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बुधवार, 2 जुलाई 2025

पाकिस्तान के द्वारा यूएनएससी की कमान सँभालने का मतलब…

पाकिस्तान के द्वारा यूएनएससी की कमान सँभालने का मतलब…


भारत के लिए जुलाई माह  एक चुनौती है कि वह अपनी कूटनीति की धार तेज़ करे क्योंकि पाकिस्तान को अमेरिका जिस तरह से मदद कर रहा है और अब यूएनएससी का कमान… इसका क्या असर होगा…

1 जुलाई 2025 को पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मासिक अध्यक्षता हासिल की। यह उसके 2025-26 के गैर-स्थायी सदस्यता कार्यकाल का हिस्सा है। लेकिन सवाल ये है: क्या ये भारत और वैश्विक मंच के लिए गेम-चेंजर है? इसका भारत और दुनिया पर क्या असर होगा! 🇮🇳🌐

पाकिस्तान इस महीने दो बड़े आयोजन करेगा:

🔹 22 जुलाई: वैश्विक शांति और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर खुली बहस।

🔹 24 जुलाई: इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) और UN के बीच सहयोग पर चर्चा।

ये दोनों मौके पाकिस्तान को वैश्विक मंच पर अपनी बात रखने का सुनहरा अवसर देंगे। लेकिन क्या वो इसका फायदा उठाकर भारत के खिलाफ अपनी चाल चलेगा, जैसे कश्मीर मुद्दे को उछालना या ऑपरेशन सिंदूर पर सवाल उठाना? 😮


🇮🇳 भारत के लिए क्या मायने?


1. कश्मीर का खेल: पाकिस्तान पहले भी UNSC में कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मंच पर लाने की नाकाम कोशिश कर चुका है। भारत, जो इसे द्विपक्षीय मुद्दा मानता है, अपनी मज़बूत कूटनीति से ऐसी कोशिशों को फिर से पटरी से उतार सकता है। 💪

2. आतंकवाद और सुरक्षा: पाकिस्तान तालिबान प्रतिबंध समिति का भी अध्यक्ष है। भारत ने बार-बार उस पर आतंकियों को पनाह देने का आरोप लगाया है। क्या पाकिस्तान इस मंच का दुरुपयोग करेगा? भारत को अपनी नजरें खुली रखनी होंगी। 👀

3. आर्थिक दांव: पाकिस्तान अपनी छवि चमकाकर निवेश और सहायता हासिल करने की कोशिश कर सकता है। भारत को अपनी वैश्विक आर्थिक ताकत (G20, क्वाड) का इस्तेमाल कर इसकी काट ढूंढनी होगी।

4. मानवाधिकार का पाखंड?: पाकिस्तान की अपनी मानवाधिकार स्थिति (अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार) सवालों के घेरे में है। भारत अपनी लोकतांत्रिक छवि और उपलब्धियों (चंद्रयान, डिजिटल इंडिया) को उजागर कर इसका जवाब दे सकता है।

🌏 वैश्विक मंच पर असर?

▪️शांति या शोशेबाजी?: पाकिस्तान ने शांति और बहुपक्षीयता की बात की है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता संदिग्ध है। क्या वो यूक्रेन, मध्य पूर्व जैसे संकटों में निष्पक्ष भूमिका निभा पाएगा? 🤔

▪️UNSC सुधार: भारत स्थायी सीट की मांग कर रहा है, लेकिन पाकिस्तान इसका विरोध करता है। ये उसकी राह में रोड़ा बन सकता है।

▪️महाशक्तियों का खेल: चीन का समर्थन पाकिस्तान को ताकत देता है, लेकिन भारत की अमेरिका, फ्रांस, और जापान के साथ मज़बूत साझेदारी इसे बैलेंस कर सकती है।


🇮🇳 भारत की रणनीति?

🔥 अपनी कूटनीति को और धार देना।

🔥 वैश्विक मंच पर अपनी उपलब्धियों (इसरो, वैक्सीन कूटनीति) को ज़ोर-शोर से पेश करना।

🔥 आतंकवाद और जलवायु जैसे साझा मुद्दों पर नेतृत्व लेना।



#UNSCPresidency #PakistanUNSC #IndiaDiplomacy #GlobalPolitics #SouthAsia #IndiaVsPakistan #WorldPeace #Geopolitics

(साभार)

बुधवार, 25 जून 2025

सीज़फ़ायर-युद्ध और ट्रंप…

 सीज़फ़ायर-युद्ध और ट्रंप…


यह दुनिया के लिए राहत की खबर है कि इज़राइल ईरान या भारत पाकिस्तान के बीज सीज़फ़ायर हो गया लेकिन युद्ध और सीज़फ़ायर के बीच जो कुछ हुआ वह क्या सब पूर्व में लिखी स्क्रिप्ट है ताकि कोई खेल खेला जा सके… राष्ट्रवाद के जुनून में जनता को धकेला जा सके…


जैसे भारत-पाकिस्तान में आभासी युद्ध करवाया गया था ड्रोन ड्रोन मिसाइल मिसाइलों का खेल किया गया था कुछ उसी तरह से यह स्क्रिप्ट भी लिख दी गई!


भारत-पाक युद्ध में भी क्या हुआ था सरकार ने स्वयं अपनी पीठ ठोकी थी पाकिस्तान को सूचना देकर आतंकवादी ठिकानों पर हमले किए थे जहां से पहले ही आतंकवादी हटा लिए गए थे और अब तो यह भी साबित हो गया है की पहलगाम आतंकवादियों के लिए जिन आतंकवादियों को नामांकित किया गया था उसमें भी भारत सरकार चूक कर गई थी और वह आतंकवादी वह नहीं थे जिन्होंने हमला किया!


भारत में यह परसेप्शन बनाया गया कि हमने चुन चुन कर टारगेट हिट किया और पाकिस्तान ने इस बात के लिए जश्न बनाया की पहली बार पाकिस्तान की वायु सेना ने भारत के बड़े-बड़े विमान को मार गिराया!


 दोनों तरफ से विन विन सिचुएशन का परसेप्शन मीडिया बनाता रहा और दोनों देश की जनता तमाशा देखते रही और दोनों देश के शासक सत्ता के पुनरप्राप्ति के प्रयासों पर अपने कदम बढ़ाते रहे और अमेरिका का राष्ट्रपति अपने व्यापारिक फायदा और अंतर्राष्ट्रीय सरपंची के लिए अपनी स्थिति मजबूत करता रहा!

पूरे देश में सेना की वर्दी पहनकर घूमने वाले तथाकथित 56 इंच कमांडर की जबान पर अभी तक पहलगाम के आतंकवादियों का सवाल वह कौन थे कब गिरफ्तार होंगे नहीं आ पाया है! 

समय की बिसात पर राजनीति के पासे  जब कूटनीति के सांचो में ढलते हैं, तो यह समझना मुश्किल हो जाता है क्या सच है क्या झूठ? 

बाहर से दिखने वाली परिस्थितियों अंदर से कितनी शालीनता से एक दूसरे का सहयोगी बन जाती है हम अपेक्षित ही नहीं कर पाते!  और शायद इसी का नाम अंतरराष्ट्रीय राजनीति है !

फोर्दो पर हमले के बाद ईरान के चट्टानी संकल्प की परीक्षा लेते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने जो कुछ कहा ,किया वह चौंकाने वाला था! 

आज ईरान ने भी कतर स्थित अमेरिकन बेस पर हमला किया लेकिन उसके पहले उसने कतर को आगाह किया इसलिए एयर बेस पर ईरानी मिसाइल तो विस्फोट करती नजर आई, लेकिन जनधन की हानि बहुत न्यूनतम थी हमले के वेग के अनुपात में 

और इस एक घटना से विमर्श उपजने लगा क्या कहीं सब कुछ स्क्रिपटेड तो नहीं चल रहा!

ईरान की पहाड़ियों में दफन सुरक्षित किला फॉरदो पर अमेरिका की बंकर रोधी मिसाइल ने हमले किए और सुरक्षित अमेरिका का विमान इसराइल लौट गए! 

एक बारगी लगा नोबेल पीस प्राइज की दौड़ में शामिल ट्रंप ऐसी गलती कैसे कर सकते हैं? 

जो संयुक्त राष्ट्र संघ के नियमों का उल्लंघन ही नहीं बल्कि अमेरिकन नागरिकों की मानसिकता को भी हिट करता था!

लेकिन जैसा भारत-पाक युद्ध में हुआ ठीक वही परसेप्शन वहां क्रिएट किया गया!

 अमेरिका ने ईरान को पूर्व सूचना दी थी कि हमें इजरायल की संतुष्टि और अमेरिका की जो सीनेट की यहूदी लाबी है , उसकी मानसिकता को तुष्ट करने के लिए ऐसा प्रदर्शित करना पड़ेगा !

आप वहां से अपने आवश्यक और जो आपको हानि पहुंचा सकते हैं ऐसी सामग्रियों को हटा ले जो 15 दिन का समय दिया गया था ट्रंप के द्वारा शायद उसकी प्रति ध्वनि भी अब समझी जा सकती है! चट्टान का वह किला अमेरिका की बंकर रोधी मिसाइलों ने हिलाया, एक सीमा तक नष्ट भी किया लेकिन फिर भी कोई रेडियोएक्टिव प्रभाव ईरान पर दुनिया ने नहीं देखा मतलब साफ था वहां से यूरेनियम हटा लिया गया था! 

यह सब इतना आसान भी नहीं रहा होगा क्योंकि

 ईरान को इस बात के लिए राजी करने के लिए शायद यह भी कहा होगा कि हम इसराइल के माध्यम से सीज फायर का निवेदन आप तक पहुंचाएंगे और वह उस ईरान की मानसिकता को संतुष्ट करेगा जिसका परसेप्शन आपने बनाया है! 

नेतन्याहू भी इजरायल के लगातार होते नुकसान से परेशान थे एक के बाद एक मुस्लिम देशों पर हमले के बाद इजरायल की आर्थिक स्थिति भी कमजोर हुई थी और युद्ध सामग्री का भंडार भी! 

कहीं की भी जनता युद्ध नहीं चाहती इजरायल की भी नहीं! नेतन्याहू परेशान थे, विद्रोह के स्वर इजराइल में भी उठने लगे थे!

अमेरिका ने समझाया इजराइल का प्राथमिक उद्देश्य युद्ध को लेकर यह था कि ईरान परमाणु संवर्धन नहीं कर पाए परमाणु बम नहीं बना पाए बंकर रोधी आक्रमण के बाद ईरान लगभग 10 साल पीछे चला गया है और यह इजरायल के लिए विन विन सिचुएशन है 

मिडिल ईस्ट में इजरायल के साथ सीधे युद्ध में शिरकत कर कर अमेरिका ने इजरायल की स्थिति को मजबूत किया है और इन्हीं सब तथ्यों की रोशनी में उन्होंने इसराइल पर दबाव डाला की  वह ईरान से  सीज फायर की रिक्वेस्ट करें!

एक चालाकीअमेरिका नेऔर की उन्होंने ईरान से अपनी एयरबेस जो कतर में थी उस पर भी हमला करवाया ताकि ईरानी मानसिकता और अमेरिका विरोधी मानसिकता इस बात से संतुष्ट हो सके कि ईरान ने सरेंडर नहीं किया नरेंद्र की तरह बल्कि अमेरिका के आक्रमण पर भी प्रत्यक्रमण कर जवाब दिया!

 ठीक इसी तरह जिस तरह इजराइल को समझाया गया कि चीन उत्तर कोरिया और सोवियत रूस ईरान को परमाण्विक हथियार दे सकते हैं इसलिए इस विषय को आगे बढ़ना तर्कसंगत नहीं!

अब व्यापार की बात होगी, शेयर मार्केट में तेजी होगी सोने के भाव गिरेंगे और पेट्रोल की आपूर्ति निरंतर रहेगी लेकिन सवाल सबसे बड़ा है क्या ईरान इजरायल युद्ध में भारत की विदेश नीति और कूटनीति एक बार फिर से आहत नहीं हुई है? 

अपने अपने तर्कों से आपके जवाब प्रतीक्षित रहेंगे पर फिलहाल ऐसा लगता है तीसरे विश्व युद्ध का खतरा कुछ दिनों के लिए तो आगे खिसक गया है!(साभार)

रविवार, 22 जून 2025

ईरान का डर, ज़िद और गर्व…

ईरान का डर, ज़िद और गर्व…


इज़राइल और अमेरिका के हमले के बाद ईरान ने दोगुनी ताक़त से इज़राइल पर हमला किया, क्या अमेरिका के युद्ध में कूदने से तीसरे विश्व युद्ध की घंटी बज़ गई है , क्या है ईरान का परमाणु ठिकाना…


ईरान के क़ुम शहर के करीब, एक ऐसा किला सांस ले रहा है जो दुनिया की नींद उड़ाए हुए है — इसका नाम है Fordow Fuel Enrichment Plant। यह कोई आम परमाणु ठिकाना नहीं, बल्कि ईरानी सत्ता का गर्व, डर और जिद तीनों है। सतह से करीब 300 फीट नीचे, सख़्त चट्टानों में सुरंगों के भीतर इस किले को इस तरह बनाया गया है कि कोई बम इसे छू भी न सके। पर जो चीज़ इसे अजेय नहीं बनाती, वो है इज़राइल और अमेरिका का बारीक इंटेलिजेंस जाल — जो Fordow के बाहर नहीं, इसके अंदर तक हर आवाज़ सुनता है

 पत्थर की दीवारें, धातु के रोटर और अंदरूनी डर

Fordow में ईरान वो काम करता है जिससे पश्चिमी दुनिया को सबसे बड़ा खतरा लगता है — high-grade यूरेनियम enrichment। इसका मतलब होता है कि परमाणु बम बनाने की बुनियाद यहीं से तैयार होती है। Iran ने Saddam और Gaddafi से सबक लिया — ओपन field में enrichment रखोगे तो अमेरिका बम गिरा देगा। इसलिए Fordow को पहाड़ के नीचे छिपा दिया गया।

लेकिन दुनिया के सबसे बेहतरीन जासूसों ने ये भी सबक सीख रखा था कि चट्टान से नहीं, इंसान से इन्फॉर्मेशन निकाली जाती है। और वहीं से शुरू होता है Mossad और CIA का अदृश्य खेल।

Mossad की इंसानी जंजीर

इज़राइल की सबसे घातक एजेंसी Mossad ने Fordow के चारों ओर एक ऐसा इंसानी घेरा बनाया है जिसमें कोई scientist, कोई engineer, कोई driver या कोई सुरक्षा गार्ड भी शामिल हो सकता है।

कई बार पैसों से, कई बार ब्लैकमेल से, और कई बार परिवार की सुरक्षा के नाम पर ये लोग अपने ही प्लांट की खबर बाहर भेजते हैं — कब कौन सा rotor बदलना है, कौन सी सुरंग में नया ventilation shaft खोदा जा रहा है।

इसी नेटवर्क ने Fordow के जैसे ही Natanz enrichment plant में centrifuge sabotage कराया था — कभी magnetic bomb से scientist उड़े, कभी remote sniper ने कार रोक कर गोली चलाई।

Unit 8200 और NSA की आंखें

इज़राइल की Unit 8200 और अमेरिका की NSA — ये दोनों agencies Fordow के बाहर की हर communication line, radio chatter, और tunnel sensor को real time में पढ़ती हैं।

Fordow से Tehran तक रोज़ाना जो encrypted report जाती है, वो cipher टूटते ही Tel Aviv और Langley की टेबल पर आ जाती है।

अमेरिकी KH-11 और KH-12 satellite Fordow की छत पर रखे ट्रकों की गिनती भी बदलते देख लेते हैं।

आजकल hyperspectral और AI-based imagery से thermal anomaly से पता चलता है कि पत्थर के नीचे कौन सी सुरंग active है और कौन सी dummy।

Cyber के कीड़े : Stuxnet और उसके वारिस

एक बार Mossad और NSA ने मिलकर दुनिया का सबसे चालाक cyber worm बनाया था — Stuxnet।

इसने Fordow की बहन site Natanz में centrifuge के rotors को खुद-ब-खुद overspeed करवा कर फाड़ दिया था।

आज के दौर में ईरान ने air-gapped systems बनाकर direct hacking रोक दी है, लेकिन phishing emails, fake research links और USB traps से इज़राइल-अमेरिका अब भी firmware poisoning करते हैं।

Smart Dust और Mini Drones : हवा में घुले जासूस

नए दौर में जासूसी सिर्फ उपग्रह या कंप्यूटर तक नहीं है। Mossad छोटे छोटे drones, और smart dust sensors Fordow के ventilation shaft में छोड़ सकता है। ये sensors vibration, gas leaks, और unusual heat record कर AI dashboard पर भेजते रहते हैं।

जैसे ही कोई suspicious drill या centrifuge overspin होता है — Israel Defense Forces या US Fifth Fleet को alert जाता है।

Azerbaijan से लेकर Gulf तक : चारों तरफ जाल

Fordow को घेरने के लिए जमीनी logistics भी active हैं। इज़राइल ने Azerbaijan border पर discrete drone hub बना रखा है।

अमेरिका के पास Iraq, Bahrain और UAE में forward bases हैं — जहां से rapid strike या sabotage squad कुछ ही घंटे में Fordow की logistic lifeline को cut कर सकते हैं।

मतलब साफ है

Fordow की concrete shell उसे बम से तो बचा सकती है, लेकिन जासूसों से नहीं।

उसकी गहराई अमेरिकी Massive Ordnance Penetrator को delay कर सकती है, रोक नहीं सकती।

और Mossad का आदमी अंदर centrifuge poison करने में कितना वक्त लगाएगा — Tehran को खुद नहीं पता।

Fordow का सच : पाताल के भीतर भी डर

Fordow ईरान का गर्व है, लेकिन Tehran के लिए एक perpetual anxiety भी है।

एक तरफ अमेरिका-इज़राइल ने आज तक इसे फुल-scale bombing से बचा रखा, क्योंकि इसका political cost Strait of Hormuz बंद कर सकता है।

दूसरी तरफ, Fordow के दरवाज़े पर Mossad का जासूसी रडार हमेशा ON है — पहाड़ के बाहर भी और अंदर भी।

Fordow बंकर बम से ज्यादा Mossad के आदमी और AI की आंखों से डरता है — और यही इस पाताल का सच है।(साभार)

शुक्रवार, 20 जून 2025

सुनो…! ऑपरेशन सिंदूर जारी है…

सुनो…! ऑपरेशन सिंदूर जारी है…


 आपरेशन सिंदुर चल रहा हैं इसके समाप्त होने की  कोई अधिकृत घोषणा नहीं हुई मतलब आपरेशन सिंदुर के चलते तीन देशों की यात्रा भी हो गई और  ट्रंप से 
35 मिनिट की बातचीत भी हो गई। और ईधर आपरेशन सिंदुर चल रहा है और ऊधर असीम मुनीर का मजे में अमेरिका दौरा भी चल रहा हैं, लंच भी हो ही गया। कितना गंभीर आपरेशन हैं ये पाकिस्तान को कोई परेशानी नहीं फिर भी चल रहा है और तो और ऐसा भी चल रहा हैं कि मानो कोई बाई पास सर्जरी चल रही हो एकदम खामोशी से…

हैरानी हुई कि आख़िर ऑपरेशन सिंदूर के बीच ये सब हो क्या रहा है,इमेज तो सीज फ़ायर से ख़राब हुई ही है और अब जैसे ही मीडिया में खबर चली के पाकिस्तानी सेनापति मुनरो को ट्रंप ने लंच पर आमंत्रित किया है वैसे ही अमेरिका की पाकिस्तान को एक तरफा झुकाव वाली बात को गलत साबित करने के लिए और मोदी जी के विश्व गुरु चरित्र की रक्षा के लिए फोन कॉल का नॉरेटिव गढ़ा गया!

दरअसल् यह अर्ध सत्य रहा होगा !प्रधानमंत्री के फोन कॉल पर कभी विदेश मंत्रालय को ब्रीफिंग करते हुए नहीं देखा गया है !जब स्वयं प्रधानमंत्री छोटी-छोटी सी बातों के लिए ट्वीट करते है ,,मन की बात करते हैं , फिर इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर उनके व्यक्तिगत वार्तालाप पर विदेश सचिव कोई वक्तव्य दे यह बात हजम नहीं होती!

तीसरी बात यह है यह सामान्य शिष्टाचार के खिलाफ है क्योंकि प्रधानमंत्री की किसी नेता के साथ हुई व्यक्तिगत बातचीत को विदेश मंत्रालय के रिकॉर्ड पर रखा जाए! विदेश सचिव सरकारके एक विभाग  अधिकारी  मात्र है प्रधानमंत्री की बात यदि विदेश मंत्री कहते केंद्रीय मंत्री परिषद की तरफ से कही जाती तो वह सरकार की बात होती तो ज्यादा असर कारक होती!

 अमेरिका में सिर्फ पाकिस्तान  के सेनापति को जिस तरह ग्लोरिफाई किया गया था लंच की डिप्लोमेसी से उसको न्यूट्रल करने के लिए यह नॉरेटिव घड़ा गया!

दरअसल श्रीमान ट्रंप ने फोन तो किया होगा लेकिन माय डियर फ्रेंड को फोन में उन्होने स्पष्ट रूप से अमेरिका आमंत्रित किया  था कि वह g7 समिट के बाद अमेरिका होते हुए भारत आए और जो  पाक सेनापति के साथ लंच था वह भारत के प्रधानमंत्री पाकिस्तान के सेनापति और अमेरिका के राष्ट्रपति एक साथ करें! 

इस डिप्लोमेसी की वजह थी एक तो ट्रंप यह स्थापित करना चाहते थे की मध्यस्थता उनकी वजह से हुई हुई है दूसरी पाकिस्तान के सेनापति ने उन्हें नोबेल पीस प्राइज के लिए नामांकित किया है अगर भारत के प्रधानमंत्री भी  वहां उपस्थित होते हैं तो शायद इस पीस प्राइज के लिए उनके प्रतिनिधित्व को ज्यादा मान्यता   मिलने के अवसर थे !

बीजेपी की आईटी सेल लगातार एक नॉरेटिव स्थापित करने की कोशिश कर रही है कि ईरान पर पाकिस्तान आक्रमण करें या ईरान पर अमेरिका जो आक्रमण करेगा उसमें पाकिस्तान के हवाई अड्डा का इस्तेमाल किया जा सके इसके लिए पाकिस्तान के सेनापति को बुलाया गया था! 

पाकिस्तान खुलकर ईरान के साथ है वह उसकी मजबूरी भी है क्योंकि उसे अरब देशों का साथ चाहिए और मुस्लिम कंट्री का भी! ईरान उसका स्वाभाविक दोस्त है और हर बार ईरान पाकिस्तान के साथ रहा है! 

जिओ पॉलिटिक्स की भी बात करें, तो चीन तुर्की जैसे देश जो खुलकर पाकिस्तान के साथ खड़े थे वह ईरान के समर्थन में है ऐसे में पाकिस्तान अमेरिका के दबाव में ईरान पर हमले की इजाजत दे दे इस नरेटीव में दम नहीं लगता!

दूसरा बीजेपी के दावों की पोल अमेरिका ने फिर खोल दी , जब विदेश सचिव के वक्तव्य के 24 घंटे के पहले ही राष्ट्रपति ट्रंप ने फिर एक बार बयान दिया कि भारत पाक युद्ध को न्यूक्लियर व्यवहार से बचने के लिए उनकी मध्यस्थ की बहुत बड़ी भूमिका थी!

और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है जिस फोन की बात की गई है , उसके संदर्भ में अमेरिका से किसी प्रकार की पुष्टि नहीं की गई है !

जब साहेब 35 मिनट तक लालआंख कर कर ट्रंप को धमका सकते हैं, तो क्या कारण है ट्रंप के एक बार फिर बयान देने के बाद प्रधानमंत्री भी खामोश है विदेश मंत्री भी और तथाकथित विशेषज्ञों के अनुसार भारत का सफलतम विदेश मंत्रालय भी!

अमेरिका की स्पष्ट डिप्लोमेसी है उसे साउथ एशिया में अपना अड्डों के लिए पाकिस्तान चाहिए और रूस की नाक में नकल डालने के लिए अफगानिस्तान में अपनी उपस्थिति दर्ज करने के लिए बलूचिस्तान में अपनी मनमानी चाहिए! पाक अमेरिका को क्यों प्रिय है , क्योंकि वह अमेरिका के बि हाफ पर ही आतंकवादी गतिविधियों को मॉनिटर करता है! 

चीन के लिए पाकिस्तान व्यापारिक मजबूरी है क्योंकि पाकिस्तान से होकर उसके ट्रेड का एक बहुत बड़ा रास्ता गुजरता है और पाकिस्तान में लगभग सरेंडर की मुद्रा में उसे चीन को सौंप रखा है!

अमेरिका जानता है भारत और चीन के बीच में बहुत सारे विवाद है इसलिए हथियारों की होड़ में चीन भारत को मदद नहीं करेगा और रूस यूक्रेन युद्ध में उलझा  होने के कारण वैसे ही निर्माण क्षमता में बहुत पीछे हो गया है ऐसे में अमेरिका ही एकमात्र ऐसा प्रतिद्वंदी है जिसे भारत में बाजार के अवसर प्राप्त हो सकते हैं भारत एक बहुत बड़ा उपभोक्ता बाजार है और हथियारों के बाजार के लिए एक उपयुक्त ग्राहक! इसलिए अमेरिका की नीति भारत को बैलेंस करने की भी है!

भाजपा का थिंक टैंक इस वक्त घबराया हुआ है, क्योंकि जिस तरह इन दिनों मोदी जी की वैश्विक छवि को डेंट लगा है विश्व गुरु की छवि आहत हुई है और सीज फायर करने के बाद , फिर ट्रंप के आगे घुटने देखने के बाद और सबसे बड़ी बात तो यह है पहलगाम और पुलवामा का आतंकवादियों पर साहेब के मुंह से एक शब्द तक नहीं निकलता! इन सब बातों ने उनके परसेप्शन की हवा निकाल दी है और बुरी तरह बेचैनी महसूस करती हुई उनके आई टी सेल इस तरह रोज नए-नए झूठ नरेटिव गढ़कर सोशल मीडिया और गोदी मीडिया के माध्यम से उस आभामंडल को बचाए रखने की कोशिश कर रही है!(साभार)

शुक्रवार, 23 मई 2025

स्वाभिमान और सिंदूर…

 स्वाभिमान और सिंदूर…


अमेरिका की दादागिरी किसी से छिपा नहीं है और ट्रंप ने दोबारा सत्ता सँभालते ही जिस तरह से अति मचाना शुरू किया है, उसके आगे मोदी सत्ता की चुप्पी भी कम हैरान करने वाली नहीं है

ऐसा शायद इतिहास में पहली बार हो रहा है कि ट्रंप की दादागिरी पर भारत ख़ामोश है और वह भारत की खामोशी का फ़ायदा उठाकर देश की बेइज्जति करने आमादा है

भारतीयों को हथकड़ी लगाने वाली बात को जायज़ ठहराने वाले शायद भारत-पाक के बीच सीजफ़ायर वाले ट्रंप के फ़ैसले को भी अपनी कुतर्कों से जायज़ ठहरा दे ?

लेकिन सवाल तब उठता है जब ट्रंप की दादागिरी पर चीन और फ़्रांस के नेता माकूल जवाब देकर ट्रंप को घुटने में ले आते है लेकिन मोदी सत्ता अब भी ख़ामोश है 

और अब तो साउथ अफ़्रीका जैसे देश भी ट्रंप को जवाब देने लग गये तब जो  फ़ेसबुक में चल रहा है… या सोशल मीडिया में सुर्ख़ी बटोरने वाले इन सवालों को समझे…

*दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति का स्वाभिमान और हमारे प्रधानमंत्री जी की रगों में दौड़ता सिंदूर*


★ कल "व्हाइट हाउस" में अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प और साउथ अफ़्रीक़ा के राष्ट्रपति रामाफोसा के बीच "जेलेन्सकी" वाली 'जूतम पैजार' हो गई..


★ ट्रंप Tv स्क्रीन लगा कर पूरी तैयारी के साथ बैठा था ताकि साउथ अफ़्रीक़ा के राष्ट्रपति की बे-'इज़्ज़ती की जाए..


★ ट्रंप ने रामाफोसा को साउथ अफ़्रीक़ा के कुछ VDO दिखाते हुए बोला कि तुम्हारे देश में काले लोग गोरों का क़त्ल कर रहे हैं..ट्रंप का ऐसा कहना ग़लत था


★ राष्ट्रपति रामाफोसा ने बोला कि VDO फ़र्ज़ी है..बल्कि साउथ अफ़्रीक़ा में काले लोगों का ही क़त्ल हुआ है..ट्रम्प को झूटा बोल दिया😃


◆ राष्ट्रपति रामाफोसा ने ट्रम्प को बोला कि मेरे पास आप को देने के लिए 3200 करोड़ का हवाई जहाज़ नहीं है..


◆ क़तर ने ट्रम्प को 3200 करोड़ का हवाई जहाज़ दिया था, यह उस पर तंज़ था🤣


◆ ट्रम्प एक बार सकपका गया था..संभलते हुए ट्रम्प ने राष्ट्रपति रामाफोसा को कहा कि अगर आप 3200 करोड़ का हवाई जहाज़ देंगे तो अमरीका क़ुबूल करेगा🔔🔔🔔


👉 राष्ट्रपति रामाफोसा साहब, हम भारतवासी आप को सलाम करते हैं..क्योंकि ट्रम्प जैसे बदतमीज़ को आप ने सही सबक़ सिखाया..


👉 राष्ट्रपति रामाफोसा साहब, आप ने अपने देश की 'इज़्ज़त, ग़ैरत और आज़ादी का समझौता नहीं किया


✋ भक्तों एक भारत के PM मोदी जी हैं ट्रम्प रोज़ मोदी जी को ज़लील करता है..पर मोदी जी के मुंह से एक लफ़्ज़ नहीं निकलता है..


👉 ख़ून में ख़ुद दारी दौड़नी चाहिए  ख़ून में सिंदूर नहीं दौड़ता... और हां व्यापार भी नहीं दौड़ना चाहिए;;;;;



मंगलवार, 13 मई 2025

युद्ध से भी बड़ा ज़हर…

 युद्ध से भी बड़ा ज़हर…


इसी ज़हर के भरोसे आरएसएस अपनी राजनीति साधते रही है , यह बात हर मंच से उठते रहा है 

क्या है वह ज़हर…

कहते है इंसान की फ़ितरत नहीं बदलती, और जब अमेरिका के सीजफ़ायर की घोषणा से बौखलाए नफ़रती चिंटुओं ने जब कर्नल सौफ़िया पर विषवमन शुरू किया तो इस खेल में बीजेपी के मंत्री विजय शाह ही नहीं पूरी बीजेपी एक्सपोज़ हो गई, क्या विजय शाह को हटाया जाएगा, 

लेकिन शुरुआत तो शिवांगी नरवाल और विदेश सचिव विक्रम मिस्सी से हो चुकी थी 

इन सभी को गाली देने वाले एक ही थे, 

शालीनता की हर सीमा लांघने में तत्पर ये लोग कुछ भी कर सकते हैं 

यक़ीन मानिए ये लोग आतंकवादियों से भी ख़तरनाक है…

लेकिन आज हम एक और मुद्दा उठाना चाहते है , आख़िर आतंक के ख़िलाफ़ इस लड़ाई में भारत अकेले क्यों पड़ गया, जबकि पूरा विश्व आतंक के ख़िलाफ़ है

कूटनीति फेल क्यों हो गई जबकि प्रधानमंत्री मोदी सौ देश घूम आए है

क्या इसकी वजह सिर्फ़ अदाणी है 

क्या है हमारे दूसरे देशों से रिश्ते…

भारत आज विश्व में अकेला है।

और ये किसी युद्ध की वजह से नहीं —

बल्कि “नफरती चिंटू” गैंग की वजह से है कहा जाय तो ग़लत नहीं होगा..


11 साल की विदेश नीति देखने के बाद इतना तो कोई भी समझ सकता है —इन नफ़रती चिंटू गैंग ने हमारी कूटनीति का बहुत नुकसान किया है


पहले पड़ोसी देशों को देखिए:


● मालदीव — जहाँ “इंडिया फर्स्ट” था, अब “इंडिया आउट” है। लक्षद्वीप विवाद में “नफरती चिंटू गैंग” ने ट्रोलिंग से देश की छवि डुबो दी। चीन ने मौक़ा देख लिया।


● बांग्लादेश — जिसे आज़ादी दिलाई, उसे हर चुनाव में “घुसपैठिया” कहा गया। CAA-NRC ने रिश्ते जला डाले। सीमा पर गोलीबारी है, ढाका खामोश है।


● श्रीलंका — जब ज़रूरत थी, भारत पीछे रहा। चीन ने बंदरगाह खरीद लिया। “नफरती चिंटू” तमिल भावनाओं की बात तो करता रहा, ज़मीनी मदद नहीं दी।


● नेपाल — 2015 की नाकाबंदी, फिर रामजन्मभूमि की राजनीति। आज हमारी ज़मीन उसके नक्शे में है — नफरती चिंटू उसे हिंदू राष्ट्र बनाना चाहता है और दिल्ली चुप है।


● भूटान — जो कभी सबसे करीबी था, अब कहता है — "भारत अब दोस्त नहीं, दबाव है।"


● म्यांमार — सेना ने लोकतंत्र कुचला, भारत ने चुप्पी साध ली। नफरती चिंटू गैंग रोहिंग्या पर नफ़रत फैलाकर नैतिक धरातल भी गंवा दिया।


और ग्लोबल मंच पर?


● रूस — शीतयुद्ध का साथी अब चीन के साथ है। भारत बस तेल का ग्राहक बन गया।


● अमेरिका — हथियारों की डीलें हैं, लेकिन लोकतंत्र और प्रेस फ्रीडम पर वहाँ बार-बार भारत को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है।


● फ्रांस — राफेल के बाद भी भारत की गिरती रैंकिंग और मुसलमानों के प्रति घृणा को लेकर चिंता ज़ाहिर कर चुका है।


● ईरान — भारत का कभी विरोध नहीं किया ,  “नफरती चिंटू” ने इस्लाम को गाली दी और चाबहार पोर्ट से भारत हटा, चीन आ गया। 


● मलेशिया-इंडोनेशिया — मुस्लिम विरोधी नैरेटिव ने वर्षों पुराने सांस्कृतिक रिश्तों को भी तोड़ दिया।


● फिलिस्तीन — भारत दशकों तक साथ था। अब सरकार इज़रायल के साथ हथियारों में व्यस्त है, जनता अकेली खड़ी है।


दरअसल दुनिया दोस्ती, भरोसे और स्थिरता की भाषा समझती है।





सोमवार, 12 मई 2025

मोदी के राष्ट्र के नाम संदेश के बाद…

 मोदी के राष्ट्र के नाम संदेश के बाद…


देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश में एक बार फिर साफ़ किया कि पानी और खून साथ नहीं बह सकते, मुँह तोड़ जवाब दिया जाएगा, 

एक बार हमने इसलिए कहा कि यही बात पुलवामा के बाद और फिर पहलगाम के बाद बिहार में वे कह चुके थे

उन्होंने प्रधानमंत्री बनने से पहले रजत शर्मा को एक टीवी प्रोग्राम में क्या कहा उसे याद करने की ज़रूरत इसलिए नहीं है क्योंकि पीएम बनने के पहले की सारी बातें ऐसी ही वे करते रहे हैं

तब सवाल अब की बातों का है, सिजफ़ायर ने एक ही झटके में सब बदल दिया।

ट्रंप पर भी भरोसा न करें, तब किस पर?

ऑपरेशन का नाम चयन की सोच…

अब जब अमेरिका बीच में आ ही गया है और पीएम ने राष्ट्र के नाम संबोधन कर ही दिया है तब क्या इस पूरे प्रकरण की विवेचना अपने अपने ढंग से करने की छूट नहीं होनी चाहिए..

प्रमोद जैन लिखते हैं…

किसी भी प्रकरण की सफलता उसके परिणाम से आकी जाती है!

भले गेंद पूरे टाइम आपके पाले में रही, पर आखिरी मिनट में यदि पेनल्टी कॉर्नर पर सामने वाली टीम में आप पर गोल कर दिया,

तो आप जीता हुआ नहीं कह लाओगे!

पहलगाम के बाद कुछ नकारात्मक पहलू जो जनता को परेशान कर रहे हैं! 


1_सीजफायर यदि भारत की शर्तों पर हुआ है तो क्या भारत को पहलगाम और पुलवामा के आतंकवादियों के संदर्भ में अपनी बात नहीं रखनी चाहिए थी?

 और जो खुखार  आतंकवादी हैं उन्हें गिरफ्तार कर भारत में क्यों नहीं लाया गया? 


2_सीजफायर की घोषणा अमेरिका से करवा कर किसी तीसरे देश को भारत और पाकिस्तान के बीच में क्यों महत्व दिया गया? 


3_क्या भारत की विदेश नीति एक्सपोज नहीं हुई, ?


चीन ने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया अमेरिका पर्दे के पीछे पाकिस्तान के साथ गल बहियां करता रहा, और रूस तटस्थ, ना यूरोपीय देशों का समर्थन मिला युद्ध के संदर्भ में ना नाटो के मुस्लिम देश भारत के साथ खड़े हुए ना कोई पड़ोसी मुल्क!


4_और तो और बीएसएफ का एक जवान जो अभी पाकिस्तान के अभिरक्षा में है उसे तक भारत सरकार ने वापस नहीं लिया!


5_हिंदुस्तान के भांड मीडिया ने इतना झूठ क्यों बोला? और भारत की रणनीति को कमजोर क्यों किया?


 इसके बावजूद सरकार द्वारा उन पर कोई प्रतिबंध नहीं लिया गया! 


6_ट्विटर अकाउंट पर सेना के प्रवक्ता विपिन मिस्त्री को गालियां देकर, और पहलगाम के शहीद की पत्नी हिमांशी को जलील कर आखिर हिंदुस्तान के इन तथाकथित भक्तों ने कौन से संस्कारों का परिचय दिया?


7_अमेरिका और चीन कश्मीर के मुद्दे का अंतरराष्ट्रीय करण करने की कोशिश कर रहे हैं, भारत सरकार ने यदि उचित  स्टेप नहीं लिए तो यह भारत के लिए बेहद तकलीफ भरा कार्य रहेगा और इसे लेकर भी देश की जनता बहुत चिंतित है!


8_जिस परमाणु युद्ध की विभीषका का डर दिखाकर यह तथाकथित सीज फायर किया गया है तो क्या भारत को इसका पूर्वानुमान नहीं था?

 यानी यह खुफिया तंत्र कीविफलता है !


9_जिस तरह राफेल के लिए फ्रांस में तकनीक देने से मना किया है और जिस तरह राफेल को लेकर बहुत सारी कंट्रोवर्सी है उसके बाद क्या सरकार का चेहरा नंगा नहीं हुआ है कि उन्होंने भ्रष्टाचार के चलते  देश की सुरक्षा से समझौता किया है?


10_56 इंची सीने का दावा करने वाले मोदी जी स्थितियों का सामना क्यों नहीं कर पाते ?


ना तो आल पार्टी  मीटिंग में आए, न युद्ध विराम की घोषणा की, ना संसद का विशेष सत्र बुलाने की हिम्मत कर पा रहे हैं! 


11,_क्या सीज फायर के बाद पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद की गतिविधियां रुक जाएंगे और क्या अमेरिका की बात पर पाकिस्तान पर भरोसा किया जा सकता है?


12_अग्नि वीर योजना पर भारत के सेना अध्यक्षों ने  जो निराशा जाहिर की है , क्या उसके बाद सरकार एक बार फिर बैक फुट पर आएगी इस योजना केसंदर्भ में?

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लेकिन इन नकारात्मक पहलुओं में भी कुछ  सकारात्मक बातें भी थी, जिसे जनता ने स्वागत किया है! 


1_आतंकवादी गतिविधियों पर पहली बार सीधे पाकिस्तान पर आक्रमण कर भारत सरकार ने यह तो जाहिर किया है इन आतंकवादी घटनाओं के खिलाफ उनकी नीति जीरो टॉलरेंस की रहेगी!


 अगर भविष्य में सरकार चुनाव के समय ही अपने इस नीति पर काम करेगीतो लोग इसे इवेंट या स्टंट मान ने पर मजबूर होंगे!

पर अभी लोग सेना की वजह से इस पर विश्वास कर रहे हैं!


2_जिस तरह पूरे देश ने तमाम राजनीतिक दलों ने सरकार के और सेना के प्रति समर्थन जाहिर किया वह निश्चित रूप से इस देश की एकता और अखंडता की गारंटी था! 


3_भारतीय सेना ने अद्भुत पराक्रम दिखलाया और भारत की युद्ध क्षमता को सबके सामने जाहिर किया और जो हौसला सेना ने दिखाया वह देश के लिए एक सकारात्मक पहलू था!


4_सेना ने आतंकवादीअड्डे , ध्वस्त किए, टारगेटेड अटैक किया, एयर बेस और एयर डिफेंस नष्ट की और अपने नए दौर के युद्ध कौशल का परिचय दिया!


5_ पहलगाम की घटना के बाद जिस तरह घाटी में बंद रहा कश्मीर में बंद रहा, भारत की तमाम मस्जिदों से उस घटना का विरोध किया, धर्म पूछ जात नहीं इस नॉरेटिव को जिस तरह हिंदुस्तान की जनता ने मुंह तोड़ जवाब देकर भारत के आंतरिक  एकता का परिचय दिया वह भी इस घटना का एक सकारात्मक पहलू था!


6_जिस तरह यह कहा गया है की आतंकवादी हमले को सीधा युद्ध समझ जाएगा अगर यह जुमला साबित नहीं हुआ और भारत सरकार  मजबूती से इस रणनीति  पर खड़ी पाई गई तो यह भी एक बहुत बड़ा सकारात्मक पहलू रहेगा आतंकवाद को खत्म करने के लिए!

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दोनों पक्षों के अपने बचाव है अपने-अपने तथ्य है लेकिन जो एक भावनात्मक सैलाब भारत की जनता में बह रहा था pok के संदर्भ में बलूचिस्तान के संदर्भ में और आतंकवादियों को गिरफ्तार करने के संदर्भ में पाकिस्तान के टुकड़े करने के संदर्भ में उस झटका लगा है और इसलिए भी लगा मोदी जी की छवि को मीडिया ने आईटी सेल ने और एक राजनीतिक विचारधारा के लोगों ने इतना ओवररेटेड कर दिया था कि लोगों की आशाएं बहुत ज्यादा थी!

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और निष्कर्ष के रूप में हम यही मान सकते हैं सेना एक बार फिर भारत के लिए गौरव का विषय बनी है और सरकार की नीतियां आलोचना का! 

लेकिन जाते-जाते राहुल गांधी की भूमिका पर भी थोड़ा सा विचार कर ले उसने अग्नि वीर का विरोध किया  और सेना के साथ खड़ा हो गया, राहुल गांधी की सारी बातें सही क्यों निकलती है ?

 और अंत में…

पुलवामा और पहलगाम पर विपक्ष के आरोपों का जवाब नहीं दिया गया है!


रविवार, 11 मई 2025

अब इनकी भी सुन लो…

 अब इनकी भी सुन लो…



भारत और पाकिस्तान के बीच अप्रत्याशित सीजफायर ने कई लोगों को चौंका दिया है. सरकार के इस फैसले पर मशहूर जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट ब्रह्मा चेलानी और पूर्व सेनाध्यक्ष  जनरल वीपी मलिक ने भी सवाल उठाए हैं. 


               चेलानी ने कहा भारत जीत की दहलीज पर था, लेकिन अंत में मन मसोस कर रह गया. युद्धविराम पर नाराजगी जाहिर करते हुए उन्होंने कहा कि भारत इतिहास से सीखने में विफल रहा है. सिर्फ पिछली रणनीतिक गलतियों को दोहरा रहा है. सैन्य गतिविधि भारत के पक्ष में थी. पाकिस्तान की हवाई सुरक्षा भारत की अपेक्षा से कहीं अधिक कमजोर साबित हुई. वे भारत में बहुत सारे ड्रोन और मिसाइल भेज रहे थे, लेकिन प्रभावी रूप से नहीं. दूसरी ओर भारत ने सीमित संख्या में मिसाइल और ड्रोन भेजे और अपने लक्ष्यों को भेदने में सक्षम रहा.'


              ब्रम्हा चेलानी ने सैन्य रूप से स्पष्ट बढ़त रखने के बावजूद भारत के तनाव कम करने के निर्णय के पीछे के तर्क पर सवाल उठाया. उन्होंने कहा, 'यह जीत के मुंह से हार छीनने की भारत की पुरानी राजनीतिक स्थिति को रेखांकित करता है.' उन्होंने आश्चर्य होते हुए कहा कि भारत ने तनाव कम करने का फैसला क्यों किया.


             चेलानी ने मौजूदा स्थिति की तुलना पिछले उदाहरणों से की, जहां उनके विचार में, भारत ने स्थायी रणनीतिक लाभ हासिल किए बिना सैन्य या कूटनीतिक लाभ को आत्मसमर्पण कर दिया.  2021 में हमने रणनीतिक कैलाश हाइट्स को खाली कर दिया, बातचीत में अपनी एकमात्र सौदेबाजी चिप को खो दिया और फिर हम लद्दाख क्षेत्रों में चीनी-डिजाइन किए गए बफर जोन और अब ऑपरेशन सिंदूर पर सहमत हुए.'


            चेलानी ने कहा, 'ऑपरेशन सिंदूर में 26 हत्याओं का बदला लेने का एक शक्तिशाली प्रतीक था और फिर भी आज जिस तरह से हमने पाकिस्तान द्वारा दिल्ली पर मिसाइल दागे जाने के बाद इस ऑपरेशन को समाप्त किया, उससे कई सवालों के जवाब नहीं मिले.' चेलानी ने कहा, 'इतिहास आज भारत के निर्णय को अच्छी तरह से नहीं देखेगा.'


         उन्होंने 'ऑपरेशन सिंदूर' के समापन को रणनीतिक और प्रतीकात्मक चूक बताया, जो जवाब से अधिक सवाल उठाती है.


        करगिल युद्ध के नायक  तत्कालीन सेनाध्यक्ष रहे जनरल वीपी मलिक सीजफायर के ऐलान के बाद कहा - '22 अप्रैल को पहलगाम में हुए भयावह पाकिस्तानी आतंकी हमले के बाद भारत ने सैन्य और असैन्य कार्रवाइयालेकि, लेकिन इनसे कोई राजनीतिक या रणनीतिक लाभ मिला भी या नहीं- यह सवाल हमने भविष्य के इतिहास पर छोड़ दिया है।'

यह सच भी जान लें

परमाणु अप्रसार संधि 1970 में लागू की गई थी भारत ने इसे भेदभाव पूर्ण करार दिया और संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए थे ।

जिसकी वजह से आज भारत के पास अपनी आत्मरक्षा के लिए परमाणु हथियार है । कितना दबाव था जब 1971 में युद्ध दो मोर्चा पर भारत की सेना लड़ रही थी ।

आज भी 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान के आतंकवादी समर्थक ठिकानों पर सेना ने हमले करके । पाकिस्तान और आतंकवाद को मुंहतोड़ जवाब दिया है सेना के शौर्य पर कोई सवाल नहीं है। 

लेकिन युद्ध विराम करना था तो पाकिस्तान पर जोरदार प्रहार के बाद करते। 

भारतीय सेना मजबूत स्थिति में थी तो राजनीतिक नेतृत्व क्यों युद्ध विराम के लिए जल्दबाजी में राजी हो गया, जबकि हमले की शुरुआत पाकिस्तान ने की थी । यही हमारा सबसे मजबूत पक्ष था । हमारे लोग मारे गए थे ।

इसके विपरीत शिमला समझौते की शर्तों को तोड़ने में पाकिस्तान कामयाब रहा क्योंकि तीसरे की मध्यस्ता के बिना द्विपक्षीय समझौते से कश्मीर समस्या को हल करना था ये शर्ते भारत ने लगाई थी और पाकिस्तान इस शर्त को तोड़कर इसमें तीसरे अमरीका की घुसपैठ करवाना चाहता था ताकि भारत पर  दबाव  बनाया जाए।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस चालाकी को समझा और दोनों पाकिस्तान और अमेरिका को कड़ा जवाब दिया था । आज  प्रधानमंत्री मोदी ने इस समझौते में अमेरिका को जवाब देने के बजाय तीसरे पक्ष को न जाने किस दबाव में स्वीकार किया है । शायद भविष्य में गोदी मीडिया इसका खुलासा कर पाए ।

लेकिन इस सब से हटकर देश के मीडिया संस्थान की खबर देखिए तो 22 अप्रैल के बाद फर्जी खबरों की बाढ़ सी चली है । फिर से वही सत्तासीन नेताओं के बचाव के लिए झूठे प्रोपेगैंडा की स्क्रिप्ट लिख दी गई है । उसे फैलाने का काम मंडली पूरे जोर से लग चुकी है ।

यह सवाल पूछने के बजाय कि युद्धविराम भी कुछ शर्तों पे किया जाता की

_पहलगाम हमले के 

हमलावरों की भारत को सौंप दिया जाए

सीमावर्ती इलाकों में भारत के खिलाफ कोई आतंकवादी घटना न हो इसके लिए सुरक्षात्मक उपाय तकनीक के इस्तेमाल की शर्त लगाई जा सकती थी

पाकिस्तान अंतराष्ट्रीय मदद 

का इस्तेमाल भारत के खिलाफ करता है उस विषय पर अंतराष्ट्रीय समर्थन हासिल कर पाकिस्तान को मिलने वाली आर्थिक मदद में रोक लगाई जा सकती थी ।

पाकिस्तान की सेना ही आतंकवाद की समर्थक है इस विषय को वैश्विक मंच पर रखकर पाकिस्तान समर्थित आतंक पर लगाम लगाई जा सकती थी

इन शर्तों पर युद्ध विराम होता तो भी भारत का मजबूत पक्ष वैश्विक स्तर पर उभर कर आता

 लेकिन ऐसा नहीं हुआ और यही बहुत चिंता की बात है ।

अमेरिका ने अपने व्यापारिक हित को महत्व दिया , पाकिस्तान शिमला समझौते की शर्त जिसमें की द्विपक्षीय वार्ता की शर्त भारत की थी उसको तोड़ कर अमेरिकी दबाव से युद्ध विराम अपने पक्ष में  करता दिखता है ।

लेकिन हमें क्या हासिल हुआ, गोदी मीडिया का झूठ, फर्जी खबरें बस यही परिणीति है क्या 140 करोड़ देशवासियों की, भारत बहुत सी आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक चुनौतियों से जूझ रहा है ।

लेकिन पाकिस्तान की तरह भिखमंगिरी भारत ने नहीं की है। भारत अपने दम पर आजाद हुआ और तमाम मुश्किलों के बावजूद आज एक मजबूत राष्ट्र बन कर खड़ा है तमाम अवरोधों, स्वार्थी राजनीति, के बावजूद 140 करोड़ भारत 

वासी स्वार्थी राजनीति और आतंकवाद से आज, कल और भविष्य मे भी टकराने को  तैयार है ।

रविवार, 15 सितंबर 2024

अमेरिका क्यों ताकतवर है...

 अमेरिका क्यों ताकतवर है...


यह बेहद कठिन सवाल है लेकिन इसका जवाब इन दिनों कुछ ऐसे दिया जा रहा है कि अमेरिका के लोग बेहद सजग है

उन्हें जैसे ही पता चला कि उनका राष्ट्र‌पति सठिया गया है, उस पर उम्र हावी होने लगी है वे आयँ-बायं-सायं बोलने लगा है।

तत्काल राष्ट्रपति जो बाइडन की पार्टी ने राष्ट्र‌पति के निर्णय लेने के अधिकारों को सीमित करते हुए बड़े और कड़े फैसले के लिए केद्रीय केबिनेट को अधिकृत कर दिया। इतना ही नहीं जो बाइडन को बीच चुनाव में उम्मीदवारी से हटा कर उप राष्ट्रपति कमला हैरिस को उम्मीदवार बना दिया।

क्योंकि अमेरिकन जानते है कि देश बतौलेबाजी से नहीं चलता...!

रविवार, 18 अप्रैल 2021

जन की बात-२

 

न समय रुक रहा था, न करोनो का कहर ही रुक था। हां सत्ता का चरित्र पल-पल बदल रहा था । अपनी जिम्मेदारी और दायित्व से मुंह मोड़ते सत्ता की जब आलोचना बढऩे लगी तो वह तमाम विरोधी दलों से सुझाव का आबंडर करने लगी, दरबारी मीडिया को सरकार की प्रशंसा में लगा दिया और इस महामारी के बढ़ते प्रकोप के लिए जन मानस को ही जिम्मेदार ठहराया जाने लगा।

जबकि हकीकत यही है कि सत्ता ने इस महामारी के कम होते प्रभाव को लेकर घोर लापरवाही बरती। जिसकी वजह से जब कोरोना का दूसरा लहरा आया तो अस्पताल, दवाई, चिकित्सकों की अनदेखी का पोल खुल गया। विश्व के दूसरे संस्थानों से मिले 50 हजार करोड़ के अलावा पीएम केयर फंड के पैसों का समुचित उपयोग नहीं किया गया जिसकी वजह से चिकित्सा सुविधा बदहाल की बदहाल रही।

जिस तरह से निजी अस्पतालों ने अपदा को अवसर में तब्दिल किया उस पर भी सत्ता की अनदेखी रही। दवाई, आक्सीजन के बगैर दम तोड़ती जिन्दगी के बीच भी कुंभ के आयोजन की अनुमति और चुनौती रैलियों में हजारों की भीड़ जुटाई गई। मोदी सत्ता को सिर्फ और सिर्फ यश चाहिए। जनता की आंखों में, मन में सत्ता प्रमुख का चरित्र खंडित नहीं होना चाहिए। नफरत-झूठ-अफवाह के चलाये शब्द बाण को धर्म और राष्ट्रवाद की चाशनी में परोसने की जिम्मेदारी दरबारी मीडिया की थी। धर्म और राष्ट्रप्रेम का ऐसा आबंडर किसने देखा था। नफरत का वेग इस कदर हावी था कि प्रधानमंत्री जैसा शख्स हर गांव में कब्रिस्तान के मुकाबले श्मशान खड़ा करना चाहता था। (फतेहपुर की जनसभा)

शायद राजा की ईच्छा ईश्वर ने पूरी कर दी थी? हर जगह से जलती चिता के ताप लोग उद्देलित थे, दुखी थे, लेकिन अब भी दरबारी मीडिया सत्ता के महिमा मंडन में लगी थी। कल तक मरकज को कोरोना फैलाने की वजह बताने वाली मीडिया कुंभ और चुनावी रैली पर मौन साध रखा था। मीडिया ने मौन तो एनआरसी और किसान आंदोलन पर भी साध रखा था। लोकतंत्र में सत्ता और मीडिया का सुख किसी अभिशाप की तरह है, जो व्यक्ति को दूसरों की व्यथा की ओर से अंधा कर देता है। मीडिया और सत्ता जितने साधारण होगे लोगों की व्यथा उतनी ही स्पष्ट दिखाई देती है, लेकिन जब सत्ता अपनी रईसी बचाने में व्यस्त हो जाये और मीडिया को रुतबा और पैसों की भूख हो तो जनमानस यूं ही लाशों में तब्दिल होता रहेगा।

हैरानी तो तब होती है जब कोई कहता है मैंने गरीबी देखी है, अभाव में जिया है और सत्ता आते ही सबसे पहले अपने सुख सुविधा के इंतजाम में उन वर्गों की अनदेखी करता है जो उपेक्षित हैं या जिन्हें सरकार के संरक्षण की ज्यादा जरूरत है। हैरानी तब और अधिक होती है जब  वह पूंजीपतियों की गोद में बैठकर, पूंजीपतियों के अनुरुप कानून बनाता है। कितने उदाहरण है जो सत्ता के प्रति घृणा उत्पन्न करती है, नोटबंदी की लाईन में मरते लोग, जीएसटी की चक्रव्यूह में आत्महत्या करते व्यापारी, मॉब लिचिंग और बलात्कार के आरोपियों की जयकारा और दूसरी पार्टियों के भ्रष्टाचारियों को संरक्षण, किसान आंदोलन से मरते किसान के बाद भी किसी सत्ता में करुणा न जगे तो इसका क्या मतलब है। अनेक अवसर में सत्ता ने अपनी मनमानी और प्रभाव का इस्तेमाल कर अपने अहंकार को बढ़ाया है। राफेल का मामला हो या तरुण गोगाई सहित कई नियुक्तियां? लेकिन सत्ता ने धर्म और राष्ट्रवाद का जो भ्रम फैलाया है, उससे जनमानस भ्रमित है और अपना हित नहीं देख पा रही है। (जारी...)

सोमवार, 12 अप्रैल 2021

सातवां बेड़ा...

 

अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में विदेशी  हस्तक्षेप को लेकर बाइडन ने साफ कह दिया था कि इसकी प्रतिक्रिया मिलेगी ! तब किसने सोचा था कि अमेरिका का निशाना सिर्फ रूस नहीं भारत भी होगा।

भारत के मामले में बिना चुनौती के इस तरह से सातवें बेड़े के भारतीय ईईंजेड में प्रवेश क्या अबकी बार ट्रम्प सरकार की प्रतिक्रिया है। अपने जहाज को भारत की सीमा में प्रवेश कराकर जिस तरह से प्रेस नोट जारी किया गया है वह पूरी दुनिया को जानकारी देना ही नहीं भारत की फजीहत करना भी है।

भारतीय विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया ये बता रही है कि ऐसा हुआ है। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में लिखा है कि यूएन कन्वेशन के तहत कोई भी देश, किसी दूसरे देश की ईईजेड में देश की अनुमति के बिना हथियार और साजो समान से लदे फ्लीट के साथ प्रवेश नहीं कर सकता। यदि जहाज में व्यापारिक वस्तएं है तो अनुमति की जरूरत नहीं।

हालांकि अमेरिका इसे अधिकार और आजादी का इस्तेमाल करने का दावा कर रही है और इसे फ्रीडम ऑफ नेविगेशन ऑपरेशन बता रही है और यह भी कहा है कि भारत के समुन्दर को लेकर किये जा रहे दावे को वह नहीं मानते और आगे भी ऐसा करते रहेंगे।

यह एक तरह से भारतीय संप्रभुता को खुलकर चुनौती है लेकिन इस मामले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चुप्पी हैरान कर देने वाला है। सांतवा बेड़ा नाम सुनकर 1971 जेहन में आने लगता है। तब पाकिस्तान पर हमला करने पर अमेरिका के द्वारा धमकी दी जा रही थी वो सातवां बेड़ा भेजेंगे। और अमेरिका ने हिन्द महासागर में सातवां बेड़ा उतार भी दिया लेकिन तब इस देश की लौह महिला ने अमेरिका को आंख दिखाकर न केवल सांतवा बेड़ा को लौटने मजबूर कर दिया था बल्कि पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिये थे।

अमेरिका द्वारा किये गये इस सार्वजनिक फजिहत से पहले पाठकों को यह जान लेना चाहिए कि इंदिरा गांधी उसी जवाहर लाल नेहरु की बेटी और राहुल गांधी की दादी है जिन पर परिवारवाद का आरोप जड़ा जाता है और 70 साल में कुछ नहीं किया का दावा किया जाता है। हैरानी तो यह है कि 70 साल में कुछ नहीं करने का दावा वे लोग भी समर्थन करते हैं जो सायकल से कार में पहुंच गए?

खैर राजनीति में झूठ नफरत और अफवाह ही जिनकी सोच हो उनके बारे में ज्यादा क्या कहा जाए? जिस तरह से झूठ और नफरत की दीवार खड़ी हुई है उसी तरह से ये गिर भी जायेगी? लेकिन तब देर न हो जाए।

ऐसे में यदि चीन के बाद दूर बैठे अमेरिका भी यदि भारतीय संप्रभुता को चुनौती देने लगे तो इसका करार जवाब दिया जाना चाहिए क्योंकि अमेरिका हर चुप्पी को कमजोरी समझता है तब अमेरिका यह भी जान ले कि कमजोर देश नहीं सत्ता  हो सकता है!

शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

कट्टरपंथियों की जमात...


 

अमेरिका में ट्रम्प समर्थकों ने जिस तरह से हिंसक वारदात की है, उससे कई सवाल खड़े हो गये हैं। भारतीय परिपेक्ष्य में भी इसे सोचने समझने की जरूरत है क्योंकि भारत में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो ट्रम्प की सत्ता के समर्थक रहे हैं और आज भी उन्हें भारत का मित्र साबित करने में लगे रहते हैं।

दरअसल कट्टरपंथियों की सत्ता का पूरी दुनिया में यही हाल है। जहां लड़ाई श्रेष्ठता की हो वहां यह सब होना लाजिमी है। दूसरी विचारधारा को खत्म करने की मंशा ही सच से मुंह फेरना है।

हाल के वर्षों में जिस तरह से नफरत की राजनीति की शुरुआत हुई है उससे भारतीय जनमास को झिकझोर कर रख दिया है। सामाजिक ताना बाना पर भी इसका दुष्प्रभाव देखा जा रहा है। सत्ता के लिए नफरत की राजनीति कट्टरपंथियों का हथियार हैं और वे नफरत फैलाने के लिए जिस तरह से झूठ भ्रम और अफवाह फैलाते हैं उससे समाज में हिंसा बढ़ती है।

अमेरिका में जो कुछ हुआ वह अचानक नहीं हुआ क्योंकि लोकतंत्र में कट्टरता की उम्र लंबी नहीं होती। यह बात भारत के भी उन कट्टरपंथियों को समझ लेना चाहिए जो सत्ता के लिए झूठ अफवाह और भ्रम का सहारा लेने से पीछे नहीं हटते। इससे न केवल सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो रहा है बल्कि इसका असर आर्थिक स्थिति पर भी पड़ रहा है।

मैं  आज भी हैरान हो जाता हूं कि जो धर्म या समाज अपने को श्रेष्ठ साबित करने में कट्टर हैं उन धर्म और समाज की खुद की स्थिति शर्मनाक है। अनेक जातियों और फिरकों में बंटे लोग जब स्वयं की एका की बात करते हैं लेकिन मौका आने पर अपनी जाति को सर्वश्रेष्ठ बताने हिंसा पर उतारू हो जाते हैं।

ये लोग अपनी श्रेष्ठता साबित करने जिस तरह से दूसरे पक्ष के इतिहास को उधेड़ते हैं वे लोग भूल जाते हैं कि उनके अपने इतिहास में भी उससे दुष्ट लोगों की कमी नहीं है लेकिन सत्ता के लिए वे इस हद तक नीचे गिर जाते हैं कि उन्हें देश से कोई सरोकार नहीं होता।

ऐसे ही एक कट्टरपंथी ने एक दिन अचानक कह दिया कि वे मांसाहारी को हिन्दू नहीं मानते जबकि सच तो यह है कि उसके परिवार के लोगों में से कई मांसाहारी है। इसी तरह एक ब्राम्हण ने कह दिया कि मांस खाने वाले ब्राम्हण नहीं है लेकिन भारत में ऐसे कई प्रांतों के ब्राम्हण है जो मांस का भक्षण करते है।

कट्टरपंथियों की वजह से ही हिंसा बढ़ी है। खाप पंचायत से लेकर ऐसे कई उदाहरण और दंगे हैं जो कट्टरपंथियों की घृणा की पराकाष्ठा है।

इसलिए भारत को भी अमेरिका में हुई घटना को लेकर चिंतित होना चाहिए।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

नरफत का मुंडन

नफरत का मुंडन
आदमी को आदमी बनाये रखना सबसे कठिन काम है। सत्ता की चाहत ने राजनेताओं को इस तरह स्वार्थी बना दिया है कि वह सहज जन की आस्था ही नहीं उसकी भीतरी ताकत व सुरक्षा को हिलाकर रख दिया है। उसकी अपनी आदमी होने की पहचान धर्म-जाति में सिमटने लगी है।
बचपन में एक कहानी पढ़ी थी। दो सेव के पेड़ आपस में बात कर रहे थे। एक सेव दूसरे सेव से कहता है। देख रहे हो धर्म जाति और रंग को लेकर आदमी इस कदर लड़ रहा है कि देखना एक दिन सब कुछ समाप्त हो जायेगा और हम सेव ही सेव बच जायेंगे। उसकी बात पर सहमति जताते हुए दूसरे सेव ने पूछा था कौन सा सेव? हरा या लाल? यानी यह लड़ाई कभी समाप्त नहीं होने वाली है? लेकिन क्या यह लड़ाई समाप्त नहीं होनी चाहिए?
यह सवाल आज मैं इसलिए उठा रहा हूं कि मुझे लगता है कि आदमी होने का अर्थ ही ज्ञान है, उसकी सोच उसका दिमाग है जो उसे अच्छे-बुरे की पहचान करने की ताकत देता है। इस देश में पूर्वजों की यही सोच ने हमें विश्व में गुरु होने की संज्ञा दी। अलग पहचान दी। पूरी दुनिया में भारत जैसा कोई देश नहीं है तो इसकी वजह हमारे आदमियत के नजदीक होने की कोशिश है। जितने श्रीराम यहां के मिट्टी पानी में बसे है उतने ही श्रीकृष्ण, माता स्वरुप शक्ति या हनुमान बसे हैं, ब्रम्हा-विष्णु-महेश भी हवा में समाये हुए हैं। कभी किसी ने एक दूसरे के मानने वालों पर लाठी-बंदूक नहीं तानी।
गौतम-महावी-गांधी के इस देश में न केवल सबको आश्रय मिला और वे भी आपस में गंगा जमुना की तरह मिल गये। राजशाही के दौर में भी दंगों की बात नहीं सुनी गई। पहला दंगा विश्व में कहां हुआ। यह कौन बपता सकता है? पर यह दावा है कि पहला दंगा कम से कम भारत में नहीं हुआ है। क्योंकि यहां वे लोग रहते हैं जो आदमीयत के ज्यादा नजदीक है। आदमी होने का अर्थ बचपन से ही संस्कार की छुट्टी में शामिल है। घर-परिवार-रिश्तेदारी, गांव-समाज का बंधन इस कदर दिलो-दिमाग में समाया है कि भरा-फरा परिवार में स्वर्ग का सुख देखा जाती है।
इस देश में जहां संस्कृति की रक्षा के लिए श्रीराम और धर्म की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण का जन्म होता है वहां आदमियत में जहर घोलने की कोशिश कभी सफल नहीं हो सकती। लेकिन क्षणिक सत्ता सुख की खातिर राजनेताओं का विष वमन विचलित करने वाला है। 
छत्तीसगढ़ में एक कहावत है हंडिया (हंडी) के मुंह में परई (ढक्कन) रख सकते है लेकिन आदमी के मुंह में क्या रखें? यानी आदमी का मुंह कब जहर उगल दे? जिस देश में आदमियत जिन्दा रखने रिश्तेदारी की अहमियत बचपने से समझाई जाती है। धर्म कथाओं व त्यौहारों का उत्सव मनाया जाता है, कर्म के अनुसार फल की दुहाई दी जाती हो। रावण के क्रोध, कंस के अत्याचार और शिशुपाल की बदजुबानी को क्या सिर्फ सत्ता सुख के लिए नजरअंदाज कर दिया जाए।
यह सच है कि कलयुग के पर्दापण के साथ ही बुराईयों का पहाड़ जगह-जगह खड़ा होगा लेकिन क्या हम बुराईयों को समाप्त करने कलि अवतार की प्रतिक्षा में आदमियत में घुलते जहर का घुंट खामोशी से पीते रहे? कर्म के अनुसार फल तो तय है? यह सोचकर कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने वाले समाज में नफरत के बीज बोने वालों के प्रति आखिर कब तक खामोशी की चादर ओढ़ कर बैठा जा सकता है?
अमेरिका में सिर्फ काला या गोरा होने पर हत्या कर दी जाती है? क्या हम वैसा ही विकास चाहते आज तो लोग हिन्दू-मुस्लिम सिख-इसाई को आपस में उलझाकर अपना सुख ढूंढ रहे है कल यदि कोई शिव भक्त, कृष्ण भक्त और राम भक्त को आपस में उलझाने लगे तब अजान से नींद खराब होने की बात कहने वाले सिर्फ इसलिए शिव मंदिर या राम मंदिर में चल रहे भजन कीर्तन को बंद कराने की कोशिश नहीं करेंगे कि वह तो ईश्वर खुदा या गाड को नहीं मानता! यह आज्बर की वजह से उसे आने जाने में तकलीफ होती है। उसकी आवाज उसे विचलित करती है। हिरण्यकश्यप ने आखिर प्रहलाद को सिर्फ विष्णु भक्त होने की सजा देना चाहता था। यह बात सभी को समझनी होगी और अजान पर टिप्पणी करने वाले सोनू निगम की तरह जितनी जल्दी नरफत का मुंडन कर दे उतना ही आदमी का आदमी बने रहने की कोशिश में प्रभावी कदम होगा।