#vishnudev #opchoudhary #dipakbaij #shivdahariya #kawasilakhma #sarojpandey लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
#vishnudev #opchoudhary #dipakbaij #shivdahariya #kawasilakhma #sarojpandey लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 9 जुलाई 2024

टोप्पो का फिर शुरू होगा खेल, केदार ने कर लिया मेल

  टोप्पो का फिर शुरू होगा खेल, केदार ने कर लिया मेल

प्रमोशन भी मिला , पैसा वाला विभाग भी 


भ्रष्टाचार के जिन आरोपी अफसरों को कोग्रेस सरकार ने किनारे लगा दिया था अब वहीं अफसर एक बार फिर सक्रिय हो गये हैं और एक बार फिर से वे मलाईदार पदों पर बैठने लगे हैं।ऐसा ही एक मामला राजेश टोप्पो का है जिन्हें पदोन्नति के साथ ही भारी भरकम जल संसाधन विभाग का सचिव बना दिया गया है। इस विभाग का मंत्री केदार कश्यप हैं और उनकी अपनी कहानी है।

एक तरफ विष्णुदेव साय की सरकार ने कल ही केबिनेट की बैठक में भ्रष्टाचार रोकने का दावा करते हुए सीआईडीसी के सभी रेट कांट्रेक्ट निरस्त करने का निर्णय लेते हुए शासकीय खरीदी जेम पोर्टल से खरीदने का निर्णय लिया है तो दूसरी तरफ भ्रष्टाचार के आरोपी राजेग सुकुमार टोप्पो को जल संसाधन विभाग का सचिव बना दिया।

बताया जाता है कि 2005 बैच के आईएएस राजेश कुमार टोप्पो जिस भी विभाग में रहे उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। वे बलोदा बाजार के कलेक्टर भी रहे हैं और जनसंपर्क आयुक्त के पद पर रहने के दौरान उन पर प्राईवेट कंपनी से साँठ गाँठ कर सरकार को करोड़ों रूपये का चूना लगाने का भी आरोप है।

भूपेश साकार ने तो उनके खिलाफ़ ई ओ डब्ल्यू में रिपोर्ट भी लिखवाई है।अप्रैल 2019 तब राज्य में कांग्रेस की सरकार बनी थी। तब संवाद के पूर्व सीईओ राजेश सुकुमार टोप्पो के खिलाफ आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) ने FIR दर्ज की। आईएएस टोप्पो पर अलग-अलग मामलों में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7, 7 सी, 13 (1)(अ) और आईपीसी की धारा 120(बी) लगाई गई ।

EOW के अधिकारी जीवन प्रकाश कुजूर ने यह FIR दर्ज कराई थी। तब मेसर्स क्यूब मीडिया एंड ब्रांडिंग प्राइवेट लिमिटेड को भी आरोपी बनाया गया था। आईएएस टोप्पो पर आरोप था कि उन्होंने 2016-2018 के कार्यकाल में शासकीय पैसे का दुरुपयोग कर निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाया। हालांकि, टोप्पो पर कोई खास कार्रवाई हुई नहीं। अब सरकार बदली, और टोप्पो की मंत्रालय में पोजिशन भी।

बता दें कि वर्ष 2018 में प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद से ही राजेश सुकुमार टोप्‍पो को मंत्रालय में पदस्‍थ कर दिया गया था, लेकिन उन्‍हें कोई विभाग नहीं दिया गया था। कोविड महामारी के दौरान उन्हें OSD बनाया गया और फिर राजस्‍व मंडल का सचिव बनाया गया था।

सूत्रों का कहना है कि प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के साथ ही राजेश टोप्पो ने एक प्राईवेट कंपनी के मालिक के  सहयोग से सरकार में पैठ बनाना शुरु कर दिया था केदार कश्यप और कहा जाता है कि केदार कश्यप के साथ उनकी  दो-दो बार मुलाकात भी हुई। इस संबंध में जब केदार कश्यप से जानकारी लेने की कोशिश की गई तो वे उपलब्ध नहीं थे।

इधर केदार कश्यप को लेकर जिस तरह की चर्चा है वह हैरान कर देने वाला है। संविदा नियुक्ति के अलावा  भी बड़े पैमाने पर भ्रस्टाचार के मामले की लीपापोती की चर्चा भी शुरु हो गई है।

ऐसे में राजेश टोप्पो को जल संसाधन विभाग का सचिव बनाना किसी बड़े खेल को अंजाम देने वाला बताया जा रहा है।

सूत्रों की माने तो राजेय टोप्पो को जल संसाधन विभाग का सचिव बनाने के पीछे रमन सरकार में मंत्री रहे एक विधायक का भी बड़ा रोल है जिसका एक  प्राईवेट कंपनी से रिश्ते की भी चर्चा जमकर होते रही है।

इधर राजेश रोप्पो को सचिव बनाने की खबर से उन अधिकारियों की बाँछे खिल गई है जो कांग्रेस शासन में मलाईदार पदो से वंचित थे। 

इधर विभाग में दैनिक वेतन भोगी और अनियमित कर्मचारियों ने भी दबाव बनाना शुरू  कर दिया है। और कल तो ज्ञापन देने के दौरान मंत्री को कार से उतरने नहीं देने की भी खबर है ।


सोमवार, 1 जुलाई 2024

पैसा दो-काम लो

 पैसा दो-काम लो


कृषि विभाग में खुले आम चल रहे चालीस फीसदी कमीशन की अपनी कहानी है तो कृषि मंत्री राम‌विचार नेताम की अपनी कहानी है। कहा जाता है कि यहां सब कुछ तय न राम‌विचार करते हैं और न ही मुख्यमंत्री की ही इस विभाग में चलती है।

चलती किसी की है तो राकेश अग्रवाल की या फिर भुवनेश यादव की। राकेश और भुवनेश का क्या क़िस्सा है यह भी चर्चा में है। और इनकी  चलेगी भी क्यों नहीं, क्योंकि कृषि मंत्री ने सारी जिम्मेदारी राकेश को सौप दी है। राकेश और भुवनेश यादव की जोड़ी ने ऐसे ऐसे कमाल शुरु कर दिया है कि कोई भरोसा भी नहीं कोगा कि छत्तीसगढ़  जैसे राज्य में डंके की चोट पर कोई सरकार  को ही नहीं आम किसानों को करोड़ों का चूना लगा रहा है।

कहा तो यहां तक जाता है कि रामविचार नेताम जरूरत पड़ने पर राकेश की गाड़ी का इस्तेमाल  ही नहीं अफिस का भी इस्तेमाल कर लेते हैं। और आफिस का इस्तेमाल को लेकर जो चर्चा है वह भी कम चौकाने वाला नहीं है। 

राम विचार नेताम के नाम पर तो रमन सिंह के भी धोखा खाने की चर्चा कम नहीं है। नाम बड़े और दर्शन छोटे की कहावत तो चरितार्थ है ही अंधा बोटे रेवड़ी अपन - अपन को दे का भी क़िस्सा कृषि विभाग के गलियारे से होते हुए एश्वर्या से लकेर अब शहर के चौराहो पर भी सुनाई देने लगा है।

ऐसा रहीं है कि रामविचार पर इस तरह के आरोप पहली बार लग रहे हो या राकेश के खेल की चर्चा पहली बार ही रही हो। रामविचार ने तो तब भी रमन सिंह, अमर अग्रवाल, बृजमोहन अग्रवाल  से बाजी मार ली थी जब इंदिरा प्रियदर्शनी बैंक घोराले के नार्को टेस्ट की कथित सीडी वायरल हुई थी।

लेकिन  सैंया भये कोतवाल तो डर काहे की तर्ज पर राकेश और भुवनेश का कमाल से लोग ज़रूर चौंक जाते हैं।

रविवार, 30 जून 2024

विजय की नासमझी…

 विजय की नासमझी...


दुर्ग लोकसभा क्षेत्र से लगातार दूसरी बार सांसद बनने वाले विजय बघेल को उम्मीद थी कि मोदी मंत्रिमंडल में और नहीं तो राज्यमंत्री बनने का मौक़ा तो मिल ही जायोगा, और इस उम्मीद की वजह पार्टी के निर्देश पर चाचा भूपेश बघेल के खिलाफ विधानसमा चुनाव लड़‌ना है। लेकिन मोदी मंत्रिमंडल में जगह तो दूर प्रदेश सरकार में भी अब उनकी पूछ परख कम हो गई है। संतोष पांडे के निवास में हुई भोज कार्यक्रम में कोई उनसे ठीक से बात करने वाला नहीं था।

लेकिन विजय बघेल ने उम्मीद नहीं छोड़ी है तो इसकी वजह कुर्मी वाद की वह राजनीति है जो उन्हें दुर्ग जिले में मजबूत नेता की छवि के रूप प्रस्तुत करता है। 

लेकिन शायद वे यह भूल गए है कि उनका भाजपा से नाता तो विद्याचरण शुक्ल की वजह से हुआ है और जब पार्टी में मोहन सेठ जैसे संघी - भाजपाईयों की कद्र नहीं है तो किर दूसरी पार्टी से आने वालों का क्या उपयोग करना है यह मोही शाह से बेहतर कौन जान सकता है। और वैसे भी मोदी-शाह को यह गाना खूब पसंद है कि - मतलब निकल गया है तो, पहचानते नहीं…

लोगों का तो यहां तक कहना है कि विजय बघेल ने तो मोदी- शाह उन्हें कभी मंत्री नहीं बनाने वाले हैं और हसका ईशारा तो उन्होंने विधानसभा चुनाव में ही तब कर दिया था, जब विजय बघेल को भूपेश के खिलाफ टिकिट दिया था और समझने  वालों के लिए ईशारा ही काफ़ी होता है। और फिर कल भोज में संगठन से लेकर सत्ता वालों का व्यवहार के बाद तो सब कुछ साफ़ हो जाने की बात कही जा रही हैं, तो अपनी पूछ परख का हवाला दे दे कर सांसद जिस तरह से एक दूसरे का पोल खोल रहे हैं , उसमें भी सब कुछ साफ़ हो गया है।

लेकिन विजय बघेल यह समझने को तैयार नहीं है और उन्हें लगता है कि देर-सबेर मंत्री बना ही दिया जायेगा...!

शनिवार, 29 जून 2024

भावना ऐसे उजागर हुई…

भावना ऐसे उजागर हुई…

 


यह तो पूत के पाँव पालने में दिखाई देने वाली कहावत को ही उजागर करता है वरना पंडरिया की विधायक भावना बोहरा के खिलाफ न तो ऐसे आरोप लगते और न ही वे पार्टी में चर्चा में हीं आती। 

दरअसल भावना बोहरा की पहचान सिर्फ पंडरिया विधायक की ही सिर्फ़ नहीं है इससे इतर वे रमन सिंह के कैसे-कैसे रिश्तेदार के रूप में भी है। अब रमन सिंह की रिश्तेदार हो तो वीआईपी कल्चर का ताम-झाम भी स्वाभाविक है और पैसो की राजनीति या राजनीति में पैसों असर भी होना है। और फिर उन्हें स्कूल चलने चलाने के अलावा एनजीओ चलाने का भी अच्छा ख़ासा अनुभव है। अब उनके एनजीओ को ग्रांट मिलता था या नहीं, या कहाँ कहाँ से मदद मिलती थी यह जाँच का एक अलग ही मसाला है।

लेकिन ताजा मामला तो किसानी से जुड़ा मामला है और आरोप भी ऐसा वैसा नहीं है, गाँव के किसान ही शिकायत ले के पहुंच गये । तीन ट्रक डीएपी खाद खाली कराने का मामला तो अब राजधानी में गूंजने लगा। 

मामला तो उनसे आसानी से नहीं मिल पाने का पहले से ही गूंज रहा है।, चुनाव जीतने के बाद रायपुर से राजस्थान तक के दौरे की नई नई खबर  को कांग्रेस ने मुद्दा बनाकर तुल देना शुरु कर दिया है। लेकिन कांग्रेसी शायद भूल गये है कि भावना बोहरा कोन है…?

शुक्रवार, 28 जून 2024

फ़कत् ला-ला ने कर दिया बेड़ा-गर्क

 फ़कत् ला-ला ने कर

दिया बेड़ा-गर्क


महापौर से लेकर विधायक बनने का सपना संजोने वाले भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता संजय श्रीवास्तव को तो पार्टी ने वह सब कुछ दिया जिसने वे लायक थे या नहीं उसे लेकर पार्टी के भीतर भी सवाल उठते रहे हैं।

एलआई सी एजेंट से राजनीति में आये संजय श्रीवास्तव भी राजीव अग्रवाल की तरह हर चुनाव में टिकिट की लाईन में लग जाते हैं, पार्षद हो या कोई भी चुनाव ।  कहा जाता है कि उन्हें टिकिट चाहिए। यही वजह है कि अब पार्टी के नेता भी उन्हें गंभीरता से नहीं लेते।

गौरी की सीढ़ी चढ़कर भजायुमों  की राजनीति करते करते ला-ला वाले खेल खेलने लगे और उनके खेल की चर्चा तो इतनी है कि ख़ुद भाजपा के नेता भी उनके निचोड़ने वाले गुण से नहीं बच पाये हैं, शंकरनगर के एक कॉम्प्लेक्स वाले ज़मीन को लेकर पार्टी के नेताओ से विवाद की चर्चा  तो इतना तूल पकड़ा था कि महापौर की टिकिट की ईच्छा चकवाचूर हो गया।

रमन सिंह के असली गृहमंत्री से संबंध बनाते बनते  संबंध प्रसाद तक जा पहुंचा लेकिन ला-ला प्रेम के चलते विधानसमा की टिकिट से वंचित होना पड़ा।यानी जो इन्हें जान गया वह टिकिट कभी नहीं देगा।

और कहा जाता है कि रायपुर दक्षिण की सीट खाली होते ही एक बार फिर जीभ लपलपाने लगा है। लेकिन सवाल तो वही है कि टिकिट  दिलायेगा कौन? क्योंकि सीढ़ी को ही तोड़ने में माहिर संजय श्रीवास्तव की  यह आदतें छूटती नहीं। और छूटे भी कैसे, इंदौरी चटोरापन कभी छूटता है क्या ?

लता की छटपटाहट...

 लता की छटपटाहट...


विष्णुदेव साय मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए मरे जा रहे लोगों की कमी नहीं हैं, कई दिग्गज नेता साम-दाम की राजनीति में लगे हैं तो कोई अपने आकाओं के भरोसे है। कहा जा रहा है कि एक तरफ़ मंत्री बनने राजेश मूणत ने पूरा दांव खेल दिया है तो दूसरी तरफ सबसे ज्यादा छटपटाहट जिसमें दिखाई दे रही है वह लता उसेंडी है।

रमन सरकार में मंत्री रह चुनी लता उसेडी को लेकर कई चर्चे है और कहा जाता है कि ऐसे ही एक चर्चे ने रमन सरकार की किरकिरी तक करा दी थी, मीडिया प्रेम से ओत प्रोत लता उसेंडी ने प्रेसक्लब में बैडमिंटन कोर्ट बनाने में भी मदद की तो पार्टी  के मीडिया संभालने वालों की मदद को लेकर भी वे चर्चा में थी…।

कहा जाता है कि इस बार भी वे मंत्री बनने के लिए पूटी ताकत लगाई हुई है, और  अब उन्हें उड़ीसा चुनाव में किये मेहनत  पर ही ज्यादा भरोसा है, क्योंकि पिछली बार वे जिस सीढ़ी में चढ़‌कर मंत्री बनी वी, वह सीढ़ी से इन दिनों किनारे कर दी गई है।

लेकिन लता की दिक़्क़त यह है कि  साय सरकार ने महिला कोटे से पहले ही लक्ष्मी राजवाड़े को मंत्री बना रखा है तब क्या इस बार महिला मंत्री की संख्या बढ़ाई जायेगी। और क्या कोई नई सीढ़ी तैयार हो गई है..!

बुधवार, 26 जून 2024

लखन लाल की लीला ...

 लखन लाल की लीला ...


विष्णुदेव साय सरकार के उद्योग मंत्री लखनलाल देवांगन की महापौर बनने से लेकर विधायक और फिर मंत्री बनने की अपनी अलग ही कहानी है। कहते हैं कि लीला दिखाने में माहिर लखनलाल की मुश्किल यह है कि वे सत्ता में चल रही आपानी खींचतान में फँस गये हैं, और हालत यह है कि उन्हें उनको लिलाओं की वजह से चेतावनी भी मिल चुकी है।

ऐसा भी नहीं है कि उद्योग जैसे भारीभरकम विभाग को चलाने में उन्हें कोई दिक़्क़त है। क्योकि महापौर रहते हुए उन्होंने उद्योगों के खेल को बड़ी ही नज़दीक से समझा और जाना है और जमीन भी खूब नापा है। आखिर कोरबा में जयसिंह आग्रवाल को साधना आसान भी नहीं है। लेकिन अब जिस तरह से चेतावनी मिली है उससे वे हतप्रभ है। उनने पद संभालते ही जिस तरह से स्पेशल ब्लास्ट फ़ैक्ट्री में विस्फोट हुआ वह तो जैसे तैसे निपट गया। लेकिन अब उद्योगों में जो समस्या है वह उनके गले का फांस बनता जा रहा है। श्रम क़ानून के उल्लंघन का मामला तो जैसे तैसे टाल ही दिया गया, क्योंकि गरीबों का कोई पूछने वाला नहीं होता। 

लेकिन मंत्रीमंडल के सदस्यों की बढ़‌ती सिफारिशों ने उनके लीला दिखाने के मार्ग में जरूर रोढ़ा बनता जा रहा है, उपर से अडानी की कंपनियों के विस्तार के अलावा उघोगों को दी जाने वाली छूट का  ऐसे ऐसे मामले सामने है कि एक कुँआ तो दूसरी तरफ खाई की स्थिति बन गई है। किसी और की नहीं उन पर खजाना संभालने वाले मंत्री की नजर है जो अमित शाह के करीबी तो है ही, प्रशामनिक अफसरों को भी अपनी मुट्ठी में कसकर बांध रखा है। तब उन्हें कैसी कैसी लीला करना पड़ रहा है, बता भी नहीं पा रहे हैं।

अंजय शुक्ला की दावेदारी ने कई लोगों की नींद उड़ा दी



बृजमोहन अग्रवाल के विधायकी से इस्तीफे के बाद रायपुर दक्षिण विधानसमा के लिए भाजपा में दावेदारों की फेहरिश्त है लेकिन जब से रविशंकर विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष अजय शुक्ला की दावेदारी सामने आई है अन्य दावेदारों में हड़‌कम्प
मच गया है। हड़‌कम्प मचने की वजह उनका युवाओं में प्रभाव के अलावा  राजनैतिक शैली है जो किसी को भी प्रभावित कर सकता है। कहा जाता है कि भाजपा के निर्धारित मापदंड में वे खरे तो उतरते ही हैं दक्षिण के रहवासी होने का भी उनको लाभ हैं।

दक्षिण के दावेदार...

भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज विधायक बृजमोहन अग्रवाल की विधायकी छुड़‌वाने के बाद अब पार्टी यहाँ किसे टिकिट देगी यह तो मोदी-शाह ही तय करेंगे लेकिन भाजपा में दावेदारों ने पार्टी की मुसिबत बढ़ा दी है।

दाबेदारों में ऐसे ऐसे नाम सामने आ रहे हैं जिनकी कल्पना ख़ुद भाजपा के स्थानीय नेताओं ने नहीं की थी, और  इनमें से  कुछ दावेदार तो ऐसे हैं जो वार्ड का चुनाव भी नहीं जीत पाये हैं लेकिन उन्हें लगता है कि प्रदेश में भाजपा की सरकार और बृजमोहन अग्रवाल  की बोई फ़्रसल आसानी से चुनाव जीतवा देगा। ऐसे में कई लोग ऐसे हैं जो खामोशी से अपनी टिकिट का इंतज़ार कर रहे हैं। पार्टी नेताओ का भी मानना है कि दक्षिण में इस बार जो नाम आयेगा वह चौंकाने वाला होगा।

चौकाने वालो नाम कौन होगा यह कहना मुश्किल है लेकिन क्या वह दक्षिण विधानसभा का  रहने वाला होगा ? यह सवाल अब बड़ा इसलिए हो गया है क्योंकि अब तक यहाँ चुनाव जीतने वाले मोहन सेठ पश्चिम के निवासी थे, और दक्षिण के दावेदार उनके नाम और ताकत की वजह से विरोध तो छोड़िये दावेदारी भी नहीं करते थे।

ऐसे में पार्टी के भीतर इस बार दक्षिण से ही किसी को टिकिट देने की माँग जोर शोर से उठाई जा रही है तो इसकी बड़ी वजह  मोहन सेठ की पसंद की अनदेखी करना भी है।


कहा जाता है कि दक्षिण से ही उम्मीदवार हो यह माँग सबसे पहले केदार गुप्ता ने उठाई थी, और चर्चा तो इस बात की भी है कि उन्होंने इस मांग को हवा देने का खेल भी किया।जड़ी-बूटी  वाले एक मामले में भूपेश सरकार के दौरान विवाद में आने वाले केदार गुप्ता पर लोकसभा चुनाव के दौरान मीडिया मैनेजमेंट के नाम पर खेल होने और करने के भी किस्से हैं।

दरअसल  टिकिट को लेकर पार्टी की दिक़्क़त यह भी है कि दक्षिण से ही कई नेता ऐसे हैं जो दमदार माने जाते हैं, बेमेतरा के लिए टिकिट वितरण  में विलम्ब होने की वजह वाले योगेश तिवारी  के लिए भी कई लोग लगे हैं तो, सिंधी समाज के गुरु भी दावेदार हैं, इसके अलावा मीनल चौबे, मृत्युंजय दुबे भी दावेदारों की फेहरिश्त में शामिल है तो कहा जा रहा है कि यूनिर्वसिटी प्रेसिडेंट रहे अंजय शुक्ला  की दावेदारी भी बेहद मजबूत है। वे दक्षिण के रहवासी भी है तो काली माई मंदिर के ट्रस्टी  भी है, यानी भाजपा जिस धर्म के घालमेल  पर विश्वास करती है उसमें अंजय शुक्ला  भी फिट बैठते हैं ,।


कहा जा रहा है कि छात्रनेता से राजनीति में आने वाले अजय शुक्ला को  बृजमोहन अग्रवाल का  बेहतर विकल्प भी माना जा रहा है। और कहा तो यहां तक जा रहा है कि अजय को टिकिट देने से पुराने छात्र नेताओ का साथ  भाजपा को उसी तरह से मिलेगा जैसे बृजमोहन अग्रवाल को मिलता रहा है।

दावेदारों की लंबी सूची होने की एक बड़ी वजह प्रदेश  में सरकार होना भी है। ऐसे में जब फैसला मोदीशाह की जोड़ी को करना है तो किसका भाग्य खुलेगा कहना मुश्किल है।

मंगलवार, 25 जून 2024

केदार का करामात...

केदार का करामात...


रमन राज में अपनी करामात दिखा चुके प्रदेश के वन मंत्री केदार कश्यप के बारे में वन कहा जाता है कि सब सुधर जाये तो सुधर जाये केदार नहीं सुधरेंगे ? और यही वजह है कि अपनी हरकतों की वजह से  2018 के चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। और इस बार भूपेश विरोधी लहर में चुनाव जीतने के बाद साय सरकार ने उन्हें मंत्री तो बना दिया लेकिन वे अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं और एक बार फिर अपनी करामात दिखाना शुरु कर दिया है।

दरअसल केदार कश्यप की अपनी पहचान क्या है कहना मुश्किल है। वे बस्तर के कद्‌दावर माने जाने वाले नेता स्व बलिराम कश्यप के पुत्र है। बलिशम कश्यप की दबंगई के सामने पार्टी में पटवा - लखीराम गुट पानी मांगते थे । लेकिन केदार कश्यप की राजनीति को लेकर कहा जाता है कि स्व-बलिराम जितने दबंग थे  केदार कश्यप उतने ही पिलपिले हैं। तो वे पिलपिले है या नहीं यह ये कहना कठिन है। लेकिन छत्तीसगढ़ में वन मंत्री के मायने क्या यह किसी से छिपा नहीं है। इससे पहले रमन राज में वन मंत्री रहे विक्रय उसेंडी को लेकर जो चर्चा उसी तरह की चर्चा अव एक बार फिर शुरू हो गई है। कैम्पा मद से लेकर जंगल तस्करों से अधिकारियों के खेल की केदार कश्यप अब समझ चुके हैं, लेकिन कितना समझे हैं इसका तो पता नहीं लेकिन उनके करामातों की चर्चा जब राजधानी पहुंची तो उन्हें चेतावनी मिलने की भी चर्चा है।

कहा जाता है कि इस चेतावनी के बाद खेल तो बदल गया है लेकिन करामात जारी है।

रविवार, 23 जून 2024

कहाँ गया विवेक...

 कहाँ गया विवेक...


रमन राज से लेकर भूपेश राज तक प्रभावशाली अफसरों में गिने जाने वाले पूर्व मुख्यसचिव विवेक ढांड की गिरफ्तारी को लेकर उठ  रहे सवालों पर अब किसी को जवाब नहीं मिल रहा है तो उसकी वजह क्या उनका वह खेल है जो वे हमेशा ही गुपचुप तरीके से खेला करते हैं और इस खेल के चलते ही गिरफ्तारी से बचे हुए हैं।

दरअसल ईडी के राडार में आने से पहले से ही वे विवादास्पद रहे हैं। कहा जाता है कि विवेड ढाड का विवादों से पुराना नाता है। उज्जैन में कलेक्टरी के दौरान भी वे विवाद में आ गये थे, जांच होती उससे पहले कमिश्नर  तिवारी ने माम‌ला रफा दफा करवा दिया ।

लेकिन जीई रोड क्षेत्र के बेशकीमती जमीन के लीज को लेकर विवाद गहराता उसने पहले रमन-भूपेश ने उन्हें बचा लिया, मामला कोर्ट क्यों नहीं पहुंचा यह आसानी से समझा जा सकता।

लेकिन ताजा मामला घोटाले का है और इस घोटाले में कई धुरंधरों को ईडी ने जेल में डाल रखा है, और रही सही कसर ई ओ डब्ल्यू ने पूरा कर दिया है। अनिल टूटेजा, सौम्या चौरसिया लेकर कई अफ़सर जेल में बंद है।

कहा गया है कि पूरे घोटाले का मास्टर माइंड अभी भी जेल से बाहर है।और वह अपना खेल बड़ी चतुराई से खेल रहा है। तब सवाल विवेक ढाड का है और चार्जशीट में नाम होने के बावजूद यदि  विवेक ढांड बचे हुए हैं तो  भाजपाई भी हैरान है और पूछ रहे हैं, अपनी ही सरकार से , कहाँ है विकेक ढांड...!

गुरुवार, 13 जून 2024

सरोज पांडे हारी या हराई गई


 सरोज पांडे की हार का ठीकरा किसके सिर फूटेगा, बीजेपी में बवाल 

छत्तीसगढ़ में सरोज पांडे को क्या बीजेपी के लोगों ने ही हराया

क्या सरोज पांडे किसी को बख्शेगी


https://youtu.be/NFPUcNyhiu4?si=1UpQQ1ym1gUTJITu


देखिए विस्तृत रिपोर्ट….