जब साय सरकार के 'ज़ीरो टॉलरेंस' पर उठे सवाल
छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद भ्रष्टाचार पर 'ज़ीरो टॉलरेंस' का दावा करने वाली विष्णुदेव साय सरकार इस वक्त दोतरफा विवादों में घिर गई है। एक ओर जहाँ स्कूली बच्चों की मुफ्त किताबें कबाड़ की दुकानों और पेपर मिलों में बेचे जाने का मामला राष्ट्रीय स्तर पर तूल पकड़ा था वहीं दूसरी ओर राजस्व विभाग में बड़े पैमाने पर लेन-देन और 'तबादला उद्योग' चलाने के गंभीर आरोपों ने सरकार की साख पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही मामलों में सरकार की कार्रवाई की दिशा पर सवाल उठ रहे हैं। जहाँ भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले तहसीलदार संघ के अध्यक्ष को निलंबित कर दिया गया, वहीं दूसरी ओर पाठ्य पुस्तक निगम घोटाले की जांच के लिए बनाई गई कमेटी में दागी चेहरों को ही शामिल कर लिया गया।
राजस्व विभाग में 'तबादला उद्योग': आवाज उठाने पर नेता निलंबित
राजस्व विभाग में हाल ही में हुए तबादलों के बाद संघ के प्रांतीय अध्यक्ष नीलमणि दुबे ने सीधे राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा की कार्यप्रणाली और उनके बंगले पर सवाल उठाए थे। दुबे का आरोप है कि नियमों को ताक पर रखकर बड़े पैमाने पर वित्तीय लेन-देन के आधार पर मनचाही पोस्टिंग दी जा रही है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जो दागी अधिकारी या पटवारी पहले दुर्ग-भिलाई या अन्य क्षेत्रों में विवादित रहे, उन्हें राजधानी रायपुर में मलाईदार कुर्सियां सौंप दी गईं।
निशाने पर आए संघ के पदाधिकारी
इस कथित घोटाले के खिलाफ आवाज उठाने का खामियाजा तहसीलदार संघ को भुगतना पड़ा है। सरकार ने जांच बिठाने के बजाय प्रांतीय अध्यक्ष नीलमणि दुबे को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। इसके साथ ही संघ के अन्य सक्रिय पदाधिकारियों—सचिव गुरुदत्त पंचभाई (दुर्ग से बलरामपुर), प्रवक्ता पखन टंडन (सुकमा) और अंजलि शर्मा (धमतरी)—का प्रशासनिक आधार पर दूर-दराज के क्षेत्रों में ट्रांसफर कर दिया गया। संघ ने इसे 'टारगेटेड' कार्रवाई और आवाज दबाने की कोशिश करार दिया है।
पाठ्य पुस्तक निगम घोटाला: बच्चों की किताबें कबाड़ के हवाले
दूसरा बड़ा मोर्चा शिक्षा विभाग में खुला है। प्रदेश के सात अलग-अलग जिलों (धमतरी, जशपुर, सूरजपुर, अंबिकापुर आदि) से सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए छपीं मुफ्त पाठ्य पुस्तकें सीधे कबाड़ की दुकानों और रिसाइक्लिंग के लिए पेपर मिलों में भेज दी गईं। कांग्रेस के पूर्व विधायक विकास उपाध्याय ने इस मामले को रंगे हाथों पकड़ा, जिसके बाद यह राष्ट्रीय सुर्खियां बन गया।
इस मामले में सरकार ने आनन-फानन में पाठ्य पुस्तक निगम के महाप्रबंधक प्रेम प्रकाश शर्मा को निलंबित तो कर दिया, लेकिन असली विवाद तब खड़ा हुआ जब जांच कमेटी के गठन की परतें खुलीं। विपक्ष का आरोप है कि पांच सदस्यीय जांच कमेटी में दो ऐसे अधिकारियों को शामिल किया गया है, जो खुद पहले से ही भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरे हैं। ऐसे में जांच की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
'पीए से मंत्री' के सफर पर उठ रहे राजनीतिक सवाल
राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा पर लग रहे इन आरोपों के बाद अब राजनीतिक गलियारों में उनके अतीत को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। पूर्व में कई बड़े नेताओं और मंत्रियों के पीए (Personal Assistant) रह चुके टंकराम वर्मा के अचानक कैबिनेट मंत्री बनने और अब उनके विभाग में ट्रांसफर-पोस्टिंग के विवाद सामने आने के बाद विपक्ष आक्रामक है। कांग्रेस का आरोप है कि साय सरकार में 'साय-साय भ्रष्टाचार' चल रहा है और इस लड़ाई को सड़क से लेकर सदन और जरूरत पड़ने पर न्यायालय तक ले जाया जाएगा।
सवालों के घेरे में जमीनी हकीकत
नया शिक्षा सत्र शुरू हुए तीन से चार महीने बीत चुके हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि राज्य के कई दूरस्थ अंचलों में बच्चों को अब तक न तो पूरी किताबें मिल पाई हैं और न ही सरकारी मुफ्त यूनिफॉर्म (स्कूली ड्रेस)। जनता और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच अब यह बड़ा सवाल तैर रहा है कि क्या मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय अपने मंत्रियों और बेलगाम हो चुके नौकरशाहों पर लगाम कसकर 'ज़ीरो टॉलरेंस' के अपने वादे को साबित कर पाएंगे, या फिर यह सिर्फ एक चुनावी नारा बनकर रह जाएगा?

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