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रविवार, 9 मई 2021

हमने किसे चुन लिया !

 

यह सवाल भले ही छोटा हो लेकिन अब महत्वपूर्ण इसलिए हो गया है क्योंकि भाजपा ने जिसे प्रधानमंत्री बनाया है वह अपनी रईसी में इस तरह डूब गया है कि उसे इस महामारी काल में भी सिर्फ और सिर्फ सत्ता की रईसी और चुनाव जीतने की रणनीति से ही मतलब है।

रोम जल रहा था तब वहां राजा नीरो चैन की बंशी बजा रहा था, इस मिथक के दुहराने की बात हम कभी स्वीकार नहीं कर पाते यदि इस देश में कोरोना का प्रकोप नहीं आता। लेकिन कहते हैं इतिहास अपने आप को दोहराता है! कोरोना के इस बढ़ते प्रकोप के बाद भी यदि सरकार का ध्यान सिर्फ कर वसूली हो तो क्या हमें रावण की कर वसूली को याद नहीं कर लेना चाहिए जो ऋषि-मुनियों से कर के बदले में खून तक निकाल लेता था। 

देश की कई राज्यों की सरकारें वैक्सीन को टैक्स फ्री या मुफ्त में देने की मांग कर रही है लेकिन प्रधानमंत्री को केवल टैक्स की पड़ी है। यही वजह है कि बंगाल चुनाव के बाद लगातार पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ रही है। इस लॉकडाउन के दौर में पेट्रोल-डीजल का ज्यादा उपयोग वही लोग कर रहे हैं जो कोरोना से पीडि़त है, जिन्हें अस्पताल, मेडिकल स्टोर्स जाना है तब कीमतों में लगातार वृद्धि होना क्या उनका खून निचोडऩा नहीं हुआ।

मोदी समर्थकों या भाजपाईयों को यह छोटी बात को बड़ा करने की कोशिश लग सकती है लेकिन यह बेहद ही शर्मसार कर देने वाली बात है। इससे भी बड़ी बात तो किसानों को जीते जी मार डालने की कोशिश है। प्रधानमंत्री ने खाद की कीमत 58 फीसदी बढ़ा दी है। चुनाव के दौरान जारी आदेश की लीपापोती का सच सबके सामने है केवल डीएपी की कीमत सात सौ रुपये बढ़ा दी गई यह खेती के लिए बड़ा संकट है। ऐसे में इसे किसान आंदोलन की प्रतिक्रिया में लिया गया फैसला नहीं तो और क्या कहेंगे।

इस कोरोना के दौर में जब केवल किसान ही देश के आर्थिक तंत्र को ही नहीं जान की रक्षा की है तब इस तरह के फैसले को आप क्या कहेंगे। सेन्ट्रल विस्टा के निर्माण कार्य को आवश्यक सेवा बताकर लॉकडाउन में भी बीस हजार करोड़ फूंकने की कोशिश क्या बेईमानी नहीं है। उसमें भई सबसे पहले प्रधानमंत्री का महल बनेगा और यह 2022 तक इसलिए बना दी जायेगी क्योंकि महल में रहने की मंशा 2024 में पता नहीं पूरी होगी या नहीं।

हैरानी तो इस बात की है कि सेन्ट्रल विस्टा को लेकर जिस तरह से पूरी दुनिया में थू-थू हो रहा है वह भी बेशर्मी से देखा जा रहा है। ऐसे में जब कोरोना काल में प्रधानमंत्री के आपदा में अवसर को अमलीजामा पहनाने वालों को भी शर्म नहीं है तब इसका क्या मतलब है। सवाल कई है लेकिन एक सवाल जो सबसे महत्वपूर्ण है कि क्या संघ के संस्कार इसी तरह के हैं, हालांकि संघ को आज भी संविधान पर विश्वास नहीं  है, यह दावा नहीं हकीकत है इसलिए वह हमेशा ही वह दरवाजा चुनती है जिससे वह पकड़ा न जाए। और दोष किसी व्यक्ति पर मढ़ सके। आडवानी की चुप्पी को लेकर भी सवाल है! लेकिन जब सत्ता ही खून चुसने को आमदा हो तो निंदा के अलावा और क्या किया जा सकता है। जरा सोचिए जरुर!

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

जिम्मेदारी कहां है...

 

यह दौर अजीब है, खुद की जिम्मेदारी से भागती मोदी सत्ता ने अपनी जिम्मेदारी से बचने दोषारोपण का सहारा लेने लगी है और इस खेल में ट्रोल आर्मी और वॉट्सअप यूनिवर्सिटी की भूमिका किसी भी सभ्य समाज को शर्मसार कर सकती है!

और जब सत्ता जिम्मेदारी से बचने लगे तो फिर इसका साफ मतलब है कि नियत ठीक नहीं है और जब नियत ही ठीक न हो तो लोकतंत्र का क्या मतलब रह जाता है।

इन दिनों संसद से लेकर सड़क तक बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी किसानों का मुद्दा छाया हुआ है। ऐसे में सत्ता की जिम्मेदारी है कि वह किसानों से बातचीत करके कोई रास्ता निकाले या फिर तीनों कृषि कानून ही रद्द कर दे लेकिन सत्ता अपनी जिम्मेदारी निभाने की बजाय आंदोलन तोडऩे में पूरी ताकत लगा रही है। पहले तो उन्हें आतंकवादी, नक्सली देशद्रोह कहा जाने लगा फिर दीवारें खड़ी की गई। सड़कों पर छड़ो की कीलें लगाई गी, रसद-पानी-बिजली इंटरनेट तक बंद किया गया। किसानों के खिलाफ इस तरह से विषवमन किया गया मानों वे आंदोलन करके दुश्मन हो गये है। और जब पूरी दुनिया का ध्यान इस मानवाधिकार हनन पर होने लगा तो इसे एक बार फिर भारत को बदनाम करने की साजिश बताई जा रही है जबकि हकीकत यह है कि पूरी दुनिया में अभी भी ऐसे लोग हैं जो मानवाधिकार के उल्लंघन पर तीखी प्रतिक्रिया देकर किसी भी देश की सत्ता को बेचैन कर देते है।

इस मोदी सत्ता की दुविधा यही है कि वह मीठा गप्प गप्प तो करती है लेकिन कड़वा के लिए दूसरे को जिम्मेदार ठहराती है, संसद  न चले तो विपक्ष जिम्मेदार, जीएसटी में तकलीफ हो तो कांग्रेस ला रही थी, किसान आंदोलन हुआ तो यह बिल कांग्रेस ली रही थी। इसका क्या मतलब है। क्या तब भाजपा विरोध में नहीं खड़ी थी और जब वह विरोध में खड़ी थी तो आज यह सब क्यों कर रही है।

लेकिन हैरानी की बात तो यह है कि वह हर असहमति के स्वर को देशद्रोही का नाम देती है जबकि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि कुछ और ही कहता है।

संसद में संजय सिंह ने पूछा भी कि यदि जीएसटी कांग्रेस, किसान कानून कांग्रेस लाने वाली थी इसलिए भाजपा ले आई तो फिर पार्टी का नाम ही कांग्रेस, बी कांग्रेस ही कर देना चाहिए। सवाल कई है जिसे पूछा जाना चाहिए कि आखिर स्टॉक सीमा में छूट देने का अर्थ क्या है, क्या यह महंगाई, कालाबाजारी को बढ़ावा देना नहीं है लेकिन यह सवाल कोई नहीं पूछेगा? क्योंकि अति राष्ट्रवाद और धर्मान्धता किसी कोढ़ से कम नहीं है। यह बात हरिशंकर परसाई जी ने जब कही थी तब कितनों को इस पर यकीन रहा होगा ! लेकिन आज की परिस्थितियां यह चिख चिख कर कह रही है कि अति सर्वेत्र वर्जते ! अति का अंत होता ही है और किसान आंदोलन ने जिस शांतिपूर्ण ढंग से अपने को विस्तार दिया है वह किसी भी सत्ता के लिए बेचैन कर देने वाला है।

रविवार, 10 मार्च 2019

मोदी है तो मुमकिन है का नया जुमला..

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अच्छे दिन आयेंगे के नारे के साथ सत्ता तक पहुंची मोदी सरकार ने बालाकोट एयर स्ट्राईक के बाद मोदी है तो मुमकिन है के नये नारे के सहारे 2019 में होने वाली सत्ता की लड़ाई को जीत लेना चाहती है। युद्ध उन्माद से पैदा हुए इस नये नारे की गूंज पार्टी दफ्तर से लेकर सोशल मीडिया में हथियार के रुप में इस्तेमाल किया जाने लगा है और केन्द्र सरकार के हर विभाग ने प्रधानमंत्री नरेन्द्री मोदी के फोटो के साथ नामुमकिन अब मुमकिन है का नारा भी अपने विज्ञापनों में चिपकाने लगा है।
सूचना तंत्र की घोर लापरवाही और सरकार की असफलता के बीच मोदी राज में एक के बाद एक हुए बड़े आतंकवादी हमले के पहले ही अच्छे दिन आयेंगे का नारा जब जुमला में तब्दिल होकर किसान, बेरोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य का मुद्दा हावी होने लगा था। मोदी सरकार की हार साफ दिखलाई देने लगा था तब पुलवामा के बाद बालाकोट में हुए एयर स्ट्राईक ने एक बार फिर नरेन्द्र मोदी को संजीवनी देने की कोशिश की।
हिन्दू मुस्लिम मंदिर मस्जिद और भारत पाक का मुद्दा हमेशा से ही राजनेताओं के लिए सत्ता की सीढ़ी रहा है। ऐसे में जब-जब किसान और बेरोजगारी का मुद्दा बड़ा होने लगता है सत्ता के लिए परेशानी बढऩे लगती है और तब सत्ता में बने रहने के लिए ऐसे हथियारों का इस्तेमाल होता है जिसमें उसके अपने फायदे हो।
2014 में अच्छे दिन आयेंगे के नारे के साथ सत्ता में आई मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती किसान और बेरोजगारी के मुद्दे थे। भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल की नियुक्ति के अलावा स्वास्थ्य और शिक्षा के मुद्दे बड़ी चुनौती थी। आतंकवाद और भ्रष्टाचार के अलावा राम मंदिर से लेकर धारा 370 को हटाने का मामला भी मोदी सरकार के लिए चुनौती भरा था। इनमें से सरकार ने किस दिशा में बेहतर काम किया यह सरकार भी नहीं बता पायेगी। लोगों की सरकार से उम्मीद टूटने लगी और विपक्ष मुद्दों को लेकर सरकार पर तीखे हमले शुरु किये तो सरकार इससे बच निकलने का रास्ता ढूंढने लगी। उपर से नोटबंदी और जीएसटी की मार से व्यापार तो प्रभावित हुआ ही लाखों नौकरी भी चली गई।
कहां तो तय था चिरागा हर शहर के लिए
ज मयस्सर नहीं एक घर के लिए

हर साल दो करोड़ बेरोजगारों को नौकरी देकर अच्छे दिन लाने का वादा था लेकिन नौकरी छिनी जाने लगी। कम होती नौकरी में युवाओं ने स्वयं को ठगा महसूस करना शुरु कर दिया और लोग कहने लगे कि इससे अच्छा तो वही दिन थे। अच्छे दिन लाने का वादा जुमला साबित हो गया। तीन बड़े राज्यों के चुनाव को सेमीफाइनल बताने के बाद भी भाजपा सत्ता से बेदखल कर दी गई। संवैधानिक संस्थाओं के औचित्य का सवाल बड़ा होने लगा और सबसे बड़ी बात तो आतंकवाद के मसले जस के तस खड़े दिखाई दिये। मोदी राज में आतंकवादियों के बड़े हमलों की वजह से सीमा और कश्मीर से आती शहीदों की लाश से लोगों का गुस्सा बढऩे लगा। सरकार के खुफिया तंत्र की असफलता ने मोदी सरकार की परीक्षा ही नहीं ली बल्कि लोगों ने फेल करना भी शुरु कर दिया।
उरी हमले के बाद किये गये सर्जिकल स्ट्राइक की चमक को भुनाने में लगी भाजपा के लिए पुलवामा की घटना सत्ता छिनते नजर आई तब एक बार फिर राष्ट्रभक्ति और देशद्रोही का प्रमाण पत्र बांटने का सिलसिला शुरु हो गया। बालाकोट में किये हवाई हमले को भुनाने युद्ध उन्माद तक ले जाया जाने लगा। इस मामले में कई टीवी चैनलों ने तो बालाकोट में तीन साढ़े तीन सौ आतंकवादियों के मारे जाने की खबर बगैर पुष्टि किये चला दी। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तो हमले वाले दिन दोपहर को ही चार सौ आतंकवादियों को मारने का दावा कर दिया और भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह ने तो ढाई सौ मार गिराने का दावा किया गया। स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी हर सभा में बालाकोट की कार्रवाई का न केवल जिक्र करते रहे बल्कि घर में घुसकर मारने की घोषणा करते रहे।
युद्ध उन्माद के बीच किसान, बेरोजगार स्वास्थ्य-शिक्षा जैसी बुनियादी मुद्दों से जुड़ी खबरें गायब होने लगी। हिन्दू मुस्लिम और भारत पाक के इस उन्माद में भाजपा को अपनी बात दिखलाई देने लगी और यहीं से एक नया नारा निकला मोदी है तो मुमकिन है।
लेकिन अब सवाल यह है कि क्या मोदी है तो मुमकिन है का यह नारा अच्छे दिन आयेंगे की तरह आम जनमानस के विश्वास पर खरा उतरेंगी। इस नारे की विश्वसनियता बनाये रखने क्या देश की जनता में जारी युद्ध उन्माद को चुनाव तक बनाये रखा जा सकता है और युद्ध उन्माद बना रहे इसके लिए भाजपा क्या करेगी। यह उसके लिए बड़ी चुनौती है। 
क्योंकि जब यह उन्माद उतरेगा तब फिर जो सवाल उठेंगे वह मोदी सरकार की राह में बाधा डालेंगे। नोटबंदी और जीएसटी की मार से परेशान व्यापारी, नौकरी के अभाव में बेरोजगार युवा, किसान, शिक्षा और स्वास्थ्य का सवाल फिर खड़ा होगा तब लोग पूछेंगे कि मोदी के रहते जब सब मुमकिन है तो अच्छे दिन क्यों नहीं आयें?

मंगलवार, 15 मार्च 2016

लिखने की दो...... आजादी!


जेएनयू में कन्हैया कुमार जब लाल सलाम का मतलब समझा रहा था तब दिल्ली से दूर बैठे छत्तीसगढ़ में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यहां सिर्फ लाल सलाम कहने वाले जेल में क्यों और कैसे ठूंस दिये जाते है। दिल्ली में लाल सलाम पर कानून का नजरिया अलग और छत्तीसगढ़ में अलग क्यों है। क्या इस देश में दो तरह के कानून है।
सवाल तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस वक्तव्य को लेकर भी उठ रहे है कि कल तक भारत में पैदा होने में शर्म महसूस होता था। कोई और ऐसा कह दे तो चड्डी वाले उसका जुलूस ही नहीं निकालते पुलिस भी मार कूट कर उसे सलाखों के पीछे डाल देती।
सवाल अभिव्यक्ति की आजादी और उसके खतरे का बना हुआ है। सरकार किसी की भी हो अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे सामान रुप से बना हुआ है। पत्रकारिता से इन बातों का सीधा संबंध हम देखते हैं कि कैसे दिल्ली से दूर गांव तक आते-आते पत्रकारिता पर दबाव बढ़ता जाता है।
राजधानी में यह खतरे दूसरी तरह का है। यहां पत्रकारों को कोई सीधा पकड़कर जेल में नहीं डालता परन्तु उसकी नौकरी छुड़ा दी जाती है। इस खेल में पुलिस का नहीं जनसंपर्क विभाग का सहारा लिया जाता है। ऐसे कितने ही उदाहरण है जब सिर्फ एक खबर पर कितनों की नौकरी चली गई कितनों के तबादले कर दिये गये। एक अखबार सारा संसार की बात हो या पत्र नहीं मित्र की बात हो राजस्थान से आये धुरंधर की बात हो या मंझोले कद की बात हो। खबरों की सच्चाई पर कम जनसंपर्क के दबाव में लिखने की आजादी पर बंदिशें लगाई गई।
कन्हैया के लाल सलाम का जिक्र यहां इसलिए किया जा रहा है कि बस्तर में पत्रकारिता तलवार की धार पर चलने जैसी है। नक्सली की आड़ में भ्रष्टाचार खूब फल फूल रहा है। सड़क-भवन के नाम पर आने वाले करोड़ों रुपये भ्रष्टाचार की भेट चढ़ रहा है। नक्सलियों का डर बताकर सरकारी सेवक कार्यालयों से गायब हो जाते हैं। महिनों स्कूल नहीं लगता पर वेतन बराबर बंटता है। राजीव गांधी शिक्षा मिशन का बुरा हाल है। पीडब्ल्यूडी के भवन व सड़क निर्माण का कोई हिसाब नहीं है। मनरेगा से लेकर दूसरी सरकारी योजनाएं दम तोड़ रही है और इस पर लिखने वालों को सीधे धमकी ही नहीं दी जाती जेल तक में ठूंस दिया जाता है। आरोप भी नक्सलियों से सांठ-गांठ का होता है। 
दिल्ली में जिस मस्ती से कन्हैया ने लाल सलाम कह दिया वैसा बस्तर में कोई कह नहीं सकता। जन सुरक्षा कानून मजबूती से पैर जमाये हुए है। बीबीसी के पत्रकार आलोक पुतुल को भेजे जाने वाले मैसेज क्या यह चुगली करने के लिए काफी   नहीं है कि यहां सब कुछ ठीक नहीं है। परन्तु सरकार को यह सब नहीं दिखता। पर्याप्त सबूत के बाद भी सरकार की खामोशी क्या यह साबित नहीं करते कि बस्तर में पत्रकारों के साथ जो कुछ हो रहा है वह सब सरकार के इशारे पर हो रहा है?
यह सच है कि इन दिनों देश भर में पत्रकारों को गरियाने का दौर चल रहा है। परन्तु इसके लिए जिम्मेदार क्या सरकार-प्रशासन और वे मीडिया हाउस नहीं है जो दबाव में है। जो अपने हितों के लिए पत्रकारों को शार्प शूटर की तरह इस्तेमाल करते हैं और जब उन्हें खबरों पर स्वयं के हित में खतरे दिखते हैं पीछे हट जाते हैं।
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सोमवार, 24 मार्च 2014

भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने से परहेज?


लोकसभा चुनाव को लेकर राजनैतिक दलों की सत्ता की भूख थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। जिसे देखो वहीं सत्ता के लिए अनैतिक गठबंधन कर रहा है या फिर अनैतिक कार्य कर रहा है। सारे सिद्धांतो को तिलाजंलि देकर जिस तरह से चुनाव जीतने की कोशिश हो रही है वह न केवल आश्चर्यजनक है बल्कि दुखद भी हैं।
पिछले दस सालों से सत्ता में बैठी कांग्रेस को निशाना बनाने वाली भारतीय जनता पार्टी भी भ्रष्टाचार और महंगाई को मुद्दा बनाने की बजाय जिस तरह से नरेन्द्र मोदी को सामने रखकर चुनावी वैतरणी वार करना चाहती हैं वह भाजपा के राजनैतिक सुचिता पर तो सवाल खड़ा करते ही है कथनी और करनी के अंतर को भी स्पष्ट कर देने वाला है।
सत्ता के लिए कुछ भी करेगा मेरी मर्जी के आगे आम जनमानस हैरान है। अपराध से लेकर भ्रष्टाचार करने वालों को टिकिट देने वाले दलों से सत्ता प्राप्ति के बाद यह उम्मीद बेमानी है कि वे ऐसे लोगों के दबाव में आये बगैर जनहित में कार्य कर पायेंगे।
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंंत्र के राजनेताओं की सत्ता भूख के आगे जनता की बेबसी स्पष्ट है कि वह आखिर किस दल पर भरोसा करे। जो लोग कांग्रेस से उम्मीद छोड़ चुके है उनके सामने भाजपा को लेकर भी वहीं सवाल है। आखिर दोनों दल किस मामले में अलग है। कुर्सी की दौड़ में जिस बम उधर हम की अफरा तरफी स्पष्ट है और भ्रष्टाचार जैसा भयावह मुद््दा जाति धर्म के आगे दम तोड़ता दिख रहा है।
यूपीए के खिलाफ चुनाव पूर्व माहौल को भुनाने की बजाय भाजपा ने जिस तरह से दूसरे दलों से आने वालों को टिकिट दी है और मोदी के भरोसे चुनावी वैतरणी पार करने की कवायद की है उससे लोगों का भरोसा भाजपा से भी डिगा है कहा जाए तो गलत नहीं होगा।
सिर्फ मोदी के भरोसे दलबदल करने वाले या आपराधिक छवि वालों को टिकिट देकर जीत का सपना कहीं एक बार फिर भाजपा को सत्ता से दूर ही रखे तो भाजपाईयों को हैरानी नहीं होनी चाहिए।
इस मामले में अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी या ममता बेनर्जी और बिजू जनता दल ही कुछ अलग राजनैतिक संदेश तो दे रहे हैं लेकिन यह कहना कठिन है कि इनकी स्वीकार्यता कितनी है।
यही वजह हैं कि पिछले दो दशक यानी 1984 के बाद से किसी भी दल ने 272 का जादुई आकंड़ा नहीं छु सका है। दलबदल करने वालों की हार और अपराधिक छवि वालों को टिकिट देने का दुस्परिणाम को नजर अंदाज करने की भूल ने ही जनता को मजबूर किया है कि वह किसी एक दल पर भरोसा न करे।
भले ही ऐसे नेता चुनाव जीत रहे हो पर सच तो यह है कि इस तरह के लोगों को टिकिट देने का दुष्परिणाम आखिल भारतीय स्तर पर पड़ता है जिसे नजरअंदाज किया जाता रहा है।
बकौल अरविन्द केजरीवाल भाजपा और कांग्रेस ने मिल बैठकर सत्ता हासिल कर रहे  हैं। ये राजनैतिक दलाली है जिसके खिलाफ हर व्यक्ति को आगे आना चाहिए तभी लोकतंत्र स्थापित होगा। क्या यह स्पष्ट नहीं दिखता इससे परे कांग्रेस और भाजपा की राजनीति है? यह सवाल केजरीवाल ने भले उठाये हो पर मोदी बनाम राहुल की लड़ाई से असल मुद्दो गौण करने की कोशिश इस सवाल पर उत्तर है।

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

कर्णधारों के मायने और महापर्व की आगाज...


लोकतंत्र कर सबसे बड़े महापर्व का आगाज हो गया। 16 मई तक राजनैतिक दलों की सांसे सांसत में रहेगी। 81.4 करोड़ मतदाता अपने 543 कर्णधारों को चुनेंगे।  जो जीतने के पहले अपने पक्ष में मतदान कराने घर घर घुमेंगे।
चुनाव आयोग के घोषणा के साथ ही शुरु हो रही इस खंदक की लड़ाई पर जीत का सेहरा बांधने की होड़ मची है। और हर बार की तरह इस बार भी जनता ने मोटे तौर पर तय कर लिया है कि सरकार किसकी बननी है। कांग्रेस जहां राहुल गांधी के नेतृत्व में हम जोड़ते हैं वे तोड़ते हैं के नाटों के साथ मैदान में है तो भाजपा पीएमएन वेटिंग नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में देश की आखंडता और महंगाई का मुद्दा बनाने में लगे हैं। पर सच तो यह है कि वर्तमान परिस्थिति में दोनों ही दलों के लिए स्वयं के बूते न तो सरकार बनाने के लिए आवश्यक जादुई आंकड़ा 272 को छुने की क्षमता है और न ही इन्हें छू पाने का विश्वास है।
कल तक कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने के लोभ में किसी भी पार्टी बाहर करने के लोभ में किसी भी पार्टी से गठबंधन करने वाली भाजपा आज भी गठबंधन के रास्ते ही सत्ता तक पहुंचने इस कदर आतुर है कि उसके लिए रामविलास पासवान हो या कोई अन्य दल अछुत नहीं है। उसे पार्टी गुर्राने वाले येदियप्पा से लेकर कल्याण सिंह और शिवसेना से लेकर आरपीआई सभी का समर्थन चाहिए।
पिछले दो दशक से जारी गठबंधन की राजनीति से देश को होने वाले नुकसान की चिंता न तो कांग्रेस को हैं और न ही भाजपा को ही रह गई है। वाजपेयी सरकार के समय में बात हो या यूपीए की हर बार अपनी अक्षमता पर गठबंधन की राजनीति की मजबूरी बताने वाले दल इस बार भी इसी राह पर है तब भला जनता क्या करें।
तीसरे मोर्च ने भी एक गठबंधन तैयार किया है लेकिन इनमें भी वहीं दल है जो देर सबरे कांग्रेस या भाजपा का हिस्सा रह चुके हैं और चुनाव परिणाम के बाद जिधर बम उधर हम के फार्मूले पर भरोसा करते हैं।
इस बार चुनाव रोमांचक और कटु होने की इसलिए भी अधिक संभावना है क्योंकि गठबंधन की राजनीति से परे आन्दोलन की राह चलते दिल्ली की सत्ता हासिल करने वाले आम आदमी पार्टी ने जिस तरह से राजनीति शुरु की है उससे परम्परागत ढंग से जनता को बेवकुफ बनाने वाले राजनैतिक दलों की नींद उड़ गई है। हालांकि आम आदमी पार्टी का असर शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित है लेकिन जिस तरह से आप के नेताओं ने कांग्रेस और भाजपा के बीच दलाली का मुद्दा उठाकर भ्रष्टाचार और महंगाई से त्रस्त जनता के बीच एक नई राजनीति की शुरूआत की है उससे भाजपा की राह कठिन होने लगी है।
कार्पोरेट घरानों के साथ कांग्रेसी और भाजपाई ताल्लुकात को मुद्दा बनाते हुए रातों रात देश में लोकप्रिय होने वाले अरविन्द केजरीवाल की पार्टी भी अपने बूते सरकार नहीं बना सकती लेकिन उसकी जीत तो तभी तय मानी जा रही थी जब उनकी पार्टी की वजह से कई राजनैतिक पार्टियों के मंत्रियों के काफिले की गाडिय़ा कस हो गई। सुरक्षा बल कम हो गये और निराश हो चुके लोगों की आंखो में उम्मीद दिखने लगी।
अब तक सिर्फ सत्ता के लिए जोड़-तोड़ और जीतने वाले प्रत्याशी को ही टिकिट का मापदंड बताने वाले दलों के लिए आप की चुनौती कितनी होगी यह तो पता नहीं लेकिन यह महापर्व अब राहुल बनाम मोदी था यूपीए बनाम एनडीए या कांग्रेस बनाम भाजपा नहीं रह गया है अब इसमें आम आमदी की भागीदारी भी जुड़ गई है जो कर्णधारों के मायने क्या हो यह लकीर खीचीं जा चुकी है।

बुधवार, 27 नवंबर 2013

मोदी का नकली लाल किला भी काम नहीं आया


आदिवासियों पर लाठी चार्ज, भाजपा पर भारी!
बस्तर बराबरी पर तो सरगुजा में कांग्रेस आगे
रायपुर। आदिवासी सीटों के सहारे सत्ता तक दो बार पहुंची भाजपा के लिए इस बर सत्ता में वापसी में आदिवासी ही बाधा बन गये हैं। कहा जाता है कि आदिवासियों पर हुए लाठी चार्ज और नक्सली वारदातों का दर्द इस बार भाजपा पर भारी पडऩे लगा है ऐसे में मैदानी इलाके में वह क्या कर पाएगी कहना कठिन है।
छत्तीसगढ़ में सत्ता की चाबी अब तक बस्तर के पास रही है लेकिन बस्तर से जिस तरह की खबरें आ रही है उसके बाद इस बार सत्ता की चाबी सरगुजा के पास होने की प्रबल संभावना है।
अब तक रूझान से स्पष्ट हो गया है कि बस्तर में कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला बराबरी का है और इस बार भाजपा को यहां 5 से 6 सीटों का नुकसान हो सकता है। पिछले दो चुनावों में बस्तर की 12 में से 11 सीट जीतकर सत्ता में आने वाली भाजपा के कई मंत्री भी यहां कांटे की टक्कर में फंस कर रह गये हैं। सूत्रों की माने तो इस बार यहा कम्यूनिष्ट पार्टी भी एक सीट जीत सकती है ऐसे में इस बराबरी की वजह से सत्ता की चाबी इस बार दूसरे क्षेत्र में चली गई है।
इधर राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि बस्तर में बराबरी की टक्कर की वजह से इस बार सत्ता की चाबी सरगुजा के पास आ गई है जहां 14 में से 10 सीटों पर कांग्रेस की जीत निश्चित माना जा रहा है। जबकि दो सीटों पर कड़े संघर्ष की स्थिति हैं। मोदी के लिए नकली लाल किला बनाकर सत्ता हासिल करने में लगी भाजपा को सरगुजा में जबरदस्त झटका लगा है वह यहां 2003 के चुनाव में 9 व 2008 के चुनाव में 10 सीटे हासिल कर सत्ता में आई थी इस बार यहां कब्जा बनाए रखने भाजपा ने पुरजोर लगाया था। यहां तक की प्रधानमंत्री इन वेटिंग नरेन्द्र मोदी के लिए नकली लाल किला भी बनाकर चर्चा में आये थे लेकिन जिस तरह के रूझान सामने आ रहे हैं उसके बाद तो यही कहा जा सकता है कि यहां नरेन्द्र मोदी का सहारा भी काम नहीं आया।
यहां मिले रूझान के मुताबिक भाजपा भटगांव सीट सीधे सीत रही है जबकि मनेन्द्रगढ़ और प्रतापपुर में वह कांटे के संघर्ष में फंसी है। जिन सीटों पर कांग्रेस की जीत तय मानी जा रही है उनमें बैंकुंठपुर वेदांती तिवारी, प्रेमनगर खेलसाय सिंह, रामानुजगंज बृहस्पति सिंह, सामरी डॉ. प्रीतम राम, लुंड्रा चिंतामणी महराज, अंबिकापुर टीएस सिंहदेव और सीतापुर अमरजीत भगत शामिल है। बताया जाता है कि भाजपा के बस्तर और सरगुजा संभाग में इस स्थिति के लिए कई कारण गिनाये जा रहे हैं जिनमें से प्रमुख कारण आदिवासियों पर लाठी चार्ज के अलावा कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार के अलावा भाजपा के मौजूदा विधायकों की करतुत को बताया जा रहा है।
बहरहाल सरकार किसकी बनेगी यह तो बाद में ही पता चलेगा लेकिन यह तो तय है कि इस बार सत्ता की चाबी बस्तर ही होगी।

शनिवार, 9 नवंबर 2013

इहु बने काहत हे उहु बने गोठियात हे...



कांग्रेस ह देश ल बरबाद कर डारीस अऊ भाजपा ह प्रदेश ल बरबाद कर डारीस। याने सब सही होड़ा बाद होगे।
वो दिन बुढ़ा गार्डन म चरचा के इही सार रीहिस। भाजपाई मन ह कहात राहय नई देखत हस गा कांग्रेस ह कइसे देश ल बरबाद करत हावय। सरदार पटेल ह नई रहीतीस त ए देश ह एक होय पातीस। नेहरु अऊ गांधी के बस चलतीस त का का नई कर डारतीन। देख लेवव दिल्ली म बइठे सरकार ह कतका भ्रष्टाचार करत हावय। कोयला घोटाला, टू जी घोटाला अऊ वोट बैंक के राजनीति करत करत आतंकवादी मन ल पंदोली अलग देवत हावय। ए मन ल कुर्सी म बइठाहु त देश ल बेच खाहीं।
भाजपाई मन के गोठ बात ल सुन के रामलाल ह गुसिया गे अऊ केहे लागीस। जादा मत बात कर तुहु मन ल मौका दे रीहिन। का करवे पाकिस्तान ह कारगील ल छोड़ संसद भवन तक घुसर गे रीहिस अऊ आतंकवादी मन ल कंधार तक लेग के छोडिऩ हावय कोयला, पानी, बिजली, खेत, बांध, नदिया-नरवा कुछु बेचे ल बाचे हावय। नक्सली मन ले सेटिंग करथव। कांग्रेसी मन ल मरवा देथव। कलेक्टर ल छोड़वा देथव। तुंहर नेता मन ह भ्रष्टाचार म अतका रमावत हे जानो मानो मरही तभो संग म अपन संपत्ति ल लेके जाही।
तभे रामसिंह ह देखीस के मामला ह बाढ़त हे बीच बचाव करे लागीस - छोड़ न ग तुमन काबर लड़थव। कोनो दुध के धुले नहीं हे। दुनो पार्टी के नेता मन के इही हाल हे। तभे तो वो दिन नरेन्द्र मोदी ह कीहिस के कांग्रेस ह देश ल बरबाद करत हे त राहुल गांधी ह पचास ठन उदाहरण देके बतादीस के भाजपा ह कइसे प्रदेश ल बरबाद करत हावय।
समारु ह वो दिन त कहतेच रीहिस। कोनो ल देश के प्रदेश के चिंता नई हे सब ल सत्ता म कइसे बइठन तेखरे चिंता हे। वो ह हर चुनाव म अइसे कही के फारम ल भरथे फेर के झन वोला वोट देथे। कांग्रेस होय चाहे भाजपा दुनो पार्टी के नेता मन के जमीन जयजाद ल देख लेवव। मनमाने बाढ़त हे। एक दुसर ल गारी देके जनता ल बेंझारत हावयं। इखर मन बर नियम कानून कुछु नई हे। तै मैं गलती से कुछु करबो त फंस जाबो एमन ह कुछु कर डारय इंखर कुछुच नई बिगडय़।
दुनो पार्टी के नेता मन ह अअइसे गोठियाथे जानो मानो इंखर ले ईमानदार कोनो नई हे। तभे त वो दिन ईतवारी ह नई काहत रीहिस जतका चुनाव म मिलथे ले लेवव बाद म कुछु नई मिलय। अपन टुरा ल कमाय बर पढ़ा लिखा के बंबई भेज दे हावय अऊ इहां गरीबी रेखा के कार्ड बना के किंदर-किंदर के मेछरावत रथे। पहिली वो ह कतका हमर राज हमर राज काहत रहाय आजकल जेती पइसा देखथे तेती नाचत रथे। कुछु कबे तहां ले मुच ले हांस देथे अऊ अतके कथे छोड़ न गा जमाना के साथ चलना चाही। न कांग्रेस ह गलत कहीथे न भाजपा ह गलत कथे। जम्मोझन त वइसनेच हे। अपन खुन ल काबर सुखाववं।