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बुधवार, 2 जून 2021

प्रधानमंत्री का शौक सबसे बड़ी चीज...

 

सेन्ट्रल विस्टा के निर्माण को जब केन्द्र सरकार ने अतिआवश्यक सेवा घोषित कर दिया है तब न्यायालय का फैसला तो वही होना था जिसका अंदेशा था, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उन लोगों में से है जो अपनी शौक के आगे किसी को ठहरने नहीं दे सकते, भले ही वे खुद मजाक बन जायें या देश के लोगों की हालत खराब हो जाए। भले ही उनके फैसलों से लोगों की जान गई हो या देश आर्थिक बदहाली की ओर चला गया हो वे अपनी शौक के आगे किसी की नहीं सुनते, अपवाद नौ लाख वाले सूट को छोड़ कर।

ऐसे में सेन्ट्रल विस्टा की बात करने से पहले पाठकों को स्मरण दिलाना जरूरी है कि वे गरीब घर के हैं और उन्होंने चाय तक बेची है, शायद यह गरीबी की वजह से वे अपनी शौक पूरी नहीं कर पाये थे और आज जब सत्ता के सर्वोच्च पद पर है तो एक-एक करके अपनी सभी शौक पूरा कर रहे हैं। मोदी जी के कपड़े और जैकेट का शौक तो उनके चहेते लोगों के उपहार से ही पूरा हो जाता है, चश्मा और दो ढाई लाख का पेन भी शायद उनके चाहने वाले ही पूरा कर देते हैं, खानपान का शौक मोदी जी को कितना है मशरुम काजू का आटा वगैरह-वगैरह किसी से छिपा ही नहीं है। तब सरकारी संपत्ति यानी सरकारी खर्चे से जो शौक पूरा किया गया है उस पर चर्चा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जनता को तय करना है कि यह शौक कितना शानदार है और राजा का शौक निराला तो होता ही है, इतिहास राजाओं के शौक के किस्से से अटा पड़ा है। 

सेन्ट्रल विस्टा के बारे में बताने से पहले प्रधानमंत्री मोदी के उन शौक को भी जानना जरूरी है जो वे प्रधानमंत्री बनते ही पूरा करने लगे, इसे उनके समर्थक समय की जरूरत भी कह सकते है लेकिन इससे पहले देश के प्रधानमंत्री एक बंगले में रहते थे लेकिन नरेन्द्र मोदी के लिए पांच बंगले मिलाकर एक बंगला बनाया गया कल्याण मार्ग भी नाम जोरदार है। इसके बाद पूर्व प्रधानमंत्री के काफिले में शामिल बीएमडब्ल्यू 7 को बदला गया और इसके बदले रेंज रोवर का काफिला खरीदा गया, चूंकि बीएमडब्ल्यू सीरिज सेडान है और सामने सीट में बैठने वाले जनता को ठीक से नहीं दिखते थे और नरेन्द्र मोदी को फोटो शोटो और दिखने दिखाने का शौक है शायद इसलिए वाहनों का काफिला ही बदल दिया गया। ऐसा मानने वाले मोदी विरोधी ही है जबकि समर्थक इसे जरूरत ही बता रहे हैं। इसमें सरकार का कितना खर्च हुआ सुरक्षा कारणओं से बताना उचित नहीं है। 

लेकिन सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री को अमेरीका से होड़ भी करना है इसलिए एयर इंडिया वन खरीदा गया आठ हजार चालीस करोड़ का खर्च होना बताया जा रहा है। चूंकि शौक से बड़ी चीज दुनिया में कुछ नहीं है और शौक यदि सरकारी खजाने से पूरी हो तो फिर यह समय भी जरूरत के रुप में प्रचारित किया जाता है। यह अलग बात है कि देश में आज भी ईलाज के अभाव में लोग दम तोड़ रहे हैं, बेरोजगारी और महंगाई ने आम लोगों का जीवन नारकीय कर दिया है लेकिन हौसला इस व्यक्ति का नहीं तोडऩा है क्योंकि ये न होगा तो हिन्दुतत्व खतरे में पड़ जायेगा, ऐसा इन दिनों वाट्अप युनिवर्सिटी के विद्यार्थी जोर-शोर से कह रहे हैं। सेन्ट्रल विस्टा को लेकर नवभारत टाईम्स के खुलासे के अनुसार सेन्ट्रल विस्टा में प्रधानमंत्री का जो बंगला बनेगा वह 15 करोड़ में बनेगा, जिसमें सभी तरह का आधुनिक सुविधा होगी, यह किसी महल से कम नहीं होगा और पुराने जमाने के राजा महाराजाओं की तर्ज पर इसके किले के भीतर परींदा भी पर नहीं मार सकता।

खर्च कितना भी होगा शौक के आगे कुछ नहीं है, हम यह नहीं कहेंगे कि इस भीषण महामारी में  इसकी क्या जरूरत है क्योंकि शौक से बड़ी चीज न देश है और न ही धर्म है।

मंगलवार, 1 जून 2021

होशियार! अच्छे दिन तो यही है...

 

गलत आदमी भी कितना सही, और मूर्ख आदमी भी कितना ताकतवर हो सकता है इसका अंदाजा किसे था, लेकिन अच्छे दिन की लालच ने सब कुछ उलट दिया था। नरसंहार के इस भयावह दौर के बाद भी यदि सत्ता की जिम्मेदारी से इतर लोग धर्म और राष्ट्रवाद के चक्कर में पड़े थे। तो इसका मतलब साफ है कि पिछले कई दशकों से नफरत का जो बीज बोया जा रहा था वह फलने फूलने लगा है। 

इतिहास गवाह है कि जिस भी राष्ट्र ने धर्म और राष्ट्रवाद को ज्यादा महत्व दिया वे न केवल पिछड़ गये बल्कि बर्बादी की राह को अग्रसर हुए। ऐसे में कोरोना की महामारी ने जो तांडव मचाया है उसे दूसरे देशों की तुलना करना सिर्फ लोगों को भ्रम में डालना है। हैरानी तो इस बात की है कि सत्ता अब भी लोगों की भावनाओं के साथ खेलने में लगी है, देश का आर्थिक ढांचा पूरी तरह से गड़बड़ा गया है। और आर्थिक ढांचे के गड़बड़ाने की वजह से महंगाई और बेरोजगारी अपने चरम पर है। लोगों का जीना दूभर होता जा रहा है लेकिन सत्ता को अपनी रईसी बरकरार रखने आज भी सेन्ट्रल विस्टा की जरूरत हैं और अपनी छवि चमकाने के लिए हिन्दू-मुस्लिम ही चाहिए।

यह ठीक है कि कोरोना वैश्विक महामारी है लेकिन वैश्विक चेतावनी को नजर अंदाज करना, क्या सत्ता की लापरवाही नहीं है, कोरोना से मौत के आंकड़े को छुपाने की कोशिश क्यों की गई। क्या सरकार के पास इस बात का जवाब है कि इस देश में कोरोना की बदइंजामी के चलते आक्सीजन के अभाव में कितने लोगों की मौत हुई, दवाई के अभाव में कितने लोग मर गए, सरकार की नासमझी के लाकडाउन के चलते कितने मजदूर सड़कों में मर गए, भूख और आर्थिक बदहाली के चलते कितने परिवार बरबार हो गए, कितने बच्चे अनाथ हो गए और किसी भी महामारी या आपदा से निपटने के लिए क्या योजना है?

हम जब कहते हैं कि गलत आदमी भी कितना सही, और मूर्ख आदमी भी कितना ताकतवर हो सकता है तो इसका मतलब साफ है कि भावनाएं और आस्था के विभत्स खेल ने देश में असुर प्रवृत्ति को ही बढ़ावा दिया है। जिसका दुष्परिणाम नरसंहार के रुप में देश भुगत रहा है। क्या इस देश की सत्ता की आंख तब भी नहीं खुलती है जब हमारे बाद पैदा हुआ बंग्लादेश हमें हर मामले में पीछे छोड़ देता है। भूखमरी और खुशहाली के इंडेक्स में हम यदि पाकिस्तान से भी पीछे चले जाते हैं तो फिर जीत किसी हो रही है।

और यह सब सत्ता की नासमझी की वजह से हो रही है क्योंकि सत्ता को आज भी इस बात की समझ नहीं है कि सरदार पटेल की बड़ी मूर्ति बना देने से नेहरु का कद छोटा नहीं हो जाता। आधुनिक भारत के निर्माण में जिन लोगों ने अपना सबकुछ होम कर दिया उनकी आलोचना ही नासमझी और मूर्खता है तब अच्छे दिन कैसे आ सकता है। चुनाव जीतना अलग बात और देश चलाना बिल्कुल अलग बात है साहेब।

शनिवार, 8 मई 2021

प्रधानमंत्री की प्राथमिकता...

 

दिल्ली हाईकोर्ट ने केन्द्र सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए जब कहा कि कड़ी कार्रवाई के लिए मजबूर न करें! तो यह सवाल उठाया जाना चाहिए कि इस भीषण महामारी में भी केन्द्र की सरकार आखिर लोगों की जान से खिलवाड़ क्यों कर रही है, उसकी प्राथमिकता क्या जनकल्याण नहीं होनी चाहिए? आखिर वह एक कदम आगे बढ़कर देश के लोगों के कल्याण की बात क्यों नहीं कर रही है। क्या वह जानती है कि कुछ भी नहीं करने के बाद भी सिर्फ हिन्दु-मुस्लिम के सहारे वह सत्ता में फिर से आ जायेगी?

यह सवाल अब हर उस देशप्रेमी की जुबान बनने लगी है जो भीषण महामारी से तड़पते जिन्दगी को अपनी खुली आंखों से देख पा रहे हैं। बंगाल चुनाव के नतीजे आने के बाद जिस तरह से वहां भाजपा और तृणमूल कांग्रेस की लड़ाई को हिन्दू-मुस्लिम का रुप देने की कोशिश की गई, उसका सच सामने आने लगा है, दुनियाभर की हिंसा की तस्वीरों को बंगाल की हिंसा बताकर नफरत फैलाने की कोशिश किस तरह की गई, भारतीय जनता पार्टी ने किस तरह से देशभर में धरना प्रदर्शन किया वह अब स्पष्ट होने लगा है।

ऐसे में एक बात तो तय है कि इस भीषण महामारी से अब इस देश की जनता को खुद ही निपटना है, क्योंकि बीस हजार करोड़ के सेन्ट्रल विस्टा को लेकर दायर याचिका पर न्यायालय ने भी हाथ खड़े कर दिये हैं। तब सवाल यही है कि मोदी सत्ता की प्राथमिकता क्या है। महामारी से निपटने मोदी सत्ता को राष्ट्रीय प्लान बनाने, आक्सीजन की सुचारु आपूर्ति और वैक्सीन को लेकर न्यायालयों ने लगातार लानत भेजी है लेकिन सरकार ने रईसी बरकरार रखने का उपाय अपनी प्राथमिकता में रखी है। यही वजह है कि तमाम विरोध के बाद भी इस महामारी में सेन्ट्रल विस्टा का काम बेधड़क चल रहा है और उसमें भी महल जैसे प्रधानमंत्री आवास सबसे पहली प्राथमिकता है जिसे हर हाल में दिसम्बर 2022 तक पूरा किया जाना है।

सरकार की दूसरी प्राथमिकता की रईसी बरकरार रखने की है इसलिए इस महामारी के दौर में सिर्फ आईडीबीआई बैक को बेचने के लिए कैबिनेट की बैठक बुलाई जाती है। इस सरकार की प्राथमिकता तो शुरु ही राज्यों में सत्ता प्राप्ति की रही है इसलिए जब भी किसी राज्य में चुनाव होता है प्रधानमंत्री सहित पूरी कैबिनेट वहां होती है और कई बार तो साफ लगता है कि ये प्रधानमंत्री देश के नहीं सिर्फ भारतीय जनता पार्टी के नेता बस हैं। यही नहीं ट्रम्प को जिताने भी रैलियां होती है और कोरोना की अनदेखई तब तक की जाती रही जब तक मध्यप्रदेश में सरकार नहीं बन गई।

सवाल बहुत से है लेकिन कोरोना काल में भी सरकार की प्राथमिकता यदि सत्ता की रईसी बरकरार रखने की है तो फिर दूसरी-तीसरी क्या चौथी लहर में भी कुछ नहीं होने वाला है। क्या देश के प्रधानमंत्री को इस भीषण महामारी से निपटने कोई योजना नहीं बनानी चाहिए? क्या मध्यम व लघु व्यापारियों या उद्योगपतियों के लिए कोई योजना नहीं बनानी चाहिए? क्या मध्यम वर्ग के लोगों की तकलीफ दूर करने योजना नहीं बनानी चाहिए। क्या रोज कमाने-खाने वालों के लिए इस सरकार ने कोई योजना बनाई है। सभी को आक्सीजन और वैक्सीन मिल जाये इसकी कोई योजना है। महामारी से बर्बाद हो चुके परिवार के परिवार और अनाथ हो चुके बच्चों के लिए कौन सी योजना है। 

सरकार जानती है कि बेबसी में तड़पते लोग भले ही आज गाली दे रहे है लेकिन वोट उन्हें ही देंगे क्योंकि हिन्दुत्व खतरे में है? राहुल गांधी के परिवार ने देश के लिए कुछ नहीं किया? तब इन सवालों का क्या अर्थ रह जाता है। जिस तरह से असम जीते वैसे ही 2024 में देश जीत लेंगे?

बुधवार, 5 मई 2021

साजिश...

 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्राथमिकता यदि इस भीषण आपदा में भी सेन्ट्रल विस्टा है तो यकीन मानिये ये सत्ता देश के लाखों लोगों की जान लेने का क्या षडयंत्र नहीं कर रही है। यह सवाल इसलिए उठाये जा रहे है ताकि लोग अपने घरों में चुपचाप बैठे रहे और कोरोना से बचे।

वैसे भी पूरी दुनिया में भारत ऐसा देश होगा जिसकी सत्ता हर समस्या के लिए अपने नागरिकों को ही दोष देती है, बेरोजगारी, महंगाई के लिए सत्ता ने बढ़ती जनसंख्या को वजह बताती है। तो कुंठित हिन्दुओं को लगता है कि आबादी बढऩे की वजह मुसलमान है। वैसे कुंठित हिन्दु तो हर समस्या के लिए ही मुसलमानों या अल्पसंख्यकों पर निशाना साधते रहे है।

ये कुंठित हिन्दू जनसंख्या नियंत्रण के लिए उपाय भी बताती है तो मानसिक रुप से दिवालिया हो चुके वे लोग हिन्दुओं को अधिकाधिक बच्चा पैदा करने की सलाह भी देते हैं। कोरोना की पहली लहर के लिए नरेन्द्र मोदी की नाकामी छुपाने जिस तरह से तब्लिकी जमात पर निशाना साधा गया वह किसी से छिपा नहीं है। नोटबंदी के दौरान मां को लाईन में लगाना और किसान आंदोलन के दौरान अल्पसंख्यक सिखों को खालिस्तानी और देशद्रोही बताकर निशाने में लेने की कोशिश को भी इस देश ने देखा है। बंगाल चुनाव में भाजपा नेताओं की टिप्पणी तो विभाजनकारी थी ही खुद प्रधानमंत्री की भाषा ने सारी मर्यादाओं को लांघकर पूरी दुनिया में भारत को शर्मसार करने में कोई कमी नहीं रखा था। उनके नेताओं ने जिस तरीके से दो र्म को ममता के जाने के बाद टीएमसी को सबक सिखाने की धमकी देते रहे उसका दुष्परिणाम सबके सामने है।

स्व. इंदिरा गांधी ने 80 के दशक में मेरठ दंगे के बाद अटल बिहारी बाजपेयी के आरोपों का जवाब देते हुए कहा था कि यह अजीब संयोग है कि संघ के लोगों के जाने के बाद ही दंगे भड़कते हैं? सवाल बंगाल चुनाव के बाद की हिंसा निश्चित रुप से निंदनीय है लेकिन इसके लिए संघ और भाजपा को भी आत्ममंथन की जरूरत है कि उनका तेवर कितना आक्रमक होना चाहिए। कंगना रनौत जैसी फिल्म अभिनेत्री के नफरत भरा ट्वीट का मतलब क्या है?

आज जब देश कोरोना के भीषण महामारी की चपेट में है और न्यायालय लगातार सरकार के क्रिया कलापों को लेकर नाराजगी जाहिर कर रही है तब भी यदि सरकार कोई योजना नहीं बना रही है और तो और दुनियाभर के देशों से प्राप्त राहत सामग्री को भी हवाई अड्डे से जरुरतमंदों तक नहीं पहुंचा रही है तब क्या यह लोगों को मौत के मुंह में ढकेलने का उपक्रम नहीं है। 

दिल्ली के बीचों बीच बन रहे प्रधानमंत्री के आवास को जल्द से जल्द पूरा करने की प्राथमिकता को लेकर अब तो प्रधानमंत्री की नियत को लेकर चौतरफा सवाल उठने लगे हैं? सरकार द्वारा मौतों के आंकड़े छुपाने का आरोप लगने के बावजूद यदि सरकार का यही रवैया रहा तो मई में एक लाख से उपर मौत होना तय है।

तब यह भी सवाल उठेगा कि जनसंख्या नियंत्रण के लिए क्या महामारी को जरिया बनाया जा रहा है। या महामारी की आड़ में एक झटके में जनसंख्या कम करने की कोशिश हो रही है।