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रविवार, 2 अगस्त 2026

छत्तीसगढ़ का ₹800 करोड़ का सियासी चक्रव्यूह

 छत्तीसगढ़ का ₹800 करोड़ का सियासी चक्रव्यूह


3 साल की फरारी, 8 राज्यों में पनाह और अचानक सरेंडर: रामगोपाल अग्रवाल के समर्पण के पीछे की पूरी 'क्रोनोलॉजी'


छत्तीसगढ़ के पावर कॉरिडोर से लेकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों तक इस समय केवल एक ही नाम की गूंज है—रामगोपाल अग्रवाल [00:41]। प्रदेश कांग्रेस के तत्कालीन कोषाध्यक्ष और छत्तीसगढ़ के चर्चित वित्तीय घोटालों के कथित 'मास्टरमाइंड' रामगोपाल अग्रवाल ने 8 जुलाई को रायपुर स्थित राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) के दफ्तर में अचानक पहुंचकर सरेंडर कर दिया [00:41]।

जो शख्स पिछले तीन सालों से देश की सबसे बड़ी केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ED) और राज्य की EOW की आंखों में धूल झोंक रहा था, उसका यह आत्मसमर्पण महज एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई राजनीतिक व कानूनी पेच जुड़े हुए हैं [00:17, 01:05]।

1. बोरियों में नोट डंप करने का आरोप: 800 करोड़ के साम्राज्य की परतें

EOW ने अदालत से रामगोपाल अग्रवाल की 17 जुलाई तक रिमांड हासिल की है [02:26]। अदालत में जांच एजेंसी द्वारा दिए गए दस्तावेजों और दलीलों के अनुसार:

 सिंडिकेट का वित्तीय नेटवर्क: सूर्यकांत तिवारी भले ही कोल लेवी व शराब घोटाले का मुख्य चेहरा रहा हो, लेकिन इस काली कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा रामगोपाल अग्रवाल के नेटवर्क तक पहुंचता था [02:58]।

 कैश का लेन-देन: जांच एजेंसियों का आरोप है कि अवैध वसूली के पैसे नोटों की गड्डियों में नहीं, बल्कि बोरियों और कार्टन में भरकर डंप किए जाते थे [03:23]।

 कोल लेवी घोटाला: अकेले कोयला लेवी से ₹52.65 करोड़ सीधे अग्रवाल के नेटवर्क में डंप होने का आरोप है [03:46]।

 हवाला नेटवर्क: पार्टी फंड और चुनावी प्रबंधन के नाम पर कुल ₹800 करोड़ के संदिग्ध लेन-देन का दावा किया गया है, जिन्हें हवाला के जरिए दिल्ली और अन्य राज्यों में भेजा गया [03:59]।

2. लुक-आउट नोटिस के बावजूद 8 राज्यों में कैसे रहे सुरक्षित?

रामगोपाल अग्रवाल 2023 से फरार थे और उनके खिलाफ ED द्वारा लुक-आउट सर्कुलर (LOC) जारी किया गया था [04:44]। देश के सभी एयरपोर्ट और प्रमुख नाकों पर सतर्कता के बावजूद वे ओडिशा, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और केरल जैसे आठ राज्यों में लगातार ठिकाने बदलते रहे [05:10]।

खोजी सूत्रों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इतनी लंबी फरारी बिना किसी मजबूत राजनीतिक सुरक्षा चक्र और भारी लॉजिस्टिक फंडिंग के संभव नहीं थी [05:32]। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह फरारी केवल कानून से बचना थी, या फिर कई रसूखदार चेहरों को बचाने के लिए एक 'मैनेज्ड एस्केप' (सोची-समझी फरारी) की रणनीति थी? [05:44]

3. अचानक सरेंडर की वजह: बेटे से पूछताछ और दो सियासी कयास

सूत्रों के मुताबिक, यह सरेंडर अचानक नहीं हुआ। EOW ने जब रामगोपाल अग्रवाल के बेटे वैभव अग्रवाल को समन भेजकर दो दिनों तक कड़ी पूछताछ की, उसके तुरंत बाद रामगोपाल अग्रवाल खुद चलकर EOW दफ्तर पहुंचे [06:38]।

इस सरेंडर को लेकर राजनीतिक गलियारों में दो प्रमुख चर्चाएं हैं:

1. गठजोड़ या अंडरस्टैंडिंग थ्योरी: एक कयास यह है कि पर्दे के पीछे कोई रणनीतिक सहमति (Understanding) बनी है, जिसके तहत अग्रवाल कानून के समक्ष प्रस्तुत हुए हैं [06:59]।

2. सरकारी गवाह (Aprover) बनने की संभावना: दूसरा और अधिक खतरनाक पहलू यह है कि यदि रामगोपाल अग्रवाल PMLA की सख्त धाराओं से राहत पाने के लिए 800 करोड़ रुपये के वित्तीय तारों (हवाला और दिल्ली ट्रांसफर) की पूरी जानकारी एजेंसियों को सौंप देते हैं, तो प्रदेश व राष्ट्रीय स्तर के कई दिग्गजों पर गाज गिर सकती है [07:31, 07:52]।

 'क्रूशियल' मोड़: ED का अगला कदम तय करेगा दिशा

EOW की रिमांड अवधि 17 जुलाई को समाप्त हो रही है [02:26, 08:12]। उस दिन रायपुर अदालत में होने वाली कार्यवाही छत्तीसगढ़ की राजनीति की भावी दिशा तय करेगी:

 यदि ED कस्टडी मांगती है: कानूनन ED के पास PMLA की धारा 45 के तहत अदालत से प्रॉडक्शन वारंट मांगकर रामगोपाल को अपनी हिरासत में लेने का पूरा अधिकार है [08:45, 08:59]। ED की कस्टडी का मतलब होगा कि जमानत लगभग असंभव हो जाएगी और जांच की आंच कई नए नेताओं तक पहुंचेगी [09:09]।

 यदि ED शांत रहती है: यदि 17 जुलाई को ED रिमांड नहीं मांगती है और केवल EOW के मामले में न्यायिक हिरासत (जेल) की स्थिति बनती है, तो पर्दे के पीछे की सेटिंग/समझौते की थ्योरी को बल मिलेगा और बचाव पक्ष के लिए जमानत की राह आसान हो सकती है [09:19, 09:31]।

निष्कर्ष

छत्तीसगढ़ के इतिहास के सबसे बड़े वित्तीय और राजनीतिक सिंडिकेट का क्लाइमेक्स 17 जुलाई की कानूनी कार्यवाही पर टिका है [09:53]। अब देखना यह है कि रिमांड खत्म होने पर ED का क्या रुख रहता है और क्या 3 साल से छिपे राजदार की जुबान खुलने से सियासी गलियारों में कोई नया भूचाल आता है [08:59, 09:43]।

वीडियो देखें 

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2024

महादेव सट्टा वाले सौरभ की गिरफ़्तारी से उड़े होश…


 महादेव सट्टा एप के कर्ता धर्ता सौरभ चंद्राकर की गिरफ़्तारी की खबर ने छत्तीसगढ़ की राजनीति में उथल पुथल मचा दिया है, कहा जाता है कि सौरभ के कांग्रेस और बीजेपी के बड़े नेताओ से सीधे संबंध हैं।

इस मामले में भूपेश बघेल पर जब आरोप लगे थे तो कांग्रेस ने भी पत्रकार वार्ता लेकर सौरभ के साथ संबंध को लेकर बीजेपी के दिग्गज नेताओ रमन सिंह, प्रेम प्रकाश पांडे, रमेश बैस सहित कई नेताओ की तस्वीर जारी की थी ।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ जूस दुकान खोलकर सौरभ चंद्राकर ने बहुत बड़े काम को अंजाम दे दिया। छोटे स्तर से लेकर बॉलीवुड और नेता, अधिकारी तक इसमें शामिल पाये गये। अब महादेव ऐप का मुख्य सरगना सौरभ चंद्राकर दुबई में गिरफ्तार कर लिया गया है। ED के अनुरोध पर जारी इंटरपोल के रेड कॉर्नर नोटिस के तहत गिरफ्तारी की कार्यवाही की गई है। प्रवर्तन निदेशालय (ED), विदेश मंत्रालय (MEA) और गृह मंत्रालय (MHA) की संयुक्त कार्रवाई में उसे पकड़ा गया है। यूएई के अधिकारियों ने भारत सरकार और CBI को सौरभ चंद्राकर की गिरफ्तारी के बारे में जानकारी दी है। सभी औपचारिकताओं को पूरा करने की प्रक्रिया पूरा करने के बाद “प्रोविजनल अरेस्ट” पर उसे भारत लाया जायेगा। जल्द ही वह भारत की जमीन पर होगा।

महादेव बेटिंग ऐप का मुख्य सरगना सौरभ चंद्राकर भिलाई शहर का रहने वाला है। उसके पिता नगर निगम में पंप ऑपरेटर थे और सौरभ एक जूस की दुकान चलाता था। वर्ष 2019 में वो दुबई गया और उसने यहां अपने एक दोस्त रवि उप्पल को भी बुलाया। इसके बाद उसने वहां महादेव ऐप लॉन्च किया और ऑनलाईन सट्टा खिलाना शुरू कर दिया। फिर धीरे-धीरे ऑनलाईन सट्टा बाजार का बड़ा नाम बन गया। वहीँ राज्य चुनाव के समय शुभम सोनी का विडियो भी वायरल हुआ, जिसने एप्प का मुखिया खुद को बताया और उसने तत्कालीन मुख्यमंत्री को पैसे पहुचाने की भी बात कही।

दरसअल, महादेव बेटिंग ऐप को कई वेबसाईट के जरिए ऑपरेट किया जाता है, यह अलग-अलग नामों से भी चलाई जाती है। इस बेटिंग ऐप में लोगों को पैसे लगाने के लिए कहा जाता है। महादेव बुक की वेबसाईट के जरिए देश में पोकर, कार्ड गेम्स, क्रिकेट, बैडमिंटन, टेनिस, फुटबॉल के मैच पर पैसे लगाए जाते हैं। हर जुए की तरह इस ऐप में भी लोग ज्यादा कमाई करने के लालच में पैसे लगाते हैं।


21 अक्टूबर, 2023 को ईडी ने इस मामले में अपनी पहली चार्जशीट दाखिल की, जिसमें सौरभ चंद्राकर और रवि उप्पल सहित 14 आरोपियों को नामजद किया गया है। जांच एजेंसी ने अपराध की 41 करोड़ रुपये की आय को अस्थायी रूप से कुर्क किया है। प्राथमिक प्रमोटरों में एक प्रमुख व्यक्ति रवि उप्पल को प्रवर्तन निदेशालय के कहने पर इंटरपोल द्वारा जारी रेड कॉर्नर नोटिस के बाद दुबई पुलिस ने गिरफ्तार किया गया है। इसके अलावा, ईडी ने विभिन्न शहरों में हवाला ऑपरेटरों से जुड़े कई परिसरों पर छापे मारे हैं, जिसके परिणामस्वरूप 417 करोड़ रुपये की संपत्ति कुर्क हुई है। कई बैंक खाते सीज करवाये गये है और कईयों की जानकारी निकाली गई है।


महादेव बेटिंग ऐप मामले में पिछले साल बॉलीवुड के कई सेलिब्रिटी, सिंगर्स, एक्टर और कॉमेडियन ED के राडार पर थे। इन सेलिब्रिटीज का नाम इस ऐप को को-प्रमोटर सौरभ चंद्राकर के साथ रिश्ते होने की वजह से सामने आए थे। ED के मुताबिक, सौरभ चंद्राकर की शादी में इवेंट मैनेजमेंट कंपनी को हवाला के जरिए 112 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था। वहीं, होटल की बुकिंग के लिए 42 करोड़ रुपये की रकम नगद के जरिए भुगतान किया गया था। सरकार ने इस बेटिंग ऐप पर बैन लगाने से पहले 2023 में कुल 138 ऑनलाईन बेटिंग ऐप और 94 डिजिटल लोन ऐप पर बैन भी लगाया था। वहीँ महादेव एप की कई वेबसाइटें भी ब्लॉक की गई, लेकिन फिर भी यह अब तक जारी है।

बुधवार, 25 सितंबर 2024

अभी सिर्फ बेल, नहीं छूटेगा जेल

  अभी सिर्फ बेल, नहीं छूटेगा जेल

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान उठते सवाल 


कोयला लेव्ही कांड को लेकर जेल में बंद पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की उपसचिव सौम्या चौरसिया को सुप्रीम कोर्ट में अंतरिम जमानत तो मिल गई है लेकिन दूसरे और भी मामलों से जुड़े होने की वजह से वे जेल में ही रहेंगी।

२१ महिने से जेल में बंद सौम्या को अंतरिम जमानत देते समय कोर्ट ने जो सवाल खड़े किये, उसका जवाब सरकार या ईडी के पास नहीं था कि आखिर किसी मामले के आरोपी को कितने समय तक जेल में रखा जा सकता है ? हैरानी की बात बात तो यह है कि ईडी ने अभी तक सौम्या के खिलाफ आरोप ही तय नहीं किये है। जबकि २१ माह  में इस मामले की सुनवाई भी शुरू नहीं हुई है।

ऐसे में कांग्रेस के इस आरोप को बल मिलता है कि यह पूरा मामला भूपेश बघेल को बदनाम करने की साजिश का हिस्सा है।

सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिका की सुनवाई ने तीन बड़े सवाल खड़े किये है कि आख़िर सोम्पा के खिलाफ अभी तक आरोप तय क्यों नहीं कर पाई, दूसरा सवाल. यही है कि सिर्फ पूछताछ के लिए इडी किसी को कितने दिनों तक हिरासत में रख सकती है और तीसरा जो सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि सत्ता किसी को ऐसा असिमित अधिकार कैसे दे सकती है जो मानवाधिकार के उल्लघन का अधिकार  दे दे। 

पूरा मामला इस प्रकार हैं... सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सीएम भूपेश बघेल की उप सचिव रहीं सौम्या चौरसिया को अंतरिम जमानत दे दी. सौम्या चौरसिया कथित कोयला लेवी घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में आरोपी हैं. जस्टिस सूर्यकांत, दीपांकर दत्ता और उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने कहा कि चौरसिया एक साल और नौ महीने से अधिक समय से हिरासत में हैं, उनके खिलाफ आरोप तय होना बाकी है और मुकदमा शुरू नहीं हुआ है. इसके साथ ही अदालत ने छत्तीसगढ़ सरकार को निर्देश दिया है कि वह अगले आदेश तक सौम्या चौरसिया को सेवा में बहाल न करे.

"जब भी जरूरत हो ट्रायल कोर्ट में सौम्या चौरसिया पेश हों": अदालत ने कहा कि जब भी जरूरत हो ट्रायल कोर्ट में सौम्या चौरसिया पेश हो और गवाहों को प्रभावित न करें. शीर्ष अदालत में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के 28 अगस्त के आदेश को चुनौती दी गई है. जिसके तहत उच्च न्यायालय ने जमानत देने से इंकार किया था. जस्टिस सूर्यकांत, दीपांकर दत्ता और उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने कहा कि चूंकि उनकी याचिका पर सुनवाई में कुछ समय लगेगा, इसलिए वह उन्हें अंतरिम जमानत दे रहे हैं.



शुक्रवार, 6 सितंबर 2024

न निलंबन, न एफ़आईआर-कड़ी कार्रवाई का प्रचार

 बच्ची का आंसू पोछने सत्त्रा व खेल...

न निलंबन, न एफ़आईआर-कड़ी कार्रवाई का प्रचार 


आलीवारा की छात्रा को जिन्दगी भर जेल की हवा खिलाने की धमकी देने वाले जिला शिक्षा अधिकारी अभय जायसवाल को लोक शिक्षण संचालनालय में सहायक संचालक के पद पर बिठा दिया गया।

इस आदेश को सरकार और उससे जुड़े लोग मुख्यमंत्री के कड़े तेवर के रूप में प्रचारित-प्रसारित कर रहे हैं लेकिन यही सरकार जब न्यायालय में ट्रांसफर को सजा से इंकार करती है तब सवाल यही है कि क्या अभय जायसवाल को सरकार ने कोई सजा दी ?

सिर्फ कुर्सी बदला गया, सजा तो उसे मिली ही नहीं । लेकिन सत्ता का अपना चरित्र है और दलाल मिडिया' का अपना चरित्र।

दो दिन पहले अलिवारा स्कूल के छात्र-छात्राएं बड़ी संख्या में शिक्षकों की कमी दूर करने की मांग को लेकर जिला शिक्षा अधिकारी से मिलने पहुंचे थे जहाँ शिक्षा अधिकारी अभय जायसवाल ने बच्चों को जिन्दगी भर जेल की हवा खिलाने की धमकी देते हैं। सहमी बच्चियां इस धमकी से डरीसहमी बच्चियाँ  शिक्षा अधिकारी के कक्ष से रोते-बिलखते बाहर निकलती है तो उस पर पत्रकारों की नजर पड़‌ जाती है और पत्रकारो ने जब रोने की वजह पूछी तो बच्चियों ने सब कुछ साफ-साफ बता दिया कि किस तरह से अभय जायसवाल ने उन्हें जेल की हवा खिलाने की धमकी दे रहे हैं।

इस धमकी का वीडियो जब वायरल हुआ तो प्रशासन के हाथ-पांव फूल गये, लेकिन अभय जायसवाल के खिलाक कार्रवाई करने की बजाय उनका तबादला कर यह प्रचारित किया गया कि बच्ची के आंसू देख मुख्यमंत्री ने कड़े तेवर दिखाते हुए जिला शिक्षा अधिकारी को हटा दिया।

जबकि कड़ा तेवर तो तब माना जाता जब अभय जायसवाल को निलंबित किया जाता और एफ़ आई आर की जाती।

लेकिन सूत्रों  का कहना है कि लेन देन कर शिक्षा अधिकारी बनने-बनाने का खेल जब चलता हो तो फिर हटाने की प्रक्रिया को ही कड़ी कार्रवाई के रूप में प्रचारित किया जाता है। और इस मामले में भी यही हुआ। सच तो यह है कि जन आक्रोश से बचने का यह तरीक़ा है।


मंगलवार, 3 सितंबर 2024

पवन नहीं यह झोंका है...

 पवन नहीं यह झोंका है...


रिमोट से चलने वाली सरकार के रूप में बदनाम हो चुने साय सरकार कब तक मंत्रिमंडल का विस्तार करेगी, निगम-मंडल में नियुक्ति कौन करेगा के सवालों के बीच पवन साय अचानक भाजपा के संगठन मंत्री पारी नेताकों में सबसे ताकतवर शख्स नजर आने लगे है तो इसकी कई वजह है।

वैसे तो भाजपा में संगठन मंत्री की ताकत क्या होती है यह किसी से छिपा नहीं है, सारंग बंधु से लेकर सौदान सिंह और अब पवन साय की ताकत का अहसास पार्टी के नेताकों को भी है, लेकिन कहा जाता है कि सत्ता आने के बाद भी ताकतवर होने का ऐसा उदाहरण बहुत कम देखने को मिलता है कि लालबत्ती के लिए भी भीड़ मुख्यमंत्री से ज्यादा संगठन मंत्री जुटा ले। हालांकि कुछ लोग नीतिन नबीन और जामवाल के पास भी पहुंच रहे हैं लेकिन जब सब कुछ तय करने का ईशारा संगठन मंत्री की ओर किया जाए तो फिर क्यों न पवन साय को ही सत्ता केन्द्र मानकर भीड़ बढ़े।

और शायद यही वजह है कि बिल्डर्स से लेकर भ्रष्टाचारी हो या आपराधिक छवि वाले नेता ही क्यों न हो, सत्ता केन्द्र को ही खुश करने में लगे हैं।

ऐसे में यदि मंत्रालय में भी भाई साहब ! वाली संस्कृति का ही प्रभाव बढ़ रहा हो तो फिर अफसरों के काम काज पर इसका असर पड़‌ना तय है।

ऐसे में लालबत्ती की चाह में चक्कर पर चक्कर लगा रहे नेता अब पवन साय को खुश करने में लगे हैं लेकिन पवन साय को जानने वाले कहते हैं कि वे भी सायं सायं  में माहिर है।

सायं साये में माहिर तो सौदान सिंह भी थे लेकिन इतनी भीड़ वे भी नहीं खींच पाये थे, और चर्चा इसी बात की है कि जब इतनी भीड़ नहीं खींच पाने के बाद भी सौदान सिंह इतना खींच गये तो फिर भीड़ वाले कितना खींच रहे हैं। और शायद यही वजह है कि भाजपाई राजनीति में इन दिनों यह नारा जोरों से उछाला जा रहा है—-

  पवन नहीं यह झोंका है

 लालबत्ती का धोखा है...।

शनिवार, 31 अगस्त 2024

लौट के बुद्धू घर को आये...

 लौट के बुद्धू घर को आये...


एक सामान्य आदमी के लिए विदेश जाने का मोह क्या होता है इसका तो पता नहीं, लेकिन सरकारी खर्चे में विदेश यात्रा के मोह से बच पाना हर किसी के बस में नहीं है। कई नेता तो सरकारी खर्च में विदेश जाने का फर्जी उपाय भी कर लेते हैं, कुछ सफल हो जाते हैं तो कुछ….!

ऐसे में छत्तीसगढ़ सरकार के उपमुख्यमंत्री अरुण साव का विदेश जाने के सपने का टूटना कितना गजब है यह बताने की इसलिए जरूरत नहीं है कि रिमोट पर चलने वाली सरकार के काम काज सुपर सीएम देख रहे हैं और अपने से कम होशियार या अनुभवहीन लोगों की फौज, कब किसकी बेइज्जती करवा दे, कहा नहीं जा सकता ।

लेकिन अमेरिका जाने के लिए मरे जा रहे की तर्ज पर दिल्ली में लगभग सप्ताह भर से डेरा डालने के बावजूद यदि ख़ाली हाथ लौट के आना बड़े तो इससे दुर्भाग्यजनक बात शायद दूसरी नहीं हो सकती। कहते हैं कि संघियों का अमेरिका के प्रति मोह नया नहीं है, संघ के प्रचारक से प्रधानमंत्री बने नरेद्र मोदी ने तो प्रधानमंत्री बनने के बाद अमेरिका जाने के लिए किसी ने सरकारी बुलावे का इंतजार तक नहीं कर सके थे।

ऐसे में यदि अरुण साव अपने अधिकारी कमलप्रीत के साथ वीजा लेने यदि दिल्ली में डेरा डाले थे तो क्या हुआ। 

वैसे भी भारी माकम बजट वाले जल जीवन मिशन में उनके रहते कौन सा भ्रष्टाचार रूक गया है, लेकिन वीजा नहीं मिलने को लेकर मंत्रालय से लेकर पार्टी नेताओ में चल रहे क़िस्से भी कम खतरनाक नहीं है, नवा बईला के चिक्कन सिंग से लेकर अनाड़ी का… सत्यानाश तक की कहावत। 

अब देखना है कि अनुभवहीनता के चलते इस घोर बेईज्जती का हिसाब किस-किस अधिकारियों से लिया जाना है। 

सोमवार, 26 अगस्त 2024

गये थे हरिभजन को वोटन लगे कपास…

 गये थे हरिभजन को

वोटन लगे कपास…


यह तो गये थे हरिभजन को वोटन लगे कपास की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना मुख्यमंत्री बनकर छत्तीसगढ़ को भ्रष्टाचार मुक्त करने का दावा करने वाले उपमुख्यमंत्री अरुण साव के विभाग में भ्रष्टाचार की नदियां नहीं बहती। और न ही बटोर लेने का खेल इस पैमाने पर होता। 

हालत यह है कि अब प्रभार वाद का नया खेल भी शुरू हो गया है सीनियर अफसरों को किनारे करके  जूनियरों को प्रभार देने के इस खेल में  लेन-देन की जो खबरें आ रही है वह हैरान कर देने वाला है तो जूनियर - सीनियर की लड़ाई ने कामकाज को भी बुरी तरह प्रभावित किया है।

कहा जाता है कि उपमुख्यमंत्री साव ने मुख्यमंत्री नहीं बन पाने की कमी को अपने विभाग में धौंस जमाकर पूरी कर ली है। नगरीय निकायों में मनमाने ढंग से संविदा नियुक्ति के बाद जल संसाधन और पीएचई में प्रभारवाद का खेल कम चर्चा में नहीं है।

वैसे भी जल जीवन मिशन को कबाड़ा करने का आरोप तो विधानसभा तक में सुर्ख़ियाँ बिखेर चुका है और कहा जाता है कि प्रधानमंत्री मोदी की हस महत्वाकांक्षी योजना का सबसे ज्यादा कबाड़ा तो धमतरी, बिलासपुर और महासमुंद जिले में निकल रहा है, जहाँ इंजिनियरों और ठेकेदारों की मिलीभगत से निकल रहा मलाई सीधे बंगले तक पहुंच रहा है।

सत्ता मिलते ही संघ का संस्कार किस तरह सिर चढ़ कर बोलता है यह किसी से छिपा नहीं है लेकिन जो लोग अरुण साव के क्रियाकलापों को देख समझ रहे हैं वे भी हैरान है।

इधर जल जीवन मिशन के बजट के बंदर बाँट को लेकर खेल नया नहीं है। इस लंबे चौड़े बजट के चक्कर में भूपेश बघेल और रुद्र गुरु   की लड़ाई अभी लोग भूले नहीं है लेकिन साव के साथ अभी यह स्थति पैदा नहीं हुई है लेकिन यह स्थिति नहीं पैदा होगी कहना मुश्किल है।

कहा जाता है कि धमतरी, महासमुंद और बलौदाबाजार में चल रहे गोलमाल और  छोटे ठेकेदारों की करतूत को लेकर चर्चा अब मुख्यमंत्री तक जा पहुंचा है।

बुधवार, 21 अगस्त 2024

चौधरी को छवि की चिंता...

 चौधरी को छवि की चिंता...


यह तो बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना अमित शाह जैसे कद्‌दावर नेता के खासमखास और प्रदेश सरकार के दमदार मंत्री ओपी चौधरी को अपनी छवि सुधारने के लिए इतनी कवायद नहीं करनी पड़ती।

कहा जा रहा है कि ३३ हजार शिक्षकों की भर्ती वाले मामले में विडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया में जिस तरह से ओपी चौधरी के ख़िलाफ़ बेरोजगारों ने मोर्चा खोला है उससे ओपी चौधरी अपनी छवि को लेकर कुछ ज्यादा ही चिंतित हो गए है, हालाँकि कलेक्टरी के दौरान भ्रष्टाचार के आरोप भी उन पर कम नहीं है, लेकिन अमित शाह के वरदहस्त में सुपर सीएम की कथित पदवी से उत्साहित ओपी चौधरी ने जिए ताह से सत्ता और संगठन में अपनी पकड़ मजबूत की थी वह उतनी ही तेजी से फिसलता जा रहा है।

और शायद यही वजह है कि उन्होंने अब अपनी छवि नये सिरे से गढ़ने की कवायद करने में  लग गये  हैं। दरअसल ओपी चौधरी यह बात भूल गये हैं कि एक बार छवि बिगड़ गई तो उसे सुधारना बड़ा टेढ़ा काम है लेकिन नौकरशाही का रुतबा उन्हें हार नहीं मानने दे रहा है, ऐसे में चर्चा  इस बात की भी है कि नेशनल प्रोपेगेंडा ग्रुप भोपाल वाले ने ठेका लिया कि वे हर हप्ते अपने सबसे बड़े पोर्टल में उनकी छवि सुधारेंगे तो दर्जन भर पोर्टल को भी छवि सुधारने की जिम्मेदारी तो दे दी गई लेकिन छवि है कि...!