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गुरुवार, 30 जुलाई 2026

वीआईपी सपनों’ के नीचे कुचला गया ‘नकटी’: कौन है सत्ता, शासन और तंत्र का असली 'खलनायक'?

 वीआईपी सपनों’ के नीचे कुचला गया ‘नकटी’: कौन है सत्ता, शासन और तंत्र का असली 'खलनायक'?



छत्तीसगढ़ की राजधानी की नाक के ठीक नीचे स्थित 'नकटी' गांव में हाल ही में चली बुलडोजर कार्रवाई ने राज्य की प्रशासनिक और राजनीतिक समरसता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विधायकों के लिए बनने वाली आलीशान कॉलोनी और रसूखदारों के वीआईपी प्रोजेक्ट्स की खातिर सदियों पुराने बसे-बसाए आशियाने ढहा दिए गए और मवेशियों का चारागाह निगल लिया गया। मूसलाधार बरसात के बीच सिर से छत छिन जाने के बाद, नया रायपुर के सेक्टर-30 के छोटे कमरों के आवंटन को ठुकराकर ग्रामीण फिर से उसी मलबे और खंडहरों में अपनी रातें काटने को मजबूर हैं [05:42]।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद केवल बुलडोजर की गड़गड़ाहट शांत नहीं हुई है, बल्कि सत्ता के गलियारों में जवाबदेही और राजनीतिक साख को लेकर घमासान छिड़ गया है।

1. मौन स्वीकृति या नीतिगत विफलता?

सुशासन का दावा करने वाले मुख्यमंत्री कार्यालय की भूमिका पर अब सीधे सवाल उठ रहे हैं [01:45]। सवाल यह उठ रहा है कि क्या विधायकों और रसूखदारों के ऐशो-आराम के लिए गरीबों के आशियानों को उजाड़ने से पहले प्रशासनिक संवेदनशीलता को पूरी तरह ताक पर रख दिया गया? स्कूल खुलने के ठीक बाद, बारिश के इस मौसम में बच्चों और महिलाओं की चीख-पुकार के बीच मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों के आवासों का घेराव यह साफ़ संकेत दे रहा है कि जनता की नजर में सत्ता शीर्ष का यह मौन किसी अपराध से कम नहीं है [02:35]।

2. नीति या हठ? किसके इशारे पर चली कार्रवाई?

राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में इस वक्त प्रदेश के वित्त मंत्री ओपी चौधरी और राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा की भूमिका है [02:58]।

 ओपी चौधरी का 'मास्टरमाइंड' एंगल: पूर्व आईएएस अधिकारी होने के नाते नियम-कायदों की बारीक समझ रखने वाले ओपी चौधरी के शंकर नगर स्थित आवास पर ग्रामीणों का फूटा गुस्सा यह बताता है कि इस 'वीआईपी प्रोजेक्ट' को अमलीजामा पहनाने की जिद का ठीकरा प्रशासनिक से ज्यादा नीतिगत स्तर पर फोड़ा जा रहा है [03:19]।

 राजस्व विभाग का मौन: जमीन और बेदखली का सीधा ताल्लुक राजस्व विभाग से होता है। पटवारी भर्ती और ट्रांसफर-पोस्टिंग के पुराने विवादों से घिरे टंकराम वर्मा के मातहत अमले ने जिस तत्परता से बेदखली को अंजाम दिया, उससे राजस्व अमले की मंशा पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं [04:31]।

3. 'रील और रियल' के बीच फंसे जनप्रतिनिधि

 अनुज शर्मा पर जनता का गुस्सा: क्षेत्रीय विधायक अनुज शर्मा को शायद पहली बार रील और रियल लाइफ के फर्क का कड़वा अहसास हुआ है [07:00]। बेघर हुई महिलाओं का आक्रोश और सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो क्षेत्रीय नेतृत्व की नाकामी को उजागर कर रहे हैं।

 बृजमोहन अग्रवाल का 'सहानुभूति कार्ड': सांसद बृजमोहन अग्रवाल द्वारा जारी वीडियो संदेश और अफसरों पर कार्रवाई की मांग वाले पत्र को जनता महज "राजनीतिक नौटंकी" करार दे रही है [09:31]। सवाल उठ रहा है कि यदि सरकार और सत्ता उनकी अपनी है, तो उनके ही नाक के नीचे अधिकारी इतनी बड़ी कार्रवाई करने की जुर्रत कैसे कर सकते हैं? क्या यह अपनी साख बचाने की कोशिश है [10:12]?

4. दागी अफ़सर के हाथों में बेदखली की कमान

मामले में सबसे सनसनीखेज पहलू कार्रवाई का नेतृत्व करने वाले अफसर कीर्तिमान सिंह राठौर का ट्रैक रिकॉर्ड है [11:04]।

 विवादित ट्रैक रिकॉर्ड: बिलासपुर में पदस्थापना के दौरान बहुचर्चित 'अरपा भैंसाझार सिंचाई परियोजना' के मुआवजा वितरण में अनियमितताओं और रसूखदारों को फायदा पहुंचाने के गंभीर आरोपों के तहत राठौर जांच के दायरे में हैं [11:39]।

 EOW की जांच का दायरा: एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) और इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (EOW) में मामला दर्ज होने और जांच की अनुमति मिलने के बावजूद ऐसे विवादित अधिकारी को जमीनी स्तर पर बेदखली और तोड़फोड़ का कमान सौंपना, पूरे प्रशासनिक ढर्रे की नीयत पर सीधे प्रश्नचिह्न लगाता है [13:06]।

सियासत गर्माई, खंडर में तब्दील जिंदगी

एक तरफ कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर गांव में डेरा जमाए हुए है और इसे प्रशासनिक बर्बरता करार दे रही है [06:13], वहीं दूसरी तरफ नकटी के मासूम बच्चे और परिवार तिरपाल के नीचे बरसात से बचने की जद्दोजहद कर रहे हैं [05:53]। सत्ता की हनक और अफसरों की बेदर्दी के बीच नकटी का यह सच अब किसी एक गांव की नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही के पतन की दास्तान बन चुका है।

वीडियो देखें 

बुधवार, 6 नवंबर 2024

टिकिट मांगने वाले भाजपा के ब्राम्हण नेताओं की मुश्किलें बढ़ी



टिकिट मांगने वाले भाजपा के ब्राम्हण नेताओं की मुश्किलें बढ़ी 


दक्षिण विधानसभा चुनाव में ब्राम्हण प्रत्याशी की मांग करने वाले भारतीय जनता पार्टी के ब्राम्हण नेताओं के सामने अब नई तरह की दिक्कत आ गई है। कहा जा रहा है कि कई नेता तो मुंह छिपाते घुम रहे है तो कई नेताओं ने चुप्पी ओढ़ ली है। 

दरअसल दक्षिण विधानसभा उपचुनाव में ब्राम्हण समाज ने ब्राम्हण प्रत्याशी उतारने दोनों ही प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा पर दबाव बनाया था। समाज के इन नेताकों के साथ भाजपा और कांग्रेस से जुड़े नेताओं ने भी न केवल शिरकत की थी, बल्कि मीडिया के ज़रिये भी अपनी मांगों को जोर-शोर से हवा दी थी।

भाजपा ने ब्राम्हण समाज की मांग की परवाह नहीं करते हुए सुनील सोनी को प्रत्याशी घोषित कर दिया, तब समाज ने कांग्रेस पर दबाव बनाया तो कांग्रेस ने ब्राम्हण समाज की मांग के अनुरूप आकाश शर्मा को टिकिट दे दिया।

ऐसे में भाजपा से जुड़े ब्राह्मण  नेता के सामने मुश्किल यह है कि वे सेठ की तिजोरी के आगे न तो कुछ बोल पा रहे है और न ही समाज में जाकर सुनील सोनी का प्रचार ही कर पा रहे हैं।

इसकी बड़ी वजह आने  वाले दिनों में निगम चुनाव है। यदि वे अभी ब्राह्मण प्रत्याशी के खिलाफ वोट माँगेंगे तो फिर निगम चुनाव में वे किस मुंह से ब्राह्मण वोट हासिल कर पायेंगे। 

कहा तो यहां तक जा रहा है कि समाज के कई पदाधिकारियों ने भाजपा के ब्राम्हण नेताओं को दो टूक कह दिया है कि वे ब्राम्हण प्रत्याशी की खिलाफत न करे।

ऐसे में ब्राम्हण वोटरों को साधने गृह मंत्री विजय शर्मा को पार्टी ने लगा दिया। लेकिन कहा जाता है कि ब्राम्हण समाज के कुछ पदाधिकारियों ने उन्हें भी दो टूक कह दिया कि वे दक्षिण में प्रचार करने की बजाय प्रदेश की कानून व्यवस्थ पर ध्यान दें तो उनके लिए बेहतर होगा।

शुक्रवार, 6 सितंबर 2024

न निलंबन, न एफ़आईआर-कड़ी कार्रवाई का प्रचार

 बच्ची का आंसू पोछने सत्त्रा व खेल...

न निलंबन, न एफ़आईआर-कड़ी कार्रवाई का प्रचार 


आलीवारा की छात्रा को जिन्दगी भर जेल की हवा खिलाने की धमकी देने वाले जिला शिक्षा अधिकारी अभय जायसवाल को लोक शिक्षण संचालनालय में सहायक संचालक के पद पर बिठा दिया गया।

इस आदेश को सरकार और उससे जुड़े लोग मुख्यमंत्री के कड़े तेवर के रूप में प्रचारित-प्रसारित कर रहे हैं लेकिन यही सरकार जब न्यायालय में ट्रांसफर को सजा से इंकार करती है तब सवाल यही है कि क्या अभय जायसवाल को सरकार ने कोई सजा दी ?

सिर्फ कुर्सी बदला गया, सजा तो उसे मिली ही नहीं । लेकिन सत्ता का अपना चरित्र है और दलाल मिडिया' का अपना चरित्र।

दो दिन पहले अलिवारा स्कूल के छात्र-छात्राएं बड़ी संख्या में शिक्षकों की कमी दूर करने की मांग को लेकर जिला शिक्षा अधिकारी से मिलने पहुंचे थे जहाँ शिक्षा अधिकारी अभय जायसवाल ने बच्चों को जिन्दगी भर जेल की हवा खिलाने की धमकी देते हैं। सहमी बच्चियां इस धमकी से डरीसहमी बच्चियाँ  शिक्षा अधिकारी के कक्ष से रोते-बिलखते बाहर निकलती है तो उस पर पत्रकारों की नजर पड़‌ जाती है और पत्रकारो ने जब रोने की वजह पूछी तो बच्चियों ने सब कुछ साफ-साफ बता दिया कि किस तरह से अभय जायसवाल ने उन्हें जेल की हवा खिलाने की धमकी दे रहे हैं।

इस धमकी का वीडियो जब वायरल हुआ तो प्रशासन के हाथ-पांव फूल गये, लेकिन अभय जायसवाल के खिलाक कार्रवाई करने की बजाय उनका तबादला कर यह प्रचारित किया गया कि बच्ची के आंसू देख मुख्यमंत्री ने कड़े तेवर दिखाते हुए जिला शिक्षा अधिकारी को हटा दिया।

जबकि कड़ा तेवर तो तब माना जाता जब अभय जायसवाल को निलंबित किया जाता और एफ़ आई आर की जाती।

लेकिन सूत्रों  का कहना है कि लेन देन कर शिक्षा अधिकारी बनने-बनाने का खेल जब चलता हो तो फिर हटाने की प्रक्रिया को ही कड़ी कार्रवाई के रूप में प्रचारित किया जाता है। और इस मामले में भी यही हुआ। सच तो यह है कि जन आक्रोश से बचने का यह तरीक़ा है।


मंगलवार, 3 सितंबर 2024

पवन नहीं यह झोंका है...

 पवन नहीं यह झोंका है...


रिमोट से चलने वाली सरकार के रूप में बदनाम हो चुने साय सरकार कब तक मंत्रिमंडल का विस्तार करेगी, निगम-मंडल में नियुक्ति कौन करेगा के सवालों के बीच पवन साय अचानक भाजपा के संगठन मंत्री पारी नेताकों में सबसे ताकतवर शख्स नजर आने लगे है तो इसकी कई वजह है।

वैसे तो भाजपा में संगठन मंत्री की ताकत क्या होती है यह किसी से छिपा नहीं है, सारंग बंधु से लेकर सौदान सिंह और अब पवन साय की ताकत का अहसास पार्टी के नेताकों को भी है, लेकिन कहा जाता है कि सत्ता आने के बाद भी ताकतवर होने का ऐसा उदाहरण बहुत कम देखने को मिलता है कि लालबत्ती के लिए भी भीड़ मुख्यमंत्री से ज्यादा संगठन मंत्री जुटा ले। हालांकि कुछ लोग नीतिन नबीन और जामवाल के पास भी पहुंच रहे हैं लेकिन जब सब कुछ तय करने का ईशारा संगठन मंत्री की ओर किया जाए तो फिर क्यों न पवन साय को ही सत्ता केन्द्र मानकर भीड़ बढ़े।

और शायद यही वजह है कि बिल्डर्स से लेकर भ्रष्टाचारी हो या आपराधिक छवि वाले नेता ही क्यों न हो, सत्ता केन्द्र को ही खुश करने में लगे हैं।

ऐसे में यदि मंत्रालय में भी भाई साहब ! वाली संस्कृति का ही प्रभाव बढ़ रहा हो तो फिर अफसरों के काम काज पर इसका असर पड़‌ना तय है।

ऐसे में लालबत्ती की चाह में चक्कर पर चक्कर लगा रहे नेता अब पवन साय को खुश करने में लगे हैं लेकिन पवन साय को जानने वाले कहते हैं कि वे भी सायं सायं  में माहिर है।

सायं साये में माहिर तो सौदान सिंह भी थे लेकिन इतनी भीड़ वे भी नहीं खींच पाये थे, और चर्चा इसी बात की है कि जब इतनी भीड़ नहीं खींच पाने के बाद भी सौदान सिंह इतना खींच गये तो फिर भीड़ वाले कितना खींच रहे हैं। और शायद यही वजह है कि भाजपाई राजनीति में इन दिनों यह नारा जोरों से उछाला जा रहा है—-

  पवन नहीं यह झोंका है

 लालबत्ती का धोखा है...।

बुधवार, 21 अगस्त 2024

चौधरी को छवि की चिंता...

 चौधरी को छवि की चिंता...


यह तो बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना अमित शाह जैसे कद्‌दावर नेता के खासमखास और प्रदेश सरकार के दमदार मंत्री ओपी चौधरी को अपनी छवि सुधारने के लिए इतनी कवायद नहीं करनी पड़ती।

कहा जा रहा है कि ३३ हजार शिक्षकों की भर्ती वाले मामले में विडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया में जिस तरह से ओपी चौधरी के ख़िलाफ़ बेरोजगारों ने मोर्चा खोला है उससे ओपी चौधरी अपनी छवि को लेकर कुछ ज्यादा ही चिंतित हो गए है, हालाँकि कलेक्टरी के दौरान भ्रष्टाचार के आरोप भी उन पर कम नहीं है, लेकिन अमित शाह के वरदहस्त में सुपर सीएम की कथित पदवी से उत्साहित ओपी चौधरी ने जिए ताह से सत्ता और संगठन में अपनी पकड़ मजबूत की थी वह उतनी ही तेजी से फिसलता जा रहा है।

और शायद यही वजह है कि उन्होंने अब अपनी छवि नये सिरे से गढ़ने की कवायद करने में  लग गये  हैं। दरअसल ओपी चौधरी यह बात भूल गये हैं कि एक बार छवि बिगड़ गई तो उसे सुधारना बड़ा टेढ़ा काम है लेकिन नौकरशाही का रुतबा उन्हें हार नहीं मानने दे रहा है, ऐसे में चर्चा  इस बात की भी है कि नेशनल प्रोपेगेंडा ग्रुप भोपाल वाले ने ठेका लिया कि वे हर हप्ते अपने सबसे बड़े पोर्टल में उनकी छवि सुधारेंगे तो दर्जन भर पोर्टल को भी छवि सुधारने की जिम्मेदारी तो दे दी गई लेकिन छवि है कि...!