे लगता है कि आदमी होने का अर्थ ही ज्ञान है, उसकी सोच उसका दिमाग है जो उसे अच्छे-बुरे की पहचान करने की ताकत देता है। इस देश में पूर्वजों की यही सोच ने हमें विश्व में गुरु होने की संज्ञा दी। अलग पहचान दी। पूरी दुनिया में भारत जैसा कोई देश नहीं है तो इसकी वजह हमारे आदमियत के नजदीक होने की कोशिश है। जितने श्रीराम यहां के मिट्टी पानी में बसे है उतने ही श्रीकृष्ण, माता स्वरुप शक्ति या हनुमान बसे हैं, ब्रम्हा-विष्णु-महेश भी हवा में समाये हुए हैं। कभी किसी ने एक दूसरे के मानने वालों पर लाठी-बंदूक नहीं तानी।
गौतम-महावी-गांधी के इस देश में न केवल सबको आश्रय मिला और वे भी आपस में गंगा जमुना की तरह मिल गये। राजशाही के दौर में भी दंगों की बात नहीं सुनी गई। पहला दंगा विश्व में कहां हुआ। यह कौन बपता सकता है? पर यह दावा है कि पहला दंगा कम से कम भारत में नहीं हुआ है। क्योंकि यहां वे लोग रहते हैं जो आदमीयत के ज्यादा नजदीक है। आदमी होने का अर्थ बचपन से ही संस्कार की छुट्टी में शामिल है। घर-परिवार-रिश्तेदारी, गांव-समाज का बंधन इस कदर दिलो-दिमाग में समाया है कि भरा-फरा परिवार में स्वर्ग का सुख देखा जाती है।
इस देश में जहां संस्कृति की रक्षा के लिए श्रीराम और धर्म की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण का जन्म होता है वहां आदमियत में जहर घोलने की कोशिश कभी सफल नहीं हो सकती। लेकिन क्षणिक सत्ता सुख की खातिर राजनेताओं का विष वमन विचलित करने वाला है। 
छत्तीसगढ़ में एक कहावत है हंडिया (हंडी) के मुंह में परई (ढक्कन) रख सकते है लेकिन आदमी के मुंह में क्या रखें? यानी आदमी का मुंह कब जहर उगल दे? जिस देश में आदमियत जिन्दा रखने रिश्तेदारी की अहमियत बचपने से समझाई जाती है। धर्म कथाओं व त्यौहारों का उत्सव मनाया जाता है, कर्म के अनुसार फल की दुहाई दी जाती हो। रावण के क्रोध, कंस के अत्याचार और शिशुपाल की बदजुबानी को क्या सिर्फ सत्ता सुख के लिए नजरअंदाज कर दिया जाए।
यह सच है कि कलयुग के पर्दापण के साथ ही बुराईयों का पहाड़ जगह-जगह खड़ा होगा लेकिन क्या हम बुराईयों को समाप्त करने कलि अवतार की प्रतिक्षा में आदमियत में घुलते जहर का घुंट खामोशी से पीते रहे? कर्म के अनुसार फल तो तय है? यह सोचकर कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने वाले समाज में नफरत के बीज बोने वालों के प्रति आखिर कब तक खामोशी की चादर ओढ़ कर बैठा जा सकता है?
अमेरिका में सिर्फ काला या गोरा होने पर हत्या कर दी जाती है? क्या हम वैसा ही विकास चाहते आज तो लोग हिन्दू-मुस्लिम सिख-इसाई को आपस में उलझाकर अपना सुख ढूंढ रहे है कल यदि कोई शिव भक्त, कृष्ण भक्त और राम भक्त को आपस में उलझाने लगे तब अजान से नींद खराब होने की बात कहने वाले सिर्फ इसलिए शिव मंदिर या राम मंदिर में चल रहे भजन कीर्तन को बंद कराने की कोशिश नहीं करेंगे कि वह तो ईश्वर खुदा या गाड को नहीं मानता! यह आज्बर की वजह से उसे आने जाने में तकलीफ होती है। उसकी आवाज उसे विचलित करती है। हिरण्यकश्यप ने आखिर प्रहलाद को सिर्फ विष्णु भक्त होने की सजा देना चाहता था। यह बात सभी को समझनी होगी और अजान पर टिप्पणी करने वाले सोनू निगम की तरह जितनी जल्दी नरफत का मुंडन कर दे उतना ही आदमी का आदमी बने रहने की कोशिश में प्रभावी कदम होगा।