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बुधवार, 15 जुलाई 2026

छत्तीसगढ़ में 'तालमेल' की पटरी से उतरी सरकार!



 यूरोक्रेसी का 'रिमोट कंट्रोल' या मंत्रियों की लाचारी? छत्तीसगढ़ में 'तालमेल' की पटरी से उतरी सरकार!

2. 2 साल, आधा दर्जन कमिश्नर: छत्तीसगढ़ चिकित्सा शिक्षा (Medical Education) विभाग बना अफसरों की 'म्यूजिकल चेयर'

3. सुशासन का दावा बनाम '2005 बैच' का दबदबा: फाइलों की खींचतान में पिस रही छत्तीसगढ़ की जनता।


छत्तीसगढ़ में सुशासन (Sushasan) और 'डबल इंजन' रफ्तार का दावा क्या सिर्फ कागजी है? राज्य के गलियारों से छनकर आ रही खबरें और लगातार हो रहे प्रशासनिक फेरबदल कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। मंत्रियों और उनके विभागों के आला अधिकारियों (सचिवों/आयुक्तों) के बीच पटरी न बैठने से न केवल विकास कार्य ठप हैं, बल्कि महत्वपूर्ण विभाग प्रशासनिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहे हैं। इसका सबसे ताजा और हैरान करने वाला उदाहरण प्रदेश का चिकित्सा शिक्षा विभाग (Medical Education Department) है, जहां पिछले दो सालों में करीब आधा दर्जन आयुक्त (Commissioners) बदले जा चुके हैं।


1. चिकित्सा शिक्षा विभाग में अफसरों की 'म्यूजिकल चेयर':

 मुद्दा: चिकित्सा शिक्षा विभाग जैसी महत्वपूर्ण रीढ़, जो डॉक्टरों के निर्माण और मेडिकल कॉलेजों के टेंडर व संचालन की कमान संभालती है, वहां अफसरों के टिकने की मियाद कुछ महीने ही रह गई है।

 इतिहास और वर्तमान: भूपेश सरकार के समय इस विभाग को सुचारू बनाने के लिए चिकित्सा शिक्षा आयुक्त (Medical Education Commissioner) के पद का सृजन हुआ था। पहली कमिश्नर नम्रता गांधी (31 जनवरी 2024) बनीं। तब से लेकर अब तक अब्दुल कैसर, जेपी मौर्य, जेपी पाठक, चंदन कुमार, किरण कौशल और रितेश अग्रवाल जैसे कई अधिकारियों के पास यह जिम्मेदारी आई और गई।

 खोजी सवाल: क्या चिकित्सा शिक्षा आयुक्त का पद इतना 'मलाईदार' या दबाव वाला है कि किसी भी अधिकारी की पटरी मंत्री या सचिव के साथ लंबे समय तक नहीं बैठ पा रही? बार-बार अधिकारियों के बदलने से मेडिकल कॉलेजों के टेंडर और स्वास्थ्य ढांचा पूरी तरह प्रभावित हो रहा है।

2. मंत्रियों बनाम सचिवों की जंग (Who is the Boss?):

 अधिकारियों का दबदबा: राजनीतिक गलियारों में चर्चा आम है कि छत्तीसगढ़ सरकार को मंत्री नहीं बल्कि अफसर चला रहे हैं। विशेषकर '2005 बैच' के चुनिंदा आईएएस अधिकारियों के दबदबे को लेकर खुद सत्ताधारी दल के भीतर असंतोष सुलग रहा है।

 सीएम सचिवालय बनाम अन्य विभाग: मुख्यमंत्री के सचिवालय (विशेषकर राहुल भगत) और वित्त विभाग (ओपी चौधरी) के निर्णयों और अन्य मंत्रियों के बीच का नीतिगत तालमेल कमजोर दिख रहा है।

 विवाद के चेहरे: चिकित्सा शिक्षा मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल और विभाग के सचिव अमित कटारिया (जो कभी पीएम के सामने चश्मा पहनने और अपनी कार्यशैली को लेकर चर्चा में रहे) के बीच के प्रशासनिक तालमेल पर भी सवाल उठ रहे हैं।

3. जनता पर सीधा असर: इलाज महंगा, जांच के नाम पर 'लूट':

 सरकारी अस्पतालों में जहां एमआरआई (MRI) और सीटी स्कैन (CT Scan) जैसी सुविधाएं मुफ्त या न्यूनतम शुल्क पर होनी चाहिए, वहां कथित तौर पर प्राइवेट अस्पतालों को फायदा पहुंचाने के लिए भारी शुल्क वसूला जा रहा है।

 आयुष्मान कार्ड (Ayushman Card) और जन आरोग्य जैसी जनकल्याणकारी योजनाएं जमीनी स्तर पर दम तोड़ रही हैं। इसी का नतीजा है कि मुख्य विपक्षी दल अब स्वास्थ्य मंत्री के बंगले के घेराव की रणनीति बना रहा है।

4. पुराना चिकित्सा उपकरण घोटाला और अधूरी कार्रवाई:

 पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने चिकित्सा उपकरणों की खरीदी में करोड़ों के कथित घोटाले की शिकायत पीएमओ, ईडी और सीबीआई से की थी।

 इस शिकायत के बाद हालांकि कुछ कार्रवाई हुई और आधा दर्जन अधिकारियों पर गाज गिरी, लेकिन कई दागी चेहरे आज भी अन्य महत्वपूर्ण विभागों में जमे हुए हैं, जो सुशासन के दावों पर सवालिया निशान खड़ा करता है।

प्रिंट मीडिया के लिए कुछ विशेष इनपुट्स (आपकी जानकारी के लिए अतिरिक्त तथ्य):

यदि आप इस पर ग्राउंड रिपोर्टिंग या फॉलो-अप करना चाहते हैं, तो इन बिंदुओं को अपनी जांच का हिस्सा बना सकते हैं:

1. फाइलों का 'गो-स्लो' मूवमेंट: मंत्रालय (महानदी भवन) से डेटा निकालें कि पिछले 6 महीनों में चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग की कितनी महत्वपूर्ण फाइलें मंत्रियों और सचिवों की 'सहमति/असहमतियों' के फेर में अटकी रहीं।

2. मेडिकल कॉलेजों में बुनियादी ढांचे की कमी: अंबिकापुर, जगदलपुर या रायपुर (मेकाहारा) जैसे प्रमुख मेडिकल कॉलेजों में नई मशीनों की खरीदी के टेंडरों की स्थिति क्या है? क्या आयुक्तों के बार-बार बदलने से टेंडर प्रक्रिया अटकी पड़ी है?

3. अन्य विभागों में भी यही हाल: सिर्फ चिकित्सा शिक्षा ही नहीं, बल्कि कई अन्य तकनीकी विभागों (जैसे पीएचई, माइनिंग और वन विभाग) में भी मंत्रियों और उनके मातहत आईएएस अधिकारियों के बीच फाइलों के नोटिंग्स पर खींचतान चल रही है, जिसे आप इस रिपोर्ट में 'बॉक्स आइटम' के रूप में जोड़ सकते हैं।

निष्कर्ष (Conclusion):

यह स्टोरी न केवल छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी के भीतर मचे घमासान को उजागर करेगी, बल्कि सुशासन और जीरो टॉलरेंस के नारों के पीछे छिपी जमीनी हकीकत को भी पाठकों के सामने रखेगी। प्रिंट मीडिया में खोजी पत्रकारिता के दृष्टिकोण से यह एक बेहद दमदार और जन-सरोकार से जुड़ी रिपोर्ट साबित हो सकती है।

वीडियो देखें 

गुरुवार, 9 जुलाई 2026

शिक्षा विभाग में 40 'दागी' अफसरों का सिंडिकेट

 छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग में 40 'दागी' अफसरों का सिंडिकेट: करोड़ों का बजट और सत्ता का खेल 


 छत्तीसगढ़ में 'हम ही बनाया है, हम ही संवारेंगे' के गूंजते नारों के बीच देश का भविष्य गढ़ने वाले शिक्षा विभाग की एक ऐसी कड़वी और स्याह हकीकत सामने आई है, जिसने पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। छत्तीसगढ़ के नौनिहालों का भविष्य संवारने का जिम्मा जिन कंधों पर है, वे खुद भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर दलदल में धंसे हुए हैं। शिक्षा विभाग के भीतर 40 से अधिक ऐसे 'दागी' अफसर मलाईदार पदों पर कुंडली मारकर बैठे हैं, जिन्हें कायदे से सलाखों के पीछे या सस्पेंशन लिस्ट में होना चाहिए था।

करोड़ों रुपए के भारी-भरकम बजट वाले इस सबसे महत्वपूर्ण विभाग को दीमक की तरह चाट रहे इन चेहरों और सत्ता के बीच की गलबहियां अब खुलकर उजागर होने लगी हैं।

युक्ति-युक्तकरण के नाम पर स्कूलों पर ताले, बेटियों की सुरक्षा दांव पर

[00:59] छत्तीसगढ़ में डबल इंजन की सरकार पर सवाल तब से ही उठने शुरू हो गए थे, जब 57 हजार शिक्षकों की भर्ती की प्रक्रिया को अटका दिया गया। इसके बाद विभाग ने 'युक्ति-युक्तकरण' (Rationalization) के नाम पर राज्य भर में हजारों सरकारी स्कूलों को बंद करने या मर्ज करने का फरमान सुना दिया।

 गरियाबंद का कन्याशाला विवाद [01:18]: गरियाबंद में 1965 से संचालित हो रहे एक नामी गर्ल्स स्कूल को बंद कर जब दूसरे को-एड स्कूल (ठाकुर दलगंजन स्कूल) में मर्ज करने का प्रयास किया गया, तो छात्राओं और अभिभावकों का गुस्सा फूट पड़ा। छात्राओं ने स्कूल में ताला जड़कर उग्र प्रदर्शन किया।

 असुरक्षित माहौल और बदहाली [02:14]: छात्राओं और परिजनों का सीधा आरोप है कि जिस स्कूल में उन्हें भेजा जा रहा है, वहां न तो पढ़ाई का स्तर अच्छा है, न ही वहां का माहौल बेटियों के लिए सेफ है। बुनियादी सुविधाएं जैसे शौचालय तक बदहाल हैं। इस तुगलकी नीति के कारण 40 से 50 छात्राएं टीसी (Transfer Certificate) लेकर स्कूल छोड़ने को मजबूर हो गईं।

 बिलासपुर में आदिवासियों पर मार [03:15]: बिलासपुर संभाग में भी इसी अविवेकपूर्ण नीति के चलते पंडो जनजाति के मासूम बच्चों को स्कूल पहुंचने के लिए 7 से 8 किलोमीटर का लंबा सफर तय करना पड़ रहा है। थक-हारकर कई गरीब आदिवासियों ने अपने बच्चों को स्कूल भेजना ही बंद कर दिया है।

40 घोटाले, ठंडे बस्ते में जांच और सत्ता का संरक्षण

[04:35] एक तरफ समय पर बच्चों को न तो कॉपी-किताबें मिल पा रही हैं और न ही स्कूल ड्रेस, वहीं दूसरी तरफ करोड़ों के बजट को ठिकाने लगाने वाले 40 दागी चेहरों पर कार्रवाई करने के बजाय सरकार उन्हें अपनी गोद में बिठाए हुए है। इन अफसरों पर भ्रष्टाचार से लेकर कुकर्मों तक के गंभीर मामले दर्ज हैं, लेकिन नेताओं और नौकरशाहों का नेक्सेस इतना मजबूत है कि तमाम जांचें ठंडे बस्ते में डाल दी गई हैं।

[05:42] सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस सिंडिकेट की पहुंच और ठसक सीधे सत्ता के शीर्ष तक है। वर्तमान शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और यहां तक कि स्वयं मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के पास भी कुछ समय के लिए यह विभाग रहा, लेकिन इन दागियों का बाल भी बांका नहीं हो सका। राजनैतिक गलियारों में चर्चा है कि इनमें से कई अफसरों को सुचिता और संस्कारों की बात करने वाले 'संघ' (RSS) का भी आंतरिक समर्थन प्राप्त है, जिसके दम पर ये मलाईदार कुर्सियों का आनंद ले रहे हैं।

सलाखों के बजाय मलाईदार पदों पर ताजपोशी

[07:54] जिन अधिकारियों की जगह जेल की कोठरी में होनी चाहिए थी, वे आज प्रदेश की पूरी शिक्षा व्यवस्था की नीतियां तय कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ के भविष्य के साथ हो रहे इस बड़े खिलवाड़ को लेकर अब विपक्ष और आम जनता में भारी आक्रोश है। यह 40 चेहरों का सिंडिकेट महज़ एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक सुनियोजित वित्तीय और नीतिगत घोटाला है।

अगर सरकार की नीयत वाकई साफ है, तो उसे तुरंत इन 40 दागी अफसरों की सूची पर संज्ञान लेते हुए इन्हें निलंबित करना चाहिए और बंद किए गए स्कूलों को दोबारा खोलना चाहिए। अन्यथा, छत्तीसगढ़ का भविष्य संवरने के बजाय इन दागियों के भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाएगा।

वीडियो देखें 

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

हद हो गई...


छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव सुनील कुमार को न केवल हाईकोर्ट में अपनी आमद देनी पड़ी बल्कि लिखित में यह कहना पड़ा कि आईंदा ऐसा नहीं होगा। हाईकोर्ट ने प्रदेश के गृह सचिव तक को नोटिस दिया है। एस पी कलेक्टर आए दिन हाईकोर्ट तलब किए जा रहे हैं और सरकार अफ़सरों की करतूतों पर परदा डाल रही है।
कोयले की कालिख के साथ कंठ तक भ्रष्टाचार में डुबी सरकार से बहुत Óयादा उम्मीद तो बेमानी है लेकिन सरकार की  करतूतों की सजा कोई कोई दूसरा क्यों भुगते। सरकार की इसी करतूत का फ़ायदा अधिकारी उठा रहे हैं। बेलगाम नौकरशाहों की मनमानी से आम आदमी का जीना दूभर होता जा रहा है। लेकिन सरकार को इसकी जरा भी परवाह हो ऐसा आचरण में नहीं दिखता।
वैसे तो रमन सरकार में अफ़सरशाही और प्रशासनिक आतंक की कहानी नई नहीं है एवं प्रशासनिक आतंक जैसे शब्दों का प्रयोग करने वाले विपक्षी कांग्रेसी नहीं उनकी ही पार्टी के नेता दिलीप सिंह जूदेव हैं। प्रशासनिक आतंक की हालत यह है कि गिनती के 4 अफ़सर पूरे प्रदेश को संभाल रहे हैं और उनके आगे न मंत्रियों की चलती है और न ही किसी और की चलती है।
प्रदेश में ऐसा कोई विभाग नहीं होगा जहां भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी फ़ल-फ़ूल रहे हैं। सरकारी खजानों पर तो डकैती डाली जा रही है। ईमानदार अफ़सरों को इतना प्रताडि़त किया जा रहा है कि वे आत्महत्या करने तक मजबूर हो रहे हैं। भ्रष्ट अफ़सरों को मलाईदार पदों पर ही नहीं बिठाया जा रहा बल्कि उन्हे रिटायरमेंट के बाद भी संविदा में रखा जा रहा है। पदोन्नति से लेकर तबादले में ईमानदार अफ़सरों की उपेक्षा की जा रही है और सरकार के मंत्रियों के पास पहुंचने वाली ऐसी शिकायतें रद्दी की टोकरी में फ़ेंकी जा रही हैं। यही वजह है कि अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ़ हाईकोर्ट में दस्तक दी जा रही है। अगर सरकार ही न्याय करे तो लोग कोर्ट क्यों जाएगें।
विधानसभा हो या मंत्रालय, कलेक्टरेट हो या पुलिस मुख्यालय सब जगह अफ़सरों की मनमानी से आम जनता त्रस्त है। अब तो अफ़सरों की अय्याशी का मामला इतना बढ गया है कि उनके द्वारा निवेशकों को लुभाने के नाम पर अश्लील नाच का आयोजन भी किया जाने लगा है। करीना कपूर हो या मैनपाट कार्निवल की रशियन बालाएं सब अफ़सरों की करतूतों की कहानी है जिस पर सरकार की पूरी स्वीकृति है।
प्रदेश में बैठी भाजपा सरकार को अपनी जिम्मेदारी का कितना अहसास है यह तो वही जाने लेकिन संविधानिक व्यवस्था में अफ़सरों से काम लेना सरकार की जिम्मेदारी है। लोकतंत्र में  सरकार इसलिए बिठाई जाती है ताकि सरकारी खजाने का सही और जनहित में उपयोग हो। बेहतर सरकार वही मानी जाती है जहां अफ़सर बेलगाम न हो और लोगों की समस्यायो का निपटारा न्यायालय जाने से पहले हो जाए।
लेकिन जब सरकार पर ही कालिख पूती हो, सरकार के ही मंत्रियों की करतूतों पर सवाल उठ रहे हों और खुद मंत्री की भूख सिफऱ् पैसा कमाने की हो तो अफ़सरों की स्वे'छाचारिता को कैसे रोका जा सकता है। गंभीर अपराधों के बाद भी यदि कई अफ़सर महत्वपूर्ण मलाईदार पदों पर बैठे हैं तो इसकी प्रमुख वजह रमन सरकार और उसके मंत्री हैं। लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत विधायिका होती है और उसकी जिम्मेदारी सिफऱ् सरकारी सुविधाओं का लाभ लेना या अपने हितों में फ़ैसला लेना बस नहीं है। बल्कि जनता के हित और चोरों को सजा मिले यह भी जिम्मेदारी है। लेकिन जिस तरह से उजार हुए भ्रष्टाचार के मामले में लीपापोती हो रही है वह उचित नहीं है। केवल बदनामी के डर से नरहरपुर कें आश्रम की आदिवासी मासूमों के बलात्कार की घटना पर लीपापोती करना शर्मनाक नहीं तो और क्या है। एक बात राजनेता जान लें कि लोकतंत्र में जनता का फ़ैसला सर्वोपरि होता है और हर बात हद में रहे तभी बेहतर है। अति सर्वत्र वर्जयेत।

बुधवार, 9 जून 2010

बाबूलाल दमदार,लाचार है सरकार!

ऐसे फैसलों से ही ईमानदार होते हैं हताश
वैसे तो पहले से ही इस बात का अंदेशा था कि आईएएस बाबूलाल अग्रवाल साफ बच निकलेंगे। अपनी दमदारी का लोहा मनवा चुके पूर्व कृषि सचिव बाबूलाल को जिस तरह से निलंबित करने में सरकार ने विलंब किया था उतनी ही जल्दी आनन फानन में बहाली का आदेश भी निकाल दिया। प्रदेश सरकार के इस निर्णय ने एक बार फिर ईमानदारों में हताशा पैदा हुई है वहीं बाबूलाल अग्रवाल की दमदारी भी सामने आई है।
कभी स्वास्थ्य सचिव रहे बाबूलाल अग्रवाल के कार्यकाल में हुए घपले की कहानी अभी लोग ठीक से भूले भी नहीं थे और उन पर होने वाली कार्रवाई से निगाह भी नहीं हटी थी कि उनकी बहाली आदेश ने आम लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया कि आखिर सरकार को हो क्या गया है। राजनैतिक सुचिता और नैतिकता की दुहाई देने वाली भाजपा अचानक सत्ता पाते ही कैसे बदल गई।
बाबूलाल अग्रवाल के निवास में जब आयकर विभाग ने छापे की कार्रवाई की तब देर है अंधेर नहीं का राग अलापने वाले भी सरकार के इस फैसले से हतप्रभ है। तब आयकर विभाग ने बाबूलाल अग्रवाल पर आय से अधिक संपत्ति का मामला बनाया था दो-चार सौ करोड़ की अनुपातहीन संपत्ति का दावा किया गया और कहा जाने लगा था कि बाबूलाल अग्रवाल का बच पाना आसा नहीं है। हालांकि अंदेशा तब भी था कि अपनी पहुंच और ताकत के बल पर राज करने वालों पर कार्रवाई आसान नहीं है।
इधर पता चला है कि उच्च स्तरीय राजनैतिक दबाव के चलते सरकार ने निर्णय लिया है इसके लिए मध्यप्रदेश में भाजपा विधायक ने भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं से चर्चा की थी और मुलाकात भी कराई थी। कहा जाता है कि सरकार पर भाजपा के ही राष्ट्रीय नेताओं का जबरदस्त दबाव था और इसके चलते ही यह तय माना जा रहा था कि बाबूलाल अग्रवाल की बहाली शीघ्र हो जाएगी। इधर सरकार के इस फैसले से आम आदमी में तीखी प्रतिक्रिया व्याप्त है और कहा जा रहा है कि इससे सरकार की छवि पर भी विपरित प्रभाव पड़ने वाला है।
गौरतलब है कि इस छापे में आयकर दस्ते ने श्री अग्रवाल व उनके परिजनों के यहां से 70 करोड़ रुपए से अधिक की अघोषित संपत्ति का खुलासा किया था। 4 फरवरी से 7 मार्च तक आयकर दस्ते की जांच में पारिवारिक व्यवसाय में श्री अग्रवाल के निवेश के भी दस्तावेज जब्त किए थे। इससे उन पर अपनी आय से अधिक अनुपातहीन संपत्ति अर्जित करने के भी आरोप लगाए थे। आयकर विभाग की फौरी रिपोर्ट के आधार पर राय शासन ने 12 फरवरी को एक आदेश जारी कर श्री अग्रवाल को निलंबित कर दिया था। इसके बाद से श्री अग्रवाल अपनी बहाली के लिए प्रयासरत थे। उनकी बहाली में छापे को लेकर आयकर विभाग की मुकम्मल रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा था। इस रिपोर्ट के लिए आयकर विभाग की लंबी जांच प्रक्रिया जारी थी। 90 दिनों के भीतर राय सरकार को आयकर रिपोर्ट के हवाले से श्री अग्रवाल को आरोप पत्र दिया जाना था। जो संभव नहीं हो पाया। इसे देखते हुए राय सरकार ने अपनी तरफ से (बिना आयकर रिपोर्ट के) जांच शुरु करते हुए श्री अग्रवाल से अघोषित व आय से अधिक संपत्ति के मामले में पूछताछ की थी। इस पर श्री अग्रवाल ने मय दस्तावेज अपनी आय व चल अचल संपत्ति का ब्यौरा के साथ अपनी बहाली के लिए राय शासन को आवेदन भी प्रस्तुत किया था। जवाब के परीक्षण के बाद राय शासन ने गुरुवार को श्री अग्रवाल का निलंबन खत्म कर सेवा में बहाल कर दिया है। सूत्रों के मुताबिक श्री अग्रवाल को राजस्व मंडल बिलासपुर में सदस्य नियुक्त किया गया है। इन्हें मिलाकर राजस्व मंडल में दो सदस्य हो गए हैं। श्री अग्रवाल के अलावा आर.सी. सिन्हा भी सदस्य है। बहरहाल अग्रवाल की बहाली ने राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल तो उठाये ही है साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि यह कदम भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाला होगा।

सोमवार, 10 मई 2010

महाराष्ट्र में पैसा खपाने वाले मुकेश-दिनेश का जलवा

क्यों न हो महाराष्ट्र का विकास
महाराष्ट्र के विकास में अब छत्तीसगढ़ का योगदान बढ़ने लगा है कहा जाता है कि छत्तीसगढ़ के राजनेताओं और अधिकारियों के करोड़ों-अरबों रुपए महाराष्ट्र में खर्च किए जा रहे हैं। प्रदेश के एक मंत्री के तो नागपुर-गोंदिया में अरबों रुपए जमीन खरीदी में लगा है और इस काम में मुकेश व दिनेश की भूमिका महत्वपूर्ण बताई जा रही है।
छत्तीसगढ़ वैसे तो भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया है। राजधानी की जमीनें आसमान छूने लगी है और फिर भ्रष्टाचार का पैसा खपाना आसान नहीं है इसलिए यहां के कई अधिकारी व नेता अपनी काली कमाई दूसरे प्रदेशों में खपाने लगे हैं। ऐसा ही एक मामला प्रदेश के दमदार माने जाने वाले मंत्री का आया है। कहा जाता है कि राजधानी में रिश्तेदारों और दोस्तों के नाम बेनामी जमीनें खरीदने के साथ-साथ अब इस मंत्री ने गोंदिया-नागपुर और मुंबई में भी अपने रिश्तेदारों व विश्वसनीय लोगों के नाम पर जमीन खरीदना शुरु कर दिया है।
हमारे सूत्रों व नागपुर संवाददाताओं के मुताबिक पिछले 5-6 सालों में यहां की जमीनों की कीमत में बेतहाशा वृध्दि हुई है और इसकी वजह छत्तीसगढ़ के एक मंत्री की रूचि है जिनके रिश्तेदारों द्वारा यहां भारी पैमाने पर जमीनें खरीदी गई है। हमारे सूत्रों के मुताबिक गोंदिया और नागपुर में इन 6 सालों में दिनेश-मुकेश की जोड़ी ने तहलका मचा रखा है और इन लोगों ने कई जमीनें अपने नाम पर खरीदी है या फिर अपने रिश्तेदारों के नाम पर रजिस्ट्री कराई है। सूत्रों का दावा है कि इन 6 सालों में गोंदिया व नागपुर में खरीदी गई जमीनों की उच्च स्तरीय जांच की गई तो बड़ा घोटाला सामने आ सकता है।
हमारे सूत्रों के मुताबिक महाराष्ट्र के तेजी से विकास में भी काली कमाई का बहुत बड़ा हाथ है पूरे देशभर के कई अधिकारी व नेता यहां पैसा खपा रहे हैं इसलिए इस प्रदेश में बढते निर्माण कार्य ने विकास दर में वृध्दि किया है। सूत्रों का कहना है कि यदि छत्तीसगढ़ के राजनेता व अधिकारी अपने ही प्रदेश में पैसा खपाये तो प्रदेश का विकास तेजी से होगा लेकिन नाम उजागर होने और पकड़े जाने के डर से ये लोग दूसरे प्रदेशों में पैसा लगाते हैं।
इधर मुकेश-दिनेश के जलवे को लेकर राजधानी में जबरर्दस्त चर्चा है और कहा जा रहा है कि इन्हें पैसा किसी राजेन्द्र अग्रवाल और उपाध्याय के मार्फत भेजा जाता है। हालांकि अधिकांश राशि हवाला के माध्यम से ही पहुंचाई जाती है। बहरहाल नागपुर और गोंदिया में बड़े पैमाने पर चल रही जमीन खरीदी को लेकर यहां कई तरह की चर्चा है और कहा जा रहा है कि यदि मुख्यमंत्री ने इस ओर ध्यान नहीं दिया तो आने वाले दिनों में कोई बड़ी मुसिबत आ सकती है।

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

प्रदेश के बड़े मगरमच्छों के खिलाफ 6 सौ मामले...

अब छत्तीसगढ क़ा क्या होगा
सरकार मामला दबा रही

छत्तीसगढ़ राय बनने के बाद यहां के उच्च पदस्थ अधिकारियों और मंत्रियों ने चौतरफा लूट मचा रखी है और यही वजह है कि लोक आयोग जैसी संस्था में शिकायतों का ग्राफ बढता जा रहा है और सरकार खुद को बचाने किसी भी मामले में कार्रवाई नहीं कर रही है।
छत्तीसगढ़ राय निर्माण के बाद वैसे तो सरकार ने लोकायुक्त के मुकाबले लोक आयोग का गठन कर अपनी मंशा जाहिर कर दी थी कि वह अपने नेताओं और मंत्रियों को किस तरह से संरक्षण देना चाहते है और अब राय निर्माण के दस साल में यही सब हो भी रहा है। बताया जाता है कि लोक आयोग के पास लगभग 6 सौ मामले लंबित है। इनमें सरकार के कई महत्वपूर्ण मंत्री और अधिकारियों के नाम है। हालत यह है कि इन लोगों के खिलाफ मिली शिकायतों की ठीक से न तो जांच हो रही है और न ही जांच में सहयोग ही किया जा रहा है।
वैसे लोक आयोग ने पिछले साल दर्जनभर मामले में कार्रवाई के लिए राय सरकार से अनुशंसा भी की थी लेकिन पता चला है कि इस मामले में सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की है।
छत्तीसगढ़ में निर्माण के क्षेत्र में खासकर पीडब्ल्यूडी, पर्यटन, सिंचाई, स्वास्थ्य, खनिज और पंचायत विभाग में भारी भ्रष्टाचार करने की खबर है और मंत्री से लेकर अधिकारियों के खिलाफ मय सबूत शिकायतें की गई है लेकिन इन मामलों की जांच तक नहीं हो रही है इस संबंध में बताया जाता है कि सरकार जानबूझकर बल की कमी उत्पन्न कर रही है जिससे चौतरफा जांच प्रभावित हो वहीं सरकार के दबाव की भी चर्चा है।इधर पता चला है कि यदि लोक आयोग को सरकार छूट दें तो प्रदेश के आधा दर्जन मंत्री और दर्जनभर से अधिक अधिकारी कटघरे में जा सकते हैं। ऐसे में सरकार अपनी बदनामी से बचने आयोग की सिफारिशों को रद्दी की टोकरी में फेंक रही है। दूसरी तरफ इस बार बजट सत्र में रिपोर्ट नहीं पेश करने को लेकर भी सरकार कटघरे में है और कहा जा रहा है कि मानसून सत्र में रिपोर्ट पेश की जाएगी। बहरहाल लोक आयोग पर दबाव को लेकर रमन सरकार कटघरे में है और कहा जाता है कि प्रदेश के भ्रष्ट मगरमच्छों को बचाने की कोशिश हो रही है।