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शनिवार, 11 जुलाई 2026

अब पृथ्वी के फेफड़े को क्यो बेचने की तैयारी

 अब पृथ्वी के फेफड़े को क्यो बेचने की तैयारी 


छत्तीसगढ़ में 'डबल इंजन' की सरकार बनते ही बस्तर और सरगुजा के विकास तथा कानून-व्यवस्था को लेकर कई बड़े दावे किए जा रहे हैं [00:08]। लेकिन विकास की इसी अंधी दौड़ के बीच एक ऐसा गंभीर सवाल उठ खड़ा हुआ है, जिसने वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और स्थानीय आदिवासियों की रातों की नींद उड़ा दी है। सवाल यह है कि क्या पर्यटन और रोजगार के नाम पर हम अपनी सदियों पुरानी प्राकृतिक विरासत को हमेशा के लिए दफन करने जा रहे हैं? [00:26]

यह चिंता बस्तर की कांगेर घाटी में स्थित एक अनमोल और अद्भुत धरोहर 'ग्रीन केव' (Green Cave) को लेकर है [02:04]। कांगेर घाटी में खोजी गई कुल 27 गुफाओं में से यह गुफा सबसे अनोखी और जादुई मानी जाती है [02:53]। सरकार इसे 'इको टूरिज्म' का एक बड़ा जरिया मानकर आम पर्यटकों के लिए खोलने की तैयारी में है, लेकिन विशेषज्ञ इसे एक आत्मघाती कदम बता रहे हैं।

क्या है 'ग्रीन केव' का जादुई रहस्य?

वैज्ञानिकों के अनुसार, यह गुफा एक 'टाइम कैप्सूल' की तरह है जहाँ लाखों सालों का इतिहास सुरक्षित है [01:45], [03:26]। इस गुफा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि दोपहर के समय केवल 60 मिनट (एक घंटे) के लिए सूर्य की किरणें एक विशेष कोण (angle) से इसके भीतर प्रवेश करती हैं [03:04]। इसी सीमित रोशनी के सहारे यहाँ मौजूद अत्यंत सूक्ष्म जीव (माइक्रोब्स) जीवित रहते हैं, जो गुफा की दीवारों को एक जादुई हरा रंग प्रदान करते हैं [03:13]।

इस गुफा का तापमान हमेशा एक समान (स्थिर) रहता है [03:37]। यहाँ पाए जाने वाले दुर्लभ अंधे केकड़े और विलक्षण प्रजाति के मेंढक पूरी तरह से इसी नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र (Eco-system) पर निर्भर हैं [03:37]।

रोजगार बनाम विनाश का सरकारी तर्क

राज्य सरकार और वन मंत्री केदार कश्यप का तर्क है कि इस गुफा को पर्यटकों के लिए खोलने से स्थानीय युवाओं को गाइड के रूप में रोजगार मिलेगा, होम-स्टे का व्यवसाय बढ़ेगा और बस्तर की गरीबी दूर होगी [03:49], [03:58]। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू बेहद खौफनाक है।

वैज्ञानिक जयंत विश्वास और लखनऊ के प्रोफेसर महेश ठक्कर जैसे विशेषज्ञों ने कड़ी चेतावनी दी है कि इस गुफा के द्वार खोलना इसके अस्तित्व को पूरी तरह से समाप्त कर देगा [02:32], [03:26], [04:37]। विशेषज्ञों का कहना है कि:

1. सांसों की गर्मी का खतरा: यदि प्रतिदिन 500 पर्यटक भी इस गुफा के भीतर जाते हैं, तो इंसानी सांसों से निकलने वाली गर्मी और कार्बन डाइऑक्साइड गुफा के भीतर के रासायनिक संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ देगी [04:18], [04:27]। इससे गुफा का खूबसूरत हरा रंग हमेशा के लिए काला पड़ जाएगा [04:37]।

2. बायो-फिल्म का नष्ट होना: अनजाने में भी अगर कोई पर्यटक इन दीवारों को छूता है, तो हजारों साल पुरानी 'बायो-फिल्म' पल भर में नष्ट हो जाएगी [04:37]।

3. कृत्रिम रोशनी (Lampenflora) का कहर: गुफा के अंदर पर्यटकों के लिए लगाई जाने वाली कृत्रिम लाइटों से वहां एक आक्रामक शैवाल (algae) पैदा हो जाएगा, जो यहाँ के मूल जादुई सूक्ष्म जीवों को खाकर खत्म कर देगा [04:59]।

आदिवासी आस्था और पर्यावरणविदों की गुहार

यह गुफा केवल एक वैज्ञानिक धरोहर नहीं है, बल्कि कुटुंबसर के कंपार्टमेंट 85 में स्थित यह स्थल स्थानीय आदिवासियों की गहरी आस्था का भी प्रतीक है [08:05]। पर्यावरणविदों ने इस खतरे को भांपते हुए वन सचिव से भी औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है [08:15]।

बड़ा सवाल: क्या प्रकृति को बेचकर ही आएगा विकास?

बस्तर के जंगलों और इस 'ग्रीन केव' को मध्य भारत या पृथ्वी का एक महत्वपूर्ण 'फेफड़ा' कहा जाता है [05:30], [05:48]। पत्रकारिता और समाज के सामने आज यह यक्ष प्रश्न खड़ा है कि क्या हम वाकई इतने गरीब हो चुके हैं कि हमें अपनी अनमोल प्राकृतिक विरासत को दांव पर लगाकर रोजगार पैदा करना पड़ रहा है? [01:15], [05:12]

यह एक ऐसी धरोहर है जो एक बार नष्ट हो गई, तो इसे दोबारा बनाना इंसान या विज्ञान किसी के बस में नहीं होगा [06:16]। अब फैसला सरकार और समाज को करना है कि हमें चंद रुपयों का क्षणिक पर्यटन चाहिए या लाखों साल पुरानी यह नायाब विरासत?

वीडियो देखें 

https://youtu.be/PMndlSt7kDY?si=hrd44SWW8HWfLHkK


मंगलवार, 15 मार्च 2016

लिखने की दो...... आजादी!


जेएनयू में कन्हैया कुमार जब लाल सलाम का मतलब समझा रहा था तब दिल्ली से दूर बैठे छत्तीसगढ़ में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यहां सिर्फ लाल सलाम कहने वाले जेल में क्यों और कैसे ठूंस दिये जाते है। दिल्ली में लाल सलाम पर कानून का नजरिया अलग और छत्तीसगढ़ में अलग क्यों है। क्या इस देश में दो तरह के कानून है।
सवाल तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस वक्तव्य को लेकर भी उठ रहे है कि कल तक भारत में पैदा होने में शर्म महसूस होता था। कोई और ऐसा कह दे तो चड्डी वाले उसका जुलूस ही नहीं निकालते पुलिस भी मार कूट कर उसे सलाखों के पीछे डाल देती।
सवाल अभिव्यक्ति की आजादी और उसके खतरे का बना हुआ है। सरकार किसी की भी हो अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे सामान रुप से बना हुआ है। पत्रकारिता से इन बातों का सीधा संबंध हम देखते हैं कि कैसे दिल्ली से दूर गांव तक आते-आते पत्रकारिता पर दबाव बढ़ता जाता है।
राजधानी में यह खतरे दूसरी तरह का है। यहां पत्रकारों को कोई सीधा पकड़कर जेल में नहीं डालता परन्तु उसकी नौकरी छुड़ा दी जाती है। इस खेल में पुलिस का नहीं जनसंपर्क विभाग का सहारा लिया जाता है। ऐसे कितने ही उदाहरण है जब सिर्फ एक खबर पर कितनों की नौकरी चली गई कितनों के तबादले कर दिये गये। एक अखबार सारा संसार की बात हो या पत्र नहीं मित्र की बात हो राजस्थान से आये धुरंधर की बात हो या मंझोले कद की बात हो। खबरों की सच्चाई पर कम जनसंपर्क के दबाव में लिखने की आजादी पर बंदिशें लगाई गई।
कन्हैया के लाल सलाम का जिक्र यहां इसलिए किया जा रहा है कि बस्तर में पत्रकारिता तलवार की धार पर चलने जैसी है। नक्सली की आड़ में भ्रष्टाचार खूब फल फूल रहा है। सड़क-भवन के नाम पर आने वाले करोड़ों रुपये भ्रष्टाचार की भेट चढ़ रहा है। नक्सलियों का डर बताकर सरकारी सेवक कार्यालयों से गायब हो जाते हैं। महिनों स्कूल नहीं लगता पर वेतन बराबर बंटता है। राजीव गांधी शिक्षा मिशन का बुरा हाल है। पीडब्ल्यूडी के भवन व सड़क निर्माण का कोई हिसाब नहीं है। मनरेगा से लेकर दूसरी सरकारी योजनाएं दम तोड़ रही है और इस पर लिखने वालों को सीधे धमकी ही नहीं दी जाती जेल तक में ठूंस दिया जाता है। आरोप भी नक्सलियों से सांठ-गांठ का होता है। 
दिल्ली में जिस मस्ती से कन्हैया ने लाल सलाम कह दिया वैसा बस्तर में कोई कह नहीं सकता। जन सुरक्षा कानून मजबूती से पैर जमाये हुए है। बीबीसी के पत्रकार आलोक पुतुल को भेजे जाने वाले मैसेज क्या यह चुगली करने के लिए काफी   नहीं है कि यहां सब कुछ ठीक नहीं है। परन्तु सरकार को यह सब नहीं दिखता। पर्याप्त सबूत के बाद भी सरकार की खामोशी क्या यह साबित नहीं करते कि बस्तर में पत्रकारों के साथ जो कुछ हो रहा है वह सब सरकार के इशारे पर हो रहा है?
यह सच है कि इन दिनों देश भर में पत्रकारों को गरियाने का दौर चल रहा है। परन्तु इसके लिए जिम्मेदार क्या सरकार-प्रशासन और वे मीडिया हाउस नहीं है जो दबाव में है। जो अपने हितों के लिए पत्रकारों को शार्प शूटर की तरह इस्तेमाल करते हैं और जब उन्हें खबरों पर स्वयं के हित में खतरे दिखते हैं पीछे हट जाते हैं।
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बुधवार, 27 नवंबर 2013

मोदी का नकली लाल किला भी काम नहीं आया


आदिवासियों पर लाठी चार्ज, भाजपा पर भारी!
बस्तर बराबरी पर तो सरगुजा में कांग्रेस आगे
रायपुर। आदिवासी सीटों के सहारे सत्ता तक दो बार पहुंची भाजपा के लिए इस बर सत्ता में वापसी में आदिवासी ही बाधा बन गये हैं। कहा जाता है कि आदिवासियों पर हुए लाठी चार्ज और नक्सली वारदातों का दर्द इस बार भाजपा पर भारी पडऩे लगा है ऐसे में मैदानी इलाके में वह क्या कर पाएगी कहना कठिन है।
छत्तीसगढ़ में सत्ता की चाबी अब तक बस्तर के पास रही है लेकिन बस्तर से जिस तरह की खबरें आ रही है उसके बाद इस बार सत्ता की चाबी सरगुजा के पास होने की प्रबल संभावना है।
अब तक रूझान से स्पष्ट हो गया है कि बस्तर में कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला बराबरी का है और इस बार भाजपा को यहां 5 से 6 सीटों का नुकसान हो सकता है। पिछले दो चुनावों में बस्तर की 12 में से 11 सीट जीतकर सत्ता में आने वाली भाजपा के कई मंत्री भी यहां कांटे की टक्कर में फंस कर रह गये हैं। सूत्रों की माने तो इस बार यहा कम्यूनिष्ट पार्टी भी एक सीट जीत सकती है ऐसे में इस बराबरी की वजह से सत्ता की चाबी इस बार दूसरे क्षेत्र में चली गई है।
इधर राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि बस्तर में बराबरी की टक्कर की वजह से इस बार सत्ता की चाबी सरगुजा के पास आ गई है जहां 14 में से 10 सीटों पर कांग्रेस की जीत निश्चित माना जा रहा है। जबकि दो सीटों पर कड़े संघर्ष की स्थिति हैं। मोदी के लिए नकली लाल किला बनाकर सत्ता हासिल करने में लगी भाजपा को सरगुजा में जबरदस्त झटका लगा है वह यहां 2003 के चुनाव में 9 व 2008 के चुनाव में 10 सीटे हासिल कर सत्ता में आई थी इस बार यहां कब्जा बनाए रखने भाजपा ने पुरजोर लगाया था। यहां तक की प्रधानमंत्री इन वेटिंग नरेन्द्र मोदी के लिए नकली लाल किला भी बनाकर चर्चा में आये थे लेकिन जिस तरह के रूझान सामने आ रहे हैं उसके बाद तो यही कहा जा सकता है कि यहां नरेन्द्र मोदी का सहारा भी काम नहीं आया।
यहां मिले रूझान के मुताबिक भाजपा भटगांव सीट सीधे सीत रही है जबकि मनेन्द्रगढ़ और प्रतापपुर में वह कांटे के संघर्ष में फंसी है। जिन सीटों पर कांग्रेस की जीत तय मानी जा रही है उनमें बैंकुंठपुर वेदांती तिवारी, प्रेमनगर खेलसाय सिंह, रामानुजगंज बृहस्पति सिंह, सामरी डॉ. प्रीतम राम, लुंड्रा चिंतामणी महराज, अंबिकापुर टीएस सिंहदेव और सीतापुर अमरजीत भगत शामिल है। बताया जाता है कि भाजपा के बस्तर और सरगुजा संभाग में इस स्थिति के लिए कई कारण गिनाये जा रहे हैं जिनमें से प्रमुख कारण आदिवासियों पर लाठी चार्ज के अलावा कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार के अलावा भाजपा के मौजूदा विधायकों की करतुत को बताया जा रहा है।
बहरहाल सरकार किसकी बनेगी यह तो बाद में ही पता चलेगा लेकिन यह तो तय है कि इस बार सत्ता की चाबी बस्तर ही होगी।

शनिवार, 23 मार्च 2013

विकास और सुराज पर कर्मों की रपट भारी


सात मंत्रियों सहित तीन दर्जन विधायक निशाने पर
    अपनों का विकास, परिजनों व समर्थकों को नियम विरूद्ध उपकृत!
    अधिकारियों का सुराज- पर्सनल स्टाफॅ  से लेकर भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण
    कई लोगों के आचरण खराब कोयले की कालिख, रोगदा बंाध का बिकना, सरकारी जमीनों पर अवैध         कब्जे और बंदर बांट
    भ्रष्ट और निकम्मों की संविदा नियुक्ति
    परिजनों, समर्थकों व पर्सनल स्टाफ की बढ़ती बदसलूकी
    आरक्षण कटोति- अनुसूचित जाति, आदिवासी व पिछड़े भी नाराज केन्द्रीय नेतृत्व सातों मंत्रियों को हटाने     का निर्देश भी दिया पर जनाधार के नाम पर प्रदेश नेतृत्व से जीवन दान ।
हैट्रिक की तैयारी में जुटी रमन सरकार भले ही अपने शासन काल में विकास और सुराज लाने का कितना भी आंकड़ा पेश कर ले सच तो यह है कि कर्मों की रिपोर्ट देखकर उनकी जमीन खिसक गई है। गुप्तचर एजेसियों से तैयार रिपोर्ट कार्ड का निष्कर्ष साफ है कि प्रदेश के सात मंत्रियों सहित करीब तीन दर्जन विधायकों को दो बारा टिकिट दी गई तो पार्टी का बेड़ा गर्क हो सकता है। रिपोर्ट कार्ड के बाद केन्द्रीय नेतृत्व जहां बेहद नाराज है वहीं प्रदेश के आला नेता भी सकते में हैं।
 सूत्रों की माने तो केन्द्रीय नेतृत्व ने इन सातों मंत्रियों को मंत्रिमंडल से हटाने का सुझाव तक दे दिया है लेकिन प्रदेश नेतृत्व इस पर सहमत इसलिए नहीं हुए क्योंकि कोयले की कालिख कहीं बगावत का बिगुल न बजा दे इसलिए इन्हें जनाधार वाले नेता बताते हुए ब्रम्हास्त्र का हवाला दिया गया है।
हमारे बेहद भरोसे बंद सूत्रों के मुताबिक छत्तीसगढ़ में 8 माह बाद होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व भी बेचैन है। और इसकी वजह यहां से पहुंचने वाले सांसदों की संख्या है। यही वजह है कि गुप्तचर एजेंसियों के माध्यम से रिपार्ट कराई गई है। रिपोर्ट में मंत्रियों के परफार्मेश पर फोकस करने का निर्देश था।
सूत्रों की माने तो रिपोर्ट कार्ड देखकर केन्द्रीय नेतृत्व भी हैरान है और यही वजह है कि सात मंत्रियों को हटाने की सलाह दी गइ्र । रिपोर्ट कार्ड में सात मंत्रियों की कार गुजारियों का विस्तार से लेखा जोखा दिया गया है। इन मंत्रियों के परिजनों व पसर्नल स्टाफ के बारे में गंभीर टिप्पणी की गई है जबकि एक मंत्री के महिला मित्र की वसूली का भी जिक्र है।
एक मंत्री के तो पर्सनल स्टाफ और परिजनों पर आरोप लगाये गये है कि इनका विभागों में भारी दबदबा हे ढेका और तबादलों में मनमानी चरम पर है। मंत्रियों के परिजनों का सरकारी जमीनों पर कब्जा और मनमाने ढंग से आबंटन पर भी तीखी टिप्पणी की गई है।
बस्तर के एक मंत्री के आचरण को लेकर जहां गंभीर सवाल उठाये गये है वहीं रायपुर के एक मंत्री व लालबत्ती वाले विधायक के व्यवहार और पर्सनल स्टाफ के दुव्र्यवहार पर भी टिप्पणी की गई है।
सूत्रों की माने तो कई अफसरों के करतूतों पर सरकार की खामोशी और संरक्षण पर भी गंभीर सवाल खड़े किये है।
बताया जाता है कि केन्द्रीय नेतृत्व ने ऐसे अफसरों को दूर रखने की हिदायत दी है जबकि खराब रिपोर्ट वाले विधायकों की टिकिट हर हाल में काटने की सलाह दी है।
सूत्रों के मुताबिक संगठन को ऐसे विधायकों व मंत्रियों के स्थान पर नये विकल्प तैयार रखने कहा है। खासकर बस्तर, सरगुजा और बिलासपुर संभाग में बड़े पैमाने पर बड़े पैमाने पर परिवर्तन के संकेत मिलने भी लगे है। इधर रायपुर-बिलासपुर के मंत्रियों को जनाधार वाला मान कर समझाईश देने की चर्चा है जबकि सूत्रों का दावा है कि केन्द्रीय नेतृत्व इनके बगावती रूख का भी पता लगाने में लगी है ताकि टिकिट करने की स्थिति पर विषय परिस्थिति पैदा न सके।
सूत्र बताते है कि विधानसभा के ठीक पहले राजनैतिक अस्थिरता से बचने मंत्रियों को हटाया नहीं जा रहा है लेकिनह केन्द्रीय नेतृत्व के द्वारा इन मंत्रियों को फटकार लगाते हुए चेतावनी जरूर दे दी गइ्र है कि यदि आचरण नहीं सुधारा गया तो टिकिट भी काटी जा सकती है। खासकर भ्रष्टाचार के मामले में मंत्रियों को सतर्क रहने की नसीहत दी गई है।