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बुधवार, 15 जुलाई 2026

छत्तीसगढ़ में 'तालमेल' की पटरी से उतरी सरकार!



 यूरोक्रेसी का 'रिमोट कंट्रोल' या मंत्रियों की लाचारी? छत्तीसगढ़ में 'तालमेल' की पटरी से उतरी सरकार!

2. 2 साल, आधा दर्जन कमिश्नर: छत्तीसगढ़ चिकित्सा शिक्षा (Medical Education) विभाग बना अफसरों की 'म्यूजिकल चेयर'

3. सुशासन का दावा बनाम '2005 बैच' का दबदबा: फाइलों की खींचतान में पिस रही छत्तीसगढ़ की जनता।


छत्तीसगढ़ में सुशासन (Sushasan) और 'डबल इंजन' रफ्तार का दावा क्या सिर्फ कागजी है? राज्य के गलियारों से छनकर आ रही खबरें और लगातार हो रहे प्रशासनिक फेरबदल कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। मंत्रियों और उनके विभागों के आला अधिकारियों (सचिवों/आयुक्तों) के बीच पटरी न बैठने से न केवल विकास कार्य ठप हैं, बल्कि महत्वपूर्ण विभाग प्रशासनिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहे हैं। इसका सबसे ताजा और हैरान करने वाला उदाहरण प्रदेश का चिकित्सा शिक्षा विभाग (Medical Education Department) है, जहां पिछले दो सालों में करीब आधा दर्जन आयुक्त (Commissioners) बदले जा चुके हैं।


1. चिकित्सा शिक्षा विभाग में अफसरों की 'म्यूजिकल चेयर':

 मुद्दा: चिकित्सा शिक्षा विभाग जैसी महत्वपूर्ण रीढ़, जो डॉक्टरों के निर्माण और मेडिकल कॉलेजों के टेंडर व संचालन की कमान संभालती है, वहां अफसरों के टिकने की मियाद कुछ महीने ही रह गई है।

 इतिहास और वर्तमान: भूपेश सरकार के समय इस विभाग को सुचारू बनाने के लिए चिकित्सा शिक्षा आयुक्त (Medical Education Commissioner) के पद का सृजन हुआ था। पहली कमिश्नर नम्रता गांधी (31 जनवरी 2024) बनीं। तब से लेकर अब तक अब्दुल कैसर, जेपी मौर्य, जेपी पाठक, चंदन कुमार, किरण कौशल और रितेश अग्रवाल जैसे कई अधिकारियों के पास यह जिम्मेदारी आई और गई।

 खोजी सवाल: क्या चिकित्सा शिक्षा आयुक्त का पद इतना 'मलाईदार' या दबाव वाला है कि किसी भी अधिकारी की पटरी मंत्री या सचिव के साथ लंबे समय तक नहीं बैठ पा रही? बार-बार अधिकारियों के बदलने से मेडिकल कॉलेजों के टेंडर और स्वास्थ्य ढांचा पूरी तरह प्रभावित हो रहा है।

2. मंत्रियों बनाम सचिवों की जंग (Who is the Boss?):

 अधिकारियों का दबदबा: राजनीतिक गलियारों में चर्चा आम है कि छत्तीसगढ़ सरकार को मंत्री नहीं बल्कि अफसर चला रहे हैं। विशेषकर '2005 बैच' के चुनिंदा आईएएस अधिकारियों के दबदबे को लेकर खुद सत्ताधारी दल के भीतर असंतोष सुलग रहा है।

 सीएम सचिवालय बनाम अन्य विभाग: मुख्यमंत्री के सचिवालय (विशेषकर राहुल भगत) और वित्त विभाग (ओपी चौधरी) के निर्णयों और अन्य मंत्रियों के बीच का नीतिगत तालमेल कमजोर दिख रहा है।

 विवाद के चेहरे: चिकित्सा शिक्षा मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल और विभाग के सचिव अमित कटारिया (जो कभी पीएम के सामने चश्मा पहनने और अपनी कार्यशैली को लेकर चर्चा में रहे) के बीच के प्रशासनिक तालमेल पर भी सवाल उठ रहे हैं।

3. जनता पर सीधा असर: इलाज महंगा, जांच के नाम पर 'लूट':

 सरकारी अस्पतालों में जहां एमआरआई (MRI) और सीटी स्कैन (CT Scan) जैसी सुविधाएं मुफ्त या न्यूनतम शुल्क पर होनी चाहिए, वहां कथित तौर पर प्राइवेट अस्पतालों को फायदा पहुंचाने के लिए भारी शुल्क वसूला जा रहा है।

 आयुष्मान कार्ड (Ayushman Card) और जन आरोग्य जैसी जनकल्याणकारी योजनाएं जमीनी स्तर पर दम तोड़ रही हैं। इसी का नतीजा है कि मुख्य विपक्षी दल अब स्वास्थ्य मंत्री के बंगले के घेराव की रणनीति बना रहा है।

4. पुराना चिकित्सा उपकरण घोटाला और अधूरी कार्रवाई:

 पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने चिकित्सा उपकरणों की खरीदी में करोड़ों के कथित घोटाले की शिकायत पीएमओ, ईडी और सीबीआई से की थी।

 इस शिकायत के बाद हालांकि कुछ कार्रवाई हुई और आधा दर्जन अधिकारियों पर गाज गिरी, लेकिन कई दागी चेहरे आज भी अन्य महत्वपूर्ण विभागों में जमे हुए हैं, जो सुशासन के दावों पर सवालिया निशान खड़ा करता है।

प्रिंट मीडिया के लिए कुछ विशेष इनपुट्स (आपकी जानकारी के लिए अतिरिक्त तथ्य):

यदि आप इस पर ग्राउंड रिपोर्टिंग या फॉलो-अप करना चाहते हैं, तो इन बिंदुओं को अपनी जांच का हिस्सा बना सकते हैं:

1. फाइलों का 'गो-स्लो' मूवमेंट: मंत्रालय (महानदी भवन) से डेटा निकालें कि पिछले 6 महीनों में चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग की कितनी महत्वपूर्ण फाइलें मंत्रियों और सचिवों की 'सहमति/असहमतियों' के फेर में अटकी रहीं।

2. मेडिकल कॉलेजों में बुनियादी ढांचे की कमी: अंबिकापुर, जगदलपुर या रायपुर (मेकाहारा) जैसे प्रमुख मेडिकल कॉलेजों में नई मशीनों की खरीदी के टेंडरों की स्थिति क्या है? क्या आयुक्तों के बार-बार बदलने से टेंडर प्रक्रिया अटकी पड़ी है?

3. अन्य विभागों में भी यही हाल: सिर्फ चिकित्सा शिक्षा ही नहीं, बल्कि कई अन्य तकनीकी विभागों (जैसे पीएचई, माइनिंग और वन विभाग) में भी मंत्रियों और उनके मातहत आईएएस अधिकारियों के बीच फाइलों के नोटिंग्स पर खींचतान चल रही है, जिसे आप इस रिपोर्ट में 'बॉक्स आइटम' के रूप में जोड़ सकते हैं।

निष्कर्ष (Conclusion):

यह स्टोरी न केवल छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी के भीतर मचे घमासान को उजागर करेगी, बल्कि सुशासन और जीरो टॉलरेंस के नारों के पीछे छिपी जमीनी हकीकत को भी पाठकों के सामने रखेगी। प्रिंट मीडिया में खोजी पत्रकारिता के दृष्टिकोण से यह एक बेहद दमदार और जन-सरोकार से जुड़ी रिपोर्ट साबित हो सकती है।

वीडियो देखें 

गुरुवार, 9 जुलाई 2026

शिक्षा विभाग में 40 'दागी' अफसरों का सिंडिकेट

 छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग में 40 'दागी' अफसरों का सिंडिकेट: करोड़ों का बजट और सत्ता का खेल 


 छत्तीसगढ़ में 'हम ही बनाया है, हम ही संवारेंगे' के गूंजते नारों के बीच देश का भविष्य गढ़ने वाले शिक्षा विभाग की एक ऐसी कड़वी और स्याह हकीकत सामने आई है, जिसने पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। छत्तीसगढ़ के नौनिहालों का भविष्य संवारने का जिम्मा जिन कंधों पर है, वे खुद भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर दलदल में धंसे हुए हैं। शिक्षा विभाग के भीतर 40 से अधिक ऐसे 'दागी' अफसर मलाईदार पदों पर कुंडली मारकर बैठे हैं, जिन्हें कायदे से सलाखों के पीछे या सस्पेंशन लिस्ट में होना चाहिए था।

करोड़ों रुपए के भारी-भरकम बजट वाले इस सबसे महत्वपूर्ण विभाग को दीमक की तरह चाट रहे इन चेहरों और सत्ता के बीच की गलबहियां अब खुलकर उजागर होने लगी हैं।

युक्ति-युक्तकरण के नाम पर स्कूलों पर ताले, बेटियों की सुरक्षा दांव पर

[00:59] छत्तीसगढ़ में डबल इंजन की सरकार पर सवाल तब से ही उठने शुरू हो गए थे, जब 57 हजार शिक्षकों की भर्ती की प्रक्रिया को अटका दिया गया। इसके बाद विभाग ने 'युक्ति-युक्तकरण' (Rationalization) के नाम पर राज्य भर में हजारों सरकारी स्कूलों को बंद करने या मर्ज करने का फरमान सुना दिया।

 गरियाबंद का कन्याशाला विवाद [01:18]: गरियाबंद में 1965 से संचालित हो रहे एक नामी गर्ल्स स्कूल को बंद कर जब दूसरे को-एड स्कूल (ठाकुर दलगंजन स्कूल) में मर्ज करने का प्रयास किया गया, तो छात्राओं और अभिभावकों का गुस्सा फूट पड़ा। छात्राओं ने स्कूल में ताला जड़कर उग्र प्रदर्शन किया।

 असुरक्षित माहौल और बदहाली [02:14]: छात्राओं और परिजनों का सीधा आरोप है कि जिस स्कूल में उन्हें भेजा जा रहा है, वहां न तो पढ़ाई का स्तर अच्छा है, न ही वहां का माहौल बेटियों के लिए सेफ है। बुनियादी सुविधाएं जैसे शौचालय तक बदहाल हैं। इस तुगलकी नीति के कारण 40 से 50 छात्राएं टीसी (Transfer Certificate) लेकर स्कूल छोड़ने को मजबूर हो गईं।

 बिलासपुर में आदिवासियों पर मार [03:15]: बिलासपुर संभाग में भी इसी अविवेकपूर्ण नीति के चलते पंडो जनजाति के मासूम बच्चों को स्कूल पहुंचने के लिए 7 से 8 किलोमीटर का लंबा सफर तय करना पड़ रहा है। थक-हारकर कई गरीब आदिवासियों ने अपने बच्चों को स्कूल भेजना ही बंद कर दिया है।

40 घोटाले, ठंडे बस्ते में जांच और सत्ता का संरक्षण

[04:35] एक तरफ समय पर बच्चों को न तो कॉपी-किताबें मिल पा रही हैं और न ही स्कूल ड्रेस, वहीं दूसरी तरफ करोड़ों के बजट को ठिकाने लगाने वाले 40 दागी चेहरों पर कार्रवाई करने के बजाय सरकार उन्हें अपनी गोद में बिठाए हुए है। इन अफसरों पर भ्रष्टाचार से लेकर कुकर्मों तक के गंभीर मामले दर्ज हैं, लेकिन नेताओं और नौकरशाहों का नेक्सेस इतना मजबूत है कि तमाम जांचें ठंडे बस्ते में डाल दी गई हैं।

[05:42] सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस सिंडिकेट की पहुंच और ठसक सीधे सत्ता के शीर्ष तक है। वर्तमान शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और यहां तक कि स्वयं मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के पास भी कुछ समय के लिए यह विभाग रहा, लेकिन इन दागियों का बाल भी बांका नहीं हो सका। राजनैतिक गलियारों में चर्चा है कि इनमें से कई अफसरों को सुचिता और संस्कारों की बात करने वाले 'संघ' (RSS) का भी आंतरिक समर्थन प्राप्त है, जिसके दम पर ये मलाईदार कुर्सियों का आनंद ले रहे हैं।

सलाखों के बजाय मलाईदार पदों पर ताजपोशी

[07:54] जिन अधिकारियों की जगह जेल की कोठरी में होनी चाहिए थी, वे आज प्रदेश की पूरी शिक्षा व्यवस्था की नीतियां तय कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ के भविष्य के साथ हो रहे इस बड़े खिलवाड़ को लेकर अब विपक्ष और आम जनता में भारी आक्रोश है। यह 40 चेहरों का सिंडिकेट महज़ एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक सुनियोजित वित्तीय और नीतिगत घोटाला है।

अगर सरकार की नीयत वाकई साफ है, तो उसे तुरंत इन 40 दागी अफसरों की सूची पर संज्ञान लेते हुए इन्हें निलंबित करना चाहिए और बंद किए गए स्कूलों को दोबारा खोलना चाहिए। अन्यथा, छत्तीसगढ़ का भविष्य संवरने के बजाय इन दागियों के भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाएगा।

वीडियो देखें 

सोमवार, 19 अगस्त 2024

अंधा बाँटे रेवड़ी...

 अंधा बाँटे रेवड़ी...


यह तो अंधा बाँटे रेवड़ी... की कहावत को ही चरितार्थ करता है, वरना खेल विभाग के द्वारा  खेल अलंकरण और पुरस्कार को लेकर इतना गोल माल नहीं होता, कहा जाता है कि अपने लोगों को उपकृत करने में लगी छत्तीसगढ़ की डबल इंजन सरकार के खेल मंत्री टंकराम वर्मा की इस टंकार से खिलाड़ियों में ग़ुस्सा भर गया है और वे इसे लेकर प्रधानमंत्री तक शिकायत करने लगे है।

पीएगिरी से मंत्री तक के सफ़र में खेल मेत्री के कारनामें की चर्चा नया नहीं है, कहा जाता है कि जब वे पीएगिरी कर रहे थे तब भी अपनी लाला वाले रोल से चर्चित थे। चर्चित तो वे अपने गृह जिले में खेलों की बदहाली को लेकर भी है लेकिन इस बार चर्चा खेल अलंकाण और खेल पुरस्कार को लेकर है।

भूपेश सरकार के दौरान इसके लिए तरस रहे खिलाड़ियों व खेल संगठनों की उम्मीद पर पानी तब फिरने लगा जब पुरस्कारों की सूची जारी हुई। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अवॉर्ड के लिए खेल विभाग ने एक ऐसे खेल संघ को पात्रता दे दी, जिसे विभागीय मान्यता 7 जुलाई 2024 को दी गई। यहां बात नॉन ओलंपिक गेम किक बॉक्सिंग की हो रही है। जिस वर्ष में उपलब्धि के लिए खिलाड़ियों से आवेदन आमंत्रित किए गए हैं, उस वर्ष में तो किक बॉक्सिंग को विभागीय मान्यता मिली थी या नहीं, इस पर भी अब प्रश्नचिन्ह लगाया जा रहा है। इस खेल में कोरबा की श्रेया शुक्ला और कृष्णकुमार डडसेना को वर्ष 2021- 22 एवं वर्ष 2022-23 में शहीद कौशल यादव पुरस्कार की पात्रता खेल विभाग की पुरस्कार समिति ने दी है। इसे लेकर अब खिलाड़ियों में चर्चा शुरू हो गई। इतना ही नहीं सीनियर वर्ग के शहीद राजीव पांडेय पुरस्कार के लिए ओलंपिक खेलों की सूची में वुशू को शामिल करके वेटलिफ्टिंग के पदक विजेता खिलाड़ी को दरकिनार कर दिया गया। वुशू में राजनांदगांव के डी. पार्थ को इसकी पात्रता दी गई है। वहीं सीनियर नेशनल वेटलिफ्टिंग के पदक विजेता रायपुर के विजय कुमार को इस अवॉर्ड की पात्रता से अलग कर दिया गया है। इसे लेकर वुशू के सीनियर खिलाड़ी प्रतीक सिंह ने कहा कि डी. पार्थ का सीनियर वर्ग में कोई पदक नहीं है, वह जूनियर वर्ल्ड चैम्पियनशिप में भाग लिया था। इधर वेटलिफ्टर विजय कुमार ने वुशू को ओलंपिक गेम कैसे माना जा रहा है।

वर्ष 2022-23 के शहीद राजीव पांडेय पुरस्कार नियम में सात खिलाड़ियों को पुरस्कृत करने का प्रावधान है। लेकिन खेल विभाग द्वारा जारी सूची में केवल 6 खिलाड़ियों को ही इसकी पात्रता दी गई। इसमें ओलंपिक गेम से 4 खिलाड़ियों को शामिल किया गया, लेकिन नॉन ओलंपिक व पैरास्पोर्ट्स से 1-1 खिलाड़ी नामित किये गये।

वर्ष 2008 के बीजिंग ओलंपिक में इसे केवल प्रदर्शन के लिए रखा गया था। मेडल टेली में इसका कहीं कोई उल्लेख नहीं है। 

एक खिलाड़ी को रस्साकशी में दो पुरस्कार खेल विभाग की जारी सूची में टग ऑफ वार (रस्साकशी) की खिलाड़ी रायपुर की नेहा यादव को वर्ष 2021-22 के शहीद कौशल यादव पुरस्कार के लिए नामित किया गया है।

यही खिलाड़ी वर्ष 2021-22 के मुख्यमंत्री ट्रॉफी पुरस्कार के लिए नामित 10 खिलाड़ियों

के दल में भी शामिल है। इस प्रकार एक खिलाड़ी को एक ही वर्ष में दो अलग-अलग

पुरस्कार की पात्रता कैसे दी गई, इस पर भी आपत्ति दर्ज कराई जा रही है।

राज्य के लिए पदक विजेता राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों और उन्हें इसके लिए तैयार करने वाले प्रशिक्षकों के अधिकारिक रूप से जारी कर दी।


गुरुवार, 25 जुलाई 2024

मंत्री पद जाने का असर…

 मंत्री पद से  इस्तीफ़ा का असर...


कहा जाता है कि मंत्री पद का अपना जलवा है और मंत्री पद के साथ मिलने वाली सुविधा का अपना मिजाज । और मंत्री पद ही छिन जाये तो सबसे ज्यादा परिवार वालों पर इसका असर होता है। बंगला छिने जाने का असर के कई किस्से है। और नेता के परिवार वालों का बंगला छिने जाने के बाद बंगले के दीवार, खंभे से लिपटकर रोने के भी किसे चर्चा में रहे हैं। तो चेहरे से हंसी गायब हो जाने और भूख नहीं लगने , कुछ भी अच्छा नहीं लगने के किस्से भी जान चर्चा में रहे हैं। 

ऐसे में रायपुर के सांसद बने बृजमोहन अग्रवाल के मंत्री पद से इस्तीफा का असर भी जनचर्चा में है।

बड़े भाई गोपाल अग्रवाल ने तो सोशल मीडिया में अपना तेवर भी दिखाना शुरू कर दिया है। 



वे लगातार भाजपा की सरकार को कोस रहे हैं। जबकि वे खाटी संघी है और महानगर प्रमुख भी रह चुके हैं। पहले वे मीडिल क्लास की तकलीफ के बहाने गरियाते रहे तो अब बजट पर को लेकर मोदी सरकार पर निशाना साधा है।

दूसरे छोटे माई योगेश आग्वाल के अपने ही क़िस्से हैं। चला मुरारी हीरो बनने की तर्ज़ पर कवर्धा कांड  के किस्से तो सभी जानते ही हैं कि होटल में क्या क्या हुआ अब चेंबर की बैठक में उनके हरकतों को तिलमिलाहट की संज्ञा दी जा रही है। क्योंकि चेम्बर चुनाव में मोहन सेठ की सत्तावाली ताकत के बाद भी वे बुरी तरह हार गये थे।

एक और छोटे भाई तो रायपुर दक्षिण से विधायक बनने का सपना ही पाल लिया है और कहा जा रह है कि पत्रकारों से अपनी दावेदारी को सबसे सक्षम बताने और मोहन सेठ का सही उत्तराधिकारी बताने में लग गये है। इस सबसे  दूर यशवंत का मिजाज भी कम चर्चा में नहीं है उनके इस तरह से राजनीति से दूरी पर कई तरह की चर्चा है जो पारिवारिक बताया जा रहा है।

यानी मंत्री पद चले जाने का असर इस तरह चर्चा में है।।

बुधवार, 17 जुलाई 2024

विकास के नाम पर मौत का विभत्स खेल...

 विकास के नाम पर मौत का विभत्स खेल...

 उद्योग पति और शासन-प्रशासन का गठ‌जोड़ छतीसगढ़ में भी


विकास के नाम पर सत्ता कैसे-कैसें खेल खेलती है, यह सिर्फ तूतीकोरिन में उद्योगपति के इशारे पर मारे गये  पुलिस द्वारा 13 प्रदर्शनकारियों से समझ पाना मुश्किल है। इस तरह का खेल इन दिनों सत्ता के लिए सहज और आम हो गई है। क्योंकि इस तरह की घटना के बाद जाँच और न्यायालयीन प्रक्रिया इतनी लंबी चलती है कि न्याय का कोई मतलब ही नहीं रहता।


स्टरलाइट कंपनी के इशारे पर पुलिम द्वारा 13 प्रदर्शनकारियों को गोली से भून देने के मामले में मद्रास हाइकोर्ट की तल्ख़ टिप्पणी  पर बात


करने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि सत्ता और कारपोरेट के गठजोड़

को लेकर उठते सवाल क्यों महत्वपूर्ण हो चले है। विकास किस शर्त पर होना चाहिए और सत्ता की पैसों की भूख की सीमा क्या है? इस दौर में यह सवाल इसलिए बेमानी है क्योंकि राजनेताओं का संगठित गिरोह ने लूट का नया तरीका अख़्तियार किया है। जिसने अब सीधे सीधे लोगों की जान से खिलवाह करना शुरू कर दिया है।

सवाल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मित्र प्रेम का नहीं है, और न ही सवाल इलेक्ट्राल बाण्ड लेने के चलते उन दवा कंपनियों की जांच रोक देने का है जो जहर परोसने आमादा थे। सवाल तो यही है कि क्या अब सत्ता में बैठे लोगों ने यह तय कर लिया है जब तक वे हैं, मौज कर ले, मरने के बाद किसने देखा है कि दुनिया का क्या होगा?

और इसी ख़तरनाक सोच ने आम आदमी का जीवन नारकीय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ा है।


छत्तीसगढ़ में शंकर गुहा नियोगी हत्याकांड सत्ता और कार्पोरेट का विभत्स चेहरा नहीं था? या फिर दुर्ग जिले के बेरला स्थित स्पेशल ब्लास्ट  फैक्टरी में हुए मौत का तांडव !

 घटना के बाद खूब हो हल्ला हुआ लेकिन क्या इस कंपनी के सभी संचालक गिरफ्तार हुए। कार्रवाई के पर किस तरह की खाना-पूर्ति की गई। उस पर क्या कांग्रेस भी सवाल उठायेगी?

छत्तीसगढ़ में भी अदानी पावर के विस्तार को लेकर तिल्दा और रायगढ़ में जनसुनवाई हो रही है। किसानों के जनसुनवाई स्थगित करने के एलान के बाद भी शासन - प्रशासन मुस्तैद है। और यदि सत्ता चाह ले तो किसानो से जमीन छिने जाने से कौन रोक सकता ।


क्या हर तरह के विरोध के बाद हसदेव अरण्य की कटाई को रोका गया, विरोध करने वालों को हिरासत में लेकर जिस तरह से वृक्षों  की कटाई की गई उसके आगे पर्यावरण को लेकर बनी तमाम संस्थाएं किस तरह मौन है? आख़िर यह परियोजना भी तो मित्र-प्रेम की इबादत है।

तब मद्रास हाईकोर्ट में चल रहे स्टरलाईट कंपनी से जुड़े इस मामले पर न्याय होगा !

कहना कठिन इस लिए भी है क्योंकि 2014 के बाद से सुनवाई के दौरान न्यायालय का ग़ुस्सा और फ़ैसले में एका दिखाई ही नहीं देता।

 स्टरलाईट के विस्तार के विरोध में ही प्रदर्शनकारियों को गोली से भून देने की इस घटना की सुनवाई के दौरान मद्रास हाइकोर्ट के जजों ने जिस तरह से सीबीआई की जाँच पर नाराजगी जाहिर करते हुए इस मौत को नियोजित बताया है क्या फ़ैसले में यह दिखाई देगा?

घटना 2018 की है, २२ और 23 मई 2018 की यह घटना स्टालाईट् के विस्तार को लेकर जनसुनवाई के दौरान हुई। जनसुनवाई के विरोध में आसपास के क्षेत्रों के लोग प्रदर्शन कर रहे थे। और जब पुलिस ने कार्रवाई शुरु की तो प्रदर्शनकारी भागने लगे और इन्हीं भागते प्रदर्शनरियों को यानी उनकी पीठ पर गोली मारी गई। 13 लोगों की मौत हो गई। प्रदर्शनकारी प्रदूषण संबंधी चिंताओं के कारण स्टरलाईंट् के कापर स्मेलटर इकाई को बंद करने की माँग कर रहे थे।

छत्तीसगढ़ के तिल्दा और रायगढ़ में भी अदानी पावर के विस्तार का विरोध हो या हसदेव अरण्य की कटाई का विरोध प्रदूषन संबंधी चिंता ही प्रमुख वजह है।

तब सवाल यही खड़ा होता है कि क्या हसदेव की कटाई नहीं रोक देनी चाहिए। हालांकि इस मामले में कांग्रेस ने विरोध जरूर किया है लेकिन क्या यह विरोध सिर्फ बयानबाजी तक रहेगा या कटाई के दौरान कांग्रेसी हसदेव को बचाने वहां जायेंगे?

मंगलवार, 16 जुलाई 2024

खिसीयानी बिल्ली खंभा नोचे...

 खिसीयानी बिल्ली खंभा नोचे...


यह तो खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की कहावत को ही चरितार्थ करता अन्यथा छत्तीसगढ़ में बदहाल होती कानून व्यवस्था को लेकर वे लोग आग बबूला नहीं होते जिन पर अपराधियाँ को ही संरक्षण देने का आरोप है या अपने राजनैतिक उद्देश्य के लिए गलत काम करने वालों को प्रश्रय देने का आरोप है।

दरअसल डबल इंजन की सरकार बनने के बाद छत्तीसगढ़ में कानून व्यवस्था की स्थिति दिनों दिन बदतर होते जा रही है, अपराधियों के हौसले बुलंद है, सरे आम चाकू बाजी और धमकी चमकी की ही खबर बस नही है, नशे का कारोबार तो फल-फूल रहा ही है, राजनैतिक संरक्षण के चलते कोल माफिया रेत माफिया, भू-माफिया सहित कई तरह के माफियाओं ने अपना खेल बड़े पैमाने पर शुरू कर दिया है, ऐसे में कांग्रेस ने भी सरकार को घेरने की रणनीति के तहत विधानसभा घेराव का निर्णय ले लिया है।

कांग्रेस के बढ़ते दबाव और आक्रामक रवैये के चलते सत्ता में बेचैनी बढ़ गई है । और इसी के तहत पिछले दिनों मंगलवार को गृहमंत्री विजय शर्मा ने रायपुर जिले के जनप्रतिनिधियों की बैठक बुलाई थी। यह जनप्रतिनिधियो की बैठक थी या केवल भाजपाई विधायक और सांसद को ही बुलाया गया था, यह कहना पर मुश्किल है। लेकिन बैठक में पहुंचे जनप्रतिनिधियो से कानून व्यवथा सुधारने के लिए सुझाव मांगे गये।

कहा जाता है कि इस टेबल टॉक के दौरानअन्य विधायकों ने सुझाव भी दिये किसी ने नाईट गश्त बढ़ाने की बात कही तो किसी ने  नशे के बढ़ते कारोबार पर चिंता जताई।

लेकिन कहा जाता है कि रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने तो अपने को किनारे लगाने की भड़ास ही निकाल ली, मंत्री पद से मजबूरी में इस्तीफ़ा देने वाले मोहन सेठ ने तो यहां तक कह दिया कि कानून व्यवस्था की ऐसी बदतर स्थिति मैंने आज तक नहीं देखी।तो रायपुर पश्चिम के विधायक ने भी जमकर भड़ास निकाला ।

कहा जाता है कि दोनों ही नेताओका ग़ुस्से की असली वजह क़ानून व्यवस्था  के बहाने स्वयं की उपेक्षा को लेकर अधिक था। जबकि अन्य जनप्रतिनिधि सामान्य लहजे में सुझाव दे रहे थे। सूत्रों का कहना है कि मोहन सेठ और मूणत सेठ के इस तेवर से न केवल गृहमंत्री हतप्रभ रह गये बल्कि इसे लेकर पार्टी में भी कई तरह की चर्चा है।

हालांकि अंत भला तो सब भला की तर्ज पर मीडिया में वहीं खबरें छपी जो दोनों को कानून व्यवस्था का चिंतक साबित करें।

रविवार, 7 जुलाई 2024

कमाहूँ नहीं त काला खाहूँ…

  कमाहूँ नहीं त काला खाहूँ…



साम्प्रदायिकता के सहारे चुनाव जीतकर विधायक बने ईश्वर साहू के बारे में कहा जाता है कि वे शुरू से ही खाटी भाजपाई रहे हैं और पेलिहा संग पंगनहा हारे की तर्ज पर उनका चाल-चलन गांव से लेकर पूरे विधानसभा में चर्चित होने लगा है लेकिन अब वे भी खाटी भाजपाई की तरह पूरे प्रदेश में फेमस हो गये है तो उसकी वजह उन पर लगने वाला वह आरोप है जिससे भाजपा के सभी विधायक ही नहीं पार्टी भी सकते में हैं।

पार्टी ने साजा विधानसमा से दिग्गज कांग्रेसी रविन्द्र चौबे  के खिलाफ जब ईश्वर साहू को टिकिर दिया था तो उसने भी नहीं सोचा था कि ईश्वर साहू इतने बड़े फ़क़ीर निकलेगे। अब जब मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने जनदर्शन लगाना शुरू किया तो पहले ही जनदर्शन में ईश्वर साहू की पोल खुल गई। मामला दबाने के लिए ईश्वर साहू पर दो लाख रुपये लेने का आरोप लग गया।

भले ही सरकार ने इस खबर को प्रमुख मीडिया संस्थानों में छपने से रोक कर पार्टी की इज्जत बचा लिया हो लेकिन खबरे तो लोगों तक पहुंच ही गई है। तो दूसरी ताफ ईश्वर साहू के दूसरे खेल का खुलासा भी होने लगा है।

हालांकि ईश्वर साहू तो पैसों को लेकर उसी दिन चर्चा में आ गये थे, जब विधानसमा चुनाव में खर्च का ब्योरा सामने आया था। उन्होंने खर्च के मामले में विष्णुदेव साय तो छोड़िये मोहन सेठ को भी पछाड़ दिया था, जबकि उसकी कमाई तब 25 हजार रूपये महिना की थी। अब यह पैसा कहाँ से आया, क्या कोई  एजेंसीं जांच करेगी , यह एक अलग सवाल है।

लेकिन पार्टी को समझ नहीं आ रहा है कि मामला जब विधानसभा में उठेगा तो क्या जवाब दिया जाएगा ।

बुधवार, 19 जून 2024

साय खिंचवा रहे हैं सायं-सायं फ़ोटो

 साय खिंचवा रहे हैं

सायं-सायं फ़ोटो 


इसे फोकट के पाय तो मरत ले खाय की  छतीसगढ़ी कहावत  से जोड़ना बेमानी होगी, लेकिन छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय इन दिनों सोशल मीडिया में छाए हुए हैं तो इसकी वजह  उनका मीडिया मैनेजमेंट हैं, हालांकि उनका मीडिया सलाह‌कार को लेकर पत्रकारो में जो चर्चा है वह पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के मीडिया सलाहकार की तरह ही है। कंवल ओढ के...!

ख़ैर आज चर्चा तो मुख्यमंत्री के धान बोवाई की तस्वीर की है  जिसे लेकर लोग बेवजह विवाद पैदा कर रहे हैं और अब विष्णुदेव साय की तुलना एक ऐसे नेता से होने लगी है जो छत्तीसगढ़ी संस्कृति की दुहाई देते हुए हाथ में भौरा चलाते थे । उसका परिणाम अब सबके सामने है।

इसमें कोई शक नहीं होगा कि विष्णुदेव साय पहले भी किसानी करते रहे होंगे, लेकिन कभी फोटो-सोटो खिंचाने की नहीं सोची होगी, लेकिन अब मुख्यमंत्री बनने के बाद भी किसानी करनी है तो फ़ोटो-शोटो ठीक-ठाक आना चाहिए तो उसी ढंग से पहनावा भी तैयार किया गया। ऐसे में पूर्वगृहमंत्री ननकीराम कँवर की किसानी वाली तस्वीर को बाजू में चिपकाकर देखना चाहिए खेती का तरीका क्या होना चाहिए।



ख़ैर अब मीडिया सलाहकार का मैनेजमेंट का कोई जवाब नहीं , सभी बड़े अख़बारों में छप तो गया अब लोगों का क्या - वे तो बोलेंगे ही।

अब आने वाले तीज़ त्यौहार में कैसे मैनेजमेंट होगा बताने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए।