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रविवार, 3 अगस्त 2025

पर उपदेश कुशल बहुतेरे…

 पर उपदेश कुशल बहुतेरे… 


पर उपदेश कुशल बहुतेरे । जे आचरहिं ते नर न घनेरे ।। — गोस्वामी तुलसीदास जी ने यह बात कही थी जिसका अर्थ है दूसरों को उपदेश देना तो बहुत आसान है लेकिन स्वयं उन उपदेशों पर अमल करना बेहद कठिन है, लेकिन इन बातों को याद करने का मतलब मोदी के दौर में इसलिए बेमानी हैं क्योंकि पिछले दस सालों से जो सरकार कारपोरेट के आसरे  विदेशी पूँजी और विदेशी सामनों से इस देश को अपने अनुकूल करने में लगा था जिसने नफ़रत का बाज़ार तैयार कर देश को ही नहीं संसद जैसे पवित्र स्थान में वैमनस्यता की दीवार खड़ी कर दी उसे अचानक हिंदुस्तानियों का पसीना कैसे याद आया , हालाँकि यह देर आये वाली कहावत मान ख़ुशी मनाई जा सकती है लेकिन पिछले ११ सालों की नौटंकी को देखते हुए या संघ की नीति को समझते हुए इस पसीने  की बात पर विश्वास करना मुश्किल है, संसद  कैसे बदल गया और पर उपदेश की कहावत को सरल भाषा में समझिये…

कुछ लोग बोल रहे हैं कि

मोदी जी जर्मनी का मांटब्लैक पेन, इटली का बना मैबैक चश्मा, स्विट्जरलैंड की बनी रोलेक्स घड़ी, अमेरिका में बना आइफोन, जर्मनी की बनी बीएमडब्लू कार, अमेरिका में बना बोईंग हवाईजहाज इस्तेमाल करते है । 

उनको मैं बोलना चाहूंगा कि मोदी जी देश हित मे विदेशी ब्रांडेड सामान उपयोग करते हैं । अरे देश को विदेशी निवेश भी तो चाहिये । अगर कोई विदेशी सामान यूज ही नही करेगा तो दूसरे देश हमारे देश मे निवेश क्यों करेंगे ? 

इसीलिये मोदी जी को विदेशी सामान यूज करने दीजिए । 

स्वदेशी को अपनाने की जिम्मेदारी आपकी और हमारी है । 

अब 11 साल पहले के संसद पर बात करें उससे पहले इस खबर पर…


जिस कुर्सी पर बैठने का अधिकार मुझे मिला है उस कुर्सी पर मै अपने किसी भी खून के रिश्ते को बैठने की इजाज़त दूंगा। ये एक इमोशनल हिस्सा है किसी भी कामयाब इंसान के जिंदगी का।

अगर उस थाना प्रभारी ने अपने खून के रिश्ते को अपनी ही कुर्सी पर बैठा लिया तो कौन सी बड़ी बात हो गई? रिश्वत लेकर कुर्सी का ईमान बेचने से क्या नियम नहीं टूटता?

अब संसद पर…

सन दौ हज़ार के आसपास संसद मैदान का माहौल खुशनुमा होता था । हँसी मज़ाक संजीदगी मुद्दे पे बात तर्क वितर्क सब था । वाजपई जी मुल्क के मुख्या थे, संजीदा आदमी थे लेकिन हर माहौल के हिसाब से सेट हो जाते थे । लालू प्रसाद यादव उसे वक़्त सबसे ताकतवर बोलकार थे, बोलने में माहिर थे दलील देना जानते थे सीधा मुद्दे पर बोलते थे, कभी कभी अपनी ज़बान से वो माहौल तब्दील कर देते थे, तरफ़दार और विरोधी खेमा दोनों लालू जी की बातों पर ठहाका लगा देता था, लालू जी का हुकूमत पर हसमुख हमला वाजपई जी को गुदगुदा देता था, वाजपई जी खुलकर हँसते थे, उनके ठीक पीछे उस वक़्त देश की रक्षा के ज़िम्मेदार जॉर्ज फ़र्नान्डिस भी लालू जी के तर्क पर मासूमाना हँसी हँसते थे, फ़र्नान्डिस लालू जी के सियासी गुरु रहे । उस दौर में हुकूमत के जितने बड़े रहे सब पर लालू जी के लफ्ज़ो का असर था, संजीदगी हँसना हँसाना तर्क वितर्क सब था, सख्त कोई नहीं था आज बीस बरस बाद मुल्क के संसद भवन के हालात बिलकुल बदल गए हैं , अब हुकूमत से सवाल पूछने पर जवाब मांगने पर गालियाँ दे दी जाती हैं, बुरे लफ्ज़ कहे जाते हैं पिछले बरस रमेश बिधूड़ी ने हदे लांग दी थी, कल भी जब संसद भवन में बहस हुई सिर्फ हाथापाई की कमी रही, बाकी सब हो गया, मुल्क के सबसे मज़बूत किले का एहतराम और तहज़ीब बिलकुल ख़त्म हो गयी है, क़सूरवार सब भवन में बैठे हैं, पक्ष विपक्ष सब ज़िम्मेदार हैं मुल्क को लेकर कोई संजीदा नहीं है कोई समझदार नहीं है । इस दौर की संसद भवन में बदज़ुबानी सुनकर थक गए हैं तो बीस बरस पहले की बहस यूट्यूब पर देख लीजिये, सवाल जवाब सब होते थे लेकिन किसी को शर्मिंदा नहीं किया जाता था, एहतराम था, ख़िलाफ़ होते हुए एक दूसरे की इज़्ज़त थी । आज कल तो संसद भवन में पगड़ियाँ उछाल दी जाती हैं । (साभार)

गुरुवार, 31 जुलाई 2025

महाभियोग-दो जज, दो नीति…

महाभियोग-दो जज, दो नीति…


ग़ज़ब देश है और अजब सत्ता, वैसे भी यह बात घर कर गई है कि क़ानून सिर्फ़ कमज़ोर लोगो के लिये है , पैसा और पहुँच वालों ने क़ानून को किस तरह अपनी जूती का खाल बनाया है यह किसी से छिपा नहीं है , ऐसे में जज द्वय शेखर यादव और यशवंत वर्मा पर चलाये जाने वाले महाभियोग भी क्या पहुँच के आगे घुटने पर आ जाएगा…

दो जज साहिबान हैं जिन पर विपक्ष ने महाभियोग चलाने के लिए मुहीम चलाई है। एक जज हैं यशवंत वर्मा जी, जिन पर भ्रष्टाचार के मामले मे महाभियोग लगाने के लिए आवेदन किया गया है। दूसरे जज हैं शेखर यादव जी, जिन पर विश्व हिन्दू परिषद की सभा में नफ़रती बयान बाज़ी का आरोप है। 


अब सरकार जस्टिस वर्मा जी के विरूद्ध तो कार्रवाई करने की बात तो कर रही है लेकिन जस्टिस यादव जी के मामले में ख़ामोशी अख्तियार किये हुए है। इन दोनों जजों के विरूद्ध एकसाथ कार्रवाई की जानी चाहिए। 


कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने दिनांक 21-07-2025 को जस्टिस वर्मा के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए 63 राज्य सभा सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित आवेदन किया था। वहीं जस्टिस यादव के विरूद्ध 152 लोक सभा सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित आवेदन पत्र  दिया था।


जब पूर्व राज्यसभा के सभापति धनखड़ इन महाभियोग पत्र पर बोल रहे थे तब वह स्पष्ट रूप से कह रहे थे कि पर्याप्त संख्या में सदस्यों ने हस्ताक्षरित आवेदन पत्र लिखकर दिये हैं। पार्लियामेंट के एक्ट अनुसार यदि इस तरह से दो आवेदन पत्र दिए जाते हैं तो इसे दोनों सदनों में संयुक्त रूप से देखा जाएगा। इन दोनों आवेदन पत्रों को हाऊस की संपत्ति माना जायेगा।


लेकिन सरकार अब इन आवेदन पत्रों पर कार्रवाई करने से हिचकिचाहट दिखा रही है। इससे सरकार की दोमुंही नीति सामने आ रही है और वह विपक्ष के साथ सहयोग नहीं कर रही है।

गुरुवार, 5 जून 2025

संसद का विशेष सत्र बुलाने से डरी मोदी सत्ता…

 संसद का विशेष सत्र बुलाने से डर गई मोदी सरकार…


ढाई सौ सांसदों ने जब मोदी सरकार को संसद का विशेष सत्र बुलाने की माँग लिखित में की तो सरकार ने साफ़ मना कर दिया, क्यों? सरकार का यह फ़ैसला इसलिए चौंकाने वाला है क्योंकि परिस्थितियाँ सामान्य नहीं है, आतंकवादी अभी भी नहीं पकड़े गये है, सीजफ़ायर क्यों और कैसे हुआ, भारत की कूटनीति इतनी कमजोर क्यों, और सबसे बड़ा सवाल राफ़ेल को लेकर है। तब सत्र नहीं बुलाने को लेकर विश्लेषण ज़रूरी हो जाता है…



पहलगाम के बाद सीजफ़ायर को लेकर  ट्रंप के मुद्दे पर सरकार बुरी तरह घिर गई है! अमेरिकन मध्यस्थता  को लेकर ट्रंप के लगातार बयानों से सरकार बैक फुट पर है! और इसका जवाब सरकार के पास नहीं है !क्योंकि आधिकारिक रूप से सीज फायर की घोषणा होने के पहले टेंप ने यह घोषणा कर दी थी, अगर इसे स्वीकार किया जाता है तो राहुल गांधी का वह नॉरेटिव भारतीय जनता पार्टी और मोदी जी की सरकार के आभा मंडल को धूमिल कर देगा क्योंकि फिर पूरे देश में गूंजेगा

,फ़ोन  आया, नरेंद्रर , हो गये  सरेंडर 

शायद सरकार इस बात से भी भयभीत है की संसद में बहुत सारे सवाल पूछे जाएंगे और यदि उनके जवाब टाले या गलत जवाब दिए गए और वह सिद्ध हो गए तो पूरे देश में सरकार की बड़ी थू  थू होगी!

कुछ तथ्य तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया के द्वारा जाहिर कर दिए जाने की वजह से चर्चा में है लेकिन ऐसा माना जाता है कुछ तथ्य अभी भी ऐसे हैं जिन्हें सरकार बताना नहीं चाहती और ससद बुलाने के बाद उन पर चर्चा होना अनिवार्य हो जाएगा!

और वह सब सरकार का नॉरेटिव खराब करेगी दरअसल पहलगाम के बाद इस सीमित स्ट्राइक के बाद सरकार एक राष्ट्रवाद का मुद्दा पूरे देश में भुनाना चाहती थी,

पुलवामा के विपरीत इस बार सरकार कामयाब नहीं हो सकी! कुछ स्थितियां ऐसी बनी  जो सरकार के विश्लेषण के बाहर थी! प्लान  असफल हो गया! 

इस योजना के तहत ही इस विवादास्पद स्ट्राइक के बाद मोदी जी प्रदेश प्रदेश स्वयं की पीठ थपथपाने लगे और राष्ट्रवाद का माहौल बनाने लगे लेकिन जिस तरह सारे देश ने घर-घर सिंदूर योजना पर रिएक्ट किया जिस तरह भारतीय जनता पार्टी की तिरंगा यात्राओं को समर्थन नहीं मिला और मोदी जी की सभाओं के बाद भी राष्ट्रवाद का यूफोरिया नहीं बना, तो सरकार को लगने लगा यह *मुद्दा बैकफायर* कर रहा है !

मोदी जी के एजेंडे में ना देश की विदेश नीति थी ना देश की कूटनीति थी ना देश की अर्थव्यवस्था थी और संसद  बुलाने के बाद इन 12 सालों में यह पहली बार था जब उन्हें जवाब देना पड़ता  इन सारी असफलताओं का जिन्हें अक्सर वह आपदा में अवसर की बात से खारिज करते हैं!

  मोदी जी की एक शैली है आम आदमी से कनेक्ट करने की जिसमें वह पूरी तरह से कामयाब रहे लेकिन वर्तमान संदर्भ इस आभामंडल को भी अपने नॉरेटिव से प्रभावित करते हुए नजर आ रहे हैं! 

जो एक भ्रामक इमेज अपने खरीदे हुए मीडिया से मोदी जी भारत की बनाना चाहते थे उसका कितना दुष्प्रभाव पड़ा है एक आभासी इंफ्रास्ट्रक्चर की बात पूरे विश्व में की गई एक आभासी अर्थव्यवस्था के नाम पर हिंदुस्तान के उत्कृष्टता  की बात पूरे विश्व में की गई , जबकि स्थितियां देश में अनुकूल नहीं थी बेरोजगारी बढ़ रही थी महंगाई बढ़ रही थी रुपया गिर रहा था मुद्रास्फीति बढ़ रही थी लेकिन बात चौथी इकोनॉमी की जाती थी, विश्व गुरु की की जाती थी, तेजी से विकसित होते एक आधुनिक भारत की बात की जाती थी लेकिन जहां आज भी तकनीक के लिए दूसरे देशों पर निर्भर करना पड़ता है! और इसी भ्रामक इमेज की वजह से भारत विश्व राजनीति का शिकार हो गया क्योंकि पूरी विश्व राजनीति इस समय व्यापार पर आधारित है? और संपन्न राष्ट्र किसी और को अपने बराबर देखना पसंद नहीं करते इसलिए आज भारत चीन की भी आंख की किरकिरी है अमेरिका की भी, और रूस ने भी उसे एक सम्मानजनक दूरी बना रखी है! और वहीं पाकिस्तान को अमेरिका भी आशीर्वाद दे रहा है और चीन भी दूध पिला रहा है!


ससद बुलाने के बाद यह *आभासी इमेज* दरक कर गिर जाती, उनका जो वास्तविक चित्र है इस आभासी इमेज के आगे बहुत छोटा पड़ जाता और शायद सत्ताधारी दल यह नहीं चाहता था इसलिए सवालों से बचने के लिए उसने संसद बुलाना उचित नहीं समझा!

सत्ताधारी दल बिहार चुनाव तक स्थितियों की अनुकूलता चाहता था वह नहीं चाहता था कि देश की मानसिकता किसी नए नॉरेटिव की ओर आगे बढ़ने लगे, 

क्योंकि संसद में

 *सामाजिक जनगणना* को लेकर भी सवाल किए जाते !

चुनाव के पहले सरकार इनसे बचाना चाहती थी! वह नया नॉरेटिव बनाने की कोशिश करेगी ससद बुलाने के पहले बच्चे हुए दिनों में नॉरेटिव को अपना अनुकूल बनाने के लिए! 

और इस सबके अलावा सबसे बड़ा सवाल होगा राफ़ेल पर।राफेल इस पूरी स्ट्राइक में विवादास्पद रहा है लेकिन जिस तरह कांग्रेस सरकार का सौदा खारिज कर कर मोदी जी की सरकार ने ऊंचे दामों पर राफेल का सौदा किया था लेकिन उसके बावजूद तकनीकी स्थानांतरण की सहमति नहीं ली गई थी और उसके बाद जब अभी इतनी विपरीत परिस्थिति में भी एसॉल्ट कंपनी ने राफेल का सोर्स कोड देने से भारत को इनकार कर दिया और भारत के राफेल का गिरना न गिरना सिर्फ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बल्कि भारत में भी चर्चित रहा उसके बाद सरकार को यह भी लगता था यदि संसद बुलाई गई तो उसके ईमानदार चेहरे को भी वैसे तो वह बचा नहीं है लेकिन शीर्ष पर भी आरोपों की बौछार की जाएगी इन स्थितियों में तोउसका बचना बहुत मुश्किल हो जाता!

ऐसी परिस्थिति में सत्ता ने सत्र से भाग जाने के निर्णय को उचित समझा।(साभार)



शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2021

जब पवित्र मान लिया...

 

हमने पहले ही कहा है कि सिर्फ जबानी जमा-खर्च से काम नहीं चलने वाला है। सत्ता को जन सरोकार से मतलब होना चाहिए लेकिन जब से मोदी सत्ता आई है भाजपाईयों के तेवर जनआंदोलन के खिलाफ हैरान कर देने वाला है। आंदोलनकारियों को देशद्रोह, दुश्मन और पता नहीं किस किस तरह की गालियों से नवाजा जाता है। जिसे हम यहां लिखने में भी शर्म महसूस करते हैं।

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस किसान आंदोलन को पवित्र कहा है उसके बाद  यह सवाल उठना चाहिए कि आखिर आंदोलन जब पवित्र है तो उनकी मांगे मानने में सरकार को दिक्कत क्या है? आंदोलन पवित्र है तो फिर बार्डर पर दुश्मनों जैसा व्यवहार करते हुए किले, खाई, क्यों खोदी गई, पानी-बिजली की सप्लाई क्यों रोकी गई। और इन सबसे भी बड़ा सवाल है कि भाजपा के पदाधिकारी से लेकर कई कार्यकर्ता उन्हें देशद्रोह आतंकवादी नक्सली किस बिना पर बोल गये? खुद प्रधानमंत्री ने आंदोलनजीवी-परजीवी जैसी भाषा कैसे बोल गये?

क्या यह सच नहीं है कि प्रधानमंत्री के परजीवी वाली भाषण की जब चौतरफा प्रतिक्रिया हुई तो वे आंदोलन को पवित्र कह गये! दरअसल यह तीनों कानून ही किसानों की बजाय पूंजीपतियों का संरक्षण अधिक करता है। असीमित भंडारण से तो आम आदमी का बुरा  हाल होगा ही खुद मोदी सत्ता ने कालाबाजारी और जमाखोरी को संरक्षण दे दिया है। 

ऐसे में सवाल कई है लेकिन सरकार सवालों की जवाबदेह से बचकर दूसरी ही बात कह रही है तब किसानों के पास आंदोलन को विस्तार देने के अलावा क्या रास्ता रह जाता है। और आंदोलन से कोई सत्ता कब तक बची रह सकती है।

आंदोलन पवित्र था है और रहेगा।

अंत में-

पवित्रता...

हल चलाने से

लेकर बीज डालने

रोपा से लेकर

निदोई करने

में लगा किसान

प्रेम और करुणआ

का सागर होता है

रोज वह फसल

के लिए दुआ

मांगता है

अपने ईश्वर से

बिल्कुल निर्भाव

पवित्र

फिर उस फसल

की कीमत

उस खेत को बचाने

की लडाई

कैसे गलत हो गया

वह भी पवित्र है पवित्र!

बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

हजारों तरह के आंसू...

 

आंसूओं को लेकर शायरों और कवियों ने जो बातें और जितनी भी बातें कहीं है उससे इतर भी कोई बात होगी या नहीं कहना कठिन हैं। लेकिन गुलाम नबी आजाद निश्चित रुप से उस तरह के राजनेता है जिन्हें आसानी से भूला देना मुश्किल है।

छत्तीसगढ़ में राज्य गठन के दौरान जब वे पर्यवेक्षक बनकर आये तो उनके ही सामने मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की कथित रुप से पिटाई हुई। लेकिन उन्होंने न तब अपने ताकत का इस्तेमाल किया न कभी भी उनके बारे में यह बात सुनने को नहीं मिली कि कांग्रेस हाईकमान तक अपनी पहुंच का कभी उन्होंने बेजा इस्तेमाल किया । कश्मीर के इस नेता ने हमेशा ही देश हित को लेकर काम किया और आज राज्य सभा से उनकी विदाई पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी बोलते-बोलते जब भावुक हो गये तो सहसा कई सवाल मन में उठने लगे।

वर्तमान नफरत के दौर में यह सवाल उठना स्वाभाविक भी था। जिन लोगाों के लिए हिन्दू राष्ट्र के अलावा कोई स्वीकार्य ही नहीं है और जो लोग मुसलमानों को इस देश का दुश्मन समझते हुए विषवमन करते रहते हैं उनके लिए प्रधानमंत्री मोदी का गुलाम नबी आजाद के प्रति स्नेह की क्या प्रतिक्रिया हुई होगी यह बताने की जरूरत नहीं हैं। क्योंकि जब किसी के दिल में सांप रेंगता है तो उसके मुंह से जबान चली जाती है।

ये देश गंगा-जमुना तहजीब का है, इस देश की आजादी में हर धर्म और हर जाति ने अपनी कुर्बानी दी है और आजादी के बाद उत्पन्न हर विषम परिस्थितियों का कंधे से कंधा लगाकर मुकाबला किया है लेकिन 2014 में जिस ढंग का अवतार हुआ हालांकि उसका बीज 2002 में ही लगाया जा चुका था, उस अवतार ने इस देश में नफरत की ऐसी आंधी चलाई है कि पूरा एक वर्ग हाशिये पे डाल दिया गया। नफरत के इस दौर में सत्ता भी वही फैसला करते रही ताकि सत्ता के लिए हथियार जुटाये जा सके लेकिन इसका दुष्परिणाम क्या हुआ। हम आर्थिक रुप से टूट गये, युवाओं के पास रोजगार खत्म हो गया, बढ़ती मंहगाई ने जीना दूभर कर दिया लेकिन राष्ट्रवाद और हिन्दूवाद के झांडे का छाया इतना गहरा रहा कि इस देश की भलाई किसमें है यह दिखना ही बंद हो गया।

क्या यह भावुक क्षण यह इशारा नहीं करता कि देश को जितनी जरूरत हिन्दुओं की है उतनी ही जरूरत मुसलमानों या दूसरे धर्म के लोगों की भी है। क्या ये आंसू उन भक्तों को भी दिखावा लगेगा जो अपने दिल में नफरत की आग लेकर चल रहे हैं या इस आंसू के बाद कथित अवतारी में इतना साहस होगा कि वह अनेकता में एकता के लिए मार्ग प्रशस्त करे।

सवाल कई हैं, लेकिन सत्ता की घिनौनी राजनीति ने जिस, बीज को बोया है उसे पेड़ बनने से रोकना ही होगा। वरना प्रधानमंत्री के आंसू पर सवाल उठने से कोई कैसे रोक सकता है!

आंसूओं को लेकर शायरों और कवियों ने जो बातें और जितनी भी बातें कहीं है उससे इतर भी कोई बात होगी या नहीं कहना कठिन हैं। लेकिन गुलाम नबी आजाद निश्चित रुप से उस तरह के राजनेता है जिन्हें आसानी से भूला देना मुश्किल है।

छत्तीसगढ़ में राज्य गठन के दौरान जब वे पर्यवेक्षक बनकर आये तो उनके ही सामने मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की कथित रुप से पिटाई हुई। लेकिन उन्होंने न तब अपने ताकत का इस्तेमाल किया न कभी भी उनके बारे में यह बात सुनने को नहीं मिली कि कांग्रेस हाईकमान तक अपनी पहुंच का कभी उन्होंने बेजा इस्तेमाल किया । कश्मीर के इस नेता ने हमेशा ही देश हित को लेकर काम किया और आज राज्य सभा से उनकी विदाई पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी बोलते-बोलते जब भावुक हो गये तो सहसा कई सवाल मन में उठने लगे।

वर्तमान नफरत के दौर में यह सवाल उठना स्वाभाविक भी था। जिन लोगाों के लिए हिन्दू राष्ट्र के अलावा कोई स्वीकार्य ही नहीं है और जो लोग मुसलमानों को इस देश का दुश्मन समझते हुए विषवमन करते रहते हैं उनके लिए प्रधानमंत्री मोदी का गुलाम नबी आजाद के प्रति स्नेह की क्या प्रतिक्रिया हुई होगी यह बताने की जरूरत नहीं हैं। क्योंकि जब किसी के दिल में सांप रेंगता है तो उसके मुंह से जबान चली जाती है।

ये देश गंगा-जमुना तहजीब का है, इस देश की आजादी में हर धर्म और हर जाति ने अपनी कुर्बानी दी है और आजादी के बाद उत्पन्न हर विषम परिस्थितियों का कंधे से कंधा लगाकर मुकाबला किया है लेकिन 2014 में जिस ढंग का अवतार हुआ हालांकि उसका बीज 2002 में ही लगाया जा चुका था, उस अवतार ने इस देश में नफरत की ऐसी आंधी चलाई है कि पूरा एक वर्ग हाशिये पे डाल दिया गया। नफरत के इस दौर में सत्ता भी वही फैसला करते रही ताकि सत्ता के लिए हथियार जुटाये जा सके लेकिन इसका दुष्परिणाम क्या हुआ। हम आर्थिक रुप से टूट गये, युवाओं के पास रोजगार खत्म हो गया, बढ़ती मंहगाई ने जीना दूभर कर दिया लेकिन राष्ट्रवाद और हिन्दूवाद के झांडे का छाया इतना गहरा रहा कि इस देश की भलाई किसमें है यह दिखना ही बंद हो गया।

क्या यह भावुक क्षण यह इशारा नहीं करता कि देश को जितनी जरूरत हिन्दुओं की है उतनी ही जरूरत मुसलमानों या दूसरे धर्म के लोगों की भी है। क्या ये आंसू उन भक्तों को भी दिखावा लगेगा जो अपने दिल में नफरत की आग लेकर चल रहे हैं या इस आंसू के बाद कथित अवतारी में इतना साहस होगा कि वह अनेकता में एकता के लिए मार्ग प्रशस्त करे।

सवाल कई हैं, लेकिन सत्ता की घिनौनी राजनीति ने जिस, बीज को बोया है उसे पेड़ बनने से रोकना ही होगा। वरना प्रधानमंत्री के आंसू पर सवाल उठने से कोई कैसे रोक सकता है!

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2021

मन की बात...


क्या हम सचमुच उस दौर में जी रहे हैं जहां नेता को कोई काम करना आता हो या न आता हो बोलना आना चाहिए और जो अपनी बातों से मोह ले वही राज करेगा? यह सवाल इसलिए उठाये जा रहे हैं क्योंकि संसद में किसान आंदोलन को लेकर जिस तरह की बातें हुई उसके बाद तो इस बात का कोई मतलब ही नहीं रह जाता कि किसान आखिर आंदोलन क्यों कर रहे हैं और न ही इस बात का मतलब ही रह गया है कि राष्ट्रवाद और हिन्दूवाद से इतर भी इस देश के लोगों की अपनी जरूरतें हैं।

पूरी दुनिया का आप आकलन कर ले ऐसा आंदोलन कहीं नहीं मिलेगा जहां दो दर्जन से अधिक आंदोलनकारी किसानों ने खुदकुशी की हो और आंदोलन के दौरान करीब दो सौ किसानों की जान चली गई हो लेकिन जब सत्ता यह कहे कि इस आंदोलन का कोई मतलब नहीं है और प्रधानमंत्री जब कहते हैं कि किसान सिर्फ आंदोलन करने के लिए आंदोलन कर रहे हैं तो इसका क्या मतलब है?

क्या इस बात को नजरअंदाज कर देनी चाहिए कि सभी राज्यों में किसानों की उपज की खरीदी किस तरह से न्यूनतम दर पर हो रही है। या हम प्रधानमंत्री की बात को मान ले कि एमएसपी बंद नहींं होगी?

ऐसे में क्या इस बात का आकलन नहीं होना चाहिए कि क्या किसानों की उपज की कितनी फसल एमएसपी पर खरीदी जा रही है और कितने व्यापारी एमएसपी पर खरीदी कर रहे हैं लेकिन जब पूरे देश को राष्ट्रवाद और हिन्दूवाद की लाठी से हांका जा सकता है तब इस बात से सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता कि गैस बिजली पेट्रोल की कीमत कितनी बढ़ रही है और न ही इस बात का ही फर्क पड़ता है कि राशन की कीमत कितनी बढ़ रही है!

ऐसे में फिर सवाल यह उठता है कि क्या जो महंगाई या अपनी दूसरी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं उनके लिए नया रास्ता क्या है क्योंकि किसानों की बढ़ती मौत के आंकड़े भी जब सत्ता को न डिगा सके तो दूसरा उपाय क्या होना चाहिए?

सबसे बड़ी दिक्कत तो यह है कि किसानों के आंदोलन को लेकर विपक्षी दलों की भूमिका भी स्पष्ट नहीं है और कार्पोरेट जगत से मिलने वाले चंदा की लालच में वे उन बातों का न ठीक से विरोध कर पा रहे हैं और न ही किसानों का ठीक से समर्थन करते हुए साथ खड़े हैं।

ऐसे में 26 जनवरी के बाद अब तक हुए पंचायतों की भीड़ को देखना होगा कि वे आंदोलन के माध्यम से राजनीति की दिशा को कैसे बदलेंगे!

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

जिम्मेदारी कहां है...

 

यह दौर अजीब है, खुद की जिम्मेदारी से भागती मोदी सत्ता ने अपनी जिम्मेदारी से बचने दोषारोपण का सहारा लेने लगी है और इस खेल में ट्रोल आर्मी और वॉट्सअप यूनिवर्सिटी की भूमिका किसी भी सभ्य समाज को शर्मसार कर सकती है!

और जब सत्ता जिम्मेदारी से बचने लगे तो फिर इसका साफ मतलब है कि नियत ठीक नहीं है और जब नियत ही ठीक न हो तो लोकतंत्र का क्या मतलब रह जाता है।

इन दिनों संसद से लेकर सड़क तक बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी किसानों का मुद्दा छाया हुआ है। ऐसे में सत्ता की जिम्मेदारी है कि वह किसानों से बातचीत करके कोई रास्ता निकाले या फिर तीनों कृषि कानून ही रद्द कर दे लेकिन सत्ता अपनी जिम्मेदारी निभाने की बजाय आंदोलन तोडऩे में पूरी ताकत लगा रही है। पहले तो उन्हें आतंकवादी, नक्सली देशद्रोह कहा जाने लगा फिर दीवारें खड़ी की गई। सड़कों पर छड़ो की कीलें लगाई गी, रसद-पानी-बिजली इंटरनेट तक बंद किया गया। किसानों के खिलाफ इस तरह से विषवमन किया गया मानों वे आंदोलन करके दुश्मन हो गये है। और जब पूरी दुनिया का ध्यान इस मानवाधिकार हनन पर होने लगा तो इसे एक बार फिर भारत को बदनाम करने की साजिश बताई जा रही है जबकि हकीकत यह है कि पूरी दुनिया में अभी भी ऐसे लोग हैं जो मानवाधिकार के उल्लंघन पर तीखी प्रतिक्रिया देकर किसी भी देश की सत्ता को बेचैन कर देते है।

इस मोदी सत्ता की दुविधा यही है कि वह मीठा गप्प गप्प तो करती है लेकिन कड़वा के लिए दूसरे को जिम्मेदार ठहराती है, संसद  न चले तो विपक्ष जिम्मेदार, जीएसटी में तकलीफ हो तो कांग्रेस ला रही थी, किसान आंदोलन हुआ तो यह बिल कांग्रेस ली रही थी। इसका क्या मतलब है। क्या तब भाजपा विरोध में नहीं खड़ी थी और जब वह विरोध में खड़ी थी तो आज यह सब क्यों कर रही है।

लेकिन हैरानी की बात तो यह है कि वह हर असहमति के स्वर को देशद्रोही का नाम देती है जबकि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि कुछ और ही कहता है।

संसद में संजय सिंह ने पूछा भी कि यदि जीएसटी कांग्रेस, किसान कानून कांग्रेस लाने वाली थी इसलिए भाजपा ले आई तो फिर पार्टी का नाम ही कांग्रेस, बी कांग्रेस ही कर देना चाहिए। सवाल कई है जिसे पूछा जाना चाहिए कि आखिर स्टॉक सीमा में छूट देने का अर्थ क्या है, क्या यह महंगाई, कालाबाजारी को बढ़ावा देना नहीं है लेकिन यह सवाल कोई नहीं पूछेगा? क्योंकि अति राष्ट्रवाद और धर्मान्धता किसी कोढ़ से कम नहीं है। यह बात हरिशंकर परसाई जी ने जब कही थी तब कितनों को इस पर यकीन रहा होगा ! लेकिन आज की परिस्थितियां यह चिख चिख कर कह रही है कि अति सर्वेत्र वर्जते ! अति का अंत होता ही है और किसान आंदोलन ने जिस शांतिपूर्ण ढंग से अपने को विस्तार दिया है वह किसी भी सत्ता के लिए बेचैन कर देने वाला है।