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शनिवार, 19 जुलाई 2025

तब जनसंघ ही नहीं कांग्रेस के भीतर का विरोध भी नहीं डिगा पाई इंदिरा को

 तब जनसंघ ही नहीं कांग्रेस के भीतर का विरोध भी नहीं डिगा पाई इंदिरा को…


अब जब अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत के पाँच विमान गिरने का दावा कर दिया है तब भी प्रधानमंत्री की चुप्पी देश को अपमानित कराने के अलावा क्या है लेकिन आज हम बात कर रहे है उस लौह महिला की जिन्होंने 19 जुलाई 1969 को वह कर दिया जो आज देश के माध्यम और ग़रीब वर्ग का जीवन है…

56 साल पहले 19 जुलाई 1969 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने का ऐतिहासिक फैसला लिया था। इस कदम ने लाखों आम लोगों और ग्रामीणों को बैंकिंग सेवाओं के दायरे में लाया और बैंकिंग संस्थानों को निजी मुनाफे से परे देश के विकास लक्ष्यों के साथ जोड़ा।  

आज, स्वतंत्रता के बाद के भारत को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण सरकारी कदमों में बैंक राष्ट्रीयकरण का एक प्रमुख स्थान है। इसने भारतीय अर्थव्यवस्था को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, और इसके प्रभावों पर आज भी विभिन्न दृष्टिकोणों से चर्चा जारी है।  

1969 से पहले, बड़े निजी बैंक मुख्य रूप से अपने मालिकों और अन्य धनी व्यक्तियों के व्यावसायिक हितों के लिए ही ऋण देते थे। कृषि क्षेत्र को केवल 2% बैंक ऋण मिलता था। लेकिन हरित क्रांति के माध्यम से बड़े कृषि परिवर्तन का लक्ष्य रखने वाले देश के लिए, कृषि क्षेत्र को बैंकिंग समर्थन को कई गुना बढ़ाने की जरूरत थी। यही वह प्रेरणा थी जिसने निजी स्वामित्व से बैंकों को सार्वजनिक क्षेत्र में लाने का फैसला लिया। 1990 के दशक तक, कृषि क्षेत्र के लिए ऋण 15% तक बढ़ गया, जो राष्ट्रीयकरण का एक सकारात्मक परिणाम था।  

राष्ट्रीयकरण से पहले ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाएँ बहुत सीमित थीं। उस समय देश में केवल 7,219 बैंक शाखाएँ थीं, जिनमें से अधिकांश बड़े शहरों और मध्यम आकार के कस्बों में थीं। लेकिन राष्ट्रीयकरण के बाद, बैंकिंग गतिविधियाँ उत्साह के साथ ग्रामीण क्षेत्रों तक फैलीं। अगले चौथाई सदी में बैंक शाखाओं की संख्या आठ गुना बढ़ गई।  

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए यह फैसला लेना आसान नहीं था। विरोधी पक्ष में केवल धनी उद्योगपति ही नहीं थे, बल्कि संगठन परिवार की तत्कालीन राजनीतिक पार्टी जनसंघ और राजगोपालाचारी की स्वतंत्र पार्टी भी थीं, जिन्होंने संसद में बैंक राष्ट्रीयकरण बिल का विरोध किया। कांग्रेस के भीतर भी मोरारजी देसाई जैसे कुछ लोग शुरू में इसके खिलाफ थे। इंदिरा गांधी ने वित्त मंत्री मोरारजी देसाई को हटाकर ही यह फैसला लागू किया। बाद में हुए राष्ट्रपति चुनाव और कांग्रेस के विभाजन में भी बैंक राष्ट्रीयकरण एक महत्वपूर्ण कारक बन गया।  

हालांकि, बैंक प्रशासन में राजनीतिक नियंत्रण और बढ़ते गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) के कारण इसे कई बार आलोचना का सामना करना पड़ा, फिर भी 1969 का बैंक राष्ट्रीयकरण भारत के इतिहास में एक निर्णायक आर्थिक कदम के रूप में आज भी चर्चा में रहता है, जो इसकी प्रासंगिकता और महत्व को रेखांकित करता है।(साभार)

शनिवार, 10 मई 2025

धोखा…

 धोखा…


पाकिस्तान कभी भी भरोसे के लायक़ नहीं है और उसने हमेशा ही पीठ पर छुरा मारा है 

तब भारत को क्या अब अंतिम उपचार नहीं करना चाहिए

ट्रंप ने जैसे ही सीजफ़ायर की घोषणा की लोग इंदिरा को याद करने लगे

पूरा सोशल मीडिया इंदिरा की तारीफ़ से भर गया,

ऐसे में कुछ सवाल जो सोशल मीडिया में सुलगने लगे

उन चार आतंकवादियों का अब तक  ना पकड़ा जाना, 


उसके बाद पाकिस्तानी सेना द्वारा आम नागरिकों की हत्या,


सैनिकों का शहीद होना, 


पाकिस्तान को लोन मिलना, 


इस सबके दौरान मीडिया का बेशर्मी से अनियंत्रित होकर झूठ फैलाना,


अमेरिका का खुले आम कहना कि हमने सीज़फायर करवाया, जबकि हमारा स्टेंड हमेशा से रहा है कि हम तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार नहीं करेंगे, 


कूटनीतिक रूप से असफलता, जबकि कहा जाता है कि हमारा डंका विदेशों में बज रहा है,


पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी पी मलिक का बेहद निराशाजनक बयान कि हमें इस सबसे क्या मिला,


इन सब बातों के बाद भी आप सरकार का समर्थन कर रहे हैं तो मान लीजिये कि आपकी भक्ति देश से बढ़कर किसी पार्टी के प्रति है, और ये शर्म की बात है.

मनी तिवारी लिखते है… आप लोग अपने अपने तर्क और अंदाजे लगाते रहिए पर इस युद्ध और युद्धविराम, दोनों के पीछे पूरा खेला IMF का ही है। 


आईएमएफ यानी "इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड" हिंदी में कहें तो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष।


एक तरीके से बीसी या फिर कमेटी वाले खेल की तरह यहां भी करीब 190 देश अपना अंशदान करते है ताकि संकट में जरूरत पड़ने पर यहां से लोन लिया जा सके।


अब पाकिस्तान को लोन चाहिए था तो उसे अपने देश पर संकट तो दिखाना पड़ेगा, मसलन भारत ने वो मंसूबा पूरा कर दिया। फिर अमेरिका के वॉशिंगटन डीसी स्थित आईएमएफ मुख्यालय से पाकिस्तान को वो फंड भी जारी कर दिया गया।


190 देशों के इकट्ठा किए अरबों डॉलर किसी को संकट के नाम पर बांट देना कोई आसान काम नहीं है। बकायदे तनाव और युद्ध जैसी स्थितियां निर्मित करनी पड़ती है।


बाकी दलाली क्या होता है आप सब को पता हइए है। किसी सरकारी बैंक से लोन अप्रूव तो आपने भी करवाया  ही होगा।

रजनीश जे जैन का लिखना है… सीज़फायर ! इस एक शब्द ने बहुत कुछ बदल दिया है। 


आज दो बाते सिद्ध हुई। पहला , यह तय हो गया कि दुनिया का चौधरी कौन है। विश्व गुरु का गुब्बारा फुट गया।  दूसरा ,  भारत की कूटनीति पर प्रश्न चिन्ह लग गया। सन इकहत्तर में जो कमाया था , आज गँवा दिया।  भारत पाकिस्तान को आतंकवादी राष्ट्र घोषित नहीं करवा पाया , न ही आईएमएफ को खैरात देने से रोक पाया ,  न ही पहलगाम  पीड़ितों को न्याय दिला पाया ! 


अब सवाल तो उठेंगे ही ! पीछा भी करेंगे। मिटटी में मिला देने वाली हुंकार का क्या होगा ? यह भी पूछा जाएगा कि क्या  एक रिफाइनरी और एक पोर्ट आई बी की ख़ुफ़िया रिपोर्ट में संभावित टारगेट होने की पुष्टि के बाद सीज फायर की प्रस्तावना लिखी गई ?


देश तो सवाल करेगा ही , और करना भी चाहिए कि ऐसी कौन सी नस दबा दी मित्र डोलांड ने जिसने भारत के विजय रथ को रोक दिया है।

और भी लोगो की प्रतिक्रिया में इंदिरा ऐसे याद आई..





कागो प्रसादो महलो अपि न गरुणायते....


अर्थात महल के सबसे उंचे शिखर पर बैठने से कौवा कभी गरुण नहीं हो जाता।


इसी तरह पीएम की कुर्सी पर बैठ जाने से हर कोई इंदिरा नहीं बन जाता, वह इंदिरा गांधी ही थी जिसने अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन को अपने जूती के नोक पर रखा, पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए एवं 1983 में दुनिया के 108 गुट निरपेक्ष राष्ट्रों का नेतृत्व संभाला।


सर्दियों का नवंबर 1971...

इंदिरा गांधी अमेरिका के दौरे पर थीं। व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति निक्सन से मुलाकात हुई। बातचीत शुरू होते ही निक्सन ने घमंड में डूबकर चेतावनी दे डाली:

"अगर भारत ने पाकिस्तान के मामले में नाक घुसाई, तो अमेरिका चुप नहीं बैठेगा!"


इंदिरा गांधी ने बिना किसी उत्तेजना के, बेहद गरिमामयी अंदाज़ में जवाब दिया:

"भारत अमेरिका को मित्र मानता है, मालिक नहीं। हम अपनी किस्मत खुद लिखते हैं।"

और इतना कहकर वे बैठक छोड़कर उठ गईं।


बाद में इस पूरी मुलाकात का ज़िक्र अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने अपनी आत्मकथा "White House Years" में किया।


उस दिन बैठक के बाद मीडिया को साझा संबोधन होना था — पर इंदिरा गांधी बाहर निकलते ही कार्यक्रम रद्द करके सीधे अपनी कार की ओर बढ़ गईं।


कार का दरवाज़ा बंद करते वक्त किसिंजर ने कहा:

"मैडम, आपको नहीं लगता कि राष्ट्रपति के प्रति थोड़ा और धैर्य दिखाना चाहिए था?"


इंदिरा गांधी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया:

"धन्यवाद मिस्टर सेक्रेटरी, भारत भले ही विकासशील देश हो, लेकिन हमारी रीढ़ की हड्डी मजबूत है। हमारे पास अत्याचार झेलने की आदत नहीं, बल्कि उसका जवाब देने का साहस है। वो दिन लद चुके जब कोई ताकत हज़ारों मील दूर बैठकर हम पर राज कर सके।"


इसे कहते हैं नेतृत्व, साहस और आत्मविश्वास ।


" एक वो थीं.....,एक ये हैं "


युद्ध समाप्ति की घोषणा अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने किया, ऐसा भारत के इतिहास में पहली बार हुआ, एक सार्वभौमिक राष्ट्र का अपमान हुआ ।


गरिमामयी हार भी स्वीकार्य है किन्तु साहसहीन,डरपोक नेतृत्व कभी नहीं, कभी भी नहीं !