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गुरुवार, 5 जून 2025

संसद का विशेष सत्र बुलाने से डरी मोदी सत्ता…

 संसद का विशेष सत्र बुलाने से डर गई मोदी सरकार…


ढाई सौ सांसदों ने जब मोदी सरकार को संसद का विशेष सत्र बुलाने की माँग लिखित में की तो सरकार ने साफ़ मना कर दिया, क्यों? सरकार का यह फ़ैसला इसलिए चौंकाने वाला है क्योंकि परिस्थितियाँ सामान्य नहीं है, आतंकवादी अभी भी नहीं पकड़े गये है, सीजफ़ायर क्यों और कैसे हुआ, भारत की कूटनीति इतनी कमजोर क्यों, और सबसे बड़ा सवाल राफ़ेल को लेकर है। तब सत्र नहीं बुलाने को लेकर विश्लेषण ज़रूरी हो जाता है…



पहलगाम के बाद सीजफ़ायर को लेकर  ट्रंप के मुद्दे पर सरकार बुरी तरह घिर गई है! अमेरिकन मध्यस्थता  को लेकर ट्रंप के लगातार बयानों से सरकार बैक फुट पर है! और इसका जवाब सरकार के पास नहीं है !क्योंकि आधिकारिक रूप से सीज फायर की घोषणा होने के पहले टेंप ने यह घोषणा कर दी थी, अगर इसे स्वीकार किया जाता है तो राहुल गांधी का वह नॉरेटिव भारतीय जनता पार्टी और मोदी जी की सरकार के आभा मंडल को धूमिल कर देगा क्योंकि फिर पूरे देश में गूंजेगा

,फ़ोन  आया, नरेंद्रर , हो गये  सरेंडर 

शायद सरकार इस बात से भी भयभीत है की संसद में बहुत सारे सवाल पूछे जाएंगे और यदि उनके जवाब टाले या गलत जवाब दिए गए और वह सिद्ध हो गए तो पूरे देश में सरकार की बड़ी थू  थू होगी!

कुछ तथ्य तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया के द्वारा जाहिर कर दिए जाने की वजह से चर्चा में है लेकिन ऐसा माना जाता है कुछ तथ्य अभी भी ऐसे हैं जिन्हें सरकार बताना नहीं चाहती और ससद बुलाने के बाद उन पर चर्चा होना अनिवार्य हो जाएगा!

और वह सब सरकार का नॉरेटिव खराब करेगी दरअसल पहलगाम के बाद इस सीमित स्ट्राइक के बाद सरकार एक राष्ट्रवाद का मुद्दा पूरे देश में भुनाना चाहती थी,

पुलवामा के विपरीत इस बार सरकार कामयाब नहीं हो सकी! कुछ स्थितियां ऐसी बनी  जो सरकार के विश्लेषण के बाहर थी! प्लान  असफल हो गया! 

इस योजना के तहत ही इस विवादास्पद स्ट्राइक के बाद मोदी जी प्रदेश प्रदेश स्वयं की पीठ थपथपाने लगे और राष्ट्रवाद का माहौल बनाने लगे लेकिन जिस तरह सारे देश ने घर-घर सिंदूर योजना पर रिएक्ट किया जिस तरह भारतीय जनता पार्टी की तिरंगा यात्राओं को समर्थन नहीं मिला और मोदी जी की सभाओं के बाद भी राष्ट्रवाद का यूफोरिया नहीं बना, तो सरकार को लगने लगा यह *मुद्दा बैकफायर* कर रहा है !

मोदी जी के एजेंडे में ना देश की विदेश नीति थी ना देश की कूटनीति थी ना देश की अर्थव्यवस्था थी और संसद  बुलाने के बाद इन 12 सालों में यह पहली बार था जब उन्हें जवाब देना पड़ता  इन सारी असफलताओं का जिन्हें अक्सर वह आपदा में अवसर की बात से खारिज करते हैं!

  मोदी जी की एक शैली है आम आदमी से कनेक्ट करने की जिसमें वह पूरी तरह से कामयाब रहे लेकिन वर्तमान संदर्भ इस आभामंडल को भी अपने नॉरेटिव से प्रभावित करते हुए नजर आ रहे हैं! 

जो एक भ्रामक इमेज अपने खरीदे हुए मीडिया से मोदी जी भारत की बनाना चाहते थे उसका कितना दुष्प्रभाव पड़ा है एक आभासी इंफ्रास्ट्रक्चर की बात पूरे विश्व में की गई एक आभासी अर्थव्यवस्था के नाम पर हिंदुस्तान के उत्कृष्टता  की बात पूरे विश्व में की गई , जबकि स्थितियां देश में अनुकूल नहीं थी बेरोजगारी बढ़ रही थी महंगाई बढ़ रही थी रुपया गिर रहा था मुद्रास्फीति बढ़ रही थी लेकिन बात चौथी इकोनॉमी की जाती थी, विश्व गुरु की की जाती थी, तेजी से विकसित होते एक आधुनिक भारत की बात की जाती थी लेकिन जहां आज भी तकनीक के लिए दूसरे देशों पर निर्भर करना पड़ता है! और इसी भ्रामक इमेज की वजह से भारत विश्व राजनीति का शिकार हो गया क्योंकि पूरी विश्व राजनीति इस समय व्यापार पर आधारित है? और संपन्न राष्ट्र किसी और को अपने बराबर देखना पसंद नहीं करते इसलिए आज भारत चीन की भी आंख की किरकिरी है अमेरिका की भी, और रूस ने भी उसे एक सम्मानजनक दूरी बना रखी है! और वहीं पाकिस्तान को अमेरिका भी आशीर्वाद दे रहा है और चीन भी दूध पिला रहा है!


ससद बुलाने के बाद यह *आभासी इमेज* दरक कर गिर जाती, उनका जो वास्तविक चित्र है इस आभासी इमेज के आगे बहुत छोटा पड़ जाता और शायद सत्ताधारी दल यह नहीं चाहता था इसलिए सवालों से बचने के लिए उसने संसद बुलाना उचित नहीं समझा!

सत्ताधारी दल बिहार चुनाव तक स्थितियों की अनुकूलता चाहता था वह नहीं चाहता था कि देश की मानसिकता किसी नए नॉरेटिव की ओर आगे बढ़ने लगे, 

क्योंकि संसद में

 *सामाजिक जनगणना* को लेकर भी सवाल किए जाते !

चुनाव के पहले सरकार इनसे बचाना चाहती थी! वह नया नॉरेटिव बनाने की कोशिश करेगी ससद बुलाने के पहले बच्चे हुए दिनों में नॉरेटिव को अपना अनुकूल बनाने के लिए! 

और इस सबके अलावा सबसे बड़ा सवाल होगा राफ़ेल पर।राफेल इस पूरी स्ट्राइक में विवादास्पद रहा है लेकिन जिस तरह कांग्रेस सरकार का सौदा खारिज कर कर मोदी जी की सरकार ने ऊंचे दामों पर राफेल का सौदा किया था लेकिन उसके बावजूद तकनीकी स्थानांतरण की सहमति नहीं ली गई थी और उसके बाद जब अभी इतनी विपरीत परिस्थिति में भी एसॉल्ट कंपनी ने राफेल का सोर्स कोड देने से भारत को इनकार कर दिया और भारत के राफेल का गिरना न गिरना सिर्फ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बल्कि भारत में भी चर्चित रहा उसके बाद सरकार को यह भी लगता था यदि संसद बुलाई गई तो उसके ईमानदार चेहरे को भी वैसे तो वह बचा नहीं है लेकिन शीर्ष पर भी आरोपों की बौछार की जाएगी इन स्थितियों में तोउसका बचना बहुत मुश्किल हो जाता!

ऐसी परिस्थिति में सत्ता ने सत्र से भाग जाने के निर्णय को उचित समझा।(साभार)



मंगलवार, 20 मई 2025

पहलगाम के बाद आई एपीसीआर की रिपोर्ट भयावह…

 पहलगाम के बाद आई एपीसीआर की रिपोर्ट भयावह…



एपीसीआर (Association for Protection of Civil Rights) की रिपोर्ट के अनुसार, पहलगाम हमले के बाद भारत में 184 घृणास्पद घटनाएं हुई हैं, जिनमें 316 लोग प्रभावित हुए हैं. इन घटनाओं में से 116 में पहलगाम हमला एक ट्रिगरिंग फैक्टर के रूप में कार्य कर सकता है. रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 43 घटनाएं हुई हैं, इसके बाद महाराष्ट्र, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश का स्थान है. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इन घटनाओं में 36 लोग शारीरिक या मानसिक रूप से प्रभावित हुए हैं. 
एपीसीआर की रिपोर्ट के मुख्य बिंदु: 
  • घृणास्पद घटनाओं में वृद्धि:
    पहलगाम हमले के बाद भारत में घृणास्पद घटनाओं में वृद्धि हुई है. 
  • उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा घटनाएं:
    रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 43 घृणास्पद घटनाएं हुई हैं, https://www.youtube.com/watch?v=SrGnuFe5iiM https://www.youtube.com/watch?v=SrGnuFe5iiM पर एक वीडियो में बताया गया है. 
  • पहलगाम हमले का प्रभाव:
    इन घटनाओं में से 116 में पहलगाम हमला एक ट्रिगरिंग फैक्टर के रूप में कार्य कर सकता है, https://www.youtube.com/watch?v=SrGnuFe5iiM https://www.youtube.com/watch?v=SrGnuFe5iiM पर एक वीडियो में बताया गया है. 
  • प्रभावित लोगों की संख्या:
    316 लोग इन घटनाओं से प्रभावित हुए हैं, जिनमें 36 लोग शारीरिक या मानसिक रूप से प्रभावित हुए हैं, https://www.youtube.com/watch?v=SrGnuFe5iiM https://www.youtube.com/watch?v=SrGnuFe5iiM पर एक वीडियो में बताया गया है. 
एपीसीआर के वकील, शोधकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता और अर्ध-कानूनी स्वयंसेवक अन्य मानवाधिकार संगठनों के साथ मिलकर मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों की जांच करने के लिए भारत के विभिन्न हिस्सों का दौरा करते हैं और मामले से संबंधित मुद्दों को चिह्नित करने के लिए रिपोर्ट पेश करते हैं।
एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राईट्स (APCR) द्वारा जारी एक 178-पृष्ठीय रिपोर्ट में 22 अप्रैल से 6 मई के बीच भारत के 19 राज्यों में मुस्लिमों के खिलाफ 184 हेट क्राईम दर्ज किए गए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, इन हमलों की प्रकृति संगठित, योजनाबद्ध और लगातार थी — औसतन हर दिन 10 से अधिक घटनाएँ। पीड़ितों में महिलाएँ, बच्चे, बुज़ुर्ग और दिहाड़ी मज़दूर शामिल हैं।_
मुख्य निष्कर्ष:
• 84 हेट स्पीच, जिनमें नरसंहार और नसबंदी की मांगें शामिल।
• 39 मार-पीट की घटनाएँ, कई मामलों में भीड़ द्वारा खुलेआम हिंसा।
• 19 तोड़फोड़ की घटनाएँ — दुकानों, मस्जिदों और घरों पर हमले।
• 12 मॉब लिंचिंग प्रयास, 3 हत्याएँ।
• कम से कम 316 मुसलमानों को शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित या विस्थापित किया गया।
“पहलगाम का बदला” — खतरनाक तर्क
रिपोर्ट के अनुसार 106 घटनाओं को हमलावरों ने “पहलगाम का बदला” कहकर जायज़ ठहराया। दक्षिणपंथी संगठनों द्वारा फैलाई गई अफवाहों और घृणात्मक भाषणों ने इस हिंसा को उकसाया।

कुछ गंभीर घटनाएँ:
• आगरा: एक मुस्लिम युवक की गोली मारकर हत्या, दूसरा गंभीर रूप से घायल।
• मैंगलुरु: झूठे आरोपों पर 32 वर्षीय मुस्लिम युवक की पीट-पीटकर हत्या।
• शामली: भीड़ ने “26 के बदले 2600” के नारे लगाते हुए युवक पर कुल्हाड़ी से हमला किया।
महिलाओं और बच्चों पर हमले
• हिजाब पहनने वाली महिला और उसके बच्चे को डंडों और तलवारों से पीटा गया।
• 15 वर्षीय लड़के को ज़बरदस्ती पाकिस्तानी झंडे पर पेशाब करवाया गया।
• कश्मीरी लड़की को हॉस्टल में पीटा गया और आतंकवादी कहा गया।
राज्य-प्रायोजित हेट स्पीच और बहिष्कार
• यति नरसिंहानंद ने मुस्लिमों के संहार की बात कही।
• बीजेपी सांसद आलोक शर्मा ने मुस्लिमों की नसबंदी की मांग की।
• कई राज्यों में मस्जिदों पर हमले, मुस्लिम दुकानदारों का बहिष्कार,
संस्थागत भेदभाव:
• मुस्लिम महिलाओं को चिकित्सा सेवाएँ नकारना।
• हिजाब पहनने पर छात्राओं को स्कूलों से निकालना।
• मुस्लिम जवान को पाकिस्तानी महिला से शादी पर CRPF 
पुलिस की निष्क्रियता और पक्षपात:
• कई मामलों में FIR दर्ज नहीं हुई, पीड़ितों को ही गिरफ्तार कर लिया गया।
• वीडियो सबूत के बावजूद हमलावरों पर कोई कार्रवाई नहीं।
निष्कर्ष: एक सुनियोजित उत्पीड़न की प्रक्रिया
यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि यह हिंसा आकस्मिक नहीं, बल्कि एक विचारधारात्मक और संस्थागत नफरत के अभियान का हिस्सा है। मुस्लिमों को टारगेट करना आज राजनीतिक रूप से स्वीकृत, सामाजिक रूप से सामान्यीकृत, और संवैधानिक संस्थाओं द्वारा अनदेखा किया जा रहा है।