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शनिवार, 12 जून 2021

शराब में सराबोर भूपेश सरकार...

 

शराब बंदी को लेकर सत्ता में आई भूपेश सरकार के राज में अब गांव-गांव में शराब की नदियां बहने लगी है। अवैध शराब कारोबारियों को जिस तरह से प्रश्रय दिया जा रहा है वह चिंतनीय है। अवैध शराब के खेल में जिस तरह से माफिया, पुलिस और नेताओं की मिलीभगत भी सामने आने लगी है। 

ऐसे में छत्तीसगढ़ के गांव-गांव की शांति छिन गई है और परिवार के परिवार बर्बादी की कगार पर है लेकिन सत्ता को शराब से होने वाली कमाई ही दिखाई दे रहा है। महासमुंद की रेल पटरी में जिस तरह की लाशें बिछी वह क्या आगे भी बिछती रहेगी। यह सवाल इसलिए है क्योंकि  अवैध शराब के कारोबारियों के शिकंजे में पूरा छत्तीसगढ़ फंस चुका है। बेमचा की उमा और उसकी पांच बेटियों की आत्महत्या का मामला भले ही कुछ दिनों बाद भूला दी जाए लेकिन सच तो यही है कि शराबी पति या शराबियों की वजह से न केवल घरेलु हिंसा बढ़ी है बल्कि अपराध में भी बढ़ोत्तरी हुआ है। सामाजिक ताने-बाने भी टूट रहे हैं और परिवार भी बिखर रहा है।

ऐसे में शराबबंदी की पहल कांग्रेस ने इसलिए की थी क्योंकि रमन सरकार में शराब की नदिया बहने लगी थी, थाने दस-दस हजार में बिकने की चर्चा थी और डॉ. रमन सिंह दारु वाले बाबा कहलाने लगे थे। शराब से परेशान छत्तीसगढ़ के लोगों ने कांग्रेस के वादे पर भरोसा किया और कांग्रेस प्रचंड बहुमत से जीत भी गई। कहा जाता  है कि शराब बंदी के वादे की वजह से महिलाओं ने कांग्रेस को एकतरफा वोट दिया था लेकिन  ढाई साल बाद भी भूपेश सरकार ने शराब बंदी की बात तो दूर इसके लिए न तो कोई सामाजिक जागरुकता ही चलाई और न ही कोई सरकारी स्तर पर ही पहल हुआ उल्टे अवैध शराब के कारोबारियों को प्रश्रय दिए जाने की खबर आने लगी है।

राजधानी रायपुर में ही किस तरह के लोग अवैध शराब का कारोबार कर रहे हैं यह किसी से छिपा नहीं है और इन लोगों की सत्ता से नजदिकियां भी किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में सरकार यदि शराब में डूब गई है कहा जाए तो गलत नहीं होगा जबकि यह किसी से छिपा नहीं है कि पिछले ढाई साल में सत्ता का शराब को लेकर क्या मापदंड है। जबकि सत्ता चाहे तो चरणबद्ध ढंग से भी शराब बंदी कर सकती है। यह ठीक है कि जिन राज्यों में शराबबंदी है वहां भी अवैध शराब बन रहे है लेकिन जागरुकता अभियान और चरणबद्ध ढंग से इसे अमलीजामा तो पहनाया ही जा सकती है।

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2021

अंधेरे नगरी, चौपट राजा

 

यह तो बचपने में सुनी कहानी अंधेर नगरी, चौपट राजा, टकासेर भाजी- टकासेर खाजा की कहानी को ही चरितार्थ करता है वरना सरकार का जोर सिर्फ बाजार पर नहीं होता। इस बार का बजट पर पूरा जोर बाजार पर है और बाजार पर जोर का केवल एक ही अर्थ है कि हर कीमत पर सरकार को टेक्स चाहिए और हर कीमत पर टेक्स का मतलब इस देश की बहुत सी चीजे निजी हाथों को बेच दी जायेगी और निजी हाथों में बेचने का अर्थ उन हाथों को नहीं देखना है कि वह देशी है या विदेशी?

हम शुरुआत एलआईसी से करें या पुराने वाहनों को रातो-रात कबाड़ में तब्दिल करने की योजना से से करें। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

पूरी दुनिया में वाहनों की सड़क से हटाने के लिए फिटनेस सर्टिफिकेट देखा जाता है लेकिन यह सरकार उसकी उम्र देख रही है, इसका सीधा सा मतलब है कि वह जानती है कि लोगों की हालत नये वाहन खरीदने की नई रह गई है, इसलिए वाहन उद्योग की तिजौरी भरने के लिए यही एक मात्र उपाय है?

इसी तरह से देश में भारतीय जीवन बीमा निगम ही एक ऐसी संस्था है जिसके फल-फूल और जड़ सभी मजबूत है वह कई बार सरकार को भी फंड देती है, लेकिन अब सरकार को लगने लगा है कि इससे काम नहीं चलेगा इसलिए उसके फल और फूल तोड़े जायेंगे, फिर तना और आखरी में जड़ को खोखला कर दो।

बजट को लेकर जिस तरह की प्रतिक्रिया आ रही है, उसमें छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की प्रतिक्रिया का अर्थ लोगों को समझना चाहिए ''बकौल भूपेश बघेल मैं पहले ही कता था कि कांग्रेस ने 70 साल में जो कुछ बनाया है ये वह सब एक-एक करके बेच देंगे!ÓÓ

जब बजट की ऐसी प्रतिक्रिया है तो समझा जा सकता है कि मोदी सत्ता आने वाले दिनों में क्या करने वाली है  और देश किस दिशा में जा रहा है।

शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

सरकारी जमीनों का बंदरबांट अब बंद करो...

जब से रमन सरकार सत्ता में आई है सरकारी जमीनों को बांटने में दस गुणा से यादा तेजी आई है। कभी उद्योगों के नाम पर तो कभी कस्बों या नई राजधानी के विस्तार के नाम पर सरकारी जमीनों को कौड़ियों के मोल हड़पा जा रहा है। यही स्थिति ही तो न चारागान के लिए जमीनें बचेंगी न ही खुली हवा में सांस लेने के लिए ही जमीन बचेंगी। कांक्रीट के जंगल ने पहले ही राजधानी रायपुर के लोगों को गर्मी में रहने मजबूर कर दिया है। ऐसे में सरकार शहर या उद्योगों की बजाय गांवों के विकास न कृषि के विकास पर सिर्फ इसलिए योजना नहीं बनाती क्योंकि इससे आम लोग ख्रुशहाल होंगे और फिर उनके भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति पर अंकुश लग जाएगी।
ताजा मामला राजधानी से लगे ग्राम अछोली का है। यहां श्मशान की जमीन एक उद्योगपति को आबंटित की जा रही है। लोग जब विरोध पर सड़कों तक आएं तब पता चला कि यहां की सरकारी जमीनों पर किस तरह से उद्योगपतियों ने अवैध कब्जा कर रखा है। अवैध कब्जों में निश्चित रुप से पटवारी से लेकर मुख्यमंत्री तक की सहमति होगी अन्यथा पटवारियों व तहसीलदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं की जाती।
अब तो गृह निर्माण मंडल ने भी कस्बों में अपनी योजना को विस्तार करना शुरु कर दिया है और कस्बों की सरकारी जमीनों पर कांक्रीट के जंगल खड़ा किया जाने लगा है। गृह निर्माण मंडल के पदाधिकारी से लेकर इंजीनियरों ने एक साजिश के तहत पैसा कमाने का खेल खेला है। चूंकि निर्माण में भ्रष्टाचार और कमीशन का लंबा चौड़ा खेल है इसलिए शहर से कस्बों तक सरकारी जमीनों को हड़पा जा रहा है। पूरी सरकार इस खेल में शामिल है और छत्तीसगढ़ की सरकारी जमीनों को साजिश के तहत हड़पा जा रहा है। भाजपा सरकार में ही नहीं कांग्रेस ने भी कमोबेश यही काम किया है। विद्याचरण शुक्ल को अपोलो अस्पताल के लिए दी गई जमीन का क्या हुआ। किसी में हिम्मत है कि पूछा जा सके? और जब विद्याचरण शुक्ल अस्पताल के नाम पर जमीन हड़पने लगे तो फिर भाजपाई क्यों पीछे रहे इसलिए भाजपा नेता गौरीशंकर अग्रवाल के रिश्तेदार डॉ. कमलेश्वर अग्रवाल और मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के भाई देवेन्द्र अग्रवाल के साढू डॉ. सुनील खेमका को कौड़ी के मोल सरकारी जमीन देने का कोई कांग्रेसी कैसे विरोध कर सकता है। पूर्व मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल पर तो बंगले, प्रेस और पेट्रोल पम्प के नाम पर सरकारी जमीनों को लीज पर लेने का मामला सुर्खियों में रहा है।
अखबारों द्वारा सरकारी जमीनें जब हड़पी जाने लगी तो फिर चोर-चोर मौसेरे भाई की तर्ज पर खेल को कौन रोक सकता है। लीज की जमीनें और उस पर अवैध निर्माण के खेल ने छत्तीसगढ़ की सरकारी जमीनों को तहस-नहस तो किया ही पर्यावरण को भी अच्छा नुकसान पहुंचाया है। खुली हवा में सांस लेने को दुर्लभ बनाते इन सरकारी योजनाओं पर आम आदमी केवल दुख जाहिर ही कर सकता है। हम सरकारी जमीन के ऐसे किसी भी बंदरबांट के विरोधी है यदि स्वयंसेवी संगठनों को भी ऐसे जमीनें दी जाती है तो वह भी गलत है और राजनैतिक पार्टियों को तो बिल्कुल भी सरकारी जमीनें नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि व्यवसाय का रुप ले चुकी राजनीति ने आम आदमी की बजाय अपने हितों को ही अधिक साधा है।