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शनिवार, 7 सितंबर 2024

थम नहीं रहा भाजपाईयों का रेप कांड...

 बंगाल पर बवाल, राजकोट पर चुप्पी... 

थम नहीं रहा भाजपाईयों का रेप कांड...



कलकत्ता में जूनियर डाक्टर  के साथ बलात्कार के बाद हत्या का आरोपी गिरफ्तार हो गया, सीबीआई जांच शुरु हो गई, विधानसभा में कड़े कानून भी बन गये लेकिन बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा है लेकिन दूसरी तरफ राजकोट में एक छात्रा के साथ हुई बलालार के मामले में बीजेपी शायद इस लिए चुप है क्योंकि बलालार करने वाले भाजपाई है और उन्हें ४० दिनों बाद भी पुलिस गिरफ्तार करने से बचती रही और कोर्ट के द्वारा जमानत खारिज करने के बाद आरोपी ने ख़ुद सरेंडर किया।

जबकि एक अन्य मामले में हिमाचल प्रदेश के भाजपा विधायक हंसराज के खिलाफ बलाकार की शिकायत लिखाने वाली युवती ने यह कहते हुए शिकायत वापस ले ली कि उसने बहकावे में शिकायत की थी। बाकि आप समझदार है कि कैसे वृजभूषण शरन सिंह के खिलाफ पास्को एक्ट हट गया था। दोनों ही मामलो को लेकर जो मीडिया रिपार्ट आई है उससे बीजेपी में हड़कंप मचा हुआ है लेकिन दोनों ही राज्यों में सरकार होने और आरोपियों के पार्टी से जुड़े होने के बाद यह सवाल सोशल मीडिया में तेजी से उठ रहा है कि आखिर भाज़पा के नेताओं पर इतने आरोप  क्यों. ? भाजपा के 12 सांसदों के नामो के अलावा बृजभूषण शरण सिंह, राम-रहीम को संरक्षण के  अलावा बलात्कारियों के स्वागत सत्कार की तस्वीरें एक बार फिर वायरल हो रही है। राजकोट और हिमाचल की खबरें कुछ इस प्रकार है

एक 21 साल की युवती के रेप के आरोप में 40 दिनों से फरार BJP कार्यकर्ता विजय रादड़िया ने आत्मसमर्पण कर दिया है. उसे जेल भेज दिया गया है). विजय, राजकोट के एक गांव में स्थित शैक्षणिक संस्थान का ट्रस्टी है. पीड़िता उसी शैक्षणिक संस्थान में पढ़ती थी. कोर्ट के आदेश के बाद विजय को 9 सितंबर तक पुलिस हिरासत में रखा जाएगा

विजय की पत्नी दक्षा राजकोट ज़िला पंचायत की सदस्य हैं. उन्होंने इस मामले में अपने पति की गिरफ़्तारी पर रोक लगाने की मांगी की थी. लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया. इसी के दो दिन बाद ये गिरफ़्तारी हुई है. इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के मुताबिक़, युवती ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और आरोप लगाया कि जून 2023 में शैक्षणिक परिसर में 2 लोगों ने उसका रेप किया. इसके बाद विजय और गांव के पूर्व सरपंच मधु थधानी के ख़िलाफ़ 25 जुलाई को मामला दर्ज किया गया.

युवती ने बताया कि वो संस्थान में ग्रैजुएशन की पढ़ाई कर रही थी और कैंपस के एक हॉस्टल में भी काम कर रही थी. मधु थधानी और विजय रादड़िया की संस्थान के तत्कालीन मैनेजिंग ट्रस्टी से दोस्ती थी. इसीलिए वो अक्सर कैंपस में आया करते थे. FIR के मुताबिक़, जून 2023 से मधु और विजय ने कथित तौर पर उसे 'आंख मारना और मुस्कुराना' शुरू कर दिया. लगभग 15 दिन बाद मधु ने उसे फ़ोनकिया।

इसके बाद दोनों व्यक्ति कथित तौर पर उसके कमरे में गए, उसे धमकाया और बारी-बारी से उसके साथ रेप किया. FIR में युवती ने ये भी आरोप लगाया कि मधु ने कहा कि संस्थान के तत्कालीन मैनेजिंग ट्रस्टी को सब कुछ पता था. मधु यधानी ने इसके बाद भी उसका यौन उत्पीड़न किया. मई, 2024 में वो आगे की पढ़ाई के लिए सूरत चली गई. लेकिन मधु ने फिर भी उससे दो बार मुलाक़ात की, आख़िरी बार 12 जुलाई को.इस दौरान भी मधु यधानी ने उसका यौन उत्पीड़न किया और उसे धमकाया. उससे शादी करने के लिए कहा और चेतावनी दी कि वो उसे किसी और आदमी से सगाई नहीं करने देगा. मधु पेशे से किसान और बिल्डर है. मधु को 2 अगस्त, 2024 को गिरफ़्तार किया गया था. वो फिलहाल न्यायिक हिरासत में है।

इस बीच, विजय रादड़िया फरार हो गया था. उसने 26 जुलाई को राजकोट डिस्ट्रिक्ट एंट सेशल कोर्ट में अग्रिम ज़मानत की अर्जी दी थी. याचिका का विरोध करते हुए राजकोट ग्रामीण पुलिस ने अपने हलफ़नामे में कहा,आरोपी याचिकाकर्ता की पत्नी राजकोट ज़िला पंचायत की सदस्य हैं. वो ख़ुद राजनीतिक रूप से प्रभावशाली है और इसलिए अग्रिम ज़मानत नहीं दी जानी चाहिए. क्योंकि अगर उसे अग्रिम ज़मानत दी जाती है, तो वो गवाहों को प्रभावित करने और सज़ा से बचने की कोशिश करेगा.

इसी पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने 3 सितंबर को विजय रादड़िया की ज़मानत याचिका खारिज कर दी. फिर 5 सितंबर को उसने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया. उसे गिरफ़्तार किया गया और 6 सितंबर को कोर्ट में पेश किया गया. कोर्ट ने उसे 9 सितंबर तक पुलिस हिरासत में भेज दिया है.

BJP की प्रतिक्रिया

इस बीच, राजकोट के BJP नेताओं का कहना है कि मामले के बारे में पार्टी हाईकमान को बताया जाएगा. इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के मुताबिक़, BJP की राजकोट ज़िला इकाई के महासचिव हरेश हेरभा ने कहा,

चूंकि वो हमारे कार्यकर्ता हैं, इसलिए हम इस मामले की रिपोर्ट पार्टी हाईकमान को देंगे. आगे की कार्रवाई के लिए उनसे मार्गदर्शन मांगेंगे.

वहीं, शैक्षणिक संस्थान के मौजूदा मैनेजिंग ट्रस्टी ने कहा कि वो जांच में पूरा सहयोग कर रहे हैं. विक्टिम को न्याय दिलाने के लिए पूरी शक्ति से काम किया जा रहा है. परिसर में 200 CCTV कैमरे लगे हैं और बाहरी लोगों को परिसर में एंट्री की अनुमति नहीं है. पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है

BJP विधायक पर पार्टी कार्यकर्ता की बेटी से नग्न तस्वीरें मांगने का आरोप, FIR के बाद पलट क्यों गई युवती?

हंसराज, हिमाचल प्रदेश के चंबा ज़िले के चुराह से तीसरी बार के विधायक हैं. वो हिमाचल प्रदेश विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष और BJP की राज्य इकाई के वर्तमान उपाध्यक्ष भी हैं. उनके ख़िलाफ़ 9 अगस्त को चंबा के महिला पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज किया।

बाद में युवती ने कहा कि 'मानसिक तनाव' में और किसी के 'बहकावे' में आकर शिकायत दर्ज कराई है. 

हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) के BJP विधायक हंस राज (BJP MLA Hans Raj) के ख़िलाफ़ एक 20 साल की युवती की शिकायत पर मामला दर्ज किया गया है. FIR के मुताबिक़, हंस राज ने कथित तौर पर युवती को अश्लील मैसेज भेजे, नग्न तस्वीरें मांगी और धमकाया. बताया गया कि युवती एक BJP कार्यकर्ता की बेटी है. हालांकि, बाद में युवती ने फ़ेसबुक पर लाइव आकर बताया कि उसने 'मानसिक तनाव' में और किसी के 'बहकावे' में आकर शिकायत दर्ज कराई है.

मंगलवार, 11 मई 2021

विचारधारा की शून्यता...

 

भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह से असम में कांग्रेस से आए हिमत बिस्वा सरमा को मुख्यमंत्री और बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को छोड़कर आये शुभेन्द्रु अधिकारी को नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी सौंपी है उसके बाद तो साफ हो गया है कि सत्ता के लालच में भाजपा बुरी तरह फंस चुकी है और अब संघ या भाजपा के सिद्धांतों की बजाय सत्ता के सिद्धांत पर चलना होगा।

हालांकि भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र में सरकार कभी भी अपने दम पर नहीं बनी है, वह दर्जनों दलों के गठबंधन के साथ ही चलती है तो  इसकी वजह उस पर लगने वाले साम्प्रदायिकता का वह आरोप है जो समय-समय पर परिलक्षित होता रहता है। 2014 में नरेन्द्र मोदी सत्ता में आये तब भी दूसरे दलों से भाजपा में आये सांसदों की संख्या ही वजह थी।

दरअसल भाजपा अब भी नहीं समझ पा रही है कि इस देश का मिजाज क्या है, यदि देश का मिजाज संघ के मिजाज से मेल खाता तो भाजपा या जनसंघ बहुत पहले ही सत्ता में आ गई होती। यह देश पूरी दुनिया को अनेकता में एकता का सिर्फ संदेश ही नहीं देता, बल्कि उसे जीता भी है। कुंठित हिन्दु  और कुंठित मुस्लिम लीग को हवा देकर अंग्रेजों ने भले ही देश का विभाजन धर्म के आधार पर कर दिया हो लेकिन भारत आज भी धर्म निरपेक्ष को जीता है।

यही वजह है कि संघ या भारतीय जनता पार्टी केन्द्र की सत्ता पर काबिज होने उन दलों की बैसाखी पर सवार होते हैं जो महत्वाकांक्षी होते है, भाजपा ऐसे दलों से भी समझौता करने से परहेज नहीं करती जो मुश्किल से एक-दो सीट ही जीत सकते हैं। भले ही संघ या भाजपा के समर्थक यह दावा करे कि वह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है या सबसे बड़ा संगठन है उनके सदस्य करोड़ों में है लेकिन सच तो यह है कि संघ या भाजपा के सिद्धांत पर चलने वालों की संख्या दहाई तक भी नहीं पहुंची है।

यही वजह है कि आजादी के सालों बाद पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी सत्ता तक पहुंचे तो 23 दलों का सहयोग था और अब मोदी सत्ता में आये है तब भी दर्जनभर दल के सहयोग के अलावा ऐसे लोगों के कारण सत्ता पर पहुंचे है जो अपने दलों से बगावत कर भाजपा में आये हैं। ताजा उदाहरण मध्यप्रदेश का है यदि ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस से बगावत नहीं करते तो मध्यप्रदेश में भाजपा सत्ता से बाहर थी।

हिन्दू राष्ट्र का सपना देखने वाले शायद भूल गए हैं कि इस देश में दूसरे धर्म के लोग भी रहते हैं और भारतीय संविधान उन्हें वो सारे अधिकार देता है जो हिन्दुओं को देता है। ऐसे में यदि कुछ लोग सोचते है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हिन्दू राष्ट्र का निर्माण कर देंगे तो यह बचकानी सोच है क्योंकि अब तो भाजपा में इतनी बड़ी संख्या में दूसरे दलों से लोग आ गए हैं जो कभी भी संघ के लिए मुसिबत खड़ी कर सकते हैं।

आखिर असम में पूरी भाजपा को सरमा के सामने झुकना पड़ा हालांकि बंगाल में शुभेन्द्रु अधिकारी को नेता प्रतिपक्ष बनाना भाजपा की रणनीति हो सकती है लेकिन शुभेन्द्रु अधिकारी को संघ के विचारधारा में ढाल लेना नामुमकिन है और कोई बड़ी बात नहीं कि भाजपा इस मामले में धोखा खा जाए।

शनिवार, 10 अप्रैल 2021

शाबास प्रधानमंत्री जी...

 

क्या बात है... देश में फिर कोरोना हाहाकार मचाने लगा है। रोज हजारों लोग मरने लगे हैं, देश की जनता तो सीधी-साधी है और सबसे भोले हैं हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी। और उनसे भी लाख गुना सीधे है हमारे गृहमंत्री अमित शाह जी। दुनिया में आग लग जाए इन लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता। फिर पहुंच जायेंगे बंगाल और जुटा लेंगे लाखों की भीड़।

मुझे एक बात प्रधानमंत्री से सीधी पूछनी है कि क्या आपकी रैलियों में जो भीड़ जुट रही है उससे कोरोना नहीं फैलता क्या? चंद रुपयों की खातिर रैली में आने वालों के लिए तो भूख पहले से ही महत्वपूर्ण रहा है लेकिन देश में जिस तरह से कोरोना के कहर से लाशों में लोग तब्दिल हो रहे हैं क्या वह भई दिखाई नहीं दे रहा है या चुनावी जीत के लिए लोगों की जान को दांव में लगा देना उचित है?

शाबास की हेडलाईन इसलिए लगाया ताकि भाजपा के वे लोग भी पढ़े और एक बार चिंतन करें कि चुनावी जीत क्या इतना जरूरी है। प्रधानमंत्री जी आप देश के मुखिया हैं और मुखिया का व्यवहार और कर्तव्य सब लोगों के हित के लिए होना चाहिए। हम मानते हैं कि चुनाव में जीत महत्वपूर्ण है लेकिन एक दो राज्य गंवा देने से क्या फर्क पड़ जायेगा, पहले भी तो छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली गंवा ही चुके हो।

एक तरफ देश में कोरोना ने हाहाकार मचा दिया है, नाईट कफ्र्यू, लॉकडाउन ने आम आदमी को प्रताडि़त किया है तो दूसरी ओर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चुनावी सभा लेने में व्यस्त है, दिनभर चुनावी सभा और शाम को दो गज की दूरी और मास्क जरूरी की बात क्या बेमानी नहीं है।

हमने पहले ही कहा है कि इस देश में कोरोना के लिए हाउडी ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सत्ता की भूख ही जिम्मेदार है, और इस बार फिर कहते हैं कि चुनावी सभा में जुटाये जा रहे भीड़ इस देश को नरक बना देने वाला है। सत्ता और राजनेताओं की बेशर्मी के कितने ही किस्से हैं लेकिन जब देश का प्रधानमंत्री ही चुनावी जीत के लिए जनता की जान को ही दांव पर लगा दे तो इसका मतलब साफ है कि हाउडी ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सत्ता बनते तक का इंतजार भी क्या ऐसा ही कुछ नहीं था।

हैरानी तो इस बात की है कि करोड़ों लोगों की जान दांव में लगते देख भी राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट ने आंखे बंद कर रखी है बाजार में भीड़ पर हल्ला मचाने वाली मीडिया को भी चुनावी रैली में भीड़ जुटाने वालों के तलवे चाटना पसंद है। जब देश की तमाम संवैधानिक संस्था, समाजसेवी कलाकार सब चुप हो तो जनता क्या करें।

वैसे भी इस देश ने गरीबी और भूखमरी के सारे रिकार्ड तोड़ दिये हैं, चंद पैसों के लिए जो लोग अपनी जान को जोखिम में डाल रहे हैं उनका ही दोष गिनाया जायेगा, कोई यह मानने को तैयार नहीं है कि प्रधानमंत्री की चुनावी सभा से कोरोना की स्थिति आने वाले दिनों में भयावह होने वाला है। लेकिन प्रधानमंत्री जी अब तो फैसला लिजिए, लोगों को बख्श दीजिए, बंगाल तो आते-जाते रहेगा लेकिन जब लोग ही नहीं रहेंगे तब...!

रविवार, 4 अप्रैल 2021

ये चेतावनी है...!

 

पंजाब में भाजपा के विधायक नारंग की किसानों ने पिटाई कर नंगा कर दिया। खबर को लेकर निंदा करते हुए जो प्रतिक्रिया आ रही है वह हैरान करने वाली है। इनमें से सबसे हैरान करने वाली प्रतिक्रिया थी, वे किसान थे यदि भाजपा या संघ के होते तो मॉब लिचिंग होता!

हमारी सोच, हमारी दशा क्या होते जा रहा है, गांधी-नेहरू के भारत से इतर हम इस देश को कहां ले जा रहे है, नानक-बुद्ध-महावीर के इस देश में ऐसी प्रतिक्रिया का कोई स्थान नहीं होना चाहिए लेकिन बीते सालों में राष्ट्रवाद और हिन्दूत्व की चाशनी में अच्छे दिन का सपना दिखाकर जो जहर फैलाया गया उसकी प्रतिक्रिया का अंदेशा किसे था?

कुर्सी की लड़ाई ने पहले ही इस देश में लोगों को बांटने का काम किया है और जब लड़ाई किसी को खत्म करने की ईच्छा में तब्दिल हो जाये तो इसका नुकसान समाज और देश भुगतता है। विरोधियों को समाप्त करने की सोच लोकतांत्रिक नहीं है यह सोच राजा महाराजा या तानाशाही सोच है।

हमने पहले ही कहा है कि यदि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष नहीं होगा तो सत्ता के खिलाफ विपक्ष की भूमिका में जनता सड़कों पर आ जायेगी और यह क्रांति कहलाता है और क्रांति से सत्ता और उनसे जुड़े लोग ही प्रभावित होते हैं।

पंजाब में भाजपा विधायक के साथ जो कुछ हुआ वह सत्ता के लिए चेतावनी है क्योंकि जनता का क्रोध को कमजोर करने का काम विपक्ष करता है, अपनी तकलीफ को विपक्ष के द्वारा उठाये जाने से आम आदमी थोड़ी राहत महसूस करता है और अपनी बात सत्ता तक पहुंच जाने से नरम भी पड़ता है लेकिन सोटिये जब विपक्ष नहीं होगा तब क्या वह अपनी तकलीफ सीधे सत्ता तक पहुंचाने की कोशिश नहीं करेगा। और इस कोशिश में वह क्या करेगा, अकेला हो तो स्वयं को नुकसान पहुंचाएगा और भीड़ हो तो प्रदर्शन तोडफ़ोड़ और...!

ऐसे में इस घटना से मुंह फेर लेने का मतलब क्या है? इस घटना के लिए जितने किसान दोषी है उससे ज्यादा दोषी वह सत्ता है जो मनमानी में विपक्ष को ही समाप्त कर देना चाहता है। चार माह से किसान आंदोलित है और सत्ता के पास यदि बात करने का भी समय न हो तो इसका मतलब क्या है।

सवाल किसानों की मांगों के उचित-अनुचित का नहीं है, सवाल तो यही है कि जब इस कानून में किसान अपनी बरबादी देख रहे हैं तो फिर उसे सत्ता क्यों थोपना चाहती है। चुनाव जीत कर सत्ता हासिल करने का यह कतई मतलब नहीं है कि उसे मनमानी की छूट है। और न ही यह मतलब है कि हारे हुए नेता कुछ बोल न सके।

ऐसे में यजि जनता विपक्ष की भूमिका में न आ जाये यह सत्ता को देखनी है!

बुधवार, 31 मार्च 2021

सवाल झूठ का नहीं...

 

जब आप जानते हो कि वह बात-बात पर झूठ बोलता है? फिर भी उसका झूठ बहस का मुद्दा बने इसका मतलब क्या है? इसका मतलब समझने से पहले एक राजा की कहानी को याद रखना जरूरी है जो सत्ता में बने रहने के लिए इस तरह का प्रपंच करता था कि जनता उसकी मनमानी की बजाय उसके दान-धर्म और कलाकारी पर ही ध्यान केन्द्रित करे। वह जानबूझकर ऐसे सवाल बड़ा करता था कि लोग उस सवाल को हल करने में लग जाए ताकि खूब ईनाम मिले।

यह एक तरह का सत्ता में बने रहने और मनमानी को जारी रखने का तरीका था। जनता को ऐसे सपनों में सलाह दो कि वह जागती आंखों में वही देखे जो सत्ता चाहती है, जो लोग जानते हैं कि यह सपना है उन्हें बागी करार देकर जेल में डाल दो और उनके खिलाफ देशद्रोह का आरोप लगा दो।

सत्ता की अपनी विचित्र शैली है, और लोकतंत्र में यह शैली तब तक कारगर होते रही है, जब तक स्वयं इस शैली के शिकार न हो जाये। तब तक बहुत देर हो चुका होता है। दरअसल प्रत्येक व्यक्ति की अपनी परेशानी है, और स्वयं की गलतियों पर दूसरे पर दोष मढऩा मानवीय प्रवृत्ति है, और सत्ता इसी बात का फायदा उठाती है। ये सच है कि इस देश में आरक्षण की वजह से कुछ सामान्य वर्ग के लोगों को दिक्कत हुई है लेकिन इस दिक्कत को बड़ा बनाना और स्वयं को आरक्षण के खिलाफ बताकर जो सपना दिखाया जाता है उसे जानने की जरूरत है। सभी जानते है उसे जानने की जरूरत है। सभी जानते हैं कि आरक्षण समाप्त करना मुश्किल भरा काम है लेकिन आरक्षण का विरोध कर वोट बटोरे जा रहे हैं।

एसेे कितने ही उदाहरण है जो केवल राजनैतिक सब्ज बाग है, हिन्दू राष्ट्र की कल्पना हो या फिर मुस्लिमों या दूसरे अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत की लकीरे खींचने की बात हो यह सिर्फ वोट हासिल करने का तरीका है। आजकल तो आय दुगनी करने और लाखों लोगों को रोजगार देने का नया जुमला शुुरु हो गया है और हैरानी की बात तो यह है कि इस प्रपंच में पढ़े-लिखे युवा भी फंसते चले जा रहे हैं।

बात असल मुद्दे से भटकाने से हुई है, बात शुरु हुई थी बात-बात में झूठ बोलने से। इसलिए यह बताना जरूरी है कि आम लोगों की सुरक्षाशिक्षा, रोजगार परिवहन के साधन और अस्पताल ही जरूरी मुद्दे हैं लेकिन इस पर कोई बात ही नहीं करना चाहता। बहस की जाती है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बंग्लादेश की आजादी को लेकर झूठ क्यों बोल रहे हैं।

जबकि बहस होनी है कि पिछले सात सालों में अच्छे दिन क्यों नहीं आये, रुपयों के मुकाबले डालर का क्या हाल है, दो करोड़ रोजगार के वादों का क्या, पेट्रोल डीजल घरेलू गैस की बढ़ती कीमत और निजीकरण के लिए लगातार बिकते सार्वजनिक उपक्रम पर बहस क्यों नहीं होनी चाहिए। किसानों के आंदोलन को लेकर सरकार की बेरुखी पर सत्याग्रह क्यों नहीं किया जाना चाहिए और सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि आखिर इन सात सालों में ऐसी क्या परिस्थितियां निर्मित हुई कि पांच लाख से अधिक लोगों ने भारत की नागरिकता त्याग दी। जिस दिन भी यह सवाल खड़ा करते लोग अपने-अपने हिस्से को लेकर खड़ा हो जायेगा देश मजबूत हो जायेगा।

शनिवार, 27 मार्च 2021

किसान आंदोलन से डरने लगी सत्ता

 

किसानों के आंदोलन को तीन माह हो रहे हैं लेकिन पांच राज्यों के चुनाव में फंसी सत्ता को इससे कोई मतलब नहीं है, न ही आम जनमानस ही इस आंदोलन से उद्देलित है, ऐसे में किसान आंदोलन और भी लंबा चले तो किसी को क्या फर्क पड़ेगा लेकिन एक बात जान ले आंदोलन किसी सत्ता का विरोधी नहीं होता, आंदोलन का मतलब सत्ता की मनमानी से मुक्ति का रास्ता है, आखिर नमक आंदोलन छेड़ कर गांधी जी ने क्या किया था, मुठ्ठी भर नमक बिट्रिश सरकार का कुछ नहीं बिगाड़ सकती थी और न ही विदेशी वों की होली जलाने से ही बिट्रिश सत्ता के राजा को ही कोई फर्क पडऩे वाला था लेकिन हिन्दुस्तानियों का दिल जुड़ गया था।

और जब दिल जुड़ता है तो लोग जुड़े है तब मनमानी करने वाली सरकार का सिंहासन डोलने लगता है, वह जनता को एक साथ जुडऩे नहीं देता क्योंकि निरापद सामूहिक कर्म किसी भी आततायी सत्ता को कंधा देता है, उसे तो हिंसा चाहिए ताकि अपनी ताकत का इस्तेमाल कर सके इसलिए जब आंदोलन अहिंसक हो तो वह उसे हिंसक बनाने षडयंत्र रचता है ताकि भला मनुष्य खामोश बैठ जाए और सत्ता अपनी मनमानी करता रहे। अविश्वास भय और अलग-अलग झुंड चाहिए ताकि हर झुंड को वह अपनी ताकत से दबोच ले।

यही वजह है कि वह किसान आंदोलन ही नहीं इससे पहले हुए शाहिन बाग को लेकर भी भय, अफवाह फैलाते रहा, निजीकरण, बेरोजगारी और महंगाई से त्रस्त लोग एक साथ जमा न हो जाए इसलिए वह राष्ट्रवाद और हिन्दूत्व की चासनी में में डूबे रसगुल्ले परोसता है। क्योंकि सत्ता यह बात जानती है कि खुदीराम, आजाद, भगतसिंह से निपटना आसान है लेकिन गांधी से निपटना अब भी कठिन है क्योंकि गांधी का मतलब अहिंसा, सामूहिकता, समर्पण और भय से मुक्ति है।

किसानों के पास क्या है, दुनिया में किसी भी देश के किसानों से कम आय भारतीय किसानों की है जबकि दुनिया के देशों में कृषि उत्पादन के मामले में वह सबसे आगे की दौड़ में है तब किसान आंदोलन से सरकार क्यों डरे, क्योंकि किसानी से होने वाले नुकसान की वजह से हर साल लाखों युवा किसानी छोड़ दूसरे काम कर रहे हैं।

यही वजह है कि किसान आंदोलन को लेकर न सरकार गंभीर है और न ही आम लोग ही इससे जुड़ पा रहे हैं तब मोदी सत्ता की मनमानी के चलते झुंड में बंटे आंदोलनकारी निजीकरण, महंगाई, बेरोजगारी इकट्ठा क्यों नहीं हो पा रहे हैं।

किसानों ने पांच राज्यों के चुनाव में भाजपा के खिलाफ वोट डालने की अपील करते हुए आंदोलन का विस्तार तो कर दिया है तब क्या निजीकरण का खिलाफत करने वालों को भी इन राज्यों के चुनाव में अपनी भूमिका स्पष्ट नहीं करनी चाहिए।

किसानों के भारत बंद को जो लोग असफल बता रहे हैं उन्हें जानना चाहिए कि यदि किसानों का आंदोलन असफल है तो  अहमदाबाद में पत्रकार वार्ता के बीच किसान नेता की गिरफ्तारी पुलिस नहीं करती। सत्ता डरने लगी है यह ईशारा है।