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बुधवार, 2 जुलाई 2025

पाकिस्तान के द्वारा यूएनएससी की कमान सँभालने का मतलब…

पाकिस्तान के द्वारा यूएनएससी की कमान सँभालने का मतलब…


भारत के लिए जुलाई माह  एक चुनौती है कि वह अपनी कूटनीति की धार तेज़ करे क्योंकि पाकिस्तान को अमेरिका जिस तरह से मदद कर रहा है और अब यूएनएससी का कमान… इसका क्या असर होगा…

1 जुलाई 2025 को पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मासिक अध्यक्षता हासिल की। यह उसके 2025-26 के गैर-स्थायी सदस्यता कार्यकाल का हिस्सा है। लेकिन सवाल ये है: क्या ये भारत और वैश्विक मंच के लिए गेम-चेंजर है? इसका भारत और दुनिया पर क्या असर होगा! 🇮🇳🌐

पाकिस्तान इस महीने दो बड़े आयोजन करेगा:

🔹 22 जुलाई: वैश्विक शांति और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर खुली बहस।

🔹 24 जुलाई: इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) और UN के बीच सहयोग पर चर्चा।

ये दोनों मौके पाकिस्तान को वैश्विक मंच पर अपनी बात रखने का सुनहरा अवसर देंगे। लेकिन क्या वो इसका फायदा उठाकर भारत के खिलाफ अपनी चाल चलेगा, जैसे कश्मीर मुद्दे को उछालना या ऑपरेशन सिंदूर पर सवाल उठाना? 😮


🇮🇳 भारत के लिए क्या मायने?


1. कश्मीर का खेल: पाकिस्तान पहले भी UNSC में कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मंच पर लाने की नाकाम कोशिश कर चुका है। भारत, जो इसे द्विपक्षीय मुद्दा मानता है, अपनी मज़बूत कूटनीति से ऐसी कोशिशों को फिर से पटरी से उतार सकता है। 💪

2. आतंकवाद और सुरक्षा: पाकिस्तान तालिबान प्रतिबंध समिति का भी अध्यक्ष है। भारत ने बार-बार उस पर आतंकियों को पनाह देने का आरोप लगाया है। क्या पाकिस्तान इस मंच का दुरुपयोग करेगा? भारत को अपनी नजरें खुली रखनी होंगी। 👀

3. आर्थिक दांव: पाकिस्तान अपनी छवि चमकाकर निवेश और सहायता हासिल करने की कोशिश कर सकता है। भारत को अपनी वैश्विक आर्थिक ताकत (G20, क्वाड) का इस्तेमाल कर इसकी काट ढूंढनी होगी।

4. मानवाधिकार का पाखंड?: पाकिस्तान की अपनी मानवाधिकार स्थिति (अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार) सवालों के घेरे में है। भारत अपनी लोकतांत्रिक छवि और उपलब्धियों (चंद्रयान, डिजिटल इंडिया) को उजागर कर इसका जवाब दे सकता है।

🌏 वैश्विक मंच पर असर?

▪️शांति या शोशेबाजी?: पाकिस्तान ने शांति और बहुपक्षीयता की बात की है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता संदिग्ध है। क्या वो यूक्रेन, मध्य पूर्व जैसे संकटों में निष्पक्ष भूमिका निभा पाएगा? 🤔

▪️UNSC सुधार: भारत स्थायी सीट की मांग कर रहा है, लेकिन पाकिस्तान इसका विरोध करता है। ये उसकी राह में रोड़ा बन सकता है।

▪️महाशक्तियों का खेल: चीन का समर्थन पाकिस्तान को ताकत देता है, लेकिन भारत की अमेरिका, फ्रांस, और जापान के साथ मज़बूत साझेदारी इसे बैलेंस कर सकती है।


🇮🇳 भारत की रणनीति?

🔥 अपनी कूटनीति को और धार देना।

🔥 वैश्विक मंच पर अपनी उपलब्धियों (इसरो, वैक्सीन कूटनीति) को ज़ोर-शोर से पेश करना।

🔥 आतंकवाद और जलवायु जैसे साझा मुद्दों पर नेतृत्व लेना।



#UNSCPresidency #PakistanUNSC #IndiaDiplomacy #GlobalPolitics #SouthAsia #IndiaVsPakistan #WorldPeace #Geopolitics

(साभार)

गुरुवार, 12 जून 2025

रोहतक की वह बेटी जिसने जिया उल हक़ जैसे क्रूर तानाशाह की नींद उड़ा दी थी

रोहतक की वह बेटी जिसने जिया उल हक़ जैसे क्रूर तानाशाह की नींद उड़ा दी थी,,,


रोहतक के एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मी दसेक साल की उस दुबली मुस्लिम लड़की की एक सबसे पक्की हिन्दू सहेली थी. सहेली और उसकी बहन अपने संगीतप्रेमी पिता के निर्देशन में क्लासिकल गाना सीख रही थीं. एक दिन उस लड़की ने उनके सामने ऐसे ही कुछ गा दिया. शाम को सहेली के पिता उसे घर छोड़ने गए और उसके पिता से बोले – “"मेरी बेटियां अच्छा गा लेती हैं पर आपकी बेटी को ईश्वर से गायन का आशीर्वाद मिला हुआ है. संगीत की तालीम दी जाए तो वह बहुत नाम कमाएगी."  

यूँ 1945 के आसपास उस लड़की के लिए दिल्ली घराने के एक बड़े उस्ताद की शागिर्दी में भर्ती किये जाने की राह खुली. उस्ताद की संगत में जल्द ही उसने दादरा और ठुमरी जैसी शास्त्रीय विधाओं में प्रवीणता हासिल कर ली. पार्टीशन के 4-5 साल तक वह दिल्ली में गाना सीखती रही. 17 की हुईं तो उम्र में उनसे काफी बड़े एक पाकिस्तानी जमींदार को उनसे इश्क हो गया. जल्द ही इस शर्त पर दोनों का निकाह हुआ कि शादी के बाद भी उस की संगीत यात्रा पर कोई रोक नहीं आने दी जाएगी. पति ने अपना वादा अपनी मौत यानी 1980 तक निभाया.

यूँ हमें इक़बाल बानो नसीब हुईं. “हम देखेंगे” वाली इक़बाल बानो!

इक़बाल बानो की गायकी का सफ़र उनकी जिन्दगी जैसा ही हैरतअंगेज रहा. कौन सोच सकता था दादरा और ठुमरी जैसी कोमल चीजें गाते-गाते वह दुबली लड़की उर्दू-फारसी की गजलें गाने लगेगी और भारत-पाकिस्तान से आगे ईरान-अफगानिस्तान तक अपनी आवाज का झंडा गाड़ देगी. उसकी आवाज में एक ठहराव था और गायकी में शास्त्रीयता को बरतने की तमीज. 

फिर 1977 का साल उसके मुल्क में अपने साथ जिया उल हक जैसा क्रूर तानाशाह लेकर आया. धार्मिक कट्टरता के पक्षधर इस निरंकुश फ़ौजी शासक ने तय करना शुरू किया कि क्या रहेगा और क्या नहीं. इस क्रम में सबसे पहले उसने अपने विरोधियों को कुचलना शुरू किया. उसके बाद डेमोक्रेसी और स्त्रियों की बारी आई. जिया उल हक ने यह तक तय कर दिया कि औरतें क्या पहन सकती हैं और क्या नहीं. पाकिस्तान की औरतों के साड़ी पहनने पर इसलिए पाबंदी लग गयी कि वह हिन्दू औरतों का पहनावा थी.

कला-संगीत-कविता जैसी चीजों को गहरा दचका भी इस दौर में लगा. फैज़ अहमद फैज को मुल्कबदर कर दिया गया. हबीब जालिब को जेल भेज दिया गया. उस्ताद मेहदी हसन का एक अल्बम बैन हुआ. शायरों-कलाकारों को सार्वजनिक रूप  से कोड़े लगे. करीब बारह साल के उस दौर की पाशविकताओं और अत्याचारों की फेहरिस्त बहुत लम्बी है.  

ऐसे माहौल में इक़बाल बानो ने विद्रोह और इन्कलाब के शायर फैज़ को गाना शुरू किया. सन 1981 में जब उन्होंने पहली बार फैज़ को गाया, निर्वासित फैज़ बेरूत में रह रहे थे और उनकी शायरी प्रतिबंधित थी. 

उसके बाद जमाने ने इक़बाल बानो का जो रूप देखा उसकी खुद उन्हें कल्पना नहीं रही होगी. बीस साल पहले उनकी आवाज कोमल, तीखी और सुन्दर हुआ करती थी – अनुभव और संघर्ष के ताप ने अब उसे किसी पुराने दरख्त के तने जैसा मजबूत, दरदरा और पायेदार बना दिया था. अचानक सारा मुल्क पिछले ही साल विधवा हुई इस प्रौढ़ औरत की तरफ उम्मीद से देखने लगा था.   

गुप्त महफ़िलें जमाई जातीं. प्रतिबंधित कविताएं गाई जातीं. स्कूल-युनिवर्सिटियों में पर्चे बांटे जाते. इक़बाल बानो हर जगह होतीं.

फिर 1986 की 13 फरवरी को लाहौर के अलहमरा आर्ट्स काउंसिल के ऑडीटोरियम में वह तारीखी महफ़िल सजी. पूरा हॉल भर चुकने के बाद भी हॉल के बाहर भीड़ बढ़ती जा रही थी. आयोजकों ने जोखिम उठाते हुए गेट खोल दिए. सीढियों पर, फर्श पर, गलियारों में – जिसे जहाँ जगह मिली वहीं बैठ गया. कुछ हजार सुनने वालों के सामने इक़बाल बानो ने फैज़ अहमद फैज़ को गाना शुरू किया:

“हम देखेंगे, लाजिम है कि हम भी देखेंगे

वो दिन कि जिसका वादा है, जो लौह-ए-अज़ल में लिक्खा है

हम देखेंगे”

इस नज्म के शुरू होते ही समूचे हॉल में बिजली दौड़ने लगी. सुनने वालों के रोंगटे खड़े होना शुरू हुए. दर्द के नश्तरों से बिंधी, इक़बाल बानो की पकी हुई आवाज के तिलिस्म ने धीरे-धीरे हर किसी को अपनी आगोश में लेना शुरू किया. अजब दीवानगी का आलम तारीं होने लगा. लोगों ने बाकायदा लयबद्ध तालियों से इक़बाल बानो का साथ देना शुरू किया. 

फिर नज्म का वह हिस्सा आया:

"जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां रुई की तरह उड़ जाएँगे

हम महकूमों के पाँव तले ये धरती धड़-धड़ धड़केगी

और अहल-ए-हकम के सर ऊपर जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी

जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से सब बुत उठवाए जाएँगे

हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम मसनद पे बिठाए जाएँगे

सब ताज उछाले जाएँगे

सब तख़्त गिराए जाएँगे" 

भीड़ तालियाँ बजाने लगी. इन्कलाब और इक़बाल बानो की जिंदाबाद के नारे लगाने शुरू हो गए. इस शोरोगुल के थामने तक इक़बाल बानो को गाना बंद करना पड़ा. उन्होंने फिर गाना शुरू किया. इस दफ़ा लोग बेकाबू होकर रोने लगे. 

कई बरसों की रुलाई दबाये बैठा एक मुल्क सांस लेना शुरू कर रहा था. 

उस रात अलहमरा आर्ट्स काउंसिल के आयोजकों-मैनेजरों के घर छापे पड़े. पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर प्रोग्राम की सारी रेकॉर्डिंग्स जब्त कर जला दीं. किसी तरह एक प्रति स्मगल होकर दुबई पहुँच गयी. उसके बाद फैज़-इक़बाल बानो की उस जुगलबंदी का नया इतिहास लिखा जाना शुरू हुआ. दुनिया भर के युवा आज भी उसे लिख रहे हैं.

दो बरस बाद जिया उल हक के अपने ही सलाहकार-साथियों ने उस जहाज में आमों की एक पेटी के भीतर बम छिपा दिए थे जिस पर उसे यात्रा करनी थी. ये बम बीच आसमान में फटे. तब से बीते इतने बरसों में जनरल जिया की हेकड़ी का भूसा भर चुका है. 

इक़बाल बानो आज तक महक रही हैं. पता है 13 फरवरी 1986 की उस रात की कंसर्ट में इक़बाल बानो क्या पहन कर गई थीं?

काले रंग की साड़ी!

Cpd

#AshokPande  जी की जादुई लेखनी

मंगलवार, 13 मई 2025

युद्ध से भी बड़ा ज़हर…

 युद्ध से भी बड़ा ज़हर…


इसी ज़हर के भरोसे आरएसएस अपनी राजनीति साधते रही है , यह बात हर मंच से उठते रहा है 

क्या है वह ज़हर…

कहते है इंसान की फ़ितरत नहीं बदलती, और जब अमेरिका के सीजफ़ायर की घोषणा से बौखलाए नफ़रती चिंटुओं ने जब कर्नल सौफ़िया पर विषवमन शुरू किया तो इस खेल में बीजेपी के मंत्री विजय शाह ही नहीं पूरी बीजेपी एक्सपोज़ हो गई, क्या विजय शाह को हटाया जाएगा, 

लेकिन शुरुआत तो शिवांगी नरवाल और विदेश सचिव विक्रम मिस्सी से हो चुकी थी 

इन सभी को गाली देने वाले एक ही थे, 

शालीनता की हर सीमा लांघने में तत्पर ये लोग कुछ भी कर सकते हैं 

यक़ीन मानिए ये लोग आतंकवादियों से भी ख़तरनाक है…

लेकिन आज हम एक और मुद्दा उठाना चाहते है , आख़िर आतंक के ख़िलाफ़ इस लड़ाई में भारत अकेले क्यों पड़ गया, जबकि पूरा विश्व आतंक के ख़िलाफ़ है

कूटनीति फेल क्यों हो गई जबकि प्रधानमंत्री मोदी सौ देश घूम आए है

क्या इसकी वजह सिर्फ़ अदाणी है 

क्या है हमारे दूसरे देशों से रिश्ते…

भारत आज विश्व में अकेला है।

और ये किसी युद्ध की वजह से नहीं —

बल्कि “नफरती चिंटू” गैंग की वजह से है कहा जाय तो ग़लत नहीं होगा..


11 साल की विदेश नीति देखने के बाद इतना तो कोई भी समझ सकता है —इन नफ़रती चिंटू गैंग ने हमारी कूटनीति का बहुत नुकसान किया है


पहले पड़ोसी देशों को देखिए:


● मालदीव — जहाँ “इंडिया फर्स्ट” था, अब “इंडिया आउट” है। लक्षद्वीप विवाद में “नफरती चिंटू गैंग” ने ट्रोलिंग से देश की छवि डुबो दी। चीन ने मौक़ा देख लिया।


● बांग्लादेश — जिसे आज़ादी दिलाई, उसे हर चुनाव में “घुसपैठिया” कहा गया। CAA-NRC ने रिश्ते जला डाले। सीमा पर गोलीबारी है, ढाका खामोश है।


● श्रीलंका — जब ज़रूरत थी, भारत पीछे रहा। चीन ने बंदरगाह खरीद लिया। “नफरती चिंटू” तमिल भावनाओं की बात तो करता रहा, ज़मीनी मदद नहीं दी।


● नेपाल — 2015 की नाकाबंदी, फिर रामजन्मभूमि की राजनीति। आज हमारी ज़मीन उसके नक्शे में है — नफरती चिंटू उसे हिंदू राष्ट्र बनाना चाहता है और दिल्ली चुप है।


● भूटान — जो कभी सबसे करीबी था, अब कहता है — "भारत अब दोस्त नहीं, दबाव है।"


● म्यांमार — सेना ने लोकतंत्र कुचला, भारत ने चुप्पी साध ली। नफरती चिंटू गैंग रोहिंग्या पर नफ़रत फैलाकर नैतिक धरातल भी गंवा दिया।


और ग्लोबल मंच पर?


● रूस — शीतयुद्ध का साथी अब चीन के साथ है। भारत बस तेल का ग्राहक बन गया।


● अमेरिका — हथियारों की डीलें हैं, लेकिन लोकतंत्र और प्रेस फ्रीडम पर वहाँ बार-बार भारत को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है।


● फ्रांस — राफेल के बाद भी भारत की गिरती रैंकिंग और मुसलमानों के प्रति घृणा को लेकर चिंता ज़ाहिर कर चुका है।


● ईरान — भारत का कभी विरोध नहीं किया ,  “नफरती चिंटू” ने इस्लाम को गाली दी और चाबहार पोर्ट से भारत हटा, चीन आ गया। 


● मलेशिया-इंडोनेशिया — मुस्लिम विरोधी नैरेटिव ने वर्षों पुराने सांस्कृतिक रिश्तों को भी तोड़ दिया।


● फिलिस्तीन — भारत दशकों तक साथ था। अब सरकार इज़रायल के साथ हथियारों में व्यस्त है, जनता अकेली खड़ी है।


दरअसल दुनिया दोस्ती, भरोसे और स्थिरता की भाषा समझती है।





सोमवार, 12 मई 2025

मोदी के राष्ट्र के नाम संदेश के बाद…

 मोदी के राष्ट्र के नाम संदेश के बाद…


देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश में एक बार फिर साफ़ किया कि पानी और खून साथ नहीं बह सकते, मुँह तोड़ जवाब दिया जाएगा, 

एक बार हमने इसलिए कहा कि यही बात पुलवामा के बाद और फिर पहलगाम के बाद बिहार में वे कह चुके थे

उन्होंने प्रधानमंत्री बनने से पहले रजत शर्मा को एक टीवी प्रोग्राम में क्या कहा उसे याद करने की ज़रूरत इसलिए नहीं है क्योंकि पीएम बनने के पहले की सारी बातें ऐसी ही वे करते रहे हैं

तब सवाल अब की बातों का है, सिजफ़ायर ने एक ही झटके में सब बदल दिया।

ट्रंप पर भी भरोसा न करें, तब किस पर?

ऑपरेशन का नाम चयन की सोच…

अब जब अमेरिका बीच में आ ही गया है और पीएम ने राष्ट्र के नाम संबोधन कर ही दिया है तब क्या इस पूरे प्रकरण की विवेचना अपने अपने ढंग से करने की छूट नहीं होनी चाहिए..

प्रमोद जैन लिखते हैं…

किसी भी प्रकरण की सफलता उसके परिणाम से आकी जाती है!

भले गेंद पूरे टाइम आपके पाले में रही, पर आखिरी मिनट में यदि पेनल्टी कॉर्नर पर सामने वाली टीम में आप पर गोल कर दिया,

तो आप जीता हुआ नहीं कह लाओगे!

पहलगाम के बाद कुछ नकारात्मक पहलू जो जनता को परेशान कर रहे हैं! 


1_सीजफायर यदि भारत की शर्तों पर हुआ है तो क्या भारत को पहलगाम और पुलवामा के आतंकवादियों के संदर्भ में अपनी बात नहीं रखनी चाहिए थी?

 और जो खुखार  आतंकवादी हैं उन्हें गिरफ्तार कर भारत में क्यों नहीं लाया गया? 


2_सीजफायर की घोषणा अमेरिका से करवा कर किसी तीसरे देश को भारत और पाकिस्तान के बीच में क्यों महत्व दिया गया? 


3_क्या भारत की विदेश नीति एक्सपोज नहीं हुई, ?


चीन ने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया अमेरिका पर्दे के पीछे पाकिस्तान के साथ गल बहियां करता रहा, और रूस तटस्थ, ना यूरोपीय देशों का समर्थन मिला युद्ध के संदर्भ में ना नाटो के मुस्लिम देश भारत के साथ खड़े हुए ना कोई पड़ोसी मुल्क!


4_और तो और बीएसएफ का एक जवान जो अभी पाकिस्तान के अभिरक्षा में है उसे तक भारत सरकार ने वापस नहीं लिया!


5_हिंदुस्तान के भांड मीडिया ने इतना झूठ क्यों बोला? और भारत की रणनीति को कमजोर क्यों किया?


 इसके बावजूद सरकार द्वारा उन पर कोई प्रतिबंध नहीं लिया गया! 


6_ट्विटर अकाउंट पर सेना के प्रवक्ता विपिन मिस्त्री को गालियां देकर, और पहलगाम के शहीद की पत्नी हिमांशी को जलील कर आखिर हिंदुस्तान के इन तथाकथित भक्तों ने कौन से संस्कारों का परिचय दिया?


7_अमेरिका और चीन कश्मीर के मुद्दे का अंतरराष्ट्रीय करण करने की कोशिश कर रहे हैं, भारत सरकार ने यदि उचित  स्टेप नहीं लिए तो यह भारत के लिए बेहद तकलीफ भरा कार्य रहेगा और इसे लेकर भी देश की जनता बहुत चिंतित है!


8_जिस परमाणु युद्ध की विभीषका का डर दिखाकर यह तथाकथित सीज फायर किया गया है तो क्या भारत को इसका पूर्वानुमान नहीं था?

 यानी यह खुफिया तंत्र कीविफलता है !


9_जिस तरह राफेल के लिए फ्रांस में तकनीक देने से मना किया है और जिस तरह राफेल को लेकर बहुत सारी कंट्रोवर्सी है उसके बाद क्या सरकार का चेहरा नंगा नहीं हुआ है कि उन्होंने भ्रष्टाचार के चलते  देश की सुरक्षा से समझौता किया है?


10_56 इंची सीने का दावा करने वाले मोदी जी स्थितियों का सामना क्यों नहीं कर पाते ?


ना तो आल पार्टी  मीटिंग में आए, न युद्ध विराम की घोषणा की, ना संसद का विशेष सत्र बुलाने की हिम्मत कर पा रहे हैं! 


11,_क्या सीज फायर के बाद पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद की गतिविधियां रुक जाएंगे और क्या अमेरिका की बात पर पाकिस्तान पर भरोसा किया जा सकता है?


12_अग्नि वीर योजना पर भारत के सेना अध्यक्षों ने  जो निराशा जाहिर की है , क्या उसके बाद सरकार एक बार फिर बैक फुट पर आएगी इस योजना केसंदर्भ में?

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लेकिन इन नकारात्मक पहलुओं में भी कुछ  सकारात्मक बातें भी थी, जिसे जनता ने स्वागत किया है! 


1_आतंकवादी गतिविधियों पर पहली बार सीधे पाकिस्तान पर आक्रमण कर भारत सरकार ने यह तो जाहिर किया है इन आतंकवादी घटनाओं के खिलाफ उनकी नीति जीरो टॉलरेंस की रहेगी!


 अगर भविष्य में सरकार चुनाव के समय ही अपने इस नीति पर काम करेगीतो लोग इसे इवेंट या स्टंट मान ने पर मजबूर होंगे!

पर अभी लोग सेना की वजह से इस पर विश्वास कर रहे हैं!


2_जिस तरह पूरे देश ने तमाम राजनीतिक दलों ने सरकार के और सेना के प्रति समर्थन जाहिर किया वह निश्चित रूप से इस देश की एकता और अखंडता की गारंटी था! 


3_भारतीय सेना ने अद्भुत पराक्रम दिखलाया और भारत की युद्ध क्षमता को सबके सामने जाहिर किया और जो हौसला सेना ने दिखाया वह देश के लिए एक सकारात्मक पहलू था!


4_सेना ने आतंकवादीअड्डे , ध्वस्त किए, टारगेटेड अटैक किया, एयर बेस और एयर डिफेंस नष्ट की और अपने नए दौर के युद्ध कौशल का परिचय दिया!


5_ पहलगाम की घटना के बाद जिस तरह घाटी में बंद रहा कश्मीर में बंद रहा, भारत की तमाम मस्जिदों से उस घटना का विरोध किया, धर्म पूछ जात नहीं इस नॉरेटिव को जिस तरह हिंदुस्तान की जनता ने मुंह तोड़ जवाब देकर भारत के आंतरिक  एकता का परिचय दिया वह भी इस घटना का एक सकारात्मक पहलू था!


6_जिस तरह यह कहा गया है की आतंकवादी हमले को सीधा युद्ध समझ जाएगा अगर यह जुमला साबित नहीं हुआ और भारत सरकार  मजबूती से इस रणनीति  पर खड़ी पाई गई तो यह भी एक बहुत बड़ा सकारात्मक पहलू रहेगा आतंकवाद को खत्म करने के लिए!

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दोनों पक्षों के अपने बचाव है अपने-अपने तथ्य है लेकिन जो एक भावनात्मक सैलाब भारत की जनता में बह रहा था pok के संदर्भ में बलूचिस्तान के संदर्भ में और आतंकवादियों को गिरफ्तार करने के संदर्भ में पाकिस्तान के टुकड़े करने के संदर्भ में उस झटका लगा है और इसलिए भी लगा मोदी जी की छवि को मीडिया ने आईटी सेल ने और एक राजनीतिक विचारधारा के लोगों ने इतना ओवररेटेड कर दिया था कि लोगों की आशाएं बहुत ज्यादा थी!

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और निष्कर्ष के रूप में हम यही मान सकते हैं सेना एक बार फिर भारत के लिए गौरव का विषय बनी है और सरकार की नीतियां आलोचना का! 

लेकिन जाते-जाते राहुल गांधी की भूमिका पर भी थोड़ा सा विचार कर ले उसने अग्नि वीर का विरोध किया  और सेना के साथ खड़ा हो गया, राहुल गांधी की सारी बातें सही क्यों निकलती है ?

 और अंत में…

पुलवामा और पहलगाम पर विपक्ष के आरोपों का जवाब नहीं दिया गया है!


रविवार, 11 मई 2025

अब इनकी भी सुन लो…

 अब इनकी भी सुन लो…



भारत और पाकिस्तान के बीच अप्रत्याशित सीजफायर ने कई लोगों को चौंका दिया है. सरकार के इस फैसले पर मशहूर जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट ब्रह्मा चेलानी और पूर्व सेनाध्यक्ष  जनरल वीपी मलिक ने भी सवाल उठाए हैं. 


               चेलानी ने कहा भारत जीत की दहलीज पर था, लेकिन अंत में मन मसोस कर रह गया. युद्धविराम पर नाराजगी जाहिर करते हुए उन्होंने कहा कि भारत इतिहास से सीखने में विफल रहा है. सिर्फ पिछली रणनीतिक गलतियों को दोहरा रहा है. सैन्य गतिविधि भारत के पक्ष में थी. पाकिस्तान की हवाई सुरक्षा भारत की अपेक्षा से कहीं अधिक कमजोर साबित हुई. वे भारत में बहुत सारे ड्रोन और मिसाइल भेज रहे थे, लेकिन प्रभावी रूप से नहीं. दूसरी ओर भारत ने सीमित संख्या में मिसाइल और ड्रोन भेजे और अपने लक्ष्यों को भेदने में सक्षम रहा.'


              ब्रम्हा चेलानी ने सैन्य रूप से स्पष्ट बढ़त रखने के बावजूद भारत के तनाव कम करने के निर्णय के पीछे के तर्क पर सवाल उठाया. उन्होंने कहा, 'यह जीत के मुंह से हार छीनने की भारत की पुरानी राजनीतिक स्थिति को रेखांकित करता है.' उन्होंने आश्चर्य होते हुए कहा कि भारत ने तनाव कम करने का फैसला क्यों किया.


             चेलानी ने मौजूदा स्थिति की तुलना पिछले उदाहरणों से की, जहां उनके विचार में, भारत ने स्थायी रणनीतिक लाभ हासिल किए बिना सैन्य या कूटनीतिक लाभ को आत्मसमर्पण कर दिया.  2021 में हमने रणनीतिक कैलाश हाइट्स को खाली कर दिया, बातचीत में अपनी एकमात्र सौदेबाजी चिप को खो दिया और फिर हम लद्दाख क्षेत्रों में चीनी-डिजाइन किए गए बफर जोन और अब ऑपरेशन सिंदूर पर सहमत हुए.'


            चेलानी ने कहा, 'ऑपरेशन सिंदूर में 26 हत्याओं का बदला लेने का एक शक्तिशाली प्रतीक था और फिर भी आज जिस तरह से हमने पाकिस्तान द्वारा दिल्ली पर मिसाइल दागे जाने के बाद इस ऑपरेशन को समाप्त किया, उससे कई सवालों के जवाब नहीं मिले.' चेलानी ने कहा, 'इतिहास आज भारत के निर्णय को अच्छी तरह से नहीं देखेगा.'


         उन्होंने 'ऑपरेशन सिंदूर' के समापन को रणनीतिक और प्रतीकात्मक चूक बताया, जो जवाब से अधिक सवाल उठाती है.


        करगिल युद्ध के नायक  तत्कालीन सेनाध्यक्ष रहे जनरल वीपी मलिक सीजफायर के ऐलान के बाद कहा - '22 अप्रैल को पहलगाम में हुए भयावह पाकिस्तानी आतंकी हमले के बाद भारत ने सैन्य और असैन्य कार्रवाइयालेकि, लेकिन इनसे कोई राजनीतिक या रणनीतिक लाभ मिला भी या नहीं- यह सवाल हमने भविष्य के इतिहास पर छोड़ दिया है।'

यह सच भी जान लें

परमाणु अप्रसार संधि 1970 में लागू की गई थी भारत ने इसे भेदभाव पूर्ण करार दिया और संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए थे ।

जिसकी वजह से आज भारत के पास अपनी आत्मरक्षा के लिए परमाणु हथियार है । कितना दबाव था जब 1971 में युद्ध दो मोर्चा पर भारत की सेना लड़ रही थी ।

आज भी 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान के आतंकवादी समर्थक ठिकानों पर सेना ने हमले करके । पाकिस्तान और आतंकवाद को मुंहतोड़ जवाब दिया है सेना के शौर्य पर कोई सवाल नहीं है। 

लेकिन युद्ध विराम करना था तो पाकिस्तान पर जोरदार प्रहार के बाद करते। 

भारतीय सेना मजबूत स्थिति में थी तो राजनीतिक नेतृत्व क्यों युद्ध विराम के लिए जल्दबाजी में राजी हो गया, जबकि हमले की शुरुआत पाकिस्तान ने की थी । यही हमारा सबसे मजबूत पक्ष था । हमारे लोग मारे गए थे ।

इसके विपरीत शिमला समझौते की शर्तों को तोड़ने में पाकिस्तान कामयाब रहा क्योंकि तीसरे की मध्यस्ता के बिना द्विपक्षीय समझौते से कश्मीर समस्या को हल करना था ये शर्ते भारत ने लगाई थी और पाकिस्तान इस शर्त को तोड़कर इसमें तीसरे अमरीका की घुसपैठ करवाना चाहता था ताकि भारत पर  दबाव  बनाया जाए।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस चालाकी को समझा और दोनों पाकिस्तान और अमेरिका को कड़ा जवाब दिया था । आज  प्रधानमंत्री मोदी ने इस समझौते में अमेरिका को जवाब देने के बजाय तीसरे पक्ष को न जाने किस दबाव में स्वीकार किया है । शायद भविष्य में गोदी मीडिया इसका खुलासा कर पाए ।

लेकिन इस सब से हटकर देश के मीडिया संस्थान की खबर देखिए तो 22 अप्रैल के बाद फर्जी खबरों की बाढ़ सी चली है । फिर से वही सत्तासीन नेताओं के बचाव के लिए झूठे प्रोपेगैंडा की स्क्रिप्ट लिख दी गई है । उसे फैलाने का काम मंडली पूरे जोर से लग चुकी है ।

यह सवाल पूछने के बजाय कि युद्धविराम भी कुछ शर्तों पे किया जाता की

_पहलगाम हमले के 

हमलावरों की भारत को सौंप दिया जाए

सीमावर्ती इलाकों में भारत के खिलाफ कोई आतंकवादी घटना न हो इसके लिए सुरक्षात्मक उपाय तकनीक के इस्तेमाल की शर्त लगाई जा सकती थी

पाकिस्तान अंतराष्ट्रीय मदद 

का इस्तेमाल भारत के खिलाफ करता है उस विषय पर अंतराष्ट्रीय समर्थन हासिल कर पाकिस्तान को मिलने वाली आर्थिक मदद में रोक लगाई जा सकती थी ।

पाकिस्तान की सेना ही आतंकवाद की समर्थक है इस विषय को वैश्विक मंच पर रखकर पाकिस्तान समर्थित आतंक पर लगाम लगाई जा सकती थी

इन शर्तों पर युद्ध विराम होता तो भी भारत का मजबूत पक्ष वैश्विक स्तर पर उभर कर आता

 लेकिन ऐसा नहीं हुआ और यही बहुत चिंता की बात है ।

अमेरिका ने अपने व्यापारिक हित को महत्व दिया , पाकिस्तान शिमला समझौते की शर्त जिसमें की द्विपक्षीय वार्ता की शर्त भारत की थी उसको तोड़ कर अमेरिकी दबाव से युद्ध विराम अपने पक्ष में  करता दिखता है ।

लेकिन हमें क्या हासिल हुआ, गोदी मीडिया का झूठ, फर्जी खबरें बस यही परिणीति है क्या 140 करोड़ देशवासियों की, भारत बहुत सी आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक चुनौतियों से जूझ रहा है ।

लेकिन पाकिस्तान की तरह भिखमंगिरी भारत ने नहीं की है। भारत अपने दम पर आजाद हुआ और तमाम मुश्किलों के बावजूद आज एक मजबूत राष्ट्र बन कर खड़ा है तमाम अवरोधों, स्वार्थी राजनीति, के बावजूद 140 करोड़ भारत 

वासी स्वार्थी राजनीति और आतंकवाद से आज, कल और भविष्य मे भी टकराने को  तैयार है ।

मंगलवार, 20 अगस्त 2024

अमित शाह का टेंशन और हिदुत्व का खेल...

 अमित शाह का टेंशन और हिदुत्व का खेल...


इधर देश में बलात्कारियों की करतू‌तों को लेकर हंगामा मचा हुआ है, मणिपुर जल रहा जम्मू तक में आकर आतंकवादी अपनी करतू‌तों को अंजाम दे रहे हैं लेकिन देश के गृह मंत्री अमित शाह को बंग्लादेश और पाकिस्तान में हिंदुओं की घटती संख्या को लेकर टेंशन है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि क्या पाकिस्तान और बांग्लादेश मे हिंदुओं की  कथित दुर्दशा और कम होती जनसंख्या का सच क्या है। क्या  यह पूरा खेल भारत में हिंदू वोटरों के ध्रुवीकरण का खेल है। 

क्या लोगों को सच से दूर रखकर एक ख़ास वर्ग के प्रति नफरत फैलाकर अपनी राजनीति साधाने का प्रयास हर चुनाव के पहले किया जाता है।

ये सच है कि 1941 की जनगणना के मुताबिक वेस्ट पाकिस्तान (वर्तमान) में 14 फीसदी हिदू थे और ईस्ट पाकिस्तान (बांग्लादेश) में 26 फीसदी हिन्दू थे।

ऐसे में पाकिस्तान और बाग्लादेश मैं वर्तमान में हितुओं की संख्या  को लेकर बवाल मचाया जाता है कि देखिये पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिदुओं को काट डाला गया।

बहरहाल पाकिस्तान और बाग्लादेश में हिंदुओं की संख्या घटने के तीन प्रमुख कारण है जिसमें से पहला कारण तो सिम्पल स्टेस्टिक्स है तो दूसरा कन्वर्जन जबकि तीसरा कारण

माइग्रेशन है। इन तीनों कारणों से पहले के कारण भी महत्वपूर्ण है जो हिंदुओं की आबादी कम होने की वजह है।

अब 1941 की जनसंध्या के आंकड़े से आगे आ जाइये 1947 में। और 1947 के विभाजन में 50 लाख हिन्दू और सिख वेस्ट पाकिस्तान से भारत आ गये तब 1951 की जन‌ग़णना में हिन्दुओं की संख्या दो फीसदी रह गई। तब से लेकर आजतक उनकी जनसंख्या प्रतिशत में लगभग उतनी है बल्कि 0.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।

ईस्ट पाकिस्तान से भी बंटवारे के दौरान यानी 1947 में हिंदुओं की जनसंख्या  26 से गिरकर 22 फ़ीसदी हो गई।

लेकिन 1970 में पाकिस्तानी सरकार ने तमाम बंगालियों पर अत्याचार किये । मार्शल लॉ लगाया। दो करोड़ हिंदू शरणार्थी भारत की शरण में आ पहुंचे। मुसलमान कहां जाते इसलिए वे वही रहे, वे वहीं मरते रहे, अत्याचार सहते रहे।

अब 7 करोड़ की जनसंख्या में दो करोड़ यदि भारत आ गए तो हिसाब लगा लिजिए कि बांग्लादेश में हिन्दु‌ओं की संख्या कितनी घटी। तब से आज तक ओवर ऑल हिदुओं की संख्या 9-10 फीसदी बची है जो आज भी उतनी ही हैं।

इसी 9-10 फ़ीसदी आंकड़े को पकड़‌कर गृह मंत्री अमित शाह कलह मचाये हुए हैं।

जनसंख्या  घटने का एक और कारण कन्वर्जन को लेकर जो हल्ला मचाया जाता है वह कन्वर्जन प्रासिक्यूशन वहां भी वैसा है जैसे इंडिया में।

ईज्ज़त नौकरी, न्याय  अधिकार को लेकर कन्वर्जन इंडिया में क्या कम हुए है।

जहां तक धर्म के आधार पर विभाजन की बात है तो यह बिल्कुल गलत है लेकिन अमित शाह फिर द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को मुस्लिम लीग के साथ तालमेल बिठानेवाले सावरकर को सर आँखों पर क्यों  बिठाते हैं?

हैरानी की बात तो यह है कि सारा सच इंटरनेट पर मौजूद होने के बाद भी यदि लोग़ राष्ट्रवाद के नाम पर परोसे जा रहे झूठ  पर आखें बंद किये हुए है तो फिर गलत लोगों को राज करने से कोई कैसे रोक सकता है!

सोमवार, 12 अप्रैल 2021

सातवां बेड़ा...

 

अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में विदेशी  हस्तक्षेप को लेकर बाइडन ने साफ कह दिया था कि इसकी प्रतिक्रिया मिलेगी ! तब किसने सोचा था कि अमेरिका का निशाना सिर्फ रूस नहीं भारत भी होगा।

भारत के मामले में बिना चुनौती के इस तरह से सातवें बेड़े के भारतीय ईईंजेड में प्रवेश क्या अबकी बार ट्रम्प सरकार की प्रतिक्रिया है। अपने जहाज को भारत की सीमा में प्रवेश कराकर जिस तरह से प्रेस नोट जारी किया गया है वह पूरी दुनिया को जानकारी देना ही नहीं भारत की फजीहत करना भी है।

भारतीय विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया ये बता रही है कि ऐसा हुआ है। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में लिखा है कि यूएन कन्वेशन के तहत कोई भी देश, किसी दूसरे देश की ईईजेड में देश की अनुमति के बिना हथियार और साजो समान से लदे फ्लीट के साथ प्रवेश नहीं कर सकता। यदि जहाज में व्यापारिक वस्तएं है तो अनुमति की जरूरत नहीं।

हालांकि अमेरिका इसे अधिकार और आजादी का इस्तेमाल करने का दावा कर रही है और इसे फ्रीडम ऑफ नेविगेशन ऑपरेशन बता रही है और यह भी कहा है कि भारत के समुन्दर को लेकर किये जा रहे दावे को वह नहीं मानते और आगे भी ऐसा करते रहेंगे।

यह एक तरह से भारतीय संप्रभुता को खुलकर चुनौती है लेकिन इस मामले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चुप्पी हैरान कर देने वाला है। सांतवा बेड़ा नाम सुनकर 1971 जेहन में आने लगता है। तब पाकिस्तान पर हमला करने पर अमेरिका के द्वारा धमकी दी जा रही थी वो सातवां बेड़ा भेजेंगे। और अमेरिका ने हिन्द महासागर में सातवां बेड़ा उतार भी दिया लेकिन तब इस देश की लौह महिला ने अमेरिका को आंख दिखाकर न केवल सांतवा बेड़ा को लौटने मजबूर कर दिया था बल्कि पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिये थे।

अमेरिका द्वारा किये गये इस सार्वजनिक फजिहत से पहले पाठकों को यह जान लेना चाहिए कि इंदिरा गांधी उसी जवाहर लाल नेहरु की बेटी और राहुल गांधी की दादी है जिन पर परिवारवाद का आरोप जड़ा जाता है और 70 साल में कुछ नहीं किया का दावा किया जाता है। हैरानी तो यह है कि 70 साल में कुछ नहीं करने का दावा वे लोग भी समर्थन करते हैं जो सायकल से कार में पहुंच गए?

खैर राजनीति में झूठ नफरत और अफवाह ही जिनकी सोच हो उनके बारे में ज्यादा क्या कहा जाए? जिस तरह से झूठ और नफरत की दीवार खड़ी हुई है उसी तरह से ये गिर भी जायेगी? लेकिन तब देर न हो जाए।

ऐसे में यदि चीन के बाद दूर बैठे अमेरिका भी यदि भारतीय संप्रभुता को चुनौती देने लगे तो इसका करार जवाब दिया जाना चाहिए क्योंकि अमेरिका हर चुप्पी को कमजोरी समझता है तब अमेरिका यह भी जान ले कि कमजोर देश नहीं सत्ता  हो सकता है!