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शनिवार, 7 जून 2025

सबूत के साथ राहुल ने उठाये चुनाव पर सवाल

 सबूत के साथ राहुल ने चुनाव पर उठाये सवाल…


देश के नामचीन अखबारों में आज राहुल गांधी के छपे लेख से मोदी सत्ता को कितना फ़र्क़ पड़ेगा कहना मुश्किल है लेकिन जिन चुनावी व्यवस्था को लेकर राहुल ने सबूत के साथ बेईमानी को सामने रखा है क्या जनमानस पर इसका असर 

राहुल गांधी ने लिखा यह पांच प्रमुख तरीके हैं जिनसे चुनाव प्रभावित किया जा रहे हैं! पहले उन्होंने लिखा चुनाव आयोग की नियुक्ति को लेकर सरकार ने जो कुछ भी कदम उठाए हैं वह पारदर्शी नहीं है 

आप खुद सोचे cji ,प्रधानमंत्री और वि पक्ष का नेता चुनाव आयोग के अधिकारी तय करता था मुख्य चुनाव आयोग के अधिकारी को तय करने के लिए इन तीन सदस्यों की कमेटी थी जो बहुमत से किसी को भी चुनाव आयोग का अध्यक्ष  बनाती थी!

लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने संसद में प्रस्ताव पास कर कर अपने बहुमत की ताकत से इस पूरी प्रक्रिया को विवादास्पद बना दिया है उन्होंने आगे लिखा अब मुख्य चुनाव अधिकारी बनने के लिए cji को हटाकर केंद्रीय मंत्रिमंडल के मंत्री को शामिल कर लिया गया है ऐसे में आप खुद सोच सकते हैं एक निष्पक्ष आदमी को हटाकर एक पूर्वाग्रह वाले आदमी को यदि नियुक्ति के लिए आगे करते हैं तो इसका सीधा मतलब है आपका मन साफ नहीं है! 

जब दो व्यक्ति एक साथ मिलकर किसी अपने व्यक्ति को या किसी ऐसे व्यक्ति को जिस पर देश का विश्वास नहीं है चुनाव अधिकारी बनना चाहेंगे तो विपक्ष का नेता और उसके विरोध के बावजूद कोई फर्क नहीं पड़ेगा! 

सब इसलिए किया गया ताकि चुनाव आयोग पर अप्रत्यक्ष रूप से सरकार का नियंत्रण रह सके ताकि वह अपने हिसाब से चुनाव को मैनेज कर 

राहुल गांधी फिर फर्जी वोटो का जिक्र करते हैं उनका कहना है की चुनाव आयोग को अपने हिसाब से मैनेज करने के बाद सरकार चुनाव जीतने के लिए फर्जी वोटो का उपयोग करती है! 

 महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में 76 लाख वोट बढ़ाए गए और उन चुनाव क्षेत्र को टारगेट किया गया जहां लोकसभा चुनाव में वह हारी वो!

उन्होंने इस बात के साक्ष्यप दिए की एक ही वाटर नंबर से अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नाम से वाटर दर्ज हैं जिनका उपयोग फर्जी वोटो के लिए किया जाता है! 

राहुल गांधी लिखते हैं फर्जी वोटरों के लिए कुछ बूथ भाजपा द्वारा निश्चित कर लिएजाते हैं, उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र में 100000 वाटर केंद्र है लेकिन इसमें से सिर्फ 12000 बूथ का चयन किया गया जहां फर्जी वोटिंग करवाई गई!

ऐसे मतदान केदो पर औसतन 600 वोट फर्जी डालें अब आप सोच सकते हैं 5:00 बजे बाद यह 600 वोट डाले जाएं तो 10 घंटे का समय लगता है प्रति वाटर समय के हिसाब से क्या किसी बूथ पर भी 10 घंटे लाइन रही है! 

एक और आश्चर्यजनक बात यह थी बड़े हुए फर्जी वोटरों में नई उम्र के वोटर नहीं थे ज्यादातर उम्र दराज वॉटर थे जो चुनाव आयोग के इस दावे को भी गलत साबित करता है कि यह नए वोटरों में उत्साह की वजह से हुआ है!

नांदेड लोकसभा क्षेत्र इसका एक बेहतरीन उदाहरण है जहां पार्लियामेंट के चुनाव में यूपीए का उम्मीदवार जीत जाता है और वही सारी विधानसभा सीटों पर भाजपा का गठबंधन और वोटो का मार्जिन विधानसभा में इतना ही रहता है जीतने वोट बढ़ाए गए थे!

 भारतीय लोकतंत्र में यह बेहद चौंकाने वाला उदाहरण है एक ही मतदाता पर्ची लेकर बूथ में वोट डालने गया और अलग-अलग पार्टियों को वोट डाला और आश्चर्य तो इस बात का था कि उसने स्टेट में देवेंद्र फडणवीस को केंद्र में मोदी जी से ज्यादा प्राथमिकता दी! सवाल था क्या यह संभव है?

इसी तरह कामठी विधानसभा का उदाहरण भी दिया गया जहां लोकसभा में कांग्रेस को 136000 वोट मिले थे और भाजपा नीत गठबंधन को 119000 विधानसभा में यहां 50000के  लगभग वोट बढ़ाए गए और जब परिणाम आया विधानसभा का तो कांग्रेस को वोट मिले 134 000 जो पिछले लोकसभा के ही आसपास थे लेकिन भारतीय जनता पार्टी के वोट बढ़ाकर 175000 हो गए जिसमें 50000 वोटो का बहुत योगदान था!

राहुल गांधी ने यह भी आरोप लगाया के चुनाव आयोग द्वारा चुनाव के बाद जानबूझकर बढ़ा हुआ मत प्रतिशत बताया जाता है, 5:00  बजे के बाद जिन बूथों पर 

भारी मात्रा में मतदान प्रतिशत बताया जाता है यह सब मैनेज किया हुआ होता है! 

राहुल गांधी ने मिसमैच को लेकर भी सवाल उठाए राहुल गांधी का कहना था जब वोटिंग मशीन  इतनी परफेक्ट है तो जीतने वोट डाले जाते हैं उससे ज्यादा क्यों गिनती है या कम क्यों 

राहुल गांधी ने चुनाव चोरी करने के लिए चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाते हुए यह भी कहा चुनाव आयोग द्वारा जवाब नहीं दिया जाता और जो तथ्य पूछे जाते हैं उनको तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाता है! 

उल्लेखनीय है की वोटिंग लिस्ट के सवाल पर कांग्रेस के तमामतर सवाल जो किए गए थे 

चुनाव आयोग ने  अभी तक उनका तथ्यात्मक जवाब नहीं दिया है! कुछ मामलों में तो उन्होंने यह कह कर भी पल्ला झाड़ लिया है कि हमारे पास इसका रिकॉर्ड नहीं है! 

अपनी शिकायत और सवालों का जवाब न देकर भारतीय लोकतंत्र की जो पारदर्शी पहचान थी उसको भी भारतीय चुनाव आयोग द्वारा खंडित किया जा रहा है! 

राहुल गांधी ने यह भी कहा चुनाव आयोग द्वारा सबूत को नष्ट किया जाता है ताकि उसे साबित नहीं किया जा सके! 

क्या आवश्यकता थी वोटिंग मशीनों से डाटा इरेज़ करने की, दिन भर वोटिंग मशीनों में काम आने वाली बैटरी है आखिर क्यों कई दिन बाद भी 100% पाई जाती है जब वोट गिने जाते हैं!

चुनाव आयोग ने हरियाणा के महाराष्ट्र के यहां तक की लोकसभा चुनाव के भी डाटा इरेज़ कर दिए हैं मशीनों से डाटा हटा दिए गए हैं! 

सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों के बावजूद भी जब हजारों रुपए जमा कराकर ईवीएम मशीन को री  चेक करने की बात की गई तो चुनाव आयोग ने जिन हुए दाताओं को नहीं बताया बल्कि मार्क ड्रिल कर कर मशीन की सत्यता स्थापित करने की कोशिश की जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है! हिंदी अंग्रेजी दोनों में छपे इस लेख में राहुल गांधी ने इन पांच बातों से किस तरह चुनाव चोरी किया जाता है इसके बारे में विस्तार से लेख में अपनी बात रखी है !

महाराष्ट्र चुनाव के बाद जन विचार संवाद के पटल पर लगातार क्रमशः धारावाहिक के रूप में मैंने इन चुनाव चोरी पर फीचर लिखे थे और चुनाव व्यवस्थाओं पर सवाल उठाए थे आज राहुल गांधी जी ने भी इस व्यवस्था को नंगा करने का प्रयास किया है और देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए शायद चुनाव की पारदर्शिता बेहद जरूरी है!

आखिर भारतीय जनता पार्टी और उसके समर्थक पारदर्शी चुनाव व्यवस्था के इ तने खिलाफ क्यों हैं?पारदर्शी चुनाव की बात करते ही वह सबूत की बात करते हैं अरे सबूत तो चुनाव आयोग नष्ट कर रहा है कहां से  लाएंगे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशो का उल्लंघन हो रहा है सरकार, मुक्त दर्शक बनी हुई है और कानून के हाथ बांध दिए गए हैं क्या यह सब अपने आप में प्रमाण नहीं दाल में कुछ काला है? (साभार)


गुरुवार, 8 अगस्त 2024

सुप्रीम कोर्ट पर भड़‌क गये हाई कोर्ट का जज...

 सुप्रीम कोर्ट पर भड़‌क गये हाई कोर्ट का जज...


एक तरफ सुप्रीम कोर्ट के रवैये को लेकर आम आदमी में नाराजगी है तो दूसरी अब हाईकोर्ट के एक जज ने भी संबैधानिक सीमाओं से बाहर जाने और हाईकोर्ट के अधिकार को कमजोर करने का आरोप लगा किया है। और कह दिया कि हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट के अधीन नहीं है। 

यह पूरा मामला एक अवमानना के मामले से जुड़ा हुआ है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दीथीं,और इसी से नाराज हाईकोर्ट के न्यायपूर्ति राजबीर सहारावत ने कड़ी -टिप्पणी कर दी।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ एक आश्चर्यजनक आदेश में, पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की अपने संवैधानिक सीमाओं से बाहर जाने और हाई कोर्ट की अधिकारिता को कमजोर करने के लिए आलोचना की है। यह आदेश न्यायमूर्ति राजबीर सहारावत द्वारा 17 जुलाई, 2024 को जारी किया गया, जो भारत की न्यायिक प्रणाली में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के बीच के संबंधों पर सवाल उठाता है।

मामला एक अवमानना याचिका से जुड़ा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के समक्ष अवमानना प्रक्रियाओं पर रोक लगा दी थी। न्यायमूर्ति सहारावत का कहना है कि इस रोक आदेश ने “संवैधानिक अनुपालन बनाम कोर्ट अनुपालन की समस्या" पैदा कर दी है और हाई कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या अनावश्यक रूप से बढ़ा दी है।

आदेश इस बात पर जोर देता है कि हाई कोर्ट सुप्रीम कोर्ट के अधीनस्थ नहीं हैं, और उनके संबंध को परिभाषित करने वाले संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हैं। न्यायमूर्ति सहारावत नोट करते हैं, “माननीय सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं कई बार स्पष्ट किया है कि हाई कोर्ट सुप्रीम कोर्ट के अधीन नहीं है।"

यह मामला नौरती राम द्वारा देवेंद्र सिंह आईएएस और एक अन्य पार्टी के खिलाफ दायर अवमानना याचिका से संबंधित है। सुनवाई के दौरान, प्रतिवादियों द्वारा एक अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश, दिनांक 3 मई, 2024, एसएलपी (सी) संख्या 9638/2024 में हाई कोर्ट के समक्ष अवमानना प्रक्रियाओं पर रोक लगा दी। इस रोक ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपीलित आदेश के संचालन को नहीं रोका, जिससे महत्वपूर्ण न्यायिक और संवैधानिक प्रभाव पड़े।

एक महत्वपूर्ण विवाद का मुद्दा यह है कि हाई कोर्ट में अवमानना प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप करने का सुप्रीम कोर्ट का अधिकार। आदेश कहता है, “संविधान के अनुच्छेद 215 और अवमानना अदालत अधिनियम की धारा 12 के अनुसार, हाई कोर्ट द्वारा पारित आदेश के कथित अवमानना के लिए कार्यवाही शुरू करने और जारी रखने की शक्ति विशेष रूप से हाई कोर्ट के पास है।"

न्यायमूर्ति सहारावत ने सुप्रीम कोर्ट के दृष्टिकोण की आलोचना की और कहा:

“मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो इस प्रकार के आदेश दो प्रमुख कारणों से उत्पन्न होते हैं, पहला, एक प्रवृत्ति कि उस आदेश के परिणाम की जिम्मेदारी लेने से बचा जाए, जो इस प्रकार का आदेश, सभी संभावना में, उत्पन्न होने के लिए बाध्य है, यह बहाना करते हुए कि अवमानना प्रक्रियाओं पर रोक का आदेश किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता है, और दूसरा, सुप्रीम कोर्ट को वास्तव में जितना 'सुप्रीम' है उससे अधिक 'सुप्रीम' और हाई कोर्ट को संवैधानिक रूप से जितना 'हाई' है उससे कम 'हाई' समझने की प्रवृत्ति।”

न्यायमूर्ति सहारावत ने सुप्रीम कोर्ट से अधिक सावधानी बरतने का आह्वान किया, यह सुझाव देते हुए कि इसे अपने आदेश के माध्यम से कानूनी परिणामों को स्पष्ट रूप से पैदा करना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसे आदेशों की आकस्मिक व्याख्या मुकदमेबाजों द्वारा गंभीर और हानिकारक परिणाम ला सकती है।

हालांकि, न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता को देखते हुए, कोर्ट ने महसूस किया कि वह आदेश का पालन करने के लिए पूर्णतः बाध्य है और इसलिए, मामला स्थगित कर दिया गया है जब तक कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा उपरोक्त एसएलपी का फैसला नहीं किया जाता।

कोर्ट ने जोड़ा, “लेकिन यह हमेशा संभव नहीं हो सकता है कि हाई कोर्ट इस तरह का मार्ग अपनाए, खासकर किसी विशेष मामले में विशेष तथ्यों और परिस्थितियों के कारण या कुछ विधायी प्रावधानों के शामिल होने के कारण। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होगी, जिसे बेहतर तरीके से टाला जाना चाहिए।"

बुधवार, 24 जुलाई 2024

सुप्रीम फ़ैसले ने गाल पर तमाचे से बचा लिया…

 नीट मामले में सुप्रीम फैसले का यह सच जानकर होश उड़ जायेंगे...


पता नहीं यह बात किसने कही है कि आपकी सड़‌क जब तक खामोश रहेगी संसद और उसके तंत्र अवारा होकर आपकों खुल्ला सांड की तरह अपनी सींगों से बिंधते रहेगें।

यह कड़‌वा सच भयावह भी है और डराने वाला भी।  NEET पेपर लीक मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या इस हकीकत को बयां करने वाला नहीं है?

आख़िर क्या वजह थी कि सुप्रीम कोर्ट भी इस नीट पेपर लीक की परीक्षा रद्द नहीं कर सका। क्या यह इस फैसले ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के माथे पर  लगने वाले कालिख से बचाने वाला साबित नहीं हुआ।

25000 सीट और हर एक सीट के लिए औसतन २० लाख रुपये भी माने जाये तो यह खेल 50000000000 का मामला है।

सारे तथ्य चीख चीख कर कह रहे थे  कि पेपर लीक हुआ है और इस घपले को दबाने के लिए परीक्षा परिणाम की घोषणा तब की गई जब समूचा देश लोकसभा चुनाव के परिणाम में व्यस्त था। क्या परिक्षा परिणाप का समय भी सुप्रीम कोर्ट ने अनदेखा किया।

कितने ही तथ्य है जो कह रहे थे कि परीक्षा परिणाम रद्द कर फिर से परीक्षा आयोजित किया जाना चाहिए। NTA, शिक्षा' माफिया के साथ पूरा सरकारी तंत्र की संलिप्तता स्पष्ट दिखाई देने के बावजूद यह फैसला क्या न्याय है।

तथ्य जो सामने है…

*67 छात्र- 720 में 720 अंक, इनमें से 8 छात्र एक ही सेंटर के.इससे पहले एक बार में 4 छात्र ही यह कीर्तिमान कर पाये थे.

*5 मई को NEET 2024 की परीक्षा हुई थी जिसका परिणाम 14 जून को आना था. लेकिन यह परिणाम 10 दिन पहले 4 जून को ही निकाल दिये गये, जिस दिन  लोकसभा चुनाव के नतीजे आ रहे थे. चुनाव परिणाम की आड़ में क्या छुपाना था? 

*परीक्षा कराने वाली सरकारी एजेंसी NTA संदेह के घेरे में है. इम्तिहान से  ठीक 24 दिन पहले 9 और 10 अप्रैल को एप्लीकेशन विंडो को फिर खोला गया था. बाद में Form correction के नाम एक बार फिर से window  खोला गया.  ऐसा क्यों किया गया, 24246 बच्चों ने तब फॉर्म भरा, उनमें से कितने कौन से सेंटर के थे, उनमें से कितनों का सेलेक्शन हुआ? इनमें से किनके कितने मार्क्स थे? 

*रांची से पटना पुलिस को इनपुट गया- एक डस्टर गाड़ी की तलाशी ली गई- 4 May  को पटना में NEET पेपरलीक की खबर, प्रश्नपत्र की बरामदगी, एक परिक्षार्थी की रात में प्रश्नपत्र मिलने की स्विकारोक्ती और  बिहार के 3 जिले से solver gang के 19 आरोपियों की गिरफ्तारी. अन्य राज्यों में भी अभ्यर्थियों के बदले परीक्षा देने वालों की गिरफ्तारी हुई.

*सवाई माधोपुर, राजस्थान में भी एक परिक्षार्थी ने स्विकारोक्ती दी कि उसे 4 की रात हूबहू प्रश्नपत्र हासिल हो गया था.

*बिहार, उड़ीसा, झारखंड, राजस्थान, कर्नाटक आदि से कई  छात्रों का सेंटर 1000-1500 किलोमीटर दूर गुजरात के गोधरा में. ये कमाल कैसे? 

*गोधरा में ही, 5 मई से पहले NEET परीक्षार्थियों की 10-10 लाख में गैरकानूनी मदद कर रहे एक एजुकेशनल कंसलटेंसी के मालिक पुरुषोत्तम राय, एक स्कूल शिक्षक एवं सुपरवाइजर तुषार भट्ट और भाजपा का एक नेता आरिफ बोहरा सहित 5 लोगों को पुलिस और कलेक्टर ने detain किया. DM ने कहा है कि solver gang  के साथ  करोड़ों के ट्राजेक्शन के सबूत हैं. गुजरात में ही एक छात्र  cbse में फेल (physiscs theory paper में 1 नं), पर   NEET में 715, कमाल पर कमाल!! 

*हरियाणा के झज्जर परिक्षा केंद्र पर बिना सरनेम के  8 छात्रों का केंद्र और सभी टॉपर. यह भी कमाल कैसे? और कुल मिलाकर 67 टॉपर - 720 /720, 718, 719. असंभव!!!! 

*67 टॉपर में से 44 को Physics  का एक सवाल गलत होने के कारण ग्रेस मार्क्स दिया गया जबकि 2018 के बाद छपी किताब के अनुसार वह सवाल सही है. 

*पटना पुलिस द्वारा आपराधिक विवेचना हेतु मांगे जाने के बाद भी NTA द्वारा प्रश्न पत्र का मिलान नहीं किया गया, जबकि 10 मिनट में मिलान करके बता सकता था कि यह प्रश्न पत्र NEET में पुछा गया प्रश्न पत्र है या नहीं. हांलाकि पटना पुलिस ने forensic जांच द्वारा साबित कर दिया कि  यह ओरिजिनल प्रश्नपत्र है. बिहार पुलिस ने  NTA से 3 बार ओरिजिनल प्रश्नपत्र की मांग, लेकिन NTA ने सहयोग नहीं किया. क्यों? 

*NTA ने बताया कि झज्जर में 6 टॉपर को प्रश्नपत्र देरी से मिलने के कारण ग्रेस मार्क्स दिया गया. जबकि  स्कूल के प्रिंसिपल ने टीवी चैनल पर कहा कि कोई देरी नहीं हुई थी. यहाँ बंटे  MNOP सीरीज के शीट पुरे देश में कहीं नहीं बंटे. घोटाला यहाँ पकड़ें. पूरा NTA संलिप्त है.

*महाराष्ट्र सहित और भी कई सेंटर पर प्रश्नपत्र 20 - 60 मीनट देरी से मिलने की खबर आई थी.

*सवाल है कि देरी से प्रश्न पत्र मिलने के कारण ग्रेस मार्क्स देने का कोई कानून न होने के बावजूद आखिर किस फार्मूले के तहत NTA ने ग्रेस मार्क्स दिए? और अब कोर्ट में अपनी गलती मान ली. तो आखिर इस तरह का भ्रष्टाचार करने वाले  NTA को अपराध की सजा कौन देगा और कब तक मिल जाएगी? 

2015 में पेपर लीक के कारण CBSE से छीनकर NTA को  exam conduct  करने का अधिकार दिया गया था. अब क्या? 

सवाल तो इतने सारे हैं कि बिना यह जांच किए ही…

1.1 महीने बाद 9-10 अप्रैल को  window क्यों खोला

    गया, 

2.पटना प्रश्नपत्र लीक की FIR की जांच पूरी किए बिना,

    झज्जर और गोधरा कांड की FIR की जांच किएबिना,  

3.मार्क्स के अनुसार रैंक में हेराफेरी की जांच किये बिना, 

    फटे  OMR शीट की जांच किये बिना, OMR शीट के

    अनुसार कम  मार्क्स आने की जांच किये बिना, खाली

    OMR शीट भरे जाने की जाच किये बिना, 

4. असाधारण और अप्राकृतिक रूप से अबतक के 

     highest cut off marks  आने की जांच किये

     बिना, 

5. बारबार application window खोलने वाले,

     लगातार अपना बयान बदलने वाले और  गैरकानूनी

     तरीके से ग्रेस मार्क्स देने वाले NTA की जांच किये

     बिना

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कैसे 1567 ग्रेस मार्क्स पाए बच्चों में से  50 टॉपर सहित 1536 बच्चों के  re-exam का आदेश  दिया? 

*शिक्षा मंत्री ने NTA को क्यों क्लीन चिट दे दी बिना जांच के?भ्रष्टाचार करने वाले को ही जांच का जिम्मा कैसे दे दिया गया? चोर को ही चौकीदार बना दिया. इतनी हडबडी  किसको है और क्यों है? 

*पहले भी शिक्षा के  Don ने, नटवरलालों ने, माफियाओं ने  entrance exam में कई बार घपले किए हैं, मध्यप्रदेश के व्यापम का रहस्य नहीं खुला अब तक और आज नटवरलाल और शिक्षा माफियाओं ने, कई कोचिंग संस्थान ने  सरकारी तंत्र के साथ मिलकर एक जाल बुनकर अरबों का व्यपार खड़ा कर लिया है. 

*इस वर्ष, NEET 2024 के लिए कुल 24,06,079 अभ्यर्थी पंजीकृत हुए, जिनमें से 23,33,297 उम्मीदवार परीक्षा में उपस्थित हुए। NEET 2024 परीक्षा में कुल 1,316,268 अभ्यर्थी सफल रहे हैं। भारत में वर्तमान में 695 चिकित्सा कॉलेज हैं, जिनमें कुल 1,06,333 सीटें चिकित्सा पाठ्यक्रमों के लिए प्राप्त हैं। इनमें से लगभग 55,648 सीटें सरकारी कॉलेजों में हैं, और 50,685 सीटें निजी MBBS कॉलेजों में हैं। 

सोचिये, 12 लाख अधिक रिजल्ट क्यों? ....प्राईवेट कालेज में एडमिशन के लिए अधिक से अधिक पैसे लेकर अभिभावकों की अंधी दौड़.

*गोधरा, गुजरात NEET घोटाले का सबसे बड़ा सेंटर है. सुप्रीम साहेब, आप सिर्फ गोधरा की जांच कर लेते, आपको देशव्यापी नेटवर्क का पता चल जाता. जी हां, व्यापम पूरे देश में व्याप्त हो गया है. 

गोधरा में खाली पेपर जमा' करवाए गए, बाद में खाली पेपर भरे गए और स्टूडेंट टॉप कर गया!!  मीडिया बता रहा है..

*क्यों कोर्ट NEET की काउंसलिंग बंद कर "कोर्ट मॉनिटरड जांच" नहीं करना चाहती थी? कोर्ट को जांच से क्या दिक़्क़त हो सकती थी?

पिछले 10 सालों में सैकड़ों  एग्जाम्स रद्द, सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में. द टाइम्स आफ इंडिया अखबार ने इन्वेस्टिगेट कर 41 एग्जाम्स में पेपर लिक की पोल खोली है. जी हाँ, पिछले 50 साल में सबसे ज्यादा बेरोजगारी वाले देश में! 

अब तो संपूर्ण देश के करोड़ों छात्रों युवाओं के जीवन का प्रश्न है.

इस तथ्य के बाद भी सुप्रीम फैसले का क्या मतलब है, किसके साथ न्याय  हुआ?

अब तो उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे की तर्ज पर इस मु‌द्दे को उठाने वालों से ही माफी मांगने कहा जा रहा है।

बेशर्मी के इस दौर में एक बार फिर राफेल घोटाले की याद ताजा कर ही। 

मंगलवार, 8 जून 2021

फटकार के बाद मोदी...

 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का वैक्सीनेशन को लेकर दिया गया बयान को कुछ लोग देर आये दुरुस्त आये कह रहे हैं तो समर्थक वाह मोदी में लगे है लेकिन हकीकत में देखा जाये तो यह लातों के भूत बातों से नहीं मानते की कहावत को चरितार्थ करता है, सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से दो हफ्ते में वैक्सीन और 35 हजार करोड़ का हिसाब मांगा था, वैक्सीन की दो कीमतों पर सवाल उठाया था और सरकार की तैयारी पूछा था उसके बाद आये इस निर्णय का सच तो यही है।

हैरानी की बा तो यह है कि जिस राष्ट्र के नाम संबोधन पर पूरी दुनिया की निगाह होती है उसमें भी कोई झूठ बोल दे, लफ्फाजी करे और अपनी लापरवाही की वजह से हुए नरसंहार पर आंख मूंद ले तो यह बेशर्मी की पराकाष्ठा के अलावा कुछ नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के झूठ की कहानी बताने से पहले यह बात आम लोगों को जान लेना चाहिए कि इस देश में गंगा में बढ़ती लाशें, चिताओं की लाईने और आक्सीजन तथा अव्यवस्था से हुई मौत न केवल सत्ता की लापरवाही के चलते हुई है बल्कि यह मोदी सत्ता के द्वारा किया गया नरसंहार है।

हम इसे सत्ता का नरसंहार इसलिए भी कहते हैं कि नमस्ते ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सरकार बनाने के लोभ से शुरु हुई लापरवाही आज भी जारी है, सत्ता की लफ्फाजी और झूठ का कहर आम लोगों के दैनिक जीवन पर बुरी तरह टूटा है। जिस मुक्त वैक्सीन को लेकर आज मोदी समर्थक बेशर्मी से अपनी पीठ थपथपाने की कोशिश कर रहे हैं वे भी जान ले कि यदि सुप्रीम कोर्ट ने दो सप्ताह के भीतर जवाब देने सरकार को नहीं हड़काया होता तो सत्ता अभी भी उत्तरप्रदेश सहित सात राज्यों में होने वाले चुनाव की रणनीति के अलावा कुछ सोच ही नहीं सकती। और रणनीति भी झूठ नफरत और अफवाह पर टिकी हुई।

सुप्रीम कोर्ट के जिन सवालों की वजह से फ्री वैक्सीन की गई वह सवाल लोगों का जानना चाहिए। कोर्ट ने मोदी सत्ता से पूछा था कि जिस  35 हजार करोड़ संसद में लाया थआ वह 35 हजार करोड़ कहां कैसे खर्च किया जवाब दो, वैक्सीन की दो कीमत क्यों है, यदि पिछले साल से तैयारी थी तो ऑक्सीजन और दवाई के अभाव में लोग क्यों मरे, तैयारी थी तो वैक्सीन की कमी क्यों है, वैक्सीन को लेकर कहां क्या खर्च किया गया। ऐसे कितने ही सवालों को लेकर जह सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सत्ता को लानत भेजते हुए दो हफ्ते के भीतर जवाब देने कहा तब फ्री वैक्सीन का खेल शुरु हुआ है।

इस  संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी के झूठ से पहले बता दें कि मोदी सत्ता की तैयारी क्या थी, जब विशेषज्ञ ऑक्सीजन की जरूरत बता रहे थे तो मोदी सत्ता ऑक्सीजन विदेशों को बेच रही थी। जब दुनिया भर के देश 2020 में ही वैक्सीन खरीदने आर्डर दे रहे थे तो मोदी सत्ता असम-बंगाल में चुनाव जीतने की रणनीति बना रही थी, कोरोना की कमी होते ही दूसरे देशों को वैक्सीन बेची जा रही थी और दावा किया जा रहा था कि हमने कोरोना की लड़ाई जीत ली है और अब दुनिया को मदद करेंगे।

सत्ता की लापरवाही से हुए नरसंहार के बाद भी यदि कोई झूठ बोले तो सवाल उठना चाहिए कि क्या देश के प्रधानमंत्री को झूठ बोलना चाहिए। प्रधानमंत्री अब भी अपनी वाहवाही की भूख मिटाने झूठ बोलते है कि भारत ने दो वैक्सीन बनाई जबकि हकीकत यही है कि भारत ने  केवल कोवैक्सीन ही बनाई और यह कारनामा भारत टेक ने किया जबकि जिस कोविशील्ड को लेकर प्रधानमंत्री मोदी दावा करते हैं वह वैक्सीन आस्ट्राजेनिका आक्सफोर्ड का है और अदार पूनावाले का सिरम इंस्टीट्यूट ने लाइसेंस लेकर कोविशील्ड तैयार किया है। यानी आप देखेंगे कल स्पूतनिक, जानसन या दूसरी कंपनी का वैक्सीन यदि भारत में तैयार होने लगे तो क्या मोदी सत्ता इसी तरह का दावा करेंगी। लापरवाही के नरसंहार का जवाब तो सुप्रीम कोर्ट ने दो हफ्ते में मांगा है लेकिन सच आपके सामने है कि मोदी सत्ता तब जागी जब सुप्रीम कोर्ट हड़काया।

मंगलवार, 12 जनवरी 2021

मी लार्ड... ये समर्पण ध्वनि है...!


 

किसान आंदोलन को लेकर जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने बीच का रास्ता निकालने की वकालत की वह हैरान कर देने वाला है। और कई तरह के सवाल भी खड़ा करने वाला है। आखिर सुप्रीम कोर्ट ने बीच का रास्ता निकालने की वकालत करने की बजाय आंदोलन को लेकर कोई बड़ा फैसला करने से क्यों हिचक रही है। सवाल यह नहीं है कि सरकार के रवैये को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी जब नाराज है तो वह सीधे कानून को गलत क्यों नहीं कह देती और न ही सवाल आंदोलन में शामिल बूढ़े-बच्चों या महिलाओं का है।

सवालतो यही है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट को किस बात का इंतजार है। क्या संविधान में मिले आम आदमी के अधिकारों की रक्षा नहीं की जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से महिलाओं और बच्चों की बात कही है, उससे सवाल यह उठता है कि सुप्रीम कोर्ट यह कैसे भूल सकती है कि किसानी के कार्य में घर का एक-एक सदस्यों का भागीदारी होती है, हल जोतने से लेकर कटाई में और खेत में खाना पहुंचाने की स्थिति में परिवार के बच्चे महिलाएं शरीक होती है।

सवाल यह नहीं है कि सरकार आंदोलन को खत्म करने के तरीके ढंूढ रही है जबकि सुप्रीम कोर्ट को इस सवाल को ध्यान में रखना चाहिए कि आखिर जो विपक्ष संसद में संशोधन की मांग कर रही थी उसे अनसुना कर चोर दरवाजे से कानून बनाने की कोशिश क्यों हुई फिर संसद में संशोधन से इंकार करने वाली सरकार आंदोलन के बाद संशोधन के लिए क्यों तैयार हो गई है।

यानी इस देश में बहुमत का दम्भ भरने वाली सरकार को आंदोलन से ही झुकाया जा सकता है।

ऐसे कितने ही सवाल है जो सुप्रीम कोर्ट को ही कटघरे में खड़ा कर रही है? आखिर सुप्रीम कोर्ट क्यों नहीं कह रही है कि कानून गलत है उसे लागू करने का तरीका गलत है। सवाल कई है, और यही हाल रहा तो सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनियता पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगेगा।

यह समर्पण ध्वनि है

साफ दिख रहा है 

किसानों का दर्द

लेकिन सत्ता को इससे

क्या लेना देना

वर्तमान भूत और

भविष्य को कुचलने

की कोशिश का

एहसास उन्हें भी है

जो न्याय की वकालत करते है

लेकिन राजा के पीछे

खड़ी चतुरंगी सेना

को सत्ता से मोह है

और न्याय ठिठक सा गया है।

राजा के मन की बात

न समझ में आये

तब भी ताली बजानी पड़ती है

क्योंकि यह समर्पण ध्वनि है

दौर है, समर्पण ध्वनि है।