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बुधवार, 18 सितंबर 2024

वाराणासी में क्यों पीटा गया सं‌धी ..


 वाराणासी में क्यों पीटा गया सं‌धी ..

पूरा वीडियो भी देखिए…


 सबसे ताकतवर होने का दम भरने वाले देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बुल्डोजर चलाकर रोब जमाने वाले योगी आदित्यनाथ के वाराणासी में यदि संघ के नेता की जमकर धुनाई हो जाये तो फिर इसे क्या आने वाले राजनीति के लिए कोई संकेत माना जाना चाहिए।

झूठ और अफवाह के आसरे नफरत की राजनीति में माहिर लोगों ने इस कदर जहर फैला रखा है कि अब उनके कुकर्म खुलकर सामने आने लगे हैं।

ऐसा ही मामला वाराणासी में तब सामने आया जब प्रेगनेंट कर देने की धमकी पर योगी की पुलिस इसलिए खामोश रह गई क्योंकि धमकी देने वाला संधी था। और इसके बाद युवती और उसके परिजनों  ने इस संघी राजेश सिंह की वह हाल कर दी कि आज पूरा देश इस संधी पर थू-थू कर रहा है। पूरे मामले का विडियो वायरल होते ही हिन्दू वादियों को साँप सूँघ गया है।


शुक्रवार, 2 अगस्त 2024

जात न पूछो राहुल की...

जात न पूछो राहुल की... 


राहुल गांधी किस जाति के हैं यह बताये इसमे पहले यह जान लेना जरूरी है झूठ और अफवाह के आसरे नफरत की राजनीति में माहिर भारतीय जनता पार्टी ने राहुल गांधी पर सीधे हमला क्यों बोल दिया है। इस हमले से भाजपा की खीज साफ दिखाई भी देने लगी है। क्योंकि अनुराग ठाकुर की बातों को जब स्पीकर ने विलोपित कर दिया उसके बाद भी देश के प्रधानमंत्री ने अपने एक्स हेडल में इसे प्रदर्शित कर संसद की गरिमा का अवमानना करने से नहीं चूके।

दरअसल यह सारा मामला जातिय जनगणना से जुड़ा हुआ है जिसका भाजपा खुलकर समर्थन नहीं कर पा रही है। और मीडिल क्लास और पिछड़े वर्ग के बिखरते वोट ने उनके भीतर के हिन्दूत्व को हिला कर रख दिया है।

दरअसल हिन्‌दु वोटरों के ध्रुवीयकरण के आसरे सत्ता तक पहुंची भाजपा के लिए नरेंद्र मोदी के करिश्में से ज़्यादा असरदार कैग का वह फर्जी रिपोर्ट और लोक आयोग को लेकर अन्ना आन्दोलन का वह तूफान था जिसकी वजह से कांग्रेस को बदनाम करने की साज़िश रची गई । लेकिन लोगों को समझाया गया कि नरेंद्र मोदी के चेहरे के आसरे ही बीजेपी सत्ता में आ सकी।

अच्छे दिन आयेंगे के सपने 2047 के विकसित भारत तक आते आते इस कदर  रिसने लगा कि मीडिल और पिछड़ा वर्ग मोदी के हाथों से फिसलते गया।

२०१९ के परिणाम का ठसक, अहंकार, आत्ममुग्धता की हवा निकल गई तो इसकी वजह राहुल गांधी का वह भारत जोड़ो यात्रा थी जो कांग्रेस को वैचारिक रूप से भी बदलकर जाति जनगणना तक पहुंचा दिया। और यही जाति जनगणना अब भाजपा और संघ के कथित हिदुत्व के आधार को हिला कर रख दिया है।

जाति किसी जननेता की क्या होती है? यह सवाल इसलिए भी भाजपा ने उठाये हैं ताकि खिसकते जनाधार को बचा लें या मोदी सत्ता की करतू‌तों पर पर्दा डाल ले।

इसरे अलावा एक बड़ी वजह है राहुल गांधी की भारतीयता की वह छवि जो किसी भी जाति या धर्म से उपर हो चुका है। 

हालांकि भाजपा के स्लीपर सेल का गांधी नेहरू परिवार की जाति और धर्म को लेकर पहला वार नहीं है इससे पहले भी वे इसे हवा देते रहे है। 

लेकिन आमने - सामने मी स्थिति पहली बार बनी है। लेकिन भाजपा ने राहुल गांधी की जाति पूछने में देर कर दी क्योंकि अब राहुल गांधी की जाति भारतीयता हो चुकी है, पूरा देश धीरे-धीरे राहुल को स्वीकार कर चुका  है सिवाय संधी संस्कारित्रों के…?


इसके बाद भी यदि सवाल राहुल के दादा फिरोज गांधी के मुसलमान  होने की अफ़वाह को हवा दी जा रही है तो देश को यह जान लेना जारी है कि फिरोज गांधी मुसलमान नहीं पारसी थे, वे फिरोज खान लिखते थे और महात्मा गांधी के द्वारा उन्हें गोद लेने के बाद वे गांधी  कहलाने लगे। उनका अंतिम संस्कार भी इसी वजह से हिन्दू रिति रिवाज से हुआ।

पारसी जोरास्ट्रि‌यन धर्म का पालन करते हैं, जो आग को पवित्र मानकर उसकी पूजा करते हैं। और जिनके बारे में आचार्य चतुर सेन ने अपने उपन्यास वयम रक्षाम में इनको यमराज की जाति के वंशज माना है....

अब सवाल पंडित नेहरू के मुसलमान होने के अफवाह का है तो इस पर केवल वहीं लोग भरोसा कर सकते है जो आँखों में कट्टरता की पट्टी बांधे घूम रहे हैं।

दररूसल पूरा खेल या षड्यंत्र की वजह अंग्रेजों की चापलूसी के सच को विस्मृत कर देने की कवायद है और कुछ नही...!

सोमवार, 22 जुलाई 2024

कालेज छात्रों को ड्रग्स का लत लगा रहा था संस्कारी संघी…

 कालेज छात्रों को ड्रग्स का लत लगा रहा था संस्कारी संघी…


अभी उत्तर प्रदेश के प्रयाग राज को एके 47 से दहलाने वाला भाजपा के पूर्व विधायक उदयभान करवरिया को समय पूर्व रिहाई का मामला ठंडा भी नहीं हो पाया था कि अब गुजरात से यह खबर आ गई कि कालेज छात्रों में ड्रग्स का लत लगाने वाले संघ के स्वयं सेवक और हिन्दू युवा वाहिनी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष विकास अहिर पकड़ा गया। वह अपना यह खेल आइसक्रीम पार्लर की आड़ में चला रहा था। योगी आदित्यनाथ से लेकर भाजपा के दिग्गजों के साल उनकी तस्बीर और फेसबुक प्रोफाईल ने संघ के संस्कार की पोल खोल कर रख दी है।


मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ गुजरात की सूरत शहर पुलिस ने एक सनसनीखेज मामले में हिंदूवादी नेता और बीजेपी कार्यकर्ता विकास अहीर समेत दो अन्य को एमडी ड्रग बेचने के मामले में अरेस्ट किया है। सोशल मीडिया पर मौजूद प्रोफाइल के अनुसार विकास अहीर हिंदू युवा वाहिनी गुजरात प्रदेश के पूर्व अध्यक्ष हैं। इसके साथ वह बीजेपी युवा मोर्चा से जुड़े हुए हैं। सूरत पुलिस आयुक्त अनुपम सिंह गहलोत ने प्रेस कांफ्रेंस करके शहर में एमडी ड्रग्स की बिक्री के मामले में पुलिस कार्रवाई की जानकारी दी। गहलोत ने कहा कि सूरत में पहले ड्रग्स की खेप मुंबई से आती थी, लेकिन पुलिस की सख्ती के बाद इस धंधे में लिप्त लोगों ने मॉड्स ऑपरेंडी में बदलाव किया है। अब राजस्थान से जरिए सूरत में ड्रग्स की बिक्री कर रहे हैं। पुलिस ने विकास अहीर के विकास के साथ चेतन साहू और अनीश खान पठान को गिरफ्तार किया है। पुलिस के इनके पास से 354 ग्राम एमडी ड्रग्स मिला है।

हिंदूवादी नेता की छवि 


सूरत पुलिस द्वारा ड्रग्स बेचने के मामले में गिरफ़्तार किए गए विकास अहीर ने सोशल मीडिया पर अपनी छवि एक हिंदू वादी नेता की बनाई है। एक्स पर अहीर ने अपने बॉयो में लिखा है कि पूर्व अध्यक्ष हिन्दू युवा वाहिनी गुजरात प्रदेश बताया है। इसके बाद अहीर ने खुद को बीजेपी युवा मोर्चा गुजरात से जुड़ा हुआ बताया है। अहीर ने बॉयो में खुद को आरएसएस को स्वयंसेवक भी बताया है। सूरत शहर पुलिस के अनुसार करीब एक महीने की होमवर्क और निगरानी के बाद तीनों आरोपियों को अरेस्ट किया गया है। पुलिस ने अनुसार पकड़े गए आरोपियों पर पहले भी कुल मामले दर्ज हैं। पुलिस ने अनुसार ड्रग्स राजस्थान के जरिए सूरत में लाया जा रहा था।

आप ने साधा निशाना 

एक तरफ जहां ड्रग्स बेचने के मामले में सूरत पुलिस ने पुलिस ने विकास अहीर और उसके 2 दोस्तों को अरेस्ट किया है तो वहीं दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गोपाल इटालिया ने इस मुद्दे पर बीजेपी पर हमला बोला है। इटालिया ने लिखा है हिंदुत्व के नाम पर 2022 के चुनाव में यही टोली उनके घर पर पहुंची थी।सूरत पुलिस आयुक्त अनुपम सिंह गहलोत ने कहा है कि सामने आया है कि आरोपी आइसक्रीम पॉर्लर की आड़ में एमडी ड्रग्स का धंधा कर रहे थे। ये टू व्हीलर से डिलीवरी भी करते थे। गहलोत ने कहा पिछले कुछ समय में सूरत में ड्रग्स बेचने के 37 मामले में दर्ज किए गए हैं। इनमें कुल 85 आरोपियों को अरेस्ट किया है। गहलोत ने कहा एनडीपीएस एक्ट में अरेस्ट आरोपियों की संपत्ति की जांच भी जा रही है। अवैध और काली कमाई से अर्जित की गई संपत्ति को सील किया जाएगा।

मंगलवार, 22 जून 2021

संघ का करतूत अयोध्या में दिखा...?

 

श्रीराम के नाम पर ठेकेदारी करने वालों को प्रभु राम ने पूंजी-सत्ता सब सौंप दी है लेकिन उनकी नियत अब भी साफ नहीं है और अब तक श्रीराम मंदिर निर्माण के नाम पर जिस तरह की धोखाधड़ी, छल, चंदाखोरी और दूसरे मामले सामने आने लगे हैं उसके बाद तो यह कहना मुश्किल हो गया है कि श्री राम के नाम पर लूट की प्रतिस्पर्धा नहीं चल रही है।

ताजा मामला तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा खरीदी जा रही जमीनों की वैधानिक और राशि को लेकर मामला सामने आया है। पहले मामले में अयोध्या  के मेयर शामिल है तो दूसरे मामले में मेयर का भांजा शामिल है। संघ के चंपत राय की भूमिका तो किसी से छिपी ही नहीं है। हालत यह है कि संघ, भाजपा से जुड़े लोग कम कीमत पर जमीन खरीद कर मंदिर ट्रस्ट को ज्यादा कीमत में जमीन धड़ल्ले से बेच रहे है और राम के नाम पर सत्ता में काबिज लोगों को इसमें कुछ भी गलत नहीं दिखता। तब यह पैसों का बंदरबांट नहीं तो और क्या है।

अयोध्या के मेयर ऋषिकेश उपाध्याय के भांजे दीप नारायण ने दशरथ महल बड़ास्थान के महंत से जो जमीन बीस लाख में खरीदी उस जमीन को ट्रस्ट को ढाई करोड़ में बेच दी। दस्तावेज देखते ही पहली नजर में सब गड़बड़झाला दिख रहा है। राजस्व विभाग के अधिकारी भी इस रजिस्ट्री पर खुलेआम उंगली उठा रहे है लेकिन न ट्रस्ट की बेशर्मी रुक रही है और न ही सत्ता की बेशर्मी।

तब सवाल यही है कि जो संघ अपने को संस्कार, चरित्रनिर्माण और पता नहीं किस-किस तरह की नैतिकता सिखाने का दावा करता है वह क्या ऐसा ही संस्कार और चरित्र निर्माण करता है। हालांकि हमने पहले भी कहा है कि संघ ने जिस तरह से इस देश को धर्म के नाम पर नफरत में झोका है, राष्ट्रपिता की हत्या में शामिल होने क आरोपों के अलावा कितने ही आरोप संघ पर है और आजादी के बाद से अब तक संघ की गतिविधियों पर चार बार बंदिश भी लग चुका है तब सवाल यही है कि देश के लिए जरूरी क्या है।

श्रीराम जन्मभूमि के नाम पर चंदा हजम करने का आरोप न तो नया है और न ही भाजपा का झूठ ही नया नहीं है। पहले के चंदे का हिसाब आज तक नहीं हुआ और अब नये चंदे में जिस तरह के घपले सामने आ रहे है उसके बाद तो संघ के संस्कार पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

गुरुवार, 17 जून 2021

पैसा खुदा से कम नहीं...

 

आर्थिक झंझावतों से गुजर रहे देश की राजनीति भी इन दिनों प्रसव वेदना से गुजरने लगी है, देश की सबसे बड़े राजनैतिक दल के भीतर भी सब कुछ ठीक नहीं है, उत्तरप्रदेश, कर्नाटक, मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों में गड़बड़झाला है कई राज्यों में स्थिति डावाडोल है लेकिन हम आज बात करेंगे, देश की सबसे बड़ी पार्टी कहलाने वाली भाजपा की।

वैसे तो भाजपा पर नरेन्द्र मोदी, अमित शाह की मजबूत पकड़ है और वे जो चाहे पार्टी में वही होगा तब सवाल यही है कि क्या भाजपा में अधिनायकवाद ने कदम बढ़ा दिया है। हालांकि भाजपा नेताओं के तमाम दावों के बाद भी हमारा शुरु से मानना रहा है कि जिस तरह से कांग्रेस में गांधी परिवार के इतर कुछ भी नहीं है उसी तरह भाजपा में संघ परिवार की स्थिति है।

देशभर की तमाम पार्टियों को परिवारवाद के नाम पर गरियाने वाली भाजपा में भी वहीं होता है जो संघ परिवार चाहता है, लेकिन स्थिति में थोड़ा बदलाव हुआ है और अब वही होगा जो गुजरात गैंग चाहता है। गुजरात गैंग क्या है और इनमें कौन कौन लोग जुड़े हैं इस पर कभी विस्तार से जानकारी दी जायेगी। अभी तो भाजपा के भीतर की स्थिति को समझने की कोशिश होनी चाहिए।

वैसे तो भाजपा को शुरु से ही पूंजीवादियों, व्यापारियों की पार्टी कहा जाता रहा है लेकिन अटल-अडवानी की जोड़ी के हटने के बाद यह साफ तौर पर दिखने भी लगा है कहा जाए तो गलत नहीं होगा। ऐसे में सवाल यह नहीं है कि संघ किनारे कर दिये गए है बल्कि सवाल यह है कि वर्तमान परिदृश्य में क्या पैसा और पूंजी ही महत्वपूर्ण हो चला है और जिसके पांस पूंजी की ताकत होगी वही पार्टी को अपने हिसाब से चलायेगा?

तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि संघ की भूमिका इतनी बेबस क्यों है? इसके लिए इतिहास में ज्यादा दिन पीछे जाने की जरूरत नहीं है। यह 2013-14 की ही बात है। कांग्रेस के खिलाफ पूरे देश में माहौल था और संघ को सत्ता की राह आसान तो दिख रहा था लेकिन वह हर  कदम सोच समझ कर चलना चाहते थे। ऐसे में मामला आडवानी और मोदी के बीच जा फंसा। भाजपा का एक बड़ा वर्ग चाहता था कि आडवानी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाए लेकिन संघ ने एक दांव खेला कि पैसा कौन लायेगा। यानी पूंजी की जवाबदारी के आगे आडवानी मौन रह गये और नरेन्द्र मोदी ने बाजी मार ली। आखिर तीन बार के मुख्यमंत्री और सहारा डायरी तो इसका संकेत था ही।

और जब संघ और पूरी भाजपा ही पूंजी के आगे नतमस्तक हो तब फिर सवाल बेमानी है कि पार्टी कौन चलायेगा। और यह बात न केवल नरेन्द्र मोदी जानते है बल्कि पूरा गुजरात गैंग जानता है कि जब तक पूंजी की ताकत रहेगी उनका न तो योगी आदित्यनाथ ही कुछ कर पायेगा और न ही संघ ही कुछ कर पायेगा।

यही वजह है कि गुजरात गैंग ने सबसे पहले योगी आदित्यनाथ का पर कतर देना चाहते हैं क्योंकि मोदी के बाद कौन के सवाल पर अब भी योगी ही है। जबकि योगी से पहले अमित शाह थे। इसलिए उत्तरप्रदेश की दमदारी और कट्टर हिन्दू चेहरा के बाद भी यदि योगी पर वार हो रहे हैं और संघ तथा पूरी भाजपा इसे खामोशी से दख रहा है तो जान लीजिए की पूंजी की ताकत ने अपना प्रभाव जमा लिया है।

बुधवार, 16 जून 2021

संघियों का ये कैसा राष्ट्रहित...

 

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बारे में कहा जाता है कि उसके संघ चालक, प्रचारक सभी काम राष्ट्रहित में कते है, राष्ट्रहित की वजह से वे परिवार नहीं बसाते और राष्ट्र निर्माण में ही अपना पूरा जीवन समर्पित कर देते हैं।

तब सवाल यह उठता है कि राष्ट्रहित क्या है और संघ के राष्ट्रहित का क्या मतलब है। यह सवाल इसलिए उठाये जा रहे है क्योंकि अयोध्या में जो जमीन घोटाले का आरोप सामने आया है उसके केन्द्र में जो नाम चर्च में है वे हैं चम्पत राय। चम्पत राय विश्व हिन्दू परिषद के बड़े चेहरे रहे हैं और संघ के प्रचारक भी रहे है यानी संघ के अनुसार चम्पत राय जो भी काम करते है वह राष्ट्रहित और राष्ट्र निर्माण के अनुरुप होता है तब सवाल यही उठता है कि राम मंदिर निर्माण के लिए जो जमीन घोटाले की खबर आ रही है उसकी हकीकत क्या है।

हकीकत में देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर के लिए जो जमीन दी गई यानी 70 करोड़ जमीन के अलावा ट्रस्ट और जमीन क्यों खरीद रही है क्या इसके लिए कोर्ट से ईजाजत ली गई। दूसरा सवाल यही है कि क्या ट्रस्ट को कुछ भी कीमत पर जमीन खरीदने का अधिकार है। तीसरा सवाल उत्तरप्रदेश राजस्व अधिनियम के उल्लंघन का है कि आखिर रजिस्ट्रार ने बाजार दर से कम में रजिस्ट्री क्यों की और इसके एवज में होने वाली राजस्व घाटा के लिए क्या रजिस्ट्रार को बर्खास्त नहीं कर दिया जाना चाहिए या संघ के राष्ट्र हित कानून से उपर है।

ऐसे में सवाल यदि संघ के संस्कार पर भी उठ रहे हैं तो यकीन मानिये मोदी सरकार के इस दौर में संघ की प्रतिष्ठा भी गिरी है क्योंकि नरेन्द्र मोदी भी संघ के प्रचारक रहे हैं और राजनैतिक शुद्धिकरण के चलते संघ में आये हैं चूंकि प्रचारक राष्ट्रहित में काम करते है और परिवार के झंझट में नहीं पड़ते इसलिए नरेन्द्र मोदी के शादीशुदा होने के बाद भी प्रचारक बनना  और न बनना किसे धोखा देना था यह संघ ही जाने। संघ प्रचारक अटल बिहारी वाजपेयी जी भी रहे और गुजरात कांड के बाद एक संघ प्रचारक जो राष्ट्रहित में ही काम करते हैं दूसरे संघ प्रचारक नरेन्द्र मोदी को राष्ट्र धर्म सिखलाने गुजरात जाते है तो कौन राष्ट्रहित का काम कर रहे थे यह भी संघ जाने।

तब सवाल यही है कि क्या संघ के प्रचारक राष्ट्रहित में ही काम करते हैं तब प्रचारक से प्रधानमंत्री बने नरेन्द्र मोदी का हर निर्णय क्या राष्ट्रहित में ही है। यह सवाल संघ के राष्ट्रहित की सोच को भी प्रदर्शित करता है कि आखिर नोटबंदी की लाईन में डेढ़ सौ लोगों की मौत क्या राष्ट्रहित में था, कोरोना की चेतावनी को नजर अंदाज करके नमस्ते ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सत्ता का लोभ क्या राष्ट्रहित का निर्णय था, रिजर्व बैंक का रिजर्व फंड का उपयोग यदि राष्ट्रहित का निर्णय मान भी ले तो क्या 8 लाख करोड़ रुपये उद्योगपतियों का राईट ऑफ करना राष्ट्रहित का निर्णय है? या बढ़ती बेरोजगारी बढ़ती महंगाई और टैक्स में बढ़ोत्तरी भी क्या राष्ट्रहित का निर्णय है।

चूंकि संघ के मुताबिक प्रचारक राष्ट्रहित में ही निर्णय लेते हैं इसलिए बंगारु लक्ष्मण से लेकर राघव जी का कार्य भी क्या राष्ट्रहित का ही है? तब सवाल यही है कि राम मंदिर ट्रस्ट को मिले चंदा का खर्च राष्ट्रहित में है और घोटाले तो हो ही नहीं सकते भले ही कानून का उल्लंघन हो जाए।

मंगलवार, 15 जून 2021

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण-4

 

1989 में सत्ता कांग्रेस के हाथ से निकल चुकी थी, बाफोर्स के भूत ने और परिवारवाद से चिढ़ ने भारतीय राजनीति को नई दिशा दी थी। यह वह दौर था जब लोगों को विश्वनाथ प्रताप सिंह से बहुत उम्मीद थी और इनके सामने न केवल पांच साल सरकार चलाने की चुनौती थी बल्कि फिर सत्तासीन होने की चुनौती थी।

वीपी सिंह ने धर्मनिरपेक्षता को जीवित रखने का प्रयास शुरु किया और मंडल कमीशन की सिफारिश लागू कर दी, समूचा पिछड़ा वर्ग इस फैसले से उत्साहित था, लेकिन हिन्दूत्व की राह में यह बड़ा रोड़ा हो सकता था। लालकृष्ण अडवानी ने सोमनाथ से अयोध्या तक राममंदिर निर्माण के लिए रथयात्रा का दांव चल दिया। रथयात्रा को रोकने पर सरकार गिरा देने की धमकी से एक बार फिर सरकार न चला पाने का दाग उभरकर सामने आ गया। भाजपा जो चाहती थी या संघ की सोच के अनुसार सब कुछ हो रहा था, गठबंधन की राजनीति ने एक बार फिर भाजपा को ताकतवर बना दिया था ऐसे में रथयात्रा को रोकने की हिम्मत कौन करे वह भी जब इस देश की भावना और आस्था से जुड़े प्रभु राम जी के नाम पर हो।

रथयात्रा की घोषणना ने देश की हवा में नफरत की फिंजा फैला दी, सामाजिक सौहाद्रर्य, गंगा जमुना संस्कृति, सामाजिक एकता डगमगाने लगा। कई जगह पर दंगे हुए, रक्तपात होने लगा। लेकिन इस यात्रा को रोकने की हिम्मत की लालू प्रसाद यादव ने। भाजपा अब तक स्वयं को ताकतवर तो समझ रही थी लेकिन वह जानती थी कि उस पर लगे साम्प्रदायिकता का दाग वह अकेले नहीं धो पायेगी। सरकार गिर गई लेकिन  कांग्रेस ने चन्द्रशेखर को समर्थन देकर चुनाव कुछ दिनों के लिए टाल दिया। लेकिन वह हिन्दू वोटों का धु्रवीकरण करने पर लगातार अपने वोट बढ़ा रही थी लेकिन अचानक वह हुआ जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।

श्री पेरुबंदुर में राजीव गांधी को बम विस्फोट से उड़ा दिया गया। चुनाव चल रहा था, हिन्दी भाषी क्षेत्र में भाजपा ध्रुवीकरण करने में कामयाब हो रही थी लेकिन इस घटना ने भाजपा को फिर सत्ता से पीछे ढकेल दिया। नरसिंम्हन राव की अगुवाई में कुछ दलों के समर्थन से कांग्रेस सरकार बनाने में सफल हो गई थी और उधर सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को लेकर कांग्रेस में फूट पडऩे लगी। नारायण दत्त तिवारी-अर्जुन सिंह जैसे नेता अपनी अलग राह चुन चुके थे।

पति के दुख की पीड़ा ने सोनिया गांधी को घर में कैद कर रखा था। विवाह के बाद भारतीय बहु का फर्ज निभाने वाली सोनिया गांधी पर जब पार्टी के भीतर ही विदेशी के बाण चले तो दूसरे कहां मौका छोडऩे वाले थे। एक तरफ कांग्रेस के भीतर ही लड़ाई चल रही थी तो दूसरी ओर साम्प्रदायिक शक्तियां सिर उठाने लगी। हालांकि भाजपा को अपनी ताकत दिखाने का मौका तो तभी मिल गया था जब शहबानों प्रकरण में बहुमत की ताकत से राजीव गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले बदल दिये थे। ये तुष्टीकरण पर प्रहार माना गया और हिन्दू वोट खिसकने का डर से कांग्रेस इतनी भयभीत हो गई कि उसने हिन्दू वोटों की खातिर राम मंदिर का ताला खुलवा दिया। भूमिपूजन भी तय हो गया।

ये एक तरह से हिन्दू कुंठा की जीत थी। जो हिन्दू कुण्ठा प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु को सोमनाथ के जीर्णोद्धार के कार्यक्रम से दूर रखा था वह राजीव गांधी पर सफल हो गया था।  राम मंदिर के ताला खुलने के फैसले भले कांग्रेस ने किया लेकिन यह ध्रुवीकरण की राजनीति का नया मोड़ था। ज्ञान पर नफरत के ध्वजारोहण का एक और चरण था।

सोमवार, 31 मई 2021

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण-3


आजादी के बाद की सत्ता जानती थी कि नफरत के ध्वजारोहण ने हिन्दू-मुस्लिम एकता को क्षति पहुंचाने का प्रयास आगे भी जारी रहेगा, इसलिए ऐसे संगठनों पर प्रतिबंध भी लगाये गए।

सत्ता सचेत थी, नेहरु सचेत थे, सरदार वल्लभ भाई पटेल भी सचेत थे, इसलिए इनके रहते तक नफरत का खेल कुचल दिया गया। ये जहां भी जाते दंगा करवाते थे। लेकिन जब सरकारे सचेत हो तो हर मुश्किल घड़ी से निपटा जा सकता है। धर्म और जाति का सहारा लेकर सत्ता में आने के उपाय जारी थे। लेकिन जिस देश में विवेकानंद, सुभाष बाबू, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद जैसे लोग सर्वधर्म सद्भाव रखते हो वहां धार्मिक कुंठा के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। लेकिन हिटलर की तर्ज पर झूठ को बार-बार परोसा जाने लगा। ताकि झूठ और अफवाह सच लगे।

भगत सिंह से मिलने कोई नहीं गया, जब देश का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ है तो भारत हिन्दू राष्ट्र क्यों नहीं, सुभाष बाबू की मौत का रहस्य पता नहीं कितने ही झूठ परोसे गए और फिर भी सत्ता नहीं मिली तो नेहरु मुसलमान थे, या हर वे नेता को मुसलमान बताये जाने लगे जो अल्पसंख्यकों और मुसलमानों के पक्ष में खड़ा होने लगे। 70 के दशक में ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण के लिए नई जमीन तलाश की जाने लगी। क्योंकि चीन और पाकिस्तान से युद्ध की वजह से भारत की आर्थिक स्थिति पर प्रभाव पड़ा था लेकिन जब इंदिरा ने बैकों का सरकारीकरण, पंचवर्षीय योजना सहित पोखरण भी कर डाला तो एक बार फिर ज्ञान पर ध्वजारोहण का मंसूबा फेल गया।

लेकिन आपातकाल का वह दौर जिससे सारे राजनैतिक दल डरे हुए थे, इंदिरा गांधी की ताकत अहंकार में परिवर्तन होने लगा था, बेरोजगारी और महंगाई मुंह खोले खड़ा था तब हिन्दू कुंठा लिये लोगों ने अपना झंडा-डंडा चिन्ह सब दांव पर लगा दिया। और स्वयं को बचाने उनके साथ हो गये जो कांग्रेस के विरोधी थे। कांग्रेस के विरोधी दल भी यह नहीं समझ पाये कि कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं होती। लेकिन सत्ता आते ही जब कुंठित हिन्दू एक बार फिर सिर उठाने लगा तो सरकार ही चली गई।

दरअसल हिन्दू कुंठा की यह एक तरह की रणनीति थी, 47 से लेकर 77 तक के सफर में वह जान चुका था कि इस देश में सिर्फ हिन्दुत्व के नाम पर वोट नहीं बटोरे जा सकते? इसलिए उन दलों के सहारे उस क्षेत्रों से भी चुनाव जीता गया जहां उनकी जीत कभी नहीं हो सकती थी। क्योंकि उनके लिए अब भी संविधान गलत था, उनके लिए झंडा में तीन रंग अशुभ था और राष्ट्रगीत भी गलत था। यही स्पष्ट है कि संघ ने अपने मुख्यालय में तिरंगा फहराने से परहेज किया। लेकिन इंदिरा गांधी के खौफ और सत्ता की चाहत ने सब कुछ अनदेखी किया।

नफरत के नए-नए बीज लाकर रोपण किया जाने लगा, कभी गौ हत्या के नाम पर तो कभी कश्मीर में धारा 370 के नाम पर। राम मंदिर तो एक मुद्दा था ही। लेकिन 77 में सत्ता आते ही पोल खुल गई, सरकार गई लेकिन उन्होंने अपनी ताकत बढ़ा ली थी, लेकिन सरकार नहीं चला पाने के दाग से कोई नहीं बच सका और 80 में एक बार फिर इंदिरा गांधी सत्ता सीन हुई। ये वह दौर था जब छोटे राज्यों के निर्माण को लेकर आंदोलन की हवा चलने लगी, राम मंदिर और धारा 370 को लेकर अफवाहों को हवा दी गई, पंजाब में खालिस्तान की मांग तेज हो गई, बेरोजगारी-महंगाई भी सिर उठाने लगा, एक बार फिर विपक्ष सत्ता के लिए ताकत लगाने लगा लेकिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या ने विपक्ष के मंसूबे पर पानी फेर दिया। नफरत की हवा तो इंदिरा गांधी ने पहले ही निकाल दी थी। कांग्रेस सत्तासीन हुई, लेकिन यह नेहरु-शाी और इंदिरा वाली कांग्रेस नहीं थी, यह राजनीति के अनाड़ी माने जाने वाले राजीव गांधी वाली कांग्रेस थी जो बगैर राजनीति के जनसेवा के लिए तत्पर रहने वाली थी, इसने केन्द्र से गांव तक पैसा पहुंचाने की स्थिति को भी नहीं छिपाया, न ही 84 के दंगे की वजह को ही छुपाया।

देश 84 के रक्तपात से हिल चुका था, सिखों ने कांग्रेस से दूरी बना ली यह भी नहीं देखा कि इंदिरा ने तमाम प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रिपोर्ट के बाद भी सिख सुरक्षा गार्डों को नहीं हटाया था। सद्भावना समाप्त सी हो गई थी और इसे हवा देने का राजनैतिक प्रयास शुरु हो चुका था लेकिन राजीव गांधी ने नए भारत की नींव रख दी थी, आधुनिकीकरण और कम्प्यूटर क्रांति का दौर शुरु हो चुका था। मिस्टर क्लीन के नाम से मिल रही प्रसिद्धि में बाफोर्स आ गया। और सत्ता की चाह में विपक्ष एक बार फिर इतिहास को भूल गठबंधन में आ गया। (जारी...)

गुरुवार, 27 मई 2021

मोदी के सात साल में सत्तर हाल...

 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सात साल का सफर पूरा कर लिया है लेकिन यकीन मानिये इन सात सालों में देश का सत्तर हाल हो गया है। विफलताओं का सारा रिकार्ड इन सात सालों में बना है लेकिन हिन्दू-मुस्लिम और राष्ट्रवाद का खेल अब भी जारी है और यही हाल रहा तो देश में आम नागरिकों का जीवन न केवल किसी बर्बाद हो चुके देश की तरह होगा, नारकीय होगा?

ये दावा हम उन आकड़ों के बल पर कर रहे हैं जो मोदी सत्ता की विफलता की कहानी तो कह रही है बल्कि गरीबों की संख्या में हो रही लगातार बढ़ोत्तरी है। मोदी सरकार जब 2014 में सत्ता में पहली बार आई तब वह अच्छे दिन आयेंगे के जुमले को लेकर आई थी, लोगों को इस सत्ता से उम्मीद भी बहुत रही लेकिन इन सात सालों में देश ने क्या खोया और क्या पाया इसकी समीक्षा नहीं की गई तो यह पता ही नहीं चलेगा कि यह देश किस तरह दुनिया के कमजोर देशों से भी नीचे जा रहा है।

आप बैकों के 8 लाख करोड़ रुपए के राइट ऑफ में गिनते जाईये। हालांकि मोदी समर्थक इस राइट ऑफ यानी कर्ज माफी को कहते हैं कि यह कर्ज माफी उन लोगों का हुआ है जो हिन्दू है और मोदी के रहते हिन्दुओं का कर्ज माफ नहीं होगा तो किसका होगा। हालांकि उनके पास कर्ज में डूबे किसानों की मौत मायने नहीं रखते क्योंकि किसान चंदा नहीं देते।

दूसरा सवाल सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को बेचने का है। सत्तर साल में किसी प्रधानमंत्री ने 19 कंपनियों को नहीं बेचा। इसी तरह 70 साल में कोई भी प्रधानमंत्री ने रिजर्व बैंक के रिजर्व फंड का उपयोग-दुरुपयोग इस स्तर पर कभी नहीं किया। सत्ता में आते ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि वे काले धन को विदेशों से लाने प्रतिबद्ध हैं और इसके लिए जरूरी कानून भी बनाना पड़ा तो वह भी बनायेंगे लेकिन इस बारे में सवाल पूछना ही मना है।

देश में हर साल दो करोड़ लोगों को रोजगार देने के वादे का सच यह है कि केन्द्र सरकार ने सात साल में केवल 9 लाख लोगों को नौकरी दी और यदि राज्यों को भी जोड़ दें तो इन सात सालों में केवल 48 लाख लोगों को ही नौकरी मिल पाई है। जबकि नौकरी से हाथ धोने वालों की संख्या दो करोड़ से अधिक बताई जा रही है। महंगाई किसी से छिपी नहीं है। पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस के अलावा रोजमर्रा के खानपान में भी दस फीसदी से अधिक महंगाई बढ़ी है।

नोटबंदी का सच तो पूरी दुनिया को मालूम है कि किस तरह से डेढ़ सौ लोग सड़कों में लाईन लगाकर मर गए। जबकि जीएसटी की विसंगति ने छोटे व्यापारियों को आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया। आगे विफलता गिनाने से पहले जिसे वे सरकार की सफलता मानते है उस धारा 370 को हटाने का कोई फायदा आम लोगों को या देश को हुआ हो यह कहना मुश्किल है।

तब मध्यप्रदेश की सत्ता की चाह और नमस्ते ट्रम्प की लापरवाही से देश में कोरोना से त्राहिमाम् भी कोई कैसे छुपा सकता है। नासमझी में किये गये लॉकडाउन के चलते मजदूरों की सड़क में मरने की मजबूरी भी कोई कैसे भूल सकता है। सच तो यह है कि हम गरीबी भूखमरी तक में पाक और कल के बंग्लादेश से पीछे है। तब सत्ता की कौन सी उपलब्धि को सच माना जाए।

मंगलवार, 11 मई 2021

विचारधारा की शून्यता...

 

भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह से असम में कांग्रेस से आए हिमत बिस्वा सरमा को मुख्यमंत्री और बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को छोड़कर आये शुभेन्द्रु अधिकारी को नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी सौंपी है उसके बाद तो साफ हो गया है कि सत्ता के लालच में भाजपा बुरी तरह फंस चुकी है और अब संघ या भाजपा के सिद्धांतों की बजाय सत्ता के सिद्धांत पर चलना होगा।

हालांकि भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र में सरकार कभी भी अपने दम पर नहीं बनी है, वह दर्जनों दलों के गठबंधन के साथ ही चलती है तो  इसकी वजह उस पर लगने वाले साम्प्रदायिकता का वह आरोप है जो समय-समय पर परिलक्षित होता रहता है। 2014 में नरेन्द्र मोदी सत्ता में आये तब भी दूसरे दलों से भाजपा में आये सांसदों की संख्या ही वजह थी।

दरअसल भाजपा अब भी नहीं समझ पा रही है कि इस देश का मिजाज क्या है, यदि देश का मिजाज संघ के मिजाज से मेल खाता तो भाजपा या जनसंघ बहुत पहले ही सत्ता में आ गई होती। यह देश पूरी दुनिया को अनेकता में एकता का सिर्फ संदेश ही नहीं देता, बल्कि उसे जीता भी है। कुंठित हिन्दु  और कुंठित मुस्लिम लीग को हवा देकर अंग्रेजों ने भले ही देश का विभाजन धर्म के आधार पर कर दिया हो लेकिन भारत आज भी धर्म निरपेक्ष को जीता है।

यही वजह है कि संघ या भारतीय जनता पार्टी केन्द्र की सत्ता पर काबिज होने उन दलों की बैसाखी पर सवार होते हैं जो महत्वाकांक्षी होते है, भाजपा ऐसे दलों से भी समझौता करने से परहेज नहीं करती जो मुश्किल से एक-दो सीट ही जीत सकते हैं। भले ही संघ या भाजपा के समर्थक यह दावा करे कि वह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है या सबसे बड़ा संगठन है उनके सदस्य करोड़ों में है लेकिन सच तो यह है कि संघ या भाजपा के सिद्धांत पर चलने वालों की संख्या दहाई तक भी नहीं पहुंची है।

यही वजह है कि आजादी के सालों बाद पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी सत्ता तक पहुंचे तो 23 दलों का सहयोग था और अब मोदी सत्ता में आये है तब भी दर्जनभर दल के सहयोग के अलावा ऐसे लोगों के कारण सत्ता पर पहुंचे है जो अपने दलों से बगावत कर भाजपा में आये हैं। ताजा उदाहरण मध्यप्रदेश का है यदि ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस से बगावत नहीं करते तो मध्यप्रदेश में भाजपा सत्ता से बाहर थी।

हिन्दू राष्ट्र का सपना देखने वाले शायद भूल गए हैं कि इस देश में दूसरे धर्म के लोग भी रहते हैं और भारतीय संविधान उन्हें वो सारे अधिकार देता है जो हिन्दुओं को देता है। ऐसे में यदि कुछ लोग सोचते है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हिन्दू राष्ट्र का निर्माण कर देंगे तो यह बचकानी सोच है क्योंकि अब तो भाजपा में इतनी बड़ी संख्या में दूसरे दलों से लोग आ गए हैं जो कभी भी संघ के लिए मुसिबत खड़ी कर सकते हैं।

आखिर असम में पूरी भाजपा को सरमा के सामने झुकना पड़ा हालांकि बंगाल में शुभेन्द्रु अधिकारी को नेता प्रतिपक्ष बनाना भाजपा की रणनीति हो सकती है लेकिन शुभेन्द्रु अधिकारी को संघ के विचारधारा में ढाल लेना नामुमकिन है और कोई बड़ी बात नहीं कि भाजपा इस मामले में धोखा खा जाए।

शनिवार, 1 मई 2021

लाशें ही तो हैं !


 लाशें ही तो हैं!


वे आते हैं,

अपने साथ लाते हैं,

नफरत का बीज

और रोप देते हैं

हमारे दिमाग में,

और हमारा दिल

दिमाग हो जाता है।


वे आते हैं

ढूंढते है कुछ ज्ञानी, कुछ नामी गिरामी,

पैसे वाले रईस,

या बदमाशों की टोली

और रोप देते हैं 

नफरत के बीज।


धीरे धीरे पनपने

लगता है बीज

दंगे के रुप में

फुटता है अंकुर

खाद पानी के

रुप में मिलता 

रहता है झूठ

अफवाह!


फिर एक दिन

हां एक दिन

पौधा फूटता है

उस बीज से

हम श्रेष्ठ हैं

कुंठित होता पौधा

बड़ा होता है।

पौधों को अब नहीं

चाहिए रोजगार

बढ़ती महंगाई से भी

उसे फर्क नहीं पड़ता


वह तो आतुर है

एक ऐसा फल देने

जिनमें, हमारी भावना हो,

आस्था हो,

सपने हो।

और यह फल ही सत्ता है।

जिसे वे तब तक

खाते रहेंगे

जब तक हम जल

न जाये 

मर न जाये

फना न हो जाये

क्योंकि हम लाशें ही तो हैं। (केटी)

(रोहित सरदाना और उन जैसे पढ़े-लिखे को समर्पित)

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

दोगली शख्सियत...

 कोई भी शख्सियत जब नफरत के मसाले से पकी हो तो वह आम आदमी कहां रह पाता है, उसमें मानवीय संवेदनाओं का तो अभाव होता ही है अपने घर परिवार के प्रति भी निष्ठुर हो जाता है, ऐसेलोग घडिय़ाली आंसू बहाने में तो माहिर होते ही हैं प्रमुख पदों पर बैठते ही इनकी ताकत खौफनाक हो जाती है। वे बात-बात पर झूठ और गुमराह करने वाली तस्वीरें पेश करते रहते हैं। और यह दोगली शख्सियत अचानक रुप नहीं लेता बल्कि यह सालों की मेहनत का नतीजा है। 

खैर इन सब बातों को अब कहने का कोई मतलब ही नहीं है क्यों यह समय कोविड से निपटने का है, इस देवभूमि को पिछली लाशों से मुक्त करने का है, आप इस समय सत्ता से न इस्तीफा मांग सकते हैं और न ही उनसे इस्तीफे की उम्मीद ही कर सकते है। हां उनकी लापरवाही और गैर जिम्मेदारी को चुपचाप किसी तमाशाबीन की तरह देख सकते हैं, जिनके अपने चले जा रहे हैं उनकी हिम्मत बढ़ा सकते हैं ताकि जो सत्ता की इस लापरवाही के बाद भी बच गये हैं वे कम से कम अच्छे से जी तो सके।

अपनों के जाने का दुख वही जानता है जिसका अपना घर-परिवार होता है लेकिन जब व्यक्ति अपने धर्म-जाति को लेकर कुंठित हो जाये तो उसके भीतर की आत्मा कहां जिन्दा रहती है उसे तो बस अपने धर्म को ही श्रेष्ठ बताना है। और इसके एवज में पिछली लाशें उन्हें कभी नहीं दिखाई देगी। कोरोना के शिकार तो फिर भी ठीक हो जा रहे हैं लेकिन सत्ता की लापरवाही के शिकार लोगों का दर्द कोई नहीं समझ सकता। ऐसे मे कल जब रिजाईन मोदी का नारा बुलंद हुआ तो इसे ब्लाक कर दिया गया। सरकार यानी मोदी सत्ता कह रही है कि उसने ब्लॉक नहीं किया? और न ही उसके इशारे पर ही ब्लॉक हुआ है?

लेकिन एक बात सत्ता जान ले किन इस देश की जनता सब-कुछ देख रही है। अब तो पूरी दुनिया में मोदी सत्ता की थू-थू हो रही है और हाईकोर्ट ने जिस तरह से लानत भेजी है उसके बाद तो सत्ता को एक दिन भी बने रहने की नैतिकता नहीं है लेकिन शरम कहां बनती है तब क्या बचा रहता है। अब तो लोगों का भी कहना है कि लानत है सत्ता की आजाद मिजाजी को। मौत के इस मंजर के लिए भले ही कुछ लोग अकेली सत्ता को दोषी मानने से इंकार कर रहे हो। लेकिन सच तो यही है कि यदि उपलब्धि का चोंगा सत्ता अकेले पहनती है तो इन लाशों की साड़ी भी उन्हें ही पहनना है।

प्रख्यात कवि कुमार विश्वास ने जिस ढंग से अपने ट्वीट में कहा है कि उससे तो साफ है कि उनके दिल में कितना गुस्सा है।

यह मंजर क्या गुस्सा दिलाने वाला नहीं है, मां का बच्चों की जिन्दगी के लिए कलपना, पत्नी का मुंह से ही पति को आक्सीजन देने की कोशिश और लाशों को रिक्शा, ठेला, सायकल से ले जाना। क्या सरकार इतनी भी व्यवस्था करने के लायक नहीं बची है तो फिर वह क्यों हैं।

गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

सत्ता का तांड़व...

 

क्या आपने उन भेडिय़ा बच्चों के बारे में सुना है जो चांद की तरफ मुंह उठाकर हुंकाती मादा की घातक छातियों से दूध पीते है, और जब उस बच्चे को झुण्ड से अलग कर बचा लिया जाता है तो वह सबसे पहले बचाने वालों को ही काटता है। उनमें न तहजीब होती है और न ही उससे प्रेम की कल्पना ही की जा सकती है।

आप यकीन नहीं करेंगे लेकिन सत्ता में बैठे लोगों की लापरवाही और गैर जिम्मेदाराना हरकत किसी भेडिय़ा बच्चे से कम नहीं है। बदइंतजामी ने तो जिन्दा लोगों को लाश में तब्दिल करने में कोई कसर नहीं छोड़ा है। इस माह यानी अप्रैल में ही कोरोना से मरने वालों का आंकड़ा पचास हजार पार कर चुका है और विशेषज्ञों की माने तो आने वाले दिनों में इसमें और तेजी आएगी। लोगों को तो पचास हजार वाले सरकारी आंकड़ों पर यकीन ही नहीं है वे इसे कई गुणा बता रहे हैं।

अपनी नाकामी छुपाने कोई सत्ता किस हद तक निचता पर उतर जाये ये कहना मुश्किल हो गया है। सत्ता की बेशर्मी आप गिनते रह जाएंगे और उससे ज्यादा निचता और बेशर्मी तो उन लोगों की है जो अपनी हिन्दू कुंठा के चलते देश को पहले ही बर्बाद कर देना चाहते हैं। देशभर में जिस तरह से कब्रिस्तान से श्मशान घाट तक लाशों की लाईने दिखाई देने लगी है वह किसी भी संवेदनशील सरकार के मुंह में तमाचा है लेकिन केन्द्र सरकार अभी भी सिर्फ और सिर्फ राजनीति कर रही है। लगता है कि भाजपा शासित राज्य के मुख्यमंत्री तो मोदी-शाह से इस कदर दहशत में है कि न तो वो एक देश एक कीमत पर ही कुछ बोल पा रहे हैं और न टीका को सभी तरह के टेक्स फ्री पर ही कुछ बोल पा रहे हैं। यदि हम महामारी में भी केन्द्र की सत्ता वेक्सीन में टैक्स माफ नहीं कर पा रही है तो इसका मतलब क्या है। 

पहले ही सरकार की लापरवाही, बदइंतजामी और लॉकडाउन के चलते कालाबाजारी की मार झेल रही जनता यदि सरकारी स्तर पर भी आपदा में अवसर की शिकार होकर अपने जान-माल को नहीं बचा पा रही है तो इस सरकार को होने का मतलब क्या है। अब तो इस सरकार की लापरवाही और बदइंतजामी को गिनाने का कोई मतलब ही नहीं है क्योंकि इस लापरवाही की लाश पर अब भी कुंठित हिन्दू बेशर्मी से जश्न मनाने का मौका ढूंढते रहते है। संघी नफरत का जज्बा लिये झपट्टा मारने को तत्पर गिद्ध की तरह वे केन्द्र की लापरवाही का ठिकरा राज्यों पर फोडऩा चाहते हैं।

हैरानी तो इस बात की है कि वे पिछली गलतियों से सबक लेने की बजाय नई-नई गलितयां कर अपनी बेशर्मी का परिचय देते हैं। और हद तो यह है कि वे अब भी यह मानने को तैयार नहीं है कि उनकी लापरवाही और अहंकार की वजह से दूसरी लहर में मौत का तांडव मचा है। सबसे शर्मनाक और हैरानी की बात तो यह है कि सत्ता अब भी इस विपदा से निपटने की कोई कारगार कोशिश नहीं कर रही है। जबकि विशेषज्ञों  की राय में आने वाला वक्त बेहद मुश्किल भरा होगा। ऐसे में आत्मा चित्कार उठता है और कहता है-

बस-बस-बस

सत्ता का हवस, बस-बस

झूठ का साहस, बस-बस

कोरोना के कहर से सब बेबस

छाती पे जलती लाश बस-बस

बदइंतजामी, बेरुखी का कॉकस 

सत्ता का अट्हास बस बस बस

सत्ता की रईसी, प्राण वायु की गरीबी

दबता जनता का नस, बस बस बस

कौशल दबा दो सत्ता का नस

न हो सके टस से मस।।

बस बस बस...

बुधवार, 28 अप्रैल 2021

सिस्टम का मतलब...

 

क्या देश की जनता को सत्ता द्वारा इतना बेवकूफ समझा जाता है कि वह कुछ भी कहे मान ले। दरअसल बात सिस्टम के फेल हो जाने की हो रही है। सच तो यह है कि सिस्टम फेल नहीं बल्कि एक्सपोज हो गया। खुद को बचाने जिस बेशर्मी से सत्ता ने सिस्टम पर दोष मढ़ा है वह हैरान ही नहीं उन लोगों के मुंह में करार तमाचा है जो दिन-रात इस देश की तरक्की के लिए काम कर रहे हैं।

इस देश की वह पुलिस जो इस भीषण काल में भी अपनी नींद खराब कर, सड़कों पर पहरेदारी कर रही है, इस देश के डाक्टर, नर्स, नर्सिंग स्टॉप अपने परिवार की चिंता किये बगैर गरीबों की सेवा में लगे है, जाति धर्म का भेद भुलाकर इस महामारी में आम जन एक साथ खड़े हैं क्या ये सभी सिस्टम को कटघरे में खड़े करने का अधिकार सत्ता को है? दरअसल खराबी सिस्टम में नहीं सत्ता में बैठे लोगों में है। जब उसकी लापरवाही गैर जिम्मेदारी सबके सामने आने लगा तो वह सिस्टम को दोष देने लग गया। 

जो लोग आज अपनी जिम्मेदारी और लापरवाही के चलते इस देश की यह हालत की है वे लोग तब क्यों सिस्टम को दोष नहीं दे रहे थे जब गृहमंत्री के पुत्र जय शाह को पद दे रहे थे, तीन हजार करोड़ की मूर्ति बनवा रहे थे, सिस्टम खुद के लिए 8 हजार करोड़ का प्लेन खरीदता है। चुनाव प्रचार करने बंग्लादेश चला जाता है लेकिन अस्पताल नहीं जाता। देश की सम्पत्ति को यह सिस्टम निजी हाथों में सौपता है, किसान बिल लाता है, सीएए लाता है, नोटबंदी करता है, विधायक खरीदता है, नमस्ते ट्रम्प करता है तब सिस्टम ठीक था लेकिन जब लोग बिलखकर तड़पकर मरने लगे तो सिस्टम फेल हो गया।

दरअसल सिस्टम फेल ही नहीं हुआ है बल्कि एक्सपोज हो गया है। क्योंकि इस सिस्टम ने जिस तरह से बात-बात पर झूठ बोलकर नफरत की दीवार खड़ी की थी और अपनी सुविधानुसार सिस्टम तैयार किया था वह इस महामारी में पूरी तरह एक्सपोज हो गया। हमने पहले ही कहा है कि यह देश दुनिया के किसी भी देश से भिन्न है, इस देश को किसी धर्म या महजब का ही प्रयास है। यह देश बना है प्रेम और सत्य की राह पर चलकर बना है, यहां झूठ-नफरत, छल-प्रपंच का कोई स्थान नहीं है और जिसे भी सत्ता ने इसे अपने इशारे पर हांकने की कोशिश की उसे मुंह की खाना पड़ी है।

जो हिन्दू कुंठा से ग्रसित है वे खुद ही जान ले कि छोटे-छोटे राज्यों में बंटे इस देश को एक करने में क्या कुछ नहीं किया गया, तब भारत बना है। आजादी की लड़ाई में हिन्दु ही नहीं मुस्लिम-सिख सहित सब धर्म के लोगों ने अपना लहू बहाया है। इस देश पर जितना हिन्दुओं का अधिकार है, उतना ही अधिकार दूसरे धर्म के लोगों का है।

लेकिन पिछले सालों में सत्ता ने क्या किया, वह अपनी तरह का सिस्टम तैयार करने लगा, अपनी कुंठा, झूठ और नफरत को सिस्टम का अंग बनाने की कोशिस की गई। जब सत्ता में बैठे लोगों का समूचा ध्यान ही अपनी सत्ता को विस्तार देने में हो तो फिर वह आम लोगों के बारे में कैसे सोच सकता था, उसका सारा सिस्टम सत्ता के लिए था इसलिए महामारी की चेतावनी को नजरअंदाज कर पहली लापरवाही की गई, पहली लहर में हुई लापरवाही ने कितनी ही जाने ली।

गुरुवार, 22 अप्रैल 2021

जन की बात-6

 

विभिन्न प्रदेशों में रिकार्ड मौतें, देश में कोरोना ने नया रिकार्ड बनाया और देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संबोधन में देश को लॉकडाउन को अंतिम विकल्प बताना क्या यह संकेत नहीं है कि बंगाल का चुनाव तो निपट जाने दो।

जब भी इस देश को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संबोधित किया है अजीब सा सन्नाटा पसरा है, इस बार तो मरघट सी शांति रही। ये ठीक है कि कुछ लोगों को केवल धार्मिक स्थल और श्मशान में ही शांति मिलती है लेकिन उनका क्या जो घर परिवार में, समाज में, सुख-शांति से रहते हैं। हमने इसी जगह पर कितनी बार लिखा है कि चुनाव में मुद्दा नागरिकों के मूल-भूत सुविधा होनी चाहिए, जाति-धर्म से उपर उठकर व्यवस्था पर वोट डालना होगा, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, बेरोजगारी, अपराध, भ्रष्टाचार पर वोट हो लेकिन न किसी सत्ता ने इसे स्वीकार किया न ही किसी धार्मिक और जाति से बंधे कुंठित लोगों ने ही माना।

तब, जब आज महामारी की इस भीषण त्रासदी से लोग प्रभावित हो रहे है तो भी सत्ता उन्हें धर्म और जाति में ही उलझाने में लगी है। हमने बार-बार कहा है कि सत्ता का एक ही चरित्र हो गया है वह अपनी रईसी और सत्ता बरकरार रखने के लिए फूट डालो राज करो की नीति का ही इस्तेमाल करती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस संबोधन से रही-सही उम्मीद भी न टूटी हो तो शायद कोविड के ट्रिपल म्यूटेंट की प्रतीक्षा का इंतजार कर लें। क्योंकि सत्ता कभी भी अपना दोष नहीं देखती, वह निर्दोष होती है? दोष तो बेबस जनता की आखों में है जो खुद तो कुछ करती नहीं सारा दोष सत्ता पर मढ़ देती है?

सोशल मीडिया में मोदी विरोधी अपना भड़ास निकाल कर जनता को ही दोषी ठहरा रहे हैं कि उन्हें तो मंदिर चाहिए था, वे अस्पताल या स्कूल की मांग कब की थी, सत्ता से लेकर पूरी मीडिया भी इस दूसरी लहर के लिए जनता को ही दोषी ठहरा रही है। जिस देश में आज भी लोग स्वास्थ्य सुविधा के अभाव में, दो जून की रोटी की आपाधापी और परिवार पालने के संकट से मर रहे हो वहां सत्ता और मीडिया का कहना कि जनता लापरवाह है वह घर में बैठे तो फिर उनकी बुद्धि पर सवाल उठना ही चाहिए?

क्या सत्ता की ताकत है कि वह अपने देश के लोगों को इस महामारी में भी बिठा के खिला सके, और मुफ्त में ईलाज कर सके? जब यह ताकत ही नहीं है, और वे खुद देश के संस्थानों को एक-एक कर बेच खा रहे है तो फिर जनता कैसे घर में बैठकर जी सकती है? यह सवाल क्या मीडिया को नहीं उठाना चाहिए? यह देश का दुर्भाग्य है कि हमने उन्हें सत्ता सौंपी है जो यह भी नहीं कह पा रहा है कि जनता घर में रहे, हम भोजन और चिकित्सा की व्यवस्था मुफ्त कर रहे है? कोरोना से बचने के लिए घर में ही रहने की वकालत करने वाली सत्ता में है इतनी हिम्मत कि अपने देशवासियों या प्रदेशवासियों को यह दे सके। नहीं है, उसे तो अपनी रईसी बरकरार रखी है, वे सुविधा को लेकर जो भी फैसले लेंगे अपने लिए लेंग।

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण-2

 

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण का इतिहास बहुत पुराना नहीं है, लेकिन यह जानना जरूरी है कि इसका इतिहास क्या है और कब से शुरु हुआ। इससे पहले ये जान ले कि इसकी शुरुआत कैसे हुई?

ऐतिहासिक तथ्य इसे हिटलर से शुरुआत होना बताते हैं। क्या इससे पहले भी शुरु हुआ? इतिहासकारों का अपना दावा है लेकिन एक बात तो तय है कि इसकी शुरुआत सत्ता और श्रेष्ठता पर आधारित है। सत्तासीन होने और स्वयं को श्रेष्ठ समझने-समझाने के साथ ही ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण हुआ है। क्योंकि बगैर पढ़े-लिखों को तो आसानी से बेवकूफ बनाया जा सकता है लेकिन पढ़े-लिखाों में नफरत का ध्वजारोहण आसान नहीं होता क्योंकि वे पंचतंत्र के शेर आया शेर आया वाला चरवाहे की कहानी भी पढ़े लिखे होते है तो आदमखोर शेर के दलदल में सोने का कंगन दिखाकर शिकार करने की कहानी भी जानते हैं तब सवाल था ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण कैसे किया जाए।

हमने पहले ही कहा है कि आदमी तोता नहीं है जो रटा रटाया वाक्य 'शिकारी आयेगा, जाल फैलायेगा, दाना डालेगा, दाना नहीं चुगना, जाल में फंस जाओगÓे को बोलकर जाल में फंस जायेगा! इसलिए दिल और दिमाग को अलग करना जरूरी था। और यह काम भारत में अंग्रेजों ने किया। अंग्रेजों ने भारतीय को टाई पहनाना शुरु किया। टाई दिल यानी हृदय और दिमाग यानी मस्तिष्क के बीच गले में पहना जाता है। यानी ज्ञान पर नफरत की ध्वजारोहण की शुरुआत भारत में अंग्रेजों ने शुरु की। वह आजादी की लड़ाई का दौर था, अंग्रेजों ने भले ही 1857 की क्रांति को विफल कर दिया था, लेकिन हिन्दू-मुस्लिम एकता को तोड़कर ही लंबे समय तक राज किया जा सकता था।

इतिहास चिख-चिख के कह रहा था कि शिवाजी से महाराणा प्रताप के लिए मुस्लिम और मुगलों की तरफ से हिन्दू युद्ध करते थे। कहीं धर्म को लेकर नफरत नहीं था। युद्ध केवल और केवल राजाओं की सत्ता प्राप्ति और सत्ता के विस्तार की वजह से होते थे। आम तौर पर हिन्दू-मुस्लिम सभी एक साथ रह रहे थे। जाति भेद तो था लेकिन वह जीवन जीने के तरीके को लेकर था। नफरत की दीवारें कैसे खड़ी की जाए ताकि जाति और धर्म की दीवार में जहर बोया जा सके यह काम अंग्रेजी सल्तनत का था। और इसी अंग्रेजी सल्तनत ने ही अपने स्वार्थ के लिए नफरत का जहर बोना शुरु किया। मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय सेवक संघ का उदय हुआ। और भी संगठन बनने लगे।

1857 की क्रांति से डरे अंग्रेजों ने हिन्दू और मुस्लिम एकता को कुठाराघात करने जहां बंग भंग जैसे कानून लाये तो दलितों को अलग करने पूना पेक्ट लाया गया। इस अंग्रेजी नीति में वे लोग फंसते चले गए, जिसमें स्वार्थ भरा था, या जिनमें संघर्ष का माद्दा नहीं था। उधर हिटलर की जर्मन नस्ल की श्रेष्ठता ने पूरी दुनिया को विश्व युद्ध में झोक दिया तो उसी तरह की श्रेष्ठता की लड़ाई यहां भी होने लगी। इतिहास कुरेदे गये जिनका वर्तमान से कोई संबंध नहीं रहा। राजाओं की लड़ाई में हिन्दू-मुस्लिम का मसाला लगाया गया जबकि वह केवल सत्ता की लड़ाई थी। राजाओं के फैसलों में हिन्दू मुस्लिम ढूंढा गया। यहां तक कि अफवाह, झूठ का सहारा लिया जाने लगा।  झूठ को अतिशयोक्ति तक ले जाकर नफरत के बीज बोए जाने लगे। 

लेकिन महात्मा गांधी दीवार बनकर खड़े हुए। नफरत के हर तीर पर ढाल बने रहे लेकिन अंग्रेजों की नीति को कामयाब होने से नहीं रोक पाये। देश का विभाजन नहीं रोक पाये। और विभाजन के बाद जब सत्ता नहीं मिली तो गांधी को ही मार डाला गया। (जारी...)

रविवार, 11 अप्रैल 2021

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण...


कोविड-19 अब 21 साबित होने लगा है, हर तरफ हाहाकार है, छोटे शहरों की हालत ज्यादा खराब है, अस्पतालों में बेड की कमी, और लापरवाही ने कितने ही घरों की रोशनी छिन ली, और यह आगे कब तक चलेगा कहना मुश्किल है।

कई शहरों में ताला लगने लगा है जिसे लॉकडाउन कहा जा रहा है, शासन-प्रशासन की बेबसी साफ दिखाई देने लगा है, दो गज की दूरी, मास्क जरूरी ही इस संक्रमण से बचने का एक मात्र उपाय है। लेकिन नेताओं को राजनीति करने से फुर्सत नहीं है वे इस आपदा को भी अवसर में बदलकर अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं।

सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को गई की तर्ज पर सत्ता और विपक्ष अपने में मस्त हैं, हालांकि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बेबाकी से स्वीकार किया कि छत्तीसगढ़ में कोरोना बढऩे की कई वजहों में से एक वजह रोड सेफ्टी क्रिकेट टूर्नामेंट भी हो सकता है लेकिन असली वजह विदर्भ से होली त्यौहार के लिए आवाजाही है। आज के इस दौर में यह स्वीकारोक्ति भी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हाउडी ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सत्ता बनाने की चाह में निर्णय की देरी की बात को आज तक केन्द्र की सत्ता मानने को तैयार नहीं है।

यह सभी जानते हैं कि राहुल गांधई सहित विपक्ष के कई नेता जनवरी-फरवरी से ही मोदी सत्ता को इसकी भयावकता पर चिंता जता रहे थे लेकिन निर्णय में देरी की वजह से न केवल कोरोना से मौतों के आकड़े बढ़े बल्कि 186 मौते गरीब मजदूरों की सड़कों पर हो गई। मध्यम वर्गों की हालत सबसे ज्यादा खराब हुई। बढ़ते संक्रमण ने देश की आर्थिक स्थिति को बदहाल कर दिया। ऐसे में याद कीजिए सत्ता ने अपनी गलती छुपाने किस तरह से नफरत फैलाकर अपने को पाक बताया था। तब्लिकी जमात और मौलाना साद तो कईयों को आज भी याद होगा लेकिन शायद वे नहीं जानते होंगे कि इस मामले में न्यायालय ने फैसले क्या दिये, सभी पर लगे आरोप निराधार पाये गए। विदेशी नागरिक अपने देश में लौट गए और मौलाना साद के रुप में जो नफरत फैलाई गई वह उन लोगों के दिलों में घर बना लिया जो अच्छे खासे पढ़े लिखे, डिग्रीधारी हैं।

ज्ञान पर नफरत का यह ध्वजारोहण नया नहीं है, हां तरीका नया है क्योंकि एक ही तरीका अपनाया गया तो लोग बेवकूफ नहीं बनेंगे। इसलिए हर बार पूरे सच में से आधे में अपना झूठ और नफरत की चाशनी लपेटी जाती है और इसे परोसा जाता है कि यही पूरी सचा लगे।

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण नया नहीं है, धर्म और राष्ट्रवाद के चश्में ने अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे नौजवानों को अपनी चपेट में लिया है। ताजा उदाहरण  बंगाल का है, जिसमें ममता बैनर्जी सिर्फ इसलिए बानों बना दी गई क्योंकि वे अल्पसंख्यकों की पीड़ा के साथ खड़ी नजर आती है। सच तो यह है कि उन्होंने जिस सादगी के साथ मुख्यमंत्री को जिया है वैसा देखने को ही नहीं मिलेगा। विधायक-सांसद से लेकर मुख्यमंत्री तक के सफर में वह आज भी अपनी लिखी किताब की रायल्टी और पेटिंग बेचकर ही पैसा रखती है। न विधायक-सांसद का पेंशन न वेतन।

बकौल ज्योति बसु, 'ममता ही असली कामरेड है लेकिन गलत पार्टी में हैÓ। को नजरअंदाज कर भी दें तो जब आज अपने को सजने संवारने में गरीब से गरीब घर की लड़कियां भी हजारों रुपए खर्च करती है खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने को गरीब घर का बताते हुए लाखों रुपए चश्में, घड़ी व पहनावे फैशन पर करते हो तब ममता की सादगी से मुकाबला उसे बानों बनाकर ही किया जा सकता है। तब इस नफरती ध्वाजारोहण में शामिल कितने पढ़े लिखे हैं जो ममता को बानों कहने का विरोध करते हैं? क्या यह उन पढे-लिखे लोगों के क्षणिक स्वार्थ से यह ध्वजारोहण उचित है। मंडल कमीशन के बाद से जिस तरह से पढ़े-लिखे लोगों पर धर्म का कंबल डाला गया है, उसका दुष्परिणाम यह है कि अब मध्यम वर्ग बेबस है असहाय है और कुछ लोग शर्मसार तो हैं लेकिन खामोश कहना ठीक नहीं, भीतर ही भीतर घुस रहे हैं।

(जारी...)

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

मेरा नाम जोकर...

 

इतिहास अपने आप को दोहराता है, जान लिजिए कि, राजकपूर ने एक फिल्म बनाई थई- मेरा नाम जोकर! अपना सब कुछ दांव पर लगाकर बनाई यह फिल्म अपनी पहली रीलिज में बुरी तरह पीठ गई, राज कपूर का सब कुछ लूट गया, यहां तक कि उनकी स्टूडियों तक के बिकने की नौबत आ गई लेकिन वे अकेले थे, संभल गए। यदि नहीं संभलते तब भी उनका परिवार सड़क पर आता फिर पता नहीं क्या होता!

खैर यह इतिहास की बातें हैं, लेकिन मेरा नाम जोकर का इतिहास इस बार पूरे देश में दोहराया गया, राजनीति में बन रही यह फिल्म पूरा हुआ है या नहीं कहना कठिन है, लेकिन इस फिल्म में कई जोकर हैं, और अब भी कई जोकर की भूमिका के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं। सालों से बन रही इस फिल्म के निर्माता पर्दे के पीछे से नये-नये जोकर ढूंढते हैं, जो सत्ता के बाहर रहते कुछ कहते हैं लेकिन सत्ता में आते ही अपनी ही जुबान से पलट जाते हैं, लेकिन जोकर की भूमिका मिलने और फिल्म पूरी करने की चाह में या पूरी फिल्म देखने की चाह में लोग किसी का नहीं सुन रहे हैं।

नफरत, अफवाह झूठ के मसाले रोज डाले जा रहे हैं और जोकर की अदाकारी पर ताली बजाने वालों की कमी नहीं हैं। यह फिल्म अभी पूरी भी नहीं हुई है तब कितने ही लोग बर्बाद होने लगे हैं और जब फिल्म पूरी होगी तो पता नहीं क्या होगा। हैरानी की बात तो यह है कि फिल्म पूरी होने की ईच्छा रखने वाले भी अब सड़कों पर आने लगे हैं लेकिन दूसरों को बर्बाद करने का शौक में कहां देखता है कि वह खुद और उसका घर बर्बाद हो रहा है।

मतलब साफ है, समझदार के लिए ईशारा काफी है। जीएसटी से लेकर राजनीति में अपराधियों की खिलाफत करने वाले आज खुद ही अपराधग्रस्त होने लगे हैं। नोटबंदी, लॉकडाउन, जीएसटी, निजीकरण, महंगाई, बेरोजगारी और किसानों की व्यथा पर इनके पुराने भाषण सुन लीजिए। इसके बाद भी आंखे न खुले तो जोकर बनने तैयार हो जाईये।

वैसे राजनीति का खेल कौन समझता है? इसलिए आश्वासन पर हर बार वोट पढ़ते जाते हैं। सत्ता की रईसी बरकरार रखने के उपक्रम भी कौन देखता है, क्योंकि जब गले में दुरंगा पट्टा बंधा हो तो हरकत भी दुरंगा ही होगा। कोरोना महामारी के खतरे पर ही राजनीति हैरान करने वाली है, ताली थाली, दीपक जलाने के तमाम उपक्रम के बीच यदि फिल्म पूरी होते देखने की चाह बनी हुई है तो इसका मतलब साफ है कि दोरंगे पट्टे ने आपके गले को इस कदर बांध रखा है कि मस्तिक और दिल को जोडऩे वाला नस अलग हो चुका है अब सिर्फ वही होगा जो जोकर दिखायेगा। फिल्में पूरी हो या ना हो ट्रेलर को हिट किया जायेगा, गानों से कमाई होगी और फिल्म पूरी होते देखने की चाह में जोर बनते लोग यही सोचते रहेंगे कि देशद्रोही फिल्म ही नहीं बनने देना चाहते!

गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

कानून से उपर सत्ता और बेबसी...

 

नक्सली हमले के बाद देश के गृहमंत्री अमित शाह का छत्तीसगढ़ दौरा इन दिनों सुर्खियों में है तो उसकी वजह बगैर मास्क की वे तमाम तस्वीरें है जो साबित करती है कि सत्ता के आगे जनता कितनी बेबस है।

अब जब न्यायालय में कार में अकेले सफर करने वाले को मास्क लगाने को उचित बता रहा है तब सोचिये देश के गृहमंत्री की इन तस्वीरों का मतलब क्या है। कहते हैं कि हर अपराधी की शुरुआत झूठ बोलने की आदत से शुरु होती है और यह सफर रंगा-बिल्ला या कुख्यात तक पहुंच जाता है, इसी तरह सार्वजनिक जीवन में छोटी-छोटी बातों का महत्व है। यही छोटी बात आम आदमी के जीवन को प्रभावित करता है।

ये सच है कि हर व्यक्ति का अपने जीवन में बहुत कुछ निजी होता है लेकिन जो लोग सार्वजनिक जीते है उनकी छोटी सी छोटी बात भी जनमानस को प्रभावित करता है। ऐसे में गृहमंत्री का मास्क नहीं लगाना चुनावी रैलियों में भीड़ और कुंभ या सामाजिक कार्यक्रमों में भीड़ का क्या प्रभाव पड़ता होगा यह सहज ही समझा जा सकता है।

देश केवल कोरोना की महामारी से त्रस्त नहीं है बल्कि झूठ, नफरत और अफवाह के उस जंजाल में भी फंस चुका है जिसके चलते हालात बदतर होते जा रहे हैं। हमारा दावा है कि कोरोना जैसी महामारी नहीं भी आती तब भी देश के हालात इसी तरह केे होते क्योंकि सत्ता पाने के लिए जो बीज बोया गया है उसका परिणाम तो दुखद होना ही था।

कानून को सत्ता के दम पर ठेंगा दिखाने की परम्परा चल पड़ी है, कितने ही उदाहरण है जब सत्ता ने अपनी मनमानी से जनता को बेबस कर दिया है, और अब तो झूठ, नफरत और अफवाह की चाशनी में सत्ता ने जनमानस के दिमाग में नस्लवाद का ऐसा जहर भर दिया है जिसका असर आसानी से जाने वाला इसलिए भी नहीं है क्योंकि सत्ता पाने की राह में सभी जहर बो रहे हैं। याद कीजिए सीएए के विरोध में बैठे लोगों को किस हद तक जलील किया गया वह याद नहीं है तो किसान आंदोलन को ही याद कर लीजिए, अफवाहबाजों ने क्या कुछ नहीं किया। इसके बाद भी यदि किसी को स्यिूमर स्पीड सोसायटी पर भरोसा है तो इसका मतलब साफ है कि विरोध का हर स्वर मुल्ला मुलायम या ममता बेगम के तमके के लिए तैयार रहे।

क्या इस देश में कोई बहुसंख्यक समाज का व्यक्ति किसी अल्पसंख्यक के लिए खड़ा नहीं हो सकता! पूरी दुनिया में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की खबरें नई नहीं है और सत्ता के लिए राजनैतिक दल ये दावा करने से नहीं चुकते कि अल्पसंख्यक उनका हक छिन रहे हैं और पहले ही अव्यवस्था से दुखी व्यक्ति आसानी से ऐसे लोगों की बातों में आ जाते हैं।

ऐसे में यदि अमित शाह के मास्क नहीं पहनने पर उनकी पार्टी के लोग खामोश हो या दूसरे का पाप गिनाने लगे तो समझ लिजिए पट्टा ने दिल और दिमाग दोनों को अलग कर इस हद तक जकड़ लिया है कि मस्तिष्क कुंद हो गया है। और जनता बेचारी तो बेबस है।

सोमवार, 5 अप्रैल 2021

बंद कर दो ये नरसंहार...!

 

बीजापुर में नक्सलियों ने फिर दो दर्जन से अधिक जवानों की हत्या कर दी, अपनी इस कामयाबी पर नक्सली जश्न मना रहे होंगे? लेकिन उन मजदूर और किसानों का क्या जिनके बेटे सालों से नक्सलियों के हमले में मारे जा रहे हैं?

मुझे एक बात नक्सलियों से सीधी पूछनी है कि क्या जवानों को मार देने से उनका राज आ जायेगा? जो लोग अपने बूढ़े मां-बाप और पत्नी बच्चों को छोड़कर नौकरी में आते हैं, उनकी क्या गलती है! इस हमले में कई नक्सली भी मारे गये हैं, उनकी लाशें देखकर भी यदि तुम्हें तरस नहीं आता तो इसका मतलब साफ है कि जो कुछ भी तुम कर रहे हो वह तुम्हारा धंधा है! धंधा तो आजकल नेता भी कर रहे हैं ऐसे में क्या तुम्हारी और नेताओं में सांठ-गांठ नहीं चल रही है?

एक बात और पूछनी है मुझे नक्सलियों से क्या ये हमला भी झीरम कांड की तरह कोई साजिश है? यह सवाल इसलिए पूछ रहा हूं क्योंकि जिस तरह से झीरम हमले को सत्ता बचाने की साजिश के रुप में देखा जा रहा था वैसे ही इस हमले को भी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के असम के चुनावी दौरे से देखा जा रहा है।

हर हमले की जिम्मेदारी लेकर अपने सीने को 56 इंच बताने वालों नक्सली क्या यह भी बता पाओंगे कि यह हमला भी किसी राजनैतिक साजिश का हिस्सा है या नहीं। खैर तुम लोग कुछ नहीं बताओंगे लेकिन जनता जान चुकी है कि नक्सली अब किसी मुद्दे पर नहीं सिर्फ पैसों के लिए लड़ाई लड़ते हैं और जब पैसा  और सत्ता ही सबकुछ है तो फिर क्या फर्क पड़ता है कि इसमें गरीब किसान मजदूर के बच्चे मरे या किसी की सत्ता हिले! तुम्हें तो बस पैसा चाहिए।

लेकिन एक बात ध्यान रखना मौत किसी की भी अच्छई नहीं होती और इस मौत के बाद उनके परिजनों की आह से कोई नहीं बच पायेगा? इसलिए अब भी वक्त है, ये नरसंहार बंद कर दो और व्यवस्था की कमजोरी से लडऩे के लिए अहिंसा के रास्ते पर आ जाओं।

नफरत, झूठ, अफवाह और हिंसा से हासिल सत्ता की न उम्र अधिक होती है और न ही इस रास्ते से सत्ता हासिल करने वाला ही कभी सुखी रहता है। हालांकि तुम्हें इन बातों से क्या मतलब, क्योंकि तुम लोग या तो ईश्वर के अस्तित्व को नकारते हो या ईश्वर के नाम पर अपनी रोटी सेकते हो। फिर भी एक बार और कहूंगा बार-बार कहूंगा बंद करो ये नरसंहार!