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गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

कोरोना की दूसरी लहर और मोदी सत्ता...

 

कोरोना की दूसरी लहर इतनी भयावह होगी, यह किसने सोचा था? क्या पहली लहर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए चेतावनी थी कि वह पूरा ध्यान स्वास्थ्य सुविधा पर दे? सवाल कई है क्योंकि अस्पताल और दवाई से जूझ रहे लोगों को यह जानना चाहिए कि पिछले साल कोरोना की पहली लहर से निबटने डब्ल्यू.एस.ओ, आईएमएफ और एशियन डेवलपमेंट बैंक ने भारत को करीब 53 हजार 620 करोड़ रुपए दिये थे ताकि मोदी सत्ता स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करे। इसके अलावा पीएम केयर फंड में भी करोड़ों अरबों रुपए जमा हुए थे! लेकिन मोदी सत्ता ने क्या किया?

सवाल बहुत से है लेकिन सारे सवाल का हिन्दू-मुस्लिम ही जवाब हो तो फिर गुस्सा और करुणा में लाशें गिनने के अलावा जनता कर भी क्या सकती है। देश का कोई राज्य नहीं है जहां स्वास्थ्य सुविधा मजबूत हो, हर जगह सरकारी लापरवाही साफ दिख रहा है, उपर से कुंभ और चुनाव ने मोदी सत्ता की लापरवाही के सारे रिकार्ड तोड़ दिये हैं?

कोरोना को लेकर जब पिछले साल सारी दुनिया उपाय ढूंढ रही थी तब हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नमस्ते ट्रम्प के चक्कर में थे लेकिन इसका दुष्परिणाम क्या हुआ। न यार मिला न बिसार सनम के तर्ज पर कोरोना तो बढ़ा ही अमेरिका से दुश्मनी अलग मोल ले ली। लापरवाही यही नहीं रुकी जब तक मध्यप्रदेश में सत्ता नहीं बन गई तब तक हाथ बांधे इंतजार किया गया। राहुल गांधी ने जब कोरोना को सुनामी और अर्थव्यवस्था को लेकर चेतावनी दी तो मोदी सत्ता सहित पूरी भाजपा मजाक बनाने लगे। यानी जिस सत्ता को विपक्ष का अच्छा सुझाव भी गंवारा नहीं उस सत्ता के अहंकार का असर जनता ही भुगतेगी। लेकिन सत्ता इन सब बातों से इसलिए बेपवाह है क्योंकि उनके पास लोगों का दिल जीतने धर्म और राष्ट्रवाद का ब्रम्हा है।

खैर सवाल तो यही है कि सालभर के समय मिलने के बाद भी मोदी सत्ता ने अस्पताल दवाई और डॉक्टर के बारे में क्या किया। कुछ नहीं किया और हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा कहा जाए तो गलत नहीं है। दुनिया की शायद यह पहली सत्ता है जिसका विरोध करना देशद्रोह है, पैसों का हिसाब मांगना देशद्रोही और हिन्दू विरोधी है। कब्रिस्तान की तरह श्मशान में बढ़ोत्तरी की मंशा सबके सामने है। उपर से सत्ता का जिम्मेदारी से भागना तो बेशर्मी की हद पार करना है। हर बात पर हिन्दू-मुस्लिम और राष्ट्रवाद के ढोंग ने देश के सामने भयावह संकट खड़ा कर दिया है। चिकित्सा सुविधा को मजाक बना देने और निजी अस्पतालों को प्रश्रय देने का नतीजा सबके सामने है। तब सवाल है आम आदमी क्या करे, एक तरफ सरकारी अस्पतालों में सुविधा का अभाव और दूसरी तरफ निजी अस्पतालों की महंगी होती चिकित्सा सुविधा में आम जन मरे नहीं तो क्या होगा। हम निजी अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था को लूट इसलिए नहीं कहेंगे क्योंकि ये सिस्टम क अंग है। जब सरकार ही सुविधा देने के नाम पर कमीशनखोरी और लूट मचा रखी है तब किसी एक संस्थान पर लूट का आरोप बेमानी है।

जब सत्ता ही आपदा को अवसर में बदलने का राग अलाप रहा हो तो कालाबाजारी कैसे गलत हो सकता है आखिर वे गलत क्या कर रहे है। जैसी राजा वैसी प्रजा तो 2014 के बाद से चल रही है।

मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

आपदा में अवसर...

 

जब देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आपदा में अवसर की बात कही थी तब भी वे लोग ताली बजा रहे थे, जो हिन्दू कुंठा से ग्रस्त थे, उन्हें तो मोदी की हर बात अच्गछी लगती है चाहे वह कितना भी अधार्मिक हो या अनैतिक हो। ये वे लोग है जो ईवीएम के विरोध को भाजपा का विरोध मानते हैं और भाजपा के विरोध को देश का।

खैर बात यहां महामारी में आपदा में अवसर की बात पर ही चर्चा होनी चाहिए क्योंकि ये बात प्रधानमंत्री ने कहा थी और उसका परिणाम कालाबाजारी से लेकर निजी अस्पतालो में दिखाई देने लगा है। बहुत पहले शायद स्कूल के दिनों में कहीं सुना था कि आपदा में अवसर नहीं सेवा ही धर्म होना चाहिए और कोई भी लोकतांत्रिक और सेवाभावी जनसेवक महामारी में आपदा में अवसर की बात नहीं कर सकता लेकिन तब मेरे इस बात को लेकर भक्तों ने मुझसे लड़ाई भी कर ली थी और कुछ तो आज भी बात नहीं करते।

तब यह भी कहा गया कि महामारी जैसे आपदा में अवसर की प्रतिज्ञा गिद्ध, सियार और लकड़बग्घे करते हैं, उनके लिए महामारी से प्रभावित लाशें शानदार दावतें होती है और ये उनके लिए किसी उत्सव से कम नहीं होता। जिस देश में एक व्यक्ति के सुख और दुख में पूरा गांव का गांव, या मोहल्ला का मोहल्ला शामिल होता है वहां महामारी के आपदा में उत्सव की बात कोई सोच भी कैसे सकता है लेकिन अंधेर नगरी, अंधेर राजा की कहानी भी याद न हो तो फिर पढऩे-लिखने का मतलब ही क्या है?

आपदा में अवसर की तलाश ज्यादातर वे लोग करते हैं जिनके खून में व्यापार है। और यह बात जब कोई स्वयं स्वीकार कर ले तो याद कीजिए 1965 और 1971 का वह युद्ध जब कुछ व्यापारी कालाबाजारी कर आपदा में अवसर का लाभ ले रहे थे। लेकिन तब सत्ता ने सेवा को धर्म बताकर कितने ही व्यापारियों के हृदय परिवर्तन किये थे लेकिन जब देश का प्रधानमंत्री ही आपदा में अवसर जैसे शब्दों का प्रयोग करेगा तो उसका परिणाम क्या होगा?

लॉकडाउन की घोषणा के साथ ही कालाबाजारी और अब निजी अस्पतालों की लूट से आम जनमानस में भय व्याप्त है। भयमुक्त शासन का कहीं पता नहीं है। लेकिन हमारा आज भी मानना है कि आपदा में अवसर की तलाश करने की बजाय आपदा में सेवा धर्म किया जाए!

रविवार, 11 अप्रैल 2021

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण...


कोविड-19 अब 21 साबित होने लगा है, हर तरफ हाहाकार है, छोटे शहरों की हालत ज्यादा खराब है, अस्पतालों में बेड की कमी, और लापरवाही ने कितने ही घरों की रोशनी छिन ली, और यह आगे कब तक चलेगा कहना मुश्किल है।

कई शहरों में ताला लगने लगा है जिसे लॉकडाउन कहा जा रहा है, शासन-प्रशासन की बेबसी साफ दिखाई देने लगा है, दो गज की दूरी, मास्क जरूरी ही इस संक्रमण से बचने का एक मात्र उपाय है। लेकिन नेताओं को राजनीति करने से फुर्सत नहीं है वे इस आपदा को भी अवसर में बदलकर अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं।

सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को गई की तर्ज पर सत्ता और विपक्ष अपने में मस्त हैं, हालांकि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बेबाकी से स्वीकार किया कि छत्तीसगढ़ में कोरोना बढऩे की कई वजहों में से एक वजह रोड सेफ्टी क्रिकेट टूर्नामेंट भी हो सकता है लेकिन असली वजह विदर्भ से होली त्यौहार के लिए आवाजाही है। आज के इस दौर में यह स्वीकारोक्ति भी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हाउडी ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सत्ता बनाने की चाह में निर्णय की देरी की बात को आज तक केन्द्र की सत्ता मानने को तैयार नहीं है।

यह सभी जानते हैं कि राहुल गांधई सहित विपक्ष के कई नेता जनवरी-फरवरी से ही मोदी सत्ता को इसकी भयावकता पर चिंता जता रहे थे लेकिन निर्णय में देरी की वजह से न केवल कोरोना से मौतों के आकड़े बढ़े बल्कि 186 मौते गरीब मजदूरों की सड़कों पर हो गई। मध्यम वर्गों की हालत सबसे ज्यादा खराब हुई। बढ़ते संक्रमण ने देश की आर्थिक स्थिति को बदहाल कर दिया। ऐसे में याद कीजिए सत्ता ने अपनी गलती छुपाने किस तरह से नफरत फैलाकर अपने को पाक बताया था। तब्लिकी जमात और मौलाना साद तो कईयों को आज भी याद होगा लेकिन शायद वे नहीं जानते होंगे कि इस मामले में न्यायालय ने फैसले क्या दिये, सभी पर लगे आरोप निराधार पाये गए। विदेशी नागरिक अपने देश में लौट गए और मौलाना साद के रुप में जो नफरत फैलाई गई वह उन लोगों के दिलों में घर बना लिया जो अच्छे खासे पढ़े लिखे, डिग्रीधारी हैं।

ज्ञान पर नफरत का यह ध्वजारोहण नया नहीं है, हां तरीका नया है क्योंकि एक ही तरीका अपनाया गया तो लोग बेवकूफ नहीं बनेंगे। इसलिए हर बार पूरे सच में से आधे में अपना झूठ और नफरत की चाशनी लपेटी जाती है और इसे परोसा जाता है कि यही पूरी सचा लगे।

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण नया नहीं है, धर्म और राष्ट्रवाद के चश्में ने अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे नौजवानों को अपनी चपेट में लिया है। ताजा उदाहरण  बंगाल का है, जिसमें ममता बैनर्जी सिर्फ इसलिए बानों बना दी गई क्योंकि वे अल्पसंख्यकों की पीड़ा के साथ खड़ी नजर आती है। सच तो यह है कि उन्होंने जिस सादगी के साथ मुख्यमंत्री को जिया है वैसा देखने को ही नहीं मिलेगा। विधायक-सांसद से लेकर मुख्यमंत्री तक के सफर में वह आज भी अपनी लिखी किताब की रायल्टी और पेटिंग बेचकर ही पैसा रखती है। न विधायक-सांसद का पेंशन न वेतन।

बकौल ज्योति बसु, 'ममता ही असली कामरेड है लेकिन गलत पार्टी में हैÓ। को नजरअंदाज कर भी दें तो जब आज अपने को सजने संवारने में गरीब से गरीब घर की लड़कियां भी हजारों रुपए खर्च करती है खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने को गरीब घर का बताते हुए लाखों रुपए चश्में, घड़ी व पहनावे फैशन पर करते हो तब ममता की सादगी से मुकाबला उसे बानों बनाकर ही किया जा सकता है। तब इस नफरती ध्वाजारोहण में शामिल कितने पढ़े लिखे हैं जो ममता को बानों कहने का विरोध करते हैं? क्या यह उन पढे-लिखे लोगों के क्षणिक स्वार्थ से यह ध्वजारोहण उचित है। मंडल कमीशन के बाद से जिस तरह से पढ़े-लिखे लोगों पर धर्म का कंबल डाला गया है, उसका दुष्परिणाम यह है कि अब मध्यम वर्ग बेबस है असहाय है और कुछ लोग शर्मसार तो हैं लेकिन खामोश कहना ठीक नहीं, भीतर ही भीतर घुस रहे हैं।

(जारी...)

सोमवार, 11 जनवरी 2021

धर्म-राष्ट्रवाद और रंगभेद



आस्ट्रेलिया में क्रिकेट खेल रहे भारतीय खिलाडिय़ों को जिस रह से रंगभेदी टिप्पणी से दो चार होना पड़ा और उसके बाद जिस तरह की प्रतिक्रिया आई है यह सब सभ्य होने का दावा करने वाले समाज के लिए चिंता का विषय है। यूरोप अमेरिका सहित कई देशों में नस्ल को लेकर आज भी विवाद उतने ही गहरे है जितने एशियाई देशों में धर्म और जाति को लेकर विवाद है।

दरअसल कट्टरपंथियों की अपनी जमात है जिन्हें मानवता से ज्यादा खुद की चिंता होती है। और अपने को श्रेष्ठ कहलाने के फेर में ये लोग झूठ-अफवाह का सहारा लेकर नफरत के न केवल बीज बोते है बल्कि कुर्तकों के खाद पानी से उन्हें संचित करते रहते हैं।

पढ़े लिखे और सबसे सभ्य कहलाने का दावा करने वाले देशों में जिस रह से रंगभेद और धर्म को लेकर आये दिन तमाशा खड़ा कर प्रताडि़त करने का उपक्रम किया जाता है वह हैरान कर देने वाला है।

भारतीय खिलाडिय़ों के साथ यह व्यवहार पहली बार नहीं हुआ है पहले भी इस तरह की टिप्पणी से भारतीय खिलाड़ी अमानित होते रहे हैं और यह सबका अंत होते नहीं दिख रहा है।

यही हाल धार्मिक और जातिय श्रेष्ठता का हाल है। झूठ और अफवाह की चासनी में जिस तरह से नफरत परोसे जाते हैं वह मानवता को शर्मसार तो करता ही है, यह सोचने को भी मजबूर करता है कि सभ्यता की परिभाषा क्या होनी चाहिए।

भारत में राजनैतिक स्वार्थ के लिए आजादी के बाद से ही राष्ट्रवाद धर्म और जाति को श्रेष्ठ साबित करने के प्रयास में नफरत के जो बीज बोए गये उससे देश को न केवल आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा बल्कि एकता अखंडता को भी नष्ट करने की कोशिश हुई।

हाल ही में हुए दो आंदोलनों का जिक्र करना जरूरी है कि किस तरह से वर्तमान सत्ता और उससे जुड़े लोगों ने आंदोलन से जुड़े लोगों की राष्ट्रभक्ति पर सवाल उठाये। याद किजीए जब नागरिक बिल को लेकर शहर-दर-शहर शाहीन बाग बनने लगे तो इस आंदोलन में शामिल होने वालों को गद्दार, देशद्रोही और न जाने किस-किस तरह से गालियां दी गई। कोरोना के कारण आंदोलन समाप्त हो गया। लेकिन कट्टरपंथियों ने जिस तरह से शाहीन बाग के आंदोलनकारियों को गालियां दी वह हमारी राक्षसी प्रवृत्ति को ही उजागर करता है।

यही हाल किसान आंदोलन को लेकर हुआ। कट्टरपंथियों की जमात ने आंदोलनरत किसानों को गद्दार साबित करने जिस तरह से झूठ-प्रपंच का सहारा लिया वह शर्मसार कर देने वाला था। अपनी बात को सही साबित करने मुसलमानों के चेहरे बनाये गये, आईटीसेल ने किसान आंदोलन के दौरान नमाज पढ़ते मुसलमानों का वीडियो बनाकर यह बताने की कोशिश की कि कैसे मुसलमान किसान आंदोलन में शामिल है जबकि इस देश में मुसलमान भी बड़ी संख्या में किसान है।

हम यहां सत्ता के अहंकार को लेकर कुछ नहीं कहेंगे लेकिन सच यही है कट्टरपंथियों की जमात ने न केवल अपना नुकसान किया है बल्कि समाज और देश को भी शर्मसार करते रहे हैं।

दरअसल यह एक तरह का अपराध है जो मानवता का ही नहीं देश का दुश्मन है।

रविवार, 12 अप्रैल 2020

कट्टरता और श्रेष्ठता - 2


मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं कैसे उन लोगों के मन में बैठे डर को दूर करूं जो यह तय कर चुके है कि मोदी सरकार आई तो उनका नुकसान होगा या नहीं आई तो यह देश एक और मुस्लिम राष्ट्र की तरफ कदम बढ़ायेगा।
राकेश विनय ही नहीं शहर में कितने ही लोग थे जो इस डर को हवा दे रहे थे और इस पूरी कहानी में हर उस घटना को ज्यादा प्रचारित किया जा रहा था जिसमें दोनों ही धर्म के लोग जुड़े थे।
मसलन राकेश को कश्मीर से भगाये कश्मीरी पंडित तो दिखाई देता था लेकिन उड़ीसा में चले मारवाड़ी भगाओं आंदोलन या आमचीं मुंबई के तहत गैर महाराष्ट्रियनो पर अत्याचार का सलवा जुडुम में खाली हुए पांच सौ गांव इसलिए राकेश को नहीं दिखलाई देता था क्योंकि उसमें मुसलमान या ईसाई नहीं होते थे।
हिन्दू लड़के के हिन्दू लड़की को प्यार या शादी के नाम पर धोखे का मामला उस ढंग से कभी नहीं उभारा गया जिस ढंग से लव जेहाद के नाम पर अभियान चलाया गया। बलात्कार के मामले मे भी घटना में राजनैतिक फायदे देखे जाने लगे तो लगने लगा था कि हम किस तरह का भारत निर्माण कर रहे हैं।
ऐसा लगता कि लोगों के दिलों दिमाग में इसे न केवल बैठा दिया गया है बल्कि उसे किसी बीज की तरह बो दिया गया है और इस बीज ने अपनी जड़े उनकी रगो में खून के साथ बढ़ता चला जा रहा है और अपनी पकड़ रगो के शिराओं पर मजबूत कर ली है।
मैं अपने शहर मे ही इस डर को महसूस करने लगा था। टूटे हुए आईनों में उभरा हर शख्स कुछ अधूरा सा लगने लगा था। सामाजिक सौहाद्र्र और अमन शांति के लिए पूरे देश में अपनी अलग पहचान बना चुके इस शहर की दिवारे कई बार दरकती हुई दिखाई देने लगता था। सोचता था यह डर हकीकत न हो।
कोई भी शख्स किसी दूसरे धर्म के बेतुकापन पर बात करने को तैयार नहीं था जबकि अमल में लाना न लाना उनकी मर्जी है लेकिन बात तो की ही जानी चाहिए।
सूरज कुमार या संतोष जी ही कुछ गंभीर थे जिन्हें मैं पूछ सकता था इसलिए राजनीति के इस हिन्दूकरण के हिंसक होते प्रहार पर मैं अक्सर सवाल छोड़ देता था। वे एक सीमा तक ही जवाब देते फिर श्रेष्ठता की परिभाषा गढऩा शुरू कर देते।
राफेल के मुद्दे को भी संतोष जी ने बड़ी सफाई से जब हिन्दू-मुस्लिम की तरफ मोड़ दिया तो मैं हतप्रभ रहने के सिवाय क्या कर सकता था। नक्सली हमले से मर रहे आदिवासियों की मौत पर वे चिंता तो जाहिर करते लेकिन उनकी चिंतन आतंकवाद की चिंता से ईतर हो जाती। अखलाक या रोहित वेमुला के मुद्दे भी इनके लिए बेमानी हो जाते लेकिन उत्तप्रदेश के किसी सुदूर गांव में कुछ मुसलमान गुण्डों द्वारा घर में घुसकर तोडफ़ोड़ और मारपीट देश की अस्मिता पर आघात हो जाता था।
ऐसा ही कुछ उलट अकील या हासीम के साथ होता। 84 के सिख विरोधी दंगे उन्हें मामूली लगते लेकिन गुजरात में हुए कत्लेआम उनके लिए आज भी बड़ा हादसा था। जबकि दोनों ही मामले पर सरकार द्वारा कत्लेआम कराये जाने या कत्लेआम को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है।
यह बाते जो दोनों ही धर्म के लिए लोग हर घटना को अपने नजरिये से देखने की वजह से ही दिक्कतें हुई थी और सामाजिक ताना बाना न केवल छिन्न भिन्न हुआ था बल्कि दिलों में प्यार की जगह नफरत या डर ने स्थान बना लिया था।
मैं और मेरा , सारी लड़ाई की जड़ यहीं से शुरू हो रहा था। स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने के फेर में आदमी किस तरह एक-दूसरे के प्रति कठोर होता जा रहा था कि वह टस से मस होना नहीं चाह रहा था। हर ऐसे व्यक्ति में जड़े उग आया था जो मजबूती से गहराई में लगातार समाता जा रहा था।
आप अंदाजा नहीं लगा सकते कि मौजूदा हालात को लेकर मैं कितना उदास हूं। मेरी जितनी चिंता पहले के माहौल को पुर्नस्थापना की होती उतनी ही तेजी से कोई न कोई ऐसा वाक्या देश में हो जाता था कि हिन्दू या मुस्लिम के झंडाबरदार फिर खड़े हो जाते और उसका असर यहां साफ दिखाई पड़ता।
मैने कितने ही बार धर्म के इस्तेमाल कर सत्ता हासिल करने की राजनैतिक शैली का उदाहरण दिया ताकि माहौल हल्का हो सके। सब जानते थे कि मैं झूठ नहीं बोलता हूं लेकिन इसे वे महज अपवाद करार देते थे।
मेरे शहर में पहले भी माहौल खराब कर राजनातिक फायदे की कोशिश हो चुकी है। एक बार एक फैंसी स्टोर चलाने वाले मुस्लिम युवक ने एक सिंघी परिवार की युवती को लेकर भाग गया। मैं जानता था कि ये दोनों एक दूसरे से बेहतंहा मोहब्बत करते थे। मेरा एक दोस्त था विरेन्द्र वह उस मुस्लिम युवक का दोस्त था इसलिए गाहे बगाहे पूरे मामले को मैं जानता था लेकिन इस मामले को राजनैतिक ढंग देकर हिन्दू मुस्लिम तक ले जाया गया और शहर में जुलूस निकाले गये जुलूस में तमाम तरह के हिन्दू संगठनों के लोग शामिल ते। सिंघी समाज से जुड़े एक प्यापारी नेता ने इस मामले का नेतृत्वकर्ता हो चुका था और बाद में वह विधायक भी बना।
पुलिस  दबाव में प्रेमी जोड़ा लौट आया। दोनों को अलग कर दिया गया। प्रशासन के दबाव में युवक भी अपना अलग रास्ता अख्तियार कर लिया.
हैरान तो मैं तब हुआ जब इस घटना के कुछ ही महीने बाद एक जुलूस कौमी एकता जिन्दाबाद के नारे के साथ पहुंचा और इस बार भी जुलूस का नेतृत्व सिंघी समाज का वहीं व्यापारी नेता कर रहा था और उसके साथ वह जुगल जोड़ी के नाम से चर्चित मुस्लिम समाज का व्यापारी नेता भी जुलुस के सामने था। कुछ ही महीने पहले हिन्दू एकता का नारा लगाने वाले को कौमी एकता का नारा लगाते कलेक्टोरेट परिसर में दाखिल होते देख जब इसकी वजह ढूंढी तो पता चला कि इस बार ब्राम्हण समाज के किसी युवक ने सिंधी समाज के युवती को ले भागा था।
यानी जिसे राजनीति करनी है वह हर हाल में धर्म का इस्तेमाल अपनी सुविधा अनुसार कर ही लेता है और अब लोग इनके नारे में कट्टरता या उन्माद के स्तर तक जा पहुंचते है।
ऐसी कितनो ही जानकारी मेरे पास थी और मै गाहे बगाहे इन घटनाओं का जिक्र कर राजनीति में धर्म के इस्तेमाल से होने वाले खतरे से आगाह करता रहा हूं। लेकिन राजनीति की हवा उस लू की तरह शैतानी हवा है जो जान ले लेने का डर पैदा करती है। वह किसी भी साक्ष्य या तर्क को नहीं मानती है उसके भीतर का डर इस कदर भयावह हो जाती है कि उसकी अपनी धार्मिक श्रेष्ठता खतरे में दिखाई देने लगता है और मौजूदा हालात को उसी तरह बना दिया गया था। राकेश तो साफ कहता था कि यदि मोदी हार गया तो यह देश का हिन्दु खतरे में पड़ जायेगा। कश्मीर की तरह दूसरे राज्यों की हालत खराब हो जायेगी। हिन्दू अपने ही देश में मारे जायेंगे। अपने कथन को सही साबित करने वह इस तरह का कुतर्क का सहारा लेता था कि समझदार व्यक्ति हंसे बिना नहीं रह सकता था। लेकिन इस तरह की बात करने वाला राकेश अकेला नहीं था। निक्की भी अमूमन यही बात करता था लेकिन निक्की यह बात करने में थोड़ी समझदारी दिखाता था। क्योंकि वह जानता कि वह गलत कह रहा है। निक्की की समझदारी के पीछे उसका भीरुपन भी था वह सीधे टकराहट से बचता था।
राकेश उज्जड़ किसम् का था इसलिए वह धर्मान्तरण से राष्ट्रान्तरण की सावरकर थ्योरी को ही मानता था। उसे तो जहां चार मुसलमान वहां एक पाकिस्तान कहने से भी गुरेज नहीं था।
दरअसल हम सब एक दूसरे को इतना कम जानते है मौजूदा परिस्थितियों के बाद ही इसका पता चला था इसलिए तकलीफ ज्यादा हुई थी
और गुस्सा भी ज्यादा था। 

शनिवार, 21 जनवरी 2012

श्री पंचधाम मंदिर में वार्षिक समारोह 31 से


सप्ताह भर राम-मय रहेगा
रायपुर। उदया सोसायटी स्थित श्री पंचधाम मंदिर का वार्षिक समारोह 31 जनवरी से 5 फरवरी तक रहेगा। इस दौरान पंाच दिवसीय दिव्य श्रीरामचरित मानस कथा एवं भंडारा का आयोजन किया गया है। कथा व्यास परम विदूषी साहवी अन्नपूर्णा माता शारदा शक्ति पीठ मैहर है। यह जानकारी श्री पंचधाम मंदिर के पुजारी श्री अभिषेक जी ने देते हुए कहा कि मंदिर की स्थापना 3 फरवरी 2012 को की गई थी। तब से हर साल मंदिर की स्थापना दिवस पर श्रीरामचरित्र मानस कथा व भंडारा का आयोजन किया जाता है। इस आयोजन में न केवल उदया सोसायटी बल्कि शहर के दूसरे हिस्सो में निवासरत राम भक्त बड़ी संख्या में पहुंचकर कथा का रसपान करते है। उन्होंने बताया कि पूरे कार्यक्रम को संरक्षक रामानंद अग्रवाल, अध्यक्ष एस के मिश्रा, कार्यकारी अध्यक्ष बी डी मिश्रा सचिव शिवाकांत त्रिपाठी व कोषाध्यक्ष विनोद गोवर्धन सहित मंदिर समिति के कार्यकारिणी व परिवार का विशेष सहयोग रहता है। मंदिर के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए पुजारी श्री अभिषेक जी ने बताया कि मंदिर में सर्वप्रथम श्री हनुमान जी की स्थापना की गई श्री इसके बाद भक्तों के आग्रह पर मां दुर्गा, श्री शिव परिवार, श्री गणेश व श्री लक्ष्मी जी का विराजमान हुआ। उन्होंने बताया कि भक्तो के दुख हरने वाले इस श्री पंचधाम मंदिर की सेवा में नित दिन बड़ी संख्या में भक्तजन यहां आते हैं और उनकी ईच्छाएं पूरी होती है। उन्होंने आगे बताया कि 31 जनवरी मंगलवार को सुबह 9 बजे श्री गणेश जी एवं शिव परिवार का अभिषेक होगा तथा अपरान्ह 3 बजे श्री राम कथा का आयोजन होगा। 1 फरवरी को सुबह 9 बजे मां दुर्गा का अभिषेक व अपरान्ह 3 बजे राम कथा होगा। 2 फरवरी को सुबह 9 बजे श्री लक्ष्मी नारायण जी का अभिषेक, 3 फरवरी को श्री हनुमान जी का अभिषेक, 4 फरवरी को श्री राम दरबार जी का अभिषेक होगा। इन दिनों राम कथा अपरान्ह 3 बजे होगा। इसी तरह 5 फरवरी को प्रात:- 10 बजे से हवन व सुभधुर भजन गंगा तथा दोपहर 12 बजे से विशाल आम भंडारा  का आयोजन किया गया है। उन्होंने आम नागरिकों से अपिल की है कि राम कथा का समापन व भंडारा का प्रसाद ग्रहण करने बड़ी संख्या में आये।

बुधवार, 14 जुलाई 2010

रामकृष्ण मठ का यह कैसा खेल सत्ताधीशों से बढ़ाओ मेल


पद की चापलूसी या पैसे का लालच
यह राजनीति की गंदी तस्वीर है या मठाधीशों का कुत्सित चेहरा। यह तो जनता ही तय करेगी। लेकिन अब तक निर्विवाद रहे रामकृष्ण मठ के नागपुर मठ ने ऐसा कुछ कर दिया है जिससे मठ के क्रियाकलापों पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है और इसे लेकर मठ के प्रति श्रध्दा व उनके कार्यों पर नमन करने वालों के दिलों पर ठेंस पहुंची है। दरअसल मठ ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के माता-पिता की तस्वीर 'विवेकानंद राष्ट्र को आह्वान' नामक किताब पर छाप दी है।
धर्मग्रंथों के अपमान और हिन्दूत्व की रक्षा के नाम पर इस देश में जिस तरह का बवाल मचा है। वह अंयंत्र कहीं नहीं है। हिन्दूत्व की परिभाषा सब अपने-अपने ढंग से देने लगे हैं और धर्म का दुरूपयोग भी अपने स्वार्थ के लिए करने लगे हैं। इस देश में हिन्दुत्व की दुहाई देने वाली भारतीय जनता पार्टी हो या शिवसेना सभी ने धर्म को अपने हिसाब से परिभाषित करने की कोशिश की है।
'समरथ को नहीं दोष गोसाई' की तर्ज पर चाहे वह किसी भी धर्म के हो पैसे व पद वालों ने धर्म का सबसे यादा अपमान किया है। यहां तक कि विभिन्न सरकारों ने भी अपने हिसाब से इसका दुरूपयोग किया। इस सबके बावजूद इस देश में अभी भी ऐसा संस्थाएं है जो राष्ट्र निर्माण की दिशा में धर्म क्षेत्र में काम कर रही हैं उनमें से एक है रामकृष्ण मठ या रामकृष्ण मिशन। शुध्द रुप से राष्ट्रीय निर्माण में लगे इस संस्था के खिलाफ आज तक किसी ने भी उंगली उठाने की हिम्मत इसलिए नहीं कि क्योंकि इस मठ या मिशन ने नि:स्वार्थ रूप से राष्ट्र निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
लेकिन लगता है पैसे व राजनीति ने इस संस्था को भी उसी राह पर खड़ा कर दिया है जो सिर्फ धर्म की आड़ में नाम पैसा सबकुछ बना लेना चाहता है। ऐसा ही मामला सामने आया है जो रामकृष्ण परमहंस, मां शारदा माई और विवेकानंद के आदर्शों को चाक-चाक करने वाला है। रामकृष्ण मठ नागपुर से प्रकाशित विवेकानंद राष्ट्र को आह्वान शीर्षक वाली इस किताब के जैसे ही पन्ने पलटे जाएंगे स्व. ठाकुर विघ्नहरण सिंह और आखरी पृष्ठ पर स्व. श्रीमती सुधा देवी सिंह की तस्वीर छापी गई है। 12 रुपए कीमत वाली इस किताब को बकायदा बेची भी जा रही है।
रामकृष्ण मठ नागपुर द्वारा किस तरह की पुस्तक बेची जानी है यह तो मठ को तय करना है और वह इसके लिए स्वतंत्र भी है। लेकिन सवाल यह है कि मठ के द्वारा सिर्फ इसी तस्वीर वाली किताबें क्यों बेची जा रही है? इसके पीछे उनका उद्देश्य क्या है? सवाल इसलिए उठाए जा रहे हैं क्योंकि जो तस्वीरें छपी हैं वे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के माता-पिता की है। ऐसे में मठ पर यह आरोप लगना स्वाभाविक है कि मठ के द्वारा अनाप-शनाप पैसा लेकर लोगों के दिलों में बैठे मठ के प्रति विश्वास को भुनाना है या सत्ता प्रमुख को खुश करना है।
इस संबंध में जब हमने रायपुर स्थित विवेकानंद आश्रम से संपर्क किया तो वे कुछ भी कहने से बचते रहे वहीें नागपुर मठ के पदाधिकारियों से संपर्क नहीं हो सका। बहरहाल रामकृष्ण मठ नागपुर के इस कारनामें का असली मकसद तो पदाधिकारी ही जाने लेकिन उनके इस कृत्य ने रामकृष्ण संस्थान पर श्रध्दा रखने वालों के दिलों में न केवल ठेस पहुंचाई है बल्कि यह सवाल भी खड़े किए है कि यहां बैठे पदाधिकारी क्या करने वाले हैं जिसका जवाब देर सबेर उन्हें देना ही होगा।
इसी किताब का अंश
जिसकी अवहेलना हुई
'ऊंचे पद वालों यया धानिकों पर भरोसा न करना। उनमें जीवनी शक्ति नहीं है वे तो जीते हुए मुर्दे के समान है। भरोसा तुम लोगों पर है, गरीब, पद मर्यादा रहित किन्तु विश्वासी तुम्ही लोगों पर। ईश्वर पर भरोसा रखो। किसी चालबाजी की आवश्यकता नहीं, उससे कुछ भी नहीं होता.... अपना सारा जीवन इस तीस करोड़ लोगों के उध्दार के लिए अर्पण कर देने का व्रत लो जो दिनों दिन डूबते जा रहे हैं। पेज नं.-52 (पन्ना 1, 83-84)।'
0 इस समय हम पशुओं की अपेक्षा कोई अधिक नीति परायण नहीं है। केवल समाज के अनुशासन के भय से हम कुछ गड़बड़ नहीं करते। यह समाज आज कह दे कि चोरी करने से दण्ड नहीं मिलेगा, तो हम इसी समय दूसरे की सम्पत्ति लूटने को टूट पड़ेंगे। पुलिस हमें सच्चरित्र बनाती है। सामाजिक प्रतिष्ठा के लोप की आशंका ही हमें नीति परायण बनाती है और वस्तुस्थिति तो यह है कि हम पशुओं से कुछ अधिक ही उन्नत हैं। (पृष्ठ-42 (ज्ञा.यो. 275)
0 दुष्कर्म द्वारा हम केवल अपना ही नहीं वरन् दूसरों का भी अहित करते हैं और सत्कर्म द्वारा हम अपना तथा दूसरो का भी भला करते हैं.....। (पृष्ठ- 47 (क.यो.88)
0 इस तरह का दिन क्या कभी होगा कि परोपकार के लिए जान जाएगी? दुनिया बच्चों का खिलवाड़ नहीं है.....। (पृष्ठ 53 (पन्ना 1, 177-178)

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

डॉ रमन की मां की तस्वीर वाली हनुमान चालीसा भी वितरित...

पैसे व पद वाले ही करते हैं धर्म का अनादर
इतिहास गवाह है कि हिन्दू धर्म का अपमान जितना दूसरे धर्म के लोगों ने नहीं किया उससे यादा वे हिन्दू जो धनाडय व सत्ता मद में बैठे हैं, ने हिन्दूत्व का अपमान किया है। गीता के बाद हनुमान चालीसा में भी लोग अपने परिजनों का तस्वीर लगाकर बांट रहे हैं और यह काम प्रदेश के मुखिया डॉ. रमन सिंह के द्वारा भी किए जाने की खबर है।
श्री भागवत गीता में स्व. ठाकुर विघ्नहरण सिंह की तस्वीर लगाकर इसे वितरित किए जाने पर धर्मग्रंथ का अपमान बताया जा रहा है और राजधानी ही नहीं बाहर के भी पुजारियों ने इस तरह के कृत्य को पाप माना है। श्री गीता की खबर छपते ही हमें लोगों ने हनुमान चालीसा लाकर दी जिसमें मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की मां स्व. श्रीमती सुधा देवी सिंह की तस्वीर लगाई गई थी। इस हनुमान चालीसा को हमें देने वालों का दावा है कि श्री गीता में तस्वीर लगाने की बात तो कई लोगों को पता है लेकिन हनुमान चालीसा में इस तरह से तस्वीर लगाकर वितरित करने का यह पहला मामला है।
वैसे धर्म के मान्य परंपरा के अनुसार एक समय था जब श्री हनुमान जी के मंदिर में महिलाएं प्रवेश करने से हिचकिचाती थी और आज भी इस देश में कई ऐसे मंदिर हैं जहां महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। हालांकि हनुमान चालीसा आयोजन समिति ने महिलाओं के हनुमान चालीसा पाठ पर प्रतिबंध को गलत बताया है। समिति का कहना है कि शास्त्रों में कहीं उल्लेख नहीं है इसलिए महिलाएं श्री हनुमान मंदिर में प्रवेश कर सकती हैं।
दूसरी तरफ धर्मग्रंथों को लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे हैं और यह चर्चा का विषय है कि धर्म ग्रंथों का उपयोग आदमी अपने लिए किस तरह से कर सकता है। वर्तमान पीढ़ी में धर्मग्रंथों पर तस्वीर लगाने को लेकर पूरे देश में बहस किए जाने की जरूरत भी बताई जा रही है और इसी तरह से तस्वीर लगाकर धर्मग्रंथ वितरित किए जाने लगे तो धर्मग्रंथ के महत्व को लेकर भी बहस छिड़ सकती है। केवल हिन्दू धर्म ग्रंथों में ही इस तरह की छेड़छाड़ होने लगी है वह भी उन हिन्दूओं द्वारा जो या तो पैसे वाले हैं या उच्च पदों पर बैठे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इस तरह के कार्य कितने उचित है।
हालांकि इस तरह के मामले में हिन्दू संगठनों की खामोशी आश्चर्यजनक है और अब तो उनके नियत पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या वे सिर्फ राजनैतिक फायदे के लिए हिन्दूत्व का इस्तेमाल करते हैं।

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

क्या भाजपाई इशारे पर चलते हैं हिन्दुत्व के झंडा बरदार


सब कह रहे हैं गलत है
पर हिन्दू संगठन खामोश है!
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के पिता स्व. ठाकुर विघ्नहरण सिंह के तेरहवीं कार्यक्रम में श्री भागवत गीता में छेड़छाड़ को लेकर आम लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त है वहीं हिन्दुत्व के नाम पर राजनीति करने वाले संगठनों को सांप सूंघ गया है और वे कुछ भी कहने से बचते रहे।
उल्लेखनीय है कि स्व. ठाकुर विघ्नहरण सिंह के तेरहवीं कार्यक्रम में ठाकुर साहब की तस्वीर वाली गीता का वितरण किया गया था। इसे लेकर आम लोगों में भारी रोष है। इस मामले में पंडित आशुतोष मिश्रा का कहना है कि तेरहवीं कार्यक्रम में इस तरह से स्वर्गीय व्यक्तियों की तस्वीर लगाकर गीता वितरित की जाती है वह गलत है लेकिन जिसके ऊपर धर्म की रक्षा का दायित्व हो वह भी इस तरह की हरकत करे तो न केवल यह पाप है बल्कि दंड का भागीदार भी है।
दूसरी तरफ राजधानी के कई हिन्दू संगठन विश्व हिन्दू परिषद, धर्मसेना, शिवसेना, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सहित छोटे-छोटे कई संगठनों के पदाधिकारियों से हमने इस मामले में प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की लेकिन इनके द्वारा प्रतिक्रिया देने से इंकार कर दिया। गीता सखा प्रेस के मन्नूलाल यदु ने जरूर कहा कि धर्मग्रंथों में अपने पूर्वजों की तस्वीर लगाने से धर्मग्रंथ का अपमान नहीं होता। दूसरी तरफ हिन्दू संगठनों की चुप्पी पर भी सवाल उठने लगे हैं धर्म के नाम पर हाय तौबा मचाने वालों की चुप्पी को लेकर अब यह सवाल उठने लगा है कि भाजपा को छोड़ यदि कोई दूसरा धर्मग्रंथ का अपमान करेगा उसके खिलाफ ही आवाज उठाई जाएगी।
नीराबाई चंद्राकर- ग्राम पंचायत दुधिया की सरपंच श्रीमती नीराबाई चंद्राकर का कहना है कि भागवत गीता में जिस किसी ने यह फोटो डाला है। उसे कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। जो हमारे हिन्दु धर्म के लिए शर्म की बात है।
पं. अर्जुन महाराज जी कवर्धा निवासी है जो राधा माधव गौ सेवा समिति बोलबम अध्यक्ष, सीताराम संर्कीतन संस्थापक, जिला वृक्षारोपण समिति के सरंक्षक है। उन्होंने इस कृत्य के लिए भर्त्सना करते हुए कहा कि यह एक निंदनीय कार्य है। इस तरह किसी भी धर्मग्रंथों में फोटो डलवाना अशोभनीय कार्य है। उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष डा. रमन सिंह जी के माता जी का फोटो हनुमान चालीसा में डाला गया था। इसका विरोध हिन्दु धर्म अनुयाइयों को करना चाहिए। रामायण भागवत गीता में इस प्रकार फोटो छपवाना घोर अपराध है। इस तरह से हिन्दु धर्म ग्रंथ को अपमान करने का हक किसी को नहीं है।
पं. द्वारिका महाराज- लोहारा रोड में स्थित सिध्दपीठ मां विन्ध्यवासिनी मंदिर के आचार्य ने श्रीमद् भागवत गीता में स्व. ठा. विघ्नहरण सिंह जी का फोटो देखकर कहा कि यह अधिकार इन्हें किसने दिया। अगर बांटना ही था तो अलग से बांट देते इस तरह से धर्मग्रंथ का अपमान करने का हक किसी को नहीं है।
पं. रविशंकर मिश्रा- गीता भगवान की कृष्णा की अलौकिक शक्ति का श्रोत है जो कि उनके श्रीमुख से निकला हुआ सृष्टि कल्याणार्थ अनुपम ग्रंथ है जिसके ऊपर न जाने कितने मनुष्य ने टीकाकरण किए और गाथा चारो वेद गाती है। ऐसा धर्मग्रंथ किसी की बपौती नहीं है। चाहे वह मुख्यमंत्री हो प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति हो। ये निंदनीय कृत्य है। मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की इस गलती के लिए उन्हें सार्वजनिक रुप से माफी मांगकर प्रायश्चित करना चाहिए।
पं. देवीप्रसाद शास्त्री- इस तरह पवित्र धर्मग्रंथों में फोटो डलवाना घोर पाप है। हो सकता है यह व्यवस्थापक की गलती हो। फिर भी यह एक नासमझी का प्रतीक है। यह एक निंदनीय कार्य है।
पं. श्री विनोद तिवारी जी- यह कृत्य श्रीमद् भागवत गीता का घोर अपमान है। यह धर्मग्रंथ के साथ छेड़छाड़ है। यह अधिकार किसी को नहीं है।
पं. कन्हैयाप्रसाद मिश्रा जी ने श्रीमद् भागवत गीता में छपे फोटो को देखते ही कहा कि यह पद का दंभ है, यह एक घृणित कार्य है। यह हिन्दुओं का पवित्र ग्रंथ है। इसके साथ खिलवाड़ अशोभनीय है।
पं. शिव पाण्डेय ने कहा कि श्रीमद् भागवत गीता या रामायण किसी भी महान धर्मग्रंथों में इस प्रकार फोटो छपवाकर हिन्दु धर्म आस्था में ठेस पहुंचाना है। यह एक अनापेक्षित राजनीति है।
हरिप्रसाद पाठक ने कहा कि यह पूर्णत: अनुचित है। आज मुख्यमंत्री है। डा. साहब तो स्व. विघ्नहरण जी का फोटो गीता में छपवा दिए कहीं प्रधान हो जाएंगे तो अपना फोटो धर्मग्रंथों में छपवाकर न बंटवा दें।
यस वर्धन (नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस) जगदलपुर
ब्ण्डण् के पिता हो या प्रधान मंत्री के पिता यह कृत्य गलत है किसी को भी यह अधिकार नही की पवित्र ग्रंथ में फोटो छपवा कर बटायें मुख्य मंत्री रमन सिंह के जिस भी उददेष्य से यह परम्परा शुरू कि हो वो चाहे अपनें प्रचार के लिए हो या अपनें पिता को भगवान का दर्जा दिलानें के लिए हो यह सरासर एक धार्मिक ग्रंथ का अपमान है इसकी हम निंदा करते हैं।
तरसेम सिंह गिल(नगर पालिका उपाध्यक्ष) कोंण्डागांव.
धार्मिक ग्रंथ वो चाहे किसी धर्म का हो इस तरह से उसके अपमान करना वो भी राय के मुखिया द्वारा यह कृत्य गलत है और हम इसकी निंदा करते हैं।
मोहन मरकाम कोंण्डागांव.
राय के मुखिया सत्ता के नषे में चुर हो कर पवित्र ग्रंथ का अपमान सम्मान का अर्थ ही भुल गये हैं ये धर्म कि बात है हम इसकी निंदा करते हैं।
मनीश श्रीवास्तव कांग्रेसी कोंण्डागांव.
लगता है डां रमन सिंग दुसरी पारी में अपनें आप कों भगवान समक्षनें लगे हैं इतिहास में कभी आज तक एैसा नही हुआ रमन सिंग जी भले ही अपनें पिता को भगवान समक्षते हों मगर पवित्र धार्मिक ग्रंथ का अपमान करनें का उन्हें कोई हक नही।

रविवार, 20 जून 2010

श्रीमद् भागवत गीता का अपमान!


ठाकुर की ठकुराई या मूणत की मुर्खताई
स्व. ठाकुर विघ्नहरण सिंह की तस्वीर वाली गीता वितरित
इसे सत्ता का दंभ कहें या व्यवस्था की मुर्खता लेकिन डॉ. रमन सिंह के पिताजी के तेरहवीं कार्यक्रम में जिस तरह से हिन्दुओं के पवित्र ग्रंथ ‘श्रीमद् भागवत गीता’ का अपमान किया गया उससे न केवल आम आदमी आक्रोशित है बल्कि उनकी टिप्पणी भी बेहद तीखी है। कोई इसे गीता का अपमान कह रहा है तो कोई इसे सत्ता का दंभ बता रहा है। मामले को तूल पकडऩे से रोकने सरकारी प्रयास भी जारी है। बावजूद इस करतूत की शिकायत नागपुर से लेकर दिल्ली तक की जा चुकी है।
विवाद की शुरुआत तब हुई जब प्रदेश के मुखिया डॉ. रमन सिंह के पिताश्री स्व. ठाकुर विघ्नहरण सिंह के तेरहवीं में 16 जून को कवर्धा में श्रद्धांजलि कार्यक्रम के दौरान श्रीमद् भागवत गीता बांटी गई। तेरहवीं कार्यक्रम में गीता का वितरण नया नहीं है लेकिन यहां जिस गीता का वितरण किया गया उसमें स्व. ठाकुर विघ्नहरण सिंह जी की रंगीन तस्वीर छापी गई थी। दरअसल हिन्दुओं के लिए गीता का महत्व किसी से छीपा नहीं है और वे इसे अपने पूजा स्थल पर रखते हैं ऐसे में स्व. ठाकुर विघ्नहरण सिंह की तस्वीर वाली गीता कोई अपने पूजा स्थल पर क्यों रखेगा और जब पूजा स्थल पर नहीं रखा जाएगा तो फिर इस पवित्र ग्रंथ को रका कहां जाएगा। हमारे भरोसेमंद सूत्रों ने बताया कि तेरहवीं में वितरित किए जाने वाले श्रीमद् भागवत गीता में स्व. ठाकुर विघ्नहरण सिंह की तस्वीर छापने के पिछे स्वयं मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की सहमति रही है जबकि सलाहकार के रुप में पूरे कार्यक्रम की व्यवस्था करने वाले नगरीय निकाय मंत्री राजेश मूणत का नाम सामने आया है।
बताया जाता है कि यह तस्वीर मूणत आफसेट में छापी गई है और करीब डेढ़ लाख लोगों को यह किताब वितरित की गई है। आम लोगों की इस मामले में बेहद तीखी प्रतिक्रिया है और कई लोगों ने तो यहां तक कह डाला कि जो जितना बड़ा अधर्मी है आज वह उतना ही बड़ा धर्म का ठेकेदार हैं।
कई लोगों ने तो यहां तक कहा कि धर्म की राजनीति करने वाली भाजपा के नेताओं की ऐसी करतूतों के कारण ही देश में भाजपा को मुंह की खानी पड़ेगी और केन्द्रीय नेतृत्व ने यदि कड़े कदम नहीें उठाये तो छत्तीसगढ़ में भी भाजपा को मुंह की खानी पड़ सकती है। बहरहाल स्व. ठाकुर विघ्नहरण सिंह की तस्वीर वाले श्रीमद् भागवत गीता का मामला किस करवट बैठेगा यह तो वक्त ही बतायेगा लेकिन यह तय है कि इस मामले को लेकर पुजारियों और आम लोगों में बेहद आक्रोश है।
क्या करें इसगीताका...
हमने स्व. ठाकुर विघ्नहरण सिंह की तस्वीर वाले ‘श्रीमद् भागवत गीता’ के उपयोग पर चर्चा की तो कई पंडितों ने कहा कि इसे नदी-तालाब में विसर्जित किया जाना ही सबसे उचित होगा क्योंकि यदि तस्वीर फाडक़र इसे पूजा स्थल पर रखेंगे तो ठाकुर साहब का अपमान होगा। भले ही तस्वीर छपाने वालों ने इस अपमान को नहीं समझा हो लेकिन आम आदमी को यह ध्यान रखना होगा कि उनकी हरकत से किसी का अपमान न हो।
कांग्रेसी अब क्या करेंगे
धर्म को लेकर हमेशा ही कांग्रेस पर हमला होता रहा है ऐसे में विपक्ष में बैठी कांग्रेस क्या रूख अख्तियार करती है इसे लेकर कई तरह की चर्चा है। खासकर उन कांग्रेसियों की दुकानदारी या ठेकेदारी बंद होने की बात कही जा रही है जो थोड़े बहुत लालच में अपने मुंह पर ताला जड़े हुए हैं।
अब कहां है हिन्दू संगठन...
छत्तीसगढ़ में हिन्दुओं के हित में बोलने वाले चार दर्जन से अधिक संगठन काम कर रहे हैं लकिन आश्चर्य का विषय तो यह है कि इतने बड़े मामले में अब तक कोई भी सामने नहीं आया है। हिन्दुत्व की दुहाई देने वाले सबसे बड़े संगठन आरएसएस हो या विश्वहिन्दू परिषद से लेकर बजरंग दल सभी ने खामोशी ओढ़ ली है बात-बात में मिशनरियों को ललकारने वाली धर्म सेना तो इस मामले में कुछ भी बोलने से कतराती रही जबकि छोटे-मोटे संगठनों ने हमें ही सलाह दे दिया कि इस मामले को तूल मत दो। हमारा भी इस मामले को तूल देने का ईरादा नहीं है लेकिन जिस हिसाब से हमें आम लोगों ने ‘गीता’ के अपमान को लेकर अपनी भावनाएं व्यक्त की हम उन्हें भावनाओं को सिर्फ शब्द दे रहे हैं।
धर्म की राजनीति करने वाले दिग्गज भी पहुंचे थे...
स्व. ठाकुर विघ्नहरण सिंह जी के तेरहवीं कार्यक्रम में वे लोग भी आए थे जिन्हें कट्टर हिन्दुवाद के रुप में जाने जाते हैं। लालकृष्ण आडवानी, उमा भारती तो कट्टर हिन्दूवादी चेहरे हैं। जबकि राजनाथ सिंह, सुंदरलाल पटवा, धर्मेन्द्र प्रधान, रविशंकर प्रसाद, प्रभात झा, उमाशंकर गुप्ता सहित अनेक लोगों का ध्यान भी इस ओर नहीं गया। क्या वे जानबूझकर चुप थे यह तो वहीं जाने।
धर्म ग्रन्थ किसी की जागीर नहीं
प्रतिक्रियाएं : आम लोगों में आक्रोश
महादेव घाट स्थित हटकेश्वर नाथ मंदिर के पुजारी श्री लोचन गिरी गोस्वामी जी हमारे धर्मग्रंथ के साथ छेड़छाड़ करना गलत बात है इस तरह से फोटो लगाना उचित नहीं है यह हक किसी को नहीं है ऐसा करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
महादेवघाट स्थित काली मंदिर के महंत संतोष गिरी महाराज फोटो लगाने का अधिकार किसने दिया। ये तो बर्दाश्त के बाहर की बात है और इस पाप के लिए सजा जरूर मिलेगी।
श्री कमल गिरी जी महाराज- इन्होंने इस तरह से गीता के अपमान की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए इसके खिलाफ आवाज उठाने का आह्वान किया।
श्री डगेश्वर शर्मा जी महाराज ने कहा कि इस तरह का कृत्य अपराध की श्रेणी में आता है और दंड भी तय होने चाहिए।
फायर ब्रिगेड चौक हनुमान मंदिर के पुजारी पं. भूषण शर्मा जी ने गीता में फोटो देखते ही आग बबूला हो उठे और इसे पाप करार देते हुए गीता के दुरुपयोग पर रोक लगाने की बात कही।
श्याम नगर स्थित शिव मंदिर के पुजारी पं. यदुवंशमणि त्रिपाठीजी ने इस ‘गीता’ को देखते ही कहा कि लगता है डॉ. रमन सिंह पर भी कलयुग का प्रभाव आ गया है और कहा कि जब राजा ही ऐसा अधर्म काम करे तो प्रजा क्या करेंगे। पद के प्रभाव में धार्मिक ग्रंथों का दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए।
आर्तेक जायसवाल अंबिकापुर- इन्होंने कहा कि पद का ऐसा दुरुपयोग कभी नहीं देखा इसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।
बल्ला महाराज- डंगनिया बम्लेश्वरी मंदिर के पुजारी ने भी कहा कि इस तरह का फोटो लगाना गलत है। धर्मग्रंथ के साथ छेड़छाड़ की ईजाजत किसी को नहीं दी जानी चाहिए। हम इसका कड़ा विरोध करते हैं।
ट्रांसपोर्टर संजय पाण्डे रायपुरा ने कहा कि कोई हिन्दु ही कैसे अपने ग्रंथ का अपमान कर सकता है आज हिन्दु संगठन चुप रहा तो हिन्दुओं की रक्षा में कौन आगे आएगा।
पत्रकार दामू अम्बाडोरे ने कहा कि अब तो जो जितना बड़ा अधर्मी है उतना बड़ा धर्म का ठेकेदार हो गया है ऐसे लोगों का बहिष्कार किया जाना चाहिए।
कवर्धा निवासी शेषनारायण पाण्डे ने कहा कि यह तो पद का दंभ है और किसी को अपने परिवार का प्रचार करना है तो कम से कम धर्म ग्रंथों को तो बख्श दें।
कोण्डागांव निवासी इसरार अहमद गोलू ने कहा कि किसी भी धर्मग्रंथ का अपमान उचित नहीं है और ऐसे मामले में कार्रवाई तय हो। धर्मग्रंथ किसी की जागिर नहीं है जिसे तो चाहे जैसा उपयोग कर ले।
विजन पब्लिक स्कूल के संरक्षक श्री सभाजीत पाण्डेय ने गीता में तस्वीर देखते ही भडक़ उठे। उन्होंने कहा कि पद में बैठकर लोग धर्म को जागिर बनाना आम लोगों की आस्था के साथ खिलवाड़ है ऐसे लोगों को न केवल पद से निकालना चाहिए बल्कि कड़ी सजा दी जानी चाहिए।
अजय दुबे संपादक खबर भूमि ने कहा कि भाजपा केवल धर्म की रक्षा की बात कर सत्त में आई है और उनके नेता इस तरह की हरकत कर रहे हैं ऐसे लोगों को पद पर बने रहने का एक दिन का भी हक नहीं है।