रविवार, 24 मई 2026

सर्किट हाउस जमींदोज, आरटीआई में जांच रिपोर्ट 'लापता'

 पीडब्ल्यूडी का 'डिमोलिशन खेल': 95 साल पुराना मजबूत सर्किट हाउस जमींदोज, आरटीआई में जांच रिपोर्ट 'लापता'



 हेरिटेज बिल्डिंग गिराने के नाम पर करोड़ों के 'संगठित खेल' की बू; बिना तकनीकी कमेटी और फॉर्म नंबर 136 के ही ढहा दिया ब्रिटिश काल का ऐतिहासिक ढांचा।

 प्रदेश में करीब 50 और सरकारी भवनों के नवनिर्माण की तैयारी, आरटीआई एक्टिविस्ट ने लगाया भ्रष्टाचार का गंभीर आरोप।


छत्तीसगढ़ का लोक निर्माण विभाग (PWD) एक बार फिर बड़े विवादों के घेरे में है। उपमुख्यमंत्री व पीडब्ल्यूडी मंत्री अरुण साव के कार्यकाल के दौरान विभाग पर एक ऐसा गंभीर आरोप लगा है, जिसने विभाग की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला राजधानी रायपुर के 95 साल पुराने ऐतिहासिक सर्किट हाउस (ओल्ड बिल्डिंग) को जमींदोज करने और उससे जुड़ी तकनीकी जानकारियों को आरटीआई (सूचना के अधिकार) के तहत छुपाने का है।

आरोप है कि जिस ब्रिटिश कालीन मजबूत इमारत को 100 साल और सुरक्षित रखा जा सकता था, उसे सिर्फ नए निर्माण और 'कमीशन के खेल' के लिए आनन-फानन में ढहा दिया गया। चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरी कवायद में नियमों को ताक पर रखने की बात सामने आ रही है।

लाखों खर्च कर संवारा, फिर चला दिया बुलडोजर

सूत्रों और आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार, पिछली सरकारों के दौरान ही इस सर्किट हाउस के कई कमरों को चमकाने, नई टाइल्स और दरवाजे लगाने में लाखों-करोड़ों रुपए खर्च किए गए थे। जनता की गाढ़ी कमाई से हुए इस जीर्णोद्धार के कुछ समय बाद ही अचानक इस पूरी बिल्डिंग को 'जर्जर' घोषित कर नेस्तनाबूद कर दिया गया।

आरटीआई में खुलासा: गायब है फॉर्म नंबर 136 और जांच प्रतिवेदन

इस पूरे मामले को लेकर आरटीआई एक्टिविस्ट राकेश चौबे ने विभाग से जब जानकारी मांगी, तो पीडब्ल्यूडी के अफसरों के हाथ-पांव फूल गए। राकेश चौबे के मुताबिक:

1 विभाग ने पहली आरटीआई में सिर्फ इतना जवाब दिया कि "भवन जर्जर हो चुका था, इसलिए इसे तोड़ा गया।"

2 जब दोबारा आरटीआई लगाकर भवन के निरीक्षण की तकनीकी रिपोर्ट मांगी गई, तो विभाग कोई पुख्ता दस्तावेज नहीं दे सका।

3 नियमतः किसी भी सरकारी बिल्डिंग को तोड़ने से पहले तकनीकी विशेषज्ञों और इंजीनियरों की 3 से 5 सदस्यीय कमेटी बनती है। यह कमेटी 'फॉर्म नंबर 136' (निरीक्षण रिपोर्ट) पर हस्ताक्षर करती है। लेकिन इस मामले में न तो कोई आधिकारिक जांच प्रतिवेदन है और न ही फॉर्म नंबर 136।

आरोप लग रहे हैं कि किसी एक चहेते इंजीनियर की कथित मौखिक या फर्जी रिपोर्ट के आधार पर इस ऐतिहासिक हेरिटेज ढांचे को गिरा दिया गया, ताकि नए सिरे से करोड़ों का टेंडर निकाला जा सके।

क्या प्रदेश में सक्रिय है 'संगठित डिमोलिशन गिरोह'?

आरटीआई एक्टिविस्ट राकेश चौबे का कहना है कि यह केवल एक बिल्डिंग का मामला नहीं है। विभाग अब प्रदेश भर में ऐसे लगभग 50 सरकारी प्रोजेक्ट्स और भवनों को फिर से नवनिर्मित (पुनर्वास) करने की तैयारी कर रहा है। आशंका जताई जा रही है कि तोड़ने और दोबारा बनाने के नाम पर विभाग में एक 'संगठित गिरोह' काम कर रहा है, जिसका मुख्य उद्देश्य सरकारी पैसे का बंदरबांट करना है।

हेरिटेज को सहेजने के बजाय मिटा दी पहचान

विशेषज्ञों के अनुसार, ब्रिटिश शासनकाल के दौरान बनी इस इमारत के स्ट्रक्चर में लगे बीम, कॉलम और लोहे इतने मजबूत थे कि यह इमारत अगली एक सदी तक खड़ी रह सकती थी। जहां एक तरफ ऐतिहासिक इमारतों को 'हेरिटेज' घोषित कर सहेजा जाता है, वहीं रायपुर में पीडब्ल्यूडी ने इसे मलबे में तब्दील कर दिया।

मामला जाएगा अपीलीय फोरम और कोर्ट

जानकारी छुपाने और टालमटोल रवैये को लेकर आरटीआई एक्टिविस्ट अब विभाग के प्रथम अपीलीय अधिकारी के पास जा रहे हैं। यदि वहां भी सही जानकारी (निरीक्षण रिपोर्ट और फॉर्म 136) नहीं मिलती है, तो मामले को संबंधित सक्षम फोरम और न्यायालय में ले जाने की तैयारी है, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।

बड़ा सवाल: मुख्यमंत्री के कड़े रुख के बाद भी PWD बेलगाम क्यों?

एक तरफ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय राजस्व जैसे विभागों में सालों से जमे अधिकारियों और पटवारियों को हटाने के कड़े आदेश दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पीडब्ल्यूडी में सालों से एक ही मलाईदार कुर्सी पर जमे अधिकारियों की 'रीति-नीति' पर कोई अंकुश नहीं दिख रहा है। अब देखना यह होगा कि भ्रष्टाचार के इन गंभीर आरोपों पर उपमुख्यमंत्री अरुण साव और मुख्यमंत्री साय क्या संज्ञान लेते हैं।

Vidio देखें 

https://youtu.be/7aEMtv3yqPE?si=f_h2rBwdRnHYnrsw


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