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बुधवार, 12 मई 2021

महानिद्रा में मोदी


बिस्तरा है न चारपाई है,

सत्ता हमने खूब पाई है।

आदमी जी रहा है मरने को

क्या यही इस सत्ता की सच्चाई है।।

क्या सत्ता सचमुच बड़ी मुश्किल से हाथ आने वाली दुधारु गाय हो चुकी है जिसे केवल दुहना है। जनता तो अपना बचाव कर रही ही लेगी, अपने जीवन के लिए संघर्ष कर ही लेगी। सत्ता की घोर लापरवाही का असर नदियों में बहती लाशें, चिताओं के ढेर, अस्पताल की अव्यवस्था और अब लॉकडाउन में परिवार पालने की समस्या के रुप में सामने आ चुकी है। इतनी त्रासदी देखने के बाद भी सत्ता में बैठे लोगों की प्राथमिकता सेन्ट्रल विस्टा इसलिए है क्योंकि वहां महल जैसे प्रधानमंत्री आवास में इसी कार्यकाल में रहना है।

हालांकि यह रोने का समय नहीं है, हम पर लादी गई मुसिबत से छुटकारा पाने मार्ग ढंंढूने का समय है, रूदन और वेदना के इस दौर में भी जो लोग नफरत की भाषा में प्राणघातक आ लगा रहे हैं वह उनके आदमी होने पर सवाल खड़ा करता है। यह ठीक है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पास भाषण देने की अद्भूत कला है, मानसिक रुप से सामने वाले व्यक्ति को अस्त-व्यस्त करने की इस अद्भूत कला ने ही उन्हें सत्ता में पहुंचाया है, लेकिन यह समय जागने का है और महानिद्रा में सोए सत्ता को झकझोर देने का है।

न्यायालय ने जिस तरीके से नरसंहार की बात कही है, जिस तरह से नदियों में लाशें बह रही है, जिस तरह से सदन का स्वर आकाश को छूने लगा है यह किसी सत्ता की लापरवाही का पाशविक  कार्य है। गांधी और बुद्ध के देश में नफरत का विषवमन से पूरी दुनिया हैरान ही नहीं है बल्कि लोकतंत्र के लिए घातक बता चुकी है।

कोरोना की त्रासदी को पूरी दुनिया ने मोदी सत्ता की लापरवाही कहा है, भारत में हो रही मौतों के लिए केन्द्र को दोषी माना है तब भी महानिद्रा टूटने का नाम नहीं ले रहा है। क्षणभर पहले ही आनंदित होती जिन्दगी का प्रवाह लाशों का रेला बन जा रहा है। इस भयावह त्रासदी से धरती वेदना से चित्कार उठी है, आकाश धुंधला-नीला हो गया है, हवा में सन्नाटा है। लेकिन सत्ता से जुड़े लोग अब भी इस त्रासदी के लिए नए-नए तरीके ढूंढ रहे हैं। शब्दों के जहरीले बम फेंके जा रहे हैं, वह फट भी रहा है और उसके तीक्षण टुकड़े हवा में उड़कर विनाश को आमंत्रित कर रहे हैं।

सिर्फ महीनेभर में कितनी-कितनी जिन्दगियों का अंत, अस्तित्व समाप्त हो गया वेदना पिघले बिना ही जम गई और विरोध के स्वर ऐसे गूंजने लगे मानों हरी-भरी, देवभूमि इस कोरोना से ही नहीं इस सत्ता से भी मुक्त होने तड़प रही है। सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो गया, अंतिम संस्कार समाज की जिम्मेदारी हुआ करती थई, लेकिन कोरोना ने वह भी छिन ली। मेरी बात सत्ता में बैठे लोगों को बुरी लग सकती है क्योंकि मेरा मानना है सत्ता की पहली जिम्मेदारी थी कि वह अपने कार्यकर्ताओं को लोगों की सेवा में झोंक दे लेकिन सत्ता ने आपदा में अवसर तलाशने की बात कही, तब यह कहना उचित है कि आदमी तो कब का मर गया भीतर केवल जानवर है, जानवर!

शनिवार, 8 मई 2021

प्रधानमंत्री की प्राथमिकता...

 

दिल्ली हाईकोर्ट ने केन्द्र सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए जब कहा कि कड़ी कार्रवाई के लिए मजबूर न करें! तो यह सवाल उठाया जाना चाहिए कि इस भीषण महामारी में भी केन्द्र की सरकार आखिर लोगों की जान से खिलवाड़ क्यों कर रही है, उसकी प्राथमिकता क्या जनकल्याण नहीं होनी चाहिए? आखिर वह एक कदम आगे बढ़कर देश के लोगों के कल्याण की बात क्यों नहीं कर रही है। क्या वह जानती है कि कुछ भी नहीं करने के बाद भी सिर्फ हिन्दु-मुस्लिम के सहारे वह सत्ता में फिर से आ जायेगी?

यह सवाल अब हर उस देशप्रेमी की जुबान बनने लगी है जो भीषण महामारी से तड़पते जिन्दगी को अपनी खुली आंखों से देख पा रहे हैं। बंगाल चुनाव के नतीजे आने के बाद जिस तरह से वहां भाजपा और तृणमूल कांग्रेस की लड़ाई को हिन्दू-मुस्लिम का रुप देने की कोशिश की गई, उसका सच सामने आने लगा है, दुनियाभर की हिंसा की तस्वीरों को बंगाल की हिंसा बताकर नफरत फैलाने की कोशिश किस तरह की गई, भारतीय जनता पार्टी ने किस तरह से देशभर में धरना प्रदर्शन किया वह अब स्पष्ट होने लगा है।

ऐसे में एक बात तो तय है कि इस भीषण महामारी से अब इस देश की जनता को खुद ही निपटना है, क्योंकि बीस हजार करोड़ के सेन्ट्रल विस्टा को लेकर दायर याचिका पर न्यायालय ने भी हाथ खड़े कर दिये हैं। तब सवाल यही है कि मोदी सत्ता की प्राथमिकता क्या है। महामारी से निपटने मोदी सत्ता को राष्ट्रीय प्लान बनाने, आक्सीजन की सुचारु आपूर्ति और वैक्सीन को लेकर न्यायालयों ने लगातार लानत भेजी है लेकिन सरकार ने रईसी बरकरार रखने का उपाय अपनी प्राथमिकता में रखी है। यही वजह है कि तमाम विरोध के बाद भी इस महामारी में सेन्ट्रल विस्टा का काम बेधड़क चल रहा है और उसमें भी महल जैसे प्रधानमंत्री आवास सबसे पहली प्राथमिकता है जिसे हर हाल में दिसम्बर 2022 तक पूरा किया जाना है।

सरकार की दूसरी प्राथमिकता की रईसी बरकरार रखने की है इसलिए इस महामारी के दौर में सिर्फ आईडीबीआई बैक को बेचने के लिए कैबिनेट की बैठक बुलाई जाती है। इस सरकार की प्राथमिकता तो शुरु ही राज्यों में सत्ता प्राप्ति की रही है इसलिए जब भी किसी राज्य में चुनाव होता है प्रधानमंत्री सहित पूरी कैबिनेट वहां होती है और कई बार तो साफ लगता है कि ये प्रधानमंत्री देश के नहीं सिर्फ भारतीय जनता पार्टी के नेता बस हैं। यही नहीं ट्रम्प को जिताने भी रैलियां होती है और कोरोना की अनदेखई तब तक की जाती रही जब तक मध्यप्रदेश में सरकार नहीं बन गई।

सवाल बहुत से है लेकिन कोरोना काल में भी सरकार की प्राथमिकता यदि सत्ता की रईसी बरकरार रखने की है तो फिर दूसरी-तीसरी क्या चौथी लहर में भी कुछ नहीं होने वाला है। क्या देश के प्रधानमंत्री को इस भीषण महामारी से निपटने कोई योजना नहीं बनानी चाहिए? क्या मध्यम व लघु व्यापारियों या उद्योगपतियों के लिए कोई योजना नहीं बनानी चाहिए? क्या मध्यम वर्ग के लोगों की तकलीफ दूर करने योजना नहीं बनानी चाहिए। क्या रोज कमाने-खाने वालों के लिए इस सरकार ने कोई योजना बनाई है। सभी को आक्सीजन और वैक्सीन मिल जाये इसकी कोई योजना है। महामारी से बर्बाद हो चुके परिवार के परिवार और अनाथ हो चुके बच्चों के लिए कौन सी योजना है। 

सरकार जानती है कि बेबसी में तड़पते लोग भले ही आज गाली दे रहे है लेकिन वोट उन्हें ही देंगे क्योंकि हिन्दुत्व खतरे में है? राहुल गांधी के परिवार ने देश के लिए कुछ नहीं किया? तब इन सवालों का क्या अर्थ रह जाता है। जिस तरह से असम जीते वैसे ही 2024 में देश जीत लेंगे?

शुक्रवार, 7 मई 2021

घबराईये मत ,आयेगा तो मोदी ही!


 

जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है तभी से इस देश में नई-नई मुसिबत आई है जब कोई यह बात कहता है तो उन्हें अनुपम खेर का वह ट्वीट जरूर पड़ लेना चाहिए जिसमें उन्होंने दस दिन पहले ही कह दिया था। घबराईये मत, आएगा तो मोदी ही। जय हो।

यह विश्वास अकेले अनुपम खेर का नहीं है, कितने ही कुंठित हिन्दु है जो इस विश्वास के साथ कोरोना और दूसरी तकलीफों से ओतप्रोत होकर चले गए। क्योंकि मोदी नहीं होगा तो हिन्दु खतरे में पड़ जायेंगे इसलिए हिन्दुओं को बचाना है तो मोदी को लाना है। देख लेना बंगाल अब कश्मीर बन जायेगा। कोई हिन्दु सुरक्षित नहीं रहेगा। आदि-आदि। 

इस तरह के पोस्ट से सोशल मीडिया में वाट्सअप युर्निवसिटी और ट्रोल आर्मी के सदस्यों द्वारा लाखों की तादात में रोज की जा रही है। उन्हें इस भीषण महामारी से ज्यादा जरूरी मोदी को बचाना लगता है और सरकार क्या कर रही है यह तो बताने की जरूरत ही नहीं है। एक भक्त तो अनुपम खेर से भी आगे निकल कर कहने लगे एक सौ तीस करोड़ का इस देश का कोरोना कुछ नहीं बिगाड़ सकता यदि रोज एक लाख मौते होंगी तब भी इस देश की आबादी को खत्म होने में दशकों लग जायेंगे क्योंकि लोग पैदा भी तो हो रहे हैं।

हालांकि इस बात को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है लेकिन कुंठित हिन्दुओं की सोच को लेकर चिंता जरूर की जानी चाहिए कि आखिर कोई सरकार इतनी लापरवाही और लाशों का ताडंव मचाने के बाद भी कुर्सी से कैसे चिपके रह सकती है। पिछले सप्ताहभर से देश के तमाम तरह के एक्सपर्ट कोरोना की तीसरी लहर को लेकर गंभीर चेतावनी दे रही है, न्यायालय रोज लानत भेज रही है लेकिन सरकार ने अभी तक दूसरी लहर से निपटने ही कोई मास्टर प्लान नहीं बनाया है।

दूसरी लहर में जिस तरह से 25 से 45 साल के उम्र के लोगों की ौत हुई है उसके चलते परिवार का परिवार बर्बाद हो गया है, बच्चे अनाथ हो गये हैं। 18 से अधिक उम्र के लोगों को वैक्सीन लगाने की सिर्फ घोषणा ही हुई है। जब वैक्सीन ही नहीं होगा तो फिर इस तरह की घोषणा का मतलब ही क्या है।

एक तरफ एक्सपर्ट तीसरी लहर में बच्चों पर कहर बरपाने की चेतावनी दे रहे है तो विश्व की सबसे बड़ी पार्टी भारतीय जनता पार्टी हिन्दु-मुस्लिम करते घुम रही है। हिन्दुओं की ठेकेदारी में व्यस्त संगठनों का कहीं पता नहीं है, संघ, बजरंग दल, विश्व हिन्दु परिषद के पदाधिकारी शायद इसलिए चुप है कि भले ही हिन्दुओं की आबादी थोड़ी कम हो जायेगी लेकिन मुसलमान भी तो मर रहे हैं। इतनी भयावह लापरवाही और आम लोगें का मोदी सरकार को लेकर जो गुस्सा साफ दिखाई दे रहा है, इसके बाद भी सरकार कुछ नहीं कर रही है तो इसकी वजह वह पंच लाईन है जो हर व्यक्ति के जेहन में राज कर रहा है। घबराईये नहीं, आयेगा तो मोदी ही!

मंगलवार, 4 मई 2021

सबसे बड़ा लुजर...

 

न कोरोना से मौते ही थम रही है और न ही सरकार अपनी गैर जिम्मेदाराना हरकत से ही बाज आ रही है! सरकार लाख दावा करे कि सब कुछ ठीक हो गया है, लेकिन जमीन में माजरा दिल दहला देने वाला है। कोर्ट ने सरकार को दो महत्वपूर्ण सुझाव दिये है पहला इस आपदा से निपटने राष्ट्रीय योजना बनाने की और दूसरा फ्री में वेक्सिन देने की लेकिन  आज की तारीख तक सरकार ने इन दोनों ही सुझाव पर अमल नहीं किया है।

इसका मतलब साफ है कि मोदी सरकार लोगों की मौत को लेकर जरा भी चिंतित नहीं है, वह सिर्फ हवा में बात कर रही है। मोदी सत्ता का दावा जमीन में पूरी तरह असफल है, अब भी आक्सीजन की कमी है, वेक्सिन की कमी से जूझ रही राज्य सरकार के सामने कानून व्यवस्था की चुनौती खड़ी हो गई है।

इतनी निर्दयी सत्ता... कितनों ने देखी है। इस आपदा से परिवार के परिवार बरबाद होते जा रहा है, बच्चे अनाथ होते जा रहे है, लघु और मध्यम व्यापारियों के सामने जीवन और परिवार बचाने का संकट खड़ा हो गया है लेकिन सत्ता के पास किसी भी तरह की योजना नहीं है। हैरानी तो इस बात की है कि भाजपा की राज्य इकाई और राज्य सरकारें भी खामोशी से जलती चिता और बिलखते लोगों को तमाशाबीन बनी देख रही है। सत्ता की निष्ठुरता का इससे बड़ा सबूत और क्या होगा कि उसने मान्य परम्पराओं तक को तिलांजलि दे दी है और बंगाल चुनाव में ममता बैनर्जी को प्रधानमंत्री ने बधाई तक नहीं दी। शायद वे कोरोना से हो रही मौत से दुखी होंगे। लेकिन जिस बेशर्मी से वह सब ठीक ठाक व्यवस्था  यानी आक्सीजन सप्लाई की बात कर रही है वह हैरान कर देने वाला है।

यदि देखा जाये तो केन्द्र की यह सत्ता हर मोर्चे में बुरी तरह फेल हो चुकी है। इतिहास में अब तक के सबसे लूजर प्रधानमंत्री के रुप में यह दर्ज हो चुका है। और पूरी दुनिया में जिस तरह से प्रतिक्रिया आ रही है वह बेहद शर्मनाक है। इसके बाद भी कोई सत्ता में कैसे बना रह सकता है। लेकिन तमाम असफलता के बाद भी हम खामोश है, सवाल नहीं पूछ रहे हैं तो इसका मतलब है हम अपने भीतर की आदमियत को धीरे-धीरे मार रहे हैं और अपने दिलों दिमाग में राज करने वालों के हाथ में एक पट्टा गले में डाल कर दे चुके हैं। अंत में-

शरम!

तुम्हे क्या लगता है

वह पहली बार

बेशरम तब हुआ था

जब उसकी दस लाख

की सूट उतरवाई गई थी

नहीं।

उसकी बेशर्मी बहुत

पहले की है

शायद जब राष्ट्रधर्म

की नसीयत मिलने

से पहले ही वह

बेशरम हो चुका था

लेकिन वह कब

कहना कठिन है लेकिन

शायद बीस साल की

उम्र में अपनी पत्नी 

को छोड़ देने से

बहुत पहले ही

उसने शरम छोड़ दी थी।

या उससे भी पहले...। (केटी)

सोमवार, 19 अप्रैल 2021

जन की बात-3

 

राम इस देश की मिट्टी, हवा, पानी कण-कण में बसे हैं, इससे किसे इंकार है लेकिन हम राम को मानने का ढकोसला करते हैं, आडंबर करते हैं, चिख-चिख कर जय श्री राम का नारा लगाते हैं लेकिन राम के मार्ग पर चलने से हिचकते हैं, दूर भागते है, राम के नाम पर लूट का जो परिदृश्य इस देश ने देखा है वैसा शायद किसी भी देश ने अपने देवता, गॉड या अल्लाह के नाम पर लूट नहीं देखा होगा।

इस कोरोना काल में भी सत्ता का चरित्र हिंसक है, संवेदना शून्य है। ऐसे में जो लोग प्रभु राम को पढ़े हैं उन्हें याद दिला दूं कि जब ताड़का वध के लिए गुरु विश्वामित्र ने राम को मांगा तो राजा दशरथ की स्थिति खराब हो गई वे वचन भंग करने तक तैयार हो गये लेकिन राजपुरोहित वशिष्ट ने विश्वामित्र को राम सौंप दिया। राम के साथ लक्ष्मण भी चले आए थे राह में गुरु विश्वामित्र ने दशरथ की स्थिति को वर्णित करते हुए और राक्षसी प्रवृत्ति के विस्तार को लेकर कहा कि जब कभी बुद्धि विलासी हो जाती है तो सत्ताधीस, डरपोक, कायर और कमजोर हो जाता है तब वह अपना पाप छुपाने का उपक्रम करता है, जनकल्याण से दूर हो जाता है, और वे ऐसे फैसले लेने लगते है जिससे आम आदमी की तकलीफे बढ़ जाए।

क्या राम के नाम पर ढकोसला करने वाली सत्ता ने इसे नहीं पढ़ा? या उसके लिए राम सिर्फ सत्ता प्राप्त करने का साधन मात्र है? प्रधानमंत्री वह होता है जिसके लिए प्रजा की ईच्छा सर्वोपरि हो लेकिन क्या ऐसा हो रहा है। वह तो अपने लिए सुख, विलास, सम्पन्नता और अधिकार को ही महत्वपूर्ण समझता है। तब अन्याय को बल मिलता है। क्या यह समय इसी तरह का नहीं हो चला है। पहले मध्यप्रदेश में सत्ता बनाने का मोह और अब बंगाल, असम में सत्ता हासिल करने का मोह क्या कोरोना से गिरती लाशों के लिए जिम्मेदार नहीं है? हर विरोध को देशद्रोह, या हिन्दू विरोधी कहकर हम किस तरह का देश बनाना चाहते हैं?

इतिहास इसलिए पढ़ाया जाता है ताकि हम अच्छी बातें सीखें और बुरी बातों से सबक लें। जिन लोगों ने भी मानवीय समानता और सबके प्रति न्याय की अनदेखी कर अपनी जाति और धर्म को श्रेष्ठ माना उसने इस संसार को, अपने देश को मुसिबत में डाला है। बीते सालों में इस देश को क्या मिला? हमने इतिहास से सबक लेने की बजाय इतिहास को कुरेदकर गलत व्याख्या की। जो काम अंग्रेजी सत्ता ने अपने राज्य लंबे समय तक चलाने के उपक्रम में फूट डालो राज करो का खेल खेला, आजादी के आंदोलन के प्रभाव को रोकने हिन्दू-मुस्लिम का आयोजन किया, क्या यह सत्ता के लिए अब भी जारी नहीं है।

याद कीजिए ताड़कावन में राक्षसों के प्रभाव को लेकर जब आर्य राजाओं ने चुप्पी साध ली तब विश्वामित्र ही ऐसे थे जो भविष्य को लेकर चिंतित थे, तब प्रभु राम ने गुरु विश्वामित्र से पूछा था कि आर्य राजाओं ने ताड़कावन क्षेत्र में राक्षसों का अधिकार स्वीकार कैसी कर लिया। राम के इस प्रश्न पर लक्ष्मण ने बड़े ही भोलेपन से कहा था जैसे रघुकुल पर कैकेयी का अधिकार सम्राट दशरथ ने स्वीकार कर लिया है न, गुरुवर?

लेकिन लक्ष्मण की कटुता पर हंसते हुए गुरु विश्वामित्र ने कहा था कि आर्य राजाओं ने न केवल राक्षसों का अधिकार स्वीकार कर लिया था बल्कि राजाओं ने यह कहकर भी समर्थन किया कि अत्यंत प्राचीन काल में पहले भी यहां राक्षसों की बस्ती थी। गुरु कहते जा रहे थे- यदि प्राचीन इतिहास के आधार पर ही राज्यों की सत्ता का निर्णय होगा, तो एक समय रावण ने अनरण्य की हत्या कर अयोध्या भी जीत ली थी तो क्या दशरथ अयोध्या भी रावण को दे देंगे?

क्या यह उन लोगों के लिए सबक लेने की बात नहीं है जो इतिहास के आधार पर सत्ता का निर्णय चाहते हैं, तब क्या हम वापस उसी राह पर चले जायें जहां जंगल राज था, सभ्यता नहीं था, यह देश सैकड़ों राज में खंडो में बंटा था। जो लोग अंग्रेजों के फूट डालो राज करो के परिणामस्वरुप पाकिस्तान बनने के परिदृश्य को भी नहीं देख पा रहे हैं वे कोरोना के लिए मोदी सत्ता की जिम्मेदारी कैसे तय कर पायेंगे? (जारी...)

रविवार, 18 अप्रैल 2021

जन की बात-२

 

न समय रुक रहा था, न करोनो का कहर ही रुक था। हां सत्ता का चरित्र पल-पल बदल रहा था । अपनी जिम्मेदारी और दायित्व से मुंह मोड़ते सत्ता की जब आलोचना बढऩे लगी तो वह तमाम विरोधी दलों से सुझाव का आबंडर करने लगी, दरबारी मीडिया को सरकार की प्रशंसा में लगा दिया और इस महामारी के बढ़ते प्रकोप के लिए जन मानस को ही जिम्मेदार ठहराया जाने लगा।

जबकि हकीकत यही है कि सत्ता ने इस महामारी के कम होते प्रभाव को लेकर घोर लापरवाही बरती। जिसकी वजह से जब कोरोना का दूसरा लहरा आया तो अस्पताल, दवाई, चिकित्सकों की अनदेखी का पोल खुल गया। विश्व के दूसरे संस्थानों से मिले 50 हजार करोड़ के अलावा पीएम केयर फंड के पैसों का समुचित उपयोग नहीं किया गया जिसकी वजह से चिकित्सा सुविधा बदहाल की बदहाल रही।

जिस तरह से निजी अस्पतालों ने अपदा को अवसर में तब्दिल किया उस पर भी सत्ता की अनदेखी रही। दवाई, आक्सीजन के बगैर दम तोड़ती जिन्दगी के बीच भी कुंभ के आयोजन की अनुमति और चुनौती रैलियों में हजारों की भीड़ जुटाई गई। मोदी सत्ता को सिर्फ और सिर्फ यश चाहिए। जनता की आंखों में, मन में सत्ता प्रमुख का चरित्र खंडित नहीं होना चाहिए। नफरत-झूठ-अफवाह के चलाये शब्द बाण को धर्म और राष्ट्रवाद की चाशनी में परोसने की जिम्मेदारी दरबारी मीडिया की थी। धर्म और राष्ट्रप्रेम का ऐसा आबंडर किसने देखा था। नफरत का वेग इस कदर हावी था कि प्रधानमंत्री जैसा शख्स हर गांव में कब्रिस्तान के मुकाबले श्मशान खड़ा करना चाहता था। (फतेहपुर की जनसभा)

शायद राजा की ईच्छा ईश्वर ने पूरी कर दी थी? हर जगह से जलती चिता के ताप लोग उद्देलित थे, दुखी थे, लेकिन अब भी दरबारी मीडिया सत्ता के महिमा मंडन में लगी थी। कल तक मरकज को कोरोना फैलाने की वजह बताने वाली मीडिया कुंभ और चुनावी रैली पर मौन साध रखा था। मीडिया ने मौन तो एनआरसी और किसान आंदोलन पर भी साध रखा था। लोकतंत्र में सत्ता और मीडिया का सुख किसी अभिशाप की तरह है, जो व्यक्ति को दूसरों की व्यथा की ओर से अंधा कर देता है। मीडिया और सत्ता जितने साधारण होगे लोगों की व्यथा उतनी ही स्पष्ट दिखाई देती है, लेकिन जब सत्ता अपनी रईसी बचाने में व्यस्त हो जाये और मीडिया को रुतबा और पैसों की भूख हो तो जनमानस यूं ही लाशों में तब्दिल होता रहेगा।

हैरानी तो तब होती है जब कोई कहता है मैंने गरीबी देखी है, अभाव में जिया है और सत्ता आते ही सबसे पहले अपने सुख सुविधा के इंतजाम में उन वर्गों की अनदेखी करता है जो उपेक्षित हैं या जिन्हें सरकार के संरक्षण की ज्यादा जरूरत है। हैरानी तब और अधिक होती है जब  वह पूंजीपतियों की गोद में बैठकर, पूंजीपतियों के अनुरुप कानून बनाता है। कितने उदाहरण है जो सत्ता के प्रति घृणा उत्पन्न करती है, नोटबंदी की लाईन में मरते लोग, जीएसटी की चक्रव्यूह में आत्महत्या करते व्यापारी, मॉब लिचिंग और बलात्कार के आरोपियों की जयकारा और दूसरी पार्टियों के भ्रष्टाचारियों को संरक्षण, किसान आंदोलन से मरते किसान के बाद भी किसी सत्ता में करुणा न जगे तो इसका क्या मतलब है। अनेक अवसर में सत्ता ने अपनी मनमानी और प्रभाव का इस्तेमाल कर अपने अहंकार को बढ़ाया है। राफेल का मामला हो या तरुण गोगाई सहित कई नियुक्तियां? लेकिन सत्ता ने धर्म और राष्ट्रवाद का जो भ्रम फैलाया है, उससे जनमानस भ्रमित है और अपना हित नहीं देख पा रही है। (जारी...)

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

संवेदना, दायित्व, अधिकार...

 

इस देश ने कई बवंडर देखें है, यह कोरोना का बवंडर भी थम जायेगा? लेकिन सत्ता की जनमानस के प्रति उपेक्षा याद रहेगी! याद तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ताली-थाली, दीप प्रज्जवलन और टीका उत्सव भी याद रहेगा। आपदा को अवसर में बदलने की सीख तो कई व्यापारी अभी से ही याद कर रहे हैं। ऐसे समय में संवेदना शून्य सरकार और उसके दायित्व को लेकर सवाल खड़ा करना कितना उचित है?

हैरानी तो इस बा की है कि जो लोग कल तक सत्ता की रईसी के लिए लगातार बेचे जा रहे सार्वजनिक उपक्रम और सरकारी संस्थानों के निजीकरण को लेकर सत्ता के साथ खड़े थे वे भी निजी अस्पतालों की कमाई को लूट रहे हैं। हालांकि यह मौका निजीकरण के विरोध का नहीं है लेकिन जो लोग निजीकरण के समर्थक हैं उनके लिए निजी अस्पताल और निजी स्कूल की इस दौर में भी कमाई चेतावनी है।

दरअसल आज भी लोगों को अपने अधिकार का पता ही नहीं है, लोकतंत्र में सरकारें क्यों बनाई जाती है यह वे जानते ही नहीं है, क्योंकि पिछले कई दशकों से उनके दिमाग में यही भरा गया कि सरकार मंदिर नहीं बनवा रही है, अल्पसंख्यकों को ज्यादा तवज्जों दे रही है, आरक्षण के नाम पर सवर्ण समाज का हक और प्रतिभा का गला घोंटा जा रहा है।

जबकि लोकतंत्र में सरकार इसलिए बनाई जाती है ताकि वह आम लोगों के मूलभूत सुविधाओं का ध्यान रखें, स्वास्थ्य, शिक्षा की सुविधा अधिकाधिक लोगों को मिले। आपदा के समय किसी को कोई तकलीफ न हो, चोरी, लूट और अन्य अपराध से लोग सुरक्षित जीवन जी सके। टैक्स का बोझ न हो अऔर हर आदमी सुख पूर्वक जीवन जीये, सबको काम मिले।

लेकिन ऐसा क्यों नहीं हुआ? क्योंकि न सरकारों ने जनता को उनका अधिकार समझाया और न ही सत्ता ने अपने दायित्व को ही पूरा किया। जो समझदार थे, नामी-गिरामी थे, पैसे वाले थे उनके गले में पट्टा डाल दिया गया ताकि वे किसी एक दल के होकर रह जाए और अपने दल की राक्षसी प्रवृत्ति पर भी खामोश रहे। लोकतंत्र में सत्ता महत्वपूर्ण नहीं होता और न ही धर्म जाति महत्वपूर्ण होता है लेकिन सत्ता में बैठने का  लोभ ने इसे हवा दी। और इस हवा के साथ लोग बहते चले गए? उन्हें लगा कि उनका दायित्व सिर्फ अपनी धर्म और जाति की श्रेष्ठता ही है।

ही वजह है कि गांधी और अम्बेडकर की तारीफ करने पर कुछ लोगों के पेट में दर्द होने लगा? उन्हें बताया गया कि हमारा ध्वज का रंग कुछ और है, संविधान गलत है। धर्म नहीं रहेगा तो देश का क्या मतलब!

लेकिन इतिहास गवाह है जिस देश ने भी धर्म अधिक महत्व दिया वह देश न तो ठीक से तरक्की कर पाया और न ही वहां लोकतंत्र ही बच सका। बात कोरोना के बवंडर से शुरु हुई थी इसलिए इस पर ही बात होनी चाहिए। लेकिन इस देवभूमि में जिस तरह लाशें गिर रही है उसे लेकर अब गुस्सा ही है, लगता है सरकार अब भी अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है। वह अब भी आपदा में अवसर तलाश रही है क्योंकि चुनाव में हजारों की भीड़ और कुंभ में लाखों की भीड़ में वह अपना निजी फायदा देख रही है। तब सवाल यही है कि कौन अपने अधिकार बोध को जागृत करे। और संवेदना शून्य सरकार पर प्रहार करे।

मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

आपदा में अवसर...

 

जब देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आपदा में अवसर की बात कही थी तब भी वे लोग ताली बजा रहे थे, जो हिन्दू कुंठा से ग्रस्त थे, उन्हें तो मोदी की हर बात अच्गछी लगती है चाहे वह कितना भी अधार्मिक हो या अनैतिक हो। ये वे लोग है जो ईवीएम के विरोध को भाजपा का विरोध मानते हैं और भाजपा के विरोध को देश का।

खैर बात यहां महामारी में आपदा में अवसर की बात पर ही चर्चा होनी चाहिए क्योंकि ये बात प्रधानमंत्री ने कहा थी और उसका परिणाम कालाबाजारी से लेकर निजी अस्पतालो में दिखाई देने लगा है। बहुत पहले शायद स्कूल के दिनों में कहीं सुना था कि आपदा में अवसर नहीं सेवा ही धर्म होना चाहिए और कोई भी लोकतांत्रिक और सेवाभावी जनसेवक महामारी में आपदा में अवसर की बात नहीं कर सकता लेकिन तब मेरे इस बात को लेकर भक्तों ने मुझसे लड़ाई भी कर ली थी और कुछ तो आज भी बात नहीं करते।

तब यह भी कहा गया कि महामारी जैसे आपदा में अवसर की प्रतिज्ञा गिद्ध, सियार और लकड़बग्घे करते हैं, उनके लिए महामारी से प्रभावित लाशें शानदार दावतें होती है और ये उनके लिए किसी उत्सव से कम नहीं होता। जिस देश में एक व्यक्ति के सुख और दुख में पूरा गांव का गांव, या मोहल्ला का मोहल्ला शामिल होता है वहां महामारी के आपदा में उत्सव की बात कोई सोच भी कैसे सकता है लेकिन अंधेर नगरी, अंधेर राजा की कहानी भी याद न हो तो फिर पढऩे-लिखने का मतलब ही क्या है?

आपदा में अवसर की तलाश ज्यादातर वे लोग करते हैं जिनके खून में व्यापार है। और यह बात जब कोई स्वयं स्वीकार कर ले तो याद कीजिए 1965 और 1971 का वह युद्ध जब कुछ व्यापारी कालाबाजारी कर आपदा में अवसर का लाभ ले रहे थे। लेकिन तब सत्ता ने सेवा को धर्म बताकर कितने ही व्यापारियों के हृदय परिवर्तन किये थे लेकिन जब देश का प्रधानमंत्री ही आपदा में अवसर जैसे शब्दों का प्रयोग करेगा तो उसका परिणाम क्या होगा?

लॉकडाउन की घोषणा के साथ ही कालाबाजारी और अब निजी अस्पतालों की लूट से आम जनमानस में भय व्याप्त है। भयमुक्त शासन का कहीं पता नहीं है। लेकिन हमारा आज भी मानना है कि आपदा में अवसर की तलाश करने की बजाय आपदा में सेवा धर्म किया जाए!