छत्तीसगढ़ के हक पर 'सर्जिकल स्ट्राइक', मुनाफे वाली कंपनी गई
छत्तीसगढ़ के संसाधनों और औद्योगिक पहचान पर दिल्ली से एक और बड़ा प्रहार हुआ है। हसदेव के जंगलों में चल रही हलचल के बीच, अब मध्य भारत के स्टील हब 'भिलाई' की धड़कन कहे जाने वाले फेरो स्क्रैप निगम लिमिटेड (FSNL) को केंद्र सरकार ने विदेशी हाथों में सौंप दिया है। लगातार मुनाफे में चल रही और भिलाई स्टील प्लांट (BSP) की रीढ़ मानी जाने वाली इस सरकारी कंपनी को जापान की 'कोनोई ट्रांसपोर्ट कंपनी लिमिटेड' (Konoike Transport Co. Ltd.) ने महज 320 करोड़ रुपये की उच्चतम बोली लगाकर खरीद लिया है।
इस सौदे के सामने आते ही भिलाई सहित पूरे प्रदेश के श्रमिक संगठनों, जागरूक नागरिकों और राजनीतिक गलियारों में आक्रोश का माहौल है। सवाल उठ रहे हैं कि जो कंपनी खुद हर साल सरकार की झोली में करोड़ों का मुनाफा डाल रही थी, उसे बेचने की इतनी जल्दबाजी क्यों थी?
कैसा अर्थशास्त्र: 3 साल के मुनाफे की कीमत पर पूरी कंपनी साफ!
विभागीय सूत्रों और वित्तीय आंकड़ों पर नजर डालें तो FSNL का यह विनिवेश किसी बड़े घोटाले से कम नजर नहीं आता।
सालाना मुनाफा: FSNL कोई बीमार या घाटे में चल रही इकाई नहीं थी। यह हर साल औसतन 100 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा कमाकर केंद्र सरकार को दे रही थी।
पेंडिंग ऑर्डर्स: विनिवेश के वक्त भी कंपनी के पास स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAIL) के विभिन्न प्लांटों से जुड़े 1000 करोड़ रुपये से अधिक के ठेके (वर्क ऑर्डर) पेंडिंग थे।
खुद की संपत्ति: कंपनी के पास 50 करोड़ रुपये से अधिक की तो अपनी अचल संपत्ति और इंफ्रास्ट्रक्चर है। वहीं शेयर बाजार में भी इस कंपनी की साख मजबूत थी और इसके शेयर की कीमत 729 रुपये के स्तर को छू रही थी।
जानकारों का कहना है कि जो कंपनी अगले तीन साल में अपनी बिक्री की पूरी कीमत (320 करोड़) खुद कमाकर सरकारी खजाने को लौटा देती, उसे महज इतनी छोटी रकम में जापान की कंपनी को सौंप देना केंद्र सरकार की नीति और नीयत दोनों पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
तीन केंद्रीय मंत्रियों के हस्ताक्षर, पर छत्तीसगढ़ सरकार मौन
दिल्ली में केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और उद्योग मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी की मौजूदगी में इस सौदे पर अंतिम मुहर लगाई गई। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम पर छत्तीसगढ़ की 'डबल इंजन' सरकार की खामोशी सबसे ज्यादा चौंकाने वाली है।
भिलाई के श्रमिक नेताओं का आरोप है कि राज्य की विष्णुदेव साय सरकार दिल्ली के फैसलों के सामने असहाय नजर आ रही है। स्थानीय रोजगार और राज्य के आर्थिक हितों की रक्षा करने के बजाय सूबे की सरकार ने इस संवेदनशील मुद्दे पर पूरी तरह से मौन साध लिया है। विपक्ष भी इस मुद्दे पर केवल चुनावी और सियासी यात्राओं तक सीमित है, जमीन पर मजदूरों की लड़ाई लड़ने वाला कोई नहीं दिख रहा।
हजारों परिवारों के भविष्य पर छाए संकट के बादल
FSNL में सीधे तौर पर काम करने वाले नियमित कर्मचारियों के अलावा, स्क्रैप प्रोसेसिंग और परिवहन कार्य में हजारों ठेका मजदूर और स्थानीय युवा जुड़े हुए हैं। जापान की निजी कंपनी के हाथ में कमान जाते ही अब यहां 'ठेका पद्धति' और 'छंटनी' का डर हावी हो गया है। स्थानीय लोगों ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा है कि आत्मनिर्भर भारत का नारा देने वाली सरकार स्थानीय युवाओं को विदेशी कॉर्पोरेट का गुलाम बनाने पर तुली है।
अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, भारतीय जनता पार्टी के कुछ स्थानीय नेता भी इस फैसले से असहज हैं और दबी जुबान में इसका विरोध कर रहे हैं, लेकिन आलाकमान के खौफ के कारण कोई भी खुलकर सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।
क्या अब नगरनार की बारी?
FSNL के इस अचानक हुए निजीकरण ने बस्तर के नगरनार स्टील प्लांट (NMDC) को लेकर भी डर बढ़ा दिया है। हालांकि सरकार लगातार नगरनार के निजीकरण का खंडन करती रही है, लेकिन FSNL के हश्र को देखकर भिलाई और बस्तर के उद्योग जगत में यह चर्चा तेज है कि आज FSNL बिका है, कल नगरनार की बारी भी आ सकती है।
Vidio देखें
https://youtu.be/S3LubnY1E-M?si=BUeOeqAhl5mViTrX

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