गुरुवार, 11 जून 2026

सुशासन का सच: जब एक अदद छत के लिए अफसरों के पैरों में साष्टांग हुए राष्ट्रपति के 'दत्तक पुत्र'


सुशासन का सच: जब एक अदद छत के लिए अफसरों के पैरों में साष्टांग हुए राष्ट्रपति के 'दत्तक पुत्र'


लोकतंत्र के बंद कमरों में बैठकर जब योजनाएं बनती हैं, तो सरकारी फाइलों और विज्ञापनों पर 'सबका साथ, सबका विकास' और 'अंत्योदय' की चमक बिखरती है। लेकिन जब इन दावों की हकीकत जमीन पर उतरती है, तो वह गरियाबंद जिले के देवभोग में आयोजित 'सुशासन त्योहार' जैसी झकझोर देने वाली तस्वीरों में बदल जाती है।

हाल ही में देवभोग में सरकारी तामझाम के साथ विकास के कसीदे पढ़े जा रहे थे। इसी बीच, पंडाल में कुछ ऐसा हुआ जिसने व्यवस्था के संवेदनहीन चेहरे को पूरी तरह बेनकाब कर दिया। विशेष पिछड़ी जनजाति (कमार) के बेबस आदिवासी महिला-पुरुष अपने हाथों में पात्रता के दस्तावेज लिए जिला पंचायत सीईओ के पैरों में साष्टांग दंडवत हो गए। आँखों में आंसू, सीने में बेबसी और जुबां पर एक अदद प्रधानमंत्री आवास (PM Awas) की गुहार। यह दृश्य सिर्फ आवेदन देने का कोई तरीका नहीं था, बल्कि यह हमारे सिस्टम की उस कड़वी हकीकत का प्रमाण था जो यह सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर 'आदिवासी बहुल' और 'आदिवासी मुख्यमंत्री' वाले राज्य में मूल निवासी इस कदर मजबूर क्यों हैं?

### **'डबल इंजन' के दावे बनाम दफ्तरों के चक्कर**

सूबे में सत्ता परिवर्तन के बाद पहली ही कैबिनेट में 18 लाख प्रधानमंत्री आवास स्वीकृत करने का बड़ा ऐलान किया गया था। खुद मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने मंचों से साफ लहजे में चेतावनी दी थी कि, *"अगर पीएम आवास को लेकर कहीं से भी कोई शिकायत आई, तो सीधे उस जिले के कलेक्टर के ऊपर कार्रवाई होगी।"* मुख्यमंत्री की इस सख्त हिदायत के बावजूद जमीनी हकीकत जस की तस है।

पैर पकड़ने को मजबूर हुए कमार आदिवासियों का दर्द है कि वे दफ्तरों के सैकड़ों चक्कर काट चुके हैं। हर बार उन्हें 'कल आना', 'फंड नहीं आया' या 'सर्वे में नाम नहीं है' जैसे जुमले थमाकर टरका दिया जाता है। अंत में थक-हारकर, बेबसी के इस चरम पर उन्होंने अफसरों के पैरों में गिरना ही अपना आखिरी रास्ता चुन लिया।

### **स्वाभिमानी समाज को घुटनों पर लाने का जिम्मेदार कौन?**

विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि व्यवस्था के आगे गिड़गिड़ाने वाले ये लोग कमार जनजाति से आते हैं, जिन्हें देश में राष्ट्रपति का 'दत्तक पुत्र' माना जाता है और संविधान में विशेष संरक्षण प्राप्त है। जो आदिवासी समाज अपनी आत्मनिर्भरता, जल-जंगल-जमीन की रक्षा और अद्वितीय स्वाभिमानी संस्कृति के लिए जाना जाता है, जो कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाता, उस समाज को एक छत के लिए अफसरों के पैरों की धूल चाटने पर मजबूर होना पड़ रहा है।

इस घटना के बाद राजनीतिक गलियारों में भी घमासान शुरू हो गया है। विपक्ष ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा है कि सरकार करोड़ों रुपये विज्ञापनों और सुशासन उत्सवों में अपनी छवि चमकाने के लिए पानी की तरह बहा रही है, लेकिन अंत्योदय की कतार में खड़ा आखिरी व्यक्ति आज भी बुनियादी हकों से महरूम है।

 मुख्यमंत्री की चेतावनी बेअसर, नौकरशाही बेफिक्र?**

> मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने साफ कहा था कि पीएम आवास में गड़बड़ी होने पर कलेक्टर नापे जाएंगे। गरियाबंद की इस मर्मांतक घटना के बाद अब जनता पूछ रही है कि क्या संवेदनहीनता की पराकाष्ठा पार करने वाले इस सिस्टम और जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई ठोस जवाबदेही तय होगी या खोखली चेतावनियों के सहारे ही सुशासन का ढोल पीटा जाता रहेगा?

विज्ञापनों की चमक में गुम होती आदिवासियों की चीख**

> राज्य में बड़े-बड़े आयोजनों, उत्सवों और प्रचार-प्रसार पर जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। विडंबना देखिए कि एक तरफ सरकार अपनी पीठ थपथपाने में व्यस्त है, तो दूसरी तरफ एक गरीब परिवार को महज कुछ हजार रुपयों की आवास की किश्त के लिए प्रशासनिक चौखट पर अपना आत्मसम्मान गिरवी रखना पड़ रहा है।

### **बड़ा सवाल: यह विकास है या विनाश?**

मौके पर मौजूद अधिकारियों ने कैमरों की चमक को देखते हुए आदिवासियों को जमीन से उठा तो दिया, क्योंकि उनके पास पद और कलम की ताकत थी, लेकिन सवाल यह है कि क्या उनका मकान स्वीकृत हुआ? यह घटना केवल एक ब्लॉक या जिले की नहीं है, बल्कि यह उस प्रशासनिक ढर्रे (Pattern) को उजागर करती है जहां आम नागरिक को अपने हक की भीख मांगनी पड़ती है।

छत्तीसगढ़ आज नक्सलवाद को पीछे छोड़कर जब शांति और मुख्यधारा की ओर बढ़ रहा है, तब आदिवासियों के मन में व्यवस्था के प्रति ऐसा अविश्वास पैदा करना बेहद खतरनाक हो सकता है। आज अगर इस प्रशासनिक संवेदनहीनता पर सवाल नहीं उठाए गए, तो यह सड़न कल किसी के भी दरवाजे तक पहुंच सकती है। सवाल सीधे सरकार की नीयत और नौकरशाही के रवैये पर खड़ा है।

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