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शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

अनुदान प्राप्त शिक्षकों की पेंशन पर सत्ता का चाबुक

 


अनुदान प्राप्त शिक्षकों की पेंशन पर सत्ता का चाबुक 

छत्तीसगढ़ में इस वक्त एक ऐसा मुद्दा गर्म हो चुका है जिसने सरकार, विपक्ष और हजारों बुजुर्ग रिटायर्ड प्रोफ़ेसर्स को आमने-सामने खड़ा कर दिया है!

इमेजिन कीजिए, आपने अपनी पूरी जिंदगी—30-40 साल—छात्रों का भविष्य बनाने में लगा दिए। आप रिटायर हुए, और आपको पिछले कई दशकों से पेंशन मिल रही है। लेकिन अचानक एक दिन एक सरकारी आदेश आता है और कहता है—"आपकी पेंशन और ग्रेच्युटी तत्काल प्रभाव से बंद की जाती है!"

जी हां, बिल्कुल सही सुना आपने! छत्तीसगढ़ के अनुदान प्राप्त अशासकीय महाविद्यालयों (Aided Private Colleges) के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर्स और कर्मचारियों के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है।


आइए पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं।

छत्तीसगढ़ के उच्च शिक्षा विभाग ने एक आदेश जारी किया है—आदेश क्रमांक ESTB/18649/2026/38-2, दिनांक 01/09/2026। इस आदेश के जरिए उन्होंने 12.10.2010 के उस पुराने आदेश को निरस्त कर दिया है जिसके तहत इन रिटायर्ड प्रोफ़ेसर्स को पिछले 40 सालों से पेंशन और ग्रेच्युटी का लाभ मिल रहा था।

आदेश आते ही मानो भूकंप आ गया! यह फैसला उन हजारों पेंशनर्स के लिए किसी झटके से कम नहीं है, जिनमें से कई बुजुर्ग प्राध्यापक 70, 80 और 90 साल की उम्र के हैं। उनकी दवाइयों का खर्चा, उनका जीवन-यापन सब इसी पेंशन पर निर्भर था।

इस फैसले के खिलाफ सबसे पहले अनुदान प्राप्त शिक्षकों ने मोर्चा खोला और प्रेस कॉन्फ्रेंस (पत्रकार वार्ता) करके अपना विरोध दर्ज करवाया। उनका कहना है कि यह उनके साथ घोर अन्याय है.

लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती! इस मुद्दे ने अब जोरदार सियासी रूप ले लिया है।

एक तरफ कांग्रेस के पूर्व विधायक विकास उपाध्याय ने सरकार के खिलाफ सीधे मोर्चा खोल दिया है और इस फैसले को रिटायर्ड कर्मचारियों के साथ धोखा बताया है।

लेकिन सबसे बड़ा ट्विस्ट तब आया जब इस मामले में भाजपा के वरिष्ठ नेता और रायपुर लोकसभा सांसद बृजमोहन अग्रवाल की एंट्री हुई!

जी हां, बृजमोहन अग्रवाल ने 1 अक्टूबर 2026 को सीधे मुख्यमंत्री जी को एक पत्र लिखा है। उन्होंने अपने पत्र में साफ लिखा है कि:

"जो प्राध्यापक 70, 80 और 90 वर्ष की आयु के हैं, उनका जीवन-यापन और चिकित्सा संबंधी आवश्यकताएं इसी पेंशन पर निर्भरहैं। चार दशकों से चली आ रही पेंशन को अचानक बंद करना उनके आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा पर गंभीर संकट है।"

बृजमोहन अग्रवाल ने मुख्यमंत्री से गुजारिश की है कि 1 सितंबर 2026 के इस आदेश पर तत्काल रोक लगाई जाए और पेंशन-ग्रेच्युटी व्यवस्था को पूर्ववत (जैसे पहले थी) बहाल किया जाए।


अब सवाल यह उठता है:

  1. क्या 40 साल से मिल रही पेंशन को एक आदेश से अचानक रोकना न्यायोचित है?
  2. जो रिटायर्ड शिक्षक आज 80-90 साल की उम्र में हैं, वे इस उम्र में आर्थिक संकट का सामना कैसे करेंगे?
  3. जब अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ सांसद सरकार के फैसले पर सवाल उठा रहे हैं, तो क्या उच्च शिक्षा विभाग अपना यह आदेश वापस लेगा?

यह मामला अब सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं रहा, बल्कि एक बेहद संवेदनशील मानवीय विषय बन चुका है।

आप लोगों का इस पूरे मामले पर क्या कहना है? क्या अनुदान प्राप्त शिक्षकों की पेंशन बहाल होनी चाहिए? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।

शनिवार, 12 सितंबर 2026

धुएँ में छत्तीसगढ़, रोशनी में उत्तराखंड: कॉरपोरेट और सियासत के बीच पिसती जल-जंगल-ज़मीन

 धुएँ में छत्तीसगढ़, रोशनी में उत्तराखंड: कॉरपोरेट और सियासत के बीच पिसती जल-जंगल-ज़मीन



 रायगढ़ के गारे पेलमा से लेकर हसदेव तक, छत्तीसगढ़ के संसाधनों पर दूसरे राज्यों और निजी घरानों का कब्ज़ा।

 उत्तराखंड सरकार का अडानी पावर के साथ 25 साल का बिजली समझौता और छत्तीसगढ़ की ज़मीन पर नए पावर प्लांट का संकट [03:06, 04:16]।

 पेसा कानून और फर्जी ग्राम सभाओं के साए में उखड़ते गाँव और भड़कता जन-आक्रोश [05:08, 05:28]।

1. कहानी का प्रवेश: एक राज्य, जो दूसरों का घर रोशन करता है और खुद धुएँ में खो जाता है

राजस्थान पावर, महाराष्ट्र पावर और अब उत्तराखंड पावर [00:12]। नाम अलग-अलग राज्यों के हैं, लेकिन इन सबके पीछे का ताना-बाना एक ही है—छत्तीसगढ़ का समृद्ध कोयला, रायगढ़ और हसदेव के जंगल, और उत्खनन का ठेका निजी कॉरपोरेट घरानों के हाथ में [00:29, 02:50]।

विकास की इस अंधी दौड़ में छत्तीसगढ़ के हिस्से सिर्फ तीन चीज़ें आ रही हैं—प्रदूषण, गंभीर बीमारियां और विस्थापन [00:54, 04:27]। स्थानीय ग्रामीण सड़कों पर हैं, जल-जंगल-ज़मीन बचाने के लिए नारे गूँज रहे हैं, लेकिन शासन-प्रशासन के कान पर जूँ तक नहीं रेंग रही [01:08, 01:18]।

2. पुष्कर सिंह धामी कैबिनेट का निर्णय और छत्तीसगढ़ का संकट

ताज़ा मामला उत्तराखंड सरकार से जुड़ा है [02:15]। उत्तराखंड को रायगढ़ के गारे पेलमा सेक्टर 4/1 का कोल ब्लॉक आवंटित किया गया [02:50, 03:42]। लेकिन असली पेच यहाँ फँसता है—उत्तराखंड के पास न तो कोयला खनन का अनुभव है और न ही वहाँ पावर प्लांट लगाने की भौगोलिक स्थितियाँ [03:56]।

परिणाम स्वरूप, उत्तराखंड सरकार ने अडानी पावर के साथ 1320 मेगावाट बिजली आपूर्ति के लिए 25 साल का लंबा करार करने का प्रस्ताव पास किया है [03:06, 03:42]। यानी ज़मीन छत्तीसगढ़ की, कोयला छत्तीसगढ़ का, राखड़ और धुआँ छत्तीसगढ़ झेलेगा, और मुनाफे का गणित कहीं और लिखा जाएगा [04:16, 04:47, 05:56]।

3. पेसा कानून की धज्जियाँ और फर्जी ग्राम सभाओं का साया

छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में पेसा (PESA) कानून लागू है, जिसके तहत किसी भी परियोजना के लिए ग्राम सभा की वैधानिक सहमति अनिवार्य है [05:08]।

लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि हसदेव से लेकर तमनार और मैदानी क्षेत्रों तक प्रशासनिक दबाव और कथित फर्जी ग्राम सभाओं के ज़रिए सहमतियाँ तैयार कर ली जाती हैं [05:28, 05:46]। ग्रामीणों के प्रतिरोध को पुलिस बल के प्रयोग और गिरफ्तारियों के दम पर दबाने की कोशिश की जाती है, जैसा कि हाल ही में तमनार और अन्य क्षेत्रों में देखा गया है

कब तक शांत रहेगा छत्तीसगढ़?

जब मुनाफे का केंद्र कॉरपोरेट घराने और बाहरी राज्य होंगे और स्थानीय नागरिकों को विस्थापन और प्रदूषण की आग में झोंक दिया जाएगा, तो असंतोष की ज्वाला भड़कना स्वाभाविक है [00:54, 07:08]। शांत छत्तीसगढ़ में जिस तेज़ी से जन-आंदोलन का दायरा बढ़ रहा है, वह केंद्र और राज्य सत्ता दोनों के लिए एक बड़ी चेतावनी है

वीडियो देखें 

गुरुवार, 10 सितंबर 2026

जब किताबों की जगह तख्तियाँ उठाने को मजबूर हुई ‘जेन अल्फा’

  जब किताबों की जगह तख्तियाँ उठाने को मजबूर हुई ‘जेन अल्फा’



डिजिटल दौर का नया चेहरा और सड़कों पर उतरता बचपन

जिस ‘जेन-अल्फा’ (Gen Alpha)—अर्थात 2010 के बाद जन्मी उस पीढ़ी—को दुनिया आमतौर पर स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में खोया हुआ मानती है, वही पीढ़ी आज छत्तीसगढ़ के बस्तर से लेकर सरगुजा तक अपने बुनियादी अधिकारों के लिए सड़कों पर संघर्ष कर रही है [00:08]।

तेज धूप हो या मूसलाधार बारिश, कोरबा से कांकेर और मरवाही से सरगुजा तक—सरकारी और एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूलों के हजारों नौनिहाल आज किताबों की जगह हाथों में शिकायत की तख्तियाँ लेकर राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर चक्काजाम करने को विवश हैं [00:31]।

इन बच्चों के सवाल बेहद सादे लेकिन पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने वाले हैं:

 “हमें हॉस्टलों में कीड़े लगा और घटिया खाना क्यों दिया जाता है?” [00:57]

 “पीने के लिए दूषित पानी क्यों मिलता है?” [01:08]

 “आवाज उठाने पर हमारे परिजनों को क्यों धमकाया जाता है?” [01:17]

 “सड़कें जर्जर क्यों हैं और घटिया साइकिलों के नाम पर यह कैसा खेल चल रहा है?” [01:30]

इनमें से अधिकांश छात्र आदिवासी, दलित और पिछड़े वर्गों से आते हैं [01:39]। जिस वर्ग के कल्याण और सामाजिक उत्थान के नाम पर राज्य और केंद्र सरकारें हर साल अरबों-खरबों रुपये के बजटीय आवंटन का दावा करती हैं [02:02], उसी वर्ग के बच्चों को न्यूनतम रोटी, कपड़ा और स्वच्छ पानी के लिए अपना भविष्य दांव पर लगाना पड़ रहा है।

आंकड़ों की जुबानी: प्रशासनिक संवेदनहीनता का रिपोर्ट कार्ड

यदि जुलाई में नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत से लेकर अब तक की स्थिति पर नजर डालें, तो राज्य के विभिन्न हिस्सों में स्कूली बच्चे 39 से अधिक बार अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर चुके हैं [02:24]।

उदाहरणात्मक रूप से, कोरबा जिले के छुरी स्थित एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूल के 300 छात्र अगस्त माह के दौरान तीन-तीन बार प्रशासनिक उपेक्षा से तंग आकर सड़कों पर बैठे [02:47]।

जब भी बच्चे चक्काजाम करते हैं, तो अमूमन यह घटनाक्रम देखने को मिलता है:

1. आश्वासन का दोहराव: ट्राइबल वेलफेयर विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, पुलिस बल और स्थानीय प्रशासनिक अमला मौके पर पहुँचता है [03:08]।

2. कागजी दिलासा: बच्चों को जल्द कार्रवाई और सुधार का आश्वासन देकर धरना समाप्त कराया जाता है [03:18]।

3. वही ढाक के तीन पात: हफ्ते-दो हफ्ते बीतने के बाद स्थिति पुनः वैसी ही हो जाती है, और सुधार के नाम पर केवल नोटिसबाजी सिमट कर रह जाती है [03:45]।

प्रशासनिक अधिकारी यह जवाब देने में असमर्थ नजर आते हैं कि यदि यही स्थितियां किसी उच्च प्रशासनिक अधिकारी या जनप्रतिनिधि के बच्चों के हॉस्टल में होतीं, तो क्या सुधार की गति यही रहती? [04:14]

नीतिगत विरोधाभास: बजट का भारी आवंटन, मगर धरातल शून्य

छत्तीसगढ़ का यह समकालीन परिदृश्य राजनीति और सामाजिक न्याय के दावों के बीच एक बड़े विरोधाभास को रेखांकित करता है [04:32]। आदिवासी बहुल राज्य में शीर्ष प्रशासनिक और विभागीय दायित्वों पर इस वर्ग के प्रतिनिधियों की मौजूदगी के बावजूद [04:43], धरातल पर क्रियान्वयन की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है।

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर गड़बड़ी कहाँ है?

 ठेकेदारी व सप्लाई तंत्र: क्या हॉस्टलों में घटिया राशन, जर्जर भवन और घटिया गुणवत्ता की सामग्री की आपूर्ति केवल निचले स्तर के ठेकेदारों की मिलीभगत है, या यह तंत्र ऊपर तक फैला हुआ है? [05:16]

 जिला प्रशासन की निगरानी: जिले के प्रशासनिक प्रमुख (कलेक्टर) और विभागीय उप-आयुक्तों की नियमित निरीक्षण प्रणाली कहाँ सुप्त पड़ी है? [05:37]

 संसाधनों का विचलन: शिक्षकों की भारी कमी के बावजूद सैकड़ों शिक्षकों को शैक्षणिक कार्यों के बजाय कलेक्टोरेट और अन्य प्रशासनिक दफ्तरों में संलग्न (अटैच) करके रखा गया है [07:21]।

युक्तीकरण (Rationalization) और व्यवस्था सुधार के नाम पर दर्जनों प्राथमिक व माध्यमिक शालाओं के समायोजन या बंद होने से ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी शिक्षा की पहुँच और कठिन हो गई है [07:46]।

भविष्य की चुनौती: जन-आक्रोश का नया केंद्र

हॉस्टलों और स्कूलों की यह अव्यवस्था केवल कमरों की दीवारों तक सीमित नहीं है। खराब सड़कों के कारण होने वाली दुर्घटनाएं, समय पर गणवेश व पाठ्यपुस्तकों का न मिलना और शिकायत करने पर मिलने वाली धमकियाँ अब इन छात्रों के बीच गहरे असंतोष का रूप ले रही हैं [06:46]।

यह स्थिति केवल प्रशासनिक ढिलाई नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन के प्रति आम जन और नई पीढ़ी के घटते विश्वास का संकेत है [06:00]। यदि समय रहते इन नौनिहालों की बुनियादी आवश्यकताओं, शैक्षणिक माहौल और हॉस्टलों के भोजन-पानी की गुणवत्ता में ठोस व स्थायी सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में यह शांतिपूर्ण विरोध एक व्यापक सामाजिक आंदोलन का रूप ले सकता है [08:03]।

छत्तीसगढ़ के नीति-निर्धारकों के सामने आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है: क्या राज्य का विकास केवल आंकड़ों की बाजीगरी में दिखाई देगा या उन दूरस्थ अंचलों के हॉस्टलों में भी पहुँचेगा जहाँ का बचपन आज सड़क पर न्याय मांग रहा है?

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बुधवार, 2 सितंबर 2026

छत्तीसगढ़ में टैक्स का फरमान और गहराता सियासत का चक्रव्यूह

 छत्तीसगढ़ में टैक्स का फरमान और गहराता सियासत का चक्रव्यूह


महतारी वंदन और धान खरीदी की राहत के बीच 'संपदा ऐप' और भवन कर का झटका: क्या पंचायतों की आत्मनिर्भरता का बोझ गरीबों की जेब पर भारी पड़ रहा है?

रिपोर्ट: विशेष मैगज़ीन कवरेज

स्थान: रायपुर / भरतपुर (छत्तीसगढ़)

1. एक तुगलकी चिट्ठी और 24 घंटे का अल्टीमेटम

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में उस समय अचानक खलबली मच गई, जब भरतपुर जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) की ओर से जारी एक पत्र सार्वजनिक हुआ [00:54]। 1 जुलाई 2026 को जारी इस सरकारी फरमान का विषय था—'समर्थ पंचायत पोर्टल' और 'संपदा ऐप' में एंट्री [02:28]।

इस आदेश के प्रमुख अंशों ने प्रशासनिक हलकों से लेकर गांवों की चौपालों तक हलचल मचा दी:

 हर घर पर समान टैक्स: समर्थ पोर्टल पर प्रॉपर्टी रजिस्टर बनाकर प्रत्येक योग्य परिवार से न्यूनतम ₹100 प्रति माह (या ₹1200 वार्षिक) भवन कर वसूलने और एंट्री करने का निर्देश दिया गया [03:07]।

 24 घंटे की डेडलाइन: पंचायत सचिवों को इस पूरी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए केवल 24 घंटे का समय दिया गया [03:17]।

 वेतन रोकने की चेतावनी: समय सीमा के भीतर 100% रिकवरी और एंट्री न होने पर 'सिविल सेवा आचरण नियम 1965' के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई और सचिवों का वेतन रोकने का अल्टीमेटम दिया गया [03:30]।

जैसे ही यह चिट्ठी सार्वजनिक हुई, सवाल उठने लगे कि क्या पक्के मकान में रहने वाले और मिट्टी-झोपड़ी में जीवन बसर करने वाले गरीब, दोनों को एक ही तराजू में तौलकर ₹1200 सालाना वसूलना जायज है [02:01]?

2. विपक्ष का करारा हमला: टी.एस. सिंहदेव और कांग्रेस के तीखे सवाल

इस फरमान के सामने आते ही राज्य की राजनीति गरमा गई। पूर्व उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव (टी.एस. बाबा) ने सरकार के इस कदम पर तीखा प्रहार किया [01:10]।

छत्तीसगढ़ सरकार एक ओर जनोन्मुखी होने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर अधिकारियों के जरिए 24 घंटे के अंदर गरीबों के घरों पर टैक्स थोप रही है। ग्राम सभाओं पर दबाव बनाया जा रहा है कि यदि वे यह टैक्स स्वीकार नहीं करेंगे तो उन्हें विकास कार्यों का पैसा नहीं मिलेगा। महतारी वंदन योजना में ₹1000 देकर दूसरी तरफ से ₹1200 वापस लेना कौन सी कल्याणकारी नीति है?" — टी.एस. सिंहदेव

सिंहदेव ने आरोप लगाया कि बढ़ती महंगाई, खाद की बढ़ती दरों और आपूर्ति में किल्लत के बीच ग्रामीणों पर यह नया बोझ डालना अत्यंत दुखद है [04:50]।

3. नीति बनाम ज़मीनी हकीकत: OSR (ऑन सोर्स रेवेन्यू) का पेच

पंचायती राज अधिनियम और केंद्र सरकार की OSR (Own Source Revenue - ऑन सोर्स रेवेन्यू) नीति का मूल उद्देश्य पंचायतों को वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनाना है [05:09]। लेकिन नियम यह भी कहते हैं कि टैक्स निर्धारण में विषमता नहीं होनी चाहिए—कच्चे और पक्के मकानों का मूल्यांकन अलग-अलग होना चाहिए [05:39]।

भरतपुर जनपद के इस फैसले में मापदंडों की इसी अनदेखी ने बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ सरकार महतारी वंदन योजना और ₹3100 प्रति क्विंटल धान खरीदी जैसी योजनाओं का श्रेय ले रही है, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण व्यवस्था में इस तरह की टैक्स रिकवरी से जनता में असंतोष की लहर है [00:28]।

4. स्मार्ट मीटर पर श्रेय और विवाद का नया मोर्चा

प्रॉपर्टी टैक्स विवाद के साथ-साथ प्रदेश में स्मार्ट मीटर को लेकर भी सियासत चरम पर है [00:07]। सत्तारूढ़ दल और विपक्ष एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं।

 विपक्ष का दावा: कांग्रेस नेताओं का स्पष्ट कहना है कि उनके कार्यकाल में एक भी स्मार्ट मीटर नहीं लगाया गया था। उस समय केवल केंद्रीय दिशा-निर्देशों का परीक्षण हुआ था [06:34]।

 टेंडर और अनुबंध पर चुनौती: विपक्ष ने सरकार को खुली चुनौती दी है कि स्मार्ट मीटर के टेंडर, अनुबंध और निजी कंपनियों को दिए गए काम की तारीखों को सार्वजनिक किया जाए, ताकि जनता के सामने सच आ सके कि स्मार्ट मीटर का बोझ किसने डाला [07:07], [07:27]।

5. निष्कर्ष: कल्याणकारी योजनाएं या वित्तीय भरपाई?

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में उठ रहा यह असंतोष आने वाले दिनों में सरकार के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकता है। एक तरफ जहां ग्रामीण जनता स्मार्ट मीटर के बिजली बिलों और महंगाई की मार झेल रही है [00:07], वहीं ₹100 प्रतिमाह का यह भवन कर उनके बजट को और बिगाड़ सकता है।

क्या सरकार इस फरमान को वापस लेगी, या पंचायतों की आत्मनिर्भरता का यह मॉडल ग्रामीण सियासत को और गरमाएगा? यह देखना आने वाले दिनों में दिलचस्प होगा।

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