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शनिवार, 9 अगस्त 2025

अगस्त क्रांति…

 अगस्त क्रांति…


सारे सबूतों के बाद भी यदि चुनाव आयोग और मोदी सत्ता अभी भी राहुल गांधी को बदनाम करने में लगे हो तो यक़ीन मानिए कि आने वाले दिनों में यह जन आंदोलन का ऐसा रूप लेगा जिसकी कल्पना न तो आरएसएस को है न ही बीजेपी को, यह दावा इसलिए है क्योंकि जब महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा की थी तो अंग्रेज़ी हुकूमत भी तब उसे हल्के में लिया था , महात्मा गांधी ने क्या कहा था और अब राहुल क्या करने वाले है…

''करो या मरो..'' : '' अगस्त क्रांति'' के 83 साल


8 अगस्त 1942. स्थान: बम्बई के ग्वालिया टैंक मैदान ( अब अगस्त क्रांति मैदान). आज सुबह से ही अखिल भारतीय कांग्रेस समिति अपने 57 वर्ष के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव '' भारत छोड़ो'' ( क्विट इंडिया) पर विचार विमर्श कर रही है. रात काफी गहरा गयी है, पर मैदान में मौजूद करीब 80000 से 100000 लोग मंत्रमुग्ध होकर अपने प्रिय नेता महात्मा गाँधी के भाषण को सुन रही है. उनके भाषण से पहले ''भारत छोड़ो'' प्रस्ताव में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ''भारत छोड़ो'' ( क्विट इंडिया) प्रस्ताव कर चुकी है. महात्मा गाँधी ने अपना भाषण हिन्दुस्तानी में देने के बाद अब वहां विदेशी पत्रकारों और प्रतिनिधियों के लिए अंग्रेजी में दे रहे हैं. वे कह रहे हैं :- ''There are representatives of the foreign press assembled here today. Through them I wish to say to the world that the United Powers who somehow or other say that they have need for India, have the opportunity now to declare India free and prove their bona fides. If they miss it, they will be missing the opportunity of their lifetime, and history will record that they did not discharge their obligations to India in time, and lost the battle.......Where shall I go, and where shall I take the forty crores of India? How is this vast mass of humanity to be aglow in the cause of world deliverance, unless and until it has touched and felt freedom. Today they have no touch of life left. It has been crushed out of them. It lustre is to be put into their eyes, freedom has to come not tomorrow, but today.''


और भाषण की समाप्ति वे अपने लॉर्ड टेनिसन द्वारा क्रीमिया युद्ध के दौरान एक असफल सैन्य कार्रवाई की स्मृति में लिखी गई " चार्ज ऑफ़ द लाइट ब्रिगेड " नामक कविता के इस वाक्यांश , जो कि उन्हें बहुत प्रिय है और उन्होंने इसे पहले भी अन्य भाषणों में कई बार इस्तेमाल किया, 

I have pledged the Congress and the Congress will do or die.'' से करते हैं.... ''डू ऑर डाई.... करो या मरो'' ... ये सुनते ही मैदान में मौजूद हजारों की भीड़ में एक नया उत्साह आ जाता है. दूसरे दिन तडके ही जब महात्मा गाँधी सहित कांग्रेस के सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया जाता है तो गांधीजी के द्वारा दिए इसी मंत्र '' करो या मरो'' से प्रेरणा लेकर लाखों-करोड़ों लोग विदेशी शासन के खिलाफ सड़क पर उतर पड़े और देखते-देखते ये आन्दोलन एक जनक्रांति में बदल गया जिसे बाद में ''अगस्त क्रांति'' का नाम दिया गया. 

ऐसे में सोचिये यदि देश की संसद में विपक्ष का मुखिया चुनाव आयोग  के आंकड़ों के साथ वोट चोरी का तथ्यों के साथ अलग अलग टाईप के अनेकों साक्ष्य प्रस्तुत करें और सत्ता पक्ष और चुनाव आयोग बजाए साथ आने,जाँच और दोषियों को सजा दिलाने की बात करने के उल्टे कोई "बदनाम" करने का घटिया जुमला बोले तो यह अघोषित आपातकाल नहीं तो और क्या है?? यह अपराधियों द्वारा अपराधियों का  सरंक्षण नहीं तो और क्या है? 


बदनामी चोरी करने से होती कि चोरी उजागर करने से, चोरी रोकने के लिए चोरों के पक्ष में बोलना चाहिए कि चोर के खिलाफ आवाज उठाने के पक्ष में. भारत का हित किस में है?? सुधार कैसे होता है. सोचिये किस तरह से आपको अनैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाया जा रहा है . 


 यदि किसी राज्य सरकार के शासन में दंगाइयों को खुली छूट हो, हजारों लोग मार दिए जाएं और मारे गए लोगो न्याय के लिए कोई कोर्ट जाएं तो वह उस राज्य के मुखिया को बदनाम करने की साज़िश है ??  


मारे गए लोगों की जान से अधिक जिसके कारण लोग मरें उसकी बदनामी को महत्वपूर्ण बनाना यह अपराधिक सोच और उनका बचाव नहीं तो और क्या है  ????? 


आप हंस नहीं देंगे !!!  जबकि लोग मरे हों, घर उजड़े हों यह एक तथ्य हो ....


यदि सरकारी आंकड़े कहते हैं कि गुजरात शिक्षा, बच्चों, स्त्रियों के मामले में कश्मीर से पिछड़ा है तो यह बदनाम करने की साज़िश नहीं सत्य है ।


यदि बच्चों  को मिड डे मील में नमक रोटी खिलाया जा रहा शिक्षा बजट के बावजूद, 

बच्चे कीचड़ भरे टूटे फूटे खंडहर में पढ़ रहे हैं तो 

खुद सरकार अपनी किरकिरी करा रही है 

यदि किसी के शासन में बलात्कार हो बच्ची की टांग काटनी पड़े, बिना पूछे जबरन दाह संस्कार कर दिया जाए तो खुद ही पूरे सरकार और उसकी व्यवस्था का सड़ा हुआ पार्ट है । जो आप कितनी ही डेटिंग पेंटिंग कर ले लोगों के सामने आ जाएगा । 


 यदि आपको बदनामी का डर है तो बदनाम करने वाले काम मत करें न कि अपेक्षा करें कि.....


 आप लोगों की जेब काटते रहें, महंगाई से लोगों का दम निकल जाए, 

आपके बुरे काम उजागर करने वालो को जेल में डालते रहें , 

बच्ची के बलात्कार पर जय श्री राम के नारे लगवाएं, 

परीक्षा सेंटर पर लड़कियों से उनके अंडर गारमेंट्स उतरवाए बिना पेपर न देने दें 

बीस लाख में मेडिकल सीट बिके

5 साल में भी ग्रेजुएट की डिग्री पूरी न हो

बाढ में जब लोगों के घर डूब गए आप टूरिज्म का आनंद उठाने वाला बेशर्मी भरा डायलग बोलें, 

आपके ढोंगी सनातनी गुर्गे भेष बदलकर विभाजन की प्रयोगशाला के तहत दंगे भड़काने की कोशिश करें ,

 अमीरों के घरों की डेकोरेटिव दीवार बनाने के लिए दिन दहाड़े खनन माफिया पूरा का पूरा पहाड़ चर जाए, 

डीएसपी को कुचल दे

पत्रकारिता में सरकार की चाटुकारिता हो और झूठे तथ्यों से देश को गुमराह किया जाए, 

नफरत से माहौल बिगाड़ने की 24*7 कोशिश हो ।  


संवेदशील घटनाओं के तथ्य छुपाएं जाएं 

और सच्ची बातों को जानबूझकर संदेह जनक बनाया जाए  । 


आप अपने ही लोगों को फर्जी किसान/मज़दूर/चौकीदार बनाते सुंदर दृश्य बनाने की कोशिश करें और किसान वास्तव में आत्महत्याएं कर रहे हों ............ 


....... पर आपकी बदनामी न हो !!!


वाह रे तुम्हारी  बदनामी का कांसेप्ट कि दोष चोर में नहीं है स्ट्रीट लाइट में है और स्ट्रीट लाईट लगवाने ने चोर को बदनाम करने की साज़िश की है ।  मतलब यह लोग आप लोगों को किस केवल का मूर्ख समझ रहे हैं सोच लीजिए !! कोई बच्चा स्कूल में अगर नालायक  है  तो स्कूल रिपोर्ट कार्ड में फेल लिख कर साजिश कर रहा है !!!


* लोगों के मरने से यदि किसी की बदनामी नहीं होती हो तो यह निर्लज्जता और क्रूरता की अथाह है । यदि कोई हत्यारे को हत्या कहे जाने पर बदनाम करने की साजिश बताए तो वह खुद हत्यारा है। 


आपको तो जिनके साथ आना चाहिए आप उल्टा न्याय की बात के पक्ष में जाने वाले उन लोगों को गिरफ्तार कर रहे हैं । दरअसल यह अच्छे लोगों और बुरे लोगों में यही फ़र्क है और क्रिमिनल मानसिकता के लोगों का गुणसूत्र भी । 


उन्हें  हत्या करने या करवाने में कोई शर्म महसूस नहीं होती पर जैसे ही कोई उनके दुष्ट चरित्र की पोल खोलने लगता है वे रिरियाने लगते हैं बदनाम करने की साज़िश हो रही है । ऐसा है तो मत करते हत्या,चोरी, डकैती,खून खराबा,अबे बुरा काम तुम कर रहे हो तो कह रहे हो तुम्हें बदनाम करने की साज़िश हो रही है । 

बेईमान को बेईमान नहीं कहा जाएगा तो क्या कहा जाएगा । किसी की कथनी और करनी में अंतर होगा तो लोग जुमला जीवी कहते हैं तो जुमला जीवी शब्द बैन करने से वो श्रम जीवी थोड़े ही बन जाएगा ।  तानाशाह के पाखंड को उसका निकम्मापन ही कहा जाएगा । यदि आपके हाथ में छुरा है तो लोग कहेंगे ही छुरा है फूल कहलवाने के लिए फूल लेना होगा । 

यदि आप चाहते हैं बदनामी न हो तो आपको तो खुद बुरे काम करना छोड़ दें न कि उपेक्षा करें कि आप कभी पकड़ में नहीं आएंगे ।  कोई देख नहीं रहा । लोग मुंह बन्द कर बैठ जाएं । आपको सोचना चाहिए आप अच्छे नागरिकों को प्रोत्साहन देना चाहते हैं या बुरे नागरिकों को । 

आप विकृति को अति के स्तर पर सोच रहे हैं कि सारे लोग विवेकहीन हो जाएं । ऐसी विकृत सोच से आपको आज या कल बाहर आना ही होगा (साभार)

गुरुवार, 7 अगस्त 2025

राहुल ने चुनाव आयोग ही नहीं सौ साल के संघी संस्कार को भी कठघरे में खड़ा कर दिया…

 राहुल ने चुनाव आयोग ही नहीं सौ साल के संघी संस्कार को भी कठघरे में खड़ा कर दिया…


राहुल गांधी जब आज चुनाव आयोग की करतूतों का सबूत पेश कर रहे थे तो पूरी दुनिया की मीडिया मौजूद थी, और यह सबूत ने सीधे तौर पर भले ही चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा किया हो लेकिन इस खेल में संघ की भूमिका से इंकार इसलिए नहीं किया जा सकता क्योंकि बीजेपी उसी की अनुवांशिक है और बीजेपी को सत्ता तक पहुँचाने में वह भी पूरी तरह शामिल रहती है, यानी सौ साल के संस्कार से ओत प्रोत बीजेपी यदि वोट चोरी का षड्यंत्र कर रही है तो क्या संघ का संस्कार है। तब इन सवालों का जवाब ही नहीं अब तो आयोग की बर्ख़ास्तगी और सुप्रीम कोर्ट को भी संज्ञान में इसे लेना चाहिए…

मोदी सरकार अवैध रूप से भारत पर शासन कर रही है। यह बात राहुल गांधी के प्रेजेंटेशन से, तमाम आंकड़ों और सबूतों के साथ साबित हो गई है। 



यह भी साबित हो गया कि पार्टी सँगठन, जमीनी काम, आरएसएस की पकड़, योजनाओं के लाभार्थी और मोदी का चुम्बकीय व्यक्तित्व वगैरह सब बेकार की बकवास है। 

असल मे चुनाव चोरी आयोग ने पूरे इलेक्टोरल सिस्टम को तोड़ मरोड़कर भाजपा के पक्ष में परिमाण निकालकर ताजपोशी करवा दी है।

और भांडा फूट जाने के डर से वोटर लिस्ट, सीसीटीवी फुटेज, फॉर्म 6, फार्म 17 का मिलान वगैरह करने से वह बुरी तरह भयभीत है। 

चुनाव चोरी आयोग, भाजपा के बजरंग दल, एबीवीपी, भाजयुमो की तरह भाजपा के एक फ्रंटल ऑर्गनाइजेशन में बदल चुका है। 

वह भारत के सम्विधान नही , भारतीय जनता पार्टी के प्रति वफादार है। इसमे शकों शुबहे की कोई गुंजाइश अब बची नही है। 

इन खुलासों के बाद, वोट चोरी से बनी सरकार भी इलेजितमेंट और अवैध हो जाती है। इसके निर्णय और नीतियां आदेश भी अवैध हैं। 

लेकिन आज राहुल गांधी ने इस तथ्य को कहने से खुद को रोका, और केवल चुनाव आयोग तक सीमित रहे। मगर यह साफ है कि एक लम्बी लड़ाई और सीधे टकराव की ओर देश बढ़ रहा है। 

इलेक्टेड गवर्मेंट होने के नाते, असहमति के बावजूद भाजपा की इस सरकार पर हम जैसो का जो भी इकबाल था, खत्म हो गया। 

अच्छा होगा, कि सिस्टम हैक कर धोखे से खुद को विजयी कराने वाली, अवैध सरकार खुद ही इस्तीफा देकर फ्रेश इलेक्शन करए। एक मिनट भी इन्हें सत्ता में रहने का अधिकार नही है।

क्योंकि…

▪️वोटर लिस्ट बनाना किसका काम है? : चुनाव आयोग

▪️डुप्लीकेट वोटर ना हों, किसका काम है? : चुनाव आयोग

▪️फर्जी पते पर बड़ी संख्या में वोटर लिस्ट ना हों, किसका काम है? : चुनाव आयोग

▪️कोई भी वोटर एक से ज़्यादा जगह वोट ना डालें, किसका काम है? : चुनाव आयोग

🔹यह सारी बातें बता कौन रहा है? : राहुल गांधी

🔹इन दस्तावेजों की जांच किसने की? : राहुल गांधी 

🔹देश के सामने सबूत के साथ सच कौन ला रहा है? : राहुल गांधी 

जो काम कायदे से चुनाव आयोग को करना चाहिए, वो राहुल गांधी कर रहे हैं - जिससे इस देश का लोकतंत्र सलामत रहे 


और चुनाव आयोग उल्टे उनसे शपथपत्र की मांग कर रहा है

ग़ज़ब धृष्टता है - जो व्यक्ति आपको सच का आईना सबूत के साथ दिखा रहा है - उसपर BJP और चुनाव आयोग हमलावर हैं! 

यही इनकी मिलीभगत का सबसे बड़ा सबूत है


चुनाव आयोग को भंग करो और बीजेपी को सत्ता से बेदखल करो!

देश में फिर से चुनाव करवाओ

प्रोफेसर जगदीप छोकर जो एसोसिएसन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म ( ADR) संस्था के संस्थापक हैं, भारत में चुनाव सम्बन्धी अनेकों रिफॉर्म का श्रेय इसी संस्था को जाता है, सुप्रीम कोर्ट में PIL दाखिल कर भारत के नागरिकों की लोकतांत्रिक अधिकारों को प्रोटेक्ट एवं पारदर्शी बनाया है।


जैसे हर उम्मीदवार द्वारा अपनी इनकम, क्रिमिनल मुकदमों, जैसे तमाम डिटेल्स बताना एवं अभी हाल में चुनावी बॉन्ड को अवैध घोषित कराना आदि शामिल है ।


कल इसी ADR के पिटीशन पर ही सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को बिहार में 65 लाख काटे गए वोटरों की डिटेल 9 तारीख तक उपलब्ध कराने को निर्देशित किया है ।


प्रोफेसर जगदीप छोकर ने आज राहुल गांधी के चुनाव सम्बन्धी प्रेस कॉन्फ्रेंस के सम्बन्ध में कहा कि, चुनाव आयोग को राहुल गांधी द्वारा लगाए गए आरोप की जांच करनी चाहिए ना कि उनसे हलफनामा मांगना चाहिए, इससे तो चुनाव आयोग का जिम्मेदारी से भागना एवं चोरी में मिली भगत ही साबित होगा।


उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव में पहले फेज के लिए हुए वोटिंग के बाद आंकड़े जारी करने में चुनाव आयोग को 11 दिन क्यों लगे ?  वो भी सिर्फ प्रतिशत बताया गया, हालांकि सुप्रीम कोर्ट में ADR ने चुनाव आयोग से मत संख्या की मांग की जिसे आज तक नहीं बताया गया।


महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव में शाम पांच बजे से ग्यारह बजे तक 75 लाख वोट अचानक कैसे बढ़ गए?


उन्होंने यह भी कहा कि पंजाब, हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा जब चुनाव आयोग से विडीओ फुटेज मांगा गया था, उसके बाद केंद्र सरकार ने संसद द्वारा नया कानून पारित करवा दिया कि विडीओ फुटेज चुनाव उपरांत सिर्फ 45 दिन तक ही सुरक्षित रखा जाएगा, आखिर क्यों...? 


और अब लास्ट बात, चुनाव आयुक्त सलेक्शन कमिटी से चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को क्यों हटा दिया गया? आखि़र किस पवित्र उद्देश्य के लिए वो बाधा बन रहे थे?


अत: निसंदेह, चुनाव के ऐसे मैनिपुलेशन से आमजनता में जन विद्रोह की चेतना पैदा हो सकती है। किन्तु संयम रखें एवं अपने अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों के तहत सत्य के साथ खड़ा हों।(साभार)


बुधवार, 6 अगस्त 2025

अहिंसा का रास्ता और आदिवासियों का दिशोम गुरु शिबू सोरेन

अहिंसा का रास्ता और आदिवासियों का दिशोम गुरु  शिबू सोरेन


 

कितने ही क़िस्सों के बीच आदिवासियों के दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने जब इस दुनिया को अलविदा कहा तो सहसा विश्वास करना मुश्किल था , जीवन भर अहिंसा के इस राही ने आदिवासियों के लिये जो कुछ किया उसे भुला पाना मुश्किल है…

 1953 का साल। छोटा सा गाँव नेमरा, जहां एक 9 साल का बच्चा, शिबू, अपनी पालतू कोयल के साथ खेलता था। एक दिन गलती से कोयल मर गई। उस मासूम का अपनी कोयल से भावनात्मक लगाव इतना जुड़ चुका था कि उसने चिड़िया का दाह-संस्कार किया और कसम खाई,


“मैं अब किसी जीव को चोट नहीं पहुंचाऊंगा।”


उस दिन से वह अहिंसा के रास्ते पर चल पड़ा था।

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ब्रिटिश एम्पायर ने देश छोड़ते छोड़ते जो आदिवासी थे उनकी जमीनों को जमींदारों और महाजनों के हवाले सौंपने का पत्ता फेंक दिया था। हालात यह थे कि अपनी ही जमीन पर खेती करने के लिए बेचारे आदिवासी महाजनों के दिए कर्ज पर निर्भर रहते थे। बदले में महाजन उनकी जमीनों को कर्ज के ब्याज तले दबाकर हथिया लिया करते थे। आप इसका जमीनी क्रियान्वयन मुंशी प्रेमचंद की गोदान में पढ़ सकते है।


तब सोबान सोरेन नाम आदमी जो कि शिबू के पिता थे वो अपने आदिवासी वर्ग के हितों की रक्षा के लिए महाजनों से जंग लड़ रहे थे। लोहा ले रहे थे।

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27 नवंबर 1957 ....


शिबू के पिता सोबान सोरेन की हत्या कर दी गई। महज 15 साल का शिबू उस रात चुपचाप बैठा रहा। दिल में एक आग जल रही थी जो मानो उसके पिता द्वारा जलाए रखने की दी गई जिम्मेदारी हो।


शिबू उस आग में फूंक मारता रहा।

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साल 1959...


“फसल हमारी, जमीन हमारी, अब कोई नहीं ले जाएगा।”


शिबू ने पिता की छोड़ी गई आंदोलन की विरासत को अपनाते हुए ये हुंकार भरी।


" उतर जाओ खेतों में, काट लो अपनी फसलें, ये तीर कमान जब तक हमारे हाथों में है हम देखते है कौन महाजन तुम्हें तुम्हारी मेहनत की कमाई लेने से रोक पाता है।"


महिलाएं हसिया लेकर खेत में उतर गईं। पुरुष तीर-कमान लेकर पहरेदारी करने लगे।

रातभर धान कटता रहा। सुबह जब महाजन आए, तीर आसमान में गूंजने। शिबू की दी गई साहस आदिवासियों के पुनर्जागरण में क्रांतिकारी भूमिका अदा करने लगी। धान काटो आंदोलन ने शिबू सोरेन को "दिशोम गुरु" (जंगल/भूमि का रक्षक) बना दिया।

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शिबू सोरेन ने अपने जीवन काल में तीन बार मुख्यमंत्री पद का शपथ लिया मगर एक भी बार वो पूर्ण कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। इसके पीछे काफी हद आदिवासी हितों को लेकर उनकी कठोर नीतियां थी जो उनके सहयोगी गठबंधन दलों के क्राइटेरिया में फिट नहीं बैठ पाती थी और तख्त पलट जाता था। उसके बाद उन्होंने अपनी राजनीति का उत्तराधिकार अपने वंश हेमंत सोरेन को सौंप दिया।

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4 अगस्त 2025 को शिबू सोरेन ने इस दुनिया में अंतिम सांस ली। आदिवासियों का दिशोम गुरु आज इस दुनिया को अलविदा कह गया।


मंगलवार, 5 अगस्त 2025

अमित शाह ने भरी संसद में झूठ बोला

अमित शाह ने भरी संसद में झूठ बोला 



मानहानि के एक केस में कोर्ट के जज ने चीन मामले में जो टिप्पणी की क्या वह सत्ता की बौखलाहट है इसे कुछ ऐसे समझ ले कि…


जब  संसद में ऑपरेशन सिंदूर के बहस के दौरान अमित शाह जी ने संसद में खड़े हो कर लगातार तीन गलत बयानी किया

(ऐसा नहीं है कि इसके पहले भाजपा के सांसदों ने संसद में गलत बयानी नहीं की है बहुत बार किया है)

उस के बाद एक बात बोला जो झूठ था या सच ये पता नहीं 

खैर पहले वो तीन गलत बयानी पढ़ लेते है

1. मैं इतिहास का विद्यार्थी हूं (जबकि विकिपीडिया के हिसाब से अमित शाह जी बायो केमिस्ट्री पढ़े थे)

2. सरदार पटेल जी ने 1960 में विरोध किया (जबकि सरदार पटेल का देहांत 1950 में ही हो गया था)

3. जयशंकर home minister है (जबकि वो विदेश मंत्री है)


फिर सीज़फायर पर अमित शाह जी ने बोला कि

अपने देश के होम मिनिस्टर के बात पे यकीन नहीं है

वो एक संवैधानिक पद पे है

ट्रंप के बात पे यकीन है

फिर

राहुल गांधी जी ने उकसाया कि इंदिरा गांधी का 50% भी है तो मोदी जी संसद में बोले कि ट्रंप ने सीज़फायर नहीं कराया

अगर दम है तो आज शाम मोदी जी बोले कि ट्रंप झूठ बोल रहा है

"‘Say Donald Trump is a liar’.."


मोदी जी भावुक हो गए और सारा कूटनीति भूल गए 

और बोल दिया कि

किसी देश के किसी नेता ने सीज़फायर के लिए कुछ नहीं कहा


अगले दिन अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जी ने भारत पर 25% टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी

क्योंकि ट्रंप साहब को उनका नोबेल प्राइज छूटता दिख रहा था


*"आप क्रोनोलॉजी समझिएगा"*


और लास्ट में एक बात पे गौर कीजियेगा


ये राहुल गांधी कर क्या रहा है


विपक्ष में रह कर मोदी जी और अमित शाह जी से वो बोलवा दे रहा है जो उन्हें नहीं बोलना चाहिए था

और

विपक्ष में रह कर सरकार से वो काम करवा दे रहा है जिसको मोदी जी और अमित शाह जी ने मना कर दिया था

जैसे

जाति जनगणना


राहुल गांधी जी ने बोला था

हम सरकार को मजबूर कर देंगे जाति जनगणना के लिए


एक so called "पप्पू" क्या क्या कर रहा है

ऐसे में मानहानि के एक मामले पर भी बातें होनी चाहिए कि क्या चीन को लेकर कोर्ट ने राहुल गांधी को जो बात बोली है, असल में वो पूरे देश के लिए ये संदेश है कि इस सरकार के खिलाफ अपना मुंह बंद रखिए।


वरना कौन नहीं जानता की चीन ने हमारी ज़मीन कब्जाई है, कुछ नये मैप भी जारी हुए जहां भारत के कयी हिस्सों को चीन का हिस्सा बताया गया।


विदेशी अखबारों से लेकर सैकड़ों आर्टिकलों में भी ये खबर छपी है। स्थानीय लोगों द्वारा बताया गया कि हमारी ज़मीन पर चीन घुसा है।


राहुल गांधी ने वही बात कही है,जिसे कोर्ट गलत बता रहा है,एक बात नोट कर लीजिए, आहिस्ता आहिस्ता हमारे देश की एक एक ईंट गिराई जा रही है।


लोकतांत्रिक ढांचे को जर्जर किया जा रहा है, दुश्मन के खिलाफ मुंह खोलने वाले को चुप किया जा रहा है।


कुल मिलाकर देश को बर्बाद करने की प्रषठभूमि तैयार है, उसमें एक यही बंदा है जो आड़े आ रहा है, इसलिए ये संघियों की नजर में खटकता है।


और हां दुनियां में चीन से बढ़कर हमारा कोई दुश्मन नहीं है, दुश्मन की सरपरस्ती अब कोर्ट भी कर रहा है,वो पट्ठा तो पहले से कर ही रहा था।


हम लुट पिट चुके हैं, और इस लूट में मीडिया और सरकार के साथ अब कोर्ट भी आ गया है.. क्योंकि गौतम अडाणी को चाइना के साथ मिलकर धंधा भी करना है।


और जो धंधे के लिए देश के साथ गद्दारी करेगा, ज्यादा दिन तक आवाम अब उसे मांफ नहीं करने वाली है, सत्ता परिवर्तन के बाद इन लोगों को राहुल गांधी भी नहीं छोड़ने वाले हैं।


ये बात राहुल गांधी खुद भी बोल चुके हैं,भूल ना जाये, इसलिए मैं भी लिखे दे रहा हूं।

हमलोग उसका memes खोजने में व्यस्त है

वो विपक्ष का नेता का भूमिका बेहतरीन तरीके से निभा रहा है(साभार)

सोमवार, 4 अगस्त 2025

नाम श्रीराम सेना, काम रावण से भी घटिया…

 नाम श्रीराम सेना, काम रावण से भी घटिया… 


नफ़रत की राजनीति इस देश को कहाँ ले जाएगा, और क्या क्या देखना पड़ेगा, क्या श्रीराम सेना के इन दरिंदों को मासूम बच्चों पर भी दया नहीं आई, स्कूल में पीने के पानी की टंकी में ज़हर… कैसे नफ़रत का यह खेल ख़त्म होगा, बहुसंख्यक होने के कारण उन्हें हर वह बात जायज लगती है जो मुसलमान के ख़िलाफ़ होती है. अब चाहे कितने ही बेकसूर और निर्दोष लोग मारे जाएं लेकिन अधिकांश हंसी की इमोजी और अश्लील वक्तव्य देते हुए एक कट्टर विचार को महानता की तरफ पेश करते हैं. लेकिन इन अपराधियों को नज़र नहीं आया कि कम से कम बच्चों को नुकसान ना पहुंचाए, नफरत की आग में अंधे होकर मासूम बच्चों को ही निशाना बनाने लगे. 

कर्नाटक के बेलगावी में एक हैरान कर देने वाली घटना सामने आई है। कुछ शरारती तत्वों ने साजिश के तहत एक सरकारी स्कूल के टैंक में जहरीला पदार्थ मिला दिया। इस घटना से स्कूल के दर्जन भर छात्र बीमार पड़ गए। 14 जुलाई को हुई इस घटना में पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया है, इनमें श्री राम सेना का एक स्थानीय नेता भी शामिल है। 

पुलिस के अनुसार आरोपियों का उद्देश्य प्रधानाध्यापक सुलेमान गोरिनाइक के इर्द-गिर्द दहशत और संदेह पैदा करना था। जो 13 सालों से हुलिकट्टी के सरकारी निचले प्राथमिक विद्यालय में कार्यरत हैं। पुलिस ने ऐसा प्रतिष्ठा को धूमिल करने और ट्रांसफर कराने के इरादे से किया गया था। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने जहर देने की इस कोशिश की निंदा की और इसे धार्मिक कट्‌टरपंथ करार दिया है।

पानी की टंकी में जहर मिलाने से 12 छात्र बीमार पड़ गए थे। गनीमत यह रही है कि किसी बच्चे की जान नहीं गई। पुलिस ने अब पूरे मामले की गहराई से जांच करने के बाद चौंकानेवाला खुलासा किया है। स्कूल में काफी बच्चों के बीमार पड़ने पर हड़कंप मच गया था। इससे अधिकारियों और अभिभावकों के बीच चिंता खड़ी हो गई थी। ये सभी बच्चे अब ठीक हो गए हैं लेकिन इस घटना की जांच में सन्न कर देने वाला खुलासा सामने आया है।

पुलिस ने पाया कि जहर देने की यह घटना पांचवीं कक्षा के एक छात्र द्वारा की गई थी। यह घटना बेलगावी के सवादत्ती तालुक के हुलिकट्टी गांव में हुई। छात्र से जब और पूछताछ की गई तो उसने बताया कि बोतल में एक हानिकारक पदार्थ दिया गया था। इसे पानी की टंकी में डालने को कहा गया था। छात्र ने बोतल देने का नाम पुलिस को कृष्ण मदार बताया।

जांच में पता चला कि कृष्ण ने दबाव में आकर यह काम किया था। पुलिस के अनुसार सागर पाटिल और नागनगौड़ा पाटिल उसे ब्लैकमेल कर रहे थे, जिन्होंने कथित तौर पर उसके अंतर्जातीय प्रेम संबंधों का पर्दाफाश करने की धमकी दी थी। कृष्ण ने उनकी मांग मान ली। 

पुलिस के अनुसार सागर पाटिल श्री राम सेना का तालुक स्तरीय का नेता है। वह इस पूरे घटना का माटरमाइंड था। पुलिस का कहना है कि पाटिल ने पूछताछ के दौरान कबूल किया कि वह स्थानीय सरकारी स्कूल में एक मुस्लिम प्रधानाध्यापक के पद पर आसीन होने से नाराज था। पुलिस ने तीनों आरोपियों सागर पाटिल, नागनगौड़ा पाटिल और कृष्ण मदार को गिरफ्तार कर लिया गया है।

रविवार, 3 अगस्त 2025

पर उपदेश कुशल बहुतेरे…

 पर उपदेश कुशल बहुतेरे… 


पर उपदेश कुशल बहुतेरे । जे आचरहिं ते नर न घनेरे ।। — गोस्वामी तुलसीदास जी ने यह बात कही थी जिसका अर्थ है दूसरों को उपदेश देना तो बहुत आसान है लेकिन स्वयं उन उपदेशों पर अमल करना बेहद कठिन है, लेकिन इन बातों को याद करने का मतलब मोदी के दौर में इसलिए बेमानी हैं क्योंकि पिछले दस सालों से जो सरकार कारपोरेट के आसरे  विदेशी पूँजी और विदेशी सामनों से इस देश को अपने अनुकूल करने में लगा था जिसने नफ़रत का बाज़ार तैयार कर देश को ही नहीं संसद जैसे पवित्र स्थान में वैमनस्यता की दीवार खड़ी कर दी उसे अचानक हिंदुस्तानियों का पसीना कैसे याद आया , हालाँकि यह देर आये वाली कहावत मान ख़ुशी मनाई जा सकती है लेकिन पिछले ११ सालों की नौटंकी को देखते हुए या संघ की नीति को समझते हुए इस पसीने  की बात पर विश्वास करना मुश्किल है, संसद  कैसे बदल गया और पर उपदेश की कहावत को सरल भाषा में समझिये…

कुछ लोग बोल रहे हैं कि

मोदी जी जर्मनी का मांटब्लैक पेन, इटली का बना मैबैक चश्मा, स्विट्जरलैंड की बनी रोलेक्स घड़ी, अमेरिका में बना आइफोन, जर्मनी की बनी बीएमडब्लू कार, अमेरिका में बना बोईंग हवाईजहाज इस्तेमाल करते है । 

उनको मैं बोलना चाहूंगा कि मोदी जी देश हित मे विदेशी ब्रांडेड सामान उपयोग करते हैं । अरे देश को विदेशी निवेश भी तो चाहिये । अगर कोई विदेशी सामान यूज ही नही करेगा तो दूसरे देश हमारे देश मे निवेश क्यों करेंगे ? 

इसीलिये मोदी जी को विदेशी सामान यूज करने दीजिए । 

स्वदेशी को अपनाने की जिम्मेदारी आपकी और हमारी है । 

अब 11 साल पहले के संसद पर बात करें उससे पहले इस खबर पर…


जिस कुर्सी पर बैठने का अधिकार मुझे मिला है उस कुर्सी पर मै अपने किसी भी खून के रिश्ते को बैठने की इजाज़त दूंगा। ये एक इमोशनल हिस्सा है किसी भी कामयाब इंसान के जिंदगी का।

अगर उस थाना प्रभारी ने अपने खून के रिश्ते को अपनी ही कुर्सी पर बैठा लिया तो कौन सी बड़ी बात हो गई? रिश्वत लेकर कुर्सी का ईमान बेचने से क्या नियम नहीं टूटता?

अब संसद पर…

सन दौ हज़ार के आसपास संसद मैदान का माहौल खुशनुमा होता था । हँसी मज़ाक संजीदगी मुद्दे पे बात तर्क वितर्क सब था । वाजपई जी मुल्क के मुख्या थे, संजीदा आदमी थे लेकिन हर माहौल के हिसाब से सेट हो जाते थे । लालू प्रसाद यादव उसे वक़्त सबसे ताकतवर बोलकार थे, बोलने में माहिर थे दलील देना जानते थे सीधा मुद्दे पर बोलते थे, कभी कभी अपनी ज़बान से वो माहौल तब्दील कर देते थे, तरफ़दार और विरोधी खेमा दोनों लालू जी की बातों पर ठहाका लगा देता था, लालू जी का हुकूमत पर हसमुख हमला वाजपई जी को गुदगुदा देता था, वाजपई जी खुलकर हँसते थे, उनके ठीक पीछे उस वक़्त देश की रक्षा के ज़िम्मेदार जॉर्ज फ़र्नान्डिस भी लालू जी के तर्क पर मासूमाना हँसी हँसते थे, फ़र्नान्डिस लालू जी के सियासी गुरु रहे । उस दौर में हुकूमत के जितने बड़े रहे सब पर लालू जी के लफ्ज़ो का असर था, संजीदगी हँसना हँसाना तर्क वितर्क सब था, सख्त कोई नहीं था आज बीस बरस बाद मुल्क के संसद भवन के हालात बिलकुल बदल गए हैं , अब हुकूमत से सवाल पूछने पर जवाब मांगने पर गालियाँ दे दी जाती हैं, बुरे लफ्ज़ कहे जाते हैं पिछले बरस रमेश बिधूड़ी ने हदे लांग दी थी, कल भी जब संसद भवन में बहस हुई सिर्फ हाथापाई की कमी रही, बाकी सब हो गया, मुल्क के सबसे मज़बूत किले का एहतराम और तहज़ीब बिलकुल ख़त्म हो गयी है, क़सूरवार सब भवन में बैठे हैं, पक्ष विपक्ष सब ज़िम्मेदार हैं मुल्क को लेकर कोई संजीदा नहीं है कोई समझदार नहीं है । इस दौर की संसद भवन में बदज़ुबानी सुनकर थक गए हैं तो बीस बरस पहले की बहस यूट्यूब पर देख लीजिये, सवाल जवाब सब होते थे लेकिन किसी को शर्मिंदा नहीं किया जाता था, एहतराम था, ख़िलाफ़ होते हुए एक दूसरे की इज़्ज़त थी । आज कल तो संसद भवन में पगड़ियाँ उछाल दी जाती हैं । (साभार)

शनिवार, 2 अगस्त 2025

एक लाख की कंपनी दस साल में तीस करोड़ की कैसे हो गई

 एक लाख की कंपनी दस साल में तीस करोड़ की कैसे हो गई 

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल की यह कहानी भी 


वैसे तो मोदी सरकार पर इलेक्ट्रोलर बॉण्ड के ज़रिए ही नहीं बड़े क़र्ज़दारों के बैंक लोन माफ़ कर चंदा वसूलने का आरोप लगता रहा है लेकिन आज हम पीयूष गोयल की वह चौंकाने वाली कहानी लेकर आये हैं जिसे सुनकर शायद आपके आँखों में बंधी पट्टी हट जाये…

नरेंद्र मोदी की सत्ता ने 2014 में कुर्सी कब्जाने के बाद से देश में फर्जीवाड़े से तिजोरी भरने का खुला खेल शुरू किया, लेकिन सिर्फ अपनों के लिए। 


आम जनता बिना भगवा ओढ़े यह काम नहीं कर सकती। 


ये कहानी मोदी के पीएम बनने से बहुत पहले, यानी 2005–06 से शुरू होती है। 


मोदी के कद्दावर मंत्री और पेशे से CA पीयूष गोयल ने अपनी पत्नी सीमा गोयल के साथ मिलकर 1 लाख रुपए की जमा पूंजी से एक कंपनी खोली। 


नाम रखा–इंटरकॉन एडवाइजर्स प्राइवेट लिमिटेड। 


गोयल 13 मई 2014 तक इसके डायरेक्टर रहे। फिर मोदी सत्ता के आते ही पद छोड़ दिया। 


1 लाख की पूंजी वाली इस कंपनी के 10 हजार शेयर्स थे–यानी 10 रुपए प्रति शेयर। 


गोयल के पद छोड़ते ही सीमा के पास 9999 शेयर आ गए। एक शेयर जेबखर्च के रूप में बेटे ध्रुव के नाम कर दिया गया। 


अब यहां से सारा खेल शुरू होता है। 


गोयल के मंत्री बनते ही इंटरकॉन की आय 10 साल (2005 से) में बढ़कर 30 करोड़ हो गई। 


इस 1 लाख के 30 करोड़ में (3000 %) बढ़ने की कहानी बहुत दिलचस्प है, क्योंकि इंटरकॉन ने आज तक कॉरपोरेट मंत्रालय को यह नहीं बताया कि कंपनी ने ऐसा कौन सा काम किया कि आय 30 करोड़ हो गई। 


इस लूट के खेल को यूं समझें। 


असल में, गोयल परिवार और दोस्तों–रिश्तेदारों का कुनबा 11 ऐसी कंपनियों से जुड़ा हुआ था, जिन्होंने बैंकों का लोन हड़पा। 


गोयल के मंत्री बनते ही कुछ कंपनियों का लोन माफ हुआ तो कुछ दीवालिया होकर बेदाग निकल गईं। 


इन्हीं में एक कंपनी थी शिरडी इंडस्ट्रीज। इस कंपनी ने 651 करोड़ का लोन लिया। नहीं चुकाया तो 2017 में 65% लोन माफ करवाया गया। 


एक और कंपनी असीस प्लाईवुड ने 458 करोड़ का लोन हड़पकर खुद को कंगाल घोषित करवा दिया। 


असीस इंडिया इंफ्रा पर भी 457 करोड़ का लोन था। असीस इंडस्ट्रीज को भी 258 करोड़ का लोन मिला। 


सारे लोन का अधिकांश हिस्सा माफ हुआ। दिलचस्प है कि शिरडी से लेकर असीस ग्रुप तक की कंपनियों का ईमेल bknath@asisindia.com ही था। यानी चारों घपलेबाज कंपनियां एक ही शख्स की थीं। 


इसी तरह की 11 कंपनियों के साथ गोयल परिवार के करीबी रिश्ते रहे और पीयूष बतौर केंद्रीय मंत्री उनके लिए काम करते रहे। 


इन सभी 11 कंपनियों में मोदी सत्ता के आते ही गोयल और उसके परिवार के बतौर निदेशक इस्तीफे तो हुए, लेकिन जिन नए लोगों को बदले में लाया गया, वे भी गोयल परिवार से जुड़े थे। 


इनमें राकेश अग्रवाल, मुकेश बंसल, अमित बंसल, मुकेश शाह और प्रशांत शेणॉय जैसे नाम हैं।


राकेश और मुकेश बंसल ने तो सरेआम कहा कि उनके पीयूष के परिवार से रिश्ते हैं। 


वहीं, पीयूष गोयल परिवार का दावा है कि इंटरकॉन का काम सिर्फ एडवाइस देना था। यानी कंपनी पैसा लेकर सलाह देती है। 


कैसी सलाह? जाहिर है लोन हड़पने की, दीवालिया होकर निकल लेने की, अपना लोन माफ करवा लेने की। 


फिर मंत्री बनकर पीयूष गोयल किस तरह इन 11 कंपनियों की मदद कर रहे थे?


सत्ता के रसूख में अपने दोस्तों का लोन माफ करवाना, उन्हें बच निकलने का रास्ता बताना। 


क्या यह हितों का टकराव नहीं है? याद रखे–पीयूष गोयल अभी भी केंद्रीय मंत्री है। 


लेकिन, न खाऊंगा, न खाने दूंगा का जुमला फेंककर देश को बरगलाने वाले नरेंद्र मोदी ने सब जानते हुए पीयूष की फाइल दबाकर रखी। 


कांग्रेस ने जब 2018 में इस मामले को उठाया तो इसी मोदी सत्ता ने झूठा बताकर हवा में उड़ा दिया। 


तब तक गोदी मीडिया भी बिक चुकी थी। 


आज भी किसी पत्रकार में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह इस मामले को दोबारा उठाने की हिम्मत कर सके।


अब यह साफ हो चुका है कि इसी मोदी सत्ता के मंत्री, संत्री, माननीयों ने किस तरह ऐसी करप्ट कंपनियों के लिए दलाली की और बैंकों से 14 लाख करोड़ के लोन माफ करवा दिए। 


अभी भी करीब 150 माननीय देश के लिए नहीं, कंपनियों के लिए काम करते हैं। 


नतीजा इंटरकॉन जैसी और भी कंपनियां खड़ी हो रही हैं और गरीब जनता के टैक्स का पैसा लूट रही हैं। 


देश को बचाने के लिए सिर्फ नरेंद्र मोदी का ही जाना जरूरी नहीं। 


उनके साथ देश की करप्ट सत्ता को भी अगले 200 साल तक उखाड़ फेंकना जरूरी है। (साभार)


वरना ऐसी सत्ता सैकड़ों पीयूष को पालती रहेगी।


Soumitra Roy

गुरुवार, 31 जुलाई 2025

महाभियोग-दो जज, दो नीति…

महाभियोग-दो जज, दो नीति…


ग़ज़ब देश है और अजब सत्ता, वैसे भी यह बात घर कर गई है कि क़ानून सिर्फ़ कमज़ोर लोगो के लिये है , पैसा और पहुँच वालों ने क़ानून को किस तरह अपनी जूती का खाल बनाया है यह किसी से छिपा नहीं है , ऐसे में जज द्वय शेखर यादव और यशवंत वर्मा पर चलाये जाने वाले महाभियोग भी क्या पहुँच के आगे घुटने पर आ जाएगा…

दो जज साहिबान हैं जिन पर विपक्ष ने महाभियोग चलाने के लिए मुहीम चलाई है। एक जज हैं यशवंत वर्मा जी, जिन पर भ्रष्टाचार के मामले मे महाभियोग लगाने के लिए आवेदन किया गया है। दूसरे जज हैं शेखर यादव जी, जिन पर विश्व हिन्दू परिषद की सभा में नफ़रती बयान बाज़ी का आरोप है। 


अब सरकार जस्टिस वर्मा जी के विरूद्ध तो कार्रवाई करने की बात तो कर रही है लेकिन जस्टिस यादव जी के मामले में ख़ामोशी अख्तियार किये हुए है। इन दोनों जजों के विरूद्ध एकसाथ कार्रवाई की जानी चाहिए। 


कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने दिनांक 21-07-2025 को जस्टिस वर्मा के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए 63 राज्य सभा सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित आवेदन किया था। वहीं जस्टिस यादव के विरूद्ध 152 लोक सभा सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित आवेदन पत्र  दिया था।


जब पूर्व राज्यसभा के सभापति धनखड़ इन महाभियोग पत्र पर बोल रहे थे तब वह स्पष्ट रूप से कह रहे थे कि पर्याप्त संख्या में सदस्यों ने हस्ताक्षरित आवेदन पत्र लिखकर दिये हैं। पार्लियामेंट के एक्ट अनुसार यदि इस तरह से दो आवेदन पत्र दिए जाते हैं तो इसे दोनों सदनों में संयुक्त रूप से देखा जाएगा। इन दोनों आवेदन पत्रों को हाऊस की संपत्ति माना जायेगा।


लेकिन सरकार अब इन आवेदन पत्रों पर कार्रवाई करने से हिचकिचाहट दिखा रही है। इससे सरकार की दोमुंही नीति सामने आ रही है और वह विपक्ष के साथ सहयोग नहीं कर रही है।

बुधवार, 30 जुलाई 2025

मिडिल क्लास को ऐसी लताड़ पर चुप्पी क्यों…

 मिडिल क्लास को ऐसी लताड़ पर चुप्पी क्यों… 


वैसे तो मोदी सरकार के आने के बाद मिडिल क्लास की स्थिति को लेकर कितनी ही आलोचना होते रहती है लेकिन पिछले दिनों इक्विटी निवेशक बसंत माहेश्वरी ने ऐसी बात कर दी जिसे सुनकर न तो बीजेपी आईटी सेल को ग़ुस्सा आया न तो भक्तों की भावना ही आहत हुई, आख़िर कौन है ये बसंत माहेश्वरी जिसने सत्ता के मुँह में ताला जड़ दिया और उन्होंने क्या कहा…


◆ बसंत माहेश्वरी साहब, भारत के बड़े इन्वेस्टर, ने आज भारतीय मिडल क्लास को लताड़ दिया है..पहली बार किसी इन्वेस्टर ने मोदी को भी लताड़ा है..पूरी दुनिया में ट्वीट वायरल है..

TCS ने 12,000 एम्प्लॉईज़ को निकाल दिया..इस पर बसंत माहेश्वरी ने ट्वीट किया


~ अब इन 12,000 बेकारों को मंदिर मस्जिद पर ट्वीट करने के लिए वक़्त की कोई कमी नहीं रहेगी..


~ भारत का मिडल क्लास इसी लाइक़ रहा है..


~ मिडल क्लास ने मंदिर मस्जिद मांगा था..और उसे जो चाहिए था वही मिला है


◆ बसंत माहेश्वरी से सवाल पूछा गया कि मिडल क्लास किधर जा रहा है? जवाब दिया कि


 मिडल क्लास "अयोध्या" जा रहा है ✌️


● मुझ जैसे लाखों लोग जब मिडल क्लास के गिरते हालात पर लिखते थे तब हमें हिंदू विरोधी, देशद्रोही, पाकिस्तानी कहा गया था


● अब किसी में हिम्मत है तो बसंत माहेश्वरी को हिंदू विरोधी बोले..बसंत माहेश्वरी ने देश के नौजवानों और नफ़रती नेताओं को बीच सड़क खड़ा कर नंगा कर दिया है..बसंत माहेश्वरी, शुक्रिया💐

मुमकिन है कि बहुत जल्द बसंत माहेश्वरी पर IT, ED, CBI की रेड पड़ेगी..मगर सच नहीं बदलेगा..

अय्यर जी अपने वॉल में आगे लिखते हैं  मोदी, शाह और आदित्यनाथ और इस फ़र्ज़ी हिंदूवादी गैंग ने भारतीय मिडल क्लास को भिकारी बना दिया है..वापस लिखता हूँ कि इन विनाशकों से आज़ादी की लड़ाई लड़िए..वरना भारत बरबाद हो जाएगा..

बसंत माहेश्वरी को इक्विटी निवेश में दो दशकों से ज़्यादा का अनुभव है। वे एक कॉस्ट अकाउंटेंट हैं और सेंट जेवियर्स कॉलेज , कोलकाता से स्नातक हैं। वे सूचीबद्ध प्रतिभूतियों में निवेश करके अपनी आजीविका चलाते हैं।

पैंटालून रिटेल, टीवी18, टाइटन, पेज इंडस्ट्रीज और हॉकिन्स कुकर जैसे कई मल्टीबैगर शेयरों की पहचान करने का उनका अनुभव रहा है । यह पुस्तक उन रणनीतियों का एक प्रतिबिंब है जिनसे उन्हें पिछले कई वर्षों में बेहतर लाभ अर्जित करने में मदद मिली है। वह लोकप्रिय ऑनलाइन निवेश पोर्टल www.theequitydesk.com के संस्थापक भी हैं , जिस पर हर महीने भारत और विदेश से हज़ारों लोग आते हैं।

मंगलवार, 29 जुलाई 2025

जम्मू में 35 सिखों की हत्या का सच

 जम्मू में 35 सिखों की हत्या का सच…आ गया सामने 


उधर जब संसद में पहलगाम हमले को लेकर बहस चल रही थी तब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान २००० में हुए छत्तीसिंहपूरा हत्याकांड का सच झकझोर देने वाला है कि क्या ऐसा इस देश में हो सकता है… २१ मार्च २००० को हुई इस हत्याकांड का सच हर भारतीय को जानना चाहिए…


मीडिया विजिलमीडिया विजिल

ग्राउंड रिपोर्ट

मीडिया विजिल डेस्‍क


पूरे 18 साल पहले की बात है जब 20 मार्च सन् 2000 को अमेरिका के राष्‍ट्रपति बिल क्लिंटन की भारत यात्रा के समानांतर जम्‍मू और कश्‍मीर में अल्‍पसंख्‍यक सिख समुदाय के 35 लोगों की अनंतनाग जिले के छत्‍तीसिंहपुरा गांव में गोली मार कर हत्‍या कर दी गई थी। सेना ने दावा किया था कि यह काम ”पाकिस्‍तान समर्थित इस्‍लामिक कट्टर समूह लश्‍कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों का है”।


इस घटना के इतने बरस बाद तमाम ऐसे साक्ष्‍य सामने आ चुके हैं जो बताते हैं कि सेना का दावा गलत था। सिखों के साथ भारतीय राज्‍य द्वारा किए गए इस ऐतिहासिक विश्‍वासघात को याद किया जाना ज़रूरी है ताकि यह समझा जा सके कि लोकतांत्रिक कहलाने वाला एक राज्‍य कैसे काम करता है।


इंडिया टुडे में एक रिपोर्ट छपी जिसका शीर्षक था, ”आतंकवादियों ने कश्‍मीर घाटी में किया सिखों का पहला नरसंहार…”। पत्रिका ने दावा किया कि ”लश्‍कर-ए-तैयबा के विदेशी सदस्‍य जिन्‍होंने हत्‍याकांड को अंजाम दिया भारतीय फौज की वर्दी पहनकर आए थे जो फर्जी या चोरी की थी।” छत्‍तीसिंहपुरा के  बाद राष्‍ट्रीय राइफल्‍स से पांच ”विदेशी आतंकवादियों” को मार गिराने का दावा किया। ये लड़के बाद में स्‍थानीय निकले। इसे पाथरीबल फर्जी मुठभेड़ कांड के नाम से जाना जाता है।


इकनॉमिक टाइम्‍स की रिपोर्ट के मुताबिक सीबीआइ ने 2006 में राष्‍ट्रीय राइफल्‍स के पांच सदस्‍यों को कथित तौर पर पांच नागरिकों की हत्‍या का दोषी पाया, जिनमें तीन पर इलज़ाम लगाया गया था कि वे पाकिस्‍तानी आतंकवादी थे जिन्‍होंने छत्‍तीसिंहपुरा में 35 सिखों का कत्‍ल किया था। दो अन्‍य को अज्ञात आतंकवादी बताया गया था।


इस जांच का हिस्‍सा रहे अवकाश प्राप्‍त लेफ्टिनेंट जनरल केएस गिल ने 2017 में सिख न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस को दिए एक इंटरव्‍यू में पत्रकार जसनीत सिंह को बताया कि छत्‍तीसिंहपुरा हत्‍याकांड में सीधे भारतीय सेना का हाथ था और इस बारे में रिपोर्ट तत्‍कालीन एनडीए सरकार के गृहमंत्री एल.के. आडवाणी को सौंपी गई थी।


आखिर क्‍या वजह थी सिखों को मारने की? शाहनवाज़ आलम अपने लेख ”नेशनल इंटरेस्‍ट, फिफ्थ कॉलम एंड दि रोमांटिक किलर्स” में लिखते हैं- ”पहला, अंतरराष्‍ट्रीय मंचों पर पाकिस्‍तान के ऊपर बढ़त बनाना। दूसरा, प्रवासी सिखों की सहानुभूति बटोरना जो खालिस्‍तान के दिनों से ही भारत की सरकारों के विरोधी रहे हैं। तीसरा, क्षेत्र में परमाणु प्रसार की भारत की कोशिशों पर अमेरिका द्वारा चिंता जताए जाने को आंशिक तौर पर भटकाना।” वे लिखते हैं कि स्‍वदेशी के मोर्चे पर यह इस हत्‍याकांड का इस्‍तेमाल सिखों को घाटी छोड़कर जाने में उकसाने के लिए किया गया, ठीक वैसे ही जैसा जगमोहन ने हिंदुओं के साथ किया था।


अमेरिकी राष्‍ट्रपति बिल क्लिंटन की यात्रा से ठीक एक दिन पहले 20 मार्च, 2000 को हुए इस हत्‍याकांड पर रिपोर्ट करते हुए फ्रंटलाइन ने लोगों के हवाले से लिखा कि, ”उन्‍होंने जैसे ही गोली चलानी शुरू की, बंदूकधारी जय माता दी और जय हिंद के नारे लगाने लगे। बिलकुल नाटकीय अंदाज़ में उनमें से एक शख्‍स हत्‍याओं के बीच ही रम की बोतल से घूंट मारता रहा। जाते वक्‍त एक ने अपने साथी से कहा- गोपाल, चलो हमारे साथ।”


दिलचस्‍प है कि इस हत्‍याकांड के रहस्‍य का पहला परदाफाश खुद क्लिंटन ने मेडलीन अलब्राइट की किताब ”दि माइटी एंड दि ऑलमाइटी: रिॅ्लेक्‍शंस ऑन अमेरिका, गॉड एंड वर्ल्‍ड अफेयर्स” के फोरवर्ड में किया:


”2000 में भारत के अपने दौरे के दौरान कुछ हिंदू आतंकवादियों ने 38 सिखों की हत्‍या कर दी। अगर मैंने वह यात्रा नहीं की होती तो मारे गए लोग शायद अब भी जिंदा रहते। अगर मैंने इस डर से यात्रा न की होती कि पता नहीं धार्मिक चरमपंथी क्‍या करेंगे, तो अमेरिका के राष्‍ट्रपति के बतौर मैं अपना काम नहीं कर रहा होता।”


हिंदुत्‍ववादी ताकतों के हो हल्‍ले के बाद प्रकाशक को फोरवर्ड का यह हिस्‍सा हटाना पड़ गया था लेकिन क्लिंटन ने वही लिखा था जो वह मानते थे। इसकी पुष्टि बाद में स्‍ट्रोब टालबोट ने अपनी पुस्‍तक ”इंगेजिंग इंडिया: डिप्‍लोमेसी, डेमोक्रेसी एंड दि बॉम्‍ब” में की जब उन्‍होंने क्लिंटन के बारे में लिखा:


”उन्‍होंने इस आरोप को समर्थन नहीं दिया कि पाकिस्‍तान उस हिंसा के पीछे था…।”


इतना ही नहीं, पाथरीबल में जो मुठभेड़ सेना ने छत्‍तीसिंहपुरा के दोषियों की बताई थी और पांच युवकों को मार गिराया था वह बाद में फर्जी साबित हुई। मोहम्‍मद सुहैल और वसीम अहमद नाम के दो पाकिस्‍तानियों को दिसंबर 2000 में छत्‍तीसिंहपुरा का ”मास्‍टरमाइंड” बताकर पकड़ा गया था, वे बाद में निर्दोष बरी हो गए। फिर सवाल उठता है कि छत्‍तीसिंहपुरा के सिखों का कत्‍लेआम किसने किया?


फ्रंटलाइन के अनुसार: ”31 अक्‍टूबर 2000 को जम्‍मू कश्‍मीर के मुख्‍यमंत्री फ़ारुख अब्‍दुल्‍ला ने एलान किया कि सुप्रीम कोर्ट के अवकाश प्राप्‍त जज एस. रत्‍नवेल पांडियन से हत्‍याकांड की जांच के लिए कहा जाएगा। जब पूछा गया कि क्‍या उन्‍होंने इस जांच के लिए क्‍या दिल्‍ली की मंजूरी ली है, तो उन्‍होंने ज़ोर देकर कहा कि उन्‍हें ऐसी किसी मंजूरी की दरकार नहीं है। अचानक चीजें बदल गईं। केवल एक पखवाड़ा बीता और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से उनकी एक मुलाकात हुई और बाद में छत्‍तीसिंहपुरा हत्‍याकांड की जांच को खत्‍म कर दिया गया… दिल्‍ली में अफसरों का कहना है कि केंद्र सरकार छत्‍तीसिंहपुरा हत्‍साकांड की जांच के निर्णय पर नाराज़ थी। कहते हैं कि वाजपेयी ने मुख्‍यमंत्री को कहा था कि उनके इस फैसले ने केंद्र सरकार को शर्मिंदा किया है।”


आज 18 साल बाद छत्‍तीसिंहपुरा हत्‍याकांड और पाथरीबल फर्जी मुठभेड़ के बारे में जानना-समझना भारतीय राज्‍य के चरित्र को समझने के लिए बहुत आवश्‍यक है। लेफ्टिनेंट जनरल केएस गिल का सिख न्‍यूज़ एक्‍सप्रेस को दिया यह साक्षात्‍कार ज़रूर देखें। 30 मिनट 18 सेकेंड पर आपको छत्तीसिंहपुरा हत्याकांड से संबंधित सवाल जवाब मिल जाएँगे। अगर इस बातचीत को पढ़ना हो तो यहाँ क्लिक करें। फ्री प्रेस कश्मीर ने 20 मार्च यानी इस हत्याकांड की बरसी पर छापा है।(साभार)

सोमवार, 28 जुलाई 2025

हिन्दी सिनेमा की आख़री ब्लेक एंड व्हाईट फ़िल्म

 हिन्दी सिनेमा की आख़री ब्लेक एंड व्हाईट फ़िल्म 


क्या आप जानते हैं हिन्दी सिनेमा की आख़री ब्लेक एंड व्हाइट फ़िल्म कौन सी थी, सुपर डुपर इस फ़िल्म को फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार तो मिला ही इसके गीत आज भी लोग गुनगुनाते नहीं थकते…

यह फ़िल्म गुजराती भाषा के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है जिसे गोवर्धनराम माधवराम त्रिपाठी ने लिखा था जो बीसवीं सदी के शुरुआती काल के प्रसिद्ध गुजराती लेखक थे। इस फ़िल्म को उत्कृष्ट छायांकन और उत्कृष्ट संगीत के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिले थे।[

फ़िल्म की कहानी…

सरस्वती (मनीष) उसकी सौतेली माँ द्वारा उदासीनता के साथ पाला जाता है और फिर भी वह एक उदार व्यक्ति के रूप में बड़ा होता है। उसके अपने विचार हैं जो वह अपने पिता के साथ बांटता नहीं है। उसके पिता उसकी शादी एक अमीर परिवार की पढ़ी-लिखी लड़की कुमुद (नूतन) के साथ तय कर देते हैं, लेकिन क्रान्तिकारी सरस्वती इस रिश्ते को मंज़ूर नहीं करता है। फिर भी वह कुमुद को चिट्ठी लिखता है और उस ज़माने की रीतियों के विपरीत कुमुद से मिलने चला जाता है। वहाँ उनका प्रेम परवान चढ़ता है और दोनों मंगेतर एक दूसरे के आशिक़ हो जाते हैं। लेकिन तक़दीर को कुछ और ही मंज़ूर है। कुमुद की शादी रमेश देव से हो जाती है जोकि एक बिगड़ा शराबी अमीर आदमी है, वो कुमुद को बहुत तंग करता है उसके वेशया के साथ संबंद है। एक बार एक झगड़े मे उसके साथों खून हो जाता है और उसकी मौत हो जाती है । कुमुद अपने देवर का लालन पोषण करने की ठान लेती है । सरस्वती जोकि अब सन्यासी बनने की तैयारी कर रहा है तब कुमुद उसे समझती है की सन्यासी बनना ठीक नहीं है एक उसके लिए और फिर उसकी बात मान कर सरस्वती कुमुद की छोटी बहन से शादी कर लेता है ।

अब तो आप समझ ही चुके होंगे कि यह फ़िल्म थी सरस्वती चंद्र।

१९६८ में बनी एक काली-सफ़ेद चलचित्र है। इसे गोविन्द सरैया ने निदेशित किया है और इसके मुख्य कलाकार हैं नूतन और मनीष। 

फ़िल्म के गीत लिखे थे इंदीवर और संगीत कल्याण जी आनंद जी ने दिये थे।

गीत

चन्दन सा बदनमुकेश
चन्दन सा बदनलता मंगेशकर
छोड़ दे सारी दुनियालता मंगेशकर
हमने अपना सब कुछ खोयामुकेश
फूल तुम्हें भेजा है ख़त मेंलता मंगेशकर, मुकेश
ओ मैं तो भूल चली बाबुल का देसलता मंगेशकर


शनिवार, 26 जुलाई 2025

सब गदहा मन बाहिर के…

 


सब गदहा मन बाहिर के…


छत्तीसगढ़ बने पच्चीस  बछर बीत गे। रइपुर ह राजधानी बन गे। गाड़ी-घोड़ा के ठिकना नहीं हे। जेती जाबे तेती मनखेच-मनखे दिखत हें। कतकोन रस्ता म त रेंंगे के सोर नहीं हे फेर कइसे फटफटी चलावत रथे। का लइका का सियान। भई भई चलावत हे। में ह त झपावत झपावत रही गेव। जिवराखन ह राज बने के बाद पहिली घांव रायपुर आय रीहिन हे। अऊ टेशन ले घर पहुंचत बपरा ल एक घंटा लग गे रीहिस। आतेच उत्ता धुर्रा बोले लागीस। कइसे महराज। कइसे रथो ए शहर म। कतका बदल गे हे। राज बने के पहिली आय रेहेव त अतेक भीड़ नहीं रीहिस। टेशन म उतरव तहां ले 10 मिनट म आ जात रेहेंव। फेर ए दारी जी ह असकटा गे। का लइका का सियान भांय भांय गाड़ी ल दबाथे। के घांव जी ह नहीं कांप गे अइसे लागय मांरेच उपर चढ़ा दीही। बीच रोड म गाड़ी ल खड़ा कर देथे। केती ले बुलकबे ते हा सोचतेच रथे कोनो फटफटी वाला ह तोर ले पहीली बुलक जाही अऊ हारन ल अइसे बजाथे के पोटा कांप जाए। तभे त मेहा नहीं आवंव। मरे के पाहरों म एक्सीडेंट होके नहीं मरव।
एकेच सांस म जीवराखन ह  राजधानी के टै्रफिक के अइसे गुणगान कर डारीस के का बताव। के जगह बपरा ह झपावत झपावत त घर आय रीहिस। मे हर केहेव पानी पसीया खा पी ले तहा ले घुमे बर जाबों। घुमे जाय बर ले दे के मानीस। घुमे बर ओखर सवाल शुरु होगे त मे हा समझावत वोला मॉल ले गेव। गाड़ी ल पार्किंग डहार उतारेक तहां ले वो हा मोला चिमचिमा के अइसे धर डारिस जानो मानों वो ह गिरीच जही। गाड़ी ल खड़ा करके लिफ्ट ले वो ला उपर लेगेंव त वो ह बकवा गे रहाय। इतवार के सेती भीड़ रीहिस। इहों भीड़ ल देख के वो खट मन ह बइठ गे। थोड़ेकेच देर म जीवराखन ह असकटा गे अऊ घर जाय के जिद करे लागीस निकलन तहां ले धोड़कीन देर म फेर ओखर शुरु होगे। कस गा महराज असकट नहीं लागय। जेती जाबे तेती खाली गाड़ीच गाड़़ी अऊ मनखेच मनखे दिखत हावय। मे ह केहेव आदत पडग़े हे गा। तहु दुचार दिन रहीबे तहां ले तुहरो आदत पड़ जाही। ते ह घुमे म धियान दे न ऐती तेती देख अऊ कुछु काही बिसाना हे त चल मॉल जाबो।
मॉल काला कथे कहीके त महु केहेव चल भई। भीड़ भाड़ ल देखत घर पहुंचन तहां ले जीवराखन ह शुरु होगे। कस महराज राजधानी बनीस त कहां ले अतेक मनखे आगे एमन ल न रेंगे ल आवय न बने गाड़ी चलाय। अब जीवराखन ल मैं का समझातेव। मोला भोपाल के किस्सा ह सुरता आगे उही ल सुना डारेंव। 
एक घांव भोपाल गे राहन त टीटी नगर डाहर एक बाजु अड़बड़  गदहा दिखीस त मोर संगवारी ह पूछ पारीस। कइसे भईया ईहा  बहुत गदहा हे त आटो वाला ह तुरते केहे रीहिस राजधानी हे साहेब सब डहार के गइहा मन इहां आबेच करथे...!

गुरुवार, 24 जुलाई 2025

फ़र्ज़ी वोटर के सहारे देश लूटने की चाल और हिटलर

 फ़र्ज़ी वोटर के सहारे देश लूटने की चाल और हिटलर… 


पिछले दिनों हेमंत मालवीय और अजीत अंजुम के साथ जो कुछ हुआ  वह साधारण घटना नहीं थी, लेकिन ये घटना हिटलर के शासन की याद को फिर से ताज़ा इसलिए कर दिया क्योंकि तब भी लोग राष्ट्रवाद की पट्टी बांधे उस अत्याचार पर ख़ामोश थे जिस तरह से आज धर्म की पट्टी बांध कर अत्याचार से मुँह मोड़े हुए है, अब तो हद हो गई कि जनता सरकार चुनने कि बजाय सरकार वोटर चुनने लगी है…

हिटलर के कुछ सच पर प्रकाश डाले उससे पहले बता दूँ कि भारत इस वक़्त बहुत बड़ी साज़िश में फंस चुका है। दो उद्योगपति और दो गुजराती नेता, इन चार लोगों ने मिलकर पूरे देश पर शिकंजा कस रखा है। हालांकि मैं यह मानता हूं कि राजनीति पब्लिक के सामने समस्या बताने से ज़्यादा, समस्या का निराकरण करना होती है।

आज राहुल जी या कांग्रेस, कितने भी बड़े कांड का खुलासा कर दें, इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। आज जरूरत है कि बीजेपी की कारस्तानियों को पकड़ने के बाद उन्हें पब्लिक करने की जगह उनसे फाइट की जाए। गोपनीयता बनाई राखी जाए, हर मोर्चे पर भाजपा को पटखनी दी जाए। भारतीय जनता सोल्यूशन और रिजल्ट ओरिएंटेड हो चुकी है।

एक वक्त था जब जनता वोट देकर सरकार चुनती थी, अब हालात ये हैं कि आज सरकार वोटर चुन रही है। राहुल गांधी जी ने संसद के बाहर कल जिस बड़े खेल के विषय में पत्रकारों को बताया वो उनकी आई टी टीम द्वारा सालभर की गई मेहनत के बाद का निष्कर्ष है।

बीते वर्षों में ईवीएम मशीन पर खूब बवाल मचा था, भाजपा विरोधी लोग कांग्रेस पर आरोप लगा रहे थे कि ये खुलकर ईवीएम के खिलाफ नहीं बोल रहे, देश में बड़ा आंदोलन नहीं कर रहे। कल राहुल जी के बयान के बाद बेहद स्पष्ट हो गया है कि तब बड़े स्तर पर विरोध क्यों न हुआ।

क्योंकि राहुल जी की टीम के हाथ कुछ पुख्ता लग चुका था। कर्नाटक में वोटरलिस्ट को पूरी तरह से डिजिटल किया गया जिसमें 6 महीने लग गए और इसके उपरांत जब इसका डेटा एनालिसिस हुआ तब बीजेपी का सारा खेल सामने आ गया। नेक्स्ट लेवल फर्जी वोटिंग का गेम।

हो सकता है कि भाजपा के इस फर्जीवाड़े ईवीएम एक फैक्टर हो, लेकिन अब यह तय है कि यह एकमात्र फैक्टर नहीं। जिस ख़तरनाक खेल का ख़ुलासा हुआ हैं वो भारतीय सोच भी नहीं सकते। महाराष्ट्र, बिहार छोड़िए, कर्नाटक चुनाव में अभी 2 साल का वक़्त है और कर्नाटक में भी फ़र्ज़ी वोटर डाले जा रहे हैं। फ़र्ज़ी वोटर से सरकारें बना कर भारत को लूटा जा रहा है।

तब राहुल के खुलासे का असर इसलिए नहीं हो रहा है क्योंकि यह बिलकुल हिटलर की रणनीति की तरह है । अमिता नीरव ने एक बार लिखा था… 1942 में फेलिक्स की उम्र इक्कीस के आसपास रही होगी। उस वक्त तक हिटलर यूथ का हिस्सा होना हर जर्मन युवा के लिए अनिवार्य था तो फेलिक्स भी उसका हिस्सा था। हिटलर उसका हीरो था। वह मानता था कि जर्मनी को फिर से उसका पुराना गौरव सिर्फ हिटलर ही दिला सकता है और हिटलर भगवान की तरह हैं। वह जर्मनों के सारे संताप मिटा देगा। 


उस वक्त यहूदियों और विरोधियों के साथ जो कुछ हिटलर कर रहा था, कंस्न्ट्रेशन कैंप्स और उन कैंप्स में जो कुछ हो रहा था, उसकी कहानियाँ बहुत छन-छनकर, बहुत ही फिल्टर होकर आना शुरू तो हो गई थी। मगर ये समझ नहीं आ रहा था इसमें कितनी सच्चाई है और कितनी गहराई है, क्योंकि इन कहानियो के स्रोत अपुष्ट थे। 


फेलिक्स को इनमें से किसी भी बात पर यकीन नहीं था। तब भी नहीं जब हिटलर ने आत्महत्या कर ली। हिटलर की आत्महत्या और उसके बाद के दो-तीन महीनों तक फेलिक्स उदास रहा और उसे एलायड फोर्सेस को लेकर गहरा गुस्सा रहा। जब अलायड फोर्सेस ने जर्मनी औऱ आसपास के कंसंट्रेशन कैंप्स की सच्चाई बयान करना शुरू किया तो फेलिक्स को ये हिटलर के खिलाफ दुष्प्रचार लगा। 


बाद में अमेरिकी सेनाओ ने जर्मन नागरिको को जबरन म्यूनिख के पास 1933 में बनाए गए पहले कंसंट्रेशन कैंप डाखाऊ और वीमर शहर के आसपास बसाए गए और कई दूसरे नाज़ी कैंप्स ले जाया गया, ताकि जर्मन नागरिक यह देख सके कि वे इतने वक्त से जिस हिटलर को भगवान मान कर पूज रहे थे, उसने असल में क्या किया?


उन नागरिकों में फेलिक्स भी एक था। जब वह डाखाऊ पहुँचा औऱ वहाँ के हालात देखे तो वह बुरी तरह से डिस्टर्ब हो गया। कई साल उसकी थैरेपी चली औऱ अंत में उसने आत्महत्या कर ली। 

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यूँ हर तरह की सत्ताएँ अपने विरोधियों को कुचलती रही हैं। इससे कोई पार्टी, कोई विचारधारा नहीं बची है। मगर पिछले कुछ सालों से हमारे यहाँ ये प्रवृत्ति इतनी तेजी से बढ़ रही है कि यदि कोई आलोचना न करे, लेकिन विपक्षी की तारीफ भी कर दे तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।


मामला सिर्फ राजनीतिक होता तब भी दिक्कत तो थी, मगर दिक्कत तब और बढ़ जाती है, जब वे दमन की प्रवृत्ति धार्मिक और सांस्कृतिक मामलों पर भी होने लगे। सोशल मीडिया ट्रोलिंग, धमकियाँ, बहिष्कार आदि-आदि से अब हम बहुत आगे आ गए हैं। 


पिछले दिनों हेमंत मालवीय और अजित अंजुमजी के खिलाफ जो कुछ हुआ, वह ताजा उदाहरण हैं। इससे पहले से भी यह होता ही आ रहा है। हर आलोचनात्मक आवाज, हर असहमति, हर प्रश्न को जैसे सत्ता कुचलने को आतुर है। 


इतना विराट जनसमर्थन और इतने नंबर्स, एक प्रशिक्षित ट्रोल आर्मी, प्रोफेशनल आईटी सेल, जमीन पर सन्नद्ध मदर ऑर्गेनाइजेशन के प्रतिबद्ध कार्यकर्ता, चौबीस घंटे चलने वाले मीडिया चैनल्स, अखबार... स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटीज के शिक्षक, पत्रकार, फिल्मकार, साहित्यकार, कलाकार और बुद्धिजीवी, व्हाट्सएप ग्रुप्स, रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी औऱ गृहस्थ महिलाएँ... सब मिलकर भी सरकार की असुरक्षा दूर नहीं कर पा रही है। ये बात बहुत चौंकाती हैं।


पिछले कुछ वक्त से फासिज्म, हिटलर और उसके वक्त के जर्मनी को समझने की कोशिश कर रही हूँ। समझा कि टोटेलिटेरियन स्टेट असल में हर तरह के हथकंडों से अपनी सत्ता को बनाए रखने औऱ लगातार ताकत बढ़ाते चले जाने के लक्ष्य पर काम करती है। 

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हिटलर ने पहला कंसंट्रेशन कैंप 1933 में डाखाऊ में बनाया था और प्रारंभिक तौर पर उसमें विरोधियों और आलोचकों को ही रखा गया था। असल में ताकत की भूख और असुरक्षा का बहुत गहरा संबंध होता है। जब सत्ता दावों की खोखली नींव पर खड़ी होती है, तब असुरक्षा गहरी होती है। 


जानकार कहते हैं कि हिटलर ने जर्मन नागरिकों को विरोधियों और यहूदियों के खिलाफ मोबलाइज करने की कोशिश की थी। मगर उसमें उसे सफलता नहीं मिली। जर्मनी में सत्ता संभालते ही गोएबल्स को प्रपोगंडा मंत्री बनाया गया। 


फिर सिलसिला शुरू हुआ कल्चरल डोमिनेंस का... राजनीति को नाटक का रूप दिया गया। जोशीले भाषण, समर्थन और दुष्प्रचार के लिए फिल्में जैसे 1935 में बनाई गई ट्रायम्फ ऑफ द विल, मीन कॉम्फ पर आधारित फिल्में और नाटक... कलाकारों औऱ बुद्धिजीवियों को हिटलर के समर्थन में लाने और काम करने के लिए दबाव औऱ प्रलोभन।


इसके लिए जर्मनी के प्रचार मंत्रालय ने नाजी शासन के लिए जरूरी माने जाने वाले कलाकारों औऱ बुद्धिजीवियों की सूची बनाई जिसे ‘गोटबेग्नाडेटेन-लिस्टे’ (ईश्वर के आशीर्वाद की सूची) कहा गया। रीच के प्रचार मंत्रालय से युद्ध से छूट के लिए जो आधिकारिक पत्र मिला, उसमें 1,041 कलाकारों और बुद्धिजीवियों के नाम थे। 


इसमें से ललित कला, साहित्य, संगीत, रंगमंच और वास्तुकाला के क्षेत्र की 378 हस्तियाँ गोटबेग्नाडेटन लिस्टे में शामिल थी। मतलब तमाम उपायों से नाजी नीतियों औऱ हिटलर के समर्थन में दुष्प्रचार किया गया। उसका असर हुआ और इस असर का उदाहरण था, फैलिक्स... सिर्फ अकेला फैलिक्स नहीं, कई लोग उस दुष्प्रचार का शिकार हुए। 


ये बात नागरिकों के लिए है, वे तमाम बुद्धिजीवी, पढ़े-लिखे प्रोफेशनल्स के लिए नहीं जो प्रत्यक्ष रूप से हिटलर की नीतियों के लिए काम करते रहे थे। उनके गुनाह तो क्षम्य ही नहीं थे। कुल मिलाकर एक ‘नाजी ईश्वर’ ने देश और दुनिया में तबाही मचा दी। ये कैसे हो पाया? 


उस दुष्प्रचार से जो कई सालों तक अलग-अलग माध्यमों से चलता रहा। 

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राजनीति को थियेटर का रूप देना असल में हर उस सत्ता के लिए जरूरी होता है, जिसने ताकत  तो लोकतांत्रिक तरीके से पाई हो, मगर उसे बनाए रखने के लिए तमाम अलोकतांत्रिक, असंवैधानिक तरीके इस्तेमाल करने पड़ रहे हैं। 


पिछले कुछ सालों के हमारे सांस्कृतिक परिदृश्य पर नजर डालें, हमारी फिल्में, गाने, साहित्य, बुद्धइजीवी, कलाकार, लेखक, पत्रकार... और हिटलर के जर्मनी को जानें। चकित होना बहुत मामूली शब्द लगेगा।(साभार)

बुधवार, 23 जुलाई 2025

हरेली-टोनही ज़मीन से अढ़ाई फिट ऊपर…

 हरेली-टोनही ज़मीन से अढ़ाई फिट ऊपर… 


छत्तीसगढ़ का पहला त्यौहार हरेली है और इसे सावन मास के अमावस्या को मनाया जाता है। इस दिन किसान अपने खेती किसानी में प्रयुक्त होने वाले औजारो की पूजा करते हैं तो घर घर न केवल पकवान बनते हैं बल्कि घर में आने वाली तमाम तरह की बाधाओं को दूर करने के उपाय किए जाते हैं, तब वह क़िस्सा जो बचपन की स्मृति लिये ज़ेहन में समाया हुआ है उसे आज आपके साथ शेयर कर रहा हूँ…

बात तीस पैतीस साल पुरानी है, कहा जाता है कि यह अमावस्या जादू टोने के लिये सबसे उपयुक्त दिन है, इस दिन तमाम तरह की शक्तियों को जागृत भी किया जाता है इसलिए आज के दिन टोनही झुपने ज़रूर निकलती है।

इस कहा सुना के फेर में हम कुछ दोस्त नदी किनारे रात में पहुँच गये , मान्यता है कि टोनही रात में निकलती है और वह न केवल ज़मीन से अढ़ाई फिट ऊपर चलती है बल्कि उसके मुँह से आग भी निकलते रहता है।

इस पहचान के आधार पर हम कुछ दोस्तों के साथ नदी किनारे जा कर चक्कर लगाने लगे।

उस रात हमे कुछ नहीं दिखा, यह सिलसिला कई सालों तक चला…

फिर …

अब भी इस मान्यता पर क्या कहें…

हरेली तिहार के दिन पूजा करने से पर्यावरण शुद्ध और सुरक्षित रहता है और फसल उगती है तो किसी भी प्रकार की बीमारी नहीं लगती है. हरेली तिहार मनाने से फसल को हानिकारक किट तथा अनेको बीमारिया नही होती है इसलिए हरेली तिहार मनाया जाता है. हरेली त्यौहार के दौरान छत्तीसगढ़ के लोग अपने-अपने खेतों में भेलवा पेड़ की शाखाएँ लगाते हैं. वे  अपने घरों के प्रवेश द्वार पर  नीम के पेड़ की शाखाएँ भी लगाते हैं. नीम में औषधीय गुण होते हैं जो बीमारियों के साथ-साथ कीड़ों को भी रोकते हैं.  लोहार हर घर के मुख्य द्वार पर नीम की पत्ती लगाकर और चौखट में कील ठोंककर आशीष देते हैं. मान्यता है कि ऐसा करने से उस घर में रहने वालों की अनिष्ट से रक्षा होती है. हरेली पर्व में, गांव और शहरों में नारियल फेंक प्रतियोगिता आयोजित की जाती है. सुबह पूजा-अर्चना के बाद, गांव के चौक-चौराहों पर युवाओं की टोली एकत्रित होती है और नारियल फेंक प्रतियोगिता खेली जाती है. इस प्रतियोगिता में, लोग नारियल को फेंककर दूरी का मापन करते हैं. नारियल हारने और जीतने का सिलसिला रात के देर तक चलता है,  हरेली त्यौहार के दिन गाय बैल भैंस को भी साफ सुथरा कर नहलाते हैं. अपनी खेती में काम आने वाले औजारों को हल (नांगर), कुदाली, फावड़ा, गैंती को धोकर और घर के बीच आंगन में रख दिया जाता है या आंगन के किसी कोने में मुरूम बिछाकर पूजा के लिए सजाते हैं और उसकी पूजा की जाती है साथ ही अपने कुलदेवता की भी पूजा की जाती है .  

माताएं गुड़ का चीला बनाती हैं और कृषि औजारों को धूप-दीप से पूजा के बाद नारियल, गुड़ के चीला का भोग लगाया जाता है. अपने-अपने घरों में अराध्य देवी-देवताओं के साथ पूजा करते हैं. हरेली के बच्चे गेंड़ी का आनंद लेते हैं. इस अवसर पर सभी के घरों में विशेष प्रकार के पकवान बनाये जाते हैं. चावल के आटे से बनी चीला रोटी को इस दिन लोग खूब चाव से खाते हैं. कोई इसे नमकीन बनाता है, तो कोई इसे मीठा भी बनाते हैं. यह खाने वालों की पसंद के ऊपर होता है. इस तरह से यह त्यौहार परम्पराओं से भरी हुई है. हरेली तिहार के दिन सभी लोग अपने–अपने दरवाजा पर नीम टहनी तोड़ कर टांग देते है और इसी बहुत गेंड़ी खेल का आयोजन शुरु हो जाता है. हरेली तिहार के दिन सुबह से ही बच्चे से लेकर युवा तक 20 या 25 फिट तक गेंडी बनाया जाता है. उसी दिन सभी युवा एवं बच्चे गेंडी चढ़ते है गावं में घूमते है. बच्चों और युवाओं के बीच गेंड़ी दौड़ प्रतियोगिता भी की जाती है.

सोमवार, 21 जुलाई 2025

बड़े बेआबरू होकर…

बड़े बेआबरू होकर…


उपराष्ट्रपति जगदीप धनगढ़ ने इस्तीफ़ा दे दिया। मानसून सत्र के पहले दिन आये उनके इस्तीफ़े की असली वजह जो भी हो लेकिन इतिहास उन्हें एक बेहद चाटुकार और आलोकतांत्रिक व्यक्ति के रूप में कभी नहीं भूलेगा ! क्या है पूरा मामला उन्हें कौन सी बीमारी थी…

जगदीप धनगड़ का विवादों से नाता रहा है , पहली बार वे विवादों में तब आये जब जनवरी 2023 में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की 'मूल संरचना सिद्धांत' के पुनरावृत्ति के संदर्भ में बयान दिया था जिसे लेकर विवाद खड़ा हो गया था. उन्होंने कहा...  'संसद के बनाए काननों को अगर अदालत रोक देती है तो यह लोकतंत्र के लिए खतरा होगा'. इस पर कांग्रेस ने तीखा प्रहार किया तो ममता बेनर्जी ने वहीं टीएमसी की ओर से कहा गया, यह व्यक्ति बीजेपी का एजेंडे को चला रहा है. 


छात्र राजनीति पर टिप्पणी करते हुए यहाँ तक कह दिया था कि कुछ विश्वविद्यालय देश विरोधी विचार धराओ की शरणस्थली बन गये है 

उन पर दिसंबर 2023 में उपराष्ट्रपति धनखड़ पर अधिवेशन में विपक्षी सांसदों को रोकने का आरोप लगा था. विपक्षी दलों के नेताओं ने आरोप लगाया कि संसद के शीत सत्र मे. रोका गया। कांग्रेस प्रेसिडेंट खड़के ने तो यह भी कह दिया कि धनगड़ का बर्ताव बीजेपी प्रवक्ताओं जैसा हो गया है 

 किस बीमारी से जूझ रहे थे धनखड़?

इस साल 9 मार्च 2025 की रात को जगदीप धनखड़को अचानक सीने में दर्द और बेचैनी की शिकायत के बाद एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था. उन्हें वहां CCU (क्रिटिकल केयर यूनिट) में निगरानी में रखा गया और वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. राजीव नारंग की देखरेख में इलाज हुआ. डॉक्टरों के अनुसार उन्हें दिल से जुड़ी परेशानी थी जिसे तत्काल नियंत्रित कर लिया गया था. करीब तीन दिनों तक अस्पताल में रहने के बाद 12 मार्च को उन्हें छुट्टी दे दी गई थी, लेकिन कार्डियक मॉनिटरिंग जारी रखी गई.

डॉक्टरों की रिपोर्ट में बताया गया था कि उपराष्ट्रपति को हाई ब्लड प्रेशर, थकावट और कार्डियक स्ट्रेस जैसी समस्याएं हैं. उम्र के लिहाज से उन्हें गंभीर श्रेणी का मरीज माना गया और मेडिकल टीम ने उन्हें लंबे समय तक विश्राम और कार्यभार में कटौती की सिफारिश की थी. अंततः उन्हें इस्तीफा देना पड़ा.

रविवार, 20 जुलाई 2025

काशी को क्योटा बनाने के बाद अब पटना को पुणे और मोतिहारी को मुंबई…

 काशी को क्योटा बनाने के बाद अब पटना को पुणे और मोतिहारी को मुंबई…


ग़ज़ब दौर है, लोग सच न देखना चाहते हैं और न ही सुनना, सत्ता में बैठे लोग कुछ भी बोलने लगे हैं और लोग ताली बजा रहे हैं । धर्म का नैरेटिव्ह सेट है इसलिए हर चुनाव के पहले इस पर नमक मिर्च का तड़का डाल दिया जाता है और फिर ताली बचाने लगते हैं, कंगना रानौत की हिमाक़त किसी मूर्खता से कम नहीं तो पटना को पुणे बनाने की घोषणा को बेशर्मी नहीं कहा जाना चाहिए…

प्रसिद्ध व्यंगकार हरिशंकर परसाई ने कहा था 

बुद्धिजीवी इस समय संशय से भरे हैं और मूर्ख भरपूर आत्मविश्वास से.

हालांकि इन पर बात करना भी नहीं करने के बराबर ही है. लेकिन जरा सोचिए अगर यह सारी धरती इन्हीं लोल लोगों से भर गई तब बातचीत के विषय कैसे होंगे? कोई भी आकर कह देगा देश को आजादी चिड़िया के अंडे से मिली है. या यह देश डेढ़ सौ सालो की लीज पर है.

कोई यह भी कह सकता है कि नेहरू और गांधी एक भूत है.

हवाई जहाज की खोज हमारे पतंग उड़ाने से हुई है. 

कोई पासपोर्ट की रैंकिंग गिरने को उपलब्धि बता सकता है

और इसलिए कंगना कह रही है कि सरदार पटेल को अंग्रेज़ी नहीं आती इसलिए वे प्रधानमंत्री नहीं बन पाये और अमित शाह का तो दवा है कि अंग्रेज़ी बोलने वालों को एक दिन शर्म आएगी..

ऐसे में समझो कि कुछ तो झोल है 

क्योंकि सरदार पटेल ने लंदन में बाक़ायदा बेरिस्टरी की है

अब थोड़ी बात नॉनबायोलॉजिकल के लिए हो जाये यानी इस झोल पर…

मोदी जानते हैं कि कहाँ क्या बोलना है क्योंकि यह देश दो धड़ों में बंट चुका है जिनमें मिडिल क्लास वर्ग का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया जा रहा। हालात यह है कि ऊंचे दाम और ऊंचे पकवान के क्राइटेरिया में या तो आप खुद को शामिल कीजिए, या फिर अति गरीबी की श्रेणी में जाकर अपना गुजर बसर कीजिए। जाकर 5 किलो राशन की लाइन में लग जाइए तभी आपका घर चल पाएगा।

जनता इतनी मासूम है कि वो साफ साफ ये देख ही नहीं पा रही कि चुनाव आते ही ये मुगलकालीन इतिहास की कब्रें सिर्फ हिन्दू मुसलमान करने के लिए खोदी जा रही है। बहस के ऐसे ऐसे चिन्हित मुद्दों को उकेरा जा रहा है जिनमें हिन्दू मुसलमान की बहस हो। अब करणी सेना के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का स्टेटमेंट ही देख लीजिए सांसद इकरा हसन के लिए। सत्ता जानती है कि इस मुद्दे पर बहस होनी ही है। सत्ता उकसाती है और जनता उछल उछल कर प्रतिक्रिया देने उतर आती है।

असल मुद्दे जनता के बीच से गायब है। रोजगार का इनके पास कोई मॉडल नहीं है। देश को हलक तक कर्ज में डुबाए बैठे है जिसकी भरपाई जनता की जेबों से की जा रही है। आपके अकाउंट से कभी मेंटेनेंस के नाम पर तो कभी एटीएम चार्ज के नाम पर तो कभी यूपीआई चार्ज के नाम पर बिना बताए पैसे काट ले रहे है। आप ट्रेन की टिकट कटाए तो बिना थर्ड पार्टी ऐप के (जिनका चार्ज लगभग 250 से 300 रुपए ज्यादा लगता है) आप आसानी से कर ही नहीं पा रहे। चिड़ियाघर और म्यूजियम जैसे पर्यटन स्थलों पर 25 रुपए की टिकट अब दो गुनी तीन गुनी होकर बिक रही है। एयरपोर्ट में और तीर्थ स्थलों पर ठेके वाली कैंटीनों में डंके की चोट पर 25 का माल 50 में बेचा जा रहा है। 

तब जब थोड़े लोग सत्ता से न डिग सके इसलिए कुछ विकास का दावा कर दो।

लोगो ने काशी को क्योटा बनते तो देख ही लिया है अब पटना को पुणे और मोतिहारी को मुंबई बनते भी देख ही लेंगे…

शनिवार, 19 जुलाई 2025

तब जनसंघ ही नहीं कांग्रेस के भीतर का विरोध भी नहीं डिगा पाई इंदिरा को

 तब जनसंघ ही नहीं कांग्रेस के भीतर का विरोध भी नहीं डिगा पाई इंदिरा को…


अब जब अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत के पाँच विमान गिरने का दावा कर दिया है तब भी प्रधानमंत्री की चुप्पी देश को अपमानित कराने के अलावा क्या है लेकिन आज हम बात कर रहे है उस लौह महिला की जिन्होंने 19 जुलाई 1969 को वह कर दिया जो आज देश के माध्यम और ग़रीब वर्ग का जीवन है…

56 साल पहले 19 जुलाई 1969 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने का ऐतिहासिक फैसला लिया था। इस कदम ने लाखों आम लोगों और ग्रामीणों को बैंकिंग सेवाओं के दायरे में लाया और बैंकिंग संस्थानों को निजी मुनाफे से परे देश के विकास लक्ष्यों के साथ जोड़ा।  

आज, स्वतंत्रता के बाद के भारत को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण सरकारी कदमों में बैंक राष्ट्रीयकरण का एक प्रमुख स्थान है। इसने भारतीय अर्थव्यवस्था को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, और इसके प्रभावों पर आज भी विभिन्न दृष्टिकोणों से चर्चा जारी है।  

1969 से पहले, बड़े निजी बैंक मुख्य रूप से अपने मालिकों और अन्य धनी व्यक्तियों के व्यावसायिक हितों के लिए ही ऋण देते थे। कृषि क्षेत्र को केवल 2% बैंक ऋण मिलता था। लेकिन हरित क्रांति के माध्यम से बड़े कृषि परिवर्तन का लक्ष्य रखने वाले देश के लिए, कृषि क्षेत्र को बैंकिंग समर्थन को कई गुना बढ़ाने की जरूरत थी। यही वह प्रेरणा थी जिसने निजी स्वामित्व से बैंकों को सार्वजनिक क्षेत्र में लाने का फैसला लिया। 1990 के दशक तक, कृषि क्षेत्र के लिए ऋण 15% तक बढ़ गया, जो राष्ट्रीयकरण का एक सकारात्मक परिणाम था।  

राष्ट्रीयकरण से पहले ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाएँ बहुत सीमित थीं। उस समय देश में केवल 7,219 बैंक शाखाएँ थीं, जिनमें से अधिकांश बड़े शहरों और मध्यम आकार के कस्बों में थीं। लेकिन राष्ट्रीयकरण के बाद, बैंकिंग गतिविधियाँ उत्साह के साथ ग्रामीण क्षेत्रों तक फैलीं। अगले चौथाई सदी में बैंक शाखाओं की संख्या आठ गुना बढ़ गई।  

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए यह फैसला लेना आसान नहीं था। विरोधी पक्ष में केवल धनी उद्योगपति ही नहीं थे, बल्कि संगठन परिवार की तत्कालीन राजनीतिक पार्टी जनसंघ और राजगोपालाचारी की स्वतंत्र पार्टी भी थीं, जिन्होंने संसद में बैंक राष्ट्रीयकरण बिल का विरोध किया। कांग्रेस के भीतर भी मोरारजी देसाई जैसे कुछ लोग शुरू में इसके खिलाफ थे। इंदिरा गांधी ने वित्त मंत्री मोरारजी देसाई को हटाकर ही यह फैसला लागू किया। बाद में हुए राष्ट्रपति चुनाव और कांग्रेस के विभाजन में भी बैंक राष्ट्रीयकरण एक महत्वपूर्ण कारक बन गया।  

हालांकि, बैंक प्रशासन में राजनीतिक नियंत्रण और बढ़ते गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) के कारण इसे कई बार आलोचना का सामना करना पड़ा, फिर भी 1969 का बैंक राष्ट्रीयकरण भारत के इतिहास में एक निर्णायक आर्थिक कदम के रूप में आज भी चर्चा में रहता है, जो इसकी प्रासंगिकता और महत्व को रेखांकित करता है।(साभार)

शुक्रवार, 18 जुलाई 2025

जब सत्ता ने झूठ बोलकर नफ़रत फैलाया, 70 सब के सब बरी

 जब सत्ता ने झूठ बोलकर 

नफ़रत फैलाया, 

70 सब के सब बरी…


जिन लोगों का पूरा संस्कार ही झूठ अफ़वाह और नफ़रत की राजनीति पर केंद्रित हो उनसे किसी अच्छाई की उम्मीद ही बेमानी है, वे देश का भला तो छोड़िये किसी का भला नहीं कर सकते, यहाँ तक कि वक्त पड़ने पर घर परिवार ही नहीं समाज को भी संकट में डाल सकते हैं। यह बात दिल्ली हाईकोर्ट के फ़ैसले ने साबित कर दिया कि कुर्सी के लिये सत्ता और उनसे जुड़े लोग किस हद तक गिर सकते हैं । आइये समझते है पूरा मामला…


मामला 2020 का है जब दिल्ली के निज़ामुद्दीन के तब्लीगी जमात के मरकज के विरुद्ध मीडिया ने कैसा माहौल बनाया था। लगता था जैसे सारा कोविड इन्ही के कारण फैला था। पूरे देश मे लोग इनके खिलाफ हो गए थे। 

दरअसल सारा झमेला इनकी निज़ामुद्दीन की एक धार्मिक सभा को लेकर उत्पन्न हुआ। इस आयोजन में देश-विदेश से हजारों लोग शामिल हुए थे। जब इस सभा में शामिल कुछ लोग कोविड-19 पॉजिटिव पाए गए, तो सरकार और मीडिया के एक वर्ग ने तब्लीगी जमात पर लॉकडाउन नियमों का उल्लंघन करने और कोरोना वायरस फैलाने का आरोप लगाया। 

दिल्ली पुलिस ने 70 भारतीय नागरिकों और 195 विदेशी नागरिकों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC), महामारी रोग अधिनियम, आपदा प्रबंधन अधिनियम और विदेशी अधिनियम के तहत मामले दर्ज किए। आरोपों में शामिल था कि मरकज में लोगों ने सामाजिक दूरी और स्वच्छता नियमों का पालन नहीं किया, कुछ जगहों पर तब्लीगी सदस्यों द्वारा थूकने, नर्सों से बदतमीजी जैसे गंभीर आरोप भी लगे। जिन्हें मीडिया और सोशल मीडिया में इस तरह फैलाया गया जैसे हिंदुस्तान में कोरोना का इनसे बड़ा अपराधी कोई दूसरा नही। सोशल मीडिया पर #CoronaJihad जैसे हैशटैग भी ट्रेंड हुए, जिससे सामुदायिक तनाव बढ़ा।

लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने 17 जुलाई 2025 को अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में तब्लीगी जमात के 70 भारतीय नागरिकों के खिलाफ दर्ज 16 एफआईआर और चार्जशीट को रद्द कर दिया। जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने कहा कि कोई सबूत नहीं है कि इन लोगों ने लॉकडाउन का उल्लंघन किया या जानबूझकर वायरस फैलाया। 


कोर्ट ने पाया कि:

1, मरकज का आयोजन मार्च 2020 की शुरुआत में हुआ था, जब पूर्ण लॉकडाउन लागू नहीं हुआ था। लोग लॉकडाउन के कारण मरकज में फंस गए थे और उनके पास बाहर निकलने का कोई साधन नहीं था।

2, कोविड-19 से संक्रमण का कोई सबूत नहीं, न तो एफआईआर और न ही चार्जशीट से यह साबित हुआ कि वे कोविड-19 से संक्रमित थे या उन्होंने बीमारी फैलाई।

3, कोर्ट ने माना कि धारा 144 CrPC या अन्य कोविड नियमों का उल्लंघन सिद्ध नहीं हुआ।

याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली अधिवक्ता आशिमा मंडला ने तर्क दिया कि आरोप "बढ़ा-चढ़ाकर" और "निराधार" थे, जिसे कोर्ट ने स्वीकार किया।

कायदे से ये पूरा मामला एक समुदाय विशेष के खिलाफ पूर्वाग्रह और मीडिया के दुष्प्रचार का जीता जागता उदाहरण है। इससे भी बड़ी बात यहां के बहुसंख्यक वर्ग के मानसिक दिवालियेपन की भी है।

नफरत और वोटों की राजनीति देश को किस गर्त में धकेल रही है उसे समझने में भी ये वर्ग असफल है।(साभार)