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शनिवार, 9 अगस्त 2025

अगस्त क्रांति…

 अगस्त क्रांति…


सारे सबूतों के बाद भी यदि चुनाव आयोग और मोदी सत्ता अभी भी राहुल गांधी को बदनाम करने में लगे हो तो यक़ीन मानिए कि आने वाले दिनों में यह जन आंदोलन का ऐसा रूप लेगा जिसकी कल्पना न तो आरएसएस को है न ही बीजेपी को, यह दावा इसलिए है क्योंकि जब महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा की थी तो अंग्रेज़ी हुकूमत भी तब उसे हल्के में लिया था , महात्मा गांधी ने क्या कहा था और अब राहुल क्या करने वाले है…

''करो या मरो..'' : '' अगस्त क्रांति'' के 83 साल


8 अगस्त 1942. स्थान: बम्बई के ग्वालिया टैंक मैदान ( अब अगस्त क्रांति मैदान). आज सुबह से ही अखिल भारतीय कांग्रेस समिति अपने 57 वर्ष के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव '' भारत छोड़ो'' ( क्विट इंडिया) पर विचार विमर्श कर रही है. रात काफी गहरा गयी है, पर मैदान में मौजूद करीब 80000 से 100000 लोग मंत्रमुग्ध होकर अपने प्रिय नेता महात्मा गाँधी के भाषण को सुन रही है. उनके भाषण से पहले ''भारत छोड़ो'' प्रस्ताव में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ''भारत छोड़ो'' ( क्विट इंडिया) प्रस्ताव कर चुकी है. महात्मा गाँधी ने अपना भाषण हिन्दुस्तानी में देने के बाद अब वहां विदेशी पत्रकारों और प्रतिनिधियों के लिए अंग्रेजी में दे रहे हैं. वे कह रहे हैं :- ''There are representatives of the foreign press assembled here today. Through them I wish to say to the world that the United Powers who somehow or other say that they have need for India, have the opportunity now to declare India free and prove their bona fides. If they miss it, they will be missing the opportunity of their lifetime, and history will record that they did not discharge their obligations to India in time, and lost the battle.......Where shall I go, and where shall I take the forty crores of India? How is this vast mass of humanity to be aglow in the cause of world deliverance, unless and until it has touched and felt freedom. Today they have no touch of life left. It has been crushed out of them. It lustre is to be put into their eyes, freedom has to come not tomorrow, but today.''


और भाषण की समाप्ति वे अपने लॉर्ड टेनिसन द्वारा क्रीमिया युद्ध के दौरान एक असफल सैन्य कार्रवाई की स्मृति में लिखी गई " चार्ज ऑफ़ द लाइट ब्रिगेड " नामक कविता के इस वाक्यांश , जो कि उन्हें बहुत प्रिय है और उन्होंने इसे पहले भी अन्य भाषणों में कई बार इस्तेमाल किया, 

I have pledged the Congress and the Congress will do or die.'' से करते हैं.... ''डू ऑर डाई.... करो या मरो'' ... ये सुनते ही मैदान में मौजूद हजारों की भीड़ में एक नया उत्साह आ जाता है. दूसरे दिन तडके ही जब महात्मा गाँधी सहित कांग्रेस के सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया जाता है तो गांधीजी के द्वारा दिए इसी मंत्र '' करो या मरो'' से प्रेरणा लेकर लाखों-करोड़ों लोग विदेशी शासन के खिलाफ सड़क पर उतर पड़े और देखते-देखते ये आन्दोलन एक जनक्रांति में बदल गया जिसे बाद में ''अगस्त क्रांति'' का नाम दिया गया. 

ऐसे में सोचिये यदि देश की संसद में विपक्ष का मुखिया चुनाव आयोग  के आंकड़ों के साथ वोट चोरी का तथ्यों के साथ अलग अलग टाईप के अनेकों साक्ष्य प्रस्तुत करें और सत्ता पक्ष और चुनाव आयोग बजाए साथ आने,जाँच और दोषियों को सजा दिलाने की बात करने के उल्टे कोई "बदनाम" करने का घटिया जुमला बोले तो यह अघोषित आपातकाल नहीं तो और क्या है?? यह अपराधियों द्वारा अपराधियों का  सरंक्षण नहीं तो और क्या है? 


बदनामी चोरी करने से होती कि चोरी उजागर करने से, चोरी रोकने के लिए चोरों के पक्ष में बोलना चाहिए कि चोर के खिलाफ आवाज उठाने के पक्ष में. भारत का हित किस में है?? सुधार कैसे होता है. सोचिये किस तरह से आपको अनैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाया जा रहा है . 


 यदि किसी राज्य सरकार के शासन में दंगाइयों को खुली छूट हो, हजारों लोग मार दिए जाएं और मारे गए लोगो न्याय के लिए कोई कोर्ट जाएं तो वह उस राज्य के मुखिया को बदनाम करने की साज़िश है ??  


मारे गए लोगों की जान से अधिक जिसके कारण लोग मरें उसकी बदनामी को महत्वपूर्ण बनाना यह अपराधिक सोच और उनका बचाव नहीं तो और क्या है  ????? 


आप हंस नहीं देंगे !!!  जबकि लोग मरे हों, घर उजड़े हों यह एक तथ्य हो ....


यदि सरकारी आंकड़े कहते हैं कि गुजरात शिक्षा, बच्चों, स्त्रियों के मामले में कश्मीर से पिछड़ा है तो यह बदनाम करने की साज़िश नहीं सत्य है ।


यदि बच्चों  को मिड डे मील में नमक रोटी खिलाया जा रहा शिक्षा बजट के बावजूद, 

बच्चे कीचड़ भरे टूटे फूटे खंडहर में पढ़ रहे हैं तो 

खुद सरकार अपनी किरकिरी करा रही है 

यदि किसी के शासन में बलात्कार हो बच्ची की टांग काटनी पड़े, बिना पूछे जबरन दाह संस्कार कर दिया जाए तो खुद ही पूरे सरकार और उसकी व्यवस्था का सड़ा हुआ पार्ट है । जो आप कितनी ही डेटिंग पेंटिंग कर ले लोगों के सामने आ जाएगा । 


 यदि आपको बदनामी का डर है तो बदनाम करने वाले काम मत करें न कि अपेक्षा करें कि.....


 आप लोगों की जेब काटते रहें, महंगाई से लोगों का दम निकल जाए, 

आपके बुरे काम उजागर करने वालो को जेल में डालते रहें , 

बच्ची के बलात्कार पर जय श्री राम के नारे लगवाएं, 

परीक्षा सेंटर पर लड़कियों से उनके अंडर गारमेंट्स उतरवाए बिना पेपर न देने दें 

बीस लाख में मेडिकल सीट बिके

5 साल में भी ग्रेजुएट की डिग्री पूरी न हो

बाढ में जब लोगों के घर डूब गए आप टूरिज्म का आनंद उठाने वाला बेशर्मी भरा डायलग बोलें, 

आपके ढोंगी सनातनी गुर्गे भेष बदलकर विभाजन की प्रयोगशाला के तहत दंगे भड़काने की कोशिश करें ,

 अमीरों के घरों की डेकोरेटिव दीवार बनाने के लिए दिन दहाड़े खनन माफिया पूरा का पूरा पहाड़ चर जाए, 

डीएसपी को कुचल दे

पत्रकारिता में सरकार की चाटुकारिता हो और झूठे तथ्यों से देश को गुमराह किया जाए, 

नफरत से माहौल बिगाड़ने की 24*7 कोशिश हो ।  


संवेदशील घटनाओं के तथ्य छुपाएं जाएं 

और सच्ची बातों को जानबूझकर संदेह जनक बनाया जाए  । 


आप अपने ही लोगों को फर्जी किसान/मज़दूर/चौकीदार बनाते सुंदर दृश्य बनाने की कोशिश करें और किसान वास्तव में आत्महत्याएं कर रहे हों ............ 


....... पर आपकी बदनामी न हो !!!


वाह रे तुम्हारी  बदनामी का कांसेप्ट कि दोष चोर में नहीं है स्ट्रीट लाइट में है और स्ट्रीट लाईट लगवाने ने चोर को बदनाम करने की साज़िश की है ।  मतलब यह लोग आप लोगों को किस केवल का मूर्ख समझ रहे हैं सोच लीजिए !! कोई बच्चा स्कूल में अगर नालायक  है  तो स्कूल रिपोर्ट कार्ड में फेल लिख कर साजिश कर रहा है !!!


* लोगों के मरने से यदि किसी की बदनामी नहीं होती हो तो यह निर्लज्जता और क्रूरता की अथाह है । यदि कोई हत्यारे को हत्या कहे जाने पर बदनाम करने की साजिश बताए तो वह खुद हत्यारा है। 


आपको तो जिनके साथ आना चाहिए आप उल्टा न्याय की बात के पक्ष में जाने वाले उन लोगों को गिरफ्तार कर रहे हैं । दरअसल यह अच्छे लोगों और बुरे लोगों में यही फ़र्क है और क्रिमिनल मानसिकता के लोगों का गुणसूत्र भी । 


उन्हें  हत्या करने या करवाने में कोई शर्म महसूस नहीं होती पर जैसे ही कोई उनके दुष्ट चरित्र की पोल खोलने लगता है वे रिरियाने लगते हैं बदनाम करने की साज़िश हो रही है । ऐसा है तो मत करते हत्या,चोरी, डकैती,खून खराबा,अबे बुरा काम तुम कर रहे हो तो कह रहे हो तुम्हें बदनाम करने की साज़िश हो रही है । 

बेईमान को बेईमान नहीं कहा जाएगा तो क्या कहा जाएगा । किसी की कथनी और करनी में अंतर होगा तो लोग जुमला जीवी कहते हैं तो जुमला जीवी शब्द बैन करने से वो श्रम जीवी थोड़े ही बन जाएगा ।  तानाशाह के पाखंड को उसका निकम्मापन ही कहा जाएगा । यदि आपके हाथ में छुरा है तो लोग कहेंगे ही छुरा है फूल कहलवाने के लिए फूल लेना होगा । 

यदि आप चाहते हैं बदनामी न हो तो आपको तो खुद बुरे काम करना छोड़ दें न कि उपेक्षा करें कि आप कभी पकड़ में नहीं आएंगे ।  कोई देख नहीं रहा । लोग मुंह बन्द कर बैठ जाएं । आपको सोचना चाहिए आप अच्छे नागरिकों को प्रोत्साहन देना चाहते हैं या बुरे नागरिकों को । 

आप विकृति को अति के स्तर पर सोच रहे हैं कि सारे लोग विवेकहीन हो जाएं । ऐसी विकृत सोच से आपको आज या कल बाहर आना ही होगा (साभार)

गुरुवार, 7 अगस्त 2025

राहुल ने चुनाव आयोग ही नहीं सौ साल के संघी संस्कार को भी कठघरे में खड़ा कर दिया…

 राहुल ने चुनाव आयोग ही नहीं सौ साल के संघी संस्कार को भी कठघरे में खड़ा कर दिया…


राहुल गांधी जब आज चुनाव आयोग की करतूतों का सबूत पेश कर रहे थे तो पूरी दुनिया की मीडिया मौजूद थी, और यह सबूत ने सीधे तौर पर भले ही चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा किया हो लेकिन इस खेल में संघ की भूमिका से इंकार इसलिए नहीं किया जा सकता क्योंकि बीजेपी उसी की अनुवांशिक है और बीजेपी को सत्ता तक पहुँचाने में वह भी पूरी तरह शामिल रहती है, यानी सौ साल के संस्कार से ओत प्रोत बीजेपी यदि वोट चोरी का षड्यंत्र कर रही है तो क्या संघ का संस्कार है। तब इन सवालों का जवाब ही नहीं अब तो आयोग की बर्ख़ास्तगी और सुप्रीम कोर्ट को भी संज्ञान में इसे लेना चाहिए…

मोदी सरकार अवैध रूप से भारत पर शासन कर रही है। यह बात राहुल गांधी के प्रेजेंटेशन से, तमाम आंकड़ों और सबूतों के साथ साबित हो गई है। 



यह भी साबित हो गया कि पार्टी सँगठन, जमीनी काम, आरएसएस की पकड़, योजनाओं के लाभार्थी और मोदी का चुम्बकीय व्यक्तित्व वगैरह सब बेकार की बकवास है। 

असल मे चुनाव चोरी आयोग ने पूरे इलेक्टोरल सिस्टम को तोड़ मरोड़कर भाजपा के पक्ष में परिमाण निकालकर ताजपोशी करवा दी है।

और भांडा फूट जाने के डर से वोटर लिस्ट, सीसीटीवी फुटेज, फॉर्म 6, फार्म 17 का मिलान वगैरह करने से वह बुरी तरह भयभीत है। 

चुनाव चोरी आयोग, भाजपा के बजरंग दल, एबीवीपी, भाजयुमो की तरह भाजपा के एक फ्रंटल ऑर्गनाइजेशन में बदल चुका है। 

वह भारत के सम्विधान नही , भारतीय जनता पार्टी के प्रति वफादार है। इसमे शकों शुबहे की कोई गुंजाइश अब बची नही है। 

इन खुलासों के बाद, वोट चोरी से बनी सरकार भी इलेजितमेंट और अवैध हो जाती है। इसके निर्णय और नीतियां आदेश भी अवैध हैं। 

लेकिन आज राहुल गांधी ने इस तथ्य को कहने से खुद को रोका, और केवल चुनाव आयोग तक सीमित रहे। मगर यह साफ है कि एक लम्बी लड़ाई और सीधे टकराव की ओर देश बढ़ रहा है। 

इलेक्टेड गवर्मेंट होने के नाते, असहमति के बावजूद भाजपा की इस सरकार पर हम जैसो का जो भी इकबाल था, खत्म हो गया। 

अच्छा होगा, कि सिस्टम हैक कर धोखे से खुद को विजयी कराने वाली, अवैध सरकार खुद ही इस्तीफा देकर फ्रेश इलेक्शन करए। एक मिनट भी इन्हें सत्ता में रहने का अधिकार नही है।

क्योंकि…

▪️वोटर लिस्ट बनाना किसका काम है? : चुनाव आयोग

▪️डुप्लीकेट वोटर ना हों, किसका काम है? : चुनाव आयोग

▪️फर्जी पते पर बड़ी संख्या में वोटर लिस्ट ना हों, किसका काम है? : चुनाव आयोग

▪️कोई भी वोटर एक से ज़्यादा जगह वोट ना डालें, किसका काम है? : चुनाव आयोग

🔹यह सारी बातें बता कौन रहा है? : राहुल गांधी

🔹इन दस्तावेजों की जांच किसने की? : राहुल गांधी 

🔹देश के सामने सबूत के साथ सच कौन ला रहा है? : राहुल गांधी 

जो काम कायदे से चुनाव आयोग को करना चाहिए, वो राहुल गांधी कर रहे हैं - जिससे इस देश का लोकतंत्र सलामत रहे 


और चुनाव आयोग उल्टे उनसे शपथपत्र की मांग कर रहा है

ग़ज़ब धृष्टता है - जो व्यक्ति आपको सच का आईना सबूत के साथ दिखा रहा है - उसपर BJP और चुनाव आयोग हमलावर हैं! 

यही इनकी मिलीभगत का सबसे बड़ा सबूत है


चुनाव आयोग को भंग करो और बीजेपी को सत्ता से बेदखल करो!

देश में फिर से चुनाव करवाओ

प्रोफेसर जगदीप छोकर जो एसोसिएसन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म ( ADR) संस्था के संस्थापक हैं, भारत में चुनाव सम्बन्धी अनेकों रिफॉर्म का श्रेय इसी संस्था को जाता है, सुप्रीम कोर्ट में PIL दाखिल कर भारत के नागरिकों की लोकतांत्रिक अधिकारों को प्रोटेक्ट एवं पारदर्शी बनाया है।


जैसे हर उम्मीदवार द्वारा अपनी इनकम, क्रिमिनल मुकदमों, जैसे तमाम डिटेल्स बताना एवं अभी हाल में चुनावी बॉन्ड को अवैध घोषित कराना आदि शामिल है ।


कल इसी ADR के पिटीशन पर ही सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को बिहार में 65 लाख काटे गए वोटरों की डिटेल 9 तारीख तक उपलब्ध कराने को निर्देशित किया है ।


प्रोफेसर जगदीप छोकर ने आज राहुल गांधी के चुनाव सम्बन्धी प्रेस कॉन्फ्रेंस के सम्बन्ध में कहा कि, चुनाव आयोग को राहुल गांधी द्वारा लगाए गए आरोप की जांच करनी चाहिए ना कि उनसे हलफनामा मांगना चाहिए, इससे तो चुनाव आयोग का जिम्मेदारी से भागना एवं चोरी में मिली भगत ही साबित होगा।


उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव में पहले फेज के लिए हुए वोटिंग के बाद आंकड़े जारी करने में चुनाव आयोग को 11 दिन क्यों लगे ?  वो भी सिर्फ प्रतिशत बताया गया, हालांकि सुप्रीम कोर्ट में ADR ने चुनाव आयोग से मत संख्या की मांग की जिसे आज तक नहीं बताया गया।


महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव में शाम पांच बजे से ग्यारह बजे तक 75 लाख वोट अचानक कैसे बढ़ गए?


उन्होंने यह भी कहा कि पंजाब, हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा जब चुनाव आयोग से विडीओ फुटेज मांगा गया था, उसके बाद केंद्र सरकार ने संसद द्वारा नया कानून पारित करवा दिया कि विडीओ फुटेज चुनाव उपरांत सिर्फ 45 दिन तक ही सुरक्षित रखा जाएगा, आखिर क्यों...? 


और अब लास्ट बात, चुनाव आयुक्त सलेक्शन कमिटी से चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को क्यों हटा दिया गया? आखि़र किस पवित्र उद्देश्य के लिए वो बाधा बन रहे थे?


अत: निसंदेह, चुनाव के ऐसे मैनिपुलेशन से आमजनता में जन विद्रोह की चेतना पैदा हो सकती है। किन्तु संयम रखें एवं अपने अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों के तहत सत्य के साथ खड़ा हों।(साभार)


मंगलवार, 5 अगस्त 2025

अमित शाह ने भरी संसद में झूठ बोला

अमित शाह ने भरी संसद में झूठ बोला 



मानहानि के एक केस में कोर्ट के जज ने चीन मामले में जो टिप्पणी की क्या वह सत्ता की बौखलाहट है इसे कुछ ऐसे समझ ले कि…


जब  संसद में ऑपरेशन सिंदूर के बहस के दौरान अमित शाह जी ने संसद में खड़े हो कर लगातार तीन गलत बयानी किया

(ऐसा नहीं है कि इसके पहले भाजपा के सांसदों ने संसद में गलत बयानी नहीं की है बहुत बार किया है)

उस के बाद एक बात बोला जो झूठ था या सच ये पता नहीं 

खैर पहले वो तीन गलत बयानी पढ़ लेते है

1. मैं इतिहास का विद्यार्थी हूं (जबकि विकिपीडिया के हिसाब से अमित शाह जी बायो केमिस्ट्री पढ़े थे)

2. सरदार पटेल जी ने 1960 में विरोध किया (जबकि सरदार पटेल का देहांत 1950 में ही हो गया था)

3. जयशंकर home minister है (जबकि वो विदेश मंत्री है)


फिर सीज़फायर पर अमित शाह जी ने बोला कि

अपने देश के होम मिनिस्टर के बात पे यकीन नहीं है

वो एक संवैधानिक पद पे है

ट्रंप के बात पे यकीन है

फिर

राहुल गांधी जी ने उकसाया कि इंदिरा गांधी का 50% भी है तो मोदी जी संसद में बोले कि ट्रंप ने सीज़फायर नहीं कराया

अगर दम है तो आज शाम मोदी जी बोले कि ट्रंप झूठ बोल रहा है

"‘Say Donald Trump is a liar’.."


मोदी जी भावुक हो गए और सारा कूटनीति भूल गए 

और बोल दिया कि

किसी देश के किसी नेता ने सीज़फायर के लिए कुछ नहीं कहा


अगले दिन अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जी ने भारत पर 25% टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी

क्योंकि ट्रंप साहब को उनका नोबेल प्राइज छूटता दिख रहा था


*"आप क्रोनोलॉजी समझिएगा"*


और लास्ट में एक बात पे गौर कीजियेगा


ये राहुल गांधी कर क्या रहा है


विपक्ष में रह कर मोदी जी और अमित शाह जी से वो बोलवा दे रहा है जो उन्हें नहीं बोलना चाहिए था

और

विपक्ष में रह कर सरकार से वो काम करवा दे रहा है जिसको मोदी जी और अमित शाह जी ने मना कर दिया था

जैसे

जाति जनगणना


राहुल गांधी जी ने बोला था

हम सरकार को मजबूर कर देंगे जाति जनगणना के लिए


एक so called "पप्पू" क्या क्या कर रहा है

ऐसे में मानहानि के एक मामले पर भी बातें होनी चाहिए कि क्या चीन को लेकर कोर्ट ने राहुल गांधी को जो बात बोली है, असल में वो पूरे देश के लिए ये संदेश है कि इस सरकार के खिलाफ अपना मुंह बंद रखिए।


वरना कौन नहीं जानता की चीन ने हमारी ज़मीन कब्जाई है, कुछ नये मैप भी जारी हुए जहां भारत के कयी हिस्सों को चीन का हिस्सा बताया गया।


विदेशी अखबारों से लेकर सैकड़ों आर्टिकलों में भी ये खबर छपी है। स्थानीय लोगों द्वारा बताया गया कि हमारी ज़मीन पर चीन घुसा है।


राहुल गांधी ने वही बात कही है,जिसे कोर्ट गलत बता रहा है,एक बात नोट कर लीजिए, आहिस्ता आहिस्ता हमारे देश की एक एक ईंट गिराई जा रही है।


लोकतांत्रिक ढांचे को जर्जर किया जा रहा है, दुश्मन के खिलाफ मुंह खोलने वाले को चुप किया जा रहा है।


कुल मिलाकर देश को बर्बाद करने की प्रषठभूमि तैयार है, उसमें एक यही बंदा है जो आड़े आ रहा है, इसलिए ये संघियों की नजर में खटकता है।


और हां दुनियां में चीन से बढ़कर हमारा कोई दुश्मन नहीं है, दुश्मन की सरपरस्ती अब कोर्ट भी कर रहा है,वो पट्ठा तो पहले से कर ही रहा था।


हम लुट पिट चुके हैं, और इस लूट में मीडिया और सरकार के साथ अब कोर्ट भी आ गया है.. क्योंकि गौतम अडाणी को चाइना के साथ मिलकर धंधा भी करना है।


और जो धंधे के लिए देश के साथ गद्दारी करेगा, ज्यादा दिन तक आवाम अब उसे मांफ नहीं करने वाली है, सत्ता परिवर्तन के बाद इन लोगों को राहुल गांधी भी नहीं छोड़ने वाले हैं।


ये बात राहुल गांधी खुद भी बोल चुके हैं,भूल ना जाये, इसलिए मैं भी लिखे दे रहा हूं।

हमलोग उसका memes खोजने में व्यस्त है

वो विपक्ष का नेता का भूमिका बेहतरीन तरीके से निभा रहा है(साभार)

गुरुवार, 24 जुलाई 2025

फ़र्ज़ी वोटर के सहारे देश लूटने की चाल और हिटलर

 फ़र्ज़ी वोटर के सहारे देश लूटने की चाल और हिटलर… 


पिछले दिनों हेमंत मालवीय और अजीत अंजुम के साथ जो कुछ हुआ  वह साधारण घटना नहीं थी, लेकिन ये घटना हिटलर के शासन की याद को फिर से ताज़ा इसलिए कर दिया क्योंकि तब भी लोग राष्ट्रवाद की पट्टी बांधे उस अत्याचार पर ख़ामोश थे जिस तरह से आज धर्म की पट्टी बांध कर अत्याचार से मुँह मोड़े हुए है, अब तो हद हो गई कि जनता सरकार चुनने कि बजाय सरकार वोटर चुनने लगी है…

हिटलर के कुछ सच पर प्रकाश डाले उससे पहले बता दूँ कि भारत इस वक़्त बहुत बड़ी साज़िश में फंस चुका है। दो उद्योगपति और दो गुजराती नेता, इन चार लोगों ने मिलकर पूरे देश पर शिकंजा कस रखा है। हालांकि मैं यह मानता हूं कि राजनीति पब्लिक के सामने समस्या बताने से ज़्यादा, समस्या का निराकरण करना होती है।

आज राहुल जी या कांग्रेस, कितने भी बड़े कांड का खुलासा कर दें, इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। आज जरूरत है कि बीजेपी की कारस्तानियों को पकड़ने के बाद उन्हें पब्लिक करने की जगह उनसे फाइट की जाए। गोपनीयता बनाई राखी जाए, हर मोर्चे पर भाजपा को पटखनी दी जाए। भारतीय जनता सोल्यूशन और रिजल्ट ओरिएंटेड हो चुकी है।

एक वक्त था जब जनता वोट देकर सरकार चुनती थी, अब हालात ये हैं कि आज सरकार वोटर चुन रही है। राहुल गांधी जी ने संसद के बाहर कल जिस बड़े खेल के विषय में पत्रकारों को बताया वो उनकी आई टी टीम द्वारा सालभर की गई मेहनत के बाद का निष्कर्ष है।

बीते वर्षों में ईवीएम मशीन पर खूब बवाल मचा था, भाजपा विरोधी लोग कांग्रेस पर आरोप लगा रहे थे कि ये खुलकर ईवीएम के खिलाफ नहीं बोल रहे, देश में बड़ा आंदोलन नहीं कर रहे। कल राहुल जी के बयान के बाद बेहद स्पष्ट हो गया है कि तब बड़े स्तर पर विरोध क्यों न हुआ।

क्योंकि राहुल जी की टीम के हाथ कुछ पुख्ता लग चुका था। कर्नाटक में वोटरलिस्ट को पूरी तरह से डिजिटल किया गया जिसमें 6 महीने लग गए और इसके उपरांत जब इसका डेटा एनालिसिस हुआ तब बीजेपी का सारा खेल सामने आ गया। नेक्स्ट लेवल फर्जी वोटिंग का गेम।

हो सकता है कि भाजपा के इस फर्जीवाड़े ईवीएम एक फैक्टर हो, लेकिन अब यह तय है कि यह एकमात्र फैक्टर नहीं। जिस ख़तरनाक खेल का ख़ुलासा हुआ हैं वो भारतीय सोच भी नहीं सकते। महाराष्ट्र, बिहार छोड़िए, कर्नाटक चुनाव में अभी 2 साल का वक़्त है और कर्नाटक में भी फ़र्ज़ी वोटर डाले जा रहे हैं। फ़र्ज़ी वोटर से सरकारें बना कर भारत को लूटा जा रहा है।

तब राहुल के खुलासे का असर इसलिए नहीं हो रहा है क्योंकि यह बिलकुल हिटलर की रणनीति की तरह है । अमिता नीरव ने एक बार लिखा था… 1942 में फेलिक्स की उम्र इक्कीस के आसपास रही होगी। उस वक्त तक हिटलर यूथ का हिस्सा होना हर जर्मन युवा के लिए अनिवार्य था तो फेलिक्स भी उसका हिस्सा था। हिटलर उसका हीरो था। वह मानता था कि जर्मनी को फिर से उसका पुराना गौरव सिर्फ हिटलर ही दिला सकता है और हिटलर भगवान की तरह हैं। वह जर्मनों के सारे संताप मिटा देगा। 


उस वक्त यहूदियों और विरोधियों के साथ जो कुछ हिटलर कर रहा था, कंस्न्ट्रेशन कैंप्स और उन कैंप्स में जो कुछ हो रहा था, उसकी कहानियाँ बहुत छन-छनकर, बहुत ही फिल्टर होकर आना शुरू तो हो गई थी। मगर ये समझ नहीं आ रहा था इसमें कितनी सच्चाई है और कितनी गहराई है, क्योंकि इन कहानियो के स्रोत अपुष्ट थे। 


फेलिक्स को इनमें से किसी भी बात पर यकीन नहीं था। तब भी नहीं जब हिटलर ने आत्महत्या कर ली। हिटलर की आत्महत्या और उसके बाद के दो-तीन महीनों तक फेलिक्स उदास रहा और उसे एलायड फोर्सेस को लेकर गहरा गुस्सा रहा। जब अलायड फोर्सेस ने जर्मनी औऱ आसपास के कंसंट्रेशन कैंप्स की सच्चाई बयान करना शुरू किया तो फेलिक्स को ये हिटलर के खिलाफ दुष्प्रचार लगा। 


बाद में अमेरिकी सेनाओ ने जर्मन नागरिको को जबरन म्यूनिख के पास 1933 में बनाए गए पहले कंसंट्रेशन कैंप डाखाऊ और वीमर शहर के आसपास बसाए गए और कई दूसरे नाज़ी कैंप्स ले जाया गया, ताकि जर्मन नागरिक यह देख सके कि वे इतने वक्त से जिस हिटलर को भगवान मान कर पूज रहे थे, उसने असल में क्या किया?


उन नागरिकों में फेलिक्स भी एक था। जब वह डाखाऊ पहुँचा औऱ वहाँ के हालात देखे तो वह बुरी तरह से डिस्टर्ब हो गया। कई साल उसकी थैरेपी चली औऱ अंत में उसने आत्महत्या कर ली। 

***

यूँ हर तरह की सत्ताएँ अपने विरोधियों को कुचलती रही हैं। इससे कोई पार्टी, कोई विचारधारा नहीं बची है। मगर पिछले कुछ सालों से हमारे यहाँ ये प्रवृत्ति इतनी तेजी से बढ़ रही है कि यदि कोई आलोचना न करे, लेकिन विपक्षी की तारीफ भी कर दे तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।


मामला सिर्फ राजनीतिक होता तब भी दिक्कत तो थी, मगर दिक्कत तब और बढ़ जाती है, जब वे दमन की प्रवृत्ति धार्मिक और सांस्कृतिक मामलों पर भी होने लगे। सोशल मीडिया ट्रोलिंग, धमकियाँ, बहिष्कार आदि-आदि से अब हम बहुत आगे आ गए हैं। 


पिछले दिनों हेमंत मालवीय और अजित अंजुमजी के खिलाफ जो कुछ हुआ, वह ताजा उदाहरण हैं। इससे पहले से भी यह होता ही आ रहा है। हर आलोचनात्मक आवाज, हर असहमति, हर प्रश्न को जैसे सत्ता कुचलने को आतुर है। 


इतना विराट जनसमर्थन और इतने नंबर्स, एक प्रशिक्षित ट्रोल आर्मी, प्रोफेशनल आईटी सेल, जमीन पर सन्नद्ध मदर ऑर्गेनाइजेशन के प्रतिबद्ध कार्यकर्ता, चौबीस घंटे चलने वाले मीडिया चैनल्स, अखबार... स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटीज के शिक्षक, पत्रकार, फिल्मकार, साहित्यकार, कलाकार और बुद्धिजीवी, व्हाट्सएप ग्रुप्स, रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी औऱ गृहस्थ महिलाएँ... सब मिलकर भी सरकार की असुरक्षा दूर नहीं कर पा रही है। ये बात बहुत चौंकाती हैं।


पिछले कुछ वक्त से फासिज्म, हिटलर और उसके वक्त के जर्मनी को समझने की कोशिश कर रही हूँ। समझा कि टोटेलिटेरियन स्टेट असल में हर तरह के हथकंडों से अपनी सत्ता को बनाए रखने औऱ लगातार ताकत बढ़ाते चले जाने के लक्ष्य पर काम करती है। 

***

हिटलर ने पहला कंसंट्रेशन कैंप 1933 में डाखाऊ में बनाया था और प्रारंभिक तौर पर उसमें विरोधियों और आलोचकों को ही रखा गया था। असल में ताकत की भूख और असुरक्षा का बहुत गहरा संबंध होता है। जब सत्ता दावों की खोखली नींव पर खड़ी होती है, तब असुरक्षा गहरी होती है। 


जानकार कहते हैं कि हिटलर ने जर्मन नागरिकों को विरोधियों और यहूदियों के खिलाफ मोबलाइज करने की कोशिश की थी। मगर उसमें उसे सफलता नहीं मिली। जर्मनी में सत्ता संभालते ही गोएबल्स को प्रपोगंडा मंत्री बनाया गया। 


फिर सिलसिला शुरू हुआ कल्चरल डोमिनेंस का... राजनीति को नाटक का रूप दिया गया। जोशीले भाषण, समर्थन और दुष्प्रचार के लिए फिल्में जैसे 1935 में बनाई गई ट्रायम्फ ऑफ द विल, मीन कॉम्फ पर आधारित फिल्में और नाटक... कलाकारों औऱ बुद्धिजीवियों को हिटलर के समर्थन में लाने और काम करने के लिए दबाव औऱ प्रलोभन।


इसके लिए जर्मनी के प्रचार मंत्रालय ने नाजी शासन के लिए जरूरी माने जाने वाले कलाकारों औऱ बुद्धिजीवियों की सूची बनाई जिसे ‘गोटबेग्नाडेटेन-लिस्टे’ (ईश्वर के आशीर्वाद की सूची) कहा गया। रीच के प्रचार मंत्रालय से युद्ध से छूट के लिए जो आधिकारिक पत्र मिला, उसमें 1,041 कलाकारों और बुद्धिजीवियों के नाम थे। 


इसमें से ललित कला, साहित्य, संगीत, रंगमंच और वास्तुकाला के क्षेत्र की 378 हस्तियाँ गोटबेग्नाडेटन लिस्टे में शामिल थी। मतलब तमाम उपायों से नाजी नीतियों औऱ हिटलर के समर्थन में दुष्प्रचार किया गया। उसका असर हुआ और इस असर का उदाहरण था, फैलिक्स... सिर्फ अकेला फैलिक्स नहीं, कई लोग उस दुष्प्रचार का शिकार हुए। 


ये बात नागरिकों के लिए है, वे तमाम बुद्धिजीवी, पढ़े-लिखे प्रोफेशनल्स के लिए नहीं जो प्रत्यक्ष रूप से हिटलर की नीतियों के लिए काम करते रहे थे। उनके गुनाह तो क्षम्य ही नहीं थे। कुल मिलाकर एक ‘नाजी ईश्वर’ ने देश और दुनिया में तबाही मचा दी। ये कैसे हो पाया? 


उस दुष्प्रचार से जो कई सालों तक अलग-अलग माध्यमों से चलता रहा। 

***

राजनीति को थियेटर का रूप देना असल में हर उस सत्ता के लिए जरूरी होता है, जिसने ताकत  तो लोकतांत्रिक तरीके से पाई हो, मगर उसे बनाए रखने के लिए तमाम अलोकतांत्रिक, असंवैधानिक तरीके इस्तेमाल करने पड़ रहे हैं। 


पिछले कुछ सालों के हमारे सांस्कृतिक परिदृश्य पर नजर डालें, हमारी फिल्में, गाने, साहित्य, बुद्धइजीवी, कलाकार, लेखक, पत्रकार... और हिटलर के जर्मनी को जानें। चकित होना बहुत मामूली शब्द लगेगा।(साभार)

शनिवार, 7 जून 2025

सबूत के साथ राहुल ने उठाये चुनाव पर सवाल

 सबूत के साथ राहुल ने चुनाव पर उठाये सवाल…


देश के नामचीन अखबारों में आज राहुल गांधी के छपे लेख से मोदी सत्ता को कितना फ़र्क़ पड़ेगा कहना मुश्किल है लेकिन जिन चुनावी व्यवस्था को लेकर राहुल ने सबूत के साथ बेईमानी को सामने रखा है क्या जनमानस पर इसका असर 

राहुल गांधी ने लिखा यह पांच प्रमुख तरीके हैं जिनसे चुनाव प्रभावित किया जा रहे हैं! पहले उन्होंने लिखा चुनाव आयोग की नियुक्ति को लेकर सरकार ने जो कुछ भी कदम उठाए हैं वह पारदर्शी नहीं है 

आप खुद सोचे cji ,प्रधानमंत्री और वि पक्ष का नेता चुनाव आयोग के अधिकारी तय करता था मुख्य चुनाव आयोग के अधिकारी को तय करने के लिए इन तीन सदस्यों की कमेटी थी जो बहुमत से किसी को भी चुनाव आयोग का अध्यक्ष  बनाती थी!

लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने संसद में प्रस्ताव पास कर कर अपने बहुमत की ताकत से इस पूरी प्रक्रिया को विवादास्पद बना दिया है उन्होंने आगे लिखा अब मुख्य चुनाव अधिकारी बनने के लिए cji को हटाकर केंद्रीय मंत्रिमंडल के मंत्री को शामिल कर लिया गया है ऐसे में आप खुद सोच सकते हैं एक निष्पक्ष आदमी को हटाकर एक पूर्वाग्रह वाले आदमी को यदि नियुक्ति के लिए आगे करते हैं तो इसका सीधा मतलब है आपका मन साफ नहीं है! 

जब दो व्यक्ति एक साथ मिलकर किसी अपने व्यक्ति को या किसी ऐसे व्यक्ति को जिस पर देश का विश्वास नहीं है चुनाव अधिकारी बनना चाहेंगे तो विपक्ष का नेता और उसके विरोध के बावजूद कोई फर्क नहीं पड़ेगा! 

सब इसलिए किया गया ताकि चुनाव आयोग पर अप्रत्यक्ष रूप से सरकार का नियंत्रण रह सके ताकि वह अपने हिसाब से चुनाव को मैनेज कर 

राहुल गांधी फिर फर्जी वोटो का जिक्र करते हैं उनका कहना है की चुनाव आयोग को अपने हिसाब से मैनेज करने के बाद सरकार चुनाव जीतने के लिए फर्जी वोटो का उपयोग करती है! 

 महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में 76 लाख वोट बढ़ाए गए और उन चुनाव क्षेत्र को टारगेट किया गया जहां लोकसभा चुनाव में वह हारी वो!

उन्होंने इस बात के साक्ष्यप दिए की एक ही वाटर नंबर से अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नाम से वाटर दर्ज हैं जिनका उपयोग फर्जी वोटो के लिए किया जाता है! 

राहुल गांधी लिखते हैं फर्जी वोटरों के लिए कुछ बूथ भाजपा द्वारा निश्चित कर लिएजाते हैं, उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र में 100000 वाटर केंद्र है लेकिन इसमें से सिर्फ 12000 बूथ का चयन किया गया जहां फर्जी वोटिंग करवाई गई!

ऐसे मतदान केदो पर औसतन 600 वोट फर्जी डालें अब आप सोच सकते हैं 5:00 बजे बाद यह 600 वोट डाले जाएं तो 10 घंटे का समय लगता है प्रति वाटर समय के हिसाब से क्या किसी बूथ पर भी 10 घंटे लाइन रही है! 

एक और आश्चर्यजनक बात यह थी बड़े हुए फर्जी वोटरों में नई उम्र के वोटर नहीं थे ज्यादातर उम्र दराज वॉटर थे जो चुनाव आयोग के इस दावे को भी गलत साबित करता है कि यह नए वोटरों में उत्साह की वजह से हुआ है!

नांदेड लोकसभा क्षेत्र इसका एक बेहतरीन उदाहरण है जहां पार्लियामेंट के चुनाव में यूपीए का उम्मीदवार जीत जाता है और वही सारी विधानसभा सीटों पर भाजपा का गठबंधन और वोटो का मार्जिन विधानसभा में इतना ही रहता है जीतने वोट बढ़ाए गए थे!

 भारतीय लोकतंत्र में यह बेहद चौंकाने वाला उदाहरण है एक ही मतदाता पर्ची लेकर बूथ में वोट डालने गया और अलग-अलग पार्टियों को वोट डाला और आश्चर्य तो इस बात का था कि उसने स्टेट में देवेंद्र फडणवीस को केंद्र में मोदी जी से ज्यादा प्राथमिकता दी! सवाल था क्या यह संभव है?

इसी तरह कामठी विधानसभा का उदाहरण भी दिया गया जहां लोकसभा में कांग्रेस को 136000 वोट मिले थे और भाजपा नीत गठबंधन को 119000 विधानसभा में यहां 50000के  लगभग वोट बढ़ाए गए और जब परिणाम आया विधानसभा का तो कांग्रेस को वोट मिले 134 000 जो पिछले लोकसभा के ही आसपास थे लेकिन भारतीय जनता पार्टी के वोट बढ़ाकर 175000 हो गए जिसमें 50000 वोटो का बहुत योगदान था!

राहुल गांधी ने यह भी आरोप लगाया के चुनाव आयोग द्वारा चुनाव के बाद जानबूझकर बढ़ा हुआ मत प्रतिशत बताया जाता है, 5:00  बजे के बाद जिन बूथों पर 

भारी मात्रा में मतदान प्रतिशत बताया जाता है यह सब मैनेज किया हुआ होता है! 

राहुल गांधी ने मिसमैच को लेकर भी सवाल उठाए राहुल गांधी का कहना था जब वोटिंग मशीन  इतनी परफेक्ट है तो जीतने वोट डाले जाते हैं उससे ज्यादा क्यों गिनती है या कम क्यों 

राहुल गांधी ने चुनाव चोरी करने के लिए चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाते हुए यह भी कहा चुनाव आयोग द्वारा जवाब नहीं दिया जाता और जो तथ्य पूछे जाते हैं उनको तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाता है! 

उल्लेखनीय है की वोटिंग लिस्ट के सवाल पर कांग्रेस के तमामतर सवाल जो किए गए थे 

चुनाव आयोग ने  अभी तक उनका तथ्यात्मक जवाब नहीं दिया है! कुछ मामलों में तो उन्होंने यह कह कर भी पल्ला झाड़ लिया है कि हमारे पास इसका रिकॉर्ड नहीं है! 

अपनी शिकायत और सवालों का जवाब न देकर भारतीय लोकतंत्र की जो पारदर्शी पहचान थी उसको भी भारतीय चुनाव आयोग द्वारा खंडित किया जा रहा है! 

राहुल गांधी ने यह भी कहा चुनाव आयोग द्वारा सबूत को नष्ट किया जाता है ताकि उसे साबित नहीं किया जा सके! 

क्या आवश्यकता थी वोटिंग मशीनों से डाटा इरेज़ करने की, दिन भर वोटिंग मशीनों में काम आने वाली बैटरी है आखिर क्यों कई दिन बाद भी 100% पाई जाती है जब वोट गिने जाते हैं!

चुनाव आयोग ने हरियाणा के महाराष्ट्र के यहां तक की लोकसभा चुनाव के भी डाटा इरेज़ कर दिए हैं मशीनों से डाटा हटा दिए गए हैं! 

सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों के बावजूद भी जब हजारों रुपए जमा कराकर ईवीएम मशीन को री  चेक करने की बात की गई तो चुनाव आयोग ने जिन हुए दाताओं को नहीं बताया बल्कि मार्क ड्रिल कर कर मशीन की सत्यता स्थापित करने की कोशिश की जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है! हिंदी अंग्रेजी दोनों में छपे इस लेख में राहुल गांधी ने इन पांच बातों से किस तरह चुनाव चोरी किया जाता है इसके बारे में विस्तार से लेख में अपनी बात रखी है !

महाराष्ट्र चुनाव के बाद जन विचार संवाद के पटल पर लगातार क्रमशः धारावाहिक के रूप में मैंने इन चुनाव चोरी पर फीचर लिखे थे और चुनाव व्यवस्थाओं पर सवाल उठाए थे आज राहुल गांधी जी ने भी इस व्यवस्था को नंगा करने का प्रयास किया है और देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए शायद चुनाव की पारदर्शिता बेहद जरूरी है!

आखिर भारतीय जनता पार्टी और उसके समर्थक पारदर्शी चुनाव व्यवस्था के इ तने खिलाफ क्यों हैं?पारदर्शी चुनाव की बात करते ही वह सबूत की बात करते हैं अरे सबूत तो चुनाव आयोग नष्ट कर रहा है कहां से  लाएंगे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशो का उल्लंघन हो रहा है सरकार, मुक्त दर्शक बनी हुई है और कानून के हाथ बांध दिए गए हैं क्या यह सब अपने आप में प्रमाण नहीं दाल में कुछ काला है? (साभार)


मंगलवार, 27 मई 2025

संघ ने कराये बम धमाके…

 संघ ने कराये बम धमाके…


वैसे तो संघ को लेकर कितने ही सवाल है, सदस्यता, रजिस्ट्रेशन न होना, नफ़रत फैलाना, लेकिन संघ के प्रचारक रहे व्यक्ति यदि न्यायालय में शपथ पत्र के साथ बम की बात कहता है तो क्या उसकी सच्चाई सामने नहीं आना चाहिए। क्या है पूरा मामला…

2022 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के पूर्व प्रचारक यशवंत शिंदे ने एक हलफनामे और सार्वजनिक साक्षात्कारों के माध्यम से ऐसे गंभीर आरोप लगाए, जिनसे राजनीतिक और सामाजिक हलकों में हलचल मच गई। उन्होंने आरोप लगाया कि 2003 से 2008 के बीच महाराष्ट्र के कई हिस्सों में हुए बम धमाकों के पीछे संघ परिवार के वरिष्ठ नेताओं की साजिश थी, जिसका उद्देश्य मुस्लिम समुदाय को बदनाम करना और समाज में ध्रुवीकरण के ज़रिए भाजपा को राजनीतिक लाभ पहुंचाना था।

नांदेड की एक अदालत में शपथपत्र दाखिल करते हुए शिंदे ने बताया कि उन्हें और कुछ अन्य लोगों को आधुनिक हथियारों और बम बनाने की ट्रेनिंग दी गई थी। यह प्रशिक्षण कुछ मौजूदा और सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों तथा खुफिया एजेंसी के सदस्यों द्वारा दिया गया। उन्होंने कहा कि इन धमाकों को इस तरह अंजाम देने की योजना थी कि उनका दोष मुसलमानों पर डाला जा सके।

शिंदे ने अपने हलफनामे में विशेष रूप से महाराष्ट्र के जालना, परभणी, पूर्णा और नांदेड में हुए बम धमाकों का जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि इन घटनाओं में संघ परिवार के सदस्य शामिल थे, और वर्तमान RSS प्रमुख मोहन भागवत सहित कई वरिष्ठ नेताओं को इस साजिश की जानकारी थी या उन्होंने चेतावनियों को नजरअंदाज किया। शिंदे के अनुसार, उन्होंने कई बार RSS, विश्व हिंदू परिषद और भाजपा के शीर्ष नेताओं को इन घटनाओं के बारे में सूचित करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला।

शिंदे के आरोपों को कुछ हद तक जांच एजेंसियों की रिपोर्टों और अदालत में दिए गए बयानों का समर्थन प्राप्त है। उदाहरण के लिए, 2006 के नांदेड धमाके में बजरंग दल के दो कार्यकर्ता बम बनाते समय मारे गए थे, और घटनास्थल से मुस्लिमों का भेष बनाकर हमले को उनके सिर मढ़ने की योजना के साक्ष्य मिले थे। इसी तरह, मालेगांव और अजमेर धमाकों की जांच में भी दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों की संलिप्तता सामने आई, और स्वामी असीमानंद जैसे आरोपियों ने अपने बयानों में माना कि इन हमलों के पीछे कुछ वरिष्ठ संघ नेता भी थे।

हालांकि, यह ध्यान देना आवश्यक है कि यशवंत शिंदे के दावे अभी तक न्यायिक रूप से पूरी तरह से सत्यापित नहीं हुए हैं। नांदेड मामले में उन्हें गवाह के रूप में शामिल करने की उनकी याचिका अदालत ने समय बीत जाने और प्रक्रियात्मक आधारों पर खारिज कर दी। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) पर यह आरोप लगे हैं कि उन्होंने इन मामलों की जांच पूरी गंभीरता से नहीं की।

कुछ मामलों में NIA ने दक्षिणपंथी संगठनों की भूमिका को जांच में शामिल किया, लेकिन शिंदे द्वारा उठाए गए सभी बिंदुओं की पुष्टि एजेंसी की रिपोर्टों में सार्वजनिक रूप से नहीं हुई है।

यशवंत शिंदे का हलफनामा और उनके सार्वजनिक बयान एक ऐसे व्यक्ति का दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं, जो स्वयं संघ का हिस्सा रह चुका है और जिसने कथित साजिशों का प्रत्यक्ष अनुभव किया है। उनके आरोप उन चुनौतियों की ओर इशारा करते हैं, जो भारत में धार्मिक सहिष्णुता, न्यायिक पारदर्शिता और लोकतांत्रिक जवाबदेही के सामने खड़ी हैं।

उमेश नारायण सक्सेना के वॉल से…

चाचा नेहरू से लोकदेव तक…

 चाचा नेहरू से लोकदेव तक…

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की कितनी ही यादें हैं, बच्चे उन्हें चाचा नेहरू कहते थे तो राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने उन्हें लोकदेव कहा । आज़ादी की लड़ाई में नौ साल तक जेल में रहे पंडित नेहरू को लेकर  भले ही समूची बीजेपी अपने राजनैतिक ध्येय के लिए विषवमन करती हो  पर सच नहीं बदलने वाला। कुछ यादें…


मुल्क बरसों की गुलामी से आजाद हो गया था.

नेहरू,सरदार पटेल और मौलाना आजाद के बंगले नज़दीक ही थे. उनकी ये रिवायत सी हो चली थी कि लगभग रोज़ाना शाम नेहरू, पटेल के घर खुद ड्राइव करके जाते और फिर दोनों मौलाना के घर पहुंचते. तीनों साथ बैठ के चाय पीते.

पटेल कोई काम पड़ने पर खुद नेहरू के घर जाते,बजाय फोन या फाइल भेजने के. नेहरू कहते  ऐसा क्यों करते हो. किसी को भेज दिया करो, पटेल मुस्कुराते हुए कहते कल से फोन करूंगा या किसी को भेजूंगा।

नेहरू कहते तुम और तुम्हारा कल....

दोनों हंस पड़ते. नेहरू और पटेल का आपसी प्यार अलग ही दर्जे का था। 

पटेल और नेहरू दोनों ही मौलाना का बहुत सम्मान करते थे. नेहरू हमेशा ही मौलाना को स्वयं फोन मिलाते थे। अगर मिलने की जरुरत हो, तो खुद उनके घर जाते थे. 

एक रोज़,किसी अहम मसले पर नेहरू जी को मौलाना से बात करनी थी। नेहरू ने पास खड़े सेक्रेटरी से कहा "मौलाना से बात कराओ"

फोन मिलाया गया.

"सर श्रीमान पीएम आपसे बात करेंगे"

नेहरू ने जैसे ही हैलो कहा, उधर से आवाज आई

" पंडित ,तुम्हारी उंगलियां दुख रहीं है क्या खुद फोन मिलाते हुए"

नेहरू हड़बड़ाते हुए शर्मिंदगी से बोले

"मौलाना साहब, माफ़ी , अगली बार ऐसी गुस्ताखी नही होगी". मौलाना ने कहा, ठीक है, कोई नहीं, अब बताएं, क्या हुआ.

उस शाम तीनों इस वाकए को याद कर खूब हंसे।

सियासत कभी ऐसी भी थी 

वो दौर शालीनता,सभ्यता का था

वो दौर नेहरू का था.........

एक और यादें…

पाकिस्तान के एक डिप्लोमेट थे हुसैन हक्कानी, 

  एक बार उन्होंने कहा था कि नेहरू 1949 में अमेरिका गए ,राष्ट्रपति   Trueman  से मिले। राष्ट्रपति ने पूछा बोलो अमेरिका भारत के लिए क्या कर सकता है ? नेहरू बोले हमें भारत को आधुनिक बनाना है। खेती को आधुनिक करना है। हमें भारत में भी मेस्चचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलॉजी जैसे संस्थान बनाने है। अमेरिकन राष्ट्रपति ने मदद का वादा किया था ।

कुछ दिनो बाद पाकिस्तान के प्रधान मंत्री लियाकत अली को अमेरिकन दौरे की दावत मिली। अमेरिकन राष्ट्रपति ने लियाकत  से पूछा -बोलो क्या मदद कर सकता हूं ? लियाकत ने जेब से एक लिस्ट निकाली और बताने लगे हमे असलाह ,गोल बारूद ,हथियार और सैनिक उपकरण दे दीजिये । अमेरिका ने दोनों देशो को उनकी मांग के मुताबिक मदद का वादा किया।

इससे समझ आता है  कि दोनो प्रधान मंत्रियो की प्राथमिकता क्या थी ?


एक युवा राष्ट्र के नेता होने के नाते वैसे भी नेहरू को ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों द्वारा छोड़ी गई समस्याओं का एक बड़ा हिस्सा विरासत में मिला था जबकि 1943 के बंगाल के अकाल ने देश के अन्न भंडारों को खाली कर दिया था।


द्वितीय विश्व युद्ध का वो दौर जबकि कोई भी क्षण ऐसा नहीं था कि जब परमाणु युद्ध की आशंका न बन रही हो, ऐसे समय में दुनिया को एक ऐसे मध्यस्थ या शांति दूत की जरूरत थी जो पूरे विश्व में एक कद्दावर वैश्विक नेता के रूप में पहचाना जाता हो और पूरब और पश्चिम की महान ताकतों की सनक या मनमानी को भी शांति और सहमति में परिवर्तित करवा सकता हो।

अन्यथा उसने अचानक ही जो विनाश की ताकत हासिल कर ली थी उसमें कोई भी किसी भी समय दुनिया को मानव जाति के अंतिम युद्ध में डुबो सकता था ।

 हमारा सौभाग्य था कि ऐसे समय में हमारे पास जवाहर थे, जी हां नेहरू में वह प्रतिभा, साहस और  बुद्धिमत्ता थी जो कि इस भूमिका को बखूबी निभा सकते थे।

यह साहस बस नेहरू ही कर सकते थे कि वह अमेरिका के राष्ट्रपति और फिदेल कास्त्रो दोनों से एक ही समय में दोस्ती निभा सकते थे। हालांकि ये बात संदिग्ध है पर वो नेहरु ही हो सकते थे जो कि अंतरराष्ट्रीय हितों की इतनी समझ रखते थे कि सुरक्षा परिषद की स्थाई सीट खुद न लेकर चीन को दिलवा सकते थे।

अगर जॉन एफ कैनेडी सभी प्रोटोकॉल तोड़कर नेहरु को रिसीव करने विमान के अंदर पहुंच जाते थे या निकिता खुश्चेव तिब्बत से दलाई-लामा को खदेड़ने के लिए चीन को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराकर नेहरु से गलबहियां कर लेते थे तो आखिर उस नेहरु में ऐसा क्या था ?

कि मुसोलिनी जैसा तानाशाह जो कि रवींद्र नाथ टैगोर और गांधी से मिलकर अपना सीना चौड़ा करता था लेकिन नेहरु उससे मिलने के आमंत्रण को भी ठुकरा सकते थे ।


सैकड़ो साल की गुलामी के बाद इस देश को जिस अवस्था में नेहरू ने पाया था अगले 17 सालों में उन्होंने इसे दुनिया के प्रमुख देशों की बराबरी में खड़ा कर दिया।


व्यापक परमाणु परीक्षण संधि जिसे सीटीबीटी ( Comprehensive Nuclear test Ban Treaty)कहते हैं उस पर आज भले ही भारत हस्ताक्षर न कर रहा हो पर उदारमना नेहरु ने इसकी जरूरत सन 1963 में ही समझ ली थी। नेहरु ने विश्व के समक्ष सीमित परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि एलटीबीटी का प्रस्ताव रखा था।जिसके अंतर्गत विश्व में परमाणु परीक्षण वायुमंडल, बाहरी अंतरिक्ष और पानी के नीचे करने के लिए प्रतिबंध लगा दिए गए।

  लेकिन उनके बाद आजतक कोई और नहीं हुआ जो कि भूमिगत परीक्षणों पर प्रतिबंध लगा सके।


जिस समय दुनिया दो प्रमुख शक्तियों के गुट में बंट रही थी जिसमें एक गुट सोवियत समर्थक समाजवादी  था और दूसरा गुट पूंजीवादी देशों का समूह अमेरिका समर्थक । जिसमें नाटो के कई देश भी थे उस समय जवाहरलाल नेहरू ने  दुनिया के कुछ प्रमुख देशों को लेकर जिसमें प्रमुख यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति जोसिप ब्रोज टीटो थी और मिस्र  के राष्ट्रपति गमाल अब्दुल नासिर घाना के राष्ट्रपति क्वामे नक्रूमा और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो गुटनिरपेक्ष आंदोलन की शुरुआत की ।

 

गुटनिरपेक्ष आंदोलन ( NAM) The Non_Aligned Movement

 राष्ट्रों की एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय संस्था थी जिसके अनुसार वे दुनिया में किसी भी पावर ब्लॉक के साथ या विरोध में नहीं रहेंगे इसआंदोलन की स्थापना अप्रैल 1961 में हुई और 2012 तक इसमें दुनिया के 120 सदस्य देश थे ।

   इस संगठन का उद्देश्य गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों के राष्ट्रीय स्वतंत्रता,सार्वभौमिकता ,क्षेत्रीय एकता और सुरक्षा में उनके साम्राज्यवाद औपनिवेशिक वाद, जातिवाद, रंग भेद और विदेशी आक्रमण या  अधिकरण हस्तक्षेप आदि के मामलों के विरुद्ध उनके युद्ध के दौरान सुनिश्चित करना है। आज  यह संगठन संयुक्त राष्ट्र के कुल सदस्य देशों की संख्या का दो तिहाई और विश्व की लगभग 55% जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है।


तो अब अगली बार यदि कोई आपसे पूछता है कि गांधी ने नेहरू को प्रधानमन्त्री क्यों चुना ?

  तो आप बस इतना कह सकते हैं कि किसी देश के प्रधानमंत्री को न सिर्फ घरेलू मुद्दे बल्कि इससे अधिक अंतराष्ट्रीय मुद्दों की समझ होनी चाहिए। ये बात गांधी जी  खूब समझते थे। और देश के शुरुआती तीन आम चुनावों में नेहरु की जीत भी ये बताती है कि वे जनता के बीच कितने लोकप्रिय थे।

रविवार, 15 सितंबर 2024

दादा की शहादत पर भारी पोते की गाली...

 दादा की शहादत पर भारी पोते की गाली...


पता नहीं भाजपा  में जाते ही कोई देशद्रोही का तमगा बाँटने लगता है तो कोई हिन्दुत्व का। लेकिन इस दौर में यही  सब हो रहा है, दुनिया देख रही है कि भारत की राजनीति में हिन्दू वोटरों के ध्रुवीकरण का  कैसा विभत्स खेल चल रहा है।

परेशानी यह नहीं है कि देश की तरक्की किस विचारधारा से होगी। परेशानी तो यह है कि मोदी सत्त्रा की आलोचना आख़िर  उनकी पार्टी को बर्दाश्त क्यों नहीं है, क्या मंहगाई, बेरोजगारी, नफरत, लूट, दरकती सड्‌के, टपकती छत, महँगी  शिक्षा पर बात नहीं होनी चाहिए।


नॉन बायोलोजिकल क्रियेचर पर स्पेस टेक्नालाजी पर बहस क्या सत्ता  का ही अधिकार है।


ऐसे में रवनीत सिंह बिट्‌टू का राहुल गांधी को देश का नम्बर वन आंतकी घोषित करने के क्या मायने है। जिस परिवार से रवनीत सिंह बिट्‌टू आते  है क्या वे सभी आतंकी थे? उनके दादा बेअंत सिंह ने तो कांग्रेस से मुख्यमंत्री रहते शहादत दी थी। तब क्या वे भूल गये हैं कि राहुल या कांग्रेस को आतंकी  कहने का मतलब क्या है?

खबर के मुताबिक़ केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता रवनीत सिंह बिट्टू ने कांग्रेस लीडर राहुल गांधी को आतंकवादी बताया है। नेता प्रतिपक्ष पर निशाना साधते हुए बिट्टू ने कहा, ‘राहुल गांधी ने सिखों को बांटने का प्रयास किया है। सिख किसी पार्टी से जुड़ा हुआ नहीं है, मगर चिंगारी लगाने की कोशिश हो रही है। राहुल गांधी देश के नंबर वन टेररिस्ट हैं।’ भाजपा नेता ने कहा कि वे लोग जो हर वक्त मारने की बात करते हैं, जहाजों-ट्रेनों को उड़ाने की बात करते हैं... वे राहुल गांधी के समर्थन में आ गए हैं। ऐसे में आप अंदाजा लगा लीजिए। मेरे ख्याल से अगर किसी को पकड़ने के लिए इनाम होना चाहिए तो वो राहुल गांधी हैं। उन्होंने राहुल गांधी को देश का सबसे बड़ा दुश्मन भी बताया।

रवनीत सिंह बिट्टू ने कहा, 'राहुल गांधी भारतीय नहीं हैं, उन्होंने अपना ज्यादातर समय बाहर बिताया है। उन्हें अपने देश से ज्यादा प्यार नहीं है, क्योंकि वह विदेश जाकर हर बात को गलत तरीके से कहते हैं। जो लोग मोस्ट वांटेड हैं, अलगाववादी हैं, बम, बंदूक और गोले बनाने में माहिर हैं, उन्होंने राहुल गांधी के बयानों की सराहना की है।' मंत्री ने कहा कि कांग्रेस केवल इधर-उधर की बातें करती है। जबकि राहुल गांधी पहली बार संसद में विपक्ष के नेता बने हैं। वे कभी सिख की असुरक्षा की बात करते हैं तो कभी समाज के बिखराव की बात करते हैं। उनका ऐसा व्यवहार माफ करने लायक नहीं है।

रवनीत सिंह बिट्टू ने कहा कि राहुल गांधी में गंभीरता नहीं है। राहुल गांधी हो या उनके पार्टी के अन्य नेता, सभी देश को तोड़ने में लगे हुए हैं। कांग्रेस को देश की सुरक्षा और करोड़ों जनता के हितों की चिंता बिल्कुल नहीं है। सिर्फ वोट के लिए कांग्रेस समाज में अशांति फैलाने में लगी हुई है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को मैंने काफी नजदीक से देखा है, परखा है। कांग्रेस के टिकट पर तीन बार सांसद रहा हूं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता और भाजपा के मूल मंत्रों से प्रभावित होकर भाजपा की सदस्यता ली। पीएम मोदी के नेतृत्व वाले केंद्र सरकार में शामिल होकर रेल के क्षेत्र में देशवासियों की सेवा कर रहा हूं। 

राहुल गांधी ने वाशिंगटन डीसी में भारतीय अमेरिकियों की सभा को बीते सोमवार को संबोधित किया था। इस दौरा उन्होंने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कुछ धर्मों, भाषाओं और समुदायों को अन्य की तुलना में कमतर मानता है। उन्होंने कहा था कि भारत में राजनीति के लिए नहीं, बल्कि इसी बात की लड़ाई लड़ी जा रही है। कांग्रेस नेता ने कहा था, ‘लड़ाई इस बात की है कि क्या एक सिख को भारत में पगड़ी या कड़ा पहनने का अधिकार है या नहीं। या एक सिख के रूप में वह गुरुद्वारे जा सकते हैं या नहीं। लड़ाई इसी बात के लिए है और यह सिर्फ उनके लिए ही नहीं, बल्कि सभी धर्मों के लिए है।’ 

सोमवार, 5 अगस्त 2024

बंग्लादेश से भारत कितना अलग ?

 बंग्लादेश से भारत कितना अलग ? 

तुही के, हमी के-रजाकार रजाकार !


सवाल यह नहीं है कि बंग्लादेश के प्रधानमंत्री शेख हसीना का अब क्या होगा?

सवाल तो यह है कि लोक‌प्रियता की शिखर में बैठी शेख हसीना कैसे चूक गई और क्या इसका भारत के राज काज में कोई समानता है । हालांकि यह सवाल तो तब भी उठे थे जब श्रीलंका में भी आन्दोलन हुआ था।

लेकिन बांग्लादेश में यह स्थिति क्यों बनी इस सवाल का यदि एक लाईन में जवाब ढूँढा जाए तो सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि लोकप्रियता की शिखर में पहुंच कर शेख हसीना ने विरोध के स्वर को कुचलने के लिए जिस भाषा का इस्तेमाल किया, जिस तरह से विरोधियों को विदेशी एजेंट, देशद्रोही ओर गद्‌दार खुले आम कहने लगी उसका परिणाम सबके सामने है।

लोकप्रियता के शिखर में पहुंचने वाली शेख़ हसीना के पिता बंगबंधु मुजीबुर्ररहमान की बेटी है जिन्होंने पाकिस्तान से बंग्लादेश को आजाद कराया था और लोकतंत्र की हिमायती व नरम तेवर की मानी जाती रही है लेकिन लोकप्रियता की शिखर में पहुंचने के बाद उन्होंने विरोधियों को जिस तरह से ठेंगे पर रखा, उन्हें विदेशी एजेंट बताकर जेल में डाला,यह परिणाम उसी का है कहा जाय तो गलत नहीं होगा।

हर युद्ध के कई कारण होते हैं, वैसे ही तख्ता पलट के भी कई कारण होते है लेकिन तत्कालीक कारण ही ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। और यह कारण था बेरोजगारी के साथ आरक्षण पर सत्ता का निर्णय और विरोधियों पर बद‌जुबानी।

कोर्ट के फैसले के बाद जब छात्र भड़के तो प्रधानमंत्री शोख हसीना ने कह दिया कि यदि स्वतंत्रता सेनानियों को आरक्षण नहीं मिलेगा तो क्या रजाकारों (गद्‌दारों) को आरक्षण मिलेगा।

रजाकार (गद्दार) शब्द इतना तूल पक‌ड़‌ा कि ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने आंदोलन करते हुए नारा ही बुलंद कर दिया कि 'तुही के, हमी के, रजाकार रजाकार यानी तुम कौन- हम कौन गद्‌दार-गद्दार।

इस नारे ने इतना तूल पकड़‌ा कि शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़‌कर भागना पड़ा।

लोकप्रियता के मद में डूबे सत्ता ने क्या विरोधियों के खिलाफ भारत में भी विषवमन नहीं कर रही है, राहुल गांधी को चीनी एजेट तो किसानों को पाकिस्तान परस्त, एनआरसी-सीएए, से लेकर धारा 370 को हटाने का मामला हो या कोरेगांव ?

किस तरह से इस दौर में आन्दोलन को कुचलने के निए गोली मारों सालों को जैसे नारे नहीं उछाले गये, बढ़ती बेरोजगारी के बीच पेपर लीक का मामला हो या फिर चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर उठते सवाल? क्या लोगों में ग़ुस्सा नहीं बढ़ रहा?

हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण के लिए एक वर्ग विशेष को निशाने में लेने के ख़िलाफ़ उठते आवाज़ में विरोधियों को हिन्दू विरोधी करार देना।

शेख़ हसीना ने लोकतंत्र और संविधान को कुचल डाला था। 

जिसने भी विरोध किया उसे जेल में डाल दिया। 

विपक्ष के नेताओं को देशद्रोही और ग़द्दार कहा। 

विदेशी एजेंट कहा। 

छह महीने पहले 300 में 280 से ज़्यादा सीटें जीत गईं। क्योंकि विपक्ष ने चुनाव का बहिष्कार कर दिया था। 

शेख़ हसीना के इशारे पर नाचते थे टीवी चैनल। 

अदालतें उनके हिसाब से फ़ैसले लिखती थीं। 

दो बार की प्रधानमंत्री ख़ालिदा जिया को उन्होंने जेल में डाल दिया था। 

उन्हें इलाज तक के लिए नहीं जाने दिया। 

शेख़ हसीना को भ्रम था कि उनके "मन की बात" पूरे बांग्लादेश के मन की बात है। 

फिर जनता का ये भ्रम टूट गया।

शेख़ हसीना 5 बार प्रधानमंत्री रहीं। 

लेकिन अब बांग्लादेश के इतिहास पर धब्बा हैं।

जब आप जनता के प्यार को तानाशाही का लाइसेंस समझ लेते हैं तो नागरिक आपको नाज़ से नासूर में बदलते देर नहीं लगाता। 

लोग नीतियाँ बनाने के लिए वोट देते हैं विपक्षमुक्त करने के लिए नहीं।

शेख़ हसीना ने डेमोक्रेसी के सारे सिस्टम तहस-नहस कर डाले थे। 

नहीं जानती थीं कि विपक्ष को लेकर फैलाए गए झूठ, चुनाव आयोग के फ़रेब, अदालतों की बेहयाई से ऊबी ह जनता के सब्र का बांध टूटेगा तो चोरों की तरह भागना पड़ जाएगा।

विश्वगुरु भारत ने एक और पड़ोसी देश में भद पिटवा ली है। 

फिर साबित हुआ है कि एस जयशंकर को विदेश नीति की बारीक समझ नहीं है। 

वो बहुत अच्छे अफ़सर रहे होंगे, लेकिन उनके पास ऐसी सूक्ष्म नज़र नहीं जो नरसिम्हा राव, गुजराल या प्रणब मुखर्जी जैसे विदेश मंत्रियों पास थी॥


तब सवाल यही है कि क्या बांग्लादेश की घटना से सत्ता को सबक नहीं लेना चाहिए?


शुक्रवार, 2 अगस्त 2024

जात न पूछो राहुल की...

जात न पूछो राहुल की... 


राहुल गांधी किस जाति के हैं यह बताये इसमे पहले यह जान लेना जरूरी है झूठ और अफवाह के आसरे नफरत की राजनीति में माहिर भारतीय जनता पार्टी ने राहुल गांधी पर सीधे हमला क्यों बोल दिया है। इस हमले से भाजपा की खीज साफ दिखाई भी देने लगी है। क्योंकि अनुराग ठाकुर की बातों को जब स्पीकर ने विलोपित कर दिया उसके बाद भी देश के प्रधानमंत्री ने अपने एक्स हेडल में इसे प्रदर्शित कर संसद की गरिमा का अवमानना करने से नहीं चूके।

दरअसल यह सारा मामला जातिय जनगणना से जुड़ा हुआ है जिसका भाजपा खुलकर समर्थन नहीं कर पा रही है। और मीडिल क्लास और पिछड़े वर्ग के बिखरते वोट ने उनके भीतर के हिन्दूत्व को हिला कर रख दिया है।

दरअसल हिन्‌दु वोटरों के ध्रुवीयकरण के आसरे सत्ता तक पहुंची भाजपा के लिए नरेंद्र मोदी के करिश्में से ज़्यादा असरदार कैग का वह फर्जी रिपोर्ट और लोक आयोग को लेकर अन्ना आन्दोलन का वह तूफान था जिसकी वजह से कांग्रेस को बदनाम करने की साज़िश रची गई । लेकिन लोगों को समझाया गया कि नरेंद्र मोदी के चेहरे के आसरे ही बीजेपी सत्ता में आ सकी।

अच्छे दिन आयेंगे के सपने 2047 के विकसित भारत तक आते आते इस कदर  रिसने लगा कि मीडिल और पिछड़ा वर्ग मोदी के हाथों से फिसलते गया।

२०१९ के परिणाम का ठसक, अहंकार, आत्ममुग्धता की हवा निकल गई तो इसकी वजह राहुल गांधी का वह भारत जोड़ो यात्रा थी जो कांग्रेस को वैचारिक रूप से भी बदलकर जाति जनगणना तक पहुंचा दिया। और यही जाति जनगणना अब भाजपा और संघ के कथित हिदुत्व के आधार को हिला कर रख दिया है।

जाति किसी जननेता की क्या होती है? यह सवाल इसलिए भी भाजपा ने उठाये हैं ताकि खिसकते जनाधार को बचा लें या मोदी सत्ता की करतू‌तों पर पर्दा डाल ले।

इसरे अलावा एक बड़ी वजह है राहुल गांधी की भारतीयता की वह छवि जो किसी भी जाति या धर्म से उपर हो चुका है। 

हालांकि भाजपा के स्लीपर सेल का गांधी नेहरू परिवार की जाति और धर्म को लेकर पहला वार नहीं है इससे पहले भी वे इसे हवा देते रहे है। 

लेकिन आमने - सामने मी स्थिति पहली बार बनी है। लेकिन भाजपा ने राहुल गांधी की जाति पूछने में देर कर दी क्योंकि अब राहुल गांधी की जाति भारतीयता हो चुकी है, पूरा देश धीरे-धीरे राहुल को स्वीकार कर चुका  है सिवाय संधी संस्कारित्रों के…?


इसके बाद भी यदि सवाल राहुल के दादा फिरोज गांधी के मुसलमान  होने की अफ़वाह को हवा दी जा रही है तो देश को यह जान लेना जारी है कि फिरोज गांधी मुसलमान नहीं पारसी थे, वे फिरोज खान लिखते थे और महात्मा गांधी के द्वारा उन्हें गोद लेने के बाद वे गांधी  कहलाने लगे। उनका अंतिम संस्कार भी इसी वजह से हिन्दू रिति रिवाज से हुआ।

पारसी जोरास्ट्रि‌यन धर्म का पालन करते हैं, जो आग को पवित्र मानकर उसकी पूजा करते हैं। और जिनके बारे में आचार्य चतुर सेन ने अपने उपन्यास वयम रक्षाम में इनको यमराज की जाति के वंशज माना है....

अब सवाल पंडित नेहरू के मुसलमान होने के अफवाह का है तो इस पर केवल वहीं लोग भरोसा कर सकते है जो आँखों में कट्टरता की पट्टी बांधे घूम रहे हैं।

दररूसल पूरा खेल या षड्यंत्र की वजह अंग्रेजों की चापलूसी के सच को विस्मृत कर देने की कवायद है और कुछ नही...!

शनिवार, 27 जुलाई 2024

राजनीति में खत्म हो चुकी मानववाद को पुर्नजीवित करने की कोशिश...

 राजनीति में खत्म हो चुकी मानववाद को पुर्नजीवित करने की कोशिश... 




अपनी जिस जूती को पहनकर आदमी घर के भीतर इसलिए नहीं जाता कि घर अपवित्र हो जायेंगा, तब दूसरे की जूती को अपने जंघे पर रख लेना भले ही लोगों को राजनीति लगे, लेकिन सच तो यही है कि यही मानवता है जिसका  रास्ते का सफ़र गांधीवाद से शुरू होता है।

मंच से दलित-वंचित के लिए लंबे चौड़े भाषण देना उनके साथ,  उनके काम के साथ उनकी ज़िंदगी जीना आसान नहीं है । क्या कोई नेता सप्ताह नहीं, कुछ घंटे ही वैसी ज़िंदगी बिता सकता है?

धर्म और जाति की राजनीति के इस दौर में जब जन‌कल्याण और मानवता से लोगों ने दूरी बना ली है। सत्ता में बैठे लोगों को वेलफेयर की अवधारणा बकवास लगने लगी हो तब यह बात भाजपा और संघ को भी समझना होगा कि असली धर्म और जाति मानवता ही है जो लोगों को एक दूसरे से जोड़ कर रखती है।

क्या मोची की दुकान पर आकर उसने बातचीत करते हुए उसके काम को समझ लेना ही गांधी है ? नहीं क़तई नहीं..।

लेकिन यह गांधीवाद का एक रास्ता है।

 जरा सोचिये कि एक सामान्य घर का लड़का यदि चाय बेचने की बात बताकर खुद को महान होने का दंभ भरता है तो वह कितना महान होगा जिसकी तीन पीढ़ियां इस देश में सत्ता संभाली हो वह कभी बढ़ई के पास काम सीखने लगता है तो कभी गैराज में जाकर मोटर साइकिल बनाता है तो कभी किसान के साथ खेत में, और इसमें भी उसका मन नहीं भरता तो मोची की दुकान में पहुंचकर जूते बनाने की बारिकियां सीखने लगता है।

इसे कोई फोटो आपुर्चनिटी भी कह सकता है लेकिन यह दलितों और वंचितों को राजनीति में प्रासंगिक बनाये रखने का एक मात्र जरिया है।

गांधी इसलिए महात्मा हुए क्योंकि वे शौचालय की सफाई और सङ्‌क में झाडू लगाने से परहेज नहीं करते थे महात्मा ने सच का प्रयोग किया, सादगी के साथ जन सेवा को आत्म सात किया।

नेहरू इसलिए लोकदेव नहीं कहलाये कि विनेबा भावे ने उन्हें यह तमगा  दिया बल्कि नेहरू इसलिए लोकदेव कहे जाने लगे कि वे आजादी के बाद के भारत को संभालने में स्वयं को न्यौछावर करने से कभी हिचके नहीं। लाठी डंडा लिये हिंसक भीड़ में सीना ताने घूसते चले जाते थे।

तब राहुल गांधी ने जिस तरह से अपने सरनेम को सार्थक करने में सड़क से लेकर संसद तक समर्पित दिखाई दे रहे हैं यह भारत की पुर्नजागरण का ऐसा दौर है जो  धर्म और जाति के स्थान नाम पर मानवता को स्थापित करता है।

शुक्रवार, 14 मई 2021

कनक-कनक तै सौ गुनी...

 

जिस तरह से रुदन और वेदना के स्वर दिनों दिन आकाश से ऊंचा होने लगा है, यकीन मानिये ये किसी नरमेघ से कम नहीं है। और इन लाशों को देखकर भी यदि हम को उसके अपराध के लिए बचा रहे हैं तो फिर हमारे भीतर का मानव मर चुका है और हम वापस जानवर बन रहे हैं।

हम यहां मोदी सरकार की पिछली लापरवाही के इस त्रासदीपूर्ण दुष्परिणाम को नहीं गिना रहे हैं बल्कि वर्तमान में मोदी सत्ता को क्या करना चाहिए पर चर्चा कर रहे हैं। सत्ता ने पूर्व में जो गलतियां की वह अक्षम्य है लेकिन इस देश में कब सत्ता ने अपनी जिम्मेदारी मानी है, ईलाज के अभाव में दम तोड़ती जिन्दगी, भूख से मौत और सत्ता की रईसी को बरकरार रखने की कोशिश में आम जनों का खून निचोडऩे वाला टैक्स।

ऐसे में जो हुआ सो हुआ लेकिन अब क्या आगे भी ऐसा ही चलता रहेगा। क्या आगे भी ऐसी लाशें नदी में बहती रहेगी, इतनी रुदन और वेदना के बाद भी यदि करुणआ न जगे और भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति न हो इस पर क्या सचेत रहने की जरूरत नहीं है। बड़े शौक से नेहरु और गांधी को गली देने वाले जरा सोचिये इस भीषण महामारी में यदि वे होते तो क्या वे घरों में दुबके बैठे होते, आजादी के भीषण त्रासदी के बाद क्या वे चुप िबैठे थे? इसलिए जब बात इस त्रासदी की हो रही है और देश का प्रधानमंत्री मुंह में दही जमाकर अपने निवास पर बैठा हो तब जिम्मेदारी को लेकर सवाल उठेंगे और जिन्हें ये सवाल पसंद नहीं वे अपने भीतर झांके और पूछे यदि उन्हें आक्सीजन, दवाई और खाना न मिले तब भी क्या वे अपनी किस्मत को ही कोसेंगे?

जब कांग्रेस ने सेंट्रल विस्टा का शिलान्यास किया था तब भी मैं इसका विरोध कर रहा था और आज जब सेंट्रल विस्टा में प्रधानमंत्री का महल बनाया जा रहा है तब हमें सोचना चाहिए कि क्या हम उस राजतंत्र को वापस देखना चाहते है जो राजमहल के बगैर अकल्पनीय था। लोकतंत्र में हम प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की जरूरत इसलिए महसूस नहीं की गई थी कि वे महलों में रहे, बल्कि यह व्यवस्था इसलिए की गई थी ताकि हर व्यक्ति को मूलभूत सुविधा मिले, उनके जीवन जीने का संघर्ष कम हो सके लेकिन आम आदमी के जीने का संघर्ष बढ़ गया और जनप्रतिनिधियों की सुविधा में बढ़ोत्तरी हो गई।

जनप्रतिनिधियों की सुविधा बढऩी चाहिए लेकिन वह लाशों के महल में कदापि स्वीकार नहीं है। क्या देश के प्रधानमंत्री सहित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और तमाम जनप्रतिनिधियों को अस्पतालों का दौरा नहीं करना चाहिए? इस त्रासदी के शिकार लोगों की पीड़ा जानकर भविष्य के हिसाब से व्यवस्था करने में ध्यान नहीं देना चाहिए।

सेन्ट्रल विस्टा में महल तो कदापि नहीं बनना चाहिए और यह बनता है तो कांग्रेस सहित तमाम विपक्ष को यह घोषणा कर देना चाहिए कि जब तक इस देश में भूख से एक भी व्यक्ति की मौत होती है, ईलाज के अभाव में कोई दम तोड़ देता है तब तक वे इस महल में सत्ता आने के बाद भी नहीं रहने वाले। कांग्रेस तो महात्मा गांधी की पार्टी कहलाती है फिर इस तरह की घोषणा से परहेज क्यों? 

कोरोना की वजह से बर्बाद हुए परिवार और अनाथ बच्चों के लिए जो काम देश के प्रधानमंत्री को करना चाहिए वह छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने किया है। यह एक तरह से उस केन्द्रीय सत्ता के मुंह में तमाचा है जो अपने को देश की सरकार कहती है। हालांकि जिस तरह से चुनावी रैलियों में प्रधानमंत्री का झूठ, अमर्यादित भाषा रही है, उसके बाद तो वे भाजपा के संघ संस्कारित प्रधानमंत्री ही ज्यादा रहे हैं। तब लोकतंत्र में जनता की जिम्मेदारी है कि वे सरकार को मजबूर करे। क्योंकि सत्ता का मतलब रईसी हो गया है।

गुरुवार, 22 अप्रैल 2021

जन की बात-6

 

विभिन्न प्रदेशों में रिकार्ड मौतें, देश में कोरोना ने नया रिकार्ड बनाया और देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संबोधन में देश को लॉकडाउन को अंतिम विकल्प बताना क्या यह संकेत नहीं है कि बंगाल का चुनाव तो निपट जाने दो।

जब भी इस देश को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संबोधित किया है अजीब सा सन्नाटा पसरा है, इस बार तो मरघट सी शांति रही। ये ठीक है कि कुछ लोगों को केवल धार्मिक स्थल और श्मशान में ही शांति मिलती है लेकिन उनका क्या जो घर परिवार में, समाज में, सुख-शांति से रहते हैं। हमने इसी जगह पर कितनी बार लिखा है कि चुनाव में मुद्दा नागरिकों के मूल-भूत सुविधा होनी चाहिए, जाति-धर्म से उपर उठकर व्यवस्था पर वोट डालना होगा, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, बेरोजगारी, अपराध, भ्रष्टाचार पर वोट हो लेकिन न किसी सत्ता ने इसे स्वीकार किया न ही किसी धार्मिक और जाति से बंधे कुंठित लोगों ने ही माना।

तब, जब आज महामारी की इस भीषण त्रासदी से लोग प्रभावित हो रहे है तो भी सत्ता उन्हें धर्म और जाति में ही उलझाने में लगी है। हमने बार-बार कहा है कि सत्ता का एक ही चरित्र हो गया है वह अपनी रईसी और सत्ता बरकरार रखने के लिए फूट डालो राज करो की नीति का ही इस्तेमाल करती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस संबोधन से रही-सही उम्मीद भी न टूटी हो तो शायद कोविड के ट्रिपल म्यूटेंट की प्रतीक्षा का इंतजार कर लें। क्योंकि सत्ता कभी भी अपना दोष नहीं देखती, वह निर्दोष होती है? दोष तो बेबस जनता की आखों में है जो खुद तो कुछ करती नहीं सारा दोष सत्ता पर मढ़ देती है?

सोशल मीडिया में मोदी विरोधी अपना भड़ास निकाल कर जनता को ही दोषी ठहरा रहे हैं कि उन्हें तो मंदिर चाहिए था, वे अस्पताल या स्कूल की मांग कब की थी, सत्ता से लेकर पूरी मीडिया भी इस दूसरी लहर के लिए जनता को ही दोषी ठहरा रही है। जिस देश में आज भी लोग स्वास्थ्य सुविधा के अभाव में, दो जून की रोटी की आपाधापी और परिवार पालने के संकट से मर रहे हो वहां सत्ता और मीडिया का कहना कि जनता लापरवाह है वह घर में बैठे तो फिर उनकी बुद्धि पर सवाल उठना ही चाहिए?

क्या सत्ता की ताकत है कि वह अपने देश के लोगों को इस महामारी में भी बिठा के खिला सके, और मुफ्त में ईलाज कर सके? जब यह ताकत ही नहीं है, और वे खुद देश के संस्थानों को एक-एक कर बेच खा रहे है तो फिर जनता कैसे घर में बैठकर जी सकती है? यह सवाल क्या मीडिया को नहीं उठाना चाहिए? यह देश का दुर्भाग्य है कि हमने उन्हें सत्ता सौंपी है जो यह भी नहीं कह पा रहा है कि जनता घर में रहे, हम भोजन और चिकित्सा की व्यवस्था मुफ्त कर रहे है? कोरोना से बचने के लिए घर में ही रहने की वकालत करने वाली सत्ता में है इतनी हिम्मत कि अपने देशवासियों या प्रदेशवासियों को यह दे सके। नहीं है, उसे तो अपनी रईसी बरकरार रखी है, वे सुविधा को लेकर जो भी फैसले लेंगे अपने लिए लेंग।

रविवार, 21 मार्च 2021

अनिर्णय का बोझ

 

कांग्रेस नेतृत्व इन दिनों अनिर्णय के बोझ से बिखरता जा रहा है। नाराज नेताओं को संभाल नहीं पाने की वजह से कांग्रेस का संकट गहराता जा रहा है, ऐसे में राहुल-प्रियंका की मेहनत का सिर्फ इतना ही मतलब है कि वे खुद को स्थापित करना चाहते है।

वैसे कांग्रेस तो राजीव गांधी की मृत्यु के बाद से ही लगातार कमजोर होते चली गई लेकिन सोनिया के नेतृत्व में बनी मनमोहन सरकार ने आम कांग्रेसियों की उम्मीद कायम रखी लेकिन मोदी सरकार के आने के बाद जिस तरह से कांग्रेस में बिखराव शुरु हुआ उससे नेतृत्व की क्षमता पर भले ही सवाल न उठे लेकिन नेतृत्व की निर्णय क्षमता पर तो सवाल उठने ही लगे हैं।

ऐसे में उन लोगों की चिंता बढ़ गई है जो कांग्रेस को लोकतंत्र के प्रहरी के रुप में देखते हैं! लेकिन सवाल वही है कि कांग्रेस से छिटकते लोगों को कैसे संभाला जाए? क्या कांग्रेस में नए तरह का परिवर्तन है या वह प्रसव वेदना से दो चार हो रही है ताकि नए पौध का आगाज हो!

हालांकि कांग्रेस के लिए इस तरह का संकट नया नहीं है। इंदिरा गांधई के नेतृत्व को भी ऐसी ही चुनौती मिली थी लेकिन तब इंदिरा के पास सत्ता की ताकत थी लेकिन आज?

लगातार हारते चुनाव से भले ही कई लोग हताशा में चले गए है लेकिन कांग्रेस में अभी भी ऐसे लोग हैं जो कांग्रेस में जान फूंकने की ताकत रखते है, हर गांव में कांग्रेस को चाहने वाले हैं, इस सबके बावजूद इस सच्चाई से कतई इंकार नहीं है कि चुनावी राजनीति में जीत ही महत्वपूर्ण है और लगातार पराजय ने कांग्रेस के भीतर उथल-पुथल मचा दी है। हालांकि कुछ लोग इसके पीछे की वजह कांग्रेस के उन नेताओं पर दोष मढ़ते हुए बताते हैं कि कई नेता सिर्फ सत्ता और रुतबे के जाल में इतना फंस चुके है कि उन्हें स्वयं के हित के अलावा कुछ नहीं दिखाई देता और ऐसे ही लोग नये लोगों के लिए एक इंच जमीन छोडऩे को तैयार नहीं है ऐसे में गुटबाजी और अंर्तकलहर को संभाल पाना तब और मुश्किल हो जाता है जब आप लगातार चुनावी राजनीति में पराजित हो रहे हो।

राजस्थान में सचिन पायलट मान गये तो सब ठीक हो गया वरना  उसका भी हश्र मध्यप्रदेश की तरह तय था। ऐसे में ज्योतिरादित्य सिंधिया की स्थिति को लेकर भले ही कांग्रेसी खुश हो ले लेकिन इससे गई सत्ता तो वापस होने वाली नहीं है।

तब सवाल यही उठता है कि कांग्रेस नेतृत्व आखिर किस तरह से संगठन चलाना चाहती है। क्या सिर्फ राहुल और प्रियंका के भाग दौड़ से ही कांग्रेस की वापसी हो सकेगी या नेतृत्व इस बात का इंतजार कर रही है कि मोदी सत्ता की गलतियों से जनता उन्हें सत्तासीन कर देगी?

कांग्रेस की स्थिति इसी से समझा जा सकता है कि पिछले चार साल में 170 विधायकों ने पार्टी छोड़ दी? ऐसे में नेतृत्व की कमजोरी पर सवाल तो उठेंगे ही?

बुधवार, 10 मार्च 2021

कांग्रेस और ठेकेदार !

 

छत्तीसगढ़ के कांग्रेस में क्या सचमुच सब ठीक चल रहा है? यह सवाल अब खुलकर सामने है कि मुख्यमंत्री की योजना को उनके ही मंत्री और पार्टी संगठन के लोग ही पलीता लगाने में लगे हैं और कांग्रेस के वे लोग अब किनारे होने लगे हैं या किनारे किये जा रहे हैं जिन्होंने कांग्रेस को सत्ता में लाने न केवल संघर्ष किया बल्कि जेल भी गये।

छत्तीसगढ़ के आधा दर्जन मंत्रियों की भूमिका को लेकर कांग्रेस के भीतर ही सवाल उठाये जा रहे हैं जिसमें प्रमुख नाम संसदीय कार्यमंत्री रविन्द्र चौबे का है। रविन्द्र चौबे शुरु से ही अपनी कार्यशैली को लेकर विवाद में रहे हैं और मीठलबरा के नाम से चर्चित भी है।

ताजा मामला उनके विभाग में जिसके चलते भाजपाई ठेकेदारों को फायदा हुआ और दो-पांच प्रतिशत कमीशन देकर अपने खेल को जारी रखने लगे। जिसका परिणाम यह है कि वे ही लोग फिर मलाई खाने लगे जो पिछले पंद्रह साल से मलाई खा रहे थे। ऐसे में मंत्रियों के बंगले में उन्हीं ठेकेदारों की चल रही है जो पहले भी अपना चलाते थे। मनमाना कमीशन दो और भ्रष्टाचार करते रहो चूंकि अफसर वहीं है और पंद्रह साल की भरपाई मंत्रियों को करनी है तो मामला फिट है। छत्तीगढ़ के कई मंत्रियों पर भाजपाई ठेकेदारों को संरक्षण देने का आरोप लगने लगा है और इनमें से एक मंत्री रविन्द्र चौबे के खिलाफ तो शिकायत करने की भी तैयारी हो चुकी है। रविन्द्र चौबे के जल संसाधन और कृषि जैसे महत्वपूर्ण विभाग के बारे में कहा जाता है कि यह इन दिनों कमाई का बड़ा जरिया बन चुका है और इन विभागों में भाजपा से जुड़े ठेकेदारों की मनमानी से कांग्रेस के लिए मुसिबत खड़ी हो सकती है। इस विभाग में चल रहे कमीशनखोरी की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मंत्री के रुख से नाराज आधा दर्जन कांग्रेसियों ने प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया और राहुल गांधी से मय सबूत शिकायत करने की तैयारी कर चुके हैं।

शिकायतकर्ताओं ने जिस तरह से तीन चार ठेकेदारों की रविन्द्र चौबे, भाजपा के एक पूर्व मंत्री सहित भाजपा के कार्यक्रमों में शिरकत करने की जो तस्वीरें जुटाई है वह आने वाले दिनों में बवाल खड़ा कर सकता है। शिकायतकर्ता का कहना है कि एक तरफ कांग्रेस के लोग पूरे देश में भाजपा के खिलाफ चुनौतीपूर्ण लड़ाई लड़ रहे हैं और दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में भाजपा से जुड़े लोगों को खाद-पानी दिया जा रहा है उसे बर्दाश्त नहीं किया  जायेगा।

हालांकि कई कांग्रेसियों का तो यहां तक कहना है कि यदि सत्ता आने के बाद भी कांग्रेस से जुड़े लोगों की उपेक्षा हो रही है तो हाईकमान को खबर होनी ही चाहिए।

गुरुवार, 4 मार्च 2021

गलतियों का पुलिंदा...

 

राहुल गांधी जब कहते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया आपातकाल एक गलती थई तो इसके मायने साफ है कि राहुल में गलत को गलत कहने का साहस है वे जानते है कि यह देश झूठ और नफरत से तरक्की नहीं कर सकता और न ही जनता को ज्यादा दिनों तक मूर्ख ही बनाया जा सकता। सत्ता में बने रहने के लिए कोई झूठ, अफवाह और भ्रम का सहारा तो ले सकता है लेकिन इससे देश का भला नहीं होने वाला।

लेकिन सवाल अब भी गलती स्वीकार करने की है तो गुजरात की गलती को गिनना शुरु कर दीजिए जिसे वे कभी स्वीकार नहीं करेंगे और न ही नोटबंदी, जीएसटी का गलत इम्पीयरेंशन को ही गलत मानेंगे वे तो बिना बुलाये अमेरिका जाने और पाकिस्तान जाकर बिरयानी खाने को भी गलत नहीं मानेंगे और तो और बढ़ती महंगाई-बेरोजगारी को ही गलत कहा जायेगा। विरोध के स्वर को देशद्रोही और जेएनयू के सच को भी वे गलत नहीं मानेंगे, आज इनकी गलती गिनते जाईये, आप इनके झूठ भी गिन सकते है जो ये कभी स्वीकार करने की साहस नहीं कर पायेंगे?

तब सवाल यही उठता है कि लोकतंत्र में क्या चुनाव जीतने ही महत्वपूर्ण हो चला है, जनसरोकार का कोई मतलब ही नहीं  रह गया, सुविधानुसार एनआरसी का खेल खेलो और जन सरोकार से टेक्स तब तक वसूलते रहो जब तक वह दम न तोड़ दे।

संवैधानिक संस्थानों के बजट को लेकर भी सवाल उठने लगे है तो सीबीआई, सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के बजट में पिछले 6 सालों में लगभग दो गुणा बढ़ोत्तरी क्या दर्शाती है। क्या संस्थागत ढांचों को अपने अनुरूप करने की मंशा क्या नहीं दिखती, सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ट जज गोगोई की राज्यसभा में नियुक्ति क्या गलत होने की चुगली नहीं करती?

ऐसे कितने ही सवाल है जो गलत फैसलों की ओर साफ इशारा करती है। किसानों को आतंकवादी और किसान आंदोलन को देशद्रोही बता देना क्या गलत नहीं है?

लेकिन इन गलतियों को स्वीकार करने का साहस किसमें है। ऐसे में राहुल गांधी के इमरजेंसी को लेकर वर्तमान में तुलना करने वाला बयान कई मायने में महत्वपूर्ण है।

आखिर इमरजेंसी क्यों लगी? इलाहाबाद के जस्टिस सिंहा ने दो बातों का जिक्र कर फैसला सुनाया था। जनप्रतिनिधि कानून 123/7 के तहत दो आरोप लगाये गये। पहला आरोप था जिसमें रायबरेली सभा के लिए सरकारी विभाग बिजली खीची गई उसके लिए सरकारी विभाग ने मदद की दूसरा आरोप था पीएमओ से जुड़े अधिकारी कपूर का सरकारी प्रचार में सहयोग कर रहे थे।

ऐसे में क्या यह वर्तमान में नहीं हो रहा है? लेकिन अब इन मामलों में न कोर्ट को कोई मतलब है न चुनाव आयोग का। ऐसे में यदि राहुल जब इमरजेंसी और वर्तमान दौर का जिक्र करते हैं तो साफ है कि सत्ता ने लोकतंत्र की खाल का जूता बनाकर पहन लिया है और संवैधानिक संस्था बजट के भार में दब गये है तब सवाल यही है कि गलती कैसे स्वीकार की जा सकती है क्योंकि नैतिकता से बड़ा चुनाव जीतना है।

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

राजनेताओं के खेल प्रेम पर राहुल का प्रहार...


खेलों की दुर्दशा को लेकर कई तरह के सवाल उठते रहे हैं। खेल संघो पर राजनेताओं की बढ़ती दखलदांजी से लोग नाराज भी है लेकिन ठुकुरसुहाती के फेर में खिलाड़ी भी इसका खुलकर विरोध नहीं कर पाते।
वैसे तो राजनीति ने हर क्षेत्र को दुर्दशा तक पहुंचा दिया है। राजनेताओं के लोभ ने खेलों को भी नहीं छोड़ा। छत्तीसगढ़ में भी प्रत्येक खेल संघो पर नेताओं का कब्जा है। हम यहां यह नहीं कह रहे हैं कि सभी राजनीतिज्ञ एक ही रास्ते से चलने वाले है। यहां भी कई खेल संघ ऐसे है और कई नेता ऐसे है जो पूरी ईमानदारी से खेलों को बढ़ावा दे रहे हैं लेकिन बहुत से नेता अपनी राजनैतिक फायदे के लिए खेल संघों का दुरूपयोग कर रहे हैं। खेलों के गिरते स्तर को लेकर हमेशा से ही चिंता की जाती है और राजनीति के बढ़ते हस्ताक्षेप पर विवाद होता रहा है।
राज्य बनने के बाद ओलंपिक और क्रिकेट एसोसिएसन का विवाद किसी से छिपा नहीं है। जिसकी सत्ता उसका खेल संघो पर कब्जा नया नहीं है। कभी छत्तीसगढ़ के प्राय: सभी खेल संघो पर कांग्रेसियों का कब्जा था और अब एक दो खेल संघों को छोड़ सभी पर भाजपाई बैठे हुए हैं।
खेलों को बढ़ावा देने के नाम पर अपनी राजनैतिक दुकान चलाने के अलावा आयोजनों में भ्रष्टाचार और खिलाडिय़ों के चयन में पक्षपात की खबरें लगातार आते रही है। अब तो मामला दैहिक शोषण तक जा पहुंच हैंं।
खेलों में राजनीति और राजनेताओं के हस्तक्षेप टोकने की मागं हर व्यक्ति की है लेकिन इसकी परवाह कभी किसी राजनैतिक दलों को नहीं रही। सावर्जनिक रूप से खेलों में राजनीति का विरोध करने वाले लोग भी मौका पाते ही खेल संघो में बैठने से गुरेज नहीं करते। ऐसे में राहुल गांधी का खेल से राजनेताओं को दूर रखने की सोच को एक  अच्छी खबर के रूप में देखा जा रहा है। यह पहली बार हुआ है जब खेल को लेकर किसी पार्टी के बड़े नेता ने ऐसी बात कही ंहै।
अपनी तरह की अलग सोच रखकर नई ईबादत की कोशिश में जुटे राहुल की यह सोच यदि उनकी पार्टी भी फरमान जारी कर पूरी करे तभी इसका मतलब है अन्यथा यह राजनैतिक ढकोसला ही माना जायेगा।
युवाओं को अधिकाधिक अधिकार देकर देश की दिशा बदलने की सोच को लेकर आगे बढ़ रहे राहुल गांधी के इस सोच पर कांग्रेस ही खरा उतर जाने तो खेल का भविष्य अलग होगा।
छत्तीसगढ़ में खेल संघो पर जिस तरह से राजनेताओं की माफियागिरी ने कब्जा कर रखा है वह किसी से छिपा नहीं है। नेताओं के अलावा जमीन, शराब और खनिज माफिया तक खेल संघो पर जमें हुए हैं। कई संघो पर तो आपराधिक रिकार्ड वाले भी बैठे हैं ऐसे में खिलाडिय़ों को भी ठुकुरसुहाती छोड़ अपने खेलों की प्रगति के लिए खुलकर आना होगा।
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शनिवार, 9 नवंबर 2013

इहु बने काहत हे उहु बने गोठियात हे...



कांग्रेस ह देश ल बरबाद कर डारीस अऊ भाजपा ह प्रदेश ल बरबाद कर डारीस। याने सब सही होड़ा बाद होगे।
वो दिन बुढ़ा गार्डन म चरचा के इही सार रीहिस। भाजपाई मन ह कहात राहय नई देखत हस गा कांग्रेस ह कइसे देश ल बरबाद करत हावय। सरदार पटेल ह नई रहीतीस त ए देश ह एक होय पातीस। नेहरु अऊ गांधी के बस चलतीस त का का नई कर डारतीन। देख लेवव दिल्ली म बइठे सरकार ह कतका भ्रष्टाचार करत हावय। कोयला घोटाला, टू जी घोटाला अऊ वोट बैंक के राजनीति करत करत आतंकवादी मन ल पंदोली अलग देवत हावय। ए मन ल कुर्सी म बइठाहु त देश ल बेच खाहीं।
भाजपाई मन के गोठ बात ल सुन के रामलाल ह गुसिया गे अऊ केहे लागीस। जादा मत बात कर तुहु मन ल मौका दे रीहिन। का करवे पाकिस्तान ह कारगील ल छोड़ संसद भवन तक घुसर गे रीहिस अऊ आतंकवादी मन ल कंधार तक लेग के छोडिऩ हावय कोयला, पानी, बिजली, खेत, बांध, नदिया-नरवा कुछु बेचे ल बाचे हावय। नक्सली मन ले सेटिंग करथव। कांग्रेसी मन ल मरवा देथव। कलेक्टर ल छोड़वा देथव। तुंहर नेता मन ह भ्रष्टाचार म अतका रमावत हे जानो मानो मरही तभो संग म अपन संपत्ति ल लेके जाही।
तभे रामसिंह ह देखीस के मामला ह बाढ़त हे बीच बचाव करे लागीस - छोड़ न ग तुमन काबर लड़थव। कोनो दुध के धुले नहीं हे। दुनो पार्टी के नेता मन के इही हाल हे। तभे तो वो दिन नरेन्द्र मोदी ह कीहिस के कांग्रेस ह देश ल बरबाद करत हे त राहुल गांधी ह पचास ठन उदाहरण देके बतादीस के भाजपा ह कइसे प्रदेश ल बरबाद करत हावय।
समारु ह वो दिन त कहतेच रीहिस। कोनो ल देश के प्रदेश के चिंता नई हे सब ल सत्ता म कइसे बइठन तेखरे चिंता हे। वो ह हर चुनाव म अइसे कही के फारम ल भरथे फेर के झन वोला वोट देथे। कांग्रेस होय चाहे भाजपा दुनो पार्टी के नेता मन के जमीन जयजाद ल देख लेवव। मनमाने बाढ़त हे। एक दुसर ल गारी देके जनता ल बेंझारत हावयं। इखर मन बर नियम कानून कुछु नई हे। तै मैं गलती से कुछु करबो त फंस जाबो एमन ह कुछु कर डारय इंखर कुछुच नई बिगडय़।
दुनो पार्टी के नेता मन ह अअइसे गोठियाथे जानो मानो इंखर ले ईमानदार कोनो नई हे। तभे त वो दिन ईतवारी ह नई काहत रीहिस जतका चुनाव म मिलथे ले लेवव बाद म कुछु नई मिलय। अपन टुरा ल कमाय बर पढ़ा लिखा के बंबई भेज दे हावय अऊ इहां गरीबी रेखा के कार्ड बना के किंदर-किंदर के मेछरावत रथे। पहिली वो ह कतका हमर राज हमर राज काहत रहाय आजकल जेती पइसा देखथे तेती नाचत रथे। कुछु कबे तहां ले मुच ले हांस देथे अऊ अतके कथे छोड़ न गा जमाना के साथ चलना चाही। न कांग्रेस ह गलत कहीथे न भाजपा ह गलत कथे। जम्मोझन त वइसनेच हे। अपन खुन ल काबर सुखाववं।