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रविवार, 17 फ़रवरी 2019

वैचारिक पत्रकारिता और दलाली




यह सच है कि वैचारिक पत्रकारिता करना बहुत कठिन है। किसी एक विचारधारा के समर्थन में खड़ा होना वह भी सीना ठोंक के आसान नहीं है। वह भी तब जब आप सत्ता के बाहर हो। छत्तीसगढ़ में वैचारिक पत्रकारिता की शुरुआत कब से हुई यह कहना कठिन है लेकिन इसकी शुरुआत युगधर्म से होने की बात कही जाती है। अपना पक्ष रखने दक्षिणपंथियों ने अखबार निकाला और फिर एक विचारधारा को लेकर संघर्ष करते रहे लेकिन यह स्वीकार्य तब भी नहीं था और न ही दैनिक स्वदेश के खुलने के बाद ही स्वीकार्य हो पाया। परिणाम स्वरुप इस एक विचारधारा के साथ खड़ा रहना मुश्किल कार्य रहा इस तरह की पत्रकारिता से न केवल अखबार को खड़ा रखना मुश्किल है बल्कि एक विचारधारा को लेकर चलने वाले पत्रकारों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते रहे हैं। यही वजह है कि सत्ता के दौरान फलने-फूलने वाले ऐसे पत्रकार सत्ता जाते ही गड़बड़ा जाते है।
ताजा उदाहरण छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद देखा जा सकता है। भाजपा की सत्ता जाते ही कल तक स्वयं को भाजपाई विचारधारा का समर्थक बताने वाले ऐसे अधिकांश पत्रकारों में स्वयं को भाजपा विरोधी साबित करने की होड़ सी मच गई है। कुछ तो पत्रकारिता छोड़ दूसरा काम धाम में रुचि ले रहे हैं तो कुछ कांग्रेसियों के सामने स्वयं को कांग्रेसी साबित करने में लग गए हैं। इनमें वे पत्रकार भी शामिल है जिन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत गद्रे भवन (पुराने भाजपा कार्यालय) में पनाह लेते थे या रात गुजारते थे। एक पत्रकार तो मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से अपनी नजदीकी का हवाला देते नहीं थकते और कोई भी काम करा लेने का दावा करते घूम रहा है। हालांकि यह पहले भी रमन राज में पत्रकारिता से Óयादा कमीशनखोरी का काम भी करा रहा है।
इसी तरह का एक पत्रकार जो चुनाव से पहले किसी भी सूरत में कांग्रेस की सत्ता नहीं आने का दावा करता था वह चुनाव परिणाम आते ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को अपने कालेज के जमाने का साथी बताता घूम रहा है।
इसी तरह 5 हजार की तनख्वाह से रायपुर में पत्रकारिता शुरु करने वाले का ठाठ इन दिनों चर्चा में है।
भाजपा की बौखलाहट...
चुनाव में बुरी तरह बौखलाई भाजपा को अब पत्रकार कांग्रेसी नजर आने लगे। पिछले दिनों भाजपा प्रभारी अनिल जैन को एक पत्रकार का सवाल इतना नागवार गुजरा कि वे प्रेस कांफ्रेंस के दौरान ही एक पत्रकार को कांग्रेसी बता गये जबकि एक अन्य घटनाक्रम में भाजपा कार्यालय में एक पत्रकार की न केवल पिटाई की गई बल्कि एक महिला पत्रकार को अभद्रतापूर्वक कक्ष से बाहर निकाला गया। इस पत्रकार की सिर्फ इतनी गलती थी कि हार की समीक्षा के दौरान हंगामा कर रहे कार्यकर्ताओं की वीडियो बनाने वह बैठ गया था।
भाजपा नेताओं के शह पर हुई इस गुण्डागर्दी के खिलाफ प्रदेशभर के पत्रकार आंदोलन पर है लेकिन भाजपा नेतृत्व को इससे कोई लेना देना नहीं है। जबकि प्रेस क्लब रायपुर ने अनिश्चितकालीन धरना दे दिया है।
फर्जी के चक्कर में असली भी गये...
रमन राज में पत्रकारिता की आड़ में कई भाजपाई धंधा करने लग गये थे और फर्जी न्यूज एजेंसी बनाकर सरकार से लाखों रुपये महिना वसूल भी रहे थे। ऐसा नहीं है कि रमन राज के इस करतूत की जानकारी किसी को नहीं थी लेकिन सत्ता बदलते ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को जैसे ही इस करतूत की जानकारी मिली उन्होंने तुरन्त ऐसे 17 एजेंसियों का दाना पानी बंद कर दिया। कहा जाता है कि इन एजेंसियों की आड़ में कई भाजपाई लाल हो गये थे।
और अंत में...
जब से सत्ता बदली है जनसंपर्क विभाग में भी अमूल चूल परिवर्तन दिखने लगा है। एक अधिकारी के लम्बी छुट्टी पर चले जाने को लेकर चर्चा गर्म है।

रविवार, 7 नवंबर 2010

भास्कर का फरमान, प्रेस हटाओ!

वैसे तो अपने नए-नए फरमान को लेकर छत्तीसगढ़ के अखबार मालिक हमेशा ही सुर्खियों में रहे हैं। हरिभूमि ने हर शनिवार को अपने कर्मचारी पत्रकारों व फोटोग्राफरों के ही लिए फरमान जारी किया है कि वे इस दिन सफेद टी-शर्ट जिसमें हरिभूमि लिखा हो ही पहना करें। पत्रिका ने भी कोशिश की कि ग्रेजुएट ही रखेंगे लेकिन दोनों फेल हो गए अब भास्कर ने अपने कर्मचारियों, पत्रकारों और फोटोग्राफरों को नया फरमान जारी किया है कि वे अपनी वाहन में प्रेस नहीं लिखेंगे।
हालांकि भास्कर का यह फरमान अच्छी शुरुआत है। जब दूधवाले, धोबी या प्रिटिंग प्रेस वाले भी अपने वाहनों में प्रेस लिखा रहे हो तो इसके दुरुपयोग को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। लेकिन इस फरमान को लेकर यहां बेहद असंतोष है। अब नौकरी करनी हो तो मालिक-संपादकों के फरमान मानने ही पड़ेंगे। इसके एवज में भले ही झंझट हो या कोई भुगते मालिक को क्या फर्क पड़ता है। देखना यह है कि यह फरमान कितने दिनों तक चलता है।
जनसंपर्क सचिव का डर...
मुख्यमंत्री के करीबी माने जाने वाले एन बैजेन्द्र कुमार को यह डर हमेशा ही सताता रहता है कि कहीं जनसंपर्क में बैठे वर्तमान चंडाल चौकड़ी कहीं कुछ ऐसा वैसा न कर दें जिससे जवाब देना मुश्किल हो जाए। पहले ही घपलेबाजी यहां कम नहीं हुई है उसकी लीपापोती में पसीने छूट गए है अब फोटोग्राफरों की नियुक्ति को लेकर स्वराज दास की भूमिका पर सवाल उठ रहे है। कुरैटी के कारनामों की चर्चा भी कम नहीं है। दिक्कत ये है कि छोटे कर्मचारी इन चंडाल चौकड़ी से अलग दुखी है और अपने से होशियार को कोई पसंद नहीं करता तो हाशिये पर रखना मजबूरी है।
नवभारत और नार्को...
नवभारत ने बैंक घोटाले में लिप्त सिंहा के नार्कों टेस्ट की सीडी होने का दावा कर स्टोरी लगा दिया और कह दिया कि जिसे देखना है वे दफ्तर आ जाए। दफ्तर आने वालों को निराशा लगी और ये लोग दावा कर रहे हैं कि अब तक सेटिंग से दूर की ईमेज बनाने वाले नवभारत के रंगा-बिल्ला ने सेटिंग कर ली है। इस खबर से रंगा-बिल्ला को दस लाख मिला हो या नहीं ये तो रंगा-बिल्ला जाने लेकिन सीडी की क्लिपिंग लाने वाले रमेश बैस के करीबी पत्रकार दुखी हैं? उनका दुख दूसरे से सेटिंग की है या सीडी नहीं मिल पाने का यह तो वही जाने लेकिन दुष्प्रचार में यही सबसे आगे है।
और अंत में...
पत्रिका और नेशनल लुक की सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि भास्कर के द्वारा इनके हॉकर खरीद लिए जाते हैं। अब यह भास्कर कर रहा है या नवभारत इसे लेकर आम चर्चा है। क्योंकि इस लड़ाई में नवभारत के मजे हैं।

रविवार, 27 जून 2010

संवाद में चुपचाप दर्जनभर लोगों की संविदा नियुक्ति

संवाद में चुपचाप दर्जनभर लोगों की संविदा नियुक्ति
छत्तीसगढ़ जनसंपर्क के अधीन संवाद में भर्राशाही का आलम यह है कि गुपचुप तरीके से दर्जनभर लोगों को संविदा नियुक्ति दे दी गई। इस मामले की शिकायत भी सचिव व विभागीय मंत्री डॉ. रमन सिंह से की गई है।
छत्तीसगढ़ संवाद में भर्राशाही और भ्रष्टाचार थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के इस विभाग में चल रहे घपलेबाजी व अनियमितता की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए तो कई अधिकारियों को जेल जाना पड़ सकता है। आडिट आपत्ति के बाद भी मुख्यमंत्री की खामोशी ने कई सवाल खड़े किए हैं जिसके चलते यहां के अधिकारियों की मनमानी बढ़ गई है। हालत यह है कि पिछले दो माह में दर्जनभर लोगों को गुपचुप तरीके से संविदा नियुक्ति दे दी गई और अब तो संवाद को अय्याशी का अड्डा तक बताया जाने लगा है।हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों ने बताया कि पिछले दो माह में नादिर कुरैशी, चमनजीत वर्मा, स्वाती शुक्ला, बबीता राय, दीप्ति वर्मा, सतीश जायसवाल, गोकुल यादव, सत्यनारायण प्रजापति व टिकेश्वर वर्मा को संविदा नियुक्ति दिए जाने की चर्चा है। यहीं नहीं भ्रष्टाचार में लिप्त कई संविदा कर्मियों को आने वाले दिनों में नियमित किए जाने की कोशिश का भी पता चला है। बहरहाल संवाद में चल रहे इस गोरखधंधे को लेकर कई तरह की चर्चा है और कहा जा रहा है कि अधिकारियों की करतूत शर्मनाक स्थिति पर पहुंच गई है।

रविवार, 13 जून 2010

संवाद के प्रबंध समिति हैं,भ्रष्ट अफसरों के मोहरे!

खास लोगों को नियमित करने की कोशिश
जनसंपर्क की सहयोगी माने जाने वाली संवाद में लूट खसोट चरम पर है और इसके संचालन के लिए बनी प्रबंध समिति के सदस्य सिर्फ अफसरों के हितों का ही ध्यान रखते हैं यही वजह है कि इस बैठक में अफसरों को भुगतान की स्वीकृति दी जाती है और अब तो गलत ढंग से संविदा नियुक्ति वालों को अफसरों के इशारे पर नियमित करने की योजना बनाई जा रही है।
संवाद में चल रहे खेल पर शासन का ध्यान क्यों नहीं है इसे लेकर कई तरह की चर्चा है। बताया जाता है कि अब भ्रष्ट अफसरों ने संविदा के पदों से उनके कमीशनखोरी और हेराफेरी में साथ देने वालों की एक टीम बना ली है। पिछले दिनों 40 करोड़ रुपयों की आडिट आपत्तियां की गई। इन आपत्तियों के बाद से टीम भावना बढ़ती देखी जा रही है। जिस आडिट रिपोर्ट में आपत्तियां का उल्लेख हैं, उसे दबाने के कुकर्म में सभी एकजुट दिख रहे हैं। भ्रष्ट अफसरों द्वारा अपने ऐसे संविदा साथियों को संवाद में कथित प्रबंध समिति की आड़ में नियमित करने की कोशिश की जा रही है। प्रबंध समिति के अध्यक्ष मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह है इसलिए कुछ लिखकर पास करा लो आपत्ति कोई कर नहीं सकता।
संवाद के संचालन के लिए एक प्रबंध समिति बनी है। प्रबंध समिति के माध्यम से लिए गए फैसले को देखकर ऐसा नहीं लगता कि इसके सदस्यों ने कभी संस्था के हित में कुछ सोचा भी होगा। कोई भी कह सकता है कि समिति के सदस्यों को संवाद के फैसलों में उनके अधिकारों और दायित्वों की सीमा तक का पता नहीं होगा। यही कारण है कि सदस्य संवाद पर शासन करने वाले जनसंपर्क अफसरों के लिए मोहरों के समान है। दरअसल प्रबंध समिति के नाम पर कुछ भी किया जा सकता है। प्रबंध समिति के सदस्य अफसर गांधीजी के तीन बंदरों की तरह हैं जो पिछले दस सालों में कुछ भी न देख पाए, न सुन पाए और न ही कुछ बोल ही पाए। किसी भी सदस्य ने कभी किसी मामले में पूछताछ करना भी जरूरी नहीं समझा तो आपत्ति करने की हिम्मत दिखाना तो बहुत दूर की बात है। मुख्यमंत्री का विभाग होने से कोई भी पूछताछ के बारे में सोच भी कैसे सकता है। ऐसी समिति के नाम पर किए गए फैसलो को क्यों मान्य किया जाना चाहिए जिनके सदस्यों को किसी बात पर सहमत और असहमत होने का अधिकार न हो तो। जनसंपर्क और संवाद के प्रभारी अधिकारियों ने बहुत अच्छी तरह से गांधीजी के इन बंदरों को इस्तेमाल किया है यही कारण है कि राय के बाहर के लोग यहां बिना सर्टिफिकेट के नौकरी कर रहे हैं। संवाद के संविदा के सबसे बड़े पद पर एक पश्चिम बंगाल का आदमी बैठा है जिसके पास संबंधित पद की अनिवार्य शैक्षिणक योग्यता नहीं है। उसने ऐसी पढ़ाई की है कि कहीं भी उसके प्रमाण पत्रों के आधार पर रोजगार पंजीयन नहीं हो सका। बर्थ डेट सर्टिफाई करने के लिए उसे 10 कक्षा का प्रवेश पत्र आवेदन के साथ संलग्न करना पड़ा है। अनुभव प्रमाण पत्र भी फर्जी है, जिस संस्था को खुद बने 3 साल हुए थे उसने अपने यहां काम करने का 5 साल का अनुभव प्रमाण पत्र दिया।

मंगलवार, 1 जून 2010

संवाद में करोड़ों की घपलेबाजी

घपलों की कहानी
आडिट की जुबानी
सालों से जमें अफसर किस तरह का खेल खेलकर लाखों-करोड़ों की घपलेबाजी करते हैं यह देखना हो तो आडिट रिपोर्ट देखी जा सकती है। नियम कानून ताक पर रखकर सरकारी प्रचार के लिए जिस तरह से कमीशन देने वालों को करोड़ों रुपए बांटे गए वह आश्चर्यजनक इसलिए है क्योंकि इस विभाग के मुखिया डॉ. रमन सिंह है जो प्रदेश के मुख्यमंत्री भी हैं।
पिछली बार संजीवनी एग्रोविजन इंटरप्राइजेस को किए गए भुगतान पर आडिट आपत्ति की खबर प्रकाशित किया था। इस बार ऐसे ही संवाद के कारनामें प्रकाशित किए जा रहे हैं। जिसके भुगतान पर आपत्ति की गई है। जनसंपर्क विभाग ने संवाद के माध्यम से रमन सरकार के चार साल पूरे होने पर विज्ञापन जारी किया था। इसके निर्माण व प्रसारण के लिए संवाद ने न तो कोई निविदा ही बुलाई और न ही किसी तरह का कोटेशन ही मंगाया। यही नहीं यह काम 1 लाख रुपए पर सेकण्ड के हिसाब से टीवी स्पॉट के लिए भुगतान किया गया वह भी 30 से 60 सेकेण्ड समय का भुगतान किया गया यह भुगतान बीएसआर फिल्म को किया गया। इसके लिए न तो किसी तरह के नियम बनाए गए और न ही कोई मापदंड ही तय किया गया।
यह बीएसआर फिल्म को लेकर भी कई तरह की चर्चा है। बहरहाल संवाद में चल रहे घपलेबाजी की वजह सालों से बैठे अधिकारियों की कमीशनखोरी में रूचि को बताया जा रहा है।

गुरुवार, 27 मई 2010

मुख्यमंत्री के नाक के नीचे घपलेबाजी , आडिटर ने संवाद की गड़बड़ी खोली

प्रदेश के मुखिया डॉ. रमन सिंह भले ही अपने को कितना ही पाक-साफ बता लें लेकिन उनके अपने ही विभाग संवाद में जिस तरह से करोड़ों रुपए की घपलेबाजी की गई है उसका खुलासा आडिट रिपोर्ट से हो रहा है और अब तो सीधे मुख्यमंत्री पर उंगली उठाई जाने लगी है और कहा जा रहा है कि सरकारी खजाने को लुटने की इस साजिश में डॉ. रमन सिंह भी साथ में हैं।
छत्तीसगढ़ संवाद और जनसंपर्क में लूट खसोट की घटना नई नहीं है संवाद बनते ही जिस तरह से किराये के भवन के नाम पर सरकारी खजानों को लुटा गया वह किसी से छिपा नहीं है तब से आज तक संवाद का प्रभार सुखदेव कुरोटी के पास है कभी विज्ञापन के कमीशन तो कभी प्रचार सामग्री में घपलेबाजी को लेकर चर्च में रहे संवाद में इन दिनों इस बात की भी चर्चा है कि मुख्यमंत्री के करीबी माने जाने वाले अधिकारियों की मिलीभगत से हर साल सरकार को सौ करोड़ से ऊपर का चुना लगाया जा रहा है।
ताजा मामला संवाद के चाटर्ड एकाउण्टेन्ट योति अग्रवाल एंड कंपनी की रिपोर्ट है सूचना के अधिकार के तहत निकाली गई इस रिपोर्ट में सी.ए. ने संवाद में चल रहे गड़बड़ियों का खुलासा किया है। संवाद के फिल्म सेक्शन में ही करोड़ों रुपए की गड़बड़ी की ओर इशारा किया गया है। बिल नम्बर 661 और 874 में नवा अंजोर को ढाई लाख और 15 लाख का भुगतान किया गया है। यह डाकुमेंट्री फिल्म बनाने संजीवनी एग्रो विजन इंटरप्राइजेस को दिया गया जो एक कलेक्टर के साले की बताई जाती है। इस पर सीए ने आपत्ति की है।
सूत्रों ने बताया कि इस मामले में संवाद ने न तो डीएवीपी रेट का ही ध्यान रखा। बताया जाता है कि कलेक्टर की सिफारिश पर ही गई इस कार्य की गुणवत्ता भी खराब रही है और इसे लेकर विवाद भी हो चुका है। सीए ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा है कि जब यह संस्था रजिस्ट्रर्ड ही नहीं था तब इसे किस तरह से इतनी बड़ी राशि का काम दिया गया और भुगतान किया गया।
बताया जाता है कि संवाद में इस घपलेबाजी की चर्चा जोरों पर है और अधिकारियों की मुख्यमंत्री से सेटिंग की बात भी कही जा रही है। बहरहाल संवाद में घपलेबाजी थमने का नाम नहीं ले रही है और इस लूट-खसोट में उच्च स्तरीय मिलीभगत को लेकर आम लोगों में कई तरह की चर्चा है।

सोमवार, 10 मई 2010

संवाद में कुरेटी के हाथ से जनसंपर्क का विज्ञापन फिसला

सालों से जमें संवाद में सुखदेव कुरोटी के विवादास्पद छवि के बाद शायद शासन की नींद टूटी है और कहा जा रहा है उनसे जनसंपर्क विभाग के विज्ञापन का प्रभार छिना गया है।
उल्लेखनीय है कि जनसंपर्क और संवाद में चल रहे कमीशनखोरी को लेकर जबरदस्त चर्चा है और इसकी शिकायत जनसंपर्क सचिव से लेकर मुख्यमंत्री तक की गई है। बताया जाता है कि लगातार शिकायत के बाद संवाद में व्यवस्था परिवर्तन किए जाने की खबर है। हालांकि इस व्यवस्था परिवर्तन की कोई लिखित में आदेश जारी नहीं किए है लेकिन उच्च पदस्थ अधिकारियों ने इसकी पुष्टि की है।
सूत्रों के मुताबिक अब तक संवाद के द्वारा जारी किए जाने वाले सारे विज्ञापन सुखदेव कुरोटी के पास से जारी किए जाते थे लेकिन लगातार शिकायत को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है कि अब जनसंपर्क द्वारा जारी किए जाने वाले विज्ञापन कुरोटी की बजाय उनके जूनियर श्री पुजारी के मार्फत जारी होंगे। संवाद में हुए इस परिवर्तन की मीडिया जगत में जबरदस्त चर्चा है और कहा जा रहा है कि यह कुरोटी के पर कतरे जाने की शुरुआत है।

शनिवार, 8 मई 2010

तेल लगाओ, विज्ञापन पाओ

संवाद में विज्ञापन देने नियम कानून नहीं
छत्तीसगढ़ संवाद में विज्ञापन जारी करने का कोई नियम कानून नहीं है। जो जितना चापलूती करेगा उसे उतना विज्ञापन जारी किया जाता है। चापलूसी के आगे प्रसार संख्या भी बेमानी है।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के इस विभाग में भर्राशाही और अफसर शाही इस कदर हावी है कि कई अखबार वाले भी कुछ कहने-छापने से हिचकते हैं। इस संबंध में जब सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी गई तो यह जानकारी संवाद में चल रहे भर्राशाही का पोल खोलने के लिए काफी है।
संवाद ने 1 मई 2009 से 25 जुलाई 2009 से 25 जुलाई 2009 के बीच जो विज्ञापन जारी किए है दिल्ली से प्रकाशित होने वाले महामेघा को 50 हजार का विज्ञापन दिया गया। इसी तरह भिलाई से प्रकाशित अगास दिया को 80 हजार का विज्ञापन दिया गया। हरिभूमि और प्रखर समाचार को एक ही ग्रेट का बनाया गया और दोनों को तीन-तीन लाख का विज्ञापन दिया गया। सर्वाधिक विज्ञापन मुख्यमंत्री के गृह जिले राजनांदगांव के अखबारों को दिया गया जबकि दिल्ली के हिन्दी जगत को 50 हजार और इंदौर के ग्राम संस्कृति को 30 हजार का विज्ञापन दिया गया दिल्ली के ही नया ज्ञानोदय को 25 हजार लोकमाया हिन्दसत को 50-50 हजार का विज्ञापन दिया गया पटना के राष्ट्रीय प्रसंग को 75 हजार का विज्ञापन दिया गया।
इसके मुकाबले छत्तीसगढ़ के अखबारों को 5-10 हजार का विज्ञापन ही दिया गया। इस आंकड़े से स्पष्ट है कि जनसंपर्क और संवाद में किस तरह का भर्राशाही व चापलूसी चल रहा है। आश्चर्य का विषय तो यह है कि इन विज्ञापनों की आड़ में कमीशनखोरी की चर्चा भी जोर-शोर से है।

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

संवाद में 18 करोड़ का घोटाला...


आडिट आपत्ति के बाद लीपापोती शुरु
अपने निर्माण के साथ ही विवादों में घिरे छत्तीसगढ़ संवाद में अनियमितता की कहानी थमने का नाम नहीं ले रही है संविदा नियुक्ति के मामले में लेन-देन में फंसे यहां के अधिकारी अब छत्तीसगढ क़े बाहर से प्रकाशित होने वाले कथित नेशनल अखबारों को व्यवसायिक दर पर विज्ञापन देने के मामले में बुरी तरह फंस गए हैं। इस मामले में अधिकारियों द्वारा कमीशनखोरी की भी चर्चा है और अब आडिट आपत्ति के बाद इस मामले की लीपा-पोती की जा रही है। मुख्यमंत्री के विभाग में चल रहे घपलेबाजी के उजागर होने के बाद भी किसी तरह की कार्रवाई नहीं होने पर सीधे सचिव बृजेन्द्र कुमार पर उंगली उठने लगी है।
छत्तीसगढ़ बनने के बाद राय सरकार के विज्ञापन से मिलने वाले कमीशन पर खड़ा संवाद के अधिकारी कमीशनखोरी में मस्त हो गए हैं। वैसे तो संवाद में यह सब नया नहीं है। पहले किराये के भवन में संचालित होने को लेकर विवाद में रहे जनसंपर्क के अधिकारियों पर कमीशनखोरी का आरोप लगते रहा है। इसके बाद संविदा नियुक्ति के मामले में संवाद विवादों में घिरा लेकिन मुख्यमंत्री का विवाद होने के कारण कोई कार्रवाई नहीं हुई और यहां के अधिकारियों द्वारा मुख्यमंत्री के नाम से धमकी-चमकी देने की वजह से कई पत्रकारों की नौकरी तक खतरे में पड़ चुकी है।
ऐसे में इस विभाग में चल रहे घपलेबाजी की तरफ कोई देखना ही नहीं चाहता और प्रकाशन से लेकर विज्ञापनों के डिजाईन के नाम पर मनमाने रुप से अनियमितता की जा रही है हालत यह है कि करोड़ों की संपत्ति के स्वामी होते यहां के अधिकारियों की शिकायतों की फाईलें दब जाती है और सूचना का अधिकार कानून भी यहां आकर दम तोड़ देता है। ताजा मामले का खुलासा तब हुअआ जब आडिट विभाग ने तथा कथित नेशनल अखबारों को विज्ञापन के नाम पर भुगतान पर आपत्ति की। दरअसल इन अखबारों को डीएवीपी रेट से भुगतान करने की बजाय व्यवसायिक दर पर भुगतान किया गया जो डीएवीपी दर से 10 गुणा अधिक होता है।
बताया जाता है कि डीएवीपी की बजाय व्यवसायिक दर पर भुगतान की कहानी कमीशनखोरी से जुड़ी हुई है और हर भुगतान के एवज में 10 फीसदी राशि अलग से लिए जाने की चर्चा है। बताया जाता है कि आडिट आपत्ति के बाद अफसरों ने इस पर लीपापोती का खेल शुरु कर दिया है और यह सब उच्च स्तर पर किया गया। बताया जाता है कि लीपापोती के तहत उन अखबारों को डीएवीपी की दर पर पुन: विज्ञापन दिए जा रहे हैं ताकि भुगतान को एडजेस्ट किया जा सके। इसी तरह इसकी कहानी भी गढ़ी जा रही है।
इधर यह भी पता चला है कि इस मामले में ऊपर तक पैसा पहुंचाये जाने का हल्ला है। किस स्तर तक पैसा पहुंचाया गया है यह तो जांच का विषय है लेकिन प्रदेश के मुखिया के विभाग में चल रहे 18 करोड़ के इस घपलेबाजी को लेकर कई तरह की चर्चा है और कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री और सरकार की छवि बनने वाले इस विभाग की करतूत से सरकार की छवि पर भी असर पड़ेगा। बहरहाल मुख्यमंत्री के विभाग में ही चल रहे भ्रष्टाचार की आम लोगों में बेहद चर्चा है और कहा जा रहा है कि सालों से जमें अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं हुई तो स्थिति और भी बदतर होगी।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

मुख्यमंत्री के खिलाफ छाप लो, संवाद प्रभारी के खिलाफ छापा तो नौकरी गई...


छत्तीसगढ़ में अफसर राज हावी है इसका यह नमूना मात्र है। छत्तीसगढ़ में सरकारी विज्ञापन के मोह ने पत्रकारिता की ऐसी-तैसी करने में कोई कमी नहीं छोड़ा है। यही वजह है कि यहां अधिकारियों के खिलाफ खबर छपते ही उसकी तीखी प्रतिक्रिया होती है।
पिछले दिनों मृत्युजंय मिश्रा ने अपनी नौकरी से हटाये जाने को लेकर संवाद प्रभारी कोरेटी के खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस ली। ढसाढस भरे प्रेस कांफ्रेंस में वैसे तो सभी अखबारों के पत्रकार मौजूद थे लेकिन रोज निकलने वाले अखबारों में से दो-तीन अखबारों में ही यह खबर प्रकाशित हो पाई। इनमें से प्रतिदिन राजधानी में भी यह खबर प्रमुखता से छप गई। इस खबर को ठाकुर नामक पत्रकार ने बनाया था। जैसे ही अखबार में खबर छपी हड़कम्प मच गया। जब हमने पत्रकारिता की शुरुआत की थी मुझे याद है। तब हड़कम्प मचाने वाली खबरों पर संपादन के द्वारा पत्रकारों की पीठ थपथपाई जाती थी लेकिन यहां तो उल्टा ही हो गया। इस पत्रकार की नौकरी ही चली गई।
पत्रकारिता के इस नए मापदंड से कोई पत्रकार हैरान भी नहीं है क्योंकि ऐसा यहां अक्सर होने लगा है और कभी नेता या अधिकारियों द्वारा पत्रकारों को नौकरी से निकलवाने की धमकी नई भी नहीं है। लेकिन सिर्फ सरकारी विज्ञापन के लिए जनसंपर्क के अधिकारियों से ऐसी घनिष्ठता आश्चर्यजनक है। छत्तीसगढ़ में यही सब कुछ हो रहा है और विज्ञापन देने वाली इस संस्था के अधिकारियों का प्रभाव बड़े-बड़े बैनरों पर भी स्पष्ट देखा जा सकता है। कई पत्रकार तो अब आपसी चर्चा में व्यंग्य तक करने लगे हैं कि मुख्यमंत्री के खिलाफ छाप सकते हो लेकिन जनसंपर्क या संवाद के अधिकारियों की करतूत को छापोगे तो नौकरी चली जाएगी। छत्तीसगढ़ में अखबार मालिकों के इस रवैये की वजह से ही शासन-प्रशासन में स्वेच्छाचारिता बढ़ी है और यही हाल रहा तो पत्रकारिता पर यह कलंक धुलने वाला नहीं है।
और अंत में...जनसंपर्क में नौकरी वही लोग कर सकते हैं जो अपना वेतन भी अधिकारियों पर कुर्बान कर दे। ऐसे ही एक युवक यहां अपने नियमित होने के इंतजार में आधा वेतन अधिकारियों के लिए छोड़ देता है। इसके सर्टिफिकेट भी फर्जी होने की चर्चा है।