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गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

कानून से उपर सत्ता और बेबसी...

 

नक्सली हमले के बाद देश के गृहमंत्री अमित शाह का छत्तीसगढ़ दौरा इन दिनों सुर्खियों में है तो उसकी वजह बगैर मास्क की वे तमाम तस्वीरें है जो साबित करती है कि सत्ता के आगे जनता कितनी बेबस है।

अब जब न्यायालय में कार में अकेले सफर करने वाले को मास्क लगाने को उचित बता रहा है तब सोचिये देश के गृहमंत्री की इन तस्वीरों का मतलब क्या है। कहते हैं कि हर अपराधी की शुरुआत झूठ बोलने की आदत से शुरु होती है और यह सफर रंगा-बिल्ला या कुख्यात तक पहुंच जाता है, इसी तरह सार्वजनिक जीवन में छोटी-छोटी बातों का महत्व है। यही छोटी बात आम आदमी के जीवन को प्रभावित करता है।

ये सच है कि हर व्यक्ति का अपने जीवन में बहुत कुछ निजी होता है लेकिन जो लोग सार्वजनिक जीते है उनकी छोटी सी छोटी बात भी जनमानस को प्रभावित करता है। ऐसे में गृहमंत्री का मास्क नहीं लगाना चुनावी रैलियों में भीड़ और कुंभ या सामाजिक कार्यक्रमों में भीड़ का क्या प्रभाव पड़ता होगा यह सहज ही समझा जा सकता है।

देश केवल कोरोना की महामारी से त्रस्त नहीं है बल्कि झूठ, नफरत और अफवाह के उस जंजाल में भी फंस चुका है जिसके चलते हालात बदतर होते जा रहे हैं। हमारा दावा है कि कोरोना जैसी महामारी नहीं भी आती तब भी देश के हालात इसी तरह केे होते क्योंकि सत्ता पाने के लिए जो बीज बोया गया है उसका परिणाम तो दुखद होना ही था।

कानून को सत्ता के दम पर ठेंगा दिखाने की परम्परा चल पड़ी है, कितने ही उदाहरण है जब सत्ता ने अपनी मनमानी से जनता को बेबस कर दिया है, और अब तो झूठ, नफरत और अफवाह की चाशनी में सत्ता ने जनमानस के दिमाग में नस्लवाद का ऐसा जहर भर दिया है जिसका असर आसानी से जाने वाला इसलिए भी नहीं है क्योंकि सत्ता पाने की राह में सभी जहर बो रहे हैं। याद कीजिए सीएए के विरोध में बैठे लोगों को किस हद तक जलील किया गया वह याद नहीं है तो किसान आंदोलन को ही याद कर लीजिए, अफवाहबाजों ने क्या कुछ नहीं किया। इसके बाद भी यदि किसी को स्यिूमर स्पीड सोसायटी पर भरोसा है तो इसका मतलब साफ है कि विरोध का हर स्वर मुल्ला मुलायम या ममता बेगम के तमके के लिए तैयार रहे।

क्या इस देश में कोई बहुसंख्यक समाज का व्यक्ति किसी अल्पसंख्यक के लिए खड़ा नहीं हो सकता! पूरी दुनिया में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की खबरें नई नहीं है और सत्ता के लिए राजनैतिक दल ये दावा करने से नहीं चुकते कि अल्पसंख्यक उनका हक छिन रहे हैं और पहले ही अव्यवस्था से दुखी व्यक्ति आसानी से ऐसे लोगों की बातों में आ जाते हैं।

ऐसे में यदि अमित शाह के मास्क नहीं पहनने पर उनकी पार्टी के लोग खामोश हो या दूसरे का पाप गिनाने लगे तो समझ लिजिए पट्टा ने दिल और दिमाग दोनों को अलग कर इस हद तक जकड़ लिया है कि मस्तिष्क कुंद हो गया है। और जनता बेचारी तो बेबस है।

शनिवार, 3 अप्रैल 2021

लोकतंत्र की डकैती !

 

सवाल यह नहीं है कि ईवीएम में गड़बड़ी की जा सकती है या नहीं? सवाल तो यह है कि भाजपा और कम्यूनिस्ट पार्टी को छोड़ जब देश की तमाम पार्टियों ने ईवीएम से चुनाव को संदिग्ध बताकर विरोध किया है तब ईवीएम से चुनाव क्यों? और इससे भी बड़ा सवाल तो यह है कि ईवीएम के विरोध पर केवल भाजपा के लोग ही क्यों चिढ़ते है?

क्या ईवीएम से चुनाव निष्पक्ष नहीं हो रहा है? यह सवाल सबसे पहले 2009 में भाजपा के लालकृष्ण आडवानी ने ही उठाये थे  और फिर एक अन्य भाजपाई नेता नरसिम्हन ने तो ईवीएम से फ्राड चुनाव को लेकर पूरी किताब ही लिख दी है। ऐसे में जब ईवीएम को लेकर संदिग्धता बनी हुई है तो क्या इस देश के लोकतंत्र को हड़पा जा रहा है।

पांच राज्यों में हो रहे चुनाव में भी ईवीएम को लेकर हर दौर में सवाल उठ रहे हैं। सवाल तो चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी उठे हैं। याद कीजिए टीएन शेषण का दौर तो लगगता ही नहीं कि चुनाव आयोग नाम की कोई संस्था भी है।

असम में भाजपा प्रत्याशी के बेलेरो से ईवीएम बरामदगी का मामला ही चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा करने के लिए काफई है। हालांकि चुनाव आयोग ने स्वयं को निष्पक्ष बताने चार अफसरों को निलंबित कर उस बूथ में फिर से मतदान कराने का निर्णय लिया है लेकिन सच तो यह है कि बाकी केन्द्रों में सब ठीक-ठाक हुआ है उसकी गारंटी कौन देगा?

हैरानी की बात तो यह है कि इस पूरे मामले में भाजपा की तरफ से ऐसा कुछ नहीं किया गया जिससे लोगों में चुनाव को लेकर भरोसा जगे। हालांकि कांग्रेस सहित अन्य विपक्षियों ने तो भाजपा नेता कृष्णेन्द्रु पॉल की उम्मीदवारी खारिज करने की मांग की है लेकिन पॉल अभी तक भाजपा में बने हुए है।

लोकतंत्र की डकैती पूंजीवाद का शगल है, और पूंजीवाद का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि सत्ता का हस्तांतरण भी पूंजी के बल पर होने लगा है। अब तो सोशल मीडिया में कई तरह के किस्से पढ़े जा सकते हैं। असम हो या मणिपुर यहां तक कि मध्यप्रदेश में सत्ता का हस्तांतरण कैसे हुआ यह किसी से छिपा नहीं है, ऐसे में आम आदमी अपने को ठगा महसूस नहीं करे तो क्या करें।

वोट किसी को भी दो सरकार तो हमारी ही बनेगी का खेल क्या लोकतंत्र की डकैती नहीं है?

शुक्रवार, 5 मार्च 2021

हिटलर की राह...

 

क्या भारत में लोकतंत्र खतरे में है? क्या देश के प्रधानमंत्री की राह हिटलरी हो चली है? क्या असहमति के स्वर को दबाने सरकारी तंत्र का दुरुपयोग किया जा रहा है? ये ऐसे सवाल है जिसे फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट से बल मिलता है।

दुनिया में लोकतंत्र को लेकर अपनी रिपोर्ट में फ्रीडम हाउस ने जिस तरह से अमेरिका और भारत सहित दुनिया के कई देशों में लोकतंत्र में गिरावट बताया है उसके बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि भारत आखिर किस दिशा में जा रहा है। हालांकि इस रिपोर्ट पर अमेरिका के विदेश सचिव ने सहमति जताई है लेकिन भारत भर में इस रिपोर्ट से सन्नाटा छाया हुआ है। यही कोई वाहवाही की रिपोर्ट होती तो अब तक भक्त, वाट्सअप यूनिर्वसिटी और आईटी सेल तारीफों के कसीदे गढ़ते रहते लेकिन रिपोर्ट मोदी सत्ता की करतूतों पर सवाल उठा रहा है तो सन्नाटा है।

सन्नाटे और चुप्पी में वे लोग भी हैं जो कल तक किसान आंदोलन के समर्थन में खड़े थे, फिल्मी हस्तियां, कलाकार, साहित्यकारों की इस रिपोर्ट पर चुप्पी ने ही साबित कर दिया है कि सत्ता का भय किस कदर हावी है। रिपोर्ट की एक-एक बातें न केवल महत्वपूर्ण है बल्कि यह बताती है कि वर्तमान सत्ता ने लोकतांत्रिक मूल्यों को किस तरह तोड़ा है।

ऐसे में नागरिकता कानून से लेकर जेएनयू और वर्तमान में चल रहे किसान आंदोलन को लेकर सरकार भूमिका को स्पष्ट करती है। सीबीआई, ईडी और आयकर की कार्रवाई को लेकर विपक्ष पहले ही आरोप लगाते रही है कि ये सब विरोध के स्वर को दबाने मोदी सत्ता का औजार है। अनुराग और तापसी के यहां मारे गये आयकर छापे भी इसी ओर चुगली करते हैं।

भारत की आंशिक आजादी को लेकर फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट को लेकर इतिहास को पलटने की जरूरत है कि आजादी की लड़ाई में कौन खड़ा था, कैसे मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने झूठ और अफवाह का सहारा लिया गया ?

ऐसी कितनी ही रिपोर्ट फाइलों में बंद है जो साफ कहता है कि दंगा होता नहीं करवाया जाता है, गढ़ा जाता  है? ऐसे कितने ही सवाल उठाये गये जो गैर जरूरी थे, जिसमें सिवाय नफरत के अलावा कुछ नहीं था।

ऐसे में आज तक फ्रीडम हाउस ने भारत के लोकतंत्र में आई गिरावट को लेकर जब रिपोर्ट प्रकाशित की है तब आम आदमी को सोचना होगा कि आखिर इस देश में किसकी जरूरत है।

क्या नेताजी सुभाष बाबू की वकालत सिर्फ इसलिए की जाती रही ताकि बीस साल तक तानाशाही शासन की मंशा के समर्थक है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चालीस और पचास के दशक में बहुत से देश आजाद हुए जिनमें से अधिकांश देशों में राजशाही या तानाशाही सत्ता का उदय हुआ। भारत में भी कई राजा  इसके समर्थक थे लेकिन गांधी-नेहरु की सोच ने इस देश में लोकतंत्र की नींव रखी। 

ऐसे में सवाल यही है कि गांधी-नेहरु का विरोध करते-करते हम इतने अलोकतांत्रिक हो चले है कि इस देश में ही लोकतंत्र खतरे में आ रहा है।

मंगलवार, 29 दिसंबर 2020

तब लोकतंत्र का पाठ और ज़रूरी हो जाता है

तब लोकतंत्र का पाठ           और जरूरी हो जाता है...

किसान आंदोलन को लेकर जिस तरह का बवाल खड़ा हुआ है उसके बाद सत्ता के अडिय़ल रुख को लेकर कई तरह के सवाल खड़ा होने लगा है, सत्ता और उनसे जुड़े लोगों ने आंदोलन को बदनाम करने की जो रणनीति अपनाई वह पूरी तरह असफल हो गई और इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि किसान और भड़क गये। अडानी-अंबानी के बहिष्कार के साथ ही अब जिस तरह से आंदोलन का रुख जा रहा है वह देश के लिए चिंता का सबब बनता जा रहा है।

निजीकरण के प्रति सरकार की बढ़ती रूचि की एकमात्र वजह सत्ता की रईसी को बरकरार रखने के अलावा कुछ नहीं है। ऐसे में सवाल यह नहीं है कि किसान आंदोलन का परिणाम क्या होगा? बल्कि सवाल यह है कि यदि कृषि जैसे क्षेत्रों में भी इस तरह के कानून आ जाए तो किसानों का भला कैसे हो पायेगा? जबकि आज भी किसानो को अपनी उपज समर्थन मूल्य से कम में बेचना पड़ रहा है। जबकि इन्हीं अन्नदाताओं के भरोसे देश मजबूत हुआ है।

भले ही सत्ता और उनसे जुड़े लोग यह तथ्य न माने कि किसानों की वजह से ही भारत की समृति और आत्मनिर्भरता कायम है लेकिन सच यही है। किसानों ने हमेशा ही इस देश को आत्मनिर्भर बनाने में खूब मेहनत की है।

याद कीजिए वह दौर जब कम उपज की वजह से अमेरिका ने अनाज देने के नाम पर दादागिरी की थी तब इन्हीं किसानों के हरित क्रांति कर देश को अनाज के उत्पादन में न केवल आत्मनिर्भर किया बल्कि निर्यात के माध्यम से विदेशी मुद्रा भी दिलाई। श्वेत क्रांति से लेकर सहकारिता में किसानों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। जब भी देश में संकट आया है, इन्हीं किसानों ने सबसे अग्रणी भूमिका निभाई है।

लेकिन हैरान करने वाली बात तो यह है कि सरकार कभी सोच ही नहीं सकती कि किसानों के हालात क्यों खराब है जबकि कृषि से जुड़े उद्योग हो या बीमा कंपनियां रातो रात अमीर हो जाते हैं, खाद बीज दवा बेचने वाली कंपनी अरबों कमा लेती है।

सच तो यही है कि जब तक किसानों की उपज का एक-एक दावा समर्थन मूल्य पर नहीं बिकेगा तब तक किसानों की आर्थिक स्थिति सुधर ही नहीं सकती।

ऐसे में प्रधानमंत्री जब लोकतंत्र की पाठ की बात करते है तो उन्हें अपनी पार्टी और अपने सांसद और विधायकों की तरफ झाकनी चाहिए कि कितने बड़े-बड़े अपराधी जमा हो गये हैं। उन्हें खुद की सुरक्षा में होने वाले खर्च की तरफ देखनी चाहिए जो रोज एक करोड़ रुपये खर्च किये जा रहे हैं।

खुद की सुरक्षा में हर रोज करोड़ों रुपये खर्च करने वाला यदि किसानों को रोज का 17 रुपये देने के बाद उसे सम्मान कहे तो लोकतंत्र का सबक याद करने की किसे जरूरत है। अपराधियों के भरोसे जब सत्ता चलती है, पार्टियां चलती है तो लोकतंत्र का सबक तो याद दिलाना ही पड़ेगा।

संवैधानिक संस्थाओं पर जब सत्ता की नकेल कसते चली जाएगी तो लोकतंत्र क्या सिर्फ नाम का नहीं रह जायेगा। तब भला लोकतंत्र का पाठ को लेकर तंज कसकर तालियां भी बटोरी जायेगी और पूंजीपतियों की गोद में बैठकर चुनाव भी जीते जायेंगे।

ऐसे में लोकतंत्र के लिए शबीना अदिम का यह शेर जरूरी सबक है...

यही बात खुद समझना,

यही बात आम करना।

जो गुरूर में हो डूबा,

उसे मत सलाम करना।


 

सोमवार, 28 दिसंबर 2020

लोकतंत्र का पाठ !

 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा अपने विरोधियों पर तंज कसना नई बात नहीं है ऐसे में उनका यह कहना कि कुछ लोग उन्हें लोकतंत्र का पाठ सीखा रहे हैं, हैरान कर देने वाला है। क्योंकि बीते 6 सालों में जिस तरह से देश के हालात हुए हैं उसके बाद भी कोई लोकतंत्र का पाठ पर तंज कसे तो यह जरूरी हो जाता है कि लोकतंत्र को नये सिरे से समझने की कोशिश हो।

क्या वर्तमान सत्ता के लिए सिर्फ चुनाव कराना ही लोकतंत्र नहीं रह गया है? देश के प्रधानमंत्री ने क्या किया है यह देखना भी जरूरी है। बीते 6 साल में देश के इस हालात के लिए कौन जिम्मेदार है? चुनाव दर चुनाव जीतना और सत्ता हासिल करने के लिए छल प्रपंच करना ही लोकतंत्र है तो फिर लोकतंत्र का पाठ नये सिरे से पढऩे की जरूरत है।

लोकतंत्र की विद्वानों ने कई तरह की परिभाषा दी है, उन परिभाषाओं में प्रधानमंत्री कहां फिट बैठते हैं इस पर भी बहस की जा सकती है। जबकि लोकतंत्र को लेकर जितने भी परिभाषाएं गढ़ी गई हैं उनमें जनता का जनता के लिए शासन ही महत्वपूर्ण है और जनता जब लोकतंत्र में महत्वपूर्ण है तब सत्ता क्यों अपने को महत्वपूर्ण समझती है। सारी योजनाएँ सत्ता के अनुकूल ही क्यों बनती है?

यह सवाल इसलिए उठाए जा रहे हैं क्योंकि वर्तमान सत्ता के लिए चुनाव ही महत्वपूर्ण है। ऐसे में लोकतंत्र का पाठ पढ़ाना और उसे याद रखना कहां महत्वपूर्ण रहेगा।

सवाल जब लोकतंत्र का है तो यह भी समझना होगा कि लोकतंत्र का मतलब सिर्फ चुनाव नहीं है, सिर्फ जनता के हित के फैसले भी लोकतंत्र नहीं है, देश को सुदृढ़ बनाना भी लोकतंत्र का हिस्सा है न कि सार्वजनिक उपक्रमों को बेचकर अपनी रईसी बरकरार रखना।

हमने पहले भी लिखा है कि सत्ता की ताकत ने इस देश में लोकतंत्र का किस कदर रोका है। सत्ता ने कैसे अपनी जीत पर खुद को ईश्वर समझ लिया है। और जनमानस की भावनाओं की अनदेखी की है।

हम अपने पाठकों को याद दिला दें कि आजादी के बाद इस देश में जितने भी प्रधानमंत्री बने हैं उनमें से सभी ने इस देश को सुदृढ़ करने, इस देश में रोजगार देने और संसाधनों का देश हित में इस्तेमाल करने सार्वजनिक उपक्रमों की स्थापना की है। बाजारवाद के बढ़ते प्रभाव और रिफार्म के दौर में भी नरसिन्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर मनमोहन सिंह के दौर में भी दर्जनों सार्वजनिक उपक्रम बनाये गये लेकिन नरेन्द्र मोदी ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने अपने 6 साल की सत्ता में कोई भी सार्वजनिक उपक्रम नहीं बनाये बल्कि तेईस सार्वजनिक उपक्रमों को बेच भी दिया।

ऐसे मे कोई लोकतंत्र के पाठ को लेकर जब सवाल खड़ा करे तो यह साबित नहीं करता कि लोकतंत्र का पाठ पढऩे की जरूरत है। 

फिर इस मजाक को जम्हूरियत का नाम दिया 

हमें डराने लगे हैं वो हमारी ताकत से

-नोमान शौक

मुझसे क्या लिखानी है कि अब मेरे लिये

कभी सोने, कभी चांदी के कलम आते हैं

-बशीर बद्र


रविवार, 27 दिसंबर 2020

लोकतंत्र कहां हैं...!

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जम्मू कश्मीर के लोगों के लिए आयुष्मान भारत की घोषणा करते हुए जब कहते हैं कि कुछ लोग मुझे रोज लोकतंत्र का पाठ पढ़ा रहे हैं तब यह सवाल स्वाभाविक रुप से उठता है कि क्या देश का प्रधानमंत्री लोकतंत्र की परिभाषा भूल गये हैं या वे लोकतंत्र को सबसे ज्यादा जानते है।

हमने पहले भी इसी जगह पर लिखा है कि वर्तमान सत्ता के किसान आंदोलन को लेकर जो अडिय़ल रुख अख्तियार किया है वह किसी भी लिहाज से उचित नहीं है। लोकतंत्र में कानून बनाना या अपने एजेंडे को लागू करना सरकार का ही काम है लेकिन इसका यह कोई मतलब नहीं है कि विरोधियों को पाकिस्तानी या खालिस्तानी करार दिया जाए।

जब से तीनों कृषि कानून के खिलाफ किसानों ने आवाज बुलंद की है तभी से सत्ता और उनसे जुड़े लोगों ने आंदोलनरत किसानों के खिलाफ विषवमन किया है। यहां तक कि इस आंदोलन को विदेशी साजिश तक बता दिया गया। लेकिन सच तो यही है कि ये तीनों कानून को लेकर किसानों के मन में जो शंकाएं हैं उसे दूर करने की कोशिश नहीं की गई।

सरकार को अपनी दिक्कत हो सकती है लेकिन क्या यह सच नहीं है कि किसानों की हालत दिनों दिन बदतर होते जा रही है ऐसे में किसानों को लेकर गठित आयोग कि सिफारिश पर मोदी सत्ता ने पिछले 6 सालों में क्या किया? कुछ भी नहीं न भूमि सुधार न तकनीकी? ऐसे में जब किसानों के लिए मंडी और समर्थन मूल्य महत्वपूर्ण हो जाता है तब उस पर भी कानून नहीं बनाना क्या सरकार का अडिय़ल रुख नहीं है।

तब भला लोकतंत्र के पाठ को लेकर तंज कसना यह साबित नहीं करता कि प्रधानमंत्री को लोकतंत्र का सम्पूर्ण ज्ञान है और वे लोकतंत्र को लेकर कुछ भी नहीं समझना चाहते जबकि यह सर्व सत्य है कि जीवन के हर क्षेत्र में रोज सीखने का अवसर मिलता है चाहे आप उस क्षेत्र के कितने भी बड़े ज्ञानी हो। रोज कुछ कुछ सीखा जा सकता है।

जहां तक लोकतंत्र का सवाल है तो यह कौन नहीं जानता कि आज भी इस देश में लोकतंत्र सत्ता की ताकत और पूंजी के दबाव में पैरों तले रोज रौदा जाता है। जो व्यक्ति कानून के चक्कर में पड़ता है उससे पूछिये कि न्याय उसे कब मिलता है या तो वह टूट जाता है या जीवन का अंतिम सांस ले रहा होता है। इस न्याय को लोकतंत्र का विजय बताकर सत्ता भले ही खुश हो ले लेकिन सच तो यही है कि सत्ता का हर कदम उसके अपनी रईसी को बरकरार रखने में होता हैं।

ऐसे में आम आदमी का दर्द को लेकर मशहूर शायह राजेश रेड्डी के इस शेर की याद आती है-

शाम को जिस वक्त खाली हाथ घर जाता हूं मैं

मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूं मैं।।

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

कर्णधारों के मायने और महापर्व की आगाज...


लोकतंत्र कर सबसे बड़े महापर्व का आगाज हो गया। 16 मई तक राजनैतिक दलों की सांसे सांसत में रहेगी। 81.4 करोड़ मतदाता अपने 543 कर्णधारों को चुनेंगे।  जो जीतने के पहले अपने पक्ष में मतदान कराने घर घर घुमेंगे।
चुनाव आयोग के घोषणा के साथ ही शुरु हो रही इस खंदक की लड़ाई पर जीत का सेहरा बांधने की होड़ मची है। और हर बार की तरह इस बार भी जनता ने मोटे तौर पर तय कर लिया है कि सरकार किसकी बननी है। कांग्रेस जहां राहुल गांधी के नेतृत्व में हम जोड़ते हैं वे तोड़ते हैं के नाटों के साथ मैदान में है तो भाजपा पीएमएन वेटिंग नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में देश की आखंडता और महंगाई का मुद्दा बनाने में लगे हैं। पर सच तो यह है कि वर्तमान परिस्थिति में दोनों ही दलों के लिए स्वयं के बूते न तो सरकार बनाने के लिए आवश्यक जादुई आंकड़ा 272 को छुने की क्षमता है और न ही इन्हें छू पाने का विश्वास है।
कल तक कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने के लोभ में किसी भी पार्टी बाहर करने के लोभ में किसी भी पार्टी से गठबंधन करने वाली भाजपा आज भी गठबंधन के रास्ते ही सत्ता तक पहुंचने इस कदर आतुर है कि उसके लिए रामविलास पासवान हो या कोई अन्य दल अछुत नहीं है। उसे पार्टी गुर्राने वाले येदियप्पा से लेकर कल्याण सिंह और शिवसेना से लेकर आरपीआई सभी का समर्थन चाहिए।
पिछले दो दशक से जारी गठबंधन की राजनीति से देश को होने वाले नुकसान की चिंता न तो कांग्रेस को हैं और न ही भाजपा को ही रह गई है। वाजपेयी सरकार के समय में बात हो या यूपीए की हर बार अपनी अक्षमता पर गठबंधन की राजनीति की मजबूरी बताने वाले दल इस बार भी इसी राह पर है तब भला जनता क्या करें।
तीसरे मोर्च ने भी एक गठबंधन तैयार किया है लेकिन इनमें भी वहीं दल है जो देर सबरे कांग्रेस या भाजपा का हिस्सा रह चुके हैं और चुनाव परिणाम के बाद जिधर बम उधर हम के फार्मूले पर भरोसा करते हैं।
इस बार चुनाव रोमांचक और कटु होने की इसलिए भी अधिक संभावना है क्योंकि गठबंधन की राजनीति से परे आन्दोलन की राह चलते दिल्ली की सत्ता हासिल करने वाले आम आदमी पार्टी ने जिस तरह से राजनीति शुरु की है उससे परम्परागत ढंग से जनता को बेवकुफ बनाने वाले राजनैतिक दलों की नींद उड़ गई है। हालांकि आम आदमी पार्टी का असर शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित है लेकिन जिस तरह से आप के नेताओं ने कांग्रेस और भाजपा के बीच दलाली का मुद्दा उठाकर भ्रष्टाचार और महंगाई से त्रस्त जनता के बीच एक नई राजनीति की शुरूआत की है उससे भाजपा की राह कठिन होने लगी है।
कार्पोरेट घरानों के साथ कांग्रेसी और भाजपाई ताल्लुकात को मुद्दा बनाते हुए रातों रात देश में लोकप्रिय होने वाले अरविन्द केजरीवाल की पार्टी भी अपने बूते सरकार नहीं बना सकती लेकिन उसकी जीत तो तभी तय मानी जा रही थी जब उनकी पार्टी की वजह से कई राजनैतिक पार्टियों के मंत्रियों के काफिले की गाडिय़ा कस हो गई। सुरक्षा बल कम हो गये और निराश हो चुके लोगों की आंखो में उम्मीद दिखने लगी।
अब तक सिर्फ सत्ता के लिए जोड़-तोड़ और जीतने वाले प्रत्याशी को ही टिकिट का मापदंड बताने वाले दलों के लिए आप की चुनौती कितनी होगी यह तो पता नहीं लेकिन यह महापर्व अब राहुल बनाम मोदी था यूपीए बनाम एनडीए या कांग्रेस बनाम भाजपा नहीं रह गया है अब इसमें आम आमदी की भागीदारी भी जुड़ गई है जो कर्णधारों के मायने क्या हो यह लकीर खीचीं जा चुकी है।