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बुधवार, 17 जुलाई 2024

विकास के नाम पर मौत का विभत्स खेल...

 विकास के नाम पर मौत का विभत्स खेल...

 उद्योग पति और शासन-प्रशासन का गठ‌जोड़ छतीसगढ़ में भी


विकास के नाम पर सत्ता कैसे-कैसें खेल खेलती है, यह सिर्फ तूतीकोरिन में उद्योगपति के इशारे पर मारे गये  पुलिस द्वारा 13 प्रदर्शनकारियों से समझ पाना मुश्किल है। इस तरह का खेल इन दिनों सत्ता के लिए सहज और आम हो गई है। क्योंकि इस तरह की घटना के बाद जाँच और न्यायालयीन प्रक्रिया इतनी लंबी चलती है कि न्याय का कोई मतलब ही नहीं रहता।


स्टरलाइट कंपनी के इशारे पर पुलिम द्वारा 13 प्रदर्शनकारियों को गोली से भून देने के मामले में मद्रास हाइकोर्ट की तल्ख़ टिप्पणी  पर बात


करने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि सत्ता और कारपोरेट के गठजोड़

को लेकर उठते सवाल क्यों महत्वपूर्ण हो चले है। विकास किस शर्त पर होना चाहिए और सत्ता की पैसों की भूख की सीमा क्या है? इस दौर में यह सवाल इसलिए बेमानी है क्योंकि राजनेताओं का संगठित गिरोह ने लूट का नया तरीका अख़्तियार किया है। जिसने अब सीधे सीधे लोगों की जान से खिलवाह करना शुरू कर दिया है।

सवाल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मित्र प्रेम का नहीं है, और न ही सवाल इलेक्ट्राल बाण्ड लेने के चलते उन दवा कंपनियों की जांच रोक देने का है जो जहर परोसने आमादा थे। सवाल तो यही है कि क्या अब सत्ता में बैठे लोगों ने यह तय कर लिया है जब तक वे हैं, मौज कर ले, मरने के बाद किसने देखा है कि दुनिया का क्या होगा?

और इसी ख़तरनाक सोच ने आम आदमी का जीवन नारकीय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ा है।


छत्तीसगढ़ में शंकर गुहा नियोगी हत्याकांड सत्ता और कार्पोरेट का विभत्स चेहरा नहीं था? या फिर दुर्ग जिले के बेरला स्थित स्पेशल ब्लास्ट  फैक्टरी में हुए मौत का तांडव !

 घटना के बाद खूब हो हल्ला हुआ लेकिन क्या इस कंपनी के सभी संचालक गिरफ्तार हुए। कार्रवाई के पर किस तरह की खाना-पूर्ति की गई। उस पर क्या कांग्रेस भी सवाल उठायेगी?

छत्तीसगढ़ में भी अदानी पावर के विस्तार को लेकर तिल्दा और रायगढ़ में जनसुनवाई हो रही है। किसानों के जनसुनवाई स्थगित करने के एलान के बाद भी शासन - प्रशासन मुस्तैद है। और यदि सत्ता चाह ले तो किसानो से जमीन छिने जाने से कौन रोक सकता ।


क्या हर तरह के विरोध के बाद हसदेव अरण्य की कटाई को रोका गया, विरोध करने वालों को हिरासत में लेकर जिस तरह से वृक्षों  की कटाई की गई उसके आगे पर्यावरण को लेकर बनी तमाम संस्थाएं किस तरह मौन है? आख़िर यह परियोजना भी तो मित्र-प्रेम की इबादत है।

तब मद्रास हाईकोर्ट में चल रहे स्टरलाईट कंपनी से जुड़े इस मामले पर न्याय होगा !

कहना कठिन इस लिए भी है क्योंकि 2014 के बाद से सुनवाई के दौरान न्यायालय का ग़ुस्सा और फ़ैसले में एका दिखाई ही नहीं देता।

 स्टरलाईट के विस्तार के विरोध में ही प्रदर्शनकारियों को गोली से भून देने की इस घटना की सुनवाई के दौरान मद्रास हाइकोर्ट के जजों ने जिस तरह से सीबीआई की जाँच पर नाराजगी जाहिर करते हुए इस मौत को नियोजित बताया है क्या फ़ैसले में यह दिखाई देगा?

घटना 2018 की है, २२ और 23 मई 2018 की यह घटना स्टालाईट् के विस्तार को लेकर जनसुनवाई के दौरान हुई। जनसुनवाई के विरोध में आसपास के क्षेत्रों के लोग प्रदर्शन कर रहे थे। और जब पुलिस ने कार्रवाई शुरु की तो प्रदर्शनकारी भागने लगे और इन्हीं भागते प्रदर्शनरियों को यानी उनकी पीठ पर गोली मारी गई। 13 लोगों की मौत हो गई। प्रदर्शनकारी प्रदूषण संबंधी चिंताओं के कारण स्टरलाईंट् के कापर स्मेलटर इकाई को बंद करने की माँग कर रहे थे।

छत्तीसगढ़ के तिल्दा और रायगढ़ में भी अदानी पावर के विस्तार का विरोध हो या हसदेव अरण्य की कटाई का विरोध प्रदूषन संबंधी चिंता ही प्रमुख वजह है।

तब सवाल यही खड़ा होता है कि क्या हसदेव की कटाई नहीं रोक देनी चाहिए। हालांकि इस मामले में कांग्रेस ने विरोध जरूर किया है लेकिन क्या यह विरोध सिर्फ बयानबाजी तक रहेगा या कटाई के दौरान कांग्रेसी हसदेव को बचाने वहां जायेंगे?

गुरुवार, 27 जून 2024

विरासत सँभाले या खुद को…

 विरासत सँभाले या खुद को…


शुक्ल बंधुओं की राजनीति को आगे बढ़ाने में लगे अमितेष शुक्ल की स्थिति इन दिनों इतनी खराब है कि घर में भी उनकी बातें नहीं सुनी जाने की चर्चा आम हो गई है।

एक समय था जब चाचा विद्याचरण की तूती पूरे देश में बोलती थी तो श्यामाचान शुक्ल का अपना प्रभाव था और उसी प्रभाव के चलते वे जब पहली बार राजिम से विधायक बने तो इस विरासत  को आगे बढ़ाने  का दावा भी किया जा रहा था, बावजूद इसके कि उसमें खाने-खजुआने के अलावा और कोई विशेष गुण नहीं है।

राज्य बनने के बाद तो जिस ताह से अजीत जोगी ने राजनीति की, उसे समझ पानी में अमितेष इस कदर मुश्किल में पड़ गये कि चुनाव ही हार गये। दोहजार अट्ठारह के चुनाव में कांग्रेस की लहर की वजह से पचास हजार वोट से जीत हासिल कर अपने को फिर से तुर्मखां समझने लगे। लेकिन रोहित साहू से फिर वे मात खा गये।

ऐसे में अब प्रतिष्ठा बचाने की बात तो दूर अगले चुनाव में टिकिट भी मिल पायेगी कहना मुश्किल है, तब निष्ठावान कार्यकताओं ने भी पल्ला झाड़‌ना शुरु कर दिया है। इसकी दो तरह की चाय के अलावा भी दूसरी वजह की चर्चा भी खूब जमकर चल रही है।अब अमितेश के सामने दिक़्क़त सिर्फ़ खाने की ही नहीं, निकालने की भी है…!

रविवार, 4 जुलाई 2021

बाबा को गुस्सा क्यों आता है...

 

शीर्षक देखकर बहुत से लोगों को नसरुद्दीन शाह और शबाना आजमी अभिनीत फिल्म अलबर्ट पिंटों को गुस्सा क्यों आता है कि याद ताजा हो गई होगी, लेकिन यकीन मानिये रियल लाईफ और रील लाईफ में ज्यादा अंतर नहीं होता, कुछ लोगों में नाराजगी व्यक्त करने का स्वभाव आदत में तब्दिल हो जाता है और वे ये भूल जाते है कि उनकी नाराजगी का दूरगामी असर क्या पडऩे वाला है।

हम बात कर रहे हैं प्रदेशत के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव यानी बाबा का। उनकी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से नाराजगी जग जाहिर है, नाराजगी की वजह के कई कयास है। ताजा मामला मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के उस बयान के बाद सामने आई हैं जिसमें बघेल ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधा बढ़ाने निजी अस्पतालों को मदद की जायेगी। इस योजना पर काम शुरु किया जा रहा है। वैसे देखा जाए तो इस तरह की योजना बनाना मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार भी है लेकिन राजा साहेब यानी टीएस बाबा को लगता है कि मुख्यमंत्री अनावश्यक हस्तक्षेप कर रहे हैं इसलिए जब इस योजना को लेकर पत्रकारों ने स्वास्थ्य मंत्री बाबा साहेब से सवाल पूछा तो वे सवाल सुनते ही उखड़ गए और इस पर असहमति जताते हुए यहां तक कह दिया कि निजी अस्पतालों को गरीबों को मुफ्त में ईलाज करना चाहिए तभी अनुदान देना चाहिए।

हालांकि मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने से चूक गए राजा साहेब की नाराजगी नई नहीं है, वे पहले भी अपनी नाराजगी सार्वजनिक तौर पर जाहिर कर चुके हैं, ढाई-ढाई साल वाले फार्मूले को  उनके ही समर्थकों द्वारा हवा देने का आरोप तो उन पर लगा ही है उनका इस मामले में गोल-मोल जवाब भी आशकाएं बढ़ाने वाला साबित हुआ। विभाग के बंटवारे से शुरु हुई नाराजगी की खबर हर किसी को है, कैबिनेट की कई बैठकों में बाबा के तेवर की चर्चा भी बाहर आते रही है ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पताल को लेकर दिये उनके बयान का क्या मतलब है यह तो वही जाने लेकिन बुरी गत बन चुकी भाजपा नेताओं के लिए यह नाराजगी मुद्दा जरूर बन गया है। 

वैसे अपने सौम्य व्यवहार और खुशमिजाज के लिए राजधानी में छवि बनाने वाले राजा साहेब के बारे में कहा जाता है कि यदि हकीकत पता करना हो तो अंबिकापुर और आसपास जरूर घुमा-देखना चाहिए। फिर अडानी के परसा कोल ब्लॉक में राजा साहेब की भूमिका तो वहां के ग्रामीण पहले ही बता चुके हैं कि परसा कोल ब्लॉक में अडानी के नियम कानून की धज्जियां पर बाबा कुछ नहीं बोलते जबकि यह क्षेत्र उनके विधानसभा में भी पड़ता है, धंधा पानी की चर्चा तो अलग ही मामला है। यानी बाबा को गुस्सा क्यों आता है कुछ-कुछ तो लोग समझने भी लगे हैं।

मंगलवार, 29 जून 2021

बघेल-बाबा में बढ़ते मतभेद...

 

प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव के बीच सत्ता संघर्ष किसी से छिपा नहीं है लेकिन अब कई मामलों में यह खुलकर सामने आने लगा है तो इसकी वजह ढाई-ढाई साल के फार्मूले का सच है या खुद को बीस साबित करने की रणनीति का हिस्सा है यह तो वक्त ही बतायेगा लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधा बढ़ाने को लेकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के निर्णय पर जिस तरह से उनके ही स्वास्थ्य मंत्री टीएस बाबा ने असहमति जताते हुए सवाल खड़ा किया है वह किस बात का संकेत हैं।

हालांकि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के पास जिस तरह का बहुमत है उसने सारे अंदेशे को विराम दे दिया है लेकिन मुख्यमंत्री के पास जिस तरह का बहुमत है उसने सारे अंदेशे को विराम दे दिया है लेकिन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को लेकर कुछ मंत्रियों की नाराजगी भी खुलकर सामने आने लगी है। मुख्यमंत्री बघेल पर जिस तरह से सबकुछ अपनी मर्जी चलाने का आरोप बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे मंत्रियों के बीच भी तल्खी बढऩे लगी है। यही नहीं संगठन के लोगों को सत्ता में भागीदारी देने में हो रहे विलंब की वजह से भी मुख्यमंत्री के प्रति आक्रोश अब कांग्रेस के भीतर साफ तौर पर महसूस की जा सकती है।

ढाई-ढाई साल के कथित फार्मूले को लेकर जो बवाल काटे जा रहे थे वह भले ही टांय-टांय फिस्स हो गया हो लेकिन जिस तरह से समय-समय पर टीएस बाबा, मोहम्मद अकबर, रुद्र गुरु सहित कई मंत्री और विधायकों का रुख प्रकट होने लगा है उसके बाद ये कहना गलत नहीं होगा कि आने वाला ढाई साल कैसा होगा। 

सत्ता और संगठन में भले ही मतभेद सामने नहीं आया है लेकिन लाल बत्ती की चाह में घेरेबंदी और देर होने की वजह से सत्ता के प्रति नाराजगी भी अब जोर पकडऩे लगा है। हालांकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम ने सत्ता के कार्यों पर संतोष भी जताया है लेकिन ये कौन नहीं जानता कि मोहन मरकाम पिछले दो साल से किस तरह से कार्य करते रहे हैं। और अब जब शराबबंदी से लेकर दूसरे वादों की बात हो या केन्द्र की मोदी सरकार की आलोचना की बात हो उनके तेवर का कहीं पता नहीं होता।

हैरानी की बात तो यह है कि संगठन से जुड़े लोगों की सत्ता में भागीदारी कब होगी इसका भी पता किसी को नहीं है। पिछले कई महीने से अब-तब की आस में बैठे कांग्रेसियों का सब्र भी जवाब देने लगा है जब सवाल यही है कि बघेल-बाबा के मतभेद की वजह से देर हो रही है या अकबर-रुद्रगुरु के तेवर की वजह से देर हो रही है। ऐसे में यदि संगठन कमजोर नेतृत्व के पास रहा तो सत्ता में बवाल उठना तय है और वर्तमान संगठन का हाल किसी से छिपा भी नहीं है।

शनिवार, 12 जून 2021

शराब में सराबोर भूपेश सरकार...

 

शराब बंदी को लेकर सत्ता में आई भूपेश सरकार के राज में अब गांव-गांव में शराब की नदियां बहने लगी है। अवैध शराब कारोबारियों को जिस तरह से प्रश्रय दिया जा रहा है वह चिंतनीय है। अवैध शराब के खेल में जिस तरह से माफिया, पुलिस और नेताओं की मिलीभगत भी सामने आने लगी है। 

ऐसे में छत्तीसगढ़ के गांव-गांव की शांति छिन गई है और परिवार के परिवार बर्बादी की कगार पर है लेकिन सत्ता को शराब से होने वाली कमाई ही दिखाई दे रहा है। महासमुंद की रेल पटरी में जिस तरह की लाशें बिछी वह क्या आगे भी बिछती रहेगी। यह सवाल इसलिए है क्योंकि  अवैध शराब के कारोबारियों के शिकंजे में पूरा छत्तीसगढ़ फंस चुका है। बेमचा की उमा और उसकी पांच बेटियों की आत्महत्या का मामला भले ही कुछ दिनों बाद भूला दी जाए लेकिन सच तो यही है कि शराबी पति या शराबियों की वजह से न केवल घरेलु हिंसा बढ़ी है बल्कि अपराध में भी बढ़ोत्तरी हुआ है। सामाजिक ताने-बाने भी टूट रहे हैं और परिवार भी बिखर रहा है।

ऐसे में शराबबंदी की पहल कांग्रेस ने इसलिए की थी क्योंकि रमन सरकार में शराब की नदिया बहने लगी थी, थाने दस-दस हजार में बिकने की चर्चा थी और डॉ. रमन सिंह दारु वाले बाबा कहलाने लगे थे। शराब से परेशान छत्तीसगढ़ के लोगों ने कांग्रेस के वादे पर भरोसा किया और कांग्रेस प्रचंड बहुमत से जीत भी गई। कहा जाता  है कि शराब बंदी के वादे की वजह से महिलाओं ने कांग्रेस को एकतरफा वोट दिया था लेकिन  ढाई साल बाद भी भूपेश सरकार ने शराब बंदी की बात तो दूर इसके लिए न तो कोई सामाजिक जागरुकता ही चलाई और न ही कोई सरकारी स्तर पर ही पहल हुआ उल्टे अवैध शराब के कारोबारियों को प्रश्रय दिए जाने की खबर आने लगी है।

राजधानी रायपुर में ही किस तरह के लोग अवैध शराब का कारोबार कर रहे हैं यह किसी से छिपा नहीं है और इन लोगों की सत्ता से नजदिकियां भी किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में सरकार यदि शराब में डूब गई है कहा जाए तो गलत नहीं होगा जबकि यह किसी से छिपा नहीं है कि पिछले ढाई साल में सत्ता का शराब को लेकर क्या मापदंड है। जबकि सत्ता चाहे तो चरणबद्ध ढंग से भी शराब बंदी कर सकती है। यह ठीक है कि जिन राज्यों में शराबबंदी है वहां भी अवैध शराब बन रहे है लेकिन जागरुकता अभियान और चरणबद्ध ढंग से इसे अमलीजामा तो पहनाया ही जा सकती है।

सोमवार, 7 जून 2021

ढाई साल का सच!

 

वैसे तो राजनीति में निश्चित कुछ भी नहीं होता है, तब ढाई-ढाई साल वाला फार्मूला क्या बला है? छत्तीसगढ़ में जब से कांग्रेस की सरकार आई है तभी से यह चर्चा जोरों पर रही कि भूपेश बघेल और सिंहदेव उर्फ बाबा के बीच ढाई-ढाई साल का बंटवारा हुआ है, और यह चर्चा अब तेज इसलिए हो गया है क्योंकि वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का ढाई साल 17 जून को पूरा होने जा रहा है।

ऐसे में इस सच को आम लोगों को जानना भी जरूरी है कि आखिर यह ढाई साल क्या बला है और इसमें कितनी सच्चाई है। हैरानी तो लोगों को इसलिए भी है या ढाई-ढाई साल के चर्चे को बल इसलिए भी मिलता है क्योंकि इससे अब तक सीधे तौर पर नो मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कभी इंकार किया और न ही सिंहदेव ने ही कभी इसका सीधे समर्थन ही किया।

यदि दोनों नेता भूपेश बघेल और सिंहदेव इस फार्मूले को इंकार कर देते तो विवाद ही नहीं होता और यदि इस सवाल पर गोल-मोल जवाब  आ रहा है तो इसका मतलब साफ है कि यह फार्मूला कहीं न कहीं अस्तित्व में रहा है। तब सच का पड़ताल जरूरी है। तब सच क्या है?

पंद्रह साल के निर्वासन के बाद जब छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने भारी बहुमत से जीत दर्ज करने से पहले मुख्यमंत्री पद के दो दावेदार थे भूपेश बघेल और सिंहदेव! लेकिन बहुमत आते ही चरणदास महंत और ताम्रध्वज साहू भी मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल हो गए। एक अनार सौ बीमार की तर्ज पर जब मुख्यमंत्री बनने की होड़ मची तो किसी का किसी से समझौता मुश्किल हो गया। हालांकि तब भी मुकाबला भूपेश और सिंहदेव में ही था और दोनों पीछे हटने को तैयार नहीं थे।

जैसा कि कांग्रेस में अमूमन होता है लड़ाई के फैसला का निर्णय हाईकमान पर छोड़ दिया गया, और दो की लड़ाई में तीसरे को फायदे की न केवल उम्मीद ही बढ़ गई बल्कि हाईकमान ने भी साफ कह दिया कि जीत का श्रेय भूपेश बघेल और सिंहदेव को है लेकिन दोनों एक नहीं हो पा रहे हैं तो फिर उनका निर्णय ही सर्वोपरि होगा और हाईकमान के इस फैसले पर सभी यानी चारों दावेदार राजी भी हो गये।

अब सुनिये इस ढाई साल का सच। जिससे न भूपेश बघेल इंकार करते हैं न ही सिंहदेव उर्फ बाबा ही सीधे इंकार करते हैं। दरअसल ढाई साल का इस सच से कांग्रेस हाईकमान ने पहले ही दिन कह दिया था कि ये तुम लोग जानो। तुम लोग मतलब भूपेश बघेल और सिंहदेव। अब असल कहानी में आते हैं, हाईकमान पर निर्णय छोड़ दाऊ, बाबा और महंत लौटने लगे और अभी वे हवाई अड्डे पर पहुंचे ही थे कि ताम्रध्वज साहू के नाम पर मुहर लगने की खबर ने इस ढाई साल के फार्मूले की नींव रखी, उल्टा पैर लौटे भूपेश बघेल, सिंहदेव और चरणदास महंत ने सीधे राहुल गांधी यानी हाईकमान से कहा कि हमारे बीच सहमति बन गई है कि भूपेश बघेल को मुख्यमंत्री बनाया जाए। राहुल गांधी को सहमति का फार्मूला भी समझाया गया लेकिन कहते हैं राहुल गांधी ने साफ कह दिया कि इस फार्मूले को आप लोग जानो, अभी क्या करना है। तीनों का समवेत स्वर गूंजा भूपेश बघेल। और भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बन गये।

फार्मूले और सहमति का स्टाम्प पेपर तो है नहीं कि चुनौती दी जा सके और जब तक सीधे-सीधे दाऊ, बाबा और महंत कुछ नहीं कहेंगे यह कोई जान भी नहीं सकता कि आखिर सच क्या है, और जनता जान भी गये तो इसे लागू करवाने वाला हाईकमान को जानना ही नहीं मानना जरूरी है और हाईकमान जब किसी को कभी भी हकाल सकता है तो इस फार्मूले का मतलब ही क्या है।

रविवार, 11 अप्रैल 2021

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण...


कोविड-19 अब 21 साबित होने लगा है, हर तरफ हाहाकार है, छोटे शहरों की हालत ज्यादा खराब है, अस्पतालों में बेड की कमी, और लापरवाही ने कितने ही घरों की रोशनी छिन ली, और यह आगे कब तक चलेगा कहना मुश्किल है।

कई शहरों में ताला लगने लगा है जिसे लॉकडाउन कहा जा रहा है, शासन-प्रशासन की बेबसी साफ दिखाई देने लगा है, दो गज की दूरी, मास्क जरूरी ही इस संक्रमण से बचने का एक मात्र उपाय है। लेकिन नेताओं को राजनीति करने से फुर्सत नहीं है वे इस आपदा को भी अवसर में बदलकर अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं।

सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को गई की तर्ज पर सत्ता और विपक्ष अपने में मस्त हैं, हालांकि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बेबाकी से स्वीकार किया कि छत्तीसगढ़ में कोरोना बढऩे की कई वजहों में से एक वजह रोड सेफ्टी क्रिकेट टूर्नामेंट भी हो सकता है लेकिन असली वजह विदर्भ से होली त्यौहार के लिए आवाजाही है। आज के इस दौर में यह स्वीकारोक्ति भी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हाउडी ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सत्ता बनाने की चाह में निर्णय की देरी की बात को आज तक केन्द्र की सत्ता मानने को तैयार नहीं है।

यह सभी जानते हैं कि राहुल गांधई सहित विपक्ष के कई नेता जनवरी-फरवरी से ही मोदी सत्ता को इसकी भयावकता पर चिंता जता रहे थे लेकिन निर्णय में देरी की वजह से न केवल कोरोना से मौतों के आकड़े बढ़े बल्कि 186 मौते गरीब मजदूरों की सड़कों पर हो गई। मध्यम वर्गों की हालत सबसे ज्यादा खराब हुई। बढ़ते संक्रमण ने देश की आर्थिक स्थिति को बदहाल कर दिया। ऐसे में याद कीजिए सत्ता ने अपनी गलती छुपाने किस तरह से नफरत फैलाकर अपने को पाक बताया था। तब्लिकी जमात और मौलाना साद तो कईयों को आज भी याद होगा लेकिन शायद वे नहीं जानते होंगे कि इस मामले में न्यायालय ने फैसले क्या दिये, सभी पर लगे आरोप निराधार पाये गए। विदेशी नागरिक अपने देश में लौट गए और मौलाना साद के रुप में जो नफरत फैलाई गई वह उन लोगों के दिलों में घर बना लिया जो अच्छे खासे पढ़े लिखे, डिग्रीधारी हैं।

ज्ञान पर नफरत का यह ध्वजारोहण नया नहीं है, हां तरीका नया है क्योंकि एक ही तरीका अपनाया गया तो लोग बेवकूफ नहीं बनेंगे। इसलिए हर बार पूरे सच में से आधे में अपना झूठ और नफरत की चाशनी लपेटी जाती है और इसे परोसा जाता है कि यही पूरी सचा लगे।

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण नया नहीं है, धर्म और राष्ट्रवाद के चश्में ने अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे नौजवानों को अपनी चपेट में लिया है। ताजा उदाहरण  बंगाल का है, जिसमें ममता बैनर्जी सिर्फ इसलिए बानों बना दी गई क्योंकि वे अल्पसंख्यकों की पीड़ा के साथ खड़ी नजर आती है। सच तो यह है कि उन्होंने जिस सादगी के साथ मुख्यमंत्री को जिया है वैसा देखने को ही नहीं मिलेगा। विधायक-सांसद से लेकर मुख्यमंत्री तक के सफर में वह आज भी अपनी लिखी किताब की रायल्टी और पेटिंग बेचकर ही पैसा रखती है। न विधायक-सांसद का पेंशन न वेतन।

बकौल ज्योति बसु, 'ममता ही असली कामरेड है लेकिन गलत पार्टी में हैÓ। को नजरअंदाज कर भी दें तो जब आज अपने को सजने संवारने में गरीब से गरीब घर की लड़कियां भी हजारों रुपए खर्च करती है खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने को गरीब घर का बताते हुए लाखों रुपए चश्में, घड़ी व पहनावे फैशन पर करते हो तब ममता की सादगी से मुकाबला उसे बानों बनाकर ही किया जा सकता है। तब इस नफरती ध्वाजारोहण में शामिल कितने पढ़े लिखे हैं जो ममता को बानों कहने का विरोध करते हैं? क्या यह उन पढे-लिखे लोगों के क्षणिक स्वार्थ से यह ध्वजारोहण उचित है। मंडल कमीशन के बाद से जिस तरह से पढ़े-लिखे लोगों पर धर्म का कंबल डाला गया है, उसका दुष्परिणाम यह है कि अब मध्यम वर्ग बेबस है असहाय है और कुछ लोग शर्मसार तो हैं लेकिन खामोश कहना ठीक नहीं, भीतर ही भीतर घुस रहे हैं।

(जारी...)

गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

कानून से उपर सत्ता और बेबसी...

 

नक्सली हमले के बाद देश के गृहमंत्री अमित शाह का छत्तीसगढ़ दौरा इन दिनों सुर्खियों में है तो उसकी वजह बगैर मास्क की वे तमाम तस्वीरें है जो साबित करती है कि सत्ता के आगे जनता कितनी बेबस है।

अब जब न्यायालय में कार में अकेले सफर करने वाले को मास्क लगाने को उचित बता रहा है तब सोचिये देश के गृहमंत्री की इन तस्वीरों का मतलब क्या है। कहते हैं कि हर अपराधी की शुरुआत झूठ बोलने की आदत से शुरु होती है और यह सफर रंगा-बिल्ला या कुख्यात तक पहुंच जाता है, इसी तरह सार्वजनिक जीवन में छोटी-छोटी बातों का महत्व है। यही छोटी बात आम आदमी के जीवन को प्रभावित करता है।

ये सच है कि हर व्यक्ति का अपने जीवन में बहुत कुछ निजी होता है लेकिन जो लोग सार्वजनिक जीते है उनकी छोटी सी छोटी बात भी जनमानस को प्रभावित करता है। ऐसे में गृहमंत्री का मास्क नहीं लगाना चुनावी रैलियों में भीड़ और कुंभ या सामाजिक कार्यक्रमों में भीड़ का क्या प्रभाव पड़ता होगा यह सहज ही समझा जा सकता है।

देश केवल कोरोना की महामारी से त्रस्त नहीं है बल्कि झूठ, नफरत और अफवाह के उस जंजाल में भी फंस चुका है जिसके चलते हालात बदतर होते जा रहे हैं। हमारा दावा है कि कोरोना जैसी महामारी नहीं भी आती तब भी देश के हालात इसी तरह केे होते क्योंकि सत्ता पाने के लिए जो बीज बोया गया है उसका परिणाम तो दुखद होना ही था।

कानून को सत्ता के दम पर ठेंगा दिखाने की परम्परा चल पड़ी है, कितने ही उदाहरण है जब सत्ता ने अपनी मनमानी से जनता को बेबस कर दिया है, और अब तो झूठ, नफरत और अफवाह की चाशनी में सत्ता ने जनमानस के दिमाग में नस्लवाद का ऐसा जहर भर दिया है जिसका असर आसानी से जाने वाला इसलिए भी नहीं है क्योंकि सत्ता पाने की राह में सभी जहर बो रहे हैं। याद कीजिए सीएए के विरोध में बैठे लोगों को किस हद तक जलील किया गया वह याद नहीं है तो किसान आंदोलन को ही याद कर लीजिए, अफवाहबाजों ने क्या कुछ नहीं किया। इसके बाद भी यदि किसी को स्यिूमर स्पीड सोसायटी पर भरोसा है तो इसका मतलब साफ है कि विरोध का हर स्वर मुल्ला मुलायम या ममता बेगम के तमके के लिए तैयार रहे।

क्या इस देश में कोई बहुसंख्यक समाज का व्यक्ति किसी अल्पसंख्यक के लिए खड़ा नहीं हो सकता! पूरी दुनिया में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की खबरें नई नहीं है और सत्ता के लिए राजनैतिक दल ये दावा करने से नहीं चुकते कि अल्पसंख्यक उनका हक छिन रहे हैं और पहले ही अव्यवस्था से दुखी व्यक्ति आसानी से ऐसे लोगों की बातों में आ जाते हैं।

ऐसे में यदि अमित शाह के मास्क नहीं पहनने पर उनकी पार्टी के लोग खामोश हो या दूसरे का पाप गिनाने लगे तो समझ लिजिए पट्टा ने दिल और दिमाग दोनों को अलग कर इस हद तक जकड़ लिया है कि मस्तिष्क कुंद हो गया है। और जनता बेचारी तो बेबस है।

मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

सत्ता की राजनीति...

 

नक्सली हमले में मारे गये जवानों के अंतिम संस्कार के दौरान परिजनों की तस्वीरें बेहद भावुक और भीतर तक हिला देने वाली है। हालांकि आम लोग इसे कुछ दिनों बाद भूल जायेंगे नेताओं और सरकार की तो बात ही करना बेमानी है क्योंकि सत्ता की क्रूरता और संवेदनहीनता की लम्बी कहानी है।

अचानक लॉकडाउन से मजदूरों और मध्यम वर्गों की बदहाली की तस्वीरों को अब कौन याद रखता है। और यदि सत्ता को यह सब याद भी है तो वह पुनर्रावृत्ति रोकने के लिए क्या कर रही है।

महामारी की बात छोड़ भी दे तो धर्म और जाति में नफरत बोने वाले भी कहां चुप है। वे आज भी अपने को श्रेष्ठ कहते हुए दूसरे का अपमान करने से नहीं चुकते। इस दुनिया में शायद ही कुछ लोग होंगे जो अपने धर्मों का पूरी तरह पालन करते होंगे लेकिन उन्हें दूसरे धर्म से और उसे मानने वालों से बेहद नफरत है और वे अपनी नफरत का इजहार सार्वजनिक रुप से करने से भी नहीं हिचकते।

दरअसल नक्सली से लेकर दंगे और जाति से लेकर धर्म की वजह से जो अशांति फैली है, मारकाट मचा है उसके मूल में  सत्ता और उसकी राजनीति ही है। सत्ता पाने के लिए और सत्ता की रईसी बरकरार रखने के खेल में आम आदमी पिसता चला जा रहा है।

सत्ता की वजह से ही गलत लोगों को फलने-फूलने का मौका मिलता है। ताजा उदाहरण महाराष्ट्र का है। सौ करोड़ की वसूली का मामला हैरान कर देने वाला है, जिस देश में बेरोजगारी और भूखमरी बढ़ते जा रही है वहां सत्ता की रईसी की कल्पना की बेमानी है। राफेल डील का मामला भी संदिग्ध होता रहा है, सत्ता की ताकत का अहसास तो पहले से ही था लेकिन फ्रेच जर्नर के दावे ने इसकी पुष्टि कर दी। यदि दो सरकारों के बीच हुए सौदो में भी कमीशन या दलाली होने लगी है तो जान लिजिए की सत्ता ने इसे सिस्टम बना दिया है। ऐसे में अब तो सत्ता यह कहकर सारे अपराधों से मुक्ति भी पा सकती है कि जनता ने उन्हें पांच साल के लिए चुना है इसलिए इन पांच वर्षों में वे जो करें सब सही है। 

याद कीजिए छत्तीसगढ़ में एक घोटाले पर जब विपक्ष ने सवाल उठाया था तो तब के तत्कालीन मुख्यमंत्री का जवाब था 'जब बेचने वाले को आपत्ति नहीं, खरीदने वाले को आपत्ति नहीं तो विपक्ष को क्यों आपत्ति हो रही है।Ó

निजीकरण के होड़ में क्या यही सब कुछ नहीं हो रहा है, सरकार धड़ाधड़ सब बेच रही है और कई एसेट्स तो कम कीमत में बेची जा रही है।

ऐसे में बिहार में जब छात्र सिर्फ इसलिए तोडफ़ोड़ करते है कि उनकी पढ़ाई का नुकसान अब बर्दाश्त नहीं तो इसका मतलब क्या है? चार माह से कृषि कानून के खिलाफ बैठे किसानों की अनदेखी क्या सत्ता के धौंस की कहानी नहीं है। तब नक्सली हमले को लेकर जवानों की शहादत की तस्वीरों का क्या मतलब? सत्ता के लिए विकास का मतलब कमीशनखोरी और निजीकरण ही रह गया है तब बदहाल होते लोगों की चिंता कौन करें।

सोमवार, 5 अप्रैल 2021

बंद कर दो ये नरसंहार...!

 

बीजापुर में नक्सलियों ने फिर दो दर्जन से अधिक जवानों की हत्या कर दी, अपनी इस कामयाबी पर नक्सली जश्न मना रहे होंगे? लेकिन उन मजदूर और किसानों का क्या जिनके बेटे सालों से नक्सलियों के हमले में मारे जा रहे हैं?

मुझे एक बात नक्सलियों से सीधी पूछनी है कि क्या जवानों को मार देने से उनका राज आ जायेगा? जो लोग अपने बूढ़े मां-बाप और पत्नी बच्चों को छोड़कर नौकरी में आते हैं, उनकी क्या गलती है! इस हमले में कई नक्सली भी मारे गये हैं, उनकी लाशें देखकर भी यदि तुम्हें तरस नहीं आता तो इसका मतलब साफ है कि जो कुछ भी तुम कर रहे हो वह तुम्हारा धंधा है! धंधा तो आजकल नेता भी कर रहे हैं ऐसे में क्या तुम्हारी और नेताओं में सांठ-गांठ नहीं चल रही है?

एक बात और पूछनी है मुझे नक्सलियों से क्या ये हमला भी झीरम कांड की तरह कोई साजिश है? यह सवाल इसलिए पूछ रहा हूं क्योंकि जिस तरह से झीरम हमले को सत्ता बचाने की साजिश के रुप में देखा जा रहा था वैसे ही इस हमले को भी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के असम के चुनावी दौरे से देखा जा रहा है।

हर हमले की जिम्मेदारी लेकर अपने सीने को 56 इंच बताने वालों नक्सली क्या यह भी बता पाओंगे कि यह हमला भी किसी राजनैतिक साजिश का हिस्सा है या नहीं। खैर तुम लोग कुछ नहीं बताओंगे लेकिन जनता जान चुकी है कि नक्सली अब किसी मुद्दे पर नहीं सिर्फ पैसों के लिए लड़ाई लड़ते हैं और जब पैसा  और सत्ता ही सबकुछ है तो फिर क्या फर्क पड़ता है कि इसमें गरीब किसान मजदूर के बच्चे मरे या किसी की सत्ता हिले! तुम्हें तो बस पैसा चाहिए।

लेकिन एक बात ध्यान रखना मौत किसी की भी अच्छई नहीं होती और इस मौत के बाद उनके परिजनों की आह से कोई नहीं बच पायेगा? इसलिए अब भी वक्त है, ये नरसंहार बंद कर दो और व्यवस्था की कमजोरी से लडऩे के लिए अहिंसा के रास्ते पर आ जाओं।

नफरत, झूठ, अफवाह और हिंसा से हासिल सत्ता की न उम्र अधिक होती है और न ही इस रास्ते से सत्ता हासिल करने वाला ही कभी सुखी रहता है। हालांकि तुम्हें इन बातों से क्या मतलब, क्योंकि तुम लोग या तो ईश्वर के अस्तित्व को नकारते हो या ईश्वर के नाम पर अपनी रोटी सेकते हो। फिर भी एक बार और कहूंगा बार-बार कहूंगा बंद करो ये नरसंहार!

शुक्रवार, 12 मार्च 2021

कैसा जनसरोकार !



एक तरफ केन्द्र सरकार के मनमाने फैसले से देश की आर्थिक स्थिति बदहाली की कगार पर है, बेरोजगारी और महंगाई से आम जनमानस त्रस्त है तब छत्तीसगढ़ सरकार के द्वारा विधायकों और पूर्व विधायकों की सुविधा की राशि को दो गुणा कर देने का मतलब क्या है? ये सच है कि भूपेश सरकार जब से सत्ता में आई है तब से आम जनों के हित में कई निर्णय लिये है लेकिन नोट बंदी, जीएसटी और कोविड की वजह से आर्थिक झंझावत भी कम नहीं है।

ऐसे में छत्तीसगढ़ सरकार का यह निर्णय न केवल हैरान कर देने वाला है बल्कि सत्ता के चरित्र को भी प्रदर्शित करता है। सवाल जनप्रतिनिधियों की सुविधा में ईजाफे का नहीं है और न ही हमें इस बात से इंकार है कि जनप्रतिनिधियों की सुविधाओं में कमी हो लेकिन क्या यह वर्तमान समय में उचित है।

छत्तीसगढ़ भी उन राज्यों में शामिल है जिनकों लगातार कर्ज लेना पड़ रहा है, प्रदेश की आर्थिक स्थिति डांवाडोल है और केन्द्र की मनमानी के चलते आने वाले दिनों में कोई आर्थिक मदद की उम्मीद तो दूर योजनाओं के लिए या धान खरीदी के कोटे के लिए ही पैसा मिलने की उम्मीद नहीं है।

जानकारो का कहना है कि छत्तीसगढ़ राज्य में विकास के कार्यों में रफ्तार की कमी है। धीमी गति से चल रहे विकास कार्यों के अलावा नई नौकरी के रास्ते भी नहीं खुल पा रहे हैं। अस्पताल या स्कूल भवन तो बन गए है लेकिन डाक्टरों और शिक्षकों की कमी है। सहायक शिक्षक अपने वेतन की विसंगति को दूर करने आंदोलनरत है, मनरेगा का काम भी धीमी गति से हो रहा है। इसके अलावा भी वित्तीय स्थिति को लेकर कई तरह के सवाल है। साल दर साल राज्य का कर्ज बढ़ता ही जा रहा है, पैसों की कमी की वजह से कई योजनाएं तय समय में पूरी नहीं होने की वजह से योजना लागत में डेढ़ से दो गुणा वृद्धि हो गई है।

ऐसी स्थिति में पूर्व और वर्तमान विधायकों की सुविधा में सीधे दो गुणा वृद्धि को लेकर सवाल तो उठेंगे ही। क्या विधायकों की सुविधा जन सरोकार से बड़ा हो गया है।

राजधानी में ही शारदा चौक से तात्यापारा चौक तक चौड़ीकरण के लिए बजट का रोना रोया जाता है, तालाबों की सफाई का मामला हो या नए ओवर ब्रिज निर्माण का मामला हो सब कुछ वित्तीय संकट के कारण रुका पड़ा है।

सरकार अपने प्रचार प्रसार और सुविधा के नाम पर करोड़ों अरबों रुपये खर्च कर रही है लेकिन अस्पतालों की हालत बदहाल है, कहीं दवाई नहीं तो कहीं डाक्टर नहीं है। ऐसे में यह सवाल तो उठेंगे ही कि क्या जनप्रतिनिधि केवल अपनी सुविधा ही देखते है। जब छत्तीसगढ़ के विधायकों का वेतन वैसे भी बहुत ज्यादा है।

बुधवार, 3 फ़रवरी 2021

अत्याचार...

 

रसद रोक दो, बिजली काट दो, नुकीले कीलें गाड़ दो और भी चाहे कितने ही उपाय कर लो पूरी दुनिया में इन सरकारी कोशिश से न तो  कभी आंदोलन रुकी है और न ही रुक सकेगी।

दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन को तोडऩे की तमाम सरकारी षडय़ंत्र नेस्तनाबूत हो चुकी है और अब सरकार जिस तरह से किसानों को रोकने का उपाय कर रही है उसका क्या मतलब है। क्या मोदी सत्ता किसानों के आंदोलन से भयभीत हो चली है, नहीं तो 26 जनवरी की आड़ में किसानों को रोकने के लिए जो रास्ता अख्तियार कर रही है, वैसा कभी नहीं करती।

दिल्ली बार्डर में किसानों को रोकने के लिए जिस तरह की व्यवस्था की जा रही है, वैसी व्यवस्था तो सत्ता केवल दुश्मनों के लिए करती है। इंटरनेट ठप्प कर दी गई है, बिजली पानी काट दी गई है और जिस तरह से नुकीलें कीलें, बारह लेयर की बाड़ और कंटीली तार लगाकर किसानों को रोकने की कोशिश की जा रही है वह हैरान कर देने वाली है।

लेकिन सरकारें शायद नहीं जानती कि आंदोलन रसद-पानी से नहीं हिम्मत से चलता है और आंदोलन की ताकत को दुनिया में कोई सत्ता नहीं रोक पायी है। इसलिए अब मोदी सत्ता के सामने तीनों कानून वापस लेने के अलावा भी कोई चारा होगा, कहना कठिन है।

दिल्ली के हालत 26 जनवरी के बाद जिस तरह से बदले और आंदोलन की गूंज देश के गांवों तक पहुंचने लगी है वैसा इससे पहले कब हुआ है याद नहीं पड़ता और यह भी याद नहीं पड़ता कि आंदोलन को रोकने कभी किसी सरकार ने रसद-पानी बिजली काटी हो।

ऐसे में किसानों के आंदोलन को लेकर आम लोग भी अब अपनी प्रतिक्रिया देने लगे हैं। जात-धर्म से दूर किसान जिस तरह से एकजुट होकर आंदोलन में हिस्सा लेने लगे हैं वह क्या इस देश में नए राजनैतिक समीकरण की ओर संकेत नहीं कर रहे है? क्या अगला चुनाव अब विकास के मुद्दे की बजाय किसानों के चुनाव लडऩे को लेकर होगा।

यकीन जानिये ऐसा हो सकता है? क्योंकि किसान अब समझने लगे हैं कि उनका हित किसमें है और यदि गांव-गांव से किसान आंदोलन की गूंज सुनाई दे रही है तो यह मोदी सत्ता ही नहीं दूसरे राजनैतिक दलों के लिए भी एक बड़ी चुनौती होगी। क्योंकि धर्म और जाति से परे किसानों का ेक जुट होना आंदोलन की सफलता की कहानी लिखने जा रहा है।

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2021

अंधेरे नगरी, चौपट राजा

 

यह तो बचपने में सुनी कहानी अंधेर नगरी, चौपट राजा, टकासेर भाजी- टकासेर खाजा की कहानी को ही चरितार्थ करता है वरना सरकार का जोर सिर्फ बाजार पर नहीं होता। इस बार का बजट पर पूरा जोर बाजार पर है और बाजार पर जोर का केवल एक ही अर्थ है कि हर कीमत पर सरकार को टेक्स चाहिए और हर कीमत पर टेक्स का मतलब इस देश की बहुत सी चीजे निजी हाथों को बेच दी जायेगी और निजी हाथों में बेचने का अर्थ उन हाथों को नहीं देखना है कि वह देशी है या विदेशी?

हम शुरुआत एलआईसी से करें या पुराने वाहनों को रातो-रात कबाड़ में तब्दिल करने की योजना से से करें। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

पूरी दुनिया में वाहनों की सड़क से हटाने के लिए फिटनेस सर्टिफिकेट देखा जाता है लेकिन यह सरकार उसकी उम्र देख रही है, इसका सीधा सा मतलब है कि वह जानती है कि लोगों की हालत नये वाहन खरीदने की नई रह गई है, इसलिए वाहन उद्योग की तिजौरी भरने के लिए यही एक मात्र उपाय है?

इसी तरह से देश में भारतीय जीवन बीमा निगम ही एक ऐसी संस्था है जिसके फल-फूल और जड़ सभी मजबूत है वह कई बार सरकार को भी फंड देती है, लेकिन अब सरकार को लगने लगा है कि इससे काम नहीं चलेगा इसलिए उसके फल और फूल तोड़े जायेंगे, फिर तना और आखरी में जड़ को खोखला कर दो।

बजट को लेकर जिस तरह की प्रतिक्रिया आ रही है, उसमें छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की प्रतिक्रिया का अर्थ लोगों को समझना चाहिए ''बकौल भूपेश बघेल मैं पहले ही कता था कि कांग्रेस ने 70 साल में जो कुछ बनाया है ये वह सब एक-एक करके बेच देंगे!ÓÓ

जब बजट की ऐसी प्रतिक्रिया है तो समझा जा सकता है कि मोदी सत्ता आने वाले दिनों में क्या करने वाली है  और देश किस दिशा में जा रहा है।

मंगलवार, 5 जनवरी 2021

बात कैसे बनेगी साहेब !

 



किसानों के साथ 8वें दौर की बैठक फिर बेनतीजा रहा। और फिर 9वें दौर की बैठक 8 जनवरी को होगी। किसान जब तीनों कानून को वापस लेने की मांग पूरी हुए बिना आंदोलन को समाप्त नहीं करने वाले हैं तब सरकार का अडियल रूख हैरान कर देने वाला है।

वैसे तो इस तीनों कानून को लेकर सरकार की नियत तब ही स्पष्ट हो गई थी जब सिे संसद में पास करने का जो तरीका अपनाया गया था, बगैर बहस और बगैर वोटिंग के यहां कानून कैसे पास हुआ यह किसी से छिपा नहीं है। भले ही कुछ लोग इसे चोर दरवाजा कहने पर आपत्ति उठाये लेकिन सच तो यही है कि इस कानून को लेकर सरकार की नीयत पहले ही दिन से खराब थी।

और खराब हो भी तो क्या फर्क पड़़ता है क्योंकि ये तीनों कानून सिर्फ और सिर्फ पूंजीपतियों के हितों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।

इसलिए आज जब विज्ञान भवन में सरकार के नुमाईदों और किसानों के बीच चर्चा के दौरान जब लंच का समय हुआ तो किसान अपने लंगर में मस्त थे और सत्ता के नुमाईदें फाईव स्टार होटल अशोका का खाना खा रहे थे। यकीन मानिये इस आठ दौर की बैठकों में सरकार का जितना खर्च हुआ है वह टिहरी बार्डर में धनारत या आंदोलनरत किसानों के एक दिन के भोजन से ज्यादा रुपये खर्च हुआ है। और ये पैसा किसका है। हमारा-तुम्हारा टैक्स का पैसा है।

स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना विज्ञान भवन का अपना इतिहास है लेकिन इससे सरकार को कोई सरोकार नहीं है वह तो आंदोलनरत किसान को थका देने की सोच के साथ बैठक पर बैठक यानी तारीख पर तारीख की घोषणा करते जा रही है लेकिन ुसे न किसानों के हितों की चिंता है न आंदोलनरत मरते-बिलखते किसानों की ही चिंता है। यदि उसकी चिंता में किसान होते तो कानून पास कराने का तरीका गलत नहीं होता और समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी होती।

जिन्हें ये तीनों कानून गलत लगते हैं उन्हें हम एक और जानकारी दें दे कि दुनिया के चावल उत्पादन करने वाले 103 देशों में भारत ऐसा देश है जो सबसे ज्यादा चावल एक्सपोर्ट करता है और यहां के उद्योगपति हो या सरकार सबसे ज्यादा पैसा कमाते हैं और आप हैरान होंगे कि जापान से लेकर कोरिया सहित ऐसे कितने ही देश हैं जहां प्रति किलो चावल तीन सौ रुपये प्रति किलो से ज्यादा कीमत पर बिकते हैं। यहां तक कि कनाडा में भी दो सौ रुपये किलो से अधिक कीमत है। और ऐसे में एमएसपी को कानून की गारंटी मिल जाएगी तो चावल एक्सपोर्ट करने वालों की कमाई कम हो जायेगी।

एक बात और हर बात में पाक को लेकर राजनीति करने वाले यह भी जान ले कि पाकिस्तान के किसानों की आर्थिक स्थिति भारत के किसानों की आर्थिक स्थिति से बेहतर है। इसलिए जो लोग कृषि रिफार्म के नाम से लाये गये इन तीनों कानून की वकालत कर रहे है वे जान ले कि जब तक एमएसपी को कानूनी गारंटी में नहीं लाया जायेगा तब तक किसानों की आय नहीं सुधरने वाली।

और हां, 8 जनवरी को भी बात बन जायेगी यह कभी नहीं सोचना? क्योंकि नियत में बरकक्त है और नियत में ही खोट हो तो सफलता मुश्किल है। बनेगी साहेब!

किसानों के साथ 8वें दौर की बैठक फिर बेनतीजा रहा। और फिर 9वें दौर की बैठक 8 जनवरी को होगी। किसान जब तीनों कानून को वापस लेने की मांग पूरी हुए बिना आंदोलन को समाप्त नहीं करने वाले हैं तब सरकार का अडियल रूख हैरान कर देने वाला है।

वैसे तो इस तीनों कानून को लेकर सरकार की नियत तब ही स्पष्ट हो गई थी जब सिे संसद में पास करने का जो तरीका अपनाया गया था, बगैर बहस और बगैर वोटिंग के यहां कानून कैसे पास हुआ यह किसी से छिपा नहीं है। भले ही कुछ लोग इसे चोर दरवाजा कहने पर आपत्ति उठाये लेकिन सच तो यही है कि इस कानून को लेकर सरकार की नीयत पहले ही दिन से खराब थी।

और खराब हो भी तो क्या फर्क पड़़ता है क्योंकि ये तीनों कानून सिर्फ और सिर्फ पूंजीपतियों के हितों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।

इसलिए आज जब विज्ञान भवन में सरकार के नुमाईदों और किसानों के बीच चर्चा के दौरान जब लंच का समय हुआ तो किसान अपने लंगर में मस्त थे और सत्ता के नुमाईदें फाईव स्टार होटल अशोका का खाना खा रहे थे। यकीन मानिये इस आठ दौर की बैठकों में सरकार का जितना खर्च हुआ है वह टिहरी बार्डर में धनारत या आंदोलनरत किसानों के एक दिन के भोजन से ज्यादा रुपये खर्च हुआ है। और ये पैसा किसका है। हमारा-तुम्हारा टैक्स का पैसा है।

स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना विज्ञान भवन का अपना इतिहास है लेकिन इससे सरकार को कोई सरोकार नहीं है वह तो आंदोलनरत किसान को थका देने की सोच के साथ बैठक पर बैठक यानी तारीख पर तारीख की घोषणा करते जा रही है लेकिन ुसे न किसानों के हितों की चिंता है न आंदोलनरत मरते-बिलखते किसानों की ही चिंता है। यदि उसकी चिंता में किसान होते तो कानून पास कराने का तरीका गलत नहीं होता और समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी होती।

जिन्हें ये तीनों कानून गलत लगते हैं उन्हें हम एक और जानकारी दें दे कि दुनिया के चावल उत्पादन करने वाले 103 देशों में भारत ऐसा देश है जो सबसे ज्यादा चावल एक्सपोर्ट करता है और यहां के उद्योगपति हो या सरकार सबसे ज्यादा पैसा कमाते हैं और आप हैरान होंगे कि जापान से लेकर कोरिया सहित ऐसे कितने ही देश हैं जहां प्रति किलो चावल तीन सौ रुपये प्रति किलो से ज्यादा कीमत पर बिकते हैं। यहां तक कि कनाडा में भी दो सौ रुपये किलो से अधिक कीमत है। और ऐसे में एमएसपी को कानून की गारंटी मिल जाएगी तो चावल एक्सपोर्ट करने वालों की कमाई कम हो जायेगी।

एक बात और हर बात में पाक को लेकर राजनीति करने वाले यह भी जान ले कि पाकिस्तान के किसानों की आर्थिक स्थिति भारत के किसानों की आर्थिक स्थिति से बेहतर है। इसलिए जो लोग कृषि रिफार्म के नाम से लाये गये इन तीनों कानून की वकालत कर रहे है वे जान ले कि जब तक एमएसपी को कानूनी गारंटी में नहीं लाया जायेगा तब तक किसानों की आय नहीं सुधरने वाली।

और हां, 8 जनवरी को भी बात बन जायेगी यह कभी नहीं सोचना? क्योंकि नियत में बरकक्त है और नियत में ही खोट हो तो सफलता मुश्किल है।

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

सरकार के अडऩे का अर्थ...

किसान आंदोलन के बढ़ते प्रभाव के बाद भी यदि मोदी सत्ता अड़ी हुई है तो इसका मतलब साफ है कि उसे किसानों की कोई परवाह नहीं है। दरअसल मोदी सरकार के पास सत्ता में बने रहने का जो विकल्प है उससे जनआन्दोलन कोई मायने नहीं रखता? उसके पास सत्ता में बने रहने केलिए जो आवश्यक साधन चाहिए वह उसने जुटा लिये है। ऐसे में कोई भई मांग सिरे से खारिज किया जा सकता है।

सत्ता में बने रहने के लिए सबसे जरूरी साधन पैसा है और भारतीय जनता पार्टी इस देश में सबसे पैसे वाली पार्टी है, दूसरा साधन उसका हिन्दू-मुस्लिम है और तीसरा साधन विरोधी दलों का बिखराव और खरीद फरोख्त या दबाव की राजनीति है। इन सभी में साधन सम्पन्न सत्ता कब जनहित की परवाह करती है।

यही वजह है कि 2014 के चुनाव के बाद मोदी सत्ता ने ऐसे कई निर्णय लिये जो देश या आम लोगों के हितों के विपरित थी लेकिन 2019 के चुनाव परिणाम उसके पक्ष में गये, यही नहीं राज्य दर राज्य जीत, पंचायत से लेकर नगरीय निकायों में उसे सफलता मिलते रही। और उसका पूरा ध्यान इसी पर लगा रहा। 

नोटबंदी का परिणाम क्या हुआ? किसी से नहीं छिपा है। डेढ़ सौ के लगभग मौत क ेबाद भी न कालाधन खत्म हुआ और न ही आतंकवाद की कमर टूटी लेकिन मोदी सत्ता के इस दावे के बिखर जाने के बाद भी उसकी जीत चलते रही। जीएसटी लागू करने का परिणाम भी उसके पक्ष में रहा ऐसे में जब मोदी सत्ता ने सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने का काम शुरु किया तब भी वहां काम करने वालों की पीड़ा का कहीं असर नहीं दिखा, रेलवे से लेकर एयर पोर्ट और लालकिला तक गिरवी रखने के बाद भी वह चुनाव जीतते रही तब भला किसान आंदोलन से उसे क्या फर्क पडऩा है।

वह जानती है कि लोकतंत्र में चुनाव जीतना ही सभी अपराधों की माफी है और चुनाव जीतने के लिए पूंजी सबसे अहम हथियार है और पंूजी से औवेसी खड़ा किया जा सकता है। पूंजी से कट्टर हिन्दू की नींव रखी जा सकती है, पूंजी से जमीन ही नहीं आकाश-पाताल सब पर कब्जा किया जा सकता है और जब विरोध के स्वरों के अपने राजनैतिक स्वार्थ हो तो सत्ता की मनमानी को कोई कैसे रोक सकता है।

यही वजह है कि कड़कड़ाती ठंड में किसानों की मौत के बढ़ते आकड़े हमें अब नहीं झकझोरते है क्योंकि हमने तय कर लिया है कि बाबर से लेकर औरंगजेब ने जो अत्याचार किया है उससे मुक्ति यही सत्ता दिलायेगी।

अरे साहेब किसानों का हित सिर्फ समर्थन मूल्य पर धान खरीदी से है। इसे ही कानून बना दो किसानों को और कुछ नहीं चाहिए?

गुरुवार, 17 दिसंबर 2020

आंदोलन से उपजे सवाल

 

मोदी सरकार सत्ता में आते के लिए जब किसानों की आय 2022 तक दो गुनी करने का दावा कर रही थी, तब उसी समय कार्पोरेट की आय कई गुना करने की नीति पर काम चल रहा था, यही वजह है कि इस कानून के आने के पहले ही एक तरफ जहां अडानी पूरे देश में गोदाम बनाने में जुट गया था तो अंबानी के द्वारा शहर दर शहर रिटेल शॉप खोल रहा था।

सवाल यह नहीं है कि अडानी-अंबानी क्या कर रहे हैं, सवाल यह है कि सरकार की मंशा क्या सचमुच किसानों की आय दो गुनी करने की है? यह सवाल इसलिए भी उठाये जा रहे हैं क्योंकि किसानों ने सरकार के हर प्रस्ताव को नकार दिया है और तो और कानून को वापस लेने की मांग पर अड़े हुए है।

आंदोलन का रुख क्या होगा? क्या आंदोलन दिल्ली बार्डर पर ही सिमट कर रह जायेगा? या इसका विस्तार देशभर में फैलेगा? ये तमाम सवाल इसलिए गैर जरूरी है क्योंकि किसान कड़कड़ाती ठंड में भी एक पग पीछे हटने तैयार नहीं है ऐसे में आंदोलन का असर देश भर में होने लगा है।

क्या बगैर समर्थन मूल्य पर खरीदी से किसानों की आय दो गुना हो सकती है, बिल्कुल नहीं हो सकती इसलिए सरकार यदि किसानों की आमदनी बढ़ाना चाहती है तो वह समर्थन मूल्य से कम खरीदी पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाती? इस पर कानून बना दे कि समर्थन मूल्य के नीचे खरीदी पर जेल होगी? किसानों का दावा है कि सिर्फ इस एक कानून से न केवल किसानों की हालत सुधर जायेगी बल्कि आमदनी भी बढ़ जाएगी।

लेकिन मोदी सत्ता जिस तरह से तीनों कानून को लेकर अड़ी हुई है वह उसकी नियत ही नहीं अहंकार को भी प्रदर्शित करता है। क्योंकि चुनाव जीतने में माहिर हो चुकी इस सत्ता को इस बात की परवाह ही नहीं है कि विरोध कितना जायज है। इसलिए वह आंदोलन को तोडऩे हर संभव कोशिश में लगी है।

आंदोलन के दौरान एक तरफ जब किसान चर्चा कर रहे थे तो दूसरी तरफ सत्ता इस कानून को सही बताने में लगी रही ऐसे में चर्चा का नतीजा क्या होना है स्पष्ट था।

अब भी सत्ता और उसकी पूरी टीम कानून को जायज ठहराने में लगी है जबकि सच तो यह है कि इस कानून से केवल कार्पोरेट की आय बढऩी है। आंदोलन को तोडऩे की साजिश पर भी सवाल उठने लगे है ऐसे में आंदोलन का विस्तार देशभर में होने लगा है।

कल ही छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने दो टूक कह दिया है कि बगैर एमएसपी के किसानों की आय दो गुना हो ही नहीं सकती। भूपेश बघेल किसान हैं वे किसानों का दर्द समझते हैं इसलिए वे जानते हैं कि किसान किस तरह से अपनी उपज बेचने मजबूर होते हैं।

छत्तीसगढ़ में एक कहावत है करम फूटहा खेती करय, अकाल पडय़ नहीं त भाव गिरय। इस कहावत को भूपेश सरकार ने तोडऩे की कोशिश की है। मोदी सत्ता भी इस मॉडल को अपना ले।

मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

किसानी पर अधिकार


 

किसानी पर अधिकार

यह सर्व सत्य है कि जिसके पास पैसा है उसी के पास धरती, आकाश और पाताल पर अधिकार है और सत्ता वह बात हर बार समझाते रही है लेकिन हम ही नहीं समझ पाये या इसे किसानों ने ही नहीं समझा तो गलती सत्ता की कैसे हुई।

याद किजीए जब गैट समझौते के उथल पुथल के बीच आर्थर डेकल का प्रस्ताव आया तो स्वदेशी को प्रमोट करने वाले संगठन, आरएसएस और भाजपा पूरे देश में विरोध के स्वर को हवा देने में लगी थी और तब की सत्ता कृषि सब्सिडी को लेकर अलग ही  राग अलाप रही थी। लेकिन तब भी कोई नहीं समझ पा रहा था कि मामला गड़बड़ है।

दरअसल सभ्यता का सारा विकास ही जमीनों पर कब्जे करने का इतिहास है। महाभारत से लेकर आज तक जितने भी युद्ध हुए हैं वह सब जमीनों के लिए है। आदिवासी क्षेत्रों में संघर्ष की बात हो या जाति संघर्ष, सभी ने मूल में जमीनों पर कब्जा जमाने का ही खेल रहा है।

यही वजह है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब युद्ध आसान नहीं रह गया तो जमीनों पर कब्जों के लिए नया रास्ता अख्यितार किया गया। अमेरिका, चीन, सउदी अरब जैसों देशों ने अफ्रीका में खेती के नाम पर जमीनों पर कब्जा करना शुरु किया। कई देश आज विकसित देशों के कृषि उपनिवेश बने है। पैसों की जरूरत के लिए कई देश अपनी जमीन खेती के लिए दे रहे है। अमेरिका बायोफ्यूल के नाम पर मक्का की खेती करवा रहा है तो चीन की रूचि व्यवसायिक फसलों की तरफ है।

वह भी सत्य है कि जिन देशों में भूखमरी के हालात है, उन देशों की जमीनों पर खेती के नाम पर व्यवसायिक घरानों का कब्जा है और इस कब्जे के खेल में सरकार उन्हीं का साथ दे रही है। ऐसे में उत्पादन पर किसका हक हो रहा है यह समझना आसान है। और व्यवसाय में मुनाफा कमाना ही जब ईमानदारी हो तो फिर आम आदमी के हित की बात कोई व्यवसायी कैसे सोच सकता है। जबकि पूंजीवाद का सीधा तर्क है कि बच्चे को तभी तक हाथ पकड़कर चलाना चाहिए जब तक वह चलना न सीख ले। और चलना सीख ले तो हाथ छोड़ दो भले ही वह गड्ढे में क्यों न गिर जाए।

लेकिन हम कुछ समझना ही नहीं चाहते जबकि हमें तभी समझ लेना चाहिए था कि जब रिलायंस देश भर में स्टोर्स खोल रहा था, अडानी देश भर में गोदाम बना रहा था। आखिर लाभ के लिए सिर्फ मार्केटिंग की ही नहीं, उत्पादन की भी जरूरत होती है। और उत्पादन के लिए जमीन की जरूरत होती है।

इसलिए जब तीन कृषि कानून को लेकर किसान आंदोलन करने लगे तो सरकार यह सब कैसे बर्दाश्त करेगी। आंदोलन लंबा चले या न चले सरकार की मंशा स्पष्ट है। आज वह भले ही किसानों के दबाव में आ जाए लेकिन वह पिछले दरवाजे से यही करने वाली है। भविष्य के इस संकेत से सावधान रहना होगा, क्योंकि जमीन सिर्फ जमीन  नहीं है वह धरती, आकाश, पाताल भी है और धरती, आकाश पाताल को रखने का अधिकार भी उन्हीं को है जिनके पास पैसा है। और दुर्भाग्य से सत्ता भी इसी पर चलने लगी है।

रविवार, 17 फ़रवरी 2019

वैचारिक पत्रकारिता और दलाली




यह सच है कि वैचारिक पत्रकारिता करना बहुत कठिन है। किसी एक विचारधारा के समर्थन में खड़ा होना वह भी सीना ठोंक के आसान नहीं है। वह भी तब जब आप सत्ता के बाहर हो। छत्तीसगढ़ में वैचारिक पत्रकारिता की शुरुआत कब से हुई यह कहना कठिन है लेकिन इसकी शुरुआत युगधर्म से होने की बात कही जाती है। अपना पक्ष रखने दक्षिणपंथियों ने अखबार निकाला और फिर एक विचारधारा को लेकर संघर्ष करते रहे लेकिन यह स्वीकार्य तब भी नहीं था और न ही दैनिक स्वदेश के खुलने के बाद ही स्वीकार्य हो पाया। परिणाम स्वरुप इस एक विचारधारा के साथ खड़ा रहना मुश्किल कार्य रहा इस तरह की पत्रकारिता से न केवल अखबार को खड़ा रखना मुश्किल है बल्कि एक विचारधारा को लेकर चलने वाले पत्रकारों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते रहे हैं। यही वजह है कि सत्ता के दौरान फलने-फूलने वाले ऐसे पत्रकार सत्ता जाते ही गड़बड़ा जाते है।
ताजा उदाहरण छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद देखा जा सकता है। भाजपा की सत्ता जाते ही कल तक स्वयं को भाजपाई विचारधारा का समर्थक बताने वाले ऐसे अधिकांश पत्रकारों में स्वयं को भाजपा विरोधी साबित करने की होड़ सी मच गई है। कुछ तो पत्रकारिता छोड़ दूसरा काम धाम में रुचि ले रहे हैं तो कुछ कांग्रेसियों के सामने स्वयं को कांग्रेसी साबित करने में लग गए हैं। इनमें वे पत्रकार भी शामिल है जिन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत गद्रे भवन (पुराने भाजपा कार्यालय) में पनाह लेते थे या रात गुजारते थे। एक पत्रकार तो मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से अपनी नजदीकी का हवाला देते नहीं थकते और कोई भी काम करा लेने का दावा करते घूम रहा है। हालांकि यह पहले भी रमन राज में पत्रकारिता से Óयादा कमीशनखोरी का काम भी करा रहा है।
इसी तरह का एक पत्रकार जो चुनाव से पहले किसी भी सूरत में कांग्रेस की सत्ता नहीं आने का दावा करता था वह चुनाव परिणाम आते ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को अपने कालेज के जमाने का साथी बताता घूम रहा है।
इसी तरह 5 हजार की तनख्वाह से रायपुर में पत्रकारिता शुरु करने वाले का ठाठ इन दिनों चर्चा में है।
भाजपा की बौखलाहट...
चुनाव में बुरी तरह बौखलाई भाजपा को अब पत्रकार कांग्रेसी नजर आने लगे। पिछले दिनों भाजपा प्रभारी अनिल जैन को एक पत्रकार का सवाल इतना नागवार गुजरा कि वे प्रेस कांफ्रेंस के दौरान ही एक पत्रकार को कांग्रेसी बता गये जबकि एक अन्य घटनाक्रम में भाजपा कार्यालय में एक पत्रकार की न केवल पिटाई की गई बल्कि एक महिला पत्रकार को अभद्रतापूर्वक कक्ष से बाहर निकाला गया। इस पत्रकार की सिर्फ इतनी गलती थी कि हार की समीक्षा के दौरान हंगामा कर रहे कार्यकर्ताओं की वीडियो बनाने वह बैठ गया था।
भाजपा नेताओं के शह पर हुई इस गुण्डागर्दी के खिलाफ प्रदेशभर के पत्रकार आंदोलन पर है लेकिन भाजपा नेतृत्व को इससे कोई लेना देना नहीं है। जबकि प्रेस क्लब रायपुर ने अनिश्चितकालीन धरना दे दिया है।
फर्जी के चक्कर में असली भी गये...
रमन राज में पत्रकारिता की आड़ में कई भाजपाई धंधा करने लग गये थे और फर्जी न्यूज एजेंसी बनाकर सरकार से लाखों रुपये महिना वसूल भी रहे थे। ऐसा नहीं है कि रमन राज के इस करतूत की जानकारी किसी को नहीं थी लेकिन सत्ता बदलते ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को जैसे ही इस करतूत की जानकारी मिली उन्होंने तुरन्त ऐसे 17 एजेंसियों का दाना पानी बंद कर दिया। कहा जाता है कि इन एजेंसियों की आड़ में कई भाजपाई लाल हो गये थे।
और अंत में...
जब से सत्ता बदली है जनसंपर्क विभाग में भी अमूल चूल परिवर्तन दिखने लगा है। एक अधिकारी के लम्बी छुट्टी पर चले जाने को लेकर चर्चा गर्म है।

सोमवार, 26 अगस्त 2013

नार्को सीडी की असलियत पर सरकार चुप क्यों?


* भूपेश की चुनौती से भाजपा में घबराहट!
* कांग्रेसी घोटालों को पैसा खाकर दबाया!
* संचेती बंधु और अदानी गु्रप पर मेहरबानी!
* जल जंगल जमीन सभी की चौतरफा लूट!
* सब कुछ मुफ्त बांटने से मध्यम वर्ग नाराज!
रायपुर। इंदिरा बैंक घोटाले के मामले में नार्को सीडी के खुलासे से जहां भाजपा की मुसिबत थमने का नाम नहीं ले रहा है वहीं मुख्यमंत्री और चारों मंत्रियों से हाईकमान की नाराजगी ने नया मोड़ ले लिया है। नार्को सीडी को फर्जी बताने वाली सरकार ने अब तक न तो असली सीडी ही जारी की है ओर न ही भूपेश बघेल की चुनौती को दी स्वीकार किया है इसे लेकर भाजपा को जवाब देना मुश्कि हो रहा है।
अपनी कथित साफ छवि और विकास को मुद्दा बनाने का दंभ भरने वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की कोल ब्लॉक आबंटन में संचती बंधुओं पर की गई मेहरबानी से ही किरकिरी शुरू हो गई थी। इस मेहरबानी के चलते न केवल छत्तीसगढ़ को हजार करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ बल्कि भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष नीतिन गडकरी भी कटघरे में खड़े हुए। इसके बाद कैग ने अदानी ग्रुप पर मेहरबानी का खुलासा कर रमन सरकार के कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा कर दिया। अभी यह मामला शांत भी नहीं हुआ था कि नक्सलियों के दरभा कांड में हुए कांग्रेसी दिग्ंगजों की हत्या
ने सरकार की नियत पर सवाल खड़ा कर दिया। इस मामले में कांग्रेस नेता भूपेश बघेल के द्वारा रमन सिंह के द्वारा ब्रम्हास्त्र चलाने की बात कहकर सनसनी फैला दी थी।
ताजा मामला इंदिरा बैक घोटाले में उमेश सिंह की नार्को सीडी का है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह सहित उनके मंत्रियों पर घोटाले दबाने करोड़ों रूपये खाने का जो आरोप कांग्रेस ने लगाया हे उससे भाजपा में बेचैनी बड़ गई है। हालांकि उपरी तौर पर भाजपा इस सीडी से नुकसान नहीं होने का दावा कर रही है पर सच तो यह है कि कल तक कांग्रेस को गरियाने वाली भाजपा के पास नार्को सीडी मामले में कोई जवाब नहीं हे। अब तो आम आदमी भी कहने लगा है कि यदि सीडी नकली है तो सरकार असली सीडी सामने क्यों नहीं ला रही है।
इधर भाजपा ने भ्रष्टाचार, दरभा कांड और नार्को सीडी से हो रहे नुकसान से निपटने कई विधायकों की टिकिट काटने और गरीबों व युवाओं को सब कुछ मुक्त बांटने का निर्णय ले लिया है।
सूत्रों का कहना है कि हाल के वर्षो में विकास के नाम पर संसाधनों की चौतरफा लूट जिस पैमाने पर हुआ है वह अंयंत्र कहीं देखने को नहीं मिलेगा। स्तर हीन सड़क से लेकर भवन निर्माण और भ्रष्ट अधिकारियों के संरक्षण को लेकर आम लोगों में सरकार की छवि पर प्रभाव पड़ा है।
इधर सरकार की मुफ्त बांटने की वोट बैक की राजनीति से मध्यम वर्ग में बेहद नाराजगी है। सूत्र बताते है कि सरकार की इस मुक्त बांटो योजना से नाराज मध्यम वर्ग ने यदि अपनी नाराजगी वोट के रूप में तब्दिल कर दी तो भाजपा को लेने के देने पड़ जायेंगे।
दूसरी तरफ चर्चा इस बात की भी है कि चुनावी साल में रमन सरकार के करतूतों के इस खुलासे से हाईकमान भी नाराज हे और भले ही बाहर से सब ठीक दिख रहा हो लेकिन भीतर से कुछ भी ठीक नहीं है।
बहरहाल नार्को सीडी का असर क्या होगा यह बाद में ही पता चलेगा।