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रविवार, 4 अगस्त 2024

पांडे से अनुराग की बजाय द्वेष क्यों...

 पांडे से अनुराग की बजाय द्वेष क्यों...


इसी महिने रिटायर्ड होने वाले आईएएस अनुराग पाण्डे को बीजापुर कलेक्टर से हटाकर मंत्रालय भेज देने की घटना से भाजपा के कई दिग्गज मी चौंक गये हैं। ख़ाटी संघ परिवार के अनुराग पाण्डे के पिता स्व मनहरण लाल पांडे बिलासपुर से सांसद रहे है तो बहन हर्षिता पाण्डे भी भाजपा में बेहद सकिय है इसने बाद भी उनका हटा दिया जाना चर्चा का विषय है।

भले ही लोग इसे भाजपा नेता से विवाद वाले विडियों से जोड़ रहे हो या फिर धमकी देने वाला भाजपाई अपनी पीठ थपथपा रहा हो लेकिन कहा जा रहा है कि असल कहानी तो बिलासपुर के इलाने की है, जहां हर्षिता पाण्डे ने डॉ रमन सिंह के कार्यकाल के दोरान की थी l हालांकि एक चर्चा तो विष्णुदेव साय के लाड‌ले मंत्री केदार कश्यप प्रदेश भाजपाध्यक्ष किरणदेव को लेकर भी सुनाई जा रही है कि वे दोनों ही नेता की वे ठीक से नहीं सुनते थे।

 कहा जाता है कि खाटी छत्तीसगढ़िया अनुराग पाण्डे को हटाने के पिछे की बड़ी वजह जगदलपुर के उस व्यापारी की है जिसका पूरा वैध-अवैध व्यापार बीजापुर पर निर्भर है और हाल ही में मुख्यमंत्री के मेरे बस्तर प्रवास पर  उस व्यापारी ने मुख्यमंत्री से मुलाकात की थी।


इधर अनुराग पाण्डे को हटाने को लेकर छत्तीसगर सवर्ण संघर्ष समिति ने भी मोर्चा खोलते हुए ज्ञापन सौंपा है। इस ज्ञापन की भी अपनी कहानी है। बहरहाल अनुराग पांडे को 

इस तरह से हटाने से उन लोगों को भी झटका लगा है जो रिटायर्ड के बाद नियुक्ति का सपना पाले अपने को भाजपाई कहते नहीं थकते हैं।

मंगलवार, 16 जुलाई 2024

खिसीयानी बिल्ली खंभा नोचे...

 खिसीयानी बिल्ली खंभा नोचे...


यह तो खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की कहावत को ही चरितार्थ करता अन्यथा छत्तीसगढ़ में बदहाल होती कानून व्यवस्था को लेकर वे लोग आग बबूला नहीं होते जिन पर अपराधियाँ को ही संरक्षण देने का आरोप है या अपने राजनैतिक उद्देश्य के लिए गलत काम करने वालों को प्रश्रय देने का आरोप है।

दरअसल डबल इंजन की सरकार बनने के बाद छत्तीसगढ़ में कानून व्यवस्था की स्थिति दिनों दिन बदतर होते जा रही है, अपराधियों के हौसले बुलंद है, सरे आम चाकू बाजी और धमकी चमकी की ही खबर बस नही है, नशे का कारोबार तो फल-फूल रहा ही है, राजनैतिक संरक्षण के चलते कोल माफिया रेत माफिया, भू-माफिया सहित कई तरह के माफियाओं ने अपना खेल बड़े पैमाने पर शुरू कर दिया है, ऐसे में कांग्रेस ने भी सरकार को घेरने की रणनीति के तहत विधानसभा घेराव का निर्णय ले लिया है।

कांग्रेस के बढ़ते दबाव और आक्रामक रवैये के चलते सत्ता में बेचैनी बढ़ गई है । और इसी के तहत पिछले दिनों मंगलवार को गृहमंत्री विजय शर्मा ने रायपुर जिले के जनप्रतिनिधियों की बैठक बुलाई थी। यह जनप्रतिनिधियो की बैठक थी या केवल भाजपाई विधायक और सांसद को ही बुलाया गया था, यह कहना पर मुश्किल है। लेकिन बैठक में पहुंचे जनप्रतिनिधियो से कानून व्यवथा सुधारने के लिए सुझाव मांगे गये।

कहा जाता है कि इस टेबल टॉक के दौरानअन्य विधायकों ने सुझाव भी दिये किसी ने नाईट गश्त बढ़ाने की बात कही तो किसी ने  नशे के बढ़ते कारोबार पर चिंता जताई।

लेकिन कहा जाता है कि रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने तो अपने को किनारे लगाने की भड़ास ही निकाल ली, मंत्री पद से मजबूरी में इस्तीफ़ा देने वाले मोहन सेठ ने तो यहां तक कह दिया कि कानून व्यवस्था की ऐसी बदतर स्थिति मैंने आज तक नहीं देखी।तो रायपुर पश्चिम के विधायक ने भी जमकर भड़ास निकाला ।

कहा जाता है कि दोनों ही नेताओका ग़ुस्से की असली वजह क़ानून व्यवस्था  के बहाने स्वयं की उपेक्षा को लेकर अधिक था। जबकि अन्य जनप्रतिनिधि सामान्य लहजे में सुझाव दे रहे थे। सूत्रों का कहना है कि मोहन सेठ और मूणत सेठ के इस तेवर से न केवल गृहमंत्री हतप्रभ रह गये बल्कि इसे लेकर पार्टी में भी कई तरह की चर्चा है।

हालांकि अंत भला तो सब भला की तर्ज पर मीडिया में वहीं खबरें छपी जो दोनों को कानून व्यवस्था का चिंतक साबित करें।

शुक्रवार, 5 जुलाई 2024

झीरम का भूत ...

 झीरम का भूत ...


लगता है. झीरम का भूत आईपीएस मयंक श्रीवास्तव का पीछा ही नहीं छोड़ रहा है, २००६ बैच के इस अधिकारी ने वैसे तो पुलिस कप्तान के रूप में बस्तर के कई जिले संभाले हैं, जिले कैसे संभाल रहे थे, इसका एक अलग ही कहानी है लेकिन इन दिनों  प्रदेश सरकार ने उन्हें पत्रकारों को संभालने का जिम्मा देते हुए डायरेक्टर के पद पर जनसंपर्क विभाग में नियुक्त किया हुआ है।

 लिखने-पढ़ने, कविता - कहानी के शौकीन मयंक श्रीवास्तव को यह रास नहीं आ रहा है, और वे किसी रेंज में आईजी बनने के लिए छटपटा रहे हैं। लेकिन कहा जाता है कि राज्य सरकार उनके नाम से डरी हुई है और नहीं चाहती कि बेवजह विपक्षी कांग्रेस को मौका मिले।

दरअसल 2013 में जब झींरम घाटी काण्ड हुआ था जिसमें कांग्रेस के कई दिग्गज नेता नक्सली हमले में मारे गए थे उस दौरान मयंक श्रीवास्तव ही एस पी थे। घटना के तत्काल बाद उन्हें हटा दिया गया था। लेकिन वे अब भी कांग्रेस नेताओ के निशाने पर है।


ऐसे में सरकार के सामने दिक़्क़त यह है कि उनकी पोस्टिंग यदि जिले में की जाती है तो कांग्रेस इस मामले को लेकर हल्ला मचायेगी। 2018 में सत्रा परिवर्तन के बाद से मयंक श्रीवास्तव लूप लाईन में  चल रहे हैं और भूपेश सरकार  के दौरान वे अग्निशमन, आपातकालीन‌ सेवा, एसडी आर एफ जैसा काम संभालते रहे हैं।


2023 में सत्ता परिवर्तन के बाद उन्हें उम्मीद थी कि कहीं न कहीं फिट कर दिये जायेगे लेकिन यूपी वाले इस साहब को जनसंपर्क में बिठा दिया गया। हालांकि जनसंपर्क में बैठने वाले वे पहले आईपीएस नहीं है। जिनसे उन्होंने चार्ज लिया वह दीपांशु काबरा भी आईपीएस ही है, अब दीपांशु काबरा की अपनी अलग कहानी है, ईडी के राडार में  रहने वाले दीपांशु काबरा से चार्ज लेने वाले मयंक श्रीवास्तव का मन इस विभाग से भर गया है तो इसकी वजह वर्दी के रौब में आई कमी है और अब वे आईजी बनने की छटपटाहट में ऐसे ऐसे लोगों का चक्कर लगा रहे हैं जो उनके सामने बैठने की हिम्मत नहीं कर पाते थे।

गुरुवार, 27 जून 2024

साय का संविदा प्रेम...

साय का संविदा प्रेम...


मुख्यमंत्री बनने से चूक गये अरूण साव अब उपमुख्यमंत्री बनने के बाद ऐसा कोई मौका छोड़‌ना नहीं चाहते जो एक मुख्यमंत्री के हिस्से में न आता हो।  भारी भरकम कई विभाग संभाल रहे अरुण साव के किस्से अब बाहर आने लगे हैं तो इनकी वजह उनका संघ प्रेम भी है लेकिन कहा जाता है कि संघ प्रेम के साथ साथ वे संविदा प्रेमी भी बन गये हैं।

हिंग लगे ने फिटकिरी और रंग चोखा की तर्ज पर चल  इस खेल में नियम कायदों को ताक में रखकर  सेवानिवृत कर्मचारियों और अधिकारियों को संविदा नियुक्ति देने की चर्चा है ओर चर्चा तो उन लोगों को संविदा देने की भी है जो लेन-देन में खूब विश्वास रखते हैं, लेकिन अरुण साव का संबंध आरएसएस से है इसलिए वे इसमें कितना माहिर है, समझा जा सकता है।

चुनाव के पहले प्रदेश अध्यक्ष बनकर उन्होंने जो भूमिका निभाई थी, अब उसकी भी परते उघड़‌ने लगी है और अब उपमुख्यमंत्री बनकर वे कितनी सावधानी बरत रहे हैं वह भी काम नहीं आ रहा है।

कहा जाता है कि असल में उनका मुख्यमंत्री नहीं बन पाने की बड़ी वजह वे खुद भी नहीं तलाश पाये हैं, रमन सिंह ओपी चौधरी से लेकर संघ के एक बड़े पदाधिकारी हो या संगठन का काम देखने. चुनाव के दौरान दिल्ली से भेजे गये लोग ।

लेकिन अब अरुण साव किसी को भी कोई मौका देना नहीं चाहते इसलिए वे फूंक फूंक कर कदम तो उठा रहे हैं लेकिन ख़ैर, खून, खाँसी ख़ुशी के साथ प्रेम भी कहां छिपता है।