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मंगलवार, 28 जुलाई 2026

निजी खर्च पर हुए मोतियाबिंद ऑपरेशनों को सरकारी उपलब्धि बता थपथपाई जा रही पीठ!

 निजी खर्च पर हुए मोतियाबिंद ऑपरेशनों को सरकारी उपलब्धि बता थपथपाई जा रही पीठ!


 1,08,000 ऑपरेशनों के लक्ष्य के मुकाबले सरकारी अस्पतालों और एनजीओ की कुल साख महज 38,365 पर सिमटी

 नाकामी छिपाने को आम जनता द्वारा निजी अस्पतालों में अपनी जेब से कराए गए 70,983 ऑपरेशनों को सरकारी आंकड़ों में जोड़ा गया

 प्रदेश भर के सरकारी मेडिकल कॉलेजों की लचर स्थिति: साल भर में दर्ज हुए मात्र 1,409 ऑपरेशन

रायपुर।

प्रदेश में ‘डबल इंजन’ सरकार के बड़े-बड़े विज्ञापनों और स्वास्थ्य सेवाओं के दावों के बीच एक चौंकाने वाली हकीकत सामने आई है। राज्य के स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी सरकारी आंकड़ों के पोस्टमार्टम से खुलासा हुआ है कि गरीबों को मुफ्त इलाज और मोतियाबिंद से मुक्ति दिलाने का दावा करने वाला सरकारी तंत्र पूरी तरह वेंटिलेटर पर है। अपनी नाकामी और लचर व्यवस्था को छिपाने के लिए विभाग ने ऐसा खेल खेला है, जिसे आंकड़ों की बाजीगरी और जनता के साथ धोखाधड़ी कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

साल 2025-26 के लिए राज्य सरकार ने पूरे छत्तीसगढ़ में 1 लाख 8 हजार गरीबों के मोतियाबिंद का मुफ्त ऑपरेशन करने का लक्ष्य तय किया था। लेकिन जब विभागीय समीक्षा रिपोर्ट के आंकड़े सामने आए, तो सरकारी दावों की हवा निकल गई।

सरकारी तंत्र की पोल खोलते आंकड़े (2025-26):

1. सरकारी मेडिकल कॉलेज: प्रदेश भर के तमाम बड़े और आधुनिक समझे जाने वाले सरकारी मेडिकल कॉलेज मिलकर पूरे साल में महज 1,409 मोतियाबिंद ऑपरेशन ही कर पाए। [02:05]

2. जिला सिविल केंद्रीय अस्पताल: राज्य के सभी जिला और सिविल अस्पतालों का कुल प्रदर्शन 31,146 ऑपरेशनों तक सीमित रहा। [02:19]

3. गैर सरकारी संस्थाएं (NGOs): एनजीओ के माध्यम से 5,810 ऑपरेशन कराए गए। [02:28]

यदि इन सभी सरकारी व्यवस्थाओं और एनजीओ के आंकड़ों को जोड़ भी दिया जाए, तो कुल जमा आंकड़ा 38,365 ऑपरेशनों पर ही अटक जाता है। [02:38] यह आंकड़ा तय लक्ष्य (1.08 लाख) के आधे हिस्से तक भी नहीं पहुंच पाता।

यूं रची गई आंकड़ों की 'चालाकी'

जब लक्ष्य और उपलब्धि के बीच एक बड़ा गड्ढा दिखने लगा, तो स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारियों ने अपनी साख बचाने के लिए एक अजीबो-गरीब पैंतरा अपनाया। प्रदेश के जिन आम नागरिकों ने मजबूरी में, कर्ज लेकर या अपनी जमीन-जायदाद गिरवी रखकर निजी अस्पतालों में अपनी जेब से 70,983 मोतियाबिंद ऑपरेशन [01:27] कराए, सरकार ने उन निजी ऑपरेशनों को भी अपनी सरकारी रिपोर्ट में घसीट लिया।

सरकारी ऑपरेशनों (38,365) और निजी खर्च पर हुए ऑपरेशनों (70,983) को एक साथ जोड़कर रिपोर्ट तैयार की गई और ढिंढोरा पीटा गया कि "सरकार ने मोतियाबिंद मुक्ति के लक्ष्य को लगभग हासिल कर लिया है।"

'आंख फोड़वा कांड' का डरावना अतीत और वर्तमान का अंधेरा

स्वास्थ्य विभाग की यह बदहाली छत्तीसगढ़ के लिए नई नहीं है। राज्य में पूर्ववर्ती रमन सरकार के कार्यकाल के दौरान महासमुंद, बालोद, बिलासपुर और जगदलपुर जैसे क्षेत्रों में हुए 'आंख फोड़वा कांड' की दर्दनाक यादें आज भी ताजा हैं, [04:49] जब घटिया दवाओं और लापरवाही के कारण दर्जनों गरीबों ने अपनी आंखों की रोशनी हमेशा के लिए गंवा दी थी।

आज सरकार और चेहरे भले बदल गए हों, लेकिन जमीनी हकीकत नहीं बदली। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों का न होना, मशीनों का खराब रहना और महीनों लंबी तारीखें मिलना आम बात हो गई है। मजबूरी में गरीब बुजुर्ग अपनी जिंदगी भर की कमाई निजी अस्पतालों में लुटा रहे हैं और सरकार उन्हीं के आंकड़ों पर श्रेय बटोर रही है।

3 तीखे सवाल, जिनका जवाब सरकार को देना होगा:

1. जिम्मेदारी तय क्यों नहीं?: जब सरकारी और एनजीओ तंत्र मिलकर लक्ष्य का 40% भी पूरा नहीं कर पाया, तो इस विफलता के लिए जिम्मेदार स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई?

2. क्या यह जनता से धोखा नहीं?: आम नागरिकों द्वारा अपनी गाढ़ी कमाई से निजी अस्पतालों में कराए गए इलाज को सरकारी रिपोर्ट में शामिल करना क्या सीधे तौर पर आंकड़ों की जालसाजी नहीं है?

3. करोड़ों का स्वास्थ्य बजट कहां?: आयुष्मान योजना और स्वास्थ्य विभाग के भारी-भरकम बजट के बावजूद यदि गरीब को प्राइवेट अस्पताल का ही दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है, तो विभाग का असल काम क्या रह गया है?

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सोमवार, 27 जुलाई 2026

हाई कोर्ट को देनी पड़ी अंतिम चेतावनी!

 कुर्सी की मलाई, चौपट पढ़ाई: जब गुरुजी बने बाबू और हाई कोर्ट को देनी पड़ी चेतावनी!


क्लास रूम  खाली, दफ्तर फुल

शिक्षा को किसी भी समाज की रीढ़ माना जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ में इस रीढ़ पर ही प्रशासनिक नाकामी और राजनीतिक सिफारिशों का वार चल रहा है [00:08]। आलम यह है कि जिन हाथों में चौक और डस्टर होना चाहिए, वे दफ्तरों में फाइलें पलटने और बिल पास करने में व्यस्त हैं [00:43]। एक तरफ बस्तर से लेकर सरगुजा तक ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों में बच्चे एक-एक शिक्षक के लिए तरस रहे हैं [01:04], वहीं दूसरी तरफ हजारों योग्य शिक्षक शहरों में मलाईदार गैर-शिक्षण पदों पर कब्जा जमाए बैठे हैं [00:43]।

2. कानून की धज्जियां: क्या कहता है RTE एक्ट?

शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम 2009 की धारा 27 बहुत स्पष्ट रूप से निर्देश देती है कि किसी भी शिक्षक को गैर-शिक्षकीय (Non-teaching) कार्यों में नहीं लगाया जा सकता [01:31]। इसके केवल तीन ही अपवाद हैं:

 जनगणना [01:42]

 आपदा राहत कार्य [01:42]

 चुनाव ड्यूटी [01:42]

लेकिन छत्तीसगढ़ में नियम-कानूनों को ताक पर रखकर शिक्षकों को चपरासी, बाबू, समन्वयक और प्रशासनिक अधिकारी तक बना दिया गया है [01:56]।

3. हाई कोर्ट का कड़ा रुख और अल्टीमेटम

जब यह पूरा घालमेल हाई कोर्ट पहुंचा, तो अदालत ने सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़ा ऐतराज जताया [00:25]। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि यह बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है और सरकार को व्यवस्था सुधारने की अंतिम चेतावनी व अल्टीमेटम जारी कर दिया [02:16]।

4. सिस्टम का असली खेल: मलाईदार पोस्टिंग का गणित

प्रदेश के 146 विकासखंडों (Blocks) में DEO, ABO जैसे पदों पर प्रशासनिक संवर्ग (Administrative Cadre) के अधिकारियों की नियुक्ति होनी चाहिए [03:09]। लेकिन हकीकत यह है कि अधिकांश जगहों पर प्रिंसिपल और लेक्चरर (व्याख्याता) इन कुर्सियों पर काबिज हैं [03:23]।

यह खेल क्यों चल रहा है?

1. राजनीतिक संरक्षण और मलाईदार पद: ग्रामीण क्षेत्रों में पढ़ाने से बचने के लिए कई शिक्षक राजनीतिक पहुंच और पैसों की ताकत के दम पर शहर के दफ्तरों में टिके हुए हैं [04:22]।

2. प्रशासनिक नाकामी: राज्य निर्माण के 25 वर्षों बाद भी स्कूल शिक्षा विभाग में अपना प्रशासनिक कैडर खड़ा नहीं किया जा सका, जिससे 'प्रभारी राज' का शॉर्टकट अपनाया जा रहा है [04:55]।

5. नौनिहालों का दर्द: "नेतागिरी मत करो!"

जब शिक्षक दफ्तरों में एसी की हवा खा रहे हैं, तब दूर-दराज के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं [05:42]। जब शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय (आलीबारा) की छात्राएं 11वीं-12वीं के लिए शिक्षकों की मांग लेकर कलेक्टर कार्यालय पहुंचीं [06:03], तो उन्हें मदद के बजाय अधिकारियों की बदतमीजी और "जेल भिजवाने" जैसी धमकियां मिलीं [06:15]।

6. निष्कर्ष और यक्ष प्रश्न

हाई कोर्ट का यह फैसला केवल एक अदालती आदेश नहीं, बल्कि लाखों नौनिहालों के हक की लड़ाई है [08:31]।

 क्या सरकार युक्ति-युक्तकरण के नाम पर केवल खानापूर्ति करेगी या वास्तव में शिक्षकों को वापस ब्लैकबोर्ड तक भेजेगी? [07:31]

 क्या स्कूल शिक्षा विभाग में सालों से चले आ रहे 'प्रभारी राज' को खत्म कर स्थाई भर्तियां की जाएंगी? [08:21]

यदि समय रहते इस व्यवस्था को नहीं सुधारा गया, तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य अंधेरे में धकेलने का जिम्मेदार कौन होगा?

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रविवार, 26 जुलाई 2026

मलाई की चाह में बीजेपी पहुंचे दलबदलुओं के हाथ लगा 'झुनझुना'

  मलाई की चाह में बीजेपी पहुंचे दलबदलुओं के हाथ लगा 'झुनझुना'


कांग्रेस और अन्य दलों से पाला बदलकर भाजपा का दामन थामने वाले दिग्गज हासिये पर; मूल कैडर के दबाव और आंतरिक असंतोष के चलते निगम-मंडलों में जगह मिलना मुश्किल


छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता बदलते ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने वाले दलबदलुओं की स्थिति अब 'ना घर के, ना घाट के' जैसी बन गई है [00:19]। सत्ता की मलाई खाने और बड़े पदों की चाहत में अपनी मूल पार्टी का साथ छोड़कर भाजपा का दुपट्टा ओढ़ने वाले नेताओं के हाथ अब सिर्फ पछतावा लगा है [00:28]।

वरिष्ठ पत्रकार कौशल तिवारी के अनुसार, लगभग ढाई साल पहले जब भूपेश सरकार की विदाई हुई, तब कांग्रेस और अन्य दलों के नेताओं का भाजपा में प्रवेश करने का मेला सा लग गया था [00:48]। भाजपा का दावा था कि 10 हजार से अधिक नेताओं और कार्यकर्ताओं ने पार्टी में निष्ठा जताई है [01:58]। लेकिन आज स्थिति यह है कि 'यूज एंड थ्रो' की राजनीति के तहत भाजपा ने इनमें से अधिकांश को पूरी तरह से किनारे कर दिया है [01:38]।

किस्मत सिर्फ एकाध की चमकी, बाकी को मिला सिर्फ 'झुनझुना'

इस पूरे दलबदल के खेल में किस्मत सिर्फ चिंतामणि महाराज की चमकी, जिन्हें कांग्रेस छोड़कर आते ही सरगुजा लोकसभा से टिकट दिया गया और वे जीतकर दिल्ली पहुंच गए [02:10]। लेकिन उनके अलावा बाकी दिग्गज नेताओं के हाथ खाली हैं:

 चंद्रशेखर शुक्ला: 350 सदस्यों वाली जंबो कार्यकारिणी में मात्र एक जगह मिली [02:30]।

 चोलेश्वर चंद्राकर अन्य: प्रभारी या आमंत्रित सदस्य बनाकर टहला दिया गया है [02:40]।

कोई भी बड़ा नेता केवल 'दरी बिछाने' या कार्यकारिणी का कागज जेब में लेकर घूमने के लिए पाला नहीं बदलता [02:49]। पावर, पद, प्रतिष्ठा और गाड़ी की उम्मीद में भाजपा का दामन थामने वाले नेताओं में अब भारी छटपटाहट देखी जा रही है [03:04]।

हाशिये पर धकेले गए कई बड़े चेहरे

निगम, मंडल और आयोगों में लाल बत्ती की उम्मीद लगाए बैठे पूर्व विधायकों, पूर्व महापौरों और प्रदेश स्तरीय पदाधिकारियों की लंबी फेहरिस्त अब उपेक्षा का शिकार है [03:14]। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:

 प्रमोद शर्मा (पूर्व विधायक, बलौदाबाजार) [03:31]

 सफीरा साहू (पूर्व महापौर, जगदलपुर) [03:46]

 चुन्नीलाल साहू, विधान मिश्रा, शिशुपाल सूरी (पूर्व विधायक) [03:46]

 अरुण चौहान (पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष) [03:57]

 शीला तिवारी (पूर्व महिला कांग्रेस अध्यक्ष, बस्तर) [03:57]

 वाणी राव (पूर्व महापौर) एवं अनीता रावटे (पूर्व प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष) [04:09]

 सीमा बघेल (पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की भाभी) [04:09]

 कमल झा (पूर्व अध्यक्ष, महिला कांग्रेस जगदलपुर) [04:20]

 यशवर्धन राव (पूर्व नेता प्रतिपक्ष, जगदलपुर) [04:20]

 महेश देवांगन (दिवंगत जंगी जी के करीबी) [04:31]

शादी-ब्याह के उपेक्षित मेहमानों की तरह इन नेताओं को पार्टी की बैठकों में बुला तो लिया जाता है, लेकिन नीतिगत फैसलों में इनकी कोई राय नहीं ली जाती [04:52]।

भाजपा कैडर का भारी दबाव और अंदरूनी अंतर्द्वंद्व

भाजपा द्वारा बाहरी नेताओं को दरकिनार करने के पीछे पार्टी के मूल कैडर का भारी विरोध मुख्य वजह माना जा रहा है [05:17]। सालों से पार्टी का झंडा उठाने और दरी बिछाने वाले निष्ठावान कार्यकर्ताओं ने साफ चेतावनी दे रखी है कि यदि सत्ता मिलने पर निगम-मंडलों के मलाईदार पद बाहर से आए लोगों को दिए गए, तो इसका कड़ा विरोध होगा [05:48]।

इसके साथ ही, भाजपा के भीतर भी गहरा अंतर्द्वंद्व चल रहा है [07:30]। विधायकों और मंत्रियों में असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं, जिसके कारण डैमेज कंट्रोल की कोशिशें जारी हैं [07:52]। फिलहाल, विचारधारा छोड़कर सिर्फ सत्ता के पीछे भागने वाले दलबदलू नेताओं का भविष्य छत्तीसगढ़ की राजनीति में अनिश्चितता के भंवर में फंसा नजर आ रहा है [06:49]।

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शनिवार, 25 जुलाई 2026

सत्ता का चक्रव्यूह और अनुशासन का बुलडोज़र

 सत्ता का चक्रव्यूह और अनुशासन का बुलडोज़र

मंत्रिमंडल फेरबदल की सुगबुगाहट, दिग्गजों के तेवर और रायपुर से दिल्ली तक छिड़ी अंदरूनी महाभारत



छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों एक ऐसी हलचल मची हुई है [00:07], जिसने सत्ता के गलियारों से लेकर दिल्ली दरबार तक सरगर्मियां तेज कर दी हैं। कल तक जो भारतीय जनता पार्टी 'ऑल इज़ वेल' और 'कड़े अनुशासन' का दावा करती थी [00:15], आज उसी पार्टी के अंदरूनी खाने में छिड़ी खींचतान और महाभारत की परतें धीरे-धीरे खुलकर बाहर आने लगी हैं।

छत्तीसगढ़ में बैठी डबल इंजन की सरकार को लगभग ढाई साल पूरे होने को हैं [00:46]। चुनावी वादों और परफॉर्मेंस की समीक्षा के बीच खबर यह उठी कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय अपने मंत्रिमंडल का विस्तार और फेरबदल करना चाहते हैं [00:56]। मंशा साफ थी—खराब प्रदर्शन करने वाले मंत्रियों की छुट्टी कर अपने पसंदीदा और वफादार विधायकों को जगह देना, ताकि आगामी चुनाव के लिए नई बिसात बिछाई जा सके। लेकिन, दिल्ली से आए फरमान ने फिलहाल इस फेरबदल पर ब्रेक लगा दिया है [01:13]—"अभी रुको, देखते हैं।"

आखिर ऐसा क्या हुआ कि फेरबदल का प्रस्ताव लेकर दिल्ली गए नेतृत्व को खाली हाथ लौटना पड़ा? [01:36] बंद कमरों में हुई बैठक में ऐसा कौन सा पेंच फंसा, जिससे सत्ता और संगठन का यह मास्टर प्लान खटाई में पड़ गया?

बंद कमरे की इनसाइड स्टोरी: पाँच दिग्गजों के तेवर से फंसा पेंच

सूत्रों और अंदरूनी राजनीतिक रिपोर्टों के मुताबिक [01:56], मंत्रिमंडल फेरबदल के रास्ते में पाँच प्रमुख नेताओं के रुख और सियासी समीकरण सबसे बड़ी दीवार बनकर खड़े हो गए हैं:

1. रामविचार नेताम का असंतोष [02:09]: सरगुल ज़ोन के बड़े आदिवासी चेहरा और कद्दावर नेता रामविचार नेताम को कोर ग्रुप से हटाए जाने के बाद से वे बेहद खफा बताए जा रहे हैं [04:54]। सरगुजा संभाग में आदिवासियों के बीच उनके असर को देखते हुए पार्टी के लिए उनकी नाराजगी को दरकिनार करना इतना आसान नहीं दिख रहा है [05:02]।

2. रेणुका सिंह का खुलकर सामने आना [02:09]: पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ विधायक रेणुका सिंह के नाम से वायरल हुए कथित ऑडियो ने सियासी माहौल में आग में घी डालने का काम किया है [05:21]। हालाँकि, ऑडियो की आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन इसने पार्टी के भीतर पनप रहे असंतोष को उजागर कर दिया है [05:30]। कांग्रेस भी इस मौके को लपकते हुए साय सरकार को 'रिमोट कंट्रोल से चलने वाली सरकार' बताकर हमलावर है [05:46]।

3. विजय शर्मा और गृह मंत्रालय की खींचतान [02:09]: गृह मंत्री विजय शर्मा को लेकर चर्चा है कि राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति और राजधानी में चाकूबाजी/अपराधों की घटनाओं के चलते [06:51] उन्हें दिल्ली की केंद्रीय संगठन राजनीति में शिफ्ट करने का प्रस्ताव था [07:08]। लेकिन खबरें हैं कि विजय शर्मा न केवल प्रदेश छोड़ने को तैयार नहीं हैं, बल्कि गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी भी अपने पास ही रखना चाहते हैं [07:16]।

4. ओपी चौधरी और पसंद-नापसंद की सूची [02:09]: फेरबदल की कवायद में ओपी चौधरी द्वारा सौंपी गई संभावित सूची को लेकर भी तालमेल का अभाव दिखा [07:44]। सूची में शामिल कुछ नामों और बदलाव के तरीकों पर शीर्ष नेतृत्व व मंत्रियों के बीच अनबन की खबरें छन-छन कर बाहर आ रही हैं [08:06]।

5. डिप्टी सीएम अरुण साव और साहू वोट बैंक का समीकरण [02:09]: उप-मुख्यमंत्री और साहू समाज के बड़े चेहरे अरुण साव के विभागों को लेकर भी कई सवाल उठ रहे थे [08:35]। चर्चा थी कि उनका विभाग बदला जा सकता है या फेरबदल की गाज गिर सकती है [08:45]। लेकिन, साहू समाज के विशाल वोट बैंक और पार्टी के अंदरूनी समीकरणों के चलते यह फैसला इतना आसान नहीं रहा [08:24]।

शिकायतों का गुबार और 'सत्ता बचाने' की हिदायत

हाल ही में आयोजित बीजेपी की उच्चस्तरीय बैठकों में दिल्ली से आए पर्यवेक्षकों व नेताओं के सामने मंत्रियों के प्रदर्शन, उनके ओएसडी (OSD) व विशेष सहायकों की कार्यशैली को लेकर जमकर शिकायतें पहुँची थीं [03:28]।

दिल्ली के केंद्रीय नेतृत्व ने विधायकों और नेताओं को शांत करते हुए कड़ा संदेश भी दिया था—"सत्ता चली गई तो किसी के पास कुछ नहीं बचेगा [04:11] आपसी नाराजगी भूलकर संगठन के लिए काम कीजिए, आपकी शिकायतों पर गंभीरता से विचार किया जाएगा [04:19]"

आगे क्या? अनुशासन की परीक्षा और बड़ा सवाल

फिलहाल, फेरबदल का यह पेंच सुलझने के बजाय और उलझ गया है [09:25]। दिग्गजों के रुख ने यह साबित कर दिया है कि सत्ता संतुलन बनाना किसी चुनौती से कम नहीं है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या आने वाले दिनों में केंद्रीय नेतृत्व इस उलझे हुए समीकरण को सुलझा पाएगा, या फिर असंतोष के इस गुबार के बीच फेरबदल की योजना लंबे समय के लिए ठंडे बस्ते में चली जाएगी? [09:45] राजनीति के इस शतरंज पर छत्तीसगढ़ की जनता और राजनीतिक विश्लेषकों की नज़रें लगातार बनी हुई हैं।

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