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मंगलवार, 5 अगस्त 2025

अमित शाह ने भरी संसद में झूठ बोला

अमित शाह ने भरी संसद में झूठ बोला 



मानहानि के एक केस में कोर्ट के जज ने चीन मामले में जो टिप्पणी की क्या वह सत्ता की बौखलाहट है इसे कुछ ऐसे समझ ले कि…


जब  संसद में ऑपरेशन सिंदूर के बहस के दौरान अमित शाह जी ने संसद में खड़े हो कर लगातार तीन गलत बयानी किया

(ऐसा नहीं है कि इसके पहले भाजपा के सांसदों ने संसद में गलत बयानी नहीं की है बहुत बार किया है)

उस के बाद एक बात बोला जो झूठ था या सच ये पता नहीं 

खैर पहले वो तीन गलत बयानी पढ़ लेते है

1. मैं इतिहास का विद्यार्थी हूं (जबकि विकिपीडिया के हिसाब से अमित शाह जी बायो केमिस्ट्री पढ़े थे)

2. सरदार पटेल जी ने 1960 में विरोध किया (जबकि सरदार पटेल का देहांत 1950 में ही हो गया था)

3. जयशंकर home minister है (जबकि वो विदेश मंत्री है)


फिर सीज़फायर पर अमित शाह जी ने बोला कि

अपने देश के होम मिनिस्टर के बात पे यकीन नहीं है

वो एक संवैधानिक पद पे है

ट्रंप के बात पे यकीन है

फिर

राहुल गांधी जी ने उकसाया कि इंदिरा गांधी का 50% भी है तो मोदी जी संसद में बोले कि ट्रंप ने सीज़फायर नहीं कराया

अगर दम है तो आज शाम मोदी जी बोले कि ट्रंप झूठ बोल रहा है

"‘Say Donald Trump is a liar’.."


मोदी जी भावुक हो गए और सारा कूटनीति भूल गए 

और बोल दिया कि

किसी देश के किसी नेता ने सीज़फायर के लिए कुछ नहीं कहा


अगले दिन अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जी ने भारत पर 25% टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी

क्योंकि ट्रंप साहब को उनका नोबेल प्राइज छूटता दिख रहा था


*"आप क्रोनोलॉजी समझिएगा"*


और लास्ट में एक बात पे गौर कीजियेगा


ये राहुल गांधी कर क्या रहा है


विपक्ष में रह कर मोदी जी और अमित शाह जी से वो बोलवा दे रहा है जो उन्हें नहीं बोलना चाहिए था

और

विपक्ष में रह कर सरकार से वो काम करवा दे रहा है जिसको मोदी जी और अमित शाह जी ने मना कर दिया था

जैसे

जाति जनगणना


राहुल गांधी जी ने बोला था

हम सरकार को मजबूर कर देंगे जाति जनगणना के लिए


एक so called "पप्पू" क्या क्या कर रहा है

ऐसे में मानहानि के एक मामले पर भी बातें होनी चाहिए कि क्या चीन को लेकर कोर्ट ने राहुल गांधी को जो बात बोली है, असल में वो पूरे देश के लिए ये संदेश है कि इस सरकार के खिलाफ अपना मुंह बंद रखिए।


वरना कौन नहीं जानता की चीन ने हमारी ज़मीन कब्जाई है, कुछ नये मैप भी जारी हुए जहां भारत के कयी हिस्सों को चीन का हिस्सा बताया गया।


विदेशी अखबारों से लेकर सैकड़ों आर्टिकलों में भी ये खबर छपी है। स्थानीय लोगों द्वारा बताया गया कि हमारी ज़मीन पर चीन घुसा है।


राहुल गांधी ने वही बात कही है,जिसे कोर्ट गलत बता रहा है,एक बात नोट कर लीजिए, आहिस्ता आहिस्ता हमारे देश की एक एक ईंट गिराई जा रही है।


लोकतांत्रिक ढांचे को जर्जर किया जा रहा है, दुश्मन के खिलाफ मुंह खोलने वाले को चुप किया जा रहा है।


कुल मिलाकर देश को बर्बाद करने की प्रषठभूमि तैयार है, उसमें एक यही बंदा है जो आड़े आ रहा है, इसलिए ये संघियों की नजर में खटकता है।


और हां दुनियां में चीन से बढ़कर हमारा कोई दुश्मन नहीं है, दुश्मन की सरपरस्ती अब कोर्ट भी कर रहा है,वो पट्ठा तो पहले से कर ही रहा था।


हम लुट पिट चुके हैं, और इस लूट में मीडिया और सरकार के साथ अब कोर्ट भी आ गया है.. क्योंकि गौतम अडाणी को चाइना के साथ मिलकर धंधा भी करना है।


और जो धंधे के लिए देश के साथ गद्दारी करेगा, ज्यादा दिन तक आवाम अब उसे मांफ नहीं करने वाली है, सत्ता परिवर्तन के बाद इन लोगों को राहुल गांधी भी नहीं छोड़ने वाले हैं।


ये बात राहुल गांधी खुद भी बोल चुके हैं,भूल ना जाये, इसलिए मैं भी लिखे दे रहा हूं।

हमलोग उसका memes खोजने में व्यस्त है

वो विपक्ष का नेता का भूमिका बेहतरीन तरीके से निभा रहा है(साभार)

रविवार, 20 जुलाई 2025

काशी को क्योटा बनाने के बाद अब पटना को पुणे और मोतिहारी को मुंबई…

 काशी को क्योटा बनाने के बाद अब पटना को पुणे और मोतिहारी को मुंबई…


ग़ज़ब दौर है, लोग सच न देखना चाहते हैं और न ही सुनना, सत्ता में बैठे लोग कुछ भी बोलने लगे हैं और लोग ताली बजा रहे हैं । धर्म का नैरेटिव्ह सेट है इसलिए हर चुनाव के पहले इस पर नमक मिर्च का तड़का डाल दिया जाता है और फिर ताली बचाने लगते हैं, कंगना रानौत की हिमाक़त किसी मूर्खता से कम नहीं तो पटना को पुणे बनाने की घोषणा को बेशर्मी नहीं कहा जाना चाहिए…

प्रसिद्ध व्यंगकार हरिशंकर परसाई ने कहा था 

बुद्धिजीवी इस समय संशय से भरे हैं और मूर्ख भरपूर आत्मविश्वास से.

हालांकि इन पर बात करना भी नहीं करने के बराबर ही है. लेकिन जरा सोचिए अगर यह सारी धरती इन्हीं लोल लोगों से भर गई तब बातचीत के विषय कैसे होंगे? कोई भी आकर कह देगा देश को आजादी चिड़िया के अंडे से मिली है. या यह देश डेढ़ सौ सालो की लीज पर है.

कोई यह भी कह सकता है कि नेहरू और गांधी एक भूत है.

हवाई जहाज की खोज हमारे पतंग उड़ाने से हुई है. 

कोई पासपोर्ट की रैंकिंग गिरने को उपलब्धि बता सकता है

और इसलिए कंगना कह रही है कि सरदार पटेल को अंग्रेज़ी नहीं आती इसलिए वे प्रधानमंत्री नहीं बन पाये और अमित शाह का तो दवा है कि अंग्रेज़ी बोलने वालों को एक दिन शर्म आएगी..

ऐसे में समझो कि कुछ तो झोल है 

क्योंकि सरदार पटेल ने लंदन में बाक़ायदा बेरिस्टरी की है

अब थोड़ी बात नॉनबायोलॉजिकल के लिए हो जाये यानी इस झोल पर…

मोदी जानते हैं कि कहाँ क्या बोलना है क्योंकि यह देश दो धड़ों में बंट चुका है जिनमें मिडिल क्लास वर्ग का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया जा रहा। हालात यह है कि ऊंचे दाम और ऊंचे पकवान के क्राइटेरिया में या तो आप खुद को शामिल कीजिए, या फिर अति गरीबी की श्रेणी में जाकर अपना गुजर बसर कीजिए। जाकर 5 किलो राशन की लाइन में लग जाइए तभी आपका घर चल पाएगा।

जनता इतनी मासूम है कि वो साफ साफ ये देख ही नहीं पा रही कि चुनाव आते ही ये मुगलकालीन इतिहास की कब्रें सिर्फ हिन्दू मुसलमान करने के लिए खोदी जा रही है। बहस के ऐसे ऐसे चिन्हित मुद्दों को उकेरा जा रहा है जिनमें हिन्दू मुसलमान की बहस हो। अब करणी सेना के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का स्टेटमेंट ही देख लीजिए सांसद इकरा हसन के लिए। सत्ता जानती है कि इस मुद्दे पर बहस होनी ही है। सत्ता उकसाती है और जनता उछल उछल कर प्रतिक्रिया देने उतर आती है।

असल मुद्दे जनता के बीच से गायब है। रोजगार का इनके पास कोई मॉडल नहीं है। देश को हलक तक कर्ज में डुबाए बैठे है जिसकी भरपाई जनता की जेबों से की जा रही है। आपके अकाउंट से कभी मेंटेनेंस के नाम पर तो कभी एटीएम चार्ज के नाम पर तो कभी यूपीआई चार्ज के नाम पर बिना बताए पैसे काट ले रहे है। आप ट्रेन की टिकट कटाए तो बिना थर्ड पार्टी ऐप के (जिनका चार्ज लगभग 250 से 300 रुपए ज्यादा लगता है) आप आसानी से कर ही नहीं पा रहे। चिड़ियाघर और म्यूजियम जैसे पर्यटन स्थलों पर 25 रुपए की टिकट अब दो गुनी तीन गुनी होकर बिक रही है। एयरपोर्ट में और तीर्थ स्थलों पर ठेके वाली कैंटीनों में डंके की चोट पर 25 का माल 50 में बेचा जा रहा है। 

तब जब थोड़े लोग सत्ता से न डिग सके इसलिए कुछ विकास का दावा कर दो।

लोगो ने काशी को क्योटा बनते तो देख ही लिया है अब पटना को पुणे और मोतिहारी को मुंबई बनते भी देख ही लेंगे…

मंगलवार, 20 अगस्त 2024

अमित शाह का टेंशन और हिदुत्व का खेल...

 अमित शाह का टेंशन और हिदुत्व का खेल...


इधर देश में बलात्कारियों की करतू‌तों को लेकर हंगामा मचा हुआ है, मणिपुर जल रहा जम्मू तक में आकर आतंकवादी अपनी करतू‌तों को अंजाम दे रहे हैं लेकिन देश के गृह मंत्री अमित शाह को बंग्लादेश और पाकिस्तान में हिंदुओं की घटती संख्या को लेकर टेंशन है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि क्या पाकिस्तान और बांग्लादेश मे हिंदुओं की  कथित दुर्दशा और कम होती जनसंख्या का सच क्या है। क्या  यह पूरा खेल भारत में हिंदू वोटरों के ध्रुवीकरण का खेल है। 

क्या लोगों को सच से दूर रखकर एक ख़ास वर्ग के प्रति नफरत फैलाकर अपनी राजनीति साधाने का प्रयास हर चुनाव के पहले किया जाता है।

ये सच है कि 1941 की जनगणना के मुताबिक वेस्ट पाकिस्तान (वर्तमान) में 14 फीसदी हिदू थे और ईस्ट पाकिस्तान (बांग्लादेश) में 26 फीसदी हिन्दू थे।

ऐसे में पाकिस्तान और बाग्लादेश मैं वर्तमान में हितुओं की संख्या  को लेकर बवाल मचाया जाता है कि देखिये पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिदुओं को काट डाला गया।

बहरहाल पाकिस्तान और बाग्लादेश में हिंदुओं की संख्या घटने के तीन प्रमुख कारण है जिसमें से पहला कारण तो सिम्पल स्टेस्टिक्स है तो दूसरा कन्वर्जन जबकि तीसरा कारण

माइग्रेशन है। इन तीनों कारणों से पहले के कारण भी महत्वपूर्ण है जो हिंदुओं की आबादी कम होने की वजह है।

अब 1941 की जनसंध्या के आंकड़े से आगे आ जाइये 1947 में। और 1947 के विभाजन में 50 लाख हिन्दू और सिख वेस्ट पाकिस्तान से भारत आ गये तब 1951 की जन‌ग़णना में हिन्दुओं की संख्या दो फीसदी रह गई। तब से लेकर आजतक उनकी जनसंख्या प्रतिशत में लगभग उतनी है बल्कि 0.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।

ईस्ट पाकिस्तान से भी बंटवारे के दौरान यानी 1947 में हिंदुओं की जनसंख्या  26 से गिरकर 22 फ़ीसदी हो गई।

लेकिन 1970 में पाकिस्तानी सरकार ने तमाम बंगालियों पर अत्याचार किये । मार्शल लॉ लगाया। दो करोड़ हिंदू शरणार्थी भारत की शरण में आ पहुंचे। मुसलमान कहां जाते इसलिए वे वही रहे, वे वहीं मरते रहे, अत्याचार सहते रहे।

अब 7 करोड़ की जनसंख्या में दो करोड़ यदि भारत आ गए तो हिसाब लगा लिजिए कि बांग्लादेश में हिन्दु‌ओं की संख्या कितनी घटी। तब से आज तक ओवर ऑल हिदुओं की संख्या 9-10 फीसदी बची है जो आज भी उतनी ही हैं।

इसी 9-10 फ़ीसदी आंकड़े को पकड़‌कर गृह मंत्री अमित शाह कलह मचाये हुए हैं।

जनसंख्या  घटने का एक और कारण कन्वर्जन को लेकर जो हल्ला मचाया जाता है वह कन्वर्जन प्रासिक्यूशन वहां भी वैसा है जैसे इंडिया में।

ईज्ज़त नौकरी, न्याय  अधिकार को लेकर कन्वर्जन इंडिया में क्या कम हुए है।

जहां तक धर्म के आधार पर विभाजन की बात है तो यह बिल्कुल गलत है लेकिन अमित शाह फिर द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को मुस्लिम लीग के साथ तालमेल बिठानेवाले सावरकर को सर आँखों पर क्यों  बिठाते हैं?

हैरानी की बात तो यह है कि सारा सच इंटरनेट पर मौजूद होने के बाद भी यदि लोग़ राष्ट्रवाद के नाम पर परोसे जा रहे झूठ  पर आखें बंद किये हुए है तो फिर गलत लोगों को राज करने से कोई कैसे रोक सकता है!

रविवार, 21 जुलाई 2024

गुजरात लॉबी का यह कैसा करतूत

 फिर जुड़‌ने लगा पीएमओ से तार…

गुजरात लॉबी का यह कैसा करतूत


इन दस सालों में का देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित्र शाह ने जो चक्रव्यूह रचा था, क्या उस चक्रव्यूह का खेल खत्म होने लगा है। पूंजी निवेश से लेकर बैंको के कर्जे ‌लेकर भागने का मामला हो या फिर भ्रष्टाचार के बड़े मामले, नीट पेपर लीक घोटाला हो या यूपीएससी का खेल ! आखिर सारे तार पीएमओ से क्यों जुड़ जाते है?

नीट पेपर लीक मामले में जिस तरह से गुजरात का गोधरा चर्चा में है। गोधरा के इस पेपर लीक मामले को लेकर हो रहे रोज खुलासे के बाद अब ट्रेनी आईएएस पूजा खेड्‌कर का मामला सामने आने के बाद एक बार फिर गुजरात लॉबी ही नहीं पीएमओ पर भी उंगली उठने लगी है। और इस विवाद के बीच जिस ताह से यूपीएससी के अध्यक्ष मनोज सोनी का इस्तीफ़ा सामने आया है वह हैरान करने वाला तो है ही बल्कि मोदी सत्ता के उस निर्णय की नीयत पर उंगली उठाता है जिसके तहत दर्जनौ लोगों को प्रोफेशनल नियुप्ति के नाम पर कहीं सचिव बना दिया गया तो कहीं अध्यक्ष या डायरेक्टर ।

यश बॉस के इस दौर में यह जान लेना ज़रूरी है कि आखिर मनोज सोनी के इस्तीफ़े को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,गृह मंत्री अमित शाह क्यों निशाने पर है।

क्या मनोज सोनी का इस्तीफ़ा फर्जी प्रमाणपत्र, सत्ता और विशेषाधिकार का कथित दुरुपयोग के बाद जिस तरह से कई आईपीएस और आईएएस के चयन पर उठ रही उंगली है। लेकिन पहले ये जान ले कि मोदी-शाह क्यों निशाने पर है। गुजरात के रहने वाले मनोज सोनी का अभी पांच साल का कार्यकाल बाकी था। सोनी ने अपने इस्तीफे में व्यक्तिगत कारणों का हवाला दिया है। सोनी का कार्यकाल 2029 में पूरा होना था। मनोज सोनी आयोग में 2017 में बतौर सदस्य नियुक्त हुए थे। उन्होंने 16 मई, 2023 को अध्यक्ष के रूप में शपथ ली। ऐसे में उन्होंने बतौर अध्यक्ष सिर्फ करीब 13 महीने काम किया। मनोज सोनी गुजरात के आणंद जिले से ताल्लुक रखते हैं। उनका परिवार मुंबई से गुजरात शिफ्ट हुआ था। उन्होंने बचपन के दिनों में अगरबत्तियां तक बेंची।

द हिंदू' ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उन्होंने लगभग एक महीने पहले इस्तीफा दे दिया था। सूत्रों के अनुसार वह गुजरात के शक्तिशाली स्वामीनारायण संप्रदाय की एक शाखा अनुपम मिशन को अधिक समय देना चाहते हैं। वह 2020 में दीक्षा प्राप्त करने के बाद मिशन में एक साधु या निष्काम कर्मयोगी बन गए थे। सोनी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करीबी माना जाता है, जिन्होंने उन्हें 2005 में वडोदरा में महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय (MSU) के कुलपति के रूप में चुना था। तब वह 40 वर्ष के थे। जिससे वह देश के सबसे कम उम्र के कुलपति बन गए थे। जून 2017 में यूपीएससी में नियुक्ति से पहले सोनी ने बाबासाहेब अम्बेडकर मुक्त विश्वविद्यालय (बीएओयू) के 1 अगस्त 2009 से 31 जुलाई 2015 तक कुलपति रहे थे। इसके बाद वह अप्रैल 2005 से अप्रैल 2008 तक वडोदरा में स्थित महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी ऑफ बड़ौदा के कुलपति रहे थे। 

 सोनी गुजरात विधानमंडल के एक अधिनियम द्वारा गठित एक अर्ध-न्यायिक निकाय के सदस्य भी रह चुके हैं। मनोज सोनी की गिनती उन लोगों में होती है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विश्वासपात्र माने जाते हैं। पीएम मोदी ने मनोज सोनी के संघर्ष को देखते हुए ही मुख्यमंत्री रहते हुए एमएसयू के वीसी की जिम्मेदारी सौंपी थी। एमएसयू में मनोज सोनी के वीसी रहते हुए कई आंदोलन हुए थे, लेकिन उन्होंने नो कंप्राेमाइज का फॉर्मूला अपनाया था। आर्ट्स फैकल्टी में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों से जुड़े विवाद में वह काफी सुर्खियों में रहे थे। ऐसा कहा जाता है कि इस विवाद के चलते उन्हें एमएसयू में दूसरा कार्यकाल नहीं मिल पाया था, हालांकि मनोज सोनी को बाद में बाबासाहेब अम्बेडकर मुक्त विश्वविद्यालय (बीएओयू) का वीसी बनाया गया था।

तब सवाल यही है कि क्या प्रोफ़ेशनलों की नियुक्ति की वजह क्या है…?


शनिवार, 10 अप्रैल 2021

शाबास प्रधानमंत्री जी...

 

क्या बात है... देश में फिर कोरोना हाहाकार मचाने लगा है। रोज हजारों लोग मरने लगे हैं, देश की जनता तो सीधी-साधी है और सबसे भोले हैं हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी। और उनसे भी लाख गुना सीधे है हमारे गृहमंत्री अमित शाह जी। दुनिया में आग लग जाए इन लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता। फिर पहुंच जायेंगे बंगाल और जुटा लेंगे लाखों की भीड़।

मुझे एक बात प्रधानमंत्री से सीधी पूछनी है कि क्या आपकी रैलियों में जो भीड़ जुट रही है उससे कोरोना नहीं फैलता क्या? चंद रुपयों की खातिर रैली में आने वालों के लिए तो भूख पहले से ही महत्वपूर्ण रहा है लेकिन देश में जिस तरह से कोरोना के कहर से लाशों में लोग तब्दिल हो रहे हैं क्या वह भई दिखाई नहीं दे रहा है या चुनावी जीत के लिए लोगों की जान को दांव में लगा देना उचित है?

शाबास की हेडलाईन इसलिए लगाया ताकि भाजपा के वे लोग भी पढ़े और एक बार चिंतन करें कि चुनावी जीत क्या इतना जरूरी है। प्रधानमंत्री जी आप देश के मुखिया हैं और मुखिया का व्यवहार और कर्तव्य सब लोगों के हित के लिए होना चाहिए। हम मानते हैं कि चुनाव में जीत महत्वपूर्ण है लेकिन एक दो राज्य गंवा देने से क्या फर्क पड़ जायेगा, पहले भी तो छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली गंवा ही चुके हो।

एक तरफ देश में कोरोना ने हाहाकार मचा दिया है, नाईट कफ्र्यू, लॉकडाउन ने आम आदमी को प्रताडि़त किया है तो दूसरी ओर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चुनावी सभा लेने में व्यस्त है, दिनभर चुनावी सभा और शाम को दो गज की दूरी और मास्क जरूरी की बात क्या बेमानी नहीं है।

हमने पहले ही कहा है कि इस देश में कोरोना के लिए हाउडी ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सत्ता की भूख ही जिम्मेदार है, और इस बार फिर कहते हैं कि चुनावी सभा में जुटाये जा रहे भीड़ इस देश को नरक बना देने वाला है। सत्ता और राजनेताओं की बेशर्मी के कितने ही किस्से हैं लेकिन जब देश का प्रधानमंत्री ही चुनावी जीत के लिए जनता की जान को ही दांव पर लगा दे तो इसका मतलब साफ है कि हाउडी ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सत्ता बनते तक का इंतजार भी क्या ऐसा ही कुछ नहीं था।

हैरानी तो इस बात की है कि करोड़ों लोगों की जान दांव में लगते देख भी राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट ने आंखे बंद कर रखी है बाजार में भीड़ पर हल्ला मचाने वाली मीडिया को भी चुनावी रैली में भीड़ जुटाने वालों के तलवे चाटना पसंद है। जब देश की तमाम संवैधानिक संस्था, समाजसेवी कलाकार सब चुप हो तो जनता क्या करें।

वैसे भी इस देश ने गरीबी और भूखमरी के सारे रिकार्ड तोड़ दिये हैं, चंद पैसों के लिए जो लोग अपनी जान को जोखिम में डाल रहे हैं उनका ही दोष गिनाया जायेगा, कोई यह मानने को तैयार नहीं है कि प्रधानमंत्री की चुनावी सभा से कोरोना की स्थिति आने वाले दिनों में भयावह होने वाला है। लेकिन प्रधानमंत्री जी अब तो फैसला लिजिए, लोगों को बख्श दीजिए, बंगाल तो आते-जाते रहेगा लेकिन जब लोग ही नहीं रहेंगे तब...!

गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

कानून से उपर सत्ता और बेबसी...

 

नक्सली हमले के बाद देश के गृहमंत्री अमित शाह का छत्तीसगढ़ दौरा इन दिनों सुर्खियों में है तो उसकी वजह बगैर मास्क की वे तमाम तस्वीरें है जो साबित करती है कि सत्ता के आगे जनता कितनी बेबस है।

अब जब न्यायालय में कार में अकेले सफर करने वाले को मास्क लगाने को उचित बता रहा है तब सोचिये देश के गृहमंत्री की इन तस्वीरों का मतलब क्या है। कहते हैं कि हर अपराधी की शुरुआत झूठ बोलने की आदत से शुरु होती है और यह सफर रंगा-बिल्ला या कुख्यात तक पहुंच जाता है, इसी तरह सार्वजनिक जीवन में छोटी-छोटी बातों का महत्व है। यही छोटी बात आम आदमी के जीवन को प्रभावित करता है।

ये सच है कि हर व्यक्ति का अपने जीवन में बहुत कुछ निजी होता है लेकिन जो लोग सार्वजनिक जीते है उनकी छोटी सी छोटी बात भी जनमानस को प्रभावित करता है। ऐसे में गृहमंत्री का मास्क नहीं लगाना चुनावी रैलियों में भीड़ और कुंभ या सामाजिक कार्यक्रमों में भीड़ का क्या प्रभाव पड़ता होगा यह सहज ही समझा जा सकता है।

देश केवल कोरोना की महामारी से त्रस्त नहीं है बल्कि झूठ, नफरत और अफवाह के उस जंजाल में भी फंस चुका है जिसके चलते हालात बदतर होते जा रहे हैं। हमारा दावा है कि कोरोना जैसी महामारी नहीं भी आती तब भी देश के हालात इसी तरह केे होते क्योंकि सत्ता पाने के लिए जो बीज बोया गया है उसका परिणाम तो दुखद होना ही था।

कानून को सत्ता के दम पर ठेंगा दिखाने की परम्परा चल पड़ी है, कितने ही उदाहरण है जब सत्ता ने अपनी मनमानी से जनता को बेबस कर दिया है, और अब तो झूठ, नफरत और अफवाह की चाशनी में सत्ता ने जनमानस के दिमाग में नस्लवाद का ऐसा जहर भर दिया है जिसका असर आसानी से जाने वाला इसलिए भी नहीं है क्योंकि सत्ता पाने की राह में सभी जहर बो रहे हैं। याद कीजिए सीएए के विरोध में बैठे लोगों को किस हद तक जलील किया गया वह याद नहीं है तो किसान आंदोलन को ही याद कर लीजिए, अफवाहबाजों ने क्या कुछ नहीं किया। इसके बाद भी यदि किसी को स्यिूमर स्पीड सोसायटी पर भरोसा है तो इसका मतलब साफ है कि विरोध का हर स्वर मुल्ला मुलायम या ममता बेगम के तमके के लिए तैयार रहे।

क्या इस देश में कोई बहुसंख्यक समाज का व्यक्ति किसी अल्पसंख्यक के लिए खड़ा नहीं हो सकता! पूरी दुनिया में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की खबरें नई नहीं है और सत्ता के लिए राजनैतिक दल ये दावा करने से नहीं चुकते कि अल्पसंख्यक उनका हक छिन रहे हैं और पहले ही अव्यवस्था से दुखी व्यक्ति आसानी से ऐसे लोगों की बातों में आ जाते हैं।

ऐसे में यदि अमित शाह के मास्क नहीं पहनने पर उनकी पार्टी के लोग खामोश हो या दूसरे का पाप गिनाने लगे तो समझ लिजिए पट्टा ने दिल और दिमाग दोनों को अलग कर इस हद तक जकड़ लिया है कि मस्तिष्क कुंद हो गया है। और जनता बेचारी तो बेबस है।

मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

सत्ता की राजनीति...

 

नक्सली हमले में मारे गये जवानों के अंतिम संस्कार के दौरान परिजनों की तस्वीरें बेहद भावुक और भीतर तक हिला देने वाली है। हालांकि आम लोग इसे कुछ दिनों बाद भूल जायेंगे नेताओं और सरकार की तो बात ही करना बेमानी है क्योंकि सत्ता की क्रूरता और संवेदनहीनता की लम्बी कहानी है।

अचानक लॉकडाउन से मजदूरों और मध्यम वर्गों की बदहाली की तस्वीरों को अब कौन याद रखता है। और यदि सत्ता को यह सब याद भी है तो वह पुनर्रावृत्ति रोकने के लिए क्या कर रही है।

महामारी की बात छोड़ भी दे तो धर्म और जाति में नफरत बोने वाले भी कहां चुप है। वे आज भी अपने को श्रेष्ठ कहते हुए दूसरे का अपमान करने से नहीं चुकते। इस दुनिया में शायद ही कुछ लोग होंगे जो अपने धर्मों का पूरी तरह पालन करते होंगे लेकिन उन्हें दूसरे धर्म से और उसे मानने वालों से बेहद नफरत है और वे अपनी नफरत का इजहार सार्वजनिक रुप से करने से भी नहीं हिचकते।

दरअसल नक्सली से लेकर दंगे और जाति से लेकर धर्म की वजह से जो अशांति फैली है, मारकाट मचा है उसके मूल में  सत्ता और उसकी राजनीति ही है। सत्ता पाने के लिए और सत्ता की रईसी बरकरार रखने के खेल में आम आदमी पिसता चला जा रहा है।

सत्ता की वजह से ही गलत लोगों को फलने-फूलने का मौका मिलता है। ताजा उदाहरण महाराष्ट्र का है। सौ करोड़ की वसूली का मामला हैरान कर देने वाला है, जिस देश में बेरोजगारी और भूखमरी बढ़ते जा रही है वहां सत्ता की रईसी की कल्पना की बेमानी है। राफेल डील का मामला भी संदिग्ध होता रहा है, सत्ता की ताकत का अहसास तो पहले से ही था लेकिन फ्रेच जर्नर के दावे ने इसकी पुष्टि कर दी। यदि दो सरकारों के बीच हुए सौदो में भी कमीशन या दलाली होने लगी है तो जान लिजिए की सत्ता ने इसे सिस्टम बना दिया है। ऐसे में अब तो सत्ता यह कहकर सारे अपराधों से मुक्ति भी पा सकती है कि जनता ने उन्हें पांच साल के लिए चुना है इसलिए इन पांच वर्षों में वे जो करें सब सही है। 

याद कीजिए छत्तीसगढ़ में एक घोटाले पर जब विपक्ष ने सवाल उठाया था तो तब के तत्कालीन मुख्यमंत्री का जवाब था 'जब बेचने वाले को आपत्ति नहीं, खरीदने वाले को आपत्ति नहीं तो विपक्ष को क्यों आपत्ति हो रही है।Ó

निजीकरण के होड़ में क्या यही सब कुछ नहीं हो रहा है, सरकार धड़ाधड़ सब बेच रही है और कई एसेट्स तो कम कीमत में बेची जा रही है।

ऐसे में बिहार में जब छात्र सिर्फ इसलिए तोडफ़ोड़ करते है कि उनकी पढ़ाई का नुकसान अब बर्दाश्त नहीं तो इसका मतलब क्या है? चार माह से कृषि कानून के खिलाफ बैठे किसानों की अनदेखी क्या सत्ता के धौंस की कहानी नहीं है। तब नक्सली हमले को लेकर जवानों की शहादत की तस्वीरों का क्या मतलब? सत्ता के लिए विकास का मतलब कमीशनखोरी और निजीकरण ही रह गया है तब बदहाल होते लोगों की चिंता कौन करें।