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गुरुवार, 24 जुलाई 2025

फ़र्ज़ी वोटर के सहारे देश लूटने की चाल और हिटलर

 फ़र्ज़ी वोटर के सहारे देश लूटने की चाल और हिटलर… 


पिछले दिनों हेमंत मालवीय और अजीत अंजुम के साथ जो कुछ हुआ  वह साधारण घटना नहीं थी, लेकिन ये घटना हिटलर के शासन की याद को फिर से ताज़ा इसलिए कर दिया क्योंकि तब भी लोग राष्ट्रवाद की पट्टी बांधे उस अत्याचार पर ख़ामोश थे जिस तरह से आज धर्म की पट्टी बांध कर अत्याचार से मुँह मोड़े हुए है, अब तो हद हो गई कि जनता सरकार चुनने कि बजाय सरकार वोटर चुनने लगी है…

हिटलर के कुछ सच पर प्रकाश डाले उससे पहले बता दूँ कि भारत इस वक़्त बहुत बड़ी साज़िश में फंस चुका है। दो उद्योगपति और दो गुजराती नेता, इन चार लोगों ने मिलकर पूरे देश पर शिकंजा कस रखा है। हालांकि मैं यह मानता हूं कि राजनीति पब्लिक के सामने समस्या बताने से ज़्यादा, समस्या का निराकरण करना होती है।

आज राहुल जी या कांग्रेस, कितने भी बड़े कांड का खुलासा कर दें, इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। आज जरूरत है कि बीजेपी की कारस्तानियों को पकड़ने के बाद उन्हें पब्लिक करने की जगह उनसे फाइट की जाए। गोपनीयता बनाई राखी जाए, हर मोर्चे पर भाजपा को पटखनी दी जाए। भारतीय जनता सोल्यूशन और रिजल्ट ओरिएंटेड हो चुकी है।

एक वक्त था जब जनता वोट देकर सरकार चुनती थी, अब हालात ये हैं कि आज सरकार वोटर चुन रही है। राहुल गांधी जी ने संसद के बाहर कल जिस बड़े खेल के विषय में पत्रकारों को बताया वो उनकी आई टी टीम द्वारा सालभर की गई मेहनत के बाद का निष्कर्ष है।

बीते वर्षों में ईवीएम मशीन पर खूब बवाल मचा था, भाजपा विरोधी लोग कांग्रेस पर आरोप लगा रहे थे कि ये खुलकर ईवीएम के खिलाफ नहीं बोल रहे, देश में बड़ा आंदोलन नहीं कर रहे। कल राहुल जी के बयान के बाद बेहद स्पष्ट हो गया है कि तब बड़े स्तर पर विरोध क्यों न हुआ।

क्योंकि राहुल जी की टीम के हाथ कुछ पुख्ता लग चुका था। कर्नाटक में वोटरलिस्ट को पूरी तरह से डिजिटल किया गया जिसमें 6 महीने लग गए और इसके उपरांत जब इसका डेटा एनालिसिस हुआ तब बीजेपी का सारा खेल सामने आ गया। नेक्स्ट लेवल फर्जी वोटिंग का गेम।

हो सकता है कि भाजपा के इस फर्जीवाड़े ईवीएम एक फैक्टर हो, लेकिन अब यह तय है कि यह एकमात्र फैक्टर नहीं। जिस ख़तरनाक खेल का ख़ुलासा हुआ हैं वो भारतीय सोच भी नहीं सकते। महाराष्ट्र, बिहार छोड़िए, कर्नाटक चुनाव में अभी 2 साल का वक़्त है और कर्नाटक में भी फ़र्ज़ी वोटर डाले जा रहे हैं। फ़र्ज़ी वोटर से सरकारें बना कर भारत को लूटा जा रहा है।

तब राहुल के खुलासे का असर इसलिए नहीं हो रहा है क्योंकि यह बिलकुल हिटलर की रणनीति की तरह है । अमिता नीरव ने एक बार लिखा था… 1942 में फेलिक्स की उम्र इक्कीस के आसपास रही होगी। उस वक्त तक हिटलर यूथ का हिस्सा होना हर जर्मन युवा के लिए अनिवार्य था तो फेलिक्स भी उसका हिस्सा था। हिटलर उसका हीरो था। वह मानता था कि जर्मनी को फिर से उसका पुराना गौरव सिर्फ हिटलर ही दिला सकता है और हिटलर भगवान की तरह हैं। वह जर्मनों के सारे संताप मिटा देगा। 


उस वक्त यहूदियों और विरोधियों के साथ जो कुछ हिटलर कर रहा था, कंस्न्ट्रेशन कैंप्स और उन कैंप्स में जो कुछ हो रहा था, उसकी कहानियाँ बहुत छन-छनकर, बहुत ही फिल्टर होकर आना शुरू तो हो गई थी। मगर ये समझ नहीं आ रहा था इसमें कितनी सच्चाई है और कितनी गहराई है, क्योंकि इन कहानियो के स्रोत अपुष्ट थे। 


फेलिक्स को इनमें से किसी भी बात पर यकीन नहीं था। तब भी नहीं जब हिटलर ने आत्महत्या कर ली। हिटलर की आत्महत्या और उसके बाद के दो-तीन महीनों तक फेलिक्स उदास रहा और उसे एलायड फोर्सेस को लेकर गहरा गुस्सा रहा। जब अलायड फोर्सेस ने जर्मनी औऱ आसपास के कंसंट्रेशन कैंप्स की सच्चाई बयान करना शुरू किया तो फेलिक्स को ये हिटलर के खिलाफ दुष्प्रचार लगा। 


बाद में अमेरिकी सेनाओ ने जर्मन नागरिको को जबरन म्यूनिख के पास 1933 में बनाए गए पहले कंसंट्रेशन कैंप डाखाऊ और वीमर शहर के आसपास बसाए गए और कई दूसरे नाज़ी कैंप्स ले जाया गया, ताकि जर्मन नागरिक यह देख सके कि वे इतने वक्त से जिस हिटलर को भगवान मान कर पूज रहे थे, उसने असल में क्या किया?


उन नागरिकों में फेलिक्स भी एक था। जब वह डाखाऊ पहुँचा औऱ वहाँ के हालात देखे तो वह बुरी तरह से डिस्टर्ब हो गया। कई साल उसकी थैरेपी चली औऱ अंत में उसने आत्महत्या कर ली। 

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यूँ हर तरह की सत्ताएँ अपने विरोधियों को कुचलती रही हैं। इससे कोई पार्टी, कोई विचारधारा नहीं बची है। मगर पिछले कुछ सालों से हमारे यहाँ ये प्रवृत्ति इतनी तेजी से बढ़ रही है कि यदि कोई आलोचना न करे, लेकिन विपक्षी की तारीफ भी कर दे तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।


मामला सिर्फ राजनीतिक होता तब भी दिक्कत तो थी, मगर दिक्कत तब और बढ़ जाती है, जब वे दमन की प्रवृत्ति धार्मिक और सांस्कृतिक मामलों पर भी होने लगे। सोशल मीडिया ट्रोलिंग, धमकियाँ, बहिष्कार आदि-आदि से अब हम बहुत आगे आ गए हैं। 


पिछले दिनों हेमंत मालवीय और अजित अंजुमजी के खिलाफ जो कुछ हुआ, वह ताजा उदाहरण हैं। इससे पहले से भी यह होता ही आ रहा है। हर आलोचनात्मक आवाज, हर असहमति, हर प्रश्न को जैसे सत्ता कुचलने को आतुर है। 


इतना विराट जनसमर्थन और इतने नंबर्स, एक प्रशिक्षित ट्रोल आर्मी, प्रोफेशनल आईटी सेल, जमीन पर सन्नद्ध मदर ऑर्गेनाइजेशन के प्रतिबद्ध कार्यकर्ता, चौबीस घंटे चलने वाले मीडिया चैनल्स, अखबार... स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटीज के शिक्षक, पत्रकार, फिल्मकार, साहित्यकार, कलाकार और बुद्धिजीवी, व्हाट्सएप ग्रुप्स, रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी औऱ गृहस्थ महिलाएँ... सब मिलकर भी सरकार की असुरक्षा दूर नहीं कर पा रही है। ये बात बहुत चौंकाती हैं।


पिछले कुछ वक्त से फासिज्म, हिटलर और उसके वक्त के जर्मनी को समझने की कोशिश कर रही हूँ। समझा कि टोटेलिटेरियन स्टेट असल में हर तरह के हथकंडों से अपनी सत्ता को बनाए रखने औऱ लगातार ताकत बढ़ाते चले जाने के लक्ष्य पर काम करती है। 

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हिटलर ने पहला कंसंट्रेशन कैंप 1933 में डाखाऊ में बनाया था और प्रारंभिक तौर पर उसमें विरोधियों और आलोचकों को ही रखा गया था। असल में ताकत की भूख और असुरक्षा का बहुत गहरा संबंध होता है। जब सत्ता दावों की खोखली नींव पर खड़ी होती है, तब असुरक्षा गहरी होती है। 


जानकार कहते हैं कि हिटलर ने जर्मन नागरिकों को विरोधियों और यहूदियों के खिलाफ मोबलाइज करने की कोशिश की थी। मगर उसमें उसे सफलता नहीं मिली। जर्मनी में सत्ता संभालते ही गोएबल्स को प्रपोगंडा मंत्री बनाया गया। 


फिर सिलसिला शुरू हुआ कल्चरल डोमिनेंस का... राजनीति को नाटक का रूप दिया गया। जोशीले भाषण, समर्थन और दुष्प्रचार के लिए फिल्में जैसे 1935 में बनाई गई ट्रायम्फ ऑफ द विल, मीन कॉम्फ पर आधारित फिल्में और नाटक... कलाकारों औऱ बुद्धिजीवियों को हिटलर के समर्थन में लाने और काम करने के लिए दबाव औऱ प्रलोभन।


इसके लिए जर्मनी के प्रचार मंत्रालय ने नाजी शासन के लिए जरूरी माने जाने वाले कलाकारों औऱ बुद्धिजीवियों की सूची बनाई जिसे ‘गोटबेग्नाडेटेन-लिस्टे’ (ईश्वर के आशीर्वाद की सूची) कहा गया। रीच के प्रचार मंत्रालय से युद्ध से छूट के लिए जो आधिकारिक पत्र मिला, उसमें 1,041 कलाकारों और बुद्धिजीवियों के नाम थे। 


इसमें से ललित कला, साहित्य, संगीत, रंगमंच और वास्तुकाला के क्षेत्र की 378 हस्तियाँ गोटबेग्नाडेटन लिस्टे में शामिल थी। मतलब तमाम उपायों से नाजी नीतियों औऱ हिटलर के समर्थन में दुष्प्रचार किया गया। उसका असर हुआ और इस असर का उदाहरण था, फैलिक्स... सिर्फ अकेला फैलिक्स नहीं, कई लोग उस दुष्प्रचार का शिकार हुए। 


ये बात नागरिकों के लिए है, वे तमाम बुद्धिजीवी, पढ़े-लिखे प्रोफेशनल्स के लिए नहीं जो प्रत्यक्ष रूप से हिटलर की नीतियों के लिए काम करते रहे थे। उनके गुनाह तो क्षम्य ही नहीं थे। कुल मिलाकर एक ‘नाजी ईश्वर’ ने देश और दुनिया में तबाही मचा दी। ये कैसे हो पाया? 


उस दुष्प्रचार से जो कई सालों तक अलग-अलग माध्यमों से चलता रहा। 

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राजनीति को थियेटर का रूप देना असल में हर उस सत्ता के लिए जरूरी होता है, जिसने ताकत  तो लोकतांत्रिक तरीके से पाई हो, मगर उसे बनाए रखने के लिए तमाम अलोकतांत्रिक, असंवैधानिक तरीके इस्तेमाल करने पड़ रहे हैं। 


पिछले कुछ सालों के हमारे सांस्कृतिक परिदृश्य पर नजर डालें, हमारी फिल्में, गाने, साहित्य, बुद्धइजीवी, कलाकार, लेखक, पत्रकार... और हिटलर के जर्मनी को जानें। चकित होना बहुत मामूली शब्द लगेगा।(साभार)

गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

सत्ता का तांड़व...

 

क्या आपने उन भेडिय़ा बच्चों के बारे में सुना है जो चांद की तरफ मुंह उठाकर हुंकाती मादा की घातक छातियों से दूध पीते है, और जब उस बच्चे को झुण्ड से अलग कर बचा लिया जाता है तो वह सबसे पहले बचाने वालों को ही काटता है। उनमें न तहजीब होती है और न ही उससे प्रेम की कल्पना ही की जा सकती है।

आप यकीन नहीं करेंगे लेकिन सत्ता में बैठे लोगों की लापरवाही और गैर जिम्मेदाराना हरकत किसी भेडिय़ा बच्चे से कम नहीं है। बदइंतजामी ने तो जिन्दा लोगों को लाश में तब्दिल करने में कोई कसर नहीं छोड़ा है। इस माह यानी अप्रैल में ही कोरोना से मरने वालों का आंकड़ा पचास हजार पार कर चुका है और विशेषज्ञों की माने तो आने वाले दिनों में इसमें और तेजी आएगी। लोगों को तो पचास हजार वाले सरकारी आंकड़ों पर यकीन ही नहीं है वे इसे कई गुणा बता रहे हैं।

अपनी नाकामी छुपाने कोई सत्ता किस हद तक निचता पर उतर जाये ये कहना मुश्किल हो गया है। सत्ता की बेशर्मी आप गिनते रह जाएंगे और उससे ज्यादा निचता और बेशर्मी तो उन लोगों की है जो अपनी हिन्दू कुंठा के चलते देश को पहले ही बर्बाद कर देना चाहते हैं। देशभर में जिस तरह से कब्रिस्तान से श्मशान घाट तक लाशों की लाईने दिखाई देने लगी है वह किसी भी संवेदनशील सरकार के मुंह में तमाचा है लेकिन केन्द्र सरकार अभी भी सिर्फ और सिर्फ राजनीति कर रही है। लगता है कि भाजपा शासित राज्य के मुख्यमंत्री तो मोदी-शाह से इस कदर दहशत में है कि न तो वो एक देश एक कीमत पर ही कुछ बोल पा रहे हैं और न टीका को सभी तरह के टेक्स फ्री पर ही कुछ बोल पा रहे हैं। यदि हम महामारी में भी केन्द्र की सत्ता वेक्सीन में टैक्स माफ नहीं कर पा रही है तो इसका मतलब क्या है। 

पहले ही सरकार की लापरवाही, बदइंतजामी और लॉकडाउन के चलते कालाबाजारी की मार झेल रही जनता यदि सरकारी स्तर पर भी आपदा में अवसर की शिकार होकर अपने जान-माल को नहीं बचा पा रही है तो इस सरकार को होने का मतलब क्या है। अब तो इस सरकार की लापरवाही और बदइंतजामी को गिनाने का कोई मतलब ही नहीं है क्योंकि इस लापरवाही की लाश पर अब भी कुंठित हिन्दू बेशर्मी से जश्न मनाने का मौका ढूंढते रहते है। संघी नफरत का जज्बा लिये झपट्टा मारने को तत्पर गिद्ध की तरह वे केन्द्र की लापरवाही का ठिकरा राज्यों पर फोडऩा चाहते हैं।

हैरानी तो इस बात की है कि वे पिछली गलतियों से सबक लेने की बजाय नई-नई गलितयां कर अपनी बेशर्मी का परिचय देते हैं। और हद तो यह है कि वे अब भी यह मानने को तैयार नहीं है कि उनकी लापरवाही और अहंकार की वजह से दूसरी लहर में मौत का तांडव मचा है। सबसे शर्मनाक और हैरानी की बात तो यह है कि सत्ता अब भी इस विपदा से निपटने की कोई कारगार कोशिश नहीं कर रही है। जबकि विशेषज्ञों  की राय में आने वाला वक्त बेहद मुश्किल भरा होगा। ऐसे में आत्मा चित्कार उठता है और कहता है-

बस-बस-बस

सत्ता का हवस, बस-बस

झूठ का साहस, बस-बस

कोरोना के कहर से सब बेबस

छाती पे जलती लाश बस-बस

बदइंतजामी, बेरुखी का कॉकस 

सत्ता का अट्हास बस बस बस

सत्ता की रईसी, प्राण वायु की गरीबी

दबता जनता का नस, बस बस बस

कौशल दबा दो सत्ता का नस

न हो सके टस से मस।।

बस बस बस...

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण-2

 

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण का इतिहास बहुत पुराना नहीं है, लेकिन यह जानना जरूरी है कि इसका इतिहास क्या है और कब से शुरु हुआ। इससे पहले ये जान ले कि इसकी शुरुआत कैसे हुई?

ऐतिहासिक तथ्य इसे हिटलर से शुरुआत होना बताते हैं। क्या इससे पहले भी शुरु हुआ? इतिहासकारों का अपना दावा है लेकिन एक बात तो तय है कि इसकी शुरुआत सत्ता और श्रेष्ठता पर आधारित है। सत्तासीन होने और स्वयं को श्रेष्ठ समझने-समझाने के साथ ही ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण हुआ है। क्योंकि बगैर पढ़े-लिखों को तो आसानी से बेवकूफ बनाया जा सकता है लेकिन पढ़े-लिखाों में नफरत का ध्वजारोहण आसान नहीं होता क्योंकि वे पंचतंत्र के शेर आया शेर आया वाला चरवाहे की कहानी भी पढ़े लिखे होते है तो आदमखोर शेर के दलदल में सोने का कंगन दिखाकर शिकार करने की कहानी भी जानते हैं तब सवाल था ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण कैसे किया जाए।

हमने पहले ही कहा है कि आदमी तोता नहीं है जो रटा रटाया वाक्य 'शिकारी आयेगा, जाल फैलायेगा, दाना डालेगा, दाना नहीं चुगना, जाल में फंस जाओगÓे को बोलकर जाल में फंस जायेगा! इसलिए दिल और दिमाग को अलग करना जरूरी था। और यह काम भारत में अंग्रेजों ने किया। अंग्रेजों ने भारतीय को टाई पहनाना शुरु किया। टाई दिल यानी हृदय और दिमाग यानी मस्तिष्क के बीच गले में पहना जाता है। यानी ज्ञान पर नफरत की ध्वजारोहण की शुरुआत भारत में अंग्रेजों ने शुरु की। वह आजादी की लड़ाई का दौर था, अंग्रेजों ने भले ही 1857 की क्रांति को विफल कर दिया था, लेकिन हिन्दू-मुस्लिम एकता को तोड़कर ही लंबे समय तक राज किया जा सकता था।

इतिहास चिख-चिख के कह रहा था कि शिवाजी से महाराणा प्रताप के लिए मुस्लिम और मुगलों की तरफ से हिन्दू युद्ध करते थे। कहीं धर्म को लेकर नफरत नहीं था। युद्ध केवल और केवल राजाओं की सत्ता प्राप्ति और सत्ता के विस्तार की वजह से होते थे। आम तौर पर हिन्दू-मुस्लिम सभी एक साथ रह रहे थे। जाति भेद तो था लेकिन वह जीवन जीने के तरीके को लेकर था। नफरत की दीवारें कैसे खड़ी की जाए ताकि जाति और धर्म की दीवार में जहर बोया जा सके यह काम अंग्रेजी सल्तनत का था। और इसी अंग्रेजी सल्तनत ने ही अपने स्वार्थ के लिए नफरत का जहर बोना शुरु किया। मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय सेवक संघ का उदय हुआ। और भी संगठन बनने लगे।

1857 की क्रांति से डरे अंग्रेजों ने हिन्दू और मुस्लिम एकता को कुठाराघात करने जहां बंग भंग जैसे कानून लाये तो दलितों को अलग करने पूना पेक्ट लाया गया। इस अंग्रेजी नीति में वे लोग फंसते चले गए, जिसमें स्वार्थ भरा था, या जिनमें संघर्ष का माद्दा नहीं था। उधर हिटलर की जर्मन नस्ल की श्रेष्ठता ने पूरी दुनिया को विश्व युद्ध में झोक दिया तो उसी तरह की श्रेष्ठता की लड़ाई यहां भी होने लगी। इतिहास कुरेदे गये जिनका वर्तमान से कोई संबंध नहीं रहा। राजाओं की लड़ाई में हिन्दू-मुस्लिम का मसाला लगाया गया जबकि वह केवल सत्ता की लड़ाई थी। राजाओं के फैसलों में हिन्दू मुस्लिम ढूंढा गया। यहां तक कि अफवाह, झूठ का सहारा लिया जाने लगा।  झूठ को अतिशयोक्ति तक ले जाकर नफरत के बीज बोए जाने लगे। 

लेकिन महात्मा गांधी दीवार बनकर खड़े हुए। नफरत के हर तीर पर ढाल बने रहे लेकिन अंग्रेजों की नीति को कामयाब होने से नहीं रोक पाये। देश का विभाजन नहीं रोक पाये। और विभाजन के बाद जब सत्ता नहीं मिली तो गांधी को ही मार डाला गया। (जारी...)

गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

कानून से उपर सत्ता और बेबसी...

 

नक्सली हमले के बाद देश के गृहमंत्री अमित शाह का छत्तीसगढ़ दौरा इन दिनों सुर्खियों में है तो उसकी वजह बगैर मास्क की वे तमाम तस्वीरें है जो साबित करती है कि सत्ता के आगे जनता कितनी बेबस है।

अब जब न्यायालय में कार में अकेले सफर करने वाले को मास्क लगाने को उचित बता रहा है तब सोचिये देश के गृहमंत्री की इन तस्वीरों का मतलब क्या है। कहते हैं कि हर अपराधी की शुरुआत झूठ बोलने की आदत से शुरु होती है और यह सफर रंगा-बिल्ला या कुख्यात तक पहुंच जाता है, इसी तरह सार्वजनिक जीवन में छोटी-छोटी बातों का महत्व है। यही छोटी बात आम आदमी के जीवन को प्रभावित करता है।

ये सच है कि हर व्यक्ति का अपने जीवन में बहुत कुछ निजी होता है लेकिन जो लोग सार्वजनिक जीते है उनकी छोटी सी छोटी बात भी जनमानस को प्रभावित करता है। ऐसे में गृहमंत्री का मास्क नहीं लगाना चुनावी रैलियों में भीड़ और कुंभ या सामाजिक कार्यक्रमों में भीड़ का क्या प्रभाव पड़ता होगा यह सहज ही समझा जा सकता है।

देश केवल कोरोना की महामारी से त्रस्त नहीं है बल्कि झूठ, नफरत और अफवाह के उस जंजाल में भी फंस चुका है जिसके चलते हालात बदतर होते जा रहे हैं। हमारा दावा है कि कोरोना जैसी महामारी नहीं भी आती तब भी देश के हालात इसी तरह केे होते क्योंकि सत्ता पाने के लिए जो बीज बोया गया है उसका परिणाम तो दुखद होना ही था।

कानून को सत्ता के दम पर ठेंगा दिखाने की परम्परा चल पड़ी है, कितने ही उदाहरण है जब सत्ता ने अपनी मनमानी से जनता को बेबस कर दिया है, और अब तो झूठ, नफरत और अफवाह की चाशनी में सत्ता ने जनमानस के दिमाग में नस्लवाद का ऐसा जहर भर दिया है जिसका असर आसानी से जाने वाला इसलिए भी नहीं है क्योंकि सत्ता पाने की राह में सभी जहर बो रहे हैं। याद कीजिए सीएए के विरोध में बैठे लोगों को किस हद तक जलील किया गया वह याद नहीं है तो किसान आंदोलन को ही याद कर लीजिए, अफवाहबाजों ने क्या कुछ नहीं किया। इसके बाद भी यदि किसी को स्यिूमर स्पीड सोसायटी पर भरोसा है तो इसका मतलब साफ है कि विरोध का हर स्वर मुल्ला मुलायम या ममता बेगम के तमके के लिए तैयार रहे।

क्या इस देश में कोई बहुसंख्यक समाज का व्यक्ति किसी अल्पसंख्यक के लिए खड़ा नहीं हो सकता! पूरी दुनिया में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की खबरें नई नहीं है और सत्ता के लिए राजनैतिक दल ये दावा करने से नहीं चुकते कि अल्पसंख्यक उनका हक छिन रहे हैं और पहले ही अव्यवस्था से दुखी व्यक्ति आसानी से ऐसे लोगों की बातों में आ जाते हैं।

ऐसे में यदि अमित शाह के मास्क नहीं पहनने पर उनकी पार्टी के लोग खामोश हो या दूसरे का पाप गिनाने लगे तो समझ लिजिए पट्टा ने दिल और दिमाग दोनों को अलग कर इस हद तक जकड़ लिया है कि मस्तिष्क कुंद हो गया है। और जनता बेचारी तो बेबस है।

सोमवार, 8 मार्च 2021

समय लिखेगा अपराध...



एक तरफ फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट को अमेरिका के विदेश सचिव ने स्वीकार करते हुए दरियादिली दिखाई है और कहा है कि हाल के सालों में जो कुछ हुआ उसमें अमेरिका सरकार सुधार लायेगी तो दूसरी तरफ भारत सरकार ने इस रिपोर्ट को भ्रामक, गलत और अनुचित कहा है?

ेऐसे में भारत के हर नागरिक को फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट पढऩी चाहिए और फ्रीडम हाउस द्वारा आंशिक रुप से स्वतंत्र कहने वाले मुद्दों के अलावा दूसरी बातों को भी गौर करना होगा? एक तरफ हम 21वी सदी में भारत की तरक्की और अच्छे दिन आयेंगे के सपने में जी रहे हैं तो दूसरी तरफ नागरिक स्वतंत्रता का क्या हाल है यह किसी से छिपा नहीं है।

जिस देश में आज भी लिंग भेद, जाति और धर्म के नाम पर न केवल विभाजन रेखाएं खींची जाती है बल्कि कानूनन भेदभाव होता है, वहां आजादी का मतलब आसानी से समझा जा सकता है। सत्ता और राजनैतिक दलों की मनमानी, उनके झूठे वादों पर कानून की भूमिका पर कितने ही सवाल उठते रहे हैं। माफिया, आतंक की परिभाषाएं तक सुविधानुसार बदलती रही है।

हमने पहले ही कहा है कि इस देश में चुनाव करा लेना और कुछ भी बोल देना को ही लोकतंत्र मान लिया गया है, जबकि लोकतंत्र का मतलब नागरिक अधिकार से जुड़ा हुआ है, लेकिन नागरिक अधिकार का कोई मतलब ही नहीं रह गया है। बोलने की आजादी के नाम पर सत्ता के साये में कुछ भी बोले जाने की छूट है लेकिन सत्ता विरोधी स्वर को देशद्रोही मान लिया जाता है।

कोरोना काल में तब्लीकी जमात पर कोरोना फैलाने का आरोप लगाकर क्या एक धर्म विशेष पर निशाना साधने की कोशिश नहीं हुई, किसान आंदोलन के दौरान भी खालीस्तानी और आतंकवादी बताकर क्या धर्म विशेष पर निशाना नहीं साधा गया। इस आंदोलन के दौरान नमाज पढऩे मुस्लिमों का वीडियो जारी कर क्या बताने की कोशिश हुई।

दिल्ली के सड़कों के नामकरण को लेकर की जा रही टिप्पणी किसे निशाना बनाने किया जाता है? ऐसे कितने ही सवालों को आप छोड़ दे तो थानों में रिपोर्ट लिखने की स्थिति, अदालतों में तारीख पर तारीख क्या लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता की आदर्श स्थिति है। आम कहावत है आप कितने भी सच्चे और ईमानदार रहे एक बार ताकतवर के चंगुल में फंस गये तो न्याय धरा का धरा रह जायेगा। ताकतवर तारीख लेता रहेगा और ईमानदार थक कर स्वयं से हार जायेगा?

हम यहां फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट को जस्टिफाई नहीं कर रहे हैं बल्कि हमारा कहना है कि न्याय यदि विलंब से मिले तो उस न्याय का कोई अर्थ नहीं रह जाता। विरोध के स्वर को देशद्रोह कहकर हम क्या अपने ही नागरिकों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार नहीं कर रहे है। हाल के वर्षों में तुष्टीकरण और धर्मनिरपेक्ष शब्दावली पर प्रहार करके किसे निशाने पर लिया जाता है।

प्रवीण तोगडिय़ा, हरेन पंड्या और आडवानी को किनारे करने की राजनीतिक मजबूरी को सब जायज करार देने वाले ये भूल जाते हैं कि पड़ोसी के घर में आग लग जाये तो चुप बैठने का अर्थ स्वयं के घर को भी आग में झोंक देना है। जेएनयू आंदोलन हो सीएए आंदोलन, नोटबंदी के खिलाफ आंदोलन हो, या किसान आंदोलन हर उस विरोध के स्वर को देशद्रोह का रुप दिया गया, रोहित वेमुला से लेकर कितने दलित आज भी दबंगों के आगे न्याय मांगने मर जाते हैं!

ऐसे में फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट को सिरे से नकारने का क्या मतलब है? जब सत्ता के इशारे पर इडी, आयकर सीबीआई के छापे पड़ते हो और धर्म और जाति के आधार पर हमले होते हो!

शुक्रवार, 5 मार्च 2021

हिटलर की राह...

 

क्या भारत में लोकतंत्र खतरे में है? क्या देश के प्रधानमंत्री की राह हिटलरी हो चली है? क्या असहमति के स्वर को दबाने सरकारी तंत्र का दुरुपयोग किया जा रहा है? ये ऐसे सवाल है जिसे फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट से बल मिलता है।

दुनिया में लोकतंत्र को लेकर अपनी रिपोर्ट में फ्रीडम हाउस ने जिस तरह से अमेरिका और भारत सहित दुनिया के कई देशों में लोकतंत्र में गिरावट बताया है उसके बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि भारत आखिर किस दिशा में जा रहा है। हालांकि इस रिपोर्ट पर अमेरिका के विदेश सचिव ने सहमति जताई है लेकिन भारत भर में इस रिपोर्ट से सन्नाटा छाया हुआ है। यही कोई वाहवाही की रिपोर्ट होती तो अब तक भक्त, वाट्सअप यूनिर्वसिटी और आईटी सेल तारीफों के कसीदे गढ़ते रहते लेकिन रिपोर्ट मोदी सत्ता की करतूतों पर सवाल उठा रहा है तो सन्नाटा है।

सन्नाटे और चुप्पी में वे लोग भी हैं जो कल तक किसान आंदोलन के समर्थन में खड़े थे, फिल्मी हस्तियां, कलाकार, साहित्यकारों की इस रिपोर्ट पर चुप्पी ने ही साबित कर दिया है कि सत्ता का भय किस कदर हावी है। रिपोर्ट की एक-एक बातें न केवल महत्वपूर्ण है बल्कि यह बताती है कि वर्तमान सत्ता ने लोकतांत्रिक मूल्यों को किस तरह तोड़ा है।

ऐसे में नागरिकता कानून से लेकर जेएनयू और वर्तमान में चल रहे किसान आंदोलन को लेकर सरकार भूमिका को स्पष्ट करती है। सीबीआई, ईडी और आयकर की कार्रवाई को लेकर विपक्ष पहले ही आरोप लगाते रही है कि ये सब विरोध के स्वर को दबाने मोदी सत्ता का औजार है। अनुराग और तापसी के यहां मारे गये आयकर छापे भी इसी ओर चुगली करते हैं।

भारत की आंशिक आजादी को लेकर फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट को लेकर इतिहास को पलटने की जरूरत है कि आजादी की लड़ाई में कौन खड़ा था, कैसे मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने झूठ और अफवाह का सहारा लिया गया ?

ऐसी कितनी ही रिपोर्ट फाइलों में बंद है जो साफ कहता है कि दंगा होता नहीं करवाया जाता है, गढ़ा जाता  है? ऐसे कितने ही सवाल उठाये गये जो गैर जरूरी थे, जिसमें सिवाय नफरत के अलावा कुछ नहीं था।

ऐसे में आज तक फ्रीडम हाउस ने भारत के लोकतंत्र में आई गिरावट को लेकर जब रिपोर्ट प्रकाशित की है तब आम आदमी को सोचना होगा कि आखिर इस देश में किसकी जरूरत है।

क्या नेताजी सुभाष बाबू की वकालत सिर्फ इसलिए की जाती रही ताकि बीस साल तक तानाशाही शासन की मंशा के समर्थक है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चालीस और पचास के दशक में बहुत से देश आजाद हुए जिनमें से अधिकांश देशों में राजशाही या तानाशाही सत्ता का उदय हुआ। भारत में भी कई राजा  इसके समर्थक थे लेकिन गांधी-नेहरु की सोच ने इस देश में लोकतंत्र की नींव रखी। 

ऐसे में सवाल यही है कि गांधी-नेहरु का विरोध करते-करते हम इतने अलोकतांत्रिक हो चले है कि इस देश में ही लोकतंत्र खतरे में आ रहा है।