मंगलवार, 26 मई 2026

छत्तीसगढ़ का 'गुजराती' सौदा!

 छत्तीसगढ़ का 'गुजराती' सौदा!

अमित शाह की 'क्रोनोलॉजी', बस्तर का 'विकास मॉडल 2.0' और छत्तीसगढ़ के जल-जंगल-जमीन पर कॉर्पोरेट पहरा।

कौशल तिवारी “ मयूख”

[INTRO

राजनीति और कॉर्पोरेट जगत की जुगलबंदी में कोई भी कदम यूं ही नहीं उठाया जाता; हर बड़े दौरे के पीछे एक सोची-समझी 'क्रोनोलॉजी' होती है और हर क्रोनोलॉजी के पीछे अरबों रुपये की एक बड़ी डील। जब देश के गृह मंत्री अमित शाह बस्तर की धरती पर कदम रखते हैं और दावा करते हैं कि 5 साल में बस्तर के आदिवासियों की आमदनी छह गुना बढ़ जाएगी, तो वह एक सुनहरे भविष्य का सपना बेच रहे होते हैं । लेकिन इसी बीच सत्ता के गलियारों से एक ऐसी सूची (List) लीक होती है, जो गृह मंत्री के दावों की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी है ।

यह कहानी सिर्फ 'नक्सल मुक्त बस्तर' की नहीं है, बल्कि 'संसाधन मुक्त छत्तीसगढ़' की है । एक तरफ बस्तर में सुरक्षा कैंपों को 'वीर शहीद गुंडादूर सेवा डेरा' में तब्दील करने का प्रशासनिक ढोल पीटा जा रहा है, तो दूसरी तरफ परदे के पीछे से अडानी से लेकर टोरेंट तक की गुजराती लॉबी को छत्तीसगढ़ के जल-जंगल और जमीन सौंपने का पूरा खाका तैयार हो चुका है ।

1. शाह का 'बस्तर मॉडल 2.0': सेवा का मुखौटा या जमीन की घेराबंदी?

गृह मंत्री अमित शाह ने बस्तर दौरे में केरल जितने बड़े भूभाग को नक्सलवाद से मुक्त कराने के लिए 200 सुरक्षा कैंपों में से 70 को 'वीर शहीद गुंडादूर सेवा डेरा' बनाने का एलान किया । दावा है कि यहाँ बैंकिंग, आधार कार्ड और 371 सरकारी योजनाएं सीधे आदिवासियों के दरवाजे तक पहुंचेंगी ।

लेकिन स्थानीय जानकारों और राजनीति के इनसाइडर्स का सवाल कुछ और है: क्या ये 'सेवा डेरे' सिर्फ आदिवासियों की भलाई के लिए हैं, या फिर बस्तर के दुर्गम और खनिज-समृद्ध इलाकों में कॉर्पोरेट कंपनियों की सुरक्षित एंट्री के लिए बनाए गए सेफ पैसेज (Safe Passage) हैं?

2. वो 'वायरल लिस्ट': छत्तीसगढ़ की छाती पर 'सूरत और अहमदाबाद' का पहरा

जैसे ही गृह मंत्री का दौरा खत्म होता है, छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक हलकों में एक सूची तैरने लगती है। यह सूची बताती है कि राज्य की विष्णुदेव साय सरकार ने गुजरात की दिग्गज कंपनियों के लिए रेड कारपेट बिछा दिया है :

 अडानी पावर  अडानी एंटरप्राइजेज (अहमदाबाद): ऊर्जा और केमिकल प्रोजेक्ट्स के लिए सरगुजा की हसदेव-समृद्ध वादियों में बड़े पैमाने पर जमीन की तलाश और हरी झंडी ।

 आरसेलर मित्तल निपॉन (सूरत): बस्तर के लौह-अयस्क (Iron Ore) के गढ़ में भारी उद्योग लगाने की तैयारी ।

 टोरेंट फार्मास्यूटिकल्स और लाइस्टियम लाइफ साइंसेज (अहमदाबाद): दवा उद्योग के नाम पर राजधानी रायपुर के आसपास की महंगी जमीनों पर नजर ।

 सफायर सेमीकॉम (अहमदाबाद): इलेक्ट्रॉनिक सेमीकंडक्टर हब के लिए रायपुर में पैठ ।

 अंबुजा सीमेंट: छत्तीसगढ़ के लाइमस्टोन (चूना पत्थर) बेल्ट पर पूरी तरह काबिज होने की कवायद, जिस पर पहले ही अवैध वसूली के संगीन आरोप लग चुके हैं ।

3. मुर्दों के अंगूठे और फर्जी जनसुनवाई का 'सच्चा चिट्ठा'

विकास की इस चमचमाती कहानी का सबसे काला अध्याय है—'जमीन हड़पने का खेल'। मैदानी हकीकत यह है कि इन बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों को स्थापित करने के लिए जनसुनवाइयों का मजाक उड़ाया जा रहा है । कई इलाकों से रिपोर्ट आ रही है कि प्रशासन की मिलीभगत से फर्जी जनसुनवाइयां की गईं और जो ग्रामीण सालों पहले मर चुके हैं, उनके नाम पर अंगूठे लगवाकर उद्योगों के पक्ष में सहमति दिखा दी गई । सरकार पूरी तरह से उद्योगपतियों की गोद में बैठी नजर आ रही है ।

4. छत्तीसगढ़िया युवा: सिर्फ 'चपरासी और गार्ड' बनने की योग्यता?

डबल इंजन सरकार का सबसे बड़ा खोखला दावा है—'स्थानीय युवाओं को रोजगार']। कड़वा सच तो यह है कि स्किल डेवलपमेंट के नाम पर छत्तीसगढ़ के युवाओं को अपने ही जल-जंगल-जमीन पर महज चपरासी या सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी भी नसीब नहीं हो रही है ।

हाल ही में राज्य के उद्योगों में हुई जानलेवा दुर्घटनाओं ने इस सच से पर्दा उठा दिया कि मरने वाले अधिकांश मजदूर बाहरी राज्यों के थे। उद्योगपतियों की क्रूर नीति साफ है—स्थानीय लोगों को नौकरी पर मत रखो, क्योंकि अगर वे हक मांगेंगे तो 'आंदोलन' का खतरा रहेगा। इसलिए मजदूर भी बाहर से मंगाए जा रहे हैं ।

5. 'उलगुलान' की गूंज और सुलगती सियासत

इस गुजराती घुसपैठ के खिलाफ अब बस्तर और सरगुजा ही नहीं, बल्कि छुईखदान समेत छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों में भी 'जल-जंगल-जमीन' की रक्षा के लिए 'उलगुलान' (क्रांति) के नारे गूंजने लगे हैं ।

क्षेत्रीय दलों जैसे छत्तीसगढ़ समाज पार्टी, क्रांति सेना और जय जोहार पार्टी ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है । उनका सीधा आरोप है कि दिल्ली के आकाओं (नरेंद्र मोदी और अमित शाह) के दबाव में विष्णुदेव साय सरकार छत्तीसगढ़ की अस्मिता और संपदा को गुजरात के उद्योगपतियों के हाथों गिरवी रख रही है ।

[OUTRO/CONCLUSION: निष्कर्ष]

क्या छत्तीसगढ़ का नक्शा अब पूरी तरह बदलने वाला है? क्या छत्तीसगढ़िया जनता का सदियों से चला आ रहा शोषण अब कॉर्पोरेट गुलामी के एक नए युग में तब्दील हो जाएगा? 

अमित शाह का बस्तर आना और तत्काल बाद गुजराती कंपनियों को ताबड़तोड़ हरी झंडी मिलना, यह चीख-चीख कर गवाही दे रहा है कि लोकतंत्र की आड़ में कॉर्पोरेट लूट का एक विशाल नेटवर्क काम कर रहा है । पर्यावरण की तबाही और स्थानीय जनता को चपरासी बनाने की कीमत पर खड़ा किया जा रहा यह 'गुजरात मॉडल', छत्तीसगढ़ के सुनहरे भविष्य का निर्माण नहीं, बल्कि उसकी बर्बादी का नया दस्तावेज है।

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