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शनिवार, 22 मई 2021

प्रधानमंत्री के आंसू...

 

कोरोना के इस भीषण तबाही को लेकर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दुखी है, तो उन्हें दुखी होना भी चाहिए क्योंकि कोरोना की जो तबाही और नरसंहार इस देवभूमि के कतरे कतरे में दिखाई दे रहा है उसकी वजह किसी से छिपी भी नहीं है। सत्ता की लापरवाही के चलते हुए इस नरसंहार को लेकर दुखी होना और इसकी जिम्मेदारी लेना दोनों ही अलग बात है।

हम यह बिल्कुल भी नहीं कह रहे हैं कि नरसंहार के इस मंजर से प्रधानमंत्री जी दुखी होने का नाटक कर रहे हैं क्योंकि जिस तरह से रुदन और वेदना के स्वर आकाश से ऊंचा होता जा रहा है उसमें दुखी होने के अलावा कोई राह भी नहीं है। सत्ता या नेताओं को लेकर कितनी भई मोटी चमड़ी की बात कही जाए वह मोटी चमड़ी भी इस रुदन के आगे पिघल जायेगी फिर नरेन्द्र मोदी तो देश के प्रधानमंत्री है। 

ऐसे में उनके दुख के सच होने को लेकर आश्वस्त होना चाहिए हो यदि वे अपनी लापरवाही का बयान नमस्ते ट्रम्प से शुरु कर तमाम लापरवाही को गिना देते तो शायद उनके दुख पर सवाल नहीं उठता। लेकिन सत्ता के प्रमुख पदों पर बैठने वालों का अपना चरित्र होता है, फिर जिम्मेदारी को स्वीकार करने के लिए न केवल नैतिक साहस की जरूरत होती है बल्कि अपने भीतर के झूठ और छल को मारना पड़ता है। और यदि राजा जिम्मेदारी स्वीकार कर ले तो फिर वह कैसा राजा।

कोरोना के दौर में देश की सत्ता से लोगों की उम्मीद यदि बड़ी है तो इसके लिए प्रधानमंत्री को कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। सत्ता की जब पूरी रईसी लोगों के टैक्स पर निर्भर है, सेन्ट्रल विस्टा के लिए पैसे या प्रधानमंत्री के महल के लिए पैसे जब टैक्स से ही आना है तो वैक्सीन को टैक्स फ्री कैसे किया जा सकता है। आखिर जनता पेट्रोल, रसोई गैस पर टैक्स दे ही रही है, दवा से लेकर घरेलु उपयोग की वस्तुओं  की कालाबाजारी में अधिक पैसे दे ही रही है तब वैक्सीन में टैक्स देने से क्या परेशानी हो सकती है।

इसलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर टैक्स नहीं लेने का दबाव डालना ही गलत है, वैसे भी सत्ता चलाना आसान काम तो है नहीं। फिर आपदा के समय तो यह और भी मुश्किल भरा काम है। सलाह देने या आलोचना करने वालों का क्या है उनका कौन सा पैसा लगना है तब उनकी सलाह तो बेमानी ही हुई और फिर मुफ्त की सलाह की कोई कीमत भी तो नहीं होती। देश को प्रधानमंत्री को धन्यवाद करना चाहिए क्योंकि वे न केवल दुखी है बल्कि उन्होंने मृतकों को श्रद्धांजलि भी दे दी है और अब क्या किसी को सुली पर चढ़ाओगे?

बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

हजारों तरह के आंसू...

 

आंसूओं को लेकर शायरों और कवियों ने जो बातें और जितनी भी बातें कहीं है उससे इतर भी कोई बात होगी या नहीं कहना कठिन हैं। लेकिन गुलाम नबी आजाद निश्चित रुप से उस तरह के राजनेता है जिन्हें आसानी से भूला देना मुश्किल है।

छत्तीसगढ़ में राज्य गठन के दौरान जब वे पर्यवेक्षक बनकर आये तो उनके ही सामने मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की कथित रुप से पिटाई हुई। लेकिन उन्होंने न तब अपने ताकत का इस्तेमाल किया न कभी भी उनके बारे में यह बात सुनने को नहीं मिली कि कांग्रेस हाईकमान तक अपनी पहुंच का कभी उन्होंने बेजा इस्तेमाल किया । कश्मीर के इस नेता ने हमेशा ही देश हित को लेकर काम किया और आज राज्य सभा से उनकी विदाई पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी बोलते-बोलते जब भावुक हो गये तो सहसा कई सवाल मन में उठने लगे।

वर्तमान नफरत के दौर में यह सवाल उठना स्वाभाविक भी था। जिन लोगाों के लिए हिन्दू राष्ट्र के अलावा कोई स्वीकार्य ही नहीं है और जो लोग मुसलमानों को इस देश का दुश्मन समझते हुए विषवमन करते रहते हैं उनके लिए प्रधानमंत्री मोदी का गुलाम नबी आजाद के प्रति स्नेह की क्या प्रतिक्रिया हुई होगी यह बताने की जरूरत नहीं हैं। क्योंकि जब किसी के दिल में सांप रेंगता है तो उसके मुंह से जबान चली जाती है।

ये देश गंगा-जमुना तहजीब का है, इस देश की आजादी में हर धर्म और हर जाति ने अपनी कुर्बानी दी है और आजादी के बाद उत्पन्न हर विषम परिस्थितियों का कंधे से कंधा लगाकर मुकाबला किया है लेकिन 2014 में जिस ढंग का अवतार हुआ हालांकि उसका बीज 2002 में ही लगाया जा चुका था, उस अवतार ने इस देश में नफरत की ऐसी आंधी चलाई है कि पूरा एक वर्ग हाशिये पे डाल दिया गया। नफरत के इस दौर में सत्ता भी वही फैसला करते रही ताकि सत्ता के लिए हथियार जुटाये जा सके लेकिन इसका दुष्परिणाम क्या हुआ। हम आर्थिक रुप से टूट गये, युवाओं के पास रोजगार खत्म हो गया, बढ़ती मंहगाई ने जीना दूभर कर दिया लेकिन राष्ट्रवाद और हिन्दूवाद के झांडे का छाया इतना गहरा रहा कि इस देश की भलाई किसमें है यह दिखना ही बंद हो गया।

क्या यह भावुक क्षण यह इशारा नहीं करता कि देश को जितनी जरूरत हिन्दुओं की है उतनी ही जरूरत मुसलमानों या दूसरे धर्म के लोगों की भी है। क्या ये आंसू उन भक्तों को भी दिखावा लगेगा जो अपने दिल में नफरत की आग लेकर चल रहे हैं या इस आंसू के बाद कथित अवतारी में इतना साहस होगा कि वह अनेकता में एकता के लिए मार्ग प्रशस्त करे।

सवाल कई हैं, लेकिन सत्ता की घिनौनी राजनीति ने जिस, बीज को बोया है उसे पेड़ बनने से रोकना ही होगा। वरना प्रधानमंत्री के आंसू पर सवाल उठने से कोई कैसे रोक सकता है!

आंसूओं को लेकर शायरों और कवियों ने जो बातें और जितनी भी बातें कहीं है उससे इतर भी कोई बात होगी या नहीं कहना कठिन हैं। लेकिन गुलाम नबी आजाद निश्चित रुप से उस तरह के राजनेता है जिन्हें आसानी से भूला देना मुश्किल है।

छत्तीसगढ़ में राज्य गठन के दौरान जब वे पर्यवेक्षक बनकर आये तो उनके ही सामने मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की कथित रुप से पिटाई हुई। लेकिन उन्होंने न तब अपने ताकत का इस्तेमाल किया न कभी भी उनके बारे में यह बात सुनने को नहीं मिली कि कांग्रेस हाईकमान तक अपनी पहुंच का कभी उन्होंने बेजा इस्तेमाल किया । कश्मीर के इस नेता ने हमेशा ही देश हित को लेकर काम किया और आज राज्य सभा से उनकी विदाई पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी बोलते-बोलते जब भावुक हो गये तो सहसा कई सवाल मन में उठने लगे।

वर्तमान नफरत के दौर में यह सवाल उठना स्वाभाविक भी था। जिन लोगाों के लिए हिन्दू राष्ट्र के अलावा कोई स्वीकार्य ही नहीं है और जो लोग मुसलमानों को इस देश का दुश्मन समझते हुए विषवमन करते रहते हैं उनके लिए प्रधानमंत्री मोदी का गुलाम नबी आजाद के प्रति स्नेह की क्या प्रतिक्रिया हुई होगी यह बताने की जरूरत नहीं हैं। क्योंकि जब किसी के दिल में सांप रेंगता है तो उसके मुंह से जबान चली जाती है।

ये देश गंगा-जमुना तहजीब का है, इस देश की आजादी में हर धर्म और हर जाति ने अपनी कुर्बानी दी है और आजादी के बाद उत्पन्न हर विषम परिस्थितियों का कंधे से कंधा लगाकर मुकाबला किया है लेकिन 2014 में जिस ढंग का अवतार हुआ हालांकि उसका बीज 2002 में ही लगाया जा चुका था, उस अवतार ने इस देश में नफरत की ऐसी आंधी चलाई है कि पूरा एक वर्ग हाशिये पे डाल दिया गया। नफरत के इस दौर में सत्ता भी वही फैसला करते रही ताकि सत्ता के लिए हथियार जुटाये जा सके लेकिन इसका दुष्परिणाम क्या हुआ। हम आर्थिक रुप से टूट गये, युवाओं के पास रोजगार खत्म हो गया, बढ़ती मंहगाई ने जीना दूभर कर दिया लेकिन राष्ट्रवाद और हिन्दूवाद के झांडे का छाया इतना गहरा रहा कि इस देश की भलाई किसमें है यह दिखना ही बंद हो गया।

क्या यह भावुक क्षण यह इशारा नहीं करता कि देश को जितनी जरूरत हिन्दुओं की है उतनी ही जरूरत मुसलमानों या दूसरे धर्म के लोगों की भी है। क्या ये आंसू उन भक्तों को भी दिखावा लगेगा जो अपने दिल में नफरत की आग लेकर चल रहे हैं या इस आंसू के बाद कथित अवतारी में इतना साहस होगा कि वह अनेकता में एकता के लिए मार्ग प्रशस्त करे।

सवाल कई हैं, लेकिन सत्ता की घिनौनी राजनीति ने जिस, बीज को बोया है उसे पेड़ बनने से रोकना ही होगा। वरना प्रधानमंत्री के आंसू पर सवाल उठने से कोई कैसे रोक सकता है!