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बुधवार, 4 जून 2025

न्याय पर भरोसा दिलाती-नीरू…

 न्याय पर भरोसा दिलाती-नीरू…


आज के इस दौर में जब न्याय व्यवस्था को लेकर कितने ही सवाल उठ रहे हो, पैसों और रसूख़ के दम पर न्याय को अपने पाले में कर लेने  को लेकर उठते सवाल हो या राष्ट्रहित में न्याय का फ़ैसलो तक पहुँचने से पहले दम तोड़ देना। ऐसे में मलयालम में बनी फ़िल्म नीरू में कोर्ट रूम के ड्रामे  के बीच जज का फ़ैसला  कम से कम न्याय पर भरोसा दिलाती तो है…


यह कहानी है कि एक ऐसी  अंधी लड़की की जिसके साथ बलात्कार होता है, अपराधी इतने शातिरपने से अपराध करता है कि कोई सबूत नहीं छोड़ता. लेकिन अपराधी को पता नहीं होता कि वह अंधी लड़की एक बेहतरीन स्कल्पचर आर्टिस्ट है. 

अपराध के क्षणों में कोई भी व्यक्ति अपनी सुध-बुध खो सकता है, लेकिन कहते हैं कि जब प्रकृति आपसे कुछ छीन लेती है तो उसके बदले दूसरे अंग अधिक सक्रिय हो जाते हैं,  स्पर्श और सुनने की अद्भुत क्षमता के कारण वह उस पीड़ित समय में अपराधी की शक्ल का जायजा ले लेती है.

अपराधी का जब कोई पता नहीं चलता तब यह अंधी लड़की उस अपराधी की हूबहू मूर्ति बनाती है, जिससे वह पुलिस के गिरफ्त में आ जाता है. लेकिन इसके बाद भी अपराधी के रसूखदार होने के कारण बहुत से छल प्रपंच फिल्म में देखने को मिलते हैं. 

कई सारे घटनाक्रम होने के बाद अदालत में कोई ठोस नतीजा नहीं निकलता तब पीड़िता के पक्ष में लड़ने वाले वकील कोर्ट में यह दलील रखते हैं वह अंधी लड़की की कला पर भरोसा रखकर एक नज़ीर पेश की जाएं. जज इसकी अनुमति देते हैं और अंत में यह केस एक उदाहरण बन जाता है.

यह फिल्म न्याय में किया गया एक अद्भुत प्रयोग है और ऐसे ही प्रयोगों के कारण न्याय पर भरोसा बढ़ जाता है. यह फिल्म न्याय के लिए एक प्रयोग के तौर पर याद रखी जा सकती है. कानून के सारे दाव पेंच जब न्याय दिलाने में असमर्थ हो जाते हैं तब कला यह साबित करती है कि कला सिर्फ़ रोमांटिसिज्म नहीं बल्कि संपूर्ण जीवन का आधार है और अपराधी तक पहुंचाने का जरिया बन सकती है. (साभार)

सोमवार, 10 मई 2021

अब तो समझ जाओं...

 

आपने फिल्म मदारी नहीं देखी है, तो एक बार जरूर देख ले। खासकर, उन लोगों को यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए जो नरेन्द्र मोदी या मोहन भागवत जैसे लोगों को भगवान समझते हैं ताकि वे अपनों को खोने से पहले ही समझ जाये। अपनों के खोने का दुख बेहद दर्दनामक होता है और फिर बाद में पछतावा के सिवाय कुछ हासिल नहीं होता। आदमी यही सोचता रह जाता है कि काश!...

मदारी में मंत्री का बेटा कहता है मुझे 5-10 वर्ष नहीं लगेगा समझने में, मैं समझ गया! यह उन लोगों के लिए भी है जो आंख मूंद कर बैठे हैं। याद कीजिए गोरखपुर का वह आक्सीजन कांड जिसने कितने ही बच्चों की जान ले ली थी तभी सत्ता की जवाबदेही तय हो जाती तो आक्सीजन की आपूर्ति सुधर सकती थी।

आज हम यह बात आपसे इसलिए कह रहे हैं क्योंकि इस देश को कोरोना के भीषण संकट में डालने का काम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपनी महत्वाकांक्षा ने किया है। नमस्ते ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सरकार बनाने की पहली बड़ी गलती को माफ कर भी दे तो उसके बाद कोरोना की दूसरी लहर की चेतावनी को नजर अंदाज कर बडे आयोजनों की अनुमति के कारण देश में त्राहिमाम् मचा हुआ है।

सत्ता की इस लापरवाही की वजह से ही सुप्रीम कोर्ट को टास्क फोर्स बनाना पड़ा और कोर्ट को कहना पड़ा कि हम लोगों को इस तरह से मरते नहीं देख सकते। हैरानी की बात तो यह है कि सुप्रीम कोर्ट को वह काम अपने हाथ में लेना पड़ा जिस काम को सरकार को करना था। यह किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए बेहद दुखद है और सत्ता के लिए तो शर्मसार कर देने वाला निर्णय है। लेकिन जब सत्ता में शर्म नाम की चीज ही न बची हो तो पूरी दुनिया हंसेगी। और यही हो रहा है। समूचा दुनिया ने भारत के इस मौजूदा संकट के लिए केन्द्र की सरकार को दोषी माना है। मेड़िकल जर्नल की सम्पादकीय में मोदी सत्ता के लिए जिस तरह के शब्दों को इस्तेमाल करते हुए लानत भेजी है वह चौकाने वाला है।

हालांकि इससे पहले कई राज्यों के न्यायालय ने नरसंहार जैसे शब्दों का उपयोग करते हुए यहां तक कहा कि चोरी करो डाका डालो लेकिन आक्सीजन और दवाई का इंतजाम करो। इस तरह की टिप्पणी के बाद अब सरकार कोरोना की बजाय अपनी छवि चमकाने पूरी पार्टी को झोंक दे और पार्टी के पढ़े-लिखे लोग यदि सरकार की छवि सुधारने छल-प्रपंच, झूठ, अफवाह, हिन्दू-मुस्लिम करने लगे तो कोरोना का यह रुप नरसंहार बन जायेगा।

इसलिए हमने जब कहा कि ऐसे लोगों को फिल्म मदारी इसलिए भी देख लेना चाहिए क्योंकि फिल्म समाज का आईना होता है। और वह सिखाता है कि देश के प्रति प्रेम और मानवता की रक्षा के लिए किस तरह से हर व्यक्ति की जवाबदारी है। ऐसे कितने ही उदाहरण है कि इस देश के लोगों ने पट्टा उतारकर देश हित में कड़े फैसले लिये है लेकिन जिस तरह का दुरंगी पट्टा पहनाकर लोगों की आंखों में भी पट्टा बांधी गई है उनके लिए फिल्म का यह डायलॉग महत्वपूर्ण है तुम मेरी दुनिया छिनोगे, मैं तुम्हारी दुनिया में घुस जाउंगा। यह कहता है अब भी देर हुई  है सवाल कीजिए, रोज कीजिए! नहीं तो अपनी बारी का इंतजार कीजिए।