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गुरुवार, 7 मार्च 2013

अपनी ढपली, अपना राग...


जैसे जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आने लगा है अखबार मालिकों ने अपना खेल शुरू कर दिया है। प्रसार बढ़ाने कुर्सी बांटने वाले भास्कर अब भी अपने को नंबर वन बता रहा है तो नवभारत, हरिभूमि और पत्रिका भी अपने को नम्बर वन बताते नहीं थकते ऐसे में पाठक किसे नम्बर वन माने? अब तो प्रसार बढ़ाने की होड़ में हर अखबार इनामी योजना से लेकर कुर्मी टेबल, हाट-पॉट टिफीन बांट रहे है। इस दौड़ में नई दुनिया भी शामिल है। हालांकि नई दुनिया का मालिक से लेकर संपादक तक बदल चुका है। दूसरी तरफ पत्रकारों की स्थिति भी यही है। अब उनकी पहचान कलम की बजाय बैनर से होती है। और अधिकारी से लेकर नेता भी बड़े बैनर माने जाने वाले अखबार के पत्रकारों को ही ज्यादा पूछ परख करते हैं।
ऐसे में जब चुनाव नजदीक हो तो विज्ञापन और पेड न्यूज की मारा मारी के चलते बड़े बैनरों के इन पत्रकारों पर दबाव भी बहुत है। और अब तो पत्रकारों की किमत भी बढऩे लगी है। बैनर बदलने के एवज में वेतन भी बढ़ रहा है।  मुसिबत छोटे बैनर की बढ़ गई है क्योंकि छोटे बैनर के अच्छे पत्रकारों को बड़े बैनर वाले ज्यादा तनख्वाह देकर अपने यहां ले जाने लगे हैं।
इन सबके बीच छोटे बैनरों खासकर साप्ताहिक और मासिक पत्रिका निकाल रहे पत्रकारों की दिक्कतें भी इस चुनावी साल में बढऩे लगी है। क्योंकि बड़े बैनरों की अपनी सीमा हे और उन पर सरकार व जनसंपर्क विभाग का दबाव भी है जबकि इसके उलट छोटे बैनर वालों की पूछ तभी बढ़ती है जब वे दमदार खबर परोसते हैं।
हालांकि पत्रिका के आने के बाद बड़े अखबारों का तेवर भी बदला है लेकिन चुनाव तक यह तेवर बरकरार रहेगा इसे लेकर संशय जरूर कायम है। नंबर वन की दौड़ में शामिल पत्रिका को विधानसभा का पास नहीं दिये जाने को लेकर चर्चा भी खूब हो रही है और इसे सरकार के बदले की कार्रवाई का भौंडा प्रदर्शन माना जा रहा है।  अब तक पत्रकारों को धमकाने का आरोप पुलिस और माफिया पर ही लगता रहा है लेकिन नंबर वन की दौड़
में शामिल पत्रिका को विधानसभा का पास नहीं दिये जाने को लेकर चर्चा भी खूब हो रही है और इसे सरकार के बदले की कार्रवाई  माना जा रहा है।
अब तक पत्रकारों को धमकाने का आरोप पुलिस और माफिया पर ही लगता रहा है लेकिन इस बार एक मासिक पत्रिका से जुड़े अनिल श्रीवास्तव नायक पत्रकार ने जनसंपर्क के अधिकारी के खिलाफ सिटी कोतवाली में शिकायत की है। शिकायत किये एक माह हो गये लेकिन अभी तक जुर्म दर्ज भी नहीं हुआ है। यानी सरकारी दबाव जारी है।
और अंत में ...
मंत्रालय दूर होने से अफसरों को राहत तो मिली है लेकिन पत्रकारों की दिक्कत बड़ गई है। मंत्रालय के नाम पर समय व रूतबा झाडऩे वालों को अब अन्य सीटों पर मेहनत करनी पड़ रही है।

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

जो है नाम वाला, वही तो बदनाम है!

छत्तीसगढ़ की राजधानी में इन दिनों बड़े व प्रतिष्ठित माने जाने वाले अखबारों ने नया खेल शुरु किया है । अपनी प्रतिष्ठा बचाने के फेर में 'नवभारत' ने तो जग हंसाई कर दी। पता नहीं यह मैनेजमेंट का दिमाग था या शहर को नहीं जानने वाले संपादक का। हुआ यूं कि सीजी-04 में नार्को टेस्ट की कहानी छापी गई और कहा गया कि इसमें एक मंत्री व अधिकारी को बैंक मैनेजर सिंहा को बचाने करोड़ रुपए का लेन देन का खुलासा हुआ है और जिन्हें यह नार्को टेस्ट की सीडी देखना है वे नवभारत आकर देख सकते हैं। अब जिन्हें छत्तीसगढ़ का ज्ञान न हो वह ऐसी बचकानी हरकत कर सकता है क्योंकि यहां के लोग सीडी देखने पहुंच गए। अब उन्हें बगैर सीडी दिखाए लौटाया जा रहा है। यदि यही हरकत छोटे अखबार वाले करते तो इसे ब्लैकमेलिंग की संज्ञा दे दी जाती? आश्चर्य तो यह है कि यह सीडी नवभारत में काम करने वाले ही नहीं देख पाए है? यानी फुल सेटिंग? वसूली? या इसे और नाम कमाने का या पेपर बेचने का फार्मूला क्या कहें।
क्या पत्रिका भी इसी राह पर
रायपुर की आवाज उठाने का दावा करने वाले नए नेवले अखबार ने अपनी आमद से दूसरे बड़े अखबारों को हिला जरूर दिया है लेकिन उसके तेवर फिलहाल दिखाई नहीं पड़ रहे हैं। खबरें नहीं गढ़ने का दावा तो बाद में ही पता चलेगा लेकिन फ्रंट पेज में फुल पेज विज्ञापन छाप कर उसने भी वहीं किया है जो दूसरे बड़े अखबार कर रहे हैं यानी गुड़ के भाई पा...!
सीनियर फोटोग्राफर जब डर गए...
पिछले दिनों डांस बार में भाजपा नेता प्रभाष झा के बेटे के साथ मारपीट के मामले में गिरफ्तार शिव सैनिक प्रमुख धनंजय सिंह परिहार को जब पुलिस ने अदालत में पेश किया तो सीनियर फोटोग्राफरों की हवा निकल गई। पहचान और संबंध था या डर ये तो वही जाने लेकिन सीनियरों ने जूनियरों को फोटो खींचने लगा दिया। स्वयं बचने लगे। केवल विनय शर्मा ही ऐसे थे जो फोटो खींचने पहुंचे। अब चर्चा इस बात की है कि कौन-कौन बार में डांस देख चुका है?
हिमांशु का खेल...
वैसे तो इस बंदे का कोई जवाब नहीं है चाहे कर्मचारियों पर दबाव बनाने की बात हो या मालिकों पर प्रेशर बनाने की। समय के अनुरूप दबाव बनाओं और अपना उल्लू सीधा करो? ऐसे में पत्रिका के दहशत पर अपना उल्लू सीधा कर लिया जाए तो बुराई क्या है?
रमन प्रिंट में
हिन्दुस्तान से प्रताड़ित होने वाले इलेक्ट्रानिक मीडिया का यह कैमरा मेन इन दिनों हरिभूमि का फोटोग्राफर बन गया है। अब वह इलेक्ट्रानिक मीडिया से यादा खुश है।
रामकुमार की जनसत्ता से छुट्टी
भास्कर को अपना ईमान समझने के बाद भी जब वहां से हटाए गए तो रामकुमार परमार ने जनसत्ता का रुख किया अब वे वहां से भी चले गए। कहां जाना है अभी तय नहीं है।
'पप्पू' भी होगा पास...
मौका सबका आता है। जब बड़े-बड़े लोग सुपर स्टार बन रहे हैं तो पप्पू पटेल भला क्यों पीछे रहें? दो फीट का पप्पू पटेल भी बहुत जल्द एक छत्तीसगढ़ी फिल्म में हीरो बनकर आ रहा है। डोंगरगढ़ और इसके आसपास के इलाकों में इस फिल्म की शूटिंग जोर-शोर से चल रही है। पप्पू पटेल को पूरा विश्वास है कि छत्तीसगढ़ के दर्शक उसे जरूर पसंद करेंगे।



और अंत में...
एआईसीसी के इस मेंबर ने इतना अवैध निर्माण कर लिया है कि उसे बचाने भाजपाई नेताओं से गिड़गिड़ाना ही पड़ेगा। अब जनसंपर्क वाले मजा लें तो लेते रहें।